Book Title: Sramana 1997 10
Author(s): Ashok Kumar Singh
Publisher: Parshvanath Vidhyashram Varanasi
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Page #1 -------------------------------------------------------------------------- ________________ श्रमण ŚRAMAŅA अक्टूबर - दिसम्बर १६६७ HAR पार्श्वनाथ विद्यापीठ, वाराणसी LES PĀRŚVANĀTHA VIDYAPITHA, VARANASI. JaraanizIRIRANIBRARIBIRTER M ARATrarriaTWIaraiNT नRINorg Page #2 -------------------------------------------------------------------------- ________________ श्रमण पार्श्वनाथ विद्यापीठ की त्रैमासिक शोध-पत्रिका वर्ष-४८] अंक १०-१२] [अक्टूबर-दिसम्बर १९९७ प्रधान सम्पादक प्रोफेसर सागरमल जैन सम्पादक मण्डल डॉ अशोक कुमार सिंह डॉ शिवप्रसाद डॉ० श्रीप्रकाश पाण्डेय प्रकाशनार्थ लेख-सामग्री, समाचार, विज्ञापन, सदस्यता आदि के लिए सम्पर्क करें प्रधान सम्पादक श्रमण पार्श्वनाथ विद्यापीठ आई०टी०आई० मार्ग, करौंदी पो०ऑ०-बी०एच०यू० वाराणसी-२२१००५ दूरभाषः ३१६५२१, ३१८०४६ .. वार्षिक सदस्यता शुल्क संस्थाओं के लिए रू० ६०.०० व्यक्तियों के लिए स० ५०.०० एक प्रति स० १५.०० . . . . __ आजीवन सदस्यता शुल्क संस्थाओं के लिए स० १०००.०० व्यक्तियों के लिए स० ५००.०० यह आवश्यक नहीं कि लेखक के विचारों से सम्पादक सहमत हों Page #3 -------------------------------------------------------------------------- ________________ श्रमण प्रस्तुत अंक में लेख पृष्ठ संख्या 0 0 0 0 जैन आगमों की मूल भाषा : अर्धमागधी या शौरसेनी १-२८ डॉ० सागरमल जैन दशाश्रुतस्कंधनियुक्ति : अन्तरावलोकन ३१-४४ डॉ० अशोक कुमार सिंह षट्प्राभृत के रचनाकार और उसका रचनाकाल ४५-५२ डॉ० के० आर० चन्द्र जैन आगमों में धर्म-अधर्म (द्रव्य) : एक ऐतिहासिक विवेचन ५३-७२ डॉ० विजय कुमार पंचकारण समवाय ७३-८० डॉ० रतनचन्द्र जैन अड्डालिजीय गच्छ ८१-८२ डॉ० शिवप्रसाद जर्मन जैन श्राविका डॉ० शेर्लोट क्राउझे ८३-६२ हजारीमल बांठिया 0 0 0 0 जैन जगत् • ६३-१०५ 107-118 0 Aştakaprakaraņa : An Introduction Dr. Ashok Kumar Singh 0 1-28 Navatattvaprakaraņa Translated by: Dr. Shriprakash Pandey Page #4 -------------------------------------------------------------------------- ________________ श्रमण जैन आगमों की मूल भाषा : अर्धमागधी या शौरसेनी ? प्रो० सागरमल जैन* वर्तमान में 'प्राकृत - विद्या' नामक शोध पत्रिका के माध्यम से जैन विद्या के विद्वानों का एक वर्ग आग्रहपूर्वक यह मत प्रतिपादित कर रहा है कि “जैन आगमों की मूल भाषा शौरसेनी प्राकृत थी, जिसे कालान्तर में परिवर्तित करके अर्धमागधी बना दी गई" । इस वर्ग का यह भी दावा है कि शौरसेनी प्राकृत ही प्राचीनतम् प्राकृत है और अन्य सभी प्राकृतें यथा-मागधी, पैशाची, महाराष्ट्री आदि इसी से विकसित हुई हैं, अतः वे सभी शौरसेनी प्राकृत से परवर्ती भी हैं। इसी क्रम में दिगम्बर परम्परा में आगमों के रूप में मान्य आचार्य कुन्दकुन्द के ग्रन्थों में निहित अर्धमागधी और महाराष्ट्री शब्दरूपों को परिवर्तित कर उन्हें शौरसेनी में रूपान्तरित करने का एक सुनियोजित प्रयत्न भी किया जा रहा है। इस समस्त प्रचार-प्रसार के पीछे मूलभूत उद्देश्य यह है कि श्वेताम्बर मान्य आगमों को दिगम्बर परम्परा में मान्य आगमतुल्य ग्रन्थों से अर्वाचीन और अपने शौरसेनी में निबद्ध आगमतुल्य ग्रन्थों को प्राचीन सिद्ध किया जाये । इस पारस्परिक विवाद का एक परिणाम यह भी हो रहा है कि श्वेताम्बर - दिगम्बर परम्परा के बीच कटुता की खाईं गहरी होती जा रही है और इन सब में एक निष्पक्ष भाषाशास्त्रीय अध्ययन को पीछे छोड़ दिया जा रहा है। प्रस्तुत निबन्ध में मैं इन सभी प्रश्नों पर श्वेताम्बर एवं दिगम्बर परम्परा में आगम रूप में मान्य ग्रन्थों के आलोक में चर्चा करने का प्रयत्न करूंगा । 1 क्या आगम साहित्य मूलतः शौरसेनी प्राकृत में निबद्ध था ? यहां सर्वप्रथम मैं इस प्रश्न की चर्चा करना चाहूंगा कि क्या जैन आगम साहित्य मूलतः शैरसेनी प्राकृत 'में निबद्ध था और उसे बाद में परिवर्तित करके अर्धमागधी रूप मानद निदेशक, पार्श्वनाथ विद्यापीठ वाराणसी। Page #5 -------------------------------------------------------------------------- ________________ 2 : श्रमण/अक्टूबर-दिसम्बर /१६६७ दिया गया? जैन विद्या कुछ के विद्वानों की यह मान्यता है कि जैन आगम साहित्य मूलतः शौरसेनी प्राकृत में निबद्ध हुआ था और उसे बाद में अर्धमागधी में रूपान्तरित किया गया। अपने इस कथन के पक्ष में वे श्वेताम्बर, दिगम्बर किन्हीं भी आगमों का प्रमाण न देकर प्रो० टॉटिया के व्याख्यान से कुछ अंश उद्धृत करते हैं। डॉ० सुदीप जैन ने प्राकृत विद्या जनवरी-मार्च ६६ के सम्पादकीय में उनके कथन को निम्न रूप में प्रस्तुत किया है: “हाल ही में श्री लालबहादुरशास्त्री संस्कृत विद्यापीठ में सम्पन्न द्वितीय आचार्य कुन्दकुन्दस्मृति व्याख्यानमाला में विश्वविश्रुत भाषाशास्त्री एवं दार्शनिक विचारक प्रो० नथमल जी टॉटिया ने स्पष्ट रूप से घोषित किया कि “श्रमण-साहित्य का प्राचीन रूप, चाहे वे बौद्धों के त्रिपिटक आदि हों, श्वेताम्बरों के आचारांगसूत्र, दशवैकालिकसूत्र आदि हों अथवा दिगम्बरों के षट्खण्डागमसूत्र, समयसार आदि हों, सभी शौरसेनी प्राकृत में ही निबद्ध थे। उन्होंने आगे सप्रमाण स्पष्ट किया कि बौद्धों ने बाद में श्रीलंका में एक बृहत्संगीति में योजनापूर्वक शौरसेनी में निबद्ध बौद्धसाहित्य का मागधीकरण किया और प्राचीन शौरसेनी में निबद्ध बौद्ध साहित्य के ग्रंथों को अग्निसात कर दिया। इसी प्रकार श्वेताम्बर जैन साहित्य का भी प्राचीन रूप शौरसेनी प्राकृत में ही था, जिसका रूप क्रमशः अर्धमागधी में बदल गया। यदि हम वर्तमान अर्धमागधी आगम साहित्य को ही मूल श्वेताम्बर आगम साहित्य मानने पर जोर देंगे, तो इस अर्धमागधी भाषा का आज से पन्द्रह सौ वर्ष के पहिले अस्तित्व ही नहीं होने से इस स्थिति में हमें अपने आगम साहित्य को भी ५०० वर्ष ई० के परवर्ती मानना पड़ेगा। "उन्होंने स्पष्ट किया कि आज भी आचारांगसूत्र आदि की प्राचीन प्रतियों में शौरसेनी के शब्दों की प्रचुरता मिलती है, जबकि नये प्रकाशित संस्करणों में उन शब्दों का अर्द्धमागधीकरण हो गया है। उन्होनें कहा कि पक्षव्यामोह के कारण ऐसे परिवर्तनों से हम अपने साहित्य का प्राचीन मूलरूप खो रहे हैं। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि दिगम्बर जैन साहित्य में ही शौरसेनी भाषा के प्राचीनरूप सुरक्षित उपलब्ध हैं।" निस्संदेह प्रो० टॉटिया जैन और बौद्ध विद्याओं के वरिष्ठतम् विद्वानों में एक हैं और उनके कथन का कोई अर्थ और आधार भी होगा। किन्तु ये कधन उनके अपने हैं या उन्हें अपने पक्ष की पुष्टि हेतु तोड़-मरोड़ कर प्रस्तुत किया गया है, यह एक विवादास्पद प्रश्न है? क्योंकि एक ओर तुलसीप्रज्ञा के सम्पादक का कहना हैं कि टॉटिया जी ने इसका खण्डन किया है। वे तुलसीप्रज्ञा (अप्रैल-जून, ६६ खण्ड २२ अंक ४) में लिखते हैं कि Page #6 -------------------------------------------------------------------------- ________________ जैन आगमों की मूल भाषा : अर्धमागधी या शौरसेनी? : 3 डॉ० नथमल टॉटिया ने दिल्ली की एक पत्रिका में छपे और उनके नाम से प्रचारित इस कथन का खण्डन किया है कि महावीरवाणी शौरसेनी प्राकृत में निबद्ध हुई। उन्होंने स्पष्ट मत प्रकट किया कि आचारांग, उत्तरध्ययन, सूत्रकृतांग और दशवैकालिक में अर्धमागधी भाषा का उत्कृष्ट रूप है"। दूसरी ओर प्राकृत-विद्या के सम्पादक डॉ० सुदीपजी का कथन है कि उनके व्याख्यान की टेप हमारे पास उपलब्ध है और हमने उन्हें अविकल रूप से यथावत दिया है। मात्र इतना ही नहीं डॉ० सुदीपजी का तो यह भी कथन है कि तुलसीप्रज्ञा के खण्डन के बाद भी वे टॉटिया जी से मिले हैं और टॉटिया जी ने उन्हें कहा है कि वे अपने कथन पर आज भी दृढ़ हैं। टॉटिया जी के इस कथन को उन्होंने प्राकत-विद्या जुलाई-सितम्बर ६६ के अंक में निम्न शब्दों में प्रस्तुत कियाः “मैं संस्कृत विद्यापीठ की व्याख्यानमाला में प्रस्तुत तथ्यों पर पूर्णतया दृढ़ हूँ तथा यह मेरी तथ्याधारित स्पष्ट आवधारणा है जिससे विचलित होने का प्रश्न ही नहीं उठता है"। (पृ०.६) . यह समस्त विवाद दो पत्रिकाओं के माध्यम से दोनों सम्पादकों के मध्य है, किन्तु इस विवाद में सत्यता क्या है और डॉ० टॉटिया का मूल मन्तव्य क्या है, इसका निर्णय तो तभी सम्भव है जब डॉ० टॉटिया स्वयं इस सम्बन्ध में लिखित वक्तव्य दें, किन्तु वे इस संबंध में मौन हैं। मैंने स्वयं उन्हें पत्र लिखा था, किन्तु उनका कोई प्रत्युत्तर नहीं आया। जहां तक प्रो० टाटिया के वक्तव्य का प्रश्न है वे जैन धर्म दर्शन के एक गहन अध्येता तथा स्पष्टवादी वक्ता हैं। तथ्य से परे उनका कभी कोई वक्तव्य मेरी जानकारी में नहीं आया। डॉ० सुदीप जी का प्राकृत विद्या में उल्लिखित कथन कहां तक सत्य है यह बिना किसी ठोस प्रमाण के कहना उचित नहीं होगा। मेरी अन्तरात्मा यह स्वीकार नहीं करती है कि डॉ० टॉटिया जैसे गम्भीर विद्वान् बिना प्रमाण के ऐसे वक्तव्य दें। कहीं न कहीं शब्दों की कोई जोड़-तोड़ अवश्य हो रही है। डॉ० सुदीपजी प्राकृत-विद्या जुलाई-सितम्बर ६६ में डॉ० टॉटिया जी के उक्त व्याख्यानों के विचार बिन्दुओं को अविकल रूप से प्रस्तुत करते हुए लिखते हैं कि “हरिभद्र का सारा योगशतक धवला से है।" है इसका तात्पर्य है कि हरिभद्र के योगशतक को धवला के आधार पर बनाया गया है। क्या टॉटिया जी जैसे विद्वान् को इतना भी इतिहास बोध नहीं हैं कि योगशतक Page #7 -------------------------------------------------------------------------- ________________ 4 : श्रमण/अक्टूबर-दिसम्बर/१६६७ के कर्ता हरिभद्रसूरि और धवला के कर्ता में कौन पहले हुआ है? यह तो ऐतिहासिक सत्य है कि हरिभद्रसूरि का योगशतक (आठवीं शती) धवला (१०वीं शती) से पूर्ववर्ती है। मुझे विश्वास ही नहीं होता हैं, कि टॉटिया जी जैसा विद्वान् इस ऐतिहासिक सत्य को अनदेखा कर दे। कहीं न कहीं उनके नाम पर कोई भ्रम खड़ा किया जा रहा है। डॉ० टॉटिया जी को अपनी चुप्पी तोड़कर इस भ्रम का निराकरण करना चाहिए । वस्तुतः यदि कोई भी चर्चा प्रमाणों के आधार पर नहीं होती है तो उसे कैसे मान्य किया जा सकता है, फिर चाहे उसे कितने ही बड़े विद्वान ने क्यों न कहा हो? यदि व्यक्ति का ही महत्त्व मान्य है, तो अभी संयोग से टॉटिया जी से भी वरिष्ठ अन्तर्राष्ट्रीय ख्याति के जैन बौद्ध विद्याओं के महामनीषी और स्वयं टॉटिया जी के गुरु पद्मविभूषण पं० दलसुखभाई मालवणिया हमारे बीच हैं, फिर तो उनके कथन को अधिक प्रामाणिक मानकर प्राकृत-विद्या के सम्पादक को स्वीकार करना होगा। खैर यह सब प्रास्ताविक बातें थीं, जिससे यह समझा जा सके कि समस्या क्या है, कैसे उत्पन्न हुई और प्रस्तुत स्पष्टीकरण की क्या आवश्यकता है? हमें तो व्यक्तियों के कथनों या वक्तव्यों पर न जाकर तथ्यों के प्रकाश में इसकी समीक्षा करनी है कि आगमों की मूलभाषा क्या थी और अर्धमागधी और शौरसेनी में कौन प्राचीन है? आगमों की मूलभाषा अर्धमागधी - यह एक सुनिश्चित सत्य है कि महावीर का जन्मक्षेत्र और कार्यक्षेत्र दोनों ही मुख्य रूप से मगध और उसके समीपवर्ती क्षेत्र में ही था, अतः यह स्वाभाविक है कि उन्होंने जिस भाषा को बोला होगा वह समीपवर्ती क्षेत्रीय बोलियों से प्रभावित मागधी अर्थात् अर्धमागधी ही रही होगी। व्यक्ति की भाषा कभी भी अपनी मातृभाषा से अप्रभावित नहीं होती है। पुनः श्वेताम्बर परम्परा में मान्य जो भी आगम साहित्य आज उपलब्ध हैं, उनमें अनेक ऐसे सन्दर्भ हैं, जिनमें स्पष्ट रूप से यह उल्लेख है कि महावीर ने अपने उपदेश अर्धमागधी भाषा में दिये थे। इस सम्बन्ध में अर्धमागधी आगम साहित्य से कुछ प्रमाण प्रस्तत किये जा रहे हैं यथाः१. भगवं च णं अद्धमागहीए भासाए धम्ममाइक्खइ। - समवायांग, समवाय ३४ सूत्र २२. २. तए णं समणे भगवं महावीरे कुणिअस्स भंभसारपुतस्स अद्धमागहीए भासाए भासत्ति Page #8 -------------------------------------------------------------------------- ________________ जैन आगमों की मूल भाषा अर्धमागधी या शौरसेनी : 5 अरिहाधम्मं परिकहइ । - औपपातिकसूत्र. ३. गोयमा । देवाणं अद्धमागहीए भासाए भासंति सवियणं अद्धमागहा भासा भासिज्जमाणी विसज्जति। -भगवई, लाडनूंः शतक५ उद्देशक ४ सूत्र ६३. ४. तए णं समणे भगवं महावीरे उसभदत्त माहणस्स देवाणंदा माहणीए तीसे य महति महलियाए इसिपरिसाए मुणिपरिसाए जइपरिसाए.... सव्व भासणुगामणिए सरस्सईए जोयणणीहारिणासरेणं अद्धम गहाए भासाए भासइ धम्मं परिकहइ । भगवई लाडनूं, शतक ६, उद्देशक ३३, सूत्र १४६. ५. तए णं समणे भगवं महावीरे जामालिस्स खत्तियकुमारस्स..अद्धमागहाए भासाए भासइ धम्मं परिकहइ। -भगवई, लाडनूः शतक ६, उद्देशक ३३, सूत्र १६३. ६. सव्वसत्तसमदरिसीहिं अर्द्धमागहीए भासाए सुत्तं उवदिट्ठं । - आचारांग चूर्णि, जिनदासगणि पृ० २५५. मात्र इतना ही नहीं, दिगम्बर परम्परा में मान्य आचार्य कुन्दकुन्द के ग्रन्थ बोधपाहुड, जो स्वयं शौरसेनी में निबद्ध हैं, उसकी टीका में दिगम्बर आचार्य श्रुतसागर जी लिखते हैं कि भगवान् महावीर ने अर्धमागधी भाषा में अपना उपदेश दिया । प्रमाण के लिये उस टीका के अनुवाद का वह अंश प्रस्तुत है । -अर्थ मगध देश भाषात्मक और अर्ध सर्वभाषात्मक भगवान् की ध्वनि खिरती है। शंका -अर्धमागधी भाषा देवकृत अतिशय कैसे हो सकती है, क्योंकि भगवान् की भाषा ही अर्धमागधी है ? उत्तर - मगध देव के सान्निध्य से होने से आचार्य प्रभाचन्द्र ने नन्दीश्वर भक्ति के अर्थ में लिखा है- “एक योजन तक भगवान् की वाणी स्वयंमेव सुनाई देती है उसके आगे संख्यात योजनों तक उस दिव्यध्वनि का विस्तार मगध जाति के देव करते हैं। अतः अर्धमागधी भाषा देवकृत है । ( षट्प्राभृतम् चतुर्थ बोधपाहुड टीका पृ० १७६/३२) 1 मात्र यही नहीं वर्तमान में भी दिगम्बर परम्परा के महान् संत एवं आचार्य विद्यासागर जी के प्रमुख शिष्य मुनि श्री प्रमाण सागरजी अपनी पुस्तकं जैनधर्मदर्शन, में लिखते हैं कि उन भगवान् महावीर का उपदेश सर्वग्राह्य अर्धमागधी भाषा में हुआ । जब श्वेताम्बर और दिगम्बर दोनों ही परम्पराएँ यह मानकर चल रही हैं कि भगवान् का उपदेश अर्धमागधी में हुआ था और इसी भाषा में उनके उपदेशों के आधार पर आगमों का प्रणयन हुआ तो फिर शौरसेनी के नाम से नया विवाद खड़ा करके Page #9 -------------------------------------------------------------------------- ________________ 6 : श्रमण/अक्टूबर-दिसम्बर/१६६७ इस खाईं को चौड़ा क्यों किया जा रहा है? यह तो आगमिक प्रमाणों की चर्चा हुई। व्यावहारिक एवं ऐतिहासिक तथ्य भी इसी की पुष्टि करते हैं१. यदि महावीर ने अपने उपदेश अर्धमागधी में दिये तो यह स्वाभाविक है कि गणधरों ने उसी भाषा में आगमों का प्रणयन किया होगा। अतः सिद्ध है कि आगमों की मूल भाषा क्षेत्रीय बोलियों से प्रभावित मागधी अर्थात् अर्धमागधी रही है, यह मानना होगा। २. इसके विपरीत शौरसेनी आगमतुल्य मान्य ग्रन्थों में किसी एक भी ग्रन्थ में एक भी सन्दर्भ ऐसा नहीं है, जिससे यह प्रतिध्वनित भी होता हो कि आगमों की मूल भाषा शौरसेनी प्राकृत थी। उनमें मात्र यह उल्लेख है कि तीर्थंकरों की जो वाणी खिरती है, वह सर्वभाषारूप परिणत होती है। उसका तात्पर्य मात्र इतना ही है कि उनकी वाणी जनसाधारण को आसानी से समझ में आती थी। वह लोकवाणी थी। उसमें मगध के निकटवर्ती क्षेत्रों की क्षेत्रीय बोलियों के शब्द रूप भी होते थे और यही कारण था कि उसे मागधी न कहकर अर्धमागधी कहा गया था। जो ग्रन्थ जिस क्षेत्र में रचित या सम्पादित होता है, उसका वहां की बोली से प्रभावित होना स्वाभाविक है। प्राचीन स्तर के जैन आगम यथा आचारांग, सूत्रकृतांग, इसिभासियाई (ऋषिभाषित), उत्तराध्ययन, दशवैकालिक आदि मगध और उसके समीपवर्ती क्षेत्र में रचित हैं और उनमें इसी क्षेत्र के नगरों आदि की सूचनाएं हैं। मूल आगमों में एक भी ऐसी सूचना नहीं है कि महावीर ने बिहार, बंगाल और पूर्वी उत्तर प्रदेश से आगे विहार किया हो। अतः उनकी भाषा अर्थमागधी ही रही होगी। ४. पुनः आगमों की प्रथम वाचना पाटलिपुत्र में और दूसरी खण्डगिरि (उड़ीसा) में हुई, ये दोनों क्षेत्र मथुरा से पर्याप्त दूरी पर स्थित हैं, अतः कम से कम प्रथम और द्वितीय वाचना के समय तक अर्थात् ई०पू० दूसरी शती तक उनके शौरसेनी में रूपान्तरित होने का या उससे प्रभावित होने का प्रश्न ही नहीं उठता है। यह सत्य है कि उसके पश्चात् जब जैन धर्म एवं विद्या का केन्द्र पाटलिपुत्र से हटकर लगभग ई०पू० प्रथम शती में मथुरा बना तो उस पर शौरसेनी का प्रभाव आना प्रारम्भ हुआ। यद्यपि मथुरा से प्राप्त दूसरी शती तक के अभिलेखों का शौरसेनी Page #10 -------------------------------------------------------------------------- ________________ जैन आगमों की मूल भाषा : अर्धमागधी या शौरसेनी : 7 के प्रभाव से मुक्त होना यही सिद्ध करता है कि जैनागमों पर शौरसेनी का प्रभाव दूसरी शती के पश्चात् ही प्रारम्भ हुआ होगा। सम्भवतः फल्गुमित्र (दूसरी शती) के समय या उसके भी पश्चात् स्कंदिल (चतुर्थ शती) की माधुरी वाचना के समय उन पर शौरसेनी प्रभाव आया था, यही कारण है कि यापनीय परम्परा में मान्य आचारांग, उत्तराध्ययन, दशवैकालिक, निशीथ, कल्प, आदि जो आगम रहे हैं, वे शौरसेनी से प्रभावित रहे हैं। यदि डॉ० टॉटिया ने यह कहा है कि आचारांग आदि श्वेताम्बर आगमों का शौरसेनी प्रभावित संस्करण भी था जो मथुरा क्षेत्र में विकसित यापनीय परम्परा को मान्य था, तो उनका कथन सत्य है क्योंकि भगवती आराधना की टीका में आचारांग, उत्तराध्ययन, निशीथ, आदि के जो संदर्भ दिये गये हैं वे सभी शौरसेनी से प्रभावित हैं। किन्तु इसका यह अर्थ कदापि नहीं है कि आगमों की रचना शौरसेनी में हुई थी और बाद में वे अर्धमागधी में रूपान्तरित किये गये। ज्ञातव्य है कि यह माथुरी वाचना स्कंदिल के समय महावीर निर्वाण के लगभग आठ सौ वर्ष पश्चात् हुई थी और उसमें जिन आगमों की वाचना हुई, वे सभी उसके पूर्व अस्तित्व में थे। यापनीयों ने आगमों के इसी शौरसेनी प्रभावित संस्करण को मान्य किया था, किन्तु दिगम्बरों को तो वे आगम भी मान्य नहीं थे, क्योंकि उनके अनुसार तो इस माथुरी वाचना के लगभग दो सौ वर्ष पूर्व ही आगम साहित्य विलुप्त हो चुका था। श्वेताम्बर परम्परा में मान्य आचारांग, सूत्रकृतांग, ऋषिभाषित, उत्तराध्ययन, दशवकालिक, कल्प, व्यवहार, निशीथ आदि तो ई०पू० चौथी शती से दूसरी शती तक की रचनाएँ हैं, जिसे पाश्चात्य विद्वानों ने भी स्वीकार किया है। ज्ञातव्य है कि मथुरा का जैन विद्या के केन्द्र के रूप में विकास ई०पू० प्रथम शती से ही हुआ है और उसके पश्चात् ही इन आगमों पर शौरसेनी प्रभाव आया होगा। आगमों के भाषिक स्वरूप में परिवर्तन कब और कैसे? यहाँ यह भी ज्ञातव्य है कि स्कंदिल की इस माथुरी वाचना के समय ही समानान्तर रूप से एक वाचना वलभी (गुजरात) में नागार्जुन की अध्यक्षता में हुई थी और इसी काल में उन पर महाराष्ट्री प्रभाव भी आया। क्योंकि उस क्षेत्र की प्राकृत महाराष्ट्री प्राकृत थी। इसी महाराष्ट्री प्राकृत से प्रभावित आगम आज तक श्वेताम्बर परम्परा में मान्य हैं। अतः इस तथ्य को भी स्पष्ट रूप से समझ लेना चाहिए कि आगमों के महाराष्ट्री प्रभावित और शौरसेनी प्रभावित संस्करण जो लगभग ईसा की चतुर्थ-पंचम शती में अस्तित्व में आये, उनका मूल आधार अर्धमागधी आगम ही थे। यह भी ज्ञातव्य है कि न तो स्कंदिल की माथुरी वाचना में और न नागार्जुन की वलभी वाचना में आगमों की भाषा Page #11 -------------------------------------------------------------------------- ________________ 8: श्रमण/अक्टूबर-दिसम्बर/१६६७ में सोच-समझ पूर्वक कोई परिवर्तन किया गया था। वास्तविकता यह है कि उस युग तक आगम कण्ठस्थ चले आ रहे थे और कोई भी कण्ठस्थ ग्रन्थ स्वाभाविक रूप से कण्ठस्थ करने वाले व्यक्ति की क्षेत्रीय बोली से अर्थात् उच्चारण शैली से अप्रभावित नहीं रह सकता है, यही कारण था कि जो उत्तर भारत का निर्ग्रन्थ संघ मथुरा में एकत्रित हुआ उसके आगम पाठ उस क्षेत्र की बोली-शौरसेनी से प्रभावित हुए और जो पश्चिमी भारत का निर्ग्रन्थ संघ वलभी में एकत्रित हुआ उसके आगम पाठ उस क्षेत्र की बोली महाराष्ट्री प्राकृत से प्रभावित हुए। पुनः यह भी स्मरण रखना चाहिए कि इन दोनों वाचनाओं में सम्पादित आगमों का मूल आधार तो अर्धमागधी आगम ही थे, यही कारण है कि शौरसेनी आगम न तो शुद्ध शौरसेनी में हैं और न वलभी वाचना के आगम शुद्ध महाराष्ट्री में हैं, उन दोनों में अर्धमागधी के शब्द रूप तो उपलब्ध होते ही हैं। शौरसेनी आगमों में तो अर्धमागधी के साथ-साथ महाराष्ट्री प्राकृत के शब्द रुप भी बहुलता से मिलते हैं, यही कारण है कि भाषाविद् उनकी भाषा को जैन शौरसेनी और जैन महाराष्ट्री कहते हैं। दुर्भाग्य तो यह हैं कि जिन शौरसेनी आगमों की दुहाई दी जा रही है, उनमें से अनेक ५० प्रतिशत से अधिक अर्धमागधी और महाराष्ट्री प्राकृत से प्रभावित हैं। श्वेताम्बर और दिगम्बर मान्य आगमों में प्राकृत के रूपों का जो वैविध्य है, उसके कारणों की विस्तृत चर्चा मैंने अपने लेख 'जैन आगमों में हुआ भाषिक स्वरूप परिवर्तनः एक विमर्श' सागर जैन विद्याभारती, भाग १, पृ० २३६-२४३ में की है। प्रस्तुत प्रसंग में उसका निम्न अंश द्रष्टव्य हैं: ___“जैन आगमिक एवं आगम रूप में मान्य अर्धमागधी तथा शौरसेनी ग्रन्थों के भाषिक स्वरूप में परिवर्तन क्यों हुआ? इस प्रश्न का उत्तर अनेक रूपों में दिया जा सकता है। वस्तुतः इन ग्रन्थों में हुए भाषिक परिवर्तनों का कोई एक ही कारण नहीं है, अपितु अनेक कारण हैं, जिन पर हम क्रमशः विचार करेंगे:१. भारत में वैदिक परम्परा में वेद वचनों को मंत्र रूप में मानकर उनके स्वर-व्यंजन की उच्चारण योजना को अपरिवर्तनीय बनाये रखने पर अधिक बल दिया गया, उनके लिये शब्द और ध्वनि ही महत्त्वपूर्ण रही और अर्थ गौण रहा। यही कारण है कि आज भी अनेक वेदपाठी ब्राह्मण ऐसे हैं, जो वेदमंत्रों की उच्चारण शैली, लय आदि के प्रति अत्यन्त सतर्क रहते हैं, किन्तु वे उनके अर्थों को नहीं जानते हैं। यही कारण है कि वेद शब्द रूप में यथावत बने रहे। इसके विपरीत जैन परम्परा में यह माना गया कि तीर्थंकर अर्थ के उपदेष्टा होते हैं उनके वचनों को शब्द Page #12 -------------------------------------------------------------------------- ________________ जैन आगमों की मूल भाषा : अर्धमागधी या शौरसेनी : 9 रूप तो गणधर आदि द्वारा दिया जाता है। अतः जैनाचार्यों के लिये अर्थ या कथन का तात्पर्य ही प्रमुख था, उन्होंने कभी भी शब्दों पर बल नहीं दिया। शब्दों में चाहे परिवर्तन हो जाए, लेकिन अर्थों में परिवर्तन नहीं होना चाहिए, जैन आचार्यों का यही प्रमुख लक्ष्य रहा। शब्द रूपों की उनकी इस उपेक्षा के फलस्वरूप आगमों के भाषिक स्वरूप में परिवर्तन होते गये। इसी क्रम में ईसा की चतुर्थ शती में अर्धमागधी आगमों के शौरसेनी प्रभावित और महाराष्ट्री प्रभावित संस्करण अस्तित्व में आये। __ आगम साहित्य में जो भाषिक परिवर्तन हुए उसका दूसरा कारण यह था कि जैन भिक्षु संघ में विभिन्न प्रदेशों के भिक्षु सम्मलित थे। अपनी-अपनी प्रादेशिक बोलियों से प्रभावित होने के कारण उनकी उच्चारण शैली में भी स्वाभाविक भिन्नता रहती थी, फलतः उनके द्वारा कण्ठस्थ आगम साहित्य के भाषिक स्वरूप में भिन्नताएं आ गयीं। ३. जैन भिक्षु सामान्यतया भ्रमणशील होते हैं, उनकी भ्रमणशीलता के कारण उनकी बोलियों, भाषाओं पर अन्य प्रदेशों की बोलियों का भी प्रभाव पड़ता था, फलतः आगमों के भाषिक स्वरूप में भी परिवर्तन हुआ और उनमें तत् तत् क्षेत्रीय बोलियों का मिश्रण होता गया। उदाहरण के रूप में जब पूर्व का भिक्षु पश्चिमी प्रदेशों में अधिक विहार करता है, तो उसकी भाषा में पूर्व एवं पश्चिमी दोनों की ही बोलियों का प्रभाव आ जाता है और यही कारण था कि उनके द्वारा कण्ठस्थ आगम के भाषिक स्वरूप की एकरूपता समाप्त हो गई। ४. सामान्यतया बुद्ध के वचन उनके निर्वाण के २००-३०० वर्षों के ही अन्दर लिखित रूप में आ गए। अतः उनके भाषिक स्वरूप में उनके रचनाकाल के बाद बहुत अधिक परिवर्तन नहीं आया, तथापि उनकी उच्चारण शैली विभिन्न देशों में भिन्न-भिन्न रही है। आज भी लंका, बर्मा, थाईलैण्ड आदि देशों के भिक्षुओं का त्रिपिटक का उच्चारण भिन्न-भिन्न होता है, फिर भी उनके लिखित स्वरूप में बहुत कुछ एकरूपता है। इसके विपरीत जैन आगमिक एवं आगमतुल्य साहित्य एक सुदीर्घकाल तक लिखित रूप में नहीं आ सका, वह गुरु-शिष्य परम्परा से मौखिक ही चलता रहा। फलतः देशकालगत उच्चारण भेद से उनको लिपिबद्ध करते समय उनके भाषिक स्वरूप में भी परिवर्तन होता गया। मात्र यही नहीं; लिखित प्रतिलिपियों के पाठ भी प्रतिलिपिकारों की असावधानी या क्षेत्रीय बोली से प्रभावित हुए । श्वेताम्बर आगमों Page #13 -------------------------------------------------------------------------- ________________ 10 : श्रमण / अक्टूबर-दिसम्बर / १६६७ की प्रतिलिपियाँ मुख्यतः गुजरात एवं राजस्थान में हुईं, अतः उन पर महाराष्ट्री का प्रभाव आ गया। ५. भारत में कागज का प्रचलन न होने से भोजपत्रों या ताड़पत्रों पर ग्रन्थों को लिखवाना और उन्हें सुरक्षित रखना जैन मुनियों की अहिंसा एवं अपरिग्रह की भावना के प्रतिकूल था। लगभग ई० सन् की ५वीं शती तक इस कार्य को पाप प्रवृत्ति माना जाता था तथा इसके लिए दण्ड की व्यवस्था भी थी। फलतः महावीर के पश्चात् लगभग १००० वर्ष तक जैन साहित्य श्रुत परम्परा पर ही आधारित रहा । आगमों के भाषिक स्वरूप में वैविध्य आ गया । ६. आगमिक एवं आगम-तुल्य साहित्य में आज भाषिक रूपों का जो वैविध्य देखा जाता है, उसका एक कारण लहियों (प्रतिलिपिकारों) की असावधानी भी रही है । प्रतिलिपिकार जिस क्षेत्र का होता था, उस पर भी उस क्षेत्र की बोली / भाषा का प्रभाव रहता था और असावधानी से अपनी प्रादेशिक बोली के शब्द रूपों को लिख देता था । उदाहरण के रूप में चाहे मूलपाठ में " गच्छति” लिखा हो लेकिन यदि उस क्षेत्र में प्रचलन में " गच्छइ" का व्यवहार है, तो प्रतिलिपिकार “गच्छइ" रूप ही लिख देगा । ७. जैन आगम एवं आगम तुल्य ग्रन्थों में आये भाषिक परिवर्तनों का एक कारण यह भी है कि वे विभिन्न कालों एवं प्रदेशों में सम्पादित होते रहे हैं । सम्पादकों ने उनके प्राचीन स्वरूप को स्थिर रखने का प्रयत्न नहीं किया, अपितु उन्हें सम्पादित करते समय अपने युग एवं क्षेत्र की प्रचलित भाषा और व्याकरण के आधार पर उनमें परिवर्तन भी कर दिया । यही कारण हैं कि अर्धमागधी में लिखित आगम भी जब मथुरा में संकलित एवं सम्पादित हुए तो उनका भाषिक स्वरूप अर्धमागधी की अपेक्षा शौरसेनी के निकट हो गया, और जब वलभी में लिखा गया तो वह महाराष्ट्री से प्रभावित हो गया । यह अलग बात है कि ऐसा परिवर्तन सम्पूर्ण रूप में न हो सका और उसमें अर्धमागधी के तत्त्व भी बने रहे । अतः अर्धमागधी और शौरसेनी आगमों में भाषिक स्वरूप का जो वैविध्य है, वह एक यथार्थता है, जिसे हमें स्वीकार करना होगा । क्या शौरसेनी आगमों के भाषिक स्वरूप में एकरूपता है ? किन्तु डॉ० सुदीप जैन का दावा है कि "आज भी शौरसेनी आगम साहित्य Page #14 -------------------------------------------------------------------------- ________________ जैन आगमों की मूल भाषा : अर्धमागधी या शौरसेनी : 11 में भाषिक तत्त्व की एकरूपता है, जबकि अर्धमागधी आगम साहित्य में भाषा के विविध रूप पाये जाते हैं। उदाहरण स्वरूप शैरसेनी में सर्वत्र “ण” का प्रयोग मिलता है, कहीं भी 'न' का प्रयोग नहीं है, जबकि अर्धमागधी में नकार के साथ-साथ णकार का प्रयोग भी विकल्पतः मिलता है। यदि शौरसेनी युग में नकार का प्रयोग अलग भाषा में प्रचलित होता तो दिगम्बर साहित्य में कहीं तो विकल्प से प्राप्त होता।" (प्राकृतविद्या जुलाई-सितम्बर ६६, पृ०७.) यहाँ डॉ० सुदीप जैन ने दो बातें उठाई हैं- प्रथम शौरसेनी आगम साहित्य की भाषिक एकरूपता की और दूसरी ‘ण' कार और 'न' कार की। क्या सुदीप जी आपने शौरसेनी आगम साहित्य के उपलब्ध संस्करणों का भाषाशास्त्र की दृष्टि से कोई प्रामाणिक अध्ययन किया है? यदि आपने किया होता तो आप ऐसा खोखला दावा प्रस्तुत नहीं करते? आप केवल 'ण' कार का ही उदाहरण क्यों देते हैं- वह तो महाराष्ट्री और शौरसेनी दोनों में सामान्य है। दूसरे शब्द रूपों की चर्चा क्यों नहीं करते हैं? नीचे मैं दिगम्बर शौरसेनी आगमतुल्य ग्रन्थों से ही कुछ उदाहरण दे रहा हूँ, जिनसे उनके भाषिकतत्त्व की एकरूपता का दावा कितना खोखला है यह सिद्ध हो जाता है। मात्र यही नहीं इससे यह भी सिद्ध होता है शौरसेनी आगमतुल्य ग्रन्थ न केवल अर्धमागधी से प्रभावित हैं, अपितु उससे परवर्ती महाराष्ट्री प्राकृत से भी प्रभावित हैं:१. आत्मा के लिये अर्धमागधी में आता, अत्ता, अप्पा, आदि शब्द रूपों के प्रयोग उपलब्ध हैं, जबकि शौरसेनी में "द" श्रुति के कारण “आदा" रूप बनता है। समयसार में “आदा" के साथ-साथ “अप्पा" शब्द रूप जो कि अर्धमागधी का है अनेक बार प्रयोग में आया है। केवल समयसार में ही नहीं, अपितु नियमसार (१२०,१२१,१८३) आदि में भी "अप्पा" शब्द का प्रयोग है। २. श्रुत का शौरसेनी रूप “सुद" बनता है। शौरसेनी आगमतुल्य ग्रन्थों में अनेक स्थानों पर “सुद" “सुदकेवली" शब्द के प्रयोग भी हुए हैं, जबकि समयसार (वर्णी ग्रन्थमाला गाथा ६ एवं १०) में स्पष्ट रूप में "सुयकेवली” “सुयणाण" शब्दरूपों का भी प्रयोग मिलता है और ये दोनों महाराष्ट्री शब्द रूप हैं तथा परवर्ती भी हैं। अर्धमागधी में तो सदैव ‘सुत' शब्द का प्रयोग होता है। ३. शौरसेनी “द" श्रुतिप्रथान है साथ ही उसमें “लोप" की प्रवृत्ति अत्यल्प है, अतः उसके क्रिया रूप “हवदि, होदि, कुणदि, गिण्हदि, कुव्वदि, परिणमदि, भण्णदि, Page #15 -------------------------------------------------------------------------- ________________ 12 : श्रमण/अक्टूबर-दिसम्बर/१६६७ पस्सदि, आदि बनते हैं, इन क्रिया रूपों का प्रयोग उन ग्रन्थों में हुआ भी है, किन्तु . उन्हीं ग्रन्थों के क्रिया रूपों पर महाराष्ट्री प्राकृत का कितना व्यापक प्रभाव है, इसे निम्न उदाहरणों से जाना जा सकता हैसमयसार (वर्णी ग्रन्थमाला, वाराणसी) जाणइ (गाथा सं० १०), हवई (११ ३१५, ३८६, ३८४), मुणइ (३२), वुच्चइ (४५) कुइ (८१,२८६, ३१६, ३२१, ३२५, ३४०), परिणमइ (७६,७६,८०), (ज्ञातव्य है कि समयसार के इसी संस्करण की गाथा क्रमांक ७७,७८,७६, में परिणमदि रूप भी मिलता है)। इसी प्रकार के अन्य महाराष्ट्री प्राकृत के रूप, जैसे वेयई (८४), कुणई (७१,६६, २८६, २६३, ३२२, ३२६), होइ (६४, १६७, ३०६, ३४६, ३५८), करेई (६४, २३७, २३८, ३२८, ३४८), हवई (४१, ३२६, ३२६), जाणई (१८५, ३१६, ३१६, ३२०, ३६१), बहइ (१८६) सेवइ (१६७), मरइ (२५७, २६०), (जबकि गाथा २५८ में मरदि है), पावइ (२६१, २६२), धिप्पइ (२६६), उप्पज्जइ (३०८), विणस्सइ (३१२, ३४५), दीसइ (३२३), आदि भी मिलते हैं। ये तो कुछ ही उदाहरण हैं- ऐसे अनेकों महाराष्ट्री प्राकृत के क्रिया रूप समयसार में उपलब्ध हैं। न केवल समयसार अपितु नियमसार, पंचास्तिकायसार, प्रवचनसार आदि की भी यही स्थिति है। - बारहवीं शती में रचित वसुनन्दिकृत श्रावकाचार (भारतीय ज्ञानपीठ संस्करण) की स्थिति तो कुन्दकुन्द के इन ग्रन्थों से भी बदतर है, उसकी प्रारम्भ की सौ गाथाओं में ४०प्रतिशत क्रिया रूप महाराष्ट्री प्राकृत के हैं। इससे फलित यह होता है कि तथाकथित शौरसेनी आगमों के भाषागत स्वरूप में तो अर्धमागधी आगमों की अपेक्षा भी न केवल अधिक वैविध्य है, अपितु उस महाराष्ट्री प्राकृत का भी व्यापक प्रभाव है, जिसे सुदीप जी शौरसेनी से परवर्ती मान रहे हैं। यदि ये ग्रन्थ प्राचीन होते तो इन पर अर्धमागधी और महाराष्ट्री का प्रभाव कहाँ से आता? प्रो० ए०एन० उपाध्ये ने प्रवचनसार की भूमिका में स्पष्टतः यह स्वीकार किया है कि उसकी भाषा पर अर्धमागधी का प्रभाव है। प्रो० खड़बड़ी ने तो षटखण्डागम की भाषा को भी शुद्ध शौरसेनी नहीं माना है। 'न' कार और 'ण' कार में कौन प्राचीन अब हम णकार और नकार के प्रश्न पर आते हैं। भाई सुदीप जी आपका Page #16 -------------------------------------------------------------------------- ________________ जैन आगमों की मूल भाषा : अर्धमागधी या शौरसेनी : 13 यह कथन सत्य है कि अर्धमागधी में नकार और णकार दोनों पाये जाते हैं। किन्तु दिगम्बर शौरसेनी आगमतुल्य ग्रन्थों में सर्वत्र णकार का पाया जाना यही सिद्ध करता है कि जिस शौरसेनी को आप अरिष्टनेमि के काल से प्रचलित प्राचीनतम् प्राकृत कहना चाहते हैं, उस णकार प्रधान शौरसेनी का जन्म तो ईसा की तीसरी शताब्दी तक हुआ भी नहीं था। “ण” की अपेक्षा न का प्रयोग प्राचीन है। ई०पू० तृतीय शती के अशोक के अभिलेख एवं ई०पू० द्वितीय शती के खारवेल के शिलालेख से लेकर मथुरा के शिलालेख (ई०पू० दूसरी शती से ईसा की दूसरी शती तक) इन लगभग ८० जैन शिलालेखों में एक भी णकार का प्रयोग नहीं है। इनमें शौरसेनी प्राकृत के रूपों यथा “णमों” “अरिहंताणं" और “णमों वड्ढमाणं" का सर्वथा अभाव है। यहाँ हम केवल उन्हीं प्राचीन शिलालेखों को उद्धधृत कर रहे हैं, जिनमें इन शब्दों का प्रयोग हुआ है:- ज्ञातव्य है कि ये सभी अभिलेखीय साक्ष्य जैन शिलालेख संग्रह, भाग २ से प्रस्तुत हैं, जो दिगम्बर जैन समाज द्वारा ही प्रकाशित हैं:०१. हाथीगुफा बिहार का शिलालेख- प्राकृत, जैन सम्राट खारवेल, मौर्यकाल १६५ वॉ वर्ष पृ० ४ लेख क्रमांक २- नमो अरहंतानं, नमो सवसिधानं ०२. वैकुण्ठ स्वर्गपुरी गुफा, उदयगिरि, बिहार, -प्राकृत, मौर्यकाल १६५ वाँ वर्ष लगभग ई०पू० दूसरी शती पृ०११ ले०क्र० 'अरहन्तपसादन' । ०३. मथुरा, प्राकृत, महाक्षत्रप शोडाशके ८१ वर्ष का पृ० १२ क्रमांक ५, नम अरहतो वधमानस' ०४. मथुरा, प्राकृत काल निर्देश नहीं दिया है, किन्तु जे०एफ० फलीट के अनुसार लगभग १४-१३ ई०पूर्व का होना चाहिए पृ०१५ क्रमांक ८ मो ‘अरहतो वर्धमानस्य'। ०६. मथुरा प्राकृत सम्भवतः १४-१३ ई०पू० प्रथमशती पृ०१५ लेख क्रमांक १०, मा अरहतपूजा' ०७. मथुरा प्राकृत पृ०१७ क्रमांक १४ 'मा अहतानं श्रमणश्रविका' ०८. मथुरा प्राकृत पृ०१७ क्रमांक १५ 'नमो अरहंतानं' ०६. मथुरा प्राकृत पृ०१८ क्रमांक १६ 'नमो अरहतो महाविरस' १०. मथुरा, प्राकृत हुविष्क संवत ३६- हस्तिस्तम्भ पृ०३४, क्रमांक ४३ ‘अयर्येन रुद्रदासेन' अरहतनं पुजाये। ११. मथुरा प्राकृत भग्न वर्ष ६३ पृ०४६ क्रमांक ६७ 'नमो अर्हतो महाविरस्य' १२. मथुरा, प्राकृत वासुदेव सं०६८ पृ०४७ क्रमांक ६० 'नमो अरहतो महावीरस्य' १३. मथुरा, प्राकृत पृ०४८ क्रमांक ७१-नमो अरहंतानं सिहकसं Page #17 -------------------------------------------------------------------------- ________________ 14 : श्रमण/अक्टूबर-दिसम्बर/१६६७ १४. मथुरा, प्राकृत भग्न पृ० ४८ क्रमांक ७२ 'नमो अरहंतान' १५. मथुरा, प्राकृत भग्न पृ० ४८ क्रमांक ७३ 'नमो अरहंतान' १६. मथुरा, प्राकृत भग्न पृ० ४८ क्रमांक ७५ 'अरहंतान वधमानस्य' १७. मथुरा, प्राकृत भग्न पृ० ५१, क्रमांक ८० 'नमो अरहंतान.....द्वन" सूरसेन प्रदेश, जहाँ से शौरसेनी प्राकृत का जन्म हुआ, वहाँ के शिलालेखों में दूसरी-तीसरी शती तक णकार एवं 'द' श्रुति के प्रयोग का अभाव यही सिद्ध करता है कि दिगम्बर आगमों एवं नाटकों की शौरसेनी का जन्म ईसा की दूसरी शती के पूर्व का नहीं है, जबकि नकार प्रधान अर्धमागधी का प्रयोग तो अशोक के अभिलेखों से अर्थात् ई०पू०. तीसरी शती से सिद्ध होता है। इससे यही फलित होता है कि अर्धमागधी आगम प्राचीन थे, आगमों का शब्द रूपान्तरण अर्धमागधी से शौरसेनी में हुआ है, न कि शौरसेनी से अर्धमागधी में। दिगम्बर मान्य आगमों की वह शौरसेनी जिस प्राचीनता का बढ़-चढ़ कर दावा किया जाता है, वह अर्धमागधी और महाराष्ट्री दोनों से ही प्रभावित है और न केवल भाषायी स्वरूप के आधार पर अपनी विषय वस्तु के आधार पर अपितु भी ईसा की चौथी- पाँचवी शती के पूर्व की नहीं है। यदि शौरसेनी प्राचीनतम प्राकृत है, तो फिर सम्पूर्ण देश में ईसा की तीसरी चौथी शती तक का एक भी अभिलेख शौरसेनी प्राकृत में क्यों नहीं मिलता है। अशोक के अभिलेख, खारवेल के अभिलेख, बलडी का अभिलेख और मथुरा के शताधिक अभिलेख कोई भी तो शौरसेनी प्राकृल में नहीं हैं। इन सभी अभिलेखों की भाषा क्षेत्रीय बोलियों से प्रभावित मागधी ही है। अतः उसे अर्धमागधी तो कहा जा सकता है, किन्तु शौरसेनी कदापि नहीं कहा जा सकता है। अतः प्राकृतों में अर्धमागधी ही प्राचीन है, क्योंकि मथुरा के प्राचीन अभिलेखों में भी 'नमो अरहंतानं', 'नमो वधमानस' आदि अर्थमागधी शब्द रूप मिलते हैं। श्वेताम्बर आगमों एवं अभिलेखों में आये ‘अरहंतानं' पाठ को तो प्राकृत-विद्या में खोटे सिक्के की तरह बताया गया है, इसका अर्थ है कि यह पाठ शौरेसनी का नहीं है (प्राकृत-विद्या अक्टूबर-दिसम्बर ६४ पृ०१०-११) अतः शौरसेनी उसके बाद ही विकसित हुई है। शौरसेनी आगम और उनकी प्राचीनताः जब हम आगम की बात करते हैं तो हमें यह स्पष्ट रूप से समझ लेना चाहिए कि आचारांग आदि द्वादशांगी जिन्हें श्वेताम्बर, दिगम्बर और यापनीय परम्परा आगम Page #18 -------------------------------------------------------------------------- ________________ जैन आगमों की मूल भाषा : अर्धमागधी या शौरसेनी : 15 कद्दूकर उल्लेख करती हैं, वे सभी मूलतः अर्धमागधी में निबद्ध हुए हैं। चाहे श्वेताम्बर परम्परा में नन्दीसूत्र में उल्लिखित आगम हो, चाहें मूलाचार, भगवती आराधना और उनकी टीकाओं में या तत्त्वार्थ और उसकी दिगम्बर टीकाओं में उल्लिखित आगम हो, अथवा अंगपण्णत्ति एवं धवला के अंग और अंग बाह्य के रूप में उल्लेखित आगम हो, उनमें से एक भी ऐसा नहीं है जो शौरसेनी प्राकृत में निबद्ध रहा हो । हाँ इतना अवश्य है कि इनमें से कुछ के शौरसेनी प्राकृत से प्रभावित संस्करण माथुरी वाचना के लगभग चतुर्थ शती के समय अस्तित्व में अवश्य आये थे, किन्तु इन्हें शौरसेनी आगम कहना उचित नहीं होगा, वस्तुतः ये आचारांग, उत्तराध्ययन, दशवैकालिक, ऋषिभाषित आदि श्वेताम्बर परम्परा में मान्य आगमों के ही शौरसेनी संस्करण थे, जो यापनीय परम्परा में मान्य थे और जिनकी भाषिक स्वरूप और कुछ पाठ भेदों को छोड़कर श्वे. मान्य आगमों से समरूपता थी । इनके स्वरूप आदि के सम्बन्ध में विस्तृत चर्चा मैंने " जैन धर्म का यापनीय सम्प्रदाय" नामक ग्रन्थ के तीसरे अध्याय के प्रारम्भ में की है। इच्छुक पाठक उसे वहाँ देख सकते हैं। 