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14 : श्रमण/अक्टूबर-दिसम्बर/१६६७
१४. मथुरा, प्राकृत भग्न पृ० ४८ क्रमांक ७२ 'नमो अरहंतान' १५. मथुरा, प्राकृत भग्न पृ० ४८ क्रमांक ७३ 'नमो अरहंतान' १६. मथुरा, प्राकृत भग्न पृ० ४८ क्रमांक ७५ 'अरहंतान वधमानस्य' १७. मथुरा, प्राकृत भग्न पृ० ५१, क्रमांक ८० 'नमो अरहंतान.....द्वन"
सूरसेन प्रदेश, जहाँ से शौरसेनी प्राकृत का जन्म हुआ, वहाँ के शिलालेखों में दूसरी-तीसरी शती तक णकार एवं 'द' श्रुति के प्रयोग का अभाव यही सिद्ध करता है कि दिगम्बर आगमों एवं नाटकों की शौरसेनी का जन्म ईसा की दूसरी शती के पूर्व का नहीं है, जबकि नकार प्रधान अर्धमागधी का प्रयोग तो अशोक के अभिलेखों से अर्थात् ई०पू०. तीसरी शती से सिद्ध होता है। इससे यही फलित होता है कि अर्धमागधी आगम प्राचीन थे, आगमों का शब्द रूपान्तरण अर्धमागधी से शौरसेनी में हुआ है, न कि शौरसेनी से अर्धमागधी में। दिगम्बर मान्य आगमों की वह शौरसेनी जिस प्राचीनता का बढ़-चढ़ कर दावा किया जाता है, वह अर्धमागधी और महाराष्ट्री दोनों से ही प्रभावित है और न केवल भाषायी स्वरूप के आधार पर अपनी विषय वस्तु के आधार पर अपितु भी ईसा की चौथी- पाँचवी शती के पूर्व की नहीं है।
यदि शौरसेनी प्राचीनतम प्राकृत है, तो फिर सम्पूर्ण देश में ईसा की तीसरी चौथी शती तक का एक भी अभिलेख शौरसेनी प्राकृत में क्यों नहीं मिलता है। अशोक के अभिलेख, खारवेल के अभिलेख, बलडी का अभिलेख और मथुरा के शताधिक अभिलेख कोई भी तो शौरसेनी प्राकृल में नहीं हैं। इन सभी अभिलेखों की भाषा क्षेत्रीय बोलियों से प्रभावित मागधी ही है। अतः उसे अर्धमागधी तो कहा जा सकता है, किन्तु शौरसेनी कदापि नहीं कहा जा सकता है। अतः प्राकृतों में अर्धमागधी ही प्राचीन है, क्योंकि मथुरा के प्राचीन अभिलेखों में भी 'नमो अरहंतानं', 'नमो वधमानस' आदि अर्थमागधी शब्द रूप मिलते हैं। श्वेताम्बर आगमों एवं अभिलेखों में आये ‘अरहंतानं' पाठ को तो प्राकृत-विद्या में खोटे सिक्के की तरह बताया गया है, इसका अर्थ है कि यह पाठ शौरेसनी का नहीं है (प्राकृत-विद्या अक्टूबर-दिसम्बर ६४ पृ०१०-११) अतः शौरसेनी उसके बाद ही विकसित हुई है। शौरसेनी आगम और उनकी प्राचीनताः
जब हम आगम की बात करते हैं तो हमें यह स्पष्ट रूप से समझ लेना चाहिए कि आचारांग आदि द्वादशांगी जिन्हें श्वेताम्बर, दिगम्बर और यापनीय परम्परा आगम
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