Book Title: Savruttik Aagam Sootraani 1 Part 20 Pragyapana Mool evam Vrutti Part 3
Author(s): Anandsagarsuri, Dipratnasagar, Deepratnasagar
Publisher: Vardhaman Jain Agam Mandir Samstha Palitana
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Page #1 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम नमो नमो निम्मलदंसणस्स ॐ पूज्य आनंद - क्षमा- ललित-सुशील सुधर्मसागर - गुरुभ्यो नमः सवृत्तिक- आगम-सुत्ताणि आगम 53710 आगम १५ “प्रज्ञापना” मूलं एवं वृत्तिः [3] आगा ~1~ भाग 20 आगम आगम आगम आगम आगम आगम आगम आगम मूल संशोधक :- पूज्यपाद आगमोद्धारक आचार्यश्री आनंदसागरसूरीश्वरजी महाराजसाहेब 2 आगम 2 आगम अभिनव-संकलनकर्ता :- आगम दिवाकर मुनिश्री दीपरत्नसागरजी [M.Com., M.Ed., Ph.D., श्रुत नागम 2 आजम + आजम के आगम पूज्य शासनप्रभावक आचार्य श्री हर्षसागरसूरिजी की प्रेरणा से 'वर्धमान जैन आगम मंदिर संस्था' पालिताणा Page #2 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ईस प्रोजेक्ट के संपूर्ण-अनुदान-दाता OFF OFF OF श्री आगम मंदिर पालिताणा UFOTEOROL ~2~ Page #3 -------------------------------------------------------------------------- ________________ नमो नमो निम्मलदसणस्स सवृत्तिक-आगम-सुत्ताणि मूल संशोधक अभिनव-संकलनकर्ता M ORUAE - पूज्यपाद आगमोद्धारक आचार्य श्री आनंदसागरसूरीश्वरजी महाराज - आगम दिवाकर मुनिश्री दीपरत्नसागरजी [M.Com., M.Ed., Ph.D., श्रुतमहर्षि] प्रत-प्राप्ति और पेज सेटिंग कर्ता : के चेरमन श्री प्रवीणभाई शाह, अमेरिका मुद्रक : नवप्रभात प्रिन्टींग प्रेस अमदाबाद Mo 9825598855/9825306275 ~3~ Page #4 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ( ਸ ਸ ਸ ਸ ਸ ਸ ਸ ਸ ਗੁਰ ਰਾਗ ਰ ਗ ਰ ਸਾਹਸ ਸ ਸ ਸ ਦਰਜ ਕਰ आगम ਸਜਨ , ਹਾਲ ਉਹ ਰਸ ਕਸ ਕਸਰ Page #5 -------------------------------------------------------------------------- ________________ [भाग-२०] श्री प्रज्ञापना (उपांगसूत्रम्-१५/३) नमो नमो निम्मलदंसणस्स पूज्य श्रीआनंद-क्षमा-ललित-सुशील-सुधर्मसागर गुरुभ्यो नम: "प्रज्ञापना" मूलं एवं वृत्ति: (भाग-३) [मूलं एवं मलयगिरि-प्रणीत वृत्ति:] [आद्य संपादकश्री] पूज्य आगमोद्धारक आचार्यदेव श्री आनंदसागर सूरीश्वरजी म. सा. (किञ्चित वैशिष्ठ्यं समर्पितेन सह) पुन: संकलनकर्ता- मुनि दीपरत्नसागर (M.Com., M.Ed., Ph.D.श्रुतमहर्षि) 28/07/2017, शुक्रवार, २०७३ श्रावण शुक्ल ५ 'सवृत्तिक-आगम-सुत्ताणि' श्रेणि भाग-२० श्री आगमोद्धारक-वाचना-शताब्दी-वर्ष-निमित्त 'आगम-वृत्ति-मुद्रण-प्रोजेक्ट': ~5~ Page #6 -------------------------------------------------------------------------- ________________ सामाचारी-संरक्षक, ज्ञानधनी, आगम-संशोधक, तीव्र-मेधावी, समाधिमृत्यु-प्राप्त, बहुमुखीप्रतिभाधारक पज्यपाद आगमोद्धारक आचार्यदेव श्री आनंदसागरसरीश्वरजी महाराज साहेब | .जिन्होने शुद्ध-श्रद्धा, सम्यक् श्रुत आराधना, यथाख्यातचारित्र के प्रति गति और अंत समय देह-ममत्व के त्याग के द्वारा कायोत्सर्ग नामक : | अभ्यंतर-तप कि मिशाल कायम कि है ऐसे बहुश्रुत आचार्य श्री सागरानंदसूरीश्वरजी महाराज का परिचय कराना मेरे लिए नामुमकिन है, फ़िर भी । गरुभक्ति बद्धि से श्रद्धांजली स्वरुप एक मामली सी झलक पैस करने का यह प्रयास मात्र है। .चारित्र-ग्रहण के बाद अल्प कालमे जो अपने गुरुदेव की छत्रछाया से दूर हो गये, तो भी गुरुदेव के स्वर्ग-गमन को सिर्फ कर्मो का प्रभाव मानकर अपने संयम के लक्ष्य प्रति स्थिर रहते हुए अकेले ज्ञान-मार्ग कि साधना के पथ पर चले | पढाई के लिए ही कितने महिनो तक रोज एकासणा तप के साथ बारह किल्लोमिटर पैदल विहार भी किया | लेकिन अपने मंझिल पे डटे रहे, और परिणाम स्वरुप संस्कृत एवं प्राकृत भाषा का, । प्राचीन लिपिओ का, व्याकरण-न्याय-साहित्य आदि का सम्पूर्ण ज्ञान प्राप्त किया | जैन आगमशास्त्रो के समुद्र को भी पार कर गए। .एक अकेला आदमी भी क्या नहीं कर शकता? इस प्रश्न का उत्तर हमें इस महापुरुष के जीवन और कवन से मिल गया, जब वे चल पड़े | देवर्द्धिगणी क्षमाश्रमण के स्थापित पथ पर. बिना किसी सहाय लिए हए सिर्फ अकेले ही "जैन-आगम-शास्त्रो" को दीर्घजीवी बनाने के लिए अनेक हस्तप्रतो से शुद्ध-पाठ तैयार किये | दो वैकल्पिक आगम, कल्पसूत्र और निर्यक्तिओ को जोड़कर ४५ आगम-शास्त्रो को संशोधित कर के संपादित किया : || फिर पालीताणामें आगम मंदिर बनवाकर आरस-पत्थर के ऊपर ये सभी आगम-साहित्य को कंडारा, सूरतमें तामपत्र पर भी अंकित करवाए और । : "आगम मंजूषा" नाम से मुद्रण भी करवा के बड़ी बड़ी पेटीमें रखवा के गाँव गाँव भेज दिए | वर्तमानकालमे सर्व प्रथमबार ऐसा कार्य हुआ | .सिर्फ मूल आगम के कार्य से ही उन के कदम रुके नही थे, उन्होंने आगमो की वृत्ति, चूर्णि, नियुक्ति, अवचूरी, संस्कृत-छाया आदि का | • भी संशोधन-सम्पादन किया | उपयोगी विषयो के लिए उन्होंने एक लाख श्लोक प्रमाण संस्कृत-प्राकृत नए ग्रंथो की रचना भी की | कितने ही ग्रंथो : की प्रस्तावना भी लिखी | ये सम्यक्-श्रुत मुद्रित करवाने के लिए आगमोदय समिति, देवचंद लालभाई इत्यादि विभिन्न संस्था की स्थापना भी की। | .ज्ञानमार्ग के अलावा सम्मेतशिखर, अंतरीक्षजी, केशरियाजी आदि तीर्थरक्षा कर के सम्यक-दर्शन-आराधना का परिचय भी दिया | राजाओं। को प्रतिबोध कर के और वाचनाओ द्वारा अपनी प्रवचन-प्रभावकता भी उजागर करवाई | बालदिक्षा, देवद्रव्य-संरक्षण, तिथि-प्रश्न इत्यादि विषयोमे | सत्य-पक्षमें अंत तक दृढ़ रहे | जैनशासन के लिए जब जरुरत पड़ी तब अदालती कारवाईओ का सामना भी बड़ी निडरता से किया था | . सागरानंदजी के नाम से मशहूर हो चुके पूज्य आनंदसागरसूरीश्वरजीने अपने परिवार स्वरुप ८७० साधू-साध्वीजी भी शासन को भेट किये | ...ये थे हमारे गुरुदेव "सागरजी"... ......मुनि दीपरत्नसागर... . -.. -.. -.. Page #7 -------------------------------------------------------------------------- ________________ संयमैकलक्षी, उपधान-तप-प्रेरक, चारित्र-मार्ग-रागी, प्रवचन-पटु, सुपरिवार-युक्त पूज्य गच्छाधिपतिआचार्यदेव श्री देवेन्द्रसागरसूरीश्वरजी महाराज साहेब ... परमपूज्य आचार्यश्री आनंदसागरसूरीश्वरजी के पाट-परंपरामे हुए तिसरे गच्छाधिपति थे पूज्य आचार्य श्री देवेन्द्रसागरसूरीश्वरजी, जो एक । | पून्यवान् आत्मा थे, दीक्षा ग्रहण के बाद अल्पकालमे ही एक शिष्य के गुरु बन गये | फ़िर क्या । शिष्यो कि संख्या बढ़ती चली, बढ़ते हुए पुन्य के • साथ-साथ वे आखिर 'गच्छाधिपति' पद पे आरूढ़ हो गए | इस महात्मा का पुन्य सिर्फ शिष्यों तक सिमित नही था, वे जहा कहीं भी 'उपधान-तप' की प्रेरणा करते थे, तुरंत ही वहां 'उपधान' हो जाते थे | प्रवचनपटुता एवं पर्षदापन्य के कारण उन के उपदेश-प्राप्त बहोत आत्माओने संयम-मार्ग का स्वीकार किया | खुद भी संयमैकलक्षी होने के कारण चारित्रमार्ग के रागी तो थे ही, साथसाथ ज्ञानमार्ग का स्पर्श भी उन का निरंतर रहेता था | आप कभी भी दुपहर को चले जाइए, वे खुद अकेले या शिष्य-परिवार के साथ कोई भी ग्रन्थ के अध्ययन-अध्यापनमें रत दिखाई देंगे। ... ये तो हमने उनके जीवन के दो-तीन पहेल दिखाए | एक और भी अनुसरणीय बात उन के जीवनमें देखने को मिली थी- 'आराधना-प्रेम'. कैसी भी शारीरिक स्थिति हो, मगर उन्होंने दोनों शाश्वती ओलीजी, [पोष)दशमी, शुक्ल पंचमी, त्रिकाल देववंदन, पर्व या पर्वतिथि के देववंदन आदि : आराधना कभी नहीं छोड़ी | आखरी सालोमें जब उन को एहसास हो गया की अब 'अंतिम-आराधना' का अवसर नजदीक है, तब उन के मुहमें एक ही | रटण बारबार चालु हो गया- “अरिहंतनुं शरण, सिद्धनुं शरण, साधुनुं शरण, केवली भगवंते भाखेला धर्मनु शरण' इसी चार शरणो के रटण के साथ ही वे : | समाधि-मृत्यु-रूप सम्यक् निद्रा को प्राप्त हुए थे | ऐसे महान् सूरिवर को भावबरी वंदना | ... मुनि दीपरत्नसागर.... ... श्री वर्धमान जैन आगम मंदिर संस्था, पालिताणा ... पूज्यपाद आनंदसागर-सूरीश्वरजी की बौद्धिक-प्रतिभा का मूर्तिमंत स्वरुप ऐसी इस संस्था की स्थापना विक्रम संवत १९९९ मे महा-वद ५ को हुइ । पूज्य आचार्य हर्षसागरसूरिजी की प्रेरणा से जिन की तरफ़ से इस सवृत्तिक-आगम-सुत्ताणि के लिए संपूर्ण द्रव्य-सहाय की प्राप्ति हुइ । शिल्प-स्थापत्य, शिलोत्कीर्ण आगम और समवसरण स्थित नयनरम्य ४५ चौमुख जिन-प्रतिमाजी से सुशोभित ऐसा ये 'आगममंदिर' है, जो शत्रुजय-गिरिराज कि तलेटीमे स्थित है | वर्तमान २४ जिनवर, २० विहरमान जिनवर और १ शाश्वत मिलाकर ४५ चौमुखजी यहा बिराजमान है | जहां : |४० समवसरण की रचना मेरु पर्वत के तिनो काण्ड के वर्षों के अनुसार चार अलग-अलग रंगो के आरस-पत्थर से बना है, देवो द्वारा रचित समवसरण | : के शास्त्र वर्णन-अनुसार आगम-मंदिर कि समवसरण का स्थापत्य है | ऐसी अनेक विशेषता से युक्त ये आगममंदिर है। *मुनि दीपरत्नसागर... -.. -.. -.. -.. -.. ~7~ . . Page #8 -------------------------------------------------------------------------- ________________ - .. - .. - .. - .. - .. - .. - .. - .. - .. . ____ 'सागर-समुदाय-एकता-संरक्षक, तीर्थ-उद्धार-कार्य-प्रवृत्त, गुणानुरागी' इस “सवृत्तिक-आगम-सुत्ताणि' श्रेणि भाग १ से ४० के संपूर्ण अनुदान के प्रेरणादाता पूज्य शासनप्रभावक आचार्य श्री हर्षसागरसूरिजी महाराज साहेब पूज्यपाद स्व. गच्छाधिपति देवेन्द्रसागर-सूरीश्वरजी के विनयी शिष्य एवं दो गच्छाधिपतिओ के मुख्य सहायक के रुपमे 'सागर समुदाय' के सुचारु संचालक पूज्य हर्षसागरसूरिजी, जिन की प्रेरणा से ये "सवृत्तिक-आगम-सत्ताणि" के मुद्रण के लिए संपूर्ण द्रव्यराशि प्राप्त हुई, उनका अत्यल्प परिचय यहां करेंगे| समुदाय-एकता के लिए सदैव प्रयत्नशील रहते हुए ये महात्मा समुदाय के साधु-साध्वीजी की आवश्यकताओकी पूर्ती के लिए भी प्रवृत्त रहेते है, प्राचीन-अर्वाचीन तीर्थो के जीर्णोद्धार एवं विकाश के लिए भी उत्साहित रहेते है, ज्ञान-क्षेत्र अछूता न रहे इसीलिए अनुमोदना, अनुदान एवं | समय मिलने पर शास्त्र-वांचनमें भी रूचि रखते है | समुदाय के जरूरतमंद साध्वीजी भगवंतो के आवास का विषय हो या साध्वीजी के विहारमें मजदूर का वेतन चुकाना हो, ऐसे छोटे-छोटे कार्यों के प्रति भी उन का लक्ष्य रहेता है | दर्शन-शुद्धि के लिए जब उन्होंने समग्र भारतवर्ष के १०० साल तक के | पुराने जिनालयो में १८ अभिषेक की प्रेरणा की, उस वक्त लगभग सभी अभिषेक-सामग्री की द्रव्य-शुद्धि का ख़याल रखते हुए अपनी मेधावी बुद्धि का : परिचय दिया था, साथमे अनुकंपा भाव से पुजारी या विधि करानेवाले को यत्किंचित् बहुमान प्रगट करते हुए कुछ धन-राशि प्रदान करवाई | ऐसे बहुगुण-संपन्न महात्मा पूज्य आचार्यश्री हर्षसागर-सूरिजी को हम भावभरी वंदना करते हुए इस श्रुतकार्य का प्रारंभ करने जा रहे है। - मुनि दीपरत्नसागर [कात्रजपूना, कपडवंज, प्रभासपाटण आदि स्थानोमे आगममंदिर के प्रेरक, कर्मग्रंथ अभ्यासु, निस्पृह महात्मा पूज्यपाद गच्छाधिपति आचार्य श्री दौलतसागर-सूरीश्वरजी महाराज साहेब (एवं) अजातशत्रु, स्वाध्याय-रसिक, प्रशांतमूर्ती और अपने गुरु के प्रीतिपात्र परम पूज्य आचार्य श्री नंदीवर्धनसागर-सूरिजी महाराज साहेब इस पवित्र श्रुत-कार्यमे दोनो सूरिवरो का स्मरण करते हुए कोटि कोटि वंदना के साथ :-..-..-..-..-..-..-..-..-..-..-..-..-..-.. Page #9 -------------------------------------------------------------------------- ________________ मूलाका : ३४९ + २३१ । प्रज्ञापना (उपांग) सूत्रस्य विषयानुक्रम - १ दीप-अनुक्रमा: ६२२ पृष्ठाक: ३५३ मूलाक: विषय: | पृष्ठांक: । । मूलांक: । विषय: | पृष्ठांक: मूलांक: विषय: ००१ | पद ०१- प्रज्ञापना | पद ०३- बहवक्तव्यता (वर्तते) | पद ०७-उच्छवास: १९२ | पद ०२- स्थानं --दवार २०- संजी ३५४ | पद ०८- संज्ञा २५७ | पद ०३- बहुवक्तव्यता --द्वार २१- भवसिद्धिक: ३५६ | पद ०९- योनि: --द्वार ०१- दिशा -द्वार २२- अस्तिकाय: ३६१ पद १०- चरिम: |--द्वार ०२- गतिः -वार २३- चरम: --द्वार ०३- इन्द्रियं --दवार २४- जीव: ३७५ पद ११- भाषा --- --द्वार ०४- काय: |--द्वार २५-क्षेत्रं ४०० पद १२- शरीरं --द्वार ०५- योग: -द्वार २६- बन्धं ४०५ | पद १३. परिणाम: | --द्वार ०६- वेदः |--द्वार २७- पद्गल, दिशा ४१३ पद १४- कषाय: | --द्वार ०७- कषाय: आदि अल्पबहत्त्वं |--द्वार ०८- लेश्या ४१९ पद १५- इन्द्रियं |--द्वार ०९- द्रष्टि : २९८ पद ०४- स्थितिः --उद्देशक: ०१- नामादि --दवार १०- ज्ञानं ३०७ | पद ०५- विशेष --उद्देशक: ०२- उपचयादि |--द्वार ११- अज्ञानं ३२६ पद ०६- व्युत्क्रान्ति: पद १६- प्रयोग: --दवार १२- दर्शनं |--द्वार ०१- द्वादश: --द्वार १३- संयत: --द्वार ०२- चतुर्विंशति: | पद १७- लेश्या --दवार १४- उपयोग: --दवार ०३- सांतरं --उद्देशक: ०१- समाहारादि --दवार १५- आहारक: --द्वार ०४- एकसमयं --उद्देशक: ०२- षड्भेदा: --दवार १६- भाषक: --दवार ०५- आगति: --उद्देशक: ०३- उपपातादि --द्वार १७- परित्त: --द्वार ०६- उद्वर्तना/गति: --उद्देशक: ०४- परिणामादि | --दवार १८- पर्याप्त: --दवार ०७- परभवायु: --उद्देशक: ०५- वर्णादि --द्वार १९- सूक्ष्म --द्वार ०८- आकर्ष:/आयुबंध: --उद्देशक: ०६- मनुष्यापेक्षया पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र-[१५]उपांगसूत्र-[४] "प्रज्ञापना" मूलं एवं मलयगिरि-प्रणीता वृत्ति: ४३८ ४४२ Page #10 -------------------------------------------------------------------------- ________________ मूलाङ्का: ३४९ + २३१ विषय: पद १८- कायस्थिति: --द्वार् ०१- जीव: --द्वार् ०२- गति: --द्वार् ०३ - इन्द्रियं --द्वार् ०४- काय: मूलांक: ४७१ --- --- --- --- --द्वार ०५- योग: --द्वार ०६- वेदं --दवार ०७- कषायः --द्वार ०८- लेश्या --द्वार् ०९- सम्यकत्वं --द्वार १०- ज्ञानं --दद्वार ११ दर्शनं --द्वार १२- संयत: --दवार १३ उपयोग: --द्वार १४- आहार: --दवार १५- भाषक: --द्वार् १६- परितः पृष्ठांक: प्रज्ञापना ( उपांग) सूत्रस्य विषयानुक्रम २ मूलांक: विषय: पृष्ठांक: पद १८- बहुवक्तव्यता ( वर्तते ) --द्वार् २१- अस्तिकाय: --द्वार् २२- चरिम: ४९५ ४९६ ५०९ ५२५ ५३४ ५४६ ५४७ ५४८ ५४९ ५७० पद १९- सम्यकत्वं पद २०- अंतक्रिया पद २१- अवगाहनासंस्थान / शरीर पद २२- क्रिया --- पद २३- कर्मप्रकृत्तिः -- उद्देशक: ०१- अष्टविधा -- उद्देशक: ०२- भेद-प्रभेदाः पद २४- कर्मबन्धं पद २५- कर्मवेदनं पद २६- कर्मवेदबन्धं पद २७- कर्मवेदवेदनं ०१२ ०१२ ०३७ ~10~ ०८९ ०९४ ०९६ १०१ मूलांक: --- ५७२ ५७३ दीप- अनुक्रमाः ६२२ विषय: पद २८ - आहार / उद्देशक : २ वर्तते --द्वार् ०२- भवसिद्धिकत्वं --द्वार ०३- संजी --द्वार ०४- लेश्या -द्वार ०५- द्रष्टि: -द्वार ०६- संयत: --दवार ०७- कषाय: -द्वार ०८- ज्ञानं - दुवार ०९- योग: --द्वार १० उपयोग: --द्वार ११- वेद: --द्वार १२- शरीरं --दवार १३ पर्याप्तिः ५७५ ५७७ पद २८- आहार: १०३ ५७९ --दद्वार १७- पर्याप्तः --द्वार १८- सूक्ष्मं १०३ ५८४ -- उद्देशक: ०१- सचित्तादि -- उद्देशक: ०२--द्वार् ०१ आहारकत्वं १२९ --द्वार १९- संज्ञी --द्वार् २०- भवसिद्धिक: पद ३५- वेदना ५९५ ५९९-६२२ १४० पद ३६- समुद्घातः पूज्य आगमोद्धारकश्री संशोधितः मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित.. आगमसूत्र [१५],उपांगसूत्र [४] “प्रज्ञापना" मूलं एवं मलयगिरि-प्रणीता वृत्तिः पद २९- उपयोग: पद ३०- पश्यता पद ३१- संजी पद ३२- संयतः पद ३३- अवधि: पद ३४- प्रविचारणा पृष्ठांक 830 830 १३८ १३८ १३८ १३८ १४६ १४६ १४६ १४६ १४६ १४६ १५६ १६३ १७२ १७५ १७९ १९२ २१३ २२४ Page #11 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ['प्रज्ञापना' - मूलं एवं वृत्तिः ] इस प्रकाशन की विकास- गाथा यह प्रत सबसे पहले “प्रज्ञापना सूत्रम्” के नामसे सन १९१८ (विक्रम संवत १९७४) में आगमोदय समिति द्वारा प्रकाशित हुई, इस के संपादकमहोदय थे पूज्यपाद आगमोद्धारक आचार्यदेव श्री आनंदसागरसूरीश्वरजी (सागरानंदसूरिजी ) महाराज साहेब | इसी प्रत को फिर से दुसरे पूज्यश्रीओने अपने-अपने नामसे भी छपवाई, जिसमे उन्होंने खुदने तो कुछ नहीं किया, मगर इसी प्रत को ऑफसेट करवा के, अपना एवं अपनी प्रकाशन संस्था का नाम छाप दिया. जिसमे किसीने पूज्यपाद् सागरानंदसूरिजी के नाम को आगे रखा, और अपनी वफादारी दिखाई, तो किसीने स्वयं को ही इस पुरे कार्य का कर्ता बता दिया और श्रीमद्सागरानंदसूरिजी तथा प्रकाशक का नाम ही मिटा दिया | * हमारा ये प्रयास क्यों? * आगम की सेवा करने के हमें तो बहोत अवसर मिले, ४५ आगम सटीक भी हमने ३० भागोमे १२५०० से ज्यादा पृष्ठोमें प्रकाशित करवाए है, किन्तु लोगो की पूज्य श्री सागरानंदसूरीश्वरजी के प्रति श्रद्धा तथा प्रत स्वरुप प्राचीन प्रथा का आदर देखकर हमने इसी प्रत को स् करवाई, उसके बाद एक स्पेशियल फोरमेट बनवाया, जिसमे बीचमे पूज्यश्री संपादित प्रत ज्यों की त्यों रख दी, ऊपर शीर्षस्थानमे आगम का नाम, फिर पद, उद्देश, द्वार्, और मूलसूत्र के क्रमांक लिख दिए, ताँकि पढ़नेवाले को प्रत्येक पेज पर कौनसा पद, उद्देश, द्वार् एवं मूलसूत्र चल रहे है उसका सरलता से ज्ञान हो शके, बायीं तरफ आगम का क्रम और इसी प्रत का सूत्रक्रम दिया है, उसके साथ वहाँ 'दीप अनुक्रम' भी दिया है, जिससे हमारे प्राकृत, संस्कृत, हिंदी गुजराती, इंग्लिश आदि सभी आगम प्रकाशनोमें प्रवेश कर शके | हमारे अनुक्रम तो प्रत्येक प्रकाशनोमें एक सामान और क्रमशः आगे बढते हुए ही है, इसीलिए सिर्फ क्रम नंबर दिए है, मगर प्रत में गाथा और सूत्रों के नंबर अलग-अलग होने से हमने जहां सूत्र है वहाँ कौंस [-] दिए है और जहां गाथा है वहाँ ||-|| ऐसी दो लाइन खींची है या फिर गाथा शब्द लिख दिया है । हमने एक अनुक्रमणिका भी बनायी है, जिसमे प्रत्येक पद, उद्देश, द्वार और मूल लिख दिये है और साथमें इस सम्पादन के पृष्ठांक भी दे दिए है, जिससे अभ्यासक व्यक्ति अपने चहिते विषय तक आसानी से पहुँच शकता है । अनेक पृष्ठ के नीचे विशिष्ठ फूटनोट भी लिखी है, जिसमे उस पृष्ठ पर चल रहे ख़ास विषयवस्तु की, मूल प्रतमें रही हुई कोई-कोई मुद्रण-भूल की या क्रमांकन सम्बन्धी जानकारी प्राप्त होती है । शासनप्रभावक पूज्य आचार्यश्री हर्षसागरसूरिजी म०सा० की प्रेरणासे और श्री वर्धमान जैन आगममंदिर, पालिताणा की संपूर्ण द्रव्य सहाय से ये 'सवृत्तिक-आगम-सुत्ताणि भाग-२० का मुद्रण हुआ है, हम उन के प्रति हमारा आभार व्यक्त करते है । ...... मुनि दीपरत्नसागर. ~11~ Page #12 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (१५) प्रत सूत्रांक [ २८८ -२८९] + गाथा दीप अनुक्रम [५३४ -५३६] “प्रज्ञापना” – उपांगसूत्र- ४/३ (मूलं+वृत्तिः) पदं [२३], -------- उद्देशक: [१], ------- दारं [-1, मूलं [ २८८-२८९] + गाथा पूज्य आगमोद्धारकश्री संशोधितः मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित.. आगमसूत्र - [१५]उपांगसूत्र- [४] "प्रज्ञापना" मूलं एवं मलयगिरि-प्रणीता वृत्तिः अथ त्रयोविंशतितमं कर्मप्रकृतिपदं ॥ २३ ॥ तदेवमुक्तं द्वाविंशतितमं पदं, सम्प्रति त्रयोविंशतितममारभ्यते, अस्य चायमभिसम्बन्धः - दहानन्तरपदे नारकादिगतिपरिणामेन परिणतानां जीवानां प्राणातिपातादिक्रियाविशेषश्चिन्तितः सम्प्रति पुनः कर्मबन्धादिपरिणामविशेषश्चिन्त्यते--तत्र चेयमधिकारद्वारगाथा - ➖➖➖➖➖➖➖ कति पगडी १ कह बंधति २ कहिवि ठाणेहिं बंधए जीवी ३। कति वेदेह य पयडी ४ अणुभावो कहविहो कस्स ५ || १|| कति णं भंते! कम्मपगडीओ पण्णत्ताओ, गो० ! अट्ठ कम्मपगडीओ पण्णत्ताओ, तं० णाणावरणिज्जं १ दंसणावरणि २ वेदणिज्जं ३ मोहणिअं ४ आउयं ५ नाम ६ गोयं ७ अंतराइयं ८, नेरइयाणं भंते ! कह कम्मपगडीओ पं० १, गो० ! एवं चेव, एवं जाव वैमाणियाणं ॥ १ (सूत्रं २८८ ) कहण्णं भंते । जीवे अट्ट कम्मपगडीतो बंधति १, गो० ! नाणावरणिज्जस्स कम्मस्स उदए दरिसणावरणिज्जं कम्मं नियच्छति, दंसणावरणिअस्स कम्मस्स उदरणं दंसणमोहणि कम्मं नियच्छति, दंसणमोहणिअस्स कम्मस्स उदरणं मिच्छतं नियच्छति, मिच्छत्तेणं उदिएणं गो० ! एवं खलु जीवो अट्ठ कम्मपगडीतो बंघति, कण्णं भंते! नेरइए अट्ठ कम्मपगडीओ बंधति ?, गो० ! एवं चेव, एवं जाव वेमाणिते । कहणं भंते ! जीवा अट्ठ कम्मपगडीतो बंधंति, गो० ! एवं चेव जाव बेमाणिया ।। २ ( सूत्रं २८९ ) Furaroonal & Pre Only अथ पद (२३) “कर्मप्रकृति” आरब्धम् अथ (२३) कर्मप्रकृति-पदे उद्देशक: (१) आरब्ध:, अत्र ( २३ ) कर्मप्रकृति-पदे प्रथमे उद्देशके अधिकार : ( १, २) आरब्ध:, ~ 12 ~ Page #13 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम “प्रज्ञापना" - उपांगसूत्र-४ (मूलं+वृत्ति:) पदं [२३], -------------- उद्देशक: [१], ------------- दारं -1, -------------- मूलं [२८८-२८९] + गाथा पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र-[१५]उपांगसूत्र-[४] "प्रज्ञापना" मूलं एवं मलयगिरि-प्रणीता वृत्ति: प्रत प्रज्ञापनाया: मल सूत्रांक [२८८-२८९] प.वृत्ती. ॥४५३॥ गाथा 'कर पगडी' इत्यादि, कति प्रकृतयो भवन्तीत्यादि प्रथमोऽधिकारः, तथा कथं-केन प्रकारेण ताः प्रकृती-III. मातीति द्वितीयः, कतिभिः स्थानबंधातीति तृतीयः, कति प्रकृतीवेदयते इति चतुर्थः, कस्य कर्मणः कतिविधोऽनु- कृतिपदे भागः पञ्चमः । तत्र प्रथमाधिकारनिरूपणार्थमाह-'कति णं भंते ! कम्मपयडीओ पण्णत्ताओं' इति, ननूक्तमेव प्रकृतिक्रियापदे कति कर्मप्रकृतय इति ततः किमर्थमिह प्रकृतिसङ्ख्यार्थः प्रश्नः ।, उच्यते, विशेषप्रतिपादनार्थः, स चायं न्धश्च सू. विशेष:-पूर्व ज्ञानावरणीयादि कर्म बझन् कतिमिः क्रियाभियुज्यते इत्युक्त, क्रियाश्च प्राणातिपातहेतवः, प्राणाति-11 |२८८-२८९ पातश्च बायं ज्ञानावरणीयादिकर्मवन्धकारणं, कर्मवन्धः कार्य, इह तु ज्ञानावरणीयादिकर्म एवान्तरं कर्मबन्धका-18 शरणं प्रतिपाद्यमिति, भगवनिर्वचनमाह-गौतम! अष्टौ कर्मप्रकृतयः प्रज्ञप्ताः, एता एव नामग्राहं दर्शयति-IN 'ज्ञानावरणीयं दर्शनावरणीय' इत्यादि, ज्ञायते-परिच्छिद्यते वस्त्वनेनेति ज्ञानं-सामान्यविशेषात्मके वस्तुनि विशेषग्रहणात्मको बोधः, आनियते-आच्छाधते अमेनेत्यावरणीयं 'कृद्धहुल'मिति वचनात् करणेऽनीयप्रत्ययः, ज्ञानस्यावरणीयं ज्ञानावरणीय, दृश्यतेऽनेनेति दर्शन-सामान्यविशेषात्मके वस्तुनि सामान्यग्रहणात्मको बोधः, उक्तं च-"जं सामन्नग्गहणं भावाणं नेय कटु आगारं । अविसेसिऊण अत्ये दंसणमिइ वुचए समए ॥१॥" यत् सामान्यग्रहणं भावानां नैव कृत्वाऽऽकारम् । अर्थानविशेष्य दर्शनमित्युच्यते समये ॥१॥] तस्यावरणीय दर्शनावरणीयं, तथा वेद्यते-आहादादिरूपेण यदनुभूयते तद्वेदनीयं, अत्र कर्मण्यनीयः, यद्यपि च सर्व कर्म वेधते दीप अनुक्रम [५३४-५३६] wireluniorary.org ~13~ Page #14 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (१५) “प्रज्ञापना" - उपांगसूत्र-४ (मूलं+वृत्ति:) पदं [२३], -------------- उद्देशक: [१], ------------- दारं [-], -------------- मूलं [२८८-२८९] + गाथा पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र-[१५Jउपांगसूत्र-[४] "प्रज्ञापना" मूलं एवं मलयगिरि-प्रणीता वृत्ति: सूत्रांक [२८८ -२८९] तथापि पङ्कजादिशब्दवत् वेदनीयशब्दस्य रूढिविषयत्वात् सातासातरूपमेव कर्म वेदनीयमित्युच्यते, न शेष, तथा मोहयति-सदसद्विवेकविकलं करोति आत्मानमिति मोहनीयं, अत्र बहुलवचनात् कर्य्यनीयः, तथा एतिIN आगच्छति प्रतिवन्धकतां खकृतकर्मबद्धनरकादिकुगतेर्निष्क्रमितुमनसो जन्तोरित्यायुः, अथवा आ समन्तादेति गच्छति भवाद् भवान्तरसान्तो विपाकोदयमित्यायुः, उभयत्राप्यौणादिक उसप्रत्ययः, तथा नामयति-पत्यादि-12 पर्यायानभवनं प्रति प्रवणयति जीवमिति नाम, तथा गूयते-शब्द्यते उच्चावचैः शब्दयेत् तद् गोत्रं-उच्चनीचकलोत्पत्तिलक्षणः पर्यायविशेषः तद्विपाकवेद्यं कर्मापि गोत्रं, कार्ये कारणोपचारात्, यद्वा कर्मणोऽपादानविवक्षा गूयते-शच्यते उच्चावचैः शब्दैरात्मा यस्मात् कर्मणः उदयाद् गोत्रं, तथा जीवं दानादिकं चान्तरा व्यवधानापादनाय एति-गच्छत्यन्तरायं, जीवस्य दानादि कर्तुमुद्यतस्य विघातकृद् भवतीत्यर्थः, अत्राह-नन्वित्थं ज्ञानावरणीयाद्युपन्यासे किश्चिदस्ति प्रयोजनमुत यथाकथञ्चिदेव प्रवृत्तिरिति ?, अस्तीति बूमः, किं तदिति चेत्, उच्यते, इह ज्ञानं दर्शनं च जीवस्य खतत्त्वभूतं, तदभावे जीवत्वस्यैवाभावात् , चेतनालक्षणो हि जीवस्ततः स कथं ज्ञानदर्शनाभावे भवेत् ?, ज्ञानदर्शनयोरपि च मध्ये प्रधानं ज्ञानं, तशादेव सकलशास्त्रादिविषयविचारसन्ततिप्रवृत्तेः, अपिच-सर्वा अपि लब्धयो जीवस्य साकारोपयोगोपयुक्तस्योपजायन्ते, न दर्शनोपयोगोपयुक्तस्य, 'सघाओ लद्धीओ सागरोवउत्तस्स नो अणागारोवओगोवउत्तस्से' [सर्वा लब्धयः साकारोपयोगोपयुक्तस्य नानाकारोपयोगोपयुक्तस्य] serceaeseseseseeयरब्रा गाथा दीप अनुक्रम [५३४-५३६]] ~14~ Page #15 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (१५) “प्रज्ञापना" - उपांगसूत्र-४ (मूलं+वृत्ति:) पदं [२३], -------------- उद्देशक: [१], ------------- दारं [-], -------------- मूलं [२८८-२८९] + गाथा पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र-[१५Jउपांगसूत्र-[४] "प्रज्ञापना" मूलं एवं मलयगिरि-प्रणीता वृत्ति: प्रत सूत्रांक [२८८-२८९] ॥४५४॥ गाथा प्रज्ञापना- पति वचनप्रामाण्यात् , अन्यत्र-यस्मिन् समये सकलकर्मविनिर्मुक्तखरूपो जीवः सम्पद्यते तस्मिन् समये ज्ञानोप-18 पजाना२३कर्मप्रयोगोपयुक्त एव न दर्शनोपयुक्तो, दर्शनोपयोगस्य द्वितीयसमये भावात् , ततो ज्ञानं प्रधानं, तदावारकं च ज्ञानावर-|| यवृत्ती. | कृतिपदे. शणीयं कर्म ततस्तत्प्रथममुक्तं, ततस्तदनन्तरं दर्शनावरणीयं ज्ञानोपयोगाच्युतस्य दर्शनोपयोगेऽवस्थानात् , एते च ज्ञान-18| दर्शनावरणीये खविपाकमुपदर्शयतो यथायोगमवश्यं सुखदुःखरूपवेदनीयकर्मविपाकोदयनिमित्ते भवतः, तथाहि- न्धश्च सू. ज्ञानावरणमुपचयोत्कर्षमधिरूढं विषाकतोऽनुभवन् सूक्ष्म २ तरवस्तुविचारासमर्थमात्मानं जानानः खिद्यते भूरि- २८८-२८२ लोकः, ज्ञानावरणकर्मक्षयोपशमपाटयोपेतश्च सूक्ष्मसूक्ष्मतराणि वस्तूनि निजप्रज्ञया भिन्दानो बहुजनातिशायिनमा-N त्मानं पश्यन् सुखं वेदयते, तथाऽतिनिविडदर्शनावरणविपाकोदये जात्यन्धादिरनुभवति दुःखमद्धतं, दनाचरणक-1 मक्षयोपशमपटिष्टतापरिकरितश्च स्पष्टचक्षुराद्युपेतो यथावद् वस्तूनि पश्यन् वेदयते प्रमोदम्, तत एतदथेप्रतिपत्त्यर्थे । दर्शनावरणीयानन्तरं वेदनीयग्रहणं, वेदनीयं च सुखदुःखे जनयत्सभीष्टानभीष्टविषयसम्बन्धात् ,अभीष्टानभीष्टविषयस-11 सम्बन्धे चावश्यं संसारिणां रागद्वेषौ तौ च मोहनीयहेतुकौतत एतदर्थप्रतिपत्त्यर्थ वेदनीयानन्तरं मोहनीयग्रहणं, मोह-18 नीयमूढाथ जन्तयो बहारम्भपरिग्रहाद्यासक्ता नरकाद्यायुष्कमावनन्ति ततो मोहनीयानन्तरमायुष्कग्रहणं, नरका- ४५४॥ द्यायुष्कोदये चावश्यं नरकगत्यादीनि नामान्युदयमायान्ति तत आयुष्कानन्तरं नामग्रहणं, नामकर्मादये च निय-1॥ मादुच्चनीचान्यतरगोत्रकर्मविपाकोदयेन भवितव्यमतो नामग्रहणानन्तरं गोत्रग्रहणं, गोत्रोदये. चोचःकुलोत्पन्नस्य दीप अनुक्रम [५३४-५३६]] ~15 Page #16 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (१५) “प्रज्ञापना" - उपांगसूत्र-४ (मूलं+वृत्ति:) पदं [२३], -------------- उद्देशक: [१], ------------- दारं -1, -------------- मूलं [२८८-२८९] + गाथा पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र-[१५]उपांगसूत्र-[४] "प्रज्ञापना" मूलं एवं मलयगिरि-प्रणीता वृत्ति: सूत्रांक [२८८ -२८९] गाथा eeeeeeeee प्रायो दानलाभान्तरायादिक्षयोपशमो भवति, राजप्रभृतीनां प्राचुर्येण दानलाभादिदर्शनात् , नीचैःकुलोत्पन्नस्य हैं। दानलाभान्तरायायुदयोऽन्त्यजातीनां तथादर्शनात, तत एतदर्थप्रतिपत्त्यर्थ गोत्रानन्तरमन्तरायग्रहणं । तदेवमुक्तं प्रथम द्वारम् , अधुना कथं वनातीति द्वितीयद्वारप्रतिपादनार्थमाह-कहण्णं भंते।' इत्यादि, कथं-केन प्रकारेण णमिति वाक्यालङ्कारे जीवोऽष्टौ प्रकृतीनाति ?, भगवानाह-गौतम ! ज्ञानावरणीयस्य कर्मण उदयेन दर्शनावरणीय कर्म निर्गच्छति-निश्चयेन गच्छति, विशिष्टोद्यापनमासादयति, किमुक्तं भवति ?-जानावरणीयमुत्कर्षप्रासमुदयेन अनुभवन् दर्शनावरणीयमुदयेन वेदयते, दृश्यन्ते हि खलु शून्यवादिप्रभृतयः कुवादिनः कुज्ञानवासितान्तःकरणा विपरीतं पश्यन्त इति, दर्शनावरणीयस्य च कर्मण उदयेन दर्शनमोहनीय कर्म निर्गच्छति, विपाकावस्थोदयेन प्रतिपद्यते इति भावः, तस्य दर्शनमोहनीयस्य कर्मण उदयेन मिथ्यात्वं निर्गच्छति, अतत्त्वं तत्वमध्यवस्थति तत्त्वं चातत्त्वमिति भावः, तत एवं मिथ्यात्वोदयेन जीवोऽष्टौ प्रकृतीबंधाति, खलुशब्दः प्रायोवृत्तिदर्शनार्थः, प्रायस्तावदेवमन्यथा सम्यग्दृष्टिरपि कश्चिदष्टौ प्रकृतीनाति, केवलं कश्चित् न बनात्यपि वथा सूक्ष्मसम्परायादिरिति स प्रकारो नोक्तः, एष चात्र तात्पर्याथैः-पूर्वकर्मपरिणामसामर्थ्यात् उत्तरकर्मणः सम्भवो, यथा बीजादरपत्रना-18 लादीनां, उक्तं च-“जीवपरिणामहेउं कम्मत्ता पुग्गला परिणमंति । पुग्गलकम्मनिमित्तं जीवोवि तहेव परिणमइ ॥१॥” इति [ जीवपरिणामहेतोः पुद्गलाः कर्मतया परिणमन्ति । कर्मपुद्गलहेतोर्जीवोऽपि तथैव परिणमति | दीप अनुक्रम [५३४-५३६]] Hirwaitaram.org ~16~ Page #17 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (१५) “प्रज्ञापना” – उपांगसूत्र-४ (मूलं+वृत्तिः ) पदं [२३], -------------- उद्देशक: [१], ------------- दारं -1, -------------- मूलं [२८८-२८९] + गाथा पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र-[१५Jउपांगसूत्र-[४] "प्रज्ञापना" मूलं एवं मलयगिरि-प्रणीता वृत्ति: प्रत सूत्रांक [२८८-२८९]] प्रज्ञापनायाः मल- यवृत्ती. कर्मप्रकृतिपदे स्थानानि ॥४५५॥ गाथा ॥१॥] उक्तमेवार्थ चतुर्विंशतिदण्डकक्रमेण निरूपयति-'कहण्णं भंते ! नेरहए' इत्यादि सुगम, तदेवमुक्त एकत्वेन दण्डकः, सम्प्रति बहुत्वेनाह-'कहण्णं भंते ! नेरइया' इत्यादि पाठसिद्धं । उक्तं द्वितीयद्वारमपि, अधुना कतिभिः स्थानैर्वधातीति तृतीयद्वारमभिधित्सुराह जीवे णं भंते ! णाणावरणिजं कम्मं कतिहिं ठाणेहिं बंधति ?, गो.1 दोहि ठाणेहि, तं०-रागेण य दोसेण य, रागे दुविहे पं० त०-माया य लोभे य, दोसे दुविधे पं०, तं०-कोहे य माणे य, इतेहिं चउहि ठाणेहिं विरितोवग्गहिएहिं एवं खलु जीवे णाणावरणिजं कर्म बंधति, एवं नेरतिते जाब वेमाणिते, जीवा णं भंते ! णाणावरणिज कम्म कतिहिं ठाणेहिं बंधंति , गो.! दोहिं ठाणेहिं एवं चेव, एवं नेरइया जाव वेमाणिया, एवं दसणावरणिजं जाव अंतराइज, एवं एते एमत्तपोहनिया सोळस दंडगा ॥३(सूत्र २९०) 'जीवे णं भंते!' इत्यादि प्रश्नसूत्रं सुगम, भगवानाह-द्वाभ्यां स्थानाभ्यां, त एव स्थाने नामग्राहमाह-तद्यथा-1 रागेण द्वेषेण च, अथ कोऽसौ रागः को वा द्वेष इति , उच्यते, प्रीतिलक्षणो रागोऽप्रीत्यात्मको द्वेषः, एतौ च प्रीत्यप्रीत्यात्मको रागद्वेषौ नात्यन्तं क्रोधादिभ्यो व्यतिरिच्यते, किन्तु तेष्वेवान्तर्भवतः, स चान्तर्भावो नयभेदाद्वि-18 |चित्र इति विनेयजनानुग्रहाय प्रदर्श्यते, तत्र सङ्ग्रहो मन्यते-क्रोधोऽप्रीत्यात्मकः प्रतीत एव, मानोऽपि परगुणासहनात्मकत्वादप्रीत्यात्मकः, ततोऽप्रीत्यात्मकत्वादेतो द्वावपि द्वेषः, लोभोऽभिष्वङ्गात्मकत्वात् प्रीतिरूपः सुप्रसिद्धो, दीप अनुक्रम [५३४-५३६] ॥४५५॥ अत्र (२३) कर्मप्रकृति-पदे प्रथमे उद्देशके अधिकारः (३) आरब्धः, ~17~ Page #18 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (१५) “प्रज्ञापना" - उपांगसूत्र-४ (मूलं+वृत्ति:) पदं [२३], -------------- उद्देशक: [१], ------------- दारं -1, -------------- मूलं [२९०] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र-[१५]उपांगसूत्र-[४] "प्रज्ञापना" मूलं एवं मलयगिरि-प्रणीता वृत्ति: प्रत सूत्रांक [२९० मायामपि परवञ्चनात्मिका किश्चिदभिलपन् प्रयुङ्के अभिलाषश्च प्रीतिखभाव इति साऽपि प्रीत्यात्मिका, तत एतौ मायालोभी प्रीत्यात्मकत्वात् रागः, उक्तं च-"कोहं माणं चापीइजाइतो बेइ संगहो दोसं । मायाए लोभेण य स पीइसामण्णतो रागं ॥१॥" अत्र उत्तरार्द्धस्याक्षरयोजना-मायया लोभेन सह प्रीतिजातिसामान्यात् स मानप्रीतिजातिभावात् द्वावपि मायालोभी स सङ्ग्रहो रागमाचष्टे इति । व्यवहारः पुनते-माया खलु परोपघातायर प्रयुज्यते परोपघातपरिणामश्च द्वेष इति मायाया अपि द्वेषेऽन्तर्भावः, या तु न्यायोपादानेनार्थे मूर्छा स परोपघातरहितः शुद्धो लोम इति रागः, एवं चेदमस्य मतेन वस्तु व्यवस्थितं-क्रोधमानमाया द्वेपो लोगो राग इति. आहारा च-मायपि दोसमिच्छइ ववहारो जं परोवघायाय । नायोवायाणे चिय मुच्छा लोभेत्ति तो रागो ॥१॥" ऋजुसूत्रः पुनराह-क्रोधो नियमादप्रीत्यात्मकः, ततः स परोपघातात्मकत्वात् द्वेषः, ये तु मानमायालोभास्ते द्विधाऽपि सम्भवन्ति-प्रीत्यात्मका अप्रीत्यात्मकाच, तथाहि-मानः खाहकारोपयोगकाले प्रीत्यात्मकः खगुणवहुमानभावात् , परगुणद्वेषोपयोगवेलायामप्रीत्यात्मको मात्सर्यादिभावात्, मायाऽपि परवञ्चनोपयोगप्रवृत्ती परोपघातरूपत्वात् अप्रीत्यात्मिका परगतद्रव्योपादानचिन्तायां त्वभिष्वनात्मकत्वात् प्रीतिरूपा, लोभोऽपि क्षत्रियादीनां परिचिन्त्यमानः प्रीत्यप्रीत्यात्मकः सुप्रतीतः, तथाहि-क्षत्रिया एवं मन्यन्ते परविषयापहारोऽस्माकं न्यायो 'वीरभोग्या वसुन्धरा' इति न्यायात्, ततो यदा परविषयापहाराय तेषामत्यर्थमभियोगस्तदाऽसौ अप्रीत्यात्मकः, परोप-15 दीप अनुक्रम [५३७] secestrocercernedeserceneese ~18~ Page #19 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (१५) “प्रज्ञापना" - उपांगसूत्र-४ (मूलं+वृत्ति:) पदं [२३], -------------- उद्देशक: [१], ------------- दारं [-], -------------- मूलं [२९०] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र-[१५]उपांगसूत्र-[४] "प्रज्ञापना" मूलं एवं मलयगिरि-प्रणीता वृत्ति: प्रत सूत्रांक [२९० प्रज्ञापना- घातहेतुत्वात् , यदा तु परविषयजिघृक्षोपयोगस्तदा सोऽभिष्वङ्गात्मकत्वात् प्रीत्यात्मकः, तत एवं यानमायालोमा । धा२३कर्मप्रया। मल- उभयरूपा अपि संवेद्यन्ते, यदा च प्रीत्युपयोगो न तदाप्रीत्युपयोगः, यदा चाप्रीत्युपयोगो न तदा प्रीत्युपयोगः, कतिपदे य० चौ. एकस्मिन् समये उपयोगद्वयाभावात् , ततो मानमायालोभाः प्रीत्युपयोगकाले रागोप्रीत्युपयोगकाले द्वेषा, बकं स्थानानि ॥४५॥ च-"उजुसुयमयं कोहो दोसो सेसाणमयमणेगंतो । रागोत्ति य दोसोति य परिणाम वसेण उ बिसेसो ॥१॥ सू. २९० माणो रागोत्ति मओ साहंकारोवओगकालंमि । सो चेव होइ दोसो परगुणदोसोवयोगमि ॥२॥ मायालोमा चेवं परोवघाओवओगतो दोस्रो । मुच्छोवओगकाले रागोऽभिस्संगलिंगोत्ति ॥३॥" शब्दादयस्त्रयः पुनरेवमाहुःइह हादेव कषायो-क्रोधो लोभश्च, ये तु मानमाये ते कोषलोभयोरन्तर्भवतः, तथाहि-माने मायायां च ये परोपघातहेतवोऽध्यवसायास्ते क्रोधोऽप्रीत्यात्मकत्वात् ये तु खगुणोत्कर्षपरद्रव्यमूर्छात्मकास्ते लोभोऽभिष्वङ्गरूपत्वाला लोभोऽपि च लोकप्रसिद्धो द्विधा-परोपघातात्मको मूर्छात्मकथ, तत्र परोपघातात्मको यथा क्षत्रियाणां परायापहारे, मूछात्मको न्यायोपाते निजद्रव्ये, तत्र यः परोपघातात्मकः स क्रोधो भवति, क्रोधश्च सर्वोऽपि यथोकन रूपो द्वेषोप्रीत्यात्मकत्वात् , केवलस्तु मूर्छात्मकोऽध्यवसायो लोभः सच रागः, तथा चोक्तम्-“सद्दाइमय माणे ४५६॥ KIमायाए व सगुणोवरागा य 1 उचओगो लोहो चिय जतोस तत्थेव उवरद्धो॥१॥ सेसंसा कोहो चिय सपरोक्षा-1 यमइओत्ति तो दोसो । तल्लक्षणो य लोभो अह मुच्छा केवलो रागो ॥२॥” इति, तत्र सङ्गहनयमतेनाह-18 दीप अनुक्रम [५३७] ~19~ Page #20 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (१५) प्रत सूत्रांक [२९०] दीप अनुक्रम [५३७] “प्रज्ञापना” – उपांगसूत्र - ४ ( मूलं + वृत्ति:) - पदं [२३], • उद्देशक: [१], ------------- दारं [ - ], [---- • मूलं [ २९०] पूज्य आगमोद्धारकश्री संशोधितः मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र [१५],उपांगसूत्र-[४] "प्रज्ञापना" मूलं एवं मलयगिरि-प्रणीता वृत्तिः 'रागे दुविहे पण्णत्ते' इत्यादि सुगमं, भावितत्वात् उपसंहारमाह- 'इश्वेतेहिं चउहिं ठाणेहिं' इत्यादि, एवं खलु इत्येतैरनन्तरो कैश्चतुर्भिः स्थानैः, कथंभूतैरित्याह-वीर्योपगृहीतैर्जीववीर्योपस्थापितैरित्यर्थः, ज्ञानावरणीयं कर्म जीवो वञ्जाति, अमुमेवार्थ चतुर्विंशतिदण्डकक्रमेण चिन्तयति - ' एवं नेरहए जाव वेमाणिए' सुगमं, नवरमेवं सूत्रपाठः 'नेरइए णं भंते ! नाणावरणिज्जं कम्मं कहहिं ठाणेहिं बंध' इत्यादि । तदेवमेकत्वेन चिन्ता कृता, सम्प्रति बहुत्वेन तां कुर्वन्नाह - 'जीवा णं भंते ' इत्यादि सुगमं, यथा च ज्ञानावरणीयमेकत्ववदुत्वाभ्यां दण्डकद्वयेन चिन्तितं तथा दर्शनावरणीयादीन्यपि चिन्तनीयानि, सर्वसङ्ख्यया पोडश दण्डकाः । तदेवमुक्तं तृतीयं द्वारम् सम्प्रति कति प्रकृती | र्वेदयते इति चतुर्थ द्वारमभिधित्सुराह जीवे णं भंते ! णाणावरणिअं कम्मं वेदेति १, गो० ! अत्थेमइए वेदेति अत्येमहए नो नेएह, नेरहए णं भंते! णाणावरपिअं कम्मं वेदेति ?, गो० ! नियमा वेदेति, एवं जाव बेमाणिते, णवरं मणूसे जहा जीवे जीवा णं मंते ! पानावरकिम्मं वेदेति ?, गो० ! वेदेति एवं चेव, एवं जाव वेभाणिया, एवं जहा गाणावरणिअं तहा दंसणावरणिज्जं मोहणि अंतराइयं च वेणिज्जाउनामगोताई एवं चैव, नवरं मणूसेवि नियमा वेदेति, एवं एते एगचपोहनिया सोलस दंडगा || ४ ( सू २९१ ) 'जीवे णं भंते !' इत्यादि, अस्त्येककः कश्चित् यो वेदयतेऽस्त्येककः कश्चित् यो न वेदयते अक्षीणघातिकर्मा वेद अत्र (२३) कर्मप्रकृति-पदे प्रथमे उद्देशके अधिकार : ( ४ ) आरब्ध:, For Pal Use Only ~20~ yor Page #21 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (१५) “प्रज्ञापना" - उपांगसूत्र-४ (मूलं+वृत्ति:) पदं [२३], -------------- उद्देशक: [१], ------------- दारं [-], -------------- मूलं [२९१] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र-[१५]उपांगसूत्र-[४] "प्रज्ञापना" मूलं एवं मलयगिरि-प्रणीता वृत्ति: प्रत याः मल- यवृत्तो. सूत्रांक [२९१] ॥४५७॥ दीप अनुक्रम [५३८] यते क्षीणघातिकर्मा तु न वेदयते इति भावः, अमुमेवार्थ चतुर्विंशतिदण्डकक्रमेण चिन्तयति-'नेरइए गंभते । २३कर्मप्रइत्यादि सुगम, मनुष्यं मुक्त्वा शेषेषु सर्वेष्वपि स्थानेषु नियमावेदयते इति वक्तव्यं, सर्वेषामक्षीणघातिकर्मत्वात्, कृतिपदे मनुष्ये यथा जीवपदेऽभिहितं तथाऽभिधातव्यं, क्षीणघातिकर्मणोऽपि मनुष्यस्य लभ्यमानत्वात् , एवमेष एकत्वेन 18 वेदनानुदण्डक उक्तः, एवं बहुत्वेनापि वक्तव्यः, यथा च ज्ञानावरणीयमेकत्वपृथक्त्वाभ्यां भावितं एवं दर्शनावरणीयमोह-लाभावा सू. नीयान्तरायाण्यपि भावनीयानि, वेदनीयायुर्नामगोत्राणि तु जीवपदे भजनीयानि, यतः-सिद्धा न वेदयन्ते शेषा २९१-२९२ वेदयन्ते इति, शेषास्तु नैरयिकादयो मनुष्या अपि च नियमावेदयन्ते, आसंसारचरमसमयमवश्यममीषामुदयसम्भवात्, सर्वसझाया चास्मिन्नप्यधिकारे एकत्वपृथक्त्वाभ्यां पोडश दण्डका भवन्ति । गतं चतुर्थेद्वारम्, इदानीं तु अनुभावः कस्य कर्मणः कतिविध इति पञ्चमद्वारमभिधित्सुराहणाणावरणिज्जस्स णं भंते ! कम्मस्स जीवेणं बद्धस्स पुहस्स बद्धफासपुढस्स संचियस्स चियस्स उवचियस्स आवागपचस्स विवागपत्स्स फलपत्तस्स उदयपत्तस्स जीवेणं कयरस जीवेणं निवत्तियस्स जीवेणं परिणामियस्स सयं वा उदिपणस्स परेण वा उदीरियस्स तदुभएण वा उदीरिजमाणस्स गतिं पप्प ठिति पप्प भवं पप्प पोग्गलपरिणाम पप्प कति ४५७॥ विधे अणुभावे पण्णचे, गोणाणावरणिजस्स णं कम्मस्स जीवेणं बद्धस्स जाव पोग्गलपरिणाम पप दसविषे अणुभावे पं०, तं०-सोतावरणे सोपविण्णाणावरणे नेचावरणे नेचविण्णाणावरणे पाणावरणे घाणविण्णाणावरणे रसावरणे रस weirmiumurary.com अत्र (२३) कर्मप्रकृति-पदे प्रथमे उद्देशके अधिकारः (५) आरब्धः, ~21~ Page #22 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (१५) “प्रज्ञापना" - उपांगसूत्र-४ (मूलं+वृत्ति:) पदं [२३], -------------- उद्देशकः [१], ------------- दारं -], -------------- मूलं [२९२] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र-[१५]उपांगसूत्र-[४] "प्रज्ञापना" मूलं एवं मलयगिरि-प्रणीता वृत्ति: प्रत सूत्रांक [२९२] दीप अनुक्रम [५३९] विण्णाणावरणे फासावरणे फासविष्णाणावरणे, जं वेदेति पोग्गलं वा पोग्गले वा पोग्गलपरिणामं वा वीससा वा पोग्गलाणं परिणाम तेसिं वा उदएणं जाणियई ण जाणति जाणिउकामे ण याणति जाणिचावि न याणति उच्छन्त्रणाणी यावि भवति णाणावरणिज्जस्स कम्मस्स उदएणं, एस णं गोयमा ! णाणावरणिज्जे कम्मे एस गं गोयमा ! गाणावरणिअस्स कम्मस्स जीवेणं चद्धस्स जाव पोग्गलपरिणाम पप्प दसविधे अणुभाव पं० । दरिसणावरणिज्जस्स गं भंते! कम्मस्स जीवेणं बद्धस्स जाव पोग्गलपरिणाम पप्प कतिविधे अणुभाव पं०१, गो! दरिसणावरणिअस्स कम्मस्स जीवेणं बद्धस्स जाव पोग्गलपरिणामं पप्प णवविधे अणुभावे पं०, तं०-णिदा णिहा २ पयला पयला २ थीणद्धी चक्षुदंसणाचरणे अचक्सुदंसणावरणे ओहिदसणावरणे केवलदसणावरणे, जं वेदेति पोग्गलं वा पोग्गले वा पोग्गलपरिणाम वा बीससा वा पोग्गलाणं परिणाम तेसि वा उदएणं पासियई वाण पासति पासिउकामेचि ण पासति पासिता विण पासति, उच्छन्नदसणी यावि भवति दरिसणावरणिजस्स कम्मस्स उदएणं, एस णं गो०। दरिसणावरणिले कम्मे एस गं गोयमा ! दरिसणावरणिजस्स कम्मस्स जीवेणं बद्धस्स जाव पोग्गलपरिणामं पप्प गवविघे अणुभावे पण्णते, सायाचेयणिज्जस्स गं भंते ! कम्मस्स जीवेणं बद्धस्स जाव पोग्गलपरिणामं पप्प कतिविधे अणुभाव पं०१, गो! सातावेदणिज्जस्स णं कम्मस्स जीवेणं बद्धस्स जाव अविधे अणुभावे पं०२०-मणुण्णा सहा १ मणुण्णा रूवा २ मणुण्णा गंधा ३ मणुष्णा रसा ४ मणुष्णा फासा ५ मणोसहता ६ वयसहया ७ कायसुहता ८ जं वेदेति पोग्गलं वा पोग्गले वा पोग्गलपरिणाम चा वीससा वा पोग्गलाणं परिणाम तेसि वा उदएणं सातावेदणिज कम्मं वेदेति, एसणं गो! सायावेय KakfastrolorsTEGeorotocom ~22~ Page #23 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम “प्रज्ञापना" - उपांगसूत्र-४ (मूलं+वृत्ति:) पदं [२३], -------------- उद्देशक: [१], ------------- दारं [-], -------------- मूलं [२९२] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र-[१५]उपांगसूत्र-[४] "प्रज्ञापना" मूलं एवं मलयगिरि-प्रणीता वृत्ति: ANI S प्रज्ञापनाया मलयवृत्ती. २३कर्मप्र| कृतिपदे कर्मानुभा प्रत सूत्रांक [२९२] वः सू. ॥४५॥ २९२ दीप अनुक्रम [५३९] o880882008 - मिजे कम्मे एस 4 मौ० ! सासायणिजस्स जाव अहविषे अणुभाव पं० । असातावेयणिजस्स में भंते ! कम्मस्त जीवेष बहेव पुच्छा, उपरं च, नवरं अमणुष्णा सदा जाव कायदुहया एस गं गो.1 असायावेयणिजे कम्मे एस पं. गी.असातावेदणिजस्स जान अढविधे अणुभावे पं० । मोहणिज्जस्स पं भंते ! कम्मस्स जीवेणं बद्धस्स जाव कतिविषे अणुभावे पं०१, मो०। मोहणिअस्स कम्मस्स जीवेषं बद्धस्स जाव पंचविधे अणुभावे पं०,०-सम्मत्तवेचणिजे मिच्छरवेणिजे सम्मामिच्छत्तवेयणिजे कसायवेयणिजे नोकसायवेयणिजे जं वेदेति पोग्गलं वा पोग्गले वा पोग्गलपरिजाम वा बीससा वा पोग्गलाण परिणाम तेसि वा उदएणं मोहणिज्ज कम्मं वेएर वा एसणं गोयमा मोहणिजस्स कम्म स्स जाब पंचविधे अणुभावे पं० । बाउस्स गं मंते ! कम्मस्स जीवेणं तहेव पुच्छा, गो० आउपस्स णं कम्मस्स जीवेणं बद्धस्स जाव पडबिहे अणुभाव पं० सं०-नेरहमाउते तिरियाउने मणुयाउए देवाउए, जं वेदेति पोग्मलं वा पोग्मले का पोन्मलपरिणाम यावीससा वा पोग्गलाणं परिणाम तेसिंवा उदएणं जाउयं कम्मं वेदेति वा एसणं गो ! आउए कम्मे एसगं गो० आउकम्मस्स जाब चउबिहे अणुभावे पण्णते। मुहणामस्सणं भंते ! कम्मस्स जीवेणं पुरुछा, मो०! सुहणामस्स कम्मस्स जीवेर्ण घउद्दसविषे अणुभाव पं०२०-इट्ठा सदा १ इटारूवार इट्टा गंधा ३ इटारसा ४ इट्टा फासा ५५हागती ६ट्ठा ठिती हे लावण्णे ८ इट्टा जसोकिची ९ इट्टे उट्ठाणकम्मबलबीरियपुरिसकारपरकमे १० इहस्सरया ११कंवस्सस्था १२ पियस्सरया १३ मणुष्णस्सरया १४ जं वेदेति पोग्गलं वा पोग्गले वा पोग्गलपरिणाम वा बीससा वा पोम्गला परिणाम तेसिं या उदएणं सुभणाम कर्म वेएइ एसणं गो ! सुहनामकम्मे एसणं गो. सुभणामस्स कम्मरस जाब ॥४५८॥ ~23~ Page #24 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (१५) “प्रज्ञापना" - उपांगसूत्र-४ (मूलं+वृत्ति:) पदं [२३], -------------- उद्देशक: [१], ------------- दारं [-], -------------- मूलं [२९२] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र-[१५]उपांगसूत्र-[४] "प्रज्ञापना" मूलं एवं मलयगिरि-प्रणीता वृत्ति: प्रत सूत्रांक [२९२] पउद्दसविषे अघुमावे ०, दुहमामस्स में भंते! पुच्छा, गो० एवं चेव, गवर अणिहा सहा जाव हीणस्सरया दीणस्तरमा अतस्सरपा जं वेदेति सेस ते चेच जाव चउपसविषे अणुभावे पण्णचे । उच्चागोतस्स णं मंते ! कम्मस्स जीवेणं पुच्छा, मो०! उच्चायोवस्स कम्मस्स जीवेणं बद्धस्स जाव अविहे अशुभावे ० त०-जातिविसिट्टया १ कुलविसिट्टया २ बलविसिट्ठया ३ रुखवि०४ तववि.५ सुयवि०६ लामवि०७इस्सरियवि०८ वेदेति पोग्गलं वा पोग्गले वा पोग्गलपरिणाम वा वीससा वा पोग्गलाणं परिणाम तेर्सि वा उदएर्ण जाव अढविधे अणुमावे पं०, णीयागोयस्स भंते! पुच्छा, गो! एवं चेच, गवरं जातिविहीणया जाव इस्सरियविहीणया जं वेदेति पुम्मलं वा पोग्गले वा पोग्गलपरिणाम वा वीससा वा पोग्गलाणं परिणाम तेसिं वा उदएणं जाव अविधे अणुभावे पण्णते, अंतरायस्स शं भंते ! कम्मस्स जीवेणं पुच्छा, गो.! अंतराइयस्स कम्मस्स जीवेणं बद्धस्स जाव पंचविधे अणुभावे पं०, ०-दाणंतराए लाभतराए भोगतराए उवभोगतराए बीरियंतराए, जं वेदेति पोग्गल जाव वीससा वा० तेसिं वा उदएणं अंतराइयं कम्मं वेदेति, एस गं गो. अंतराइए कम्मे, एस गं गो.! जाव पंचविधे अणुभावे पं० (सूत्र २९२)॥ पण्णवणाए तेवीसतितमस्स पयस्स पढमो उद्देसो २३-१॥ 'नाणावरणिजस्सगं भंते ! इत्यादि, ज्ञानावरणीयख गमिति वाक्यालकारे भदन्त ! जीवेन बद्धस्य-राग-12 द्वेषपरिणामवशतः कर्मरूपतया परिणमितस्य स्पृष्टस्य-आत्मप्रदेशैः सह संश्लेषमुपगतस्य 'बद्धफासपुहस्से ति पुन-11 दीप अनुक्रम [५३९] MIRRIarary.org ~24~ Page #25 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (१५) “प्रज्ञापना" - उपांगसूत्र-४ (मूलं+वृत्ति:) पदं [२३], -------------- उद्देशक: [१], ------------- दारं [-], -------------- मूलं [२९२] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र-[१५]उपांगसूत्र-[४] "प्रज्ञापना" मूलं एवं मलयगिरि-प्रणीता वृत्ति: प्रत सूत्रांक [२९२] प्रज्ञापचाया मल- बापत्ती. ॥४५९॥ २९२ रपि गाढतरं बद्धस्थातीव स्पर्शेन स्पृष्टस्य च, किमुक्तं भवति ?-आवेष्टनपरिवेष्टनरूपतयाऽतीव सोपचयं गाढतरं|२३कर्मप्रच बद्धस्पेति, 'सञ्चितस्य' आवाधाकालातिक्रमेणोत्तरकालवेदनयोग्यतया निषिक्तस्य 'चितस्य' उत्तरोत्तरस्थिति कृतिपदे प्रदेशहान्या रसवृयाऽवस्थापितस्य 'उपचितस्य' समानजातीयप्रकृत्यन्तरदलिकसमेणोपचयं नीतख 'आपाकप्रा- कमोनुमासस्य' ईपत्पाकाभिमुखीभूतस्य 'विपाकप्राप्तस्य' विशिष्टपाकमुपगतस्य अत एव 'फलपासस्य फलं दातुमभिमुखीभू- वः सू. तस्य ततः सामग्रीवशादुदयप्राप्तस्य, एते चापाकप्राप्सत्वादयः कर्मधर्माः यथा आम्रफलस्य, तथाहि-आम्रफलं प्रथमत ईषत्पाकाभिमुखं भवति, ततो विशिष्टं पाकमुपागतं तदनन्तरं तृप्तिप्रमोदादि फलं दातुमुचितं ततः सामग्रीवशा-II दुपभोगप्रासं भवति, एवं कर्मापीति, तत् पुनर्जीवेन कथं बद्धमित्यत आह-'जीवेण कयस्स' जीवेन कर्मवन्धन- बद्धेनेति गम्यते 'कृतस्य' निष्पादितस्य जीवो छुपयोगखभावस्ततोऽसौ रागादिपरिणतो भवति, न शेषो, रागादिपरिणतश्च सन् कर्म करोति, सा च रागादिपरिणतिः कर्मवन्धनवद्धस्य भवति, न तद्वियोगे, अन्यथा मुक्ताना-1 मप्यवीतरागत्वप्रसक्तः, ततः कर्मबन्धनबद्धेन सता जीवेन कृतस्येति द्रष्टव्यं, उक्तं च-'जीवस्तु कर्मबन्धनबद्धो वीरस्य भगवतः कर्ता । सन्तत्याऽनायं च तदिष्टं कर्मात्मनः कर्तुः॥१॥" इति, तथा जीवेन निवर्तितस्य, इह ४५९॥ बन्धसमये जीवः प्रथमतोऽविशिष्टान् कर्मवर्गणान्तःपातिनः पुद्गलान् गृह्णन् अनाभोगिकेन वीर्येण तस्मिन्नेव बन्धस-II मये ज्ञानावरणीयादितया व्यवस्थापयत्याहारमिव रसादिसप्तधातुरूपतया यच ज्ञानावरणीयादितया व्यवस्थापन दीप अनुक्रम [५३९] ~25 Page #26 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (१५) “प्रज्ञापना" - उपांगसूत्र-४ (मूलं+वृत्ति:) पदं [२३], -------------- उद्देशक: [१], ------------- दारं [-], -------------- मूलं [२९२] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र-[१५]उपांगसूत्र-[४] "प्रज्ञापना" मूलं एवं मलयगिरि-प्रणीता वृत्ति: प्रत सूत्रांक [२९२] दीप अनुक्रम [५३९] तन्निवर्तनमित्युच्यते, तथा जीवेन परिणामितस्य-विशेषप्रत्ययः प्रद्वेषनिहवादिभिस्तं तमुत्तरोत्तरं परिणाम प्रापितस्य, खयं वा विपाकप्राप्ततया परनिरपेक्षमुदीर्णस्य-उदयप्राप्तस्य परेण वा उदीरितस्य-उदयमुपनीतस्य तदुभयेन-खपररूपेणोभयेन उदीर्यमाणस्य-उदयमुपनीयमानस्य गति प्राप्य किञ्चिद्धि कर्म काश्चिद् गति प्राप्य तीब्रा-11 |नुभावं भवति, यथा नरकगति प्राप्यासातवेदनीय, असातोदयो हि यथा नारकाणां तीत्रो भवति न तथा तिर्यगादीनामिति, तथा स्थिति प्राप्य सर्वोत्कृष्टामिति शेषः, सर्वोत्कृष्ट हि स्थितिमुपगतमशुभं कर्म तीत्रानुभावं भवति, यथा मिथ्यात्वं भवं प्राप्य, इह किमपि कर्म कश्चिद्भवमाश्रित्य स्खविपाकदर्शनसमर्थ यथा निद्रा मनुष्यभवं तिर्य भयं वा प्राप्य ततो भवं प्राप्येत्युक्तं, एतावता किल स्वत उदयस्य कारणानि दर्शितानि, कर्म हि तां तां गतिं स्थितिं भवं वा प्राप्य खयमुदयमागच्छतीति, सम्प्रति परत उदयमाह-पुद्गलं काष्ठलेष्णुखशादिलक्षणं प्राप्य, तथाहिपरेण क्षिसं काष्ठलेष्टुखहादिकमासाद्य भवत्यसातवेदनीयक्रोधादीनामुदयः, तथा पुद्गलपरिणाम प्राप्य-इह किश्चिस्कर्म कमपि पुद्गलमाश्रित्य विपाकमायाति, यथाऽभ्यवहृतस्याहारस्थाजीर्णत्वपरिणाममाश्रित्य असातवेदनीयं ज्ञानावरणीयं सुरापानमिति, ततः पुद्गलपरिणाम प्राप्येत्युक्तं, कतिविधोऽनुभावः प्रज्ञप्त इत्येष प्रश्नः, अत्र निर्वचनंदशविधोऽनुभावः प्रज्ञप्तः, तदेव दशविधमनुभावं दर्शयति-'सोयावरणे' इत्यादि, इह श्रोत्रशब्देन श्रोत्रेन्द्रियविषयः क्षयोपशमः परिगृखते 'सोयविण्णाणावरणे' इति श्रोत्रविज्ञानशब्देन श्रोत्रेन्द्रियोपयोगो, यत्तु निर्यच्युपकरणलक्षणं ~26~ Page #27 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (१५) प्रत सूत्रांक [२९२] दीप अनुक्रम [५३९ ] “प्रज्ञापना” – उपांगसूत्र - ४ ( मूलं + वृत्ति:) - पदं [२३], -------------उद्देशक: [१], ----दारं [-1, ---- • मूलं [ २९२] पूज्य आगमोद्धारकश्री संशोधितः मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र [१५],उपांगसूत्र-[४] "प्रज्ञापना" मूलं एवं मलयगिरि-प्रणीता वृत्तिः प्रज्ञापना द्रव्येन्द्रियं तदङ्गोपाङ्गनामकर्मनिर्वत्यै न ज्ञानावरणविषय इति न श्रोत्रशब्देन गृमते, एवं नेत्रावरणे इत्याद्यपि याः मल- ४ भावनीयं तचैकेन्द्रियाणां रसनत्राणचक्षुः श्रोत्रविषयाणां लब्ध्युपयोगानां प्राय आवरणं, प्रायोग्रहणं च बकुलाय० वृत्तौ ४ दिव्यवच्छेदार्थ, वकुलादीनां हि यथायोगं पञ्चानामपीन्द्रियाणां लब्ध्युपयोगाः फलतोऽस्पष्टा उपलक्ष्यन्ते, आग१४ मेऽपि च प्रोच्यन्ते - “पंचिंदियोवि बउलो नरोब पंचिंदिओवओगाओ । तहवि न भण्णइ पंचिंदिओत्ति दवि॥४६० ॥ दियाभावा ॥ १ ॥” तथा “जह मुहमं भाविंदियनाणं दबिंदियावरोहेवि । दवसुयाभावंमिवि भावसुर्य पत्थिवाईणं ॥ २ ॥” इति [ पञ्चेन्द्रियोऽपि बकुलो नर इव पञ्चेन्द्रियोपयोगात् । तथापि न भण्यते पञ्चेन्द्रिय इति द्रव्येन्द्रि याभावात् ॥ १ ॥ यथा सूक्ष्मं मावेन्द्रियज्ञानं द्रव्येन्द्रियावरोधेऽपि । द्रव्यश्रुताभावेऽपि भावश्रुतं पार्थिवादीनां ॥ २ ॥ ] ततः प्राय इत्युक्तं, द्वीन्द्रियाणां प्राणचक्षुः श्रोत्रेन्द्रियविषयाणां लब्ध्युपयोगानां त्रीन्द्रियाणां चक्षुःश्रोत्रविषयाणां चतुरिन्द्रियाणां श्रोत्रेन्द्रियलच्भ्युपयोगावरणं सर्वेषामपि स्पर्शनेन्द्रियलब्ध्युपयोगावरणं कुष्ठादिव्याधिभिरुपहतदेहस्य द्रष्टव्यं पञ्चेन्द्रियाणामपि जात्यन्धादीनां पश्वाद्वा अन्धवधिरीभूतानां चक्षुरादीन्द्रियलब्ध्बुपयोगावरणं भावनीयं, कथमेवमिन्द्रियाणां लब्ध्युपयोगावरणमिति चेत्, उच्यते, स्वयमुदीर्णस्य परेण वा उदीरितस्य ज्ञानावरणीयकर्मण उदयेन, तथा चाह-'जं वेएर' इति, यद्वेदयते परेण क्षिसं काष्ठलेष्टुखङ्गादिलक्षणं पुद्गलं तेनाभिचातजननसमर्थेन 'पुग्गले वा' इति यावद्वहून् पुद्गलान् काष्ठादिलक्षणान् परेण क्षिसान् वेदयते, तैरभिघातजननस Eucation International For Parts Only ~27~ २३ कर्मप्रकृतिपदे कर्मानुभावः सू. २९२ ॥४६०॥ www.landbrary or Page #28 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (१५) “प्रज्ञापना" - उपांगसूत्र-४ (मूलं+वृत्ति:) पदं [२३], -------------- उद्देशक: [१], ------------- दारं -,-------------- मूलं [२९२] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र-[१५]उपांगसूत्र-[४] "प्रज्ञापना" मूलं एवं मलयगिरि-प्रणीता वृत्ति: प्रत सूत्रांक [२९२] दीप अनुक्रम [५३९] मथैः, 'पुद्गलपरिणामं वा' इति यं वा पुद्गलपरिणाममभ्यवहताहारपरिणामरूपं पानीयरसादिकमतिदुःखजनकं वेदयते तेन वा ज्ञानपरिणत्युपहननात् तथा-वीससा बा पोग्गलाणं परिणाम मिति विखसया यः पुद्गलानां परिणामः शीतोष्णातपादिरूपस्तं वेदयते यदा तदा तेनेन्द्रियोपघातजननद्वारेण ज्ञानपस्णिताचुपहतायां ज्ञातव्यमेवै. |न्द्रियकमपि सबस्तु न जानाति, ज्ञानपरिणतेरुपहतत्वात् , अयं सापेक्ष उदय उक्तो, निरपेक्षस्य तु विषये सूत्रमि| दम्-'तेर्सि वा उदएणति तेषां वा ज्ञानावरणीयकर्मपुद्गलानां विपाकप्राप्तानामुदयेन ज्ञातव्यं न जानाति 'जाणि| उकामेवि न याणई' इति ज्ञानपरिणामेन परिणतुमिच्छन्नपि ज्ञानपरिणत्युपघातान जानाति, 'जाणित्ताविन याणई' इति, प्राक् ज्ञात्वाऽपि पचान जानीते, तेषामेव ज्ञानावरणीयकर्मपदलानामुदयात् , 'उच्छन्ननाणी यावि भवई' इत्यादि, ज्ञानावरणीयख कर्मण उदयेन जीव उच्छन्नज्ञान्यपि भवति, उच्छन्नं च तद् ज्ञानं च उच्छन्नज्ञानं तदस्यास्तीति उच्छन्नज्ञानी, सर्वधनादिपाठाभ्युपगमादिन, यावत्शक्तिप्रच्छादितज्ञान्यपि भवतीत्यर्थः, 'एस गोयमा ! णाणावरणिजे कम्मे इत्याधुपसंहारवाक्यं कण्ठ्यं, 'दंसणावरणिज्जस्स मंते ! इत्यादि प्रश्नसूत्रं पूर्ववत्, निर्वचनमाह-गौतम ! नवविधः प्रज्ञप्तः, तदेव नवविधत्वं दर्शयति-निद्रा' इत्यादि, निद्राशब्दार्थमने वक्ष्यामो, भावार्थस्त्वयम्-"सुहपडिबोहा निद्दा दुहपडिबोहा य निद्दनिहा य । पयला होइ ठियस्स उ पयलप|यला य चंकमतो॥