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178... प्रतिष्ठा विधि का मौलिक विवेचन
ईशान
उ उत्तर
वायव्य
च
पूर्व
अ
आग्नेय
दक्षिण द
नैऋत्य
पश्चिम क
'च अ क' रेखा पर दोनों तरफ समकोण अथवा लम्ब बनाने के लिए 'च क' को त्रिज्या मानकर 'क' केन्द्र एवं 'च' केन्द्र से दो वृत्त बनायें। ये दोनों वृत्त 'उ' एवं 'द' बिन्दु पर एक दूसरे को काटेंगे। अब 'उ द' रेखा को 'अ' पर मिलाएँ। इस प्रकार हमें चारों दिशाओं की रेखाएँ मिल जायेंगी ।
'अ द'
दक्षिण
'अ उ'
उत्तर
'अ क'
पश्चिम
'अ च'
पूर्व दिशा बतलाती है।
आधुनिक विधि- दिशा निर्धारण के लिए वर्तमान काल में चुम्बकीय सुई का प्रयोग किया जाता है। इसमें एक चुम्बकीय सुई अपनी धुरी पर घूमती रहती है। सुई एक डायल पर स्थित होती है। डायल में उत्तर - दक्षिण एवं पूर्व-पश्चिम दिशाएँ 90°-90° कोण पर दिखाई जाती है। ऐसे कुल 360° में डायल विभाजित रहता है। चुम्बक का यह गुण होता है कि स्वतन्त्रता पूर्वक घूमने पर कुछ ही समय में वह पृथ्वी की चुम्बकीय धारा के समानान्तर हो जाता है तथा सुई उत्तर-दक्षिण दिशा में स्थिर हो जाती है। सुई के उत्तरी ध्रुव पर लाल निशान अथवा तीर का निशान लगा रहता है। इस डायल को घुमाकर उत्तर दिशा में तीर पर लाया जाता है। इससे हमें सारी दिशाओं का ज्ञान हो जाता है। अच्छे किस्म के यन्त्रों में आजकल सुई को डायल में ही फिट कर देते हैं तथा पूरा डायल