1 वस्तुतः आज जिन्हें हम शौरसेनी आगम के नाम से जानते है उनमें मुख्यतः निम्न ग्रन्थ आते हैं: अ. यापनीय आगम १. कसायपाहुड, लगभग ईसा की चौथी शती, गुणधर २. षट्खण्डागम, ईसा की पाँचवीं शती का उत्तरार्ध, पुष्पदंत और भूतबली ३. भगवती आराधना, ईसा की छठी शती, शिवार्य ४. मूलाचार, ईसा की छठी शती - वट्टकेर ज्ञातव्य है कि ये सभी ग्रन्थ मूलतः यापनीय परम्परा के हैं और इनमें अनेकों गाथाएँ श्वे. मान्य आगमों, विशेष रूप से निर्युक्तियों और प्रकीर्णकों के समरूप हैं । ब. कुन्दकुन्द द्वारा रचित ईसा की छठी शती के लगभग के ग्रन्थ ५. समयसार ६. नियमसार ७. प्रवचनसार पंचास्तिकायसार ८. ६. अष्टपाहुड ( इनका कुन्दकुन्द द्वारा रचित होना सन्दिग्ध है, क्योंकि इसकी भाषा * में अपभ्रंश के शब्द भी पाये जाते हैं) Page #19 -------------------------------------------------------------------------- ________________ 16 : श्रमण/अक्टूबर-दिसम्बर/१९६७ स. अन्य ग्रन्थ, ईसा की छठी शती के पश्चात् १०. तिलोयपण्णति- यतिवृषभ ११. लोकविभाग १२. जंबूद्वीपपण्णत्ति १३. अंगपण्णत्ति १४. क्षपणसार १५. गोम्मटसार (दसवीं शती) किन्तु इनमें से कसायपाहुड को छोड़कर कोई भी ग्रन्थ ऐसा नहीं है, जो पाँचवीं शती के पूर्व का हो। ये सभी ग्रन्थ गुणस्थान सिद्धान्त एवं सप्तभंगी की चर्चा अवश्य करते हैं और गुणस्थान की चर्चा जैन दर्शन में पांचवीं शती से पूर्व के ग्रन्थों में अनुपस्थित है। श्वेताम्बर आगमों में समवायांग और आवश्यक नियुक्ति की दो प्रक्षिप्त गाथाओं को छोड़कर गुणस्थान की चर्चा पूर्णतः अनुपस्थित है, जबकि षट्खण्डागम, मूलाचार, भगवती आराधना आदि ग्रन्थों में और कुन्दकुन्द के ग्रन्थों में इनकी चर्चा पायी जाती है, अतः ये सभी ग्रन्थ उनसे परवर्ती हैं। इसी प्रकार उमास्वाति के तत्त्वार्थसूत्र मूल और उसके स्वोपज्ञ भाष्य में भी गुणस्थान की चर्चा अनुपस्थित है, जबकि इसकी परवर्ती टीकाएँ गुणस्थान की विस्तृत चर्चाए प्रस्तुत करती हैं। उमास्वाति का काल तीसरी-चौथी शत. के लगभग है। अतः यह निश्चित है कि गुणस्थान का सिद्धान्त पांचवीं शती में अस्तित्त्व में आया है। अतः शौरसेनी प्राकृत में निबद्ध कोई भी ग्रन्थ जो गुणस्थान का उल्लेख कर रहा है, ईसा की पांचवी शती के पूर्व का नहीं है। प्राचीन शौरसेनी आगमतुल्य ग्रन्थों में मात्र कसायपाहुड ही ऐसा है जो स्पष्टतः गुणस्थानों का उल्लेख नहीं करता है, किन्तु उसमें भी प्रकारान्तर से १२ गुण स्थानों की चर्चा उपलब्ध है, अतः वह भी आध्यात्मिक विकास की उन दस अवस्थाओं, जिनका उल्लेख आचारांगनियुक्ति और तत्त्वार्थसूत्र में है से परवर्ती और गुणस्थान सिद्धान्त के विकास के संक्रमण काल की रचना है, अतः उसका काल भी चौथी से पांचवीं शती के बीच सिद्ध होता है। शौरसेनी की प्राचीनता का दावा, कितना खोखला शौरसेनी की प्राचीनता का गुणगान इस आधार भी किया जाता है कि यह नारायण कृष्ण और तीर्थंकर अरिष्टनेमि की मातृभाषा रही है, क्योंकि इन दोनों महापुरुषों का जन्म शूरसेन जनपद में हुआ था और ये शौरसेनी प्राकृत में ही अपना वाक् व्यवहार करते थे। डॉ० सुदीप जी के शब्दों में “इन दोनों महापुरुषों के प्रभावक व्यक्तित्व के Page #20 -------------------------------------------------------------------------- ________________ जैन आगमों की मूल भाषा : अर्धमागधी या शौरसेनी : 17 महाप्रभाव से शूरसेन जनपद में जन्मी शौरसेनी प्राकृत भाषा को सम्पूर्ण आर्यावृत में प्रसारित होने का सुअवसर मिला था।” (प्राकृतविद्या-जुलाई-सितम्बर ६६, पृ०. ६) यदि हम एक बार उनके इस कथन को मान भी लें, तो प्रश्न उठता हैं अरिष्टनेमि के पूर्व नमि मिथिला में जन्मे थे, वासुपूज्य चम्पा में जन्मे थे, सुपार्श्व, चन्द्रप्रभ और श्रेयांस काशी जनपद में जन्मे थे, यही नहीं प्रथम तीर्थंकर ऋषभदेव और मर्यादा पुरुषोत्तम राम आयोध्या में जन्मे थे। ये सभी क्षेत्र तो मगध के ही निकटवर्ती हैं, अतः इनकी मातृभाषा तो अर्थमागधी रही होगी। भाई सुदीप जी के अनुसार यदि शौरसेनी अरिष्टनेमि जितनी प्राचीन है, तो फिर अर्धमागधी तो ऋषभ जितनी प्राचीन सिद्ध होती है, अतः शौरसेनी से अर्धमागधी प्राचीन ही है। यदि शौरसेनी प्राचीन होती तो सभी प्राचीन अभिलेख और प्राचीन आगमिक ग्रन्थ शौरसेनी में मिलते- किन्तु ईसा की चौथी, पाँचवीं शती से पूर्व का कोई भी जैन ग्रन्थ और अभिलेख शौरसेनी में उपलब्ध क्यों नहीं होता है? पुनः नाटकों में भी भास के समय से अर्थात् ईसा की दूसरी शती से ही शौरसेनी के प्रयोग (वाक्यांश) उपलब्ध होते हैं। " नाटकों में शौरसेनी प्राकृत की उपलब्धता के आधार पर उसकी प्राचीनता का गुणगान किया जाता है, मैं विनम्रता पूर्वक पूछना चाहूँगा कि क्या इन उपलब्ध नाटकों में कोई भी नाटक ईसा की दूसरी-तीसरी शती से पूर्व का है? फिर उन्हें शौरसेनी की प्राचीनता का आधार कैसे माना जा सकता है। मात्र नाटक ही नहीं, वे शौरसेनी प्राकृत का एक भी ऐसा ग्रन्थ या अभिलेख दिखा दें, जो अर्धमागधी आगमों और मागधी प्रधान अशोक, खारवेल, आदि के अभिलेखों से प्राचीन हो। अर्धमागधी के अतिरिक्त जिस महाराष्ट्री प्राकृत को वे शौरसेनी से परवर्ती बता रहे हैं, उसमें सातवाहन नरेश हाल की गाथा सप्तशती लगभग प्रथम शती में रचित है और शौरसेनी के किसी भी ग्रन्थ से प्राचीन है। पुनः मैं डॉ० सुदीप के निम्न कथन की ओर पाठकों का ध्यान दिलाना चाहूँगा, वे प्राकृत-विद्या जुलाई-सितम्बर ६६ में लिखते हैं कि दिगम्बरों के ग्रन्थ उस शौरसेनी प्राकृत में हैं, जिसमें 'मागधी' आदि प्राकृतों का जन्म हुआ, इस सम्बन्ध में मेरा उनसे निवेदन है कि मागधी के सम्बन्ध में 'प्रकृतिः शौरसेनी' (प्राकृतप्रकाश ११/२) इस कथन की वे जो व्याख्या कर रहे हैं वह भ्रान्त है और वे स्वयं भी शौरसेनी के सम्बन्ध में Page #21 -------------------------------------------------------------------------- ________________ 18 : श्रमण/अक्टूबर-दिसम्बर /१६६७ 'प्रकृतिः संस्कृतम्' (प्राकृतप्रकाश १२/२), इस सूत्र की व्याख्या में 'प्रकृतिः' का जन्मदात्रीयह अर्थ अस्वीकार कर चुके हैं। इसकी विस्तृत समीक्षा हमने अग्रिम पृष्ठों में की है। इसके प्रत्युत्तर में मेरा दूसरा तर्क यह है कि यदि शौरसेनी प्राकृत ग्रन्थों के आधार पर ही मागधी के प्राकृत आगमों की रचना हुई, तो उनमें किसी भी शौरसेनी प्राकृत के ग्रन्थ का उल्लेख क्यों नहीं है? श्वेताम्बर आगमों में वे एक भी संदर्भ दिखा दें, जिनमें भगवतीआराधना, मूलाचार, षट्खण्डागम, तिलोयपण्णत्ति, प्रवचनसार, समयसार, नियमसार आदि का उल्लेख हुआ हो। टीकाओं में भी मलयगिरि (तेरहवीं शती) ने मात्र 'समयपाहुड' का उल्लेख किया है, इसके विपरीत मूलाचार, भगवतीआराधना और षट्खण्डागम की टीकाओं में एवं तत्त्वार्थसूत्र की सर्वार्थसिद्धि, राजवार्तिक, श्लोकवार्तिक, आदि सभी दिगम्बर टीकाओं में इन आगमों एवं नियुक्तियों के उल्लेख हैं। भगवतीआराधना की टीका में तो आचारांग, उत्तराध्ययन, कल्प तथा निशीथ से अनेक अवतरण भी दिये गये हैं। मूलाचार में न केवल अर्धमागधी आगमों का उल्लेख है, अपित उनकी सैकड़ों गाथाएँ भी हैं। मूलाचार में आवश्यकनियुक्ति, आतुरप्रत्याख्यान, महाप्रत्याख्यान, चन्द्रवेध्यक, उत्तराध्ययन, दशवैकालिक आदि की अनेक गाथाएँ अपने शौरसेनी शब्द रूपों में यथावत् पायी जाती हैं। . दिगम्बर परम्परा में जो प्रतिक्रमणसूत्र उपलब्ध हैं, उसमें ज्ञातासूत्र के उन्हीं १६ अध्ययनों के नाम मिलते हैं, जो वर्तमान में श्वेताम्बर परम्परा में उपलब्ध ज्ञाताधर्मकथा में उपलब्ध हैं। तार्किक दृष्टि से यह स्पष्ट है कि जो ग्रन्थ जिन-जिन ग्रन्थों का उल्लेख करता है, वह उनसे परवर्ती ही होता है, पूर्ववर्ती कदापि नहीं। शौरसेनी आगम या आगमतुल्य ग्रन्थों में यदि अर्धमागधी आगमों के नाम मिलते हैं तो फिर शौरसेनी और उसका रचित साहित्य अर्धमागधी आगमों से प्राचीन कैसे हो सकता है? आदरणीय टॉटिया जी के माध्यम से यह बात भी उठायी गयी कि मूलतः आगम शौरसेनी में रचित थे और कालान्तर में उनका अर्धमागधीकरण (महाराष्ट्रीकरण) किया गया। यह एक ऐतिहासिक सत्य हैं कि जैनधर्म का उद्भव मगध में हुआ और वहीं से वह दक्षिणी एवं उत्तरपश्चिमी भारत में फैला । अतः आवश्यकता हुई अर्धमागधी आगमों के शौरसेनी और महाराष्ट्री रूपान्तरण की, न कि शौरसेनी आगमों के अर्धमागधी रूपान्तरण की। सत्य तो यह है कि अर्धमागधी आगम ही शौरसेनी या महाराष्ट्री में रूपान्तरित हुए न कि शौरसेनी आगम अर्धमागधी में रूपान्तरित हुए। अतः ऐतिहासिक तथ्यों की अवहलना कर मात्र कुतर्क करना कहाँ तक उचित है? Page #22 -------------------------------------------------------------------------- ________________ जैन आगमों की मूल भाषा : अर्धमागधी या शौरसेनी : 19 बुद्ध वचनों की मूल भाषा मागधी थी, न कि शौरसेनीः शौरसेनी को मूलभाषा एवं मागधी से प्राचीन सिद्ध करने हेतु आदरणीय प्रो० नथमल जी टाटिया के नाम से यह भी प्रचारित किया जा रहा है। कि "शौरसेनी पालि भाषा की जननी है-यह मेरा स्पष्ट चिन्तन है। पहले बौद्धों के ग्रन्थ शौरसेनी में थे, उनको जला दिया गया और पालि में लिखा गया" । प्राकृत-विद्या, जुलाई-सितम्बर ६६, पृ० १०. टॉटिया जी जैसा बौद्ध विद्या का प्रकाण्ड विद्वान् ऐसी कपोल कल्पित बात कैसे कह सकता है? यह विचारणीय है। क्या ऐसा कोई भी अभिलेखीय या साहित्यिक प्रमाण उपलब्ध है, जिसके आधार पर यह कहा जा सकता है, कि मूल बुद्धवचन शौरसेनी में थे। यदि हो तो आदरणीय टॉटिया जी या भाई सुदीप जी उसे प्रस्तुत करें, अन्यथा ऐसी आधारहीन बातें करना विद्वानों के लिये शोभनीय नहीं है। यह बात तो बौद्ध विद्वान् स्वीकार करते हैं कि मूल बुद्धवचन 'मागधी' में थे और कालान्तर में उनकी भाषा को संस्कारित करके पालि में लिखा गया। यहाँ यह भी ज्ञातव्य है कि जिस प्रकार मागधी और अर्धमागधी में किंचित अन्तर है, उसी प्रकार ‘मागधी' और 'पालि' में भी किंचित अन्तर है, वस्तुतः पालि भगवान् बुद्ध की मूलभाषा ‘मागधी' का एक संस्कारित रूप ही है। यही कारण है कि कुछ विद्वान् पालि को मागधी का ही एक प्रकार मानते हैं, दोनों में बहुत अधिक अन्तर नहीं है। पालि, संस्कृत और मागधी की मध्यवर्ती भाषा है या मागधी का ही साहित्यिक रूप है। यह तो प्रमाण सिद्ध है कि भगवान् बुद्ध ने मागधी में ही अपने उपदेश दिये थे-क्योंकि उनकी जन्मस्थली और कार्यस्थली दोनों मगध और उसका निकटवर्ती प्रदेश ही था। बौद्ध विद्वानों का स्पष्ट मन्तव्य है कि मागधी ही मूल भाषा है। इस सम्बन्ध में बुद्धघोष का निम्न कथन सबसे बड़ा प्रमाण है सा मागधी मूल भासा नरायाय आदिकप्पिका। ब्रह्मणो च अस्सुतालापा संबुद्धा चापि भासरे। अर्थात् मागधी ही मूलभाषा है, जो सृष्टि के प्रारम्भ में उत्पन्न हुई और न केवल ब्रह्मा (देवता) अपितु बालक और बुद्ध भी इसी भाषा में बोलते हैं- (See-The preface to the Childer's Pali Dictionary). इससे यही फलित होता है मूल बुद्धवचन मागधी में थे। पालि उसी मागधी का संस्कारित साहित्यिक रूप है, जिसमें कालान्तर में बुद्धवचन लिखे गये। वस्तुतः पालि Page #23 -------------------------------------------------------------------------- ________________ 20 : श्रमण/अक्टूबर-दिसम्बर /१६६७ के रूप में मागधी का एक ऐसा संस्करण तैयार किया गया, जिसे संस्कृत के विद्वान् और भिन्न-भिन्न प्रान्तों के लोग भी आसानी से समझ सकें। अतः बुद्ध वचन मूलतः मागधी में थे, न कि शौरसेनी में। बौद्ध त्रिपिटक की पालि और जैन आगमों की अर्धमागधी में कितना साम्य है, यह तो सुत्तनिपात और इसिभासियाईं के तुलनात्मक अध्ययन से स्पष्ट हो जाता है। प्राचीन पालि ग्रन्थों एवं प्राचीन अर्धमागधी आगमों की भाषा में अधिक दूरी नहीं है। जिस समय अर्धमागधी और पालि में ग्रन्थ रचना हो रही थी, उस समय तक शौरसेनी एक बोली थी, न कि एक साहित्यिक भाषा। साहित्यिक भाषा के रूप में उसका जन्म तो ईसा की तीसरी शताब्दी के बाद ही हुआ है। संस्कृत के पश्चात् सर्वप्रथम साहित्यिक भाषा के रूप में यदि कोई भाषा विकसित हुई है तो वे अर्धमागधी एवं पालि ही हैं, न कि शौरसेनी। शौरसेनी का कोई भी ग्रन्थ या नाटकों के अंश ईसा की दूसरी-तीसरी शती से पूर्व का नहीं है- जबकि पालि त्रिपिटक और अर्धमागधी आगम साहित्य के अनेक ग्रन्थ ई०पू० तीसरी-चौथी शती में निर्मित हो चुके थे। 'प्रकृतिः शौरसेनी' का सम्यक् अर्थ जो विद्वान् मागधी को शौरसेनी से परवर्ती एवं उसी से विकसित मानते हैं. वे अपने कथन का आधार वररुचि (लगभग ७वीं शती) के प्राकृतप्रकाश और हेमचन्द्र (लगभग १२वीं शताब्दी) के प्राकृतव्याकरण के निम्न सूत्रों को बताते हैं:अ. १. प्रकृतिः शौरसेनी ।।१०/२।। अस्याः पैशाच्याः प्रकृतिः शौरसेनी। स्थितायां शौरसेन्यां पैशाची लक्षणं प्रवर्तात्ततव्यम्। २. प्रकृतिः शौरसेनी ।।११/२।। अस्याः मागध्याः प्रकृतिः शौरसेनीति वेदितव्यम् । वररुचिकृत 'प्राकृत प्रकाश' ब. १. शेष शौरसेनीवत् ।।८/४/३०२।। ___ मागध्या यदुक्तं, ततोअन्यच्छौरसेनीवद् द्रष्टव्यम्। २. शेष शौरसेनीवत् ।।८/४/३२३ ।। पैशाच्यां यदुक्तं, तओअन्यच्छेषं पैशाच्या शौरसेनीवद् भवति। ३. शेष शौरसेनीवत् ।।८/४/४४६ ।। अपभ्रंशे प्राय+ शौरसेनीवत् कार्य भवति। Page #24 -------------------------------------------------------------------------- ________________ जैन आगमों की मूल भाषा अर्धमागधी या शौरसेनी : 21 अपभ्रंशभाषायां प्रायः शौरसेनीभाषातुल्य कार्य जायते; शौरसेनी-भाषायाः ये नियमाः सन्ति, तेषां प्रवृत्तिरपभ्रंशभाषायामपि जायते । हेमचन्द्रकृत 'प्राकृतव्याकरण' अतः इस प्रसंग में यह आवश्यक है कि हम सर्वप्रथम इन सूत्रों में 'प्रकृति' शब्द का वास्तविक तात्पर्य क्या है, इसे समझें। यदि हम यहाँ प्रकृति का अर्थ उद्भव का कारण मानते हैं, तो निश्चित ही इन सूत्रों से यह 'फलित होता है कि मागधी या पैशाची का उद्भव शौरसेनी से हुआ, किन्तु शौरसेनी को एकमात्र प्राचीन भाषा मानने वाले तथा मागधी और पैशाची को उससे उद्भूत मानने वाले ये विद्वान् वररुचि के उस सूत्र को भी उद्धृत क्यों नहीं करते, जिसमें शौरसेनी की प्रकृति संस्कृत बताई गयी है यथा - "शौरसेनी- १२/१ टीका - शूरसेनानां भाषा शौरसेनी साच लक्ष्यलक्षणाम्यां स्फुटीकियते इति वेदितव्यम् । अधिकारसूत्रमेतदा परिच्छेद समाप्तेः १२ / १ प्रकृतिः संस्कृतम्-१२/२ टीका- शौरसेन्यां ये शब्दास्तेषां प्रकृतिः संस्कृतम् ।। प्राकृतप्रकाश १२/२।” अतः उक्त सूत्र के आधार पर हमें यह भी स्वीकार करना होगा कि शौरसेनी प्राकृत संस्कृत से उत्पन्न हुई । इस प्रकार प्रकृति का अर्थ उद्गम स्थल करने पर उसी प्राकृतप्रकाश के आधार पर यह भी मानना होगा कि मूलभाषा संस्कृत थी और उसी से शौरसेनी उत्पन्न हुई । क्या शौरसेनी के पक्षधर इस सत्य को स्वीकार करने को तैयार हैं? भाई सुदीप जी, जो शौरसेनी के पक्षधर हैं और 'प्रकृतिः शौरसेनी' के आधार पर मागधी को शौरसेनी से उत्पन्न बताते हैं, वे स्वयं भी 'प्रकृतिः संस्कृतम्- प्राकृतप्रकाश १२/२' के आधार पर यह मानने को तैयार नहीं हैं कि प्रकृति का अर्थ उससे उत्पन्न हुई ऐसा है । वे स्वयं लिखते हैं " आज जितने भी प्राकृत व्याकरणशास्त्र उपलब्ध हैं, वे सभी संस्कृत भाषा में हैं एवं संस्कृत व्याकरण के मॉडल पर निर्मित हैं । अतएव उनमें 'प्रकृतिः संस्कृतम्' जैसे प्रयोग देखकर कतिपयजन ऐसा भ्रम करने लगते हैं कि प्राकृतभाषा संस्कृत भाषा से उत्पन्न हुई - ऐसा अर्थ कदापि नहीं है 'प्राकृत - विद्या, जुलाई-सितम्बर ६६, पृ०१४ | भाई सुदीप जी जब शौरसेनी की बारी आती है, तब आप प्रकृति का अर्थ आधार मॉडल करें और जब मागधी का प्रश्न आये तब आप 'प्रकृतिः शौरसेनी' का अर्थ मागधी शौरसेनी से उत्पन्न हुई ऐसा करें - यह दोहरा मापदण्ड क्यों? क्या केवल शौरसेनी को प्राचीन और मागधी को अर्वाचीन बताने के लिये । वस्तुतः प्राकृत और संस्कृत शब्द स्वयं ही इस बात के प्रमाण हैं कि उनमें मूलभाषा कौन है? 1 संस्कृत शब्द स्वयं ही इस बात का सूचक है कि संस्कृत स्वाभाविक या मूल Page #25 -------------------------------------------------------------------------- ________________ 22 : श्रमण / अक्टूबर-दिसम्बर / १६६७ भाषा न होकर एक संस्कारित कृत्रिम भाषा है। प्राकृत शब्दों एवं शब्द रूपों का व्याकरण द्वारा संस्कार करके जो भाषा निर्मित होती है, उसे ही संस्कृत कहा जा सकता है, जिसे संस्कारित न किया गया हो वह संस्कृत कैसे होगी? वस्तुतः प्राकृत स्वाभाविक या सहज भाषा है और उसी को संस्कारित करके संस्कृत भाषा निर्मित हुई है । इस दृष्टि से प्राकृ मूल भाषा है और संस्कृत उससे उद्भूत हुई है। हेमचन्द्र के पूर्व थारापद्रगच्छीय नमिसाधु ने रुद्रट के काव्यालंकार की टीका में प्राकृत और संस्कृत शब्द का अर्थ स्पष्ट कर दिया है। वे लिखते हैं सकल जगज्जन्तुनां व्याकरणादिभिरनाहित संस्कारः सहजो वचनव्यापारः प्रकृतिः तत्र भवं सैव वा प्राकृत । आरिसवयणे सिद्धं, देवाणं अद्धमागहा वाणी इत्यादि, वचनाद्वा प्राक् पूर्वकृतं प्राकृतम् - बालमहिलादि सुबोधं सकल भाषा निबन्धनभूत वचनमुच्यते । मेघनिर्मुक्तजलमिवैकस्वरूपं तदेव च देशविशेषात् संस्कार करणात् च समासादित विशेषं सत् संस्कृतादुत्तर भेदोनाप्नोति । काव्यालंकार टीका नमिसाधु, २ / १२ अर्थात् जो संसार के प्राणियों का व्याकरण आदिसंस्कार से रहित सहज वचन व्यापार है उससे निःसृत भाषा प्राकृत है, जो बालक, महिला आदि के लिये भी सुबोध है और पूर्व में निर्मित होने ( प्राक्कृत) सभी भाषाओं की रचना का आधार है वह तो मेघ से निर्मुक्त जल की तरह सहज है, उसी का देश प्रदेश के आधार पर किया गया संस्कारित रूप संस्कृत और उसके विभिन्न भेद, अर्थात् विभिन्न साहित्यिक प्राकृतें हैं । सत्य यह है कि बोली के रूप में तो प्राकृतें ही प्राचीन हैं और संस्कृत उनका संस्कारित रूप हैं- वस्तुतः संस्कृत विभिन्न प्राकृत बोलियों के बीच सेतु का काम करने वाली एक सामान्य साहित्यिक भाषा के रूप में अस्तित्त्व में आई । यदि हम भाषा - विकास की दृष्टि से इस प्रश्न पर चर्चा करें तो भी यह स्पष्ट है कि संस्कृत सुपरिमार्जित; सुव्यवस्थित और व्याकरण के आधार पर सुनिबद्ध भाषा है । यदि हम यह मानते हैं कि संस्कृत से प्राकृतें निर्मित हुई हैं, तो हमें यह भी मानना होगा कि मानव जाति अपने आदिकाल में व्याकरण शास्त्र के नियमों से संस्कृत भाषा बोलती थी और उसी से अपभ्रष्ट होकर शौरसेनी और शौरसेनी से अपभ्रष्ट होकर मागधी, पैशाची, अपभ्रंश आदि भाषाएँ निर्मित हुईं। इसका अर्थ यह भी होगा कि मानव जाति की मूल भाषा अर्थात् संस्कृत से अपभ्रष्ट होते-होते ही विभिन्न भाषाओं का जन्म - हुआ, किन्तु मानव जाति और मानवीय संस्कृति के विकास का वैज्ञानिक इतिहास इस Page #26 -------------------------------------------------------------------------- ________________ जैन आगमों की मूल भाषा : अर्धमागधी या शौरसेनी : 23 बात को कभी भी स्वीकार नहीं करेगा। वह तो यही मानता है कि मानवीय बोलियों के संस्कार द्वारा ही विभिन्न साहित्यिक भाषाएँ अस्तित्त्व में आईं अर्थात् विभिन्न बोलियों से ही विभिन्न भाषाओं का जन्म हुआ है। वस्तुतः इस विवाद के मूल में साहित्यिक भाषा और लोक भाषा अर्थात् बोली के अन्तर को नहीं समझ पाना है। वस्तुतः प्राकृतें अपने मूलस्वरूप में भाषाएँ न होकर बोलियाँ रही हैं। यहाँ हमें यह भी ध्यान रखना चाहिए कि प्राकृत कोई एक बोली नहीं अपितु बोली समूह का नाम है। जिस प्रकार प्रारम्भ में विभिन्न प्राकृतों अर्थात् बोलियों को संस्कारित करके एक सामान्य वैदिक भाषा का निर्माण हुआ, उसी प्रकार कालक्रम में विभिन्न बोलियों को अलग-अलग रूप में संस्कारित करके उनसे विभिन्न साहित्यिक प्राकृतों का निर्माण हुआ। अतः यह एक सुनिश्चित सत्य है कि बोली के रूप में प्राकृतें मूल एवं प्राचीन हैं और उन्हीं से संस्कृत का विकास एक 'कामन' (Common) भाषा के रूप में हुआ। प्राकृतें बोलियाँ हैं और संस्कृत भाषा। बोली को व्याकरण से संस्कारित करके एक रूपता देने से भाषा का विकास होता है। भाषा से बोली का विकास नहीं होता है। विभिन्न प्राकृत बोलियों को आगे चलकर व्याकरण के नियमों से संस्कारित किया गया तो उनसे विभिन्न प्राकृतों का जन्म हुआ। जैसे मागधी बोली से मागधी प्राकत का, शौरसेनी बोली से शौरसेनी प्राकृत का और महाराष्ट्र की बोली से महाराष्ट्री प्राकृत का विकास हुआ। प्राकृत के शौरसेनी, मागधी, पैशाची, महाराष्ट्री आदि भेद तत्-तत् प्रदेशों की बोलियों से उत्पन्न हुए हैं न कि किसी प्राकृत विशेष से। यहाँ यह भी ज्ञातव्य है कि कोई भी प्राकृत व्याकरण सातवीं शती से पूर्व का नहीं है। साथ ही उनमें प्रत्येक प्राकृत के लिये अलग-अलग मॉडल अपनाये गये हैं। वररुचि के लिये शौरसेनी की प्रकृति संस्कत है जबकि हेमचन्द्र के लिये शौरसेनी की प्रकृति (महाराष्ट्री) प्राकृत है, अतः प्रकृति का अर्थ आदर्श या मॉडल है। अन्यथा हेमचन्द्र के शौरसेनी के सम्बन्ध में ‘शेष प्राकृतवत् (०८.०४.२८६) का अर्थ होगा शौरसेनी महाराष्ट्री से उत्पन्न हुई, जो शौरसेनी के पक्षधरों को मान्य नहीं होगा। क्या अर्धमागधी आगम मूलतः शौरसेनी में थे? प्राकृत विद्या जनवरी-मार्च ६६ के सम्पादकीय में डॉ० सुदीप जैन ने प्रो० टॉटिया को यह कहते हुए प्रस्तुत किया है कि "श्वेताम्बर जैन साहित्य का भी प्राचीन रूप शौरसेनी प्राकृतमय ही था, जिसका स्वरूप क्रमशः अर्धमागधी के रूप में बदल गया"। इस सन्दर्भ में हमारा प्रश्न यह है कि यदि प्राचीन श्वेताम्बर आगम साहित्य शौरसेनी प्राकृत में था, Page #27 -------------------------------------------------------------------------- ________________ 24 : श्रमण/अक्टूबर-दिसम्बर/१६६७ तो फिर वर्तमान उपलब्ध पाठों में कहीं भी शौरसेनी की 'द' श्रुति का प्रभाव क्यों नहीं दिखाई देता। इसके विपरीत हम यह पाते हैं कि दिगम्बर परम्परा में मान्य शौरसेनी आगम साहित्य पर अर्धमागधी और महाराष्ट्री प्राकृत का व्यापक प्रभाव है, इस तथ्य की सप्रमाण चर्चा हम पूर्व में कर चुके हैं। इस सम्बन्ध में दिगम्बर परम्परा के शीर्षस्थ विद्वान् प्रो० ए०एन० उपाध्ये का यह स्पष्ट मन्तव्य है कि प्रवचनसार की भाषा पर श्वेताम्बर आगमों की अर्धमागधी भाषा का पर्याप्त प्रभाव है और अर्धमागधी भाषा की अनेक विशेषताएँ उत्तराधिकार के रूप में इस ग्रन्थ को प्राप्त हुई हैं। इसमें स्वर परिवर्तन, मध्यवर्ती व्यंजनों के परिवर्तन, 'य' श्रुति इत्यादि अर्धमागधी भाषा के समान ही मिलते हैं। दूसरे वरिष्ठ दिगम्बर विद्वान् प्रो० खडबडी का कहना है कि षट्खण्डागम् की भाषा शुद्ध शौरसेनी नहीं है। इस प्रकार जहाँ एक ओर दिगम्बर विद्वान् इस तथ्य को स्पष्ट रूप से स्वीकार कर रहे हैं कि दिगम्बर आगमों पर श्वेताम्बर आगमों की अर्धमागधी भाषा का प्रभाव है वहाँ यह कैसे माना जा सकता है कि श्वेताम्बर आगम शौरसेनी से अर्धमागधी में रूपान्तरित हुए। अपितु इससे तो यही फलित होता है कि अर्धमागधी आगम ही शौरसेनी में रूपान्तरित हुए हैं। पुनः अर्धमागधी भाषा के स्वरूप के सम्बन्ध में दिगम्बर विद्वानों में जो भ्रांति प्रचलित रही है उसका स्पष्टीकरण भी आवश्यक है। सम्भवतः ये विद्वान् अर्धमागधी और महाराष्ट्री के अन्तर को स्पष्ट रूप से नहीं समझ पाये हैं तथा सामान्यतः अर्धमागधी और महाराष्ट्री को पर्यायवाची मानकर ही चलते रहे हैं। यही कारण है कि डा० ए०एन० उपाध्ये जैसे विद्वान भी 'य' श्रुति को अर्धमागधी का लक्षण बताते हैं? जबकि वह मूलतः महाराष्ट्री प्राकृत का लक्षण है, न कि अर्धमागधी का। अर्थमागधी तो 'त' श्रुति प्रधान है। यह सत्य है कि श्वेताम्बर आगमों की अर्धमागधी भाषा में काल क्रम में परिवर्तन हुए हैं और उस पर महाराष्ट्री प्राकृत की 'य' श्रुति का प्रभाव आया है, किन्तु यह मानना पूर्णतः मिथ्या है कि श्वेताम्बर आगमों का शौरसेनी से अर्धमागधी में रूपान्तरण हुआ है। वास्तविकता यह है कि अर्धमागधी आगम ही माधुरी और वलभी वाचनाओं के समय क्रमशः शौरसेनी और महाराष्ट्री से प्रभावित हुए हैं। टॉटिया जी जैसा विद्वान् इस प्रकार की मिथ्या धारणा को प्रतिपादित करे कि शौरसेनी आगम ही अर्धमागधी में रूपान्तरित हुए- यह विश्वसनीय नहीं लगता है। यदि टॉटिया जी का यह कथन कि पालि त्रिपिटक और अर्धमागधी आगम मूलतः शौरसेनी में थे और फिर पालि और अर्धमागधी में रूपान्तरित हुए' सत्य है, तो उन्हें या सुदीप Page #28 -------------------------------------------------------------------------- ________________ जैन आगमों की मूल भाषा : अर्धमागधी या शौरसेनी : 25 जी को इसका प्रमाण प्रस्तुत करना चाहिए। वस्तुतः जब किसी बोली को साहित्यिक भाषा का रूप दिया जाता है, तो एकरूपता के लिये नियम या व्यवस्था आवश्यक होती है और यही नियम भाषा का व्याकरण बनाते हैं। विभिन्न प्राकृतों को जब साहित्यिक भाषा का रूप दिया गया तो उनके लिये भी व्याकरण के नियम आवश्यक हुए और ये व्याकरण के नियम मुख्यतः संस्कृत से गृहीत किये गये। जब व्याकरणशास्त्र में किसी भाषा की प्रकृति बताई जाती है तब वहाँ तात्पर्य होता है कि उस भाषा के व्याकरण के नियमों का मूल आदर्श किस भाषा के शब्द रूप हैं? उदाहरण के रूप में जब हम शौरसेनी के व्याकरण की चर्चा करते हैं तो हम यह मानते हैं कि उसके व्याकरण का आदर्श अपनी कुछ विशेषताओं को छोड़कर जिसकी चर्चा उस भाषा के व्याकरण में होती है, संस्कृत के शब्द रूप हैं: किसी भी भाषा का जन्म बोली के रूप में पहले होता है फिर बोली से साहित्यिक भाषा का जन्म होता है। जब साहित्यिक भाषा बनती है तब उसके लिये व्याकरण के नियम बनाये जाते हैं, ये व्याकरण के नियम जिस भाषा के शब्दरूपों के आधार पर उस भाषा के शब्दरूपों को समझाते हैं वही कसी प्रकृति कहलाते हैं। यह सत्य है कि बोली का जन्म पहले होता है, व्याकरण उसके बाद बनता है। शौरसेनी अथवा प्राकृत की प्रकृति को संस्कृत मानने का अर्थ इतना ही है कि इन भाषाओं के जो भी व्याकरण बने हैं वे संस्कृत शब्द रूपों के आधार पर बने है। यहाँ पर यह भी ज्ञातव्य है कि प्राकृत का कोई भी व्याकरण प्राकृत के लिखने या बोलने वालों के लिये नहीं बनाया गया, अपितु, उनके लिये बनाया गया जो संस्कृत में लिखते या बोलते थे। यदि हमें किसी संस्कृत के जानकार व्यक्ति को प्राकृत के शब्द या शब्दरूपों को समझाना हो तो हमें उसका आधार संस्कृत को ही बनाना होगा और उसी के आधार पर यह समझाना होगा कि संस्कृत के किसी शब्द से प्राकृत का कौन सा शब्दरूप कैसे निष्पन्न हुआ है इसलिये जो भी प्राकृत व्याकरण निर्मित किये गये अपरिहार्य रूप से वे संस्कृत शब्दों या शब्दरूपों को आधार मानकर प्राकृत शब्द या शब्दरूपों की व्याख्या करते हैं। संस्कृत को प्राकृत की प्रकृति कहने का इतना ही तात्पर्य है। इसी प्रकार जब मागधी, पैशाची या अपभ्रंश की 'प्रकृति' शौरसेनी को कहा जाता है तो उसका तात्पर्य होता है, प्रस्तुत व्याकरण के नियमों में इन भाषाओं के शब्दरूपों को शौरसेनी शब्दों को आधार मानकर समझाया गया है। प्राकृत प्रकाश की टीका में वररुचि ने स्पष्टतः लिखा है- शौरसेन्या ये शब्दास्तेषां प्रकृतिः संस्कृतम् (१२/२) अर्थात् शौरसेनी के जो शब्द हैं उनकी प्रकृति Page #29 -------------------------------------------------------------------------- ________________ 26 : श्रमण / अक्टूबर-दिसम्बर / १६६७ या आधार संस्कृत शब्द हैं। यहां यह भी ज्ञातव्य है कि प्राकृतों में तीन प्रकार के शब्दरूप मिलते हैं- तद्भव, तत्सम् और देशज । देशज शब्द वे हैं जो किसी देश विशेष में किसी विशेष अर्थ में प्रयुक्त हैं। इनके अर्थ की व्याख्या के लिये व्याकरण की कोई आवश्यकता नहीं होती है । तद्भव शब्द वे हैं जो संस्कृत शब्दों से निर्मित हैं जबकि संस्कृत के समान शब्दतत्सम् हैं। संस्कृत व्याकरण में दो शब्द प्रसिद्ध हैं- प्रकृति और प्रत्यय। इनमें मूल शब्दरूप को प्रकृति कहा जाता है। मूल शब्द से जो शब्दरूप बना है वह तद्भव है। प्राकृत व्याकरण संस्कृत शब्द से प्राकृत का तद्भव शब्दरूप कैसे बना है, इसकी व्याख्या करता है । अतः यहाॅ संस्कृत को प्रकृति कहने का तात्पर्य मात्र इतना कि तद्भव शब्दों के सन्दर्भ में संस्कृत शब्द को आदर्श मानकर या माडल मानकर यह व्याकरण लिखा गया है। अतः प्रकृति का अर्थ आदर्श या मॉडल है। संस्कृत शब्द रूप को मॉडल / आदर्श मानना इसलिये आवश्यक था कि प्राकृत व्याकरण संस्कृत के जानकार विद्वानों को दृष्टि में रखकर या उनके लिये ही लिखे गये थे। जब डॉ० सुदीपजी शौरसेनी के सन्दर्भ में 'प्रकृतिः संस्कृतम्' का अर्थ मॉडल या आदर्श करते हैं तो उन्हें मागधी, पैशाची आदि के सन्दर्भ में प्रकृतिः शौरसेनी का अर्थ भी यही करना चाहिए कि शौरसेनी को मॉडल या आदर्श मानकर इनका व्याकरण लिखा गया है- इससे यह सिद्ध नहीं होता है कि मागधी आदि प्राकृतों की उत्पत्ति शौरसेनी से हुई है। हेमचन्द्र ने महाराष्ट्री प्राकृत को आधार मानकर शौरसेनी, मागधी आदि प्राकृतों को समझाया है अतः इससे यह सिद्ध नहीं होता है कि महाराष्ट्री प्राचीन है या महाराष्ट्री से मागधी, शौरसेनी आदि उत्पन्न हुई । प्राचीन कौन ? अर्धमागधी या शौरसेनी इसी सन्दर्भ में टॉटिया जी के नाम से यह भी प्रतिपादित किया गया है कि "यदि वर्तमान अर्धमागधी आगम साहित्य को ही मूल आगम साहित्य मानने पर जोर देंगे तो इस अर्धमागधी भाषा का आज से १५०० वर्ष पहले अस्तित्त्व ही नहीं होने से इन स्थिति में हमें अपने आगम साहित्य को ही ५०० ई० के परवर्ती मानना पड़ेगा "। ज्ञातव्य है कि यहाॅ भी महाराष्ट्री और अर्धमागधी के अन्तर को न समझते हुए एक भ्रान्ति को खड़ा किया गया है। सर्वप्रथम तो यह समझ लेना चाहिए कि आगमों के प्राचीन अर्धमागधी के 'त' श्रुति प्रधान पाठ चूर्णियों और अनेक प्राचीन प्रतियों में आज भी मिल रहे हैं। उससे निःसंदेह यह सिद्ध होता है कि मूल अर्धमागधी 'त' श्रुति प्रधान थी और उसमें लोष की प्रवृत्ति नगण्य ही थी और यह अर्धमागधी भाषा शौरसेनी और Page #30 -------------------------------------------------------------------------- ________________ जैन आगमों की मूल भाषा : अर्धमागधी या शौरसेनी : 27 महाराष्ट्री से प्राचीन भी है। यदि श्वेताम्बर आगम शौरसेनी से महाराष्ट्री जिसे दिगम्बर विद्वान् भ्रांति से अर्धमागधी कह रहे हैं, बदले गये तो फिर उनकी प्राचीन प्रतियों में 'त' श्रुति के स्थान पर 'द' श्रुति के पाठ क्यों उपलब्ध नहीं होते हैं जो शौरसेनी की विशेषता है। इस प्रसंग में डॉ० टॉटियाजी के नाम से यह भी कहा गया है कि आज भी आचारांगसूत्र आदि की प्राचीन प्रतियों में शौरसेनी के शब्दों की प्रचुरता मिलती है। मैं आदरणीय टॉटियाजी से और भाई सुदीपजी से साग्रह निवेदन करूंगा की वे आचारांग, ऋषिभाषित, सूत्रकृतांग आदि की किन्हीं भी प्राचीन प्रतियों में 'द' श्रुति प्रधान पाठ दिखला दें। प्राचीन प्रतियों में जो पाठ मिल रहे हैं, वे अर्धमागधी या आर्ष प्राकृत के हैं, न कि शौरसेनी के। यह एक अलग बात है कि कुछ शब्दरूप आर्ष अर्धमागधी और शौरसेनी में समान हैं। वस्तुतः इन प्राचीन प्रतियों में न तो 'द' श्रति देखी जाती है और न "न" के स्थान पर “ण” की प्रवृत्ति देखी जाती है, जिसे व्याकरण में शौरसेनी की विशेषता कहा जाता है। सत्य तो यह है कि अर्धमागधी आगमों का ही शौरसेनी रूपान्तरण हुआ है न कि शौरसेनी आगमों का अर्धमागधी रूपान्तरण । यह सत्य है कि न केवल अर्धमागधी आगमों पर अपितु शौरसेनी आगमतुल्य कुन्दकुन्द आदि के ग्रन्थों पर भी महाराष्ट्री की 'य' श्रुति का स्पष्ट प्रभाव हैं जिसे हम पूर्व में सिद्ध कर चुके हैं। क्या पन्द्रह सौ वर्ष पूर्व अर्धमागधी भाषा एवं श्वेताम्बर अर्धमागधी आगमों का अस्तित्त्व नहीं था? डॉ० सुदीपजी द्वारा टॉटियाजी के नाम से उद्धृत यह कथन कि १५०० वर्ष पहले अर्धमागधी भाषा का अस्तित्त्व ही नहीं था' पूर्णतः भ्रान्त है। आचारांग, सूत्रकृतांग, ऋषिभाषित जैसे आगमों को पाश्चात्य विद्वानों ने एक स्वर से ई०पू० तीसरी-चौथी शताब्दी या उससे भी पहले का माना है। क्या उस समय ये आगम अर्धमागधी भाषा में निबद्ध न होकर शौरसेनी में निबद्ध थे। ज्ञातव्य है कि 'द' श्रुति प्रधान और 'ण' कार की प्रवृत्ति वाली शौरसेनी का जन्म तो उस समय हुआ ही नहीं था अन्यथा अशोक के अभिलेखों में और मथुरा (जो शौरसेनी की जन्म भूमि है) के अभिलेखों में कहीं तो इस शौरसेनी के वैशिष्ट्य वाले शब्दरूप उपलब्ध होने चाहिए थे? क्या शौरसेनी प्राकृत में निबद्ध ऐसा एक भी ग्रन्थ है जो ई०पू० में रचा गया हो? सत्य तो यह है कि भास (ईसा की दूसरी शती) के नाटकों के अतिरिक्त ईसा की चौथी-पॉचवीं शताब्दी के पूर्व शौरसेनी में निबद्ध एक भी ग्रन्थ नहीं था। जबकि मागधी के अभिलेख और अर्धमागधी के आगम ई०पू० Page #31 -------------------------------------------------------------------------- ________________ 28 : श्रमण / अक्टूबर-दिसम्बर / १६६७ ब तीसरी शती से उपलब्ध हो रहे हैं। पुनः यदि ये लोग जिसे अर्धमागधी कह रहें हैं उसे महाराष्ट्री भी मान ले तो उसके भी ग्रन्थ ईसा की प्रथम शताब्दी से उपलब्ध होते हैं । सातवाहन नरेश हाल की गाथासप्तशती महाराष्ट्री प्राकृत का प्राचीन ग्रन्थ है, जो ई०पू० प्रथम शती ईसा की प्रथम शती के मध्य रचित है । पुनः यह एक संकलन ग्रन्थ है जिसमें अनेक ग्रन्थों से गाथाएँ संकलित की गई हैं। इसका तात्पर्य यह हुआ कि इसके पूर्व भी महाराष्ट्री प्राकृत में ग्रन्थ रचे गये थे । कालिदास के नाटकों जिनमें शौरसेनी का प्राचीनतम् रुप मिलता है, भी ईसा की चतुर्थ शताब्दी के बाद के ही हैं। कुन्दकुन्द के ग्रन्थ स्पष्ट रूप से न केवल अर्धमागधी आगमों से, अपितु परवर्ती 'य' श्रुति प्रधान महाराष्ट्री से भी प्रभावित हैं, किसी भी स्थिति में ईसा की पांचवीं छठीं शताब्दी के पूर्व के सिद्ध नहीं होते हैं। षट्खण्डागम् और कुन्दकुन्द के ग्रन्थों में गुणस्थान, सप्तभंगी आदि लगभग ५वीं शती में निर्मित अवधारणाओं की उपस्थिति उन्हें श्वेताम्बर आगमों और उमास्वाति के तत्त्वार्थसूत्र (लगभग चतुर्थ शती) से परवर्ती ही सिद्ध करती हैं, क्योंकि इनमें ये अवधारणायें अनुपस्थित हैं। इस सम्बन्ध में मैंने अपने ग्रन्थ 'गुणस्थान सिद्धान्त : एक विश्लेषण' और 'जैन धर्म का यापनीय सम्प्रदाय' में विस्तार से प्रकाश है । इस प्रकार सत्य तो यह है कि अर्धमागधी भाषा या अर्धमागधी आगम नहीं, अपितु शौरसेनी भाषा ईसा की दूसरी शती के पश्चात् और शौरसेनी आगम ईसा० की ५वीं शती के पश्चात् अस्तित्त्व में आये। अच्छा होगा कि भाई सुदीप जी पहले मागधी और पालि तथा अर्धमागधी और महाराष्ट्री के अन्तर एवं इनके प्रत्येक के लक्षणों तथा जैन आगमिक साहित्य के ग्रन्थों के कालक्रम और जैन इतिहास को तटस्थ दृष्टि से समझ लें और फिर प्रमाण सहित अपनी कलम निर्भीक रूप से चलायें, व्यर्थ की आधारहीन भ्रान्तियाँ खड़ी करके समाज में कटुता के बीज न बोयें। डाला Page #32 -------------------------------------------------------------------------- ________________ श्रमण दशाश्रुतस्कन्धनिर्युक्तिः अन्तरावलोकन - डॉ० अशोक कुमार सिंह* अर्धमागधी जैनागमों पर प्राचीनतम व्याख्या के रूप में आचार्य भद्रबाहु निबद्ध दस निर्युक्तियों में से आज उपलब्ध आठ निर्युक्तियों में छेदसूत्र दशाश्रुतस्कन्ध निर्युक्ति भी एक है | आकार की दृष्टि से यह सबसे छोटी है। इसके दो प्रकाशित संस्करण उपलब्ध हैं- मूल और चूर्णि सहित मणिविजय गणि ग्रन्थमाला, भावनगर ' १६५४ और “निर्युक्तिसङ्ग्रह” शीर्षक के अन्तर्गत सभी उपलब्ध नियुक्तियों के साथ विजयजिनेन्द्रसूरि द्वारा सम्पादित लाखाबावल २९, १६८६ संस्करण । इसके अतिरिक्त निशीथसूत्रभाष्य - चूर्णि के साथ इसके आठवें पर्युषणाकल्प अध्ययन की सभी क्रमांक (५२-११८) गाथायें प्रकाशित *हैं। विद्वद्वर्य मुनिश्री पुण्यविजय जी द्वारा कल्पसूत्र के साथ भी पर्युषणाकल्प अध्ययन की नियुक्ति गाथायें प्रकाशित हैं। भावनगर संस्करण में १४१ गाथायें और लाखाबावल संस्करण में १४२ गाथायें प्राप्त होती हैं । लाखाबावल में भूलवश क्रमांक ११० के पश्चात् ११२ मुद्रित होने से यह संख्या - वृद्धि हो गयी है, वैसे दोनों संस्करणों की गाथा संख्या १४१ ही है । सम्भव है लाखाबावल संस्करण का पाठ, भावनगर संस्करण से लिया गया हो, यद्यपि सम्पादक ने इस तथ्य का उल्लेख नहीं किया है । जैन पाण्डुलिपियों की सूचना देने वाले कैटलागों और जैन साहित्य के इतिहास के ग्रन्थों में इसकी गाथा संख्या के सम्बन्ध में प्राप्त विवरण में भिन्नता है । 'गवर्नमेण्ट कलेक्शन आव मैनुस्क्रिप्ट्स' (संग्रा० एच०आर० कापडिया ) में इसकी गाथा सं० १५४ बताई गई है। 'जैन साहित्य का बृहद् इतिहास' भाग- एक में भी इसकी गाथा सं० १५४ है ।' जिनरत्नकोश" में यह सं० १४४ है । कापडिया लिखित 'ए हिस्ट्री आव जैन कैननिकल * वरिष्ठ प्रवक्ता, पार्श्वनाथ विद्यापीठ वाराणसी । Page #33 -------------------------------------------------------------------------- ________________ 32 : श्रमण / अक्टूबर-दिसम्बर / १६६७ लिटरेचर आव जैनाज' में तद्सम्बद्ध विवरण अत्यन्त भ्रामक है। उनके द्वारा अलग-अलग अध्ययनों की दी गई गाथाओं का योग ६६ ही होता है। 'गवर्नमेण्ट कलेक्शन' में प्रदत्त अलग-अलग अध्ययनों की गाथाओं का योग १४४ ही है, १५४ तो मुद्रण दोष है । जो इस उद्धृत् विवरण से भी स्पष्ट है"This work ends on fel.5; 154 gathas in all; Verses of the different sections of this nijjutti corresponding to the ten sections of Daśāśrutaskandha are separately numbered as under: असमाहिट्ठाणनिज्जुत्ति सबलदोसनिज्जुत्ति आसायण निज्जुत्ति गणिसंपयानिज्जुत्ति चित्तसमाहिट्ठाणनिज्जुत्ति उवासगपडिमानिज्जुत्ति भिक्खु पडिमा निज्जुत्ति पज्जोसवणाकप्पनिज्जुत्ति मोहणिज्जठाणनिज्जुत्ति आयतिट्ठाण निज्जुत्ति 99 Verses ३ १० ७ ४ ११ ८ ६७ ८ १५ 11 11 11 " of 11 11 सही योग..... (99+३+ . १४४) जैन साहित्य का बृहद् इतिहास भाग - १० का विवरण भी सम्भवतः इसी स्रोत पर आधारित होने से तथ्य से परे हो गया है। इस प्रकार १५४ गाथाओं का उल्लेख वस्तुतः १४४ गाथाओं का ही माना जाना चाहिए। 11 . आचारदसाणं निज्जुत्ती ११६ । । गाथा १५४ ।।” .+१५ = कापडिया का बाद में लिखा गया ( कैननिकल लिटरेचर) विवरण स्वाभाविक रूप से अपने पूर्ववर्ती (गवर्नमेण्ट कलेक्शन) विवरण पर ही आधारित होगा या दोनों की सूचनाओं का स्रोत एक ही होगा। परन्तु मुद्रण- दोष ने विवरण को पूरीतरह असंगत बना दिया है। प्रथम दृष्टि में उनके विवरण से इस नियुक्ति में १२ अध्ययन होने क भ्रम हो जाता है । " ६, ११, ३, १०, ७, ४, ११, ८, ६,७८, और १५ साथ ही इन Page #34 -------------------------------------------------------------------------- ________________ दशाश्रुतस्कंधनिर्युक्ति : अन्तरावलोकन : 33 गंगाओं का योग भी ६६ ही होता है। वस्तुतः शुरू का ६ और हवें, दसवें क्रम पर उल्लिखित ६, ७, के मध्य विराम अनापेक्षित है। इसप्रकार ६ को गणना से पृथक् कर देने और ६, ७ के स्थान पर ६७ पाठ कर देने से अध्ययन संख्या दस और गाथा संख्या १४४ हो जाती है और कापडिया के उक्त दोनों विवरण एक रूप हो जाते हैं । इस नियुक्ति की गाथा सं० १४४ और १४१ के रूप में संख्या- भेद पाँचवें अध्ययन में क्रमशः चार (१४४) और एक (१४१) गाथा उल्लिखित होने के कारण है 1 द० नि० की गाथा सं० निर्धारित करने के क्रम में नि० भा० चू० का विवरण भी बहुत महत्त्वपूर्ण है। प्रस्तुत नियुक्ति के आठवें 'पर्युषणाकल्प' अध्ययन की सभी गाथायें नि० भा० के दसवें उद्देशक में उसी क्रम से 'इमा णिज्जुत्ती १२ कहकर उदधृत हैं। निर्युक्ति के आठवें अध्ययन में ६७ गाथायें और नि० भा० के दसवें उद्देशक के सम्बद्ध अंश में ७२ गाथायें हैं। इस प्रकार नि० भा० में नियुक्ति गाथाओं के रूप में पाँच गाथायें अतिरिक्त हैं, जिनका वहाँ क्रमांक क्रमशः ३१५५, ३१७०, ३१७५, ३१६२ और ३२०६ है । इन अतिरिक्त गाथाओं का क्रमांक द० नि० में गाथा ६८, ८२, ८६,११८, एवं १०६ के बाद आता है। द० चू० (भावनगर) में ऊपर उल्लिखित गाथा सं० ६८ एवं ८६ की चूर्णि में, नि० भा० चू० में उपलब्ध गाथा सं० ३१५५ और ३१७५ की चूर्णि का विवरण भी प्राप्त होता है । द० नि० की गाथा सं० ८२ का प्रथम और शेष तीनों चरण नि० भा० चू० की ३१६६ और ३१७० दोनों गाथाओं में उपलब्ध हैं । फलतः द० चू० में भी ८२ की चूर्णि, में नि० भा० चू० की दोनों गाथाओं की चूर्णियों का समन्वित रूप मिलता है । परन्तु गाथा सं० १०१ की चूर्णि के साथ नि० भा० गाथा ३१६२ की चूर्णि और ११८ की चूर्णि के साथ नि० भा० गाथा ३२०६ की चूर्णि द० चू० में प्राप्त नहीं होती है | इन गाथाओं का विषय - प्रतिपादन की दृष्टि से भी महत्त्व है । नि० भा० गाथा सं० ३१५४ एवं द० नि० गाथा ६८ में श्रमणों के सामान्य चातुर्मास (१२० दिन) के अतिरिक्त न्यूनाधिक चातुर्मास की अवधि का वर्णन है। उसमें ७० दिन के जघन्य ( सबसे कम स्थिति) वर्षावास का उल्लेख है । ३१५५वीं गाथा में ७० दिन का वर्षावास किन स्थितियों में होता है यह बताया गया है, जो बिल्कुल प्रासङ्गिक है । गाथा सं० ३१६६ और ३१७० में श्रमणों द्वारा आहार ग्रहण के क्रम में Page #35 -------------------------------------------------------------------------- ________________ 34 : श्रमण / अक्टूबर-दिसम्बर / १६६७ विकृति - ग्रहण का नियम बताया गया है। जैसा कि ऊपर उल्लिखित है द० नि० की ८२वीं गाथा के चारों चरण उक्त दोनों गाथाओं के क्रमश: प्रथम चरण ( ३१६६) और द्वितीय, तृतीय और चतुर्थ चरण ( ३१७०) के समान हैं। इन दोनों गाथाओं का अंश निर्युक्ति में एक ही गाथा में कैसे समाहित यह विचारणीय है । विकृति के ही प्रसंग में अचित्त विकृति का प्ररूपण करने वाली ३१७५वीं गाथा भी प्रासंगिक है क्योंकि द० नि० में सचित्त विकृति का प्रतिपादन है परन्तु अचित्त विकृति के प्रतिपादन का अभाव असंगत प्रतीत होता है। अतः यह गाथा भी द० नि० का अंग रही होगी । यही स्थिति शेष दोनों गाथाओं ३१६२ और ३२०६ की भी है। इसप्रकार द० चू० में इन पाँच गाथाओं का विवेचन और विषय प्रतिपादन में तारतम्य द० नि० से इन गाथाओं के सम्बन्ध पर महत्त्वपूर्ण समस्या उपस्थित करती 1 द० नि० में प्रयुक्त छन्द ० नि० प्राकृत के मात्रिक छन्द गाथा में निबद्ध है । 'गाथा सामान्य' के रूप में जानी जाने वाली यह संस्कृत छन्द आर्या के समान है । छन्दोऽनुशासन की वृत्ति में उल्लिखित भी है- आर्येव संस्कृतेतर भाषासु गाथासंज्ञेति गाथालक्षणानि' अर्थात् संस्कृत का आर्या छन्द ही दूसरी भाषाओं में गाथा के रूप में जाना जाता है। दोनों 'गाथासामान्य' और आर्या के चारों चरणों को मिलाकर ५७ मात्रायें होती हैं। गाथा में चारों चरणों में मात्रा का विभाजन क्रमशः इसप्रकार है- १२, १८, १२ और १५ । इसप्रकार पूर्वार्द्ध के दोनों चरणों में ३० और उत्तरार्द्ध के दोनों चरणों में २७ मात्राएँ हैं । संस्कृत आर्या और प्राकृत 'गाथासामान्य' में अन्तर यह है कि अनिवार्य रूप से आर्या में ५७ मात्रायें ही होती हैं। इसमें कोई अपवाद नहीं हो सकता, जबकि गाथा में मात्रा ५७ से कम-अधिक भी हो सकती है, जैसे इसमें ५४ मात्राओं की गाहू, ६० मात्राओं की उद्गाथा और ६२ मात्राओं की गाहिनी भी पायी जाती है । मात्रावृत्तों की प्रमुख विशेषता यह है कि इसके प्रत्येक चरण में लघु या गुरु वर्ण का क्रम और उनकी संख्या नियत नहीं है। प्रत्येक गाथा में गुरु और लघु की संख्या में न्यूनाधिक्य के कारण 'गाथा सामान्य के बहुत से उपभेद हो जाते हैं 1 द० नि० में 'गाथा सामान्य' के प्रयोग का बाहुल्य है। कुछ गाथायें गाहू उद्गार्थी Page #36 -------------------------------------------------------------------------- ________________ दशाश्रुतस्कंधनियुक्ति : अन्तरावलोकन : 35 और गाहिनी में भी रचित हैं। सामान्य लक्षण वाली गाथाओं (५७ मात्रा) में बुद्धि, लज्जा, विद्या, क्षमा, देही, गौरी, धात्री, चूर्णा, छाया, कान्ति और महामाया का प्रयोग हुआ है। विभिन्न गाथावृत्तों में निबद्ध श्लोकों की संख्या इस प्रकार है- बुद्धि-१, लज्जा-४, विद्या-११, क्षमा-६, देही-२८, गौरी-२२, धात्री-२३, चूर्णा-१५, छाया-८, कान्ति-३, महामाया-३, उद्गाथा-६, और अन्य-४ । सभी गाथाओं में यथास्थिति में ही छन्द-लक्षण घटित नहीं हो जाते हैं। दूसरे शब्दों में सभी गाथायें छन्द की दृष्टि से शुद्ध हैं या निर्दोष हैं, ऐसी बात नहीं है। नियुक्ति संरचना नियुक्ति के संरचनात्मक स्वरूप को प्रकाशित करने वाली दशवैकालिक नियुक्ति की निम्न गाथायें१४ निक्खेवेगट्ठनिरुत्तविही पवित्ती य केण वा कस्स? तद्दारभेयलक्खण तयरिहपरिसा य सुत्तत्थो।।५।। एवं भिक्खुस्स य निक्खेवो निस्तएगट्ठिआणि लिंगाणि। अगुणट्ठिओ न भिक्खू अवयवा पंच दाराई।।