१॥ थीणगिद्धी पुण अइसंकिलिट्टकम्माणुबेयणे होइ । महणिहा दिणचिंतियवावारपसाणी | ~28~ Page #29 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (१५) प्रत सूत्रांक [२९२] दीप अनुक्रम [५३९] “प्रज्ञापना” – उपांगसूत्र - ४ ( मूलं + वृत्ति:) - पदं [२३], -----------उद्देशक: [१], -------- दारं [-], [------ • मूलं [ २९२] पूज्य आगमोद्धारकश्री संशोधितः मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र [१५],उपांगसूत्र-[४] "प्रज्ञापना" मूलं एवं मलयगिरि-प्रणीता वृत्तिः प्रज्ञापना या मल 8 य० वृत्ती. ॥४६१॥ पायं ॥ २ ॥ " [ सुखप्रतिबोधा निद्रा दुःखप्रतिबोधा च निद्रानिद्रा च । प्रचला भवति स्थितस्य तु प्रचलाप्रचला च चङ्क्रमतः ॥ १ ॥ स्त्यानर्द्धिः पुनरतिसंक्लिष्टकर्मांणुवेदने भवति । महानिद्रा दिनचिन्तितव्यापारप्रसाधनी प्रायः ॥२॥ ] चक्षुर्दर्शनावरणं चक्षुः सामान्योपयोगावरणं, एवं शेषेष्वपि भावनीयं, 'जं वेयर' इत्यादि, यं वेदयते पुगलं मृदुशयनादिकं ' पुग्गले वा' इति यान् पुद्गलान् बहून् मृदुशयनीयादीन् वेदयते पुद्गलपरिणामं माहिषदध्याद्यभ्यवहृताहारपरिणाममित्यर्थः, 'बीससा पोग्गलाण परिणाम' मिति वर्षाखभ्रसम्भृतनभोरूपं धाराम्बुनिपातरूपं वा यं वेदयते तेन निद्रायुदयापेक्षया दर्शनपरिणत्युपघाते एतावता परत उक्तः, सम्प्रति खत उदयमाह - 'तेसिं वा उदरणं'ति तेषां वा दर्शनावरणीय कर्मपुद्गलानामुदयेन परिणतिविघातेन द्रष्टव्यं न पश्यति, तथा कश्चित् दर्शनपरिणामेन परिणन्तुमिच्छन्नपि जात्यन्धत्वादिना दर्शनपरिणत्युपघातान्न पश्यति, प्राग् दृष्ट्वापि पश्चान्न पश्यति, दर्शनावरणीय कर्मपुद्गलानामुदयात् किं बहुना १, दर्शनावरणीयस्य कर्मण उदयेन जीव उच्छन्नदर्शन्यपि यावच्छतिप्रच्छादितदर्शन्यपि भवति, 'एस णं गोयमा ! दरिसणावरणिजे कम्मे' इत्याद्युपसंहारवाक्यं । 'सायावेयणिज्जस्त णं भंते! कम्मस्स' इत्यादि प्रश्नसूत्रं प्राग्वत्, निर्वचनमाह – गौतम ! अष्टविधोऽनुभावः प्रज्ञप्तः, अष्टविधत्वमेव दर्शयति'मणुन्ना सहा' इत्यादि, मनोज्ञाः शब्दा आगन्तुका वेणुवीणादिसम्बन्धिनः अन्ये आत्मीया इत्याहुस्तदयुक्तं, आत्मीयशब्दानां वाक्सुखेनेत्यनेनैव गृहीतत्वात्, मनोज्ञा रसा-इक्षुरसप्रभृतयः, मनोज्ञा गन्धाः - कर्पूरादिसम्बन्धिनः, Education Internation For Parts Only ~29~ २३ कर्मग्र कृतिपदे कर्मानुभावः सू. २९२ ॥४६१॥ Page #30 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (१५) प्रत सूत्रांक [२९२] दीप अनुक्रम [५३९ ] “प्रज्ञापना” – उपांगसूत्र - ४ ( मूलं + वृत्ति:) - पदं [२३], -------------- • उद्देशक: [१], ------------- दारं [-], [---- • मूलं [ २९२] पूज्य आगमोद्धारकश्री संशोधितः मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र [१५],उपांगसूत्र-[४] "प्रज्ञापना" मूलं एवं मलयगिरि-प्रणीता वृत्तिः मनोज्ञानि रूपाणि-खगत स्वस्त्रीगत चित्रादिगतानि मनोज्ञाः स्पर्शा- हंसतूल्यादिगता 'मणोसुहया' इति मनसि सुखं यस्यासौ मनःसुखस्तस्य भावो मनःसुखता, सुखितं मन इत्यर्थः, वाचि सुखं यस्यासौ वाक्सुखस्तस्य भावो वाक्सुखता, सर्वेषां श्रोत्रमनः प्रल्हादकारिणी वागिति तात्पर्यार्थः, काये सुखं यस्यासौ कायसुखस्तद्भावः कायमुखता, सुखितः काय इत्यर्थः, एते चाष्टौ पदार्थाः सातावेदनीयस्योदयेन प्राणिनामुपतिष्ठन्ते तत उक्तोऽष्टविधः सातवेदनीयस्यानुभावः परतः सातावेदनीयस्योदयमुपदर्शयति- 'जं वेएइ पुग्गल' मित्यादि, यद्वेदयते पुद्गलं स्रक्चन्दनादि यान् वेदयते पुद्गलान् बहून् सक्चन्दनादीन् यं वा वेदयते पुद्गलपरिणामं देशकालययोऽवस्थानुरूपाहारपरिणामं, 'वीससा वा पुग्गलाण परिणामं विस्रसया वा यं पुद्गलानां परिणामं कालेऽभिलषितं शीतोष्णादिवेदनाप्रतीकाररूपं तेन मनसः समाधानसम्पादनात् सातावेदनीयं कर्मानुभवति, सातवेदनीयकर्मफलं सातं वेदयते इत्यर्थः, उक्तः परत उदयः सम्प्रति खत उदयमाह-'तेसिं या उदरणं'ति तेषां वा सातावेदनीय कर्म पुद्गलानामुदयेन मनोज्ञशब्दादिव्यतिरेकेणापि कदाचित् सुखं वेदयते, यथा नैरयिकास्तीर्थकरजन्मादिकाले 'एस णं गोयमा !' इत्याद्युपसंहारवाक्यं, 'असायावेयणिजस्स णं भंते!' इत्यादि प्रश्नसूत्रं सुगमं, निर्वचनं पूर्ववत्, तथा चाह- 'तहेव पुच्छा उत्तरं च' नवरमित्यादिना पूर्वसूत्रादस्य विशेषमुपदर्शयति, 'अमणुण्णा सद्दा' इत्यादि, अमनोज्ञाः शब्दाः - खरोष्ट्राश्वादिसम्वन्धिन आगन्तुका अमनोज्ञा रसाः - स्वस्याप्रतिभासिनो दुःखजनकाः अमनोज्ञा गन्धा - गोमहिषादिमृतकडेवरा Ja Eucation intention For Parts Only ~30~ Page #31 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (१५) “प्रज्ञापना" - उपांगसूत्र-४ (मूलं+वृत्ति:) पदं [२३], -------------- उद्देशक: [१], ------------- दारं [-], -------------- मूलं [२९२] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र-[१५]उपांगसूत्र-[४] "प्रज्ञापना" मूलं एवं मलयगिरि-प्रणीता वृत्ति: प्रत सूत्रांक [२९२] dek दीप अनुक्रम [५३९] प्रज्ञापना दिगन्धा अमनोज्ञानि रूपाणि-खगतखस्त्रीगतादीनि अमनोज्ञाः स्पर्शा:-कर्कशादयः, 'मणोदुहिया' इति दुःखितं ।२३कर्मप्रया। मल- |मन इति 'वइदुहिया' इति अभव्या वाक् इति भावार्थः, 'कायदुहिया' इति काये दुःखं यस्यासी कायदुःख- कृतिपदे यवृत्ती. झावः कायदुःखिता दुःखितकाय इत्यर्थः, "जं वेएई' इत्यादि, यं वेदयते पुद्गलं-विषशस्त्रकण्टकादि 'पुग्गले वा कर्मानुभा || इति वान् वा पुर्लान् बहून् विषशस्त्रकण्टकादीन् वेदयते पुद्गलपरिणाममपश्याहारलक्षणं, विस्रसया या वं वेदयते । वः सू. ॥४६॥ लापुद्गलपरिणाम अकालेऽनमिलषितं शीतोष्णादिपरिणाम, तेन मनसोऽसमाधानसम्पादनात् , असातवेदनीयं कर्मानुभ-II २९२ वति, असातवेदनीयकर्मफलमसातं वेदयते इति भावः, एतेन परत उदय उक्ता, सम्प्रति खत उदयमाह-'तेसिं वा IS उदएणं'ति तेषां वा असातवेदनीयकर्मपुद्गलानामुदयेनासातं वेदयते, 'एस णं गोयमा ! इत्याधुपसंहारवाक्यं मोहणिजस्स गं भंते । इत्यादि प्रश्नसूत्रं प्राग्वत्, निर्वचनं पञ्चविघोज्नुभाकः प्रज्ञप्तः, तदेव पञ्चविधत्वं दर्शयति-8 'सम्यक्त्यवेदनीय'मित्यादि, सम्यक्त्वरूपेण यद्वेयं तत्सम्यक्त्ववेदनीयं, एवं शेषपदेष्यपि शब्दार्थों भाषनीयः, भावार्थस्त्वयं-यदिह वेधमानं प्रशमादिपरिणामं करोति तत्सम्यक्त्ववेदनीय, यत्पुनरदेवादिबुद्धिहेतुस्तन्मिथ्यात्व-11 वेदनीयं, मित्रपरिणामहेतुः सम्यग्मिध्यात्ववेदनीयं, क्रोधादिपरिणामकारणं कषायवेदनीय हास्यादिपरिणामकारणं नोकषायवेदनीवं, 'जं वेएइ पुग्गल मित्यादि, यं वेदयते पुदलविषयं प्रतिमादिकं पुद्गलान् वा यान् वेदयते वहून प्रतिमादीन् वा पुद्गलपरिणाम देशाधनुरूपाहारपरिणामं कर्मपुद्गलविशेषोपादानसमर्थ भवति, आहारपरिणाम-18 ~31~ Page #32 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (१५) “प्रज्ञापना" - उपांगसूत्र-४ (मूलं+वृत्ति:) पदं [२३], -------------- उद्देशक: [१], ------------- दारं [-], -------------- मूलं [२९२] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र-[१५]उपांगसूत्र-[४] "प्रज्ञापना" मूलं एवं मलयगिरि-प्रणीता वृत्ति: प्रत सूत्रांक [२९२] दीप अनुक्रम विशेषादपि कदाचित्कर्मपुदलविशेषो, यथा बाल्यौपच्याथाहारपरिणामात् शानावरणीयकर्मपुद्गलानां प्रतिविशिष्टः क्षयोपशमः, उक्तं च-"उदयखबखओवसमोवसमावि व जंच मुणो मणिया। वर्ष खेतं कालं भावं च मवं च संपप्प ॥१॥" पिस्रसया का यं पुतलानां परिणाम अनविकारादिकं यदर्शनादेव विवेक उपजायते, "आयुः शर जलयरप्रतिम नराणां, सम्पत्तयः कुसुमितछमसारतुल्याः । खोपभोगसरशा विषयोपमोगाः, सङ्कल्पमात्ररमणीयKIमिदं हि सर्वम् ॥ १॥" इलादि, अन्यं वा प्रशमादिपरिणामनिवन्धनं संवेदयते तत्सामर्थ्यात् मोहनीवं सम्य क्ववेदनीयादिकं वेदयते, सम्यक्त्ववेदनीयादिकर्मफलं प्रशमादि वेदयते इति भावः, एतावता परत उदय उक्त, सम्प्रति खतस्तमाह-'तेसि वा उदएणं ति तेषां च सम्यक्त्ववेदनीवादिकर्मपुद्गलामामुदयेन प्रशमादि वेदयते, 'एस। ' इत्याधुपसंहारवाक्यं । 'आउस्स मंते ! इत्यादि, प्रश्नसूत्रं प्राम्वत् , निर्वचनं चतुर्विधोऽनुभावः प्रज्ञासः, तदेव चतुर्विधत्वं दर्शयत्ति-'नेरझ्याउए' इत्यादि सुगम, 'जं वेएर पुम्गलं वा' इत्यादि, वं वेदयते पुद्गलं शस्त्रादिकमायुरपवर्तनसमर्थ बहून् पुदलान् शखादिरूपान् यान् वेदयते यं वा पुद्गलपरिणाम विषान्नादिपरिणामरूपं विलसया वा यं पुद्गलपरिणामं शीतादिकमेवायुरपवर्तनक्षमं, तेनोपयुज्यमानभषावुपोऽपवर्तमात्, नारकाधायुःकर्म वेदयते, एतावता परत उदयोऽमिहिता, सत उदयख सूत्रमिदं-तेर्सि वा उदएणति तेषां वा नारकाधायुःपुद्गलानामुदयेन नारका १ उदयक्षयक्षयोपशमोपशमा अपि च कर्मणो यणिताः । द्रव्यं क्षेत्र कालं भावं भवं च संप्राप्य ॥१॥ [५३९] ~32~ Page #33 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (१५) “प्रज्ञापना" - उपांगसूत्र-४ (मूलं+वृत्ति:) पदं [२३], -------------- उद्देशक: [१], ------------- दारं [-], -------------- मूलं [२९२] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र-[१५]उपांगसूत्र-[४] "प्रज्ञापना" मूलं एवं मलयगिरि-प्रणीता वृत्ति: प्रत सूत्रांक [२९२] दीप अनुक्रम [५३९] मायायुर्वेदयते 'एस ण'मित्याद्युपसंहारवाक्यं । नामकर्म द्विधा-शुभनामकर्म अशुभनामकर्म च, तत्र शुभनामकर्माधि- २३कर्मप्रया: मल कृत्य सूत्रमाह-'सुभनामकम्मस्स णं भंते !' इत्यादि प्रश्नसूत्रं प्राग्वत् ,निर्वचनं चतुर्दशविधोऽनुभावः प्रज्ञप्तः, तदेव कृतिपदे य० वृत्ती. च चतुर्दशविधत्वं दर्शयति-'इटा सहा' इत्यादि, एते शब्दादय आत्मीया एव परिगृह्यन्ते, नामकर्मविपाकस्य चिन्त्य-कर्मानुभा॥४ ॥ मानत्वात् , तत्र वादित्राद्युत्पादिता इत्येके, तदयुक्तं, तेषामन्यकर्मोदयनिष्पाद्यत्वात् , इष्टा गतिमत्तवारणाचनुका-8 व: सू. |रिणी शिक्षिकाद्यारोहणतश्चेत्येके, इष्टा स्थितिः सहजा सिंहासनादौ चान्ये, इष्ट लावण्य-छायाविशेषलक्षणं कुङ्कुमाद्य- २९२ नुलेपनजमित्यपरे इष्टा यशःकीर्तिः यशसा युक्ता कीर्तिः२, यशःकीयोश्चायं विशेषः-'दानपुण्यकृता कीर्तिः, पराक्रमकृतं यशः' 'इट्टे उट्ठाणकम्मवलवीरियपुरिसक्कारपरकमें' इति उत्थानं-देहचेष्टाविशेषः कर्म-आरेचनभ्रमणादि। बलं-शारीरसामर्थ्य विशेषः वीर्य-जीवप्रभवः स एव पुरुषकार:-अभिमानविशेषः स एव निष्पादितखविषयः पराकमः इष्टवरता-बल्लभखरता, तत्र इष्टाः शब्दा इति सामान्योक्तावियं विशेषोक्तिस्तदन्यबहुतमत्यापेक्षाऽवगन्तव्या, 'कांतखरते'ति कान्तः-कमनीयः सामान्यतोऽभिलषणीय इत्यर्थः, कान्तः खरो यस्य स तथा तद्भावः कान्तखरता, 'प्रियखरते ति प्रियो-भूयोऽभिलपणीयः प्रियः खरो यस्य स तथा तद्भावः प्रियखरता, 'मणुण्णस्सरता' इति उप-15 करतभावोऽपि खालम्बनप्रीतिजनको मनोज्ञः स खरो यस्य स मनोज्ञखरस्तद्भायो मनोज्ञखरता, 'जं वेएइ' इत्यादि, ये वेदयते पुद्गलं वीणावर्णकगन्धताम्बूलपट्टशिविकासिंहासनकुङ्कुमदानराजयोगगुलिकादिलक्षणं, तथा च वीणादिसं ॥४६॥ Saa ~33~ Page #34 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम “प्रज्ञापना" - उपांगसूत्र-४ (मूलं+वृत्ति:) पदं [२३], -------------- उद्देशक: [१], ------------- दारं -,-------------- मूलं [२९२] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र-[१५]उपांगसूत्र-[४] "प्रज्ञापना" मूलं एवं मलयगिरि-प्रणीता वृत्ति: प्रत सूत्रांक [२९२] म्बन्धाद् भवन्तीष्टाः शब्दादय इति परिभावनीयमेतत्सूक्ष्मधिया मार्गप्रहर्षमनसोऽनुसारिण्या, 'पुग्गले वा' इति यतो बहून् पुद्गलान् वेणुवीणादिकान् वेदयते यं पुद्गलपरिणामं बायोषध्याहारपरिणामं विस्रसया या यं पुद्गलानां परिणाम-शुभजलदादिकं तथा चोन्नतान् कजलसमप्रभान् मेघानवलोक्य गायन्ति मत्तयुवतयो रेलुकानिष्टखरानि-1 त्यादि, तत्प्रभावात् शुभनामकर्म वेदयते, शुभनामकर्मफलमिष्टखरतादिकमनुभवतीति भावः, एतावता परत उक्तः, इदानी खतस्तमाह-'तेसि वा उदएणं'ति तेषां वा शुभानां कर्मपुद्गलानामुदयेन इष्टशब्दादिकं वेदयते, 'एस'णं गो | | इत्याधुपसंहारवाक्यं, 'दुहनामस्स णं भंते ! इत्यादि प्रश्नसूत्रं प्राग्वत् , निर्वचनसूत्रं प्रागुक्तार्थपरीत्येन भावनीयं,18 गोत्रं द्विधा-उचैर्गो नीचैर्गोत्रं च, तत्रोथैर्गोत्रविषयं सूत्रमाह-'उच्चागोयस्स णं भंते !' इत्यादि प्रश्नसूत्र प्राग्वत,8 निर्वचनमष्टविधोऽनुभावःप्रज्ञप्तः, तदेवाष्टविधत्वं दर्शयति-जाइविसिट्टया' इत्यादि, जात्यादयः सुप्रतीताः, शब्दार्थ-18 स्त्वेवम्-जात्या विशिष्टो जातिविशिष्टस्तद्भावो जातिविशिष्टता इत्यादि 'जं वेएइ पुग्गलं वा' इत्यादि ये पेदयते पगलं वाघद्रव्यादिलक्षणं, तथाहि-द्रव्यसम्बन्धाद्राजादिविशिष्टपुरुषसम्परिग्रहाद्वा नीचजातिकुलोत्पन्नोऽपि जात्या दिस[म्पन्न इव जनस्य मान्य उपजायते, बलविशिष्टताऽपि मल्लानामिव लकुटिभ्रमणवशात् रूपविशिष्टता प्रतिविशिष्टतादृ-IN |ग्वखालकारसम्बन्धात् तपोविशिष्टता गिरिकूट्याचारोहणेनातापनां कुर्वतः श्रुतविशिष्टता मनोज्ञभूदेशसम्बन्धात् खाध्यायं कुर्वतः लाभविशिष्टता प्रतिविशिष्टरलादियोगात् ऐश्वर्यविशिष्टता धनकनकादिसम्बन्धादिति, 'पुग्गले वाग दीप अनुक्रम [५३९] 9893902 ~34~ Page #35 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (१५) “प्रज्ञापना" - उपांगसूत्र-४ (मूलं+वृत्ति:) पदं [२३], -------------- उद्देशक: [१], ------------- दारं [-], -------------- मूलं [२९२] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र-[१५]उपांगसूत्र-[४] "प्रज्ञापना" मूलं एवं मलयगिरि-प्रणीता वृत्ति: प्रत उद्देशः१ सूत्रांक [२९२] दीप अनुक्रम [५३९] प्रज्ञापना-1 इति यान् बहून् पुद्गलान् वेदयते पुद्गलपरिणाम-दिव्यफलाद्याहारपरिणामरूपं विस्रसया वा यं पुद्गलानां परिणाम- २३कर्मप्रया: मल- अकस्मादभिहितजलदागमसंवादादिलक्षणं तत्प्रभावादुच्चैर्गोत्रं वेदयते-उच्चैर्गोत्रकर्मफलं जातिविशिष्टत्वादिकं वेदयते, कृतिपदे यवृत्ती. एतेन परत उदय उक्तः, सम्प्रति खतस्तमाह-'तेर्सि वा उदएणं' तेषां वा उच्चैर्गोत्रकर्मपुद्गलानां उदयेन जातिवि॥४६४॥ शिष्टत्वादिकं भवति, 'एस णं गोयमा' इत्याद्युपसंहारवाक्यं, 'नीयागोयस्स णं भंते । इत्यादि प्रश्नसूत्रं प्राग्वत्, सू. २९२ Nनिर्वचनमश्टविधोऽनुभावः, तमेवाष्टविधमनुभावं दर्शयति-'जाइविहीणया' इत्यादि, सुप्रतीतं, 'जं वेएइ पुग्गल'मि ति यं वेदयते पुद्गलं नीचकर्मासेवनरूपंनीचपुरुषसम्बन्धलक्षणं वा, तथाहि-उत्तमजातिसम्पन्नोऽपि उत्तमकुलोत्पन्नोNऽपि यदि नीचैःकर्मयशात् यथा (अधम) जीविकारूपमासेवते चाण्डाली वा गच्छति तदा भवति चाण्डालादिरिव जनस्य निन्यः, बलहीनता सुखशयनीयादिसम्बन्धतः रूपविहीनता कुत्सितवस्त्रादिसम्बन्धात् तपोविहीनता पार्थ| स्थादिसंसर्गात् श्रुतविहीनता विकथापरसाध्वाभासादिसंसर्गात् लामविहीनता देशकालानुचितकुक्रयाणकुसम्पर्कतः। ऐश्वर्यविहीनता कुग्रहकुकलत्रादिसम्पर्कत इति 'पुग्गले' इति यान् बहून् पुद्गलान् वेदयते यं वा पुद्गलपरिणाम वृन्ताकीफलाद्याहारपरिणामरूपं, वृन्ताकीफलं मभ्यवहृतं कण्ड्रत्युत्पादनेन रूपविहीनतामापादयतीत्यादि, विश्र-180४६४॥ सया वा पुद्गलानां परिणाम अभिहितजलदागमविसंवादलक्षणं वेदयते, तत्प्रभावात् नीचैःकर्म वेदयते, नीचैःकर्म-| [फलं जात्यादिविहीनतारूपं वेदयते इत्यर्थः, एतावता परत उदय उक्तः, सम्प्रति खत उदयमाह-'तेसिं वा उदए ~35 Page #36 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (१५) “प्रज्ञापना" - उपांगसूत्र-४ (मूलं+वृत्ति:) पदं [२३], -------------- उद्देशकः [१], ------------- दारं -], -------------- मूलं [२९२] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र-[१५]उपांगसूत्र-[४] "प्रज्ञापना" मूलं एवं मलयगिरि-प्रणीता वृत्ति: प्रत सूत्रांक [२९२] 'ति तेषां वा-नीचैर्गोत्रकर्मपुद्गलानामुदयेन जासादिविहीनतामनुभवति, 'एस णं गोयमा!' इत्याधुपसंहारवाक्यं, 19 अंतरायस्स णं भंते ! इत्यादि प्रश्नसूत्रं प्राग्वत्, निर्वचनं पञ्चविधोऽनुभावः प्रज्ञप्तः, तदेव पञ्चविधत्वं दर्शयति-दा-11 1 गंतराए' इत्यादि, दानस्यान्तरायो-विघ्नः दानान्तरायः, एवं सर्वत्र भावनीयं, तत्र दानान्तरायो दानान्तरायस्य कर्म-18 णः फलं लाभान्तरायादयो लाभान्तरायादिकर्मणामिति 'जं वेएइ पुग्गलं वा' इत्यादि, यं वेदयते पुद्गलं तथाविध-18 विशिष्टरत्नादिलक्षणं, तथाहि-प्रतिविशिष्टरत्नादिसम्बन्धात् दृश्यते तद्विपये एव दानान्तरायोदयः, सन्धिच्छेदनायु पकरणसम्बन्धालाभान्तरायकर्मोदयः प्रतिविशिष्टाहारसम्बन्धादनर्धार्थसम्बन्धाद्वा लोभतो भोगान्तरायोदयः एवIN मुपभोगान्तरायकर्मोदयोऽपि भावनीयः, तथा लकुटादिअभिघाताद्वीर्यान्तरायकर्मोदय इति, 'पुग्गले या' बहून् | तथाविधान् यान पुद्गलान् वेदयते यं वा पुद्गलपरिणामं तथाविधाहारौषध्यादिपरिणामरूपं, तथाहि-दृश्यते | तथाविधाहारीषधपरिणामाद्वीयर्यान्तरायकर्मोदयः मन्त्रापसिक्तवासादिगन्धपुद्गलपरिणामात् भागान्तरायादयो यथा सुबन्धुसचिवस्य, विस्रसया या यं पुद्गलानां परिणामं चित्रं शीतादिलक्षणं, तथाहि-रश्यन्ते वखादिकं दातुकामा अपि शीतादि निपतन्तमालोक्य दानान्तरायादयात् तस्यादातार इति तत्प्रभावात् , एप परत उदय उक्तः, खतस्त-IN माह-'तेर्सि वा उदएणति तेषां वा-अन्तरायकर्मपुद्गलानामुदयेन अन्तरायकर्मफलंदानान्तरायादिकं वेदयते-'एस णमित्याग्रुपसंहारवाक्यम् । इति श्रीमलयगिरिविरचितायां प्रत्रयाविंशतितमस्य कर्मप्रकृतिपदस्य प्रथमादेशकः ॥१॥ दीप अनुक्रम [५३९] vior ~36~ Page #37 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (१५) “प्रज्ञापना" - उपांगसूत्र-४ (मूलं+वृत्ति:) पदं [२३], -------------- उद्देशकः [२], ------------- दारं -], -------------- मूलं [२९३] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र-[१५]उपांगसूत्र-[४] "प्रज्ञापना" मूलं एवं मलयगिरि-प्रणीता वृत्ति: प्रत सूत्रांक प्रज्ञापनायाः मल- यवृत्ती. ॥४६५॥ [२९३] दीप अनुक्रम [५४०] व्याख्यातः प्रथमोद्देशकः, इदानी द्वितीयो व्याख्येयः, तस्य चायमभिसम्बन्धः, इहानन्तरोद्देशके ज्ञानावरणीया-1|२३कर्मप्रदीनामनुभाव उक्तः, इह तु तेषामेय ज्ञानावरणीयादीनामुत्तरप्रकृतिविभाग उच्यते, तत्र विशेषपरिज्ञानार्थ भूयोऽ- कृतिपदे |पि मूलप्रकृतिविषयं प्रश्ननिर्वचनसूत्रमाह २ उद्देशः सू. २९३ कति णं भंते ! कम्मपगडीओ पण्णताओ, गो ! अट्ठ कम्मपगडीओ पं०,०–णाणावरणिजं जाव अंतराइय, णाणावरणिज्जे णं भंते ! कम्मे कतिविधे पं०१, गो! पंचविधे पं०,०-आभिणियोहियनाणावरणिले जाव केवलनाणावरणिजे, दंसणावरणिले गं भंते । कम्मे कतिविधे पं०१, गो०! दु०५०,०-निहापंचए य दसणचउकए य, निदाएंचए ण भंते ! कति विधे पं०१, गो.! पंचविहे पं०, ०--निदा जाब थिणद्धी, देसणचउक्कए णं पुच्छा, गो। चउविघं पं०, तं०-चक्खुदंसणावरणिजे जाव केवलदसणावरणिजे, वेयणिजे णं भंते ! कम्मे कतिविधे पं०, गो.! दुविहे पं०, २०-सायावेयणिजे य असायावेयणिजे य, सातावेयणिज्जे णं भंते ! कम्मे पुच्छा, गो० ! अढविधे पं०, तं०-मणुण्णा सदा जाव कायमुहया, असायावेदणिजे णं भंते ! कम्मे कतिविधे पं०१, गो! अढविधे पं०, तंअमणुण्णा सदा जाव कायद्या , मोहणिजे णं भंते । कम्मे कतिविधे पं०१, गो०। दु. ५०, तं०-दसण मोहणिजे य ॥४६५॥ चरित्चमोहणिजे य, देसणमोहणिजे णे भंते ! कम्मे कतिविधे पं०१, गो! तिविहे पं०, तं०-सम्मत्तवेदणिजे मिच्छत्तबेयणिजे सम्मामिच्छत्तवेषणिजे, चरित्तमोहणिजे णं भंते ! कम्मे कतिविधे पं०१, गो! दुविधे पं०, तं-कसायवे. 8030093015230038 अथ (२३) कर्मप्रकृति-पदे उद्देशक: (२) आरब्ध: ~37~ Page #38 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (१५) “प्रज्ञापना" - उपांगसूत्र-४ (मूलं+वृत्ति:) पदं [२३], -------------- उद्देशक: [२], ------------- दारं -,-------------- मूलं [२९३] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र-[१५]उपांगसूत्र-[४] "प्रज्ञापना" मूलं एवं मलयगिरि-प्रणीता वृत्ति: टायटटca प्रत सूत्रांक [२९३] नोकसायवेद०, कसायवेदणिजे णं भंते ! कतिविधे पं०१, गो. सोलस विधे पं०, तं-अणताणुबंधी कोहे अर्णताणुबंधी माणे अ० माया अ० लोमे, अपञ्चक्खाणे कोहे एवं माणे माया लोभे, पञ्चक्खाणावरणे कोहे एवं माणे माया लोभे, संजलणकोहे एवं माणे माया लोमे, नोकसायवेयणिजे णं भंते ! कम्मे कतिविधे पं० १, गो० ! णवविहे पं०, ०इत्थीवेयवेयणिजे पुरिसवे० नपुंसगवे हासे रती अरती भए सोगे दुगुंछा, आउए णं भंते ! कम्मे कतिविधे पं०१, गो! चउविधे पं०, तं०- नेरइयाउए जाव देवाउए, णामे गं भंते ! कम्मे कतिविधे पं० १, गो० ! बायालीसतिविहे पण्णचे, तं०-गतिनामे १ जातिनामे २ सरीरनामे ३ सरीरोवंगनामे ४ सरीरबंधणनामे ५ सरीरसंघयणनामे ६ संघायणनामे ७ संठाणनामे ८ वणणामे ९ गंधणामे १० रसणामे ११ फासणामे १२ अगुरुलघुनामे १३ उवधायणामे १४ परामायणामे १५ आणुपुषिणामे १६ उस्सासणामे १७ आयवणामे १८ उजओयणामे १९ विहायगतिणामे २० तसनामे २१ थावरणामे २२ सुहुमनामे २३ बादरणामे २४ पज्जतणामे २५ अपजसणामे २६ साहारणसरीरणामे २७ पत्तेयसरीरणामे २८ थिरणामे २९ अथिरणामे ३० सुमगामे ३१ असुभणामे ३२ सुभगगामे ३३ दुमगणामे ३४ मूसरनामे ३५ दूसरनामे ३६ आदेजनामे ३७ अणादेजनामे ३८ जसोकिचिगामे ३९ अजसो किरिणामे ४० जिम्माणणा० ४१ तित्थगरणा० ४२ । गतिनामे णं मंते ! कम्मे कतिविहे पं० १, गो! चउबिहे पं०, ०-निरय तिरिय० मणु० देवगतिणामे, जातिणामे णं भंते ! कम्मे पुच्छा, गो! पंच०५०, त० एगिदियजातिणामे जाव पंचिंदियजातिणा, सरीरनामे णं भंते! कम्मे कतिविधे पं०१, गोरीपंच००,०-ओरालियसरीरनामे जाव कम्मगसरीरणामे, सरीरो दीप अनुक्रम [५४०] 2000 ~38~ Page #39 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (१५) “प्रज्ञापना" - उपांगसूत्र-४ (मूलं+वृत्ति:) पदं [२३], -------------- उद्देशकः [२], ------------- दारं -], -------------- मूलं [२९३] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र-[१५]उपांगसूत्र-[४] "प्रज्ञापना" मूलं एवं मलयगिरि-प्रणीता वृत्ति: प्रज्ञापनाया: मलय. वृत्ती . प्रत सूत्रांक [२९३]] २३कर्मप्रकृतिपदे २ उद्देशः | सू. २९३ ॥४६६॥ दीप अनुक्रम [५४०] eneHABAR वंगनामेणं भंते ! कति विधे ५०१, गो!तिविधे पं० त०-ओरालियसरीरोवंगणामे वेउबियसरीरोवंग आहारगसरीरोव०सरीखंधणनामेण भंते! कतिविहे पण्णते, गो.! पंचविधे पं० सं०-ओरालियसरीरबंधणणामे जाव कम्मगसरीरबंधणनामे, सरीरसंघायणामे गं भंते ! कति०१, गो०! पंचविधे पं०, तं०-ओरालियसरीरसंघायनामे जाव कम्मगसरीरसंघायनामे, संघयणनामे गं भंते ! कतिविधे पं०, गो०! छविहे पं०, तं-वइरोसभनारायसंघयणनामे उसहनारायसं० नारायसंघ० अद्धनारायसं० कीलियासंघ० छेवट्ठसंघयणनामे, संठाणनामे णं भंते ! कतिविधे पं०१, गो०! छबिहे पं०, तं०-समचउरंससंठाणनामे निग्गोहपरिमंडलसंठा साइसं० धामणसं० खुअसं० इंडसंठाणनामे, वण्णनामे ण भंते ! कम्मे कति विधे पं०१, गो०! पंचविधे पं०,०-कालवण्णनामे जाव सुकिल्लवण्णनामे, गंधनामे णं भंते ! कम्मे पुच्छा, मो०! दु० ५०, तं०-सुरभिगंधनामे दुरभिगंधनामे, रसनामे थे पुच्छा, गो०! पंचविधे पं०, तक-तित्तरसनामे जाव महुररसनामे, फासनामे णं पुच्छा, गो०! अट्टविहे पं०, तं०-कक्खडफासनामे जाव लहुयफासनामे, अगुरुलहुयनामे एगागारे पं०, उवधायनामे एगागारे ५०, पराघातनामे एगागारे पं०, आणुपुविणामे चउबिहे पं०, ०-नेरइयआणुपुषीणामे जाव देवाणुपुरीणामे, उस्सासनामे एगागारे ५०, सेसाणि सवाणि एगागाराई पण्णाचाई जाव तित्थगरनामे, णवरं विहायगतिनामे दुविधे पं० सं०-पसस्थविहायगइनामे अपसत्थविहायगतिनामे य । गोए णं भंते ! कम्मे काविहे पं०१, गो० दुविहे पं०, तं०-उच्चागोए य नीयागोए य, उचागोए णं भंते । कइविधे पं०, गो० अढविधे पं०, ०-जाइनिसिया जाव इस्सरियविसिया, एवं नीयागोएवि, णवरं जातिविहीणता ॥४६६॥ ~39~ Page #40 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (१५) “प्रज्ञापना" - उपांगसूत्र-४ (मूलं+वृत्ति:) पदं [२३], -------------- उद्देशकः [२], ------------- दारं -], -------------- मूलं [२९३] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र-[१५]उपांगसूत्र-[४] "प्रज्ञापना" मूलं एवं मलयगिरि-प्रणीता वृत्ति: प्रत सूत्रांक [२९३] Eeeeeeeeeeeeesecene जाव इस्सरियविहीणया । अंतराए णं भंते ! कम्मे कतिविधे पं०१, गो.! पंचविधे पं० त० दाणतराइए जाव वीरियंतराइए । (सूत्र २९३) 'कइ णं भंते !' इत्यादि पूर्ववत् , सम्प्रति 'यथोद्देशं [तथा] निर्देश' इति न्यायात् ज्ञानावरणीयोत्तरप्रकृतिविषयं । सूत्रमाह-'नाणावरणिजे णं भंते !' इत्यादि, इह आभिनिबोधिकादि इत्यादिशब्दार्थ उपयोगपदे वक्ष्यते, विनहभावना त्वियम्-आभिनिवोधिकज्ञानस्यावरणीय आभिनिवोधिक ज्ञानावरणीयं, एवं श्रुतज्ञानावरणीयमित्यादि-IN प्वपि भावनीयं । दर्शनावरणीयोत्तरप्रकृतीराह-'दरिसणावरणिज्जे णं भंते !' इत्यादि, 'द्रा कुत्सायां' नियतं द्राति-। कुत्सितत्वमविस्पष्टत्वं गच्छति चैतन्यं यस्यां खापावस्थायां सा निद्रा, यदिवा 'नै खप्ने' निद्राणं निद्रा, नखच्छोवाटिकामात्रेण यस्यां प्रबोध उपजायते सा खापावस्था निद्रा, तद्विपाकवेद्या कर्मप्रकृतिरपि निद्रा कारणे कार्योपचा रात्, 'निहानिद्द'त्ति निद्रातोऽतिशायिनी निद्रानिद्रा, शाकपार्थिवादिदर्शनात् 'मयूरज्यसकादय' इति मध्यमपदलोपी समासः, तस्यां हि चैतन्यस्यात्यन्तमस्फुटीभूतत्वात् बहुभिर्घोलनाप्रकारैः प्रबोधो भवति, ततः सुखप्रबोधहेतुनिद्रातोऽस्या अतिशायिनीत्वं, तद्विपाकवेद्या कर्मप्रकृतिरपि निद्रानिद्रा उपचारात्, तथा उपविष्ट ऊर्ध्वस्थितो वा प्रचलयति-घूर्णयति यस्यां खापावस्थायां सा प्रचला, तद्विपाकवेद्या कर्मप्रकृतिरपि प्रचला, 'पयलापयला' इति । प्रचलातोऽतिशायिनी प्रचलाप्रचला, पूर्ववत् मध्यमपदलोपी समासः, सा हि चक्रमणादिकमपि कुर्षत उदयमधि दीप अनुक्रम [५४०] SAREastatinintennational ~ 40~ Page #41 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (१५) “प्रज्ञापना" - उपांगसूत्र-४ (मूलं+वृत्ति:) पदं [२३], -------------- उद्देशकः [२], ------------- दारं -], -------------- मूलं [२९३] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र-[१५]उपांगसूत्र-[४] "प्रज्ञापना" मूलं एवं मलयगिरि-प्रणीता वृत्ति: प्रत सूत्रांक [२९३] दीप अनुक्रम [५४०] प्रज्ञापना- गच्छति, ततः स्थानस्थितखप्तृप्रभवप्रचलोपक्षया तस्या अतिशायिनीत्वं, 'थीणद्धी' इति स्त्याना-पिण्डीभूताश्कर्मप्रया मल-18ऋद्धिः-आत्मशक्तिरूपा यस्यां खापावस्थायां सा स्त्यानर्द्धिः, तद्भावे हि प्रथमसंहननस्य केशवावलसदृशी श- कृतिपदे य. वृत्ती. |क्तिरुपजायते, तथा च श्रूयते प्रवचने-कचित् प्रदेशे कोऽपि प्रातः क्षुलकः स्त्यानर्द्धिनिद्रासहितो द्विरदेन दिवा २ उद्देशः ॥४६७॥ खलीकृतः, ततस्तस्मिन् द्विरदे बद्धाभिनिवेशो रजन्यां स्त्यानध्र्युदये प्रवर्तमानः समुत्थाय तद्दन्तमुशलमुत्पाठ्य खोपा- सू. २९३ श्रयद्वारि च प्रक्षिप्य पुनः प्रसुप्तवानित्यादि, तथा चक्षुषा दर्शनं चक्षुर्दर्शनं तस्यावरणीयं चक्षुर्दर्शनावरणीयं अचक्षु-IN पा-चक्षुर्वजशेषेन्द्रियमनोभिर्दर्शनमचक्षुर्दर्शनं तस्यावरणीयमचक्षुर्दर्शनावरणीय अवधिरेव दर्शनमवधिदर्शनं तस्खावरणीयमवधिदर्शनावरणीयं केवलमेव दर्शनं केवलदर्शनं तस्यावरणीयं केवलदर्शनावरणीयं, इह निद्रापञ्चकं प्राप्साया दर्शनलब्धेरुपघातकृद् दर्शनावरणचतुष्टयं तु मूलत एव दर्शनलब्धिमुपहन्ति, आह च गन्धहस्ती-“निद्रादयः समधिगताया दर्शनलब्धेरुपघाते वर्तन्ते, दर्शनावरणचतुष्टयं तदुद्गमोच्छेदित्वात् समूलपातं हन्ति दर्शनल-18 ब्धि"मिति, वेदनीयं द्विधा-सातवेदनीयमसातवेदनीयं च, सातरूपेण यद्यते तत्सातवेदनीय, तद्विपरीतमसातवे-18॥ दनीयं, किमुक्तं भवति ?-यस्योदयात् शारीरं मानसं च सुखं वेदयते तत्सातवेदनीय, यसोदयात् पुनः शरीरे ४६७|| मनसि च दुःखमनुभवति तदसातवेदनीयं, एकैकमष्टविध, मनोज्ञामनोजशब्दादिविषयभेदात, मोहनीयं द्विधादर्शनमोहनीयं चारित्रमोहनीयं च, दर्शन-सम्यक्त्वं तन्मोहयतीति दर्शनमोहनीयं, चारित्रं-पावद्येतरयोगनिवृत्तिप्र ~ 41~ Page #42 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (१५) “प्रज्ञापना" - उपांगसूत्र-४ (मूलं+वृत्ति:) पदं [२३], -------------- उद्देशकः [२], ------------- दारं -], -------------- मूलं [२९३] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र-[१५]उपांगसूत्र-[४] "प्रज्ञापना" मूलं एवं मलयगिरि-प्रणीता वृत्ति: प्रत सूत्रांक [२९३] वृत्तिगम्यं शुभारमपरिणामरूपं तन्मोहयतीति चारित्रमोहनीयं, चशब्दी खगतानेकभेदसूचकी, दर्शनमोहनीयं । त्रिविध, तद्यथा-सम्यक्त्ववेदनीयं मिथ्यात्ववेदनीयं मिश्रवेदनीयं, तत्र जिनप्रणीततत्त्वश्रद्धानात्मकेन सम्यक्त्वरूपेण यवेद्यते तत्सम्यक्त्ववेदनीयं, यत्पुनर्जिनप्रणीततत्त्वाश्रद्धानात्मकेन मिथ्यात्वरूपेण वेद्यते तन्मिध्यात्ववेदनीयं. यत्तु मिश्ररूपेण-जिनप्रणीततत्त्वेषु न श्रद्धानं नापि निन्देत्येवंलक्षणेन वेद्यते तन्मिश्रवेदनीयं, आह-सम्यक्त्ववेदनीयं कथं दर्शनमोहनीयं ?, न हि तद्दर्शनं मोहयति, तस्य प्रशमादिपरिणामहेतुत्वात् , उच्यते, इह सम्यक्त्ववेदनीयं मिथ्यात्वप्रकृतिः, ततोऽतिचारसम्भवात् , औपशमिकक्षायिकदर्शनमोहनाचेदं दर्शनमोहनीयमित्युच्यते, चारित्रS मोहनीयं द्विविधं-कषायवेदनीयं नोकषायवेदनीयं च, तत्र यत्क्रोधादिकषायरूपेण वेद्यते तत्कषायवेदनीय, यत्पुनः स्त्रीवेदादिनोकषायरूपेण वेद्यते तन्नोकषायवेदनीयं, चशब्दी खगतानेकभेदसूचकौ, तत्र कषायवेदनीयं षोडशविध, क्रोधमानमायालोमानां प्रत्येकमनन्तानुबन्ध्यप्रत्याख्यानप्रत्याख्यानावरणसज्वलनरूपत्वात् , तत्रानन्तं संसारमनुबधन्तीत्येवंशीला अनन्तानुबन्धिनः, उक्तं च-"अनन्तान्यनुवमन्ति, यतो जन्मानि भूतये । ततोऽनन्तानुबन्धाख्या, क्रोधायेषु नियोजिता ॥१॥" एषां संयोजना इति द्वितीयमपि नाम, तत्रायमन्वर्थः-संयुज्यन्ते-सम्बध्यन्तेऽनन्तसङ्खयैभवर्जन्तवो येस्ते संयोजनाः, उक्तं च-'संयोजयन्ति यन्नरमनन्तसङ्घर्भवैः कषायास्ते । संयोजनताउनन्तानुवन्धिता याप्यतस्तेषाम् ॥१॥" सर्व प्रत्याख्यानं देशप्रत्याख्यानं च येषामुदये न लभ्यते ते भवन्त्यप्रत्या दीप अनुक्रम [५४०] 298203 टएर ~ 42~ Page #43 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (१५) “प्रज्ञापना" - उपांगसूत्र-४ (मूलं+वृत्ति:) पदं [२३], -------------- उद्देशक: [२], ------------- दारं [-], -------------- मूलं [२९३] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र-[१५]उपांगसूत्र-[४] "प्रज्ञापना" मूलं एवं मलयगिरि-प्रणीता वृत्ति: २३कर्मप्रकृतिपदे प्रत सूत्रांक [२९३] प्रज्ञापना- ख्यानाः, सर्वनिषेधवचनोऽयं नञ्, उक्तं च-'खल्पमपि नोत्सहेयेषां, प्रत्याख्यानमिहोदयात् । अप्रत्याख्यानसंज्ञाया: मल- तो, द्वितीयेषु निवेशिता ॥१॥" तथा प्रत्याख्यान-सर्वविरतिरूपमात्रियते यैस्ते प्रत्याख्यानावरणाः, आह चय० वृत्ती. "सर्वसावधविरतिः, प्रत्याख्यानमुदाहृतम् । तदावरणसंज्ञाऽतस्तृतीयेषु निवेशिता ॥१॥" तथा परीपहोपसर्गनिपाते २ उद्देशः ૪૬૮ાા |सति चारित्रिणमपि सम्-ईषत् ज्वलयन्तीति सज्वलनाः, उक्तं च-"संज्वलयन्ति यति यत्संविझं सर्वपापविरत-1 | सू. २९३ 18 मपि । तस्मात् सज्वलना इत्यप्रशमकरा निरुध्यन्ते ॥१॥" अन्यत्राप्युक्तम्-"शब्दादीन् विषयान् प्राप्य, सज्वल-18 यन्ति यतो मुहुः । ततः सख्यलनाहान, चतुर्थानामिहोच्यते ॥१॥" स्वरूपं च पश्चानपाऽमीपामिदं जलरेणुपुढविपचयराईसरिसो चउबिहो कोहो । तिणिसलयाकट्टडियसेलत्थंभोवमो माणो ॥१॥ मायावलेहीगोमुत्ति| मिढसिंगघणवंसमूलसमा । लोहो हलिहखंजणकद्दमकिमिरागसारित्यो ॥२॥ पक्खचउम्मासवच्छरजावज्जीवाणुगामिणो कमसो । देवनरतिरियनारयगइसाहणहेयवो भणिया ॥३॥" [जलरेणुपृथ्वीपर्वतराजीसदृशश्चतुर्विधः क्रोधः । तिनिशलताकाष्ठास्थिशैलस्तम्भोपमो मानः॥१॥ मायावलेखिकामेण्ढशृङ्गधनवंशमूलसमा । लोभो हरिद्राखञ्जनकदेमकृमिरागसदृशः ॥२॥ पक्षचतुर्मासवत्सरयावजीवानुगामिनः क्रमशः। देवनरतिर्यग्नरकगतिसा- ४६८i धनहेतबो भणिताः ॥३॥] 'इत्थीवेए' इति वेद्यते इति वेदः स्त्रिया वेदः स्त्रीवेदः, खियाः पुमांसं प्रत्यभिलाष इत्यर्थः, तद्विपाकवेद्यं कर्मापि स्त्रीवेदः, पुरुषस्य वेदः पुरुषवेदः, पुरुषस्य स्त्रियं प्रत्यभिलाष इत्यर्थः, तद्विपाकवेद्यं क दीप अनुक्रम [५४०] ~ 43~ Page #44 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (१५) “प्रज्ञापना" - उपांगसूत्र-४ (मूलं+वृत्ति:) पदं [२३], -------------- उद्देशकः [२], ------------- दारं -], -------------- मूलं [२९३] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र-[१५]उपांगसूत्र-[४] "प्रज्ञापना" मूलं एवं मलयगिरि-प्रणीता वृत्ति: प्रत सूत्रांक [२९३] मापि पुरुषवेदः, नपुंसकस्य वेदो नपुंसकवेदः, नपुंसकस्य स्त्रियं पुरुषं च प्रत्यभिलाष इत्यर्थः, तद्विपाकवेद्यं कर्मापि। नपुंसकवेदः, तथा यदुदयात् सनिमित्तमनिमित्तं वा हसति स्म हासयते वा तत् हास्यमोहनीयं, यदुदयाद्बाथाभ्यन्तरेषु वस्तुपु प्रमोदमाघत्ते तत् रतिमोहनीयं, यदुदयवशात् पुनर्वाह्याभ्यन्तरेषु वस्तुपु अग्रीतिं करोति तदरतिमोहनीयं, यदुदयात् प्रियविप्रयोगादौ सोरस्ताडमाक्रन्दति परिदेवते भूपीठे च लुठति दीर्घ च निःश्वसिति तत् शोकमोहनीयं, यदुदयवशात् सनिमित्तमनिमित्तं वा तथारूपस्वसङ्कल्पतो बिभेति तद्भयमोहनीयं, यदुदयवशात् पुनः शुभमशुभं वा वस्तु जुगुप्सते तत् जुगुप्सामोहनीयं, जुगुप्साजनकं मोहनीयं जुगुप्सामोहनीय, एवं सर्वपदेध्वपि विग्रहो भावनीयः, नोकषायता चामीषां हास्यादीनां कषायसहचारित्वात् , कैः कषायैः सहचारितेति चेत्, उच्यते, आद्यैादशभिः, तथाहि-नायेषु द्वादशकषायेषु क्षीणेषु हास्यादीनामवस्थानसम्भवस्तदनन्तरमेव तेषामपि क्षपणाय प्रवृत्तिः, अथवा पते प्रादुर्भवन्तोऽवश्यं कषायादीनुद्दीपयन्ति ततः कषायसहचारिणः, एवं नोशब्दः साह|चर्ये द्रष्टव्यः, कषायैः सहचारिणो नोकपाया इति, उक्तं च-"कपायसहवर्तित्वात् , कषायप्रेरणादपि । हास्यादिनवकस्योक्ता, नोकषायकषायता ॥१॥" आयुःकर्मसूत्रं पाठसिद्धं, नामकर्म द्विचत्वारिंशद्विधं, तानेव द्वाचत्वारिंशतं भेदानाह-'गतिनामे'त्यादि, गम्यते-तथाविधकर्मसचिवैः प्राप्यते इति गतिः-नारकत्वादिपर्यायपरिणतिः, सा. चतुर्धा, तद्यथा-नरकगतिस्तिर्यग्गतिर्मनुष्यगतिर्देवगतिस्तजनकं नाम गतिनाम, तदपि चतुर्की, 'नरकगतिनामें-18 दीप अनुक्रम [५४०] EFERENCSee For P OW ~44 Page #45 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (१५) “प्रज्ञापना" - उपांगसूत्र-४ (मूलं+वृत्ति:) पदं [२३], -------------- उद्देशकः [२], ------------- दारं -], -------------- मूलं [२९३] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र-[१५]उपांगसूत्र-[४] "प्रज्ञापना" मूलं एवं मलयगिरि-प्रणीता वृत्ति: प्रत सूत्रांक [२९३] प्रज्ञापनाया: मलय. वृत्ती. ॥४६॥ दीप अनुक्रम [५४०] स्वादि, तथा एकेन्द्रियादीनामेकेन्द्रियवादिरूपसमानपरिणामलक्षणमेकेन्द्रियादिशब्दव्यपदेशभाक् यत्सामान्य साकर्मप्रजातिस्तजनकं नाम जातिनाम, इदमत्र तात्पर्य-द्रव्यरूपमिन्द्रियमहोपाङ्गनामेन्द्रियपोसिनामसामर्थ्यसिद्ध, भा- कृतिपदे वरूपं तु स्पर्शनादीन्द्रियावरणक्षयोपशमसामयात्, 'क्षायोपशमिकाणीन्द्रियाणीति वचनात्, यत्पुनरेकेन्द्रियादिश- २ उद्देशः ब्दप्रवृत्तिनिवन्धनं तथारूपसमानपरिणतिलक्षणं सामान्यं तदनन्यसाध्यत्वाजातिनिबन्धनमिति, तब जातिनामसू. २९३ पञ्चधा, तद्यथा-एकेन्द्रियजातिनाम यावत्पश्चेन्द्रियजातिनाम, तथा शीर्यते इति शरीरं, तत्पञ्चधा, तद्यथा-औदारिक क्रियमाहारकं तैजसं कार्मणं, एतानि प्रागेव व्याख्यातानि, तन्निबन्धनं नामापि पञ्चधा, तद्यथा-औदारिकनाम वैक्रियनाम इत्यादि, तत्र यदुदयादौदारिकशरीरप्रायोग्यान पुद्गलानादाय औदारिकशरीररूपतया परिणमयति परिणमथ्य च जीवप्रदेशैः सह परस्परानुगमरूपतया सम्बन्धयति तदौदारिकशरीरनाम, एवं शेषशरीरनामान्यपि भावनीयानि, 'सरीरोपाङ्गनामेति शरीरस्थानान्यष्टौ शिरप्रभृतीनि, उक्तं च-'सीसमुरोयरपिट्ठी दो बाडू ऊरुया य अटुंगा [शीर्षमुदरं पृष्ठिद्वौं वाहू उरुणी चाष्टाङ्गानि] इति, उपाहानि अङ्गावयवभूतान्यङ्गुल्यादीनि शेषाणि । तत्प्रत्यययवभूतान्यङ्गुलिपरेखादीनि अङ्गोपाङ्गानि अङ्गानि च उपाङ्गानि च अङ्गोपाङ्गानि च २ अङ्गोपाङ्गानि “स्था- I ४६९॥ दावसङ्घयेय" इत्येकशेषः, तन्निमित्तं नाम शरीरोपाङ्गनाम, तच त्रिधा, तद्यथा-औदारिकाङ्गोपाङ्गनाम क्रियानोपा-11 अनाम आहारकाङ्गोपाङ्गनाम, तत्र यदुदयवशादौदारिकशरीरत्वेन परिणतानां पुद्गलानामङ्गोपाङ्गविभागपरिणति SAREauraton International ~45~ Page #46 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (१५) “प्रज्ञापना" - उपांगसूत्र-४ (मूलं+वृत्ति:) पदं [२३], -------------- उद्देशक: [२], ------------- दारं [-], -------------- मूलं [२९३] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र-[१५]उपांगसूत्र-[४] "प्रज्ञापना" मूलं एवं मलयगिरि-प्रणीता वृत्ति: प्रत सूत्रांक [२९३] दीप अनुक्रम [५४०] रुपजायते तदौदारिकाङ्गोपाङ्गनाम, एवं वैक्रियाहारकाङ्गोपाङ्गनाम्नी अपि वाच्ये, तैजसकार्मणयोस्तु जीवप्रदेशसंस्थानानुरोधित्वान्नास्त्यङ्गोपाङ्गसम्भवः, तथा बध्यतेऽनेनेति बन्धनं, यदौदारिकपुद्गलानां गृहीतानां गृह्यमाणानां च परस्परं तैजसादिपुद्गलैर्वा सह सम्बन्धजनकं तद्वन्धननाम, आह च मूलटीकाकार:-"विद्यते तत्कर्म यन्निमि-IM |त्ता धादिसंयोगापत्तिराविर्भवति, यथा काष्ठद्वयभेदैक्यस्य करणे जतु कारण"मिति, तच पञ्चधा, तद्यथा-औदारि कबन्धननाम वैक्रियबन्धननाम आहारकबन्धननाम तैजसवन्धननाम कार्मणबन्धननाम, तत्र यदुदयवशात् औदा-IN |रिकपुद्गलानां गृहीतानां गृह्यमाणानां च परस्परं तेजसादिपुद्गलैश्च सह सम्बन्ध उपजायते तदौदारिकवन्धनं, यदुदयाद्वैक्रियपुद्गलानां गृहीतानां गृह्यमाणानां च परस्परं तैजसकार्मणपुद्गलैश्च सह सम्बन्धः तद्वैक्रियबन्धन, यदुदयादाहारकशरीरपुद्गलानां गृहीतानां गृह्यमाणानां च परस्परं तैजसकार्मणपुद्गलैश्च सह सम्बन्धस्तदाहारकबन्धन, यदुदयात्तैजसपुद्गलानां गृहीतानां गृह्यमाणानां च परस्परं कार्मणपुद्गलैश्च सह सम्बन्धस्तत्तैजसबन्धननाम, यदुदयात् कार्मणपुद्गलानां गृहीतानां गृह्यमाणानां च परस्परं सम्बन्धसत्कार्मणवन्धननाम, तथा सङ्घात्यन्ते-पि-IN |ण्डीक्रियन्ते औदारिकादिपुद्गला येन तत्सहातं तच तन्नाम च सछातनाम, तदपि पञ्चधा, तद्यथा-औदारिकसबा-10 तनाम बैंक्रियसवातनाम आहारकसवातनाम तैजससहातनाम कार्मणसवातनाम, तत्र यदुदयवशादौदारिकशरीररचनाऽनुकारिसहातरूपा जायते तदीदारिकसहातनाम, एवं वैक्रियादिशरीरसाहातनामस्वपि भावनीयं, 'संघयण ~46~ Page #47 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (१५) प्रत सूत्रांक [२९३] दीप अनुक्रम [ ५४० ] पदं [२३], -------------- 3: [2]--------- GR [-], ------ • मूलं [ २९३] पूज्य आगमोद्धारकश्री संशोधितः मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र [१५],उपांगसूत्र-[४] "प्रज्ञापना" मूलं एवं मलयगिरि-प्रणीता वृत्तिः प्रज्ञापना याः मल य०वृत्ती. ॥४७०॥ “प्रज्ञापना” – उपांगसूत्र - ४ ( मूलं + वृत्ति:) - नामे' इति संहनननाम, संहननं - अस्थिरचनाविशेषः, आह च मूलटीकाकार:- "संहननमस्थिरचनाविशेषः” इति, तेन यः प्राह सूत्रे शक्तिविशेष एव संहननमिति, तथा च तद्बन्थः - 'सुत्ते सत्तिविसेसो संघयण' मिति स भ्रान्तः, | मूलटीकाकारेणापि सूत्रानुयायिना संहननस्यास्थिरचनाविशेषात्मकस्य प्रतिपादितत्वात्, यत्त्वकेन्द्रियाणां सेवार्त्तसंहननमन्यत्रोक्तं तत् टीकाकारेण समाहितं, औदारिकशरीरत्वादुपचारत इदमुक्तं द्रष्टव्यं न तु तत्त्ववृत्त्येति, यदि पुनः शक्तिविशेषः स्यात् ततो देवानां नैरयिकाणां च संहननमुध्येत अथ च ते सूत्रे साक्षादसंहननिन उक्ता इत्यलं उत्सूत्रप्ररूपक विस्पन्दितेषु स चास्थिरचनाविशेष औदारिकशरीर एव नान्येषु तेषामस्थिरहितत्यात्, तच्च पोढा, १ मतमिदं जिनवल्लभीयं यतस्ततो न श्रीमद्धरिभद्रसूरिसूत्रितायां वृत्तौ कथञ्चिदप्युलेखः, न चानुक्तोपालम्भसंभावना यतः तेन जिनवइमेन विहिते तदनुसारिमिच विवृते सूक्ष्मार्थसार्थशत के स्पष्टमवलोक्यते चतुर्दश्यां गाथायां “सुते सत्तिविसेसो संघयणमिट्ठनिचड" ति सूत्रे, व्याख्याने च तथा सूत्रे-आगमे शक्तिविशेषः संहननमुच्यते, कोऽभिप्रायः वर्षभनाराचादिशब्दस्य संहननाभिधायकस्य शक्तिविशेपाभिधायकतथा व्याख्यात्तत्वात् शक्तिविशेषः संहननमागमे प्रोच्यते । ईदृशं च संहननं देवनारकयोरपीष्यत एव तेन देवा वार्षभनाराचसंहननिनो नारकाः सेवार्तसंहननिन इत्यागमाभिप्रायतो बोद्धव्यं । इह तु प्रन्येऽस्थिनिचयकीलिकादिरूपाणामस्थामेव रचनाविशेषः संहननं बोद्धव्यं एतथास्थिनिचयरूपं संहननमदारिकशरीर एव, नान्येषु शेषाणामरथ्याद्यभावादिति गाथार्थः ॥ व्याख्याकारः पञ्चदश्यामपि गाथायां साक्षेपमभिदधौ यथा अत्राह - ननु "नरतिरियाणं छप्पिय, हवंति विगलिंदियाण छेवट्ट" मिति वचनात् यो विकलेन्द्रियाणां पि Education Internation For Praise Only ~47~ २३ कर्मप्रकृतिपदं ||४७०॥ Page #48 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (१५) प्रत सूत्रांक [२९३] टीप अनुक्रम [५४०] “प्रज्ञापना" उपांगसूत्र- ४ ( मूलं + वृत्तिः) - दारं [-1, - मूलं [ २१३] पदं [२३], ---- उद्देशक: [२], पूज्य आगमोद्धारकश्री संशोधितः मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र [१५] उपांगसूत्र-[४] “प्रज्ञापना" मूलं एवं मलयगिरि-प्रणीता वृत्तिः ➖➖➖➖➖➖➖➖➖➖➖ Education Inman - ➖➖➖➖➖➖➖➖➖➖➖ - पीलिकादीनां छेदवृत्त संहननोदयोऽभ्युपगतः सोऽस्थ्यभावे कथं संगच्छते ? इत्यत्रोच्यते - योऽयमस्थिविन्यासप्रयत्नोऽभिहितोऽसौ बलप्रकपंख्यापकोऽत एव सूत्रे शक्तिविशेषः संहननमुक्तं, अन्यथोभयमर्कटमहपट्टकीलिकाप्रयत्ने सति गात्रसंकोचविकाशाभावो भाव्येत । अतः पिपीलिकादीनां क्षुद्रसत्त्वानां यद्यप्यस्थीनि न संभाव्यन्ते तथापि कायवलमधिकृत्य संहननमुच्यते, तथाहि – लोकेऽस्थिसद्भावेऽप्यल्पवलः पुरुषोऽसंहनन एव व्यपदिश्यते । ततः शक्तिमपेक्ष्य तेषां संहननं वेदितव्यं । अथवा शङ्खादीनां द्वीन्द्रियाणामपि दृश्यन्ते एवास्थीनि, पिपीलिकादीनां तु सूक्ष्मत्वात्केवलगम्यानीति न कश्चिद्विरोध इति पञ्चसङ्ग्रहामिप्रायः । इतीदं षड्विधं संहननमस्थिसंनिचयात्मकं यदुदयाद्भवति शरीरे तदपि तत्संज्ञितं षडिधं संहनननामकर्मेति गाथार्थः ॥ प्रसारकसभा मुद्रिते प्रस्तावनाकर्तृभिर्विवेचितं च तत्र “संहननव्याख्याधिकारे यदुक्तं - "सुत्ते सत्तिविसेसो" तत्र समयविद्भिः समालोचनीयं समयेध्वस्थिरचनात्मकस्यैव स्वीकृतत्वात्, यदुक्तं विवाहप्रज्ञप्तिवृत्ती सूक्ष्मसूक्ष्मतरपदार्थसार्थवर्णनोद्वेधानादिकालसंबद्धमिध्यात्वाविरतकषायाद्यन्तरारातिवर्गस्वान्तत्र्यापारार्जितमूलककर्माष्टकम हामलापनयनक्षमनाना| विधयमनियमव्रातोर्मियुक्तचारित्रभुवनापूर्णगाढतरदुःखदसमर्थकपायतापभीत्यागतचिरंतनमुनिपुङ्गवजीवनच रनिर्भय क्रीडोपशोभिते सिद्धान्तरत्नाकरे दुष्धमारकराक्षसेन कवलीयमानमेधायुबैलानामैदंयुगीनजनानां प्रवेशाय सरलनवायादित्या बद्धतटैः विबुधेनार्चनीयक्रमकजैः श्रीमदभयदेवसुरिपादैः – “इह संहननं अस्थिरचनाविशेषः" । तथा चरणसंस्पर्शिरजोभिः पवित्रितभूमण्डलैः श्रीमद्देवभद्रसूरिपादैः त्रैलोक्यदीपिकावृत्तावपि तथैवाभिधानात् । तत्पाठश्चायम् – “संहन्यन्ते संहतिविशेषं प्राप्यन्ते शरीरास्थ्यवयवाः यैस्तानि संहननानि दृढदृढत रादयः शरीरबंधाः"। मनु तर्हि एकेन्द्रियाणां सेवार्त्तसंहननं जीवाभिगमोपा विबुधानां च वज्रर्षभनाराचं प्रज्ञापनादौ प्रोक्तमस्ति तत्र भवतां का गतिरिति चेत् न, एकाक्षाणां सुधाशिनां च शक्तिमपेक्ष्यौपचारिकमुक्तं, तथाहि एकाक्षाणामत्यन्ताल्पीयसी शक्तिरेतदृशक्तिविषय For Panal Lise Only ➖➖➖➖➖➖➖➖➖➖➖➖ ~ 48~ war Page #49 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (१५) “प्रज्ञापना" - उपांगसूत्र-४ (मूलं+वृत्ति:) पदं [२३], -------------- उद्देशक: [२], ------------- दारं [-], -------------- मूलं [२९३] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र-[१५]उपांगसूत्र-[४] "प्रज्ञापना" मूलं एवं मलयगिरि-प्रणीता वृत्ति: प्रज्ञापना- याः मल- यवृत्ती. प्रत सूत्रांक [२९३] ॥४७॥ दीप अनुक्रम [५४०] सेवार्तसंहननस्य तदादारिकशरीरसंबंधमात्रमपेक्ष्य द्रष्टव्यं, निर्जराणामपि चकवर्तिभ्योऽप्यखन्तमहती शक्तिः सा च प्रथमसंहननविषया २३कर्मप्रइति । न चैतत्प्रथकृतिः सूत्रे शक्तिविशेष(यः) संहननमुक्तं, वृत्तिकृता तु तदभिप्रायः प्रकटीकृतः, तत् किमर्थ भवद्भिः समालोचनीयमुच्यत M कृतिपदं इति वाच्यं, पंथद्विस्तु "सुत्ते सत्तिविससो" इत्यनेन सूत्रे शक्तिविशेष(प.) संहननं संस्थापित, वृत्तिकारेणापि तदेवातिटडीकतं, न त्वौपचारिकमुक्तं, ननूपचारोऽपि सद्वस्तुन एवं क्रियते, नत्वसद्वस्तुन इति चेत् , सत्यं, परम्-"अतस्मिन् तदभ्यवसाय: उपचारः" इति वचनात् उपचारोऽप्यसत्येव सद्वस्तुनो न तु सद्वस्तुनि सद्वस्तुनः । अपि च सूत्रे शक्तिविशेषः संहननं स्यात् तर्हि जीवाभिगमसूत्रे कथं देवनारका असंहननाः प्रोक्ताः, तथा च तद्न्थः ----"मुरनेरइया छहं संघयणाणं असंघयणा" इति, पुनः तत्रैव हेतुमद्भावेनोक्तं-'नेवही नेव सिरा | नेव पहारू नेव संधयणमट्ठी ति । किं च सूत्रे शक्तिविशेषः संहननं तर्हि गर्भजनरतिरश्चामपि ग्रंथकृदभिप्रायेण सूत्रे शक्तिविशेषः संहननमुक्तं स्यात् ; तश्च कुत्रचिदागमे नोपलभ्यते इति, एतन्न स्वमनीषिकाया विजूंभितं, कि तूत्पत्तिविनाशादिजीवनापूर्णभवाब्धिनिमञ्जतूसत्योद्ध|रणपोतायमानैः श्रीमन्मलयगिरिसूरिपादैः जीवाभिगमायुपांगवृत्तिषु तथैवोल्लेखः कृतः । तद्मयश्चायम्-"अस्थिनिचयात्मकं च संहननमसोडस्थ्याधभावादसंहननानि शरीराणि, इयमत्र भावना-इह तत्त्ववृत्त्या संहननमस्थिनिधयात्मकं, यत्तु प्रागेकेन्द्रियाणां सेवासंहननमभ्यधायि तदीवारिकशरीरसंबंधमात्रमपेक्ष्यौपचारिक, देवा अपि यदन्यत्र प्रज्ञापनादौ वर्षभनाराचसंहननिनः सम्यन्ते तेऽपि गौणवृत्त्या, तथाहि-रह यारशी मनुष्यलोके पक्रवादेविशिष्टवमर्षभनाराचसंहननिनः सकलशेषमनुष्यजनासाधारणी शक्ति:-'दो सोला बत्तीसा सत्रबलेणं तु संकलनिवद्ध'मित्यादिका, ततोऽप्यधिकतरा देवानां पर्वतोपाटनादिविषया श्रूयते न प शरीरपरिजेश इति तेऽपि वर्षभनाराच IN४७१॥ सिंहननिनः उक्ताः, न पुनः परमार्थतस्ते संहननिनः, ततो नारकाणामस्थ्यभावात् संहननाभावः । एतेन योऽपरिणतभगक्सिद्धान्तसारो उररिया ~ 49~ Page #50 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (१५) “प्रज्ञापना" - उपांगसूत्र-४ (मूलं+वृत्ति:) पदं [२३], -------------- उद्देशकः [२], ------------- दारं -], -------------- मूलं [२९३] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र-[१५]उपांगसूत्र-[४] "प्रज्ञापना" मूलं एवं मलयगिरि-प्रणीता वृत्ति: प्रत सूत्रांक [२९३] दीप अनुक्रम [५४०] Teaseenecesses बाबदूकः सिद्धान्तबाहुल्यमात्मनः ख्यापयन्नेवं प्रललाप "सुत्ते सत्चिविसेसो संघयणमिट्ठिनिचों"त्ति इति सोऽपाकीर्णो द्रष्टव्यः । साक्षा दत्रैव सूत्रेऽस्थिनिचयात्मकस्य संहननस्याभिधानात् । अस्थ्यभावे संहननप्रतिषेधात् इति (जीवाभिगमसू० ३२) एवमेव त्रैलोक्यदीपिकावृत्तावप्युहेखितं । तत्वं पुनः कलहंसा जानन्ति" || अन्न नैवं वाच्यं यदुतोपसर्जनानुपसर्जनकृत एष विशेषो यतः श्रीमद्भिरिभद्रसूरिपाच-18 रपि आवश्यकद्वत्तौ "इह चेत्थम्भूतास्थिसंचयोपमितः शक्तिविशेषः संहननमुच्यते न स्वस्थिसंचय एव, देवानामस्थिरहितानामपि प्रथमसंइननयुक्तत्वात्" इति वचनेन शक्तिविशेषरूपस्यैव तस्याङ्गीकारादिति, आदौ तावत् क एष तावदचेत् गणनां विबुधेषु यो मुख्यं सूर्य ज्योतिरिङ्गणमाख्याय ज्योतिरिङ्गणमेव ज्योतिष्पतितया व्याहरेत् ।, नैव चेत् कश्चित् कथमिव व्याकृतं सूत्रेऽस्थिनिचयस्य संहननवाच्यतानिषेधाय 'गुत्ते सत्तिविसेसो' इत्यावि, भवदर्शितोक्तावपि अस्थिनिचयस्यैव संहननवाच्यता स्पष्टैव, यत उदितं यह चेत्यादि अन्यथाभियुक्तमतं तु केवलमेवास्थिनिचर्य संहननशब्दवाच्यतयाऽपेक्षितमपाकुर्यात् न तु शास्त्रसिद्ध संहननस्पास्थिवाच्यतापक्षं, तथा च देवानामाघसंहननिता शक्तिविशेषापेक्षिणी एकेन्द्रियाणामन्त्यसंहननितौदारिकशरीरसत्ताऽपेक्षिणीत्येवं भवत्यौपचारिकी नतु अस्थिनिचयस्यौपचारिकत्वं संहननशब्दवाच्यतायां लेशवोऽपि, ततो युक्तमेवोक्तं श्रीमद्दिष्टीकाकद्भिर्मलयगिरिसूरिचरणैरुररीकृत्य जिनवल्लभगणिसत्कं 'सुत्ते सत्तिविसेसो' इति वचनं 'इत्यलमुत्सूत्रप्ररूपकविस्पन्दितेषु' इत्येवं कुमार्गगमृगसिंहनाधीयं वचनं, एवं च 'साइणा परिनिब्बुढे' इति वचनस्य | कल्याणकपरतया व्याख्यानं गर्भापहारस्य षष्ठकल्याणकतया व्यक्तीकृतिश्च तस्मैव मुखमलकुर्वाणा शोभते न सूत्रानुसारिणां श्रीमहरिभद्राचार्याभयदेवसूरिन्याख्यातवीरवरश्रीमद्वर्धमानस्वामिकल्याणपश्चकवादिनामिस्पलं चसूर्या । 202020000 ~50~ Page #51 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (१५) प्रत सूत्रांक [२९३] दीप अनुक्रम [ ५४० ] “प्रज्ञापना” – उपांगसूत्र - ४ ( मूलं + वृत्ति:) - पदं [२३], -------------- • उद्देशक: [२], ---------दारं [-], [---- • मूलं [ २९३] पूज्य आगमोद्धारकश्री संशोधितः मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र [१५],उपांगसूत्र-[४] "प्रज्ञापना" मूलं एवं मलयगिरि-प्रणीता वृत्तिः प्रज्ञापना या मल ॥४७२ ॥ तद्यथा-वजर्षभनाराचं ऋषभनाराचं नाराचं अर्द्धनाराचं कीलिका सेवा च तत्र वज्रं कीलिका ऋषभः परि ६ वेष्टनपट्टः नाराचं- उभयतो मर्कटबन्धः, उक्तं च- "रिसहो य होइ पट्टो वज्रं पुण कीलिया मुणेयचा । उभओ य० वृत्तौ ४ मक्कडबंधो नारायं तं वियाणाहि ॥ १ ॥ [ ऋषभश्च भवति पट्टो वज्रं पुनः कीलिका ज्ञातव्या । उभयतो मर्कटबन्धो यस्तं नाराचं विजानीहि ॥ १ ॥ ] ततश्च द्वयोरस्नोरुभयतो मर्कटबन्धनबद्धयोः पट्टाकृतिना तृतीयेनास्ना परिवेष्टितयोरुपरि तदस्थित्रयभेदि कीलिकाख्यं वज्रनामकमस्थि यत्र भवति तद्वज्रर्षभनाराचसंहननं, यत्पुनः कीलिकारहितं संहननं तत् ऋषभनाराचं, यत्र त्वस्थ्नां मर्कटबन्ध एव केवलो भवति तत्संहननं नाराचं, यत्र त्वेकपार्श्वन मर्कटबन्धो द्वितीयपार्श्वे च कीलिका तदर्द्धनाराचसंहननं, यत्रास्थीनि कीलिकामाबद्धान्येव भवन्ति तत्संहननं कीलिकाख्यं यत्र पुनः परस्परपर्यन्तमात्र संस्पर्शलक्षणां सेवामागतानि अस्थीनि नित्यमेव सेहाभ्यङ्गादिरूपां परिशीलनामाकाङ्क्षन्ति तत्सेवार्त्तसंहननं, एतन्निबन्धनं संहनननामापि षोढा, तद्यथा-वर्जर्षेभनाराच संहनननाम ऋषभनाराचनाम नाराचनाम अर्द्धनाराचनाम कीलिकानाम सेवार्त्तनाम, तत्र यदुदयात् वज्रर्षभनाराचसंहननं भवति तत् वज्रर्षभनाराचसंहनननाम, एवं शेषसंहनननामखपि भावनीयं, तथा संस्थानं-आकारविशेषस्तेष्वेव गृहीतसङ्घातितबद्धेषु औदारिकादिषु पुगलेषु संस्थानविशेषो यस्य कर्मण उदयाद् भवति तत्संस्थानं, एतच्च पोढा, तद्यथा-समचतुर| ससंस्थाननाम न्यग्रोधपरिमण्डलसंस्थाननाम सादिसंस्थाननाम वामनसंस्थाननाम कुब्जसंस्थाननाम हुण्डसंस्थान Eticatur For Penal Use Only ~51~ २३ कर्मप्रकृतिपदं ॥४७२॥ Page #52 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (१५) “प्रज्ञापना" - उपांगसूत्र-४ (मूलं+वृत्ति:) पदं [२३], -------------- उद्देशक: [२], ------------- दारं [-], -------------- मूलं [२९३] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र-[१५]उपांगसूत्र-[४] "प्रज्ञापना" मूलं एवं मलयगिरि-प्रणीता वृत्ति: प्रत सूत्रांक [२९३] नाम च, तत्र यदुदयादसुमतां समचतुरस्त्रसंस्थानमुपजायते तत्समचतुरस्रसंस्थाननाम, यदुदयात्तु न्यग्रोधपरिम-IN Kण्डलं संस्थानं तन्यग्रोधपरिमण्डलसंस्थाननाम, एवं शेषाण्यपि वाच्यानि, तथा वर्ण्यते-अलकियते शरीरमनेनेति। वर्णः स च पश्चप्रकारः श्वेतपीतरक्तनीलकृष्णभेदात् , तन्निबन्धनं नामापि पञ्चधा, तद्यथा-श्वेतवर्णनाम पीतवर्ण-1॥ नाम रक्तवर्णनाम नीलवर्णनाम कृष्णवर्णनाम, तत्र यदुदयाजन्तुशरीरेषु श्वेतवर्णप्रादुर्भावो यथा विशकण्ठिकानां तत् श्वेतवर्णनाम, एवं शेषवर्णनामान्यपि भावनीयानि, तथा 'गन्ध अईने' गन्ध्यते-आणायते इति गन्धः, स द्विधा-सुरभिगन्धो दुरभिगन्धश्च, तन्निबन्धनं गन्धनामापि द्विधा, तद्यथा-सुरभिगन्धनाम दुरभिगन्धनाम च, तत्र यदुदयाजन्तुशरीरेषु सुरभिगन्ध उपजायते यथा शतपत्रमालतीकुसुमादीनां तत्सुरभिगन्धनाम, यदुदयाद् दुर| भिगन्धः शरीरेधूपजायते यथा लशुनादीनां तत् दुरभिगन्धनाम, तथा 'रस आखादनखेहनयोः' रखते आखाद्यते | इति रसः, स पञ्चधा, तिक्तकटुकषायाम्लमधुरभेदात्, तन्निबन्धन रसनामापि पञ्चधा, तद्यथा-तिक्तनाम कटु-1. नाम कपायनाम अम्लनाम मधुरनाम, तत्र यदुदयात् जन्तुशरीरपु तिक्तो रसो भवति यथा मरिचादीनां तत्तिक्तरसनाम, एवं शेषापयपि रसनामानि भावनीयानि, तथा 'स्पृश संस्पर्श' स्पृश्यते इति स्पर्शः, 'अकर्तरी ति घञ्प्रत्ययः, स च कर्कशमृदुल घुगुरुखिग्धरूक्षशीतोष्णभेदादष्टप्रकारः, तनिवन्धनं स्पर्शनांमाप्यष्टप्रकार, तत्र यदुदयाजन्तु-18| शरीरेषु कर्कशः स्पर्शो भवति यथा पाषाणविशेषादीनां तत्कर्कशस्पर्शनाम, एवं शेषापयपि स्पर्शनामानि भावनी दीप अनुक्रम [५४०] ~52~ Page #53 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम “प्रज्ञापना" - उपांगसूत्र-४ (मूलं+वृत्ति:) पदं [२३], -------------- उद्देशक: [२], ------------- दारं [-], -------------- मूलं [२९३] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र-[१५]उपांगसूत्र-[४] "प्रज्ञापना" मूलं एवं मलयगिरि-प्रणीता वृत्ति: कृतिपद प्रत सूत्रांक [२९३] 2009 प्रज्ञापना-18 यानि, तथा यदुदयात् प्राणिनां शरीराणि न गुरूणि नापि लघुनि किन्त्वगुरुलघुरूपाणि भवन्ति तदगुरुलघुनाम, २३कर्मप्रया: मल- तथा यदुदयात् खशरीरावयवैरेव शरीरान्तः परिवर्द्धमानैः प्रतिजिहागलवृन्दलम्बकचोरदन्तादिभिरुपहन्यते यद्वा । य. वृत्ती. खयंकृतोद्वन्धनभैरवप्रपातादिभिस्तदुपघातनाम, यदुदयात् पुनरोजखी दर्शनमात्रेण वाक्सौष्ठवेन वा महानृपसभा॥