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( ७४ ) को ग्रहण किया है। तथा इनमें से दृष्टि सम्बन्ध के आधार पर कार्य सिद्धि योग तथा स्थान एवं युति सम्बन्ध के आधार पर राज योगों का निरूपण किया है । यहां राज योग शब्द भी पाराशर के विशेष फलदायक' अर्थ में प्रयुक्त हुआ है। क्योंकि कार्येश प्रश्न की प्रकृति अनुसार राज्येश भाग्येश , धनेश, सुखेश, पुत्रेश या रोगेश आदि में से कोई भी हो सकता है। उसके लिए यह आवश्यक नहीं है कि वह राज्य या भाग्य भाव का ही प्रतिनिधित्व करे।
उक्त चार राजयोगों से पहले दो योग स्थान सम्बन्ध के आधार पर और अन्तिम दो योग युति सम्बन्ध के आधार पर बनते हैं। इन योगों में विशेष बात यह कि योगकारक ग्रहों पर चन्द्रमा की दष्टि अनिवार्य रूप से होनी चाहिए। उक्त योग क्रमश: इस प्रकार हैं: प्रथम योग : लग्नेश कार्यभाव में और कार्येश लग्न भाव में
हो तथा इनमें से किसी पर चन्द्रमा की दृष्टि हो। द्वितीय योग : लग्नेश लग्न में और कार्येश कार्य भाव में स्थित
हो तथा इनमें से किसी पर चन्द्रमा की दृष्टि हो। ततीय योग : लग्नेश और कार्येश दोनों लग्न में और चन्द्रमा
इन्हें देखता हो। चतर्थ योग : लग्नेश और कार्येश दोनों कार्य भाव में हों, तथा
__ चन्द्रमा इन्हें देखता हो। कार्य सिद्धि का बीज होने के कारण चन्द्रमा का विशेष महत्व है। इसी कारण से इन योगों में चन्द्रमा की दृष्टि
१. देखिये-श्लोक ६०.
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