३३२ ।। निर्यक्ति साहित्य की संरचना या नियुक्ति के अवयवों या घटकों पर कुछ सीमा तक प्रकाश डालती हैं। जहाँ तक नियुक्ति साहित्य की संरचना को समग्र रूप से अभिव्यक्त करने का प्रश्न है तो अभी तक कोई प्राचीन उल्लेख हमारे समक्ष नहीं आया है। प्रो० कापडिया ने भी इसी तथ्य को इंगित करते हुए कहा है-"In order that its nature may completely realised, it is necessary to tap another source wherein there is a specific mention of atleast its constituents." फिर भी हम दश० नि० की गाथाओं के आलोक में कह सकते हैं कि निक्षेप, एकार्थ एवं निरुक्त नियुक्ति साहित्य के घटक के रूप में प्राचीन साहित्य में भी वर्णित हैं। इसके अतिरिक्त दृष्टान्त कथाओं का संकेत भी पर्याप्त मात्रा में नियुक्तियों में दृष्टिगोचर होता है। नियुक्ति साहित्य की संरचना में उक्त चारों घटकों-निक्षेप, एकार्थ, निरुक्त और दृष्टान्त की महत्ता एवं स्वरूप के सम्बन्ध में आधुनिक भारतीय एवं विदेशी विद्वानों Page #37 -------------------------------------------------------------------------- ________________ 36 : श्रमण/अक्टूबर-दिसम्बर/१६६७ ने भी मन्तव्य प्रस्तुत किया है। नियुक्ति साहित्य के प्रमुख घटक के रूप में निक्षेप की महत्ता बताते हुए एल० एल्सडोर्फ१६ का अभिमत है "This courious system of subjecting key-words to an investigation by applying a scheme of fixed view-points may be less fruitful philosophically, but it occupies almost a key position in early scholastic literature, particularly the Nijjuttis. Itis of prime importance for understanding of these difficult and hitherto rather imperfectly explored texts." नियुक्ति साहित्य में एकार्थ का महत्त्व प्रतिपादित करते हुए कापड़िया ने कहा है "Egattha is one of the features of Nijjutti, and it should be so, for, otherwise a commentary is not worth the name. A thing or a point gets correctly understood when synonyms are suggested". अवयव के रूप में निर्युक्त में निरुक्त की उपस्थिति बताते हुए कापडिया में निरुक्त८ को भारतीय साहित्य को जैनों का योगदान कहा है। उनका अभिमत है "All the extant Nijjuttis more or less indulge in the discussion of Niruttas. This is another instance how the Indian literature gets enriched by Jaina contributions." नियुक्ति साहित्य में पर्याप्त संख्या में दृष्टान्त कथाओं का निर्देशमात्र उपलब्ध होता है। इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए जे० शाण्टियर ने उचित ही कहा है-१६ "For the most important aim of the Niryukti is apparently to give a sort of register of the legends and tales which are used to illustrate the religious sentences and moral or disciplinary rules as given in the canonical text." द०नि० की संरचना स्वाभाविक रूप से अन्य नियुक्तियों की मँति द० नि० में भी निक्षेप, एकाई निरुक्त और दृष्टान्त कथायें घटक के रूप में विद्यमान हैं। इस नियुक्ति में आशातना, Page #38 -------------------------------------------------------------------------- ________________ दशाश्रुतस्कंधनियुक्ति : अन्तरावलोकन : 37 मणिसम्पदा, शरीरसम्पदा, संग्रहपरिज्ञा, भिक्षु, स्थापना, मोह, जाति और बन्ध शब्दों के निक्षेप प्राप्त होते हैं। ज्ञात, पर्युषणा और मोह शब्दों के एकार्थक इस नियुक्ति में प्राप्त होते हैं। निरुक्त की दृष्टि से वह स्थल उद्धृत किया जा सकता है जहाँ श्रावक ही उपासक है श्रमण नहीं- इस तथ्य का निरूपण करते हुए कहा गया है-जिसके द्वारा सम्पूर्ण रूप से कार्य किया जाता है, वही कर्ता कहा जाता है। जहाँ तक द० नि० में संकेतित दृष्टान्त कथाओं का प्रश्न है इसमें क्षमापना में कुम्भकार, उदायन चण्डप्रद्योत और चेट द्रमक का दृष्टान्त, चारों कषायों की दृष्टि से क्रोध में मरुक, मान में अत्यहंकारिणी भट्टा, माया में साध्वी पाण्डुरार्या का और लोभ में आर्यमगु का दृष्टान्त निर्दिष्ट है। द० नि० का प्रतिपाद्य द० नि० में आदि मंगलाचरण के रूप में सम्पूर्ण श्रुतों के ज्ञाता, दशाश्रुत, कल्प और व्यवहार- इन छेदसूत्रों के कर्ता प्राचीनगोत्रीय भद्रबाहु की वन्दना की गई है। विषय-निरुपण का प्रारम्भ दशा के निक्षेप से किया गया है। द्रव्य-निक्षेप की दृष्टि से . दशा, वस्तु की अवस्था है तो भाव-निक्षेप की दृष्टि से जीवन की अवस्था। जीवन-अवस्था या आयु-विपाक के सन्दर्भ में सौ वर्ष की आयु को दस-दस वर्ष की दस दशाओं-अवस्थाओं में वर्गीकृत किया गया है। ये दस अवस्थायें हैं-बाला (एक से दस वर्ष), मन्दा (ग्यारह से बीस वर्ष), क्रीडा (२१-३० वर्ष), बाला (३१-४० वर्ष), प्रज्ञा (४१-५० वर्ष), हायनी (५१-६० वर्ष), प्रपंचा (६१-७० वर्ष), प्राग्भारा (७१-८० वर्ष), मन्मुखी (८१-६० वर्ष) और शायनी (६१-१०० वर्ष)। अध्ययन से तात्पर्य शास्त्र-विभाग से है और प्रस्तुत ग्रन्थ में दशाश्रुतस्कन्ध के दस अध्ययनों असमाधि, शबल, आशातना, गणिगुण, मनःसमाथि, श्रावकप्रतिमा, भिक्षुप्रतिमा, पर्युषणाकल्प, मोह और निदान की क्रमशः नियुक्ति की गई है। इसके उक्त अध्ययन दृष्टिवाद आदि पूर्वो से उद्धृत हैं। आचार का ज्ञाताधर्म आदि छः अंगों में विस्तृत तथा दशाश्रुतस्कन्ध के इन अध्ययनों में संक्षिप्त निरूपण उपलब्ध होता है। नियुक्ति की प्रस्तावना रूप आठ गाथाओं के पश्चात् असमाधि (गाथा ६-११), शबल (१२-१४), आशातना (१५-२४), गणिगुण या गणिसम्पदा (२४-३१), मनः समाधि (३२), श्रावकप्रतिमा (३३-४३), भिक्षप्रतिमा (४४-५१), पर्युषणाकल्प (५२-११८), मोह (११६-१२६) और निदान अध्ययन (१२७-१४१) की नियुक्ति की गई है। Page #39 -------------------------------------------------------------------------- ________________ 38 : श्रमण/अक्टूबर-दिसम्बर/१६६७ प्रथम ‘असमाधि अध्ययन में समाधि का द्रव्य और भाव की दृष्टि से तथा इसके २० अतिशयों या स्थानों का निर्देश है। समाधि-प्राप्ति में सहायक द्रव्य या वस्तु-विशेष द्रव्यसमाधि और प्रशस्त योग द्वारा प्राप्त होने वाली जीव की सुसमाहित अवस्था भाव समाधि है। समाधि की विपरीत अवस्था असमाधि है। ___ द्वितीय 'शबल अध्ययन' में शबल और शबलता अर्थात् चारित्र को दूषित करने वाले शिथिलाचारों का निर्देश है। चारित्र का दूषित होना या चारित्र पर दाग, धब्बा या कलंक लग जाना जैसे कि चितकबरा बैल आदि यह द्रव्य शबल है। शबलत्व में चारित्र सर्वथा दूषित नहीं होता बल्कि अंश रूप में भ्रष्ट होता है। जिसप्रकार कम या अधिक खण्डित घड़ा खण्डित ही कहा जायगा उसी प्रकार चारित्र की अंशतः विराधना, चाहे जिस भी मात्रा में हो, वह शबल विराधना कही जाती है। तृतीय अध्ययन ‘आशातना' में इसके मिथ्याप्रतिपादन और मिथ्याप्रतिपत्तिलाभ दो भेद बताये गये हैं। पुनः इन दोनों का छ: निक्षेपों-नाम, स्थापना, द्रव्य, काल, क्षेत्र - और भाव से प्रतिपादन है। मिथ्याप्रतिपादन और मिथ्याप्रतिपत्तिलाभ आशातनाओं का द्रव्य, क्षेत्र, काल और भाव निक्षेप की दृष्टि से इष्ट और अनिष्ट रूप में भी निरूपण है। उदाहरणस्वरूप चोरों द्वारा हृत उपधि का साधु द्वारा पुर्नग्रहण अनिष्ट द्रव्याशातना तथा उद्गम, उत्पादन आदि दोषो से युक्त उपधि की साधु को प्राप्ति इष्ट द्रव्याशातना है। सचित आदि द्रव्यों का अरण्य आदि में प्राप्त होना अनिष्ट क्षेत्र और ग्रामादि में प्राप्त होना इष्ट क्षेत्र मिथ्याप्रतिपादन आशातना है। द्रव्यादि की दुर्भिक्ष में प्राप्ति अनिष्टकाल और सुभिक्ष में प्राप्ति इष्ट काल मिथ्याप्रतिपादन आशातना है। जो संयम और तप में तत्पर हों उनके विषय में वह नहीं करता है, अशक्य है या कम करता है, इसप्रकार अपनी उत्कृष्टता का कथन भावदृष्टि से मिथ्याप्रतिपादन आशातना है। इसी प्रकार इष्ट और अनिष्ट मिथ्याप्रतिपत्ति आशातना का भी द्रव्य, क्षेत्र, काल और भाव की दृष्टि से निरूपण है। प्राप्त द्रव्य का परिमाण उचित होने पर इष्ट, कम या अधिक होने पर अनिष्ट द्रव्य मिथ्याप्रतिपत्ति आशातना हैं। सम्यकूरूप से प्रदत्त द्रव्य इष्ट और असम्यक रूप से प्रदत्त द्रव्य अनिष्ट । द्रव्य की प्राप्ति और प्रदान सुक्षेत्र में हो तो इष्ट और विक्षेत्र में हो तो अनिष्ट मिथ्याप्रतिपत्ति आशातना है। औदयिक आदि छ: प्रकार के भावों के कारण भी मिथ्याप्रतिपत्ति आशातना छः प्रकार की होती है। उपसर्गों से भी अकस्मात् आशातना होती है। Page #40 -------------------------------------------------------------------------- ________________ दशाश्रुतस्कंधनियुक्ति : अन्तरावलोकन : 39 छेदसूत्र दशाश्रुतस्कन्ध में वर्णित गुरु सम्बन्धी आशातना निमित्तों का यदि अकारण आचरण किया जाय तो उससे गम्भीर कर्मों का बन्ध होता है। कारण उपस्थित होने पर इन आशातनाओं का आचरण करने वाला गम्भीर कर्म का बन्ध नहीं करता है। श्रमण को गुरु-आशातना से बचना चाहिए। चतुर्थ अध्ययन 'गणिसम्पदा' में गणि को द्रव्य और भाव रूप से दो प्रकार का निर्दिष्ट किया गया है। द्रव्यगणि अर्थात् गणि का संसारी शरीर और भाव गणि से तात्पर्य उसका आचारसम्पदा आदि गुणों से युक्त होना है। गणि का मुख्य गुण गणसंग्रह और उपकार करना तथा धर्मज्ञ होना है। गणि द्वारा गणसंग्रह द्रव्य और भाव दो दृष्टियों से होता है। द्रव्य अपेक्षा से शिष्यों के लिए वस्रादि संग्रह और भाव अपेक्षा से शिष्यों के लिए ज्ञानादि का संग्रह। इसीप्रकार गणि गणोपकारक भी द्रव्य और भाव दोनों की अपेक्षा से होता है। द्रव्योपग्रह से अभिप्राय आहारादि द्वारा कृपा और भावोपग्रह का अर्थ रुग्ण, वृद्धादि के संरक्षण रूप है। गणिधर्म अर्थात गणिस्वभाव को जानने वाला गणि कहा जाता है। द्रव्यगण अर्थात् गच्छ और भावगण अर्थात् ज्ञानादि को धारण करने में समर्थ को गणि कहा जाता है। सम्पदा नाम, स्थापना, द्रव्य , क्षेत्र, काल और भाव निक्षेप से छः प्रकार की होती है। द्रव्य दृष्टि से गणि की सम्पदा शरीर है। औदयिकादि छः प्रकार के भाव सम्पदा हैं। आठवीं गणिसम्पदा संग्रह परिज्ञा भी नाम, स्थापना, द्रव्य क्षेत्र, काल और भाव रूप से छः प्रकार की होती है। पर्वत, कन्दरा, शिलाखण्डों आदि विषम स्थानों पर अपने शरीर पर उगे हुए दाँतों को बिना खिन्न हुए वहन करने वाले गज की भाँति गणि भी जिनभक्त, साधर्मिक तथा असमर्थों को विषम क्षेत्र और दुष्काल में सरलतापूर्वक वहन करता है। पंचम अध्ययन 'मनः समाधि' की नियुक्ति मात्र एक गाथा में है। इस अध्ययन को श्रेणिअध्ययन भी कहा जाता है। इसमें उपासक के चार भेद-द्रव्य, तदर्थ, मोह और भाव निर्दिष्ट हैं। छठवें 'उपासकप्रतिमा' अध्ययन में उपासक-श्रावक के उपर्युक्त चारों भेदों का लक्षण बताकर श्रावक ही उपासक है, श्रमण नहीं, इसका युक्तिपूर्वक प्रतिपादन किया गया है। द्रव्य और भाव निक्षेपों की अपेक्षा से प्रतिमा का स्वरूप बताया गया है। द्रव्योपासक-संसारी शरीर धारण करने वाला, तदर्थोपासक-ओदनादि पदार्थों की इच्छा वाला, मोहोपासक कुप्रवचन और कुधर्म की उपासना करने वाला और भावोपासक श्रमणों Page #41 -------------------------------------------------------------------------- ________________ 40 : श्रमण/अक्टूबर-दिसम्बर/१६६७ का आराधक सम्यग्दृष्टि श्रावक है। किसी कार्य को जो समग्र रूप से सम्पादित करता है उसी के द्वारा कार्य कृत कहा जाता है। केवल ज्ञान प्राप्त कर लेने के पश्चात् श्रमण भक्ति या उपासना नहीं करते है। अतः वे उपासक नहीं कहे जा सकते हैं। संन्यास चाहने वाले गृहस्थ का द्रव्यलिंग संयम प्रतिमा है। प्रतिमा-विशेष के अपेक्षित गुणों का श्रावक में विद्यमान होना भाव प्रतिमा है। सप्तम 'भिक्षुप्रतिमा' अध्ययन में भावनिक्षेप की अपेक्षा से भिक्षुप्रतिमा का प्रतिपादन है। भाव निक्षेप की दृष्टि से भिक्षु प्रतिमायें-समाधि, उपधान, विवेक, प्रतिसंलीनता और एकलविहार-पाँच हैं। समाधि प्रतिमा के श्रुतसमाधि और चारित्र समाधि दो भेद हैं। श्रुतसमाधि के ६६ भेद निर्दिष्ट हैं। आचारांग में वर्णित ४२, स्थानांग में १६, व्यवहारसूत्र में चार, दो मोक प्रतिमा तथा दो चन्द्र प्रतिमा (४२+१६+४+२+२)- इनको मिलाकर ६६ प्रतिमायें होती हैं। सामायिक आदि (सामायिक, छेदोपस्थापन, परिहारविशुद्धि, सूक्ष्ममसम्पराय और यथाख्यात) पाँच चारित्र सम्बन्धी प्रतिमायें हैं। . उपधान प्रतिमा श्रमणों की बारह और श्रावकों की ग्यारह होती हैं। विवेक प्रतिमा अभ्यन्तर और बाह्य दो प्रकार की है। अभ्यन्तर विवेक प्रतिमा कषायरूप है तथा बाह्य विवेक प्रतिमा गण (शरीर और भक्त-पान) है। प्रतिसंलीनता प्रतिमा इन्द्रिय और नोइन्द्रिय दो प्रकार की होती है। इन्द्रियप्रतिसंलीनता श्रोत्रेन्द्रिय आदि पाँच प्रकार की होती है। आचार सम्पदा आदि आठ गुणों से युक्त भिक्षु की एकलविहार प्रतिमा होती है। उक्त गुणों से युक्त भिक्षु सम्यक्त्व और चारित्र से दृढ़, बहुश्रुत्, अचल, अरति, रति, भय और भैरव (अकस्मात भय) को सहन करने वाले होते हैं। आठवें अध्ययन ‘पर्युषणाकल्प' के प्रारम्भ में पर्युषणा के आठ पर्यायवाची शब्द उल्लिखित हैं। स्थापना (ठवणा) के छः द्वारों से निक्षेप द्वारा अन्य सभी सात एकार्थक शब्दों का भी निक्षेप किया गया माना है। स्थापना का निक्षेप नाम, स्थापना, द्रव्य, क्षेत्र, काल और भाव की अपेक्षा से किया गया है। कालस्थापना का प्ररूपण करते हुए कहा गया है कि ऋतुबद्ध (ग्रीष्म और शीतकाल के) क्षेत्र से वर्षाऋतु में निष्क्रमण और शरदकाल में प्रवेश का नियम है। ऋतुबद्धकाल में प्रतिमाधारी श्रमणों को एक क्षेत्र में एकदिन, यथालन्दियों को पाँच दिन, जिनकल्पी को एक मास, स्थविरकल्पी को सामान्यतः एक मास तथा विशेष परिस्थिति होने पर एक मास से कम या अधिक वास करने का नियम है। चातुर्मास क्षेत्र ग्रहण करने की स्वीकारोक्ति करने और न करने के सम्बन्ध में भी कालस्थापना के अन्तर्गत विचार किया गया है। चातुर्मास आरम्भ करने से अधिक पहले, Page #42 -------------------------------------------------------------------------- ________________ दशाश्रुतस्कंधनिर्युक्ति : अन्तरावलोकन : 41 चातुर्मास क्षेत्र ग्रहण की बात स्वीकार करने की स्थिति में किसी प्राकृतिक या मानवीय कारणों से उक्त क्षेत्र - विशेष से साधु के विहार करने पर श्रावकों में उसकी गरिमा की क्षति की सम्भावना है। वर्षावास की अवधि ७० दिन, ८० दिन, तीन महीने, चार महीने, पाँच महीने और अधिकतम छः महीने बतायी गयी है । राजा के दुष्ट होने, सर्पभय, श्रमण के रुग्ण हो जाने और स्थण्डिल भूमि अप्राप्य होने पर चातुर्मास काल के मध्य में ही विहार कल्प्य है । इसीप्रकार अकल्याणकारी परिस्थिति, ऊनोदरी व्रत धारण करने, राजा के दुष्ट होने, वर्षा न रुकने, मार्ग दुर्गम या कीचड़ युक्त होने पर चातुर्मास समाप्त हो जाने के बाद भी श्रमण द्वारा विलम्ब से विहार किया जा सकता है । सामान्यतः चातुर्मास स्थल के चारों दिशाओं में ढाई कोस (८ कि०मी०) तक इस प्रकार दोनों तरफ मिलाकर १६ कि०मी० तक क्षेत्र मर्यादा होती है। कारणवश इसका अपवाद हो सकता है। पर्वतादि पर स्थित चातुर्मास स्थल के सन्दर्भ में क्षेत्र की पाँच और छ: दिशायें भी हो सकती हैं। गाँव यदि उपवन आदि के किनारे हो तो केवल एक और तीन दिशाओं में ही क्षेत्र हो सकता हैं 1 द्रव्यस्थापना आहार, विकृति, संस्तारक, पात्र लोच, सचित्त और अचित्त के त्याग, ग्रहण और धारण की दृष्टि से निरूपित है। ऋतुबद्ध काल की अपेक्षा चातुर्मास में आहार की मात्रा यथासम्भव क्रमशः कम कर देनी चाहिए। विकृति प्रशस्त और अप्रशस्त दो प्रकार की होती है । प्रशस्त विकृति सामान्यतः, जबकि अप्रशस्त विकृति कारणपूर्वक ग्रहण की जानी चाहिए । वर्षावास हेतु नया संस्तारक ग्रहण करना चाहिए। गुरु दूसरों को भी संस्तारक प्रदान करते हैं । अतः तीन संस्तारक ग्रहण कर सकते हैं। उच्चार, प्रस्रवण और श्लेष्म (कफ) हेतु साधुओं को तीन-तीन पात्र ग्रहण करने का विधान है । वर्षावास काल में जिनकल्पियों को प्रतिदिन लोच करना आवश्यक है, जबकि स्थविरकल्पियों के लिए केवल एक बार । सचित्त त्याग के परिप्रेक्ष्य में निर्दिष्ट है कि पूर्वदीक्षित और श्रद्धावान् के अतिरिक्त अन्य को दीक्षित करना वर्जित हैं। पाँच समितियों के पालन, गुण और दोषों की आलोचना, पाप न करने और पूर्व में किये गये पापों का प्रायश्चित्त करने का उपदेश है। क्षमापना में कुम्भकार, उदायन-चण्डप्रद्योत और चेट द्रमक का दृष्टान्त, चारों कषायों के भेद-प्रभेदों का उपमा सहित निर्देश, क्रोध में मरुक् का, मान में अत्यहंकारिणी Page #43 -------------------------------------------------------------------------- ________________ 42 : श्रमण/अक्टूबर-दिसम्बर/१६६७ भट्टा का, माया में पाण्डुरार्या का और लोभ में आर्यममु का दृष्टान्त निर्दिष्ट है। श्रमणों को संयम में आत्मा योजित करने का उपदेश है। इस अध्ययन के अन्त में उपदेश दिया गया है कि ज्ञानार्थी, तपस्वी तथा असहिष्णु को, बरसात होने पर भी, यतनापूर्वक गोचरी ग्रहण करनी चाहिए। नवम 'मोहनीय' में मोह का नाम, स्थापना, द्रव्य और भाव निक्षेपों में से भाव निक्षेप द्वारा कथन करने का निर्देश है। द्रव्य निक्षेप से मोह सचित्त और अचित्त दो प्रकार का है। सचित्त मोह धातु, गो, अन्नादि और अचित्त मोह गृह, धन आदि है। भाव मोह संघात या सामान्य और विभाग रूप दो प्रकार का होता है। भाव मोह संघात दृष्टि से एक प्रकृति और विभाग दृष्टि से अनेक प्रकृति होता है। __ कर्मप्रवाद में वर्णित अष्टविधकर्म ही संक्षेप में मोह कहा गया है। उसके अनेक एकार्थक हैं। तीर्थंकरों के अनुसार साधु, गुरु, मित्र, बान्धव, श्रेष्टि और सेनापति के वध में गुरुबन्ध या महाबन्ध है। साधु को गुरु की आशातना और जिनवचनों का विलोपन, हनन या व्याघात नहीं करना चाहिए। दशम 'निदान' अध्ययन के आरम्भ में नाम, स्थापना, द्रव्य और भाव निक्षेपों में से भाव निक्षेप द्वारा आयति का कथन करने का निर्देश है। द्रव्य निक्षेप से जाति या उत्पत्ति उत्पन्न द्रव्य का स्वभाव है जबकि भावनिक्षेप से यह उत्पत्ति रूप अनुभवन है। निदानकृत कर्मफल का भोग ओघ- सामान्य और विभाग दो प्रकार का बताया गया है। ओघ अनुभवन से अभिप्राय सांसारिक जीवों की उत्पत्ति और मरण है। विभाग अनुभवन औदयिक, औपशमिक, क्षायिक, क्षायोपशमिक, पारिणामिक और सान्निपातिक छ: भाव रूप हैं। इसी क्रम में उत्पत्ति के तीन भेद बताये गये हैं- जाति, आजाति और प्रत्याजाति। सांसारिकों की नरकादि गतियों में उत्पत्ति जाति है। संमूर्छ, अगर्भ, उपपात आदि अन्य प्रकार से जन्म आजाति है। जिस भव से जीव च्युत हुआ है, उसी भव में जब उसका पुनर्जन्म होता है, वह प्रत्याजाति है और यह केवल मनुष्य और तिर्यंच को होता है। इस अध्ययन में बन्थ का द्रव्य और भाव निक्षेप से वर्णन है। द्रव्य बन्ध दो प्रकार का होता है-प्रयोग बन्ध और विस्रसाबन्ध । प्रयोग बन्ध मूल और उत्तर दो प्रकार का होता है। मूलबन्ध के दो भेद होते हैं-शारीरिक और अशारीरिक। नूपुर या वेणी उत्तरबन्ध है। विरसा बन्ध सादिक और अनादिक दो प्रकार का है। निक्षेप की दृष्टि से भाव बन्ध जीव और अजीव दो प्रकार का होता है। ये दोनों भाव तीन-तीन प्रकार Page #44 -------------------------------------------------------------------------- ________________ दशाश्रुतस्कंधनिर्युक्ति : अन्तरावलोकन : 43 के होते हैं-विपाक से बन्ध, अविपाक से बन्ध और तदुभय बन्ध । क्षेत्र और काल की दृष्टि से विचार करते हुए कहा गया है जिस क्षेत्र में बन्ध हो वह क्षेत्र बन्ध और जिस काल में बन्ध हो वह काल बन्ध है । भावनिक्षेप से (निदान) में कषाय बन्ध अधिकार अनेक विधियों और अर्थों में होता है। भाव निदान इहलौकिक और पारलौकिक दो प्रकार का होता है । प्रस्तुत अध्ययन में पारलौकिक बन्ध का कथन है। निदान - दोष के कारण श्रमण का भव-भ्रमण अवश्यम्भावी बताया गया है। श्रमण जन्म-मरण से मुक्त कैसे होता है और भव-भ्रमण क्यों करता है, इस परिप्रेक्ष्य में निर्दिष्ट है कि अदूषित मूल और उत्तरगुण वाला, सदा संसार मे अनासक्त, भक्त (आहार), उपाधि और शय्यासन में सदा शुद्धता और एकान्त का सेवन करने वाला तथा सदा अप्रमत्त श्रमण मोक्षगामी होता है । तीर्थंकर, गुरुओं और साधुओं में भक्ति-युक्त, इन्द्रियजयी प्रायः सिद्ध होता है । इसके विरुद्ध विषयाभिलाषी और असंयत को मोक्ष नहीं होता, निदान और संदान करने वाले निश्चित रूप से इस संसार में आते हैं। निदान दोष के कारण संयम मार्ग पर प्रयत्नशील भी श्रमण निश्चित रूप से उत्पत्ति या जन्म पाता है या संसार प्राप्त करता है । अतः अनिदान श्रेयस्कर है। I इस प्रकारसंक्षेप में दशाश्रुतस्कन्ध निर्युक्ति का परिचय संक्षेप में प्रस्तुत है 1 सन्दर्भ (१) मूल एवं चूर्णि सहित, मणिविजयगणि ग्रन्थमाला सं० १४, भावनगर १९५५, पृ० ४२, १८४, प्रताकार । (२) नियुक्तिसंग्रह, सं० विजयजिनेन्द्रसूरि, हर्षपुष्पामृत जैन ग्रन्थमाला सं० १८६, लाखाबावल, १६८६ पृ० ४७६-४६६ । (३) निशीथसूत्रम् भाष्य एवं चूर्णि सहित, स० आचार्य अमरमुनि ग्र०मा०सं० ५, भारतयी विद्या प्रकाशन, दिल्ली और सन्मति ज्ञानपीठ, राजगृह, भाग-३, उद्देशक १०, गाथा ३१३४८-३२०६, (४) कल्पसूत्र, मूल-चूर्णि, पृथ्वीचन्द्रसूरि कृत टिप्पण सहित सम्पा०, मुनि पुण्यविजय जी, जैन कला साहित्य संशोधक कार्यालय सिरीज़ नं० ५, साराभाई मणिलाल वाब, अहमदाबाद, १६५२, पृ० ८५-१११ (५) संग्रा० एच०आर० कापडिया, गवर्नमेण्ट कलेक्शन आव मैनुस्क्रिप्ट्स भाण्डारकर ओरिएण्टल रिसर्च इंस्टीच्यूट, पूना १६३६, खण्ड २२, भाग २, पृ० ६७. Page #45 -------------------------------------------------------------------------- ________________ 44 : श्रमण/अक्टूबर-दिसम्बर/१६६७ (८) (६) जैन साहित्य का बृहद् इतिहास भाग-१, पा०वि० ग्र०मा०सं० ६ पार्श्वनाथ विद्यापीठ, वाराणसी, द्वि०सं० १९८६, पृ० ३४. संग्रा० एच० डी० वेलणकर जिनरत्नकोश खण्ड एक, गवर्नमेण्ट ओरिएण्टल सिरीज, भाण्डारकर ओरिएण्टल रिसर्च इंस्टीच्यूट, पूना; १६४४, पृ० १७२. प्रो० एच०आर० कापडिया, हिस्ट्री आव द ननिकल लिटरेचर आव द जैनाज़, लेखक, सूरत १६४१, पृ० १८२. (६) कापडिया, गवर्नमेण्ट कलेक्शन, ओरिएण्टल, पूना १६३६, पृ० ६७. (१०) बृहद् इतिहास, पार्श्वनाथ, वाराणसी १६८६, पृ० ३५. (११) कापडिया, कैननिकल, सूरत १६४१, पृ० १८२. (१२) सं० अमरमुनि, निशीथसूत्रभाष्य-चूर्णि, दिल्ली-राजगृह, पृ० १३७. (१३) सं० प्रो० एच०डी० वेलणकर, 'छन्दोऽनुशासन' (हेमचन्द्र) भारतीय विद्याभवन, बम्बई १६६१, पृ० १२८, (१४) “दशवैकालिकनियुक्ति” 'नियुक्तिसंग्रह' लाखाबावल १६८८, पृ० ३२८ एवं ३६१. (१५) प्रो० कापडिया, कैननिकल, सूरत १६४१, पृ० १८५. (१६) एल० अल्सडोर्फ, “निक्षेप-ए जैन कान्ट्रीब्यूशन टू स्कालस्टिक" (१७) कापडिया, कैननिकल १६४१, पृ० २१०. (१८) वही, पृ० २११. (१६) जे० शार्पेण्टियर, उत्तराध्ययन सूत्र, उपशाला १६२२, भूमिका पृ०५०, (२०) जर्नल आव द ओरिएण्टल इंस्टीच्यूट, ओरिएण्टल इंस्टीच्यूट, बड़ौदा, खण्ड २२, अङ्क ४, जून १६७३, पृ० ४५५. Page #46 -------------------------------------------------------------------------- ________________ श्रमण 'षटप्राभृत' के रचनाकार और उसका रचनाकाल -डॉ० के० आर० चन्द्र, डॉ० ए० एन० उपाध्ये ने 'प्रवचनसार' की प्रस्तावना में 'षट्प्राभृत' के रचनाकार के विषय में जो कुछ अभिप्राय व्यक्त किया है उसी को लेकर यह चर्चा की जा रही है। कुन्दकुन्दाचार्य के प्रवचनसार' और 'षट्प्राभृत' की भाषा का विश्लेषणात्मक अध्ययन किया जाय तो उन दोनों की भाषा के स्वरूप से ऐसा लगता है कि ये दोनों कृतियाँ अलग-अलग काल की रचनाएं हैं अतः किसी एक ही आचार्य की ये रचनाएं नहीं हैं ऐसा स्पष्ट प्रतीत होता है। इस तथ्य की स्पष्टता के लिए नमूने के रूप में भाषिक प्रयोगों के कुछ उदाहरण नीचे प्रस्तुत किये जा रहे हैं प्रवचनसार । भाषिक विशेषताएँ। षट्प्राभृत १.सिर्फ -दि,-दे का ही प्रयोग वर्तमान काल तृ०पु० एकवचन का प्रत्यय अनुपात २१५ : ७४ -इ,-ए प्रत्ययों की संख्या -दि,-दे से तीन गुणी है २. 'आदा' और 'अप्पा ' 'आत्मन्' शब्द के विविधरूप 'आदा' और 'अप्पा' के सिवाय 'आया' भी जो परवी काल का रूप है ३.सिर्फ नपुंसक शब्दों के लिए । -णि ओर -लिङ्गी भी -णि विभक्ति प्रथमा द्वितीया बहुवचन अनुपात १ : ७ की विभक्तियाँ * पूर्व अध्यक्ष, प्राकृत विभाग, गुजरात विश्वविद्यालय अहमदाबाद। Page #47 -------------------------------------------------------------------------- ________________ 46 : श्रमण/अक्टूबर-दिसम्बर/१६६७ ४. अनुपात -ए,-म्हि, म्मि ४ : २:१ सप्तमी एक | वचन के प्रत्यय सिर्फ-ए और-म्मि अनुपात ५ : १ शौरसेनी का मुख्य प्रत्यय -म्हि का सर्वथा अभाव संबंधक भूत कृदन्त के प्रत्ययों का अनुपात ५.द्ग -च्चा ३ -इय ६ -त्ता १२ -संस्कृत प्रत्यय वाला रूप मात्र ध्वनि परिवर्तन के साथ ६५ -दूण ० दूण -च्चा ० -इय ४ - त्ता २ -ध्वनि परिवर्तन वाला १ -तु १ -तु २ -उं ६ -तूण ६ -ऊण ३६ -ऊणं ७ उपरोक्त उदाहरणों में -तुं और उं प्रत्यय हेत्वर्थक के प्रत्यय हैं जिनका प्रयोग सं०भू० कृदन्त के लिए 'षट्प्राभृत' में किया गया है। यह प्रवृत्ति परवर्ती काल की है और अपभ्रंश काल के समीप ले जाती है। ऊपर के दोनों ग्रंथों के तुलनात्मक प्रत्ययों से स्पष्ट होता है कि 'प्रवचनसार' की शौरसेनी भाषा से 'षट्प्राभृत' की भाषा महाराष्ट्री प्राकृत के अधिक नजदीक है। ६. इन प्रयोगों के सिवाय 'षट्प्राभृत' में अपभ्रंश भाषा के सदृश प्रयोगों की बहुलता है। अनेक प्रयोगों में से कुछ उदाहरण नमूने के रूप में नीचे प्रस्तुत किये जा रहे ७. विभक्ति रहित मूल नाम शब्दों के प्रयोग तथा अन्य अपभ्रंश प्रयोग क. प्रथमा एकवचन चेइय, ४.६०; अनुगृहण, २.१०; वुत्त, ३.२१; णिम्मम, (स्त्रीलिंग) ४.४६ ख. प्रथमा बहुबचन Page #48 -------------------------------------------------------------------------- ________________ षट्प्राभृत के रचनाकार और उसका रचनाकाल : 47 वड्ढमाण, १.६, सिक्खावय, २. २२; णिब्भय, ४.५० मुणि, ५.१५६ ग. द्वि०ए० वचन) अप्पा, ३.१६; विणय, ४.१७; गारव, ५.१०४ कसाय, ६. २६, सेवा, सद्धा, २.१२. घ. द्वि०ब० वचन ) सुपरीसह ५.६२ च. षष्ठी ए०व०) परिवार, १.१० छ. सप्तमी एक वचन रहिय, २. २०, सिवमग्ग, ३.२, लेसा ( स्त्री०), ४.३३; दंसण, ४.२६ ज. नपुं. ब०व० के प्रत्यय - इं वाले रूपों में इं को छन्द की दृष्टि से गुरु के बदले लघु पढ़ना पड़ता है अर्थात् यह इं प्रत्यय वास्तव में इँ प्रत्यय माना जाना चाहिए जो परवर्ती काल का और अधिकतर अपभ्रंश में प्रयुक्त हुआ है । उदाहरण - चउदसपुव्वाई ५.५२ झ. दीर्घ स्वरान्त शब्दों का विभक्ति रहित हस्व स्वरान्त शब्दों के रूप में प्रयोग सील (शिलायाम् ), स०ए०व० ४.५६ दय (दयाम्), द्वि०ए०व० ५. १३१ एसण (एषणा ) ( प्र०ए०व० (स्त्रीलिंग) २.३६ ञ. तृ०ए०व० के लिए-ए, इं और -इ विभक्ति अर्थात् अपभ्रंश विभक्तियों के प्रयोग इक्किं (एकेन ), ६.२२, जिणे कहियं ( जिनेन कथिनत), ४.६१, संखेवि (संक्षेपेन), ५.१२६ ट. षष्ठी ए०व० या ब०व० का रूप ताह = ( तस्य या तेषाम् ), ३.२७; जाहु (यस्य ) ३.२७ ठ. स०ए०व० की विभक्ति-इ निरइ (नरके), ६.२५ ड. बिना अनुस्वार के अव्ययों का प्रयोग कह ( कथम् ) ३.२४ ( क ), ८. अपभ्रंश के समान अन्य शब्द रूपों के प्रयोग इक्क (एक), ६.२२; इत्तहे ( एतस्मात्), २.३०, अट्ठारह (अष्टादश), ६.६०, तेरहमे (त्रयोदशे), ४.३२ Page #49 -------------------------------------------------------------------------- ________________ 48 : श्रमण / अक्टूबर-दिसम्बर / १६६७ (देखिए - पिशल, २४३, २४५, ४४१), ण. वर्तमान काल के तृ०ब०व०का प्रत्यय - हि लहहि ( लभन्ते), ६.७७, चिट्ठहि ( तिष्ठन्ति ), ६.१०४, १०५ त. आज्ञार्थ द्वि०पु०ए०व० का प्रत्यय - इ भावि ( भावय), ५.८०, ६४, ( ३ बार ) परिहरि ( परिहर) २.६ थ. सं०भू० कृदन्त के लिए - 'एवि' प्रत्यय लेवि ( लात्वा ), ६.२१, चएवि ( त्यक्त्वा ), ६.२८ भू धातु का भूत कृदन्त हुओ (भूतः ), ४.६१ यह रूप तो आधुनिक भारतीय आर्य भाषा में प्रयुक्त होने वाले रूप के जैसा है । द. I ऊपर जितने भी प्रयोग दिये गये हैं वे अपभ्रंश भाषा के रूपों के सदृश्य हैं उनको यदि बदलकर शौरसेनी के रूपों के समान बना दिया जाय तो, चूंकि यह कृति पद्यात्मक है, छन्दोंभंग हो जाता है। अतः इस ग्रंथ का समीक्षित (Critical) सम्पादन करने पर इसकी भाषा में परवर्ती काल की भाषा के जो तत्त्व मिलते हैं उनके स्थान पर यदि प्राचीन भाषा के प्रयोग रख दिये जाय तो वे अनुपयुक्त ही ठहरेंगे। (देखें पृ०-६६ ) इससे यही निष्कर्ष निकलता है कि इस 'ग्रंथ' की भाषा और 'प्रवचनसार' की भाषा में बहुत ही अन्तर है । अतः न तो इसकी रचना स्वयं कुन्दकुन्दाचार्य द्वारा की गयी है और न ही कुन्दकुन्दाचार्य द्वारा पूर्व में प्रचलित गाथाओं का संकलन किया गया है । यदि इन दोनों संभावनाओं में से किसी एक को भी मान्य रखा जाय जैसा कि डॉ० ए०एन० उपाध्ये का आग्रह - मन्तव्य तर्क है' तब फिर यह भी मानना पड़ेगा कि कुन्दकुन्दाचार्य का समय भी इतना प्राचीन नहीं है जैसा डॉ० उपाध्ये ने साबित करने का विफल प्रयत्न किया है। ऐसी अवस्था में कुन्दकुन्दाचार्य का समय भी पाँचवीं - छठीं शताब्दी के बाद का मानने के लिए बाध्य होना पड़ेगा। डॉ० उपाध्ये ने इस विषय में स्पष्ट अभिप्राय व्यक्त नहीं किया है। उन्होंने W. Denecke के मत को निराधार सिद्ध करने का निष्फल प्रयत्न किया है जो ऐसे निष्कर्ष पर पहुँचे थे कि 'षट्प्राभृत, की भाषा कुन्दकुन्दाचार्य के 'समयसार' की भाषा से परवर्ती काल की है 1 Page #50 -------------------------------------------------------------------------- ________________ षट्प्राभृत के रचनाकार और उसका रचनाकाल : 49 - हमारे इस सूक्ष्म भाषा अध्ययन-विश्लेषण से भी यही सिद्ध होता है कि 'प्रवचनसार' और 'षट्प्राभृत' की भाषा के स्वरूप के काल में बहुत बड़ा अन्तर है तथा 'षट्प्राभृत' और 'प्रवचनसार' के रचनाकार एक ही आचार्य कदापि नहीं हो सकते। डॉ० ए०एन० उपाध्ये W. Denecke के इस मत को कि 'षट्प्राभृत' श्री कुन्दकुन्दाचार्य की रचना नहीं हो सकती और यह ग्रंथ कुन्दकुन्दाचार्य से परवर्ती काल का है नहीं मानते और दिगम्बर जो जैन परम्परा चली आ रही है उसे ही मान्य रखने की सलाह देते हैं। उनका जो (argument) तर्क-दलील है उसे उनके ही शब्दों में यहाँ पर उद्धृत (अंग्रेजी में) किया जा रहा है W. Denecke doubts Kundakunda's authorship, but he gives no definite reasons. Dialectically he finds that six pähudas are younger than Samayasāra etc; but this can not be a safe guide, unless we are guided by critical editions. The reason for the presence of Apabhramśa forms in these pāhudas, as compared with Pravacanasāra, I have explained in my discussion on the dilect of Pravacanasāra. It is imaginable that traditionaly compiled texts might be attributed to Kundakunda because of his literary reputation;........In conclusion I would say that these pāhudas contain many ideas, phrases and sentences which are quite in tune with the spirit and phrasiology of Pravacansāra.3 उपरोक्त उद्धरण में उनका यह कहना कि 'षट्प्राभृत' का संस्करण समीक्षित सम्पादन नहीं है और इसमें 'प्रवचनसार' के समान ही ideas, phrases और entences प्राप्त हो रहे हैं इसलिए उसे चालू परम्परा के विरुद्ध परवर्ती काल की रचना मानना उचित नहीं होगा। किसी भी परवर्ती काल के ग्रंथ में पूर्ववर्ती काल के ग्रंथ के समान विषय-वस्तु और शैली का पाया जाना एकान्ततः यह साबित नहीं करता कि ऐसी परवर्ती काल की कृति अपने से पूर्ववर्ती काल की रचना के समय में ही रची गयी होगी। उन दोनों के भाषा-स्वरूप पर भी विचार किया जाना चाहिए। 'षट्प्राभृत' की समीक्षित आवृत्ति का क्या अर्थ होता है? क्या उसमें से ऐसी गाथाएँ विक्षिप्त मानी जाए जिनमें अपभ्रंश के स्पष्ट प्रयोग हैं या ऐसी गाथाओं की भाषा का मूल स्वरूप अपभ्रंश से प्रभावित नहीं था परन्तु बाद में काल के प्रभाव से उसमें अपभ्रंश के प्रयोग घुस गये, यदि ऐसा माना जाय तो यह उपयुक्त नहीं है। 'षट्प्राभृत' में सिर्फ पाँच दस प्रयोग ही अपभ्रंश Page #51 -------------------------------------------------------------------------- ________________ 50 : श्रमण/अक्टूबर-दिसम्बर/१९६७ के हों ऐसा नहीं है। इसमें तो हरेक ‘पाहुड' में बीसों प्रयोग अपभ्रंश के मिलते हैं। लगा १५० से अधिक प्रयोग अपभ्रंश भाषा के सदृश मिल रहे हैं और यदि उन अपभ्रंश प्रयोगों को सुधारकर उन्हें शौरसेनी प्राकृत के अनुरूप (यानी समीक्षित आवृत्ति बनाने का यही अर्थ होता हो तो?) बना दिया जाय तो सभी जगह गाथाओं में छान्दोभंग हो जाता है। किसी भी पद्यमय रचना में इसप्रकार की क्षति समीक्षित आवृत्ति के मापदण्ड से मान्य नहीं ठहरेगी। नमूने के रूप में कुछ ही ऐसे सुधारे हुए उदाहरण प्रस्तुत किये जा रहे हैं जिससे स्पष्ट हो जाएगा कि ऐसा साहस कहाँ तक उचित होगा? 'षट्प्राभृत' में उपलब्ध प्रयोग और संशोधित प्रयोग। दोनों में मात्राओं का अन्तर और तब फिर संशोधित पाठ से छन्दोभंग का भय। षट्प्राभृत के पाठ उपलब्ध मुद्रित पाठ और मात्राएं संशोधित पाठ और मात्राएं (कल्पित-समीक्षित पाठ) १. प्रथमा एकवचन दुस्सील १.१६ दुस्सीलो गरहिउ ३.१६ गरहिओ (५) भणिय ४.५४ भणिया (स्त्री०) मुणी, मुणिणो, मुणीओ, मुणओ २. प्रथमा बहुवचन मुणि ५.१५६ (२) णिब्भय, ४.५० साहु ६.१०४ साहुणे, साहवो, साहू, साहूओ Page #52 -------------------------------------------------------------------------- ________________ षट्प्राभृत के रचनाकार और उसका रचनाकाल : 51 ३. द्वितीया एक वचन झाण ५.११६ झाण मिच्छत्त ५.११५ मिच्छत्तं (६) विरइ ६.१६ विरइं मणं मणु ५.१४० (२) (३) - ४. तृतीया एकवचन जिणे ४.६१ जिणेण, जिणेणं ५. आज्ञार्थ भावि ५.१३१ भावय, भावसु, भावहि (४) (४) (४) - ६. भूत कृदन्त हुउ ४.३० (२) हुओ, भूदो, भूओ वुत्त ३.२१ BB ७. संबंधक भूत कृदन्त आरुहवि (५) आरुहित्ता, आरुहिऊण-तूण, द्ण (७) आरुहितुं,-दु,-उं झाइऊण,-तूण,दूण झाइत्ता, झाइत्तु झाएवि Page #53 -------------------------------------------------------------------------- ________________ 52 : श्रमण/अक्टूबर-दिसम्बर/१६६७ (६) (७) ८. अप्पय जह ३.१८ जहा (३) ओ ६.८ तु या उ अणदिणु अणुदिणं इस तरह से समीक्षित या संशोधित आवृत्ति में जो पाठ कल्पित किये गये हैं वे किसी हस्तप्रत में मिल भी जाय तो सर्वत्र छन्दोभंग होगा अतः ऐसी कल्पना करना कि अभी जो अपभ्रंश रूप उपलब्ध हैं वे विश्वसनीय नहीं हो सकते, यह किस आधार पर मान्य रक्खा जाय? ऐसी परिस्थिति में यही मानना उपयुक्त होगा कि 'षट्प्राभृत में कितने ही ऐसे प्रयोग हैं जो परवर्ती (प्रवचनसार की भाषा की तुलना में, काल के और अपभ्रंश भाषा संबंधी हैं जिसके कारण षट्प्राभृत की रचना का काल अपभ्रंश युग में चला जाता है और इसलिए यह न तो स्वयं कुन्दकुन्दाचार्य की ही रचना है और न ही उनके द्वारा प्रचलित किया गया प्राचीन गाथाओं का संकलन है जैसी कि डॉ० ए० एन० उपाध्ये की धारणा है। संदर्भ१. देखिए प्रवचनसार, सं० ए०एन० उपाध्ये, कीप्रस्तावना पृ० ३५, (श्रीमद् राजचन्द्र जैन शास्त्रमाला, श्रीमद् राजचंद्र आश्रम, अगास १६६४) २. वहीं, पृ० ३५. 3. Pravacanasāra, Kundakunda, editor Prof. A.N. Upadhye Shrimand Rajachandra Jaina Shastramala, Shrimad Rajchandra Ashram, Agas, 1964 'Introduction' p.36. Page #54 -------------------------------------------------------------------------- ________________ श्रमण जैनागमों में धर्म-अधर्म (द्रव्य) : एक ऐतिहासिक विवेचन -डॉ० विजय कुमार जैन दर्शन में षट् द्रव्यों की सत्ता स्वीकार की गयी है। धर्म, अधर्म आकाश, जीव, पुद्गल और काल-ये षट् द्रव्य हैं। भेद-प्रभेद की दृष्टि से द्रव्य का प्रथम विभाजन अस्तिकाय और अनस्तिकाय के रूप में है। अस्तिकाय द्रव्य वे हैं जिन्हें शरीर प्राप्त हो और अनस्तिकाय जिन्हें शरीर प्राप्त न हो। धर्म, अधर्म, आकाश, जीव और पुद्गल अस्तिकाय के अन्तर्गत तथा एकमात्र काल अनस्तिकाय के अन्तर्गत आता है। काल को किसी भी प्रकार का शरीर प्राप्त नहीं होता। अस्तिकाय को जीव-अजीव के रूप में में "विभाजित किया जाता है। जीव 'मुक्त' और 'बद्ध' दो होते हैं तो अजीव के अन्तर्गत धर्म, अधर्म, आकाश, और पुद्गल होते हैं। सामान्यतया जिन अर्थों में धर्म-अधर्म शब्द प्रयुक्त किये जाते हैं, जैन दर्शन में प्रयुक्त धर्म-अधर्म का उससे सर्वथा भिन्न अर्थ है। धर्म और अधर्म जैन दर्शन का एक पारिभाषिक शब्द है जो 'गति' और 'स्थिति' का सूचक है। चार्वाक को छोड़कर प्रायः सभी भारतीय दर्शनों और धर्मशास्त्रों में धर्म-अधर्म का प्रयोग नीति-अनीति, पाप-पुण्य, शुभ-अशुभ के रूप में देखा जाता है। गति और स्थिति के कारण रूप धर्म-अधर्म सिद्धान्त को प्रस्तुत कर जैन दर्शन ने एक नवीन मौलिक सिद्धान्त का प्रतिपादन किया है, जो जैन दर्शन की विशिष्टता का द्योतक है। डॉ० सुरेन्द्रनाथ दासगुप्त के शब्दों में-जैन तत्त्वमीमांसा में धर्म और अधर्म शब्द अन्य भारतीय दर्शनों से नितान्त भिन्न रूप में व्यवहृत हुए हैं।' पाश्चात्य विद्वान प्रो० गोण्डा के अनुसार-जैन दर्शन के विकास काल में ये दो शब्द 'धर्म' और 'अधर्म' इतने प्रचलित थे कि जैन दर्शन अपने सिद्धान्तों में इन्हें स्थान दिये बिना नहीं रह सका । सामान्यतया इनके द्वारा प्रतिपादित अर्थ जैन दर्शन को मान्य नहीं था अतः जैन दर्शन ने इन शब्दों को बिल्कुल * प्रवक्ता, पार्श्वनाथ विद्यापीठ Page #55 -------------------------------------------------------------------------- ________________ 54 : श्रमण / अक्टूबर-दिसम्बर / १६६७ नवीन अर्थ में प्रयुक्त किया जो कि अन्य भारतीय दर्शनकारों को ज्ञात नहीं थे । अतः इतना तो स्पष्ट है कि 'गति' और 'स्थिति' के कारणरूप में धर्म-अधर्म को प्रस्तुत कर जैन दर्शन ने विश्व को एक नया सिद्धान्त दिया है 1 विज्ञान की दृष्टि से जैन दर्शन में मान्य धर्मद्रव्य और विज्ञान में मान्य ईथर (Ether) लगभग एक से प्रतीत होते हैं। आइन्स्टीन के अनुसार ईथर अभौतिक (अपारमाणविक), लोकव्याप्त एवं नहीं देखा जा सकने वाला एक अखण्ड द्रव्य है । धर्म द्रव्य और ईथर किस सीमा तक समान हैं इसकी तुलनात्मक विवेचना करते हुए प्रो० जी०आर० जैन लिखते हैं- "यह प्रमाणित हो गया है कि जैन दार्शनिक व आधुनिक वैज्ञानिक यहाँ तक एकमत हैं कि धर्म द्रव्य या ईथर अभौतिक अपारमाणविक, अविभाज्य, अखण्ड, आकाश के समान व्याप्त, अरूप, गति का अनिवार्य माध्यम और अपने आप में स्थिर है । वस्तुतः जिस ज्ञान को विज्ञान के क्षेत्र में १६वीं शताब्दी में खोजने का प्रयास किया गया उसे जैनाचार्यों ने कई शताब्दियों पूर्व ही खोज लिया था । जैन परम्परा में धर्म शब्द मुख्यतः तीन अर्थों में प्रयुक्त है १. स्वभाव अर्थात् गुण के रूप में जब जैन तत्त्वमीमांसा का श्रीगणेश 'अनन्त धर्मात्मकं वस्तु' से होता है । २. ‘नीति’ अर्थात् आचरण के रूप में जब जैन आचारमीमांसा के मूलाधार के रूप में 'अहिंसा परमोधर्मः' कहा जाता है । ३. द्रव्य के अन्तर्गत जब षड्द्रव्यों के रूप में धर्मास्तिकाय, अधर्मास्तिकाय, आकाशास्तिकाय आदि की विवेचना होती है 1 प्रस्तुत निबन्ध में 'धर्म-अधर्म' का द्रव्य के रूप में विवेचन करना ही हमारा उद्देश्य है, विशेषतः इस दृष्टिकोण से कि धर्मास्तिकाय और अधर्मास्तिकाय की अवधारणा जैनागमों में कब और किस रूप में आयी ? ऐसा नहीं है कि इससे पूर्व में इस विषय पर कार्य नहीं हुए हैं। कार्य तो हुए किन्तु उनके स्वरूप के सन्दर्भ में हुए हैं। या, अस्तिकायों की विवेचना के साथ धर्म-अधर्म की भी चर्चा विद्वानों ने किया है । ऐतिहासिक विवेचन की दृष्टिसे धर्मास्तिकाय और अधर्मास्तिकाय के सन्दर्भ में कुछ प्रश्न उपस्थित होते हैं, जो इस प्रकार हैं १. धर्मास्तिकाय और अधर्मास्तिकाय का सिद्धान्त आगमों में कब और किस रूप में आया? Page #56 -------------------------------------------------------------------------- ________________ जैन आगमों में धर्म-अधर्म : 55 * २. धर्मास्तिकाय-अधर्मास्तिकाय का स्वरूप आगमों की रचना से पूर्व निर्धारित था अथवा रचना के साथ-साथ उसका विकास-क्रम है ? इस सन्दर्भ में हम आगम साहित्य में विवेचित धर्मास्तिकाय- अधर्मास्तिकाय के स्वरूप को प्रस्तुत करना चाहेंगे। आगम साहित्य कई भागों में विभक्त है- अंग, उपांग, मूलसूत्र, छेदसूत्र, चूलिका सूत्र तथा प्रकीर्णक । प्रस्तुत निबन्ध का प्रस्तुतीकरण इसी क्रम में है । आचारांग " द्वादशांगी का पहला अंग आचारांगसूत्र है। इसमें कोई सन्देह नहीं कि आचारांगसूत्र आगमों में जैन आचार को प्रस्तुत करने वाला सबसे प्राचीन अंग आगम है । ग्रन्थ के प्रथम श्रुत स्कन्ध में बहुत ही स्पष्ट शब्दों में कहा गया है "समता ही धर्म है ।"" चौथे अध्ययन के प्रथम उद्देश्य में अहिंसा को शाश्वत, नित्य और शुद्ध धर्म कहा गया है । वस्तुतः धर्म असंदीपन द्वीप की भाँति है । जिस प्रकार असंदीपन ( जल में नहीं डूबा हुआ) द्वीप जलपोत यात्रियों के लिए आश्वासन स्थान होता है उसी प्रकार आर्य द्वारा उपदिष्ट धर्म संसार समुद्र पार करने वालों के लिए आश्वासन स्थान होता है । ७ ८ उपर्युक्त उद्धरण से यह स्पष्ट है कि धर्म-अधर्म की चर्चा आचरण के रूप में हुई है, जो प्रचलित धर्म के सैद्धान्तिक दृष्टिकोण से अभिन्न है । किन्तु आचारांग के द्वितीय अध्ययन में लोक की चर्चा करते हुए उसके तीन भाग बताये गये हैं- अधोभाग, ऊर्ध्वभाग और तिर्यग्भाग, जो परोक्ष रूप से धर्मास्तिकाय और अधर्मास्तिकाय की अवधारणा को ध्वनित करते हैं। इसकी चर्चा पं० दलसुख भाई मालवणिया ने भी की है। उन्होंने लिखा है- आचारांग के द्वितीय अध्ययन का नाम ही 'लोगविजय' है तथा पाँचवें अध्ययन का नाम लोगसार है और उसके बीच तिर्यग् लोक में मनुष्य रहता है यह मान्यता भी स्थिर हो गयी थी। साथ ही तीनों लोकों के तीनों भागों में जाने का निर्देश है, लोक के अलावा अलोक की कल्पना भी देखी जाती है । किन्तु लोक के अग्रभाग में लोक- अलोक के सन्धिस्थल में सिद्धि स्थान था, ऐसा कोई विचार आचारांग में दिखता नहीं ।' पासिमं दविए लोकालोक पवंचाओ मुच्चई ' ( आचारांग १२० ) अर्थात् देखो कि यह योग्य पुरुष लोक और अलोक के प्रपंच से मुक्त हो जाता है । ऐसा आचारांग में निर्देश है। इससे स्पष्ट है कि आगे चलकर जो लोक - अलोक की परिभाषा स्थिर हुई वह आचारांग में नहीं दिखती। I Page #57 -------------------------------------------------------------------------- ________________ 56 : श्रमण/अक्टूबर-दिसम्बर /१६६७ सूत्रकृतांगसूत्र यह आचारांग सूत्र से परवर्ती है। यदि इसे 'दर्शन' और 'धर्म' का संगम स्थल कहा जाये तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी। दो श्रुतस्कन्धों में विभक्त इस साहित्य के प्रथम श्रुतस्कन्ध में धर्म सम्बन्धी चर्चायें प्राप्त होती हैं, जैसे-मुनिधर्म", श्रमणधर्म', लौकिक धर्म१२, लोकोत्तर थर्म१३ आदि। नवम अध्ययन जो 'धर्म' नाम से संज्ञयित है, की प्रथम गाथा के पूर्वाद्ध में प्रश्न उपस्थित किया गया है कि मतिमानों ने कौन सा व कैसा धर्म बताया है उत्तर स्वरूप कहा गया है- तीर्थंकरों के ऋजु अर्थात् सरल धर्म को सुनो।१४ द्वितीय श्रुतस्कंध के छठे अध्ययन में भी रत्नत्रय रूप धर्म का प्रतिपादन करते हुए कहा गया है कि तत्त्वदर्शी केवली भगवान् की आज्ञा से इस समाधियुक्त धर्म को अंगीकार कर तथा धर्म में सम्यक् प्रकार से सुस्थित होकर तीनों करणों से समस्त मिथ्यादर्शनों से विरक्त हो साधक अपनी और दूसरों की आत्मा का त्राता बनता है। अतः महादुस्तर समुद्र की भाँति संसार- समुद्र को पार करने के लिए आदान (सम्यग्दर्शन-ज्ञान-चारित्र) रूप धर्म का निरूपण एवं ग्रहण करना चाहिए।५।। उपर्युक्त उद्धरणों से इतना स्पष्ट है कि धर्म-अधर्म की चर्चा आचार-अनाचार के परिप्रेक्ष्य में विशेष रूप से हुई है। इसका स्पष्ट उदाहरण हम द्वितीय श्रुतस्कन्ध के द्वितीय अध्ययन की ७१४ वीं गाथा में देख सकते हैं, जहाँ उल्लेख है-जो अनारम्भी होते हैं, अपरिग्रही होते हैं, जो धार्मिक होते हैं, धर्मानुसार प्रवृति करते हैं या धर्म की अनुज्ञा देते हैं, धर्म को ही अपना इष्ट मानते हैं या धर्म प्रधान होते हैं, धर्म की ही चर्चा करते हैं, धर्म को ही देखनेवाले, धर्म में अनुरक्त, धर्मशील तथा धर्माचार परायण होते हैं, यहाँ तक कि वे धर्म से ही अपनी जीविका उपार्जन करते हुए जीवनयापन करते हैं वे धार्मिक पुरुष अनगार अर्थात् गृहत्यागी भाग्यवान् होते हैं।