Book Title: Jain Jyotirgranth Sangraha
Author(s): Kshamavijay
Publisher: Mulchand Bulakhidas Shah
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। जैनज्योतिर्ग्रन्थसंग्रहे हारिभद्रीया लग्नशुद्धिः। ७ चंदो बीओ तइओ छट्ठो इक्कारसो तह य ॥ १०३॥ तइओ छट्ठो दसमो इकारसमो कुजो बुहो अ सुहो । लग्गगओ चउ-पंच-सत्तम-नव-दसमगो अ गुरू ॥ १०४ ॥ तइओ छट्ठो नवमो दुवालसो सुंदरो भवे सुक्को ।३ बीओ पंचमओ अट्ठमो अ इक्कारसो असणी ॥ १०५ ॥ दुपणछट्ठो दु-ति-छठे ति-छ-दसि ति-छ-दसि तिकोणकिंदेसु । ति-छ-न-व-बारसि दु-पण-ट्ट सव्वि इगारे सियं मुत्तुं ॥१०६॥ गुरुबुहससिसूराणं छन्वग्गो ६ इह सुहो न सेसाणं । जा उण छव्वग्गसुद्धी पुव्वुत्ता सा पइट्ठाए॥१०७॥ अहवा वि मज्झिमबलं काऊण सणिं गुरुं च बलवंतं । अबलं शुकं लग्गे तो दिक्खं दिज सीसस्स ॥ १०८ ॥ दुपणछअडेक्कारसठाणे ९ मझिमबलो सणी होइ । लग्गगओ चउ सत्तम दसमो अ गुरू भवे बलवं ॥ १०९ ॥ छट्ठो दुवालसो तह अबलो सुक्को सुहो वयग्गहणे । दो तइय पंच छडिक्कारसमो तह बुहो सुहओ ॥ ११० ॥ तइए छटे १२ दसमे इकारसमम्मि मंगले लग्गे । दिक्खं पत्तो सत्तो जायइ बहुनाणतवजुत्तो ॥ १११ ॥ सुकंगारयमंदाण सत्तमे ससहरे गहियदिक्खो । पीडिजए अवस्सं सत्थदुसीलत्तवाहीहि ॥ ११२ ॥ इय दिक्खाकुंडलिया १५ दिसिमित्तं दंसिआ मए एवं । वुच्छं इओ पइट्ठाकुंडलियमहं समासेणं ॥ ११३ ॥ गुरुबुहसुक्का सुहया लग्गगया मज्झिमो ससी लग्गे । सूरंगारयसणिणो वजेयव्वा पयत्तेणं ॥ ११४ ॥ गुरुबुहससिणो सुहया १८ बीए ठाणम्मि मज्झिमो सुक्को । कजस्स विणासयरा दिणयरसणिमंगला बीआ ॥ ११५ ॥ तइयम्मि सुहा रविससिबुहभोमसणिच्छरा न संदेहो। मज्झिमओ सुरमंती सुक्को उ असुंदरो तइओ ॥ ११६ ॥ लग्गाओ२१ चउत्थगया गुरुबुहसुक्का सुहावहा भणिया । मज्झत्थो अ चउत्थो चंदो सेसा गहा असुहा ॥ ११७ ॥ रविससिकुजसुक्कसणी पंचमठाणम्मि मज्झिमा नेआ । बुहगुरुणो पुण दुनि वि सव्वत्थपसाहया तत्थ ॥११८॥२४ रविससिकुजगुरुसणिणो छढे ठाणम्मि संठिआ सुहया । सुक्कबुहा पुण छट्ठा मज्झिमया हुंति नायव्वा ॥ ११९ ॥ सत्तमठाणम्मि गुरू सुहओ
१ गुरु बुह सणि सूराणं इति प्रत्यन्तरे,
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