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80 : श्रमण/अक्टूबर-दिसम्बर/१६६७
विपरीत यदि काल को भी सभी कार्यों का कारण माना जाय, स्वभाव को भी सभी कार्यों का कारण माना जाय, नियति को भी सभी कार्यों का कारण स्वीकार किया जाय, पूर्वकृत कर्म को भी और पौरुष को भी तो यह एकान्तवादों का समवायमात्र होगा, समन्वय नहीं।
संदर्भ१. (क) “सर्वं सदैव नियतं भवति स्वकीयकर्मोदयान्मरणजीवितदुःखसौख्यम् ।
समयसारकलश, १६८ (ख) "आर्हतानां किञ्चित् सुखदुःखादि नियतित एवं भवति तत्कारणस्य
कर्मणः कस्मिंश्चिदवसरेऽवश्यम्भाव्युदय सद्भावान्नियतिकृतमित्युच्यते।" सूत्रकृतांगटीका, १/२/४
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पार्श्वनाथ विद्यापीठ में अध्ययनरत पूज्य साध्वीवृन्द एवं छात्र-छात्राएं।
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