६ मधुकर मुनि ने भी द्वितीय श्रुतस्कन्ध के पाँचवें अध्ययन की गाथा ५६७ की व्याख्या में स्पष्ट शब्दों में लिखा है कि श्रृत और चारित्र या सम्यग्दर्शन-ज्ञान-चारित्र धर्म कहलाते हैं, ये आत्मा के स्वाभाविक परिणाम, स्वभाव या गुण हैं। ठीक इनके विपरीत मिथ्यात्व, अविरति, प्रमाद, कषाय और योग- ये भी आत्मा के ही गुण हैं, परिणाम हैं, किन्तु कर्मोपाधिजनित होने से तथा मुक्ति के विरोधी होने से अधर्म कहलाते हैं। ____ अब प्रश्न उठता है कि सूत्रकृतांग में धर्म-अधर्म की द्रव्य के रूप में चर्चा हुई है या नहीं? द्वितीय श्रुतस्कन्ध के पाँचवे अध्ययन में कुछ ऐसे उद्धरण मिलते हैं जो परोक्ष रूप में धर्मास्तिकाय और अधर्मास्तिकाय को प्रकाशित करते हैं। जिन तत्त्वों Page #58 -------------------------------------------------------------------------- ________________ जैन आगमों में धर्म-अधर्म : 57 को अस्तिरूप में फलित करते हुए १७ (सत्रह ) प्रतिपक्षी युगलों के द्वारा प्रस्तुत किया गया है तथा अस्तित्व को स्वीकार करने तथा नास्तित्व को अस्वीकार करने का निर्देश दिया गया है, वे सत्ररह युगल निम्नलिखित हैं " _ १. लोक-अलोक, २. जीव- अजीव, ३. धर्म-अधर्म, ४. बन्धन - मोक्ष, ५. पुण्य-पाप, ६. आस्रव संवर, ७. वेदना - निर्जरा, ८. क्रिया-अक्रिया, ६. क्रोध-मान, १०. माया - लोभ, ११. प्रेम - द्वेष, १२. चतुरंग - संसार, १३. देव-देवी, १४. सिद्धि-असिद्धि, १५. सिद्धिगति-असिद्धिगति, १६. साधु - असाधु, १७. कल्याण- अकल्याण । इन उद्धरणों से यह ज्ञात नहीं हो पाता है कि उपर्युक्त सत्ररह युगलों में वर्णित धर्म-अधर्म द्रव्य रूप में आया है या आचार- अनाचार के रूप में। इस सम्बन्ध में कुछ विद्वानों का मानना है कि इन युगलों में वर्णित धर्म-अधर्म का सम्बन्ध चरित्र से है । यह उचित नहीं जान पड़ता है क्योंकि धर्म-अधर्म का विभाजन यदि आचार - अनाचार के रूप में होता तो पुनः पुण्य-पाप के विभाजन की आवश्यकता नहीं पड़ती। अतः यहाँ धर्म-अधर्म का वर्णन आचार - अनाचार के रूप में न होकर द्रव्य रूप में ही हुआ है ऐसा कहा जा सकता है। लेकिन जैन दर्शन के शीर्षस्थ विद्वान् पं० दलसुख भाई मालवणिया का अभिमत इसके विपरीत है। उनके अनुसार- पंचास्तिकाय और षड्द्रव्यों की कल्पना नव तत्त्व या सात तत्त्व के बाद ही हुई है इसका प्रमाण हमें भगवती सूत्र में मिल जाता है । वहाँ प्रश्न किया गया है कि लोकान्त में खड़ा रहकर देव अलोक में अपना हाथ हिला सकता है या नहीं? उत्तर दिया गया है- 'जीवणं आहारोवचिया पोग्गला, वोंदिया पोग्गला कलेवरचिया पोग्गला पोग्गलमेव पप्पजीवाण य अजीवाण य गतिपरियाए आहिज्जइ अलोए णं नेवत्थि जीवा नेवत्थि पोग्गला “ अर्थात् जीवों के अनुगत आहारोपचित पुद्गल शरीरोपचित पुद्गल और कलेकरोपचित पूद्गल होते हैं तथा पुद्गलों के आश्रित ही जीवों और अजीवों की गतिपर्याय कही गयी है । अलोक में न तो जीव हैं और न ही पुद्गल हैं। इसी कारण पूर्वोक्त देव यावत् सिकोड़ने और पसारने में समर्थ नहीं है। अतः स्पष्ट है कि जीव और अजीव की गति का कारण पुद्गल को माना गया है। यदि भगवती के इस स्तर की रचना के समय में धर्मास्तिकाय द्रव्य की कल्पना स्थिर हो गयी होती तो ऐसा उत्तर मिलता नहीं। वे आगे लिखते हैं- सूत्रकृतांग में जीव, अजीव, पुण्य, पाप, आस्रव, संवर, वेदना, निर्जरा, क्रिया, अधिकरण, बन्ध और मोक्ष का निर्देश है इसी सूची का संकोच हम सात पदार्थ और नव तत्त्व में देखते हैं। इससे वेदना क्रिया और अधिकरण को निकाल देने से ही ये अंतिम सूचियाँ बनी हैं इसमें संदेह नहीं है । 1 Page #59 -------------------------------------------------------------------------- ________________ 58 : श्रमण/अक्टूबर-दिसम्बर/१६६७ स्पष्ट है कि सूत्रकृतांग के काल तक पंचास्तिकाय और षड्द्रव्यों की चर्चा ने तत्त्वविचारणा में स्थान नहीं पाया है।।६ पंडित जी का यह कथन समीक्षणीय है। क्योंकि जीव और पुद्गल दोनों गतिशील हैं। गति और स्थिति दोनों ही क्रियाएँ सहज रूप से जीव और पुद्गल में ही पायी जाती हैं। इनका स्वभाव न केवल गति करना है और न स्थिति करना ही। गति और स्थित का उपादान कारण जीव एवं पुद्गल स्वयं है तथा निमित्तकारण धर्म-अधर्म द्रव्य है। साथ ही सूत्रकृतांग में यदि लोक-अलोक का विभाजन है तो धर्म-अधर्म का द्रव्य रूप में अस्तित्व स्वतः प्रमाणित हो जाता है क्योंकि धर्म-अधर्म द्रव्य के बिना लोक-अलोक की व्यवस्था हो ही नहीं सकती। स्थानांगसूत्र स्थानांगसूत्र में धर्म-अधर्म की विवेचना आचार एवं व्यवहार के साथ-साथ स्पष्टतः द्रव्य रूप में भी हुई है। ग्रंथ के प्रथम स्थान में अस्तित्व-सूत्र की पाँचवी गाथा में लोक, अलोक, धर्मास्तिकाय, अधर्मास्तिकाय बन्थ, मोक्ष, पुण्य, पाप, आस्रव, संवर, वेदना और निर्जरा को एक-एक माना गया है जो संग्रहनय की अर्थवत्ता को प्रकट करता है।२० अन्यत्र भी द्रव्य के दो प्रकारों को स्पष्ट करते हुए उसे गतिसमापन्नक और अगतिसमापन्नक ‘बताया गया है जो धर्मास्तिकाय और अधर्मास्तिकाय द्रव्य के प्रत्यक्ष उल्लेख हैं।२१ इसमें श्रुतधर्म, चारित्रधर्म और अस्तिकायधर्म के रूप में धर्म के तीन प्रकार बताये गये हैं।२२ अस्तिकाय रूप में द्रव्य की स्थापना यहाँ स्पष्ट रूप में परिलक्षित होती है। अस्तिकाय धर्म के पाँच प्रकार हैं-धर्मास्तिकाय, अधर्मास्तिकाय, आकाशास्तिकाय, जीवास्तिकाय और पुद्गलास्तिकाय ।२३ अस्तिकायधर्म के ये पाँचों प्रकार यह प्रमाणित करते हैं कि यह उनके विकास का प्रारम्भिक स्तर है। स्वरूप की दृष्टि से धर्मास्तिकाय अवर्ण, अगन्ध, अरस, अस्पर्श, अरूपी, अजीव, शाश्वत, अवस्थित और लोक का अंशभूत द्रव्य है।२४ द्रव्य, क्षेत्र, काल, भाव और गुण की अपेक्षा से धर्मास्तिकाय के पाँच प्रकार निरूपित किय गये हैं।२५ द्रव्य की अपेक्षा से धर्मास्तिकाय एक, क्षेत्र की अपेक्षा से लोक प्रमाण, काल की अपेक्षा से ध्रुव, निश्चित, शाश्वत, अक्षय, नित्य भाव की अपेक्षा से वर्ण, गंध, रस और स्पर्श से रहित तथा गुण की अपेक्षा से गमन गुणवाला अर्थात् जीव और पुद्गल के गमन करने में सहायक है।२६ इसी प्रकार अधर्मास्तिकाय द्रव्य, क्षेत्र, काल, भाव और गुण की अपेक्षा से एक, लोकप्रमाण नित्य, अस्पर्श तथा अवस्थान गुणवाला स्थानांग में धर्म, आचार और व्यवहार की दृष्टि से भी निरूपित है। इसके Page #60 -------------------------------------------------------------------------- ________________ जैन आगमों में धर्म-अधर्म : 59 दो, चार और दस प्रकार बताये गये हैं- श्रुतधर्म और चारित्रधर्म;२८ शान्ति, मुक्ति (निर्लोभता) आर्जव और मार्दव;२६ ग्रामधर्म, नगरधर्म, राष्ट्रधर्म, पाखण्डधर्म, कुलधर्म, गणधर्म, संघधर्म, श्रुतधर्म, चारित्रधर्म और अस्तिकाय धर्म । यहाँ अस्तिकाय धर्म से तात्पर्य द्रव्यों के स्वभाव से है। समवायांगसूत्र इसके अन्तर्गत धर्म-अधर्म की विवेचना प्रचलित सामान्य अर्थ में तथा द्रव्य, दोनों अर्थों में हुई है। प्रथम स्थानक में संग्रहनय की दृष्टि से लोक-अलोक, धर्म-अधर्म आदि परस्पर प्रतिपक्षी या सापेक्ष पदार्थों की चर्चायें मिलती हैं। इसी प्रकार पाँचवें समवाय में विविध विषय निरूपण के अन्तर्गत भी धर्मास्तिकाय, अधर्मास्तिकाय आदि का उल्लेख मिलता है जो द्रव्य के प्रकारों पर प्रकाश डालता है।३२ व्याख्याप्रज्ञप्तिसूत्र पाँचवें व्याख्याप्रज्ञप्ति अंग में धर्म-अधर्म का विवेचन आचार एवं द्रव्य दोनों रूपों में हुआ है। द्रव्य के रूप में धर्म-अधर्म से संबधित लगभग सभी पक्षों पर विचारणा इस ग्रंथ में हुई है। द्वितीय शतक के दसवें उद्देशक में पाँच प्रकार के३३ अस्तिकायों को निरूपित करते हुए उसके लक्षण, स्वरूप और प्रकारों पर प्रकाश डाला गया है। धर्मास्तिकाय की प्रवृति बताते हुए कहा गया है कि जगत् के जितने भी चल-अचल अर्थात् गमनशील और स्थितिशील भाव वाले हैं वे सब धर्मास्तिकाय और अधर्मास्तिकाय के द्वारा प्रवृत होते हैं। जीवों के आगमन, गमन, भाषा, उन्मेष (पलक झपकना), मनोयोग, वचनयोग और काययोग आदि धर्मास्तिकाय से प्रवृत होते हैं। इसी प्रकार जीव के स्थान, निषीदन (बैठना), त्वग्वर्तन (करवट लेना) और मन को एकाग्र करना आदि अधर्मास्तिकाय द्वारा प्रवृत्त होते हैं।३४ लक्षण के पश्चात् धर्मास्तिकाय और अधर्मास्तिकाय के ये पर्यायवाची शब्द बताये गये हैं-धर्म, धर्मास्तिकाय, प्राणातिपातविरमण, मृषावादविरमण यावत् परिग्रहविरमण, क्रोध-विवेक यावत् मिथ्या दर्शन-शल्य-विवेक अथवा ईर्या समिति, भाषा समिति, एषणा समिति अथवा मनोगुप्ति, वचनगुप्ति या कायगुप्ति ये सब तथा इनके समान जितने भी दूसरे इस प्रकार के शब्द हैं वे सब धर्मास्तिकाय के अभिवचन (पर्याय) हैं। इसी प्रकार अधर्म, अधर्मास्तिकाय यावत् उच्चार-प्रसवण- खेल-जल्ल-सिंधाण-परिष्ठापनिका सम्बन्धी असमिति, मन-अगुप्ति, वचन-अगुप्ति और काय-अगुप्ति ये सब तथा इसी प्रकार के अन्य शब्द भी अधर्मास्तिकाय के अभिवचन (पर्याय) हैं।३५ द्रव्य, क्षेत्र, काल, भाव Page #61 -------------------------------------------------------------------------- ________________ 60 : श्रमण/अक्टूबर-दिसम्बर/१९६७ और गुण की अपेक्षा से धर्मास्तिकाय और अधर्मास्तिकाय के पाँच-पाँच प्रकार हैं।३६ इसका उल्लेख स्थानांगसूत्र में भी आया है। आकार की दृष्टि से धर्म लोक, लोकमात्र, लोक प्रमाण और लोक स्पृष्ट है।७ अतः उसे एक स्थान से दूसरे स्थान में जाने की कोई आवश्यकता नहीं होती। जितने उसके प्रदेश हैं उतने ही प्रदेशों में वह रहता है। प्रदेशों से अभिप्राय है स्कन्ध का ऐसा सूक्ष्म अंश जिसका पुनः अंश न हो सके। ये प्रदेश संख्या में असंख्यात हैं। अब यहाँ प्रश्न हो सकता है कि धर्मास्तिकाय यदि संख्या में असंख्यात हैं तो क्या उसके एक प्रदेश से चार प्रदेशों को धर्मास्तिकाय कहा जा सकता है? इस संबंध में महावीर और गौतम के बीच हुई वार्ता, व्याख्याप्रज्ञप्ति में बड़े ही सुन्दर ढंग से प्रस्तुत की गयी है- गौतम ने भगवान् से पूछा-भगवन्, क्या धर्मास्तिकाय के एक, दो, तीन, चार आदि प्रदेशों को धर्मास्तिकाय कहा जा सकता है? महावीर ने कहा- गौतम, धर्मास्तिकाय के असंख्येय प्रदेश हैं। वे सब प्रतिपूर्ण निरवशेष और एक शब्द द्वारा गृहीत होते हैं। अतः इनको ही धर्मास्तिकाय कहा जा सकता है। प्रस्तुत मंतव्य निश्चय नय की दृष्टि से स्वीकार किया जा सकता है, व्यवहार नय की दृष्टि से नहीं। क्योंकि निश्चय की दृष्टि से जब तक एक प्रदेश भी कम हो तब तक उसको धर्मास्तिकाय की संज्ञा नहीं दी जा सकती। धर्मास्तिकाय के जब सभी प्रदेश परिपूर्ण हों तभी वे धर्मास्तिकाय हैं। तात्पर्यअधूरी वस्तु, वस्तु नहीं कहला सकती लेकिन व्यवहार नय की दृष्टि से वही वस्तु, वस्तु कहला सकती है। यथा-गधे की पूंछ कट जाने के उपरान्त भी गधा, गधा ही कहलाता है। ठीक इसी प्रकार अधर्म के विषय में भी कहा गया है क्योंकि वह भी असंख्यात प्रदेशवाला तथा धर्म की भाँति सर्वलोकव्यापी है। प्रति प्रश्न के रूप में यहाँ यह शंका हो सकती है कि धर्म-अधर्म दोनों असंख्यात प्रदेशवाले और सर्वव्यापी हैं तो फिर दोनों एक होंगे? यदि एक नहीं हैं तो दोनों आपस में टकराते होंगे? इन प्रश्नों का भगवान् ने कहा है-धर्मास्तिकाय के जघन्यपद में तीन तथा उत्कृष्ट पद में छः प्रदेशों, अधर्मास्तिकाय के जघन्य पद में चार और उत्कृष्ट पद में सात प्रदेशों, आकाशास्तिकाय के सात प्रदेशों, जीवास्तिकाय के अनन्त प्रदेशों, पुद्गल के अनन्त प्रदेशों को स्पृष्ट करता है तथा काल को कथंचित स्पृष्ट करता भी है, कथंचित नहीं भी करता है। यदि स्पृष्ट करता भी है तो नियमतः अनन्त समयों से स्पृष्ट होता है। इसी प्रकार अधर्मास्तिकाय का एक प्रदेश धर्मास्तिकाय के जघन्यपद में चार और उत्कृष्ट पद में छः प्रदेशों से स्पृष्ट करता है। शेष सभी धर्मास्तिकाय की भाँति ही स्पृष्ट होते हैं।४० इनका यह स्पर्शन ठीक उसी प्रकार होता है जिस प्रकार एक कमरे में रखे गये दो, तीन दीपकों के प्रकाश में स्पर्शन होते हैं। Page #62 -------------------------------------------------------------------------- ________________ जैन आगमों में धर्म-अधर्म : 61 व्याख्याप्रज्ञप्ति में इस संबंध में भी चर्चा मिलती है कि धर्मास्तिकाय-अधर्मास्तिकाय यदि द्रव्य हैं तो क्या कोई व्यक्ति उस पर बैठने, सोने, खड़ा होने, लेटने आदि में समर्थ हो सकता है? उत्तर होगा-नहीं? क्योंकि धर्मास्तिकाय और अधर्मास्तिकाय दोनों ही अमूर्त द्रव्य हैं। अतः जो अमूर्त द्रव्य हैं जिसे हम देख नहीं सकते, स्पर्श नहीं कर सकते उस पर बैठ कैसे सकते हैं? व्याख्याप्रज्ञप्ति के अनुसार कोई कूटगारशाला हो, जो बाहर और भीतर दोनों से लीपी हुई हो, चारो ओर से ढकी हुई हो उसके बाद भी गुप्त हो और उस कूटगारशाला के द्वार के कपाटों को बंद करके ठीक मध्य भाग में कम से कम एक, दो या तीन और उत्कृष्ट अधिक से अधिक १००० (एक हजार) दीपक जला दें तो हे गौतम उन दीपकों की प्रभाएँ परस्पर एक-दूसरे से सम्बद्ध होकर एक-दूसरे की प्रभा (किरण) को छूकर अर्थात् परस्पर एक रूप होकर रहती हैं, तो क्या कोई व्यक्ति उन प्रदीप प्रभाओं पर बैठने, सोने यावत् करवट बदलने में समर्थ हो सकता है? नहीं, तो फिर धर्मास्तिकाय-अधर्मास्तिकाय त्रिक में न कोई बैठ सकता है और न सो सकता है, न खड़ा रह सकता और न ही करवट बदल सकता है। जहाँ तक द्रव्यार्थरूप में धर्मास्तिकाय और अधर्मास्तिकाय के अल्पत्व-बहुत्व का प्रश्न है तो व्याख्याप्रज्ञप्ति में इसे प्रज्ञापना के तृतीय बहुवक्तव्यतावाद के अनुसार इसका उल्लेख समझने का निर्देश दिया गया है।४२ उपर्युक्त तथ्यों के आधार पर इतना तो स्पष्ट है कि व्याख्याप्रज्ञप्ति में धर्म-अधर्म का द्रव्य रूप में पूर्णतः विकसित रूप प्राप्त होता है। लेकिन यहाँ इसे द्रव्य रूप में न कहकर अस्तिकाय रूप में कहा जाए तो उचित होगा। क्योंकि इसमें धर्म-अधर्म को द्रव्य की अपेक्षा अस्तिकाय रूप में ज्यादा विश्लेषित किया गया है। लेकिन यहाँ दो प्रश्न उपस्थित होते हैं-(१) धर्मास्तिकाय, अधर्मास्तिकाय के जो पर्यायवाची बताये गये हैं वे कहाँ तक तर्कसंगत हैं? (२) द्रव्यार्थ रूप में धर्मास्तिकाय-अधर्मास्तिकाय के अल्पत्व-बहुत्व के सन्दर्भ में यह प्रसंग आना कि प्रज्ञापना के अनुसार समझना चाहिए, का क्या अभिप्राय है? प्रथम प्रश्न के सन्दर्भ में डॉ० धर्मचन्द जैन का कहना है कि "व्याख्याप्रज्ञप्ति सूत्र में धर्मास्तिकाय आदि के जो पर्यायार्थक अभिवचन दिए गए हैं, उनसे इन धर्म-अधर्म आदि के अर्थ का व्यापक परिचय मिलता है। धर्मास्तिकाय के अभिवचन में प्राणातिपातविरमण यावत् परिग्रह विरमण, क्रोध-विवेक यावत् मिथ्यादर्शन-शल्य विवेक आदि को भी स्थान दिया गया है। इनके विपरीत अधर्मास्तिकाय के अभिवचन हैं।४३ डॉ० जैन के इस कथन में प्रयुक्त शब्द 'इन' यदि धर्म-अधर्म के पारम्परिक अर्थ को द्योतित करते हैं तब तो Page #63 -------------------------------------------------------------------------- ________________ 62 : श्रमण/अक्टूबर-दिसम्बर/१९६७ उनका यह कथन सत्य प्रतीत होता है क्योंकि व्याख्याप्रज्ञप्ति में धर्मास्तिकाय और अधर्मास्तिकाय के पर्यायार्थक अभिवचन धर्म-अधर्म को द्रव्य रूप में अभिहित करने की अपेक्षा उसके पारम्परिक अर्थ को ज्यादा दर्शाते हैं और यदि उनका कथन धर्म-अधर्म के पर्यायवाची शब्दों से द्रव्यार्थ को दर्शाना है तो उचित नहीं जान पड़ता। दूसरे प्रश्न के सन्दर्भ में ऐसा का जा सकता है कि व्याख्याप्रज्ञप्ति में उद्धृत प्रज्ञापना के सन्दर्भ से यह स्पष्ट होता है कि धर्म-अधर्म के अल्पत्व- बहुत्व की चर्चा प्रज्ञापना में विशेष रूप से हुई है। जीवाजीवाभिगमसूत्र जीवाभिगम और अजीवाभिगम को मिलाकर जीवाजीवाभिगम नाम बनता है। प्रस्तुत ग्रंथ में भगवान् महावीर और गणधर गौतम के प्रश्नोत्तर के रूप में जीव-अजीव के भेद-प्रभेदों की चर्चा की गयी है। इसमें जीव और अजीव की चर्चा समान रूप से न करके अजीव का संक्षेप दृष्टि से तथा जीव का विस्तृत रूप से प्रतिपादन किया गया है। अजीव को रूपी-अरूपी४४ इन दो रूपों में विभाजित करते हुए अरूपी अजीव के दस प्रकार बताये गये हैं। साथ ही यह भी निर्देश किया गया है कि जैसा प्रज्ञापनासूत्र में कहा गया है वैसा ही समझना चाहिए।५५ प्रज्ञापनासूत्र इसके प्रथम प्रज्ञापना पद में जीव और अजीव के भेद-प्रभेद को बताते हुए अजीव के सम्बन्ध में विस्तार से निरूपण हुआ है। आगे अजीव को रूपी-अरूपी'६ इन दो भेदों में विभक्त करते हुए रूपी के अन्तर्गत पुद्गल द्रव्य तथा अरूपी के अन्तर्गत धर्मास्तिकाय, अधर्मास्तिकाय आदि का निरूपण है। अरूपी अजीव दस प्रकार के बताये गये हैं-(१) धर्मास्तिकाय (२)धर्मास्तिकाय का देश (३) धर्मास्तिकाय के प्रदेश (४) अधर्मास्तिकाय (५) अधर्मास्तिकाय का देश (६) अधर्मास्तिकाय का प्रदेश (७) आकाशास्तिकाय (८) आकाशास्तिकाय का देश (E) आकाशास्तिकाय के प्रदेश तथा (१०) अद्धासमय। इनके अतिरिक्त तृतीय प्रज्ञापना के बहुवक्तव्यतावाद में द्रव्य और प्रदेश की अपेक्षा से अल्पत्व-बहुत्व का निरूपण है। धर्मास्तिकाय, अधर्मास्तिकाय और आकाशास्तिकाय एक-एक द्रव्य होने से द्रव्यार्थ रूप से तुल्य हैं और दूसरे द्रव्यों की अपेक्षा अल्प हैं। उनसे जीवास्तिकाय, जीवास्तिकाय से पुद्गलास्तिकाय और Page #64 -------------------------------------------------------------------------- ________________ जैन आगमों में धर्म-अधर्म : 63 • पुद्गलास्तिकाय से अद्धासमय उत्तरोत्तर अनन्तगुण हैं। इसी प्रकार प्रदेशार्थ रूप से धर्मास्तिकाय और अधर्मास्तिकाय असंख्यात् हैं-परस्पर तुल्य हैं और दूसरे प्रदेशों की अपेक्षा अल्प हैं। उनसे जीवास्तिकाय, जीवास्तिकाय से पुद्गलास्तिकाय, पुद्गलास्तिकाय से अद्धा समय और अद्धासमय से आकाशास्तिकाय उत्तरोत्तर अनन्तगुण हैं।८ उत्तराध्ययनसूत्र मूल सूत्रों में एकमात्र प्रथम मूलसूत्र उत्तराध्ययन में ही द्रव्य के रूप में धर्म-अधर्म लोक को परिभाषित करते हुए कहा गया है-लोक जीव-अजीवमय है। अजीव दो प्रकार के हैं-रूपी और अरूपी।५० पुनः रूपी के चार तथा अरूपी के दस प्रकार बताये गये हैं।५१ अरूपी अजीव द्रव्यों के प्रमाण प्ररूपण में कहा गया है-धर्म-अधर्म लोक प्रमाण है। आकाश लोक और अलोक दोनों में व्याप्त है। काल मनुष्य क्षेत्रान्तर्गत है। धर्म-अधर्म और आकाश ये तीनों द्रव्य अनादि-अनन्त और सर्वकालिक हैं। प्रवाह की अपेक्षा से काल भी अनादि-अनन्त है तथा आदेश अर्थात एक-एक समय की अपेक्षा से सादि और सान्त है।५२ अट्ठाइसवें अध्ययन में गति और अगति (स्थिति) को धर्म-अधर्म के लक्षण बताये गये हैं।५३ अनुयोगद्वारसूत्र प्रस्तुत ग्रंथ में षद्रव्यों की चर्चा हुई है।५४ जीव-अजीव के रूप में द्रव्य के दो प्रकारों का विवेचन करते हुए अजीव द्रव्य के दस प्रकारों५५ पर प्रकाश डाला गया है। साथ द्रव्यानुपूर्वी के अन्तर्गत पूर्वानुपूर्वी तथा पश्चानुपूर्वी के आधार पर द्रव्यों का क्रम स्थापित किया गया है। द्रव्य विशेष के समुदाय में जो पूर्व (प्रथम) द्रव्य है, उससे प्रारंभ कर अनुक्रम से आगे-आगे के द्रव्यों की स्थापना अथवा गणना की जाती है उसे पूर्वानुपूर्वी कहते हैं। इसी प्रकार द्रव्य विशेष के समुदाय में से जो अंतिम द्रव्य हो उसे लेकर विलोम क्रम से प्रथम द्रव्य तक गणना करने को पश्चानुपूर्वी कहते हैं। पूर्वानुपूर्वी से द्रव्यों के कम इस प्रकार है- धर्मास्तिकाय, अधर्मास्तिकाय आकाशास्तिकाय, जीवास्तिकाय, पुद्गलास्तिकाय और अद्धासमय।१६ पश्चानुपूर्वी ठीक पूर्वानुपूर्वी के विपरीत होता है।५७ यदि १ से ६ तक की संख्या को पश्चानुपूर्वी के आधार पर बैठाना चाहें तो ६,५,४,३,२ और १ कहेंगे। इसी प्रकार द्रव्यों को भी पश्चानुपूर्वी के अन्तर्गत निर्धारित किया गया है। Page #65 -------------------------------------------------------------------------- ________________ 64 : श्रमण / अक्टूबर-दिसम्बर / १६६७ तंदुलवैचारिक प्रकीर्णकों में धर्म-अधर्म का द्रव्य रूप में कहीं स्पष्ट उल्लेख प्राप्त नहीं होता 1 तंदुलवैचारिक के अन्तर्गत 'धर्म' की विवेचना हुई है किन्तु प्राप्त उद्धरणों से ज्ञात होता है कि यहाँ 'धर्म' का प्रयोग मानव जीवन में सम्यक्त्व और मोक्ष रूपी कमल को प्राप्त करने के सन्दर्भ में हुआ है । गाथा १७१ से १७४ में वर्णित धर्म - प्रभाव के अन्तर्गत कहा गया है कि 'धर्म रक्षक है, धर्म शरण है, धर्म गति है और धर्म ही आधार है । धर्म प्रीतिकर, कीर्तिकर, दीप्तिकर यशकर, रतिकर, अभयकर, निवृत्तिकर और मोक्ष प्राप्ति में मदद करने वाला है । देवेन्द्र और चक्रवर्तियों के पद भी धर्म के कारण ही प्राप्त होते हैं और उसी से मुक्ति की प्राप्ति भी होती है। उपलब्ध तथ्यों से यह स्पष्ट होता है कि आचारांगसूत्र और सूत्रकृतांगसूत्र में धर्म-अधर्म आदि पंचास्तिकाय का जो स्वरूप लोक - अलोक के रूप में अस्पष्ट दृष्टिगोचर होता है वह स्थानांगसूत्र के द्वितीय स्थान के प्रथम उद्देशक में द्रव्य के प्रकार- गति समापन्नक और अगतिसमापन्नक के रूप में स्पष्ट हो जाता है । स्थानांग में स्पष्ट उल्लेख आया है कि चार कारणों से जीव और पुद्गल लोक से बाहर नहीं जा सकते। उनमें पहला कारण है-धर्मास्तिकाय का अभाव । धर्मास्तिकाय, अधर्मास्तिकाय, आकाशास्तिकाय, जीवास्तिकाय और पुद्गलास्तिकाय अस्तिकाय के प्रकार हैं- जो स्थानांग, समवायांग और व्याख्याप्रज्ञप्ति में समान रूप से मिलते हैं । किन्तु पंचास्तिकायों की विस्तृत चर्चा व्याख्याप्रज्ञप्ति में दृष्टिगोचर होती है । द्रव्य, क्षेत्र, काल, भाव और गुण की अपेक्षा से धर्मास्तिकाय के जिन पाँच प्रकारों का उल्लेख मिलता है उनका निर्धारण स्थानांगसूत्र में ही हो गया है और उसी की पुनरावृत्ति व्याख्याप्रज्ञप्ति में मिलती है 1 उपांगों में जीवाजीवाभिगम एवं प्रज्ञापना के अन्तर्गत एक नया तथ्य देखने को मिलता है जिसकी चर्चा पूर्व के आगमों में नहीं हुई। जीवाजीवाभिगम में द्रव्य को जीव-अजीव के रूप में विभाजित करते हुए अजीव के दस प्रकार बताये गये हैं- धर्मास्तिकाय, अधर्मास्तिकाय केदेश, धर्मास्तिकाय के देश, धर्मास्तिकाय के प्रदेश, अधर्मास्तिकाय, अधर्मास्तिकाय के प्रदेश, आकाशास्तिकाय, आकाशास्तिकाय के देश, आकाशास्तिकाय के प्रदेश तथा अद्धासमय । उत्तराध्ययनसूत्र और अनुयोगद्वारसूत्र में भी अजीव के उपर्युक्त दस प्रकारों का उल्लेख है । जहाँ तक प्रकीर्णकों का प्रश्न है तो तंदुलवैचारिक में धर्म की विशेषता Page #66 -------------------------------------------------------------------------- ________________ जैन आगमों में धर्म-अधर्म : 65 • बताते हुए कहा गया है कि धर्म गति है। लेकिन यहाँ धर्म द्रव्य रूप है यह स्पष्ट नहीं होता है। ___आगमों में वर्णित धर्मास्तिकाय और अधर्मास्तिकाय का विवेचन देखने के पश्चात् प्रथम प्रश्न जिसकी चर्चा लेख के प्रारम्भ में की गयी है उठता है कि धर्मास्तिकाय-अधर्मास्तिकाय का वर्णन सर्वप्रथम कब और किस आगम में आया है? प्राप्त तथ्यों के आधार पर हम कह सकते हैं कि धर्मास्तिकाय और अधर्मास्तिकाय का स्पष्ट उल्लेख स्थानांगसूत्र में प्राप्त होता है। इसका अभिप्राय यह नहीं है कि आचारांग और सूत्रकृतांग में धर्मास्तिकाय-अधर्मास्तिकाय की चर्चा नहीं हुई है। प्रत्यक्ष नहीं तो परोक्ष रूप में चर्चा हुई है। इस सन्दर्भ में हम कुछ जैन विद्वानों के मंतव्यों को उपस्थित करना चाहेंगे। पंडित दलसुखभाई मालवणिया (जिनके विचारों का उल्लेख हम पूर्व में कर चुके हैं, का स्पष्ट मानना है कि सूत्रकृतांग के काल तक पंचास्तिकायों और षद्रव्यों ने तत्त्वविचारणा में स्थान नहीं पाया था। अतः एक ओर मालवणिया जी का यह कहना कि आचारांग में लोक-अलोक का विभाजन है और दूसरी ओर यह कहना कि सूत्रकृतांग के काल तक पंचास्तिकाय और षड्द्रव्यों ने तत्त्वविचारणा में स्थान नहीं पाया है विद्वद्जनों के लिए हैं। क्योंकि यदि हम मानते हैं कि आचारांग में लोक-अलोक का विभाजन है तो फिर यह नहीं कहा जा सकता कि सूत्रकृतांग के काल तक पंचास्तिकायों ने तत्त्व विचारणा में स्थान नहीं पाया है। प्रश्न होता है कि आचारांग में यदि लोक-अलोक की चर्चा हुई है तो उसके विभाजन का आधार क्या है? इतना तो स्पष्ट है कि आधार रूप में पंचास्तिकाय को माना जा सकता है। व्याख्याप्रज्ञप्ति में भी स्पष्ट कहा गया है कि पंचास्तिकाय लोक है। यह सत्य है कि आचारांग में द्रव्य-सम्बन्धी चर्चा के लिए कोई स्वतंत्र अध्ययन नहीं है किन्तु इसका यह अभिप्राय नहीं है कि आचारांग में वर्णित लोक-अलोक के विभाजन का आधार पंचास्तिकाय नहीं कोई और तत्त्व है। सूत्रकृतांग में जो सत्रह प्रतिपक्षी युगलों का वर्णन आया है उसमें पहले लोक-अलोक की प्ररूपणा हुई है उसके बाद फिर जीव-अजीव का वर्णन आया है। साथ ही उसमें धर्म-अथर्म का भी वर्णन है जो द्रव्यात्मक धर्म-अधर्म की ओर संकेत करता है। यदि क्योंकि धर्म-अधर्म का भाव वहाँ पुण्य-पाप से होता तो पुण्य-पाप को पुनः अलग से वर्णित करने की आवश्यकता नहीं पड़ती। साथ ही मालवणिया जी इन्हीं सत्रह प्रतिपक्षी युगलों को सात तत्त्व एवं नव तत्त्व का आधार मानते हैं, अतः यह नहीं कहा जा सकता कि सूत्रकृतांग Page #67 -------------------------------------------------------------------------- ________________ 66 : श्रमण/अक्टूबर-दिसम्बर/१९६७ के काल तक पंचास्तिकायों ने तत्त्व विचारणा में स्थान नहीं पाया था। इस सन्दर्भ में आचार्य महाप्रज्ञजी का कथन है-'नव तत्त्व से पूर्व लोक और अलोक का उल्लेख प्राप्त होता है तथा नवतत्त्व की व्यवस्था में मोक्ष तत्त्व का समावेश है। इन दोनों आधारों पर इस निष्कर्ष पर पहुँचना कठिन नहीं है कि नव तत्त्व की व्यवस्था पंचास्तिकाय की अवधारणा के साथ जुड़ी हुई है। षड्द्रव्य पंचास्तिकाय का विकसित रूप है। पंचास्तिकाय में काल सम्मिलित नहीं है, क्योंकि वह अस्तिकाय नहीं है। वह एक द्रव्य है, इसलिए षड्द्रव्य में परिगणित है। यह बहुत संभव है कि जैन दर्शन में द्रव्य के अर्थ में अस्तिकाय का प्रयोग प्राचीन है और द्रव्य का प्रयोग उसके बाद का है, इसलिए पंचास्तिकाय का सिद्धान्त लोक-अलोक, जीव-अजीव और मोक्ष के सिद्धान्त के साथ ही स्थापित हुआ था। प्रो० सागरमल जैन उपर्युक्त वर्णित तथ्यों से कुछ भिन्न विचार रखते हैं। उनका मानना है कि प्रारम्भ में जैन दर्शन में अस्तिकाय की ही अवधारणा थी। अपने इतिहास की दृष्टि से यह अवधारणा पार्श्वयुगीन थी। 'इसिभासियाई' के पार्श्व नामक इकतीसवें अध्याय में पार्श्व के जगत् सम्बन्धी दृष्टिकोण का प्रस्तुतीकरण करते हुए विश्व के मूल घटकों के रूप में पंचास्तिकायों का उल्लेख हुआ है। भगवतीसूत्र में महावीर ने पार्श्व की इसी अवधारणा का पोषण करते हुए यह माना था कि लोक पंचास्तिकाय रूप है।६० यदि अस्तिकाय की अवधारणा पार्श्वयुगीन माना जाता है तो जिज्ञासा होती है कि आचारांग और सत्रकतांग में अस्तिकायों का स्पष्ट उल्लेख क्यों नहीं हो पाया? समाधान स्वरूप यह कहा जा सकता है कि आगमों की रचना महावीर के गणधरों एवं स्थविरों द्वारा एक योजनाबद्ध रूप में की गयी है। अतः दर्शन के आधारभूत तत्त्वों का विवेचन पूर्व और पर में होना स्वाभाविक है, जैसे-व्याख्याप्रज्ञप्ति में प्रज्ञापना का उद्धरण देते हुए यह कहना कि आगे का वर्णन प्रज्ञापना के अनुसार समझना चाहिए। जीवाजीवाभिगमसूत्र में यह कहना कि प्रज्ञापना के अनुसार जानना चाहिए, इस बात की पुष्टि करता है। जैसा कि आचार्य महाप्रज्ञ ने लिखा है- “आचारांग और सूत्रकृतांग में दर्शन के आधारभूत तत्त्वों की खोज एक सुसंगत उपक्रम नहीं है। महावीर ने किसी आगम की रचना नहीं की। उन्होंने जो कहा उसको आधार मानकर गणधरों और स्थविरों ने आगमों की रचना की। आचारांग आदि अंगसूत्रों की रचना एक योजनाबद्ध ढंग से की गई थी। समवायांग और नंदी में उपलब्ध द्वादशांगी के विवरण से इस तथ्य की पुष्टि होती है। जहाँ तक धर्म-अधर्म शब्द के प्रयोग का प्रश्न है तो इतना तो सत्य है कि Page #68 -------------------------------------------------------------------------- ________________ जैन आगमों में धर्म-अधर्म : 67 जैन दर्शन में धर्म-अधर्म का प्रयोग एक नवीन अर्थ में किया गया है। साथ ही यह भी सत्य है कि धर्म-अधर्म शब्द का प्रयोग जिस व्यापक अर्थों में होता है वह वस्तुतः वैदिक दर्शन की देन है क्योंकि जैन धर्म दर्शन के विकासकाल में धर्म-अधर्म ने इतना व्यापक रूप धारण कर लिया था कि इन शब्दों से जैन दर्शन अपने को वंचित नहीं रख सका और उसे गति तथा स्थिति के कारण रूप में स्वीकार कर लिया। इस संबंध में डॉ० सुरेन्द्र दास नाथ गुप्त का कहना है कि जैन दार्शनिकों ने इन दो द्रव्यों को संभवतः इसलिए आवश्यक माना हो कि उनकी विचारधारा में जीव अथवा परमाणु (पुद्गल) की आन्तरिक प्रवृत्ति के बाह्य प्रकटन के लिए कोई बाड्य निमित्त होना चाहिए जिसके बिना उसकी परिणति बाहय गति के रूप में होनी असंभव है। इस प्रकार यह चिन्तन किया गया होगा कि गति की परिणति या निष्पत्ति के लिए किसी बाहय तत्त्व की सहायता अपेक्षित होनी चाहिए जिसके अभाव में मुक्त आत्मा की गति भी असंभव हो जाती है।६२ संदर्भ1. The conception of Dharma and Adharma in Jainism is abso lutely different from what they mean in other systems of Indian Philosophy-S.N. Dasgupta,. A History of Indian Philosophy, Cambridge University Press, London 1932, P. 197 २. डॉ० लूडो रोचेर, जैन दर्शन में धर्मास्तिकाय-अधर्मास्तिकाय-उद्धृत आचार्य श्री तुलसी अभिनन्दन ग्रंथ, आचार्य श्री तुलसी धवल समारोह समिति, दिल्ली पृ० १४८ ३. मुनिश्री नगराजजी, जैन दर्शन और आधुनिक विज्ञान, आत्माराम एण्ड सन्स, काश्मीरी गेट, दिल्ली १६५६, पृ० १३४ 4. Thus it is proved that science and Jain Physics agree absolutely so for as they call Dharm (ether) non-material, non-atomic, non-discrete, continuous, co-extensive with space, indivisible and as a necessary medium for motion and one which does not itself move.) उद्धृत वहीं पृ०-१४१. ५. समियाए धम्मे आरिएहिं पवेइए- आचारांगसूत्र, संपा०- मधुकर मुनि, जिनागम ग्रंथमाला, ग्रंथांक-१, आगम प्रकाशन समिति ब्यावर १६८०, १/५/३/१५७. ६. एस धम्मे सुद्धे णित्तिए सासए समेच्च लोयं खेतण्णहिं पवेदिते। वही-१/४/५/१३२. '७. जहा से दीवे असंदीणे एवं से धम्मे आरियपदेसिए । ते अणवकंखमाणा अणतिवातेमाणा दइता मेधाविणो पंडितो। वही-१/६/३/१८६ Page #69 -------------------------------------------------------------------------- ________________ 68 : श्रमण/अक्टूबर-दिसम्बर/१६६७ ८. आयतचक्खू लोगविपस्सी लोगस्स अहोभागं जाणति, उड्ढं भागं जाणति, तिरियं भागं जाणति। वही-१/२/५/६१ ६. पं० दलसुखभाई मालवणिया, जैन दर्शन का आदिकाल, श्री पुष्कर मुनि अभिनन्दन ग्रंथ, पुष्कर मुनि अभिनदन ग्रंथ पृ० २४१-२४२. १०. सूत्रकृतांगसूत्र, संपा० मधुकर मुनि, जिनागम ग्रंथमाला, ग्रंथांक- ६, आगम प्रकाशन समिति ब्यावर, १६८२, १/४/७६-७६ ११. वही - १/६/४३७-४४३ १२. वही १३. वही - १/६/४६४-४७२ १४. वही - १/६, ४३७ १५. बुद्धस्स आणाए इमं समाहिं, अस्सि सुठिच्चा तिविहेण ताती।तरिउं समुदं व महाभवोधं आयाणवं धम्ममुदाहरेज्जासि ।। सूत्रकृतांगसूत्र, संपा० युवाचार्य मधुकर मुनि, जिनागम ग्रंथमाला, ग्रंथांक-१०, आगम प्रकाशन समिति, ब्यावर, १६८२,-२/६/८४१ १६. तं जहा-अणारंभा अपरिग्गहा धम्मिया धम्माणुगा धम्मिट्ठ। जाव धम्मेणं चेव वित्तिं . कप्पेमाणा विहरंति, सुसीला सुव्वता सुप्पडियाणंदा -------ततो वि पांडिविरता जावज्जीवाए। वही-२/२/७१४. १७. वही - २/५/७६५-७८१. १८. पं० दलसुखभाई मालवणिया, जैनदर्शन का आदिकाल, लालभाई, दलपतभाई भारतीय संस्कृति विद्यामंदिर, अहमदाबाद, १६८०, पृ० ३४. १६. वही -पृ० ३४-३५. २०. एगे लोए । एगे अलोए। एगे धम्मे। एगे अधम्मे। एगे बंधे। एगे मोक्खे। एगे पुण्णे। एगे पावे। एगे आसवे। एगे संवरे। एगे वेयणा। एगे णिज्जरा। स्थानांगसूत्र, संपा०-मधुकर मुनि, जिनागम ग्रंथमाला, ग्रंथांक-७, आगम प्रकाशन समिति ब्यावर १६८१, १/५-१६. २१. दुविहा दव्वा पण्णत्ता, तं जहा-गतिसमावण्णगा चेव, अगतिसमावण्णगा चेव। वही-२/१/१४४. २२. तिविहे धम्मे पण्णत्ते, तं जहा-सुयधम्मे, चरित्तधम्मे, अत्थिकायधम्मे। वही-३/३/४१०. Page #70 -------------------------------------------------------------------------- ________________ जैन आगमों में धर्म-अधर्म : 69 २३. चत्तारि अत्थिकाया अजीवकाया पण्णत्ता, तं जहा-धम्मत्थिकाए, अधम्मत्थिकाए आगासत्थिकाए, पोग्गलत्थिकाए। वही-४/१/६६ २४. धम्मत्थिकाए अवण्णे अंगधे अरसे अफासे अरूवी अजीवे सासए अवट्ठिए लोगदव्ये। वही-५/३/१७०. २५. तं जहा-दव्वओ खेत्तओ, कालओ, भावओ, गुणओ। वही-५/३/१७०. २६. वही। २७. अधम्मत्थिकाएं अवण्णे अंगधे अरसे अफासे अरूवी अजीवे सासए अवट्ठिए लोगदव्वे। वही-५/३/१७१ २८. दुविहे धम्मे पण्णत्ते, तं जहा-सुयधम्मे चे व, चरित्तधम्मे चे व। वही-२/१/१०७. २६. चत्तारि धम्मदारा पण्णत्ता, तं जहा-खंती, मुत्ती, अज्जवे, मद्दवे। वही-४/४/६२७. ३०. दसविधे धम्मे पण्णत्ते तं जहा-गामधम्मे, णगरधम्मे, रठ्ठधम्मे, पासंडधम्मे कुलधम्मे, गणधम्मे, संघधम्मे, सुयघम्मे, चरित्रधम्मे अत्थिकायधम्मे। वही-१०/१३५. ३१. एगे लोए, एगे अलोए । एगे धम्मे, एगे अधम्मे। समवायांगसूत्र, संपा०-मधुकर मुनि, जिनागम ग्रंथमाला, ग्रंथांक-८ आगम प्रकाशन समिति, ब्यावर १६८२, १/३. ३२. वही- विविधविषय निरूपण, गाथा-५७६. ३३. गोयमा पंच अस्थिकाया पण्णत्ता, तं जहा-धम्मत्थिकाए, अधम्मत्थिकाए, आगासत्थिकाए जीवत्थिकाए पोग्गलत्थिकाए। व्याख्याप्रज्ञप्तिसूत्र संपा० मधुकर सुनि, जिनागम ग्रंथमाला, ग्रंथांक- १४, आगम प्रकाशन समिति ब्यावर, १६८२, २/१०/१. ३४. धम्मत्थिकाए णं जीवाणं आगमण-गमण-भेसुम्मेस-मणजोग वइजोग-कायजोगा, जे यावऽण्णे तहप्पगारा चलाभावा सव्वे ते धम्मत्थिकाए पवत्तंति, गइलक्खणे णं धम्मत्थिकाए। गोयमा अधम्मत्थिकाए णं जीवाणं ढाणनिसीयण-तुयट्टण-मणस्स य एगत्ततीभावकरणया, यावऽण्णे तहप्पगारा, थिराभावा सव्वे ते अधम्मत्थिकाए पवत्तंति, ठाणलक्खणे णं अधम्मत्थिकाए। वही-१३/४/२४-२५. ३५. गोयमा अणेगा अभिवयणा पन्नत्ता, तं जहा-धम्मे ति वा, धम्मत्थिकाय ति वा, पाणातिवायवेरमणे ति वा, मुसावायवेरमणे ति वा एवं जाव परिग्गहवेरमणे ति वा, कोहविवेगे ति वा जाव मिच्छादसणसल्लविवेगे ति वा, इरियासमिती ति वा, भासास० एसणा स० आदाणभंडमत्तनिक्खेवण स० उचार-पासवणखेल-सिंधाण-परिद्धावणिया Page #71 -------------------------------------------------------------------------- ________________ 70 : श्रमण / अक्टूबर-दिसम्बर / १६६७ समिती ति वा, मणगुत्ती ति वा, वइगुत्ती ति वा, कायगुत्ती ति वा, जे यावऽन्ने तहप्पगारासव्वे ते धम्मत्थिकायस्स अभिवयणां । तं जहा - अधम्मेति वा, अधम्मेत्थि वा, पाणातिवाए ति वा ......... जाव' मिच्छादंसणसल्ले ति वा सव्वे. अधम्मत्थिकायस्स अभिवयणा । वही - २०/२/४-५. ३६. वही- २/१०/२-३. ३७. गोयमा, लोए लोयमेत्ते लोयप्पमाणे लोफुडे लोयं चेव फसित्ताणं चिट्ठइ | वही - २/१०/१३ ३८. गोयमा, असंखेज्जा धम्मत्थिकायपदेसा ते सव्वे कसिणा पडिपुण्णा निरवसेसा एगग्गहणगहिया, एस णं गोयमा, धम्मत्थिकाए त्ति वत्तव्वं सिया । वही -२/१०/८ ३६. वही - १३/४/२६ ४०. वही- १३.०४/३० ४१. गोयमा, से जहा नामए कूडागारसाला सिया दुहओ लित्ता गुत्ता गुत्तदुवारा जाहा रायप्पसेणइज्जे जाव दुवारवयणाई पिइ; दुवारवयणाई पिहित्ता तीसे कूडागारसालाए बहुमज्झदेसभाए जहन्त्रेणं एक्को वा दो वा तिण्णि वा, उक्कोसेणं पदीवसहसं पलीवेज्जा; से नूणं गोयमा! ताओ पदीव लेस्साओ अन्नमन्नसंबद्धाओ अन्नमन्न्पुट्ठाओ जाव अन्न मन्नधडत्ताए चिट्ठति ? हंता, चिट्ठति। “चक्कियाणं गोयमा, केयि तासु पदीवलेस्सासु आसइत्तए वा जाव तुयट्ठित्तए वा ?” भगवं, णो इण्ट्ठे समट्टे, अनंता पुण तत्थ जीवा ओगाढ़ा । से तेणट्टेणं गोयमा एवं जाव वुच्चइ ओगाढ़ा । वही - १३/४/६६.२. ४२. एएसिं अप्पाबहुगं जहा बहुवत्तव्वयाए तहेव निखसेसं । वही - २५/४/१७. ४३. डा० धर्मचन्द जैन, द्रव्यानुयोग (प्रस्तावना) भाग - ३, संपा० मुनि श्री कन्हैयालाल जी कमल, आगम अनुयोग ग्रंथमाला, ग्रंथांक - ८, आगम अनुयोग ट्रस्ट, बम्बई १६६५, पृ० ३१. ४४. तं जहा-रूवि-अजीवाभिगमे य अरूवि - अजीवाभिगमे य । जीवाजीवा- भिगमसूत्र, संपा० मधुकरमुनि, जिनागम ग्रंथमाला ब्यावर ग्रंथांक-३०, १६८६, १/३. Page #72 -------------------------------------------------------------------------- ________________ जैन आगमों में धर्म-अधर्म : 71 ४५. तं जहा धम्मत्थिकाए एवं जहा पण्णवणाए जाव, से तं अरूवि- अजीवाभिगमे। वही-१/४. ४६. प्रज्ञापनासूत्र, संपा० मधुकर मुनि, जिनागम ग्रंथमाला, ग्रंथांक-१६, आगम प्रकाशन समिति, ब्यावर, १६८३, १/४. ४७. अरूविअजीवपण्णवणा दसविहा पन्नत्ता। तं जहा- धम्मत्थिकाए, धम्मत्थिकाए देसे धम्मत्थिकायस्स पदेसा अधम्मत्थिकायस्स देसे अधम्मत्थिकायस्स पदेसा, आगासस्थिकाए आगासत्थिकायस्स देसे आगासत्थिकायस्स पदेसा, अद्धासमय। से तं अविअजीवपण्णवणा। वही-१/५. ४८. धम्मत्थिकाए अधम्मत्थिकाए आगासत्थिकाए य एते णं तिणि वि तुल्ला दव्वट्ठयाए सव्वत्थोवा, धम्मत्थिकाए अधम्मत्थिकाए य एते णं दोण्णि वि तुल्ला पदेस्टुताए असंखेज्जगुणा, जीवत्थिकाए दव्वट्ठयाए अणंतगुणे, से चेव पदेसठ्ठताए असंखज्जगुणे, पोग्गलत्थिकाए दव्वट्ठयाए अणंतगुणे, से चेव पदेसट्टयाए असंखेज्जगुणे, अद्धासमए दवट्ठ-पदेसट्टयाए अणंतगुणे आगासत्थिकाए पएसट्टयाए अणंतगुणे । वही-३/२७३. ४६. जीवा चेव अजीवा य एस लोए वियाहिए। उत्तराध्यययनसूत्र, संपा०- मधुकर मुनि, जिनागम ग्रंथमाला, ग्रंथांक-१६, आगम प्रकाशन समिति ब्यावर, १९८४/३६/२. ५०. वही - ३६/४. ५१. अरूवी दसहा वुत्ता रूविणो वि चउब्विहा। वही ५२. वही-३६/७-६ ५३. गइलक्खणो उ धम्मो अहम्मो ढाणलक्षणो। भायणं सव्वदव्वाणं नहं ओगाहलक्खणं ।। वही-२८/६. ५४. अनुयोगद्वारसूत्र, संपा०- मधुकर मुनि, जिनागम ग्रंथमाला, ग्रंथांक-२८, आगम प्रकाशन समिति ब्यावर, १६८७, गाथा-२१८. ५५. वही - गाथा-४०१. ५६. पुव्वाणुपुव्वी धम्मत्थिकाए अधम्मत्थिकाए आगासत्थिकाए जीवत्थिकाए पोग्गलत्थिकाए अद्धासमए । से तं पुव्वाणुपुवी। वही, १३२. ५७. पच्छाणुपुब्बी अद्धासमए पोग्गलत्थिकाए जीवत्थिकाए आगासत्थिकाए अधम्मत्थिकाए, धम्मत्थिकाए। से तं पच्छाणुपुब्बी। वही, १३३. Page #73 -------------------------------------------------------------------------- ________________ 72 : श्रमण/अक्टूबर-दिसम्बर /१६६७ ५८. तंदुलवैचारिक आगम, अहिंसा एवं समता शोध संस्थान, उदयपुर- १७१-१७४६ ५६. भगवई, संपा०- आचार्य महाप्रज्ञ, जैन विश्वभारती संस्थान, लाडनूं-१६६४, भूमिका, पृ० १८. ६०. द्रव्यानुयोग, मुनिश्री कन्हैयालाल जी कमल, आगम अनुयोग ट्रस्ट, अहमदाबाद १६६४, भूमिका-पृ०३५. ६१. भगवई, संपा० आचार्य महाप्रज्ञ, जैन विश्वभारती संस्थान, लाडनूं १६६४, भूमिका-पृ० १७. 62. The necessity of admitting these two categories seems probably to have been felt by the Jains on account of their notion that the inner activity of the Jiva or the atoms required for its exterior realization the help of some other extraneous entity, without which this could not have been transformed into actual exterior motion.......................thus it was conceived that actual motion required for its fulfilment the help of an extraneous entity which was absent in the region of the liberated souls. S.N. Dasgupta, A History of Indian Philosophy, Cambridge University press, London 1932. p.198. Page #74 -------------------------------------------------------------------------- ________________ श्रमण पंचकारणसमवाय और अनेकान्त सन्मतिसूत्र में निम्नलिखित गाथा कही गई है : कालो सहाव णियई पुव्वकयं पुरिस कारणेगंता । मिच्छत्तं ते चेव (व) उ समासओ होंति सम्मत्तं । । ५३ ।। - डॉ० रतनचन्द्र जैन* अर्थात् काल, स्वभाव, नियति, पूर्वकृत कर्म तथा पौरुष, इनमें से किसी एक को समस्त कार्यों का कारण मानना एकान्तवाद है जो मिथ्यात्व है किन्तु भिन्न-भिन्न कार्यों की अपेक्षा इन सबको कारण स्वीकार करना अनेकान्तवाद है, अतएव सम्यक्त्व है । इस गाथा की कुछ आधुनिक जैन विद्वान् यह व्याख्या करते हैं कि इनमें से किसी एक के द्वारा प्रत्येक कार्य की उत्पत्ति मानना मिथ्यात्व है और पाँचों के समूह से प्रत्येक कार्य की उत्पत्ति मानना सम्यक्त्व है । मैं इस व्याख्या से असहमत हूँ। मेरी दृष्टि से इस गाथा का यह अर्थ नहीं है कि पाँचों के समवाय से प्रत्येक कार्य की उत्पत्ति मानना सम्यक्त्व है, अपितु यह अर्थ है कि पाँचों को जगत् के भिन्न-भिन्न कार्यों का कारण मानना सम्यक्त्व है, यह व्याख्या इसलिए समीचीन है कि जगत् के कार्यों में वैविध्य है इसलिए उनकी उत्पत्ति विविध कारणों से ही हो सकती है। इसके समर्थन में निम्नलिखित आर्षवचन प्रस्तुत कर रहा हूँ । सूत्रकृतांग में कहा गया है: एवमेयाणि जंपता बाला पंडियमाणिणो । निययानिययं संतं अयाणंता अबुद्धिया ।। ( १ / २ / ४ ) १३७ आराधनानगर कोटरा सुल्तानाबाद, भोपाल - ४६२००३. Page #75 -------------------------------------------------------------------------- ________________ 74 : श्रमण /अक्टूबर-दिसम्बर /१६६७ अर्थात् सुखदुःखादि सब नियतिकृत हैं ऐसा कहने वाले बुद्धिहीन हैं, क्योंकि सुखदुःखादि नियतिकृत भी हैं और अनियतिकृत भी। इसे स्पष्ट करते हुए टीकाकार कहते हैं : “आर्हतानां किञ्चित् सुखदुःखादि नियतित एव भवति तत्कारणस्य कर्मणः कस्मिंश्चिद- वसरे ऽवश्यम्भाव्युदयसभावान्नियतिकृतमित्युच्यते तथा किञ्चिदनियतिकृतं च पुरुषकारकालेश्वरस्वभावकादिकृतम्।" । भाव यह है कि जैनों के मतानुसार कुछ सुखदुःखादि कार्य नियति से ही होते हैं, क्योंकि उनके कारणभूत कर्म का किसी काल में उदय अवश्यम्भावी होने से वे नियतिकृत कहलाते हैं तथा कुछ अनियति से अर्थात् पौरुष, काल, ईश्वर, स्वभाव, कर्म आदि से होते हैं। यहाँ "कुछ कार्य नियति से होते हैं, कुछ कार्य अनियति से' इन शब्दों से स्पष्ट है कि प्रत्येक कार्य नियति और अनियति दोनों से अर्थात् नियति, स्वभाव, काल पूर्वकृत कर्म और पौरुष इन पाँचों के समवाय से नहीं होता। कौन से कार्य किस कारण से उत्पन्न होते हैं, इसका स्पष्टीकरण सूत्रकृतांग के टीकाकार ने निम्नलिखित शब्दों में किया है: “अस्ति कालः कारणत्वेनाशेषस्य जगतः प्रभववृद्धिस्थितिविनाशेषु साध्येषु तथा शीतोष्णवर्षवनस्पतिपुष्फलादिषु चेति तथा चोक्तम्-‘कालः पचति भूतानीत्यादि ।' तथास्ति स्वभावोऽपि कारणत्वेनाशेषस्य जगतः, स्वो भावो स्वभाव इति कृत्वा, तेन हि जीवाजीवभव्यत्वाभव्यत्वमूर्तत्वामूर्तत्वानां स्वस्वरूपानुविधानात् तथा धर्माधर्माकाशकालादीनां च गतिस्थित्यवगाह- परत्वापरत्वादिस्वरूपापादनादिति। तथा चोक्तम्-कः कण्टकानामित्यादि ।' तथा नियतिरपि कारणत्वेनाश्रीयते, तथा तथा पदार्थानां नियतेरेव नियतत्वात् । तथा पुराकृतं, तच्च शुभाशुभमिष्टानिष्टफलं कारणम्। तथा पुरुषकारोऽपि कारणं, यस्मान्न पुरुषकारमन्तरेण किञ्चित् सिध्यति । तथा चोक्तम्-"न दैवमिति सञ्चिन्त्य त्यजेदुद्यममात्मनः । अनुद्यमेन कस्तैलं तिलेभ्यः प्राप्तुमर्हति।.........तदेवं सर्वानपि कालादीन् कारणत्वेनाभ्युपगच्छन् तथात्मपुण्यपाप परलोकादिकं चेच्छन् क्रियावादी सम्यग्दृष्टित्वेनाभ्युपगन्तव्यः।" (सूत्रकृतांग/ समवसरणाध्ययन/गाथा १२१ की शीलाङ्क टीका) अर्थ इस प्रकार है: काल सम्पूर्ण जगत् की उत्पत्ति, वृद्धि, स्थिति, और विनाश Page #76 -------------------------------------------------------------------------- ________________ पंचकारणसमवाय और अनेकान्त : 75 का तथा शीत, उष्ण, वर्षा, आदि ऋतुओं तथा वनस्पति, पुष्प, फल आदि की उचित समय पर उत्पत्ति का कारण है। स्वभाव जीव और अजीव के भव्यत्व, अभव्यत्व, मूर्तत्व, अमूर्तत्व आदि स्वरूप का तथा धर्म, अधर्म, आकाश और काल की गति, स्थिति, अवगाह, परत्वापरत्व आदि के कार्यत्व की निष्पत्ति का कारण है। नियति पदाथों के अपने-अपने स्वरूप में नियत रहने का कारण है। पूर्वकृत कर्म शुभाशुभ भावों एवं इष्टानिष्ट फलों का कारण है तथा पुरुषकार पौरुष द्वारा साध्य कार्यों का कारण है। इस प्रकार क्रियावादी कालादि सभी तत्त्वों को कारणरूप से स्वीकार करता है तथा आत्मा, पुण्य-पाप, परलोक आदि के अस्तित्व को मानता है, इसलिए उसे सम्यग्दृष्टि समझना चाहिए। इस विवेचन से स्पष्ट हो जाता है कि ये पाँचों तत्त्व भिन्न-भिन्न कार्यों के कारण हैं, प्रत्येक कार्य के नहीं और सन्मतिसूत्र की उपर्युक्त गाथा में कालादि पाँचों को इन भिन्न-भिन्न कार्यों की अपेक्षा कारणरूप में स्वीकार करने वाले को सम्यग्दृष्टि कहा गया है, इनमें से किसी एक या कुछ को कारणरूप में स्वीकार कर, अन्य के कारणत्व का निषेध करनेवाला मिथ्यादृष्टि घोषित किया गया है। यहाँ प्रत्येक की कारणरूप में स्वीकृति मात्र अपेक्षित है, प्रत्येक को समस्त कार्यों का कारण स्वीकार करना नहीं। आचार्य अमृतचन्द्र ने भी नियति-अनियति, काल-अकाल, स्वभाव- अस्वभाव, दैव-पुरुषकार आदि परस्परविरुद्ध कारणों से परस्परविरुद्ध कार्यों की उत्पत्ति बतलाई है: “नियतिनयेन नियमितौष्ण्यबहिवन्नियत स्वभावमासि। अनियतिनयेन नियत्यनियमितौष्ण्यपानीयवदनियतस्वभावमासि। स्वभावनयेनानिशित तीक्ष्णकण्टकवत् संस्कारनर्थक्यकारि । अस्वभावनयेनायस्कार निशिततीक्ष्ण विशिखवत् संस्कारसार्थक्यकारि। कालनयेन निदाघदिवसानुसारिपच्चमान- सहकारफलवत् समयायत्तसिद्धिः। अकालनयेन कृत्रिमोष्मपाच्यमान- सहकारफलवत् समयानायत्तसिद्धिः । पुरुषकारनयेन पुरुषकारोपलब्धमधुकुक्कुटीकपुरुषकारवादिवद् यत्नसाध्यसिद्धिः। दैवनयेन पुरुषकारवादिदत्तमधुकुक्कुटीगर्भलब्धमाणिक्यदैववादिवदयत्नसाध्यसिद्धिः।” (प्रवचनसार- तत्त्वदीपिका टीका, ३/७५) __ अर्थात् नियतिनय से अग्नि के उष्णत्व स्वभाव के समान आत्मद्रव्य का चैतन्यस्वभाव नियत है। अनियतिनय से पानी के औपाधिक उष्णस्वभाव के समान आत्मद्रव्य का कर्मोपधिजन्य मोहरागादिस्वभाव अनियत है। स्वभावनय से काँटे के तीक्ष्ण Page #77 -------------------------------------------------------------------------- ________________ 76 : श्रमण/अक्टूबर-दिसम्बर/१६६७ स्वभाव के समान आत्मा का चैतन्यस्वभाव स्वाभाविक है। अस्वभावनय से लुहार के द्वारा बाण में उत्पन्न की गई तीक्ष्णता के समान आत्मा के क्षायोपशमिकादि भाव अस्वाभाविक हैं। कालनय से जैसे वृक्ष पर लगे आम्रफल का पकना समय के अधीन है वैसे ही आत्म सम्बद्ध कर्मों की निर्जरा समयाधीन है। अकालनय से जैसे आम का फल भूसे में रख देने से समय के पूर्व भी पक जाता है, वैसे ही आत्मा अपने कर्मों की निर्जरा तप के द्वारा निर्धारित समय के पूर्व भी कर लेती है। पुरुषकारनय से जैसे पुरुषकारवादी को मधुमक्खियों का छत्ता प्रयत्न से प्राप्त हुआ, वैसे ही आत्मद्रव्य के साध्य की सिद्धि प्रयत्न से होती है। किन्तु, दैवनय से जैसे पुरुषकारवादी ने मधुमक्खियों का छत्ता दैववादी को दिया और उसके भीतर उसे माणिक्य की प्राप्ति हो गयी। वैसे ही आत्मा के कार्यविशेष की सिद्धि अयत्नपूर्वक भी हो जाती है। इन आर्षवचनों से सिद्ध है कि काल, स्वभाव, नियति आदि कारणों से भिन्न-भिन्न कार्यों की उत्पत्ति होती है और अमुक कारण से अमुक कार्य की उत्पत्ति हुई है, इसका निश्चय तभी होता है जब अन्य कारणों के बिना उस कार्य की उत्पत्ति देखी जाय। आचार्य कुन्दकुन्द ने अरहन्तों के स्थान, आसन, गमन तथा धर्मोपदेश आदि क्रियाओं को इस आधार पर नियतिजन्य कहा है कि वे प्रयत्न के बिना उत्पन्न होती, ठाणणिसेज्जविहारा धम्मुवदेसो य णियदयो तेसिं। अरहंताणं काले मायाचारो व्व इत्थीणं ।। प्रवचनसार, १/४४ इसे आचार्य अमृतचन्द्र जी ने निम्नलिखित शब्दों में स्पष्ट किया है: “यथा हि महिलानां प्रयत्नमन्तरेणापि तथाविध योग्यतासद्भवात् स्वभावभूत एव मायोपगुण्ठनागुण्ठितो व्यवहारः प्रवर्तते, तथा हि केवलिनां प्रयत्नमन्तरेणापि तथाविधयोग्यतासद्भावात् स्थानमासनं विहरणं धर्मदेशना च स्वभावभूता एव प्रवर्तन्ते।" (प्रवचनसार/तत्त्वदीपिका १/४४) ___अर्थात् जैसे महिलाओं से प्रयत्न के बिना भी उस प्रकार की योग्यता होने के कारण स्वभावगत मायाचार प्रवृत्त होता है, वैसे ही केवलियों से प्रयत्न के बिना ही उस प्रकार की योग्यता के सद्भाव से स्थान, आसन, विहार और धर्मोपदेश की क्रियाएं स्वभाव से ही प्रवृत्त होती हैं। (यहाँ आचार्य अमृतचन्द्र जी ने कुन्दकुन्दप्रयुक्त 'नियति' शब्द के . लिए 'स्वभाव' शब्द का प्रयोग किया है।) Page #78 -------------------------------------------------------------------------- ________________ पंचकारणसमवाय और अनेकान्त : 77 इसी प्रकार श्री पद्मप्रभमलधारिदेव ने शुद्धचैतन्यभाव को कर्मोपाधि के बिना निष्पन्न होने के कारण परिणामभव अर्थात् स्वभावजन्य कहा है: “सकलकर्मोपाधिविनिर्मुक्तः परिणामे भवः पारिणामिकभावः।” (नियमसार। तात्पर्यवृत्ति, ४१) आचार्य कुन्दकुन्द ने रागादिभावों को स्वभाव से अनुद्भूत एवं कर्मोदयजन्य बतलाया है: जह फलिहमणी सुद्धो ण सयं परिणमइ रायमाईहिं। रंगिज्जदि अण्णेहिं दु सो रत्तादीहिं दव्वेहिं।। एवं णाणी सुद्धो ण सयं परिणमइ रायमाईहिं। राइज्जदि अण्णेहिं दु सो रागादीहिं दोसेहिं ।। समयसार, गाथा २७८-२७६. श्री उमास्वामी ने काल रूप कारण के बिना होने वाली निर्जरा को तपरूप पौरुष से होने वाली कहा है: “तपसा निर्जरा च।” (तत्त्वार्थसूत्र, ६/३) इस प्रकार प्रत्येक कारण अन्य कारणों से मिलकर नहीं, अपितु उनके बिना. ही अपना कार्य करता है। कोई भी कारण दूसरे कारण के कार्य को उत्पन्न नहीं कर सकता। निमित्त और उपादान भी अपने-अपने ही कार्य को करते हैं। निमित्त का कार्य उपादान नहीं कर सकता, उपादान का कार्य निमित्त से उत्पन्न होना असंभव है। कुम्भकाररूप निमित्त अपने योगोपयोग का ही कर्ता होता है और मिट्टीरूप उपादान अपने घटपरिणाम का जैसा कि आचार्य कुन्दकुन्द ने कहा है: जीवो ण करेदि घडं णेव पडं णेव सेसगे दव्वे। जोगुवओगा उप्पादगा य तेसिं हवदि कत्ता।। समयसार १०० पृथक्-पृथक् कार्य के उत्पादक सिद्ध होने पर ही कालादि पाँच कारणों का स्वतन्त्र कारणत्व घटित हो सकता है। जैसे एक ही पुत्र की अपेक्षा संसार के सभी पुरुषों का पितृत्व घटित नहीं होता अथवा केवल द्रव्य या केवल पर्याय की अपेक्षा नित्यत्व और अनित्यत्व दोनों धर्म घटित नहीं होते, वैसे ही एक ही कार्य की अपेक्षा कालादि सभी कारणों का कारणत्व घटित नहीं हो सकता। Page #79 -------------------------------------------------------------------------- ________________ 78 : श्रमण/अक्टूबर-दिसम्बर/१६६७ यदि सभी कारण सभी कार्य करें तो उनमें अभेद का प्रसंग आयेगा। समस्त कारण एक ही कारण के नामान्तर सिद्ध होंगे। इससे एक ही कारण के द्वारा जगत् के समस्त कार्यों की उत्पत्ति मानने का एकान्तवाद घटित होगा। अथवा पाँचों के समवाय से ही प्रत्येक कार्य की उत्पत्ति मानने पर एकान्तनियतिवाद का प्रसंग आयेगा, क्योंकि प्रत्येक कार्य में नियतिरूप कारण अनिवार्यतः होने से अन्य चार कारण भी नियत हो जायेंगे, क्योंकि कार्य के साथ सम्पूर्ण कारण सामग्री का नियत होना ही एकान्तनियतिवाद का लक्षण है, जैसा कि गोम्मटसार कर्मकाण्ड में कहा गया है: जत्तु जदा जेण जहा जस्य य णियमेण होदि तत्त तदा। तेण तहा तस्स हवे इति वादो णियदिवादो तु।। अर्थात् जिसका, जो, जब, जिसके द्वारा, जिस विधि से नियमपूर्वक होना है, उसका, वह, उस समय, उसके द्वारा, उस विधि से होता है। इस प्रकार सब कुछ नियत - मानना नियतिवाद है। एकान्तनियतिवाद जैनसिद्धान्त के विरुद्ध है। सूत्रकृतांग की पूर्वोद्धृत गाथा इसकी साक्षी है। आचार्य नेमिचन्द्र सिद्धान्तचक्रवर्ती ने भी 'कथंचित्' शब्द के बिना नियतिवाद को एकान्तवाद और मिथ्या बतलाया है: परसमयाणं मिच्छं खलु होदि सव्वहा वयणा। जइणाणं पुण वयणं सम्मं खु कहं चि वयणादो।। गोम्मटसार (कर्मकाण्ड ८६४-८६५) अथवा पाँचों के समवाय से प्रत्येक कार्य की उत्पत्ति मानने पर किसी भी कार्य के उत्पन्न न हो पाने का प्रसंग उपस्थित होगा,क्योंकि कालादि पाँचों कारण जल और अग्नि के समान परस्परविरुद्धस्वभावी हैं। अतः जैसे जल और अग्नि के समवाय से शीतलतारूप समान कार्य उत्पन्न नहीं हो सकता, वैसे ही स्वभाव और पूर्वकृत कर्म के समवाय से चैतन्यभावरूप परिणामिकभाव की सिद्धि संभव नहीं है। जहाँ इन परस्परविरुद्ध कारणों का समवाय होगा वहाँ ये सुन्द-उपसुन्द के समान परस्परविरुद्ध कार्य उत्पन्न करके एक-दूसरे के कार्य का विघात करेंगे। एक ओर जहाँ स्वभावरूप कारण, कार्य को अनादि-अनन्त बनायेगा, वहीं काल तथा कर्मरूप कारण उसकी अनादि-अनन्तता' मिटाकर सादि-सान्त बनाने का प्रयत्न करेंगे। स्वभावरूप कारण आत्मा को Page #80 -------------------------------------------------------------------------- ________________ पंचकारणसमवाय और अनेकान्त : 79 शुद्धचैतन्यस्वरूप प्रदान करेगा, तो कर्मोदयरूप कारण शुद्धचैतन्यस्वभाव को नष्ट कर आत्मा को मोह-राग-द्वेष के साँचे में ढालेगा। इस प्रकार ये परस्परविरोधी स्वभाव वाले कारण आपस में तलवारें भाँजते रहेंगे और एक-दूसरे के कार्य की भ्रूण हत्या कर किसी भी कार्य को उत्पन्न न होने देंगे। एकान्तवादों का समवाय कारणविषयक पाँच एकान्तवादों को अपेक्षाभेद के बिना सामूहिक रूप से स्वीकार कर लेना अनेकान्तवाद नहीं है, सामूहिक एकान्तवाद है। अपेक्षाभेद के बिना उनकी एकान्तात्मकता नष्ट नहीं होती। काल, स्वभाव, नियति, पूर्वकृत कर्म तथा पौरुष, इनमें से कोई भी जगत् के समस्त कार्यों का कारण नहीं है, सब भिन्न-भिन्न कार्यों के कारण हैं। अतः इनमें से प्रत्येक को जगत् के समस्त कार्यों का कारण स्वीकार कर लेना अपेक्षाभेद नहीं है, अपितु अपेक्षकत्व है जो विरोध का एकमात्र कारण है। वस्तुतः कारणैकान्तवादियों में विवाद तो इसी बात का है कि कालवादी काल को ही जगत् के समस्त कार्यों का कारण मानता है, स्वभाववादी स्वभाव को ही, नियतिवादी नियति को ही, कर्मवादी कर्म को ही तथा पौरुषवादी पौरुष को ही, और इस प्रकार ये एक-दूसरे के कारणत्व का निषेध करते हैं। अब यदि एक ही पुरुष अपेक्षाभेद के बिना इन पाँचों एकान्तवादों को मानने लगे तो परस्पर निषेधात्मक मतों का जमघट एक ही व्यक्ति के भीतर हो जायेगा। वह भले ही पाँचों को जगत् के कार्यों का कारण स्वीकार करे, किन्तु अपेक्षाभेद के बिना उनका परस्परनिषेधात्मक भाव समाप्त नहीं होगा। एक कारणैकान्त दूसरे का निषेध इसलिए करता है कि जिस कार्यविशेष को उत्पन्न करने की अपेक्षा उसका औचित्य है उस पर उसकी दृष्टि नहीं जाती। इसी प्रकार जिस कार्य विशेष को उत्पन्न न कर पाने की अपेक्षा स्वयं का कथंचित्त्व है उस पर भी दृष्टि नहीं जाती। अतः इस अपेक्षाभेद को उजागर किये बिना किसी भी कारण का औचित्य सिद्ध नहीं हो सकता और प्रत्येक कारण का औचित्य सिद्ध हुए बिना वे एक-दूसरे को स्वीकार्य नहीं हो सकते। अतः जब भिन्न-भिन्न कार्यों की अपेक्षा प्रत्येक का औचित्य प्रकट किया जायेगा, तभी इनकी परस्परनिषेधात्मक दृष्टि मिट सकती है और ये कारणैकान्त स्याद्वाद की माला में गुंथकर सम्यक् बन सकते हैं। ऐसा होने पर नियतिरूप कारण कर्मोदयजनित कार्यों का ही कारण सिद्ध होगा,' प्रत्येक कार्य का नहीं, जिससे एकान्तनियतिवाद का प्रसंग उपस्थित नहीं होगा। इसके Page #81 -------------------------------------------------------------------------- ________________ 80 : श्रमण/अक्टूबर-दिसम्बर/१६६७ विपरीत यदि काल को भी सभी कार्यों का कारण माना जाय, स्वभाव को भी सभी कार्यों का कारण माना जाय, नियति को भी सभी कार्यों का कारण स्वीकार किया जाय, पूर्वकृत कर्म को भी और पौरुष को भी तो यह एकान्तवादों का समवायमात्र होगा, समन्वय नहीं। संदर्भ१. (क) “सर्वं सदैव नियतं भवति स्वकीयकर्मोदयान्मरणजीवितदुःखसौख्यम् । समयसारकलश, १६८ (ख) "आर्हतानां किञ्चित् सुखदुःखादि नियतित एवं भवति तत्कारणस्य कर्मणः कस्मिंश्चिदवसरेऽवश्यम्भाव्युदय सद्भावान्नियतिकृतमित्युच्यते।" सूत्रकृतांगटीका, १/२/४ SS SRO S S HAR - पार्श्वनाथ विद्यापीठ में अध्ययनरत पूज्य साध्वीवृन्द एवं छात्र-छात्राएं। Page #82 -------------------------------------------------------------------------- ________________ श्रमण अड्डालिजीय गच्छ जैन परम्परा के श्वेताम्बर सम्प्रदाय में विभिन्न स्थानों के नाम से उद्भूत अल्पजीवी गच्छों में अड्डालिजीय गच्छ भी एक है । अडालज नामक स्थान से सम्बद्ध होने के कारण इस गच्छ का उक्त नामकरण हुआ होगा। अहमदाबाद के निकट 'अडालज' नामक स्थान है जो शायद यही हो सकता है। इस गच्छ से सम्बद्ध साक्ष्यों में मात्र चार अभिलेख ही प्राप्त होते हैं जो बढ़वाण स्थित एक जिनालय में परिकर एवं एक जिनप्रतिमा पर उत्कीर्ण हैं। मुनि विजयधर्म सूरि ने इनकी वाचना दी है, जो निम्नानुसार है:१. सं० ११३६ फाल्गुन वदि ४ श्री अड्डालिजीयगच्छे श्रीजीवदेवाचार्यसंताने कुंभानाजप्रतिबद्धसोढसुताशांतिना स्वस्वश्रेयोर्थं (स्वस्वश्रेयो ऽर्थ) श्रीशांतिनाथप्रतिमा कारापिता । परिकर के नीचे का लेख बड़ा जैन मंदिर, बढवाण २. सं० १२०७ चैत्र वदि ५ स ( 1 ) नौ श्रीअड्डालिजीयगच्छे श्री देवाचार्यसंताने श्रे० शांति दुहिता नामी सांपी स्वश्रेयोर्थं (स्वश्रेयो ऽर्थं ) श्री अजितनाथ - जिनयुगलं कारापितं | मंगलं महाश्री || अजितनाथ कीयुगल प्रतिमा पर उत्कीर्ण लेख बड़ा जैन मंदिर, बढवाण - शिवप्रसाद * ३. संवत् १२२८ फाल्गुन वदि ५ भो (भौ ) मे श्रीअड्डालिज्जगच्छे श्रीमोढवंशे श्रे० धांधू भार्या । चडवश्राविकया आत्मश्रेयोर्थं (आत्मश्रेयो ऽर्थं) श्री श्रेयांसप्रतिमा कारिता ।। परिकर के नीचे का लेख बड़ा जैन मंदिर, बढवाण ४. संवत् १२७३ वर्षे कार्तिक वदि ५ सोमे श्रीमोढ.. प्रवक्ता, पार्श्वनाथ विद्यापीठ । . श्रीअड्डालिज्जगच्छीय श्रे० Page #83 -------------------------------------------------------------------------- ________________ 82 : श्रमण/अक्टूबर-दिसम्बर/१६६७ आसादेवसुत श्रे० शांतिपुत्रेण व्य० उदयपातेन श्रे० षोहिणि स्वश्रेयोर्थं (स्वश्रेयोऽ६) श्रीमल्लिनाथजिनविंवं (बिंबं) कारितमिति। परिकर के नीचे का लेख बड़ा जैन मंदिर, बढवाण जैसा कि ऊपर हम देख चुके हैं प्रथम लेख में जो वि०सं० ११३६ का है, जीवदेवाचार्य की परम्परा के अनुयायी एक श्रावक द्वारा शांतिनाथ की प्रतिमा प्रतिष्ठापित करने की बात कही गयी है जबकि द्वितीय लेख में (जो वि०सं० १२०७ का है) देवसूरि की परम्परा के एक श्रावक द्वारा अजितनाथ की प्रतिमा प्रतिष्ठापित करने का उल्लेख है। श्वेताम्बर परम्परा में परकायप्रवेशविद्या में निपुण जीवदेवसरि नामक एक प्रभावक आचार्य हो चुके हैं। जो वायडगच्छ के आदिम आचार्य माने जाते हैं। उनका काल ईस्वी सन् की स्वीं-६वीं शताब्दी माना जाता है।३ यदि ऊपरकथित अभिलेखों में उल्लिखित जीवदेवसूरि और देवसूरि से वायडगच्छ के प्रवर्तक जीवदेवसूरि की ओर संकेत है तो यह कहा जासकता है कि वायडगच्छ या वायटीयगच्छ की एक शाखा के रूप में यह गच्छ अस्तित्व में आया होगा। इस गच्छ से सम्बद्ध तृतीय और चतुर्थ लेखों से भी ज्ञात होता है कि प्रतिमा । प्रतिष्ठा का कार्य इस गच्छ के मुनिजनों द्वारा नहीं बल्कि श्रावकों द्वारा ही सम्पन्न होता रहा। वि०सं० १२६३ के पश्चात् इस गच्छ से सम्बद्ध कोई साक्ष्य नहीं मिलता। अतः यह माना जा सकता है कि इस गच्छ के अनुयायी श्रमण विक्रम सम्वत की तेरहवीं शती के अन्त तक किन्हीं अन्य प्रभावशाली गच्छों में सम्मिलित हो गये होंगे। इस गच्छ के प्रवर्तक कौन थे! वायडगच्छ की एक शाखा के रूप में यह गच्छ कब अस्तित्व में आया, साक्ष्यों के अभाव में ये सभी प्रश्न अनुत्तरित ही रह जाते हैं। संदर्भ१. विजयधर्म सूरि-संपा० प्राचीनलेखसंग्रह, भाग १, यशोविजय जैन ग्रन्थमाला, भावनगर १६२६ ई०स०, लेखांक २,१०,२१,३२ २. प्रभावकचरित, संपा० मुनि जिनविजय, सिंघी जैन ग्रन्थमाला, ग्रन्थांक १३, कलकत्ता १६४० स०, पृष्ठ ४७-५३. "जीवदेवसूरिप्रबन्ध" प्रबन्धकोश, संपा० मुनि जिनविजय, सिंघी जैन ग्रन्थमाला, ग्रन्थांक ६, शांतिनिकेतन १६३५ ई०स०, पृष्ठ ७-६. 3. M.A. Dhaky- "Vayata-gaccha and Vayatiyacaityas" निर्ग्रन्थ, वर्ष २, १६६६ ई०स०, हिन्दी खण्ड, पृष्ठ ४०-४८. Page #84 -------------------------------------------------------------------------- ________________ श्रमण जर्मन जैन श्राविका डॉ० क्राउझे (सुश्री सुभद्रा देवी) -हजारीमल बांठिया विदेशी जैन विद्वानों में जर्मन की विदूषी डॉ० शर्लोटे क्राउझे ऐसी एक मात्र सर्वप्रथम महिला विद्वान् थीं जिन्होंने भारत में आकर अपने आपको जैन धर्म के प्रचार-प्रसार में समर्पित कर दिया। स्वयं इतिहासतत्त्वमहोदधि जैनाचार्य श्री विजयेन्द्र सूरीश्वर जी के कर कमलों से वि०सं० १९८२ की श्रावण बड़ी पंचमी के दिन नया शहर में पांच हजार जैन-जैनेतर जनता की उपस्थिति में विधिवत भगवान् जिनेन्द्रदेव की प्रतिमा को साक्षी मानकर जैनधर्म में दीक्षित हो गईं और अपना नाम भी भारतीय पद्धतिनुसार कु० सुभद्रा देवी रखकर जैन श्राविका बन गईं और चौथा ब्रह्मचर्यव्रत भी धारण कर लिया। डॉ० क्राउझे का जन्म मारबर्ग (जर्मनी) के पास लेपज़िग शहर में हुआ। आपकी प्रारंभिक शिक्षा वहीं हुई और आप "नासकेतरी राजस्थानी कथा" पर शोध निबन्ध लिखकर पी-एच०डी० की उपाधि ग्रहण कर, मारबर्ग विश्वविद्यालय, मारबर्ग में प्रो० जॉन हर्टेल के पास गुजराती, हिन्दी और संस्कृत में विशेष अध्ययन करने के लिये आ गईं। प्रो० हल ने अपनी बेटी की तरह अपने घर में ही रहने की इजाजत दे दी। प्रारंभ '* ५२/१६, शक्करपट्टी, कानपुर-२०८००१. Page #85 -------------------------------------------------------------------------- ________________ 84 : श्रमण/अक्टूबर-दिसम्बर/१९६७ से ही डॉ० क्राउझे मेधावी छात्रा थीं। जैनधर्म के प्रति आपके मन में असीम अनुराग पैदा हुआ और शास्त्र विशारद श्री विजयधर्म सूरि जी के साथ आपने पत्राचार के माध्यम से जैन धर्म की शिक्षा लेना प्रारंभ कर दिया। मारबर्ग विश्वविद्यालय से अपनी शिक्षा समाप्त कर आप सन् १६२५ में पारसी व जैनधर्म पर अध्ययन करने के लिए सर्वप्रथम बम्बई आईं और वहाँ कुछ दिन ठहर कर आचार्य श्री विजय धर्मसूरि जी के पाटवी शिष्य इतिहासतत्त्व- महोदथि जैनाचार्य श्री विजयेन्द्र सूरीश्वर जी के पास आबू में आईं। जैन धर्म साहित्य और जैन मुनियों के आचार और व्यवहार से प्रभावित होकर आपने जैनधर्म में दीक्षित होना भी स्वीकार कर लिया। शिवपुरी में स्थायी निवास बनाकर आगमों का अध्ययन उपाध्याय मुनि मंगल विजय जी के पास किया। शिवपुरी में आप ग्वालियर की महारानी सिंधिया सैर सपाटे के लिये अक्सर आती रहती थीं। उनसे सम्पर्क होने पर महारानी साहिबा के निर्देशानुसार ग्वालियर के शिक्षा विभाग में डिप्टी डाइरेक्टर पद पर नियुक्त हुईं और कुछ दिन उज्जैन में ही सिंधिया शोध-संस्थान में क्यूरेटर पद पर कार्यरत रहीं। आप जैन साहित्य व आगम का निरन्तर स्वाध्याय करती रहीं। जैनधर्म पर गुजरात, मध्य प्रदेश, कलकत्ता में कई जगह भाषण भी दिये जो इतने प्रभाविक रहे कि इनकी विद्वता की सुगन्ध सर्वत्र : फैलने लगी। डॉ० क्राउझे ने जो तीन महत्त्वपूर्ण भाषण दिये वे पुस्तिका के रूप में श्री यशोविजय जैन ग्रन्थमाला, भावनगर से प्रकाशित हुए। जिनके नाम इस प्रकार हैं 1. An Interpretation of Jaina ethics 2. A Kaleidoscope of Indian wisdom. 3. The Heritage of the last Arhat. जब ये पुस्तिकायें देश-विदेश भेजी गईं तो इनकी सर्वत्र प्रशंसा हुई। इनके प्रशंसकों में हेमबुर्ग (जर्मनी) के एल० ऑल्सडोर्फ, बोन (जर्मनी) के डॉ० हर्मन जैकोबी के अलावा नार्वे, स्वीडन, चेकोस्लोवाकिया, रूस, अमेरिका, इंग्लैण्ड, फ्रांस आदि के विदेशी विद्वान मुख्य थे। इनमें से कई विद्वानों ने डॉ० क्राउझे को बधाई देने के लिये आचार्य श्री विजयेन्द्रसूरि जी को पत्र दिये। ये पत्र “लेटर्स टू विजयेन्द्रसूरि" पुस्तक में सन् १६३६ में प्रकाशित हुए हैं। डॉ० क्राउझे के लेख सन् १६२२ से ही लेपज़िग की पत्र-पत्रिकाओं में छपने Page #86 -------------------------------------------------------------------------- ________________ जर्मन जैन श्राविका डॉ० शेर्लोट क्राउझे : 85 * लगे थे। सन् १६२५ में लेपज़िग की पत्रिका Asia Major (Phil. Hab. Schrift Vol Jun. 1923) में " नेसकेतरी कथा - एक राजस्थानी कहानी" व्याकरण की पूर्ण जानकारी के साथ छपी है। इसी कहानी पर डॉ० क्राउझे ने पी-एच०डी० की उपाधि प्राप्त की थी । सन् १९२५ में भारत आने के बाद इनके लेख गुजराती, हिन्दी और अंग्रेजी में, कलकत्ता रिव्यू जैनसत्यप्रकाश, अनेकान्त आदि पत्रिकाओं में छपे । सन् १६४४ में सिंधिया सरकार ने “विक्रमस्मृतिग्रन्थ" नामक महाग्रन्थ प्रकाशित किया जिसमें “जैन साहित्य और महाकाल मंदिर" पर ३० पृष्ठ का आपका बृहत् लेख नई शोध दिशा के साथ हिन्दी में प्रकाशित हुआ । लेख के अंत में डॉ० क्राउझे ने लिखा है- “भारतीय संस्कृति के प्रगाढ़ प्रेम से प्रेरित होकर मैंने विदेशी होते हुए भी यह निबन्ध हिन्दी में ही लिखा, अतः यदि इसमें कुछ त्रुटियां रह गयी हों तो पाठक क्षमा करें, ऐसी प्रार्थना है - लेखिका ।" जैनसत्यप्रकाश में तो इनके लेख सदा गुजराती भाषा में छपते थे । सन् १६४८ में उज्जैन से प्रकाशित “विक्रम वाल्यूम" में डॉ० क्राउझे का “सिद्धसेन दिवाकर और विक्रमादित्य” नामक शोधपूर्ण लेख छपा। इसके अतिरिक्त आपके अनेक शोधपूर्ण लेख अनेक पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हुये हैं । * सन् १६५० के दिनांक ५ अक्टूबर के एक पत्र में पू० मुनिराज विद्याविजयजी ने मुझको लिखा "डॉ० टैसीटोरी से भी कई गुनी सेवा जर्मन विदुषी डॉ० क्राउझे (सुभद्रा देवी ) ने की है और कर रही हैं। इनकी सेवा का कार्य इतना विशाल है कि जितना लिखा जाय, उतना कम है। इस समय ऐसी विदुषी की विद्वता का लाभ मध्य भारत सरकार काफी ले रही हैं। एज्यूकेशन डिप्टी डाइरेक्टर के ओहदे पर वह हैं। पांच सौ पच्चीस रुपये मिलते हैं। कोई हिन्दुस्तानी जो काम नहीं करता या नहीं कर सकता, वह काम डॉ० क्राउझे कर देती हैं और यशस्विनी बनती हैं। * प्रस्तुत लेख के परिशिष्ट में इनके प्रकाशित लेखों की सूची दी जा रही है, जिसे मारबर्ग (जर्मनी) की डॉ० लिटगार्ड सोनी ने तैयार की है और वह स्वयं डॉ० क्राउझे पर शोधात्मक जीवन-परिचय जर्मन भाषा में लिखने जा रही हैं। गत वर्ष वह अपने भारतीय पति डॉ० जयेन्द्र सोनी के साथ भारत भ्रमण पर आई थीं। वे डॉ० क्राउझे के सम्बन्ध में पूर्ण जानकारी प्राप्त करने के लिये शिवपुरी - ग्वालियर, झाँसी, पूना और हस्तिनापुर गई थीं। Page #87 -------------------------------------------------------------------------- ________________ 86 : श्रमण/अक्टूबर-दिसम्बर /१६६७ वि०सं० २००८ में स्वनामधन्य, जैन साहित्य महारथी श्री अगरचन्द नाही अपने पुत्र के विवाह के संदर्भ में जब ग्वालियर गये, तो वहां वे डॉ० क्राउझे को निमंत्रण देने उनके बंगले पर गये और फाटक खटखटा कर बोले-क्या बहिन जी भीतर हैं? जब डॉ० क्रउझे ने फाटक खोला तो देखा-श्री नाहटाजी खड़े हैं। डॉ० क्राउझे ने तत्काल कहा-भाई साहब! मुझे बहिन के नाम से शायद संबोधित करने वाले पहले व्यक्ति आप ही हैं। यहाँ के सभी जैन-जैनेतर, भाई-बहिन डाक्टर साहब कर ही मुझे सम्बोधित करते हैं। इस प्रकार डॉ क्राउझे एक अत्यन्त विनयशील विदुषी महिला थीं। डॉ० क्राउजे का निधन २८ जनवरी सन् १९८० में ग्वालियर में हुआ। वृद्धावस्था में कोई परिचारिका उपलब्ध न होने के कारण वे गिरजाघर चली गई थीं। वहीं उनका निधन हुआ। वहीं समाधि बनी हुई है। वर्तमान में राष्ट्रसंत जैनाचार्य श्री पद्मसागरसूरि जी से डॉ० क्राउझे के बारे में मैंने जानकारी चाही और उनसे डॉ० क्राउझे के बारे में एक संस्मरण लिखकर देने की आग्रहपूर्वक विनती की तो उन्होंने निम्न संस्मरण स्वहस्त लिखकर भेजा है, जो इस प्रकार हैश्रीमान् सुश्रावक श्री हजारीमलजी बांठिया, योग्य धर्मलाभ। डॉ० सुभद्रा देवी (शर्लोटे क्राउझे) के विषय में-इतना ही मैं लिखूगा कि बाल्य जीवन में जब मैं ७वीं कक्षा में, शिवपुरी श्री वीरतत्त्व प्रकाशन मंडल में छात्रावास में १६४६-५० में अभ्यास करता था, तब उन्हें नजदीक से देखने का अवसर मुझे मिला था। जिनेश्वर देव की भक्ति-पूजा साथ में करने का मौका भी मिला है। उनकी पूजा, चैत्यवंदन, स्तुति खूब भावपूर्ण और अनुमोदनीय थी। वे खूब भाव विभोर होकर पूजा करती थीं। बालकों के प्रति उनका स्नह भी प्रशंसनीय देखा। जब-जब उनका मुनिराज श्री विद्याविजय जी म० के दर्शनार्थ शिवपुरी आना होता तब बच्चों के लिये मिठाई-फल आदि कुछ न कुछ जरूर लेकर आती थीं। बच्चों के साथ में खेल में भी कई बार हिस्सा ले लेती थीं। हिन्दी-गुजराती भाषा का भी अच्छा ज्ञान था, उच्चारण भी सही करती थीं। उनका चेहरा भी उनकी धर्मप्रियता और सात्त्विकता का परिचय सहज ही देता था। मेरी स्मृति में आज तक उनकी भक्तिभावना जुड़ी हुई है, जो हमेशा जुड़ी रहेगी। -पद्मसागर सूरि Page #88 -------------------------------------------------------------------------- ________________ जर्मन जैन श्राविका डॉ० शेर्लोट क्राउझे : 87 वि०सं० १९८४ में उपाध्याय मुनि मंगलविजय जी ने शास्त्र विशारद श्री विजयधर्म सूरि जी के जीवन पर काव्यमय रास “धर्म जीवन प्रदीप" लिखा जो श्री यशोविजय जैन ग्रन्थमाला, भावनगर से सन् १६२८ में प्रकाशित हुआ था। इसके परिशिष्ट में इतिहास तत्त्व महोदधि आचार्य श्री विजयेन्द्र सूरि जी का भी संक्षिप्त जीवन परिचय काव्य में लिखा है। इस प्रकरण में उन्होंने जैन जर्मन श्राविका डॉ० सुभद्रा देवी रास (डॉ० शर्लोटे क्राउझे) गुजराती भाषा में प्रकाशित किया है। उसी को यथावत् मैं प्रस्तुत कर रहा हूँ जिससे पाठकगण स्वयं निर्णय कर सकेगें कि वह जर्मन श्राविका कितनी महान थीं और किस प्रकार उन्होंने जैन धर्म को ग्रहण किया तथा अपनी सेवायें दीं। जर्मन जैन श्राविका डॉ० सुभद्रादेवी रास (डा० शर्लोटे क्राउझे) दूहा सिंहावलोक न्याये करी, कहुं दत्तचित्त अवधार। यूरोपदेशीय मन धरी, कहुं किंचित अधिकार ।।१।। दृष्टि अभ्यासक मन करी, केईक करे त्यां अभ्यास । आचारे नहीं जैनता खरी, विचारक जैन केई खास ।।२।। पक्षपात मीशनरी घणों, स्कॉलर मां नहीं गंध। मध्यस्थ भाव स्कॉलर तणो, मीशनरी ते धर्मांध ।।३।। केई सरल स्वभावी घणां, यॉकोबी, हर्टेल, थोमस । बीजपण विद्वान् तणा, नाम उपलक्षे सुवास।।४।। हर्टेल-शिस्या मे खरी, जर्मनीमां सुप्रसिद्ध। अभ्यासक दृष्टि धरी, अभ्यास तिकां बहु किद्ध ।।५।। अभिधा जेहनी जाणे सहु, "क्रौजे" पी-एच०डी० धार । सर चालॉटे अवर बहु, यूरीपीयन नाम सार ।।६।। (ढाल-देसी) विलोकया शास्त्र अनेक दर्शननां, यूरापमां बहु बार रे। सहायक संस्कृत प्रोफेसरनां, टाइटल लॅपजिग अवधार रे।।१।। Page #89 -------------------------------------------------------------------------- ________________ 88 : श्रमण / अक्टूबर-दिसम्बर / १६६७ जर्मनदेश मां स्त्रीओने पदवी, हेवी बहु थोड़ी विचार रे । बुद्धि - चालाकी से श्रम त्यजावी, प्रसिद्ध करावी ते वार रे ।। २ ।। मारवाडी पुरातन भाषा मां, नासकेतरी कथा निबंध रे । अनुवाद कोश अने टिप्पणमां, निपुणता जाणो प्रबंध रे । । ३ । । पी-एच० डी० पदवी ते निबंधे, मेलवी सुखकर संबंधे रे । भाषा यूरोपनी साली ते धंधे, वाक् चातुरीना प्रबंधे रे || ४ || पत्र व्यवहार गुरुदेव साथे, चाले प्रश्नोत्तर संगाथे रे । प्रेमघणो गुरुदेव संगाथे, गुरु-वचन प्रमाण साथ रे । । ५ । । पारसी ने वली जैन धर्मना, अभ्यासे ते भारते आवेरे । विश्वविद्यालय अनुमति मानो, मुंबइमां प्रथम ते जावे रे।। ६ ।। आगमन पत्र खीवाणदी दीधो, विजेन्द्र सूरिजी ने सिध्धोरे। उतारो सकलात वालो नो लीघो, पारसी धर्मनो अभ्यास की धोरे ॥ ७ ॥ परिचय जैन श्रावको नी साथे, सूरिपत्र तणे अनुसारे रे । नागरदास सहायक संगाथे, गुजरात मुख्य नगर मां सार रे ।। ८ ।। भ्रमण करी सूरि-दर्शनकाजे, आबू तीर्थ मांहे सूरि राजे रे । दर्शन धर्म - चर्चा बहु राजे, सात दिवस त्यां स्थिरता छाजे रे ।। ६ ।। शिवपुरी मांहे अभ्यासनी काजै, शासन दीपक परिचय बाधे रे । प्राचीन रास उत्तराध्ययन राजे, अभ्यास प्रबल पणे छाजे रे ।। १० ।। आचार विचारे शुद्ध साधु निहाली, बीज श्रद्धातणां रोपाय रे । संवेग रंग वासनारढी आली, अंतर आतमे वास सुहाय रे ।।99 ।। साधु अने गृहस्थ धर्म आचारो, विद्या वारिधि समझावे प्यारो रे । श्रावक धर्म-ग्र - ग्रहण जिज्ञासा धारो, वधे प्रतिदिन ते मनोहारोरे ।। १२ ।। व्रतग्रहण- अभिलाषाओ आवे, नयांशहर सूरीश्वर पास रे । व्रत-स्वरूप खूब दृढ़ समझावे, जयंतविजय सुवास रे ।। १३ ।। श्रावण वदिपंचमी शुभ दिवसे, ब्यासी ओगणी संवत धार रे । शाहजी शाहना न्होराने विषे, प्रजा उलट तणो नहीं पार रे ।। १४ ।। पब्लीक जन पांच हजार जाणो, जैनेतर - बहुत अवधारो रे । मध्य मंडपमांहे नाण बखाणों, जिनराज चौमुखे अवधारो रे ।। १५ ।। Page #90 -------------------------------------------------------------------------- ________________ जर्मन जैन श्राविका डॉ० शेर्लोट क्राउझे : 89 शुद्धि क्रिया सुणे सहु शांत भावे, समकत चाला वो मुख्य धार रे। नाम निक्षेपों भारतीय भावे, देवी सुभद्रा अति मनोहार रे।।१६ ।। व्रताष्टक पण साथ विचारो, अभयचन्द्र तेहमां अवधारो रे। वीर-वाणी शुद्ध घोष प्रचारो, सूरीश्वर-मुखथी मनोहारो रे।।१७।। शुद्धि प्रथम ते जैनोमां जाणो, सूरीश्वर ने मल्यो सारोटाणो रे। भरतीयोनी घणी ने जाणो, यूरोपीयन प्रथम बखाणो रे।।१८ ।। जय जय कार नगर फेलाणो, मले भेद बहुत प्रमाणो रे। धर्म भगिनी सहु पहेचाणो, जैन धर्म व्याख्याने गवाणो रे।।१६ ।। देवी-व्याख्यान सुन्दर शैलीमां, जैन दर्शन बहु प्रमाणो रे। मध्यस्थ भाव अवर दर्शन मां, समभाव बहु उत्साही रे।।२०।। भेद भाव श्रावक नहीं राखे, साधर्मि-वात्सल्य सांचु ते दाखे रे। भोजन आमंत्रणमा बहाने, सत्कार सन्मान न छाने रे।।२१।। पर्युषण पर्व तिहांपूर्ण कीथां, व्याख्यानादिकनों लाभ लीधो रे। शिवपुरी मां पठन-काम सिध्यां, धर्म-रंग जामे प्रसिद्धा रे।।२२।। गुरुदेव-शिष्या मुख्यतेजाणो, विद्या गुरु वारिधि बखाणो रे। सिंदे सरकार महाराणी तणो, परिचय थी धर्म प्रेम जाणो रे।।२३।। एक सप्ताह सौपुर मां पधार्या, महाराणी आमंत्रण बखाणों रे। आचार विचारे देवी ने निहाल्यां, सवी मन आश्चर्य नो राणो रे।।२४।। ओध नियुक्ति सूत्र नो अभ्यास, मंगल विजय पास ते खास रे। रात दिवस ज्ञान ध्यान विलास, अवर नहीं मन वास रे।।२५ ।। व्रत नियम पाले बहु प्रिते, मोहमयी बिहार मां युक्त रे। छात्रों साथे ज्ञान-गोष्ठीने करते, व्याख्यान पब्लीक मां उद्युक्त रे।।२६ ।। ल्हावो धर्मोन्नतिनो सारो लीघौ, सदाचारिणी विदुषी जाणो रे। जहांगीर हॉल मां भाषण कीधुं श्रोताजने वचनामृत पीधुं रे।।२७।। रोम-रोम भाषणनी मांहे, जैनत्वपणुं बहु जलके रे। मौज शोख यूरोपनो त्यागी जैनधर्म माहे रटलागी रे।।२८ ।। धन्य देवी अम सहु गुण गावे, द्वेषी जवासा मुकाई जावे रे। गुजरातनी यात्राओ सिद्धायां, सवी नगरमां सन्मान पायां रे।।२६11 Page #91 -------------------------------------------------------------------------- ________________ 90 : श्रमण / अक्टूबर-दिसम्बर / १६६७ भावनगर मां सन्मान रूपालु, सूनावाला नो प्रेम निहालुं रे । भक्तिभाव सवी जनतारी धारे, धर्म मंगल मन अवधारो रे । । ३० ।। दूहा दैवी प्रकरण पूरण करी, प्रस्तुत विषय जवाय, सूरि आणा मनमां धरी, शिवपुरी विहार कराम । ।१ ।। हिमांशु शिष्य रत्न ग्रही; शासन दीपक नो बिहार, उपदेशे उपकार सही, मार्ग मां अनेक विचार ।।२ ।। रचियता - शास्त्र विशारद जैनाचार्य श्री विजय धर्म सूरि जी के शिष्य न्याय विशारद, न्याय तीर्थ उपाध्याय जी श्री मंगलविजय जी महाराज । "धर्म जीवन प्रदीप" वि०स० १६८४ में प्रकाशित - श्री यशोविजय जैन ग्रन्थमाला भावनगर से संकलित । उपरोक्त परिचय काव्य से स्पष्ट है कि डॉ० काउझे का जैन साहित्य को एक विशिष्ट अवदान रहा है। जैन समाज का कर्त्तव्य है कि ऐसी विदुषी विद्वान् श्राविका का समस्त साहित्य संग्रह कर एक पुस्तक के रूप में उनकी जीवनी और चित्रों सहित प्रकाशित करे। डॉ० क्राउझे की जो निजी लाइब्रेरी थी और उनका समस्त साहित्य भंडारकर रिसर्च इन्स्टीच्यूट, पूना को क्राउझे की वसीयत के अनुसार वहाँ गिरजाघर वालों ने भेज दिया। मुझे हर्ष है कि पार्श्वनाथ विद्यापीठ, वाराणसी के निदेशक डॉ० सागरमल जी जैन ने डॉ० क्राउझे के उपलब्ध साहित्य के संपादन और प्रकाशन के इस गुरुत्तर कार्य को निष्पादित करने के लिये अपनी स्वीकृति दे दी है। इस कार्य के लिये लगभग एक लाख रूपयों की आवश्यकता है। जैन समाज के साहित्य प्रेमी दानदाता उदार भाव से स्वतः प्रेरणा प्राप्त कर अपनी धनराशि के चेक या ड्राफ्ट पार्श्वनाथ विद्यापीठ, वाराणसी२२१००५ के नाम से बनाकर भेजें, ऐसा मेरा नम्र निवेदन है । Page #92 -------------------------------------------------------------------------- ________________ जर्मन जैन श्राविका डॉ० शेर्लोट क्राउझे : 91 BIBLIOGRAPHY Biliographie von Charlotte Krause colleted by Y. and J. Soni. 1922 (ubers.) Prinz Aghata. Die Abenteuer Ambadas. Indische Novellen 1. Leipzig: H. Haessel. 1924 Eine neue Pancatanatra-Mischrezension in Alt-Gujarātī in Streitberg-Festgabe. Leipzig Markert & Fetters Verlag. 1925 (hrsg.) Nāsaketarī kathā, an old Rrājasthāni Tale. Ed. with notes, a grammar and a glossary. Leipzig: Asia Major (Phil. Hab. Schrift vom Juni 1923). 1925 Buchbesprechung von R.E. Hume The Thirteen Principal Upanishads. In ZDMG 79, pp. 334-336. 1929 Jangal ma Mangala Shivpuri. 1928 Indo-Irania Fire Worship. In: The Samaldas College Magazine Vol XI September 1928 No. 1. pp. 1-23. 1929 An Interpretation of Jain Ethics. A Lecture. Bhavnagar: Shri Yashovijaya Jain Granthmala. 37pp. 1929 The Kaleidoscope of Indian Wisdom. A Lecture. Bhavnagar. 130 Buchbesprechung von L. Alsdorf Der Kumārapālapratibodha. In orientalistische Literaturzeitung 33 col. 672-674. 1930 Buchbesprechung von. A.A. Guerinot La Religion Jaina. In ZDMG 84 pp. 195-202. 1930 The Heritage of the Last Arhat. A Lecture. Bhavnagar: Shri Yashovijaya Jian Granthamala. 1930 The Social Atmosphere of Present Jainism, The Calcutta Review. 1930 Ādhunika Jaina Sāmājika Paristhiti. In: Anekanta P. 463470. Auch in: Prabhāt 1930, pp. 22-23. 1931 Individual and Society in Jainism The Calcutta Review. 1932 Pythagoras the Vegetarian. The Calcutta Review PP. 207-215. Page #93 -------------------------------------------------------------------------- ________________ 92 : 997/37767-fclfer/9EEV 1933 (Secd. ed.) Sayings of Vijaya Dharma Suri. Translated by Charlotte Krause. Bhavnagar. Shree Vijayadharmasuri Jain Granthmala7. 1934 The Jain Cannon and Early Indian Court Life. In: Calcutta Review 1934, pp.2-5. 1944 Jaina Sāhitya aor Mahākāla-mandir Smriti Grantha Ujjain. 1948 Siddasena Divakara and Vikramaditya Vikrama Volume Ujjain. 1945 Some Literature on Śsamkheśvar in Srī Jaina Satya Prakāśa, Ahmedabad Varşa 11, Anka 3, pp. 73-80. 1945 Śrī-Phalavarddhi-Pārsvanāth-Stuti in: Śrī Jaina Satya Prakāśa. Ahmedabad Varșa 11, Anka 4, pp. 138-142. 1946 Śrī-Hemavimalasuri's Ter Kāthīyānī Sajiyāy" in: Śrī Jaina Satya Prakāśa. Ahmedabad Varsa 12, Anka 5-6, pp. 161-164. 1951 Tran prācina Gujarātī Kệtioṁ Gujarāta Vidyā Sabhā Ahmedabad 1952 Ancient Jaina Hymns, crit. ed. with introd., discourses, notes and index. Ujjain: Scindia Oriental Series No. 2. 1954 Māndavagadhanā of Śrī Pramada-Pārsvadeva in srī Jaina Satya Prakash Ahmedabad Varsa 19, Anka 2-3, pp. 39-43. 1955 Jaina Dhanna Guruone Püjārī Tarīke Olakhāvyā in: ŚrīJaina Satya Prakāśa. Ahmedabad Anka 4, pp. 74-75. 1955 Jaina Kathā Sāhityanā Mahārathi, Professor Dr. Hertelnā Dehānta in: Śrī Jaina Satya Prakāśa. Ahmedabad Anka 4, p. 73. 0.J. New Light on the Vedic and Avestic Religions. Reprint from Triveni. Journal of Indian Renaissance. Madras. OJ. Jāvada of Mandu, Reprint from the Journal of the Madhya Pradesh Itihasa Parishad, Bhopal, No. IV o.J. Page #94 -------------------------------------------------------------------------- ________________ श्रमण जैन जगत् मणिधारी आचार्य श्री जिनचन्द्रसूरि जी म० का ८५७वां जन्मोत्सव सम्पन्न पटना, १० सितम्बर बेगमपुर, पटना स्थित चार सौ वर्ष प्राचीन दादावाड़ी में खरतरगच्छालंकार द्वितीय दादा गुरु आचार्य श्री जिनचन्द्रसूरि जी महाराज का ८५७वां जन्मोत्सव धूमधाम से मनाया गया। इस अवसर पर भजन-पूजन आदि के भव्य कार्यक्रम आयोजित किये गये जिसमें बड़ी संख्या में लोगों ने भाग लिया। ज्ञातव्य है कि इस दादावाड़ी में निःशुल्क चिकित्सालय एवं निःशुल्क टीकाकरण केन्द्र भी स्थापित हैं जिससे स्थानीय जन लाभान्वित होते हैं। * उदयपुर में आचार्य श्री देवेन्द्र मुनि का भव्य चातुर्मास उदयपुर में आचार्य श्री देवेन्द्र मुनि जी म०सा० के चातुर्मास के दौरान विविध कार्यक्रम आयोजित किये गये। महावीर युवा परिषद की ओर से सामूहिक क्षमापना पर्व का आयोजन किया गया जिसमें स्वेताम्बर और दिगम्बर परम्परा के पधारे हुए सन्तों और साध्वियों के मंगल प्रवचन हुए। इस अवसर पर आचार्यश्री ने अपने मननीय प्रवचन में विभिन्न रूपकों के माध्यम से 'क्षमा' का विशद विश्लेषण किया। अपने प्रवचन में उन्होंने जैन समाज की एकता पर बल देते हुए इसे अपरिहार्य बताया। दिनांक २ अक्टूबर को गांधी जयन्ती समारोह का आयोजन किया गया जिसमें आचार्यश्री ने महात्मा गांधी के जीवन दर्शन और आदर्शों पर प्रकाश डाला। इस अवसर पर पार्श्वनाथ विद्यापीठ के निदेशक, प्रखर वक्ता प्रो० सागरमल जैन भी उपस्थित थे। अपने ओजस्वी भाषण में प्रो० जैन ने कहा कि गांधीजी ने जैन धर्म के प्रमुख सिद्धान्त अहिंसा को न केवल पढ़ा या सुना बल्कि उसे व्यवहार रूप में परिणित भी किया। कार्यक्रम में अन्य वक्ताओं ने भी अपने विचार व्यक्त किये। Page #95 -------------------------------------------------------------------------- ________________ 94 : श्रमण/अक्टूबर-दिसम्बर/१६६७ दिनांक ५ अक्टूबर को आचार्य श्री के सान्निध्य में राजस्थान जैन महिलाअधिवेशन का आयोजन हुआ जिसमें आचार्यश्री ने जैनधर्म में नारी की महत्ता पर अनेक रूपकों के माध्यम से प्रकाश डाला। दिनांक १५-१६ अक्टूबर तक आचार्य श्री के सान्निध्य में उपाध्याय श्री पुष्कर मुनि जी म०सा० की ८६वीं जयन्ती मनायी गयी जिसमें देश के विभिन्न अंचलों से अधिकाधिक संख्या में श्रद्धालु एकत्र हुए। कार्तिकवदि १३ को आचार्य श्री का ६७वां जन्म दिवस सोल्लास मनाया गया। दीपावली और कार्तिकपूर्णिमा के अवसर पर भी आचार्य श्री के सानिध्य में विविध कार्यक्रम आयोजित किये गये। मुम्बई में पाण्डुलिपि प्रदर्शनी पर्युषण पर्व के पावन अवसर पर अनेकान्त ज्ञान मंदिर वीना (सागर) द्वारा ब्रह्मचारी संदीप जी 'सरल' के निर्देशन में महानगरी मुम्बई में प्राचीन हस्तलिखित पाण्डुलिपियों की भव्य प्रदर्शनी का आयोजन किया गया। श्रीचन्द्रप्रभ दि० जैन मंदिर, भूलेश्वर, मुम्बई के विशाल प्रांगण में मुनिश्री भूतवली सागर जी म० के सान्निध्य में ६ सितम्बर को प्रदर्शनी का शुभारम्भ हुआ। एक सप्ताह तक चलने वाली इस प्रदर्शनी का हजारों लोगों ने अवलोकन किया। अनेकान्त ज्ञान मंदिर द्वारा देश के अन्य नगरों में भी इसी प्रकार की प्रदर्शनी पूर्व में आयोजित की जा चुकी है। डा० सुधा जैन द्वारा प्रेक्षा-ध्यान प्रशिक्षण अणुव्रत अनुशास्ता श्री तुलसी के विद्वान् शिष्य मुनि श्री गुलाब चन्द्र निर्मोही' के सान्निध्य में उड़ीसा प्रान्त के कालाहॉडी जिले के केसिंगा ग्राम में पार्श्वनाथ विद्यापीठ, वाराणसी की प्रवक्ता डॉ० सुधा जैन ने दिनांक २७.१०.६७ से ३१.१०.६७ तक प्रतिदिन एक घंटे तक प्रेक्षाध्यान, आसन, प्राणायाम के बारे में वहाँ के लोगों को जानकारी दी तथा प्रयोगात्मक प्रशिक्षण भी दिया, जिसमें वहाँ की महिलाओं व कन्याओं ने उत्साहपूर्वक भाग लिया। आसन, प्राणायाम द्वारा विभिन्न रोगों से मुक्ति के विषय में प्रयोगात्मक रूप से अवगत कराया। केसिंगा में ही दिनांक ३१.१०.६७ को महावीर परिनिर्वाण दिवस पर मुनि श्री के सानिध्य में आयोजित कार्यक्रम में मंगलाचरण के पश्चात् उक्त संस्थान के प्रवक्ता डॉ० विजय कुमार ने 'जैनधर्म की प्रासंगिकता' विषय पर अपना वक्तव्य दिया। Page #96 -------------------------------------------------------------------------- ________________ जैन जगत् : 95 भानीय लोगों के वक्तव्य के बाद मुनि श्री गुलाबचन्द्र जी 'निर्मोही' ने 'भगवान महावीर की समन्वयात्मक दृष्टि' पर अपने सारगर्भित वक्तव्य से लोगों को लाभान्वित किया। कार्यक्रम का कुशल संचालन मुनि श्री विनोद कुमार 'विवेक' ने किया। अमृत महोत्सव परमारक्षत्रियोद्धारक, राष्ट्रसंत, तपागच्छीय आचार्य परममूज्य श्रीमद् विजयइन्द्रदिन सूरीश्वरजी महाराज का ७५ वां जन्मोत्सव कार्तिकावदि ६ को दिल्ली, पंजाब, राजस्थान और गुजरात के विभिन्न स्थानों में सोल्लास मनाया गया। इस पुनीत अवसर पर भव्य कार्यक्रम आयोजित किये गये। जैन हिन्दू ही हैं, हिन्दू समाज से भिन्न नहीं -श्री सौभाग्यमुनि 'कुमुद' भारतवर्ष में जैन संस्कृति हिन्दू समाज से अलग नहीं रही है, जैन समाज सदियों से हिन्दू ही माना जाता रहा है। दोनों ही संस्कृतियों में खानपान, रहन-सहन, "वेशभूषा सभी कुछ एक ही है, साथ ही जैन समाज अपने व्यावहारिक कार्यकलाप जैसे शादी विवाह, मरणोत्तर क्रियाएं आदि हिन्दू-विधियों के अनुसार ही करता है। लौकिक त्योहार, उत्सव आदि भी आम हिन्दुओं के साथ ही मनाता रहा है। फिर यह हिन्दुओं से अलग कैसे? उक्त विचार श्रमणसंघीय महामंत्री श्री सौभाग्य मुनिजी “कुमुद" ने धुलिया में १ नवम्बर १९६७ को देश के कोने-कोने से आये जैन धर्मावलम्बियों की धर्मसभा में व्यक्त किये। मुनि कुमुद जी ने कहा कि भारत की चार संस्कृतियां हैं: हिन्दू, इस्लाम, पर्सिया और आंग्ल । इस्लाम, पर्सिया और आंग्ल ये तीन संस्कृतियां भारत को बाहर से प्राप्त हुई हैं। हिन्दू संस्कृति भारत की संस्कृति है। जैन, वैदिक, बौद्ध, सिक्ख उसी संस्कृति के अंग हैं। उपासना पद्धति के आधार पर किसी संस्कृति को टुकड़ों में बाँटते जाना बिल्कुल उचित नहीं है। मुनिश्री ने सभा को संबोधित करते हुए कहा है कि जैन अपने अनुयायियों की संख्या सीमित में हो सकते हैं किन्तु वे हिन्दू संस्कृति के ही अंग हैं। Page #97 -------------------------------------------------------------------------- ________________ 96 : श्रमण/अक्टूबर-दिसम्बर/१६६७ मुम्बई में अभूतपूर्व अहिंसा रैली मुम्बई, २० अक्टूबर राजस्थान में जैन प्रतिमाओं को खंडित करने और जीवदया के कार्य में लगे सामाजिक कार्यकर्ताओं पर हो रहे हमले तथा महाराष्ट्र में जीवदया कानून के न लागू होने से आहत हुई जैन समाज की भावनाओं के प्रदर्शन हेतु एक विशाल एवं अभूतपूर्व रैली का आयोजन किया गया। इसमें जैन समाज के प्रमुख नेता श्री दीपचंद गार्डी, श्री भरत शाह, श्रीकनकराज लोढा, श्री जवाहर शाह, श्री किशोर एम० वर्धन, श्री प्रताप भेगीलाल, श्री ताराचंद्र संघवी आदि उपस्थित थे। प्रमुख आचार्य श्री यशोवर्म सूरि जी म०सा०, आचार्य प्रद्युम्न विमल जी म०सा०, पंयास अरूण विजय जी म० आदि ने रैली का मार्गदर्शन किया। महाराष्ट्र के मुख्य मंत्री श्री मनोहर जोशी, शिक्षा मंत्री श्री राणेदत्ता आदि ने भी इस रैली को सम्बोधित किया। महाकवि आरसी-साहित्य शोध-संस्थान की स्थापना युगपुरुष, पुण्यश्लोक, महाकवि स्व० श्री आरसी प्रसाद सिंह के बहुआयामी व्यक्तित्व एवं कृतियों के समग्र मूल्यांकन तथा उनकी बहुपथीय साहित्य-साधना पर गवेषणा की दृष्टि डालने के लिये, शोधप्रज्ञों को प्रोत्साहित करने और उनके साहित्य को जन-जन तक पहुँचाने के लिए इस शोध संस्थान की स्थापना की गयी है। यह अत्यन्त हर्ष का विषय है कि बिहार राष्ट्र भाषा परिषद, पटना के पूर्व संचालक सुविख्यात लेखक स्वनामधन्य डा० श्रीरंजन सूरि देव इस शोध संस्थान के निदेशक नियुक्त किये गये हैं। श्री दादावाडी पारमार्थिक ट्रस्ट का सराहनीय कार्य श्री दादावाडी पारमार्थिक ट्रस्ट, इन्दौर के तत्त्वावधान में यहाँ रामबाग स्थित दादावाडी में मालवा क्षेत्र के तीर्थों पर आने वाले श्वे० तीर्थ यात्रियों की सुविथा को ध्यान में रखते हुए भोजन एवं निवास की समुचित व्यवस्था की गयी है। समस्त श्वे० जैन तीर्थयात्री इससे लाभ उठा सकते हैं। श्री दादाबाड़ी पारमार्थिक ट्रस्ट इसके लिए बधाई का पात्र है। जैन पत्र-पत्रिकाओं की सूची महाराष्ट्र जैन साहित्य परिषद्, कोल्हापुर और जैन सहयोग, पुणे के संयुक्त तत्वावधान में ६,१० और ११ जनवरी १६६८ को महाराष्ट्र की सांस्कृतिक राजधानी Page #98 -------------------------------------------------------------------------- ________________ जैन जगत् : 97 पुणे में ग्यारहवां अखिल भारतीय मराठी जैन साहित्य सम्मेलन आयोजित किया गया है जिसमें महाराष्ट्र, उत्तर कर्नाटक, गोवा, सीमावर्ती मध्य प्रदेश और आन्ध्र प्रदेश के हजारों साहित्यप्रेमी उपस्थित होंगे। इस अवसर पर विभिन्न भाषाओं में प्रकाशित होने वाली समग्र जैन पत्र-पत्रिकाओं और पुस्तक प्रकाशकों की एक बृहद् सूची प्रकाशित की जायेगी। सामायिक सूत्र निःशुल्क भेंट उपाध्याय प्रवर श्री कन्हैया लाल जी 'कमल' के सुशिष्य श्री विनय मुनि जी म० 'वागीश' द्वारा सम्पादित सामायिक सूत्र निःशुल्क उपलब्ध है। इच्छुक व्यक्ति निम्न पते पर सम्पर्क करेंडॉ० सोहल लाल जी संचेती, चांदी हाल, केशरवाडी, जोधपुर-राजस्थान ३४२००२. शोक समाचार श्री विजय कुमार जैन मोतीवाला की पुण्य स्मृति में सामूहिक श्रद्धाञ्जलि समारोह समाज रत्न,दानवीर, सुश्रावक श्री विजय कुमार जैन मोतीवाला की पुण्य स्मृति में रविवार २३ नवम्बर १९६७ प्रातः ६.३० बजे महावीर सीनियर माडल स्कूल, दिल्ली के विशाल प्रांगण में एक प्रार्थना सभा आयोजित की गयी। प्रार्थना सभा राष्ट्रसन्त, पूज्य प्रवर्तक भण्डारी श्री पदमचन्द जी महाराज एवम् पूज्य प्रवर्तक श्री कुन्दन ऋषि जी म० के पावन सान्निध्य एवं जैन समाज की विभिन्न संस्थाओं के अनेक प्रतिनिधियों की उपस्थिति में सम्पन्न हुई। इस अवसर पर अनेक साधु एवं साध्वीवृन्द ने अपने अमृत प्रवचन एवं पावन संदेश दिए। अत्यन्त मृदुभाषी, कर्मठ समाज सेवी श्री मोतीवाला पार्श्वनाथ विद्यापीठ से भी जुड़े रहे। आप १६८६ से १९६१ तक विद्यापीठ की प्रबन्ध समिति के अध्यक्ष पद पर रहे। इस अवधि में विद्यापीठ की शैक्षणिक एवं सांस्कृतिक उपलब्धियां उल्लेखनीय रहीं। आपकी असामयिक मृत्यु का दुःखद • समाचार पूरे विद्यापीठ परिवार को मर्माहत कर गया। विद्यापीठ में शोक सभा का आयोजन कर ऐसे पुण्यात्मा को भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित की गयी। Page #99 -------------------------------------------------------------------------- ________________ श्रमण सम्मान एवं पुरस्कार प्रो० सागरमल जैन को आचार्य हस्ति स्मृति सम्मान पीपाड़ सिटी, ११ अक्टूबर, पार्श्वनाथ विद्यापीठ के लिये यह अत्यन्त हर्ष और गौरव का विषय है कि संस्थान के निदेशक प्रो० सागरमल जैन को जैन धर्म, दर्शन, साहित्य, संस्कृति आदि के क्षेत्र में सर्वोत्कृष्ट सेवा के लिए सम्यग्ज्ञान प्रचारक मंडल, जयपुर द्वारा राजस्थान प्रान्त के पीपाड़ शहर में एक भव्य समारोह में आचार्य हस्ति स्मृति सम्मान १६६४ से सम्मानित किया गया। डॉ० जैन इसके पूर्व भी अनेक पुरस्कारों से सम्मानित किए जा चुके हैं। ज्ञातव्य है कि इसी अवसर पर जैन विद्या के मूर्धन्य मनीषी पद्मभूषण पं० दलसुखभाई मालवणिया, अहमदाबाद, प्रो० प्रेमसुमन जैन, उदयपुर और प्रो० भागचन्द्र जैन 'भास्कर' भी इसी पुरस्कार से अलग-अलग वर्षों के लिए सम्मानित किये गये । युवाचार्य महाश्रमण को हार्दिक बधाई आपका ( युवाचार्य महाश्रमण ) जन्म वि०सं० २०१६ वैशाख शुक्ला नवमी ( १३ मई, १६६२) को सरदार शहर में हुआ। आपका बचपन का नाम मोहन लाल था । बाल्यकाल से ही आपमें अलौकिक एवं विलक्षण प्रतिभाएँ विद्यमान थीं। बारह वर्ष की अवस्था में आपके मन में वैराग्य का अंकुर फूटा और आपने अपने मन की भावना तत्कालीन आचार्य श्री तुलसी के समक्ष रखी । आपकी प्रतिभा से परिचय के पश्चात् आचार्य श्री ने आपको दीक्षित होने की संतुति दे दी। वि०सं० २०३१ . Page #100 -------------------------------------------------------------------------- ________________ जैन जगत् : 99 शाख शुक्ला चतुर्दशी (५, मई १६७४, रविवार) के दिन सरदार शहर की पुण्य भूमि पर मुनि श्री सुमेरमल जी (लाडनूं) के सान्निध्य में आपकी मुनि दीक्षा हुई। मुनि सुमेरमल जी के निर्देशन में वर्षों तक स्वाध्याय करने के पश्चात् वि०सं० २०४१ ज्येष्ठ कृष्णा अष्टमी को आप पंचमी समिति के पात्रसंवाहक के लिए व्यक्तिगत सेवा हेतु नियुक्त किये गये । तेरापंथ धर्मसंघ में इस नियुक्ति का विशेष महत्त्व है। समय के साथ-साथ आप हिन्दी, संस्कृत और प्राकृत भाषाओं को भी अधिकृत करते गये। जैसे-जैसे आपकी अर्हताएँ एवं क्षमताएँ बढ़ती गयीं संघीय दायित्व भी आपसे जुड़ते गए । वि० सं० २०४२ माघ शुक्ला सप्तमी ( १६ फरवरी १६८६) उदयपुर, मर्यादा महोत्सव के पावन अवसर पर आप युवाचार्य महाप्रज्ञ के अंतरंग सहयोगी बनाये गये जिसका दायित्व आपने पूर्णतः वहन किया। वि०सं० २०४३ वैशाख शुक्ला चतुर्थी ( १४ मई १८८६ ) को अक्षय तृतीया के सुअवसर पर व्यावर में आप ग्रुप लीडर बनाये गये तथा वि०सं० २०४६ भाद्र शुक्ला नवमी (६ सितम्बर १९८६) को लाडनू में योगक्षेम वर्ष में आचार्य श्री तुलसी के पदारोहण दिवस पर मंगल गीतों और मंगल स्तवना के बीच आप महाश्रमण के पद पर प्रतिष्ठित किये गये। वरीयताक्रम में महाश्रमण का पद आचार्य और युवाचार्य के बाद तीसरे स्थान पर आता है। महाश्रमण के रूप में आपने तीन स्वतंत्र और महत्त्वपूर्ण यात्रायें कीं- प्रथम यात्रा फरवरी-मार्च १९८६ में लाडनू से डूंगर गढ़, सरदार शहर होते हुए छोटी खाटू तक, द्वितीय यात्रा नवम्बर-दिसम्बर में सिंवाची - मलानी क्षेत्र में हुई, तीसरी यात्रा २५ नवम्बर से ४ जनवरी ६५ तक दिल्ली के उपनगरों में हुई । समय तीव्र गति से बढ़ता गया और महाश्रमण मुदित कुमार लघुता से प्रभुता और बिन्दु से सिन्धु बनने की निर्विघ्न यात्रा पर अग्रसर होते हुए १४ सितम्बर १६६७ (वि०सं० २०५४ भाद्र शुक्ला द्वादशी ) को युवाचार्य पद पर प्रतिष्ठित हुए । महाश्रमण मुदित कुमार के युवाचार्य पद पर प्रतिष्ठित होने पर पार्श्वनाथ विद्यापीठ परिवार की ओर से उन्हें हार्दिक बधाई । भव्य अनुमोदना - बहुमान समारोह अंचलगच्छाधिपति आचार्य श्री गुणसागर सूरीश्वर जी म० के शिष्य गणिवर श्री महोदय सागर जी म० की प्रेरणा से श्री कस्तूर प्रकाशन ट्रस्ट (मुम्बई) और श्री गुणीजन भक्ति ट्रस्ट ( अहमदाबाद) के संयुक्त तत्त्वावधान में भाद्रपद सुदि १५ को श्री शंखेश्वर महातीर्थ में एक भव्य अनुमोदना - बहुमान समारोह का आयोजन किया गया । इस समारोह में जैनेतर कुल में उत्पन्न किन्तु जिनशासन के विशिष्ट आराधक ८५ व्यक्तियों Page #101 -------------------------------------------------------------------------- ________________ 10) : श्रमण/अक्टूबर-दिसम्बर/१६६७ का बहुमान किया गया। इस अवसर पर पूज्य गणिवर्य जी द्वारा प्रणीत बहुरला वसुंधरा, भाग ३-४ और भाग १-४ के संयुक्तांक का भी विमोचन किया गया। श्री श्रेणिक कस्तूर भाई, श्री किशोर एम० वर्धन आदि अनेक गण्यमान्य व्यक्ति इस समारोह में उपस्थित थे। श्री हस्तिमलजी मुणोत अध्यक्ष निर्वाचित हैदराबाद २१ सितम्बर अखिल भारतीय श्वे० स्थानकवासी जैन कान्फ्रेन्स द्वारा आयोजित सम्मेलन के अवसर पर श्री हस्तिमल जी मुणोत सर्वसम्मति से अध्यक्ष निर्वाचित किये गये। इस अवसर पर निवर्तमान अध्यक्ष श्रीवंकटलालजी कोठारी, श्री रतनचंदजी वोहरा, श्री नृपराजजी जैन, श्री जे०डी० जैन, श्रीसम्पतलाल जी डूंगरवाल आदि ने माल्यार्पण कर श्री मुणोत का अभिनंदन किया। श्री मुणोत द्वारा इस अवसर पर उपयोगी ३१ सूत्री कार्यक्रम की घोषणा की गयी। अहिंसा इन्टरनेशनल वार्षिक पुरस्कार अहिंसा इन्टरनेशनल द्वारा निम्न तीन वार्षिक पुरस्कारों (वर्ष १६६७) के लिए नाम आमंत्रित हैं: १. २१,०००/- का अहिंसा इन्टरनेशनल डिप्टीमल जैन साहित्य पुरस्कार यह जैन साहित्य के विद्वान् को उनके समग्र साहित्य अथवा एकल कृति की श्रेष्ठता के आधार पर दिया जाएगा। (लिखित पुस्तकों की सूची तथा अपनी एकल कृति या दो श्रेष्ठ पुस्तकों का भेजना आवश्यक है।) २. ११,०००/- का अहिंसा इन्टरनेशनल भगवानदास शोभालाल जैन शाकाहार पुरस्कार यह शाकाहार प्रसार के क्षेत्र में कार्य कर रहे कर्मठ कार्यकर्ता को उनके कार्य की श्रेष्ठता के आधार पर दिया जाएगा। ३. ११,०००/- का अहिंसा इन्टरनेशनल रघुबीरसिंह जैन जीव रक्षा पुरस्कार यह जीवरक्षा के क्षेत्र में कार्य कर रहे कर्मठ कार्यकर्ता को उसके कार्य की श्रेष्टता के आधार पर दिया जाएमा। नाम का सुझाव स्वयं लेखक/कार्यकर्ता/संस्था अथवा अन्य व्यक्ति द्वारा ३० नवम्बर, १९६७ तक निम्न पते पर लेखक/कार्यकर्ता के पूरे नाम व पते, जीवन-परिचय (संबंधित क्षेत्र में कार्य सहित) व पासपोर्ट आकार के फोटो सहित आमंत्रित है। पुरस्कार २२ फरवरी, १६६८ को नई दिल्ली में रजत जयंती समारोह पर भेंट किए Page #102 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ● जाएंगे। सतीश कुमार जैन, सेक्रेटरी जनरल, अहिंसा इन्टरनेशनल, ५३, ऋषभ विहार, famil-9900€2. जैन जगत् : 101 Announcement of Mahāvīra Awards 1998 Bhagavana Mahāvīra Foundation, Chennai, has issued announcement inviting nonminations for its annual Mahāvīra Awards for Excellence in Human Endeavour for the year 1998. The Foundation in its endeavour to recognise, promote and preseve excellence in Human Endeavour in the spheres of propagatin of Non-violence, Vegetarianism, Education, Medicine, Community and Social Service and other objects for the advancement of general public utility with emphasis on the benefits of such endeavours reaching the poor and downtrodden, has insituted Mahāvīra Awards. Each of the three Awards consists of a Cash Prize of Rs.5 lacs, a Scroll and a Statuette of Bhagavāna Mahāvīra. The three Awards arc (1) for Excellence in the sphere of propagation of Non-violence, Truth and Vegetarianism, (2) for Exceellence in the field of Education and Medicine and (3) for Excellence in the sphere of Conmmunity and Social Service. The evaluation will be done by a Selection Committee, of which Sri C. Subramaniam, Former Governor of Maharastra, is the Chairman and includes other persons of eminence. Nominations should contain details of the name and address of the individual, biographical sketch of the individual and in case of institutions, date of establishment, names of Governing body members, awards or honours already conferred, copies of three years audited balance sheets with a write up justifying as to how the individuals/institutions work fulfills the objects of the Award with specific details as to how the activities benefitted the society. Name, address, and occupation of the sponsors who reconmmends the individual/institution may also be given. Self sponsored nominations will nbot be accepted. The completed nomination may be sent to the Foundation, P.O.Box 2983, 170, Triplicane High Road, Chennai, 600005. The last date for receipt of the nominations is 15th January 1998. Page #103 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Page #104 -------------------------------------------------------------------------- ________________ श्रमण पुस्तक-समीक्षा युगद्रष्टा आचार्य श्री : अध्ययन और अवदान- लेखक - डॉ० राजेन्द्र मुनि, प्रकाशक -: -श्री तारक गुरु जैन ग्रन्थालय, शास्त्री सर्कल, गुरु पुष्कर मार्ग, उदयपुर (राज०), प्रथम संस्करण, कुल पृष्ठ-३८४, आकार - डिमाई, मूल्य १००/- रुपये ! प्रस्तुत पुस्तक के लेखक हैं महोपाध्याय डॉ० राजेन्द्र मुनि जी । युगद्रष्टा पूज्य आचार्य श्री देवेन्द्र मुनि जी जाने माने संत और चिन्तक हैं। उनकी साहित्य साधना का एक विशाल क्षेत्र है। उनकी विभिन्न महत्त्वपूर्ण रचनाओं पर दिये गये विद्वानों के मतों को देखते हुए यह कहना मुश्किल है कि उनकी कौन सी रचना किस ऊँचाई पर है I इस सन्दर्भ में गोस्वामी तुलसीदास जी की पंक्ति याद आती है- "को बड़ छोट कहत अपराध" । विभिन्न अवसरों पर उन महान कृतियों को देखने का भी सौभाग्य प्राप्त हुआ है। उनमें से बहुत तो ऐसी हैं जो अपने आप में पी-एच०डी० शोध-प्रबन्ध के लिए पर्याप्त हैं। यदि आचार्य श्री के चिन्तन और लेखन की विभिन्न विधाओं को एक-एक कर अध्ययन किया जाए तो वे डी० लिट्० शोध प्रबन्धों के लिए पर्याप्त सामग्रियों रखती हैं। परन्तु प्रस्तुत पुस्तक में उन समस्त सामग्रियों को अति संक्षिप्त रूप देकर विवेचित करने का प्रयास किया गया है। इससे एक ओर तो आचार्य श्री की साहित्यिक विशालता के प्रति होने वाला न्याय आशंका की परिधि में आ जाता है वहीं दूसरी ओर गागर में सागर भरने की उक्ति चरितार्थ होती है । लेखक ने आचार्य श्री की रचनाओं में पायी जाने वाली विधाओं को वर्गीकृत करके उनके महत्त्वों पर प्रकाश डालने का सफल प्रयास किया है, जैसे- “उनके ( आचार्य श्री ) समग्र निबन्ध विचारप्रधान, आध्यात्मिक, समीक्षात्मक तथा गवेषणात्मक "सभी उपन्यासों का आधार है पौराणिक, ऐतिहासिक तथा धार्मिक"- पं० देवेन्द्र मुनि शास्त्री लिखित कहानियाँ प्राचीन कहानियों का नवीन संस्करण हैं- “आदि । पुस्तक की भाषा आदि देखने से ऐसा लगता है कि लेखक डॉ० राजेन्द्र मुनि जी के परिचय में प्राप्त यह उक्ति "जब आपका प्रवचन होता है तो ऐसा लगता है आपकी वाणी के द्वारा माँ सरस्वती अवतरित हो रही हैं" सत्य ही है। प्रस्तुत रचना के लिए मुनिश्री को बधाई । पुस्तक की छपाई एवं बाह्याकृति आकर्षक है। Page #105 -------------------------------------------------------------------------- ________________ 104 : श्रमण/अक्टूबर-दिसम्बर/१६६७ हरख पत्रावली- लेखक-हरख चन्द बोथरा, प्रकाशक-हीरा भैया प्रकाशन ६५, पत्रकारकालोनी, कनाड़िया मार्ग, इन्दौर-१, प्रथम संस्करण, मूल्य-एक रु०, आकार-डिमाई। प्रस्तुत रचना 'हरख पत्रावली' स्वर्गीय श्री हरखचन्द बोथरा के पत्रों का संग्रह है। बोथरा जी परिवार में रहते हुए भी संत की तरह जीवन व्यतीत करते थे। उनके पत्रों में साधारण पारिवारिक बातों से ज्यादा आत्मा, सत्य, पुरुषार्थ, मोक्ष आदि के विवेचन हैं, जो उनकी सामाजिक, धार्मिक एवं दार्शनिक भावनाओं को प्रस्तुत करते हैं। यह पुस्तक विद्वानों एवं सामान्य लोगों के लिए भी अति उपयोगी है। आशा है इसे पाठकों द्वारा प्रसंशा प्राप्त होगी। इस कार्य के लिए पत्रों के संकलनकर्ता बधाई के पात्र हैं। __-डॉ० सुधा जैन Asceticism In Ancient India by Dr. Yugal Kishore Mishra, Published by Research Institute of Prakrit Jainology and Ahimsa, Vaishali, 1987, page-119, Price Rs. 38.00. The book "Asceticism In Ancient India" is the published form of the Ph.D. thesis submitted by Dr. Yugal Kishore Mishra to Bihar University, Muzaffarpur. It consists of five chapters namely Introduction, The Ascetic Ideals and Practices, The relation of Asceticism to Religion and Philosophy, A critique of the Ascetic Tradition and Asceticism and Society. Asceticism matters much in Indian thinking. Dr. Mishra, in the different chapters of his book, has focused upon asceticism from various angles of philolsophy, religion, society etc. which may be remarked as a valuable contribution to the subject delt with. Hope, among scholars Dr. Mishra will be honoured for this illuminating work and I also congratulate him whole heartedly. -Dr. Bashistha Narayan Sinha Page #106 -------------------------------------------------------------------------- ________________ 105 : श्रमण/अक्टूबर-दिसम्बर/१६६७ -- L . डॉ० सागरमल जैन अभिनन्दन ग्रंथ पार्श्वनाथ विद्यापीठ, आई०टी०आई० मार्ग, करौंदी वाराणसी-२२१००५. दूरभाष- ०५४२-३१६५२१, ३१८०४६ पार्श्वनाथ विद्यापीठ के हीरक जयन्ती के शुभ अवसर पर (मार्च, १६६८) पार्श्वनाथ विद्यापीठ की प्रबन्ध समिति ने जैन धर्म एवं दर्शन के मर्मज्ञ मनीषी एवं संस्थान के निदेशक डॉ० सागरमल जैन का अभिनन्दन ग्रंथ प्रकाशित करने का निर्णय लिया है। यह अभिनन्दन ग्रंथ मुख्य रूप से तीन खण्डों में विभाजित होगा। प्रथम खण्ड डॉ० जैन के व्यक्तित्व एवं कृतित्व से सम्बन्धित होगा, जिसमें विद्वानों एवं शुभेक्षुओं द्वारा आमंत्रित अभिनन्दन ग्रन्थ समिति आपके व्यक्तित्व एवं कृतित्व के विभिन्न पहलुओं को रेखांकित करने वाले संस्मरण/लेख संगृहीत होंगे। दूसरे खण्ड में आपकी रचनाओं पर विद्वानों द्वारा प्राप्त समीक्षाओं का समावेश होगा। अध्यक्ष तीसरे खण्ड में डॉ० जैन के कुछ चुने हुए शोघ लेखों का श्री नेमिनाथ जैन | संकलन होगा। ___ एतद् द्वारा डॉ० सागरमल जैन के विराट व्यक्तित्व से उपाध्यक्ष | सम्बन्धित विद्वानों/सामाजिक कार्यकर्ताओं की शुभाशंसाएं/ श्री भूपेन्द्र नाथ जैन श्री नृपराज जैन संस्मरण/आलेख आदि आमंत्रित हैं। कृपया अपने संस्मरण/समीक्षा/सुभाशंसाएं/आलेख कोषाध्यक्ष | आदि १० फरवरी १६६८ तक भेज कर हमें अनुगृहीत करें। श्री इन्द्रभूति बरड़ डॉ० श्रीप्रकाश पाण्डेय प्रबन्ध सम्पादक डॉ० सागरमल जैन अभिनन्दन ग्रंथ प्रबन्ध सम्पादक डॉ० श्रीप्रकाश पाण्डेय पार्श्वनाथ विद्यापीठ, करौंदी, पोस्ट-बी०एच०यू०, वाराणसी-२२१००५। Page #107 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ŚRAMANA Third Monthly Research Journal of Pārsvanatha Vidyapitha Vol-48] Number 10-12 General Editor Prof. Sagaramal Jain Editors Dr. Ashok Kumar Singh Dr. Shriprakash Pandey For publishing Articles, News, Advertisement and Membership, Contant General Editor Śramaṇa Pārśvanātha Vidyāpītha I.T.I. Road, Karaundi P.O. B.H.U. Varanasi- 221 005 Phone: 316521, 318046 For Institutions For Individual Single Issue [October-December 1997 Annual Subscription For Institutions For Individual : : Life Membership : . Rs. 60.00 Rs. 50.00 Rs. 15.00 Rs. 1000.00. Rs. 500.00 Page #108 -------------------------------------------------------------------------- ________________ (Sramana Astaka Prakaraņa: An Introduction Dr. Ashok Kumar Singh* Ācārya Haribhadra, one of the most prominent Jaina Ācārya and the most prolific writer was born in Cittauda or a place nearby. Very scanty informations are available about his life. As established by Muni Jinavijayajī, it is generally agreed that he lived between 753 to 827 A.D. His mother was Gangābāi and his father was Sankara Bhatta. He was Brahmin by caste. He became Royal priest of the king Jitāri of Cittauda . He had vowed that he would become the pupil of him or her whose sayings he would not comprehend. The well-known dramatic incidence of his life, of not fully grasping the Prākşta Gāthā, recited by Yākinī Mahattarā, a Jaina nun, made him the disciple of a Jaina monk Jinabhattasüri. This change over of a Great scholar, Royal priest and above all a rudite Brahmin, was not merely a change of faith but was a new birth to him. Infact, it was a spiritual rebirth which gave a new direction to his life and thought. He was transformed totally but he retained all, that was best in him along with his previous thoughts and beliefs. The new impact of Jainism made him more inclined to devote all his might and main to philosophic and religious pursuits. His works are testimony to his genius and mainly consist of religious stories, philosophical treatises, discourses, exhortations on right conduct and on Yoga. He has composed * Senior Lecturer, Pāršavnatha Vitdyāpītha. Page #109 -------------------------------------------------------------------------- ________________ 108 : श्रमण/अक्टूबर-दिसम्बर / १६६७ a number of Prakarana works also viz. Aşṭaka Prakaraṇa, Şoḍaśaka Prakaraṇa, Viṁśativiņśikā and Pāṇcāśāka also. Presently, the subject matter, in brief, of Aṣṭaka Prakaraṇa, composed in Sanskrit, containing 258 verses, is being given. It is a compendium of 32 prakaranas dealing with different topics. Each contains eight verses hence Aṣṭaka, except, last 32nd which contains 10 verses. The title of the Aṣṭakas are: (1) Mahādevāṣṭakaṁ, (2) Snānāṣṭakaṁ, (3) Püjāṣṭakam, (4) Agnikārikāṣṭakam, (5) Bhikṣāṣṭakam, (6) Sarvasampatakarībhikṣāṣṭakaṁ, (7) Pracchannabhojanāṣṭakam, (8) Pratyakhyānāṣṭakaṁ, (9) Jñānāṣṭakam, (10) Vairagyaṣṭakaṁ, (11) Tapāṣṭakam, (12) Vādāṣṭakaṁ, (13) Dharmavādāṣṭakaṁ, (14) Ekanityapakṣakhaṇḍanāṣṭkaṁ, (15) Anityapakṣakhaṇḍanāṣṭakaṁ, (16) Nityānityapakṣamaṇḍanāṣṭakaṁ, (17) Mansabhakṣaṇadúṣaṇāṣṭakam, (18) Mansabhakṣaṇadüṣaṇāṣṭakaṁ, (19) Madyapānadüṣaṇāṣṭakam, (20) Maithunadüṣaṇāṣṭakaṁ, (21) Sükṣmabuddhyaśrayaṇāṣṭakaṁ, (22) Bhāvaśudhivicārāṣṭakam, (23) Śāsanamālinyaniṣedhāṣṭakaṁ, Page #110 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Aṣṭaka Prakaraṇa: An Introduction : 109 (24) Punyanubandhipuṇyādivivaraṇāṣtakaṁ, (25) Punyānubandhipuṇyafalāṣṭakaṁ, (26) Tirthakṛddānamahatthvasiddhyāṣṭakaṁ, (27) Tirthakṛddānaniṣphalatäparihārāṣṭakaṁ, (28) Rājyādidānepi Tirthakṛto Doṣābhāvapratipādanāṣṭakaṁ, (29) Sāmāyikasvarüpanirüpaṇāṣṭakaṁ, (30) Kevalajñānāṣṭakaṁ, (31) Tirthakṛddeśanāṣṭakaṁ and (32) Mokṣāṣṭakaṁ. In the first, Mahādevāṣṭakaṁ Acārya Haribhadra describes the virtues, good deeds and mode of worship of great Lord (Mahadeva). He is free from attachment, hatred, passions and miserable Karma- particles. The Great Lord is Omniscient, calm and intelligent. He possesses eternal bliss and is venerable for all the deities. To practise, according to canons, is the best and only mode of his worship. His sermons are bound to annihilate the birth-cycle. The second Snanāṣṭakaṁ deals with bathing or ablution. Bathing is of two types: physical and mental, categorised as external and spiritual in non-Jaina systems. Physical bathing causes purity of partial body only and that too, merely, for a few moments. It is the instrumental cause of mental bath. Physical bath, of house-holders, followed by worship of deities and monks, is auspicious. This bath is prohibited for monks who are preached to perform mental bath with meditation like water. Real bather is the one, wholly free from impurity and not sticking to it again. The third, Püjāṣṭakaṁ deals with two-fold worship; impure and pure, means of heaven and salvation (svarga mokṣa), respectively. The former is performed with flowers of Jasmines etc. and is the cause of auspicious bondage while the pure worship is performed with eight abstract flowers viz. nonviolence, truth, non-stealing, celibacy, non-possession, devotion Page #111 -------------------------------------------------------------------------- ________________ 110 : 277/374577-F224492/9EEL of teacher, penances and cognition. By pure worship, modes of soul, become auspicous, which ultimately leads to salvation. In the fourth, Agnikārikastakaṁ, fire has been depicted two fold as sacrificial and spiritual or psychic. Monks are preached to kindle the spiritual fire with analytic meditation and fuel of karmas. Initiation is the cause of salvation. Good fortunes attained by sacrificial fire beget sin. Haribhadra refutes others contention that seen is annihilated by charity. He opines that sin is destroyed only by penances. According to Ācārya, practising the path of liberation, generally, yields more auspicious and sinless fortunes, in form of right fairth, knowledge and conduct samyag darśana Jñāna cāritra. Fifth, Bhikṣāṣtakaṁ- deals with three fold beggings; Sarvasampatkarī, Pauruşaghnī and Vrttibhikṣā. The first one brings all types of fortunes of this world and the next. The second Pauruşaghni is manhood or vịrile destroying and the third Vrttibhikṣā is the begging for livelihood. That of an ideal monk, made for Sthaviras- elder monks etc., is the first one and is likely to bring glory to Jina-order. That of a monk, practising vicious and violent-ridden conduct for supporting his life, is cate gorised as Pauruşaghnī and is bound to cause disgrace to Jina-order. The third one-Vrttibhikṣā, is the begging by those poor, blind and crippled ones, unable to carry on with other activities of livelihood. It is considered better than Paurușaghnī. The sixth, Sarvasampatkarībhikṣāṣtakaṁ deals mainly with refutation of opponents' view that virtuous food is not at all practical. Opponents maintain that unavailability of virtuous food, essential for ideal begging of monks, also mars the attainment of Omniscience. As in the absence of virtuous food, the conduct of monks can never be virtuous and this eventually results in the negation of Omniscience itself. Ācārya Haribhadra establishes the feasibility of virtuous food and thus the attainment of Omniscience. Page #112 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Astaka Prakaraņa: An Introduction : 111 The seventh, 'Pracchannabhojanāștakam, describes that waking food by monks, in open, is not proper. A monk should always take food unobserved or in private. Monk's taking food in open is harmful in both ways. In case, he offers food to beggars etc. he would bind auspicious bondage. His denial is likely to invite beggar's hostility towards Jina-order. To avoid this, a monk should always take food in private, an ideal option for him (monk). The eighth, 'Pratyākhyānāştakam' depicts it (repudiation) as two fold: physical as well as mental, Physical repudiation is observed with worldly aspirations. But this (worldly) aspiration, in any form, is discarded in the mental one. There are certain obstacles in the observence of mental repudiation such as worldly desires etc. Repudiation of non-liberatable ones, aiming at superattainments is, infact, not mental repudiation. Repudiation should be observed duly with proper rituals, otherwise, its effect may be adverse. It is not auspicious if it lacks discretion, devotion to Jina-order and is augumented by desire for salvation. Physical repudiation occurs due to the rise of miserable karman and want of immense virility. The conduct of one, observing mental repudiation would naturally become right. The ninth Jñānāsțakam depicts knowledge as three-fold: subject-semblence, self-manifestation and the perception of reality. The first one may be compared with that of an infantine about poison etc. It is the cause of great sin. The second, selfmanifestation, is the knowledge of one, subdued by sins. It is also vilified by evils etc. The conduct of one possessing this knowledge is righteous. It causes auspicious bondage and often leads to renunciation. The perception of reality is related to the tranquil one, with righteous conduct. One's conduct, blessed with this conation, is pure. It is the determinant knowledge of undesirables etc. and the cause of emancipation. The tenth Vairāgyāstakaṁ describes renunciation of three types: mournful meditation, delusion- infested and imbued with Page #113 -------------------------------------------------------------------------- ________________ 112 : 477/377987T-Facy*/9EEL right knowledge. The meditation caused by the loss of favourites etc, is mournful meditation. It leads, sometimes, to suicide etc. One's detatchment from this world swayed by heretic dogmas, is delusion-infected renunciation. Contrary to these, if one renounces the world, on realisation that soul's affliction is due to the cycle of birth, it is renunciation in true sense, imbued with right knowledge. It ensues from the enlightened knowledge of Reals. In the eleventh Tapāstakam Haribhadra refutes the opponent's contention, 'austerity is nothing but affliction like that of an oxen etc'. Against it, Ācārya argues that if we identify misery with penances, all the miserable creatures will become devout. According to Acārya, their opponent's) proposition also implies that all hellish beings would be considered great devouts and conversely, ascetics, blessed with the pleasure of tranquility, as non-devouts. Their view, that austerity, neither proved logically nor depicted in canons, is injurious to soul, is also refuted. The twelfth Vādāstakaṁ' categorises Vāda (Discussion or debate) as three-fold: Dry discussion, Disputation and Virtuous or Righteous Discussion. When a Jaina monk debates with extremely arrogant debator, hostile to Jina religion, it is Dry Discussion. In this debate if monk prevails, the subjugated one may take recourse to suicide etc. while the defeat of monk is likely to cause disgrace to the Jina-order. The second type of debate, called Disputation, is predominated by trick or fallacy and futile reply. This debate is unadvisable to monk because victory by fair means is rare here. Lastly, that between a monk and an intelligent and impartial one, having knowledge of his sacred books, is called Righteous Debate. According to the thirteenth 'Dharmavādāștakaṁ' the topic or theme of the religious or virtuous debate is useful for Page #114 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Aṣṭaka Prakarana: An Introduction 113 emancipation. It comprehends the virtues, essential for religious conduct of respective systems i.e. Jaina, Bauddha, Samkhya Vaiseṣika etc. Acarya suggests that discussion on the definition of valid knowledge etc. is futile. The real nature of objects, as preached by seer's etc. ought to be contemplated, vigilantly and impartially by righteous and religious ones. The fourteenth, 'Ekäntanityapakṣakhaṇḍanāṣṭaka' refutes the absolute view of exclusively eternal soul advocatedby some systems. According to Acarya, soul being inert violence etc. are not applicable therein. implies that non-violence, truth etc. also do not occur in the soul, as postulated by them. Again, this negation of violence etc., in turn, led to the negation of all Yamas and Niyamas. Ultimately, association of the body with absolutely eternal soul is also proved illogical. In the same way, the of soul's all- pervasiveness or omni-presence, makes its world-cycle untenable. In 14th and 15th Nityapakṣakhaṇḍanāṣṭakaṁ and 'Anityapakṣakhaṇḍanāṣṭakam', respectively, Acarya Haribhadra refutes the postulates of those considering soul as absolutely eternal, permanent, inert etc. as well as of those contemplating soul as absolutely impermanent etc. In the 16th 'Nityānityapakṣamaṇḍanāṣṭakaṁ, Haribhadra propounds that in the soul, of permanent-cum-changeable nature and identical-cum-different from body, violence etc. do occur. Though main cause of violence is the fruition of one's karman yet killer is the efficient cause. The act of violence is carried out due to agitation in mind. Vicious feeling is subsided by righteous preaching etc. and by auspicious disposition of mind. Acarya further maintains that eternal-cum-changeable etc. nature of soul is established by memory, retention, tangibility and also by tradition. Both 17th and 18th Aṣṭakas are entitled as 'Mānsabhakṣaṇa-düṣaṇāṣtakaṁ'. A verse occured in Vișnusmrti Page #115 -------------------------------------------------------------------------- ________________ 114 : श्रमण / अक्टूबर-दिसम्बर / १६६७ depicts, that meat-eating, consuming liquor and coupulation s not sinful but abstention from it brings great rewards. In both of these Aṣṭakas, Haribhadra refutes the arguments put forward by advocates of meat-eating. The adherents of meat-eating, plead that as milk, the constituent of the body of cow and rice, the part of the body of one-sensed sentient paddy etc. are eatable, in the same way meat also, being the limb of the body of cow, is eatable. Against this Haribhadra argues that in this world all the provisions, pertaining to edibles, and inedibles are made according to canons and common practices, hence, meat-eating is not justified on the ground of being a limb or the constituent of a creature only. He further refutes their view by citing a verse from the Vişnusmrti itself. Me he will devour in the next world, whose flesh, I eat in this (life). To the Acārya, it is a clear decree forbidding meat-eating. After refuting the view, meat-eating is not sinful, in the 19th Madyapānaüṣaṇāsṭakaṁ' Haribhadra contends that consuming of liquor is hazardous and is a mine of sins. He says that even telling its vices is futile because its vices and hazards are obvious. To illustrate, the fatal consequences of consuming liquord he cites an example, from Hindu Mythology, of a great sage (Rși) who fell in hell due to consuming liquor. The 20th 'Maithunaduṣaṇāṣṭakaṁ' treats the last assumption of the verse of Viṣṇusmrti 'there is no sin in coupulation.' Refuting it Haribhadra says that passion is the cause of sexual carnality. An activity caused by passion can never be sinless. The pious objective and special occasion prescribed for carnal intercourse in Vișnusmrti itself is a proof that this acivity is a rare one. He cites an instance given by great sages. This intercourse is the destroyer of creatures like penetration of heated iron-rod into pipe. Therefore, intercourse.. is the cause of vices. Page #116 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Aṣṭaka Prakaraṇa: An Introduction : 115 In this 21st 'Sükṣmabuddhyāṣrayaṇāṣṭakam' Haribhadra preaches to examine minutely, the propriety of the vow or volition before adapting it. Misapprehension or wrong comprehension is likely to mar the virtuous objective of vow. The defects of observing a vow without reflecting on its pros and cons is thus illustrated. A monk, having taken a vow to give medicine to some sicks, is grieved if he does not find the object (sick monk) within stipulated period of vow. Otherwise, a situation of non-illness, is ideal. Thus a volited act of benevolence not thought of carefully may, in reality desire the harm of others. He preaches that the acts of charity etc. also should be carefully, performed completely in tune with canonical preachings. The 22nd Bhāvaśuddhivicārāṣṭakam' describes that 'Bhāvaśuddhi or auspicious disposition of mind follows the path of liberation. It delights in the preachings of canons and is free from the prejudices. The rise, in the causes of impurity of mind viz. attachments, hatred and delusion, makes the purity of mind, impossible. The subservience to or high respect towards enlightened one leads to the subsidience in delusion. This subservience to the more virtuous is the prime condition of attaining purity of mind. Acārya says that a monk holding, the virtuous ones, in high esteem is likely to attain purity of mind. The 23rd Śāsanamālinyaniṣedhāṣṭakaṁ maintains that one should try his best not to malign the Jina-order. It (maligning) is the prime cause of sin. In maligning the Jinaorder, even ignorantly, one becomes the cause of perversity in other creatures and is himself the subject to the bondage of intense deluding karman. On the contrary, the one, contributing in the elevation of Jina-order, thus being instrumental in the attainment of right faith by others, attains this himself which ultimately bestows the bliss of salvation. The 24th 'Punyānubandhipuṇyādivivaraṇāṣṭakaṁ', Page #117 -------------------------------------------------------------------------- ________________ 116 : $907/3186 cp-faktepe/9EEL depicts that men should, by all means, pratice virtuous deeds, causing auspicious bondage. It rewards non-decaying good fortunes. Ācārya maintains that because of the auspicious bondage one transmigrates to a better birth after the present one. On the contrary, inauspicious bondage causes more inauspicious birth after the present one. Auspicious bondage is the outcome of the purity of thought, which, in turn, is caused by adhering to canons and by obeying the elder monks. In the 25th 'Punyānubandhipunyafalāşakaṁ Ācārya advocates that auspicious bondage is not detrimental in pursuing the pure religion. Acārya opines that such activities as the service of parents etc. is proper. It is, virtually, the excellent primary benediction of the renunciation. He goes to the extent of proclaiming that the auspicious bondage bestows the most excellent reward i.e. Seerhood. This 26th Tirthakrddānamahatvasuddhyaştakam' aims at establishing that alms given by Mahāvīra, the 24th Tirthařkara at the time of renunciation, may be categorised as Great. Some (Buddhists) contend that since alms of Boddhisattvas, depicted in Buddhist canons is innumerable, hence that may be categorised as Great. But, the amount of the alms made by Tirthaṁkara being explicitly mentioned, it can not be termed as Great. Refuting them Acārya claims that Seer's alms are magnanimous on two accounts, firstly- want of alms-seekers and secondly, his declaration, 'ask for alms, ask for alms'. In the 27th Tirthakrddānanisphalatāparihārāșțakaṁ' opponent's contention is refuted. Tirthamkara is likely to get emancipation in the same birth, hence, his act of charity is futile is refuted. Acārya says that charity is made by Great Souls because of their is compassionate disposition of mind. Infact, accumulated karmas are destructed due to this charity. The 28th RājyādidānêpiTīrthakrtaDoşābhāvapratipādanāștakarn' propounds that it is not proper to denounce the Page #118 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Astaka Prakarana: An Introduction : 117 grant of state etc. to other (successor) because throne is full of great sins. Haribhadra maintains that, in case, state etc. is abandoned masterless, it will lead to chaos and ultimately to considerable loss of the life and property. Thus grant of the state to others, is in the interest of the people. Acārya also justifies marriage by Great souls. The 29th, Sāmāyikasvarüpanirüpaņāstakar depicts the nature and characteristics of equanimity (Sāmāyika). Those having attained equanimity resemble the Sandal, in nature. This (equanimity), of auspicious nature, should not be misunderstood with the inagnamity caused auspicious mind. The equanimous one is disinterested in wishing harm towards even ill-doer. Ācārya cites a volition, attributed to Bodhisattvas. "May all the vicious conduct of the world descent on me, and as an effect of my righteous conduct, all the worldly creatures, attain salvation. This volition is in the opinion of Haribhadra, a prayer by a house-holdder for (attaining) enlightenment etc. The 30th, 'Kevalajnāñāstakam' depicts that soul, purified by equanimity and wholly free from destructive karmas, attains Ominscience, the illuminator of the universe and the nonuniverse. The Omniscience, though intrinsic nature of soul, is covered with karmic impurity. This karmic impurity is to be eliminated in the same way, as the impurity of rays of gems is removed through creating devices. Haribhadra also argues that analogy of moonlight with Ominiscience is not a complete analogy This 31st, Tirthakrddeśanāsțakam' narrates the effect of religious sermon on creature and the reason as to why Tirthařkara is engaged in it (deśanā). Haribhadra says that the rise of Tirthařkaranāmakarma causes even the detached Tīrthaṁkara, to be engaged in religious sermon. A single speech of that Great soul (Tirthamkara) is capable of illustrating simultaneously the path of welfare to the Page #119 -------------------------------------------------------------------------- ________________ 118 : 97401/377 -fa14&R/9€€6 numerous living beings, as well as a multitude of subjects. If not-liberatable ones (abhavyas) are unable to comprehend of his sermon, it is their fault, like the owls are unable to see the light. The last one, Mokṣāṣtakan, containing ten verses, instead of eight, describes the characteristics of liberation. It also refutes other contention of others that in the absence of food etc., emancipated ones can not attain bliss. Haribhadra says that liberation is blessed with absolute bliss, never mingled with miseries and is, never decayed after origination. Thus Aștaka Prakaraṇa, contains topics, independent of each other and each of its prakraņas are unit by itself. But these may be considered as inter-connected also because all of these deal with practical aspect of Jaina conduct and aim at teaching the monks as well as laities to become righteous ones; examine their conduct and thought minutely in the light of provisions of canons. Haribhadra, tries to clear the misgivings, caused by wrong arguments of heretics, pertaining to some significant aspects of Jaina conduct. Another feature of this Aşřka Prakaraṇa which attracts our attention is the self imposedbrevity or condition of dealing one topic in 8 verses only. We find that sometimes brevity is a handicap as it leads to the unintelligibility of the theme which can not be appreciated. But still this remains a very useful and valuable work of the genious Ācārya that is Haribhadra. Page #120 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Navatattvaprakaraña (A Manual of Nine Categories of Truth) Translated by: Dr. Shriprakash Pandey Publisher: Pārsvanātha Vidyāpītha Varanasi-221005 Page #121 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Book Navatattvaprakaraņa Translated by : Dr. Shriprakash Pandey Publisher Pārsvanātha Vidyāpītha I.T.I. Road, Karaundi, Varanasi-5 Phone 316521-318046 First Edition : 1998 Price : Rs. 40/ Composed at : Sun Computer Softech Naria, Varanasi-5 Phone-318698. Printed at i Vardhaman Mudranalaya Bhelupur, Varanasi-10 Page #122 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Publisher's Note Navatattvaprakarana is an important work of Jaina philosophical literature. It mainly deals with concept of Navatatn'as (nine categories of truth), considered as a core of Jaina Philosophy. Besides, being short in size, it is equally important both, for an inquisitive and an ascetic. A number of translations of this text, particularly in Hindi and Gujarati have been broughtout, but no serious efforts were made for its English translation. Pārsvanātha Vidyāpītha feels emense pleasure in bringing out this title, for the first time with Sanskrit cchāyā, Roman transliteration and English translation. We are very thankful to Dr. Shriprakash Pandey, who has hot only rendered this text into English but also managed it through the press. Our thanks are also due to Sun Computer Softech and Vardhamana Mudranalaya for its beautiful composing and excellent printing respectively. B.N. Jain Secretary Pārsvanātha Vidyāpītha Page #123 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Preface Navatattvaprakaraña is an important work of Jaina philosophical literature. Dealing with nine tattavas (categories of truth) this work is based on the premise that the goal of human life is complete eradication of sorrows and sufferings i.e. to attain salvation, possible only by treading on the path of triple jewels (ratna-traya)- right faith (samyagdarśana), right knowledge (samyag-jñāna) and right conduct (samyag cāritrā), which collectively constitute the path of liberation. Out of these three jewels right faith is to believe in tattvas (categories of truth). As the great exponent of Jaina philosophy and monk Acārya Umāsvāti has rightly observed in his famous work Tattvārthasütra tattvārthaśraddhānamsamyagdarśanam. (1.2) Therefore, the true knowledge of the tattvas (categories of truth) is considered of great importance for attainment of salvation, which the said work deals with. The word "tattva" is derived from the Sanskrit word tat with the suffix tva, which connotes the meaning as tasyabhāvaḥ tattvam' i.e. the first principle or category of truth. In Jainism the word tattva, sat, artha, Padārtha and tattvārtha have been used in various context as synonyms of the word Reality or its equivalent term. Generally, Jainas do not make any distinction among substance, reality, existence etc. Ācārya Umāsvāti has used the word tattvārtha, sat and dravya in similar way, in the context of substance. Ācārya Nemicandra has mentioned dychotomous division of tattva into jīva (living) and ajīva (non-living) as dravyas. In Jaina canons dravya (substance) is classified as of six types- Jiva, ajīva, dharma, adharma, pudgala and kāla while tattvas are said to be of nine, viz. 1. cxistence of soul (Jiva) 2. existence of non-santient entity (ajīva--matter, time, sapce, medium of rest, medium of motion). 3. auspicious karma (punya) 4. inauspicious karma (pāpa) the inflow of karmic particles towards the soul (āśrava) 6. stoppage of inflow of karmic particles (samvara) annihilation of karmic particles (nirjarā) 8. binding of karmic particles with the soul (bandha) - M Page #124 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ii: Navatattva Prakarana liberation (mokşa)* These are the nine tattvas (categories of truth) discussed elaborately in Jaina Canons. We have references of seven tattvas also. Infact, there are three fundamental approaches regarding number of tattvas. From the point of view of cosmic order there are only two fundamental categories of truth- Jiva (living entity) and ajīva (nonliving entity). From ontological point of view, considering especially spiritual phenomenon the tattvas are of seven types. viz--Jiva, ajīva, āśrava (influx of Karmas), bandha (bondage of Karmas), sarvara (stoppage of Karmas), nirjarā (annihilation of Karmas) and mokşa (libaration). If we consider it from the religious point of tiew, we have nine tattvas (categories of truth) which, besides above seven, includes two more-punya (auspicious Karmas) and pāpa (inauspicious Karmas). From metaphysical and spiritual point of view the second classification is well received by scholors. However, in Jaina āgmas the third tradition is often used. The Bhagavatī, Prajñāpanā, Uttarādhyayana have mentioned nine categories of tattvas. The Sthānanga mentions two fold classification- Jiva and ajīva. Acārya Nemicandra in his Dravyasarngraha has also advocated this two fold classification. ācārya Umāsvāti in his famous tretise Tattvārtha Sütra has included punya and pāpa in äsrava and mentioned the seven fold classification. The brief account of these nine categories of truth is as under: (1) Jiva (Soul) Jiva is essentially a unit of consciousness which is potentially endowed with infinitevision (anantadarśana), infiniteknowledge (ananta jñāna), infinite power (ananta vīrya), infinite bliss (ananta sukha). It has neither beginning nor end. It is eternal and infinite in number. Jivas have been classified broadly into two types-- those are in bondage (baddha or Saṁsāri) and those are liberated (mukta). The samsārījīvas are classified into six types according to their nature of body they possess-as prthvīkāya (earth bodied) (2) apakāya(water bodied), (3) tejaskāya(fire bodied) (4) * The order of tattvas differs in many of the editions of Navttava prakarna. In all the editions, the order of Jiva and ajīva is first and second respectively. But in some of the editions puna and pāpa or included before the āśrava and bandha while in some, they are included after the catogries of aśrava and bandha. Page #125 -------------------------------------------------------------------------- ________________ vāyukāya (air bodied), (5) vanspatikāya (vegetable kingdom) and (6) trasakāya(moveable ones). The state of liberated soul is characterised by its freedom from disease, being without body, without experience of misery, the enjoyment of perfect bliss, possessing perfect knowledge, intution and free from rebirth and highest state of perfection. It is formless but the karmic matter associated with the soul shapes itself into subtle body and clings the soul and binds it in cycle of birth and death. When karmas are completely annihilated, the soulbecomes liberated and establishes itself in anantacatuștaya (four infinites) with all its potential and qualities fully developed (2) Ajiva (Non- sentient entity) The class of non-sentient entity is called ajīva. It is constituted by pudgal(matter), Dharma(medium of motion), Adharma(mediumofrest), Akāśa (space) and kāla(time). The matter is non-living stuff possessed of senses qualities with varied fuction of power. The principle of medium of restand medium of motion fecilitate all movements and static states, in the physical Universe. All these substances are accommodated in Ākāsa (space) and it is the principleoftime, which marks the continuity or change in the substances and their modes becauseitis constituted of guņa(quality and puryāya(modes) both. (3-4) Punya and Pāpa (auspicious and inauspicious karmas) In Jainism punya and pāpa as conceived and interpreted in their scriptural texts and legendary accounts, are mostly centered around the word caritra which has the the word 'conduct' for its english equivalents. Both are notonly relativebutcontrary terms as well, each presupposing the other. Punya is moral strength while pāpa is moral weakness. It is the preponderance of the senses, and sensibility over reason: it is rebellion of the lower insticts and impulse against the moral good and duty. The only notabalefactor which is found commensurate in both punya and pāpaisthe free will of agent who performs the same, just as punya is really a punya when it is performed willingly, so pāpais pāpaonly when it is committed voluntarily. Both auspicious and inauspicious tendencies come under ásrave (influx of karma). Auspicious and inauspicious karma only means that time karnapudgala which are attracted by psychological, physiological and vocaltendencies of ātman.Punyacan be aquired by the auspicious deeds Page #126 -------------------------------------------------------------------------- ________________ iv: Navatattva Prakarana as to have sympathy and kindness towards poor, philonthropic deeds etc. 'described as of 42 types. On the other hand demeritorious karmas or pāpa are said to be of eighty two types (see verce 18-19). (5) Aśrava (influx of Karmas) Aśrava is inflow of karmic particles towards the soul. As in pond water comes through a channel so the karmas come to the atman through the Aśrava. Forty two different channels conduct the influx of karmas into the soul which are mysterious determinant of the condition of the soul. Influx of karmas deviates the soul from its real nature. The requisitive power which galvanise the soul draw in matters from without is-mithyātva (wrong belief), avirati (vowlessness), pramāda (nigligence), kaṣāya (passions and yoga (functional activities of mind, speech and body. The soul being attracted by these elements comes transformed into magnet as were and attracts the karma praticles towards it. The physical conditon which magnetise the soul to attract foregin elements is bhāvāśrava (the subjective influx) and the foreign matter that is actually drawn into by the soul to accumulate there in state of satta (existence) is called drayāśrava (objective influx) which results ultimately in bondage (bandha). (6) Samvara (prevention of inflow of karmic particles towards the soul). Samvara prevents the inflow of karmic praticles towards the soul. It is of two types- (1) dravya (objective) and bhāva (subjective) samvara. Objective samvara means the actually shutting up the channels against further influx of fresh karmic particles. By subjective influx we mean the kind of conscious and voluntary striving, mental and moral, on the part of soul, to arrest the influx partially or wholly. The samvara is of fifty seven types- those are five samitis (vigilences), three guptis (self restraints), ten fold yatidharma, twelve bhāvanās (reflections), twently six parișahas (afflictions) and five cãritras (right conducts). (7) Nirjarā (annihilation of karma) Nirjara means the annihilation or dissipation of previous accumulated karma particles in the soul. It also means the separation of karma particles from the atmapradesas. Acording to Umāsvāti being ripen by penances, the separation of karmas is called nirjarā (Tattvärtha sütra 1-4). So it is only austerity or severe penance which can burn the karmic Page #127 -------------------------------------------------------------------------- ________________ seeds, the root evolent of miseries or bondage. Just as fire consumes the combustible so do the austerity (tapa) burn up the karmic seeds. These austerities are of various kinds, classified by Jainas mainly into two-types (1) Bahya tapa (external austerity) (2) Abhyantara tapa (internal austerity). The external austerity is physical while enternal austerity is psychical. External austerity consists of vow of fasting, avoidence of full meals, dietetic restrictions, renunciation of palatable articles or ghee, curd etc.six types of delicacies, endurence of physical trouble and turning the senses from their respective objects. Six forms of enternal austerities are- atonements, reverence or humility, rendering voluntary services to humanity, means study, meditation and giving up the attachment of body. By practising these austerities one can completely burn up all types of karmic seeds and get liberated. V (8) Bandha (bondage) The principle of bandha is an important spiritual concept in Jainism. Bondage means union of karma particles with the soul. It is oftwo types-dravyabandha (subjective bondage) and bhāvabandha (objective bondage). The karmic particles, coming in contact with the soul and creating a veil of obstruction is called dravyabandha. Bhāvabanda refers to the psychic states that leads us to the involvement in the wheel of life. Both types of bondage are complementary to each other. The bondage has been distinguished of four types (1) Prakṛti Bandha-the nature of karma particles that has entered into the soul. (2) Sthiti Bandha-duration of karma particles entered into the soul, anubhāgabandha- intensity of karma particles associated with soul and (4) pradeśa bandha-extensiveness and aggregates of the karmic particles associaed with the soul. Bondage is elminated by the process of samvaraandnirjarāwhich referes to prevention and annihilation of karma particles respectively. (9) Mokşa (liberation) Mokṣa is the highest ideal to be attained in Jainism. It is the emancipation of the soul from the snares of karmas. When the self is totaly freed from the bondage of karmas and has passed beyond the possibility of rebirth, it is said to have attained mokṣa. Like other categories it is also of two types- bhāvamokṣa- when the soul becomes free from four ghātī (destructive) karmas it is called Bhāvamokṣa. When the four aghati (nondestructive) karmas disappear from the constitution of the soul, it is said to Page #128 -------------------------------------------------------------------------- ________________ vi: Navatattva Prakarana have attained dravyamokşa. After being freed from the karmicencrustations the soul moves upaward to the endof lokākāśa and remains in its pure form (anntacatuștaya) at the siddhāśilā, an abode of liberated souls. Navatattvaprakaraña incapsulates all these nine tattvas with their descriptions, divisions, subdivisions etc., Its first seven verses explicitly deal with concept of jīva (soul). From verse 8 ta 4 ajiva, 15 to 17 auspicious karmas, 18 to 20 inauspicious karmas, 21 to 24 influx of karmic particles, 25 to 33 stoppage of karmic particles, 34 to 36 annihilation of karmic particles, 37 to 42 binding of karmic particles with the soul, 43 to 50 liberation and from 51 to 59 verses with prakīrņaka adhikāra. Therefore, from the point of view of subjectmatter this text is a manual of nine categories of truth and has an important place in Jaina literature. The entire Jaina literature is divided into four expositions (anuyogas)(i) Substantial exposition (dravānuyoga) dealing with mainly concept of substances and their divisions, (ü) Mathemetical exposition (ganitānuyoga)- dealing with numerical discriptions, division-subdivisions of time, space and pudgala. (ii) Jural teliological exposition (caranakaranānuyoga)- dealing with code of conduct of Householders and monks and defferent Jurals. (iv) Exposition of religious parables (dharmakalhānuyoga)-dealing with religious stories and paradigm of morality. Navtattvaprakaraña comprehends all these four expositions. As substances like soul, non-soul etc. are delt herein, so it is a part of substantial exposition. As it describes in detail the numerical description of divisions subdivision- of matter and its atoms, space, time along with its largest and miņutest part, it comprehends mathemetical exposition. Dealingwith restraints (gupti), carefulness (samitis), afflictions (parişaha) and ten fold yati dharma etc., it becomes the part of exposition of Jural teliological exposition. Similarly, as it consists of the details of the liberated ones, it also has contents of the exposition of religious parables. About the text How many verses exactly Navatattvaprakarana has, who is the Page #129 -------------------------------------------------------------------------- ________________ original author of the text, when did he flourished? these questions have been a matter of debate among the scholars. This work consists of, generally, 59 to 60 verese but in some of its editions the number differs. A number of editions of this work are also published. The number of verses of the text in those editions mostly differs. Barring few maximum works contain 60 verses. Some important editions along with their author, date of composition and number of verses are as follows: Name of the Text Navatattvaprakaraṇa Navatattvaprakaraṇa Navatattvaprakaraṇa Navatattvaprakaraṇa Muniratnasüri Navatattvaprakarana Jayasekharasüri Sri Navatattvaprakaraṇam Brhannavatattva Prakṣepagāthā, Commentaries Navatattvavṛtti (Svopajñatīkā) Navatattvavṛtti Navatattvavṛtti Navatattvavṛtti Navatattvavivarana Navatattvavivarana Navatattva Avacüri Navatattva Avacüri Navatattvaprakarana Bhāṣya Navatattva Bhāṣya Vivarana Navatattva Bälävabodha Navatattva Bälävaboḍha Navatattva Vārtika * Author Bhaävasagara Devaguptasüri Jinacandra * ---- Devendra Suri (Tapāgaccha) Amback Prasada Devendra süri (Kharatara Gachchiya) Samaya Sundara Gani (Kharatara Gaccha) Paramananda Süri Devacanda Süri ManikyaSekhara Süri Sadhuratna Süri Māna VijayaGaņi (Tapāgaccha) Abhaydevasüri (Navangivṛttikāra) Period VS 1809 VS 1174 1752 AD 13th cent. AD 1290-1327 A.D. VS 1220 Yaśodevasüri (Upakeśagaccha) Somasundara Süri Pārsvacandra Ratnalabha Pupil of Sri Viveka Ratnasüri 15th cent. A.D. VS 1698 14 cent. A.D. 13 cent. A.D. 15th cent. A.D. VS 1644 18th Cent. A.D. 1135 A.D. 1174 A.D. VS 1502 VS 1593 VS 1600 No. of Verses. vii 15 14 54 30 Āryas* 59* 141 14th Cent. A.D. ⠀⠀⠀ 140 Apart from these müla, bhāṣya, avacürṇi, bālavabodha and tabā, we find also references of a number of rāsa, joḍā, stavana and 138 * Published by Bhimsi Manek, Bombay 1903 under Laghu prakarana Sangrah. Published by Śriman Mukti Kamal Jain Mohan Malayam (with Sumangalā Tīkā Bhavanagar. 1934. Navatattva-Sahitya-Samgraha, Sanyojak Udayavijaya Gaņi, Ahmedabad. Page No. 1. 104* Page #130 -------------------------------------------------------------------------- ________________ viii : Navatattva Prakarana caupāī written on Navatattvaprakariņa, in Prāksta, Sanskrit, Gujarati and Hindi, which show the importance of the text. Author Navatattvaprakarana, in its fabric, contains no information about its original author or the date of composition in the work in the work itself. An old handwritten MS of Navatattvarakarana contains in its opening verse the name of Śrī Dharma Süri as its author. The verse runs thus: ia navatattaviyāro, appumaināņajāņaņāheur samkhitto uddhario, lihio Siridhammasürihiń. Although the name of Śrī Dharma Süri appears at the end of the verse but we have no further information regarding his identity or his date. Even the commentators have not suggested any clue about the author and his date. In some of the editions the name of Śrī Cirantanācārya has been given as its author- Cirantanācārya viracitam- but it does not denote the name of its original author. It denotes only that this text is compiled by any encient ācārya. Going through the different editions one can easily notice that out of 59 (60) verses only 27 seem to be original and rest 32 (33) verses are interpolated later on, for 27 verses are common in most of the editions. Had the original Navatattvaprakarana contained 60 verses, it would have been mentioned by the commentators. Since we do not have any commentary dating prior to 12th century A.D. it can be inferred that the original author of 27 verses must have flourished in or before 13th cent. A.D. An another old MS contains a verse in its puşpikā (conculding verse) mentioning the name of Śrī Vādidevasüri as its author. The verse reads: Vādidevasüri viracitaṁ navatattvaprakaranam? According to the above verse Śrī Vādideva Süri (1143-1226 A.D.) was the author of this text. Vādideva Süri, the famous author of Pramāṇanayatattvāloka, Syādvādratnākara etc., was basically a logician 1. Śrī Navatattvaprakaranam, Cirantanacāryaviracitam, Sriman muktikamal Jain Mohan Mālāyām, Bhavanagar 1934. Page No. 8. 2. Ibid P. 8. Page #131 -------------------------------------------------------------------------- ________________ but at the same time also a prolific writer. Since commentaries found on the text do not date prior to the period of Vadideva Süri, taking into consideration the above citation and discussion of earlier scholars it can be inferred that he himself was the original author (mülkāra) of the text, but in absence of any literary evidence it can't be said with a degree of certainty. However, putting aside all the discrepancies about its author, date and number of verses etc. it remains an important work expounding the concept of nine categories of truth. The work is highly useful to those, beginner. in Jaina Philosophy. Besides its multiple editions, along with commentaries, avacüris etc. in Prāksta, Samskrit, Gujarati and Hindi available, no serious efforts were made for its English rendering. I undertook this task to make more familiar to the readers by this important work. While translating, I have used mostly common and familiar equivalents of the terms given in original so that the general reader could comprehend it easily. Before, I conclud it is my pleasant duty to acknowledge my debt to those, instrumental in this endevour. The desirability of the English rendering of this Navatattvaprakarana was first suggested to me by Dr. Jitendra B. Shah, Director, Sharadaben Chimanbhai Educational Research Centre, Ahmedabad in 1993, when I was associated with that Institute. I express my thanks to Dr. Shah. My appointment in Parsvanātha Vidyāpītha in 1994 left the work incompleted. I putforth this proposal to Prof. Sagarmal Jain, Director, Parsvanatha Vidyāpītha, who kindly agreed. I am grateful to Prof. Jain whose kind blessing sustained me allthrough this noble undertaking and without whose interest this work would not have seen the light of the day. My special thanks are also due to the authorities of VidyapithaShri. B.N. Jain, Secretary and Shri I. Barar, Jt. Secretary who so kindly consented its publication. I record my sincere thanks to my senior colleague Dr. A.K. Singh who throughout gave his valuable suggestions. January 1998 Dr. Shriprakash Pandey Page #132 -------------------------------------------------------------------------- ________________ नवतत्त्वप्रकरण Navatattvaprakarana जीवाऽजीवा पुण्णं, पावाऽऽसंवसवरो य निज्जरणा। बन्धो मुक्खो य तहा, नवतत्ता हुंति नायव्वा ।।१।। jīvā, jīvā punņņam, pāvā" savasaṁvaro ya nijjarņā. baṁdho mukkho ya tahā navatattā humti nāyavvā. [1] जीवाऽजीवौ पुण्यं, पापस्रवौ संवरश्च निर्जरणा।। बन्धो मोक्षश्च तथा नव तत्त्वानि भवन्ति ज्ञातव्यानि ।।१।। Jiva (soul), Ajīva (non-soul), puāya (auspicious karma), pāpa (inauspicious karma), sasrava (influx of karma), samvara (prevention of influx of karma), nirjarā (partial annihilation or dissipation of karma), bandha (bondage of karma) and moksa (emancipation or complete dissipation of karma) these nine tattvas (categories) are worth knowing. (1) चउदस चउदस, बाया-लीसा बासी अ हुंति बायाला। सत्तावन्नं बारस, चउ नव भेया कमेणेसिं ।।२।। caudasa caudasa bāyālīsā bāsī a huộti bāyāla. sattāvannam barasa cau nava bheya kamenesim. [2] चतुर्दश चतुर्दश द्विचत्वारिंशद्, व्यशीतिश्च भवन्ति द्विचत्वारिंशत् । सप्तपश्चाशद् द्वादश, चत्वारो नव भेदाः क्रमेणैषाम् ।।२।। These nine tattvas comprise fourteen types of jīva (soul) and ajīva (non-soul), fourty-two types of punya (auspicious karma), eighty-two types of pāpa (inauspicious karma), fourty-two types of asrava (influx of karma), fiftyseven-types of samvara (prevention of influx of karma), twelve types of nirjarā (dissipation of karma), four types of bandha (bondage) and nine types of moksa (emancipation). (2) Page #133 -------------------------------------------------------------------------- ________________ 2 : Navatattva Prakarana एगविह दुविह तिविहा, चउव्विहा पंच छव्विहा जीवा । चेयण - तसइयरेसिंह, वेय-गई - करण - काएहिं । । ३ । । egaviha duvila tivihā cauvihā paṁca chavvihā Jīvā ceyana tasaiyarehini, veya gaī karana kāyehim.[3] एकविध-द्विविध-त्रिविधा - चतुर्विधाः पञ्च षड्विधा जीवाः; चेतन -सेतरैर्वेद-गति - करण - कायैः ।।३।। With regard to its cetanā (consciousness), trasa and sthāvara (mobile and immobile), veda (sex-passions), gati (condition of existence), indriya (senses) and kāya (physical body) the soul is devided into one, two, theree, four, five and six types respectively. (3). एगिंदिय सुहुमियरा, सन्नियर पणिदिया य सबितिचउ । अपजत्ता पज्जत्ता, कमेण चउदस जियट्ठाणा । । ४ । । egimdiya suhumiyarā sanniyara paṇimdiyā ya sabiticau appajattā pajjattā kameņa caudasa jiyathāṇā. [4] एकेन्द्रियाः सूक्ष्मेतराः, संज्ञीतरपञ्चेन्द्रियाश्च सद्वित्रिचतुः । अपर्याप्ताः पर्याप्ताः क्रमेण चतुर्दश जीवस्थानानि । । ४ । । Śükṣma and bädara ekendriya (subtle and gross one sensed), sanji and asanjñī pancendriya (rational and irrational five sensed), dvindriya (two sensed), trīndriya (three sensed) and caturendriya (four sensed) these seven types of jīva, by the point of view of paryāptaka and aparyāptaka (developed and undeveloped) are devided into fourteen jīva sthānakas. (4) नाणं च दंसणं चेव, चरित्तं च तवो तहा । वीरियं उवओगो य, एयं जीअस्स लक्खणं ॥ ५ ॥ nāņaṁ ca daṁsaṇaṁ ceva carittam ca tavo tahā vīrīyaṁ uvaogo ya yeyaṁ jiassa lakkhaṇaṁ. [5] ज्ञानं च दर्शनं चैव, चारित्रं च तपस्तथा, वीर्यमुपयोग चैतज्जीवस्य लक्षणम् ।।५ ।। Page #134 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Navatattva Prakarana : 3 Jiana (knowledge), darśana (intution), caritra (conduct), tapa (austerity) and upayoga (cognitive operations) these are the defining characteristics of jīva (soul). (5) आहारसरीरिंदिय, पज्जत्ती आणपाणभासमणे। चउ पंच पंच छप्पिय, इगविगलाऽसन्निसन्नीणं ।।६।। dhārasarīrimdiya pujjatti āņapānabhasamune can parica panca chappiva igavigalā' sainisanniņam. 16) आहारशरीरेन्द्रिय-पर्याप्तय आनप्राणभाषामनांसि । चतस्रः पञ्च पञ्च षडपि, चैकविकलाऽसंज्ञिसंज्ञिनाम् ।।६।। Ahāra (food), śarīra (body), indriya (senses), svāsochvāsa (inhalation and exhalation), bhasa (language) and mana (mind) these are six paryaptis (bodily capacities of jīva). Ekendriya (one sensed), vikalendriya (having two three or four sences), cisanjñ and sanji pancendriya jīva (irrational and rational five sensed soul) possesses four, five, five and six bodily capacities respectively. (6) पणिंदिअ त्ति बलूसा-साऊ-दस पाण चउ छ सग अट्ठ। इग-दु-ति-चउरिंदीणं, असन्नि-सत्रीण नव दसय।।७।। panindia iti balüsā-sai-dasa pāņu can chha saga attha ig-du-ti-caurimdiņam asanni-sanniņa nava dasaya. 171 पंचेन्द्रिय त्रिबलोच्छ्वासायूंषि दश प्राणाश्चत्वारः षट् सप्ताष्टौ। एकद्वित्रिचतुरिन्द्रियाणा-मसंज्ञिसंज्ञिनां नव दश च ।।७।। Pancendriya (five senseed), tina bala (power of mind, body and speech) svāsochvāsa (inhalation an exhalation and āyusya (age) these are dasa prana (ten vital organs). Ekendriya (one sensed); dvindriya (two sensed), trindriya (three sensed), and Caturendriya (four sensed) Jiva (soul) possesses four, six, seven and eight prāna (vital organs) respectively. Only sanjil and (isanjñī pancendriya (rational and irrational live sensed) possesses nine and ten prūna (vital organs). Page #135 -------------------------------------------------------------------------- ________________ 4 : Navatattva Prakarana Ajiva (Non-soul) Asīva is not mearly the form of negative of jiva (soul) but it is positive verity standing opposed to Jiva (soul). धम्माऽधम्मागासा, तिय-तिय-भेया तहेव अद्धा य। खंधा देस पोसा, परमाणु अजीव चउदसहा ।।८।। dhammā'ahammāgāsā tiya-tiya bheyā taheva addhā ya khardhā desa paesā paramāņu ajīva caudasahā. [8] धर्माऽधर्माऽकाशा स्त्रिकत्रिकभेदास्तथैवाद्धा च। स्कन्धा देश-प्रदेशाः परमाणवोऽजीवश्चतुर्दशधा ।।८।। Dharmāstikāya (medium of motion), adharamāstikāya (medium of rest) and ākāśāstikāya (space) has three divisions where kāla (time) has only one. Similary, pudgalāstikāya (matter) is devided into skandha (molecules), desa (a part of molecules), pradeśa (a subtle constituent partless, part of molecules) as paramāņu (a subtle part of matter separated from molecules). In this way ajiva (non-soul) has total fourteen divisions.(8) धम्माऽधम्मा पुग्गल, नह कालो पंच हुँति अज्जीवा। चलणसहावो धम्मो, थिरसंठाणो अहम्मो य ।।६।। dhammā'dhammā puggala naha kālo pańca husti ajjīvā cālana sahāvo dhammo thirasamthāno ahammo ya. [9]. धर्माधमौं पुद्गलाः नभः कालः पंच भवन्त्यजीवाः। चलनस्वभावो धर्मः, स्थिरसंस्थानोऽधर्मश्च ।।६।। Dharamāstikāya (medium of motion), adharmāstikāya (medium of rest), pudgala (matter), akāśā (space) and kāla (time) are five fundamental varities of ajīva (non-soul). Dharmāstikāya and adharmāstikāya are the auxilary cause of motion and rest of soul and non-soul respectively. (9) अवगाहो आगासं, पुग्गलजीवाण पुग्गला चऊहा। खंधा देस पएसा, परमाणु चेव नायव्वा ।।१०।। Page #136 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Navatattva Prakarana : 5 wvagāho ägāsaṁ puggaljīvana puggalā caühā khamdhā desa paeisā paramāņu ceva nāyavvā. [10] अवकाश आकाशं, पुद्गलजीवानां पुद्गलाश्चतु । स्कन्धा देशप्रदेशाः, परमाणवश्चैव ज्ञातव्याः।।१०।। Ākāśa (space) provides room to the soul and non-soul. Pudgala (matter) is devided into four parts-pradeśa, skandha, deśa and paramāņu. (10) (see, verse-8). सबंधयार उज्जोअ, पभा छायातवेहि आ (इय)। वन-गंध-रसा-फासा, पुग्गलाणं तु लक्खणं ।।११।। saddamdhayāra ujjoa pabhā chāyātavehi ā (iya) vanna-gandhā-rasā-phasa puggalanam tu lakkhanam. [11]. शब्दान्धकाराबुद्योतः प्रभाछायात पैश्च।। वर्णो गन्धो रसः स्पर्शः पुद्गलानां तु लक्षणम् ।।११।। Sabda (words), andhakāra (darkness), udyota (moonlight or coldlustor), prabhā (light), chāyā (shed), ātapa (heat), varna (colour), rasa (taste), sparsa (touch) and gandha (smell) are the main characteristics of matter. (11) एगा कोडिसतसट्टि, लक्खा सत्तहत्तरी सहस्सा य। दो य सया सोलहिया, आवलिया इगमुहुत्तम्मि ।।१२।। egā kodisatasatthi lakkhā sattahattarī sahassā ya do ya sayā solahiyā āvaliyā igamuhuttammi. [12] एका कोटिः सप्तषष्टिलक्षाः सप्तसप्ततिः सहस्राश्च । द्वे च शते षोडशाधिके, आवलिका एकस्मिन्मुहूर्ते ।।१२।। One muhürta (a unit of time) consists of 16777216 avalikās. (12). समयावली मुहुत्ता, दीहा पक्खा य मास वरिसा य। मणिओ पलिया सागर, उस्सप्पिणि-सप्पिणी कालो।।१३।। samayāvali muhuttā dīhā pakkhā ya māsa varisā ya bhaņio paliā sāgara ussappiņi-sappiņi kālo. (13). Page #137 -------------------------------------------------------------------------- ________________ 6 : Navatattva Prakarana समयावलिमुहूर्ता दिवसाः पक्षाश्च मासाा वर्षाश्च। भणितः पल्यः सागरः उत्सर्पिण्यवसर्पिणी कालः ।।१३।। The time is devided into samaya (the lowest unit of time), ūvalikā (innumerable samayas make an avalikā), muhürta (16777216 āvalikās make an muhürta which is an unit of time equal to 48 minutes of European time), divasa (day, aunit of time equal to 30 muhurtas) and paksa (a fortnight), māsa (month), varsa number of years), Sagaropama (10 crore into crore (1000,000,000,000,000 palyopamas), utsarpiņi (ascending aeon which comprises 10 crore into crore sāgaropamas), and avasarpiņī (descending aeon which comprises the same number of sāgaropamas).(13) परिणामि जीव मुत्तं, सपएसा एग खित्त किरिया य। णिच्चं कारण कत्ता, सव्वगय इयर अप्पवेसे।।१४।। - pariņāmi jīva muttam sapaesā ega khitta kiriyā ya niccam karana katrā savvagaya eyara appavese. [14] परिणामी जीवो मूर्तः, सप्रदेश एकः क्षेत्रं क्रिया च। नित्यं कारणं कर्ता, सर्वगतमितर अप्रवेशः ।।१४।। parinami (transformative), jiva (soul), murta (tangible), sapradesi (possessing a subtle constituent part of space), eka (one), kriya (activity) nirya (permanent), karana (cause), kartā (doer), sarvavyāpī (omnipresent) and itara-apraveśī (non pierceble) are the six substances worth knowing. (14) Punya tattva (auspicious Karma) सा उच्चगोअ मणुदुग, सुरदुग पंचिंदिजाइ पणदेहा। आइतितणुणुवंगा, आइम-संघयण-संठाणा।।१५।। sā uccisoa manuduga suraduga paṁcimdijai panadehā aititammnanga din-scamghayana-samthānā. [15] सातोच्चैगंत्रिमनुष्यद्विक-सुरद्विकपञ्चेन्द्रियजातिपञ्चदेहाः।। आदित्रितनूनामुपाङ्गान्यादिमसंहननसंस्थाने ।।१५।। Page #138 -------------------------------------------------------------------------- ________________ वनचउक्कागुरुलहु, परघाउस्सास आयवुज्जाअं । सुभखगइनिमिणतसदस, सुरनरतिरिआउ तित्थयरं ।। १६ ।। Navatattva Prakarana : 7 vannacaukkagurulahu paraghāussāsa āyaujjāaṁ subhakhagainimiņatasadasa suranaratiriau tithayaram. [16] वर्णचतुष्काऽगुरुलघु-पराघातोच्छ्वसातपोद्योतम् शुभखगतिनिर्माण सदशक - सुरनरतिर्यगायुस्तीर्थकरं । ।१६ ।। Punyatattva (auspicious karma) is considered of 42 types viz. sātāvednīya (which causes a feeling of pleasure), uccagotra (high family sorroundings), mānuṣyadvika (human age), devadvika (age of celestial beings), pañcendriya jāti (five sense organs), pancaśarīra (five types of body), tine sarira upanga (three secondry parts of body), prathama sanghayana (which procures the flocking together of the physical body), prathama sansthāna vajra, ṛṣabha sansthāna (which gives firmness of joints), varnacatuṣka (four colour), agurulaghu (neither heavy nor light), paraghāta (capability of vanquishing other), svāśochvās (inhalation and exhalation), atapa (heat or warın splendour), udyota (moon light or cold lustre), subhavihāyogāti (acquiring good condition), nirmāņa (construction), trasadasaka (ten nature of mobiles), deva manusya tiryancayuṣa (age of human, celestial and animal beings) and Tirthankaranāmakarma (which procures the position of prophet of the Jaina religion). (15-16) तस बायर पज्जत्तं, पत्तेअ थिरं सुभं च सुभगं च । सुस्सर आइज्ज जसं, तसाइदसगं इमं होइ । । १७ ।। tasa bayara pajjattaṁ, pattea thiram subhaṁ ca subhagaṁ ca sussara aijja jasaṁ, tasaidasagam imam hoi. [17] त्रसबादरपर्याप्तं, प्रत्येकं स्थिरं शुभं च सुभगं च ।। सुस्वरादेययशस्त्रसादिदशकमिदं भवति ।। १७ ।। Trasa (mobile), bādara (gross body), paryāpta (developed), pratyeka (individual body), sthira (constant), Śubha (handsome personality), Subhaga (amiable personality even though not beau Page #139 -------------------------------------------------------------------------- ________________ 8: Navatattva Prakaraña tiful), suswara (bestowing melodius voice), adeya (suggestive) and yaśa (granting honour and glory) are trasadaśakaprakstis.(17) Pāpa tattva (inauspicious karma) The karmas which produce sorrow and sufferings at the time of their realisation, are called pāpa or inauspicious karma. नाणंतरायदसगं नव बीए नीअ साय मिच्छत्तं। थावरदस-निरयतिगं, कसाय पणवीस तिरियदुर्ग।।१८।। nānamtarāyadasagań nava biye nia sāya michhattam thāvaradasa-nirayatigaṁ kasāya paņavīsa tiriyadugaṁ. [18] ज्ञानान्तरायदशकं, नव द्वितीये नीचैरसातं मिथ्यात्वम् । स्वावरदशकं निरयत्रिकं; कषायपञ्चविंशतिःतिर्यद्विकम् ।।१८।। इगबितिचउजाईओ, कुखगइ उवघाय हुंति पावस्स। अपसत्यं वनचऊ, अपढम-संघयण-संठाणा।।१६।। igabiticaujaio kukhagai uvaghāya husti pāvassa apasatthaṁ vannacaü apadhama-saṁghayana-saṁthāņā. [19] एकद्वित्रिचतुर्जातयः कुखगतिरूपघातो भवन्ति पापस्य। अप्रशस्तं वर्णचतुष्क-मप्रथमसंहननसंस्थानानि ।।१६।। Jñānāvaraņa (five knowledge obscuring and five power hindering karma), darśānāvaraņa (nine intution deluding karma), nīcagotra (low status), asātā-vedanīya (pain producing karma), mithyātva (wrong belef), sthāvaradaśka (ten immobility causing karma), nārakatska (three types of hell), paccīsa kașāya (twenty five passions), tiryancadvika (two types of animal beings), ekendriya (one sensed), dvīndriya (two sensed), trīndriya (three sensed), caturendriya jāti (four sensed), aśubha vihāyogati (inauspicious capacity of moving in space), upaghāta (self annihilation), aśubhāvarṇādicara (four cause of having ugly body), prathama sivāya pañca sanghayaņa (five sanghayana 4 except first one) and pañca sansthāna (five karmas which Forn Page #140 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Navatattva Prakarana : 9 determine the shape of the body) are eighty two types of inauspicious karma. (18-19). थावर सुहुम अपज्जं, साहारण-मथिरम-सुभ-दुभगाणि। दुस्सर-णाइज्ज-जसं, थावरदसगं विवज्जत्थं ।।२०।। thāvara suhuma apajjaṁ sāhāraņa-mathirama-subha-dubhagāņi dussara-naijja-jasam thāvaradasagm vivajjatham. [20] स्थावरसूक्ष्मापर्याप्तं, साधारणमस्थिरमशुभदुर्भाग्ये दुःस्वरानादेयायशः स्थावरदशकं विपर्ययार्थम् ।।२०।। Sthāvara (static), sükşma (subtle), apparyāpta (developed), Sadhārana (common), a-asthira (non-constant), asubha (cause of ugly body), durbhaga (unsympathetic), duswara (ill sounding voice making), anādeya (unsuggestive) and apayasa (which causes dishonour and defame) are the sthāvarapraksti (ten nature of immobile) which are counterpart of the trasaprakrti (ten nature of mobile soul). (20) Āsrava (Influx of Karma particles towards the Soul) Influx of karma particles towards soul, is called āśrava. इंदिअ-कसाय-अव्वय, जोगा पंच चउ पंच तिनि कमा। किरियाओ पणवीसं, इमा उ ताओ अणुक्कमसो।।२१।। imdiyakasāya-avvaya joga pamca caupamca tinni kama kiriyao panavisam imā u tāo anukkamaso. [21] इन्द्रियकषायावतयोगाः पंच चत्वारि पंच त्रीणि क्रमात्। क्रियाः पञ्चविंशतिः, इमास्तु ता अनुक्रमशः ।।२१।। Pañca-indriyān (five senses), cāra kasāya (four passions), avrata (non-vows) and yoga (action performed by mind, body and speech) are the twenty-five rootcauses of āśrava (influx of karma).(21) Page #141 -------------------------------------------------------------------------- ________________ 10 : Navatattva Prakarana काइय अहिगरणिआ, पाउसिया पारितावणी किरिया। पाणाइवायरंभिय, परिग्गहिआ मायवत्ती अ।।२२।। kāia ahigaraņiā pāusiyā pāritāvani kiriyā pāņāivāyaraṁbhiya pariggahiā mayavattí a. [22] कायिक्यधिकरणिकी, प्राद्वेषिकी परितापनिकी क्रिया प्राणातिपातिक्यारम्भिकी; पारिग्रहिकी मायाप्रत्ययिकी च।।२२।। मिच्छादसणवत्ती, अपच्चक्खाणी य दिट्टि पुट्ठि य। पाडुच्चिय सामंतो-वणीअ नेसत्थी साहत्थी।।२३।। michhādaṁsanavattī apaccakhānī ya ditthi putthi ya pāducciya sāmamto-vania nesatthi sāhatthi. [23] मिथ्यादर्शनप्रत्ययिकी, अप्रत्याख्यानिकी च दृष्टिकी पृष्टिकी (स्पृष्टिकी) च प्रातित्यकी सामान्तोपनिपातिकी नैशस्त्रिकी स्वाहस्तिकी ।।२३ ।। आणवणि विआरणिया, अणभोगा अणवकंखपच्चइया। अन्ना पओग समुदाणपिज्ज दोसेरियावहिया।।२४।। āņavaņi viāraņiā aṇabhogā aṇavakaṁkhapaccaiyā annā paoga samudāņapijja doseriyāvahiā. [24] आज्ञापनिकी वैदारणिकी, अनाभोगिकयनवकाङ्क्षप्रत्ययिकी। अन्या प्रायोगिकी सामुदानिकी प्रेमिकी दैषिकीर्यापथिकी।।२४ ।। Twenty-five types of activities which cause inflow of karmic matter towards soul are as under: (1) Kāyiki kriyā (a wicked man's readiness to hurt others). (2) Adhikāraniki kriya (having weapons of hurtfulness). (3) Pradveșikī kriyā (tendency of having averson for soul and non-soul (jiva-ajiva) in anger. (4) Paritāpānikī kriyā (any things which may cause mental pain to oneself or others. (5) Prānātipātiki kriya (depriving other of vitalities of age, sense Page #142 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Navatattva Prakarana : 11 organ, powers and respiration. (6) Ărambhikī kriyā (engaging in harmful activities). (7) Parigrāhikī kriyā (possesion of worldy belongings). (8) Māyāpratyayikī kriyā (deceitful disturbance of some one's right knowledge and faith). (9) Mithyādarśanapratyāyikīkriyā (praising one's actions due to wrong belief). 10. Apratyākhyānīki kriyā (not renouncing what ought to be renounced). 11. Draștikī kriyā (infatuated desire to see a pleasing form) 12. Sprștiki kriyā (frivolous indulgence in touching). 13. Prātityakī kriyā (inventing new sense of enjoyment). 14. Sāmantopanipātikī kriyā (evacuating, urinating etc. at a place, frequented by men, women and animals). 15. Naissștikī kriyā (admiration of unrighteous things). 16. Swahastikī kriyā (undertaking to do by one's own hand, what should be done by others). 17. Ajñapānikī kriyā (miss-interpreting the scriptural injuctions, which we do not want to follow). 18. Vidāraņikī kriyā (proclaiming others sin). 19. Anābhogikī kriyā (to seat one's own body cloth, etc. at a place without properly inspected and cleansed). 20. Anavakānşapratyayikī kriyā (disrespect to scriptural injunctions out of roguishness or lethorgy). 21. Prāyogikī kriyā (bodily movement). 22. Sāmudānikī kriyā (tendency to neglect vows after having taken them). 23. Premikī kriyā (to love oneself or produce love and affection in others). 24. Dvesikī kriyā (tendency to speak proudly in anger). Page #143 -------------------------------------------------------------------------- ________________ 12 : Navatattva Prakarana 25. Īryāpathikī kriyā (action which causes either the bondage or the experience of īryāpatha karma). (22-23-24) Samvara (prevention of influx of Karma) Samvara is an antagonistic principle of āśrava. Impeding the flow of karmic matter towards soul is called samvara. समिई गुत्ती परिसह, जइधम्मो भावणा चरित्ताणि। पण ति दुवीस दस बार, पंचभेएहिं सगवन्ना।।२५।। samiī gutt parisaha jaidhammo bhāvaņā carittāņi pana ti duvisa dasa bara pamcabheyehim sagavanna. [25] समितितृप्तिः परिषहो, यतिधर्मो भावनाश्चरित्राणि। पंचत्रिकद्वाविंशतिशद्वादशपञ्चभेदैः सप्तापञ्चाशत् ।।२५।। Samiti (carefulness), gupti (restraints), parişaha (troubles), yatidharma (observance for monks), bhāvanā (reflections) and Caritra (conduct) are devided into five, three, twenty two, twelve and five types respectively, are the fifty-seven types of samvara. 1 (25). इरिया भासेसणादाणे, उच्चारे समिईसु अ। मणगुत्ती वयगुत्ती, कायगुत्ती तहेव य।।२६ ।। iriyā bhāsesaņādāņe ucсāre samaīsu a maņaguttī vayagutti kāyaguttī taheva ya. [26] ईर्याभाषेषणादानान्युच्चारः समितिषु च। मनोगुप्तिर्वचोगुप्तिः कायगुप्तिस्तथैव च ।।२६ ।। Five Samitis (carefulness) are as under(1) Iryasamiti (carefulness of walking), (2) Bhasāsamiti (carefulness of language, (3) Esaņā samiti (carefulness in taking food), (4) Adananikespanā samiti (carefulness in taking clothes, pots, etc.) and (5) Uccāra-paristhāpanikā samiti (carefulness in placing urine, excreta, cough, etc.). Three guptis (restraints) are Page #144 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Navatattva Prakarana : 13 known as-(1) Manogupti ( restraint of mind), (2) Vācanāgupti * (restraint of speech) and Kāyagupti ( restraint of body). (26) खुहा पिवासा सीउन्हं, दंसाचेलारइत्थिओ | चरिया निसीहिया सिज्जा, अक्कोस वह जायणा ।। २७ ।। khuhā pivāsā sīunhaṁ daṁsācelāraitthio cariyā nisīhiyā sijjā akkosa vaha jāyaṇā. [27] क्षुधा पिपासा शीतमुष्णं, दंशोऽचेलको ऽरतिस्त्रीकः । चर्या नैषेधिकी शय्या, आक्रोशो वधो याचना ।। २७ ।। अलाभरोग तणफासा, मल-सक्कार - परीसहा । पन्ना अन्नाण सम्मत्तं, इअ बावीस परीसहा ।। २८ ।। alābharoga taṇaphāsā mala-sakkāra-parisahā pannā annāna samattam ia bāvīsa parisahā. [28] अलाभरोगतृणस्पर्शा, मलसत्कारपरिषहीं। प्रज्ञा अज्ञानं सम्यक्त्वमिति द्वाविंशतिः परिषहाः ।। २८ ।। Kşudhā (hunger), trsā (thirst), sita ( could ), usna ( heat), danśamasaka ( insects bites ), nagnatva or acla (nackedness), arati (distaste), strī (women), caryā ( moving), naisedhikāī (place prohibited), sayyā (bedding), ākrośa ( harsh words ), badha (killing), yācanā ( begging ), alābha (non-benificial), roga (disease), trina sparsa (touch of thorn, straw, grass, etc.), mala ( excreta), satkāra (honour), prajñā (miraculous intellect), ajñāna (ignorence) and samyaktva (rightousness) are the twenty-two types of parisaha (troubles) to be conquered. (27-28). खंती मद्दव अज्जव, मत्ती तव संजमे अ बोधव्वे । सच्चं सोअं आकिंचणं च बंभं च जइधम्मो ।। २६ ।। khamti maddava ajjava matti tava samjame a bodhavve saccam soam ākimcanam ca bambham ca jaidhammo. [29] क्षान्तिर्मार्दव आर्जवो, मुक्तिः तपः संयमश्च बोद्धव्यः । सत्यं शौचमाकिंचन्यं च ब्रह्म च यतिधर्मः ।। २६ ।। Page #145 -------------------------------------------------------------------------- ________________ 14 : Navatattva Prakarana kşamă (forgivness), mridutā (humbleness), ārjava (simplicity) mukti (mukti-nirlobhatā) greedlessness, tapa (austerity), samyama (restraintment), satya (truthfulness), sauc (holiness), akincanatā (non-possession), and brahmacarya (celebacy), are ten observence for yatidharma (monks). (29) पढममणिच्चमसरणं, संसारो एगया य अण्णत्तं। असुइत्तं आसव, संवरो य तह णिज्जरा नवमी।।३०।। padhāmamaņiccamasaraṇaḥ saṁsāro egayā ya aạnnattań asuittam āsava, samvaro ya taha nijjara navami. [30] प्रथममनित्यमशरणं, संसार एकता चान्यत्वं । अशुचित्वमाश्रवः संवरश्च तथा निर्जरा नवमी।।।३०।। लोगसहावो बोही-दुल्लहा धम्मस्स साहगा अरिहा। एआओ भावणाओ, भावेअव्वा पयत्तेणं ।।३१।। logasahão bohí-dullahā dhammassa sähagā arihā eão bhāvaņão bhāveavvā payattenar. [31] लोकस्वाभावो बोधिर्दुर्लभा धर्मस्य साधका अर्हन्तः। एता भावना, भावितव्याः प्रयत्नेन ।।३१।। Anirya (transitoriness), asarana (non-shelter), samsāra (world) ekatva (oneness), anyarva (difference), ashucitva (impurity), asrava (influx of karma), Samvara (impeding of karmic flow), nirjară (dissipation of karma), loka swabhāva (to think about nature of the universe and its constituent parts), bodhi durlabha bhāvanā (rareness of attaining imancipation) and dharma bhāvanā (to think about propagator of Jina dharma- Arihanta) twelve bhāvanās are worth knowing. (30-31) सामाइअत्थ पढम, छेओवट्टवणं भवे बीअं। परिहारविसुद्धिअं सुहुमं तह संपरायं च ।।३२।। sāmāiattha padhamaṁ cheovatthavanam bhave biań parihara visuddhiam, suhumam taha samparayam ca. [32] Page #146 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Navatattva Prakarana : 15 सामायिकमथ प्रथमं छेदोपस्थापनं भवेद् द्वितीयम् । परिहारविशुद्धिकं सूक्ष्मं तथा सांपरायिकं च ।।३२ ।। तत्तो अ अहक्खायं, खायं सव्बंमि जीवलोगम्मि। जं चरिऊण सुविहिया, वच्चंति अयरामरं ठाणं ।।३३।। tatto a ahakkhāyaḥ khāyaḥ savvaṁmi jīvalogammi jam cariuna suvihiyā vaccamti ayarāmaram thānam. [33] ततश्च यथाख्यातं, ख्यातं सर्वस्मिन् जीवलोके। यच्चरित्वा सुविहिता गच्छन्त्यजरामरं स्थानम्।।३३।। Sāmāyika (conduct to be followed in the primary stage of self control), chedopasthāpanīya (conduct of monk in the beginning of his spiritual carrier), parihāraviếuddhi (pure and absolute non-injury), sükşma samparāya (slightest delusion) and yathā khyātacaritra (ideal passion and affectionless conduct) are five types of cāritra (conduct which should be practiced to attain in liberation. (32-33) Nirjarā (annihilation of Karma) अणसणमूणोअरिया, वित्तीसंखेवणं रसच्चाओ। कायकिलेसो संलीणया य बज्झो तवो होई।।३४।। anasanamüņoariā vittīsaṁkhevaņam rasaccão kāykileso samlinayā ya bajjho tao hoi. [34] अनशनमूनौदरिका-वृत्तिसंक्षेपणं रसत्यागः। कायक्लेशः संलीनता च बाह्यं तपो भवति ।।३४।। Anasana (to give up the food under proper norms), unodari (to take food less than the demand of appetite), vrtisanksepa (to receive limited food with respect to substance, space, time and form), rasatyāga (renunciation of ghee, milk, curd, etc, six types of delicacies), kāyakleśa (body abandonment), santīnatā (checking the volition of sense organs in wrong deeds and developing passion to check the activities of mind, body and Page #147 -------------------------------------------------------------------------- ________________ 16 : Navatattva Prakarana speech) are known as bāhyatapa (external austerities ). ( 34 ) पायच्छित्तं विणओ, वेयावच्चं तहेव सज्झाओ। झाणं उस्सग्गोऽवि अ, अब्मिंतरओ तवो होइ ।। ३५ ।। pāyacchittam vinao veyāvaccam taheva sajjhão jhānam ussaggo 'vi a abbhimitarao tavo hoi. [35] प्रायश्चित्तं विनयो, वैयावृत्यं तथैव स्वाध्यायः । ध्यानं कायोत्सर्गेऽपि चाभ्यन्तरं तपो भवति । । ३५ ।। Prāyścitta (atonement ), vinaya (reverence), vaiyavrtti ( rendering voluntarily services), swādhyāya (self-study), dhyāna (Meditation) and vyutsarga (giving up the attachment of body) are the six ābhyāntara tapa (internal austerities) (35) Bandha (bondage ) बारसविहं तवो णिज्जरा य, बंधो चउविगप्पो य पयइ द्वि- अणुभागपएसभेएहिं नायव्वो ।। ३६ ।। * värasavihan tho nijjara ya banidho cauvigappo ya payai tthi anubhāgapaesabheyehim nāyavvo. [36] द्वादशविध तपो निर्ज्जरा च, बन्धश्चतुर्विकल्पश्च प्रकृतिस्थित्यनुभागप्रदेशभेदैर्ज्ञातव्यः । । ३६ ।। पयई सहावो वृत्तो, ठिई कालावहारणं । अणुभागो रसो णेओ, पएओ दलसंचओ ।। ३७ ॥ payai sahão vutto tthii kālāvahāraṇaṁ anubhāgo raso neo paeo dalasamcao [37] प्रकृतिः स्वभावः उक्तः, स्थिति कालवधारणम् । अनुभागो रसो ज्ञेयः, प्रदेशी दलसंचयः ।। ३७ ।। * In müla Navatattvaprakaraṇa this gāthā is given at place of 34th gāthā under the category of Nirjară (annihilation of karmas) but as it falls under the category of bandha (bondage of soul), its number has been changed here. Page #148 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Navatattva Prakarana : 17 Above mentioned twelve kind of austerity is the cause of nirjarā. Bandha (bondage) is an unification of karma particles with the soul. It is of four types- (i) prakrtibandha (nature of the karma bondage) (ii) sthitibandha (duration of karma bondage) (iii) rasabandha (intensity of karma bondage) and (iv) pradeśa bandha karmic space pointal bondage. (36-37) पडपडिहारऽसिमज्ज हडचित्कुलालभंडगारीणं। जह एएसिं भावा, कम्माणऽवि जाण तह भावा।।३८।। padapadihāra'simajja hadacittakulālabhaṁdagārīnań jaha eesiṁ bhāvā kammān'avi jāņa taha bhāvā. [38] पटप्रतिहारासिमद्य-हडिचित्रकुलालभाण्डागारिणाम् यथैतेषां भावाः कर्मणामपि जानीहि तथा भावाः।।३८ ।। The nature of eight species of karma is the same as the nature of pața (obstacle), pratiharī (watchman), talawāra (sword), madirā (wine), chitrakāra (painter), kumbhakāra (potter) and bhandārī (treasurer). (38) इह नाणदंसणावरण वेयमोहाउनामगोआणि। विग्धं च पण नव दु अट्ठवीस चउ तिसय दु पणविहं ।।३६ ।। iha nānadaṁsaņāvarana veya mohāunāunāmagoāņi viggham ca pana nava du arthavisa cau tisaya du panavihan. [39] अत्र ज्ञानदर्शनावरणवेद्य मोहायुर्नामगोत्राणि। विघ्नं च पञ्चनवद्व्यष्टाविंशतिचतुस्त्रिशतद्विपञ्चविधम् ।।३६ ।। Karma has eight fundamental species(1) Jānāvarana (knowledge obscuring karma) (2) Darsanavarana (intution obscuring karma) (3) Vedaniya (feeling producing karma) Mohaniya (belief and conduct obstructing karma) Ayusya karma (age determining karma) (6) Nāmakarma (personality determining karma) 45) Page #149 -------------------------------------------------------------------------- ________________ 18 : Navatattva Prakarana (7) Gotra karma (status determining karma) (8) Antarāya karma (power hindering karma) These eight types of karma are devided into five, nine, twentyeight, four, one hundred and three, and five sub types respectively. (39) नाणे अ सणावरणे, वेयणिए चेव अंतराए अ। तीसं कोडाकोडी, अयराणं ठिइ अ उक्कोसा।।४।। nane a damisaņāvarañe veyaṇyaņai ceva aṁfarāye tīsaṁ kodākodi ayarāņam thii a ukkosās. [40] ज्ञाने च दर्शनावरणे, वेदनीये चैवान्तराये च त्रिंशत्कोटीकोट्यो ऽतराणां स्थितिश्चोत्कृष्टा।।४०।। The maximan duration of Jñānāvaraña (knowledge obscuring), darśanāvaraña (intution obscuring), vedanīya (feeling producing) and antarāya (power hindering karma) is thirty crore into crore sāgaropamas. (40) सित्तरि कोडाकोडी, मोहणीए वीस नाम-गोएसु। तित्तीसं अयराइं आउट्ठिइबंध उक्कोसा।।४१।। sittari kodākodi mohaņie vīsa nāma-goesu tittīsaṁ ayarāim āutthibaṁdha ukkosā. [41] सप्ततिः कोटीकोट्यो मोहनीये विंशतिर्नामगोत्रयोः। त्रयस्त्रिंशदतराण्यायः-स्थितिबन्ध उत्कर्षात् ।।४१।। Similarly, the maximam duration of mohanīya (belief and conduct obscuring karma), nāmakarma (personality determining karma), gotra karma (status determining karma) and ayușya karma (age determing karmas) is seventy, twenty, twenty and thirty three crore into crore sāgaropama respectively. (41) बारस मुहुत्त जहन्ना, वेयणिए अट्ठ नाम गोएसु। सेसाणंतमुहत्तं, एयं बंधट्टिईमाणं ।।४२।। Page #150 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Navatattva Prakarana : 19 Darasa muhutta jahannā veyaņiye attha goesu sesāņaṁtamuhuttam eyaṁ bardhatthiīmāņa”. [42] द्वादश मुहूर्तानि जघन्या, वेदनीये ऽष्टौ नामागोत्रयोः शेषाणामन्तर्मुहूर्तमे-तद्बन्धस्थितिमानम् ।।४२ ।। The minimum duration of vedaniya (feeling producing), nāma (personality determining) and gotra (status dtermining) karma) is tweleve, eight and eight muhürta respectively, whereas rest karma have their minimum duration of less than one muhürta. (42) Moksa (Liberation) After complete annihilation of all types of karma the soul gets emancipated and joins siddhasilā, an abode of the emancipated soul, situated at the end of the loka. Other emancipated souls (Jivas) residing at siddhasilā do not return to the mundane world and from their they watch regularly all kinds of substance (dravya) alongwith their modifications paryāya occured in peresent, past and future. Emancipated soul, being free from birth, old age, death, hunger, thirst, disease, anxity, poverty, sorrow and sufferings enjoys infinite bliss. Since the Karma is the root cause of birth or worldly existence, and that being distructed, ends all the possibilities of transmigration of soul. संतपयपरूवणया, दव्वपमाणं च खित्त फुसणा य। कालो अंतरभागो भावे अप्पाबहुं चेव ।।४३।। saṁtapayaparüvaņayā davvapamāņaṁ khitta phusaņā ya kālo astarbhāgobhāve appābahuṁ ceva. [43] सत्पदप्ररूपणा, द्रव्यप्रमाणं च क्षेत्रं स्पर्शना च कालोऽन्तरश्च भागो, भावोऽल्पबहुत्वं चैव।।४३ ।। Emancipation can be described by its nine anuyogadvāra (i) stapadprarüpaņā (existence), (ii) dravya (substance), (iii) pramāņa (quantity), (iv) kśetra (space), (v) sparșa (pervading area), (vi) kāla (time), (vii) antara (interval), (viii) bhāga Page #151 -------------------------------------------------------------------------- ________________ 20 : Navatattva Prakarana (division), and (ix) (bhāva) reflection and alpabahutva (relative. numerical strength). (43) सत सुद्धपयत्ता, विज्जंतं खकुसुमव्व न असंतं। मुक्खत्ति पयं तस्स उ, परुवणा मग्गणाईहिं ।।४४।। samtaṁ suddhapayattā vijjaṁtam khakusuaṁvva na asamtam mukkhatti payam tassa u parivana magganaihim. [44] सत्, शुद्धपदत्वाद्विद्यमानं, खकुसुमवत् न असत् "मोक्ष" इति पदं तस्य तु, प्ररूपणा मार्गणादिभिः ।।४४।। Moksa (emancipation) is the reality because it is of one pada (single word without being compound). The things possessing one pada are always Sat (real) for example- cow, horse, elephant etc. The things having two padas are some times real and sometimes unreal like Rājapurușa and Akāśakusuma (sky flower). (44) गइइंदिए काए, जोए वेए कसायनाणे अ। संजमदंसणलेसा, भव सम्मे सन्नि आहारे।।४५।। gaiiņdiye kāye joe veye kasāyanāņo a samjamdamsanalesa bhava samme sanni āhāre. [45] गतिरिन्द्रियं च कायः, योगो वेदः कषायो ज्ञानं च संयमो दर्शनं लेश्या, भव्यः सम्यक्त्वं संज्ञाहारः ।।४५ ।। Gati (state of existence), indriya (sense organs), kāya (body), veda (sexual inclinations), kaśāya (passions), jñāna (knowledge), samyama (restraintment), darśana (intution), leśyā (colour of thoughts), bhavya (liberatableones, samyaktva (righteousness), sanjni (rational) and āhāra (nourishment) are the fourteen mārganās(categories of disquisition doors)of soul. (45) नरगइपणिदितस भव, सनि अहक्खाय खइयसम्मत्ते। मुक्खोऽणाहार केवल-दसणनाणे न सेसेसु।।४६।। Page #152 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Navatattva Prakarana: 21 naragaipanimditasa bhava sanni ahakkhāya khaiasammatte A mukkho, nāhāra kevala-damsananāne na sesesu. [46] नरगतिपंचेन्द्रियत्रसभव्यसं ज्ञियथाख्यातक्षायिकसम्यक्त्वे मोक्षो ऽनाहारकेवलदर्शनज्ञाने, न शेषेषु ।। ४६ ।। Mokşa (emancipations) is not possible through all mārgaṇās. It is possible only through the mārgaṇās named-manuşya gati (human state of existence), pancendriya jīva (five sensed soul), trasakāya (mobile bodied ), bhavya ( liberatableones), yathākhyātacāritra (possessing ideal and passionless conduct), kśāyika samyaktva (righteousness attained by the distruction of seven karma prakrtis ), anāhāra (non- nourishment) and kevalajñāna (omniscience). (46) दव्वपमाणे सिद्धाणं, जीवदव्वाणि हुंतिऽवाणि हुंतिऽणताणि । लोगस्स असंखिज्जे, भागे इन्त्रो य सव्वेवि ।। ४७ ।। davvapamāne siddhāṇam jīvadavvāṇi huṁti'ṇaṁtāņi logassa asarkhijje bhāge ekko ya savvevi. [47] द्रव्यप्रमाणे सिद्धानां जीवद्रव्याणि भवन्त्यनन्तानि लोकस्यासंख्येयभागे, एकश्च सर्वेऽपि । ।४७।। In quantity there are infinite number of emancipated souls (Siddhas). There reside, the Siddha and other emancipated soul in innumerable part of loka. (47) फुसणा अहिया कालो, इग- सिद्ध- पडुच्च साइओणंतो । पडिवायाऽभावाओ, सिद्धाणं अंतरं नत्थि ॥ ४८ ॥ phusaṇā ahiyā kālo iga-siddha-paducca sãioṇaṁto padivāyā' bhāvão siddhānam amtaram natthi. [48] स्पर्शनाधिका कालः एकसिद्धं प्रतीत्य साधनन्तः प्रतिपाता ऽभावतः सिद्धानामान्तरं नास्ति ।। ४८ ।। The emancipated soul pervades a larger area. With respect to an Page #153 -------------------------------------------------------------------------- ________________ 22 : Navatattva Prakarana emancipated soul time is both finite and infinite. The time when soul gets emancipated, is finite, since it does not banish from the state of emancipation and due to not being any interval its time is infinite. (48) सव्वजियाणमणते, भागे ते तेसिं दसण नाणं। खइए भावे परिणा-मिए अ पुण होइ जीवत्तं ।।४६।। savvajiyāṇamaņamte bhāge te tesiṁ daṁsaņa nāņaṁ khaie bhāve pariņā-miye a puņa hoi jīvattaṁ. [49] सर्वजीवानामनन्ते भागे ते, तेषां दर्शनं ज्ञानम्। क्षयिके भावे, पारिणामिके च पुनर्भवति जीवत्वम् ।।४६ ।। Emancipated souls (Siddha) are infinite part of all the souls (jivas). Their jnana (knowledge) and darsana (intution) are subsidential (kṣāyika) and life is pariņāmika (transformative).(49) थोवा नपुंससिद्धा, थीनरसिद्धा कमेण संखगुणा। इअ मुक्खतत्तमेअं, नवतत्ता लेसओ भणिया।।५०।। thoā napuṁsasiddhā thīnarasiddhā kameņa saṁkhaguņā ia mukkhatattameam navatatta lesao bhaniya. [50] स्तोका नपुंसकसिद्धाः स्त्रीनरसिद्धाः क्रमेण संख्यगुणाः इति मोक्षतत्त्वमेत-न्नवतत्त्वानि लेशतो भणितानि ।।५० ।। The quantity of emancipated soul as a napunsaka (neuter gender is less; while strī (feminine) and puruışa (masculine) emancipated souls are numerable in number than that of neuter emancipated soul. These are the nine tattvas related very briefly. (50) जीवाइनवपयत्ये, जो जाणइ तस्स होइ सम्मत्तं। भावेण सद्दहंतो अयाणमाणेऽवि सम्मत्तं ।।५।। jīvāinavapayatthe jo jāņai tassa hoi sammattań bhavena saddahamto ayanamanévi sammattam. [51] Page #154 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Navatattva Prakarana : 23 जीवादिनवपदार्थान् यो जानाति तस्य भवति सम्यक्त्वम्। भावेन श्रद्धतोऽज्ञानवतोऽपि सम्यक्त्वम् ।।५१।। One who has the knowledge of these all the nine categories possesses right belief. No matter if one does not know the details of these categories but if he has veneration for these tattvas must possess samyaktva (right belief). (51) सव्वाइ जिणेसर-भासियाइं वयणाइं ननहा हुंति। इइ बुद्धी जस्स मणे, सम्मत्तं निच्चलं तस्स ।।५२ ।। savvāi jiņesara-bhāsiyāīm vayaņāiṁ nannahā huṁti ii buddhi jassa mane sammattam niccalam tassa. [52] सर्वाणि जिनेश्वरभाषितानि वचनानि नान्यथा भवन्ति। इतिबुद्धिर्यस्य मनसि, सम्यक्त्वम् निश्चलं तस्य ।।५२।। The teachings of the Loard Mahāvīra are indeed worth while. It never goes otherwise. One who thinks so, possess firm right belief. (52) अंतोमुहुत्तमित्तंपि, फासियं हुज्ज जेहि सम्मत्तं। तेसिं अवऽढपुग्गल-परियट्टो चेव संसारो।।३।। aṁtomuhuttamittampi phāsiyam hujja jehi sammatta tesiṁ ava'dhapusgala pariyatto cevasaṁsāro. [53] अन्तर्मुहूर्तमात्रमपि, स्पृष्टं भवेद यैः सम्यक्त्वम् । तेषामपार्द्धपुद्गलपरावर्तश्चैव संसारः ।५३ ।। The souls, established in right belief even for a antarmuhürta, their maximan life is no longer than ardhapudgala parāvarta (an unit of time equal to infinite ascending and descending aeon). (53) उस्सप्पिणी अणंता, पुग्गल-परिअट्टओ मुणेयव्यो। तेऽणंताऽतीअद्धा, अणागयद्धा अणंतगुणा।।५४।। Page #155 -------------------------------------------------------------------------- ________________ 24 : Navatattva Prakarana ussappini anamta puggala-pariattao muneyavvo te'nantā'tiaddhā anāgayaddha anantaguna. [54] उत्सर्पिप्पण्योऽनन्ताः पुद्गलपरावर्तको ज्ञातव्यः। तेऽनन्ता अतीताद्धा, अनागताद्धानन्तगुणाः ।।५४ ।। Pudgalaparāvarta comprises a period of infinite ascending aeon (utsarpiņi). It was exisistent in infinite past and will remain in future too, infinite time larger than that of past. (54) जिणअजिणतित्थऽतित्था, गिहि अन्नसलिंग थी नर नपुंसा। पत्तेय सयंबुद्धा, बुद्धबोहिय इक्कणिका य ।।५५ ।। jinaajinatitthatitthā gihi annasalimga thi nara napuṁsā patteya sayambuddha buddhabohiya ikkanikka ya. [55] जिनाजिनतीर्थातीर्था, गृह्यन्यस्वलिङ्गस्त्रीनरनपुंसकाः। प्रत्येकस्वयंबुद्धौ, बुद्धबोधितैकानेकाश्च ।।५५ ।। जिणसिद्धा अरिहंता, अजिणसिद्धा य पुंडरियपमुहा। गणहारि तित्थसिद्धा अतित्थसिद्धा य मरुदेवी।।५६ ।। jiņasiddhā arihaṁtā ajiņasiddhā ya puțdariyapamuhā ganahari titthasiddhā atitthasiddhā ya Marudevī. [56] जिनसिद्धा अर्हन्तो, अजिनसिद्धाश्च पुण्डरिकप्रमुखाः गणधारिणस्तीर्थसिद्धा, अतीर्थसिद्धा च मरुदेवी।।५६ ।। गिहिलिंगसिद्ध भरहो, वकलचीरी य अन्नलिंगम्मि। साहू सलिंगसिद्धा, थीसिद्धा चंदणापमुहा ।।५७।। gihilimigasiddha bharaho Vakkalcīri ya annalinigammi sāhu salimgasiddhā thisddhā camdanapamuhā. [57] गृहिलिंगसिद्धो भरतो, बल्कलचीरी चान्यलिङ्गे। साधवः स्वलिङ्गसिद्धाः स्त्रीसिद्धाश्चन्दनाप्रमुखाः।।५७।। पुंसिद्धा गोयमाइ, गांगेयाइ नपुंसया सिद्धा। पत्तेय-सयंबुद्धा, भणिया करकंडु-कविलाइ।।७।। Page #156 -------------------------------------------------------------------------- ________________ pumisiddha Goamāi gāṁgeyāi napumisayā siddhā patteya sayamibuddha bhaṇiā karakaṁdu kaviläi. [58] पुरुषसिद्धा गौतमादयो, गाङ्गेयादयो नपुंसकाः सिद्धाः । प्रत्येकस्वयंबुद्धाः भणिताः करकण्डुकपिकादयः ॥ ५८ ॥ तह बुद्धबोहि गुरूबोहिया इगसमये इगसिद्धा य । इगसमयेऽवि अणेगा, सिद्धा तेऽणेगसिद्धा य ।। ५६ ।। taha buddhabohi gurübohiyā igasamaye igasiddhā ya igasamay'vi anega siddhā te'negasiddha ya. [59] तथा बुद्धबोधिता गुरुबोधिता एकसमये एकसिद्धाश्च । एकसमयेऽप्यनेकाः, सिद्धास्ते ऽनेकसिद्धाश्च ।। ५६ ।। Navatattva Prakarana : 25 The Siddhas (emancipated souls) are supposed to be of fifteen types (1) Jina siddha- those who get emancipated after being a Tirthankara (after establishing the ford), like Rṣabhdeva and Mahāvīra. (2) (3) (4) (5) (6) Ajijna siddha-those who get emancipated without being a Tirthankara only as a Samanyakevalī, like Pundarika Swāmi.. Tirtha siddha-those who get emancipated after establishing four fold (Caturvidha saṁgha) like Jambüswāmī. Atīrtha siddha-those who get emancipated either before establishment of tirtha (ford) or after curtailment of tirtha, like mother Marudevi. Grihalimga siddha- those who get emancipated as a lay devotee (śrāvaka) after attaining kavalajñana (omniscience), as Bharata Cakravarti. Anyalimga siddha- those who get emancipated as an ascetic even belonging to other religions, after attaining omnisciences like- Valkalacīri. Page #157 -------------------------------------------------------------------------- ________________ 26 : Navatattva Prakarana (7) Swalimga siddha- those who get emancipated as an ascetic after attaining omniscience Strīlimga siddha- those who get emancipated as a women, like Candanabālā. Puruş linga siddha- those who get emancipated as a man, like Gautama swāmī. (10) Napuṁşakalimga siddha- those who get emancipated as a eanuch (napunşaka) as Gāngeya. (11) Svayambuddha siddha- those who get emancipated without any proper effecient cause with their own effort, as Kapila. (12) Pratyeka buddha siddha- those who get emancipated on account of their own efficiency and effort, as Karakandu. (13) Buddhabodhita- those who get emancipated hearing sermon of their teachers. (14) Ekasiddha- when only one soul gets emancipated at a : time is called Ekasiddha, as Mahāvīra swāmī. (15) Anekasiddha-when more than one soul get emancipated at a time, they are called anekasiddha. (55-59) जइ आइ होइ पुच्छा, जिणाण मग्गंमि उत्तरं तइआ। इक्कस्स निगोयस्स, अणंतभागो य सिद्धिगओ।।६०।। jai āi hoi pucchā jiņāņa maggammi uttaraṁ taiā ikkassa nigoyassa, anaṁtabhāgo ya siddhigao. [60] यदा इति पृच्छा जिनानां मार्गे उत्तरं तदा। एकस्य निगोदस्य, अनंतभागश्च सिद्धिगतः।। When a question was asked to Loard Mahāvīra that till now how many souls (jīvas) have got emancipated, his simple answer to this question was that less than infinite part of nigoda( body of microorganisms/infinite microsouls) have got emancipated. (60) Page #158 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Navatattva Prakarana : 27 Notes:(1) It is noteworthy that the soul assimilates only that karmic matter which is within its own pradeśas and which is devided into eight species of karma. Eight species of karma may be compared as under: Knowledge obscuring karma may be compared with bondage since it covers the knowledge, intution obscuring (darśanāvaraniya) karma with a watchman as it stops the intution, feeling producing (vedanīya) karma with a honey adged sword since it produces pain and pleasure both; belief and conduct obscuring (mohaniya) karma with a wine as it produces attachment and affection to the worldly things; age determining karma with a shackles as it binds the individuals in the shackles of age; personality determining (āyuşya) karma with an artist as artist makes good and bad paintings in the same way personality determining (nāma) karma makes the body ugly and beautiful; status determining (gotra) karma with a potter as he makes pots big and small according to his own desire and power hindering (antarāya) karma may be compared with a store keeper since it obstructs charity, receiving, enjoyment and will power. Page #159 -------------------------------------------------------------------------- ________________ 1. 2. 3. 4. 5. 6. 8. BIBLIOGRAPHY A Source Book of Jain Philosophy, Devendra Muni Shastri, Shri Tarak Guru Jain Granthamala, Udaipur 1983, Glossary of Jain Terms. Edited and compiled by Dr. N.L. Jain, Published by Jain International, Ahmedabad 1995. Jaina Sahityano Samkṣipta Itihās, Mohanlal Dalichand Desai, Svetambara Jaina Conference, Bombay 1933. 9. Jaina Sanskṛta Sahityano Itihas- Vol. I-II H.R. Kapadia. Shri. Muktikamal Jain Mohanmala N.64 Badodara, 1968. 7. Labdhisara, Prof. L.C. Jain Vol. I. The S.S. Muralidhar Kanhaialal Trust Katni- 1994. 12. Jainism: Precepts and Practice (Vol. 1-2) by Puran Chand Nahar, Krishnachandra Ghosh, Caxton Publication- Delhi 1988. Jinaratnakosa, Hari Domodar Velankar, Bhandarkar Oriental Research Institute- Poona- 1944.. Prakaraṇamālā- Shri Sudarsan Vijayaji Maharaj, Shri Vijaydan Surishwarji Jain Granthamala Gopipura-Surat. V.S. 2003. 10. 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