४७३। मपि गतः सभ्यानामपि त्रासमापादयति प्रतिवादिनश्च प्रतिभाविघातं करोति तत्पराघातनाम, तथा कूर्परलाङ्गलगोमूत्रिकाकारेण यथाक्रम द्वित्रिचतुःसमयप्रमाणेन विग्रहेण भवान्तरोत्पत्तिस्थानं गच्छतो जीवस्यानुश्रेणिनियता गमनपरिपाटी आनुपूर्वी, तद्विपाकवेद्यं नामकर्मापि कारणे कार्योपचारात् आनुपूर्वी नाम, तच्च चतुर्की, तद्यथानरयिकानुपूर्वीनाम तिर्यगानुपूर्वीनाम मनुष्यानुपूर्वीनाम देवानुपूर्वी नाम, तथा यदुदयवशादात्मन उच्चासनिःवासलब्धिरुपजायते तदुच्छासनाम, आह-यद्येवमुच्छ्वासपर्याप्तिनाम्नः कोपयोगः, उच्यते, उच्छासनान उच्छासनिःश्वासयोग्य पुद्गलग्रहणमोक्षविषया लन्धिरुपजायते, सा च लब्धिःच्छासपर्याप्तिमन्तरेण खफलं साधयति, न । खलुइपुक्षेपणशक्तिमानपि धनुग्रहणशक्तिमन्तरेण क्षेमुमलं, तत उच्छासपर्याप्तिनिष्पादनार्थमुच्छ्वासपर्याप्सिनान उपयोगः, एवमन्यत्रापि यथायोगं भिन्नविषयता सूक्ष्मधिया भावनीया, तथा यदुदयात् जन्तुशरीराणि खरूपेणानुष्णान्यपि उष्णप्रकाशलक्षणमातपं कुर्वन्ति तदातपनाम, तद्विपाकश्च भानुमण्डलगतेषु पृथिवीकायिकेष्वेव न यही, प्रवचनेऽपि निषेधात्, तत्रोष्णत्वमुष्णस्पर्शनामोदयात् उत्कटलोहितवर्णनामोदयाच प्रकाशकत्वमिति, तथा दीप अनुक्रम [५४०] Recenterceneserce न ~53~ Page #54 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (१५) “प्रज्ञापना" - उपांगसूत्र-४ (मूलं+वृत्ति:) पदं [२३], -------------- उद्देशक: [२], ------------- दारं [-], -------------- मूलं [२९३] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र-[१५]उपांगसूत्र-[४] "प्रज्ञापना" मूलं एवं मलयगिरि-प्रणीता वृत्ति: प्रत सूत्रांक [२९३] यदुदयाजन्तुशरीराण्यनुष्णप्रकाशकरूपमुद्योतं कुर्वन्ति यथा यतिदेवोत्तरवैक्रियचन्द्रनक्षत्रतारविमानरत्नौषधयस्तदु-11 द्योतनाम, तथा विहायसा गतिः-गमनं विहायोगतिः, ननु सर्वगतत्वात् विहायसस्ततोऽन्यत्र गतिर्न सम्भवतीति किमर्थ विशेषणं?, व्यवच्छेद्याभावात् , सत्यमेतत् , किन्तु यदि गतिरेवोच्यते ततो नानः प्रथमप्रकृतिरपि गतिरस्ती-1 ति पौनरुत्याशङ्का स्थात् , अतस्तव्यवच्छेदार्थ विहायसा गतिः, न तु नारकादिपर्यायपरिणतिरूपेति विहायोगतिः, सा द्विविधा-प्रशस्ता अप्रशस्ता च, तत्र प्रशस्ता हंसगजवृषभादीनां अप्रशस्ता खरोष्ट्रमहिषादीनां, तद्विपाकवेद्यं विहायोगतिनामकर्म द्विधा-प्रशस्त विहायोगतिनाम अप्रशस्तविहायोगतिनाम चेति, तथा प्रसन्ति-उ-N प्णाधभितप्ताः सन्तो विवक्षितस्थानादुद्विजन्ते गच्छन्ति च छायाद्यासेवनार्थ स्थानान्तरमिति प्रसा-दीन्द्रियादIS यस्तत्पर्यायपरिणतिवेद्यं नामकर्मापि त्रसनाम, तथा यदुदयादुष्णाद्यमितापेऽपि तत्स्थानपरिहारासमर्थाः पृथिव्यप्ते जोवायुवनस्पतयः स्थावरा जायन्ते तत् स्थावरनाम, तथा बादरनाम यदुदयाज्जीया बादरा भवन्ति, बादरत्वं परिSणामविशेषः, यदशात् पृथिव्यादेरेकैकस्य जन्तुशरीरस्य चक्षुधित्वाभावेऽपि बहूनां समुदाये चक्षुषा ग्रहणं भवति, तद्विपरीतं सूक्ष्मनाम, यदुदयावहूनामपि समुदितानां जन्तुशरीराणां चक्षुशता न भवति, उक्तं च श्रावकप्रज्ञप्तिमूलटीकायां-"सूक्ष्मनाम यदुदयात् सूक्ष्मो भवति, असन्तसूक्ष्मोऽतीन्द्रिय इत्यर्थः” इति, पर्याप्तकनाम यदुदयात् । खयोग्यपर्याप्सिनिर्वर्तनसमर्थो भवति तत्पर्यासिनाम-आहारादिपुद्गलग्रहणपरिणमनहेतुरात्मनः शक्तिविशेषः, दीप अनुक्रम [५४०] ~54~ Page #55 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (१५) “प्रज्ञापना" - उपांगसूत्र-४ (मूलं+वृत्ति:) पदं [२३], -------------- उद्देशकः [२], ------------- दारं -], -------------- मूलं [२९३] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र-[१५]उपांगसूत्र-[४] "प्रज्ञापना" मूलं एवं मलयगिरि-प्रणीता वृत्ति: प्रज्ञापनाया: मलय०वृत्ती. प्रत सूत्रांक [२९३] ॥४७॥ दीप अनुक्रम [५४०] एतच प्रागेवोक्तमिति, तद्विपरीतमपर्यासकनाम, तथा यदुदयात् जीवं जीवं प्रति भिन्नं शरीरं तत्प्रत्येकनाम, यदु- २३कर्मप्र| दयवशात् पुनरनन्तानां जीवानामेकं शरीरं भवति तत्साधारणनाम, तथा यदुदयवशात् शरीरावयवानां शिरोऽस्थि- कृतिपदं दन्तानां स्थिरता भवति तत्स्थिरनाम, तद्विपरीतमस्थिरनाम, यदुदयवशाजिहादीनामवयवानामस्थिरता भवति तद-IN स्थिरनाम, तथा यदुदयान्नाभेरुपरितना अवयवाः शुभा जायन्ते तत् शुभनाम, यदुदयवशात् नाभरधस्तना पादाद-IN योऽवयवा अशुभा भवन्ति तदशुभनाम, तथाहि-शिरसा स्पृष्टस्तुष्यति पादेन तु रुष्यति, कामिन्या पादेनापि स्पृष्टः। तोपमुपयाति ततो व्यभिचार इति चेत्, न, तस्य परितोषस्य मोहनीयनिवन्धनत्वात् , वस्तुस्थितिथेह चिन्त्यते | इत्यदोषः, तथा यदुदयवशादनुपदपि सर्वस्य मनःप्रियो भवति तत्सुभगनाम, तद्विपरीतं दुर्भगनाम, यदुदयादुपकारकृदपि जनस्य द्वेष्यो भवति, उक्तं च-"अणुवकएवि बहूणं जो पिओ तस्स सुभगनामुदओ। उबगारकारगोवि हुन रुचए दुग्भगस्सुदए ॥१॥ सुभगुदएवि हु कोई किंची आसज दुग्भगो जावि । जायइ तहोसाओ। जहा अभवाण तित्थयरो ॥२॥" [अनुपकृतेऽपि बहूनां यः प्रियस्तस्य सुभगनान उदयः । उपकारकारकोऽपि न रोचते दौर्भाग्यस्योदये ॥१॥ सुभगस्योदयेऽपि कश्चित्कञ्चिदासाद्य दुर्भगो यद्यपि । जायते तदोषात् यथाऽभव्यानां An४७४॥ तीर्थकरः ॥२॥] तथा यदुदयवशात् जीवस्य खरः श्रोतॄणां प्रीतिहेतुरुपजायते तत्सुखरनाम, तद्विपरीतं दुःखरनाम यदुदयात् खरः श्रोतृणामप्रीतये भवति, तथा यदुदयवशात् यचेष्टते भाषते वा तत्सर्व लोकः प्रमाणीकरोति ! ~55~ Page #56 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (१५) “प्रज्ञापना" - उपांगसूत्र-४ (मूलं+वृत्ति:) पदं [२३], -------------- उद्देशकः [२], ------------- दारं -], -------------- मूलं [२९३] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र-[१५]उपांगसूत्र-[४] "प्रज्ञापना" मूलं एवं मलयगिरि-प्रणीता वृत्ति: प्रत सूत्रांक [२९३] enenewestock दर्शनसमनन्तरमेव च जनोऽभ्युत्थानादि समाचरति तदादेयनाम, तद्विपरीतमनादेयं, यदुदयवशादुपपन्नमपि त्रुवाणो नोपादेयवचनो भवति नाप्युपक्रियमाणोऽपि जनस्तस्याभ्युत्थानादि समाचरति, तथा तपःशौर्यत्यागादिना समुपार्जितेन यशसा कीर्तनं-संशब्दनं यशःकीर्तिः, यद्वा यशः-सामान्येन ख्यातिः कीर्तिः-गुणोत्कीर्तनरूपा प्रशंसा अथवा सर्वदिग्गामिनी पराक्रमकृता वा सर्वजनोत्कीर्तनीयगुणता यशः एकदेशगामिनी पुण्यकृता वा कीर्तिः ते यदुदयवशाद्भवतस्तद्यशःकीर्तिनाम, यदुदयवशात् मध्यस्थस्थापि जनस्याप्रशस्यो भवति तदयशःकीर्तिनाम, तथा यदुदयवशाजन्तुशरीरेषु खखजात्यनुसारेणाप्रत्यङ्गानां प्रतिनियतस्थानयतिता भवति तन्निर्माणनाम, तच सूत्रधारकल्पं, तदभावे हि तद्भूतककल्पैरङ्गोपाङ्गनामादिभिर्निवर्तितानामपि शिरउरउदरादीनां स्थानवृत्तेरनियमः स्थात् , तथा यदुदयक्शात् अष्टमहाप्रातिहार्यप्रमुखाश्चतुस्विंशदतिशयाः प्रादुष्यन्ति तत्तीर्थकरनाम, तदेवमुक्ताः नामकर्मणो द्विचत्वारिंशद्भेदाः, सम्प्रत्येतेषामेव गत्यादीनामवान्तरभेदप्रतिपादनार्थमाह-गइनामे णं भंते ! कम्मे | कइविहे पं०' इत्यादि, समस्तमपि निगदसिद्धम् , उक्ता नामकर्मणो भेदाः, सम्प्रति गोत्रकर्मभेदानाह–'गोए णं भंते !' इत्यादि, यदुदययशादुत्तमजातिकुलबलतपोरूपैश्चर्यश्रुतसत्काराभ्युत्थानासनप्रदानाअलिप्रग्रहादिसम्भवस्तद्चैर्गोत्रं, यदुदयवशात् पुनर्ज्ञानादिसम्पन्नोऽपि निन्दा लभते हीनजात्यादिसम्भवं च तत् नीचैर्गोत्रं, उक्तौ गोत्रभेदो, सम्प्रति तयोरेव भेदानाह-उचगोए णं भंते ! कम्मे कइविहे पं०' इत्यादि सुगम, सम्प्रति अन्तरायभेदानाह C दीप अनुक्रम [५४०] - ~56~ Page #57 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम “प्रज्ञापना" - उपांगसूत्र-४ (मूलं+वृत्ति:) पदं [२३], -------------- उद्देशक: [२], ------------- दारं [-], -------------- मूलं [२९३] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र-[१५]उपांगसूत्र-[४] "प्रज्ञापना" मूलं एवं मलयगिरि-प्रणीता वृत्ति: प्रज्ञापनायाः मलय० वृत्ती. प्रत सूत्रांक [२९३] ॥४७५॥ दीप अनुक्रम [५४०] 2cene es24 |'अंतराए णं भंते ! कम्मे कइविहे' इत्यादि, तत्र यदुदयवशात् सति विभवे समागते च गुणवति पात्रे दत्तमम ||२३कर्मप्रमहाफलमिति जाननपि दातुं नोत्सहते तद्दानान्तरायं, तथा यदुदयवशाहानगुणेन प्रसिद्धादपि दातुर्गहे विद्यमानम-18 कृतिपदं पि देयमर्थजातं याच्जाकुशलोऽपि गुणवानपि याचको न लभते तलाभान्तरायं, तथा यदुदयवशात् सत्यपि विशि-18 टाहारादिसम्भवेऽसति च प्रत्याख्यानपरिणामे वैराग्ये वा केवलकार्पण्यानोत्सहते भोक्तुं तद्भोगान्तरायमेवमुपभोगान्तरायमपि भावनीयं, नवरं भोगोपभोगयोरयं विशेषः-सकृद् भुज्यते इति भोगः-आहारमाल्यादि, पुनः पुनर्भुज्यते इत्युपभोगो-वस्त्रालङ्कारादि, उक्तं च-"सइ भुजइत्ति भोगो सो पुण आहारपुप्फमाईओ। उवभोगो उरी पुणो पुण उवभुज्जइ वत्थपिलयाइ ॥१॥"[ सकृद्भुज्यते इति भोगः स पुनराहारपुष्पादिकः । उपभोगस्तु पुनः पुनरुपभुज्यते वस्त्रवनितादिः॥१॥] तथा यदुदयात् सत्यपि नीरुजि शरीरे यौवनिकायामपि वर्तमानोऽल्पप्राणो भवति यद्वा बलवत्सपि शरीरे साध्येऽपि प्रयोजने हीनसत्त्वतया न प्रवर्त्तते तवीर्यान्तरायं, उक्तो मूलोचरप्रकृतिविभागः, सम्प्रति उत्तरप्रकृतीनां जघन्योत्कृष्टस्थितिप्रतिपादनं चिकीर्षः प्रथमतो ज्ञानावरणीयस्य पञ्चप्रकारस्थापि विषये प्रश्नसूत्रमाह ॥४७५॥ णाणावरणिजस्स पं भंते ! कम्मरस केवतितं कालं ठिती पं०१, गो! जहण्णेणं अंतोमुहुर्त उकोसेणं तीसं सागरोवमकोडाकोडीतो तिण्णि य वाससहस्साई अवाहा, अचाहणिया कम्मठिती कम्मनिसेगो, निहापंचगस्स णं मंते ! कम्मस्स ~57~ Page #58 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (१५) “प्रज्ञापना" - उपांगसूत्र-४ (मूलं+वृत्ति:) पदं [२३], -------------- उद्देशक: [२], ------------- दारं [-], -------------- मूलं [२९४] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र-[१५]उपांगसूत्र-[४] "प्रज्ञापना" मूलं एवं मलयगिरि-प्रणीता वृत्ति: प्रत सूत्रांक [२९४] केवतितं कालं ठिती पं०१, गो! जह० सागरोवमस्स तिष्णि सत्तभागा पलितोबमस्स असंखेजतिभागेणं उणिया, उकोसेणं तीस सागरोवमकोडाकोडीतो, तिण्णि व वाससहस्साई अचाहा, अबाहूणिया कम्महिती कम्मनिसेनो, देसणचउकस्स गं भंते ! कम्मरस केवइयं कालं ठिती पं०१, गो०! जहने० अंतो० उ० तीस सागरोषमकोडाकोडीतो, तिणि य वाससहस्साई अवाहा०, सायावेयणिजस्स ईरियावहियं बंधगं पडच अजहण्णमणुकोसेणं दो समया संपरायबंधगं पडच ज० वारस मुहुत्ता, उ० पण्परस सागरोबमकोडाकोडीतो, पण्णरस वाससयाई अवावा, असातादणिअस्स जह सागरोवमस्स तिणि सत्तभागा पलितोवमस्स असंखेजतिभागेणं ऊणया उ० तीस सागरोवमकोडाकोडीतो, तिणि य वाससहस्साई अवाहा, सम्मत्तवेयषिजस्स पुच्छा, मो० ज० अंतो० उ० छावहि सागरोवमाई सातिरेगाति, मिच्छत्वेषणिजस्स जह. सागरोवमै पलितोवमस्स असंखेजतिभागेण ऊणगं उ० सत्चरि कोडाकोडीतो, सत्त य चाससहस्साई अवाहा, अचाहूणिया०, सम्मामिच्छत्तवेयणिजस्स ज. अंतो० उ० अंतो०, कसाक्चारसगस्स ज. सागरोवमस्स चत्तारि सत्तभागा पलितोवमस्स असंखेजइभागेणं ऊणया, उक्को० चवालीसं सागरोगनकोडाकोडीतो, पत्तालीसं वाससताई अचाहा जाब निसेगो, कोहसंजलणे पुच्छा, गो०! जहदो मासा उको० पचालीस सामरोवमकोडाकोडीतो चचालीसं वाससताई अचाहा जाव निसेगो, माणसंजलगाते पुच्छा, गो! ज०मासं उ० जहा कोहस्स, मायासंजलणाते पुच्छा, गो. ज. अद्धं मासं उ० जहा कोहस्स, लोहसंजलणाए पुच्छा, मो010 अंतो. उ० जहा कोहस्स, इथिवेयस्स पुच्छा, गो०! जहणं सागरोवमस्स दिवट्ट सत्तभागं पलितोवमस्स असंखेजइभानेण अनयं 03929202030200300507 दीप अनुक्रम [५४१] ~58~ Page #59 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (१५) “प्रज्ञापना" - उपांगसूत्र-४ (मूलं+वृत्ति:) पदं [२३], -------------- उद्देशक: [२], ------------- दारं [-], -------------- मूलं [२९४] प्रज्ञापना या: मलयवृत्ती. २३कर्मबन्धपदे क६ मंस्थितिः | सू. २९४ प्रत सूत्रांक ॥४७६॥ [२९४] उक्को. पण्णरस सागरोवमकोडाकोडीतो पण्णारस वाससताई अबाहा०, पुरिसवेदस्स णं पुच्छा, गो! जह० अट्ठ संवच्छराति उको० दस सागरोवमकोडाकोडीतो दस वाससताई अवाहा जाव णिसेगो, णपुंसमवेदस्स में पुच्छा, गो०! जह० सागरोवमस्स दोणि सचभागा पलितोवमस्स असंखेजइभागेणं ऊणया, उकोसेणं पीसं सागरोवमकोडाकोडीतो बीस य वाससताई अवाहा०, हासरतीणं पुच्छा गो! जह. सागरोवमस्स एकं सत्तभार्ग पलितोवमस्स असंखेजतिभागणं ऊर्ण उको दस सागरोवमकोडाकोडीओ दस वाससताई अबाहा, अरतिभयसोगदुगुंछाणं पुच्छा, गो०। जह० सागरोवमस्स दोणि सत्तभागा पलितोबमस्स असंखेजतिभागेणं उणया, उको बीस सागरोवमकोडाकोडीतो बीसं वाससताई अबाहा०, नेरइयाउयस्स णं पुच्छा, गो.! जह० दस वाससहस्साई अंतोमुहुत्तमभहियाई उको तेत्तीसं सागरोवमाई पुवकोडीतिभागमभहियाति, तिरिक्खजोणिवाउयस्स पुच्छा, गो! जह० अंतो० उको तिष्णि पलितोवमाई पुवकोडितिभागमभहियाई, एवं मणसाउयस्सवि, देवाउयस्स जहा नेरइयाउयस्स ठितित्ति, निरयगतिनामए ण पुच्छा गो०। जह० सागरोवमसहस्सस्स दो सत्तभागा पलितोवमस्स असंखिजतिभागेणं ऊगया, उकोसेणं वीर्स सागरोवमकोडाकोडीतो वीसं वाससताई अवाहा। तिरियगतिनामए जहा नपुंसगवेदस्स, मणुयगतिनामते पुच्छा, ज. सागरोवमस्स दिवर्द्ध सत्तभागं पलितोवमस्स असंखेजतिभागेणं ऊणगं उको. पण्णरस सागरोवमकोडाकोडीतो पण्णरसवाससताई अवाहा । देवगतिनामए णं पुच्छा, गो! जह० सागरोवमसहस्सस्स एणं सचभाग पलितोवमस्स असंखेजतिभागेणं ऊणयं उको जहा पुरिसवेदस्स, एगिदियजातिनामए गं पुच्छा, गो! जह० सागरोवमस्स दोणि सत्तभागा पलि दीप अनुक्रम [५४१] ॥४७६॥ ~59~ Page #60 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम “प्रज्ञापना" - उपांगसूत्र-४ (मूलं+वृत्ति:) पदं [२३], -------------- उद्देशक: [२], ------------- दारं [-], -------------- मूलं [२९४] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र-[१५]उपांगसूत्र-[४] "प्रज्ञापना" मूलं एवं मलयगिरि-प्रणीता वृत्ति: प्रत सूत्रांक [२९४] तोवमस्स असंखेजतिभागेणं ऊणया उक्कोसेणं वीसं सागरोवमकोडाकोडीतो बीसति वाससताई अवाहा, बेइंदियजातिनामेणं पुच्छा, गो०!जहसागरोवमस्स नव पणतीसतिभागा पलितोवमस्स असंखेजइभागेर्ण ऊणया उ० अट्ठारस सागरोवमकोडाकोडीतो अट्ठारस य वाससयाई अवाहा, तेइंदियजातिनामए णं जहण्णेणं एवं चेव, उको अट्ठारससायरोवमकोडाकोडीतो अट्ठारस वाससताई अवाहा, चउरिदियजातिनामाए पुच्छा, गो०! जह० सागरोवमस्स णव पणतीसतिभागा पलितोवमस्स असंखेजइभागेणं ऊणया उको० अट्ठारस सागरोवमकोडाकोडीतो अट्ठारस वाससताई अबाहा, पंचिंदियजातिनामाए पुच्छा, गो.जह सागरोवमस्स दोण्णि सत्तभागा पलितोचमस्स असंखेजतिभागेणं ऊणया उकोसेणं वीसं सागरोवमकोडाकोडीतो बीस य वाससताई अबाहा, ओरालियसरीरएवि एवं चेव, वेउवियसरीरनामाए णं भंते ! पुच्छा, गो! जह. सागरोवमसहस्सस्स दो सत्तभागा पलितोवमस्स असंखेजहभागेणं ऊणया, उको० वीसं सागरोवमकोडाकोडीओ वीसह वाससयाई अवाहा, आहारगसरीरनामए जह. अंतोसागरोषमकोडाकोडीओ उको. अंतोसागरकोडाकोडीओ, तेयाकम्मसरीरनामाए जहण्णेणं दोण्णि सत्तभागा पलितोवमस्स असंखेजतिभागेणं ऊणया उको बीसं सागरोवमकोडाकोडीओ वीस य वाससताई अवाहा, ओरालियवेउबियाहारगसरीरोवंगनामाए तिण्णिवि एवं चेव, सरीरबंधणनामाएषि पंचण्हवि एवं चेव, सरीरसंघायनामाए पंचण्हवि जहा सरीरनामाए कम्मस्स ठिइत्ति, वइरोसभनारायसंघयणनामाए जहा रइनामाए, उसभनारायसंघयणनामाए पुच्छा, गो! सागरोवमस्स छ पणतीसतिभागा पलितोवमस्स असंखेजाभागेणं ऊगया, उको वारस सागरोवमकोडाकोडीओ, पारस वाससताई अवाहा०, नारा दीप अनुक्रम [५४१] wraanasaram.org ~60~ Page #61 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (१५) “प्रज्ञापना" - उपांगसूत्र-४ (मूलं+वृत्ति:) पदं [२३], -------------- उद्देशकः [२], ------------- दारं -], -------------- मूलं [२९४] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र-[१५]उपांगसूत्र-[४] "प्रज्ञापना" मूलं एवं मलयगिरि-प्रणीता वृत्ति: प्रज्ञापना मल. यवृत्ती. प्रत सूत्रांक २३ कर्मबन्धपदे कमस्थितिः सू. २९४ ॥४७७॥ [२९४] यसंघयणनामस्स जह० सागरोवमस्स सत्त पणतीसतिभागा पलितोवमस्स असंखेजतिभागेणं ऊणया उको चोदस सागरोवमकोडाकोडीतो चउदस वाससताई अबाहा०, अद्धनारायसंघयणनामस्स जह. सागरोवमस्स अट्ठ पणतीसतिभागा पलितोषमस्स असंखेजतिभागेगं ऊणया उक्को सोलस सागरोवमकोडाकोडीतो सोलस वाससताई अवाहा, खीलियासघयणे णं पुच्छा, गो.ज. सागरोवमस्स नव पणतीसतिभागा पलितोवमस्स असंखेजतिभागेणं ऊगया, उक्कोसेणं अट्ठारस सागरोवमकोडाकोडीओ अट्ठारस वाससताई अवाहा, छेवट्ठसंघयणनामस्स पुच्छा, गो०! जह• सागरोक्मस्स दोणि सत्तभागा पलितोवमस्स असं० ऊणया, उक्को० बीसं सागरोवमको० वीस य वाससताई अबाहा, एवं जहा संघयणनामाते छम्भणिया एवं संठाणावि छन्माणितवा, सुकिल्लवण्णणामते पुच्छा, गो०1 जह० सागरोवमस्स एगै सत्तभार्ग पलितो. असं० ऊणगं, उको दस सागरोवमकोडाकोडीतो, दस वाससताई अवाहा, हालिद्दवण्णणामए णं पुच्छा, गो ! ज. सागरोवमस्स पंच अट्ठावीसतिभागा पलितोवमस्स अ०भा० ऊ० उ० अद्धतेरससागरोवमकोडाकोडी, अद्भतेरस वाससयाई अबाहा, लोहितवण्णणामए णं पुच्छा, गो० ! जह० सागरोवमस्स छ अट्ठावीसतिभागा पलितोवमस्स असं० भागेहि ऊणया, उ० पण्णरस सागरोवमकोडाकोडीओ पण्यारस वाससयाति अवाहा, नीलवण्णनामाए पुच्छा, मो० ज० सागरोवमस्स सत्त अट्ठावीसतिभागा पलितोबमस्स असंखेजतिभागेणं ऊणया, उक्को अट्ठारस सागरोबमकोडाकोडीवो अबद्वारस वाससताई अबाहा, कालवण्णानामाए जहा छेवट्ठसंघय०, सुब्भिगंधणामाते पुच्छा, मो01 जह सुकिल्लवण्णनामस्स, दुम्भिगंधणामाए जहा छेवट्ठसंघयणस्स, रसाणं महुरादीणं जहा वण्णाणं भणितं तहेव परिखाडीते माणितई, फासा रहर रम्यान दीप अनुक्रम [५४१] IIVI४७७॥ ~61~ Page #62 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (१५) “प्रज्ञापना" - उपांगसूत्र-४ (मूलं+वृत्ति:) पदं [२३], -------------- उद्देशक: [२], ------------- दारं [-], -------------- मूलं [२९४] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र-[१५]उपांगसूत्र-[४] "प्रज्ञापना" मूलं एवं मलयगिरि-प्रणीता वृत्ति: प्रत सूत्रांक [२९४] दीप अनुक्रम [५४१] जे अपसत्था तेसिं जहा छेवढस्स, जे पसत्था तेसिं जहा मुकिल्लवण्णनामस्स, अगुरुलहुनामाते जहा छेवहस्स, एवं उनघातनामाएवि, पराघायनामाएवि एवं चेव, निरयाणुपुबीनामाए पुच्छा, गो० जह० सागरोवमसहस्सस्स दो सत्तभागा पलितोवमस्स असंखेजतिभागेणं ऊणया, उको० वीसं सागरोवमकोडाकोडीओ, वीसं वाससताई अवाहा, तिरियाणुपुखीए पुच्छा, गो०। जह० सागरोवमस्स दो सत्तभागा पलितोवमस्स असंखेजतिभागेणं ऊणया उकोसेणं वीसं सागरोवमकोटाकोडीओ चीसति वाससताई अबाधा०, मणुयाणुपुबीनामाए णं पुच्छा, गो०।जह सागरोवमस्स दिवई सत्तभागं पलितोक्मस्स असंखेजतिभागणं ऊणय, उक्को. पण्णरस सागरोवमकोडाकोडीओ पण्णरस वाससताई अबाहा, देवाणुपुतीनामाते पुच्छा, गो० जह० सागरोवमसहस्सस्स एग सत्तभार्ग पलितोवमस्स असंखेअतिमागेणं ऊणयं. उको. दस सागरोवमकोडाकोडीओ दस व वाससताई अबाहा०, ऊसासनामाते पुच्छा, गो०। जहा तिरियाणुपुधीए, आयवनामाए वि एवं चेव, उज्जोयनामाएवि, पसत्थविहायोगतिनामाएवि पुच्छा, गो०! जह० एग सागरोवमस्स सच्चमार्ग उ. दस सागरोवमकोडाकोडीओ, दस वाससताई अबाहा०, अपसत्थविहायोगतिनामस्त पुच्छा, गो० ज० सागरोबमस्स दोण्णि सत्तभागा पलितोवमस्स असंखेजतिभागेर्ण ऊणया उ० वीसं सागरोवमकोडाकोडीओ पीस य वाससताई अवाहा०, तसनामाए थावरनामाए य एवं चेच, सुहुमनामाए पुच्छा, गो०। जह० सागरोषमस्स णव पणतीसतिभागा पलितोवमस्स असंखेजतिभागेण ऊणया, उको० अट्ठारस सागरोवमकोडाकोडीतो अट्ठारस य वाससताई अचाहा, चादरनामाए जहा अप्पसत्थविहायोगतिनामस्स, एवं पजतनामाएषि, अपजतनामाए जहा सुहुमनामस्स, परोयसरीर ~62~ Page #63 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (१५) “प्रज्ञापना" - उपांगसूत्र-४ (मूलं+वृत्ति:) पदं [२३], -------------- उद्देशक: [२], ------------- दारं [-], -------------- मूलं [२९४] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र-[१५]उपांगसूत्र-[४] "प्रज्ञापना" मूलं एवं मलयगिरि-प्रणीता वृत्ति: प्रत प्रज्ञापना या मलयवृत्ती. मस्थितिः सूत्रांक ॥४७८॥ [२९४] दीप अनुक्रम [५४१] नामाएवि दो सत्तभागा, साहारणसरीरनामाए जहा सुहमस्स, थिरनामाए एग सत्तभाग अथिरनामाए दो सुमनामाए N२३ कर्मवएगो असुमनामाए दो सुभगनामाए एगो दूभगनामाए दो सुसरनामाए एगो दूसरनामाए दो आदिजनामाए एगो अणाइजनामाए दो जसोकित्तिनामाए जह० अट्ठ मुहुत्ता उक्को० दस सागरोवमकोडाकोडीतो दस वाससताई अबाहा०, अजसोकित्तिनामाए पुच्छा, गो०! जहा अप्पसस्थविहायोगतिनामस्स, एवं णिम्माणनामाएवि, तित्थगरणामाए णं सू. २९४ पुच्छा, गो०! जह० अंतोसागरोवमकोडाकोडीओ उकोसेणवि अंतो० कोडाकोडीओ, एवं जत्थ एगो सत्तभागो तत्य उक्कोसेणं दस सागरोबमकोडाकोडीओ दस वाससताई अबाहा०, जत्थ दो सत्तभागा तत्थ उको० वीसं सागरोवमकोडा- कोडीओ वीस य वाससयांइ अबाहा, उच्चागोयस्स णं पुच्छा, गो० ! जहन्नेणं अट्ठ मुहुत्ता उ० दस सागरोवमकोडाकोडीओ, दस य वाससताई अवाहा०, णीयागोत्तरस पुच्छा, गो०! जहा अप्पसत्थविहायोगतिनामस्स, अंतराए णे पुच्छा, गो!जह अंतो० उको तीसं सागरोवमकोडाकोडीओ तिष्णि य वाससहस्साई अवाहा, अबाहूणिया कम्महिती कम्मनिसेगो। (सूत्रं २९४) 'णाणावरणिजस्स णं भंते ! कम्मस्स केवइयं कालं ठिती पं.' इति ज्ञानावरणीयस्य मतिश्रुतापधिमनःपर्याय- ४७८॥ | केवलावरणभेदतः पक्षप्रकारस्य कर्मणो भदन्त ! कियन्तं कालं यावत् स्थितिः प्रज्ञप्ता , एवमुक्त भगवानाहगौतम ! जघन्येनान्तर्मुहूर्त, तच सर्वलघु सूक्ष्मसम्परायस क्षपकस्य खगुणस्थानकचरमसमये वत्तेमानस्स वेदितव्यं, ~63~ Page #64 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (१५) “प्रज्ञापना" - उपांगसूत्र-४ (मूलं+वृत्ति:) पदं [२३], -------------- उद्देशक: [२], ------------- दारं -,-------------- मूलं [२९४] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र-[१५]उपांगसूत्र-[४] "प्रज्ञापना" मूलं एवं मलयगिरि-प्रणीता वृत्ति: प्रत सूत्रांक [२९४] उत्कर्षतस्त्रिंशत्सागरोपमकोटीकोट्यः, सा च मिथ्यादृष्टेरुत्कृष्टे सङ्केशे वर्तमानस्यावसातव्या, तदेवं नियता प्रागुक्तस्य प्रश्नोत्तरसिद्धिः, इदमपृष्टव्याकरणं त्रीणि वर्षसहस्राणि अवाधा अबाधोना कर्मस्थितिः कर्मदलिकनिषेक इति, किमर्थमिति चेत्, उच्यते, स्थितिद्वैविध्यप्रदर्शनार्थ, तथाहि-द्विविधा स्थितिः-कर्मरूपतावस्थानलक्षणा अनुभवयो ग्या च, तत्र कर्मरूपताऽवस्थानलक्षणां स्थितिमधिकृत्येदमुक्तं त्रिंशत्सागरोपमकोटाकोटय इति, अनुभवयोग्या च Mवर्षसहस्रत्रयोना यतः, आह च-'त्रीणि वर्षसहस्राणि अवाधा' किमुक्तं भवति ?-ज्ञानावरणीयं कर्म उत्कृष्टस्थितिके बद्धं सत् बन्धसमयादारभ्य त्रीणि वर्षसहस्राणि यावत् न किञ्चिदपि खोदयतो जीवस्य बाधामुत्पादयति, तावकालमध्ये दलिकनिषेकस्याभावात् , सत ऊवं हि दलिकनिषेकः, तथा चाह-अबाधोना-अबाधाकालपरिहीना अनुभवयोग्या कर्मस्थितिः, किमुक्तं भवति ?-कर्मनिषेकः, स चैवं-प्रथमस्थिती प्रभूतो द्वितीयस्थिती विशेषहीनः तृतीयस्थिती विशेषहीनः एवं विशेषहीनो विशेषहीनश्च तावद् वक्तव्यो यावत्स्थितिचरमसमयः, एतावता च यदुतमग्रायणीयाख्ये द्वितीयपूर्व कर्मप्रकृतिप्राभृते बन्धविधाने स्थितिबन्धाधिकारे-"चत्वायनुयोगद्वाराणि, तद्यथास्थितिबन्धस्थानप्ररूपणा अबाधाकण्डकप्ररूपणा उत्कृष्टनिषेकप्ररूपणा अल्पबहुत्वप्ररूपणा चे"ति, तत्रोत्कृष्टाऽवा-| धाकण्डकप्ररूपणा उत्कृष्टनिषेकप्ररूपणा च दर्शिता भवति, अवाधाकालपरिज्ञानोपायश्चार्य-यस्य यावत्यः सागरोपमकोटीकोट्यस्तस्य तावन्ति वर्षशतान्यबाधा, यस्य पुनः सागरोपमकोटीकोट्या मध्ये स्थितिस्तस्यायुर्वर्जस्यान्तर्मु-1|| दीप अनुक्रम [५४१] ~64~ Page #65 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (१५) “प्रज्ञापना" - उपांगसूत्र-४ (मूलं+वृत्ति:) पदं [२३], -------------- उद्देशक: [२], ------------- दारं [-], -------------- मूलं [२९४] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र-[१५]उपांगसूत्र-[४] "प्रज्ञापना" मूलं एवं मलयगिरि-प्रणीता वृत्ति: प्रत सूत्रांक [२९४] दीप अनुक्रम [५४१] प्रज्ञापना- इर्तमायुषस्तु जघन्यतोऽन्तर्मुहूर्तमवाधा उत्कर्षतः पूर्वकोटीत्रिभागः, तत एबमबाधाकालं परिभाष्यावाधाविषया-18|२३कर्मबयाः मल 18|णि सूत्राणि खयं भावनीयानि, निद्रापञ्चकविषयं सूत्रमाह-निद्दापंचगस्स णं भंते । इत्यादि, अत्र जपन्यतःधपदे कयवृत्ती. स्थितिः त्रयः सागरोपमस्य ससभागाः पल्योपमासङ्ख्येयभागोनाः, काऽत्र भावनेति चेत्, उच्यते, पञ्चानां ज्ञानावर-मास्थतिः मंस्थितिः राणप्रकृतीनां चतसृणां दर्शनावरणप्रकृतीनां चक्षुर्दर्शनावरणादीनां सज्वलनलोभस्य पञ्चानामन्तरायप्रकृतीनां च जप सू. २९४ ॥४७॥ न्या स्थितिरन्तर्मुहूर्त, सातवेदनीयस्य सकषायिकस्य द्वादश मुहूर्ता, इतरख तु द्वौ समयौ, प्रथमसमये बन्धो द्वितीयसमये वेदनं तृतीयसमये त्वकर्मीभवन मिति, यशःकीयुचैर्गोत्रयोरष्टौ मुहूर्ताः, पुरुषवेदस्याष्टौ संवत्सराणि, सज्वलनकोधस्य द्वौ मासी, सबलनमानस्यैको मासः, सज्वलनमायाया अर्द्धमासः, शेषाणां तु प्रकृतीनां वा यात्रा खकीया उत्कृष्टा स्थितिस्तस्या उत्कृष्टायाः सप्ततिसागरोपमकोटीकोटीप्रमाणाया मिथ्यात्वस्थित्या भागे हते यब-IN भ्यते तत्पल्योपमासयेयभागहीनं जघन्यस्थितिपरिमाणं, तत्र निद्रापञ्चकस्योत्कृष्टा स्थितिविंशत्सागरोपमकोटीकोट्यः, तासां मिथ्यात्वस्थित्या सप्सतिसागरोपमकोटीकोटीप्रमाणया भागे हियमाणे 'शून्यं शून्पेन पातयेदिति वचनात् लब्धात्रयः सागरोपमस्य सप्तभागाः, ते पल्पोपमासङ्ख्येयभागहीनाः क्रियन्ते, ततो भवति यथोकं जघन्य-S४७९॥ स्थितिपरिमाणमिति, 'सायावेयणिजस्स ईरियावहियवंधग पडुच अजहण्णमणुकोसेणं दो समया संपराइयवंधन पडुच जहण्णेणं चारस मुहुत्ता' इति प्रागेव भावितं, असातावेदनीयस्य जघन्यतस्त्रयः सप्तभागाः पल्योपमासमवेय ~65~ Page #66 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (१५) “प्रज्ञापना" - उपांगसूत्र-४ (मूलं+वृत्ति:) पदं [२३], -------------- उद्देशक: [२], ------------- दारं [-], -------------- मूलं [२९४] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र-[१५]उपांगसूत्र-[४] "प्रज्ञापना" मूलं एवं मलयगिरि-प्रणीता वृत्ति: प्रत सूत्रांक [२९४] भागोना निद्रापञ्चकवद् भावनीयाः, तस्याप्युत्कर्षतः स्थितेस्त्रिंशत्सागरोपमकोटीकोटीप्रमाणत्वात् , सम्यक्त्ववेदनी-11 यस्य यत् जघन्यतः स्थितिपरिणाममन्तर्मुह उत्कर्षतः षट्षष्टिःसागरोपमाणि सातिरेकाणि तवेदनमधिकृत्य वेदितव्य न बन्धमाश्रित्य, सम्यक्त्वसम्यग्मिध्यात्वयोवन्धाभावात् , मिथ्यात्वपुद्गला एव हि जीवेन सम्यक्त्वानुगुणविशोधिवलतखिधा क्रियन्ते, तद्यथा-सर्वविशुद्धाः अर्द्धविशुद्धाः अविशुद्धाश्च, तत्र ये सर्वविशुद्धास्ते सम्यक्त्ववेदनीयव्यपदेशं लभन्ते येऽर्द्धविशुद्धास्ते सम्यग्मिथ्यात्ववेदनीयव्यपदेशं अविशुद्धा मिथ्यात्ववेदनीयव्यपदेशसतोच तयोर्बन्धस म्भवः, यदा तु तेषां सम्यक्त्वसम्यग्मिथ्यात्वपुद्गलानां खरूपतः स्थितिश्चिन्त्यते तदाऽन्तर्मुहोबसप्ततिसागरोपमकोटीकोटीप्रमाणा वेदितव्या, सा च तायती यथा भवति तथा कर्मप्रकृतिटीकायां समकरणे भावितेति ततो अवधार्य, मिथ्यात्ववेदनीयस्य जघन्या स्थितिरेक सागरोपमं पल्योपमासङ्ख्ययभागोनमुत्कर्षतस्तस्पोत्कृष्टस्थितेः सप्त|तिसागरोपमकोटीकोटीप्रमाणत्वात् , सम्बग्मिथ्यात्ववेदनीयस्य जघन्यत उत्कर्षतो वा अन्तर्मुः वेदनापेक्षया, पुद्गलानां त्ववस्थानमुत्कर्षतः प्रागेवोक्तं, कषायद्वादशकस्खानन्तानुबन्धिचतुष्टयाप्रत्याख्यानचतुष्टयप्रसाख्यानावरणचतुष्टयरूपस्य प्रत्येकं जघन्या स्थितिश्चत्वारः सागरोपमसप्तभागा पल्योपमासयभागोनाः, उत्कर्षतस्तेषां स्थिते-1 चत्वारिंशत्सागरोपमकोटीकोटीप्रमाणत्वात्, सज्वलनानां च जघन्या स्थितिर्मासद्वयादिप्रमाणा क्षपकस खबन्धचरमसमयेऽवसातव्या, खीवेदस्य जघन्या स्थितियेद्धसागरोपमख सप्तभागाः पल्पोपमासययभागोनाः कथमिति चेत्, दीप अनुक्रम [५४१] ~66~ Page #67 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (१५) “प्रज्ञापना" - उपांगसूत्र-४ (मूलं+वृत्ति:) पदं [२३], -------------- उद्देशक: [२], ------------- दारं [-], -------------- मूलं [२९४] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र-[१५]उपांगसूत्र-[४] "प्रज्ञापना" मूलं एवं मलयगिरि-प्रणीता वृत्ति: प्रज्ञापना- याः मलयवृत्ती. प्रत सूत्रांक ॥४८०॥ [२९४] दीप अनुक्रम [५४१] उच्यते, त्रैराशिककरणवशात , तथाहि-यदि दशानां सागरोपमकोटीकोटीनां एकः सागरोपमसप्तभागो लभ्यते ||२३कर्मचततः पञ्चदशभिः सागरोपमकोटीकोटीभिः किं लभ्यते ?, राशित्रयस्थापना-१०।१।१५। अत्रान्त्येन राशिनान्धपदे कपञ्चदशलक्षणेन मध्यो राशिरेकलक्षणो गुण्यते, जाताः पञ्चदशैव, एकस्य गुणने तदेव भवतीति वचनात् , तेषामा- मस्थितिः धेन राशिना दशकलक्षणेन भागहरणं लब्धा सार्धाः ससभागा इति, 'हासरइअरइभयसोगदुगुंछाणं जहण्णुकोस- सू.२९४ ठिई भाणियचा' इति हास्यरतिअरतिभयशोकजुगुप्सानां जघन्या उत्कृष्टा च स्थितिर्वक्तव्या, सा च सुप्रसिद्धत्वानोक्ता, कथं वक्तव्येति चेत्, उच्यते, 'हासरईणं पुच्छा गो! जहण्णेणं एगो सागरोषमस्स सत्तभागो पलिओषमस्स असंखेज्जभागेण ऊणो उको दस सागरोवमकोडाकोडीओ दस वाससयाई अवाहा जाव निसेगो, अरइभयसोगद्गुंछाणं पुच्छा, गो जहण्णेणं सागरोवमस्स दोषिण सत्तभागा पलिओवमस्स असंखेज्जइभागेण ऊणगा उकोसेणं वीसं सागरोवम कोडाकोडीओ वीससयाई अवाहा जाब निसेगों' इति ज्ञेयं, तिर्यगायुषि मनुष्यायुपि च त्रीणि पल्योपमानि पूर्वकोटित्रिभागाभ्यधिकानि इति यदुक्तं तत् पूर्वकोट्यायुषस्तिर्यग्मनुष्यान् बन्धकानधिकृत्य वेदितव्यं, अन्यत्रैतावत्याः स्थितेः पूर्वकोटित्रिभागरूपाया अबाधायाचालभ्यमानत्वात् , 'तिरियगइनामाए जहा नपुंसगवेयस्स' इति, जघन्यतो द्वौ सागरोपमस्स सप्तभागौ पल्योपमासङ्ख्ययभागहीनी, उत्कर्षतो विंशतिः सागरोपमकोटीकोव्य ? इत्यर्थः, मनुष्यगतिनाम्नि 'जहण्णेणं सागरोवमस्स दिवसत्तभागं पलिओवमस्स असंखेज्जइभागेण ऊणगं'ति अत्र eseseaeeक्रम ॥४८॥ ~67~ Page #68 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (१५) “प्रज्ञापना" - उपांगसूत्र-४ (मूलं+वृत्ति:) पदं [२३], -------------- उद्देशक: [२], ------------- दारं -,-------------- मूलं [२९४] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र-[१५]उपांगसूत्र-[४] "प्रज्ञापना" मूलं एवं मलयगिरि-प्रणीता वृत्ति: प्रत सूत्रांक [२९४] IS भावना स्त्रीवेदवद् भावनीया, 'दिवद्धसत्तभाग'मित्यादौ तु नपुंसकनिर्देशः प्राकृतत्वात् , नरकगतिनाम्नो जघन्यतः सागरोपमसहस्रस्य द्वौ सप्तभागौ, किमुक्तं भवति ?-सागरोपमस्य द्वौ सप्तभागी सहस्रेण गुणिताविति, तदुत्कृष्टस्थितेविंशतिसागरोपमकोटाकोटीप्रमाणत्वात् , तद्वन्धस्य च सर्वजघन्यस्यासंक्षिपञ्चेन्द्रियस्ख भावात् , असंज्ञिपञ्चेन्द्रियकमवन्धस्य च जघन्येनैकेन्द्रियजघन्यकर्मबन्धापेक्षया सहस्रगुणत्वात्, भावयिष्यते चायमर्थो वैक्रियचिन्तायां, देवगति-18 नानो जघन्यतः सागरोपमसहस्रबैकः सप्तभागः, एकः सागरोपमख सप्तभागः सहस्रगुणित इति भावः, तस्य हि उत्कृष्टा स्थितिर्दश सागरोपमकोटीकोटयः, ततः प्रागुक्तकरणवशादेकः सागरोपमस्य सप्तभागो लब्धः, बन्धोऽपि चास्य जघन्यतोऽसंज्ञिपञ्चेन्द्रियस्येति सहस्रगुणितः, देवगतिनामसूत्रे 'उक्कोसेणं जहा पुरिसबेयस्स' इति 'दस सागरोवम-1 | कोडीओ दसवाससयाई अबाहा, अबाहूणिया कम्मठिई कम्मनिसेगों' इति वक्तव्यमिति भावः, द्वीन्द्रियजातिनामसूत्रे 'जहलेणं नव पणतीसहभागा पलिओवमस्स असंखेजइभागेण ऊणगा' इति, द्वीन्द्रियजातिनानो झुत्कृष्टा स्थितिरष्टादश सागरोपमकोटीकोटयः, 'अट्ठारस सुहुमविगलतिगे'त्ति [ सूक्ष्मा विकलेन्द्रियाश्चाष्टादश] बचनात् , ततोऽष्टा-| दशानां सागरोपमकोटीकोटीनां मिथ्यात्वस्योत्कृष्टया स्थित्या सप्ततिसागरोपमकोटाकोटीप्रमाणया भागो हियते, भागश्च न पूर्यते, ततः शून्य शून्येन पात्यते, जाता उपरि अष्टादश अधस्तात् सप्ततिस्तयोरर्द्धनापवर्तनालब्धा नव पञ्चत्रिंशद्भागास्ते पल्योपमासङ्ख्येयभागोनाः क्रियन्ते, आगतं सूत्रोक्तं परिमाणमिति, एवं त्रिचतुरिन्द्रियजातिनामसूत्रे दीप अनुक्रम [५४१] HRIRaitaram.org ~68~ Page #69 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (१५) “प्रज्ञापना" - उपांगसूत्र-४ (मूलं+वृत्ति:) पदं [२३], -------------- उद्देशकः [२], ------------- दारं -], -------------- मूलं [२९४] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र-[१५]उपांगसूत्र-[४] "प्रज्ञापना" मूलं एवं मलयगिरि-प्रणीता वृत्ति: प्रज्ञापना- याः मल- य० वृत्ती. प्रत सूत्रांक ॥४८॥ [२९४] दीप अनुक्रम [५४१] अपि भावनीये, वैक्रियशरीरनामसूत्रे 'जहण्णेणं सागरोवमस्स दो सत्तभागा पलिओयमस्स असंखेजहभागेणं ऊण- २३कर्मबगा' इति, इह वैक्रियशरीरनाम्न उत्कृष्टा विंशतिः सागरोपमकोटीकोटयः स्थितिस्ततः प्रागुक्तकरणवशेन जघन्यस्थि- धपदे क|तिचिन्तायां तस्यां द्वौ सागरोपमस्स सप्तभागौ लभ्येते, परं वैक्रियपटुमेकेन्द्रिया विकलेन्द्रियाश्च न बन्नन्ति, किन्त्वसं-मस्थितिः ज्ञिपश्चेन्द्रियादयः, असंज्ञिपञ्चेन्द्रियाच जघन्यतोऽपि बन्धं कुर्वाणा एकेन्द्रियबन्धापेक्षया सहस्रगुणं कुर्वन्ति. 'पणवी- सू. २९४ सा पण्णासा सयं सहस्सं च गुणकारो' [ पञ्चविंशतिःपञ्चाशत् शतं सहस्रं च गुणकारः ] इति वचनात्, ततो यो द्वौ सागरोपमस्य सप्तभागी प्रागुक्तकरणवशालब्धौ तौ सहस्रेण गुण्येते ततः सूत्रोक्तं परिमाणं भवति, सागरोपमस्य | द्वी सहस्री सप्तभागानां सागरोपमसहस्रस्य द्वौ सप्तभागाविति सेकोऽर्थः, आहारशरीरनाम्रो जघन्यतोऽप्यन्तःसागरोपमकोटीकोटी उत्कर्षतोऽप्यन्तःसागरोपमकोटीकोटी, नवरं जघन्यादुत्कृष्टं सोयगुणं द्रष्टव्यं, अन्ये त्वाहारकचतुष्कस्थ जघन्यतोऽप्यन्तर्मुहर्गमिच्छन्ति, (तथा च) तद्वन्धः-"पुंयेयअट्ठवासा, अट्ठमुहुत्ता जसुधगोयाणं । साए पारस आहारविग्धावरणाण किंचूणं ॥१॥" [पुंवेदेऽष्टी वर्षाण्यष्टमुहूर्ता यशउच्चगोत्रयोः । साते द्वादश वर्षाणि आहारक[विनावरणानां किञ्चिदूनं ॥१॥] अत्र 'किंचूणमिति अन्तर्मुहूर्त्तमित्यर्थः, तदत्र तत्त्वं केवलिनो विदन्ति, यथा शरी- ४८१॥ |रपञ्चकस्य जघन्यत उत्कर्षतश्च स्थितिपरिमाणमुक्तं तेनैव क्रमेण शरीरबन्धनपश्चकस्य शरीरसंघातपञ्चकस्य च वक्तव्यं, तथा चाह-'सरीरबन्धननामाएवि पंचण्हवि एवं चेव, सरीरसंघायणनामाए पंचण्हवि' इति 'बहरोसपनारायसंचय ~69~ Page #70 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (१५) “प्रज्ञापना" - उपांगसूत्र-४ (मूलं+वृत्ति:) पदं [२३], -------------- उद्देशक: [२], ------------- दारं [-], -------------- मूलं [२९४] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र-[१५]उपांगसूत्र-[४] "प्रज्ञापना" मूलं एवं मलयगिरि-प्रणीता वृत्ति: प्रत सूत्रांक [२९४] जनामाए जहा रहनामाए' इति, वर्षभनाराचसंहनननाम्रो यथा प्राक्रतिनानो मोहनीयस्योक्तं तथा वक्तव्यं, तद्यथाIST'वइरोसभनारायसंघयणनामाए भंते ! कम्मस्स केवइयं कालं ठिती पं०१, गो० जहरू एकं सत्तभागं पलिओवमस्स असंखेजहभागेण ऊणं, उक्को दस सागरोवमकोडाकोडीओ' इति, ऋषभनाराचसूत्रे 'सागरोवमस्स छप्पण्णतीसभागा पलिओवमस्स असंखिजइभागेण ऊणगा' इति, ऋषभनाराचसंहननस धुत्कृष्टा स्थिति दश सागरोपमकोटीकोटयः, तासां मिथ्यात्वस्थित्या सप्ततिसागरोपमकोटीकोटीप्रमाणया भागो हियते, तत्र भागहारासम्भवात् शून्य शून्येन पातयित्वा छेद्यच्छेदकराश्योर?नापवर्तनालब्धाः सागरोपमस्य षट् पञ्चत्रिंशभागाः, तेपल्योपमासङ्ख्येयभागहीनाः क्रियन्ते, एवं नाराचसंहनननासो जघन्यस्थितिचिन्तायां सप्त पञ्चत्रिंशद्भागाः|पल्योपमासयभा-11 गहीनाः, उत्कृष्टस्थितेश्चतुर्दशसागरोपमकोटीकोटीप्रमाणत्वात् , अर्द्धनाराचसंहनननामः अष्टौ पञ्चत्रिंशद्भागाः६। पल्योपमासयेयभागोनाः, उत्कृष्टस्थितेः पोडशसागरोपमकोटीकोटीप्रमाणत्वात् , कीलिकासंहनननानो नव पञ्चत्रिशहागाः | पल्योपमासयेयभागहीनाः, उत्कृष्टस्थितेरष्टादशसागरोपमकोटीकोष्टीप्रमाणत्वात् परिभावनीयाः, सेवार्तसंहननसूत्रं तु सुगम, यथा संहननषष्टकस्य स्थितिपरिमाणमुक्तं तेनैव क्रमेण संस्थानयटकस्यापि वक्तव्यं, तथा चाह-एवं जहा संघयणनामा छम्भणिया एवं संठपणा छम्माणियका' उक्तथायमर्थोऽन्यत्रापि 'संघयणे संठाणे पढमे दस उवरिमेसु दुगबुट्टी इति [संहनने संस्थाने प्रथमे दश उपरितनेषु विकवृद्धिः] झरिद्रवर्णनामसूत्रे 'जह 20020200000 दीप अनुक्रम [५४१] Eccceeeee ~70~ Page #71 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम “प्रज्ञापना" - उपांगसूत्र-४ (मूलं+वृत्ति:) पदं [२३], -------------- उद्देशक: [२], ------------- दारं [-], -------------- मूलं [२९४] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र-[१५]उपांगसूत्र-[४] "प्रज्ञापना" मूलं एवं मलयगिरि-प्रणीता वृत्ति: प्रत प्रज्ञापनाया मलयवृत्ती. सूत्रांक ॥४८॥ [२९४] दीप अनुक्रम [५४१] नेणं सागरावमस्स पंच अट्ठावीसहभागा पलिओवमस्स असंखेजइभागेण ऊणगा' इति, हारिद्रवर्णनानो हि सा |२३कर्मवद्वादशसागरोपमकोटीकोटयः, तथा चोक्तमन्यत्रापि-"सुक्किलसुरभिमहुराण दस उ तहा सुभगउण्हफासाणं ।। अट्ठाइजपवुही अंबिलहालिद्दपुवाणं ॥१॥" [ शुक्लसुरभिमधुराणां दशैव तथा सुभगोष्णस्पर्शयोः सार्धद्वयप्रय मस्थितिः द्धिरम्लहारिद्रपूर्वाणाम् ॥१॥] तासां मिथ्यात्वस्थित्या सप्सतिसागरोपमकोटीकोटीप्रमाणया भागो हियते, तत्र सू. २९४ शून्येन शन्यस्य पातनात्तेन उपरितनो राशिः सांश इति सामस्त्येन चतुर्भागकरणार्थ चतुर्भिर्गुण्यते जाताः पञ्चाशत्, | अधस्तनोऽपि सप्ततिलक्षणच्छेदराशिचतुर्मिर्गुण्यते जाते द्वे शते अशीत्यधिके, ततो भूयोऽपि शून्यं शन्येन पातनाल|ब्धाः पञ्च अष्टाविंशतिभागाः | ते पल्योपमासङ्ख्येयभागहीनाः क्रियन्ते, आगतं सूत्रोक्तं परिमाणं, अनेनैव |गणितक्रमेण लोहितवर्णनानो जघन्यस्थिती पट अष्टाविंशतिभागाः पल्योपमासयेयभागहीनाः, उत्कर्षतस्तस्य स्थितेः पञ्चदशसागरोपमकोटीकोटीप्रमाणत्वात् , नीलवर्णनानः ससाष्टाविंशतिभागाः पल्योपमासवेयभागहीनाः, |उत्कर्षतस्तस्य स्थितेः सार्द्धसप्तदशसागरोपमकोटीकोटीप्रमाणत्वात् , 'कालवण्णनामाए जहा सेवटुसंघयणस्से'ति | सेवात्तेसंहननस्येव जघन्यतो द्वौ सागरोपमस्य सप्तभागौ पल्योपमासङ्ख्येयभागहीनी उत्कर्षतो विंशतिसागरोपमको- ४८२॥ टीकोटयः कृष्णवर्णनानोऽपि वक्तव्या इति भावः, सुरभिगन्धनानः शुक्लवर्णनाम्न इव, 'सुकिलसुरभिमहुराण दस उ' इति वचनात् , दुरभिगम्धनानो यथा सेवार्तसंहननस्य तथानन्तरमेवोक्तमिति न पुनरुच्यते, 'रसाणं महुरादीणं weredturary.com ~71~ Page #72 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (१५) “प्रज्ञापना" - उपांगसूत्र-४ (मूलं+वृत्ति:) पदं [२३], -------------- उद्देशक: [२], ------------- दारं [-], -------------- मूलं [२९४] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र-[१५]उपांगसूत्र-[४] "प्रज्ञापना" मूलं एवं मलयगिरि-प्रणीता वृत्ति: d esesearce प्रत सूत्रांक [२९४] जहा वण्णाणं भणियं तहा परिवाडीए भाणिय' मिति, रसानां मधुरादीनां परिपाट्या-क्रमेण तथा वक्तव्यं | यथा वर्णानामुक्तं, तथै-मधुररसनानो जघन्या स्थितिरेकः सागरोपमस्य सप्तभागः पल्योपमासङ्ख्ययभागहीनः, उत्कर्पतो दश सागरोपमकोटीकोटयी दश वर्षशतान्यबाधा, अबाधारहिता कर्मस्थितिः कर्मदलिकनिषेकः, अम्लरसनाम्रो जघन्यतः पञ्च सागरोपमस्याष्टाविंशतिभागाः पल्योपमासङ्ख्येयभागहीनाः, उत्कर्षतोऽर्द्धत्रयोदशसागरोपमकोटीकोटयो अर्द्धत्रयोदश शतान्यबाधा, कषायरसनानो जघन्यतः षट्र अष्टाविंशतिभागाः सागरोपमस्य पल्योपमासङ्खयेयभागोनाः, उत्कर्षतः पञ्चदश सागरोपमकोटीकोटयः, पञ्चदश वर्षशतान्यवाधा, कटुकरसनाम्रो जघन्यतः सागरोपमस्य सप्साष्टाविंशतिभागाः पल्योपमासङ्ख्येयभागहीनाः, उत्कर्षतः सार्द्धसप्तदश सागरोपमकोटीकोटयः सार्द्धसप्तदश शतान्यवाघा, तिक्तरसनानो जघन्यतः सागरोपमस्य द्वौ सप्तभागौ पल्योपमासङ्ख्येयभागहीनी, उत्कर्षतो विंशतिः सागरोपमकोटीकोटयो विंशतिर्वषेशतान्यबाधा अबाधाकालहीना च कर्मस्थितिः कर्मदलिकनिषेक इति, स्पर्शा द्विविधाः, तद्यथा-प्रशस्ता अप्रशस्ताच, तत्र प्रशस्ता मृदुल घुस्निग्धोष्णरूपाः अप्रशस्ताः कर्कशगुरुरूक्षशीतरूपाः, प्रशस्तानां | जघन्यतः स्थितिरेकः सागरोपमस्य सप्तभागः पल्योपमासवधेयभागहीनः, उत्कर्षतो दश सागरोपमकोटीकोटयो दश वर्षशतान्यबाधा अवाधाकालहीना कर्मस्थितिः कर्मदलिकनिषेकः, अप्रशस्तानां जघन्यतो द्वौ सागरोपमस्य सप्तभागी पल्योपमासङ्ख्येयभागहीनी उत्कर्षतो विंशतिः सागरोपमकोटीकोटयो विंशतिर्वर्षशतान्यवाधा अबाधा दीप अनुक्रम [५४१] 292002202892299999 seerece Panditurary.com ~72~ Page #73 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (१५) “प्रज्ञापना" - उपांगसूत्र-४ (मूलं+वृत्ति:) पदं [२३], -------------- उद्देशक: [२], ------------- दारं [-], -------------- मूलं [२९४] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र-[१५]उपांगसूत्र-[४] "प्रज्ञापना" मूलं एवं मलयगिरि-प्रणीता वृत्ति: प्रत सूत्रांक ॥४८॥ [२९४] दीप अनुक्रम [५४१] प्रज्ञापना-18 कालोना कर्मस्थितिः कर्मदलिकनिषेकः, तथा चाह-'फासा जे अप्पसत्था तेसिं जहा सेवट्ठस्स जे पसत्था तेसि २३ कर्मबया मल- जहा सुकिल्लवपणनामस्स' इति, नरकानुपूर्वीनानो जघन्यतः सागरोपमसहस्रस्य द्वौ सप्तभागी, द्वौ सागरोपमस्य पदे कय.वृत्ती. सप्तभागी सहस्रगुणिताविति भावः, भावना नरकगतिवद् भावयितव्या, मनुष्यानुपूर्वीनामसूत्रे "जहण्णणं साग-मस्थितिः रोवमस्स दिपहुं सत्तभागं पलिओवमस्स असंखिजहभागेण ऊणगं'ति, तद्वत्कृष्टस्थितेः पञ्चदशसागरोपमकोटीकोटी-IMसू. २९४ प्रमाणत्वात् , उक्तं चान्यत्रापि-"तीस कोडाकोडी असायआवरणअंतरायाणं । मिच्छे सयरी इत्थीमणुदुगसायाण पन्नरस ॥१॥"[त्रिंशत् सागरोपमकोटीकोटयोऽसातावरणान्तरायाणाम् । मिथ्यात्वे सप्ततिः स्त्रीमनुष्यद्विकसातानां पञ्चदर्श ॥१॥ देवानुपूर्वीनाम्रोऽपि जघन्यतः एकः सागरोपमस्य ससभागः सहस्रगुणितः पल्योप-IN मासङ्घयेयभागहीनः, उत्कर्षतो हि तत्स्थितेः दशसागरोपमकोटीकोटीप्रमाणत्वात् , तथा चोक्तम्-"पुंहासरईउच्चे IS सुभखगतिथिराइछक्कदेवदुगे । दस सेसाणं वीसा एवइयाऽवाह वाससया ॥१॥॥" [ पुंवेदहास्यरत्युचर्गोत्रशु भविहायोगतिस्थिरादिषटूदेवद्विकेषु । दश शेषाणां विंशतिः एतावन्त्यबाधा वर्षशतानि ॥१॥] बन्धश्चास्स जघन्यतोऽसंज्ञिपञ्चेन्द्रियेषु इति, तथा सूक्ष्मनामसूत्रे जघन्यतो नव सागरोपमस्य पञ्चत्रिंशद्भागाः पल्योपमासयेयभागही-M४८॥ ना द्वीन्द्रियजातिनाम्न इव भावनीया, सूक्ष्मनाम्रो घुत्कर्षतः स्थितेरष्टादशसागरोपमकोटीकोटीप्रमाणत्वात् , 'अट्ठारस सुहुमविगलतिगे' इति वचनात्, एवमपर्याससाधारणनासोरपि भावनीयं, कादरपर्याप्तप्रत्येकनाम्नां तु जघन्यतो ~73~ Page #74 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (१५) “प्रज्ञापना" - उपांगसूत्र-४ (मूलं+वृत्ति:) पदं [२३], -------------- उद्देशक: [२], ------------- दारं [-], -------------- मूलं [२९४] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र-[१५]उपांगसूत्र-[४] "प्रज्ञापना" मूलं एवं मलयगिरि-प्रणीता वृत्ति: प्रत सूत्रांक [२९४] दीप अनुक्रम [५४१] दो सागरोपमस सप्तभागी पल्योपमासङ्ख्येयभागहीनी, उत्कर्षतो विंशतिः सागरोपमकोटीकोटवा, तथा चाह-N 'वायरनामाए जहा अपसत्थविहायोगइनामाए, एवं पज्जत्तनामाएवि' इत्यादि, स्थिरशुभसुभगसुखरादेयरूपाणां पञ्चानां नानां जघन्यतः स्थितिरेकः सागरोपमस्य सप्तभागः पल्योपमासङ्ख्येयभागोनः, यश-कीर्तिनामस्तु जघन्य तोऽष्टौ मुहूर्ताः, अट्ट मुहुत्ता जसुचगोयाण'मिति वचनात् , उत्कृष्टा पुनः षण्णामपि दश सागरोपमकोटीकोटयः ISI'थिराइछक्कदेवदुगे दसे'ति वचनात् , अस्थिराशुभदुर्भगदुःखरानादेयायशःकीर्तिनामां तु जघन्यतो द्वौ सागरोपमस्य सप्तभागौ पल्योपमासङ्ख्येयभागहीनी, उत्कर्षतो विंशतिः सागरोपमकोटीकोटयः, एवं निर्माणनामोऽपि वक्तव्यं, तीर्थकरनाम्नो जघन्यतोऽप्यन्तःसागरोपमकोटीकोटी उत्कर्षतोऽप्यन्तःसागरोफ्मकोटीकोटी, ननु यदि जघन्यतोऽपि तीर्थकरनाम्रोऽन्तःसागरोपमकोटीकोटीप्रमाणा स्थितिः तर्हि तावत्याः स्थितेः तिर्यग्भवभ्रमणमन्तरेण पूरयितुमशक्यत्वात् कियन्तं कालं तीर्थकरनामसत्कर्मापि तिर्यग्भवेत् , अथ चासावागमे निषिद्धः, तथा चोक्तम्-"तिरिएसु नत्थि तित्थयरनाम संतंति देसियं समए । कह य तिरिओ न होही अयरोवमकोडीकोडीओ ॥ १॥" तिर्वक्षु नास्ति तीर्थकरनाम सत्तायां इति देशितं समये । कथं च तिर्यक् न भविष्यति अतरोपमकोटीकोटीस्थितिकत्वात् १ ॥१॥] इति , ततः कथमेतदिति चेत्, उच्यते, इह यन्निकाचितं तीर्थकरनामकर्म तत्तिर्यग्गती| सत्तायां निषिद्ध, यत्पुनरुद्वर्तनापवर्तनासाध्यं तद्भवेदपि तिर्यग्गतौ न विरोधमास्कन्दति, तथा चोक्तम्-"जमिह 20299292020 ~74~ Page #75 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम “प्रज्ञापना" - उपांगसूत्र-४ (मूलं+वृत्ति:) पदं [२३], -------------- उद्देशक: [२], ------------- दारं [-], -------------- मूलं [२९४] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र-[१५]उपांगसूत्र-[४] "प्रज्ञापना" मूलं एवं मलयगिरि-प्रणीता वृत्ति: प्रत सूत्रांक प्रज्ञापना या मलयवृत्ती. ॥४cem [२९४] दीप अनुक्रम [५४१] निकाइय तित्थं तिरियभवे तं निसेहियं संतं । इयरंमि नत्थि दोसो उच्चट्टणवणासज्झे ॥१॥" [यदिह निकाचितं २३ कर्मच न्धपदे एतीर्थनाम तिर्यगभवे तन्निषिद्धं सत्तायाम् । इतरस्मिन् नास्ति दोषः उद्वर्तनापवर्तनासाध्ये ॥१॥] इति, गोत्रान्तरा-1|| यसूत्राणि सुप्रतीतानि, नवरं 'अंतराइयस्स णं पुच्छा' इति, पञ्चप्रकारस्थापीति वाक्यशेषः, निर्वचनमपि पञ्चप्रकार णां कर्मस्यापि द्रष्टव्यं । तदेवमुक्तं जघन्यत उत्कर्षतश्च सामान्यतः सर्वासां प्रकृतीनां स्थितिपरिमाणं, साम्प्रतमेकेन्द्रियान-18 स्थितिःसू. |धिकृत्य तासां तदभिधित्सुराह २९५ एगिदिया णं भंते ! जीवा णाणावरणिअस्स कम्मस्स किं बंधति ?, गो!जह सागरोवमस्स तिण्णि सत्तभागा पलितोवमस्स असंखेजहभागेणं ऊणया उक्कोसेणं ते चेव पडिपुण्णे बंधति, एवं निद्दापंचगस्सवि, देसणचउकस्सवि, एगिदिया णं भंते ! सातावेदणिज्जस्स कम्मस्स किं बंधति, गो!ज. सागरोवमदिवढं सत्तभागं पलिओवमस्स असंखेअतिभागेणं ऊणयं उतं चेव पडिपुणं बंधति, असायवेयणिजस्स जहा णाणावरणिजस्स, एगिदिया णं भंते जीवा सम्मत्तवेयणिजस्स कम्मरस किंबंधति ?, गोत्थि किंचि बंधति, एगिदिया णं भंते! जीवा मिच्छत्तवेदणिजस्स कम्मस्स ॥४८४॥ किंबंधति , गो!ज. सागरोवमं पलितोवमस्स असंखेअतिभागेणं ऊणं उ० चेव पडिपुष्णं बंधति, एगिदिया णं भंते ! जीवा सम्मामिच्छत्तवेयणिज्जस्स किं बंधंति , गो.! णत्थि किंचि बन्धंति, एगिदिया णं भंते, जीवा कसायवारसगस्स किंबंधति, गोयमा ! जह० सागरोवमस्स चत्तारि सत्तभागे पलितोवमस्स असंखेजतिभागेणं ऊणते उ० SARERatna karma ~75 Page #76 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (१५) “प्रज्ञापना" - उपांगसूत्र-४ (मूलं+वृत्ति:) पदं [२३], -------------- उद्देशक: [२], ------------- दारं -,-------------- मूलं [२९५] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र-[१५]उपांगसूत्र-[४] "प्रज्ञापना" मूलं एवं मलयगिरि-प्रणीता वृत्ति: प्रत सूत्रांक [२९५] ते चेत्र पडिपुण्णे बंधति, एवं जाव कोहसंजलणाएवि जाव लोभसंजलणाएवि, इत्विवेदस्स जहा सातावेदणिजस्स, एगिदिया पुरिसवेदस्स कम्मरस जह० सागरोवमस्स एग सत्तभागं पलितोवमरस असंखेजतिभागेणं ऊणयं उफो० ते चेव पडिपुण्णं बंधति, एगिदिया नपुंसगवेदस्स कम्मस्स जह० सागरोवमस्स दो सत्तभागे पलितोवमस्स असंखेजतिभागेणं ऊगए उको० ते चेन पडिपुण्णं बंधति, हासरतीते जहा पुरिसवेदस्स, अरतिभयसोगद्गुंछाए [उको० ते चेव पडिपुण्णे बंधति, हासरतीते जहा पुरिसवेदस्स अरतिभयसोगदुगुंछाए] जहा नपुंसगवेयस्स, नेरदयाऊ देवाऊ य निरयगतिनाम देवगतिनाम वेउबियसरीरनाम आहारगसरीरनाम नेरइयाणुपुबिनाम देवाणुपुविनाम तित्थगरणाम एताणि पदाणि ण बंधति, तिरिक्खजोणियाउयस्स जह० अंतो० उकोसेणं पुनकोडी सत्तहिं वाससहस्सेहिं वाससहस्सतिभागेण य अहियं बंधति, एवं मणुस्साउयस्सवि, तिरियगतिनामाए जहा नपुंसगवेदस्स, मणुयगतिनामाए जहा सातावेदणिज्जस्स, एगिदियनामाए पचिंदियजातिनामाए य जहा नपुंसगवेदस्स, बेईदियतेइंदियजातिनामाए पुच्छा, जह० सागरोवमस्स नव पणतीसतिभागे पलितोषमस्स असंखेजतिभागेणं ऊणए उको० ते चेत्र पडिपुण्णे बंधति, चरिंदियनामाएवि जह. सागरोवमस्स णव पणतीसतिभागे पलितोवमस्स असंखेजतिभागेणं ऊगए उ० ते चेव पडिपुण्णे बंधन्ति, एवं जत्थरिथ जहण्णगं दो सत्तभागा तिमि वा चत्वारि वा सत्तभागा अट्ठावीसतिभागा भवंति, तत्थ णं जहण्णेणं ते चेव पलितोवमस्स असंखेजतिभागेणं ऊणमा माणितवा, उ० ते चेव पडिपुण्णे बंधति, तत्थ णं जहण्णेणं एगो वा दिवड्डो वा सत्तभागो तत्थ जह० तं चेत्र माणितवं उ० तं चेव पडिपुण्णं बंधति, जसोकित्तिउच्चागोताणं ज. सागरोवमस्स एग सत्तभागं पलितोवमस्स दीप अनुक्रम [५४२] ~76~ Page #77 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (१५) “प्रज्ञापना" - उपांगसूत्र-४ (मूलं+वृत्ति:) पदं [२३], -------------- उद्देशकः [२], ------------- दारं -], -------------- मूलं [२९५] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र-[१५]उपांगसूत्र-[४] "प्रज्ञापना" मूलं एवं मलयगिरि-प्रणीता वृत्ति: प्रत सूत्रांक [२९५] प्रज्ञापना- असं० ऊणं उ० ते चेष पडिपुण्णं बंधति, अंतराइयस्स णं भंते ! पुच्छा, गो! जहा णाणावरणिजं उ० ते चेव २३कर्मवपडिपुण्णे बंधति । (सूत्र २९५) न्धपदे ए य. वृत्ती. 'एगिन्दिया णं भंते ! जीचा णं नाणावरणिजस्स कम्मस्स किं बंधंति ?' इत्यादि, अत्रेयं परिभाषा-यस्य यस्य। केन्द्रिया॥४८॥ कर्मणो या या उत्कृष्टा स्थितिः प्रागभिहिता तस्याः २ मिथ्यात्वस्थित्या सप्ततिसागरोकोटीकोटीप्रमाणया भागे हते। यलभ्यते तत्पल्योपमासस्येयभागहीनं जघन्या स्थितिः, सैव पल्योपमासययभागसहिता उत्कृष्टेति, एतत्परिभाव्य सकलमप्येकेन्द्रियगतं सूत्रं खयं परिमावनीयं, तथापि विनेयजनानुग्रहाय किञ्चिल्लिख्यते-ज्ञानावरणपञ्चकदर्शनावर- २९५ नवकासातवेदनीयान्तरायपञ्चकानां जपन्यत एकेन्द्रियाणां स्थितिवन्धखयः सागरोपमस्य सप्तभागाः पल्योपमास-IN यभागहीनाः, उत्कृष्टतम्त एव परिपूर्णाखयः सागरोपमस्स सप्तभागाः, सातवेदनीयतीवेदमनुष्यगतिमनुष्यानुपूर्षीNणां जघन्यतः सार्द्धः सागरोपमस्य सप्तभागः पल्योपमासययभागहीना, उत्कर्षतस्तु स एव सार्द्धः सप्तमागः परि पूर्णः, मिथ्यात्वस जघन्यत एक सागरोपमं पल्योपमासबेवभागहीनमुत्कर्षतः तदेव परिपूर्ण, सम्यक्त्ववेदनीयस्य सम्यग्मिथ्यात्ववेदनीयस्य च न किञ्चिदपि वनन्ति, न किश्चिदपि वेधमानतयाऽऽत्मप्रदेशः सम्बन्धयन्तीति ॥४८५|| भाका, एकेन्द्रियाणां सम्यक्त्ववेदनीयस्य सम्यग्मिथ्यात्ववेदनस्य चासम्भवात्, यस्तु साक्षान्धः स सम्यक्त्वसम्यग्मिथ्यात्वयोर्न घटत एवेति प्रागेवाभिहितं, कषावषोडशकस्स जघन्यतश्चत्वारः सागरोपमस्य सप्तभागाः फ्ल्यो-18 ecemeeeeeseseseisemerce दीप अनुक्रम [५४२] ~77~ Page #78 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (१५) “प्रज्ञापना" - उपांगसूत्र-४ (मूलं+वृत्ति:) पदं [२३], -------------- उद्देशकः [२], ------------- दारं -], -------------- मूलं [२९५] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र-[१५]उपांगसूत्र-[४] "प्रज्ञापना" मूलं एवं मलयगिरि-प्रणीता वृत्ति: प्रत सूत्रांक [२९५] पमासङ्ख्येयभागोना उत्कर्षतस्त एव परिपूर्णाः, पुरुषवेदहास्यरतिप्रशस्तविहायोगतिस्थिरादिषटूप्रथमसंस्थानप्रथमसंहन-1 नशुक्लवर्णसुरभिगन्धमधुररसोचैर्गोत्राणां जघन्यत एकः सागरोपमस्य सप्तभागः पल्योपमासङ्ख्येयभागहीनः उत्कर्षतः स एव परिपूर्णः, द्वितीयसंस्थानसंहननयोः जघन्यतः षट् पश्चत्रिंशद्भागाः पल्योपमासकोयभागहीना उत्कर्षतस्त एव । परिपूर्णाः, तृतीयसंस्थानसंहननयोर्जघन्यतः सप्त सागरोपमस्य पञ्चत्रिंशद्भागाः पल्योपमासययभागहीना उत्कर्षतस्त | एव परिपूर्णाः, लोहितवर्णकषायरसयोर्जघन्यतः षट् सागरोपमस्याष्टाविंशतिभागाः पल्योपमासङ्ख्येयभागहीना उत्कपंतस्त एव परिपूर्णाः, हारिद्रवर्णाम्लरसयोर्जघन्यतः पञ्च सागरोपमस्याष्टाविंशतिभागाः पल्योपमासळपेयभागहीनाः उत्कर्षतस्त एष परिपूर्णाः, नीलवर्णकटुरसयोः सप्त सागरोपमस्याष्टाविंशतिभागाः पल्योपमासमवेयभागोनाः उत्कपतस्त एव परिपूर्णाः, नपुंसकवेदभयजुगुप्साशोकारतितिर्यगौदारिकद्विकचरमसंस्थानचरमसंहननकृष्णवर्णतिक्तरसा|गुरुलघुपराघातोच्छासोपघातत्रसवादरपयोसप्रत्येकास्थिराशुभदुभंगदुःखरानादेयायशःकीर्तिस्थावरातपोद्योताशभविहायोगतिनिर्माणकेन्द्रियजातिपञ्चेन्द्रियजातितेजसकार्मणानां जघन्यतो द्वौ सागरोपमस्य सप्तमागौ पल्योपमास मागहीनी उत्कर्षतस्तावेव परिपूर्णाविति, नरकद्विकदेव द्विकवैक्रियचतुष्टयाहारकचतुष्टयतीर्थकरनाम्नां त्वेकेन्द्रियाणां न बन्धः, आयुश्चिन्तायामपि एकेन्द्रिया देवायु रयिकायुर्वा न बान्ति, तथा भवखामाव्यात्, किन्तु तिर्य|गायुमनुष्पायु, तदपि वमन्तो जघन्यतोऽन्तर्मुहूर्त बान्ति, उत्कर्षतः पूर्वकोटिप्रमाणं साधिकं, केवलमुत्कृष्टं चि-1॥ दीप अनुक्रम [५४२] ~78~ Page #79 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम “प्रज्ञापना" - उपांगसूत्र-४ (मूलं+वृत्ति:) पदं [२३], -------------- उद्देशकः [२], ------------- दारं -], -------------- मूलं [२९५] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र-[१५]उपांगसूत्र-[४] "प्रज्ञापना" मूलं एवं मलयगिरि-प्रणीता वृत्ति: प्रज्ञापनाया: मलय० वृत्ती. प्रत सूत्रांक [२९५] ॥४८६॥ दीप अनुक्रम [५४२] त्यते इत्येकेन्द्रिया द्वाविंशतिवर्षसहस्रप्रमाणायुषः खायुषश्च त्रिभागावशेषे परभवायुर्वनन्तः परिगृह्यन्ते इति सप्त-18|२३कर्मचवर्षसहस्राणि वर्षसहस्रत्रिभागोत्तराण्यधिकानि लभ्यन्ते, ततो भवति तिर्यगायुमनुष्यायुश्चिन्तायां सूत्रोक्तंन्धपदेदीपरिमाणमिति । उक्तमेकेन्द्रियबन्धकानधिकृत्य जघन्यत उत्कर्षतच स्थितिपरिमाणं, सम्प्रति द्वीन्द्रियानधिकृत्य। न्द्रियादीतमभिधित्सुराह नां कर्म स्थितिःसू. बेइंदिया णं भंते ! जीवा गाणावरणिजस्स कम्मस्स किं बंधति ?, गो.! जह० सागरोवमपणवीसाते तिणि सत्तभागा २९५ पलितोवमस्स असं ऊणया उ० ते चेव पडिपुण्णे बंधति, एवं निदापंचगस्सवि, एवं जहा एगिदियाणं भणितं तहा बेइंदियाणवि भाणितई, नवरं सागरोवमपणवीसाए सह भाणितबा पलितोवमस्स असंखेजतिभागेणं ऊणा सेसा (उ०) तं चेव पडिपुणं बंधति, जत्थ एगिदिया न बंधंति तत्थ एतेविन बंधति, बेइंदिया णं भंते ! जीवा मिच्छत्तवेयणिजस्स किं बंधंति , गो01, जह सागरोवमपणुवीसं पलिओवमस्स असंखेजइभागेण ऊणयं उक्कोसेणं तं चेव पडिपुण्णं बंधति, तिरिक्खजोणियाउयस्स जह० अंतो० उको पुषकोडिं उहि वासेहिं अहियं बंधंति, एवं मणुयाउयस्सवि, सेसं जहा एगिदियाणं जाव अंतराइयस्स । तेइंदिया णे भंते ! जीवा णाणावरणिजस्स किं बंधति !, गो! जह. सागरोवमपण्णासाए तिण्णि सत्त- HT४८६. भागा पलितोवमस्स असंखेजहभागेणं ऊणया उ० ते चेव पडिपुण्णे बंधति, एवं जस्स जतिभागा ते तस्स सागरोवमपण्णासाए सह भाणितबा, तेइंदिया णं भंते ! मिच्छत्तवेदणिजस्स कम्मरस किंबंधति, गो01 ज० सागरोवमपण्णासं ~79~ Page #80 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (१५) “प्रज्ञापना" - उपांगसूत्र-४ (मूलं+वृत्ति:) पदं [२३], -------------- उद्देशक: [२], ------------- दारं [-], -------------- मूलं [२९६] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र-[१५]उपांगसूत्र-[४] "प्रज्ञापना" मूलं एवं मलयगिरि-प्रणीता वृत्ति: प्रत सूत्रांक [२९६]] पलितोवमस्सासंखेजतिभागेणं ऊणयं उ० तं चेव पडिपुण्णं बंधंति, तिरिक्खजोणियाउयस्स जह• अंतो० उको० पुवकोर्डि सोलसेहिं राईदियतिभागेण य अहियं बंधंति, एवं मणुस्साउयस्सवि, सेसं जहा इंदियाणं जाव अंतराइयस्स । चउरिदिया णं भंते ! जीवा णाणावरणिजस्स किं बंधंति !, मो०। जह० सागरोवमसयस्स तिष्णि सत्तभागे पलितोबमस्स असंखेजतिभागेणं ऊणए उको० ते चेव पडिपुण्णे बंधति, एवं जस्स जति भागा तस्स सागरोवमसतेण सह भाणितबा, तिरिक्सजोणियाउयस्स कम्मस्स जह• अंतो० उ० पुबकोडिं दोहिं मासेहिं अहियं, एवं मणुस्साउयस्सवि, सेसं जहा बेईदियाणं, णवरं मिच्छत्तवेदणिजस्स जह० सागरोवमसतं पलितोवमस्स असंखेअतिमागेणं ऊणयं उ० तं चेव पडिपुणं बंधति, सेसं जहा इंदियाणं जाव अंतराइयस्स । असण्णी ण भंते ! जीवा पंचिंदिया णाणावरणिजस्स कम्मस्स किं बंधति , गो! जह० सागरोबमसहस्सस्स तिण्णि सत्तभागे पलितोवमस्सासंखेजतिभागेणं ऊणए उको० ते चेव पडिपुण्णे, एवं सो चेव गमो जहा बेइंदियाणं, णवरं सागरोवमसहस्सेण समं भाणित जस्स जति भागत्ति, मिच्छत्तयेदणिजस्स जह० सागरोवमसहस्सं पलितोवमासंखेजतिभागेणं ऊणयं उ० तं चेव पडिपुण्णं, नेरइयाउयस्स जह० दस वाससहस्साई अंतोमुत्तममहियाई उकोसेणं पलितोवमरस असंखेजतिभागं पुत्रकोडितिभागभहियं बंधति, एवं तिरिक्खजोणियाउयस्सवि, णवरं जह• अंतो०, मणुयाउयस्सवि देवाउयस्स जहा नेरइयाउयस्स, असण्णी णं भंते ! जीवा पंचिंदियनिरयगतिनामाए कम्मस्स किंबंधति ?, गो.जह सागरोवमसहस्सस्स दो सत्तभागे पलितोवमस्स असंखेज्जतिभागेणं ऊणया उको ते चेच पडिषुण्णे, एवं तिरियगतितेवि, मणुयगतिनामाएवि एवं चेव, णवरं जह• सागरो Soceasee eesesesette दीप अनुक्रम [५४३] ~80 Page #81 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम “प्रज्ञापना" - उपांगसूत्र-४ (मूलं+वृत्ति:) पदं [२३], -------------- उद्देशकः [२], ------------- दारं -], -------------- मूलं [२९६] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र-[१५]उपांगसूत्र-[४] "प्रज्ञापना" मूलं एवं मलयगिरि-प्रणीता वृत्ति: प्रज्ञापनाया: मलयवृत्ती. प्रत सूत्रांक [२९६] २३कर्मवधपदे द्वी. न्द्रियादीनां कर्मस्थितिःसू. २९५ ॥४८७॥ Ta929202920220282920 वमसहस्सस्स दिवसत्तभागं पलितोवमस्सासंखेजइभागेण ऊणं उको तं चेच पडिपुण्ण बंधंति, एवं देवगतिनामाए, नवरं ते सागरोवमसहस्सस्स एग सत्तभागं पलिओवमस्सासंखे० ऊर्ग उ० तं चेव पडिपुण्णं, वेउवियसरीरनामाए पुच्छा, गो०। ज० सागरोजमसहस्सस्स दो सत्तभागे पलितोवमस्सासंखेजतिभागेण ऊणे उको दो पडिपुण्णे बंधति, सम्मत्तसम्मामिच्छत्तआहारगसरीरनामाते तित्थगरनामाए ण किंचि बंधति, अचसिर्दु जहा बेइंदियाण, णवरं जस्स जत्तिया भागा तस्स सा सागरोवमसहस्सेण सह भाणितबा, सन्वेसि आणुपुबीए जाव अंतराइयस्स । सण्णी णं भंते ! जीवा पंचिंदिया णाणावरणिज्जस्स कम्मस्स किंबंधंति , गो! ज. अंतोमु० उ० तीसं सा० कोडाकोडीओ तिणि वाससहस्साई अवाहा, सण्णी णं भंते ! पंचिंदिया णिहापंचगस्स किं बंधति , गो० जह• अंतो० सागरोवमकोटाकोडीओ उ० तीसं सागरोवमकोडाकोडीओ तिणि य वाससहस्साई अवाहा, दंसणचउक्करस जहा गाणावरणिज्जरस, सायावेदणिजस्स जहा ओहिया ठिती भणिता तहेव माणितवा, ईरियावहियवंधयं पडुच्च संपराइयबंधयं च, असायावेयणिजस्स जहा णिदापंचगस्स, सम्मत्तवेदणिजस्स सम्मामिच्छत्तवेदणिजस्स जा ओहिया ठिती भणिता तं बंधति, मिच्छावेदणिजस्स ज० अंतोसागरोवमकोडाकोटीओ उको सत्चरिं सागरोबमकोडाकोडीओ, सत्तरिय वाससहस्साई अवाहा, कसायपारसगस्स जह एवं चेव उको० चचालीसं सागरोवमकोडाकोडीओ, चत्तालीस य वाससयाति अबाहा, कोहमाणमायालोभसंजलणाए यदो मासा मासो अद्धमासो अंतोमुहुत्तो, एवं जहनगं, उक्कोसगं पुण जहा कसायबारसगस्स, चउण्हवि आउयाणं जा ओहिया ठिती भणिता तं बंधति, आहारमसरीरस्स तित्थगरनामाए य जहष्णेणं अंतोसागरोवमकोडाकोडीतो उ० अंतोसागरोक्मकोडा दीप अनुक्रम [५४३] ॥४८७॥ ~81~ Page #82 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (१५) “प्रज्ञापना" - उपांगसूत्र-४ (मूलं+वृत्ति:) पदं [२३], -------------- उद्देशकः [२], ------------- दारं -], -------------- मूलं [२९६] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र-[१५]उपांगसूत्र-[४] "प्रज्ञापना" मूलं एवं मलयगिरि-प्रणीता वृत्ति: प्रत सूत्रांक [२९६]] कोडीओ, पुरिसवेदणिजस्स ज. अह संवच्छराई उ० दस सागरोवमकोडाकोडीओ दस य वाससताई अबाहा, जसोकिचिणामाए उचागोत्तस्स एवं चेव, नवरं जह• अह मुहुत्ता, अंतराइयस्स जहा गाणावरणिजस्स, सेसएसु सबेसु ठाणेसु. संघयणेमु संठाणेसु वण्णेसु गंधेसु य जह० अंतोसागरोबमकोडाकोडीओ उक्को जा जस्स ओहिया ठिती भणिता तं बंधति, णवरं इमं नाणतं अयाहा अवाहूणिया ण चुचति, एवं आणुपुबीते सबेसि, जाव अंतरायस्स ताव भाणितवं (सूत्र २९६) 'बेइंदिया णं भंते ! जीवा' इत्यादि, अत्रेयं परिभाषा-यस्य २ कर्मणो या या स्थितिरुत्कृष्टा प्रागभिहिता | तस्याः तस्याः मिथ्यात्वस्थित्या सप्ततिसागरोपमकोटीकोटीप्रमाणया भागे हते यलभ्यते तत्पञ्चविंशत्या गुण्यते गुणितं च सत् यावद्भवति तावत्पल्योपमासङ्घवेयभागहीन द्वीन्द्रियाणां बन्धकानां जघन्यस्थितिपरिमाणं तदेव परिपूर्णमुत्कृष्ट स्थितिपरिमाणं, तद्यथा-ज्ञानावरणपश्चकदर्शनावरणनवकासातवेदनीयान्तरायपश्चकानां त्रयः सागरोपमस्सग सप्तभागाः पञ्चविंशत्या गुणिताः, वस्तुवृत्त्या पञ्चविंशतः सागरोपमाणां त्रयः सप्तभागाः पल्योपमासययभागहीना जघन्यस्थितिबन्धपरिमाणं, त एव परिपूर्णा उत्कृष्टमित्यादि। त्रीन्द्रियवन्धचिन्तायां तदेव भागलग्धं पञ्चाशता गुण्यते चतुरिन्द्रियबन्धचिन्तायां शतेन असंज्ञिपञ्चेन्द्रियचिन्तायां सहस्रेण, आह च कर्मप्रकृतिसङ्ग्रहणिकार:-"पण-1 वीसा पन्नासा सयं सहस्सं च गुणकारो। कमसो विगलअसनीण"मिति [पञ्चविंशतिः पञ्चाशत् शतं सहस्रं च गुण-16) SEELSEEReceeti दीप अनुक्रम [५४३] ~82~ Page #83 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (१५) “प्रज्ञापना" - उपांगसूत्र-४ (मूलं+वृत्ति:) पदं [२३], -------------- उद्देशक: [२], ------------- दारं [-], -------------- मूलं [२९६] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र-[१५]उपांगसूत्र-[४] "प्रज्ञापना" मूलं एवं मलयगिरि-प्रणीता वृत्ति: २३कर्मप्रकृतिपर्द प्रत सूत्रांक [२९६] प्रज्ञापनाया मलय.वृत्ती . I૪૮૮ दीप कारः । क्रमेण विकलासंजिनाम्। तत एतकमुसारेण सूत्रंखयं मिगमनीयं सुगमत्मात् नवरं 'सागरोक्मयाणवीसा- ए तिणि सत्तभागा पलिजोवमस्स असंखेजाभागेणं ऊणगा' इति, अत्रेयं गणितभाषमा-पञ्चविंशतः सागरोपमा- णां ससमिर्मागे हियमाणे यल्लभ्यते तत्रिगुणीकृत्य पस्योषमासयभामहीनं क्रियते इति, एवं सर्चत्रापि यथायो गणितभाषना कर्सच्या । संज्ञिवचेन्द्रियवन्धकसूत्रे ज्ञानावरणीयादिकर्मणां जघन्यतः स्थितिवन्धोऽन्तसंहादिपरिमा-1 णःक्षपकस लखबन्धचरमसमवे प्रतिपत्तन्या, निद्रापञ्चकासातवेदनीयमिध्यात्वकषायद्वादशकादीनां तु पवाद - कबन्ध इति तेषां जघन्यतोऽप्यन्तासागरोपमकोटीकोटीप्रमाणः उत्कृष्टो मिथ्यारष्टेः सर्वसक्लिष्टस्य, नई तिर्थग्मनुष्यदेवायुषां स्वस्थवन्याव्यतिषिखुखेति । इह संज्ञिपञ्चेन्द्रियसूत्रे झानावरणीयादिकर्मणां जघन्यस्थितिषन्धोऽन्तर्मुद दिपरिमाण उक्तः स कस्मिन् स्वामिनि लभ्यते इति जिज्ञासुः पृच्छतिनामावणिजस्स पं मंते ! कम्मस्स जहण्णाद्वितीबंधए के०१, गो० अण्णयरे सुहुमसंपरायते उवसामए वा खवगे वा एस गोणाणावरणिज्जस्स कम्मस्स जहमठितीपंचते, साहरिते अजहणे, एवं एएणं अभिलाषेणं मोहाउपपज्जाणं सेप्तकम्माणं माणितवं, मोहणिजस्स ण मंते । कम्मरस अहमठितीबंधते के,गो० अगषरे वादरसंपराए उक्सामए का खवए वा एस णे मो. मोहणिज्जस्स कम्मस्स जहण्याठितीबंधते, तहतिरिने अजहण्णे, आउयस्स भंते ! कम्मरस जहणठितीबंधते के०१,गोजे णं जीके असंखेप्पापविढे सबमिरुबे से आउके,सेसे सक्षमहतीए आयशा अनुक्रम [५४३] ॥४८॥ ~83~ Page #84 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (१५) “प्रज्ञापना" - उपांगसूत्र-४ (मूलं+वृत्ति:) पदं [२३], -------------- उद्देशक: [२], ------------- दारं [-], -------------- मूलं [२९७] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र-[१५]उपांगसूत्र-[४] "प्रज्ञापना" मूलं एवं मलयगिरि-प्रणीता वृत्ति: प्रत सूत्रांक [२९७] तीसे में आउयघद्धार चरिमफालसमर्थसि साजहण्वियं ठिई अपज्जत्तापज्जतियं निवत्तेति, एस गं गोयमा ! आउयकमस्स जहण्णठितीबंधते, तपरित्ते अजहण्णे (सूत्र २९७), 'नाणावरणिजस्स गं मैते ! कम्मस्स जहण्णठिइबंधए के? इत्यादि सुगम, नवरमन्यत्तरसूक्ष्मसंपराय इति यदुक्तमस्य न्याख्यानं क्षपक उपशमको पा सूक्ष्मसम्परायः, इह ज्ञानापरणस्य बन्धःक्षपकस्य उपशमकस्य च जघन्य-18 तोऽन्तर्मुहूर्तप्रमाणस्ततोऽन्तर्मुहूर्तत्वाविशेषात् उपशमको वा क्षपको वा इत्युक्तम्, अन्य(बाड)प्रापि क्षपकापेक्षया उपशमकस्य बन्धो द्विगुणो येदितव्यो, यत आह कर्मप्रकृतिसङ्ग्रहणिकार:-'खवगुवसाममपडिवयमाणो दुगुणो तहि तर्हि बंधों' [क्षपकोपशमकप्रप्तिपततां द्विगुणसत्र तत्र बन्धः] इति, तसो वेदनीवस्य साम्परायिकमन्धचि-N न्तायां जघन्यः स्थितिवन्धः क्षपकस्य द्वादश मुहूर्ता उपशमकस्य चतुर्विंशतिः, नामगोत्रयोर्जघन्यतः क्षपकस्साष्टी मुहूतो उपशमकस्य षोडश, परं उपशमकस्यापि जघन्यतो बन्धः शेषयन्धापेक्षया सर्वजघन्य इति तत्सूत्रेष्वपि 'अन्नवरे पुहुमसंपराए उवसामए वा खरगे वा' इति वक्तव्यं, तथा च वक्ष्यति-'एएणं अभिलावेणं मोहाउवज्जाणं सेसकम्माणं माणियचंति उपसंहारसूत्रे 'तवारिते अजहन्ने' इति तद्व्यतिरिक्त:-क्षपकोपशमकसूक्ष्मसम्परायव्यतिरिक्तो जनो-18 जघन्यस्थितिवन्धकः, आयुर्वन्धकसूत्रे 'जेणं जीवे असंखिप्पद्धापषिढे' इत्यादि, इह द्विविधा जीवा:-सोपक्रमायुषो निरुपक्रमायुपश्च, तत्र देवा नैरयिका असायघर्षायुषस्तिर्यग्मनुष्याः सङ्ग्येयवर्षायुषोऽप्युत्तमपुरुषाश्चक्रवादयश्चर दीप अनुक्रम [५४४] 209020201292 ~84 ~ Page #85 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (१५) प्रत सूत्रांक [२९७] दीप अनुक्रम [५४४] पदं [२३], -------------- • उद्देशकः [२], ------------- दारं [-], [---- पूज्य आगमोद्धारकश्री संशोधितः मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र [१५],उपांगसूत्र-[४] "प्रज्ञापना" मूलं एवं मलयगिरि-प्रणीता वृत्तिः - मूलं [२९७] प्रज्ञापना याः मल यoवृत्तौ. ॥ ४८९ ॥ “प्रज्ञापना” – उपांगसूत्र - ४ ( मूलं + वृत्ति:) - मशरीरिणश्च निरुपक्रमायुष एव, शेषास्तु सोपक्रमा अपि निरुपक्रमा अपि, उक्तं च - "देवों नेरइया वा असंखवासाउया य तिरिमणुया । उत्तमपुरिसा य तहा चरमसरीरा य निरुवकमा ॥ १॥ सेसा संसारत्था भइया सोवकमा व इयरे वा । सोवकमनिरुवकमभेओ भणिओ समासेणं ॥ २ ॥” [देवा नैरयिका वा असंख्यवर्षायुष्काश्च नरतिर्यञ्चः । उत्तमपुरुषाश्च तथा चरमशरीराश्च निरुपक्रमाः ॥ १ ॥ शेषाः संसारस्था भक्ताः सोपक्रमा वेतरे वा । सोपक्रमनिरुपक्रमभेदो भणितः समासेन ॥ २ ॥] तत्र देवा नैरयिका असङ्ख्येय वर्षायुपस्तिर्यग्मनुष्याश्च षण्मासावशेषायुषः पारभविकायुर्वन्धका एव, ये पुनस्तिर्यग्मनुष्याः संख्ये वर्षायुषोऽपि निरुपक्रमायुषस्ते नियमात्रिभागावशेषायुषः परभवायुर्वन्ति, ये तु सो पक्रमायुपस्ते स्यात्रिभागावशेषायुषस्त्रि भाग त्रिभागावशेषायुषो यावदसङ्क्षेप्याद्धाप्रविष्टा इति, तत आह- 'जे णं जीवे' इत्यादि, यो णमिति वाक्यालङ्कारे जीवोऽसद्धक्षेप्याद्धाप्रविष्टः त्रिभागादिना प्रकारेण या सङ्केतुं न शक्यते सा असङ्क्षेप्या सा चासौ अद्धा च असङ्क्षेप्याद्धा तां प्रविष्टः असङ्क्षेप्याद्धाप्रविष्टः, जत आह- 'से' तस्यासोप्याद्धाप्रविष्टस्य जीवस्यायुः सर्वनिरुद्धं उपक्रमहेतुभिरतिसङ्घितीकृतं, आयुर्वन्धनिवर्त्तनमात्र एव कालः तस्यास्ति न परतो जीवनकाल इति भावः, एतदेव स्पष्टतरमाह - 'सेसे सक्षमहंतीए आउयबंधद्धाए' इह सर्वमहती | आयुर्बन्धाद्धा अष्टाकर्षप्रमाणा तस्याः शेषः- एकाकर्षप्रमाणा तावन्मात्रं सर्वनिरुद्धं तस्यायुर्वर्त्तते इति भावः, ततो-सयाद्धाप्रविष्टः स इत्थंभूतः तस्या - आयुर्वन्धाद्धायाश्वरम कालसमये – चरमकालावसरे एकाकर्षप्रमाणे, इह Educatin internation For Park Use Only ~ 85~ २३ कर्मप्रकृतिपदं ॥४८९ ॥ Page #86 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (१५) “प्रज्ञापना" - उपांगसूत्र-४ (मूलं+वृत्ति:) पदं [२३], -------------- उद्देशकः [२], ------------- दारं -], -------------- मूलं [२९७] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र-[१५]उपांगसूत्र-[४] "प्रज्ञापना" मूलं एवं मलयगिरि-प्रणीता वृत्ति: प्रत सूत्रांक [२९७] चरमसमयकालग्रहणेन न परमनिरुद्धः समयः परिगृह्यते किन्तु यथोक्तरूपः कालस्ततो हीनेन कालेनायुर्वन्धस्यास-II म्भवात् , यत उक्तं प्राक व्युत्क्रान्तिपदे “जीवा णं भंते ! ठिइनामनिहत्ताउयं काहिं आगरिसेहिं पकरेइ , गो. जह एकेणं उक्कोसेणं अहहिं आगरिसेहि' इति, एकेन चाकर्षणायुनिवर्त्तयति सर्वजघन्यं, यत आह-'सघजहनियमिति, सर्वजघन्या-सर्वलक्ष्यी स्थितिमिति गम्यते, निवर्तयति वनातीति भावः, किंविशिष्टामित्याह'पर्यासापर्याप्तिका' शरीरेन्द्रियपर्याप्तिनिर्वर्तनोच्छासपर्यायनिवर्तनसमर्थी, कथमेतत् अबसेयं यत्सर्वजघन्यामपि स्थिति निर्वर्तयति जीयः शरीरेन्द्रियपर्यासिनिर्वर्तनसमाँ न ततो हीनतरां इति चेत्, उच्यते, युक्तिवशातू, तपाहि-ह सर्व एव देहिनः परभवायुर्वदा नियन्ते नान्यथा, परभवायुषश्च बन्ध औदारिके वैक्रिये आहारके वा योगे वर्त-1॥ मानस्य न कार्मणे औदारिकादिमिश्रे वा, तथा चाह मूलटीकाकार:-"जेणोरालियाईणं तिण्डं सरीराणं काय-31 जोगे वट्टमाणो आउयबंधगो, न कम्मए ओरालियाइमिस्से वा” इति, औदारिकादिकाययोगश्च विशिष्टो भवति शरीरे न्द्रियपर्याप्त्या, न केवल शरीरपर्याच्या पर्याप्तस्य, तत एतत्सिद्धं शरीरपर्याप्त्या इन्द्रियपर्यात्या च पर्याप्तस्य मरणं नान्यथेति, सर्वजघन्यामपि स्थिति नियति शरीरेन्द्रियपर्याप्तिनिवर्तनसमर्थो न ततोऽपि हीनतरामिति, II एस णं गोयमे त्याघुपसंहारवाक्यम् । तदेवमुक्तो जघन्यस्थितिबन्धकः, सम्प्रत्युत्कृष्टस्थितिबन्धके पृच्छति उकोसकालद्वितीयं णं भंते ! णाणावरणिज्ज किं नेरइओ बंधति विरिक्खजोणिओ बंधइ तिरिक्खजोगिणी बंधद मणुस्सो दीप अनुक्रम [५४४] ~86~ Page #87 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (१५) “प्रज्ञापना" - उपांगसूत्र-४ (मूलं+वृत्ति:) पदं [२३], -------------- उद्देशक: [२], ------------- दारं [-], -------------- मूलं [२९८] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र-[१५]उपांगसूत्र-[४] "प्रज्ञापना" मूलं एवं मलयगिरि-प्रणीता वृत्ति: प्रज्ञापनाया:मलयावृत्ती. २३कर्ममकृतिपदं प्रत सूत्रांक ॥४९॥ [२९८] दीप अनुक्रम [५४५] संघह मस्सिणी बंघइ देवो बंधइ देवी बंधइ !, मो०! नेरइओवि बंधइ जाप देवीवि बंधइ, केरिसए क मते ! ए उकोसकालठिइयं णाणाघरणिज कम्मं बंधइ, गो० सण्णी पंचिंदिए सबाहिं पजचीहिं पञ्जने सागारे जागरे सुनो(तो)वउत्ते- मिच्छादिही कण्हलेसे य उकोससंकिलिङ्कपरिणामे ईसिमज्झिमपरिणामे वा, परिसए गं गो. नेरइए पोसकालद्वितिवं णाणावरणिकं कर्म बंधति, केरिसए थे भंते ! तिरिक्खजोणिए उकोसकालठितीयं णाणावरणिज्ज कम्मं बंधति, गो! कम्मभूमए वा कम्ममगपलिभागी वा सण्णी पंचेंदिए सबाहिं पजतीहिं पक्षनए सेस तं चेव जहा नेरइमस्स, एवं तिरिक्सजोणिणीवि मणसेवि मणूसीवि, देवदेवी जहा नेरइए, एवं आउयवाणं सत्तण्डं कम्माणं । उनोसकालठितीय णं मंते । आउयं सम्म कि नेरहओ बंधति जाव देवी ०१, मो० नो नेइओ बंधह, तिरिक्खजोणिो बंधति, नोतिरिक्खजोणिणी बंधति, मस्सेवि बंधति मणुस्सीवि बंधति, नो देवो बंधह नो देवी बंधह, केरिसए थे भंते ! तिरिक्खजोणिते उकोसठितीयं आउयं कम्मं बंधति', गो! कम्मभूमए वा कम्मभूमगपलिभागी वा सण्णी पंचिदिए सबाहिं पजचीहिं पत्तए सागारे जागरे सुत्तोवउचे मिच्छट्ठिी परमकण्हलेसे उकोससंकिलिङपरिणामे, एरिसए णं गो। तिरिक्खजोणिते उकोसकालद्वितीयं आउर्य कर्म बंधति, केरिसए ण मते ! मासे उकोसकालद्वितीयं बाउर्य कम्मं बंधति', गो कम्मभूमए का कम्मभूमगपलिभागी वा जाव सुत्तो(तो)वउने सम्मदिही वा मिच्छादिही वा कण्हलेसे वा सुफलेसे वा पाणी वा अण्णाणी वा उ० संकिलिङपरिणामे का असंकिलिपरिणामे वा तप्पाउग्गविसुज्झमाणपरिणामे क एरिसए णं गोमासे उकोसकालद्वितीयं आउयं कम्म गंधति, केरिसयाण मंते ! मणुसी उकोसकालाहियं भार ॥४९॥ ~87~ Page #88 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (१५) “प्रज्ञापना" - उपांगसूत्र-४ (मूलं+वृत्ति:) पदं [२३], -------------- उद्देशक: [२], ------------- दारं [-], -------------- मूलं [२९८] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र-[१५]उपांगसूत्र-[४] "प्रज्ञापना" मूलं एवं मलयगिरि-प्रणीता वृत्ति: प्रत सूत्रांक [२९८] कम्मं बंधह, गो! कम्मभूमिया वा कम्मभूमगपलिभागी वा जाव सुत्तोवउच्चा सम्मद्दिष्टी सुक्कलेसा तप्पाउम्पविसुज्झमाणपरिणामा, एरिसिया णं गोतमा! मणूसी उकोसकालहिइथं आउयं कम्म बंधति, अंतराइयं जहा भाणावरणि (सूत्र २९८ ) ॥ पण्णवणाए तेवीसमं पर्व समत्तं ॥ २३ ॥ . 'उकोसकालठिइयं णं भंते ! णाणावरणिज कम्मं किं नेरइओ बंधई' इत्यादि, सुगम, नैरयिकसूत्रे 'सागार' इति साकारोपयुक्तः, 'जागर' इति जाग्रत् नारकाणामपि कियानपि निद्रानुभवोऽस्ति तत उक्तम्-'जान'दिति 'सुत्तो(तो) वउत्ते' इति श्रुतोपयुक्तः साभिलापज्ञानोपयुक्त इति भावः। तिर्यग्योनिकसूत्रे 'कम्मभूमगपलिभागी च कर्मभुमगा:-N कर्मभूमिजातास्तेषां प्रतिभागः-सादृश्यं तदस्यास्तीति कर्मभूमगप्रतिभागी कर्मभूमगसदृश इत्यर्थः, कोऽसाविति चेत्, उच्यते, या कर्मभूमिजा तिर्यकत्री गर्भिणी सती केनाप्यपहत्याकर्मभूमौ मुक्ता तस्या जातः कर्मभूमगसदृश इत्यर्थः, अन्ये तु व्याचक्षते-कर्मभूमग एव यदा केनाप्यकर्मभूमौ नीतो भवति तदा स कर्मभूमगप्रतिभागी व्यपदिश्यते इति । उत्कृष्टस्थितिकायुबन्धचिन्तायां नैरयिकतिर्यग्योनिकस्त्रीदेवदेवीनां प्रतिषेधः, तासामुत्कृष्टस्थितिघु नरकादिषूत्पत्त्वभावात् , मनुष्वसूत्रे 'सम्मदिट्ठी पा मिच्छादिट्ठी वा' इति, इह द्वे उत्कृष्टे आयुषी, तद्यथा-सप्तमनरकपृथिव्यायुर्वभाति तदा मिथ्यादृष्टिः, यदा पुनरनुत्तरसुरायुस्तदा सम्यग्दृष्टिः, 'कण्हलेसे वा' नारकायुर्वन्धकः 'सुक्कलेसे वा' इति अनुत्तरसुरायुर्वन्धकः सम्यग्दृष्टिरप्रमत्तयतिः, उस्कृष्टसङ्क्लिष्टपरिणामो नारकायुर्वन्धकस्तत्त्रा दीप अनुक्रम [५४५] eteersedesee For P OW ~88~ Page #89 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (१५) “प्रज्ञापना" - उपांगसूत्र-४ (मूलं+वृत्ति:) पदं [२३], -------------- उद्देशक: [२], ------------- दारं [-], -------------- मूलं [२९८] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र-[१५]उपांगसूत्र-[४] "प्रज्ञापना" मूलं एवं मलयगिरि-प्रणीता वृत्ति: प्रज्ञापना- या मलय० वृत्ती. योग्यविशुज्यमानपरिणामोऽनुत्तरसुरायुर्वन्धकः, मानुषी तु सप्तमनरकपृथिवीयोग्यमायुन बध्नाति अनुत्तरसुरायुस्तु बनातीति तत्सूत्रे सर्व प्रशस्तं ज्ञेयं, इह अतिविशुद्ध आयुर्वन्धमेव न करोतीति तत्प्रायोग्यग्रहणं, शेषं कण्ठ्यम् ॥ | इतिश्रीमलयगिरिविरचितायां प्रज्ञापनाटीकायां त्रयोविंशतितम कर्मप्रकृत्याख्यं पदं परिसमाप्तम् ॥ २४कर्मबन्धपद प्रत सूत्रांक ॥४९॥ [२९८] अथ चतुर्विंशतितमं कर्मप्रकृतिबन्धपदं ॥ २४ ॥ दीप अनुक्रम [५४५] व्याख्यातं प्रयोविंशतितमं पदं, सम्प्रति चतुविशतितममारभ्यते-तस्य चायमभिसम्बन्धः-इहानन्तरपदे कर्मवधादिरूपः परिणामविशेषश्चिन्तितः, स एव वक्ष्यमाणेष्वपि चतुर्पु पदेषु कचित् चिन्त्यते, तत्र चतुर्विशतितमस्य | पदस्सेदमादि सूत्रम् कति णं मंते ! कम्मपगडीओ पण्णत्ताओ, गो०! अढ कम्मपगडीओ पण्णताओ, तं०-णाणावरणिज्जं जाव अंतराइयं, एवं नेरइयाणं जाव बेमाणियाणं । जीवे णं भंते ! णाणावरणिजं कम्मं बंधमाणे कति कम्मपगडीतो बंधह, गो०1 सचविहबंधए वा अद्वविह० छबिहबंधते वा, नेरइए णं मंते ! गाणावरणिज कम्मं बंधमाणे कति कम्मपगडीतो बंधति, गो! सचविहबंधए वा अवविहरू, एवं जाव वेमाणिते, णवर मणुस्से जहा जीवे, जीवा णं भंते ! णाणावरणिज कम्म ॥४९॥ अत्र पद (२३) “कर्मप्रकृति" परिसमाप्तम् अथ पद (२४) “कर्मप्रकृतिबन्ध" आरब्धम् ~89~ Page #90 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (१५) “प्रज्ञापना" - उपांगसूत्र-४ (मूलं+वृत्ति:) पदं [२४], -------------- उद्देशक: -,------------- दारं [-], -------------- मूलं [२९९] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र-[१५]उपांगसूत्र-[४] "प्रज्ञापना" मूलं एवं मलयगिरि-प्रणीता वृत्ति: प्रत सूत्रांक [२९९] दीप अनुक्रम [५४६] deceaef6o बंधमाणा कति कम्मपगडीओ बंधति ?, गो० सवेषि ताव होज सत्तविहबंधगा य अङ्कविहबंधगा य अहवा सत्तविहबंधगा य अट्ठविहवंधगा य छविहबंधगे य अहवा सत्तविहबंधगा य अढविहबंधगा य छविहबंधगा य, णेरइया ण मैते ! णाणावरणिज कर्म बंधमाणा कति कम्मपगडीतो बंधति ? गो० सदेवि ताव होजा सत्तविहबंधगा अहवा सत्तविहर्वधगा य अढविहबंधगे य, अहवा सचविहबंधगा य अद्वविहबंधगा य तिणि भंगा, एवं जाव थणियकुमारा, पुढविकाइया णं पुच्छा, गो! सत्तविहबंधगावि अट्टविहबंधगावि एवं जाव वणफइकाइया, विगलाणं पंचिदियतिरिक्खजोणियाणं तियभंगो सवेवि ताव होज सत्तविहबंधगा अहवा सत्तविहबंधगा य अट्ठविहबंधगे य अहवा सत्तविहबंधगा य अट्ठविहबंधगा य, मणसा णं भंते ! णाणावरणिज्जस्स पुच्छा, गो! सवेवि ताव होज्जा सचविहवंधगा १ अहया सत्तविहवंधगा य अढविहबंधगे य २ अहवा सत्तविहबंधगा य अढविहबंधगा य ३ अहवा सचविहबंधगा य छबिहबंधए य ४ अहवा सत्तविहबंधगा य छबिहबंधगा य ५ अहवा सत्तविहबंधगा य अट्टविहबंधगे य छबिहबंधगे य ६ अहवा सत्तविहबंधगा य अट्ठविहवंधगे य छबिहबंधगा य ७ अहवा सत्तविहबंधगा य अढविहवंधगा य छबिहबंधगे य ८ अहवा सत्चविहबंधगा य अढविहबंधगा य छबिहबंधगा य ९ एवं एते नव भंगा, सेसा वाणमंतरादिया जाव बेमाणिता जहा नेरइया सचविहादिबंधगा भाणिता सहा भाणितवा, एवं जहा णाणावरणं बंधमाणा जहिं भणिता दसणावरणपि बंधमाणा तहिं जीवादीया एगत्तपोहुचेहिं भाणितत्वा, बेयणिजं बंधमाणे जीवे कति०, गो०! सत्तविहबंधए वा अट्टविहबंधए वा छबिहबंधए वा एगविहबंधए वा, एवं मासेवि, सेसा नारगादीया सचवि० अढविहबंधगा जाव येमाणिते, जीवा ] NOR Eleel SAREauratonintimational ~90~ Page #91 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (१५) “प्रज्ञापना” – उपांगसूत्र-४ (मूलं+वृत्ति:) पदं [२४], -------------- उद्देशक: [], ------------- दारं [-], -------------- मूलं [२९९] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र-[१५]उपांगसूत्र-[४] "प्रज्ञापना" मूलं एवं मलयगिरि-प्रणीता वृत्ति: प्रत सूत्रांक प्रज्ञापनाया: मलयवृत्चौ. [२९९] ॥४९या दीप भंते ! वेदणिज कम्मे पुच्छा, मो०! सवेवि ताव होला सत्तविहबंधगा य अडविहबंधगा य एगविहबंधवा य छबिह- २४कर्मबधए म अहया सत्तविहबंधमा व अट्ठविहबंधगा य एमविहबंधगा य छविहवंधगा य अवसेसा, नारगादीया जाय वेमाणि- न्धपदं ता जहिं णाणावरणं बंधंति तर्हि माणितबा, एवं मण्सा णं भंते ! वेदणिशं कर्म बंधमाका कति कम्मपगडीतो बंधवि, गो! सोवि ताव होज सत्तविहवंधगा य एगवि०१ अहवा सत्तविहबंधगा य एगवि० अङ्कषिहबंधगे पर अहवा सत्तविहबंधगा य एगविहबंधगा य अढवि०३ अहवा सत्तविहबंधगा य एगविहबंधगा य छविहबंधगे य ४ अहवा सत्तविहबंधगा य एगविह छबिह० ५ अहवा सत्तविहबंधगा य एगवि० अहविहबंधते य छविहबंधते य ६ अहवा सत्तबिहवंधगा य एगविहबंधगा य अट्टविहबंधते य छविबंधगा य ७ अहवा सत्ताविहबंधगा य-एगवि० गा य अट्ठविहवं. छविहबंधगे य ८ अहषा सत्तविहवंधगा य एगवि० अढवि० छबिहब०९एवं एए नव भंगा भाणियबा, मोहणिज बंधमाणे जीवे कति०, गो० जीवेगिदियचो तियमंगो, जीवेगिंदिया सत्तविहवंधगावि अढविहवंधगापि, जीवे में मंते! आउर्ष कम्मं बंघमाणे कति कम्म, मो.! नियमा अट्ट, एवं नेरइए जाव वेमाणिए एवं पुत्तेणषि, जामगोयअंतराइयं बंधमाणे जीवे कति०१, गो०! जीया णाणावरणिज्ज बंधमाणे जाहिं बंधति ताहि माणितबो, एवं नेरइएवि, जाव वेमाणिए, एवं पुहुत्तेणवि भाणिया ॥ (सूत्रं २९९) पण्णवणाए भगवईए चउवीसतिमं पयं समतं ॥ | ॥४९या 'करते! कम्मपगडीओ पण्णताजो' इत्यादि, प्रागुपन्वतखालापकवेहोपन्यासो विशेषाभिधानार्थः, एषमुत्तरे-11 अनुक्रम [५४६] eesरररर ~91~ Page #92 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (१५) “प्रज्ञापना" - उपांगसूत्र-४ (मूलं+वृत्ति:) पदं [२४], -------------- उद्देशक: [-], ------------- दारं [-], -------------- मूलं [२९९] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र-[१५]उपांगसूत्र-[४] "प्रज्ञापना" मूलं एवं मलयगिरि-प्रणीता वृत्ति: 392 प्रत सूत्रांक [२९९] दीप अनुक्रम [५४६] विपि पदेषु भावनीयं, संप्रति किं कर्म वनन् कानि कर्माणि वनातीति पन्धसम्बन्धं चिचिन्तयिषुः प्रथमतो ज्ञानावरणीयेन सह सम्बन्धं चिन्तयति-'जीवे गं भंते ! णाणावरणिज कम्मं बंधमाणे कद कम्मपगडीशोपंधा' इत्यादि। सुगम, नवरं सप्तविधवन्धक आयुर्वन्धकाभावकाले अष्टविधवन्धक आबुरपि बनन् पडिधकाधको मोहायुर्वन्धाभावे, स च सूक्ष्मसम्परायः, उक्तं च-"सत्तविहपंधगा होति पाणिणो बाउबजगाणं तु । तह मुहुमसंपराया छविहर्षया ST विणिदिवा ॥१॥ मोहाउयवजाणं पवडीणं ते उ बंधगा मणिया।" [ सप्तविधयन्धका भवन्ति प्राणिन आयुर्वर्जानाम् । तथा सूक्ष्मसंपरायाः पद्विधयन्धा विनिर्दिष्टाः॥१॥ मोहायुर्वर्जानां प्रकृतीनां ते तु बन्धका भणिताः] इति, एकविधवन्धकस्तु न लभ्यते, एकविधवन्धका हि उपशान्तकषायादयः, तथा चोक्तम्-'उपसंतखीयमोहा केवलिणो एगविहबंधा। ते पुणदुसमयहिइयस्स बंधका न उण संपरायस्स ॥" [उपशान्तक्षीणमोहाः केवलिन एकविधवन्धाः । ते पुनहिसमयस्थितिकस्य बन्धका न पुनः संपरायस्य ] न चोपशान्तकपायादयो ज्ञानावरणीयं कर्म वनन्ति, तद्वन्धस्य सूक्ष्मसम्परायचरमसमय एव व्यवच्छेदात्, किन्तु केवलं सातवेदनीयमिति ॥ एतदेय नैरयिका. दिदण्डकक्रमेण चिन्तयति-'नेरहए णं भंते' इत्यादि, इह मनुष्यवर्जेषु शेषेषु पदेषु सर्वेष्वपि द्वावेव भङ्गको द्रष्टव्यौ सप्तविधवन्धको या अष्टविधवन्धको वा इति, न तु तृतीयः षड्विधवन्धक इति, तेषु सूक्ष्मसम्परायगुणस्थानासम्भवात् , मनुष्यपदेषु त्रयोऽपि वक्तव्याः, तत्र सूक्ष्मसम्परायत्वसम्भवात् , तथा चाह-एवं जाव वेमाणिए, नवरं 9 0920930 Hreluctaram.org ~92~ Page #93 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (१५) “प्रज्ञापना" - उपांगसूत्र-४ (मूलं+वृत्ति:) पदं [२४], -------------- उद्देशक: -,------------- दारं [-], -------------- मूलं [२९९] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र-[१५]उपांगसूत्र-[४] "प्रज्ञापना" मूलं एवं मलयगिरि-प्रणीता वृत्ति: प्रत सूत्रांक [२९९] प्रज्ञापनावाः मलयवृत्ती. ॥४९॥ दीप मणूसे जहा जीये' इति । उक्त एकत्वेन दण्डकः, सम्प्रति बहुत्वेनाह-'जीवा णं भंते' इत्यादि, इह जीवाः सप्तवि- २४कर्मबघबन्धकाः अष्टविधवन्धकाच सदैव पहुत्वेन लभ्यन्ते, षडूविधवन्धकस्तु कदाचित्सर्वथा न भवति, पण्मासान या- न्धपद वत् उत्कर्षतस्तदन्तरस्य प्रतिपादनात् , यदापि लभ्यते तदापि जघन्यपदे एको द्वौ वा उत्कर्षतोऽष्टाधिकं शतं, तत्र यदैकोऽपि न लभ्यते तदा प्रथमो भगः, यदा त्वेको लभ्यते तदा द्वितीयो, बहूनां लाभे तु तृतीय इति, नैरयिकाः पड्विधबन्धका न भवन्ति अष्टविधवन्धका अपि कादाचित्काः, तत्र यदेकोऽप्यष्टविधवन्धको न लभ्यते तदा सर्वेऽपि तावद् भवेयुः सप्तविधबन्धका इति प्रथमो भगः, यदा त्वेकोऽष्टविधबन्धकस्तदा द्वितीयो यदा तु बहव|स्तदा तृतीय इति, एतदेव भजत्रिकं दशखपि भवनपतिषु भावनीयं, पृथिव्यादिषु पञ्चस सप्तविधबन्धका अपि अष्ट-IN विधवन्धका अपीत्येक एव मङ्गोऽष्टविघबन्धकानामपि सदैव तेषु बहुत्वेन लभ्यमानत्वात् , द्वित्रिचतुरिन्द्रियतिर्यक-IN पञ्चेन्द्रियसूत्रेषु भङ्गत्रिकं नैरयिकवत् , मनुष्यसूत्रे भङ्गनवकमष्टविधवन्धकस्य षड्डिधवन्धकस्य च कदाचित् सर्वथाप्यभावात् , तत्राष्टविधषविधवन्धकाभावे सर्वेऽपि तावद् भवेयुः सप्तविधबन्धका इति प्रथमो भङ्गः, सप्तविधबन्धकानां सदैव बहुत्वेन प्राप्यमाणत्वात् , एकाष्टविधवन्धकभावे द्वितीयः सप्तविधवन्धकाश्चाष्टविधबन्धकश्च, बद्दष्टविधबंधक-N ॥४९॥ भावे तृतीयः सप्तविधबन्धकाश्चाष्टविधबंधकाश्च, एवमेवाष्टविधवन्धकाभावे षइविधवन्धकपदेनाप्येकत्वबहुत्वाभ्यां द्वौ भङ्गाविति द्विकसंयोगे चत्वारो भङ्गाः, त्रिकसंयोगेऽप्यष्टविधबन्धकषविधवन्धकपदयोः प्रत्येकमेकवचनबहुवचना अनुक्रम [५४६] ~93~ Page #94 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (१५) “प्रज्ञापना" - उपांगसूत्र-४ (मूलं+वृत्ति:) पदं [२४], -------------- उद्देशक: -,------------- दारं [-], -------------- मूलं [२९९] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र-[१५]उपांगसूत्र-[४] "प्रज्ञापना" मूलं एवं मलयगिरि-प्रणीता वृत्ति: प्रत सूत्रांक [२९९] भ्यां चत्वार इति सर्वसङ्ख्यया नव, व्यन्तरज्योतिष्कवैमानिका नैरयिकवत् , यथा ज्ञानावरणीयं चिन्तितं तथा दर्शना|वरणीयमपि चिन्तयितव्यं, वेदनीवचिन्तायां एकविधवन्धक एव इति उपशान्तमोहादि, शेषं प्राग्वत् , मनुष्यपदविषयचिन्तायामपि त एवं प्रागुक्ता नव भङ्गाः, सप्तविधबन्धकानामेकविधबन्धकानां च सदैव बहुत्वेनायस्थिततया भङ्गान्तरासम्भवात् , मोहचिन्तायां जीवपदे पृथिव्यादिषु पदेषु च प्रत्येकं एक एव भङ्गा-सप्तविधवन्धका अपि अष्टविधवन्धका अपीति, उभयेषामपि सदैव बहुत्वेन लभ्यमानत्वात् , पहविधवन्धकस्तु मोहनीयबन्धको न | भवति, मोहनीयबन्धो बनिवृत्तिवादरसम्परायगुणस्थानकं यावत्, पविधवन्धकस्तु सूक्ष्मसंपराय इति, आयुर्वन्धकस्तु नियमादष्टविधवन्धक इति तचिन्तायामेकवचने बहुवचने च सर्वत्राभाकं, नामगोत्रान्तरायसूत्राणि ज्ञानावरणीयसूत्रवत् ।। इति श्रीमलयगिरिविर० कर्मबन्धाख्यं चतुविशतितमं पदं समाप्तम् ॥ २४ ॥ अथ पञ्चविंशतितमं कर्मवेदाख्यं पदं ॥२५॥ सम्प्रति पञ्चविंशतितममारभ्यते, तत्र चेदमादिसूत्रम्कति णं भंते ! कम्मपगडीओ पं०१, गो० अट्ट कम्मपगडीतो पण्णचाओ तं०-णाणावरणिशं जाब अंसराइयं एवं नेरइयाणं जाव वेमाणियाणं, जीवे णं भंते ! णाणावरणिजं कम्म बंधमाणे कति कम्मपगडीतो वेदेति ?, गोनिय c tActresselsepe दीप अनुक्रम [५४६] traNP A wwwmarary.org अत्र पद (२४) “कर्मप्रकृतिबन्ध" परिसमाप्तम् अथ पद (२५) “कर्मवेद" आरब्धम ~94~ Page #95 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (१५) “प्रज्ञापना” – उपांगसूत्र-४ (मूलं+वृत्ति:) पदं [२५], -------------- उद्देशक: [], ------------- दारं [-], -------------- मूलं [३००] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र-[१५]उपांगसूत्र-[४] "प्रज्ञापना" मूलं एवं मलयगिरि-प्रणीता वृत्ति: २५कर्मवे. प्रत सूत्रांक प्रज्ञापनायाः मलयवृत्ती. [३०० ॥४९४॥ दीप अनुक्रम [५४७] मा अट्ट कम्मपगडीतो वेदेति, एवं नेरइए जाव वेमाणिए, एवं पुहुनेणवि, एवं वेदणिज्जवज जाव अंतराइयं । जीवे गं भंते ! वेदणिजं कर्म बंधमाणे कति कम्मपगडीतो वेदेति !, गो! सत्तविहवेदए वा अढविहवेदए वा चउबिहवेदए वा, दपद एवं मणूसेवि, सेसा नेरहयाति एगचेण पुहुत्तेणवि नियमा अट्ठ कम्मपगडीओ वेदंति जाव वेमाणिया, जीवाणं मंते ! सू. ३०० वेदणिजं कम्मं बंधमाणा कति कम्मपगडीतो घेदेति , गो०1 सबेवि ताव होजा अढविहवेदगा य चउबिहवेदगा य? अहवा अढविहवेदगा य चउविह० सत्तविहवेद्गे य २ अहवा अट्टविहवेदगा ब चउवि० सत्तवि० ३, एवं मसावि भाणियबा ॥ (सूत्रं ३०.) पण्णवणाए भगवईए कम्मवेदणार्म पणवीसविमं पर्य समतं ॥ २५॥ 'कइ णं भंते कम्मपगडीओ' इत्यादि गतार्थ, सम्प्रति किं कर्म बनन् कति कर्मप्रकृतीवेदयते इति चिन्तयतिजीवे गंभंते !' इत्यादि सुगम, वेदनीयसूत्रे 'सत्तविहवेयए वा अट्टविहवेयए(या) वा चउविहवेयए(या) वा इति, सस-Pel विधवेदक उपशान्तमोहः क्षीणमोहो वा, तयोर्मोहनीयोदयाभावात् , अष्टविधवेदका मिथ्यारयादयः सूक्ष्मसम्परायान्ताः, तेषामवश्यमष्टानामपि कर्मणामुदयभावात् , चतुर्विधवेदकः सयोगिकेवली, तस्य घातिकर्मचतुष्टयोदयाभावात्, बहुवचने सप्तविधवेदकाः कादाचित्का इति भत्रयम् ॥ इति श्रीमलयगिरिविरचितायां पञ्चविंशतितमं । कर्मवेदाख्यं पदं समासम् ॥ २५ ॥ Leelaceceae अत्र पद (२५) “कर्मवेद" परिसमाप्तम् ~95 Page #96 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (१५) “प्रज्ञापना” – उपांगसूत्र-४ (मूलं+वृत्ति:) पदं [२६], -------------- उद्देशक: -,------------- दारं --------------- मूलं [३०१] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र-[१५]उपांगसूत्र-[४] "प्रज्ञापना" मूलं एवं मलयगिरि-प्रणीता वृत्ति: अथ षविंशतितमं कर्मवेदबन्धाख्यं पदं ॥ २६ ॥ प्रत सूत्रांक [३०१] दीप अधुना षड्विंशतितममारभ्ये, तत्र चेदमादिसूत्रम्कति णं भंते ! कम्मपगडीओ पण्णताओ, गो० । अट्ट कम्मपगडीओ पण्णचाओ, तं०-णाणा. जाव अंतराइयं, एवं नेरइयाणं जाव वेमाणियाण, जीवे णं भंते ! गाणावरणिज्ज कम्मं वेदेमाणे कति कम्मपगडीओ बंधति ?, गो०! सत्तविहवंधए वा अद्वविहबंधए वा छबिहबंधए वा एगविहबंधए वा, नेरइएवं भंते ! णाणावरणिज्ज कम्मं वेदेमाणे कति कम्म बंधति , गो०। सत्तविहबंधए वा अढवि०, एवं जाव वेमाणिते, एवं मणसे जहा जीवे, जीवाणं भंते ! णाणावरणिअंकम्म वेदेमाणा कति० कम्मपगडीतो बंधति, गो! सबेवि ताव होआ सत्तविहबंधगा य अट्टविह०१ अहवा सत्तविहबंधगा य अट्टविहबंधगा य छविबंधगे य २ अहवा सत्तविहबंधगा य अट्टविहबंधगा य छविबंधगा य ३ अहवा सत्तविहबंधगा य अविहबंधगा य एगविहबंधए य ४ अहवा सत्तविहबंधगा य अडविहबंधगा य एगविहवंधगा य ५ अहवा सत्तविहबंधगा य अट्ठवि० छविहबंधए य एगविहबंधए य ६ अहवा सचविहवंधगा य अडवि० छविहबंधए य एगविहबंधगा य ७ अहवा सत्तविहबंधगा य अढवि. छबिह० एगविहबंधए य ८, अहवा सत्तविहबंधगा य अढ० POSsse2029292920201008 अनुक्रम [५४८] FarPranaamsamunoonm अथ पद (२६) "कर्मवेदबन्ध" आरब्धम ~96~ Page #97 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम “प्रज्ञापना" - उपांगसूत्र-४ (मूलं+वृत्ति:) पदं [२६], -------------- उद्देशक: [], ------------- दारं [-], -------------- मूलं [३०१] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र-[१५]उपांगसूत्र-[४] "प्रज्ञापना" मूलं एवं मलयगिरि-प्रणीता वृत्ति: प्रत सूत्रांक [३०१] प्रज्ञापनायाः मलय.वृत्ती. ॥४९५|| २६कर्मवेदबन्धपद सू.१०१ दीप अनुक्रम [५४८] eceaeese छबिह० एगविह० ९, एवं एते नव भंगा, अवसेसाणं एमिंदियमणूसवजाणं तिषभंगो जाव वेमाणियाणं, एगिदियाण सत्तविहवंधगा य अट्ठविह०, मणसाणं पुच्छा, गो०! सबेवि ताव होज सत्तविहबंधगा १ अहवा सत्तविहबंधगा व अट्ठविहबंधगे य २ अहवा सत्तविहबंधगा य अवविहबंधगा य ३ अहवा सत्तविहबंधगा य छबिहबंधए य४, एवं छविहबंधएणवि समं दो भंमा, एगविहबंधएणवि समं दो भंगा, अहवा सत्तविहबंधगा य अट्टविहबंधए य छबिहबंधए य चउभंगो १ अहवा सत्तविहबंधगा य अट्टविहबंधए य एगविहधगे य चउभंगो २, अहवा सत्तविहबंधगा य छविधए य एगविहबंधए य चउभंगो ३ अहवा सत्तविहवंधगा य अवविहबंधए य छविहबंधए य एगविहबंधए य भंगा अह, एवं एते सत्तावीसं भंगा, एवं जहा गाणावरणिज तहा दसणावरणिज्जंपि अंतराइयंपि, जीवेणं भंते ! वेदणिजं कर्म वेदेमाणे कति कम्मपगडीतो बंधति', गो01 सत्तविहबंधते बा अद्दविहबंघते वा छबिहबंधए वा एगविहबंधए वा अधए वा, एवं मणूसेवि, अवसेसा णारयादीया सत्तविहबं० अवविहर्ष एवं जाव वेमाणिता । जीवा णं भंते । वेदणिज कम्भ वेदेमाणा कति बंधंति , गो! सबेवि ताव होज्जा सत्तविहबंधगा य अट्टविहबंधगा य एगविहबंधगा य अहवा सत्तविहवंधगा य अडवि० एगवि. छबिहबंधगे य, अहवा सत्तविहबंधगा य अवविहबंध. एगविहबंध० छबिहबंधगा य, अबंधगेणवि समं दो भंगा भाणितबा, अहवा सचविहबंधगा य अट्ठविहबंध. एगविहबंध० छविहवंधगे य अबंधगे य चउभंगो, एवं एए नव भंगा, एगिदियाण अभंगतं, नारगादीणं तियभंगा जाव बेमाणियाणं, नवरं मनसाणं पुच्छा, सवेवि ताव होआ सचविहबंधगा एगविहबंधगा य अहवा सत्तविहबंधगा य एगविहबंधगा य छविहवंधते य अङ्कविहर्व ॥४९॥ ~97~ Page #98 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (१५) “प्रज्ञापना" - उपांगसूत्र-४ (मूलं+वृत्ति:) पदं [२६], -------------- उद्देशक: [-], ------------- दारं [-], -------------- मूलं [३०१] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र-[१५]उपांगसूत्र-[४] "प्रज्ञापना" मूलं एवं मलयगिरि-प्रणीता वृत्ति: प्रत सूत्रांक [३०१] दीप धते य अबंधते य, एवं एते सत्तावीसं भंगा भाणितवा, एवं जहा वेदणिज तहा आउयं नाम गोयं च भाणितई, मोहI णिशं वेदेमाणे जहा णाणावरणि सहा भाणियई ॥ (मूत्र ३०१)पण्ण छत्रीसतिम पर्य समत्तम् ॥ २६ ॥ 'कति गं भंते ! इत्यादि गतार्थ, सम्प्रति किं कर्म वेदयमानः काः कर्मप्रकृतीभातीत्युदयेन सह बन्धस्य सम्बन्ध । चिचिन्तयिषुरिदमाह-'जीवे णं भंते ! णाणावरणिज कम्मं वेएमाणे कइ कम्मपगडीओ बंधई' इत्यादि सुगम, नवरं ज्ञानावरणीयं कर्म वेदयमान एकविधबन्धकः उपशान्तमोहः क्षीणमोहो वा न तु सयोगिकेवली, तस्य ज्ञानावरणीयोदयाभावात् , बहुवचनचिन्तायां षड्विधवन्धकाः सूक्ष्मसम्पराया एकविधवन्धका उपशान्तमोहक्षीणमो हाः कादाचित्का एकत्वादिना च भाज्या इत्युभयेषामप्यभावे सप्तविधवन्धका अपि अष्टविधवन्धका अपीत्येको IS भङ्गो, द्वयानामपि सदैव बदुत्वेन लभ्यमानत्वात् , ततः षडविधवन्धकपदप्रक्षेपे एकवचनबहुवचनाभ्यां द्वौ भकी. एवमेव द्वौ भङ्गावेक विधवन्धकप्रक्षेपेऽपि, उभयोरपि युगपत् प्रक्षेपे पूर्ववञ्चत्वार इति सर्वसाक्षया नव, नैरयिकादिषु तु पदेग्वेकेन्द्रियमनुष्यवर्जेषु बहुवचनचिन्तायां भङ्गत्रिक, अष्टविधबन्धकानां कादाचित्कतया एकत्वादिना भाज्य-19 तया च लभ्यमानत्वात् , एकेन्द्रियेष्वभङ्गक, सप्तविधबन्धका अष्टविधबन्धका अपीति, उभयेषामपि सदा बहुत्वेन प्राप्यमाणत्वात् , मनुष्येषु तु सप्तविंशतिर्भङ्गाः, अष्टविधवन्धकपड्डिधवन्धकएकविधबंधकानां कादाचित्कतया एकवादिना भाज्यमानतया लभ्यमानत्वात् , तत्रामीपामभावे सप्तविधवन्धका इत्सेको मङ्गः, ततोऽष्टविधवन्धकपदप्र- Remeseseaeeseceneededese अनुक्रम [५४८] ~98~ Page #99 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (१५) “प्रज्ञापना" - उपांगसूत्र-४ (मूलं+वृत्ति:) पदं [२६], -------------- उद्देशक: [], ------------- दारं [-], -------------- मूलं [३०१] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र-[१५]उपांगसूत्र-[४] "प्रज्ञापना" मूलं एवं मलयगिरि-प्रणीता वृत्ति: प्रत सूत्रांक [३०१] प्रज्ञापना या। मलयवृत्ती. ॥४९६॥ दीप क्षेपे एकवचनबहुवचनाभ्यां द्वौ द्वौ, षड्विवन्धकप्रक्षेपे द्वौ, एकविधबन्धकप्रक्षेपे सति सप्त, ततोऽष्टविधवन्धक- २६कमेवेषड्विधवन्धकपदप्रक्षेपे चत्वारः, अष्टविधवन्धकैकविधवन्धकपदप्रक्षेपे चत्वारः, षड्विधबन्धकएकविधवन्धकपदप्रक्षेपेऽपि चत्वारः, एकोनविंशतिः, ततोऽष्टविधवन्धकषड्विघबन्धकैकविधबन्धकपदानां युगपत् प्रक्षेपेऽष्टाविति सप्त-IN | सू.१०१ विंशतिः, वेदनीयसूत्रे एकविधवन्धकः सयोगिकेवल्यपि, तस्यापि वेदनीयोदयबन्धसम्भवात् , अबन्धकोऽयोगिकेवली, तस्य योगाभावतो वेदनीयं वेदयमानस्यापि तद्वन्धासम्भवाद्, वेदनीयसूत्रे एकवचनबहुवचनचिन्तायां जीवपदे । नव भकाः तत्र सप्तविधवन्धकाष्टविधवन्धकैकविधबन्धकानां सदैव बद्दत्वेन लभ्यमानत्वात् बहुवचनात्मके इतरप-1 दद्वयाभावे एकः, ततः षड्विधबन्धकपदप्रक्षेपे एकवचनबहुवचनाभ्यां द्वौ एवमेव द्वावेकविधवन्धकपदप्रक्षेपे चत्वार। उभयपदप्रक्षेपे इति । मनुष्यपदे सप्तविंशतिः, तत्र हि सप्तविधबन्धका एकविधबन्धका एकेन बहुत्वेन सदावस्थिता इतरे तु त्रयोऽप्यष्टविधबन्धकाः षड्विधवन्धकाः अवन्धकाश्च कादाचित्का एकत्यादिना च भाज्याः, ततस्तेषामभावे | सप्तविधबन्धका अप्येकविधवन्धका अपीसेको भनः, ततोऽष्टविधवन्धकपदप्रक्षेपे एकवचनबहुवचनाभ्यां द्वौ द्वौ पविधबन्धकपदप्रक्षेपे द्वावेकविधबन्धकपदप्रक्षेपे इति षट्, तथा त्रयाणां पदानां त्रयो द्विकसंयोगा एकैकस्मिन् द्विकसंयोगे एकवचनबहुवचनाभ्यां चत्वार इति द्विकसंयोगे द्वादश त्रिकसंयोगेऽष्टाविति सर्वसङ्ख्यया सप्तविंशतिः, एवमायुनामगोत्रसूत्राण्यपि भावनीयानि, मोहवेदनीयं कर्म वेदयमानो जीवः सप्सविधबन्धकोष्ष्टविधबन्धकः षड़ अनुक्रम [५४८] ॥४९॥ ~99~ Page #100 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (१५) “प्रज्ञापना” – उपांगसूत्र-४ (मूलं+वृत्ति:) पदं [२६], -------------- उद्देशक: -,------------- दारं -1, -------------- मूलं [३०१] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र-[१५]उपांगसूत्र-[४] "प्रज्ञापना" मूलं एवं मलयगिरि-प्रणीता वृत्ति: प्रत सूत्रांक [३०१] दीप विधवन्धको वा, सूक्ष्मसम्परायावस्थायामपि मोहनीयवेदनसम्भवात् , एवं मनुष्यपदेऽपि वक्तव्यं, नरकादिषु तु पदेषु सप्तविधवन्धकोऽष्टविधवन्धको वेत्येवं वक्तव्यं, सूक्ष्मसम्परायत्वाभावतः षड्विधबन्धकत्वासम्भवात्, बहुवचनचिन्तायां जीवपदे भात्रिक, तत्र सूक्ष्मसम्परायाः कादाचित्का इतरे च द्वये सदैव बहुत्वेन लभ्यन्ते इति षड्विधबन्धकपदाभावे सप्तविधवन्धका अपि अष्टविधवन्धका अपीत्येको भङ्गः, ततः षविधवन्धकपदप्रक्षेपे एकवचनबहुवचनाभ्यां द्वावेतो भङ्गाविति, नैरयिकादिषु स्तनितकुमारपर्यवसानेषु सप्तविधबन्धकाः सदा बहुत्वेनावस्थिताः, अष्टविधवन्धकास्तु कादाचित्का एकत्वादिना च भाज्या इति, अष्टविधबन्धकपदाभावे सप्तविघबन्धका इत्येको भङ्गः, ततोऽष्टविधबन्धकपदप्रक्षेपे एकवचनबहुवचनाभ्यां द्वाविति, पृथिव्यादिषु तु पञ्चखप्यभङ्गक सप्तविधवन्धका अपि अष्टविधवन्धका अपीति, उभयेषामपि तेषु सदा बहुत्वेन लभ्यमानत्वात् , द्वित्रिचतुरिन्द्रियतिर्यपञ्चेन्द्रियेषु न्यन्तरज्योतिष्कवैमानिकेषु च नैरयिकवत् भङ्गत्रिकं, मनुष्येषु नव भकाः, तत्र सप्तविधबन्धका इत्येको भङ्गस्ततोऽष्टविधबन्धकपदप्रक्षेपे एकवचनबहुवचनाभ्यां द्वौ द्वौ षड्विधबंधकपदप्रक्षेपे एकवचनबहुवचनाभ्यां चत्वारः उभयपदप्रक्षेपे इति, तथा चाह-"मोहणिजं वेएमाणे जहा [बंधे] णाणावरणिज तहा भाणियब'मिति ॥ इति |श्रीमलयगिरिविरचितायां षड्विंशतितमं वेदवन्धाख्यं पदं समाप्तम् ।। अनुक्रम [५४८] Nirauasaram.org अत्र पद (२६) "कर्मवेदबन्ध" परिसमाप्तम् ~100~ Page #101 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (१५) “प्रज्ञापना” – उपांगसूत्र-४ (मूलं+वृत्ति:) पदं [२७], -------------- उद्देशक: -,------------- दारं --------------- मूलं [३०२] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र-[१५]उपांगसूत्र-[४] "प्रज्ञापना" मूलं एवं मलयगिरि-प्रणीता वृत्ति: 3739 २७कर्मवे प्रत सूत्रांक [३०२] प्रज्ञापनाया मलयवृत्ती. ॥४९७॥ दीप अथ सप्तविंशतितमं कर्मप्रकृतिवेदवेदपदं ॥२७॥ Dece दवेदपर्द संप्रति सप्तविंशतितममारभ्यते, तत्रेदमादिसूत्रम् सू. ३०१ कति णं भंते ! कम्मपगडीओ पं० १, गो! अह, त-पाणा० जाव अंतराइयं, एवं नेरइयाणं जाव वेमाणिवाणं, जीवे णं भंते ! णाणावरणिज कम्मं वेदेमाणे कति कम्मपगडीतो वेदेति , गो! सत्तविहवेयए वा अढविहवेयए वा, एवं मनसेवि, अवसेसा एगणवि पुहुनेणवि णियमा अट्ट कम्मपगडीतो वेदेति जाव वेमाणिया, जीवा गं भंते! णाणावरणिज वेदेमाणा कति कम्मपगडीतो वेदेति ?, गो! सबेवि ताव होजा अट्टविहवेदगा, अहवा अट्टविहवेदगा य सचविहवेदगे य अहवा अढविहवेदगा य सचवि०, एवं मणूसावि, दरिसणावरणिज्ज अंतराइयं च एवं चेव भाणितर्व, वेदणिजं आउपनामगोत्तातिं वेदेमाणे कति कम्मपगडीओ वेएति', गो! जहा बंधगवेदगस्स वेयणिजं तहा भाणितवाणि, जीवे णं भंते ! मोहणिज्ज वंदेमाणे कति कम्मपगडीतो वेदेति , गो! नियमा अट्ठ कम्मपगडीतो वेदेति, एवं नेरतिए जाव वेमाणिते, एवं पुहत्तेणवि (मूत्रं ३०२)॥ पण्णवणाए भगवईए सत्तावीसइमं पयं समचं ॥ २७ ॥ KI 'कई णं भंते।' इत्यादि गतार्थ, सम्प्रति किं कर्म वेदयमानः कति कर्मप्रकृतीर्वेदयते इत्युदयस्योदयेन सह सम्ब-14 ४९७॥ न्धं चिन्तयति-'जीवे णं भंते ! णाणावरणिजं कम्मं वेएमाणे कइ कम्मपगडीओ वेएई' इत्यादि, तत्र सप्तविधवे-1 अनुक्रम [५४९] SARERatin international अथ पद (२७) "कर्मप्रकृतिवेदवेद" आरब्धम् ~101~ Page #102 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (१५) “प्रज्ञापना” – उपांगसूत्र-४ (मूलं+वृत्ति:) पदं [२७], -------------- उद्देशक: [-], ------------- दारं -1, -------------- मूलं [३०२] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र-[१५]उपांगसूत्र-[४] "प्रज्ञापना" मूलं एवं मलयगिरि-प्रणीता वृत्ति: प्रत सूत्रांक [३०२] दीप दक उपशान्तमोहः क्षीणमोहो वा, तयोर्मोहनीयोदयासम्भवात् , शेषस्तु सूक्ष्मसंपरायादिरष्टविधवेदकः, एवं मनुष्यपदेऽपि वाच्यं, नैरयिकादयस्तु नियमादष्टविधवेदकाः, बहुवचनचिन्तायां जीवपदे मनुष्यपदे च भङ्गत्रिक, तत्र सर्वेऽपि तावद् भवेयुः अष्टविधवेदका इयेको भङ्गः, ततः सप्तविधवेदकस्यैकस्य भावे द्वितीयो बहूनां भावे तृ-1 तीयः, शेषेषु तु नैरयिकादिषु पदेषु अभङ्गमष्टविधवेदका इति, सप्तविधवेदकत्वस्य तत्रासम्भवात् , एवं दर्शनावरणीयान्तरायसूत्रेऽपि वक्तव्यं, वेदनीयसूत्रे जीवपदे मनुष्यपदे च प्रत्येकमष्टविधवेदको वा सप्लविधवेदको वा चतुविधवेदको वेति वक्तव्यं, शेषेषु तु नैरयिकादिषु अष्टविधवेदक इलेकः, तेषामुपशान्तमोहत्याद्यवस्थासम्भवात्, तत्रैव वेदनीयसूत्रे बहुवचनचिन्तायां जीवपदे मनुष्यपदे च प्रत्येकं भकत्रिकं, तत्राष्टविधवेदकाश्चेत्येको भङ्गा, एष सर्वथा सप्तविधवेदकानामभावे, ततः सप्तविधवेदकपदप्रक्षेपे एकवचनबहुवचनाभ्यां द्वौ भङ्गाविति, शेषेषु तु नैरयिकादिषु स्थानेष्यभनक अष्टविधवेदका इति, एवमायुर्नामगोत्रसूत्राण्यपि भावनीयानि, मोहनीयं कर्म वेदयमानो नियमादष्टविधवेदक इति, जीवादिषु पञ्चविंशती पदेष्वेकवचनचिन्तायां बहुवचनचिन्तायां च सर्वत्रापि अभङ्गक-अष्टी | कर्मप्रकृतीर्वेदयते वेदयन्ते वा॥ इति श्रीमलयगिरिविरचितायां प्र. वेदवेदाख्यं सप्तविंशतितमं पदं समाप्तम् ॥२७॥ अनुक्रम [५४९] अत्र पद (२७) "कर्मप्रकृतिवेदवेद" परिसमाप्तम् ~102 Page #103 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (१५) “प्रज्ञापना" - उपांगसूत्र-४ (मूलं+वृत्ति:) पदं [२८], -------------- उद्देशक: [१], -------------दारं --------------- मूलं [३०३] + गाथा: पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र-[१५]उपांगसूत्र-[४] "प्रज्ञापना" मूलं एवं मलयगिरि-प्रणीता वृत्ति: प्रत सूत्रांक [३०३-३०४] recene प्रज्ञापनाया मलयवृत्ती. ॥४९॥ Sectatoes गाथा: अथ अष्टविंशतितमं आहारपदं ॥२८॥ M२८आहारपदे उहे शः१नारतदेवमुक्तं वेदवेदाख्यं सप्तविंशतितमं पदं, सम्प्रत्यष्टाविंशतितममारभ्यते, तस्य चायममिसम्बन्धः-इहानन्तरपदे । |काणामानारकादिगतिसमापन्नानां कर्मवेदनापरिणाम उक्तः, इह त्वाहारपरिणाम इति, तत्र चेमे सङ्ग्रहणिगाथे हारादि सचित्तापहारट्ठी २ केवति ३ किं वावि ४ सबतो चेव ५। कतिभागं ६ सवे ७ खलु परिणामे ८ चव योद्धये ॥ १॥ एगिदियसरी सू.३०३ रादी लोमाहारो तहेव मणभक्खी । एतेसिं तु पदाणं विभावणा होति कातदा ॥२॥नेरइया णं भंते ! किं ! सचिचाहारा अचित्ताहारा भीसाहारा, गो० नो सचित्ताहारा अचित्ताहारा नो मीसाहारा, एवं असुरकुमारा जाव वेमाणिया, ओरालियसरीरा जाव मणूसा सचित्ताहारावि अचिचाहारावि मीसाहारावि । नेरहया णं भंते ! आहारट्ठी , हन्ता आहारही, नेरइयाण भंते ! केवतिकालस्स आहारट्टे समुप्पज्जति', गोनेरइयाणं दुविधे आहारे पण्णते, तं०-आभोगनिवतिते य अणाभोगनिबत्तिते य, तत्थ णं जे से अणाभोगनिवत्तिते से णं अणुसमयमविरहिते आहारवे समुप्पअति, तत्थ णं जे से आभोगनिवतिते से णं असंखिज्जसमतिए अंतोमुहुत्तिते आहारट्टे समुप्पज्जति, नेरहया णं भंते ! किमाहारमाहारें H ॥४९८॥ ति, गो! दबतो अणंतपदेसियाति खेचओ असंखेजपदेसोगाढाति कालतो अण्णायरहिइयाति भावओ वष्णमंताति गंधमंताई रसमंताई फासमंताई, जाई भावतो वण्णमंताई आहारेति ताई कि एगवण्णातिं आहारैति जाव किं पंचवण्णाई दीप अनुक्रम [५५०-५५३]] अथ पद (२८) "आहार" आरब्धम् अथ (२८) आहार-पदे उद्देशक: (१) आरब्ध: ~103~ Page #104 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (१५) “प्रज्ञापना" - उपांगसूत्र-४ (मूलं+वृत्ति:) पदं [२८], -------------- उद्देशक: [१], -------------दारं --------------- मूलं [३०३] + गाथा: पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र-[१५]उपांगसूत्र-[४] "प्रज्ञापना" मूलं एवं मलयगिरि-प्रणीता वृत्ति: प्रत सूत्रांक [३०३-३०४] Barastrasae गाथा: आहारैति, गो०1 ठाणमम्गणं पटुच्च एगवणाईपि आहारेंति जाव पैचवष्णाईपि आहारैति, विहाणमम्गणं पडुच्च कालवण्णाईपि आहारैति जाव सुकिल्लाईपि आहारेंति, जातिं वण्णतो कालवणाति आहारेति ताई कि एगगुणकालाई आहारेंति जाव दसगुणकालाई आ० संखिज्ज असंखिजगुणकालाई आ० जाव अर्णतगुणकालाई आ०, गो०! एगगुणकालाईपि आ० जाव अर्णतगुणकालाईपि आ० एवं जाव मुकिल्लाई, एवं गंधतोवि रसतोवि, जाई भावओ फासमंताई ताई नो एगफासाई आoनो दुफासाई आ० नो तिफासाई आहारेति चउफासाई आहारेंति, जाव अट्ठफासाइंपि आ०, विभागमग्गणं पडुछ कक्खडाइपि आ० जाव लुक्खाई, जाति फासतो कक्खडातिं आ० ताई कि एगगुणकक्खडाई आ० जाव अणंतगुणकक्खडाई आ०१, गो०! एगगुणकक्खडाईपि आ० जाव अणंतगुणकक्खडाईपि आ०, एवं अहवि फासा माणितबा, जाब अणतगुणलुक्खाइपि आ०, जाति भंते ! अर्णतगुणलुक्खाई आ० ताई किं पुट्ठाई आ० अपुट्ठाई आ०१, गो! पुढाई आ० नो अपुढाई आ०, जहा भासुद्देसए जाव णियमा छद्दिसि आ०, ओसणं कारणं पडच वण्णओ कालनीलातिं गंधओ दुब्भिगंधाति रसओ तित्तरसकडुयाई फासओ कक्खडगुरुयसीयलुक्खाई तेसिं पोराणे वण्णगुणे गंधगुणे रसगुणे फासगुणे विपरिणामइत्ता परिपीलइत्ता परिसाडइत्ता परिविद्धंसदत्ता अण्णे अपुवे वण्णगुणे गंधगुणे रसगुणे फासगुणे उप्पाइता आयसरीरखेनोगाढे पोग्गले सबप्पणयाए आहारं आहारैति । नेरइया णं भंते ! सबओ आहारति सबओ परिणामंति सबओ ऊससंति सबओ नीससंति अभिक्खणं आहारैति अभिक्खणं परिणामंति अभिक्खणं ऊससंति अभिक्खणं नीससंति आहच आहारैति आहच्च परिणामेति आहच ऊससंति आहच नीससंति , हंता! गो। णेरहया सब coctseeरएर दीप अनुक्रम [५५०-५५३]] gatraamay SARERatanthlaliraana ~ 104~ Page #105 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (१५) “प्रज्ञापना" - उपांगसूत्र-४ (मूलं+वृत्ति:) पदं [२८], -------------- उद्देशक: [१], ------------- दारं [-],-------------- मूलं [३०३-३०४] + गाथा: पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र-[१५]उपांगसूत्र-[४] "प्रज्ञापना" मूलं एवं मलयगिरि-प्रणीता वृत्ति: प्रत सूत्रांक [३०३ प्रज्ञापनायाः मलय. वृत्ती. २८आहारपदे उद्दे| शः१असु रादीनामाहारादि सू.३०४ -३०४] ॥४९९॥ तो आहारैति एवं तं चेव जाव आहच्च नी। नेरइया णं भंते ! पोग्गले आहारचाते गिण्हति ते णं तेसिं पोग्गलाणं सेयालंसि कतिभागं आहारेति कतिभागं आसाएंति ?, गो! असंखेजतिभागं आ० अणंतभागं अस्साएंति, नेरझ्या णं भंते ! जे पोग्गले आहारचाते गिण्हंति ते किं सत्वे आहारेंति नो सवे आहारैति?, गो. ते सत्वे अपरिसेसए आहारैति । नेरइया णं भंते जे पोग्गला आहारत्ताए गिण्हंति ते णं तेसिं पोग्गला कीसत्ताए भुजो २ परिणामेति !, गो०! सोतिदियत्ताते जाव फार्सिदियचाते अणिहत्ताले अकंतत्ताए अण्यिाहत्ताए अमणुण्णचाए अमणामत्ताते अणिच्छियचाते अभिज्झित्ताए अहत्वाते नो उद्धचाए दुक्खचाते नो सुहत्ताते एतेसि भुज्जो२ परिणमंति (सूत्रं ३०३) असुरकुमारा णं भंते ! आहारट्ठी!, हंता ! आहारट्टी, एवं जहा नेरइयाणं तहा असुरकुमाराणवि भाणितवं, जाब तेसिं भुञ्जो २ परिणमंति, तत्थ गंजे से आभोगनिवचिते से णं जहण्णेणं चउत्थभत्तस्स उक्कोसेणं सातिरेगवाससहस्सस्स आहारट्टे समुप्पजद, ओसणं कारणं पदुच वण्णतो हालिहसुकिल्लातिं गंधतो सुम्भिगंधाति रसतो अंबिलमहुराति फासओ मउयलहुयनिझुण्हार्ति, तेर्सि पोराणे वण्णगुणे जाव फासिदियचाते जाव मणामताते इच्छियचाते भिज्झियचाते उद्धृत्ताते नो अहत्ताए सुहचाए नो दुहत्ताए एतेसि भुजओ २ परिणमंति, सेसं जहा नेरहयाण, एवं जाब थणियकुमाराणं, गवरं आभोगनिवत्तिते उकोसेणं दिवसपुहुत्तस्स आहारट्टे समुप्पजति (सूत्रं ३०४) . गाथा: CSEASESee R४९९॥ दीप अनुक्रम [५५०-५५३]] 'सचित्ताहारट्ठी' इत्यादि प्रथमोऽधिकारः सचिचपदोपलक्षितः, स चैवम्-'नेरइया णं भते! किं सचिमाहारा ~105 Page #106 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (१५) “प्रज्ञापना” – उपांगसूत्र-४ (मूलं+वृत्ति:) पदं [२८], -------------- उद्देशक: [१], ------------- दारं [-],-------------- मूलं [३०३-३०४] + गाथा: पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र-[१५]उपांगसूत्र-[४] "प्रज्ञापना" मूलं एवं मलयगिरि-प्रणीता वृत्ति: प्रत सूत्रांक [३०३ -३०४] गाथा: अचित्ताहारा इत्यादि १, द्वितीय आहारार्थिन इति २, तृतीयः 'केवइय'त्ति कियता कालेन आहारार्थः समुत्पद्यते इत्यादिरूपः ३, चतुर्थः किमाहारमाहारयन्तीतिपदोपलक्षितः ४ पञ्चमः सर्वत इतिपदोपलक्षितः, स चैवम्'नरइया णं सबतो परिणामंती'त्यादि ५ चेवशब्दः समुच्चये, 'कहभाग'ति गृहीतानां पुद्गलानां कतिभागमाहारयन्तीत्येवमादिः षष्ठोऽधिकारः६, 'तथा सो' इति यान् पुद्गलान् आहारतया गृहन्ति तान् किं सर्वान्-अपरिशेषान् आहारयन्ति उतासर्वान् इत्येवमुपलक्षितः सप्तमोऽधिकारः ७, तथाऽष्टमोऽधिकारः परिणामः-परिणामरूपो बोद्धव्या, स चैवम्-'नेरइया णं भंते ! जे पोग्गले आहारत्ताए गेण्हति ते णं तेसिं पुग्गला कीसत्ताए भुजो २ परिणा|मंती'सादिरूपः ८ नवमोऽर्थाधिकारः एकेन्द्रियादीनि शरीराणि. स चैवम-'नेरइया णं भंते । किं एगिदियसरी-I राई आहारेंति जाव पंचिंदियसरीराई आहारैति ? ९, दशमोऽधिकारो लोमाहारो-लोमाहारवक्तव्यतारूपः १०, | एकादशी मनोभक्षितवक्तव्यतारूपः ११, 'एएसिं तु' इत्यादि, एतेषां सामान्यतोऽनन्तरमुदिष्टानां पदाना-अथोधि-18 काराणां विभावना-विस्तरतः प्रकाशना नाम भवति कर्त्तव्यता, सूत्रकारवचनमेतत् । प्रतिज्ञातमेव निर्वाहवितुकामो 'यथोद्देशं निर्देश' इति न्यायात् प्रथमाधिकार विभावयति-'नेरइया णं भंते ! इत्यादि, नैरयिका भदन्त ! कि सचित्ताहारा-सचित्तमाहारयन्तीति सचित्ताहाराः, एवमचित्ताहारा मिश्राहारा इसपि भाक्नीयं, भगवानाह-1 'गौतमे'सादि, इह बैक्रियशरीरिणो वैक्रियशरीरपरिपोषयोग्यान् पुद्गलानाहारयन्ति, ते चाचित्ता एव सम्भवन्ति न दीप अनुक्रम [५५०-५५३] X SAREauratoninternational ~106~ Page #107 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (१५) “प्रज्ञापना” – उपांगसूत्र-४ (मूलं+वृत्ति:) पदं [२८], -------------- उद्देशक: [१], ------------- दारं [-],-------------- मूलं [३०३-३०४] + गाथा: पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र-[१५]उपांगसूत्र-[४] "प्रज्ञापना" मूलं एवं मलयगिरि-प्रणीता वृत्ति: प्रत सूत्रांक [३०३-३०४] शाश्असु गाथा: प्रज्ञापना- जीवपरिगृहीता इत्यचित्ताहारा न सचित्ताहारा नापि मिश्राहाराः, एवमसुरकुमारादयः स्तनितकुमारपर्यवसाना भव-18 |२८आहाया मल नपतयो व्यन्तरा ज्योतिष्का वैमानिकाच वेदितव्याः, औदारिकशरीरिणः पुनरौदारिकशरीरपरिपोषयोग्यान् पुद्गला-18 य.पृचौ. नाहारयन्ति, ते च पृथिवीकायिकादिपरिणामपरिणता इति सचित्ताहारा अचित्ताहारा मिश्राहाराश्च घटन्ते, तथा ॥५०॥ चाह-ओरालियसरीरा जाव मणूसा' इत्यादि, औदारिकशरीरिणः पृथिवीकायिकेभ्य आरभ्य यावन्मनुष्याः, किमुक्तं भवति ?-पृथिव्यप्तेजोवायुवनस्पतिरूपा एकेन्द्रिया द्वित्रिचतुःपञ्चेन्द्रिया मनुष्याश्च एते प्रत्येकं सचित्ताहारा माहारादि IS अप्यचित्ताहारा अपि मिश्राहारा अपि वक्तव्याः । उक्तः प्रथमाधिकारः, सम्प्रति द्वितीयादीनष्टमपर्यन्तान् सप्ताधि-1 सू.३०४ | कारान् चतुर्विंशतिदण्डकक्रमेण युगपदभिधित्सुः प्रथमतो नैरयिकाणामभिदधाति-नेरइया 'मित्यादि, नैरयिका Iणमिति वाक्यालङ्कारे, भदन्त ! आहारार्थिनः, काकाऽभिधानतः प्रश्नार्थत्वावगतिः, भगवानाह-हंते'त्यादि, ह-1 न्तेत्यनुमती अनुमतमेतत्, गौतम ! आहारार्थिनो नैरयिका इति, यदि आहारार्थिनस्ततो भदन्त ! नैरयिका गमिति पूर्ववत् 'केवइकालस्स'त्ति प्राकृतत्वात् तृतीयार्थे षष्ठी, कियता कालेन आहारार्थ:-आहारलक्षणं प्रयोजनं आहाराभिलाष इतियावत् समुत्पद्यते ?, भगवानाह-'गौतम ! इत्यादि, नैरयिकाणां द्विविधो-द्विप्रकारः आहारः, तद्यथा-आभोगनिर्त्तितोऽनाभोगनिवर्तितश्च, तत्र आभोगनमाभोगः-आलोचनमभिसन्धिरित्यर्थः आभोगेन निर्वर्जितः-उत्पादित आभोगनिवर्तित आहारयामीतीच्छापूर्व निर्मापित इतियावत् , तद्विपरीतोऽनाभोगनिवर्तितः, दीप अनुक्रम [५५०-५५३]] ॥५०॥ ~107~ Page #108 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (१५) “प्रज्ञापना” – उपांगसूत्र-४ (मूलं+वृत्ति:) पदं [२८], -------------- उद्देशक: [१], ------------- दारं [-],-------------- मूलं [३०३-३०४] + गाथा: पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र-[१५]उपांगसूत्र-[४] "प्रज्ञापना" मूलं एवं मलयगिरि-प्रणीता वृत्ति: प्रत सूत्रांक [३०३-३०४] गाथा: आहारयामीति विशिष्टेच्छामन्तरेण यो निष्पाधते प्राब्ट्रकाले प्रचुरतरमूत्राद्यभिव्यङ्ग्यशीतपुद्गलाद्याहारवत् सोऽनाभोगनिर्वर्तित इति भावः, 'तत्थ णमित्यादि, तत्र-अनाभोगाभोगनिवर्णितयोर्मध्ये योऽसावनाभोगनिवर्तित आहारः 'से णमिति पूर्ववत् 'अनुसमयं प्रतिसमय समये २ इत्यर्थः, इह च दीर्घकालोपभोग्यस्याहारस्यैकवारमपि ग्रहणे तावन्तं कालमनुसमयं भवति, तत आभवपर्यन्तं सातत्यग्रहणप्रतिपादनार्थमाह-अविरहित आहारार्थः समुत्पद्यते, अथवा सततप्रवृत्ते आहारार्थेऽपान्तराले चुक्कस्खलितन्यायेन येन कथञ्चित् विरहभावेऽपि लोके तदगणनया लाअनुसमयमिति व्यवहारः प्रवर्त्तते ततोऽपान्तराले विरहाभावप्रतिपादनार्थमविरहित इत्युक्तं, अनुसमयमविरहितो नामोगनिर्मित आहारार्थः समुत्पद्यमानः ओजआहारादिना प्रकारेणावसेयः, 'तत्थ ण'मित्यादि, तत्र-आभोगानाभोगनिवर्तितयोर्मध्ये योऽसावाभोगनिर्वर्तितः आहारार्थः सोऽसङ्खयेयसामयिकः-असङ्ख्ययैः समयैर्निर्तितः, यच्चा|सङ्ख्येयसमयनिर्वर्तितं तज्जघन्यपदेऽप्यन्तर्मुहर्तिकं भवति न हीनमत आन्तर्मुहूर्तिक आहारार्थः समुत्पद्यते, किमुक्तं भवति ?,-अन्तर्मुहूर्त कालं यावत् प्रवर्तते न परतो, नैरयिकाणां हि योऽसावाहारयामीत्यभिलाषः स परिगृहीता हारद्रव्यपरिणामेन यजनितमतितीव्रतरं दुःखं तद्भावादन्तर्मुहू निवर्त्तते तत आन्तर्मुहूर्तिको नैरयिकाणामाहारार्थः, वानरइया णमित्यादि, नैरयिका णमिति पूर्ववत् किंखरूपमाहारमाहारयन्ति ?, भगवान् द्रव्यादिभेदतस्तमाहारयशान्तीति निरूपयितुकाम आह-'गोयमे त्यादि, गौतम! द्रव्यतो-द्रव्यखरूपपर्यालोचनायां अनन्तप्रादेशिकानि दीप अनुक्रम [५५०-५५३] Nirauasaram.org ~108~ Page #109 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम “प्रज्ञापना” – उपांगसूत्र-४ (मूलं+वृत्ति:) पदं [२८], -------------- उद्देशक: [१], ------------- दारं [-],-------------- मूलं [३०३-३०४] + गाथा: पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र-[१५]उपांगसूत्र-[४] "प्रज्ञापना" मूलं एवं मलयगिरि-प्रणीता वृत्ति: प्रत सूत्रांक प्रज्ञापना- याः मलयवृत्ती. [३०३ -३०४] 1॥५०॥ गाथा: द्रव्याणि, अन्यथा ग्रहणासम्भवात् , न हि सङ्ख्यातप्रदेशात्मका असङ्ख्यातप्रदेशात्मका वा स्कन्धा जीवस्य ग्रहणयोग्या भवन्ति, क्षेत्रतोऽसङ्ख्येयप्रदेशावगाढानि कालतोऽन्यतरस्थितिकानि, जघन्यस्थितिकानि मध्यमस्थितिकानि उ-18 रपदे उद्देस्कृष्टस्थितिकानि चेति भावार्थः, स्थितिरिति चाहारयोग्यस्कन्धपरिणामत्वेनावस्थानमवसेयं, भावतो वर्णवन्ति। शः१असुगंधवन्ति रसवन्ति स्पर्शवन्ति च, प्रतिपरमावेकैकवर्णगन्धरसस्पर्शभावात् , 'जाई भावतो वण्णमंताई' इत्यादि प्रश्न-19 रादीनासूत्रं सुगम, भगवानाह-गो.! ठाणमग्गणं पडु'त्यादि, तिष्ठन्ति विशेषा अस्मिन्निति स्थानं-सामान्यमेकवर्णामाहासाद द्विवर्ण त्रिवर्णमित्यादिरूपं तस्य मार्गणं-अन्वेषणं तत्प्रतीत्य सामान्यचिन्तामाश्रित्येति भावार्थः, एकवर्णान्यपि द्विव |सू.३०४ दीन्यपि इत्यादि सुगम, नवरं तेषामनन्तप्रादेशिकानां स्कन्धानामेकवर्णत्वं द्विवर्णत्वमित्यादि व्यवहारनयमतापेक्षया, निश्चयनयमतापेक्षया त्वनन्तप्रादेशिकस्कन्धोऽणीयानपि पञ्चवर्ण एव प्रतिपत्तन्यः, 'विहाणमग्गणं पडुचे'त्यादि, विविक्तम्-इतरव्यवच्छिन्नं धान-पोषणं खरूपस्य यत् तद्विधान-विशेषः कृष्णो नील इत्यादिप्रतिनियतो वर्णादिविशेष इतियावत् तस्य मार्गणं प्रतीत्य तानि कालवर्णान्यपि आहारयन्तीत्यादि सुगम, नवरमेतदपि व्यवहारतः प्रतिपत्तव्यं, निश्चयतः पुनरवश्यं तानि पञ्चवर्णान्येव, 'जाई वषणओ कालवष्णाइंपी'त्यादि सुगम, यावद् 'अन- ५०१॥ न्तगुणसुकिलाईपि आहारेंति' एवं गंधरसस्पर्शविषयाण्यपि सूत्राणि भावनीयानि, 'जाई भंते ! अणंतगुणलुक्खाई' इत्यादि, यानि भदन्त ! अनन्तगुणरूक्षाणि, उपलक्षणमेतत् एकगुणकालादीन्यपि आहारयन्तीति, तानि च भदन्त ! दीप अनुक्रम [५५०-५५३] 25 ~109~ Page #110 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (१५) “प्रज्ञापना” – उपांगसूत्र-४ (मूलं+वृत्ति:) पदं [२८], -------------- उद्देशक: [१], ------------- दारं [-],-------------- मूलं [३०३-३०४] + गाथा: पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र-[१५]उपांगसूत्र-[४] "प्रज्ञापना" मूलं एवं मलयगिरि-प्रणीता वृत्ति: प्रत सूत्रांक [३०३-३०४] elesedeseeeeeserverses - गाथा: किं स्पृष्टानि-आत्मप्रदेशविषयाण्याहारयन्ति उतास्पृष्टानि ?, भगवानाह-स्पृष्टानि नो अस्पृष्टानि 'जहा भामुद्देसए वा जाय नियमा छद्दिसिं'ति अत ऊर्व यथा भाषोद्देशके प्राक् सूत्रमभिहितं तथात्रापि द्रष्टव्यं, तत्र तावत् यावत् नियमा छहिसिंति पदं, तथैवम् 'जाई पुट्ठाई' आहा 'ताई भंते ! किं ओगाढाई आहा० अगोगाढाई आहारैति', गो! ओगाढाई आहारेंति णो अणोगाढाई आहारेंति, जाई भंते ! ओगाढाई आहारेंति ताई कि अणंतरोगाढाई आ० परंपरोगाढाई आहारैति ?, गो! अणंतरोगाढाई आoनो परंपरोगाढाई आ०, जाई भंते ! अणंतरोगाढाई। आ० ताई भंते ! किं अणूई आहारेंति बादराई आ०१, गो० अणूईपि आ० बादराईपि आहा०,जाई भंते ! अणूइंपि आहारैति बादराईपि आ० ताई किं उहं आ. अहे आहा०तिरिय आहारति ?, गो० उहृपि आ० अहेवि आ. तिरियपि आहारेंति, जाई भंते ! उहृपि आ० अहेवि आहा तिरियपि आहारति ताई किं आदि आ० मज्झे आ० पज्जवसाणे आ०१, गो०! आदिपि आहारैति मज्झेवि आ० पजवसाणेवि आहारति जाई भंते! आईपि आहारैति कमज्झेवि आहारति पजवसाणेवि आहारति ताई भंते ! किं सविसए आहारैति अविसए आ०१, गो० सविसए आ० नो अविसए आजाई भंते ! सचिसए आताई किं आणुपुषीए आहारेन्ति अणाणुपुबीर आ०१, गो ! आणुपुवीए आ० नो अणाणुपुषीए आ० जाई भंते ! आणुपुर्षिाताईकिं तिदिसिं आहारैति चउदिसि आहा.पंचदिसिं आहारति हिसिं आहारेंति ?,गो नियमा छहिर्सि आ०, अस्य व्याख्या-इहात्मप्रदेशः संस्पर्शनमात्मप्रदेशावगाढक्षेत्रावहिरपि दीप अनुक्रम [५५०-५५३] Hirelunurary.orm ~110~ Page #111 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (१५) “प्रज्ञापना” – उपांगसूत्र-४ (मूलं+वृत्ति:) पदं [२८], -------------- उद्देशक: [१], ------------- दारं [-],-------------- मूलं [३०३-३०४] + गाथा: पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र-[१५]उपांगसूत्र-[४] "प्रज्ञापना" मूलं एवं मलयगिरि-प्रणीता वृत्ति: प्रत सूत्रांक [३०३-३०४] प्रज्ञापना- या:मल1.वृत्ती . ॥५०॥ सम्भवति ततः प्रश्नयति-'जाई भंते' इत्यादि, यानि भदन्त ! स्पृष्टान्याहारयन्ति तानि किं अवगाढानि-आत्म-२८आहाप्रदेशैः सह एकक्षेत्रायस्थायीनि उत अनवगाढानि-आत्मप्रदेशावगाहक्षेत्रावहिरवस्थितानि?, भगवानाह-पी- रपदे उद्देतम ! अवगाढान्याहारयन्ति नानवगाढानि, यानि भदन्तावगाढान्याहारयन्ति तानि भदन्त ! किमनन्तरावगाढानि, शः१असु[किमुक्तं भवति ?-येष्वात्मप्रदेशेषु यान्यव्यवधानेनावगाढानि तैरात्मप्रदेशस्तान्येवाहारयन्ति उत परम्परावगाढा- बाना नि-एकद्वित्रयाद्यात्मप्रदेशव्यवहितानि', भगवानाह-गौतम! अनन्तरावगाढानि आहारयन्ति नो परम्परावगा | महारादि |सू. ३०४ ढानि, यानि भदन्तानन्तरावगाढान्याहारयन्ति तानि किमणूनि-स्तोकान्याहारयन्ति उत बादराणि-प्रभूतप्रदेशोपचितानि ?, भगवानाह-गौतम ! अणून्यप्याहारयन्ति बादराण्यप्याहारयन्ति, इहाणुत्ववादरत्वे तेषामेवाहारयोग्यानां स्कन्धानां प्रदेशस्तोकत्ववाहुल्यापेक्षया वेदितव्ये इति, यानि भदन्त । अणुन्यप्याहारयन्ति तानि भदन्त ! किमूर्व-ऊर्ध्वप्रदेशस्थितान्याहारयन्ति अधस्तियग्वा, इह ऊर्ध्वाधस्तियक्त्वं यापति क्षेत्रे नैरयिकोऽवगाढः तावत्येव क्षेत्रे तदपेक्षया परिभावनीयं, भगवानाह'-गौतम! ऊर्ध्वमप्याहारयन्ति-ऊर्ध्वप्रदेशावगाढान्यायाहारयन्ति एवम-18 धोऽपि तिर्यगपि, यानि भदन्त ! ऊर्ध्वमप्याहारयन्ति अधोऽप्याहारयन्ति तिर्यगप्याहारयन्ति तानि किमादावाहा- ५०२॥ | रयन्ति मध्ये आहारयन्ति पर्यवसाने आहारयन्ति, अयमत्राभिप्रायः-नैरयिका हि अनन्तप्रदेशिकानि द्रव्याण्यन्तर्मुहूचे कालं यावत् उपभोगोचितानि गृह्णन्ति, ततः संशयः किमुपभोगोचितस्य कालस्यान्तर्मुहुर्तप्रमाणस्थादी-प्रथमसमये seiseocrisesearera गाथा: दीप अनुक्रम [५५०-५५३] ~111~ Page #112 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम “प्रज्ञापना” – उपांगसूत्र-४ (मूलं+वृत्ति:) पदं [२८], -------------- उद्देशक: [१], ------------- दारं [-],-------------- मूलं [३०३-३०४] + गाथा: पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र-[१५]उपांगसूत्र-[४] "प्रज्ञापना" मूलं एवं मलयगिरि-प्रणीता वृत्ति: प्रत सूत्रांक [३०३-३०४] गाथा: आहारयन्ति उत मध्ये-मध्येषु समयेषु आहोश्चित्पर्यवसाने-पर्यवसानसमये?, भगवानाह-गौतम ! आदावपि मध्येऽपि पर्यवसानेऽप्याहारयन्ति, किमुक्तं भवति ?-उपभोगोचितस्य कालस्यान्तर्मुहूर्तप्रमाणस्यादिमध्यावसानेषु समयेष्वाहारयन्तीति, यानि भदन्त ! आदावपि मध्येऽपि पर्यवसानेऽप्याहारयन्ति तानि भदन्त ! किं खविषयाणिखोचिताहारयोग्यानि आहारयन्ति उत अविषयाणि-खोचिताहारायोग्यान्याहारयन्ति ?, भगवानाह-गौतम ! खविषयाण्याहारयन्ति नो अविषयाण्याहारयन्ति, यानि भदन्त ! खविषयाण्याहारयन्ति तानि भदन्त ! किमानुपूर्व्या आहारयन्ति अनानुपूर्व्या ?, आनुपूर्वीनाम यथासन्नं तद्विपरीता अनानुपूर्वी, भगवानाह-गौतम ! आनुपूा, सूत्रे आशा द्वितीया तृतीयार्थे वेदितव्या प्राकृतत्वात् , यथा आचाराने 'अगणिं च पुट्ठा' इत्यत्र, आहारयन्ति नो अनानुपूर्या, ऊर्ध्वमधस्तिर्यग्वा यथासन्नं नातिक्रम्याहारयन्तीति भावः, यानि भदन्त ! आनुपूर्व्या आहारयन्ति तानि कि 'तिदिसिं'ति तिस्रो दिशः समाहृताखिदिक् तस्मिन् व्यवस्थितान्याहारयन्ति चतुर्दिशि पञ्चदिशि पदिशि वा, इह लोकनिष्कुटपर्यन्ते जघन्यपदे त्रिदिगव्यवस्थितमेव प्राप्यते न द्विदिग्व्यवस्थितमेकदिग्व्यवस्थितं वा अतस्त्रिदिश आरभ्य प्रश्नः कृतः, भगवानाह---गौतम ! नियमात् षड्दिशि व्यवस्थितान्याहारयन्ति, नैरयिका हि त्रसनाड्या मध्ये व्यवस्थिताः, तत्र चावश्यं षड्दिसंभव इति, 'ओसण्णकारणं पडुचे'त्यादि, ओसन्नशब्दो बाहुल्यवाची, यथा| 'ओसन्नं देवा सायावेयणं वेदयन्ती'त्यत्र, ओसन्नकारणं-बाहुल्यकारणं प्रतीत्य, किं तद्बाहुल्यकारणमिति चेत्, सरन्यायाSESeconcer दीप अनुक्रम [५५०-५५३]] Auditurary.com ~112~ Page #113 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (१५) “प्रज्ञापना” – उपांगसूत्र-४ (मूलं+वृत्ति:) पदं [२८], -------------- उद्देशक: [१], ------------- दारं [-],-------------- मूलं [३०३-३०४] + गाथा: पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र-[१५]उपांगसूत्र-[४] "प्रज्ञापना" मूलं एवं मलयगिरि-प्रणीता वृत्ति: प्रत सूत्रांक [३०३ प्रज्ञापनाया: मलयवृत्ती. -३०४] ॥५०॥ गाथा: उच्यते, अशुभानुभाव एव, तथापि प्रायो मिथ्यादृष्टयः कृष्णादीन्याहारयन्ति न तु भविष्यत्तीर्थकरादयः तत ओस-२८आहानेत्युक्तं, वर्णतः कालनीलानि गन्धतो दुरभिगन्धानि, रसतस्तितकटुकानि स्पर्शतः कर्कशगुरुशीतरूक्षाणि इत्यादि पदे उद्देतेपामाहार्यमाणानां पुद्गलानां 'पुराणान्' अग्रेतनान् वर्णगुणान् गन्धगुणान् रसगुणान् स्पर्शगुणान् 'विपरिणा- शः१असुमहत्ता परिवीलइत्ता परिसाडइत्ता परिविद्धंसइत्ता' एतानि चत्वार्यपि पदानि एकार्थिकानि विनाशार्थप्रतिपादकानि रादीनानानादेशजविनेयानुग्रहार्थमुपातानि, विनाश्य किमित्याह-अन्यान् अपूर्वान् वर्णगुणान् गन्धगुणान् रसगुणान् माहारादि स्पर्शगुणान् उत्पाद्य आत्मशरीरक्षेत्रावगाढान् पुद्गलान् 'सबप्पणया' सर्वात्मना सर्वेरेवात्मप्रदेशैराहारमाहाररूपान आहारयन्ति, 'नेरइया णं भंते ! इत्यादि प्रश्नसूत्र सुगम, 'नेरइया णं भंते! जे पोग्गला' इत्यादि, नैरयिका णमितिपूर्ववत्, भदन्त ! यान् पुद्गलान् आहारतया गृहन्ति नैरयिकाः तेषां गृहीतानां पुद्गलानां 'सेकालंसि' एण्यत्काले ग्रहणकालोत्तरकालमित्यर्थः 'कइभागं'ति कतिथं भागमाहारयन्ति-आहारतयोपभुञ्जते !, तथा 'कतिभागं' कतिथं |भागमाहार्यमाणपुद्गलानामाखादं गृह्णन्ति, नहि सर्वे पुद्गला आहार्यमाणा आखादमायान्तीति पृथक प्रश्ना, भगवा-| नाह-गीतम 1 असलवयं भागमाहारयन्ति, अन्ये तु गवादिप्रथमबृहदग्रासग्रहण इव परिशटन्ति, आहायमाणानां| पुद्गलानामनन्तभागमाखादयन्ति, शेषास्त्वनासादिता एव शरीरपरिणाममापद्यन्ते इति, 'नेरइया णं भंते।' इत्यादि, ५०३॥ नैरयिकाः णमिति पूर्ववत् यान् युगलान् आहारतया गृहन्ति, इह ग्रहणं विशिष्टमवसेयं, ततो ये उज्झितशेषाः दीप अनुक्रम [५५०-५५३] ~113~ Page #114 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (१५) “प्रज्ञापना” – उपांगसूत्र-४ (मूलं+वृत्ति:) पदं [२८], -------------- उद्देशक: [१], ------------- दारं [-],-------------- मूलं [३०३-३०४] + गाथा: पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र-[१५]उपांगसूत्र-[४] "प्रज्ञापना" मूलं एवं मलयगिरि-प्रणीता वृत्ति: प्रत सूत्रांक [३०३-३०४] गाथा: केवला आहारपरिणामयोग्या एवावतिष्ठन्ते तेऽत्राहारतया गृह्यमाणाः पृष्टा द्रष्टव्याः, अन्यथा निर्वचनसूत्रमपेक्ष्य पूर्वापरविरोधप्रसको, न च भगवद्वचने विरोधसम्भावनाऽप्यस्ति, तत इदमेव व्याख्यानं सम्यक, अत एवंविधपूर्वा|परविरोधाशङ्काब्युदासाथै पूर्वसरिभिः कालिकसूत्रस्यानुयोगः कृतः, उक्तं च- "जं जह सुत्ते भणियं तहेव तं जा वियालणा नस्थि । किं कालियाणुजोगो दिवो दिटिप्पहाणेहिं ? ॥१॥"[यद्यथा सूत्रे भणितं तथैव तद् यदि |विचारणा नास्ति । किं कालिकानुयोगो रष्टिप्रधानैदृष्टः । ॥१॥] तान् किं सर्वान् आहारयन्ति उत नोसर्वान सबैकदेशभूतान्', भगवानाह-तान् सर्वान्-अपरिशेषानाहारयन्ति, उज्झितशेषाणामेव केवलानामाहारपरिणामयो-K | ग्यानां गृहीतत्वात् , 'नेरइया 'मित्यादि, नैरयिकाः णमितिपूर्ववत् यान् पुद्रलान् आहारतया गृह्णन्ति ते पुद्गलाः णमिति पूर्ववत् ते तेषां नेरयिकाणां कीहक्तया-किंखरूपतया भूयो भूयः परिणमन्ते', भगवानाह-गौतम! श्रोत्रेन्द्रियतया यावत्करणात् चक्षुरिन्द्रियतया माणेन्द्रियतया जिद्धेन्द्रियतयेति परिग्रहः, स्पर्शनेन्द्रियतया, इन्द्रियरूपतयापि परिणममानान शुभरूपाः किन्त्वेकान्ताशुभरूपाः, यत आह-'अणिहत्ताते' इत्यादि, इष्टा-मनसा इच्छाविषयीकृताः, यथा शोभनमिदं जातं यदित्थमिमे परिणता इति, तद्विपरीता अनिशास्तद्भावस्तत्वा तया, इह किञ्चित् | परमार्थतः शुभमपि केपाश्चिदनिष्टं भवति यथा मक्षिकाणां चन्दनकर्पूरादि तव आह-'अकंतचाए' न कान्ताःकमनीया अकान्ता अत्यन्ताशुभव गपितत्वात् , अत एवाप्रियतया न प्रिया अप्रियाः, दर्शमापातकालेऽपि न प्रिय दीप अनुक्रम [५५०-५५३]] Hirwastaram.org ~114~ Page #115 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (१५) “प्रज्ञापना” – उपांगसूत्र-४ (मूलं+वृत्ति:) पदं [२८], -------------- उद्देशक: [१], ------------- दारं [-],-------------- मूलं [३०३-३०४] + गाथा: पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र-[१५]उपांगसूत्र-[४] "प्रज्ञापना" मूलं एवं मलयगिरि-प्रणीता वृत्ति: प्रत सूत्रांक प्रज्ञापनायाः मलयवृत्ती. [३०३ -३०४] ॥५०४॥ गाथा: द्विमात्मन्युत्पादयन्तीति भावः, तद्भावोऽप्रियता तया, 'असुभत्ताए' इति न शुभा अशुभा अशुभवर्णगन्धरसस्पर्शात्म-18 २८आहा. कत्वात् तद्भावस्तत्ता तया, 'अमणुन्नत्ताए' इति न मनोज्ञा अमनोज्ञाः, विपाककाले दुःखजनकतया न मनःप्रल्हाद- रपदे उद्देहेतव इति भावः, तद्भावस्तत्ता तया, 'अमणामत्ताए' भोज्यतया मनः आमुवन्तीति मनापाः, प्राकृतत्वाच पकारस्यशः१असुमकारत्वे मणाम इति सूत्रे निर्देशः, न मनापा अमनपा, न जातुचिदपि भोज्यतया जन्तूनां मनापीभवन्तीति रादीनाभावस्तद्भावस्तत्ता तया, अत एव 'अणिच्छियत्ताए' इति अनीप्सिततया भोज्यतया खादितमीष्टा ईप्सिता न ईप्सि- माहासाद ता अनीप्सितास्तदायस्तत्ता तया, 'अभिज्झियत्ताए' अभियानमभिध्या, अभिलाष इत्यर्थः, अभिध्या सजाता एच्चि सू. ३०४ ति अभिध्यितास्तारकादिदर्शनादितप्रत्ययः तद्भावस्तत्ता तया, किमुक्तं भवति ?-ये गृहीता आहारतया पुद्गला न ते तृप्तिहेतवोऽभूवन्निति न पुनरभिलपणीयत्वेन परिणमन्ते, तथा 'अहत्ताए' इति अधस्तया, गुरुपरिणामतयेति भावः, नो ऊर्वतया-लघुपरिणामतया, अत एव दुःखतया गुरुपरिणामपरिणतत्वात् , न सुखतया लघुपरिणामपरिणतत्वाभावात्, ते पुद्गलास्तेषां नैरयिकाणां भूयो भूयः परिणमन्ते । एतान्येव आहारार्थिन इत्यादीनि सप्त द्वाराणि असुरकु-11 मारादिषु भवनपतिपु चिचिन्तयिपुरिदमाह-'जहा नेरइयाण मित्यादि, यथा नैरयिकाणां तथा असुरकुमाराणामपि VIT५०४॥ भाणितव्यं, यावत् 'तेसि भुजो २ परिणमन्तीति पर्यन्तपदं, तत्र नैरयिकसूत्रादस्य सूत्रस्य विशेषमुपदर्शयति-'तत्थ गंजे से' इत्यादि, एवं चोपदर्शितं सूत्रं न मन्दमतीनां यथास्थितं प्रतीतिमागच्छति ततस्तदनुग्रहाय सूत्रमुपदश्यते-- दीप अनुक्रम [५५०-५५३] Nirauasaram.org ~115~ Page #116 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (१५) “प्रज्ञापना” – उपांगसूत्र-४ (मूलं+वृत्ति:) पदं [२८], -------------- उद्देशक: [१], ------------- दारं [-],-------------- मूलं [३०३-३०४] + गाथा: पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र-[१५]उपांगसूत्र-[४] "प्रज्ञापना" मूलं एवं मलयगिरि-प्रणीता वृत्ति: प्रत सूत्रांक [३०३-३०४] गाथा: 'असुरकुमाराणं भंते ! आहारट्ठी, हंता आहारट्ठी, असुरकुमारा गं भंते! केवइकालस्स आहारट्टे समुष्पज्जई', अत्र सप्तम्यर्थ षष्ठी, कियति काले अतिक्रान्ते सति भूय आहारार्थः समुत्पद्यते इत्यर्थः, 'असुरकुमारा णं दुविहे आहारे पं० तंजहा-आभोगनिवत्तिए अणाभोगनिवत्तिए य, तत्थ णं जे से अणाभोगनिषत्तिए से णं अणुसमयमविरहिए आहारट्टे समुष्पज्जा, तत्थ णं जे से आभोगनिवत्तिए से णं जहण्णेणं चउत्थभत्तस्स उक्कोसेणं साइरेगस्स वाससहस्सलस्स आहारट्टे समुपज्जद' तत्र 'चउत्थभत्तस्सेति' सप्तम्यर्थे षष्ठी, चतुर्थभक्ते आगमिकीयं संज्ञा, एकस्मिन् दिवसेऽति कान्ते इत्यर्थः, भूयो जघन्येनाहारार्थः समुत्पद्यते, एतच दशवर्षसहस्रायुषां प्रतिपत्तव्यमुत्कर्षतः सातिरेके-अभ्यधिक वर्षसहस्रेऽतिक्रान्ते, एतच्च सागरोपमायुषामवसेयं, 'असुरकुमाराणं भंते ! किमाहारमाहारयन्ति', गो० दधतोऽणंतप्पएसियाई खेतो असंखेजपएसोगाढाई कालओ अन्नयरहिइयाई भावओ वण्णमंताई गंधमंताई रसमंताई। फासमंताई जाब नियमा छद्दिसि आहारेंति, ओसन्नं कारणं पडुच्च वण्णओ हालिद्दसुकिलाई, गंधओ सुरभिगंधाई, रसओ अंबिलमहुराई फासओ मउयलहुनिडुण्हाई, तेर्सि पोराणे वण्णगुणे गंधगुणे रसगुणे फासगुणे जाव इच्छियत्ताए अभिज्झियत्ताए उद्धत्ताए नो अहत्ताए सुखत्ताए नो दुहत्ताए य तेसिं भुजो २ परिणमंति', यथा चासुरकुमाराणां सूत्रमुक्तं तथा नागकुमारादीनामपि स्तनितकुमारपर्यवसानानां वक्तव्यं, नवरमाभोगनिवर्त्तिताहारार्थचिन्तायामुत्कर्षाभिधानावसरे 'उक्कोसेणं दिवसपुत्तस्स आहारट्टे समुप्पजई' इति वक्तव्यं, एतच पल्योपमासयेयभागायुषां दीप अनुक्रम [५५०-५५३] ~116~ Page #117 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (१५) “प्रज्ञापना" - उपांगसूत्र-४ (मूलं+वृत्ति:) पदं [२८], -------------- उद्देशक: [१], ------------- दारं [-],-------------- मूलं [३०३-३०४] + गाथा: पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र-[१५]उपांगसूत्र-[४] "प्रज्ञापना" मूलं एवं मलयगिरि-प्रणीता वृत्ति: प्रत सूत्रांक [३०३ २८आहागरपदे उद्देशः१पृव्यादीनामाहारादिसू.३०५ -३०४] गाथा: प्रज्ञापना-18 तदधिकायुषां चावसेयं, शेषं तथैव, तथा चाह, एवं जाव थणियकुमाराण'मित्यादि । सम्प्रति पृथिवीकायिकाना- याः मल- मतान् सप्ताधिकारान् चिन्तयितुकाम आह-. यवृत्ती. पुढविकाइया णं भंते ! आहारट्ठी ?, हता! आहारट्ठी, पुढविकाइयाणं भंते ! केवतिकालस्स आहारढे समुप्पजति ?, गो.! ॥५०५॥ अणुसमयमविरहिते आहारवे समुप्पज्जा, पुढविकाइया णं भंते! किमाहारमाहारेंति, एवं जहा नेरइयाण जाव ताई कतिदिसि आहारेति !, गो० ! निवाघातेणं छद्दिसि वाघायं पडुच्च सिय तिदिसि सिय चउदिसि सिय पंचदिर्सि, नवरं ओसन्न कारणं न भण्णति, चण्णओ कालनीललोहितहालिद्दसुकिल्लातिं गंधतो सुन्भिगंधदुभिगंधाति रसतो तित्तरसकडुयरसकसायरसअंबिलमहुराई फासतो कक्खडफासमउयगुरुयलहुयसीतउण्हणिद्धलुक्खातिं तेर्सि पोराणे वणगुणे सेसं जहा नेरइयाणं जाव आहछ नीससंति, पुडविकाइया णं भंते ! जे पोग्गले आहारचाते गिण्हंति तेसिं भंते ! पोग्गलाणं सेवालंसि कतिभागं आहारेंति कतिभागं आसाएंति ? गो! असंखेजतिभागं आहारति अर्णतभागं आसाएंति, पुढ विकाइया णं भंते ! जे पोग्गले आहारचाते गिण्हंति ते किं सवे आहारति नोसवे आहारेंति जहेब नेरइया तहेव, पुढविकाइया णं भंते ! जे पोग्गले आहारत्ताते गिण्हति ते णं वेसि पुग्गला कीसचाए भुजो २ परिणमंति?, गो! फासिदियवेमायचाते भुजो २ परिणमंति, एवं जाव वणफइकाइया। (सूत्रम् ३०५) 'पुढविकाइया णं भंते !' इत्यादि सबै पूर्ववद् भावनीयं, नवरं 'निवाघाएणं छदिसिमित्यादि, व्याघातो नाम ॥५०५१ दीप अनुक्रम [५५०-५५३] ~117~ Page #118 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (१५) “प्रज्ञापना" - उपांगसूत्र-४ (मूलं+वृत्ति:) पदं [२८], -------------- उद्देशक: [१], ------------- दारं [-], -------------- मूलं [३०५] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र-[१५]उपांगसूत्र-[४] "प्रज्ञापना" मूलं एवं मलयगिरि-प्रणीता वृत्ति: प्रत सूत्रांक [३०५]] SA920 दीप अनुक्रम [५५४] अलोकाकाशेन प्रतिस्खलनं, व्याघातस्याभावो निर्व्याघातं 'शब्दे यथावदव्ययं पूर्वपदार्थे नित्यमव्ययीभाव' इत्यव्ययीभावः 'तेन वा तृतीयाया' इति विकल्पेन अम्विधानात् पक्षेऽत्रामभावः, नियमादवश्यतया पड्दिशि व्यवस्थि|तानि, पड्भ्यो दिग्भ्य आगतानि द्रव्याण्याहारयन्तीति भावः, व्याघातं पुनः प्रतीत्य लोकनिष्कुटादौ स्यातू-कदाचित्रिदिशि-तिसृभ्यो दिग्भ्य आगतानि कदाचिच्चतुर्दिग्भ्यः कदाचित्पञ्चदिग्भ्यः, काऽत्र भावनेति चेत्, उच्यते, इह लोकनिष्कुटे पर्यन्ताधस्त्यप्रतरानेवकोणावस्थितो यदा पृथिवीकायिको वर्तते तदा तस्याधस्तादलोकेन व्याप्तत्वात् अधोदिक्पुद्गलाभावः, आग्नेयकोणावस्थितत्वात् पूर्वदिक्पुद्गलाभावो दक्षिणदिपुद्गलाभावश्च, एवमधःपूर्वदक्षिणरूपाणां तिसृणां दिशामलोकेन ध्यापनात् ता अपास्य या परिशिष्टा ऊच्चों अपरा उत्तरा च दिगव्याहता वर्तते तत आगतान् पुगलान् आहारयति, यदा पुनः स एव पृथिवीकायिका पश्चिमां दिशं अमुञ्चन् पर्त्तते तदा सापर्वदिगभ्यधिका जाता द्वे च दिशौ दक्षिणाधस्त्यरूपे अलोकेन व्याहते इति स चतुर्दिगागतान पदलानाहारयति.II यदा पुनरूर्व द्वितीयादिप्रतरगतपश्चिमदिशमवलम्ब्य तिष्ठति तदा अधस्त्यापि दिगभ्यधिका लभ्यते केवलदक्षि-18 वाणका पर्यन्तवर्तिनी अलोकेन व्याहतेति पञ्चदिगागतान् पुद्गलानाहारयतीति, शेषं सूत्रं समस्तमपि पूर्ववद् भणनीयं, यस्तु विशेषस्तमुपदर्शयति-नवरं 'उस्सण्णकारणेणं ण हवई' इत्यादि सुगम, 'फासिंदियवेमायचाए' इति विषमा मात्रा विमात्रा तस्या भावो विमात्रता तया इष्टानिष्टनानाभेदतयेति भावो, न तु नारकाणामेकान्ताशुभतया Related ~118~ Page #119 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (१५) “प्रज्ञापना" - उपांगसूत्र-४ (मूलं+वृत्ति:) पदं [२८], -------------- उद्देशक: [१], ------------- दारं [-], -------------- मूलं [३०५] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र-[१५]उपांगसूत्र-[४] "प्रज्ञापना" मूलं एवं मलयगिरि-प्रणीता वृत्ति: प्रत सूत्रांक [३०५]] प्रज्ञापना- याः मल- य०वृत्ती शः १२. ||५०६॥ दीप अनुक्रम [५५४] सराणां च शुभतयेवेति, एवं 'जाव वणस्सइकाइयाणति यथा पृथिवीकायिकाना सूत्रमुक्तमेवमसेजोवायुवनस्पतीना-ISIREआहामपि भणनीयं, सर्वेषामपि सकललोकव्यापितया विशेषाभावात् । रपदे उद्देबेईदिया ण भंते ! आहारट्ठी, हता! आहारट्ठी, बेइंदियाण मते केवतिकालस्स आहारट्टे समुप्पजति ,जहा नेरइयाणं, ३०६ नवरं तत्थ गंजे से आमोगनिवत्तिते सेणं असंखिज्जसमइए अंतोमुहुत्तिए वेमायाए आहारहे समुप्पजति, सेसं जहा पुढविकाइयाण, जाव आहथ नीससंति, नवरं नियमा छद्दिसिं, बेईदियाण मंते ! • पुच्छा, गो०! जे पोग्गले आहारचाते गिपहंति ते तेसि पुग्गलाणं सियालंसि कतिभागं आहारति कतिभागं आसाएंति , एवं जहा नेरइयाणं, बेईदियार्ण भंते ! जे पोग्गला आहारत्ताए गिण्हंति ते किं सवे आहारेंति णो सो आहारैति, गो०1 बेईदियाणं दुविधे आहारे पं०,०लोमाहारे य पक्खेवाहारे य, जे पोग्गले लोमाहारचाए गिण्हंति ते सच्चे अपरिसेसे आहारैति, जे पोग्गले पक्खेवाहारत्ताए गेण्हंति तेसिमसंखेजतिभागमाहारेंति अणेगाई च णं भागसहस्साई अफासाइजमाणाणं अणासाइजमाणाणं विद्धसमागच्छंति, एतेसिणं भंते पोग्गलाणं अणासाइजमाणाणं अफासाइजमाणाण य कयरे २ हितो अप्पा वा ४, गो०। सवत्थोवा पोग्गला अणासाइजमाणा अफासाइजमाणा अर्णतगुणा, बेइंदियाणं भंते ! जे पोग्गला आहारत्ताते पुच्छा, गो!. ५०६॥ जिभिदिय० फासिंदियवेमायत्ताए तेसिं भुओ २ परिणमंति, एवं जाव चउरिदिया, पवरं गाईचणं भागसहस्साई अणापाइलमाणाई अणासाइजमाणाई अफासाइजमाणाई विद्धंसमागच्छंति, एतेसि गं भंते ! पोग्गलाणं अणापाइलमाणा ~119~ Page #120 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (१५) “प्रज्ञापना" - उपांगसूत्र-४ (मूलं+वृत्ति:) पदं [२८], -------------- उद्देशकः [१], ------------- दारं -], -------------- मूलं [३०६] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र-[१५]उपांगसूत्र-[४] "प्रज्ञापना" मूलं एवं मलयगिरि-प्रणीता वृत्ति: प्रत सूत्रांक [३०६] TOलडक दीप अनुक्रम [५५५] णं अणासाइजमाणाणं अफासाइजमाणाण य कयरेर हितो अप्पा वा ४१, गो०- सवयोवा पोग्गला अणापाइजमाणा अणासाइजमाणा अर्णतगुणा अफासाइजमाणा अणंतगुणा, तेइंदियाण मंते ! जे पोग्गला पुच्छा, गो० ते णं पोग्गला पाणिदिय जिम्भिदिय० फार्सिदियवेमायत्ताए तेसिं भुजो२ परिणमंति, चउरिदियार्ण चक्खिदिय पाणिदिय जिभिदिय. फासिदियवेमायचाए तेर्सि मुजो २ परिणमंति, सेसं जहा तेईदियाण, पंचिंदियतिरिक्खजोणिया जहा तेईदियाण, णवर तत्थ गंजे से आमोगनिवतिते से जहण्णेणं अंतोमुहत्तस्स उको छहभत्तस्स आहारट्टे समुपजति, पंचिंदियतिरिक्खजोणि-. 'याण मंते जे पोग्गला आहा० पुच्छा, गो० सोतिदिय०चक्खिदियव्याणिदिय०जिम्मिवियफासिंदियवेमायचाए भुजो:२ : परिणमंति, मणसा एवं चेव, नवरं आभोगनिवचिते जह• अंतोमुत्तस्स उक्को० अहममत्तस्स आहारट्टे समुप्पजवि वाणमंतरा जहा नागकुमारा, एवं जोतिसियाचि, गवर आभोगनिवत्तिते जह० दिवसपुत्तस्स उ० दिवसाहत्तस्स- आहारडे समुप्पञ्जइ, एवं चेमाणियावि, नवरं आभोगनिवत्तिए ज०दिवसपुहुत्तस्स उ० तेत्तीसाए वाससहस्साणं आहारट्टे समुष्पजति, सेसं जहा असुरकुमाराणं जाव एतेसि भुजो २ परिणमंति, सोहम्मे आभोगनिवतिते ज.दिवसपहुचस्स उको. दोण्हं वाससहस्साणं आहारहे स०, ईसाणेण पुच्छा, गो० ज० दिवसपुत्तम सातिरेगस्स उ० सातिरेग दोहं वाससहस्साणं, सणकुमाराणं पुच्छा, गो० ज० दोण्हं वाससहस्साणं उ० सत्तहं वाससहस्साणं, माहिंदे पुच्छा, गो०! जहनेणं दोई वाससहस्साणं सातिरेगाणं उको सचण्हं वाससहस्साणं सातिरेगाणं, भलोए पुच्छा, गो. ज. सत्तव्हं वाससहस्साणं उ० दसव्ह वाससह, लंतएणं पुच्छा, मो० ज० दसहं वाससह उ० चउदसण्हं वाससह, महासु SARELatun international ~120 Page #121 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम “प्रज्ञापना" - उपांगसूत्र-४ (मूलं+वृत्ति:) पदं [२८], -------------- उद्देशक: [१], ------------- दारं [-], -------------- मूलं [३०६] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र-[१५]उपांगसूत्र-[४] "प्रज्ञापना" मूलं एवं मलयगिरि-प्रणीता वृत्ति: अज्ञापनाया:मलयवृत्ती. प्रत सूत्रांक [३०६] २८आहारपदे उद्दे ३०६ ॥५०७॥ के ण पुच्छा गो!ज. चउदसह वासस० उको सत्तरसण्डं वाससह, सहस्सारे पुच्छा, गो! जह० सत्तरसहं वासस० उ० अट्ठारसण्हं वाससह, आणए णं पुच्छा, गो० ज० अट्ठारसण्डं वाससह० उ० एगूणवीसाए वाससहस्साणं, पाणए णं पुच्छा, गो० ज० एगणवीसाए वास० उ० वीसाए वाससहस्साणं, आरणे णं पुच्छा, गो! ज० वीसाए वाससह उको एकवीसाए वाससह, अचुए णं पुच्छा गो.ज. एकपीसाए वाससह उको० बाषीसाए वा०, हिडिमहिडिमगेविअगाणं पुच्छा, गो० ज० बावीसाए वा० उको० तेवीसाए वा०,एवं सवत्थ सहस्साणि भाणियवाणि, जाव सम्बई, हिद्विममझिमगाणं पुच्छा, गो! ज. तेवीसाए उ० चउवीसाए, हेहिमउबरिमाणं पुच्छा, गो.! ज. चउवीसाए उ० पणवीसाए, मज्झिमहेहिमाणं पुच्छा, गो० ज० पण्णवीसाए उको छवीसाए, मज्झिममज्झिमाण पुच्छा, गो० ! ज० छवीसाए उ० सत्तावीसाए, मज्झिमउवरिमाणं पुच्छा, गो! जसत्तावीसाए उ० अट्ठावीसाए, उबरिमहेहिमाणं पुच्छा, गो० ज० अट्ठावीसाए उ० एगणतीसाए, उवरिममज्झिमाणं पुच्छा, गो० ज० एगणतीसाए उ० वीसाए, उवरिमउपरिमाणं पुच्छा, गो. ज.तीसाए उ० एगतीसाए, विजयवेजयंतजयंतअपराजियाण पुच्छा, गो० ! ज• एगतीसाए उको० तेतीसाए, सबढ़गसिद्धदेवाणं पुच्छा, गो.! अजहण्णमणुकोसेणं तेत्तीसाए वाससहस्सागं आहारट्टे समुप्पजति (मूत्र ३०६ ) 'बेइंदिया णं भंते !' इत्यादि सुगम, नवरं 'लोमाहारे पक्खेवाहारे' इति लोमभिराहारो लोमाहारः प्रक्षिप्य- meeteesses दीप अनुक्रम [५५५] ॥५०७॥ ~121 Page #122 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (१५) “प्रज्ञापना" - उपांगसूत्र-४ (मूलं+वृत्ति:) पदं [२८], -------------- उद्देशक: [१], ------------- दारं [-], -------------- मूलं [३०६] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र-[१५]उपांगसूत्र-[४] "प्रज्ञापना" मूलं एवं मलयगिरि-प्रणीता वृत्ति: प्रत सूत्रांक [३०६] दीप अनुक्रम [५५५] तेऽर्थात् मुखे इति प्रक्षेपः स चासावाहारश्च प्रक्षेपाहारः, तत्र यः खल्वोघतो वर्षादिषु पुद्गलप्रवेशो मूत्रादिगम्यः स लोमाहारः, कावलिकस्तु प्रक्षेपाहारः, तत्र यान् पुद्गलान् लोमाहारतया गृहाति तान् सर्वान्-अपरिशेषानाहारय-8 शान्ति, तेषां तथा २ खभावत्वात् , यान् पुद्गलान् प्रक्षेपाहारतया गृह्णन्ति तेषामसङ्ख्येयतमं भागमाहारयन्ति, अनेकानि पुनर्भागसहस्राणि-बहवोऽसङ्ख्यया भागा इति अस्पृश्यमानानामनाखाद्यमानानां विध्वंसमागच्छन्ति, किमु-1 तं भवति ?-बहूनि द्रव्याण्यन्तर्बहिश्व अस्पृष्टान्येवानाखादितान्येव च विध्वंसमायान्ति, नवरं यथायोग केचिदतिस्थौ-18 ल्यतः केचिदतिसौम्यत इति, सम्प्रत्यस्पृश्यमानानामनाखाद्यमानानां च परस्परमल्पबहुत्वमभिधित्सुराह-'एएसिणं भंते ! पुग्गलाणं अणासाइजमाणाण'मित्यादि, इह एकैकस्मिन् स्पर्शयोग्ये भागेऽनन्ततमो भाग आखाद्यो भवति, ततो येऽनास्वाद्यमानाः पुद्गलास्ते स्तोका एव, अस्पृश्यमानपुद्गलापेक्षया तेषामनन्तभागवर्तित्वात् , अस्पृश्य-1 मानास्तु पुद्गला अनन्तगुणाः, 'जिभिदियफासिदियवेमायचाए' इति विमात्राऽत्रापि प्राग्वद् भावनीया, 'एवं जाव चरिंदिया' एवं-द्वीन्द्रियोक्तप्रकारेण सूत्रं तावद् वक्तव्यं यावचतुरिन्द्रियाः-चतुरिन्द्रियगतं सूत्र, प्रायः समानवक्तव्यत्वात् , यस्तु विशेषः स उपदश्यते-'नवर'मित्यादि, यान् पुद्गलान् प्रक्षेपाहारतया गृह्णन्ति तेषां पुद्गलानामेकमसङ्ख्येयतमं भागमाहारयन्ति अनेकानि पुनर्भागसहस्त्राणि सङ्ख्यातीता असङ्ख्ययभागा इत्यर्थः अनाघ्रायमाणा|नि अस्पृश्यमाणानि अनास्खाद्यमानानि विध्वंसमागच्छन्ति, तानि च यथायोगमतिस्थौल्यतोऽतिसौक्षयतश्च वेदित 2020507002020002020200rnera ~122~ Page #123 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (१५) “प्रज्ञापना" - उपांगसूत्र-४ (मूलं+वृत्ति:) पदं [२८], -------------- उद्देशक: [१], ------------- दारं [-], -------------- मूलं [३०६] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र-[१५]उपांगसूत्र-[४] "प्रज्ञापना" मूलं एवं मलयगिरि-प्रणीता वृत्ति: प्रत सूत्रांक [३०६] प्रज्ञापनायामलब. वृसौ. ॥५०॥ दीप अनुक्रम [५५५] व्यानि, अत्रैवाल्पबहुत्वमाह-'एएसि णं भंते ! इत्यादि, इह एकैकस्मिन् भागे स्पर्शयोग्येऽनन्तमो भागः आखा- आहादयोग्यो भवति, तस्याप्यनन्तमो भाग आघाणयोग्यः, ततो यथोक्तमल्पबहुत्वं भवति, शेषं सर्वं सुगम, पश्चेन्द्रिय रपदे रहेसूत्रे-'जहणणेणं अंतोमुहुत्तस्सेति षष्ट्याः सप्तम्यर्थत्वादन्तर्मुहूतें गते सति भूय आहारार्थः समुत्पद्यते, उत्कर्षतः शः१. षष्ठभक्तेऽतिक्रान्ते, एतब देवकुरूत्तरकुरुतिर्यपञ्चेन्द्रियापेक्षया द्रष्टव्यं, मनुष्यसूत्रे 'उकोसेणं अट्ठमभचस्से'ति उत्कर्षतोऽष्टमभक्तेऽतिक्रान्ते, एतय ताखेव देवकुरूत्तरकुरुषु द्रष्टव्यं, व्यन्तरसूत्रे नागकुमारसूत्रवत् , ज्योतिषकसूत्रमपि तथैव, यस्तु विशेषस्तमुपदर्शयति'-नवरं जहण्णेण वि दिवसपुहुत्तस्स उक्कोसेणवि दिवसपुहुत्तस्स'त्ति, ज्योति-18 का हि जघन्यतोऽपि पल्योपमाष्टभागप्रमाणायुषस्ततस्तेषां जघन्यपदेऽप्युत्कृष्टपदेऽपि दिवसपृथक्त्वेऽतिकान्ते भूय आहारार्थः समुत्पद्यते, पल्योपमाष्टभागायुषां च खरूपत एक दिवसपृथक्त्वातिकमे भूय आहारार्थः समुत्पद्यते, वैमानिकसूत्रे 'नवरमाभोगनिवत्तिए जहणेणं दिवसपुटुसस्स' इति, एतत्पल्योपमाद्यायुषामबसेयं, 'उकोसेणं ते. तीसाए वाससहस्साणं'ति एतदनुत्तरसुराणामवसेयं, इह यस्य यावन्ति सागरोफ्माणि स्थितिस्तस्य तावत्सु वर्षसहस्रष्वतिक्रान्तेषु भूय आहारार्थः समुत्पद्यते, ततोऽमुं न्यायमाश्रित्य सौधर्मशानादिदेवलोकेषु जघन्यत उत्कर्षतच स्थितिपरिमाणं परिभाव्य वैमानिकसत्रं सकलमपि खयं विज्ञेयमिति । सम्प्रत्येकेन्द्रियशरीरादीनामधिकारमभिधित्सुराह| नेरहयाणं भंते ! किं एगिदियसरीराई आहारैति जाव पश्चिदियसरीराई आहारैति', गो० ! पूरभावपण्णवणं पद्धञ्च एमि IAL५.दा ~123~ Page #124 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (१५) “प्रज्ञापना" - उपांगसूत्र-४ (मूलं+वृत्ति:) पदं [२८], -------------- उद्देशकः [१], ------------- दारं -], -------------- मूलं [३०७] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र-[१५]उपांगसूत्र-[४] "प्रज्ञापना" मूलं एवं मलयगिरि-प्रणीता वृत्ति: प्रत सूत्रांक [३०७] दीप दियसरीराईपि आहारेंति जाव पंचिंदिय०, पडुपण्णभावषण्णवणं पडुच्च नियमा पंचिदियसरीरातिं आ०, एवं जाव थपियकुमारा, पुढविकाइयाण पुच्छा, गो० ! पुवभावपण्णवर्ण पडुच्च एवं चेव, पडुप्पण्णभावपणवणं पड्डुच्च नियमा एनिदियसरीराति, बेइंदिया पुपमावपण्णवणं पडच्च एवं पेव, पचप्पण्णभावपण्णवण प०नियमा बेइंदियाण सरीराति आ०, एवं जाव चरिंदिया ताव पवभावपण्णवर्ण पडुच्च, एवं पहप्पण्णभावपण्णवर्ण पद्धच नियमा जस्स जति. ईदियाई तईदियाई सरीराई आहारैति सेस जहा नेरझ्या, जाच बेमाणिता, नेरइया गं.भंते । कि लोमाहारा पक्खेवाहारा!, गो०लोमाहारा नो पक्खेवाहारा, एवं एगिदिया सबदेवा य भाणितधा, बेईदि० जाव मणसा लोभाहारावि पक्खेवाहारावि (सूत्र ३०७) 'नेरइया णं भंते!' इत्यादि प्रश्नसूत्र सुगम, निर्वचनसूत्रमाह-'गोयमे त्यादि, पूर्व:-अतीतो भावः पूर्वभावः तस्य प्रज्ञापना-अरूपणा तां प्रतीत्य एकेन्द्रियशरीराण्यपि यावत्करणात् द्वित्रिचतुरिन्द्रिक्शरीरपरिग्रहः, पञ्चेन्द्रियशरीराण्यप्याहारयन्ति, इयमत्र भावना-यदा तेषामाहार्यमाणानां पुद्गलानामतीतो भावः परिभाव्यते तदा ते केचित् कदाचित् एकेन्द्रियशरीरतया परिणता आसीरन् कदाचित् वीन्द्रियशरीरतया कदाचित् त्रीन्द्रियशरीरतया कदाचिच्चतुरिन्द्रियशरीरतया कदाचित् पञ्चेन्द्रियशरीरतया, ततो यदि पूर्वभावं इदानीमध्यारोप्य विवक्ष्यते तदा नैरयिका एकेन्द्रियशरीराण्यपि यावत्पश्चेन्द्रियशरीराण्यप्याहारयन्तीति भवति, पटुप्पन्नभावपण्णवणं पडुचे'त्यादि, प्रत्युत्पन्नो-वार्त्तमानिकः स चासी भावश्च प्रत्युत्पन्नभावस्तस्य प्रज्ञापना तां प्रतीत्य नियमाद-अवश्यतया पञ्चेन्द्रियशरीराण्याहारय अनुक्रम [५५६] eatreesecre । ~124~ Page #125 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (१५) “प्रज्ञापना" - उपांगसूत्र-४ (मूलं+वृत्ति:) पदं [२८], -------------- उद्देशक: [१], ------------- दारं [-], -------------- मूलं [३०७] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र-[१५]उपांगसूत्र-[४] "प्रज्ञापना" मूलं एवं मलयगिरि-प्रणीता वृत्ति: प्रत सूत्रांक [३०७] प्रज्ञापनाया: मलय. वृत्ती. १५०९॥ दीप |न्ति, कथमिति चेत्, उच्यते, इह प्रत्युत्पन्नभावप्रज्ञापनां करोति नयः ऋजुसूत्रो न शेषा नैगमादयः, ऋजुसूत्रश्च २८आहा|क्रियमाणं कृतं अभ्यवहियमाणमभ्यवहृतं परिणम्यमाणं परिणतमभ्युपगच्छति, अभ्यवाहियमाणाच पुद्गलास्ते उच्य- रपदे उद्देन्ते ये खशरीरतया परिणम्यमाना वर्चन्ते, अभ्यवहियमाणं चाभ्यवहृतं परिणम्यमानं च परिणतमिति तन्मतेन ख नसतेन ख- शः१सू. ३०७ शरीरमेवाभ्यवहियते खशरीरं च तेषां पञ्चेन्द्रियशरीरं पञ्चन्द्रियशरीरत्वात् तेषामत उक्तं नियमात् पञ्चेन्द्रियशरीराण्याहारयन्तीति, एवमसुरकुमारादयः स्तनितकुमारपर्यवसाना भवनपतयो वक्तव्याः, पृथिवीकायिकसूत्रे प्रत्युत्पनभावप्ररूपणाचिन्तायां नियमादेकेन्द्रियशरीराण्याहारयन्तीति वक्तव्यं, तेषामेकेन्द्रियतया तत्शरीराणामेकेन्द्रियशरीरत्वात्, एवं द्वीन्द्रियसूत्रे नियमात् वीन्द्रियशरीराण्याहारयन्तीति वक्तव्यं, त्रीन्द्रियसूत्रे नियमात् त्रीन्द्रियशरीरा|णि, चतुरिन्द्रियसूत्रे नियमात् चतुरिन्द्रियशरीराणि, तिर्यपञ्चेन्द्रिया मनुष्या व्यन्तरज्योतिष्कवैमानिकाश्च नैरविकवद् वक्तव्या, तथा चाह-'पुढविकाइयाणं पुच्छा' इत्यादि । अधुना लोमाहाराधिकारं विभावयिपुरिदमाह-नेरइया ण'मित्यादि सुगम, नवरं नैरयिकाणां प्रक्षेपाहारो न भवति, वैक्रियशरीराणां तथा खभावत्वात्, लोमाहारोऽपि पर्याप्तानामवसेयो नापर्यासानामिति, 'एवं एगिदिया' इत्यादि, एवं-नैरयिकोक्तप्रकारेण एकेन्द्रियाः--13 |थिव्यप्तेजोवायुवनस्पतयः सर्वे देवाश्च-असुरकुमारादयो याबद्वैमानिका भणितव्याः, तत्रैकेन्द्रियाणां प्रक्षेपाहाराभावो मुखाभावात्, असुरकुमारादीनां चैक्रियशरीरतया तथा खभावात्, द्वित्रिचतुरिन्द्रियास्तिर्यपञ्चेन्द्रिया अनुक्रम [५५६] ललललललल Scenseerator ~125 Page #126 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (१५) “प्रज्ञापना" - उपांगसूत्र-४ (मूलं+वृत्ति:) पदं [२८], -------------- उद्देशकः [१], ------------- दारं -], -------------- मूलं [३०७] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र-[१५]उपांगसूत्र-[४] "प्रज्ञापना" मूलं एवं मलयगिरि-प्रणीता वृत्ति: प्रत सूत्रांक [३०७] दीप मनुष्याश्च लोमाहारा अपि वक्तव्याः प्रक्षेपाहारा अपि, उभयरूपस्याप्याहारस्य तेषां सम्भवात् , चरममा-- धिकारमभिधित्सुराह नेरइया णं भंते । किं ओयाहारा मणभक्खी, गो.1 ओयाहारा णो मणभक्खी, एवं सचे ओरालियसरीरावि, देवा सवेवि जाव वेमाणिया ओयाहारावि मणभक्खीवि, तत्थ णं जे ते मणभक्खी देवा तेसि गं इच्छामणे समुप्पञ्जति इच्छामो णं मणभक्खणं करित्तते, तते णं तेहिं देवेहिं एवं मणसीकते समाणे खिप्पामेच जे पोग्गला इट्टा कंता जाव मणामा ते तेसिं मणभक्खत्ताए परिणमंति, से जहा नामए सीया पोग्गला सीयं पप्प सीयं चेव अतिवतिताणं चिट्ठति, उसिणा वा पोग्गला उसिणं पप्प उसिणं चेव अइबदत्ताणं चिट्ठति, एवामेव तेहिं देवेहि मणभक्खीकए समाणे से इच्छामणे खिप्पामेव अवेति (सूत्रं ३०८) आहारपयस्स पढमो उद्देसो समतो २३-१॥ 'नेरइया णं भंते ! इत्यादि, ओज-उत्पत्तिदेशे आहारयोग्यपुद्गलसमूहः, ओज आहारो येषां ते ओजआहाराः, मनसा भक्षयन्तीत्येवंशीला मनोमक्षिणः, तत्र नैरयिका ओजआहारा भवन्ति, अपर्याप्तावस्थायामोजस एवाहारस्थ सम्भवात् , मनोभक्षिणस्त्वेते न भवन्ति, मनोभक्षणलक्षणो थाहारः स उच्यते ये तथाविधशक्तिवशात् मनसा खशरीरपुष्टिजनकाः पुद्गला अभ्यवह्रियन्ते, यदभ्यवहरणानन्तरं तृप्तिपूर्वः परमसन्तोष उपजायते, न चैतन्त्रैरयिकाणामस्ति, प्रतिकूलकर्मोदयवशतः तथारूपशक्त्यभावात् , 'एवं सवे ओरालियसरीरावि' इति, एवं-नैरयि अनुक्रम [५५६] विटाएeecccsersesea ~126~ Page #127 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (१५) “प्रज्ञापना" - उपांगसूत्र-४ (मूलं+वृत्ति:) पदं [२८], -------------- उद्देशक: [१], ------------- दारं [-], -------------- मूलं [३०८] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र-[१५]उपांगसूत्र-[४] "प्रज्ञापना" मूलं एवं मलयगिरि-प्रणीता वृत्ति: प्रत सूत्रांक [३०८] दीप प्रज्ञापना- कोक्तेन प्रकारेण औदारिक शरीरिणोऽपि सर्वे पृथिवीकायिकादयो मनुष्यपर्यवसाना वक्तव्याः, तद्यथा-'पुढविका-INTRआहा या: मल- इया णं भंते ! किं ओयाहारा मनभक्खी ?, गोयमा ! ओयाहारा नो मणभक्खी'सादि, 'देवा' इत्यादि देवाः याव- रपदे उहेयवृत्ती. द्वैमानिका ओजाहारा अपि मनोभक्षिणोऽपि वक्तव्याः, तद्यथा-असुरकुमारा णं भंते ! किं ओयाहारा मनो- शः१सू. ॥५१०॥ भक्खी, गो. ओयाहारावि मणभक्खीवि, जाव वेमाणियाणं पुच्छा, गो.1 ओयाहारावि मणभक्खीवि।सम्प्र- ३०८ ति मनोभक्षित्वं देवानां यथा भवति तथोपदर्शयति-तत्थ णमित्यादि, तत्र-तेषु संसारिषु जीवेषु मध्ये, णमिति चाक्यालकारे ये मनोभक्षिणो देवास्तेषां णमिति वाक्यालकारे मनः प्रस्तावादाहारविषयं समुत्पद्यते, केनोलेखेन इत्यत आह-इच्छामः--अभिलषामो णमिति वाक्यालङ्कारे, मनोभक्षणमिति-मनसा भक्षणं मनोभक्षणं कलुमिति, तत एवं तैमनसि कृते-व्यवस्थापिते मनोभक्षणे सति तथाविधशुभकर्मोदयवशात् क्षिप्रमेव तत्कालमेति भावः, ये इष्टाः कान्ताः प्रिंया मनोज्ञा मनापा पुद्गलाः एतेषां व्याख्यानं प्राग्वत् तेषां देवानां मनोभक्षतया परिणमन्ते, कथमित्यत्रैव दृष्टान्तमाह-से जहानामए सेशब्दोऽयशब्दार्थः, स चात्र वाक्योपन्यासे, यथा नामेति विवक्षिताः शीताः पुदलाः शीतं-शीतयोनिकं प्राणिनं प्राप्य शीतत्वमेवातित्रज्य-अतिशयेन गत्वा तिष्ठन्ति, किमुक्तं भवति :-M५१०॥ । विशेषतः शीतीभूय शीतयोनिकस्य प्राणिनः सुखित्वायोपकल्पन्त इति, उष्णा वा पुद्गला उष्णं-उष्णयोनिकं। प्राप्य उष्णमेव-उष्णत्वमेवातित्रज्य-अतिशयेन गत्वा तिष्ठन्ति, विशेषतः खरूपलाभसम्पत्त्या तस्स सुखित्वायोप रस्कररहल अनुक्रम [५५७] For P OW ~127~ Page #128 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (१५) “प्रज्ञापना” – उपांगसूत्र-४ (मूलं+वृत्ति:) पदं [२८], -------------- उद्देशक: [१], ------------- दारं [-], -------------- मूलं [३०८] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र-[१५]उपांगसूत्र-[४] "प्रज्ञापना" मूलं एवं मलयगिरि-प्रणीता वृत्ति: प्रत सूत्रांक [३०८] दीप तिष्ठन्त इति भावः, 'एवमेव' अनेनैव प्रकारेण तैर्देवैः प्रागुक्तरीत्या मनोभक्षणे कृते सति स तेषां देवानामिच्छामन:-आहारविषयेच्छाप्रधान मनः क्षिप्रमेवापैति-तृप्तिभावानिवर्त्तते इति भावः, इयमत्र भावना-यथा शीतपुद्गलाः शीतयोनिकस्य प्राणिनः सुखित्वायोपकल्प्यन्ते उष्णपुद्गला वा उष्णयोनिकस्य तथा देवैरपि मनसाऽभ्यवहियमाणाः पुद्गलास्तेषां तृप्तये परमसन्तोषाय चोपकल्पन्ते, तत आहारविषयाभिलापनिवृत्तिर्भवतीति, अत्र च ओजआहारादिविभागप्रतिपादिका इमाः सूत्रकृताङ्गनियुक्तिगाथा:-"सरीरेणोयाहारो तयाय फासेण लोमआहारो। पक्खेवाहारो पुण कावलिओ होइ नायबो॥१॥ओयाहारा जीवा सधे अपजत्तया मुणेयवा। पज्जत्तगा य लोमे पक्खेवे होति। भइयवा ॥१॥ एगिदियदेवाणं नेरइयाणं च नत्थि पक्खेवो । सेसाणं जीवाणं संसारस्थाण पक्खेयो ॥२॥ लोमाहारा एगिदिया उ नेरइवसुरगणा चेव । सेसाणं आहारो लोमे पक्खेवओ चेव ॥३॥ ओयाहारा मणभक्खिणो य सधेवि सुरगणा होति । सेसा हवंति जीवा लोमे पखेवओ चेव ॥४॥" [शरीरेणौजआहारः त्वचा स्पर्शन रोमाहारः । प्रक्षेपाहारः पुमः कापलिको भवति ज्ञातव्यः॥१॥ ओजआहारा जीवाः सर्वेऽपर्याप्सका ज्ञातव्याः पर्यासाश्च रोमाहारे प्रक्षेपे भवन्ति भक्तव्याः॥२॥ एकेन्द्रियदेवानां नैरयिकाणां च नास्ति प्रक्षेपाहारः। शेषाणां जीवानां संसारस्थानां प्रक्षेपः॥३॥रोमाहारा एकेन्द्रियास्तु नैरविकसुरगणाश्चैव । शेषाणामाहारो रोमभिः प्रक्षेपेणैव ॥४॥(सू०१७१-१७२-२७३) ओजआहारा मनोभक्षिणश्च सर्वेऽपि सुरगणा भवन्ति । शेषा भवन्ति जीवा रोमभिः अनुक्रम [५५७] wereumstaram.org ~128~ Page #129 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम “प्रज्ञापना" - उपांगसूत्र-४ (मूलं+वृत्ति:) पदं [२८], -------------- उद्देशक: [१], ------------- दारं [-], -------------- मूलं [३०८] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र-[१५]उपांगसूत्र-[४] "प्रज्ञापना" मूलं एवं मलयगिरि-प्रणीता वृत्ति: प्रत सूत्रांक [३०८] प्रज्ञापना- या: मलय. वृत्ती. ॥५१॥ प्रक्षेपतश्चैव ॥५॥] अथ क आहार आभोगनिवर्णितः को वाऽनाभोगनिवर्तित इति चेत् , उच्यते, देवानामाभोग- निर्वर्चितः ओजआहारः स चापर्याप्तावस्थायां, लोमाहारोऽप्यनाभोगनिर्वर्त्तितः, सच पर्याप्तावस्थायां आभोगनिर्वति- | तो मनोभक्षणलक्षणः, स चपर्याप्तावस्थायां देवानामेव न शेषाणां, सर्वेषामप्यनाभोगनिर्वर्णित आहारोऽपर्याप्तावस्थायां लोमाहारः पर्याप्तावस्थायां, नैरयिकवर्जानां लोमाहारो, नैरयिकाणां तु लोमाहार आभोगनिर्वर्तितोऽपि, द्वीन्द्रियादीनां मनुष्यपर्यवसानानां यः प्रक्षेपाहारः स आभोगनिर्त्तित एवेति ।। श्रीमलयगिरिविर प्रज्ञापनाटीकायां आहारपदस्य प्रथमोद्देशकः परिसमाप्तः ॥ २८आहापदे उहेशा१ दीप see अनुक्रम [५५७] व्याख्यात आहारपदस्य प्रथमोद्देशकः, सम्प्रति द्वितीयो व्याख्येयः, तत्र चादाषियमधिकारसङ्ग्रहगाथाआहार १ भविय २ सण्णी ३ लेसा ४ दिही ५ य संजत ६ कसाए ७ । णाणे ८ जोगु ९ वओगे १० वेदे ११ य सरीर . १२ पञ्जत्ती १३ ॥१॥ 'आहार' त्यादि, प्रथमं सामान्यत आहाराधिकारः, द्वितीयो भव्याधिकारो-भन्यविशेषिताहाराधिकारः, एवं तृती-13 ॥११॥ यः संयधिकारः, चतुर्थो लेश्याधिकारः पञ्चमो दृष्टयधिकारः षष्ठः संयताधिकारः सप्तमः कषायाधिकारः अष्टमो ज्ञानाधिकारः नवमो योगाधिकारः दशम उपयोगाधिकारः एकादशो वेदाधिकारः द्वादशः शरीराधिकारः त्रयोदशः अत्र (२८) आहार-पदे उद्देशक (२) आरब्धः , ~129~ Page #130 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (१५) “प्रज्ञापना” – उपांगसूत्र-४ (मूलं+वृत्तिः ) पदं [२८], -------------- उद्देशक: [२], ------------- दारं [१,२], -------------- मूलं [३०९] + गाथा पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र-[१५]उपांगसूत्र-[४] "प्रज्ञापना" मूलं एवं मलयगिरि-प्रणीता वृत्ति: प्रत सूत्रांक erseases wesecc [३०९] गाथा पर्याप्त्यधिकारः, इह भन्यादिग्रहणेन तत्प्रतिपक्षभूता अभव्यादयोऽपि सूचिता द्रष्टव्याः, तथैवाने वक्ष्यमाणत्वाद्, तत्र प्रथमं सामान्यत आहाराधिकारं विभावयिषुरिदमाह जीवेणं भंते ! किं आहारए अणाहारए, गो! सिय आहारए सिय अणाहारए, एवं नेरइए जाव असुरकुमारे जाव वेमाणिए, सिद्धे णं भंते । किं आहारए अणाहारए , गो! नो आहारए अणाहारए, जीवा गं भंते । किं आहारया अणाहारया, गो! आहारयावि अणाहारयावि, नेरइयाणं! पुच्छा, गो.! सवेवि ताव होजा आहारया १ अहवा आहारगा य अणाहारए य २ अहवा आहारगा य अणाहारगा य ३, एवं जाव ओमाणिया, णवरं एगिदिया जहा जीवा, सिद्धाणं पुच्छा, गो० नो आहारमा अणाहारगा । दारं १॥ भवसिद्धिए णं भंते! जीवे किं आहारते अणाहारते, गोसिय आहारते सिय अणाहारए, एवं जाव वेमाणिए, भवसिद्धिया गं भंते ! जीवा किं आहारगा अणा०१, गो! जीवेगिदियवज्जो तियभंगो, अभवसिद्धिएवि एवं चेब, नोभवसिद्धिएनोअभवसिद्धिए ण मंते ! जीवे कि आहारए अणाहारए, गो०। णो आहारए अणाहारए, एवं सिद्धेवि, नोभवसिद्धियनोअभवसिद्धिया पं भंते । जीवा किं आहारगा अणाहारगा, गो० नो बाहारगा अणाहारगा, एवं सिद्धावि, दारं २। सण्णी णं भंते! जीवे किं आहारए अणाहारए, गो। सिय आकसिय अणा०, एवं जान वेमाणिए, गवरं एगिदियविगलिंदिया नो पुच्छिन्नति, सण्णी णं भंते ! जीवा कि आहारमा अणाहारमा, मो. जीवाइओ तियभंगो जाव वेमाणिया, असणी भंते ! जीवे किं दीप अनुक्रम 809200000 [५५८ अत्र (२८) आहार-पदे प्रथमे उद्देशके द्वारम् (१, २, ३) 'आहारकत्वं', 'भवसिद्धिकं', संज्ञी आरब्धम ~130 Page #131 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (१५) प्रत सूत्रांक [ ३०९ ] गाथा दीप अनुक्रम [५५८ -५६१] “प्रज्ञापना” – उपांगसूत्र - ४ ( मूलं + वृत्तिः ) पदं [२८], -------------उद्देशक: [२], ---- दारं [१-३], [------- मूलं [ ३०९] + गाथा पूज्य आगमोद्धारकश्री संशोधितः मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र [१५],उपांगसूत्र-[४] "प्रज्ञापना" मूलं एवं मलयगिरि-प्रणीता वृत्तिः प्रज्ञापनाया मल य० वृत्ती. ॥५१२॥ आहारए अणाहारए ?, गो० ! सिय आ० सिय अणा० एवं रइए जाव वाणमंतरे, जोइसियवेमाणिया ण पुच्छिज्जति, असण्णी णं भंते ! जीवा किं आ० अणा० १, गो० ! आहारगावि अणाहारमावि एगो भंगो, असण्णी णं भंते ! णेरइया कि आहारया अणा० १, गो० ! आहारगा वा १ अणाहारगा वा २ अहवा आहारए य अणाहारए य ३ आहारए य अणाहारया य ४ अहवा आहारगा य अणाहारए य ५ अहवा आहारगा य अणाहारगा य ६ एवं एते छन्भंगा, एवं जाव थणियकुमारा, एगिदिएस अभंगतं, बेइंदिय जाव पंचिंदियतिरिक्खजोणिएसु तियभंगो, मणूसवाणमंतरेसु छन्भंगा, नोसण्णीनोअसण्णी णं भंते! जीवे किं आ० अणा० १, गो० ! सिय आहारए सिय अणाहारए य, एवं मणूसेवि, सिद्धे अणाहारते, पुडुचेणं नोसण्णीनोअसण्णी जीवा आहारगावि अणाहारगावि, मणूसेसु तियभंगो, सिद्धा अणाहारगा । दारं ३ (सूत्रं ३०९) 'जीणं ते!" इत्यादि प्रश्नसूत्रं सुगमं, भगवानाह - 'गौतम' त्यादि, गौतम ! स्यात् - कदाचिदाहारकः कदाचिदनाहारकः, कथमिति चेत् ?, उच्यते, विग्रहगतौ केवलिसमुद्घाते शैलेश्यावस्थायां सिद्धत्वे चानाहारकः, शेषाखवस्थाखाहारकः, उक्तं च- "विग्गहगइमावना केवलिणो समोहया अजोगी य। सिद्धा य अणाहारा सेसा आहारगा जीवा ॥ १ ॥ " [विग्रहगत्यापन्नाः समवहताः केवलिनोऽयोगिनश्च । सिद्धावानाहारकाः शेषा आहारका जीवाः ॥ १ ॥ ] तदेवं सामान्यतो जीवचिन्तां कृत्वेदानीं नैरयिकादिचतुर्विंशतिदण्डकक्रमेणाहार कानाहारक चिन्तां करोति- 'नेर For Parts Only ~ 131~ २८आहा रपदे उद्दे शः २ सू. ३०९ ॥५१२॥ Page #132 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (१५) “प्रज्ञापना” – उपांगसूत्र-४ (मूलं+वृत्ति:) पदं [२८], -------------- उद्देशक: [२], ------------- दारं [१-3], -------------- मूलं [३०९] + गाथा पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र-[१५]उपांगसूत्र-[४] "प्रज्ञापना" मूलं एवं मलयगिरि-प्रणीता वृत्ति: प्रत सूत्रांक [३०९] गाथा इए णं भंते! किं आहारए' इत्यादि सुगम, तदेवं सामान्यतो जीवपदे नैरयिकादिषु चैकवचनेन आहारकानाहारकत्वचिन्ता कृता, सम्प्रति बहुवचनेन तांचिकीर्षुराह-'जीवाणं भंते !' इत्यादि प्रश्नसूत्रं सुगम, भगवानाह-गौतम! आहारका अपि अनाहारका अपि, सदैव बहुवचनविशिष्टा उभयेऽपि लभ्यन्ते इति भावः, तथाहि-विग्रहगतिव्यतिकरकेण शेषकालं सर्वेऽपि संसारिणो जीवा आहारकाः, विग्रहगतिस्तु कचित् कदाचित् कस्यचित्तु भवतीति सर्वकाल मपि लभ्यमाना सा प्रतिनियतानामेव लभ्यते तत आहारकेषु बहुवचनं, अनाहारका अपि सिद्धाः सदैव लभ्यन्ते, ते चाभव्येभ्योऽनन्तगुणाः, अन्यच-सर्वकालमेकेकस्य निगोदस्य प्रतिसमयमसङ्घयेयभागो विग्रहगत्यापन्नो लभ्यते, ततोऽनाहारफेष्वपि बहुवचनं, नैरयिकसूत्रे सर्वेऽपि तावद्भवेयुराहारकाः१, किमुक्तं भवति?-कदाचिन्नेरयिकाः सर्वेऽ-16 प्याहारका एव भवन्ति, न त्वेकोऽप्यनाहारकः, कथमिति चेत् , उच्यते, उपपातविरहात्, तथाहि-नैरयिकाणामुप-8 पातबिरहो द्वादश मुहर्ताः, एतावति चान्तरे पूर्वोत्पन्नविग्रहगत्यापन्ना अपि आहारका जाताः, अन्यस्त्वनुत्पद्यमान-18 त्वात् अनाहारको न सम्भवतीति, अथवा आहारका अनाहारकाश्च २ आहारकपदे बहुवचनं अनाहारकपदे एकवच-18 नमिति भावः, कथमेष भको घटामियतीति चेत् , उच्यते, इह नरकेषु जन्तुः कदाचिदेक उत्पद्यते कदाचिट्ठी कदाचित् जयश्चत्वारो यावत्सङ्ख्याता असङ्ख्याता वा, तत्र यदा एक उत्पद्यते सोऽपि च विग्रहगत्यापन्नोऽपि भवति अन्ये च पूर्वोत्पन्नतया आहारका अभवन् तदा एष भङ्गो लभ्यते, तृतीयभङ्गमाह-अहवा आहारगा य अणाहारगा य ३, दीप अनुक्रम [५५८-५६१] ~132~ Page #133 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (१५) “प्रज्ञापना” – उपांगसूत्र-४ (मूलं+वृत्ति:) पदं [२८], -------------- उद्देशक: [२], -------------दारं [१-३], -------------- मूलं [३०९] + गाथा पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र-[१५]उपांगसूत्र-[४] "प्रज्ञापना" मूलं एवं मलयगिरि-प्रणीता वृत्ति: प्रत सूत्रांक [३०९] पना- याः मल- य०वृत्ती. ॥५१॥ गाथा अत्रोभयत्रापि बहुवचनं, एष च भङ्गो यदा बहवो विग्रहगत्योत्पद्यन्ते तदा द्रष्टव्यः, शेपभङ्गकास्तु न सम्भवन्ति, २८आहाआहारकपदस्य नैरयिकाणां सर्वदैव बहुवचनविषयतया लभ्यमानत्वात् , एवमसुरकुमारादिषु स्तनितकुमारपर्यवसानेषु रपदे उद्देद्वीन्द्रियादिषु च वैमानिकपर्यन्तेषु प्रत्येकं भङ्गत्रिकं भावनीयं, उपपातविरहभावतः प्रथमभङ्गस्य एकादिसङ्ख्यतयोत्पत्तेःशः२ सू. शेषस्य च भङ्गद्यस्य सर्वत्रापि लभ्यमानत्वात् , एकेन्द्रियेषु पुनः पृथिव्यप्तेजोवायुवनस्पतिरूपेषु प्रत्येकमेष एवैको ३०९ भङ्गः आहारकाः अनाहारका अपि, पृथिव्यप्तेजोवायुपु प्रत्येकं प्रतिसमयमसङ्ख्यातानां वनस्पतिषु प्रतिसमयमनन्तानां विग्रहगत्योत्पद्यमानानां लभ्यमानतया अनाहारकपदेऽपि सदैव तेषु बहुवचनसम्भवात् , तथा चाह-एवं जाव माणिया नवरं एगिदिया जहा जीवा' इति, एवं-नैरयिकोक्तभङ्गप्रकारेण शेषा अप्यसुरकुमारादयस्तावद्वक्तव्या यावद्वैमानिकाः, नवरमेकेन्द्रियाः पृथिव्यप्तेजोवायुवनस्पतिरूपाः प्रत्येकं यथा उभयत्रापि बहुवचने जीवा उक्तास्तथा वक्तव्याः, सिद्धेष्वेक एव भङ्गोऽनाहारक इति, सकलशरीरप्रहाणतस्तेषामाहारासम्भवात् बहूनां च सदा भावात् इति, गतं प्रथमं द्वारं ॥ द्वितीयं भव्यद्वारमभिधित्सुराह-'भवसिद्धिए णं भंते !' इत्यादि, भरैः सङ्ख्यातरसङ्ख्यातैरनन्तैर्वा | सिद्धियस्यासी भवसिद्धिको भव्यः, स कदाचिदाहारकः कदाचिदनाहारकः, विग्रहगत्याद्यवस्थायां अनाहारकः शेष-IMInaam कालं त्वाहारकः, एवं चतुर्विंशतिदण्डकेऽपि प्रत्येकं वाच्यं, तथा चाह-एवं जाव वेमाणिए' अत्र च सिद्धविषय सूत्र न वक्तव्यं, मोक्षपदप्रासतया तस्य भवसिद्धिकत्वायोगात्, अत्रैव बहुवचनेनाहारकानाहारकत्वचिन्तां चिकीर्षुराह दीप अनुक्रम [५५८-५६१] recedeseseserseas ~133~ Page #134 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (१५) “प्रज्ञापना” – उपांगसूत्र-४ (मूलं+वृत्ति:) पदं [२८], -------------- उद्देशक: [२], -------------दारं [१-३], -------------- मूलं [३०९] + गाथा पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र-[१५]उपांगसूत्र-[४] "प्रज्ञापना" मूलं एवं मलयगिरि-प्रणीता वृत्ति: प्रत सूत्रांक [३०९] गाथा ISभवसिद्धिया णं भंते !' इत्यादि, अत्राप्याहारकद्वार इव जीवपदे एकेन्द्रियेषु च प्रत्येकमुभयत्र बहुवचनेनैक एव भङ्गो, यथा आहारका अपि अनाहारका अपि, शेषेषु नैरयिकादिषु स्थानेषु भङ्गत्रिकं, कदाचित्केवला आहारका एव न स्खेकोऽप्यनाहारकः, अथवा कदाचिदाहारका एकोऽनाहारकः, अथवा आहारका अपि अनाहारका अपि उभयत्रापि बहुवचनं, तथा चाह-'जीवगिदियवजो तियभंगों' इति, यथा च भवसिद्धिके एकस्मिन् बहुषु चाहारकानाहारकत्वचिन्ता कृता तथा अभवसिद्धिकेऽपि कर्त्तव्या, उभयत्राप्येकवचने बहुवचने च भङ्गसङ्ख्यायाः सर्वत्रापि समानत्वात् , तथा चाह-'अभवसिद्धिए एवं चेय' अभवसिद्धिकेऽपि भवसिद्धिक इव एकवचने बहुवचने च वक्तव्यमिति, यस्तु न भवसिद्धिको नाप्यभवसिद्धिकः स सिद्धः, स हि भवसिद्धिको न भवति, भवातीतत्वात् , अभवसिद्धिकस्तु रूढया यः सिद्धिगमनयोग्यो न भवति स उच्यते, ततोऽभवसिद्धिकोऽपि न भवति, सिद्धिप्राप्तत्वात, तथा च सति | नोभवसिद्धिकनोअभवसिद्धिकत्वचिन्तायां वे एव पदे, तद्यथा-जीवपदं सिद्धिपदं च, उभयत्राप्येकवचने एक एव | | भङ्गोऽनाहारक इति, बहुवचनेऽप्येक एवानाहारका इति । संज्ञिद्वारे-'सन्नी गं भंते' इत्यादि प्रश्चसूत्र सुगम, निर्वचनसूत्रमाह-'गोयमे'त्यादि, विग्रहगतावनाहारकः शेषकालमाहारका, ननु संज्ञी समनस्क उच्यते, विग्रहगती । |च मनो नास्ति ततः कथं संज्ञी सन्ननाहारको लभ्यते ।, उच्यते, इह विग्रहगत्यापन्नोऽपि संघ्यायुष्कवेदनात् संजी| व्यवहियते, यथा नारकायुष्कवेदनानारकततो न कश्चिद्दोषः, 'एवं'मित्यादि, एवमुपदर्शितेन प्रकारेण तावद् वक्तव्यं दीप अनुक्रम [५५८-५६१] ~134~ Page #135 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (१५) “प्रज्ञापना” – उपांगसूत्र-४ (मूलं+वृत्ति:) पदं [२८], -------------- उद्देशक: [२], -------------दारं [१-३], -------------- मूलं [३०९] + गाथा पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र-[१५]उपांगसूत्र-[४] "प्रज्ञापना" मूलं एवं मलयगिरि-प्रणीता वृत्ति: प्रत सूत्रांक [३०९] प्रज्ञापना- या: मलय.वृत्ती . ॥५१४|| गाथा Seaso0000000 यावद्वैमानिको-वैमानिकसूत्रं, नवरमेकेन्द्रिया विकलेन्द्रिया न प्रष्टव्याः, किमुक्तं भवति ?-तद्विषय सूत्रं सर्वथा न २८आहावक्तव्यं, तेषाममनस्कतया संज्ञित्वायोगात्, बहुवचनचिन्तायां जीवपदे नैरयिकादिपदेषु च प्रत्येकं सर्वत्र भनत्रयं, |रपदे उद्दे| तद्यथा-सर्वेऽपि तावद् भवेयुराहारकाः १ अथवा आहारकाश्च अनाहारकश्च २ अथया आहारकाच अनाहारकाचशः२ सू. का३, तथा चाह-'जीवातीतो तियभंगो जाव चेमाणिया' इति, तत्र सामान्यतो जीवपदे प्रथमभङ्गः सकललोकापे क्षया संज्ञित्वेनोत्पातविरहाभावात् द्वितीयभङ्ग एकस्मिन् संजिनि विग्रहगत्यापन्ने तृतीयभङ्गो बहुषु संज्ञिषु विग्रहगत्यापन्नेष. एवं नैरयिकादिपदेप्यपि भङ्गभाषना कार्या, 'असण्णी णं भंते ।' इत्यादि, अत्रापि विग्रहगतावनाहारकः शेषकालमाहारकः, 'एवं जाव याणमंतरे' इति एवं-सामान्यतो जीवपद इव चतुर्विंशतिदण्डकक्रमेण तावत् वक्तंव्यं यावद्वानमन्तरो-बानमंतरविषयं सूत्र, अथ नैरयिका भवनपतयो वानमन्तराश्च कथमसंज्ञिनो येनासंज्ञिसूत्रे | तेऽपि पठ्यन्ते इति , उच्यते, इह नैरयिका भवनपतयो व्यन्तराश्चासंज्ञिभ्योऽपि उत्पद्यन्ते संज्ञिभ्योऽपि, असंज्ञि-14 भ्यश्च उत्पद्यमाना असंज्ञिन इति व्यवहियन्ते संज्ञिभ्य उत्पद्यमानाः संज्ञिनः, ततोऽसंज्ञिसूत्रेऽपि ते उक्तप्रकारेण8 पठ्यन्ते, ज्योतिष्कवैमानिकास्तु संजिभ्य पवोत्पद्यन्ते नासंजिभ्य इति असंज्ञित्वव्यवहाराभावादिह ते न पठयन्ते,४५१४॥ तथा चाह-'जोइसियवमाणिया न पुच्छिति' किमुक्तं भवति?-तद्विषयं सूत्रं न वक्तव्यं, तेषामसंज्ञित्वाभावादिति, बहुवचनचिन्तायां सामान्यतो जीवपदे एक एव भरः, तद्यथा-आहारका अपि अनाहारका अपि, प्रतिसमयमेके दीप अनुक्रम [५५८-५६१] ~135 Page #136 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (१५) “प्रज्ञापना” – उपांगसूत्र-४ (मूलं+वृत्ति:) पदं [२८], -------------- उद्देशक: [२], -------------दारं [१-३], -------------- मूलं [३०९] + गाथा पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र-[१५]उपांगसूत्र-[४] "प्रज्ञापना" मूलं एवं मलयगिरि-प्रणीता वृत्ति: प्रत सूत्रांक [३०९] गाथा न्द्रियाणामनन्तानां विग्रहगत्यापन्नानामत एवानाहारकाणां सदैव लभ्यमानतया अनाहारकपदेऽपि सर्वदा बहुवचनभावात् , नैरयिकपदे षट् भङ्गाः, तत्र प्रथमो भङ्ग आहारका इति, अयं च भङ्गो यदाऽन्योऽसंज्ञिनारकः उत्पद्यमानो विग्रहगत्यापन्नो न लभ्यते पूर्वोत्पन्नास्त्वसंज्ञिनः सर्वेऽप्याहारका जातास्तदा लभ्यते, द्वितीयोऽनाहारका ! इति, एष यदा पूर्वोत्पन्नोऽसंज्ञी नारक एकोऽपि न विद्यते उत्पद्यमानास्तु विग्रहगत्यापन्ना बहयो लभ्यन्ते तदा। विज्ञेयः, तृतीय आहारकश्च अनाहारकश्च, द्वित्वेऽपि प्राकृते बहुवचनमिति बहुवचनचिन्तायामेषोऽपि भङ्गः समीचीन इत्युपन्यस्तः, तत्र यदा चिरकालोत्पन्न एकोऽसंज्ञी नारको विद्यते अधुनोत्पद्यमानोऽपि विग्रहगत्यापन्न एकस्त दाऽयं भङ्गः, चतुर्थः आहारकश्च अनाहारकाश्च एष चिरकालोत्पन्ने एकस्मिन्नसंज्ञिनि नारके विद्यमाने अधुनोत्पविद्यमानेषु असंज्ञिषु विग्रहगत्यापन्नेषु द्रष्टव्यः, पञ्चमः-आहारकाश्च अनाहारकश्च, अयं चिरकालोत्पन्नेषु बहुषु असं जिषु नारकेषु सत्सु अधुनोत्पद्यमाने विग्रहगत्यापन्ने एकस्मिन्नसंज्ञिनि विज्ञेयः, षष्ठ आहारकाच अनाहारकाच, एपी, बहुपु चिरकालोत्पन्नेषूत्पद्यमानेषु चासंज्ञिषु वेदितव्यः, 'एवमेते छन्भंगा' एवमुपदर्शितप्रकारेण एते पद भंगाः, तद्यथा-आहारकपदस्थ केवलस्य बहुवचनेनकः १, अनाहारकपदस्य केवलस्य बहुवचनेन द्वितीयः२, आहारकपदस्याना-18 हारकपदस्य च युगपत् प्रत्येकमेकवचनेन तृतीयः ३, आहारकपदस्बैकवचनेन अनाहारकपदस्य बहुवचनेन चतुर्थः ४, आहारकपदस्य बहुवचनेन अनाहारकपदस्बैकवचनेन पञ्चमः ५, उभयत्रापि बहुवचनेन षष्ठः ६, शेषास्तु भङ्गा न दीप अनुक्रम [५५८-५६१] For P OW ~136~ Page #137 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (१५) “प्रज्ञापना” – उपांगसूत्र-४ (मूलं+वृत्ति:) पदं [२८], -------------- उद्देशक: [२], ------------- दारं [१-3], -------------- मूलं [३०९] + गाथा पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र-[१५]उपांगसूत्र-[४] "प्रज्ञापना" मूलं एवं मलयगिरि-प्रणीता वृत्ति: se प्रत सूत्रांक [३०९] २. वृत्ती. ॥५१५॥ सब- ३०९ गाथा प्रशाना-18 सम्भवन्ति, बहुवचनचिन्तायाः प्रक्रान्तत्वात् , एते च षट्र भङ्गा असुरकुमारादिष्वपि स्तनितकुमारपर्यवसानेषु चेदि-N या: मल तव्याः, तथा चाह-एवं जाव थणियकुमारा' 'पगिदिएसु अभंगय'मिति एकेन्द्रियेषु पृथिव्यप्तेजोवायुवनस्पतिरूपे- पदे उद्देप्वभङ्गक-भकाभाव एक एव भा इत्यर्थः, स चाय-आहारका अपि अनाहारका अपि, तत्राहारका बहवः शः२स. सुप्रसिद्धाः, अनाहारका अपि प्रतिसमय पृथिव्यप्तेजोवायवः प्रत्येकमसङ्ख्ययाः प्रतिसमयं बनस्पतयोऽनन्ताः सर्वकालं लभ्यन्ते इति तेऽपि बहवः सिद्धाः, द्वीन्द्रियत्रीन्द्रियचतुरिन्द्रियतिर्यपञ्चेन्द्रियेषु प्रत्येकं भङ्गत्रिक, तद्यथाआहारका अथवा आहारकाश्च अनाहारकश्च अथवा आहारकाश्च अनाहारकाच, तत्र द्वीन्द्रियान् प्रति भावना-15) यदा द्वीन्द्रिय एकोऽपि विग्रहगत्यापन्नो न लभ्यते तदा पूर्वोत्पन्नाः सर्वेऽप्याहारका इति प्रथमो भङ्गः, यदा पुनरेको विग्रहगत्यापनस्तदा पूर्व सर्वेऽप्याहारका उत्पद्यमानस्त्वेकोऽनाहारक इति, यदा तूत्पद्यमाना अपि बहवो ल-M भ्यन्ते तदा तृतीयः, एवं त्रीन्द्रियचतुरिन्द्रियतिर्यपञ्चेन्द्रियेष्वपि भावना कर्तव्या, मनुष्यव्यन्तरेषु षट् भङ्गाः, ते च नरयिकेष्विव भावनीयाः, तथा चाह-'इंदिय जाव पंचिंदियतिरिक्खजोणिएसु तियमंगो, मणूसवाणमंतरेसु छन्भं- गा' इति, नोसंज्ञीनोअसंज्ञी च केवली सिद्धश्च ततो नोसंजिनोअसंज्ञित्वचिन्तायां त्रीणि पदानि, तद्यथा-जीवपदं । ॥५१५॥ मनुष्यपदं सिद्धपदं च, तत्र जीवपदे सूत्रमाह-'नोसण्णीनोअसण्णी णं भंते ! जीवे इत्यादि, स्यात्-कदाचिदाहा-19 रकः केवलिनः समुद्घाताद्यवस्थाविरहे आहारकः (कत्वात् ), स्वात्-कदाचिदनाहारकः, समुदूधातावस्थायां अयो दीप अनुक्रम [५५८-५६१] SARERainintenarana ~137 Page #138 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (१५) “प्रज्ञापना” – उपांगसूत्र-४ (मूलं+वृत्ति:) पदं [२८], -------------- उद्देशक: [२], -------------दारं [१-३], -------------- मूलं [३०९] + गाथा पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र-[१५]उपांगसूत्र-[४] "प्रज्ञापना" मूलं एवं मलयगिरि-प्रणीता वृत्ति: प्रत सूत्रांक [३०९] गाथा गित्वावस्थायां सिद्धावस्थायां वा भावनीयं, "सिद्धे अणाहारए' इति सिद्धे-सिद्धविषये सूत्रे 'अणाहारए' इति वक्तव्यं, 'पुहुत्तेण'ति पृथक्त्वेन बहुत्वेन चिन्तायामिति प्रक्रमः, 'आहारगावि अणाहारगावि' तत्राहारका अपि बहूनां केवलिनां समुद्घाताद्यवस्थारहितानां सदैव लभ्यमानत्वात् , अनाहारका अपि सिद्धानां सदैव भावात्तेषां चानाहारकत्वादिति, 'मणुस्सेसु तियभंगो' इति मनुष्यविषयं भजत्रिक, तद्यथा-आहारका एष भको यदा न | कोऽपि केवली समुद्घाताद्यवस्थागतो भवति, अथवा आहारकाश्च अनाहारकश्च एष भङ्ग एकस्मिन् केवलिनि| | समुद्घाताद्यवस्थागते सति लभ्यते, अथवा आहारकाश्च अनाहारकाच एप बहुपु केवलिसमुद्घाताद्यवस्थागतेषु सत्सु वेदितव्यः । लेश्याद्वारे सामान्यतः सलेश्यसूत्रमाहसलेसे णं मते ! जीवे किं आहारए अणाहारए', गो.सिय आहारए सिय अणाहारए, एवं जाय वेमाणिते, सलेसा णं मंते ! जीवा किं आहारगा अणाहारगा, गो०! जीवेगिदियवज्जो तियभंगो, एवं कण्हलेसावि नीललेसायि काउलेसावि जीवेगिंदियवओ तियभंगो, तेउलेसाए पुढविआउवणस्सइकाइयाण छन्भंगा, सेसाणं जीवादिओ तियभंगो जेसि अस्थि तेउलेसा, पम्हलेसाए सुकलेसाए य जीवादिओ तिभंगो, अलेसा जीवा मणुस्सा सिद्धा य एमचेणवि पुहुत्तेणवि नो आहारगा अणाहारगा, दारं ४ | सम्मदिट्ठीणं भंते ! जीवा किं आहा० अणा०१, गोसिय बाहा०सिय अणा, बेईदिया तेइंदिया चरिंदिया छम्भंगा, सिद्धा अणाहारमा, अवसेसाणं तियभंगो, मिच्छादिट्ठीसु जीवेगिदियवज्जो तिय-. 980882929292e2e2ez दीप अनुक्रम [५५८-५६१] अत्र (२८) आहार-पदे प्रथमे उद्देशके द्वाराणि (४, ५,६,७) लेश्या', 'दृष्टिः', 'संयत', 'कषाय' आरब्धानि ~138~ Page #139 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम “प्रज्ञापना" - उपांगसूत्र-४ (मूलं+वृत्ति:) पदं [२८],-------------- उद्देशक: [२], ------------- दारं [४-७], -------------- मूलं [३१०] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र-[१५]उपांगसूत्र-[४] "प्रज्ञापना" मूलं एवं मलयगिरि-प्रणीता वृत्ति: प्रत सूत्रांक [३१०] २८आहा. रपदे उद्देशः२सू. ३१० दीप प्रज्ञापना- भंगो, सम्मामिच्छादिट्ठी णं भंते ! किं आहा. अणा०, गो! आहारते नो अणा०, एवं एगिदियविगलिदियवर्ज या: मल जाव वेमाणिते, एवं प्रहत्तेणवि । दारं ५। संजए णं भंते ! जीवे किं आहा० अणा, गो०! सिय आहारए सिय यवृत्ती. अणाहारए, एवं मणूसेवि, पुराणं तियभंगो । असंजते पुच्छा, सिय आहारए सिय अणाहारए, पुहुत्तेणं जीवेगिंदियवओ तियभंगो । संजतासंजते गं जीवे० पंचिंदियतिरिक्खजोणिते मासे य३एते एगणचि पुहुनेणवि आहारगा नो अणा०, ३५१६॥ नोसंजतेनोअसंजतेनोसंजतासंजते जीवे सिद्धे य एते एगत्तेण पोहत्तेणवि नो आहा० अणा०, दारं ६ । सकसाई णं भंते ! जीवे किं आहारए अणा, गो.1 सिय आ० सिय अणाहारते, एवं जाव बेमाणिता, पुहुनेणं जीवेगिदियवज्जो तियमंगो, कोहकसाईसु जीवादीसु एवं चेव, नवरं देवेसु छन्भंगा, माणकसाईसु मायाकसाईसु य देवनेरइएसु छम्भंगा, अबसेसाणं जीवेगिंदियवज्जो तियभंगो, लोहकसाईसु नेरइएसु छम्भंगा, अवसेसेसु जीवेगिदियवजो तियभंगो, अकसाई जहा णो. सण्णीणोअसण्णी, दारं ७॥(सूत्रं ३१०) 'सलेसे णं भंते ! जीवे इत्यादि, इदं सामान्यतो जीवसूत्रमिव भाषनीय, अत्रापि सिद्धसूत्रं न वक्तव्यं, सिद्धानामलेIN श्यत्वात् , बहुवचनचिन्तायां जीवपदे एकेन्द्रियेषु च पृथिव्यादिषु प्रत्येकमेक एव भङ्गस्तद्यथा-आहारका अपि अनाहारका अपि, उभयेषामपि सदा बहुत्वेन लभ्यमानत्वात् , शेषेषु तु नैरयिकादिषु पदेषु तु प्रत्येकं भङ्गत्रिक, तद्यथा-सर्वेऽपि तावद्भवेयुराहारकाः १, अथवा आहारकाच अनाहारकश्च २, अथवा आहारकाथ अनाहारकाच| अनुक्रम [५६२-५६५] eesearseeeeeseraceae ॥५१६॥ ~139~ Page #140 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (१५) “प्रज्ञापना" - उपांगसूत्र-४ (मूलं+वृत्ति:) पदं [२८], -------------- उद्देशक: [२], ------------- दारं [४-७], -------------- मूलं [३१०] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र-[१५]उपांगसूत्र-[४] "प्रज्ञापना" मूलं एवं मलयगिरि-प्रणीता वृत्ति: प्रत सूत्रांक [३१०] दीप अनुक्रम [५६२-५६५] ३, अमीषां च भावना प्राग्वत् , तथा चाह-'जीवेगिंदियवजो तियभंगों' इति, 'एव'मित्यादि, एवं यथा सामान्यतः पसलेश्यसूत्रमुक्तं तथा कृष्णलेश्याविषयमपि नीललेश्याविषयमपि कापोतलेश्याविषयमपि सूत्रं वक्तव्यं, सर्वत्र सामान्यतो जीवपदे एकेन्द्रियेषु च प्रत्येकममङ्गकं, शेषपक्षे भङ्गत्रिकं, तेजोलेश्याविषयमपि सूत्रमेकत्वे प्राग्वत् , बहुत्वे पृथिव्यवनस्पसिषु षट् भङ्गाः, तेषु कथं तेजोलेश्यासम्भव इति चेत् ?, उच्यते, भवनपतिव्यन्तरज्योतिष्क-1 सौधर्मेशानदेवानां तेजोलेश्यावतां तत्रोत्पादभावात्, उक्तं चास्या एव भगवत्याः प्रज्ञापनायाणौं-'जेणेतेसु भवण-18 वइवाणमंतरजोइसियसोहम्मीसाणया देवा उववजंति तेणं तेउलेस्सा लम्भई" इति, ते षट् भङ्गा इमे-सर्वे आहारकाः १ अथवा सर्वे अनाहारकाः २ अथवा आहारकश्चानाहारकश्च ३ अथवा आहारकश्च अनाहारकाच ४ अथ-IN वा आहारकाच अनाहारकश्च ५ अथवा आहारकाचानाहारकाच ६, शेषाणां जीवपदादारभ्य सर्वत्रापि भङ्गत्रिक, तथा चाह-'तेउलेस्साए पुढविआउवणस्सइकाइयाणं छम्भंगा, सेसाणं जीवाईओ तियभंगों' इति, आह-कि सर्वेषामविशेषेण जीवपदादारभ्य भङ्गत्रिकमुत केषांचिदत आह-जेसिं अत्थि तेउलेसा' इति, येषामस्ति तेजोलेश्या तेषामेव भङ्गत्रिकं वक्तव्यं, न शेषाणां, एतेन किमावेदितं भवति ?,-नैरयिकविपर्य तेजोवायुविषयं द्वित्रिचतुरि| १ श्रीहरिभद्रसूरिवरविहिता प्रज्ञापनाप्रदेशव्याख्यारूपैवेयं नत्वन्या काचिचूर्णिः, अस्ति च सत्राय पाठः समयः, स्पष्टं च श्रावकधर्मपचाशकवृत्तौ औपपातिकाद्यानामुपाङ्गानां चूर्ण्यभाव इति प्रतिपादनम् । See SAREauratoninternational Tumharam.org ~140 Page #141 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (१५) “प्रज्ञापना" - उपांगसूत्र-४ (मूलं+वृत्ति:) पदं [२८],-------------- उद्देशक: [२], ------------- दारं [४-७], -------------- मूलं [३१०] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र-[१५]उपांगसूत्र-[४] "प्रज्ञापना" मूलं एवं मलयगिरि-प्रणीता वृत्ति: प्रत सूत्रांक [३१० दीप प्रज्ञापना-18|न्द्रियविषयं च तेजोलेश्यासूत्रं न वक्तव्यमिति, तथा पालेश्या शुक्ललेश्या च येषां सम्भवति तद्विषयं तयोः सूत्र|२८आहायाः मल- वक्तव्यं, तत्र पालेश्या शुक्ललेश्या च तिर्यपञ्चेन्द्रियेषु मनुष्येषु वैमानिकेषु च लभ्यते न शेषेष्विति तयोः प्रत्येकंरपदे उद्देय. वृत्ती. चत्वारि पदानि, तद्यथा-सामान्यतो जीवपदं तिर्यपञ्चेन्द्रियपदं मनुष्यपदं वैमानिकपदं च, सर्वत्राप्येकवचनचि- शः२.सू.. ॥५१७॥ न्तायां स्यादाहारकः स्यादनाहारक इति भङ्गः, बहुवचनचिन्तायां भङ्गत्रिक, तद्यधा-सर्वेऽपि तावद् भवेयुराहारकाः १ अथवा आहारकाश्च अनाहारकश्च २ अथवा आहारकाचानाहारकाश्च ३, तथा चाह-'पम्हलेसाए सुक्कलेसाए जीवाइओ तियभंगो'त्ति, अलेश्या-लेश्यातीतास्ते चायोगिकेवलिनः सिद्धाश्थ, ततोऽत्र त्रीणि पदानि, तद्यथासामान्यतो जीवपदं मनुष्याः सिद्धाश्च, सर्वत्राप्येकवचनेन बहुवचनेन चानाहारका एव वक्तव्याः, एतदेवाह-'अलेस्सा जीवा मणुस्सा सिद्धा य एगोणवि पुहुत्तेणवि नो आहारगा अणाहारगा' इति, गतं लेश्याद्वारम् । सम्प्रति सम्यग्दृष्टिद्वारम्-सम्यगदृष्टिहीपशमिकसम्यक्त्वेन साखादनसम्यक्त्वेन क्षायोपशमिकसम्यक्त्वेन वेदकसम्यक्त्वेन थायिकसम्यक्त्वेन या प्रतिपत्तव्यः, सामान्यत उपादानात्, तथैवाने भङ्गचिन्ताया अपि करिष्यमाणत्वात् , तत्रौपशमिकसम्यग्दृष्ट्यादयः सुप्रतीताः, वेदकसम्यग्दृष्टिः पुनः क्षायिकसम्यक्त्वमुत्पादयन् चरमप्रासमनुभवन्नवसेयः, ५१७॥ एकत्ये सर्वेष्यपि जीयादिपदेषु प्रत्येकमेष भङ्गः स्यादाहारका खादनाहारक इति, नबरमत्र पृथिव्यादिविषयं सूत्रं न । वक्तव्यं, तेषां सम्यग्दृष्टित्वायोगात्, 'उभयाभावो पुढवाइएसु' [उभयाभावः पृथ्व्यादिषु ] इति वचनाद्, बहुवचन अनुक्रम [५६२-५६५] ~141~ Page #142 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (१५) “प्रज्ञापना” – उपांगसूत्र-४ (मूलं+वृत्तिः ) पदं [२८],-------------- उद्देशक: [२],------------ दारं [४-७], -------------- मूलं [३१०] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र-[१५]उपांगसूत्र-[४] "प्रज्ञापना" मूलं एवं मलयगिरि-प्रणीता वृत्ति: प्रत सूत्रांक [३१०] दीप अनुक्रम [५६२-५६५] विषयं सूत्रं, सामान्यतो जीवपदे आहारका अपि अनाहारका अपि इत्येष एव भङ्गः, उभयेषामपि सदा सम्यग्दृष्टी-RI नां बहुत्वेन लभ्यमानत्वात्, नैरयिकभवनपतितिर्यपञ्चेन्द्रियमनुष्यव्यन्तरज्योतिष्कवैमानिकेषु प्रत्येकं भात्रिक, तद्यथा-कदाचित्सर्वेऽप्याहारका एव १ कदाचिदाहारका एकश्चानाहारका २, कदाचिदाहारकाश्च अनाहारकाव ३. द्वित्रिचतुरिन्द्रियेषु पुनः षह भङ्गाः, ते च प्राग्वद भावनीयाः, द्वीन्द्रियादीनां च सम्यग्दृष्टित्वमपयोंसावस्थासम्भवि-1 साखादनसम्यक्त्वापेक्षया द्रष्टव्यं, सिद्धास्त्वनाहारकाः, एतेषां क्षायिकसम्यक्त्वयुक्तत्वात् , तथा चाह-'बेइंदियतेदियचउरिदिएसु छन्भंगा, सिद्धा अणाहारगा, अवसेसाणं तियभंगों' मिथ्यादृष्टिष्वपि एकवचने सर्वत्र स्थादाहारकः स्यादनाहारक इति वक्तव्यं, बहुवचने जीवपदे पृथिव्यादिपदेषु च प्रत्येकमाहारका अपि अनाहारका अपीति, उभयेषामपि सर्वदैव तेषु बहुत्वेन लभ्यमानत्वेन, शेषेषु तु सर्वेषु स्थानेषु भङ्गत्रिकं, सिद्धसूत्रं चात्र न वक्तव्यं, सिद्धानां मिथ्यात्वापगमात्, एतदेवाह-'मिच्छादिट्ठीसु जीवेगिदियवज्जो तियभंगो, सम्मामिच्छदिहीणं भंते ! जीवे इत्यादि प्रश्नसूत्रं सुगम, भगवानाह-गौतम ! आहारको नो अनाहारकः, कस्यादिति चेत्, उच्यते, इह संसारिणामनाहारकत्वं विग्रहगती, न च सम्यग्मिच्यारष्टित्वं विग्रहगताववाप्यते, कालकरणायोगात्, 'सम्मामिच्छो न कुणइ कालं' [सम्यग्मिथ्या न करोति कालं] इति वचनात् , ततः सम्यग्मिध्यादृष्टेर्विग्रहगत्वभावतोऽनाहारकत्वाभावः, एवं चतुर्विंशतिदण्डकक्रमेण सर्वत्रापि वक्तव्यं, नवरमेकेन्द्रियविकलेन्द्रिया न वक्तव्याः, तेषां सम्यग्मिथ्यादृष्टित्वा ~142~ Page #143 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (१५) “प्रज्ञापना" - उपांगसूत्र-४ (मूलं+वृत्ति:) पदं [२८],-------------- उद्देशक: [२], ------------- दारं [४-७], -------------- मूलं [३१०] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र-[१५]उपांगसूत्र-[४] "प्रज्ञापना" मूलं एवं मलयगिरि-प्रणीता वृत्ति: प्रत सूत्रांक [३१०] दीप ३१० प्रज्ञापना सम्भवात् , एवं बहुवचनेऽपि वक्तव्यं, तद्यथा-'सम्मामिच्छहिट्ठी णं भंते ! जीवा किं आहारगा अणाहारगा ?, २८आहायाः मल- गो! आहारगा नो अणाहारगा, सम्मामिच्छट्टिी णं भंते ! नेरइया कि आ० अणा०, गो! आहारगानोरकपदे उय.वृत्ती. अणाहारगा, एवमेगिंदियविगलिंदियवजा जाव वेमाणिया' इति । गतं दृष्टिद्वारं, सम्प्रति संयतद्वारं-संयतत्वं च | देशः२ मनुष्याणामेव, तत्र द्वे पदे, तद्यथा-जीवपदं मनुष्यपदं च, तत्र जीवपदे सूत्रमाह-संजए णं भंते ! जीचे' इत्यादि ॥५१॥ गत्यादिसुगम, नवरमनाहारकत्वं केवलिसमुद्घातावस्थायामयोगित्वावस्थायां च वेदितव्यं, शेषकालमाहारकत्वं, 'एवं मण- प्वाहारकसेविति एवं मनुष्यविषये सूत्रं वक्तव्यं, तद्यथा-'संजए णं भंते ! मणूसे किं आहारए अणाहारए ?, गोसिय वादिःसू. आहारए सिय अणाहारए' भावनाऽनन्तरमेवोक्ता, 'पुहुत्तेणं तियभंगो'त्ति पृथक्त्वेन-बहुवचनेन जीवपदे मनुष्यपदे च प्रत्येकं भङ्गत्रिकं, तथैवं-सर्वेऽपि तावद्भवेयुराहारकाः, एष भनो यदा न कोऽपि केवली समुद्घातमयोगित्वं वा प्रतिपन्नो भवति तदा वेदितव्यः, अथवा आहारकाश्चानाहारकश्च, एष एकस्मिन् केवलिनि समवहते शैलेशी वा I गते प्राप्यते, अथवा आहारकाश्चानाहारकाच, एष बहुषु केवलिषु समयहतेषु शैलेशीगतेषु वा लभ्यते । असंयतसूत्रे एकवचने सर्वत्र स्थादाहारकः स्यादनाहारक इति वक्तव्यं, बहुवचने जीवपदे पृथिव्यादिषु च पदेषु प्रत्येकमाहारका | ॥५१८॥ KA अपि अनाहारका अपि इत्येष भङ्गः, शेषेषु तु नैरयिकादिषु स्थानेषु प्रत्येकं भङ्गत्रिकं, संयतासंयता-देशविरताः, ते च तिर्यक्रपञ्चेन्द्रिया मनुष्या वा न शेषाः, शेषाणां खभावत एव देशविरतिपरिणामाभावाद्, एवं चैतेषां त्रीणि पदा अनुक्रम [५६२-५६५] ~143~ Page #144 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (१५) “प्रज्ञापना” – उपांगसूत्र-४ (मूलं+वृत्तिः ) पदं [२८],-------------- उद्देशक: [२], ------------- दारं [४-७], -------------- मूलं [३१०] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र-[१५]उपांगसूत्र-[४] "प्रज्ञापना" मूलं एवं मलयगिरि-प्रणीता वृत्ति: प्रत सूत्रांक [३१०] दीप अनुक्रम [५६२-५६५] नि, तद्यथा-सामान्यतो जीवपदं तिर्यक्रपञ्चेन्द्रियपदं मनुष्यपदं च, एतेषु विष्वपि स्थानेषु एकवचने बहुवचने च आहारका भवन्ति, भवान्तरगतौ केवलिसमुद्घाताद्यवस्थासु च देशविरतिपरिणामाभावात् , नोसंयतोनोअसंयतोनोसंयतासंयतः, तचिन्तायां वे पदे, तद्यथा-जीवपदं सिद्धपदं च, उभयत्राप्येकवचने बहुवचने चानाहारकत्वमेव वक्तव्यं, न त्वाहारकत्वं, सिद्धानामनाहारकत्वात् । गतं संयतद्वारं, कषायद्वारं-'सकसाई णं भंते ! जीवे' इत्यादि, एकवचनविषयं सूत्रं सुगम, बहुवचने 'जीवेगिदियवज्जो तियभंगो'त्ति जीवपदे पृथिव्यादिषु च पञ्चसु पदेषु प्रत्येक आहारका अपि अनाहारका अपि वक्तव्यं, उभयेषामपि सकषायाणां सदैव तेषु स्थानेषु बहुत्वेन लभ्यमानत्वात् , |शेषेषु तु स्थानेषु भात्रिकं, 'कोहकसाई एवं चेच'त्ति क्रोधकषाय्यपि एवमेव-सामान्यतः सकषायवदवसेयः, तत्रा-2 पि जीवपदे पृथिव्यादिपदेषु चाभङ्गक, शेपेषु तु स्थानेषु भङ्गत्रिकमिति भावः, किं सर्वेष्वपि शेषेषु स्थानेषु भङ्गत्रिक?, नेत्याह-'नवरं 'देवेसु छन्भंगा' देवा हि खभावत एव लोभबहुला भवन्ति न क्रोधादिबहुलाः, ततः क्रोधकषायिण एकादयोऽपि लभ्यन्ते इति षड् भङ्गाः, तद्यथा-कदाचित् सर्वेऽप्याहारका एव क्रोधकषायिणः, एकस्यापि विग्रहगत्यापन्नस्थालभ्यमानत्वात् १, कदाचित्-सर्वेऽप्यनाहारकाः२, एकस्यापि क्रोधकपायिणः सत आहारकस्याप्राप्यमानत्वात् , कोधोदयो हि मानायुदयविविक्त एवेह विचक्ष्यते न मानायुदयसहितोऽपि, तेन क्रोधकपायिणः सतः कदा-1 चिदाहारकस्य सर्वथाऽप्यभावः, तथा कदाचिदेक आहारक एकोऽनाहारकः ३ कदाचिदेक आहारको बहवोऽनाहा SAREastatininternational ~144~ Page #145 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (१५) “प्रज्ञापना” – उपांगसूत्र-४ (मूलं+वृत्तिः ) पदं [२८], -------------- उद्देशक: [२], ------------- दारं [४-७], -------------- मूलं [३१०] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र-[१५]उपांगसूत्र-[४] "प्रज्ञापना" मूलं एवं मलयगिरि-प्रणीता वृत्ति: प्रत सूत्रांक serseseates [३१० दीप प्रज्ञापना रकाः ४, कदाचिद्रहव आहारका एकोऽनाहारकः ५, कदाचिहच आहारकाः यहवश्वानाहारका इति ६, मानकपा- २. या मल- यसूत्रं मायाकपायसूत्रं चैकवचने प्राग्वत् , बहुवचने विशेषमाह-माणकसाईसु' इत्यादि, मानकषायिषु मायाकषा- रकपदे - यवृत्ती. यिषु बहुवचनेन चिन्त्यमानेषु देवेषु नैरयिकेषु च प्रत्येक षड् मझाः, नैरयिका हि भवखभावतः क्रोधबहुला देवास्तु देशः २ लोभबहुलास्ततो देवानां नैरयिकाणां च मानकषायो मायाकषायश्च प्रविरल इति प्रागुक्तप्रकारेण षट् भङ्गाः, जीव- गत्यादि॥५१९॥ पदे पृथिव्यादिपदेषु च प्रत्येकमभङ्गकमाहारकाणामनाहारकाणां च मानकषायिणां मायाकषायिणां च प्रत्येक सदैव । प्वाहारकतेषु २ स्थानेषु बहुत्वेन लभ्यमानत्वात् , शेषेषु तु स्थानेषु भङ्गत्रिकं, लोभकपायसूत्रमप्येकवचने तथैव, बहुवचने विशे- वादिसू. ३१० पमाह-'लोभकसाईसु' इत्यादि, लोभकषायिषु नैरपिकेषु षट् भकास्तेषां लोभकषायस्वाल्पत्वात् , शेषेषु तु जीवैकेन्द्रियवर्जेपु स्थानेष्वपि भात्रिक, देवेष्वपि भात्रिकमिति भावः, तेषां लोभबहुलतया षड्भनयसम्भवात् , जीवे वेकेन्द्रियेषु च प्राग्वदेष एवं भरा. आहारका अप्यनाहारका अपि इति, 'अकसाई जहा नोसपणीणोअसणी'ति | अकपाविणो यथा नोसंजिनोऽसंजिन उक्तास्तथा वक्तव्याः, किमुक्तं भवति -अकपायिणोऽपि मनुष्याः सिद्धाथ, मनुष्या उपशान्तकषायादयो वेदितव्याः, अन्येषां सकपायित्वात, तत एतेषामपि त्रीणि पदानि, तद्यथा-सामा-IItem न्यतो जीवपदं मनुष्यपदं सिद्धपदं च, तत्र सामान्यतो जीवपदे मनुष्यपदे च प्रत्येकमेकवचने स्वादाहारका स्वादपानाहारक इति वक्तव्यं, सिद्धपदे त्वनाहारक एवेति, बहुवचने जीवपदे आहारका अपि अनाहारका अपीति, केवरि अनुक्रम [५६२-५६५] ~145 Page #146 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (१५) “प्रज्ञापना” – उपांगसूत्र-४ (मूलं+वृत्तिः ) पदं [२८], -------------- उद्देशक: [२], ------------- दारं [४-७], -------------- मूलं [३१०] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र-[१५]उपांगसूत्र-[४] "प्रज्ञापना" मूलं एवं मलयगिरि-प्रणीता वृत्ति: प्रत सूत्रांक [३१०] एयरटन दीप अनुक्रम [५६२-५६५] नामाहारकाणां सिद्धानामनाहारकाणां सदैव बहुत्वेन लभ्यमानत्वात् , मनुष्यपदे भऋत्रिकं, सर्वेऽपि तावद् भवेयुराहारकाः१ अथवा आहारकाचानाहारकश्च २ अथवा आहारकाचानाहारकाश्च ३ भावना च प्रागेवानेकशः कृता, सिद्धपदे त्वनाहारक एव । गतं कषायद्वारं, सम्प्रति ज्ञानद्वारम् , तत्र पाणी जहा सम्मदिट्टी, आभिणियोहियणाणी सुयणाणी य बेईदियतेइंदियचउरिदिएसु छम्भंगा, अवसेसेसु जीवादिओ तियभंगो जेसिं अस्थि, ओहिणाणी पंचिंदियतिरिक्खजोणिया आहारगाणो अणाहारगा, अबसेसेसु जीवादिओ तियर्भगो जेसिं अस्थि ओहिनाणं, मणपजवनाणी जीवा मणूसा य एगणवि पुहुत्तेणवि आहाणो अणाहारगा, केवलनाणी जहा नोसण्णीनोअसण्णी, दारं ७1 अण्णाणी मतिअणाणी सुयअण्णाणी जीवेमिंदियवज्जो तियभंगो, विभंगनाणी पंचिंदियतिरिक्खजोणिया मणूसा य आहारगाणो अणा०, अवसेसेसु जीवादियो तियभंगो, दारं ८ । सजोगीसु जीवेनिंदियवजो तियभंगो, मणजोगी वइजोगी जहा सम्मामिच्छदिट्ठी, नवरं पहजोगो विगलिंदियाणवि, कायजोगीसु जीवेगिदियवजो तियभंगो, अजोगी जीवमणूससिद्धा अणाहारगा, दारं ९। सागाराणागारोवउत्तेसु जीवेगिदियवजो तियभंगो, सिद्धा अणाहारगा, दारं १० । सवेदे जीवेगिंदियवो तियभंगो, इस्थिवेदपुरिसवेदेसुजीवादिओ तियभंगो, नपुंसगवेदए य जीवेर्गिदियवज्जो तियभंगो, अवेदए जहा केवलनाणी, दारं ११ ॥ ससरीरी जीवेगिदियवसो तियमंगो, ओरालियसरीरी जीवमसेसु तियभंगो, अवसेसा आहारगा नो अणाहारगा जेसिं अत्थि ओरालियसरीरं, बेउवियसरीरी आहारगसरीरी य अत्र (२८) आहार-पदे प्रथमे उद्देशके द्वाराणि (८, ९, १०, ११, १२, १३ ) 'ज्ञान', 'योगः', 'उपयोग, 'वेद', शरीरं,' पर्याप्ति:' आरब्धानि ~146~ Page #147 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (१५) “प्रज्ञापना" - उपांगसूत्र-४ (मूलं+वृत्ति:) पदं [२८], -------------- उद्देशक: [२], ------------- दारं [८-१३], -------------- मूलं [३११] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र-[१५]उपांगसूत्र-[४] "प्रज्ञापना" मूलं एवं मलयगिरि-प्रणीता वृत्ति: प्रत सूत्रांक प्रज्ञापनायामलयवृत्ती. [३११] ॥५२०॥ दीप अनुक्रम [५६६-५७१] आहारगा नो अणा० जेसि अस्थि, तेयकम्मसरीरी जीवेगिदियवज्जो तियभंगो, असरीरी जीवा सिद्धा य नो आहारगा आहाअणा दारं १२, आहारपजत्तीए पजते सरीरपजत्तीए पञ्जने इंदियपजत्तीए पजते आणापाणपजत्तीए पजत्तए भासा रकपदे उमणपजत्तीए पज्जचते एतासु पंचसुबि पजतासु जीवसु मणूसेसु य तियर्भगो, अवसेसा आहारगा नो अणाहारगा, देशः २ भासामणपजत्ती पंचिंदियाणं अवसेसाणं नस्थि, आहारपज्जत्तीअपजत्तए णो आहारए अणा०, एगणवि पुहुत्तेणवि, गत्यादिसरीरपजत्तीअपजत्तए सिय आहारए सिय अणाहारए, उवरिल्लियासु चउसु अपजचीसु नेरइयदेवमासेसु छन्भंगा, चाहारकअवसेसाणं जीवेगिदियवओ तियभगो, भासामणपजत्तएसु जीवेसु पंचिंदियतिरिक्खजोणिएसु य तियभंगो, नेरइयदेव | स्वादिःसू. मणुएसु छन्भंगा, सबपदेसु एगत्तपोहत्तेणं जीवादिया दंडमा पुच्छाए माणितबा जस्स जे अत्थि तस्स तं पुछिजति ३११ जस्स ज णत्थि तस्स तं न पुच्छिअति जाव भासामणपजचीअपजत्तएसु नेरहयदेवमणुएसु छम्भंगा, सेसेसु तियर्मगो (सूत्र ३११) आहारपयस्स बितिओ उद्देसो समत्तो ॥ अट्ठावीसइमं पर्य समत्तं ॥ २८॥ 'नाणी जहा सम्मदिहित्ति ज्ञानी यथा प्राक् सम्यग्दृष्टिरुक्तस्तथा वक्तव्यः, तद्यथा-नाणी णं भंते ! जीवे किं आहारए अणाहारए,गो। सिय आहारए सिय अणाहारए, नाणी णं भंते ! नेरहए कि आहारए अणाहारए.IN गो० सिय आ० सिय अणाहारए, एवं एगिदियवजं जाव वेमाणिए, नाणी णं भंते ! जीवा किं आहारगा अणाहारगा?, गो! आहारगावि अणाहारगावि, नाणी णं भंते ! नेरइया कि आहारगा अणाहारगा?, गोसधेवि ताव eeeeee e SAREastatin international ~147~ Page #148 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (१५) “प्रज्ञापना" - उपांगसूत्र-४ (मूलं+वृत्ति:) पदं [२८], -------------- उद्देशक: [२], ------------- दारं [८-१३], -------------- मूलं [३११] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र-[१५]उपांगसूत्र-[४] "प्रज्ञापना" मूलं एवं मलयगिरि-प्रणीता वृत्ति: प्रत सूत्रांक [३११] दीप अनुक्रम [५६६-५७१] होज आहारगा १, अहवा आहारगा य अणाहारगे य २ अहवा आहारगा य अणाहारगा य ३. एवं जाव थणियक-18 मारा, बेइंदियाणं पुच्छा, गो० सवेवि ताव होज आहारगा य १ अहवा अणाहारगा य २ अहवा आहारए य अणाहारए य ३, अहवा आहारगे य अणाहारगा ये ४, अहवा आहारगा य. अणाहारगे य ५, अहवा आहारगा [य अणाहारगा य ६, एवं तेइंदियचउरिदियावि भाणितचा, अवसेसा जाब बेमाणिया जहा नेरइया, सिद्धाणं पुच्छा, गो ! अणाहारगा य' इति, आभिनिवोधिकज्ञानिसूत्रे श्रुतज्ञानिसूत्रे चैकवचने प्राग्वदवसेयं, बहुवचने द्वित्रिचतुरिन्द्रियेषु षड भङ्गाः, अवशेषेषु तु जीवादिषु स्थानेषु एकेन्द्रियवर्जेपु भत्रिक, तबैवम्-'आभिनियोहियनापाणी णं भंते ! जीवा किं आहारगा अणाहारगा?, गो०! सवेवि ताव होज आहारगा १ अहवा आहारगा य अणाहापारगे य २ अहया आहारगाय अणाहारगा य ३ इत्यादि, तथा चाह-आभिणियोहियनाणी सुयनाणी य बेईदियतेई दियचउरिदिएसु छम्भंगा, अवसेसेसु जीवाइओ तियभंगो, जेसिं अस्थि' इति सुगम, नवरं 'जेसिं अस्थि' येषां जीवानामाभिनिवोधिकज्ञानश्रुतज्ञाने स्तस्तेषु भात्रिकं वक्तव्यं, न शेषेषु पृथिव्यादिविति, अवधिज्ञानसूत्रमेकवचने तथैव, बहुवचनचिन्तायां पञ्चेन्द्रियतिर्यग्योनिका आहारका एव न त्वनाहारकाः, कस्मादिति चेत्, उच्यते, इह पञ्चेन्द्रियतिरचामनाहारकत्वं विग्रहगती, न च तदानीं तेषां गुणप्रत्ययतोऽवधिसम्भवो, गुणानामेवासम्भवात् , नाप्यप्रतिपतितावधिर्देवो मनुष्यो वा तिर्यरुत्पद्यते, ततोऽवधिज्ञानिनः सतः पश्चेन्द्रियतिरश्चोऽनाहारकत्वायोगः, शेषेषु तु स्थानेष्येकेन्द्रिय SAREauratonintamatkomal ~148~ Page #149 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (१५) “प्रज्ञापना" - उपांगसूत्र-४ (मूलं+वृत्ति:) पदं [२८], -------------- उद्देशक: [२],------------- दारं [८-१३], -------------- मूलं [३११] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र-[१५]उपांगसूत्र-[४] "प्रज्ञापना" मूलं एवं मलयगिरि-प्रणीता वृत्ति: प्रत सूत्रांक [३११] सामान्यतो जीवपदे दीप १११ विकलेन्द्रियवर्जेषु प्रत्येकं भङ्गत्रिकं, तदेवाह-ओहिनाणी णं पंचिंदियतिरिक्खजोणिया आहारगा अवसेसेसु जीवाहो||२८आहामज्ञापनाया: मल तियभंगो जेसिं अस्थि ओहिणाण'मिति, मनःपर्यायज्ञानं मनुष्याणामेव, ततो द्वे पदे, तद्यथा-जीवपदं मनुष्यपदं चारकपदे जयवृत्ती. उभयत्रापि चैकवचने बहुवचने च मनःपर्यायज्ञानिन आहारका एव वक्तव्याः, न त्वनाहारकाः, विग्रहगत्याद्यवस्थाबां। HINIदेशः २ मनःपर्यायज्ञानासम्भवात् , केवलज्ञानी यथा प्राय नोसंज्ञीनोअसंज्ञी उक्तस्तथा वक्तव्यः, किमुक्तं भवति ।-केवलज्ञान-181 |गत्यादि॥५२॥ चिन्तायामपि त्रीणि पदानि, तद्यथा-सामान्यतो जीवपदं मनुष्यपदं सिद्धपदं च, तत्र सामान्यतो जीवपदे मनुष्य प्वाहारकपदे चैकवचने स्वादाहारका स्वादनाहारक इति वक्तव्यं, सिद्धपदे त्वनाहारक इति, बहुवचने सामान्यतो जीवपदे त्वादिःसू. आहारका अपि अनाहारका अपि, मनुष्यपदे भङ्गत्रिकं, तच्च प्रागेवोपदर्शितं, सिद्धपदे त्वनाहारका अपि । अज्ञानिसूत्र मत्यज्ञानिसूत्रं श्रुताज्ञानिसूत्र एकवचने प्रागिव, बहुवचनचिन्तायां जीवपदे एकेन्द्रियेषु च पृथिव्यादिषु प्रत्येकमाहा|रका अनाहारका अपि इति वक्तव्यं, शेषेषु तु भत्रिकं, विभज्ञानिसत्रमप्येकवचने तथैव, बहुवचनचिन्तायां पञ्चे|न्द्रियतियेग्योनिका मनुष्याचाहारका एव वक्तव्याः, न त्वनाहारकाः, विभङ्गज्ञानसहितस्य विग्रहगया तियेपश्चन्द्रि येषु मनुष्येषु चोत्पत्त्यसम्भवात् , अवशेषेषु स्थानेषु एकेन्द्रियपिकलेन्द्रियवर्जेषु प्रत्येकं भङ्गत्रिकं । गतं ज्ञानद्वारं, सम्प्रति ॥२१॥ IS योगद्वार-तत्र सामान्यतः सयोगिसूत्रमेकवचने तथैव, बहुवचने जीवएकेन्द्रियपदानि वर्जयित्वा शेषेषु स्थानेषु मात्रिक, जीवपदे पृथिव्यादिपदेषु च पुनः प्रत्येकमाहारका अपि अनाहारका अपीति भना, उभयेषामपि सदेव तेषु अनुक्रम [५६६-५७१] ~149~ Page #150 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (१५) “प्रज्ञापना" - उपांगसूत्र-४ (मूलं+वृत्ति:) पदं [२८], -------------- उद्देशक: [२], ------------- दारं [८-१३], -------------- मूलं [३११] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र-[१५]उपांगसूत्र-[४] "प्रज्ञापना" मूलं एवं मलयगिरि-प्रणीता वृत्ति: प्रत सूत्रांक [३११] स्थानेषु बहुत्वेन लभ्यमानत्वात् 'मणजोगी वइजोगी जहा सम्मामिच्छद्दिवी यत्ति मनोयोगिनो वाग्योगिनव यथा । प्राक् सम्यग्मिथ्यादृष्टय उक्तास्तथा वक्तव्याः, एकवचने बहुवचने चाहारका एव वक्तव्या न त्वनाहारका इति भावः, नवरं 'वइजोगो विगलिंदियाणवि'त्ति नवरमिति-सम्यग्मिध्यादृष्टिसूत्रादत्रायं विशेषः, सम्यग्मिण्यादृष्टित्वं विकलेन्द्रियाणां नास्तीति तत्सूत्रं तत्र नोकं, वाग्योगः पुनर्विकलेन्द्रियाणामप्यस्तीति तत्सूत्रमपि वाग्योगे वक्तव्यं, तबैवम्-'मणजोगी णं भंते ! जीवे किं आहारए अणाहारए ?, गो! आहारए नो अणाहारए, एवं एगिदियविगलिंदिययज जाच वेमाणिए, एवं पुडुत्तेणवि, वइजोगीणं भंते ! किं आहा अणा० १, गो! आहारए नो अणाहारए, एवं एगिदियवजं जाव वेमाणिए, एवं पुहत्तेणवित्ति, काययोगिसूत्रमप्येकवचने बहुवचने च सामान्यतः सयोगिसूत्रमिव, अयोगिनो मनुष्याः सिद्धाश्च, तेनात्र त्रीणि पदानि, तद्यथा-जीवपदं मनुष्यपदं सिद्धपदं च, त्रिष्वपि स्थानेप्येकवचने बहुवचने चानाहारकत्वमेव । गतं योगद्वारं, अधुनोपयोगद्वारमाह-तत्र साकारोपयोगसूत्रे अनाकारोपयोगसूत्रे च प्रत्येकमेकवचने सर्वत्र स्वादाहारकः स्यादनाहारक इति वक्तव्यं, सिद्धपदे त्वनाहारक इति, बहुवचने। जीवपदे पृथिव्यादिपदेषु चाहारका अपि अनाहारका अपि इति भङ्गः, शेषेषु भङ्गत्रिकं, सिद्धास्त्वनाहारका इति, सूत्रोल्लेखस्त्वयम्-'सागारोवउत्ते ण भंते ! जीवे किं आहारए अणाहारए ?, गो०! सिय आहारए सिय अणाहारए। इत्यादि । गतं उपयोगद्वारं, वेदद्वारे सामान्यतः सवेदसूत्रमेकवचने स्वादाहारकः स्यादनाहारक इति, बहुवचने जीव setatotoccereocce दीप अनुक्रम [५६६-५७१] eseleseserce ~150~ Page #151 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (१५) “प्रज्ञापना" - उपांगसूत्र-४ (मूलं+वृत्ति:) पदं [२८], -------------- उद्देशक: [२], ------------- दारं [८-१३], -------------- मूलं [३११] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र-[१५]उपांगसूत्र-[४] "प्रज्ञापना" मूलं एवं मलयगिरि-प्रणीता वृत्ति: प्रत सूत्रांक प्रज्ञापनायाः मलयवृत्ती. ॥५२या देशः २ [३११] दीप अनुक्रम [५६६-५७१] पढमेकेन्द्रियांश्च वर्जयित्वा शेपेप स्थानेष भात्रिकं. जीवपदे एकेन्द्रियेषु च पुनः प्रत्येकमभाकं, आहारका अनाहा-18TRआडा. |रका अपीति, खीवेदसूत्रं पुरुषवेदसूत्रं च एकवचने तथैव, नवरमत्र नैरयिकैकेन्द्रियविकलेन्द्रिया न वक्तव्याः , तेषां रकपदे उनपुंसकत्वात् , बहुवचने जीवादिषु पदेषु प्रत्येकं भङ्गत्रिकं, नपुंसकवेदेऽपि सूत्रमेकवचने तथैव, नवरमत्र भवनपतिव्यन्तरज्योतिष्कवैमानिका न वक्तव्यास्तेषामनपुंसकत्वाद् , बहुवचने जीवैकेन्द्रियवर्जेपु भङ्गत्रिक, जीवपदे एकेन्द्रिय- गत्यादिपदेषु च पृथिव्यादिपु पुनरभकं प्रागुक्तखरूपमिति, अवेदो यथा केवली तथा एकवचने बहुवचने च वक्तव्यः, वाहारकजीवपदे मनुष्यपदे च एकवचने स्यादाहारकः स्यादनाहारक इति, बहुवचने जीवपदे आहारका अपि अनाहारका । त्वादिसू. ३११ | अपि, मनुष्येषु भङ्गत्रिकं, सिद्धत्वेऽनाहारका इति वक्तव्यमिति भावः । गतं वेदद्वारं, शरीरद्वारे सामान्यतः शरीरसूत्रे सर्वत्रैकवचने स्यादाहारकः स्यादनाहारक इति, बहुवचने जीवएकेन्द्रियवर्जेषु शेषेषु स्थानेषु प्रत्येकं भङ्गत्रिक, जीवपदे पृथिव्यादिपदेषु च प्रत्येकमभङ्गकं प्रागुक्तमिति, औदारिकशरीरसूत्रमेकवचने तथैव, नवरमत्र नैरयिकभवनपतिव्यन्तरज्योतिष्कवैमानिका न वक्तव्यास्तेषामौदारिकशरीराभावात् , बहुवचने जीवपदे मनुष्यपदेषु च प्रत्येकं भात्रिकं, तद्यथा-सर्वेऽपि तावद्भवेयुराहारकाः, एष भको यदान कोऽपि केवली समुद्घातगतोऽयोगी वा, अथवा आ M॥५२॥ हारकाथानाहारकश्च, एष एकस्मिन् केवलिनि समुद्घातगते अयोगिनि वा सति प्राप्यते, अथवा आहारकाचानाहारकाच, एष भको बहुषु केवलिसमुघातगतेषु अयोगिषु वा सत्सु वेदयितव्यः, शेषास्त्वेकेन्द्रियहीन्द्रियत्रीन्द्रिय ~151~ Page #152 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (१५) “प्रज्ञापना" - उपांगसूत्र-४ (मूलं+वृत्ति:) पदं [२८], -------------- उद्देशक: [२], ------------- दारं [८-१३], -------------- मूलं [३११] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र-[१५]उपांगसूत्र-[४] "प्रज्ञापना" मूलं एवं मलयगिरि-प्रणीता वृत्ति: प्रत सूत्रांक [३११] चतुरिन्द्रियतिर्यपञ्चेन्द्रिया आहारका एव वक्तव्याः, न त्वनाहारकाः, विग्रहगत्युत्तीर्णानामेवौदारिकशरीरसम्भवात्, वैक्रियआहारकशरीरिणश्च सर्वेऽप्येकवचने बहुवचने चाहारका एव न त्वनाहारकाः, नवरं येषां वैक्रियमाहारक या सम्भवति त एव वक्तव्या नान्ये, तत्र वैक्रियं नैरयिकभवनपतिवायुकायिकतिर्यपञ्चेन्द्रियमनुष्यव्यन्तरज्योति-11 कवैमानिकेषु आहारकं मनुष्यष्वेव, सूत्रोलेखश्चायं-उधियसरीरी णं भंते ! जीवे किं आहारए अणाहारए १, गोयमा ! आ० णो अणा०, वेउवियसरीरे णं भंते ! णेरइए कि आहारए अणाहारए ?, गो.! आ० नो अणा.' इत्यादि, तैजसकार्मणशरीरिसूत्रे चैकवचने सर्वत्र स्थादाहारकः स्यादनाहारक इति, बहुवचने जीवैकेन्द्रियवर्जेषु शेषेषु स्थानेषु भङ्गत्रिक, जीवपदे एकेन्द्रियेषु च पुनरभक्तकं, अशरीरिणः-सिद्धास्तेन तत्र द्वे एव पदे, तद्यथा-जीवाः सिद्धाश्च, तत्र एकवचने बहुवचने चोभयत्राप्यनाहारका एव । गतं शरीरद्वार, सम्प्रति पर्याप्सिद्वारम्-तत्रागमे पर्यातयः पञ्च, भाषामनःपर्याप्त्योरेकत्वेन विवक्षणात्, तथा चाहारकपर्याप्त्या पर्यास शरीरपर्याच्या पर्याप्त इन्द्रियपर्या-18 स्या पर्याप्से प्राणापानपर्याप्त्या पर्याप्से भाषामनःपर्याप्त्या पर्याप्ते चिन्त्यमाने, अत्रैव सर्वेसङ्कलनामाह-एतासु पञ्च-४ खपि पर्याप्तिषु समर्थितासु चिन्त्यमानाखिति शेषः प्रत्येकमेकवचने जीवपदे मनुष्यपदे च स्यादाहारका स्वादनाहारक इति, शेषेणु तु स्थानेषु आहारक इति, बहुवचने 'जीवेसु मणुस्सेसु य तियभंगोत्ति जीवपदे मनुष्यपदे च भङ्गत्रिकं वक्तव्यं, तचौदारिकशरीरिसूत्रमिव भावनीयं, अवशेषाः सर्वेऽप्याहारका वक्तव्याः, नवरं भाषामनःपर्याप्सि: 9202090805098 दीप अनुक्रम [५६६-५७१] PHRumaramorg ~152 Page #153 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (१५) “प्रज्ञापना" - उपांगसूत्र-४ (मूलं+वृत्ति:) पदं [२८], -------------- उद्देशक: [२],------------- दारं [८-१३], -------------- मूलं [३११] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र-[१५]उपांगसूत्र-[४] "प्रज्ञापना" मूलं एवं मलयगिरि-प्रणीता वृत्ति: प्रत सूत्रांक [३११] दीप अनुक्रम [५६६-५७१] प्रज्ञापना पञ्चेन्द्रियाणामेवेति तत्सूत्रे एकेन्द्रियविकलेन्द्रिया न वक्तव्याः, किन्तु शेषाः, एतदेवाह-'भासामणपजत्ती पंचिंदि-२८आहा याणं अवसेसाणं नत्थि' इति, आहारपर्याप्त्यपर्यासकसूत्रे एकवचने सर्वत्राप्यनाहारको वक्तव्यो, नो आहारकः, या: मल रकपदे उ देशः २ यवृत्ती. आहारपर्याप्त्याऽपर्याप्सो विग्रहगतावेच लभ्यते, उपपातक्षेत्रं प्राप्तस्य प्रथमसमय एवाहारपर्याप्त्या पर्याप्सत्वभावाद् EN गत्यादिअन्यथा तस्मिन् समये आहारकत्वानुपपत्तेः, बहुवचने त्वनाहारका इति, शरीरपर्याप्त्यपर्याप्तसूत्रे एकवचने सर्वत्र ॥५२॥ प्वाहारक| खादाहारकः स्यादनाहारक इति, तत्र विग्रहगतावनाहारक उपपातक्षेत्रप्राप्तस्तु शरीरपयोप्तिपरिसमाप्ति यावदाहारक इति, एवमिन्द्रियपर्याप्त्यपर्याप्तसूत्रे प्राणापानपर्याप्त्यपर्याप्तसूत्रे भाषामनःपर्याप्त्यपर्याप्तसूत्रे च प्रत्येक एकवचने स्वादाहारकः स्यादनाहारक इति वक्तव्यं, बहुवचने 'उवरिलियासु' इत्यादि, उपरितनीषु शरीरापर्याप्तिप्रभृतिषु चतसृषु अपर्याप्तिधु चिन्त्यमानासु प्रत्येक नैरयिकदेवमनुष्येषु षड् भङ्गा वक्तव्याः, तद्यथा-कदाचित्सर्वेऽप्यनाहारका एव १ कदाचित्सर्वेऽप्याहारका एव २ कदाचिदेक आहारक एकोऽनाहारकः ३ कदाचिदेक आहारको बहवोऽनाहारकाः कदाचिद्वहव आहारकाः एकश्चानाहारकः ५कदाचिदहव आहारका बहपश्चानाहारकाः ६, अवशेषाणां नैरयिकदेवम नुष्यव्यतिरिक्तानां जीवैकेन्द्रियवर्जानां भात्रिक वक्तव्यं, तद्यथा-सर्वेऽपि तावद्भवेयुः आहारकाः १ अथवा आहा- ५२३॥ आशा रकाध अनाहारकश्च २ अथवा आहारकाथानाहारकाध ३, जीवपदे एकेन्द्रियपदेषु च पुनः शरीरपयोत्यपयोससूत्रे इन्द्रियपयोत्यपयोप्ससूत्रे प्राणापानपर्याप्त्यपर्याप्तसूत्रे च प्रत्येकमभङ्गक आहारका अपि अनाहारका अपि, उमयेषामपि। SARERainintenmarana ~153~ Page #154 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (१५) “प्रज्ञापना" - उपांगसूत्र-४ (मूलं+वृत्ति:) पदं [२८], -------------- उद्देशक: [२], ------------- दारं [८-१३], -------------- मूलं [३११] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र-[१५]उपांगसूत्र-[४] "प्रज्ञापना" मूलं एवं मलयगिरि-प्रणीता वृत्ति: प्रत सूत्रांक [३११] दीप अनुक्रम [५६६-५७१] च सदा बहुत्वेन लभ्यमानत्वात् , भाषामनःपर्याप्त्यपर्याप्सकास्त्वेकेन्द्रियविकलेन्द्रिया न भवन्ति, किन्तु पञ्चेन्द्रिया एव, येषां हि भाषामनःपर्याप्तिसम्भवोऽस्ति त एव तत्पर्याप्यपर्यासकाः प्रोच्यन्ते, न शेषा इति, ततस्तत्सूत्रे बहुवचने जीवपदे पञ्चेन्द्रियतिर्यग्योनिकपदे च भङ्गत्रिकं, पञ्चेन्द्रियतिर्यञ्चो हि सम्मूर्छिमाः सदैव बहयो लभ्यन्ते, ततो यावदद्याप्यन्यो विग्रहगत्यापन्नः पञ्चेन्द्रियतिर्यग् न लभ्यते तावदेष भङ्गः-सर्वेऽपि तावद् भवेयुराहारका इति १, एकस्मिन् तस्मिन् विग्रहगत्यापन्ने लभ्यमाने द्वितीयो भङ्गः-आहारकाश्चानाहारकश्चेति २, यदा तु विग्रहगत्यापन्ना अपि बहवो लभ्यन्ते तदा तृतीयो भङ्गा-आहारकाचानाहारकाश्चेति ३, जीवपदेऽपि भङ्गत्रिकं एतदपेक्षया प्रत्येयं, नैरयिकदेवमनुष्येषु प्रत्येकं पडू भङ्गाः, ते च प्रागेवोक्ताः, इह भव्यपदादारभ्य प्राय एकत्वेन बदुत्वेन च वैविक्त्येन सूत्राणि जीवादिदण्डकक्रमेण नोक्तानि ततो मा भून्मन्दमतीनां सम्मोह इति तद्विषयमतिदेशमाह-'सधपएसु एगचे सादि, एते जीवादयो दण्डकाः सर्वपदेषु-सर्वेष्वपि पदेषु एकत्वेन बदुत्वेन च पृच्छया उपलक्षणमेतन्निवंचनेन। मणितव्याः, किं सर्वत्राप्यविशेषेण कर्त्तव्याः १, नेत्साह-'जस्से सादि, यस्य यदस्ति तस्य तत्पृच्छयते-तद्विषयं सूत्रं भण्यते, यस्य पुनः यन्नास्ति न तस्य तत्प्रष्टव्यं-न तद्विषयं तस्य सूत्रं वक्तव्यमिति भावः, कियडूरं यावदेवं कर्तव्यमिति शङ्कायां चरमदण्डकवक्तव्यतामुपदिशति-'जाव भासामणपज्जतीए अपज्जत्तपसु' इत्यादि, भाविताथै, इहा|धिकृतार्थभावनार्थमिमाः पूर्वाचार्यप्रतिपादिता गाथा:-"सिद्धेगिंदियसहिया जहिं तु जीवा अभंगयं तत्थ । सिद्धे tateracticersersesectsters SARERatinintamatkarma ~154~ Page #155 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (१५) “प्रज्ञापना" - उपांगसूत्र-४ (मूलं+वृत्ति:) पदं [२८], -------------- उद्देशक: [२], ------------- दारं [८-१३], -------------- मूलं [३११] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र-[१५]उपांगसूत्र-[४] "प्रज्ञापना" मूलं एवं मलयगिरि-प्रणीता वृत्ति: प्रत सूत्रांक [३११] प्रज्ञापनाया मलयवृत्ती. ५२४|| दीप अनुक्रम [५६६-५७१] गिदिययजेहिं होइ जीवहिं तियभंगो ॥१॥ असगणीसु य नेरइय देवमणुएसु हाँति छभंगा । पुढविदगतरुगणेसु य81२८आहाछन्भंगा तेउलेसाए ॥ २॥ कोहे माणे माया छम्भंगा सुरगणेसु सन्चेसुं । माणे माया लोभे रइएहिपि छन्भंगारपदे उद्दे॥३॥ आभिणियोहियनाणे सुयनाणे खलु तहेव सम्मत्ते । छम्भंगा खलु नियमा चियतियचउरिदिएमु भवे ॥ २ सू. उवरिलापजत्तीसु चउसु णेरइयदेवमणुएसुं । छम्भंगा खलु नियमा बज्जे पढमा उ अपजत्ती ॥५॥सण्णी वि-RI ३११ सुद्धलेसा संजय हिद्विल तिसु य नाणेसु । थीपुरिसाण य वेदेखि छन्भंग अवेय तियभंगो ॥६॥ सम्मामिच्छामणवामणनाणे बालपंडियविउची । आहारसरीरंमि य नियमा आहारया होति ॥७॥ ओहि मि विर्भगमि य नियमा आहारया उ नायबा । पंचिंदिया तिरिच्छा मणुया पुण होति विभंगे ॥८॥ ओरालसरीरं मि य पज्जत्तीणं च पंचसु तहेव । तियभंगो जियमणुएसु होति आहारगा सेसा ॥९॥ णोभवअभविय लेसा अजोगिणो तय होंति असरीरी। पढमाए अपजतीऍ ते उ नियमा अणाहारा ॥१०॥ सन्नासन्नविउत्ता अवेय अकसाइणो य केवलिणो। तियभंग एकवयणे सिद्धाऽणाहारया होंति ॥ ११॥" एताश्च सर्वा अपि गाथा उक्तार्थप्रतिपादकत्वाद् भाविता इति न भूयोभाव्यन्ते ग्रन्थगौरवमयात,नवरं, 'एक्कवयणे सिद्धाणाहारया होति' इति 'एकवयणे' इत्यत्र तृती |॥५२४॥ यार्थे सप्तमी एकवचनेन एकार्थेनेति भावः, सर्वत्र सिद्धा अनाहारका भवन्तीति विज्ञेयम् ॥ इति श्रीमलयगिरिविरचि-18। तायां प्रज्ञापनाटीकायां आहारपदस्य द्वितीय उद्देशकः परिसमाप्तः॥२॥ समासमष्टाविंशतितममाहाराख्यं पदस् ॥२८॥ अत्र पद (२८) "आहार" परिसमाप्तम् ~155~ Page #156 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (१५) “प्रज्ञापना” – उपांगसूत्र-४ (मूलं+वृत्ति:) पदं [२९], -------------- उद्देशक: -,------------- दारं --------------- मूलं [३१२] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र-[१५]उपांगसूत्र-[४] "प्रज्ञापना" मूलं एवं मलयगिरि-प्रणीता वृत्ति: अथ एकोनत्रिंशत्तमं उपयोगाख्यं पदं ॥ २९ ॥ प्रत सूत्रांक [३१२] दीप अनुक्रम [५७२] तदेवमुक्तमष्टाविंशतितममाहाराख्यं पदं, साम्प्रतमेकोनत्रिंशत्तममारभ्यते-अस्य चायमभिसम्बन्धः-इहानन्तरपदे गतिपरिणामविशेष आहारपरिणाम उक्तः, इह तु ज्ञानपरिणामविशेषः उपयोगः प्रतिपाद्यते, तत्र चेदमादिसूत्रम् काविहे गं भंते । उवओगे पं०१, गोदुविहे उवओगे पं०,०-सागारोवओगे य अणागारोवओगे य, सागारोवओगे णं भंते ! कतिविधे पं०१, गो.! अट्टविहे पं०, तं०-आभिणिबोहियनाणसागारोबओगे सुयणाणसामारोवओगे ओहिणाणसा० मणपज्जवनाणसा० केवलनाणसा०मतिअण्णाणसा० सुयअण्णाणसा०विभंगणाणसा० अणागारोबओगे णं भंते! कतिविहे पं०१, गो. चउबिहे पं०, ०-चपखुर्दसणअणागारोवओगे अचक्खुदंसणअणा० ओहिदसणअणागा. केवलदसणअणागारोवओगे य। एवं जीवाण, नेरइयाण भंते! कतिविधे उवओगे पं०१, गो० दुविधे उवओगे पं०,०-- सागारोवओगे य अणागारोवओगे य, नेरइयाण भंते ! सागारोवओगे काविहे पं०१, गो ! छबिहे पं०, ०–मतिणाणसागारोवओगे सुयणाणसा० ओहिणाणसा० मतिअण्णाणसा० सुयअण्णाण विभंगणाणसा०, नेरइया णं भंते ! अणागारोवओगे काविहे पं० त०१, गो! तिविहे पं०-चक्खुदंसण अचक्खुदसण ओहिदसणअणा०, एवं जाव थणियकुमाराणं । पुढविकाइयाणं पुच्छा, गो दु० उवओगे पं०,०--सागारो० अणागारोब०, पुढवि० सागारोवोगे कतिविधे पं०१, मो० 99296020827980282929 SARERatinintenarasna Hirauasaram.org अथ पद (२९) "उपयोग" आरब्धम् ~156~ Page #157 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (१५) “प्रज्ञापना” – उपांगसूत्र-४ (मूलं+वृत्ति:) पदं [२९], -------------- उद्देशक: -,------------- दारं --------------- मूलं [३१२] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र-[१५]उपांगसूत्र-[४] "प्रज्ञापना" मूलं एवं मलयगिरि-प्रणीता वृत्ति: प्रज्ञापनाया मलयवृत्ती. २९ उपयोगपदे सूत्रं ३१२ प्रत सूत्रांक [३१२] ॥५२५॥ दीप अनुक्रम [५७२] दु० ५०, ०-मतिअण्णाण० सुयअ०, पुढविका० अणागारोवओगे कतिविधे पं०१, मो० ! एगे अचक्खुदसणअणागारोवओगे पं०, एवं जाव वणप्फइकाइयाणं । बेइंदिगाणं पुच्छा, गो०! दुविधे उवओगे पं०,०-सागारोबओगे अणागारोवओगे य, बेइंदियाणं भंते! सागारोवओगे कतिविधे पं०१,गो! चउबिहे पं०,०-आभिणि सुय० मतिअण्णाण सुतअण्णाणसा०, बेइंदियाणं अणा० कइ०५०, गो०! एगे अचखुर्दसण अणागारोवओगे, एवं तेइंदियाणवि, चउरिदियाणवि एवं चेव, नवरं अणागारोबओगे दुविधे पं००-चक्खुदंसणअणा० अचक्खुदसणअणा० । पंचिंदियतिरिक्खजोणियाणं जहा नेरइयाणं । मणुस्साणं जहा ओहिए उवओगे भणितं तहेव भाणित । वाणमंतरजोतिसियवेमाणियाणं भंते 10 जहा मेरइयाणं । जीवा णं भंते ! किं सागारोवउत्ता अणागारोवउत्ता, गो! सागारोवउचावि अणा०, से केणडेणं भंते । एवं बुधइ जीवा सागारोवउचावि अणा०, गो० जेणं जीवा आभिणिचोहियणाण सुय०ओहिमण केवल०महअणाणसुयअण्णाणविभंगणाणोवउत्ताते णं जीवा सागारोवउत्ता, जेणं जीवा चक्खुदंसणअचक्खुदसण ओहिदसणकेवलदसणोवउत्ता ते णं जीरा अणागारोवउत्ता, से तेणद्वेणं गो! एवं वुचह--जीवा सागारोवउत्ताचि अणागारो०, नेरइया गं भंते । किं सागारोवउत्ता अणा०१, मो० नेरइया सांगारोवउत्तावि अणागा०, से केणटेणं भंते ! एवं चुचति', गो० जे नेरइया आभिणियोहियणाण सय ओहि मतिअण्णाणसुय० विभंगनाणोवउत्ता ते ण नेरइया सागा०, जे ण नेरइया चक्खुदसणअचखुर्दसणओहि० ते ण नेरइया अणागारोवउत्ता, से तेणद्वेणं गो० एवं बु० जाव सागारोवउत्तावि अणागारोबउत्ताचि, एवं जाव थणियकुमारा। पुढविकाइयाणं पुच्छा, गो० तहेव जाच जेणं पुढवि० मतिअण्णाणसुयअ ॥५२॥ Keeeeeese ॐasaya92929 ~157~ Page #158 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (१५) “प्रज्ञापना” – उपांगसूत्र-४ (मूलं+वृत्ति:) पदं [२९], -------------- उद्देशक: -,------------- दारं --------------- मूलं [३१२] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र-[१५]उपांगसूत्र-[४] "प्रज्ञापना" मूलं एवं मलयगिरि-प्रणीता वृत्ति: Orces प्रत सूत्रांक [३१२] ण्णाणोवउत्ता ते णं पुढवि० सागारोब०, जे णं पुढवि. अचक्खुदंसणोवउत्ता ते णं पुढ० अणागारोवउत्ता, से तेणडेणं गो! एवं बु० जाव वणफइकाइया । बेइंदियाणं भंते ! अट्ठसहिया तहेव पुच्छा, गो०! जाव जे गं बेइंदिया आमिणिबोहिय०सुयणाणमतिअण्णाणसुयअण्णाणोवउत्चा ते गं बेइंदिया सागारोवउत्ता, जे णं इंदिया अचक्खुदंसणोवउत्ता तेणं अणागा०, से तेणद्वेणं, गो! एवं बु० एवं जाव चउरिदिया, गवरं चक्खुदंसणं अमहियं चउरिदियाणंति, पंचिंदियतिरिक्खजोणिया जहा नेरइया, मणूसा जहा जीवा, वाणमंतरजोतिसियवेमाणिया जहा नेरहया (सूत्र ३१२) पण्णवणाए भगवईए एगोणतीसइमं उवओगपर्य समत्तं ॥ २९ ॥ 'कइविहे णं भंते ! उबओगे पं.' कतिविधः-कतिप्रकारः, सूत्रे एकारो मागधभाषालक्षणवशात् , णमिति वाक्यालती, भदन्त !-परमकल्याणयोगिन् । 'उपयोगः' उपयोजनमुपयोगः भावे घन्, यद्वा उपयुज्यते-वस्तुप-10 रिच्छेदं प्रति व्यापार्यते जीवोऽनेनेत्युपयोगः-पुंनाम्नि घ' इति करणे धप्रत्ययो बोधरूपो जीवस्य तत्त्वभूतो व्यापारः प्रज्ञप्तः-प्रतिपादितः १, भगवानाह-'गोयमे त्यादि, आकार:-प्रतिनियतोऽर्थग्रहणपरिणामः, 'आगारो अ8 |विसेसो' इति वचनात् , सह आकारेण वर्तत इति साकारः स चासावुपयोगच साकारोपयोगः, किमुक्तं भवति ?-11 सचेतने अचेतने वा वस्तुनि उपयुआन आत्मा यदा सपर्यायमेव वस्तु परिच्छिनत्ति तदा स उपयोगः साकार उच्यते इति, स च कालतः छमस्थानामन्तर्मुहू कालं केवलिनामेकसामयिका, तथा न विद्यते यथोक्तरूप आकारो दीप अनुक्रम [५७२] eseseeeeserve ~158~ Page #159 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (१५) “प्रज्ञापना" - उपांगसूत्र-४ (मूलं+वृत्ति:) पदं [२९], -------------- उद्देशक: -,------------- दारं --------------- मूलं [३१२] प्रज्ञापना- य. वृत्ती. या:मल न गर प्रत ॥५२६॥ सूत्रांक [३१२] यत्र सोऽनाकारः स चासावुपयोगश्च अनाकारोपयोगः, यस्तु वस्तुनः सामान्यरूपतया परिच्छेदः सोऽनाकारोप-18|२९ उपयोगः स्कन्धावारोपयोगवदिस्यर्थः, असावपि छमस्थानामान्तर्मुहूर्त्तिकः परमनाकारोपयोगकालात् साकारोपयोगका-INI योगपदे लः सङ्ख्येयगुणः प्रतिपत्तव्यः, पर्यायपरिच्छेदकतया चिरकाललगनात्, छद्मस्थानां तथाखाभाब्यात्, केवलिनां सूत्रं ११२ त्वनाकारोऽप्युपयोग एकसामयिका, चशच्दौ खगतानेकभेदसूचकौ, तत्र साकारोपयोगभेदानभिधित्सुरिदमाह'सागारोवओगे णं भंते ! इति, अर्थाभिमुखो नियतः-प्रतिनियतस्वरूपो बोधो-बोधविशेषो अभिनियोधः अ-11 |भिनियोध एव आभिनियोधिकं, अभिनियोधशब्दस्य विनयादिपाठाभ्युपगमात् 'विनयादिभ्य' इत्यनेन खार्थे इकण्| प्रत्ययः, 'अतिवर्तन्ते खार्थे प्रत्ययकाः प्रकृतिलिङ्गवचनानी'तिवचनादत्र नपुंसकता, यथा विनय एव वैनयिकमित्य-11 त्र, अथवा अभिनिबुध्यतेऽस्मादस्मिन्वेति अभिनिबोधः-तदावरणकर्मक्षयोपशमस्तेन निवृत्तमाभिनिवोधिकं तथा तज्ज्ञानं च आभिनिवोधिकज्ञानं, स च इन्द्रियमनोनिमित्तो योग्यदेशावस्थितवस्तविषयः स्फुटप्रतिभासो बोधवि-16 | शेष इत्यर्थः, स चासौ साकारोपयोगच आभिनिषोधिकज्ञानसाकारोपयोगः, एवं सर्वत्रापि समासः कर्त्तव्यः, तथा श्रवणं श्रुतं-वाच्यवाचकभावपुरस्सरीकारेण शब्दसंस्पृष्टार्थग्रहणहेतुरुपलब्धिविशेषः, एवमाकारं वस्तु घटशब्दवाच्यं ॥५२॥ जलधारणाद्यर्थक्रियासमर्थमित्यादिरूपतया प्रधानीकृतः समानपरिणामः शब्दार्थपर्यालोचनानुसारी इन्द्रियमनोनिमितोऽवगमविशेष इत्यर्थः, श्रुतं च तत् ज्ञानं च श्रुतज्ञानं, ततो भूयः साकारोपयोगशब्देन विशेषणसमासः, तथाऽवश दीप अनुक्रम [५७२] Genercedeseयट 202929 ~159~ Page #160 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (१५) “प्रज्ञापना” – उपांगसूत्र-४ (मूलं+वृत्ति:) पदं [२९], -------------- उद्देशक: -,------------- दारं --------------- मूलं [३१२] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र-[१५]उपांगसूत्र-[४] "प्रज्ञापना" मूलं एवं मलयगिरि-प्रणीता वृत्ति: प्रत सूत्रांक [३१२] ब्दोऽधःशब्दार्थः, अब-अधो विस्तृत वस्तु धीयते-परिच्छिद्यतेऽनेनेत्यवधिः, यद्वा अवधिः-मर्यादा रूपिण्वेव द्रव्येषु परिच्छेदकतया प्रवृत्तिरूपा तदुपलक्षितं ज्ञानमप्यवधिः, अवधिश्चासौ ज्ञानं चावधिज्ञानं, तथा परिः-सर्वतो, भावे अयनं अवः, 'तुदादिभ्योऽनका वित्यधिकारे 'अकिती चे'त्यकारप्रत्ययः, अवनं गमनमिति पर्यायाः, परि | अवः पर्यवः, मनसि मनसो वा पर्यवः मनःपर्ययः, सर्वतस्तत्परिच्छेद इत्यर्थः, पाठान्तरं पर्यय इति, तत्र पर्ययणं पर्ययः, भावेऽल्प्रत्ययः, मनसि मनसो वा पर्ययः मनःपर्ययः, सर्वतस्तत्परिच्छेद इत्यर्थः, स चासौ ज्ञानं च मनःपवज्ञान मनःपर्ययज्ञानं वा, अथवा मनःपर्यायेति पाठान्तरं, तत्र मनांसि पर्येति-सर्वात्मना परिच्छिनत्ति मनःपयायं, 'कर्मणोऽण' मनःपर्यायं च तत् ज्ञानं च मनःपर्यायज्ञानं, यदिवा मनसः पर्यायाः मनःपर्यायाः, पोया धर्मा बाझवस्त्यालोचनप्रकारा इत्यनर्थान्तरं, तेषु तेषां वा सम्बन्धि ज्ञानं मनःपर्यायज्ञानं, इदं चाद्धेतृतीयद्वीपसमुद्रान्तर्वर्तिसंज्ञिमनोगतद्रग्यालम्बनं, तथा केवलं-एकं मत्यादिज्ञाननिरपेक्षत्वात् , 'नटुंमि उ छाउमथिए नाणे [[नटे तु छानस्थिके ज्ञाने] इति वचनात् शुद्धं पा केवलं तदावरणमलकलङ्कविगमात् सकलं या केवलं प्रथमत एवाशेषतदावरणविगमतः सम्पूर्णोत्पत्तेः असाधारणं वा केवलमनन्यसरशत्वात् अनन्तं पा केवलं ज्ञेयानन्तत्वात् , केवलं च तत् ज्ञानं च केवलज्ञानं, तथा मतिश्रुतावधय एव यदा मिथ्यात्वकलुषिता भवन्ति तदा यथाक्रमं मत्यज्ञानश्रुताज्ञानविभङ्गज्ञानव्यपदेशालभन्ते, उक्तं च-"आद्यत्रयमज्ञानमपि भवति मिथ्यात्वसंयुक्त"मिति, 'विभङ्ग' इति | Pron20200282 दीप अनुक्रम [५७२] ~160~ Page #161 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम “प्रज्ञापना” – उपांगसूत्र-४ (मूलं+वृत्ति:) पदं [२९], -------------- उद्देशक: -,------------- दारं --------------- मूलं [३१२] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र-[१५]उपांगसूत्र-[४] "प्रज्ञापना" मूलं एवं मलयगिरि-प्रणीता वृत्ति: प्रत सूत्रांक [३१२] दीप अनुक्रम [५७२] प्रज्ञापना- [विपरीतो भङ्गः-परिच्छित्तिप्रकारो यस्य तत् विभ, तच तत् ज्ञानं च विभङ्गज्ञान, सर्वत्रापि च साकारोपयोगशब्देन | याः मल- विशेषणसमासः । अनाकारोपयोगभेदानभिधित्सुराह-'अणागारोवओगे णं भंते । इत्यादि, तत्र चक्षुपा-चक्षुरियवृत्ती. RIन्द्रियेण दर्शनं-रूपसामान्यग्रहणलक्षणं चक्षुर्दर्शनं तच तत् अनाकारोपयोगः चक्षुईर्शनानाकारोपयोगः, अचक्षुषा-INTER चक्षुर्वर्जशेषेन्द्रियमनोभिर्दर्शनं-खस्खविषये सामान्यग्रहणमचक्षुर्दर्शनं, ततोऽनाकारोपयोगशब्देन विशेषणसमासः, एव-IN ॥५२७॥ मुत्तरत्रापि, अवधिरेव दर्शनं-सामान्यग्रहणमवधिदर्शनं, केवलमेव सकलजगदूभाविसमस्तवस्तुसामान्यपरिच्छेदरूपं । दर्शनं केवलदर्शनं, अथ मनःपर्यायदर्शनमपि कस्मान्न भवति येन पञ्चमोऽनाकारोपयोगो न भवतीति चेत् ?, उच्यते, मनःपर्यायविषयं हि ज्ञानं मनसः पर्यायाने विविक्तान् गृह्णदुपजायते, पर्यायाश्च विशेषाः, विशेषालम्बनं च ज्ञान ज्ञानमेन दर्शनमिति मनःपर्यायदर्शनाभावस्तदभावाच पञ्चमानाकारोपयोगासम्भव इति । एवं जीवाण'मित्यादि, एवं निर्विशेषणोपयोगवत् जीवानामप्युपयोगो द्विविधः प्रजप्तो भणितव्यः, तत्रापि साकारोपयोगोऽष्टविधोऽनाकारोपयोगश्चतुर्विधः, एतदुक्तं भवति-यथा प्राक् जीवपदरहितमुपयोगसूत्रं सामान्यत उक्तं तथा जीवपदसहितमपि भणितव्यं, तद्यथा-'जीवाणं भंते ! कतिविधे उपओगे पं०१.गो01 दविधे उवओगे पं०, तं-सागारोवोग। INT५२७॥ य अणागारोवओगे य, जीवाणं भंते | सागारोवओगे कतिविधे पं०१.गो.! अद्रविधे पं० त०' इत्यादि, तदेवं सामान्यतो जीवानामुपयोगश्चिन्तितः, सम्प्रति चतुर्विशतिदण्डकक्रमेण नैरयिकादीनां चिन्तयन्नाह-निरइयाणं ~161~ Page #162 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (१५) “प्रज्ञापना" - उपांगसूत्र-४ (मूलं+वृत्ति:) पदं [२९], -------------- उद्देशक: -,------------- दारं --------------- मूलं [३१२] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र-[१५]उपांगसूत्र-[४] "प्रज्ञापना" मूलं एवं मलयगिरि-प्रणीता वृत्ति: प्रत सूत्रांक [३१२] दीप अनुक्रम [५७२] भंते !' इत्यादि, नैरयिका हि द्विविधा भवन्ति-सम्यग्दृष्टयो मिथ्यादृष्टयश्च, अवधिरपि तेषां भवप्रत्ययोऽवश्यमुपजायते, भवप्रत्ययो नारकदेवाना' (तत्त्वा० अ०१ सू०२२) मिति वचनात् , तत्र सम्यग्रष्टीनां मतिज्ञानश्रुतज्ञानावधि| ज्ञानानि मिथ्यादृष्टीनां मत्यज्ञानश्रुताज्ञानविभङ्गज्ञानानीति सामान्यतो नैरयिकाणां षड्विधः साकारोपयोगः, अना-M कारोपयोगस्त्रिविधस्तद्यथा-चक्षुर्दर्शनं अचक्षुर्दर्शनमवधिदर्शनं च, एष च त्रिविधोऽप्यनाकारोपयोगः सम्यग्दृशां । मिथ्यादृशां चाविशेषेण प्रतिपत्तव्यः, उभयेषामप्यवधिदर्शनस्य सूत्रे प्रतिपादितत्वात् , एवमसुरकुमारादीनां स्तनितकुमारपर्यवसानानां भवनपतीनामप्यवसेयं, पृथिवीकायिकानां साकारोपयोगो द्विविधस्तद्यथा-मस्यज्ञानं श्रुताज्ञानं च, अनाकारोपयोग एकोऽचक्षुर्दर्शनरूपः, शेषोपयोगानां तेपामसम्भवात् , सम्यग्दर्शनादिलब्धिविकलत्वात, एवमसेजोवायुवनस्पतीनामपि वेदितव्यं, द्वीन्द्रियाणां साकारोपयोगश्चतुर्विधः, तद्यथा-मतिज्ञानं श्रुतज्ञानं मत्यज्ञानं श्रुता-18 ज्ञानं, तत्रापर्याप्तावस्थायां केषांचित् सासादनभावमासादयतां मविज्ञानश्रुतज्ञाने शेषाणां तु मत्यज्ञानश्रुताज्ञाने, अना-191 कारोपयोगस्त्वेकोऽचक्षुर्दर्शनरूपः, शेषोपयोगाणां तेषामसम्भवात्, एवं त्रीन्द्रियाणामपि, चतुरिन्द्रियाणामप्येवं, नवरमनाकारोपयोगो द्विविधः चक्षुर्दर्शनमचक्षुर्दर्शनं च, पञ्चेन्द्रियतिरश्वां साकारोपयोगः षड्विधस्तद्यथा-मतिज्ञानं श्रुतज्ञानमवधिज्ञानं मत्यज्ञानं श्रुताज्ञानं विभङ्गज्ञानं, अनाकारोपयोगविविधस्तद्यथा-चक्षुर्दर्शनं अचक्षुर्दर्शनं अवधिदशेनं च, अवधिद्विकस्यापि केषुचिचेषु सम्भवात् , मनुष्याणां यथासम्भवमष्टावपि साकारोपयोगाश्चत्वारोऽप्यनाकारो ~162~ Page #163 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (१५) “प्रज्ञापना” – उपांगसूत्र-४ (मूलं+वृत्ति:) पदं [२९], -------------- उद्देशक: -,------------- दारं --------------- मूलं [३१२] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र-[१५]उपांगसूत्र-[४] "प्रज्ञापना" मूलं एवं मलयगिरि-प्रणीता वृत्ति: प्रत याः मलयवृत्ती. पयोगाः, मनुष्येषु सर्वज्ञानदर्शनलब्धिसम्भवात् , व्यन्तरज्योतिष्कबैमानिका यथा नैरयिकाः, तदेवं सामान्यतश्चतुर्दि-18३० पश्यशतिदण्डकक्रमेण च जीवानां उपयोगश्चिन्तितः, सम्प्रति मन्दमतिस्पष्टावबोधाय जीवा एव तत्तदुपयोगोपयुक्ताः तापदं सू. सामान्यतश्चतुर्विंशतिदण्डकक्रमेण चिन्त्यन्ते-'जीवा णं भंते ! इत्यादि सुगमम् । इति श्रीमलयगिरिविरचितायां० ३१३ एकोनत्रिंशत्तममुपयोगाख्यं पदं समाप्त ॥ २९ ॥ सूत्रांक ॥५२८॥ [३१२] asvem अथ त्रिंशत्तमं पश्यत्ताख्यं पदं ॥ ३०॥ eseeeeeeeeee दीप अनुक्रम [५७२] तदेवमुक्तमेकोनत्रिंशत्तमं पदं, सम्प्रति त्रिंशत्तममारभ्यते, अस्स चायमभिसम्बन्धः-इहानन्तरपदे ज्ञानपरिणामविशेष उपयोगोऽभिहितः, इहापि ज्ञानपरिणामविशेषे उपयोगे पश्यत्ता चिन्त्यते इति, तत्र चेदमादिसूत्रम् कतिविहाणं मंते ! पासणया पण्णता?, गो दुविहा पासणया पं००-सागारपासणया अणागारपासणया, सागारपासणया ण मंते ! कइविहा पं०१, गो! छबिहा पण्णता, तं०-सुयणाणपा० ओहिणाणपा० मणपज्जवणाणपा० केवलणाणपा. सुयअण्णाणसागारपा०विभंगणाणसागारपासणया, अणागारपासणयाणं भंते ! कइविधा०, गो०! तिविहा ५०,० ५२८॥ For P OW अत्र पद (२९) "उपयोग" परिसमाप्तम् अथ पद (३०) “पश्यता" आरब्धम् ~163~ Page #164 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (१५) “प्रज्ञापना” – उपांगसूत्र-४ (मूलं+वृत्ति:) पदं [३०], -------------- उद्देशक: -,------------- दारं --------------- मूलं [३१३] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र-[१५]उपांगसूत्र-[४] "प्रज्ञापना" मूलं एवं मलयगिरि-प्रणीता वृत्ति: प्रत सूत्रांक [३१३] eekeepercenessseeeeg चक्खुदसणअणागारपा० ओहिदंसणअणा० केवलदंसणअणा०, एवं जीवाणपि, नेरइयाणं भंते ! कतिविधा पासणया पण्णचा, गो! दुविहा पं०, तं०-सागारपासणया० अणागा०, नेरहयाणं भंते ! सागारपा० काविहा पं०१, गो०। चउबिहा पं०,०-सुयणाणपा०ओहिणाणपा० सुअअण्णाणपा०विभंगणाण, नेरइयाणं भंते ! अणागारपा० कतिविहा पं०१, गो० दुविहा, तं-चक्खुदंसण ओहिद, एवं जाब थणियकुमारा । पुढविकाइयाणं भंते! कतिविहा पासणया पं०१, गो०! एगा सागारपा०, पुढविकाइयाणं भंते ! सागारपासणया कतिविहा पं०१, गो०। एगा सुयअनाणसागा. रपा०५०, एवं जाव वणफइकाइयाणं । बेइंदियाणं मंते ! कतिविहा पासणया पं०१, गो०! एगा सागारपासणया पं०, बेइंदियाण भंते ! सागारपा० काविहा पं०१, गो० दु०पं० २०-सुयणाणसागारपा० सुयअण्णाणसागारपा०, एवं • तेईदियाणवि, चउरिदियाणं पुच्छा, गो०। दु०पं०, ते०-सागारपा० अणागारपा०, सागारपासणया जहा बेइंदियाणं, चउरिदियाणं भंते ! अणागारंपा० काविहा पं०१, गो०! एगा चक्खुदंसण. अणागारपा० ५०, मसाणं जहा जीवाणं, सेसा जहा नेरइया जाव वेमाणियाणं । जीवाणं भंते ! किं सागारपस्सी अणागारपस्सी, गो.! जीवा सागारपस्सीवि अणागारपस्सीवि, से केणटेणं भंते! एवं यु० जीवा सागार० अणागार०१, गो० जेणं जीवा सुतणाणी ओहिणाणी मणपज्जय० केवल सुअअण्णाणी विभंगनाणी ते णं जीवा सागारपस्सी, जेणं जीवा चक्खुदंसणी ओहिदंसणी केवलदसणी ते णं जीवा अणागारपस्सी, से एतेणद्वेणं गोयमा! एवं चु०-जीवा सागारपस्सीवि अणागा०, नेरइया गं भंते ! कि सागारपस्सी अणागा०, गो०! एवं चेव, नवरं सागारपासणयाए मणपज्जवनाणी केवलनाणी न बुचति, सरहदseleseseaette24 दीप अनुक्रम [५७३] ~164~ Page #165 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (१५) “प्रज्ञापना” – उपांगसूत्र-४ (मूलं+वृत्ति:) पदं [३०], -------------- उद्देशक: [], ------------- दारं [-], -------------- मूलं [३१३] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र-[१५]उपांगसूत्र-[४] "प्रज्ञापना" मूलं एवं मलयगिरि-प्रणीता वृत्ति: प्रत प्रज्ञापनायाः मलयवृत्ती. घटन सूत्रांक ल ॥५२९॥ [३१३] दीप अनुक्रम [५७३] अणागारपासणयाए केवलदसणं नथि, एवं जाव थणियकुमारा । पुढविकाइयाणं पृच्छा, गो० पूढ विकाइया सागारप- ३० पश्यस्सी गो अणागारपस्सी, से केणटेणं भंते! एवं चु०-गो! पुढविकाइयाणं एगा सुयअण्णाणसागारपासणया पं०, से ते. तापदं सू. गो०, एवं जाव वणस्सतिकाइयाणं, बेईदियाणं पुच्छा, गो सागारपस्सी णो अणा०, से केणद्वेणं भंते । एवं बुचति, ३१३ गो०! बेइंदियाणं दुविहा सागारपासणया पं०, तं०-सुयणाणसागारपा० सुअअण्णाणसागारपा०, से एएणद्वेणं गो०! एवं बु०, एवं तेइंदियाणवि, चउरिदियाणं पुच्छा, गो! चउरिदिया सागारपस्सीवि अणामारपस्सीवि, से केणटेणं०१, गो!जेणं चरिंदिया सुयणाणी सुयअनाणी ते णं चउरिदिया सागारपस्सी, जे णं चउरिदिया चक्खुदंसणी ते गं चरिंदिया अणागारपस्सी, से एएणडेणं गो! एवं बु०, मणूसा जहा जीवा, अवसेसा जहा नेरइया जाब | वेमाणिया (सूत्रं ३१३) 'कतिविधा ण भंते' इत्यादि, कतिविधा-कतिप्रकारा, णमिति वाक्यालङ्कारे, भदन्त ! 'पासणय'ति 'शिर प्रेक्षणे' पश्यतीति 'सति वानिता विति अतृड्प्रत्ययः कर्त्तर्यनदादेशः, 'पानाध्मास्थानादाणुदृश्यर्तिश्रौतिकवुधिखुशदसदः पिबजिप्रधमतिष्ठमनयच्छपश्यञ्जेशृकृधिशीयसीद'मिति दृशेः पश्यादेशः, पश्यतो भावः पश्यत्ता, 'भावे तत्वला'विति तत्प्रत्ययः, 'आदापू' सैव पासणयेत्युच्यते, एष च पासणयाशब्दो रूढिवशात् साकारानाकारबोधन- ५२९॥ |तिपादकः उपयोगशब्दवत् , तथा चोपयोगविपये प्रश्नोत्तरसूत्रे इमे-'कइविहे गं भंते ! उवओगे पण्णत्ते ?, गोयमा|| SAREauratoninternational ~165 Page #166 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (१५) “प्रज्ञापना” – उपांगसूत्र-४ (मूलं+वृत्ति:) पदं [३०], -------------- उद्देशक: [-], ------------- दारं [-], -------------- मूलं [३१३] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र-[१५]उपांगसूत्र-[४] "प्रज्ञापना" मूलं एवं मलयगिरि-प्रणीता वृत्ति: प्रत 929202003083 सूत्रांक [३१३] दीप अनुक्रम [५७३] ISI दुविहे पण्णते, तं०-'सागारोवओगे य अणागारोवओगे य' पश्यत्ताविषयेऽपि प्रश्नोत्तरसूत्रे इमे-'कइविहा णं भंते ! पासणया पण्णता?, गो०! दुविहा०,०-सागारपासण्या अणागारपासणया' इति, ननु तुल्ये साकारानाकारभेदत्वे कोऽनयोः प्रतिविशेषो येन पृथगुच्यते ?, उच्यते, साकारानाकारमेदगतावान्तरभेदसञ्जयारूपः, तथादि-पञ्च। ज्ञानानि त्रीण्यज्ञानानीपष्टविधः साकार उपयोगः, साकारपश्यत्ता तु षविधा, मतिज्ञानमत्यज्ञानयोः पश्यत्तयोः । अनभ्युपगमात् , कस्मादिति चेत् , उच्यते, इह पश्यत्ता नाम पश्यतो भाव उच्यते, पश्यतो मावश्च 'शिर् प्रेक्षणे' इति वचनात् , प्रेक्षणमिह रूढिवशात् साकारपश्यत्तायां चिन्त्यमानायां प्रदीर्घकालं अनाकारपश्यत्तायां चिन्त्यमाना-18 यां प्रकष्टं परिस्फुटरूपमीक्षणमवसेयं, तथा च सति येन ज्ञानेन त्रैकालिकः परिच्छेदो भवति तदेव ज्ञानं प्रदीर्घका IST लविषयत्वात् साकारपश्यत्ताशब्दवाच्यं न शेष, मतिज्ञानमत्यज्ञाने तु उत्पन्नाविनष्टाग्राहके साम्प्रतकालविषये, तथा हाच मतिज्ञानमधिकृत्यान्यत्रोक्तम्-"जमवग्गहादिरूवंपञ्चुप्पन्नवत्थुगाहगं लोए । इंदियमणोनिमित्तं च तमामिनि-II बोधिगं बेति ॥१॥"[यदवग्रहादिरूपं प्रत्युत्पन्नवस्तुग्राहकं लोके । इन्द्रियमनोनिमित्तं च तदाभिनियोधिक मुषते । M॥१॥] तत् द्वे अपि साकारपश्यत्ता शब्दवाच्ये न भवतः, श्रुतज्ञानादीनि तु त्रिकालविषयाणि, तयाहि-श्रुतज्ञानेन अतीता अपि भावा ज्ञायन्ते अनागता अपि, उक्तं च-"ज पुण तिकालविसर्य आगमगंथानुसारि विनाणं 11 दियमणोनिमिचं सुयनाणं तं जिणा बेति ॥१॥"[यत् पुननिकालविषयं आगमनन्यानुसारि विज्ञानम् । इन्-ि Hamarama ~166~ Page #167 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (१५) “प्रज्ञापना” – उपांगसूत्र-४ (मूलं+वृत्ति:) पदं [३०], -------------- उद्देशक: -,------------- दारं --------------- मूलं [३१३] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र-[१५]उपांगसूत्र-[४] "प्रज्ञापना" मूलं एवं मलयगिरि-प्रणीता वृत्ति: प्रत सूत्रांक [३१३] प्रज्ञापना- यमनोनिमित्तं श्रुतज्ञानं तत् जिना ब्रुवते ॥१॥] अवधिज्ञानमपि सङ्ख्यातीता उत्सर्पिण्यवसर्पिणीः अतीताः परि-II पश्य सत्तापदं सू. या। मलशानिति भाविनीथ, मनःपर्यायज्ञानमपि पल्योपमाससवेयभागमतीतं जानाति भाविनं च, केवलं सकलकाल ३१३ य०वृत्ती. विषयं सुप्रतीतं, श्रुताज्ञानविभङ्गज्ञाने अपि त्रिकालविषये, ताभ्यामपि यथायोगमतीतानागतभावपरिच्छेदात्, ततः ॥५३॥ ज्ञानानि साकारपश्यत्ताशब्दवाच्यानि, उपयोगस्तु यत्राकारो यथोदितखरूपः परिस्फुरति स बोधो वर्तमानकालविषयो वा यदि भवति त्रिकालिको वा तत्र सर्वत्रापि प्रवर्तत इति साकारोपयोगोऽप्यविधः। तथा चक्षुर्दर्शनमचक्षुर्दर्शनमवधिदर्शनं केवलदर्शनमिति चतुर्विधोऽनाकारोपयोगः, अनाकारपश्यत्ता तु त्रिविधा, अचक्षुदर्शनस्यानाकारपश्यचाशब्दवाच्यत्वाभावात्, कस्मादिति चेत्, उच्यते, उक्तमिह पूर्वमनाकारपश्यत्तायां चिन्त्यमानायां प्रकृष्ट परिस्फ-IMM टरूपमीक्षणमबसेयमिति, तत्राचक्षुर्दशेने परिस्फुटरूपमीक्षणं न विद्यते, न हि चक्षुषेव शेषेन्द्रियमनोभिः परिस्फुटशमीक्षते प्रमाता, ततोऽचक्षुर्दर्शनस्यानाकारपश्यत्ताशब्दवाच्यत्वाभावात् त्रिविधाऽनाकारपश्यत्ता, तदेवं साकारभेदेडनाकारभेदे च प्रत्येकमवान्तरभेदे वैचित्र्यभावान्महानुपयोगपश्यत्तयोः प्रतिविशेषः, एनमेव प्रतिविशेष प्रतिपिपादयिषुः प्रथमतः साकारानाकारभेदी ततस्तद्गतावान्तरभेदान् प्रतिपादयति-गो! दुविहा पं० तंजहा- ५३०॥ सागारपासणया अणागारपासणयाय, सागारपासणया णं भंते ! कतिविहा पं०' इत्यादि भावितार्थम् । तदेवं सामा-12॥ न्यतो जीवपदविशेषणरहिता पश्यत्तोक्ता, साम्प्रतं तामेव जीवपदविशेषितामभिषित्सुराह-एवं जीवाणंपि' एवं दीप अनुक्रम [५७३] ~167~ Page #168 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (१५) “प्रज्ञापना” – उपांगसूत्र-४ (मूलं+वृत्ति:) पदं [३०], -------------- उद्देशक: -,------------- दारं --------------- मूलं [३१३] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र-[१५]उपांगसूत्र-[४] "प्रज्ञापना" मूलं एवं मलयगिरि-प्रणीता वृत्ति: प्रत सूत्रांक [३१३] पूर्वोक्तेन प्रकारेण जीवानामपि-जीवपदविशेषणसहितापि पश्यत्ता वक्तव्या, सा चैवम्-'जीवाणं भंते ! कतिविधान पासणया पं०१, गो01 दुविहा पं०, तंजहा-सागारपासणया अणागारपासणया य, जीवाणं भंते ! सागारपासणया कतिविहा पं०' इत्यादि, तदेवं जीवानामपि सामान्यत उक्ता, सम्प्रति चतुर्विंशतिदण्डकक्रमेण वदति-नेरइयाणं । भिंते!' इत्यादि, सुगमत्वात् उपयोगपदे प्रायो भावितत्वात् अनन्तरोक्तभावनानुसारेण खयं परिभावनीयं, तदेवं सा मान्यतो विशेषतश्च जीवानां पश्यत्तोक्ता, सम्प्रति जीवानेव पश्यचाविशिष्टान् चिचिन्तयिषुराह-'जीवा णं भंते ! किं सागारपस्सी' इत्यादि, जीवाः-जीवनयुक्ताः प्राणधारिण इत्यर्थः, णमिति वाक्यालकारे किमिति प्रश्ने साकारपश्यत्ता विद्यते येषां ते साकारपश्यत्तिनः, प्राकृतत्वात् साकारपस्सी इत्युक्तं, 'मणपज्जवनाणी केवलनाणी न वुच्चई" इत्यादि, नैरयिकाणां चारित्रप्रतिपत्तेरभावतो मनःपर्यवज्ञानकेवलज्ञानकेवलदर्शनानामभावात् ॥ इह किल छमस्थानां साकारोऽनाकारचोपयोगः क्रमेणोपजायमानो घटते, सकर्मकत्वात् , सकर्मकाणां ह्यन्यतरस्योपयोगस्य बेलायामन्यतरस्य कर्मणाऽऽवृतत्वान्न घटते एवोपयोग इति, केवली तु घातिचतुष्टयक्षयाद् भवति, ततः संशयः-किंक्षीणज्ञानावरणदर्शनावरणत्वात् यस्मिन्नेव समये रत्नप्रभादिकं जानाति तस्मिन्नेव समये पश्यति उत जीवखाभाव्यात् क्रमणेति ?, ततः पृच्छतिकेवली णं भंते । इमं रयणप्प पुढषि आगारेहिं हेतूहि उवमाहिं दिद्वैतेहिं वण्णेहिं संठाणेहिं पमाणेहिं पढीयारेहि जं समय दीप अनुक्रम [५७३] टाटOES SAREauratonintentiational ~168~ Page #169 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (१५) “प्रज्ञापना” – उपांगसूत्र-४ (मूलं+वृत्ति:) पदं [३०], -------------- उद्देशक: [], ------------- दारं [-], -------------- मूलं [३१४] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र-[१५]उपांगसूत्र-[४] "प्रज्ञापना" मूलं एवं मलयगिरि-प्रणीता वृत्ति: प्रज्ञापनाया मलयवृत्ती. See प्रत सूत्रांक [३१४] ॥५३॥ दीप अनुक्रम [५७४] जाणति तं समयं पासइ ज समय पासह तं समय जाणइ १, गो० नो तिणढे समढे, से केणद्वेण मते! एवं खुधति केवली 8३०पश्यण इमं रयणप्प पुढवि आगारेहिं जं समयं जाणति नो तं समयं पासति जं समय पानो तं समयं जा०, गो! त्तापदं सागारे से गाणे मवति अणागारे से दंसणे भवति, से तेण?णं जाव गो त समयं जाणाति एवं जाव अहे सचमी एवं आकारासोहम्मकप्पं जाव अचुर्य, गेविजगविमाणा अणुत्तरविमाणा, ईसीपम्भारं पुढवीं, परमाणु पोग्गलं दुपदेसियं खंधं जाच [दिज्ञानदअणंतपदेसियं खंध, केवली णं भंते । इमं रयणप्पमं पुढवि अणागारेहिं अहेतुहि अणुवमाहिं अदितेहिं अवण्णेहिं असं- र्शनपृथठाणेहिं अपमाणेहिं अपडोयारेहिं पासति न जाणति , हता! गो! केवली णं इमं रयणप्पमं पुढवि अणागारेहि जाव क्त्वं सू. पासति न जाणति, से केणडेणं भंते ! एवं बु. केवली इमं रयणप्यमं पुढवि अणागारेहिं जाव पासति ण जाणति, गो! अणागारे से दंसणे भवति सागारे से नाणे भवति, से ते गो०!. एवं बुच्चइ-केवली णं इमं रयणप्पमं पुढवि अणागारेहिं जाव पासति ण जाणति, एवं जाव ईसिप्पभारं पुढवि परमाणु पोग्गलं अणंतपदेसियं खंधं पासति न जाणति ।। (सूत्र ३१४) पासपायापर्य समतं ॥३०॥ 'केवली णं भंते " इत्यादि, केवलं ज्ञानं दर्शनं चास्यास्तीति केवली णमिति वाक्यालङ्कतौ भदन्त -परमका ॥५३॥ ल्याणयोगिन् ! 'इमा' प्रत्यक्षत उपलभ्यमानां रत्नप्रभाभिषां पृथिवीं 'आगारोहिति आकारभेदा यथा इयं रसप्रभा-IN पृथिवी त्रिकाण्डा खरकाण्डपङ्ककाण्डअप्काण्डभेदात्, खरकाण्डमपि षोडशभेदं, तद्यथा-प्रथम योजनसहस्रमानं ~169~ Page #170 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (१५) “प्रज्ञापना” – उपांगसूत्र-४ (मूलं+वृत्ति:) पदं [३०], -------------- उद्देशक: [-], ------------- दारं [-], -------------- मूलं [३१४] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र-[१५]उपांगसूत्र-[४] "प्रज्ञापना" मूलं एवं मलयगिरि-प्रणीता वृत्ति: प्रत सूत्रांक [३१४] रत्नकाण्डं तदनन्तरं योजनसहस्रप्रमाणमेव वज्रकाण्डं तस्याप्यधो योजनसहस्त्रमानं वैडूर्यकाण्डमित्यादि, 'हेऊहिं'ति हेतवः--उपपत्तयः, ताबेमाः-केन कारणेन रत्नप्रभेत्यभिधीयते ?, उच्यते, यस्मादस्याः रनमयं काण्ड तस्मात् रत्नप्रभा, रत्नानि प्रभा-खरूपं यस्याः सा रत्नामेति व्युत्पत्तेरिति, 'उबमाहि' इति उपमामिः, 'माङ्ग माने' अस्मादुपपूर्वात् उपमितं उपमा 'उपसर्गादात' इत्यप्रत्ययः, ताश्चैवं-रतप्रभायां रत्नप्रभादीनि काण्डानि वर्णविभागेन कीदृशानि, परागेन्दुसदृशानि इत्यादि, 'दिट्टतेहिं ति दृष्टः अन्तः-परिच्छेदो विवक्षितसाध्यसाधनयोः सम्बन्धस्थाविनाभावरूपस्य प्रमाणेन यत्र ते दृष्टान्तास्तथा घटः स्वगतैर्धम्मैः पृथुबुनोदरायाकारादिरूपैरनुगतः परधर्मेभ्यश्च पटादिगतेभ्यो व्यतिरिक्त उपलभ्यते इति पटादिभ्यः पृथक् वस्त्वन्तरं तथैवैपाऽपि रत्नप्रभा खगतभेदैरनुषक्ता शकराप्रमादिभेदेभ्यश्च व्यतिरिक्तेति ताभ्यः पृथक स्वन्तरमिसादि. 'वण्णेहिंति शुक्लादिवर्णविमागेन तेषामेव उत्कर्षा-18 पकसक्येयासंख्येयानन्तगुणविभागेन च, वर्णग्रहणमुपलक्षणं तेन गन्धरसस्पर्शविभागेन चेति द्रष्टव्यं, 'संठाणेहिति यानि तस्यां रत्नप्रभायां भवननारकादीनां संस्थानानि, तद्यथा-'ते णं भवणा बाहिं वहा अंतो चउरंसा अहे पुक्ख-13॥ रकण्णियासंठाणसंठिया' तथा 'ते गं नरया, अंतो बट्टा चाहिं चउरंसा अहे खुरप्पसंठाणसंठिया' इत्यादि, तथा |'पमाणेहिंति प्रमाणानि, 'अहे'त्यादि परिमाणानि, यथा 'असीउत्तरजोयणसयसहस्सबाइला रजुप्पमाणमत्ता आयामविक्खंभेण'मित्यादि, 'पडोयारेहिंति प्रति-सर्वतः सामस्त्येन अवतीर्यते-व्याप्यते यैसे प्रत्यवताराः, ते चात्र रन्सटाseeeeeeeeeeese दीप अनुक्रम [५७४] SARERIEahrthiana ~170~ Page #171 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (१५) “प्रज्ञापना” – उपांगसूत्र-४ (मूलं+वृत्ति:) पदं [३०], -------------- उद्देशक: [], ------------- दारं [-], -------------- मूलं [३१४] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र-[१५]उपांगसूत्र-[४] "प्रज्ञापना" मूलं एवं मलयगिरि-प्रणीता वृत्ति: प्रज्ञापना- प्रत सूत्रांक [३१४] या मल- य० वृत्ती. ॥५३२॥ दीप अनुक्रम [५७४] धनोदध्यादिवलया बदितव्याः, ते हि सर्वासु दिक्षु विदिक्षु चेमा रनप्रभा परिक्षिप्य व्यवस्थितास्तैः, 'जं समय मिति ३०पश्यधनाद 'कालाध्वनोळसावित्यधिकरणभावेऽपि द्वितीया, ततोऽयमर्थः-यस्मिन् समये जानाति-आकारादिविशिष्ट परि- त्तापदं छिनत्ति 'तं समयंति तस्मिन् समये पश्यति-केवलदर्शनविषयीकरोति ?, भगवानाह-गौतम! नायमर्थः समर्थो, आकारानायमर्थो युक्त्युपपन्न इति भावः, तत्त्वमजानानः पृच्छति-से केणटेणं भंते ! इत्यादि, 'से' इति अथशब्दार्थे अथ विज्ञानदकनार्थेन-कारणेन भदन्त ! एवं-पूर्वोक्तेन प्रकारेणोच्यते, तमेव प्रकारं दर्शयति-'केवली ण'मित्यादि, भगवानाह- शेनपृथ I क्त्वं सू. गौतमे त्यादि, अस्थायं भावार्थ:-इह ज्ञानेन परिच्छिन्दन् जानातीत्युच्यते, दर्शनेन परिच्छिन्दन् पश्यतीति, ज्ञानं INI ३१४ च 'से' तस्य भगवतः साकारमन्यथा ज्ञानत्वायोगात्, विशेषानभिगृण्हानो हि बोधो ज्ञानं, 'सविशेषं पुनर्ज्ञान मिति वचनात् , दर्शनमनाकारं 'निर्विशेषं विशेषाणां, ग्रहो दर्शनमुच्यते' इति वचनात् , तत्र ज्ञानं च दर्शनं च जीवस्य खण्डशो नोपजायते, यथा कतिपयेषु प्रदेशेषु ज्ञानं कतिपयेषु प्रदेशेषु दर्शनं, तथाखाभाव्यात्, किन्तु यदा ज्ञान तदा सामस्त्येन ज्ञानमेव यदा दर्शनं तदा सामस्त्येन दर्शनमेव, ज्ञानदर्शने च साकारानाकारतया परस्पर विरुद्धे,8 छायातपयोरिवेतरेतराभावनान्तरीयकत्वात् , ततो यस्मिन् समये जानाति तस्मिन् समये न पश्यति, यस्मिन् समये ||५३२॥ पश्यति तस्मिन् समये न जानाति, एतदेवाह-'से एएणद्वेणं' इत्यादि, एतेन यदवादीद् वादी सिद्धसेनदिवाकरो। यथा-'केवली भगवान् युगपत् जानाति पश्यति चेति, तदप्यपास्तमवगन्तव्यं, अनेन सूत्रेण साक्षात् युक्तिपूर्व ~171~ Page #172 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (१५) “प्रज्ञापना” – उपांगसूत्र-४ (मूलं+वृत्ति:) पदं [३०], -------------- उद्देशक: -,------------- दारं --------------- मूलं [३१४] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र-[१५]उपांगसूत्र-[४] "प्रज्ञापना" मूलं एवं मलयगिरि-प्रणीता वृत्ति: प्रत सूत्रांक [३१४] ज्ञानदर्शनोपयोगस्य क्रमशो व्यवस्थापितत्वात्, एवं शर्कराप्रभावालुकाप्रभापङ्कप्रभाधूमप्रभातमःप्रभातमस्तमःप्रभासीधर्मेशानसनत्कुमारमाहेन्द्रनखलोकलान्तकशुक्रसहस्रारानतप्राणतारणाच्युतकल्पग्रैवेयकविमानानुत्तरविमानेपत्प्राम्भाराभिधपृथिवीपरमाणुपुद्गलद्विप्रदेशिकस्कन्धयावदनन्तप्रदेशिकस्कन्धविषयाण्यपि सूत्राणि भावनीयानि, ननु यदि ज्ञानदर्शने साकारानाकारतया पृथगेवं व्यवस्थापितविषये तत इदमायातं यदा भगवान् केवली रत्नप्रभादिकमाकाराधभावेन परिच्छिनत्ति तदा स पश्यतीत्येवं वक्तव्यो न जानातीति, सत्यमेतत् तथा चाह-'केवली णं भंते ! इमं रयणप्पभं पुढविं अणागारेहि अहेऊहिं' इत्यादि, प्रायो भावितत्वात् सुगमं ॥ इति श्रीमलयगिरिविरचितायां त्रिंशत्तमं पदं समासं ॥ ३०॥ अथ एकत्रिंशत्तमं संज्ञापरिणामपदं ॥३१॥ -oerceतदेवमुक्तं पश्यत्ताऽऽख्यं त्रिंशत्तम पर्द, साम्प्रतमेकत्रिंशत्तममारभ्यते, अस्य चायमभिसम्बन्धः-महानन्तरपदे ज्ञानपरिणामविशेषः प्रतिपादितः, इह तु परिणामसाम्याद गतिपरिणामविशेष एव संज्ञापरिणामः प्रतिपाद्यते, तत्र चेदमादिसूत्रम् दीप अनुक्रम [५७४] अत्र पद (३०) “पश्यता" परिसमाप्तम् __ अथ पद (३१) “संजी/संज्ञापरिणाम" आरब्धम् ...अस्य अध्ययनस्य आगम-गाथा (मूल-८) दर्शित-नाम “संजी" अस्ति, किंतु अत्र वृत्तिगत नाम "संज्ञापरिणाम" इति दृश्यते ~172~ Page #173 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (१५) “प्रज्ञापना” – उपांगसूत्र-४ (मूलं+वृत्ति:) पदं [३१], --------------उद्देशक: -, ------------- दारं -1, -------------- मूलं [३१५] + गाथा पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र-[१५]उपांगसूत्र-[४] "प्रज्ञापना" मूलं एवं मलयगिरि-प्रणीता वृत्ति: प्रत सूत्रांक [३१५] Seeran ३१संज्ञापदं सू.. ३१५ यवृत्ती. गाथा प्रज्ञापना जीवा णं भंते ! कि सपणी असण्णी नोसण्णीनोअसण्णी, गो! जीवा सण्णीवि असणीवि नोसण्णीनोअसणीपि । या मल नेरइयाणं पुच्छा, गो! नेरइया सणीवि असणीवि नो नोसण्णीनोअसणी, एवं असुरकुमारा जाब थणियकुमारा, पुढविकाइयाणं पुच्छा, गो01नो सण्णी असण्णी, नो नोसण्णीनोअसण्णी, एवं बेईदियतइंदियचउरिदियावि, मणूसा जहा जीवा, पंचिदियतिरिक्ख जोणिया वाणमंतरा य जहा नेरदया, जोतिसियवेमाणिया सण्णी नो असण्णी नो नोसणी॥५३॥ नोअसण्णी, सिद्धाणं पुच्छा, गो! नो सण्णी नो असण्णी नोसणिनोअसण्णी, नेरइयतिरियमणुया य वणपरगसुरा इ सण्णीऽसण्णी य । विगलिंदिया असण्णी जोतिसवेमाणिया सण्णी ॥१॥ (वत्रं३१५) पण्णवणाए सण्णीपर्य समन ॥३१॥ 'जीवा णं भंते । किं सपणी' इत्यादि, संज्ञानं संज्ञा-'उपसर्गादात' इत्यङ्प्रत्ययः भूतभवद्भाविभावसभावपयोलोचन सा विद्यते येषां ते संजिनः, विशिष्टस्मरणादिरूपमनोविज्ञानभाज इत्यर्थः, यथोक्तमनोविज्ञानविकला असंजिन, ते च एकेन्द्रियविकलेन्द्रियसम्मूछिमपञ्चेन्द्रिया वेदितव्याः, अथवा संज्ञायते-सम्यक् परिच्छियते पूर्वोपलब्धो पत्ते मानो भावी च पदार्थों यया सा संज्ञा, भिदादिपाठाभ्युपगमात् करणे पत्र, विशिष्टा मनोवृत्तिरित्यर्थः, सा विद्यते IS येषां ते संज्ञिना समनस्का इत्यर्थः, तद्विपरीता असंज्ञिनोऽमनस्का इत्यर्थः, ते पैकेन्द्रियादय एवानन्तरोदिताः प्रतिपपत्तव्याः, एकेन्द्रियाणां प्रायः सर्वथा मनोवृत्तेरभावात्, द्वीन्द्रियादीनां तु विशिष्टमनोवृत्तेरभावः, ते हि द्वीन्द्रियादIS यो वाचैमानिकमेवार्य शब्दादिकं शब्दादिरूपतया संविदन्ति, न भूतं भाविनं चेति, केवली सिद्धयोभयप्रतिषेधषि दीप अनुक्रम [१७५ -५७६] R11५३३॥ RELIGunintentiaTASHREE ~173~ Page #174 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (१५) “प्रज्ञापना” – उपांगसूत्र-४ (मूलं+वृत्ति:) पदं [३१], --------------उद्देशक: -, ------------- दारं -1, -------------- मूलं [३१५] + गाथा पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र-[१५]उपांगसूत्र-[४] "प्रज्ञापना" मूलं एवं मलयगिरि-प्रणीता वृत्ति: प्रत सूत्रांक [३१५] गाथा षयः, केवली हि यद्यपि मनोद्रव्यसम्बन्धभाक् तथापि न तैरसौ भूतभवद्भाविभावखभावपर्यालोचनं करोति, किन्तु क्षीणसकलज्ञानदर्शनावरणत्वात् पर्यालोचनमन्तरेणैव केवलज्ञानेन केवलदर्शनेन च साक्षात्समस्तं जानाति पश्यति च, ततो न संज्ञी नाप्यसंज्ञी, सकलकालकलाकलापव्यवच्छिन्नसमस्तद्रव्यपर्यायप्रपञ्चसाक्षात्करणप्रवणज्ञानसमन्वितत्वात् , सिद्धोऽपि न संज्ञी, द्रव्यमनसोऽप्यभावात् , नाप्यसंज्ञी सर्वज्ञत्वात् , तदेवं सामान्यतो. जीवपदे संजिनोऽसंज्ञिनो नो-IN संजिनोअसंज्ञिनच लभ्यन्ते इति, भगवान तथैव प्रतिसमाधानमाह-गौतमे'स्वादि, जीवाः संजिनोऽपि नैरपिकादीनां संज्ञिनां भावाद्, असंज्ञिनोऽपि पृथिव्यादीनामसंज्ञिना भावात्, नोसंज्ञिनोअसंज्ञिनोऽपि सिद्धकेवलिनां नोसंज्ञिनोअसंज्ञिनामपि भावात् । एतानेव चतुर्विंशतिदण्डकक्रमेण चिन्तयति-'नेरइया ण'मित्यादि, इह ये नैरयिकाः संज्ञिभ्य उत्पद्यन्ते ते संज्ञिनो व्यवद्रियन्ते इतरे त्वसंज्ञिनः, न च नैरयिकाणां केवलिभावो घटते, चारित्रप्रतिपत्तेरभावात् , तत उक्तं नैरयिकाः संज्ञिनोऽप्यसंजिनोऽपि, नो नोसंज्ञिनोनोअसंज्ञिनः, एवमसुरकुमारादयोऽपि स्तनितकुमारपर्यवसाना भवनपतयो वक्तव्याः, तेषामप्यसंज्ञिनोऽप्युत्पादात् केवलित्वाभावाच, 'मणूसा जहा जीवत्ति मनुष्याः प्राक् यथा जीवा उक्तास्तथा वक्तव्याः, संज्ञिनोऽपि असंजिनोऽपि नोसंझिनोअसंझिनोऽपि वक्तव्या इति भावः, तत्र ये गर्भव्युत्क्रान्तास्ते संज्ञिनः सम्मूछिमा असंजिनः केवलिनो नोसंज्ञिनोअसंजिनः, 'पञ्चेन्दियतिरिक्खजोणियवाणमंतरा जहा नेरइया' इति, पञ्चेन्द्रियतिर्यग्योनिका व्यन्तराश्च यथा नैरयिका उक्तास्तथा वक्तव्याः, दीप अनुक्रम [१७५ -५७६] ~174~ Page #175 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (१५) प्रत सूत्रांक [३१५] गाथा दीप अनुक्रम [५७५ -५७६] पदं [३१], मूलं [ ३१५] + गाथा पूज्य आगमोद्धारकश्री संशोधितः मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित.. आगमसूत्र - [१५],उपांगसूत्र-[४] "प्रज्ञापना" मूलं एवं मलयगिरि-प्रणीता वृत्तिः प्रज्ञापनायाः मल य० वृसौ. ॥५३४॥ “प्रज्ञापना” – उपांगसूत्र - ४ ( मूलं + वृत्ति:) • उद्देशक: [-], ---------- , दारं [-], [--------- A A A A A A A A A A संज्ञिनोऽपि असंज्ञिनोऽपि नो नोसंज्ञिनोअसंज्ञिनः वक्तव्या इति भावः तत्र पञ्चेन्द्रिय तिर्यग्योनिकाः सम्मूच्छिमाः असंज्ञिनः गर्भव्युत्क्रान्ताः संज्ञिनः, व्यन्तरा असंज्ञिभ्य उत्पन्ना असंज्ञिनः संज्ञिभ्य उत्पन्नाः संज्ञिनः, उभयेऽपि चारित्रप्रतिपत्तेरभावात् नो नोसंज्ञिनोअसंज्ञिनः, ज्योतिष्कवैमानिकाः संज्ञिन एव, नो असंज्ञिनः, असंज्ञिभ्य उत्पादाभावात् नो नोसंज्ञिनोअसंज्ञिनवारित्रप्रतिपत्तेरभावात्, सिद्धास्तु प्रागुक्तयुक्तितो नो संज्ञिनो नाप्यसंज्ञिनः किन्तु नोसंज्ञिनोअसंज्ञिनः, अत्रैव सुखप्रतिपत्तये सङ्ग्रहणिगाथामाह – 'नेरइय' इत्यादि, नैरयिकाः 'तिरिय'त्ति तिर्यक्पञ्चेन्द्रिया मनुष्या वनचरा-व्यन्तरा असुरादयः- समस्ता भवनपतयः प्रत्येकं संज्ञिनोऽसंज्ञिनश्च वक्तव्याः, एतचानन्तरमेव भावितं, विकलेन्द्रिया-एकद्वित्रिचतुरिन्द्रिया असंज्ञिनो ज्योतिष्कवैमानिकाः संज्ञिन इति ॥ इति श्रीमलयगिरिविरचितायां प्र० एकत्रिंशत्तमं पदं समाप्तम् ॥ ३१ ॥ अथ द्वात्रिंशत्तमं संयमयोगाख्यं पदं ॥ ३२ ॥ तदेवमुक्तमेकत्रिंशत्तमं पदं, अधुना द्वात्रिंशत्तमं पदमारभ्यते, तस्य चायमभिसम्बन्धः - इहानन्तरपदे संज्ञिपरिणा | अत्र पद (३१) " संज्ञी” परिसमाप्तम् For Pasta Use Only अथ पद (३२) "संयत" आरब्धम् ~175~ ३१संज्ञापदं सू. ३१५ ॥५३४॥ Page #176 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (१५) “प्रज्ञापना” – उपांगसूत्र-४ (मूलं+वृत्ति:) पदं [३२], --------------उद्देशक: -, ------------- दारं -1, -------------- मूलं [३१६] + गाथा पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र-[१५]उपांगसूत्र-[४] "प्रज्ञापना" मूलं एवं मलयगिरि-प्रणीता वृत्ति: प्रत सूत्रांक [३१६]] म उक्तः, इह तु चारित्रपरिणामविशेषः संयमः प्रतिपाद्यते, संयमो नाम निरवद्येतरयोगप्रवृत्तिनिवृत्तिरूपः, तत्र चेदमादिसूत्रम् जीवाणं मंते । किं संजया असंजया संजया २ नोसंजयानोअसंजयानोसंजयासंजया, गो. जीवा संजयावि१ असंजयावि२ संजयासंजयावि३ नोसंजयानोअसंजयानोसंजयासंजयावि ४, नेरइया ण भते! पुच्छा, गो० नेरइया नो संजया असंजया नोसंजयासंजया नो नोसंजयनोअसंजयनोसंजयासंजया, एवं जाब चउरिदि, पंचिंदियतिरिक्खजोणियाणं पुच्छा, गोपिंचिदियतिरिक्खजोणिता नो संजता असंजतावि संजतासंजतावि नो नोसंजतनोअसंजतनोसंजतासंजतावि, मणुस्साणं पुच्छा, गो! मण्सा संजतावि असंजताबि संजतासंजतावि नो नोसंजतनोअसंजतनोसंजतासंजता, वाणमंतरजोतिसियवेमाणिया जहा नेरइया, सिद्धा णं पुच्छा, गो! सिद्धा नो संजता १ नो असंजता २ नो संजतासंजता ३ नोसंजतनोअसंजतनोसंजतासंजता ४॥ गाहा "संजयअसंजय मीसगा य जीवा तहेव मणुया य । संजतरहिया तिरिया सेसा अस्संजता होति ॥ १॥" (सूत्र ३१६ ) ॥ संजयपयं समत्तं ॥ ३२ ॥ 'जीवा णं भंते' इत्यादि, संयच्छन्ति स्म-सर्वसावद्ययोगेभ्यः सम्यगुपरमन्ति स्म अर्थात् निरवद्ययोगेषु चारित्र|परिणामस्फातिहेतुषु वर्तन्ते स्म इति संयताः 'गत्यर्थनित्याकर्मकादिति कर्तरि क्तप्रत्ययः, हिंसादिपापस्थाननिवृत्ता। इत्यर्थः, तद्विपरीता असंयताः, हिंसादीनां देशतो निवृत्ताः संयतासंयताः, त्रितयप्रतिषेधविषयाः सिद्धाः, कथमिति रseseederstiseद गाथा ट दीप अनुक्रम [५७७ -५७८] ~ 176~ Page #177 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (१५) “प्रज्ञापना” – उपांगसूत्र-४ (मूलं+वृत्ति:) पदं [३२], --------------उद्देशक: -, ------------- दारं -1, -------------- मूलं [३१६] + गाथा पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र-[१५]उपांगसूत्र-[४] "प्रज्ञापना" मूलं एवं मलयगिरि-प्रणीता वृत्ति: प्रत सूत्रांक [३१६]] प्रज्ञापना- याः मलयवृत्ती. ॥५३५॥ गाथा चेत्, उच्यते, उक्तमिह संयमो नाम निरवद्येतरयोगप्रवृत्तिनिवृत्तिरूपः, ततः संयतादिपर्यायो योगाश्रयः, सिद्धाथ ३२संयमभगवन्तो योगातीताः शरीरमनसोऽभावादतत्रितयप्रतिषेधविषयाः, एवं च सामान्यतो जीवपदे चतुष्टयमपि घटते, पदं सू. तथा चाह-'गोयमे'सादि, गौतम ! जीवाः संयता अपि साधूनां संयतत्वात् , असंयता अपि नैरयिकादीनामसंयतत्वात् , संयतासंयता अपि पञ्चेन्द्रियतिरश्चां मनुष्याणां च देशतः संयमस्य भावात् , नोसंयतनोअसंयतनोसंयतासंयता अपि सिद्धानां त्रयस्यापि प्रतिषेधात् , चतुर्विंशतिदण्डकसूत्राणि सुगमानि, अत्रैवं सङ्ग्रहणिगाथामाह-संयते'त्यादि, संयता असंयता मिश्रकाश्व-संयतासंयता जीवास्तथैव मनुष्याश्च, किमुक्तं भवति ?-जीवपदे मनुष्यपदे च एतानि त्रीण्यपि पदानि घटन्ते, नतु न घटन्ते इत्येवंपरमेतत् सूत्र, अन्यथा जीवपदे त्रितयप्रतिषेधरूपं चतुर्थमपि पदं घटत एव, यथोक्तं प्राक्, तथा संयतरहिता उपलक्षणमेतत् त्रितयप्रतिषेधरहिताश्च तिर्यञ्चः-तिर्यपञ्चेन्द्रियाः, आह-कथं संयतपदरहितास्तिर्यपञ्चेन्द्रियाः, यावता तेषामपि संयतत्वमुपपद्यते एच. तथाहि-संयतत्वं नाम निरविद्येतरयोगप्रवृत्तिनिवृत्त्यात्मकं, ते च निरवद्येतरयोगेषु प्रवृत्तिनिवृत्ती तिरश्चामपि सम्भवतः, यतश्चरमकालेऽपि चतु विधस्याप्याहारस्थ प्रत्याख्यानं कृत्वा शुभेपु योगेषु वर्तमाना दृश्यन्ते, अन्यच सिद्धान्ते तत्र तत्र प्रदेशे महानतान्यायारात्मन्यारोपयन्तः श्रूयन्ते, उक्तं च-"तिरियाणं चारित्तं निवारितं तह य अह पुणो तेर्सि । सुबह बहुयाणं चिय मह-1 ॥५३॥ यारोवणं समए ॥१॥" [तिरश्चां चारित्रं निवारितं तथा च पुनस्तेषां श्रूयतेऽथ महावतारोपणं बहूनां समय॥१॥ दीप अनुक्रम [५७७ -५७८] ~177~ Page #178 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (१५) “प्रज्ञापना” – उपांगसूत्र-४ (मूलं+वृत्ति:) पदं [३२], --------------उद्देशक: -, ------------- दारं -1, -------------- मूलं [३१६] + गाथा पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र-[१५]उपांगसूत्र-[४] "प्रज्ञापना" मूलं एवं मलयगिरि-प्रणीता वृत्ति: प्रत सूत्रांक [३१६]] गाथा तदेतदयुक्तं, सम्यग्वस्तुतत्त्वापरिज्ञानात् , संयतत्वमिह निरवद्येतरयोगप्रवृत्तिनिवृत्तिरूपमान्तरचारित्रपरिणामानुषक्तमवगन्तव्यं, न शेषं, न च तेषां कृतचतुर्विधाहारप्रत्याख्यानानामपि महानतान्यारोपयतां भवप्रत्ययादेव घरणपरि-18 णाम उपजायते, स खचिन्त्यचिन्तामणिकरपे मनुष्यभव एव, यदि परं कर्मक्षयोपशमाद्भवति, नान्यथा, अप्त एवालायमतिदुलेमो गीयते भगवद्भिः, अथ कथमवसीयते न तिरश्च तथा चेष्टमानानामप्यान्तरश्चारित्रपरिणामः १, उच्यते.18 केवलज्ञानाधश्रवणात् , यदि हि तिरश्चामपि चरणपरिणामस्सम्भवेत् तत् कचित् कदाचित् कस्यचिदुत्कर्षतो भाव-18 |तो मनःपयोयज्ञानं केवलज्ञानं वा श्रयेत, तयोश्चारित्रपरिणामनिवन्धनत्वात,न च श्रूयते, तस्मादवसीयत-न तेषां । | चारित्रपरिणामः, उक्तं च-"न महत्वयसम्भावेवि चरणपरिणामसंभवो तेसिं । न बहुगुणाणपि जओ केवलसंमूह18 परिणामो ॥१॥"[न महानतसद्भावेऽपि चारित्रपरिणामसंभवस्तेषाम् । न बहुगुणानामपि यतः केवलसंभूतिप-18 18Iरिणामः ॥१॥] तद्भावाभावात् संयमपदरहिताः, शेषाः संसारस्था असंयता-असंयतपदसहिंता भवन्ति, न शेषपद-18 सहिताः ॥ इति श्रीमलयगिरिविर० प्रज्ञा संयमपदं द्वात्रिंशत्तमं समासम् ॥ ३२॥ दीप अनुक्रम [५७७-५७८] Auditurary.com अत्र पद (३२) “संयत" परिसमाप्तम ~178~ Page #179 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (१५) “प्रज्ञापना” – उपांगसूत्र-४ (मूलं+वृत्ति:) पदं [३३], --------------उद्देशक: -, ------------- दारं -1, -------------- मूलं [३१७] + गाथा पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र-[१५]उपांगसूत्र-[४] "प्रज्ञापना" मूलं एवं मलयगिरि-प्रणीता वृत्ति: प्रत सूत्रांक [३१७] स्त्रक यवृत्ती गाथा प्रज्ञापनाअथ त्रयस्त्रिंशत्तमं ज्ञानपरिणामाख्यं पदं ॥ ३३॥ ३३ अवया मल विपदं सू. ३१७ तदेवमुक्तं द्वात्रिंशत्तमं पदं, सम्प्रति त्रयस्त्रिंशत्तममारभ्यते, अस्य चायमभिसम्बन्धः-इहानन्तरपदे चारित्रपरि॥५२६॥ णामविशेषः संयमः प्रतिपादितः, इह तु ज्ञानपरिणामविशेषः खल्ववधिः प्रतिपाद्यते, इत्यनेन सम्बन्धेनायातस्यास्यावधिविषयमधिकारद्वारमाहभेदविसयसंठाणे अम्भितरबाहिरे य देसोही । ओहिस्स य खयबुही पडिवाई चेव अपडिबाई ॥१॥ कइविहा णं भंते ! ओही पण्णता ?, गो। दुविहा ओही पन्नता, तं०-भवपञ्चइया य खओवसमिया य, दोहं भवपनदया, तं०-देवाण य नेरइयाण य, दोण्हं खओषसमिया, तं०-मणूसाणं पंचिंदियतिरिक्खजोणियाण य (सूत्र ३१७) 'भेयविसयेत्यादि, अवधेः-अवधिज्ञानस्य प्रागनिरूपितशब्दार्थस्य प्रथम भेदो वक्तव्यः, ततो विषयस्तदनन्तरं संस्थान-अवधिना द्योतितस क्षेत्रस्य यस्तप्रादिरूप आकारविशेषः सोऽवधिनिबन्धन इत्यवधेः संस्थानत्वेन व्यपदिश्य ॥५३६॥ ते, तथा द्विविधोऽवधिर्वक्तव्यः, तद्यथा-अभ्यन्तरो वासश्च, तत्र योऽवधिः सर्वास दिक्ष खद्योत्सं क्षेत्र प्रकाशयति । 1 अवधिमता च सह सातत्सेन ततः खद्योत्यं क्षेत्रं सम्बद्धं सोऽभ्यन्तरावधिः, एतद्विपरीतो बायावधिः, स च द्विधा, दीप अनुक्रम [५७९-५८०] अथ पद (३३) “अवधि:" आरब्धम् ...अत्र मूल-संपादने अध्ययनस्य (पदस्य) नामकरणे किञ्चित् स्खलना संभाव्यते- "अवधि" स्थाने "ज्ञानपरिणाम" इति मुद्रितं ~179~ Page #180 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (१५) “प्रज्ञापना" - उपांगसूत्र-४ (मूलं+वृत्ति:) पदं [३३], --------------उद्देशक: -1, ------------- दारं , -------------- मूलं [३१७] + गाथा पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र-[१५]उपांगसूत्र-[४] "प्रज्ञापना" मूलं एवं मलयगिरि-प्रणीता वृत्ति: प्रत सूत्रांक [३१७] गाथा तद्यथा-अन्तगतो मध्यगतश्च, अथान्तगत इति कः शब्दार्थः १, उच्यते, इह पूर्वाचार्यप्रदर्शितमर्थत्रयं अन्तेआत्मप्रदेशानां पर्यन्ते गतः-स्थितोऽन्तगतः, काऽत्र भावनेति चेत् , उच्यते, इहावधिरुत्पद्यमानः कोऽपि स्पर्द्धकरूपतयोत्पद्यते, स्पर्द्धकं च नामावधिज्ञानप्रभाया गवाक्षजालादिद्वारविनिर्गतप्रदीपप्रभाया इव प्रतिनियतो विच्छेदविशेपः, तथा चाह जिनभद्रगणिक्षमाश्रमणः खोपज्ञभाष्यटीकायां-"स्पर्द्धकमवधिविच्छेदविशेष" इति, तानि च एकजीवस्थासङ्घयेयानि संख्येयानि च भवन्ति, यत उक्तं मूलावश्यकप्रथमपीठिकायाम्-'फडाय असंखेजा संखिज्जा यावि एगजीवस्स' इति, [स्पर्धकान्यसंख्येयानि संख्येयानि चापि एकजीवस्य ] तानि च विचित्ररूपाणि कानिचित्पर्यन्तवर्तिष्वात्मप्रदेशेषूत्पद्यन्ते, तत्रापि कानिचित्पुरतः कानिचित्पृष्ठतः कानिचिदधोभागे कानिचिदुपरितनभागे कानिचिन्मध्यवर्त्तिव्यात्मप्रदेशेष्येवं योऽवधिरुपजायते स आत्मनः पर्यन्ते स्थित इतिकृत्वा अन्तगत इत्यभिधीयते, तैरेव पर्यन्तवतिमिरात्मप्रदेशैः साक्षादवबोधात्', अथवा औदारिकशरीरस्थान्ते गतः-स्थितोऽन्तगतः, औदारिकशरीरम|धिकृत्य कदाचिदेकया दिशोपलम्भात् , इदमपि स्पर्द्धकरूपमवधिज्ञानं, अथवा सर्वेषामप्यात्मप्रदेशानां क्षयोपशमभावेऽपि औदारिकशरीरस्यान्ते कयाचिदेकया दिशा यशादुपलभ्यते सोऽप्यन्तगतः, आह-यदि सर्वेषामप्यात्मप्रदेशानां क्षयोपशमस्ततः सर्वतः किं न पश्यति !, उच्यते, एकदिशैव क्षयोपशमसम्भवात् , विचित्रो हि देशाद्यपेक्षया कर्मणां क्षयोपशमः, ततः सर्वेषामप्यात्मप्रदेशानामित्थंभूत एव खसामग्रीवशात् क्षयोपशमः संवृत्तो यदौदारिक दीप अनुक्रम [५७९-५८०] ~180 Page #181 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम “प्रज्ञापना” – उपांगसूत्र-४ (मूलं+वृत्ति:) पदं [३३], --------------उद्देशक: -, ------------- दारं -1, -------------- मूलं [३१७] + गाथा पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र-[१५]उपांगसूत्र-[४] "प्रज्ञापना" मूलं एवं मलयगिरि-प्रणीता वृत्ति: प्रत सूत्रांक [३१७] गाथा प्रज्ञापना शरीरमपेक्ष्य कयाचिद्विवक्षितया एकया दिशा पश्यतीति, तथा चोक्तं नन्द्यध्ययनचूो-ओरालियसरीरंते ठियंया मन- गयंति एगहुँ, तं वा अप्पप्पएसफडगावहि एगदिसोवलंभाओ अंतगयमोहिनाणं भन्नइ, अहवा सबप्पएससु वि- विपदंसू. यावृत्ती. सुद्धसुवि ओरालियसरीरगतेण एगदिसि पासणा गयंति अंतगयंति भण्णई' इति, एष द्वितीयः, तृतीयः पुनरयं-एग दिग्भाविना तेनावधिना यदुद्योतितं क्षेत्रं तस्यान्ते वर्त्तते अवधिरवधिज्ञानवतस्तदन्ते वर्तमानत्वात् , ततोऽन्ते । ॥५३७॥ |एकदिग्गतस्यावधिविषयस्य पर्यन्ते गतः-स्थितोऽन्तगत इति, अन्तगतश्चावधिः त्रिधा, तद्यथा-पुरतोऽन्तगतः IS पृष्ठतोऽन्तगतः पार्थतोऽन्तगतः, तत्र यथा कश्चित्पुरुषो हस्तगृहीतया दीपिकया पुरतः प्रेमाणया पुरत एव पश्य-18 ति, नान्यत्र, एवं येनावधिना तथाविधक्षयोपशमभावतः पुरत एव सजयेयान्यसवेयानि या योजनानि पश्यति नान्यत्र सोऽवधिः पुरतोऽन्तगत इत्यभिधीयते, तथा स एव पुरुषो यथा पृष्ठतो हस्तेन प्रियमाणया दीपिकया पृष्ठत एव पश्यत्येवं येनावधिना पृष्ठत एव सङ्ख्येयान्यसङ्ख्ययानि वा योजनानि पश्यति स पृष्ठतोऽन्तगतो, येन तु पाथेत एकतो द्वाभ्यां वा सङ्घयेयान्यसङ्ख्येयानि वा योजनानि पश्यति स पार्थतोऽन्तगत इति, उक्तं च नन्यध्ययनचू!-"पुरतोऽतगएणं पुरतो चेव संखेजाणिवा असंखेजाणि वा जोयणाई जाणइ पासइ, मग्गतोऽतगएणं ओहिनाणेणं५३७॥ रामग्गतो चेय' इत्यादि, मध्यगत इत्यत्रापि त्रिधा व्याख्यानं, इह मध्य प्रसिद्धं दण्डादिमध्यवत् , तत्रात्मप्रदेशानां मध्येहामध्यवत्तियात्मप्रदेशेषु गतः-स्थितो मध्यगतः, अयं च स्पर्द्धकरूपः सर्वदिगुपलम्मकारणं, मध्यवर्तिनामात्मप्रद दीप अनुक्रम [५७९-५८०] secipe ~181~ Page #182 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (१५) “प्रज्ञापना” – उपांगसूत्र-४ (मूलं+वृत्ति:) पदं [३३], --------------उद्देशक: -, ------------- दारं -1, -------------- मूलं [३१७] + गाथा पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र-[१५]उपांगसूत्र-[४] "प्रज्ञापना" मूलं एवं मलयगिरि-प्रणीता वृत्ति: प्रत सूत्रांक [३१७] गाथा Reserceeseelcersesesesea शानामवधि (बसेयः, अथवा सर्वेषामप्यात्मप्रदेशानां क्षयोपशमभावेऽपि औदारिकशरीरमध्यभागेनोपलब्धिः स मध्ये गतो मध्यगतः, उक्तं च नन्द्यध्ययनचूणों-"ओरालियसरीरमज्झे फहगविसुद्धीओ सहायप्पएसविसुद्धीओ वा सब|दिसोवलंभत्तणो मज्झगतोत्ति भण्णइ' इति, अथवा तेनावधिना यदुद्योतितं क्षेत्रं सर्वासु दिक्षु तस्य मध्ये-मध्य-13 भागे स्थितो मध्यगतः, अवधिज्ञानिनस्तदुद्योतितक्षेत्रमध्यवर्तित्वात्, आह च नंदिचूर्णिकदेव-"अहवा उवलद्धिखेत्तस्स अवहिपुरिसो मज्झगतोत्ति अतो वा मज्झगतो ओही भण्णई' इति, इह व्याख्यानत्रयेऽपि यदाऽवधिना योतितं क्षेत्रमवधिमता सम्बद्धं भवति तदा सोऽभ्यन्तरावधिर्मतः, सर्वदिगुपलब्धिक्षेत्रमध्यवर्त्तित्वात् , एवं चेह न ग्रामोऽभ्यन्तरावधावस्थान्तर्भावात् , यदा तु तदुद्योतितं क्षेत्रमपान्तराले व्यवच्छिन्नत्वादवधिमता सम्बद्धं न भवति तदा बायोऽवधिः एष चेह प्रायः, प्रस्तुतत्वात् , तथा 'देसोही' इति देशावधिर्वक्तव्यः, उपलक्षणमेतत् , प्रतिपक्षभूतः। [सबोवधिध, अथ किंखरूपो देशावधिः किंखरूपो या सर्वावधिरिति चेत्, उच्यते, इदावधिविविधो भवति, तद्य था-सर्वजघन्यो मध्यमः सर्वोत्कृष्टश्च, तत्र यः सर्वजघन्यः स द्रव्यतोऽनन्तानि तैजसभाषापान्तरालवर्तीनि द्रव्याणि | त्रितोजलासयभागं क्षेत्रं कालतोऽतीतमनागतं चावलिकाया असङ्ख्येयभागं, इहावधिः क्षेत्रं कालं च खरूपतः18 साक्षान्न जानाति, तयोरमूर्तत्वात् , अवधेश्च रूपिविषयत्वात् 'रूपिष्ववघे (तत्त्वा-अ०१सू०२८) रिति वचनात्, इह क्षेत्रकालदर्शनमुपचारतो वेदितव्यं, किमुक्तं भवति ?-एतावति क्षेत्रे काले च यानि द्रव्याणि तानि जानातीति, दीप अनुक्रम [५७९-५८०] ~182~ Page #183 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (१५) “प्रज्ञापना” – उपांगसूत्र-४ (मूलं+वृत्ति:) पदं [३३], --------------उद्देशक: -, ------------- दारं -1, -------------- मूलं [३१७] + गाथा पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र-[१५]उपांगसूत्र-[४] "प्रज्ञापना" मूलं एवं मलयगिरि-प्रणीता वृत्ति: प्रत सूत्रांक [३१७] प्रज्ञापना- या मल- य. वृत्तौ. ३१७ ॥५३८॥ गाथा भावतोऽनन्तान् पर्यायान् जानाति, प्रतिद्रव्यं जघन्यपदेऽपि चतुर्णी रूपरसगन्धस्पर्शरूपाणां पर्यायाणामवगमात्, अबदो पज्जये दुगुणिए सवजहण्णे उ पिच्छए (ओही)। 'ते उ चन्नाईया चउरो' [द्वौ पर्यवौ द्विगुणिती सर्वजघन्यौ तु प्रेक्षतेऽवधिः । ते तु वर्णादिकाश्चत्वारः] इति वचनात्, द्रव्याणां चानन्तत्वात्, अत ऊर्य तु प्रदेशमा सम-II यवृद्ध्या पर्यायवृद्ध्या च प्रवर्द्धमानोऽवधिमध्यमो बेदितव्यः, स च तावत् यावत्सर्वोत्कृष्टः परमावधिन भवति, सर्वोत्कृष्टः परमावधिद्रव्यतः सर्वाणि रूपिद्रव्याणि जानाति, क्षेत्रतोऽलोके लोकमात्राणि खण्डानि, कालतोऽतीतानागता-18 श्वासझोया उत्सर्पिण्यवसर्पिणीर्भावतोऽनन्तान् पर्यायान् , प्रतिद्रव्यं सङ्घयेयानामसजयेयानां च पयोंयाणामवगमात्, 'एग दवं पेच्छं खंधमणुं वा स पज्जवे तस्स । उक्कोसमसंखिजे संखेजे पेच्छए कोई ॥१॥"[एक द्रव्यं प्रेक्षमाणः | स्कन्धमणुं वा स तस्य पर्यवान्। उत्कृष्टतः संख्येयान् असंख्येयान् प्रेक्षते कश्चित् ॥१॥] इति वचनात् , तत्र सर्वजघन्यो मध्यमश्च देशावधिः, सर्वोत्कृष्टस्तु परमावधिः सर्वावधिः। तथाऽवधेः क्षयवृद्धी वक्तव्ये, किमुक्तं भवति -हीयमानका प्रवर्द्धमानकश्चावधिर्वक्तव्य इति, तत्र तथाविधसामयभावतः पूर्वावस्थातो हानिमुपगच्छन् हीयमानका, उक्तं च-"हीयमाणयं पुवावस्थातो अहोऽहो हस्समाणं'ति, वर्द्धमानको बहुबहुतरेन्धनप्रक्षेपादिभिर्वर्द्धमानज्वालाकलाप ॥५३८॥ इव पूर्वावस्थातो यथायोग प्रशस्तप्रशस्ततराध्यवसायभावतोऽभिवर्द्धमानः, तथा प्रतिपाती अप्रतिपाती चशब्दस्यानुतार्थसमुचायकत्वादानुगामिकोऽनानुगामिकश्च वक्तव्यः, तत्र प्रतिपतनशीला प्रतिपाती-य उत्पन्नः सन् क्षयोपश रररररररररर tena दीप अनुक्रम [५७९-५८०] हरयन SHREILLEGunintentiational ~183 Page #184 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (१५) “प्रज्ञापना” – उपांगसूत्र-४ (मूलं+वृत्ति:) पदं [३३], --------------उद्देशक: -, ------------- दारं -1, -------------- मूलं [३१७] + गाथा पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र-[१५]उपांगसूत्र-[४] "प्रज्ञापना" मूलं एवं मलयगिरि-प्रणीता वृत्ति: प्रत सूत्रांक [३१७] गाथा मानुरूपं कियत्कालं स्थित्वा प्रदीप इव सामस्त्येन विध्वंसमुपयाति, अथ हीयमानकप्रतिपातिनोः का प्रतिविशेषः, उच्यते, हीयमानकः पूर्वावस्थातोऽधोऽधो हानिमुपगच्छन्नभिधीयते प्रतिपाती तु निर्मूलमेककालं धंसमुपगच्छन्निति, तथा न प्रतिपाती अप्रतिपाती, यत्केवलज्ञानाद्वा मरणादारतो वा न भ्रंशमुपयातीत्यर्थः, तथा गच्छन्तं पुरुष आ-समन्तादनुगच्छतीत्येवंशीलमानुगामि आनुगाम्येयानुगामिका, खार्थे कः प्रत्ययः, अथवा अनुगमः प्रयोजनं यस्य स आनुगामिकः, लोचनवत् गच्छन्तमनुगच्छति सोऽवधिरानुगामिक इति भावः, तथा न आनुगामिकोऽनानुगामिकः, शृङ्खलाप्रतिबद्धदीप इय यो गच्छन्तं पुरुष नानुगच्छतीति भावः ॥ तदेवमधिकारप्रतिपादनाय द्वारगाथोपन्यता, सम्प्रति 'यथोद्देशं निर्देश' इति न्यायात् प्रथमतो भेदप्रतिपादनार्थमाह-कइविहाणं भंते !' इत्यादि, कति विधो भदन्त ! अवधिः प्रज्ञासः, सूत्रे खीत्वनिर्देशः प्राकृतत्वात् , भगवानाह-गौतम ! द्विविधोऽवधिः प्रज्ञसः, तद्यNथा-'भवपचइया य खओबसमिया य' भवप्रत्ययकः क्षायोपशमिकश्च, तत्र भवन्ति कर्मवशवर्तिनः प्राणिनोऽस्मिन्निति भवो-नारकादिजन्म, 'पुनानी'ति अधिकरणे घप्रत्ययः, भव एव प्रत्ययः-कारणं यस्य स भवप्रत्ययः, प्रत्ययशब्दचेह कारणपर्यायः, वर्त्तते च प्रत्ययशब्दः कारणत्वे "प्रत्ययः शपथज्ञानहेतुविश्वासनिश्चये" इति, स एव खार्थिककप्रत्ययविधानात् भवप्रत्ययकः, तथाऽवधिज्ञानावरणीयस्य कर्मण उदयावलिकाप्रविष्टस्यांशस्य वेदनेन योऽपगमः। स क्षयोऽनुदयावस्थस्य विपाकोदयविष्कम्भणमुपशमः क्षयश्च उपशमश्च क्षयोपशमी ताभ्यां निवृत्तः क्षायोपशमिकः, दीप अनुक्रम [५७९-५८०] एन्टरटलब्रिट ~184~ Page #185 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (१५) “प्रज्ञापना” – उपांगसूत्र-४ (मूलं+वृत्ति:) पदं [३३], --------------उद्देशक: -, ------------- दारं -1, -------------- मूलं [३१७] + गाथा पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र-[१५]उपांगसूत्र-[४] "प्रज्ञापना" मूलं एवं मलयगिरि-प्रणीता वृत्ति: प्रत सूत्रांक [३१७] या मलयवृत्ती. ॥५३९॥ गाथा चशब्दी खगतानेकभेदसूचकी, तत्र तु यो येषां भवति तं तेषामुपदर्शयति-'दोह'मित्यादि, द्वयोर्जीवसमूहयोर्भवप्रत्ययका, तद्यथा-देवानां च नारकाणां च, देवा भवनपतिव्यन्तरज्योतिष्कवैमानिकभेदाचतुर्विधाः, नारका रत्नप्र- धिपदं. भादिपृथिवीभेदात् ससविधाः, चशब्दी प्रत्येक खगतानेकभेदसूचकी, ते चानेकदा विषयसंस्थानचिन्तायामने खयमेव सूत्रकृतैवोपदर्शयिष्यन्ते, आह-नन्ववधिज्ञानं क्षायोपशमिके भावे वर्तते नारकादिभवस्त्वौदयिके तत्कथं देवादीनामवधिज्ञानं भवप्रत्ययमिति व्यपदिश्यते !, नैष दोषो, यतस्तदपि परमार्थतः क्षायोपशमिकमेव, केवलं स क्षयोपशमो देवनारकभवेष्ववश्यंभावी पक्षिणां गगनगमनलब्धिरिव ततो भवप्रत्ययमिति व्यपदिश्यते, आह च नन्ध-IN ध्ययनचूर्णिकृत्-"नणु ओही खओवसमिओ चेव नारगादिभवो से उदइए भावे तओ कहं भवपचइओ भषणइ , | उच्यते, सोऽवि खओवसमिओ चेव, किंतु सो खओक्समो देवनारगमवेस अपस्सं भवइ, को दिट्टतो -पक्खीण। आगासगमणे च, तमोभवपचइओ भण्णइत्ति, तथा द्वयोः क्षायोपशमिकस्तद्यथा-मनुष्याणां च पञ्चेन्द्रियतियेग्योनिजातानां च, अत्रापि चशब्दी प्रत्येक खगतानेकभेदसूचकी, मनुष्याणां तिर्यक्रपञ्चेन्द्रियतिरश्चां चावधिज्ञानं नावश्यंभावि ततः सामान्येऽपि क्षायोपशमिकत्वे भवप्रत्ययादिदं भिद्यते, परमार्थतः पुनः सकलमप्यवधिज्ञान क्षायोपशमिकमेवेति । तदेवमुक्तो भेदः, सम्प्रति विषयप्रतिपादनार्थमाह ॥५३९॥ नेरइया णं भंते ! केवइयं खे ओहिणा जाणंति पासंति, गो! जह० अगाउयं उको० चचारि गाउयाई ओहिणा दीप अनुक्रम [५७९-५८०] ~185 Page #186 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (१५) “प्रज्ञापना” – उपांगसूत्र-४ (मूलं+वृत्ति:) पदं [३३], -------------- उद्देशक: [-], ------------- दारं [-], -------------- मूलं [३१८] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र-[१५]उपांगसूत्र-[४] "प्रज्ञापना" मूलं एवं मलयगिरि-प्रणीता वृत्ति: प्रत सूत्रांक e rseaseraesese [३१८] जाणंति पासंति, स्थणण्यभापुढविनेरइया णं भंते ! केवतियं खेतं ओहिणा जाणंति पासंति?, गो.ज. अद्भुट्टाई गाउयाई उक्को चत्तारि गाउयाई, सक्करप्पभापुढविनेरइया जह• तिण्णि गा० उको० अमुट्ठाई गाउ०, वालुयप्पभापुढविनेराया ज० अद्धाइलाई गाउ० उ० तिणि गाउयाई ओहिणा जाणंति पासंति, पंकप्पभामुडविनेरइया ज० दोण्णि गाउ० उ० अद्भाइजाई गा० ओहिणा जा० पा०, धूमप्पभापु० नेर० जह० दिवद्धंगा उक्को दो गाउ० ओहिणा जा० पा०, तमापु० ने० ज० गाउयं उ० दिवई गाउयं ओहिणा जा०या०, अधेसत्तमाए पुच्छा, मो०। जह० अर्बु गाउयं उ० गाउयं ओहिणा जा० पा० । असुरकुमारा णं भंते ! ओहिया केवइयं खेत जा. पा.१, गो० ज० पणवीसं जोअणाई उको० असंखेले दीवसमुद्दे ओहिणा जा० पा०, नागकुमारा णं ज. पणवीसं जोअणाई उ० संखेजे दीवसमुद्दे ओहिणा जा० पा०, एवं जाव थणियकुमारा । पंचिंदियतिरिक्खजोणिया णं भंते ! केवइयं खेतं ओहिणा आणति पासंति , गो० ज० अंगुलस्स असंखेअतिभागं उ० असंखेजे दीवसमदे, मसाणं भंते ! ओहिणा केवतितं खेच जा० पा०, गो.! ज० अंगुलस्स असंखेज्जतिभागं उको० असंखेज्जाई अलोए लोयप्पमाणमेचाई खंडाई ओहिणा जा० पा० । वाणमंतरा जहा नागकुमारा, जोइसिया णं मंते ! केवतितं खेत्तं ओ० जा० पा०१, गो० ज० संखेजे दीवसमुद्दे उकोसेणवि संखेजे दीवसमुद्दे, सोहम्मगदेवाणं भंते ! केव० खेत्तं ओ० जा० पा०, गो० ज० अंगुलस्स असंखेजतिभागं उको० अहे जाव इमीसे रयणप्पभाए हिडिल्ले चरमंते तिरियं जाव असंखिजे दीवसमुद्दे उजाव सगाई विमाणाई ओहिणा जाणंति पासंति, एवं ईसाणगदेवावि, सणकुमारदेवावि एवं चेच, नवरं जाव अहे दोच्चाए सकरप्पभाए पुढवीए 200202016302035 दीप अनुक्रम [५८१] sek ~186~ Page #187 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (१५) “प्रज्ञापना” – उपांगसूत्र-४ (मूलं+वृत्ति:) पदं [३३], -------------- उद्देशक: [], ------------- दारं [-], -------------- मूलं [३१८] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र-[१५]उपांगसूत्र-[४] "प्रज्ञापना" मूलं एवं मलयगिरि-प्रणीता वृत्ति: प्रत धिपत. सूत्रांक [३१८] दीप अनुक्रम [५८१] प्रज्ञापना- हिहिले चरमंते, एवं माहिंददेवावि, बभलोयलंतगदेवा तच्चाए पुढवीए हिडिल्ले चरमंते, महासुक्कसहस्सारगदेवा चउत्थीए ३३ अबयाः मल- पंकप्पभाए पुढचीए हेहिले चरमंते, आणयपाणयआरणचुयदेवा अहे जाव पंचमाए धूमप्पभाए हेहिल्ले चरमंते, हेडिममयवृत्ती. ज्झिमगेवेज्जगदेवा अधे जाव छहार तमाए पुढवीए हेहिले जाव चरमंते, उवरिमगविज्जगदेवा गं भंते ! केवतियं खत्त ३१८ ओहिणा जा० पा०, गो० ज० अंगुलस्स असंखेज्जतिभागं उ० अधे सत्तमाए हे. च० तिरियं जाव असंखेजे दीवसमुद्दे ।५४०॥ उड़े जाव सयाई विमाणाई ओ० जा० पा०, अणुचरोववाइयदेवा णं भंते ! के खेतं ओ० जा० पा०१, गो ! संभिनं लोगनालि ओ० जा० पा० (सूत्रं ३१८) 'नेरइया ण'मित्यादि सुगम, नवरं जघन्येनार्द्धगब्यूतमिति सप्तमपृथिव्यां जघन्यपदमपेक्ष्य, उत्कर्षतश्चत्वारि | || गन्यूतानि रलप्रभायामुत्कृष्टपदमाश्रित्य, अधुना प्रतिपृथिवीविषयं चिन्तयन्नाह-'रयणप्पभे'त्यादि, सुगम, जघन्य-II | पदोत्कृष्टपदविषयसवाहिके इमे गाथे-"अह १-३॥ तिन्नि २-३ अद्धाइयाई ३-२॥ दोषिण ४-२ य दिवट्ठ-1| ||५-१॥ मेगं च ६-१ अद्धं च गाउ ७-०॥ कमसो जहन्नतो रयणमाईसुं॥१॥ चत्तारि गाउयाई १-४ अडु हाई २-३॥ तिगाज्यं ३-३ चेव । अद्धाइजा ४-२॥ दोण्णि ५-२ य दिवह-६-१॥ मेगं ७-१ च नरपमुं ५४॥ ॥२॥" भवनपतिव्यन्तराणां जघन्यपदे यानि पञ्चविंशतियोजनानि तानि येषां सर्वजघन्यं दशवर्षसहस्रप्रमाणमा! युस्तेषां द्रष्टव्यानि, न शेषाणां, आह च भाष्यकृत्-'पणवीसजोयणाई दसवाससहस्सिया ठिई जेसिमिति, मनुष्य-TRA रन्यररर For P OW ~187~ Page #188 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (१५) प्रत सूत्रांक [३१८] दीप अनुक्रम [५८१] “प्रज्ञापना” – उपांगसूत्र - ४ ( मूलं + वृत्तिः ) पदं [३३], --------------उद्देशक: [-1, -------------- दारं [-], मूलं [३१८] पूज्य आगमोद्धारकश्री संशोधितः मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र [१५],उपांगसूत्र-[४] "प्रज्ञापना" मूलं एवं मलयगिरि-प्रणीता वृत्तिः चिन्तायामुत्कृष्टपदे यान्यलोके लोकप्रमाणमात्राणि खण्डानि असङ्ख्येयानि तानि परमावधिमपेक्ष्य द्रष्टव्यानि, तस्यैवैतावद्विषयसम्भवात् एतत्सामर्थ्य मात्रमुपवर्ण्यते, यद्येतावति क्षेत्रे द्रष्टव्यं भवति तर्हि पश्यति यावता तन्न विद्यते, अलोके रूपिद्रव्याणामसम्भवात्, रूपिद्रव्यविषयश्चावधिः, केवलमयं विशेषो — यावदद्यापि परिपूर्ण लोकं पश्यति तावदिह स्कन्धानेव पश्यति यदा पुनरलोकेऽपि प्रसरमवधिरधिरोहति तदा यथा यथाऽभिवृद्धिमासादयति तथा तथा लोके सूक्ष्मान् सूक्ष्मतरान् स्कन्धान् पश्यति यावदन्ते परमाणुमपि, उक्तं च- " सामत्थमेत्तमुत्तं दट्ठवं जइ हवेज पेच्छेजा । न उ तं तत्थत्थि जओ सो रुविनिबंधणो भणिओ ॥ १ ॥ तो पुण वाहिँ लोगत्थं चेव पासई दबं । सुडुमयरं सुदुमयरं परमोही जाव परमाणुं ॥ २ ॥" [ सामर्थ्यमात्रमुक्तं द्रष्टव्यं यदि भवेत् प्रेक्षेत नतु तत्तत्रास्ति यतः स रूपिनिबन्धनो भणितः ॥ १ ॥ वर्धमानः पुनर्वहिर्लोकस्वमेव पश्यति द्रव्यं । सूक्ष्मतरं सूक्ष्मतरं | परमावधिवत् परमाणु ॥ २ ॥ ] इत्थंभूतपरमावधिकलितश्च नियमादन्तर्मुहूर्त्तेन केवलालोकलक्ष्मीमालिङ्गति, यत उक्तं- "परमोहीनाणविक केवलमंतो मुहुत्तमेत्तेणं" [ परमावधिज्ञानविदः केवलमन्तर्मुहूर्त्तमात्रेण ] इति, वैमानिकानां यजघन्यपदे अङ्गुलायेयभागप्रमाणं क्षेत्रं उक्तं तत्र पर आह - नम्बङ्गुलासङ्ख्ये य भागमात्रक्षेत्रपरिमितोऽवधिः सर्वजघन्यो भवति, सर्वजघन्यश्चावधिस्तिर्यग्मनुष्येष्येव न शेषेषु, यत आह भाष्यकृत् स्वकृतटीकायाम् - "उत्कृष्टो मनुष्येष्वेव नान्येषु, मनुष्यतिर्यग्योनिष्वेव जघन्यो नान्येषु शेषाणां मध्यम एवेति" तत्कथमिह सर्वजघन्य उक्तः १, Educatin internation For Parts Only ------ ~188~ yor Page #189 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (१५) “प्रज्ञापना” – उपांगसूत्र-४ (मूलं+वृत्ति:) पदं [३३], -------------- उद्देशक: [-], ------------- दारं [-], -------------- मूलं [३१८] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र-[१५]उपांगसूत्र-[४] "प्रज्ञापना" मूलं एवं मलयगिरि-प्रणीता वृत्ति: प्रत सूत्रांक [३१८] दीप अनुक्रम [५८१] प्रज्ञापना- उच्यते, सौधर्मादिदेवानां पारभविकोऽप्युपपातकालेऽवधिः सम्भवति, स च कदाचित्सवेजघन्योऽपि, उपपातान- ३३ अवयाः मल- न्तरं तु तद्भवजः, ततो न कश्चिदोषः, आह च दुष्षमान्धकारनिमग्नजिनप्रवचनप्रदीपो जिनभद्रगणिक्षमाश्रमणः- धिपदं सू. या वृत्ती. "माणियाणमंगुलभागमसंखं जहण्णओ होइ । उववाए परभविओ तम्भवजो होइ तो पच्छा ॥१॥" उडे जाव ३१९-३२० ॥५४॥ सगाई विमाणाईति ऊर्ध्व यावत् खकीयानि विमानानि, खकीयविमानस्तूपध्वजादिकं यावदित्यर्थः, 'संभिनं। लोगनालिं'ति परिपूर्ण चतुर्दशरज्वात्मिका लोकनाडीमिति.। संस्थानद्वारमाहनेरइयाणं भंते ! ओही किंसंठिए पं० १, गो०! तप्पागारसंठिए पं०, असुरकुमाराणं पुच्छा, गो०! पल्लगसंठिते, एवं जाव थणियकुमाराणं, पंचिंदियतिरिक्खजोणियाणं पुच्छा, गो०! णाणासंठाणसं०, एवं मणूसाणचि, वाणमंतराणं पुच्छा, गो! पडहगसं०, जोतिसिवाणं पुच्छा, गो०! झल्डरिसंठाणसं०५०, सोहम्मगदेवाणं पुच्छा, गो०1 उडमुयंगागारसंठिए पं०, एवं जाव अनुयदेवाणं, गेवेज्जगदेवाणं पूच्छा, गो! पुष्फचंगेरिसंठिए पं०, अणुचरोववाइयाणं पुच्छा, गो! जवनालियासंठिते ओही, पं०। (मूत्रं ३१९) नेरइयाणं भंते । ओहिस्स किं अंतो० बाहिं०, गो०। अंतो नो बाहि, एवं जाव थपियकुमारा, पंचिदियतिरिक्खजोणियाणं पुच्छा, गो० नो अंतो बाहि, मणसाणं पुच्छा, गो। अंतीवि बाहिपि, वाणमंतरजोइसियवेमाणियाणं जहा नेरयाणं । नेरइयाणं भंते । किं देसोही सबोही, गोदेसोही |॥५४॥ नो सबोही, एवं आप थणियकुमारा, पंचिंदियतिरिक्खजोणियाणं पुच्छा, गो01 देसोही नो सबोही, मसाणं पुच्छा, ~189~ Page #190 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (१५) “प्रज्ञापना" - उपांगसूत्र-४ (मूलं+वृत्ति:) पदं [३३], -------------- उद्देशक: ------------- दारं -1, -------------- मूलं [३१९-३१९ R] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र-[१५]उपांगसूत्र-[४] "प्रज्ञापना" मूलं एवं मलयगिरि-प्रणीता वृत्ति: Reace प्रत सूत्रांक [३१९३१९R] दीप गो०! देसोहीपि सबोहीवि, वाणमंतरजोदसियवेमाणियाणं जहा नेरहयाणं । नेरइयाणं भंते ! ओही किं आणुगामिते अणाणुगामिते बड्डमाणते हीयमाणए पडिवाई अप्पडिवाई अवहिए अणवहिए , मो०! आणुगामिए नो अणाणुगामिए नो बद्माणते नो हीयमाणए नो पडिवाई अप्पडिवाई अवहिए नो अणवहिए, एवं जाव धणियकुमाराण, पंचिंदियतिखिखजोणियाणं पुच्छा, गो! आणुगामितेवि जाव अणवहिएपि, एवं मप्रसाणवि, वाणमंतरजोतिसियवेमाणियाणं जहा नेरहयाण (सूत्र ३१९)॥ पण्णवणाए ओहिपदं समत्तं ॥ ३३॥ 'नरइयाण'मित्यादि, 'तप्पागारसंठिए'त्ति तप्रो नाम काष्ठसमुदायविशेषो यो नदीप्रवाहेण प्लाग्यमानो दूरा-11 दानीयते स चायतख्यत्रश्च भवति, तदाकारसंस्थितोऽवधिनारकाणां, असुरकुमारादीनां सर्वेषामपि भवनपतीनां पल्लकसंस्थानसंस्थितः, पल्लको नाम लाटदेशे धान्याधारविशेषः, स चोर्बाध आयत उपरि च किश्चित्सहितः, पञ्चन्द्रियतियेग्योनिकानां मनुष्याणां च नानासंस्थानसंस्थितो, यथा खयम्भूरमणोदधी मत्स्याः, अपि च तत्र मत्स्यानां वलयाकारं संस्थानं निषिद्धं तिर्यग्मनुष्यावधेस्तु तदपि भवति, उक्तं च-"नाणागारो तिरियमणुएसु मच्छा सयंभूरमणेव । तत्थ बलयं निसिद्धं तस्स पुण तयंपि होजाहि ॥१॥" व्यन्तराणां परहसंस्थानसंस्थितः, पटह आतो-18 यविशेषः, स च किञ्चिदायत उपर्यधश्च समप्रमाणः, ज्योतिप्कदेवानां झलरीसंस्थानसंस्थितः, झल्लरी-चौवनद्धविस्तीर्णवलयाकारा आतोचविशेषरूपा देशविशेष प्रसिद्धा, सौधर्मदेवादीनामच्युतदेवपर्यन्तानां मृदङ्गसंस्थानसंस्थितः, अनुक्रम [५८२-५८३] ackette मूल-संपादने अत्र सूत्र-क्रमांकने मुद्रण-दोषात् (सूत्रं ३१९) इति ३१९' क्रम द्विवारान् मुद्रितं ~190~ Page #191 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (१५) “प्रज्ञापना" - उपांगसूत्र-४ (मूलं+वृत्ति:) पदं [३३], -------------- उद्देशक: ------------- दारं -1, -------------- मूलं [३१९-३१९ R] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र-[१५]उपांगसूत्र-[४] "प्रज्ञापना" मूलं एवं मलयगिरि-प्रणीता वृत्ति: प्रत सूत्रांक प्रज्ञापना-1 या: मलय.वृत्ती . [३१९ ॥५४॥ ३१९R] दीप अनुक्रम [५८२-५८३] मृदङ्गो वाद्यविशेषः, स चाधस्तात् विस्तीर्ण उपरि च तनुकः सुप्रतीतः, अवेयकदेवानां प्रथितपुष्पसशिखाकरूपच- | ३३ अवमेरीसंस्थानसंस्थितः, अनुत्तरोपपातिकदेवानां कन्याचोलकापरपर्यायजवनालकसंस्थानसंस्थितः, तथा च तप्राकारा-18 |धिपदं सू. दीनां व्याख्यानमिदं भाष्यकृदाह-"तप्पेण समागारो तप्पागारो स चाययत्तंसो । उद्धायतो उ पल्लो उबरिं च स किंचि सखित्तो ॥१॥ नचायतो समोविय पडहो हेट्टोवरि पईतो सो। चम्माणवणद्धविच्छिन्नवलयरूवा उ झल्ल| रिया ॥२॥ उद्धायओ मुइंगो हेटा रुंदो तहोवरि तणुओ। पुप्फसिहावलिरइया चंगेरी पुष्फचंगेरी ॥३॥ जवनालओत्ति भण्णाद उम्भ सिरकंचुओ कुमारीए॥" इति, अनेन च संस्थानप्रतिपादनेनेदमावेदितं द्रष्टव्यं, भवनपतिव्यन्त-II राणामूर्व प्रभूतोऽवधिवैमानिकानामधः ज्योतिष्कनारकाणां तिर्यक् विचित्रो नरतिरश्चां, आह च-"भवणवइवणयराणं उहूं बहुगो अहो य सेसाणं । नारगजोइसियाणं तिरियं ओरालिओ चित्तो॥१॥" तथा नैरयिकभवनपतिव्यन्तरज्योतिप्कवैमानिकाः तथाभवखाभाब्यादवधेमध्यवर्त्तिनो न पुनर्वहिः, किमुक्तं भवति -सर्वतःप्रकाशिखसम्बद्धावधयो भवन्ति, न तु स्पर्द्धकावधयो विच्छिन्नावधयो वा, तिर्यपञ्चेन्द्रियास्त्ववधेरन्तन विद्यन्ते, किन्तु बहिः, अत्राप्येष भावार्थ:-तिर्यपञ्चेन्द्रियास्तथाभवखाभाव्यात् स्पर्धकावधयो विच्छिन्नापान्तरालसर्वतःप्रकाश्यवधियो वा भवन्ति, स्पर्द्धकाद्यवधयो वेति भावः, देशावधिसर्वावधिचिन्तायां मनुष्यवर्जाः सर्वेऽपि देशावधयः, मनुष्यास्तु देशावधयोऽपि भवन्ति सर्वावधयोऽपि, परमावधेरपि तेषां सम्भवात् । आनुगामिकादिचिन्तायां नैरयिकभवनपति ॥५४॥ ~191~ Page #192 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (१५) “प्रज्ञापना" - उपांगसूत्र-४ (मूलं+वृत्ति:) पदं [३३], -------------- उद्देशक: ],------------- दारं -,-------------- मूलं [३१९-३१९ R] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र-[१५]उपांगसूत्र-[४] "प्रज्ञापना" मूलं एवं मलयगिरि-प्रणीता वृत्ति: प्रत सूत्रांक [३१९३१९R] व्यन्तरज्योतिष्कवैमानिका आनुगामिकाप्रतिपात्यवस्थितावधयो नत्वनानुगामिकवर्द्धमानहीयमानप्रतिपात्यनवस्थितावधयस्तथाभवखाभाव्यात् , तिर्यपञ्चेन्द्रियमनुष्याणां त्वष्टधाऽवधिरिति ॥ इति श्रीमलयगिरि० प्रज्ञापनाटी-1 कायां त्रयस्त्रिंशत्तममवध्याख्यं पदं समासम् ॥ ३३ ॥ अथ चतुर्विंशत्तमं प्रवीचारपरिणामाख्यं पदं ॥३॥ तदेवमुक्तं त्रयस्त्रिंशत्तमं पदं, सम्प्रति चतुस्त्रिंशत्तममारभ्यते, अस्य चायमभिसम्बन्धः-इहानन्तरपदे ज्ञानपरिणामविशेषोऽवधिरुक्तः, अत्र तु परिणामसाम्यावेदपरिणामविशेषः प्रवीचारः प्रतिपाद्यते इति, तत्र च सकलवक्तव्यतोपसङ्घाहिके इसे द्वे गाथे अणंतरगयाहारे १, आहारे भोयणाइय २ । पोग्गला नेव जाणंति ३, अज्झवसाणा ४ य आहिया ॥१॥ सम्मत्तस्साहिगमे ५ ततो परियारणा ६ य बोद्धया । काए फासे रूबे सद्दे य मणे य अप्पबहुं ॥२॥ नेरइया णं भंते । अणंतराहारा ततो निवतणा ततो परियाइणया ततो परिणामया ततो परियारणया तओ पच्छा विउवणया, हंता! गो०! नेरइयाणं अणंतराहारा ततो निवतणया ततो परियादिणया ततो परिणामया तओ परियारणया तओ पच्छा विउत्तणया, असुरकुमारा गं भंते ! अणंतराहारा ततो निवत्तणया ततो परियाइणया ततो परिणामया ततो विउवणया तओ पच्छा दीप अनुक्रम [५८२-५८३] acc अत्र पद (३३) “अवधि:" परिसमाप्तम् अथ पद (३४) “प्रविचारणा" आरब्धम ~192~ Page #193 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (१५) “प्रज्ञापना" - उपांगसूत्र-४ (मूलं+वृत्ति:) पदं [३४], -------------- उद्देशक: , ------------- दारं [-], -------------- मूलं [३२०] + गाथा: पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र-[१५]उपांगसूत्र-[४] "प्रज्ञापना" मूलं एवं मलयगिरि-प्रणीता वृत्ति: प्रत सूत्रांक प्रज्ञापनाया। मलयवृत्ती. [३२०] ॥५४३॥ गाथा: परियारणया, हंता! गो! असुरकुमारा अणंतराहारा ततो निबत्तणया जाव ततो पच्छा परिया०, एवं जाव थणिय- M३४ परिकुमारा, पुढविकाइया णं भैते ! अणंतराहारा ततो निवत्तगया ततो परियाइणया ततो परिणामया ततो परिया० ततो- चारणापदं विउ०१, हता! गोतं चेव जाव परियारणया नो चेवणं विउवणया, एवं जाब चउरिदिया, नवरं वाउकाइया पं- सू. ३२० चिंदियतिरिक्खजोणिया मनसा य जहा नेरझ्या, वाणमंतरजोइसियनेमाणिया जहा असुरकुमारा (सूत्रं ३२०) 'अणंतरागयाहारे'इत्यादि, प्रथममनन्तरागताहारको नैरयिकादिर्बक्तव्यः, तदनन्तरं 'आहारे भोयणाइय' इति आहाराभोगता आदिशब्दादाहारानाभोगता च वक्तव्या, यथा 'नेरयिकाणं भंते ! आहारे किं आभोगनिपत्तिए | अणाभोगनिबत्तिए' इत्यादि, तथा 'पोग्गला नेव जाणंति' इति, नैरयिका आहारतया गृहीतान् पुद्गलान्नव जानन्तीत्यादि चतुर्विंशतिदण्डकक्रमेण वक्तव्यं, 'अज्झवसाणा य आहियत्ति तदनन्तरं नैरयिकादीनां क्रमेणाध्यवसानानि, सूत्रे पुंलिङ्गनिर्देशः प्राकृतत्वात् , चः पूर्वापेक्षया समुच्चये, आख्यातानि, तदनन्तरं 'सम्मत्तस्स अहिगमे' इति, सम्यक्त्वस्याधिगमो नेरयिकादिचतुर्विशतिदण्डकक्रमेण चिन्तनीयः, 'तत्तो परियारणा य बोद्धवा' इति ततःसम्यक्त्वाधिगमप्रतिपादनादूर्ध्व परिचारणा वक्तव्यतया बोद्धव्या, कस्मिन् विषये इत्याह-काये स्पशे रूप शन्दे | ॥५४॥ मनसि च, ततः कायप्रवीचारादीनामल्पबदुत्वं, भावप्रधानोऽयं निर्देश:-अल्पबहुत्वं वक्तव्यं । सम्प्रति 'योदशं नि-18 हादेश' इति प्रथमतोऽनन्तरागताहारवक्तव्यतामभिधित्सुरिदमाह-'नरइया णं भंते !' इत्यादि, नैरयिकाः, णमिति | दीप अनुक्रम [५८४-५८६] ~193~ Page #194 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (१५) “प्रज्ञापना" - उपांगसूत्र-४ (मूलं+वृत्ति:) पदं [३४], -------------- उद्देशक: -,------------- दारं ], -------------- मूलं [३२०] + गाथा: पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र-[१५]उपांगसूत्र-[४] "प्रज्ञापना" मूलं एवं मलयगिरि-प्रणीता वृत्ति: प्रत Coen सूत्रांक [३२०] गाथा: वाक्यालकारे, भदन्त !-परमकल्याणयोगिन् । परमसुखयोगिन् ! वा अनन्तरं-उपपातक्षेत्रप्राप्सिसमयमेव आहापरयन्तीत्यनन्तरागताहाराः, 'ततो निश्चत्तणया' इति ततः-अनन्तराहारग्रहणादारभ्य क्रमेण शरीरस्पेति गम्यते नि-11 वर्त्तना-निष्पत्तिर्भवति, 'ततो परियाइणया' इति ततः-शरीरनिष्पत्तेरारभ्य पर्यादानं यथायोगमङ्गप्रत्यकैलोमाहारादिना समन्ततः पुद्गलादानं 'ततो परिणामणया' इति ततः पुद्गलादानादनन्तरं तेषां पुद्गलानां परिणामनंइन्द्रियादिरूपतया परिणत्यापादनं 'ततो परियारणया' इति ततः-इन्द्रियादिरूपतया परिणत्यापादनादूर्व परिचारणा-यथायोगं शब्दादिविषयोपभोगः, ततः पश्चात् विकुर्वणा-वैक्रियलग्धिवशात् विक्रिया नानारूपा १, एवमुक्त भगवानाह-'हंता! गोयमे'त्यादि, हन्तेत्यभ्यनुज्ञार्थ, हता! गौतम ! नैरयिका अनन्तराहारा इत्यादि, तदेवं यथा नैरयिकाणामनन्तराहारादिवक्तव्यतोक्ता तथा असुरकुमारादीनामपि स्तनितकुमारपर्यवसानानां वक्तव्या, नवरं | तेषां पूर्व विकुर्वणं पश्चात् परिचारणा, ते हि विशिष्टशब्दाधुपभोगवाम्छायां पूर्वमिष्टं वैक्रिय रूपं कुर्वन्ति पश्चात् शब्दाधुपभोगमित्येष नियमः, शेषास्तु शब्दाधुपभोगसम्पत्ती सत्यां हर्षवशात् विशिष्टतरशब्दाधुपभोगवान्छातः | अन्यतो वा कुतश्चित्कारणात् विकुर्वते, ततस्तेषां पूर्व प्रवीचारणा पश्चाद्विकुर्वणेति, पृथिवीकायविषये प्रश्नसूत्रं तथैव | उत्तरसूत्रे तावद् वक्तव्यं यावत् परिचारणा, तेषामपि स्पर्शीपभोगसम्भवात् , 'नो चेव णं विउचणय'त्ति न चैव तेषां| विकुर्वणा याच्या, वैक्रियलब्धेरसम्भवात् , 'एच'मित्यादि, एवं-पृथिवीकायिकवत् अप्कायादयो वातकायवर्जास्ता दीप अनुक्रम [५८४-५८६] For P OW ~194~ Page #195 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (१५) “प्रज्ञापना" - उपांगसूत्र-४ (मूलं+वृत्ति:) पदं [३४], -------------- उद्देशक: , ------------- दारं [-], -------------- मूलं [३२०] + गाथा: पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र-[१५]उपांगसूत्र-[४] "प्रज्ञापना" मूलं एवं मलयगिरि-प्रणीता वृत्ति: प्रत सूत्रांक प्रज्ञापनायामलय.वृत्ती . [३२०] ॥५४४॥ Sp4 गाथा: बदध्येतव्या यायचतुरिन्द्रियाः, सर्वेषामपि वैक्रियलब्धेरसम्भवेन सूत्रस्य समानत्वात् , वातकायान् प्रति विशेषमभि- ३४ परि. धित्सुः समानगमत्वात् पञ्चेन्द्रियतिर्यग्मनुष्याणामपि बातकायैः सहातिदेशमाह-'नवर'मित्यादि, 'जहा नेरइया' |चारणापदं इति यथा नैरयिकास्तथा वक्तव्याः, किमुक्तं भवति ?-'नैरयिकवत् विकुर्वणाऽप्येतेषां वक्तव्या, वैक्रियलब्धिसम्भ- सू. ३२१ वात् , सा च प्रवीचारणायाः पश्चादिति, 'वाणमंतरजोइसनेमाणिया जहा असुरकुमारा' इति असुरकुमाराणामिव व्यन्तरादीनामपि पूर्व विकुर्वणा पश्चात् परिचारणा वक्तव्येति भावः, सुरगणानां सर्वेषामपि तपाखाभाब्यात्, उक्त च मूलटीकायाम्-“पुर्व विउच्चणा खलु पच्छा परियारणा सुरगणाणं । सेसाण पुषपरियारणा उ पच्छा विउबणया ॥१॥” इति ॥ सम्प्रति आहारविषयमाभोग चिचिन्तयिषुरिदमाह नेरइया गं भंते ! आहारे किं आभोगनिवचिते अणाभोगनि०१, गो! आभोगनिवत्तिएवि अणा, एवं असुरकुमाराणं जाव वेमाणियाणं, णवरं एगिदियाण नोआभोगनिवत्तिए अणाभोगनिवत्तिए । नेरइया णं भंते! जे पोग्गले आहारत्ताए गिण्डंति ते किं जाणंति पा० आहारेंति उदाहु न याति न पासं० आहारैति', गोन याणति न पासंति आहारैति, एवं जाव तेईदिया, चउरिदियाणं पुच्छा, गो०! अत्धेगतिया न याणति पासंति आहा. अत्यंगइया न याणंति न ||५४४॥ पासंति आहा०, पंचिंदियतिरिक्खजोणियाणं पुच्छा, गो! अत्थे० जा० पा० आहा०१ अत्थे० जान पा० आहा०. अत्थेन याणंति पासंति आहा०३ अत्थेन जान पा० आ०४, एवं जाव मणुस्साणवि, वाणमंतरजोइसिया जहा -18|| दीप अनुक्रम [५८४-५८६] weredturary.com ~195 Page #196 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (१५) प्रत सूत्रांक [३२१] दीप अनुक्रम [५८७] “प्रज्ञापना” – उपांगसूत्र - ४ ( मूलं + वृत्तिः ) - मूलं [ ३२१] पदं [३४], -------------- उद्देशकः [-], -------------- दारं [-], पूज्य आगमोद्धारकश्री संशोधितः मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र [१५],उपांगसूत्र-[४] "प्रज्ञापना" मूलं एवं मलयगिरि-प्रणीता वृत्तिः Education internation नेरइया, वैमाणियाणं पुच्छा, गो० ! अत्थे० जा० पा० आ०, अत्थे० न जा० न पा० आ०, से केणद्वेणं मंते ! एवं बु० वेमाणिया अत्थे ० जा ० पा० आ० अत्थे० न जा० न पा० आ०१, गो० ! बेमाणिया दुविहा पं० तं० - माईमिच्छदिट्ठिउपवनगा य अमायिसम्मद्दिट्टिउव, एवं जहा इंदियउद्देसए पढमे मणितं तहा भाणित जाव से एएणडे णं गो० ! एवं बुच्चति, नेरइया णं भंते केवतिया अज्झवसाणा पं० १, गो० ! असंखेजा अज्झवसाणा, ते णं भंते! किं यसत्था अपसस्था १, गो० 1 पसत्थावि अप० एवं जाव वैमाणियाणं । नेरइया पणं मंते । किं सम्मत्ताभिगमी मिच्छत्ताभिगमी सम्मामिच्छत्ताभिगमी १, गो० ! सम्मताभिगमीवि भिच्छताभिगमीवि सम्मामिच्छत्ताभिगमीवि, एवं जाव बेमाणियावि, नवरं एगिंदियविगलिंदिया णो सम्मत्ताभिगमी मिच्छत्ताभिगमी नो सम्मामिच्छत्ताभिगमी (सूत्रं ३२१ ) 'नेरइयाण' मित्यादि, आभोगनिर्वर्त्तितो यदा मनःप्रणिधानपूर्वमाहारं गृहन्ति, शेषकालमनाभोग निर्वर्त्तितः, स च लोमाहारोऽवसातव्यः, एवं शेषाणामपि जीवानामाभोगनिर्वर्त्तितोऽना भोगनिर्वर्त्तितश्चाहारो भावनीयः, नवरमेकेन्द्रियाणामतिस्तोकापटुमनोद्रव्य लब्धिसम्पन्नत्वात् पटुतर आभोगो नोपजायते इति तेषां सर्वदाऽनाभोगनिर्वर्त्तित एवाहारो न पुनः कदाचिदप्याभोग निर्वर्त्तितः । अधुना आहार्यमाणपुद्गलविषये ज्ञानदर्शने चिन्तयति - 'नेरइया णं भंते' इत्यादि, नैरयिका णमिति वाक्यालङ्कारे भदन्त ! यान् पुद्गलान् आहारतया गृह्णन्ति तान् किं जानन्ति पश्यन्ति उत नेति ?, भगवानाह — गौतम ! न जानन्त्यवधिज्ञानेन, लोमाहारतया तेषामतिसूक्ष्मत्वेन नारका ------ For Parts Only ~ 196~ Page #197 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (१५) “प्रज्ञापना” – उपांगसूत्र-४ (मूलं+वृत्ति:) पदं [३४], -------------- उद्देशक: -,------------- दारं --------------- मूलं [३२१] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र-[१५]उपांगसूत्र-[४] "प्रज्ञापना" मूलं एवं मलयगिरि-प्रणीता वृत्ति: प्रत सूत्रांक [३२१] प्रज्ञापनाया: मल वृत्ती. ॥५४५॥ दीप अनुक्रम [५८७] सावधेरविषयत्वात् , न च पश्यन्ति चक्षुरिन्द्रियविषयाभावात् , द्वीन्द्रिया न जानन्ति, मिथ्याज्ञानतया तेषां सम्यक् । ३४ परिपरिज्ञानाभावात् , द्वीन्द्रियाणां हि मत्यज्ञानं तदपि चास्पष्टमतः प्रक्षेपाहारमपि न ते खयं गृह्यमाणमपि सम्यक् जा- चारणापदं नन्ति चक्षुरिन्द्रियाभावात् न च पश्यन्ति, एवं त्रीन्द्रिया अपि ज्ञानदर्शनविकला भावनीयाः, चतुरिन्द्रियाः 'अत्थेगह सू. ३२१ यत्ति सन्त्येकके ये खयं गृह्यमाणमप्याहारं प्रक्षेपरूपमपि न जानन्ति, मिथ्याज्ञानित्वात् , तेषामपि हि द्वीन्द्रियाणा-18 मिव मत्यज्ञानं तदपि चाविस्पष्टमिति, चक्षुषा पुनः पश्यन्ति चक्षुरिन्द्रियसद्भावात् , तथाहि-पश्यन्ति मक्षिकादयो । गुडादिकमिति एवमाहारयन्ति, तथा सन्त्येकके चतुरिन्द्रिया ये न जानन्ति, मिथ्याज्ञानित्वात्, न पश्यन्ति च अन्ध-8 कारादिना चक्षुर्दर्शनस्स ब्याहतत्वात् अनाभोगसम्भवाद्वा, तिर्यपञ्चेन्द्रियतिरश्चां चतुर्भङ्गी प्रक्षेपाहारं लोमाहारं |चाधिकृत्य भावनीया, तत्र प्रक्षेपाहारमधिकृत्यैवं भावना-सन्त्येकके तिर्यपञ्चेन्द्रिया ये प्रक्षेपमाहारं जानन्ति, सम्यग्ज्ञानितया तेषां यथावस्थितपरिज्ञानात् , पश्यन्ति चक्षुरिन्द्रियभावात् एवमाहारयन्ति १, तथा सन्त्येकके ये जानन्ति पूर्ववत् न च पश्यन्ति चक्षदर्शनस्यान्धकारादिना अनाभोगेन च व्याहतत्वात् २, तथा सन्त्येकके ये न जानन्ति मिथ्याज्ञानितया सम्यकपरिज्ञानाभावात् पश्यन्ति पुनश्चक्षुरिन्द्रियोपयोगात् ३ तथा सन्त्येकके ये न जान ५४५|| न्ति मिथ्याज्ञानित्वान्न च पश्यन्ति पूर्ववत् एवमाहारयन्ति ४ लोमाहारापेक्षया त्वेवं भावना-सन्त्येकके तियेपश्चन्द्रिया ये लोमाहारमपि जानन्ति, विशिष्टावधिज्ञानपरिकलितत्वात्, पश्यन्ति तथाविधक्षयोपशमभावत इन्द्रियपा-181 ~197 Page #198 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (१५) प्रत सूत्रांक [३२१] दीप अनुक्रम [५८७] “प्रज्ञापना” – उपांगसूत्र - ४ ( मूलं + वृत्तिः ) मूलं [ ३२१] पदं [३४], [--------------उद्देशक: [-1, -------------- दारं [-], पूज्य आगमोद्धारकश्री संशोधितः मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित.. आगमसूत्र -[१५]उपांगसूत्र-[४] "प्रज्ञापना" मूलं एवं मलयगिरि-प्रणीता वृत्तिः टवस्यातिविशुद्धत्वात् एवमाहारयन्ति १ तथा सन्त्येकके ये न जानन्ति पूर्ववत् न तु पश्यन्ति तथाविधस्येन्द्रियपाटवस्याभावात् २ तथा सन्त्येकके ये न जानन्ति पश्यन्ति पुनस्तद्विषयेन्द्रियपाटवस्य भावात् ३ तथा सन्त्येक के ये न जानन्ति मिथ्याज्ञानित्वात् अबधिविकलत्वात् अवधिविषयातीतत्वाद्वा न च पश्यन्ति तथारूपपाटवाभावात् ४ इति, एवं मनुष्याणामपि लोमाहारप्रक्षेपाहारी प्रतीस चतुर्भङ्गी भावनीया, 'वाणमंतरजोइसिया जहा नेरइया' इति, नैरयिकावधिरिव व्यन्तरज्योतिष्कावधिरपि मनोभक्षित्वेऽप्याहारपुद्गलानामविषयत्वात्, 'वैमाणियाणं पुच्छ'|त्ति, वैमानिकानां पृथक् सूत्रं वक्तव्यं, 'वैमाणिया णं भंते!' जे पोरगले आहारत्ताए गेण्डंति ते किं जाणंति पासंति आहारेंति उदाहु न जाणंति न पासंति आहारैति' इति, भगवानाह - 'गोयमे' त्यादि, माया पूर्वभवकृता विद्यते। येषां ते मायिनो, मायया हि यया तथा वा बादररूपकृतया कलुषकर्मप्रादुर्भावः, कलुषे च कर्मण्युदयमागते भवप्रत्ययादप्युपजायमानोऽवधिर्नातिसमीचीनो भवति, एते च सम्यग्दशो न वेदितव्याः, तथा मिथ्या — विपर्यस्ता दृष्टिःजिनप्रणीतवस्तुतच्चप्रतिपत्तिर्येषां ते मिध्यादृष्टयः, मायिनश्च मिथ्यारटयश्च मायिमिध्यादृष्टयस्ते च ते उपपन्नाश्च मायिमिथ्यादृष्टयुपपन्नास्त एव स्वार्थिककप्रत्ययविधानात् मायिमिध्यादृष्टयुपपन्नकास्ते चोपरितनोपरितनयैवेयकपर्यवसाना विज्ञेयाः, तेषां यथायोगमवश्यं मिध्यादृष्टित्वस्य मायित्वस्य च भावात्, तद्विपरीता अमायिसम्यग्टष्टयुपपनकाः, ते चानुत्तरविमानवासिनः, तेपामवश्यं सम्यग्दृष्टित्वं, पूर्वानन्तरभवे नितरां प्रतनुक्रोधमानमायालो भत्वस्योप Educatan Internation For PenalPa Lise Only ------ ~ 198~ www.landbrary or Page #199 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (१५) प्रत सूत्रांक [३२१] दीप अनुक्रम [५८७] “प्रज्ञापना” – उपांगसूत्र - ४ ( मूलं + वृत्तिः ) मूलं [ ३२१] पदं [३४], [--------------उद्देशक: [-1, -------------- दारं [-], पूज्य आगमोद्धारकश्री संशोधितः मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र [१५],उपांगसूत्र-[४] "प्रज्ञापना" मूलं एवं मलयगिरि-प्रणीता वृत्तिः प्रज्ञापना याः मल य० वृसौ. ॥५४६ ।। ३४ परिचारणापदं शान्तकषायत्वस्य च भावात्, आह च मूलटीकाकार:- "वेमाणिया मायिमिच्छद्दिकी उववण्णगा जाव उवरिमगेवेज्जा, अमाथिसम्म हिडिववन्नगा अनुत्तरसुरा एव गृह्यन्ते" इति 'एवं जहे त्यादि, एवमुक्तेन प्रकारेण प्राक् यथा इन्द्रियसत्के प्रथमोद्देशके भणितं तथा भणितव्यं, तच्च तावत् यावत् सर्वान्तिमं 'से एएणट्टेण' मित्यादिना निगमनवाक्यं, 8 सू. ३२१ तचैवम्- 'तत्थ णं जे ते मायिमिच्छदिद्विवचन्नगा ते णं न जाणंति न पासंति आहारेंति, तत्थ णं जे ते अमायिसम्मदिट्टिउबवण्णमा ते णं दुबिहा पण्णत्ता, तंजहा- अनंतरोववण्णगा य परंपरोववण्णगा य, तत्थ णं जे ते अनंत| रोववण्णगा ते णं ण याणंति न पासंति आहारैति, तत्थ णं जे ते परंपरोववण्णगा ते णं दुबिहा पं० तं०-पजत्तगाय अपज्जत्तगा य, तत्थ णं जे ते अपजत्तगा ते णं न जाणंति न पासंति आहारेंति, तत्थ णं जे ते पजत्तगा ते | दुबिहा पं० तं० – उवउत्ता य अणुवउत्ता य, तत्थ णं जे ते अणुवउत्ता ते णं ण याणंति न पासंति आहारेंति, तत्थ पणं जे ते उचउत्ता ते णं जाणंति पासंति आहारैति, से एएणणं गोयमा । एवं युच्चति-अत्थेगइया न जाणंति न पासंति आहारेंति अत्थेगइया जाणंति पासंति आहारेति ?" इति, अस्थायमर्थः- तत्र ये ते मायिमिध्यादृष्टयुपपन्नका उपरितनोपरितनचैवेयकपर्यवसाना इत्यर्थः ते मनोभक्ष्याहारयोग्यान् पुद्गलान् न जानन्ति अवधिज्ञानेन, तदवधेस्तेषामविषयत्वात्, न पश्यन्ति चक्षुषा, तथाविधपाटवाभावात्, येऽप्यमाविसम्यग्दृष्टयुपपन्नका अनुत्तरविमानवासिन इत्यर्थः, ते द्विधा - अनन्तरोपपन्नका परम्परोपपन्नकाश्च, प्रथमसमयोत्पन्ना अप्रथमसमयोत्पन्नाश्चेत्यर्थः अत्र ये ते Eucation International For Penal Use Only ------ ~199~ ॥५४६॥ Page #200 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (१५) “प्रज्ञापना” – उपांगसूत्र-४ (मूलं+वृत्ति:) पदं [३४], -------------- उद्देशक: -,------------- दारं --------------- मूलं [३२१] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र-[१५]उपांगसूत्र-[४] "प्रज्ञापना" मूलं एवं मलयगिरि-प्रणीता वृत्ति: प्रत सूत्रांक [३२१] अनन्तरोपपन्नकाते न जानन्ति न पश्यन्ति, प्रथमसमयोत्पन्नतयाऽवधिज्ञानोपयोगस्य चक्षुरिन्द्रियस्य चाभावात्, N|किन्त्येवमेषाहारयन्ति, तत्र ये ते परम्परोपपन्नकास्ते द्विविधाः, तद्यथा-पर्यासा अपर्याप्ताश्च, तत्र ये ते अपर्याप्तIS कास्ते न जानन्ति न च पश्यन्ति, पर्याप्तीनामसम्पूर्णत्वेनावध्याधुपयोगाभावात् , येऽपि पर्याप्तास्तेऽपि द्विविधाः, तद्यथा-उपयुक्ता अनुपयुक्ताश्च, तत्र ये ते उपयुक्तास्ते जानन्ति, अवधानवशतो यथाशक्ति नियमेन ज्ञानस्य स्खविषयपरिच्छेदाय प्रवृत्तिसम्भवात् , पश्यन्ति चक्षुषा इन्द्रियपाटवस्य तेषामतिविशिष्टत्वात् , ये त्वनुपयुक्तास्ते न जा-18 नन्ति न च पश्यन्ति अनुपयुक्तत्वादेव, उपयुक्ता अपि कथं मनोभक्ष्याहारयोग्यान् पुद्गलान् जानते इति चेत्, उच्यते, इहावश्यकप्रथमपीठिकायामवधिज्ञानाधिकारेऽभिहितम्-"संखेज कम्मदवे लोए थोऊणय पलियं" अस्थायमर्थःकार्मणशरीरद्रव्याणि पश्यन् क्षेत्रतो लोकस्य सङ्ख्येयान् भागान् पश्यति कालतः स्तोकोनं पल्योपमं यावत् , अनुत्तरास्तु सम्पूर्णी लोकनाडी पश्यन्ति, 'संभिन्न लोगनालिं पासंति अनुत्तरा देवा' इति वचनात् , ततस्ते मनोभक्ष्याहारयोग्यानपि पुद्गलान् जानन्ति, आह च मूलटीकाकार:-'ते जानन्ति पश्यन्ति आहारयन्ति च, विशुद्धत्वादवधेरिन्द्रियविषयस्य चातिविशुद्धत्वात् पश्यन्त्यपि" इति, अत्र इन्द्रियविषयस्येति-इन्द्रियपाटवस्खेतिभावः, उपसंहारवाक्यं प्रतीतं । अध्यवसायचिन्तायां प्रत्येकं नैरयिकादीनामसङ्ख्ययान्यध्यवसानानि प्रतिसमयं प्रायोऽन्यान्याध्यवसानभायात् । सम्यक्त्वायधिगमचिन्तां कुर्वन्नाह-'नेरइया ण'मित्यादि, नैरयिकाः णमिति पूर्ववत् भदन्त ! किं सम्यक्त्वा 20999999303 दीप अनुक्रम [५८७] SAREautatunintentiational ~200~ Page #201 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (१५) “प्रज्ञापना" - उपांगसूत्र-४ (मूलं+वृत्ति:) पदं [३४], -------------- उद्देशक: -,------------- दारं , -------------- मूलं [३२१-३२७] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र-[१५]उपांगसूत्र-[४] "प्रज्ञापना" मूलं एवं मलयगिरि-प्रणीता वृत्ति: प्रत सूत्रांक [३२१-३२७]] प्रज्ञापनायाः मलय. वृत्ती . 1५४७॥ दीप अनुक्रम धिगामिनः-सम्यक्त्वप्राप्तिवन्तः, एवं मिथ्यात्वाधिगामिनः सम्यग्मिथ्यात्वाधिगामिनश्च ?, भगवानाह-गौतम ३४ परि'सम्मेत्यादि सुगम, त्रिविधाया अपि प्राप्तेर्यथायोगं सम्भवात् , 'एवं जावे'त्यादि, एवं-नैरयिकगतेनाभिलापप्रकारेण चारणानिरन्तरं तावद्वक्तव्यं यावद्वैमानिकाः, नवरमेकेन्द्रियाणां विकलेन्द्रियाणां केषांचित् सासादनसम्यक्त्वमपि लभ्यतेपदं सू. तथापि ते मिथ्यात्वाभिमुखा इति सदपि तन्न विवक्षितं । सम्प्रति परिचारणां प्रतिपिपादयिपुरिदमाह IN३२२-३२३ देवा णं भंते ! किं सदेवीया सपरियारा सदेवीया अपरियारा अदेवीया सपरियारा अदेवीया अपरियारा, गो! अत्थेगतिया देवा सदेवीया सपरियारा अत्थेगतिया देवा अदेवीया सपरियारा अत्थे० देवा अदेविया अपरिचारा नो चेय गं देवा सदेवीया अपरिचारा, से केणद्वेणं भंते ! एवं वुचति-अत्थे० देवा सदेवीया सपरिचारा तं चेव जाव नो चेव णं देवा सदेवीया अप०१, गोभवणपतिवाणमंतरजोतिससोहम्मीसाणेसु कप्पेसु देवा संदेवीया सपरियारा, सर्णकुमारमाहिंदभलोपलंतगमहासुक्कसहस्सारआणयपाणयआरणचुएसु कप्पेसु देवा अदेवीया सपरिचारा गेवेजअणुसरोववाइया देवा अदेवीया अपरियारगा, नो चेवणं देवा सदेवीया अपरिचारा, से तेणद्वेणं गो! एवं बु० अत्थे० देवा सदेवीया सपरिचारा तं चेव नो चेव णं देवा सदेषीया अपरियारा (सूत्र ३२२) कतिविहा णं भंते ! परियारणा पं०१, गो०! पंचविहा परियारणा पं०,०-कायपरियारणा फासपरियारणा रूवप० सहपरि०मणप०, से केणढणं भंते ! एवं चु० | ॥५४७॥ पंचविहा परि०५०, त०-कायप० जाव मणप०१, गो! भवणवइवाणमंतरजोइससोहम्मीसाणेसु कप्पेसु देवा कायपरि० [५८७ -५९३] ~ 201~ Page #202 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (१५) “प्रज्ञापना" - उपांगसूत्र-४ (मूलं+वृत्ति:) पदं [३४], -------------- उद्देशक: -,------------- दारं -1, -------------- मूलं [३२१-३२७] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र-[१५]उपांगसूत्र-[४] "प्रज्ञापना" मूलं एवं मलयगिरि-प्रणीता वृत्ति: प्रत सूत्रांक [३२१-३२७] सर्णकुमारमाहिदेसु कप्पेसु देवा फासपरि० भलोपलंतगेसु देवा रूबपरिया० महामुक्कसहस्सारसु देवा सद्दप० आणयपाणयआरण एमु कप्पेसु देवा मणप०, गेवेजअणुत्तरोववाइया देवा अपरियारगा, से तेणद्वेणं मो० चेव आव मणपरियारगा, तत्थ णं जे ते कायपरियारगा देवा तेसिणं इच्छामणे समुप्पजति-इच्छामो णं अच्छरांहिं सद्धिं कायपरियारं करेचए, तए णं तेहिं देवेहिं एवं मणसीकए समाणे खिप्पामेव ताओ अच्छराओ ओरालातिं सिंगाराई मणुण्णाई मणोहराई मणोरमाई उत्तरखेउवियरूवाई विउति विउवित्ता तेसिं देवाणं अंतियं पाउम्भवंति, सते णं ते देवा ताहि अच्छराहिं सद्धिं कायपरियारणं करेंति (सूत्रं ३२३) से जहाणामए सीया पोग्गला सीतं पप्प सीयं चेव अतिवतिताणं चिट्ठति, उसिणा वा पोग्गला उसिणं पप्प उसिणं चेव अतिवतिचाणं चिद्वंति, एवमेव तेहिं देवेहिं ताहि अच्छराहिं सद्धिं कायपरियारण कते समाणे से इच्छामणे खिप्पामेव अवेति (सूत्रं ३२४) अस्थिभंते ! तेसिं देवाणं सुकपोग्गला', हता! अस्थि, ते गं भंते ! तासिं अच्छराण कीसचाते शुओ २ परिणमंति', गो! सोतिंदियत्ताते चक्खुइंदि०पाणिदिय० रसिदिय० फासिदियचाते इहत्ताते कंतताते मणुमचाते मणामचाते सुभगत्ताते सोहग्गरूवजोवणगुणलावनचाए ते तासिं भुजो २ परिणमंति (सूत्र ३२५) तत्थ ण जे ते फासपरियारगा देवा तेसि गं इच्छामणे समुप्पज्जति, एवं जहेब कायपरियारगा तहेव निरवसेसं भाणितई। तत्थ पंजे ते रुवपरियारगा देवा तेसिणं इच्छामणे समुप्पअति इच्छामो णं अच्छराहिं सद्धिं रूवपरियारणं करेत्तते, ते ण तेहिं देवेहिं एवं मणसीकते समाणे तहेब जाव उत्तरखेउवितात लवाई विउति विउविचा जेणामेव ते देवा तेणामेव उवागच्छति उवागच्छिचा तेसिं देवाणं अदरसामते ठिचा वाई उरालाई जाव मणोरमाई उत्तर रcिestsecticesectice दीप अनुक्रम [५८७ -५९३] ~202~ Page #203 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (१५) “प्रज्ञापना" - उपांगसूत्र-४ (मूलं+वृत्ति:) पदं [३४], -------------- उद्देशक: -,------------- दारं -1, -------------- मूलं [३२१-३२७] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र-[१५]उपांगसूत्र-[४] "प्रज्ञापना" मूलं एवं मलयगिरि-प्रणीता वृत्ति: प्रत सूत्रांक [३२१-३२७] प्रज्ञापनाया:'मलयवृत्ती. 203030 ५४८॥ दीप अनुक्रम CSCIOCOCCelcerseeratee वेठबिताई रूवाई उवदंसेमाणीतो २ चिट्ठति, तते णं ते देवा ताहिं अच्छराहिं सद्धिं रूवपरियारणं करेंति, सेस तं व ३४ प्रवीजाव भुजो २ परिणमन्ति । तत्थ ण जे ते सहपरियारगा देवा तेसि णं इच्छामणे समुप्पअति-इच्छामो णं अच्छराहिं सद्धिं चारपदंसू. सदपरियारणं करेत्तए, तते णं तेहिं देवेहिं एवं मणसीकए समाणे तहेव जाव उत्तरवेउबियाति रूवाति विउति विउवित्ता ३२३-३२७ जेणामेव ते देवा तेणामेव उवागच्छंति २ नातेसिं देवाणं असामंते ठिचा अणुत्तराई उच्चावयाई सदाई समुदीरेमाणीतो २ चिट्ठति, तते गं ते देवा ताहिं अच्छराहिं सद्धिं सद्दपरियारणं करेंति सेसं तं चेव जाव भुजो २ परिणमंति। तत्थ ण जे ते मणपरियारगा देवा तेसिं इच्छामणे समुप्पअति, इच्छामो णं अच्छराहिं सद्धि मणपरियारणं करेत्तते, तते गं तेहिं देवेहि एवं मणसीकए समाणे खिप्पामेव ताओ अच्छराओ तत्थ गयाओ चैव समाणीओ अणुत्तरातिं उच्चावयाति मणाई संपहारेमाणीतो २ चिति. तते णं ते देवा ताहि अग्छराहिं सद्धि मणपरियारणं करेंति, सेसं निरवसेसं तं चेक जाच भुजो २ प०(सूत्रं ३२६) एतेसि गं मंते ! देवाणं कायपरियारगाणं जाव मणपरियारगाणं अपरियारगाण य कयरे० अप्पा वा ४१, गो! सबत्योवा देवा अपरियारगा मणपरियारगा संखे० सद्दपरियारगा असंखे० रूवप० असं० फासप० असं० कायप० असं० ॥ (सूत्र ३२७) पण्णवणाए परियारणापर्य समत्तं ॥ ३४ ॥ ॥५४८॥ 'देवाणमित्यादि, सुगम, नवरं भवनपतिव्यन्तरज्योतिष्कसौधर्मेशानकल्पेषु देवा सदेवीकाः, देवीनां तत्रोत्पादात्,18 अत एव सपरिचाराः-परिचारणासहिताः, देवीनां तत्परिग्रहे यथायोगं भावतः कायप्रवीचारभावात् , सनत्कुमारमाहे [५८७ -५९३] Soo SARERatininemarana ~203~ Page #204 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (१५) “प्रज्ञापना" - उपांगसूत्र-४ (मूलं+वृत्ति:) पदं [३४], -------------- उद्देशक: -,------------- दारं -1, -------------- मूलं [३२१-३२७] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र-[१५]उपांगसूत्र-[४] "प्रज्ञापना" मूलं एवं मलयगिरि-प्रणीता वृत्ति: प्रत सूत्रांक [३२१-३२७] न्द्रियोमलोकलान्तकयोमहाशुक्रसहस्रारयोरानतादिचतुषु कल्पेषु देवा अदेवीकाः, तत्र देवीनामुत्पादाभावात् , अथ च सपरिचाराः-परिचारणासहिताः, सौधर्मेशानगतदेवीभिः सह यथाक्रमं स्पर्शरूपशब्दमनःप्रवीचारभावात् , अवेयकानुतरोपपातिनो देवा अदेवीकाः, देवीनां तत्रोत्पादाभावात् अपरिचारा:-अप्रवीचाराः, अत्यन्तमन्दपुरुषवेदोदयतया मनसापि प्रवीचारासम्भवात्, न पुनस्खे देवाः सदेवीका अपरीचाराः, तथाभवखाभाव्यात् , 'से एएण'मित्यादि निगमनवाक्यं । देवाः सदेवीकाः सपरिचारा इत्युक्तं, तत्र परिचारणामेव जिज्ञासुः पृच्छति-'कइविहाण'मित्यादि, सुगम, भगवानाह-'गौतमें'त्यादि गतार्थ, नवरं कायपरिचारगा' इति कायेन-शरीरेण मनुष्यत्रीपुंसानामिव परिचारो-मैथुनोपसेवनं 13 येषां ते कायपरिचारकाः, किमुक्तं भवति ?-भवनपत्यादय ईशानदेवलोकदेवपर्यन्ताः सक्लिष्टोदयपुरुषवेदकर्मप्रभावतो मनुष्यवत् मैथुनसुखप्रलीयमानाः सर्वाङ्गीणं कायक्लेशजं संस्पर्शसुखमवाप्य प्रीतिमासादयन्ति नान्यथेति, सनत्कुमार-11 माहेन्द्रयोः कल्पयोर्देवाः स्पर्शपरिचारकाः, स्पर्शन-स्तनभुजोरुजघनादिगाप्रसंस्पर्शेन परिचार-प्रयीचारो येषां ते तथा, ते हि यदा प्रवीचारमभिलषन्ति तदा प्रवीचाराभिलाषुकतया प्रत्यासन्नभूतानां देवीनां स्तनाद्यवयवान् संस्पृ-16 शन्ति, तावन्मात्रेणैव तेषां कायप्रवीचारादनन्तगुणं सुखं वेदोपशान्तिश्योपजायते, ब्रह्मलोकलान्तकयोः कल्पयोर्देवा| 'रूपपरिचारका' रूपेण-रूपमात्रदर्शनेन परिचारो-मैथुनोपसेवनं येषां ते तथा, ते हि सुरसुन्दरीणां मनोभवराजास्थानीयं दिव्यमुन्मादजनक रूपमुपलभ्य कायप्रवीचारादनन्तगुणं सुरतसुखमासादयन्ति, तावन्मात्रेणैवोपशान्तवेदा दीप अनुक्रम Sekseeseरान [५८७ -५९३] ~204~ Page #205 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (१५) “प्रज्ञापना" - उपांगसूत्र-४ (मूलं+वृत्ति:) पदं [३४], -------------- उद्देशक: -,------------- दारं -1, -------------- मूलं [३२१-३२७] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र-[१५]उपांगसूत्र-[४] "प्रज्ञापना" मूलं एवं मलयगिरि-प्रणीता वृत्ति: प्रत सूत्रांक estorseen [३२१ -३२७] दीप अनुक्रम प्रज्ञापना- उपजायन्ते, महाशुक्रसहस्रारेषु कल्पेषु देवाः 'शब्दपरिचारका' शब्देन-शब्दभात्रश्रवणेन परिचारो येषां से तथा, ते ४३४ प्रचीया: मल हि इच्छाविषयीकृतदेवीसत्कगीतहसितसविकारभाषितनूपुरादिध्यनिश्रवणमात्रत एव कायप्रवीचारादनन्तगुणसुखं चारपदं स्. यवृत्ती. Nउपमुअते तावन्मात्रेणैव तेषां वेद उपशान्तिमेति, आनतप्राणतारणाच्युतेषु कल्पेषु देवा 'मनःपरिचारकाः' मनसा- ३२३-३२७ ॥५४॥ मनोभवविकारोपहितपरस्परोच्चावचमनःसङ्कल्पेन परिचारो मैथुनोपसेवनं येषां ते तथा, ते हि परस्परोचावचमनः Sसङ्कल्पमात्रेणेव कायप्रवीचारादनन्तगुणं सुखमवामुषन्ति, तृसाश्च तावन्मात्रेणैवोपजायन्ते, अवेयकानुत्तरोपपातदेवा 'अपरिचारका' न विद्यते परिचारो-मैथुनोपसेवनं मनसाऽपि येषां ते तथा, तेषां प्रतनुमोहोदयतया प्रशमसुखांतीनत्वात् , यद्येचं कथं न ते जमचारिणः, उच्यते, चारित्रपरिणामाभावात् , 'से तेणटेण मित्यादि निगमनवाक्यं, तत्र ये कायपरिचारका देवास्तेषां कायप्रविचारं विभावविपरिदमाह-'तत्थ 'मित्यादि. तत्र-तेषु कायपरिचारकादिषु देवेषु मध्ये ये ते पूर्वमुक्ताः कायपरिचारका भवनपतिव्यन्तरज्योतिष्कसौधर्मशानदेवास्तेषां णमिति पूर्वबत् इच्छामनः-कायपरिचारेच्छाप्रधानं मनः समुत्पद्यते, केनोलेखेन समुत्पद्यते -इच्छामः-अभिलपामः णमिति पूर्ववत् अप्सरोमिः साढे कायपरिचारं कर्तुमिति, 'तए ण'मित्यादि, ततस्तैर्देवैरेवमुक्तेन प्रकारेण कायपरिचारे मनसि ॥४९॥ कृते सति क्षिप्रमेव-शीघ्रमेव ता अप्सरसः खखोपभोग्यदेवाभिप्रायमवेत्य परिचाराभिलाषुकतया उच्चरवैक्रियाणि | रूपाणि विकुर्वन्तीति सम्बन्धः, कथंभूतानीसत आह-उदाराणि-स्फाराणि तु हीनावयवानि तानि अपि [५८७ -५९३] ~205~ Page #206 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (१५) “प्रज्ञापना" - उपांगसूत्र-४ (मूलं+वृत्ति:) पदं [३४], -------------- उद्देशक: -,------------- दारं -1, -------------- मूलं [३२१-३२७] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र-[१५]उपांगसूत्र-[४] "प्रज्ञापना" मूलं एवं मलयगिरि-प्रणीता वृत्ति: प्रत सूत्रांक [३२१-३२७] दीप अनुक्रम 'शृङ्गाराणि शारो-विभूषणादिभिर्मण्डनं स विद्यते येषां तानि शृङ्गाराणि, 'अभ्रादिभ्य' इस्खादि अप्रत्ययः, विभूषणादिकृतोदारशहाराणीत्यर्थः, तानि च कदाचित् कस्यचिदमनोज्ञानि भवेयुः अत आह–'मनोज्ञानि' स्वखोपभोग्यदेवमनोविषयभावपेशलानि, तानि लेशतोऽपि सम्भाव्यन्ते तत आह-'मनोहराणि खखोपभोग्यस्य देवस्य मनो | हरन्ति-आत्मवशं नयन्तीति मनोहराणि, लिहादित्वादच्', तच मनोहरत्वं प्रथमसमापातमात्रभाष्यपि भवति तत आह-'मनोरमाणि' मनः खखोपभोग्यदेवसम्बन्धि रमयन्ति-क्रीडयन्ति प्रतिक्षणमुत्तरोत्तरानुरागसम्पृक्तं जनयम्तीति मनोरमाणि, तानि इत्थंभूतानि उत्तरवैक्रियाणि रूपाणि विकुर्वित्वा तेषां देवानामन्तिक-समीपं प्रादुर्भवन्ति, 'तते ण'मित्यादि, ततः णमिति पूर्ववत् , ते देवास्ताभिरप्सरोभिः सार्द्ध कायपरिचारण-मनुष्य इव मनुष्यस्त्रीभिः सर्वाङ्गीणकायक्लेशपूर्वकं मैथुनोपसेवनं कुर्वन्ति, एवमेव तेषां वेदोपशान्तिभावात् । तथा चामुमेवार्थ दृष्टान्तेन द्रढयति-से जहाणामए' इत्यादि से' इति अथशब्दार्थः, स चात्र वाक्योपन्यासे, यथा नाम 'ते' विवक्षिताः शीताः पुद्गलाः शीतं-शीतयोनिक प्राणिनं प्राप्य 'शीतमेव' शीतत्वमेवातित्रज्य-अतिशयेन गत्वा तिष्ठन्ति, किमुक्तं भवति ?-विशेषतः शीतीभूतस शीतयोनिकस्य प्राणिनः सुखित्वायोपकल्पन्ते, उष्णा वा पुद्गला उष्णयोनिकं प्रापाणिनं प्राप्य 'उष्णमेय' उष्णत्वमेवातित्रज्य-अतिशयेन गत्वा तिष्ठन्ति, विशेषतः स्वरूपलामसम्पत्या तस्य सुखि-18 वायोपतिष्ठन्ते इति भावः, 'एवमेव' अनेनैव प्रकारेण तैर्देवस्ताभिरप्सरोभिः साई यथोक्तरूपे कायपरिचारणे कृते । [५८७ -५९३] ~206~ Page #207 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (१५) प्रत सूत्रांक [ ३२१ -३२७] दीप अनुक्रम [५८७ -५९३] “प्रज्ञापना” – उपांगसूत्र - ४ ( मूलं + वृत्ति:) - मूलं [३२१-३२७] पदं [३४], ------ उद्देशकः [-], - दारं [-], पूज्य आगमोद्धारकश्री संशोधितः मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित.. आगमसूत्र - [१५],उपांगसूत्र-[४] "प्रज्ञापना" मूलं एवं मलयगिरि-प्रणीता वृत्तिः प्रज्ञापनाया मल य० वृत्ती. ॥५५०॥ सति इच्छामनः कामविषयेच्छाप्रधानं मनः क्षिप्रमेवातितृप्तिभावात् शीतीभवति, इयमत्र भावना-यथा शीतपुद्गलाः शीतयोनिकस्य प्राणिनः संस्पर्शे शीतत्वं विशेषतः आसादयन्तस्तस्य सुखित्वायोपकल्पन्ते उष्णपुद्गला वा उष्णयोनिकस्य प्राणिनः संस्पर्शे उष्णत्वमतिप्रभूतमासादयन्तः सुखाय घटन्ते तथा देवीशरीरपुद्गला देवशरीरमवाप्य देवशरीरपुद्गला अपि देवीशरीरमवाप्य परस्परं तद्गुणतां भजमानाः परस्परं सुखित्वायोपकल्पन्ते ततस्तृतिरुपजायते तृप्तिभावाचाभिलाषनिवृत्तिर्भवतीति । इह मनुष्य स्त्रीणां मनुष्यपुरुषोपभोगे शुक्रपुद्गलसङ्क्रमतः सुखमुपजायमानं लब्धं तत्किं देवीनामप्युपभोग्य देवसत्क शुक्रपुद्गलसङ्क्रमतः सुखमुपजायते आहोश्चिदन्यथेति संशयानो देवानां शुक्रपुद्गलास्तित्वं पृच्छति - 'अस्थि ण' मित्यादि, अस्तीतिनिपातोऽत्र बद्धर्थे, णमिति पूर्ववत् भदन्त । तेषां देवानां शुक्रपुदूलाः यत्सम्पर्कतो देवीनां सुखमुपजायते १, 'हंता ! अस्थि' भगवानाह - गौतम सन्ति, केवलं ते वैक्रियशरीरान्तर्गता इति न गर्भाधानहेतवः, 'ते णं भंते ।' इत्यादि, ते शुक्रपुद्गलाः, णमिति पूर्ववत् भदन्त । तासामप्सरसां कीदृक्खरूपतया 'भूयो २' यदा २ क्षरन्ति तदा २ इत्यर्थः परिणमन्ति १, भगवानाह - 'गोयमे' त्यादि, श्रोत्रेन्द्रि यरूपतया यावत्स्पर्शनेन्द्रियतया, तेऽपि कदाचिदनिष्टतया परिणमन्तः सम्भाव्येरन् तत आह-इष्टतया इष्टमपि किचित्खरूपतोऽकान्तं भवति, यथा शूकरादीनामिष्टमपि विष्ठादि, तत आह- 'कान्ततथा' कमनीयतया, कान्तमपि किञ्चिन्मनः स्पृहणीयं न भवति तत आह— 'मनोज्ञतया' अतिस्पृहणीयतया, तदप्यतिस्पृहणीयत्वं कदाचिदा For Parks Use One ------ ~207~ ३४ प्रवी चारपदं स्. ३२३-३२७ 1144011 war Page #208 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (१५) “प्रज्ञापना" - उपांगसूत्र-४ (मूलं+वृत्ति:) पदं [३४], -------------- उद्देशक: [-],-------------दारं --------------- मूलं [३२१-३२७] प्रत सूत्रांक [३२१-३२७] ब्लटवाररब्रहर पातकालमात्रभावि सम्भाव्यते तत आह-'मनापतया' मन आमुवन्ति-मनसि सदा रमन्ते इति मनापास्तद्रावस्तत्ता तया, मनसा सदा स्पृहणीयतयेति भावः, करमादिति चेत्, अत आह-सुभगतया' 'निमित्तकारणहेतुषु सर्वासां विभक्तीनां प्रायो दर्शन मिति न्यायात् अत्र हेतौ तृतीया, ततोऽयमर्थः-यतः सुभगतया-सर्वजनप्रियतया परिणमन्ति तत उच्यते इष्टतया कान्ततयेत्यादि, सुभगतया परिणमनमपि कथमिति चेत्, अत आह-'सोहग्गरूवजोषणगुणलावन्नत्ताए' इति, अत्र प्राकृततया गुणशब्दस्य लावण्यशब्दात् पूर्व निपातः परमार्थतस्तु परतो द्रष्टव्यः, ततोऽयमर्थः-सौभाग्याय-सौभाग्यहेतवे रूपयौवनलावण्यरूपा गुणा यस्य तत्सौभाग्यरूपयौवनलावण्यगुणं तद्भावसत्ता तया, तत्र रूप-सौन्दर्यवती आकृतियौवनं-परमस्तरुणिमा लावण्यं-अतिशायी मनोभवविकारदेतुः परिणतिविशेषः, यतः सौभाग्यहेतुरूपादिगुणनिबन्धनतया परिणमन्ति ततः सुभगतया परिणमंतीत्युच्यते, एवं ते शुक्रपुद्गलास्तासामप्सरसां भूयो भूयः परिणमन्ति । तदेवं कायपरिचार उक्तः, सम्प्रति स्पर्शपरिचारं विभावयिषुराह-तत्य ण'मित्यादि, तत्र-तेषु परिचारकादिषु मध्ये णमिति पूर्ववत् ये ते स्पर्शपरिचारका देवास्तेषां णमिति पूर्ववत् एवमि|च्छामनः-स्पर्शपरिचारविषयेच्छाप्रधानं मनः समुत्पद्यते, 'एवं जहे-'त्यादि, एवं-उक्तेन प्रकारेण यथैवानन्तरं प्राक् कायपरिचारका उक्ताः तथैव स्पर्शपरिचारकेष्वपि निरवशेष भणितव्यं, तचैवम्-'इच्छामो णं अच्छराहिं सद्धिं फासपरियारं करेत्तए, तए णं तेहिं देवेहिं एवं मणसीकए समाणे खिप्पामेव ताओ अच्छराओ उरालाई जाब विउवित्ता ceracticticesearcenseseen दीप अनुक्रम [५८७ -५९३] ~208~ Page #209 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (१५) “प्रज्ञापना" - उपांगसूत्र-४ (मूलं+वृत्ति:) पदं [३४], -------------- उद्देशक: -,------------- दारं -1, -------------- मूलं [३२१-३२७] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र-[१५]उपांगसूत्र-[४] "प्रज्ञापना" मूलं एवं मलयगिरि-प्रणीता वृत्ति: प्रत सूत्रांक प्रज्ञापना- या। मलय० वृत्ती. ॥५५१० [३२१ -३२७] दीप अनुक्रम तेसिं देवाणं अंतियं पाउष्भवति, तए णं ते देवा अच्छराहिं सद्धिं फासपरियारं करेंति" स्पर्शपरिचारण बदनचुम्बनस्त- ३४ प्रवीनमहनवाहुउपगृहनजघनोरुप्रभृतिगात्रसंस्पर्शरूपं, 'से जहानामए सीया पुग्गला सीयं पप्प सीयं चेव अतिवइचाणचारपदं सू. चिट्ठति उसिणा वा पोग्गला उसिणं पप्प उसिणं चेव अइवइत्ताणं चिट्ठति एवमेव तेहिं देवेहिं ताहिं अच्छराहिं ३२३-३२७ सद्धि फासपरियारणे कए समाणे इच्छामणे खिप्पामेव अवेइ,' अस्स सपातनिका व्याख्या प्राग्वत्, 'अविणं भंते । तेसिं देवाणं सुकपोग्गला , हता! अस्थि, ते पं भंते ! तासिं अच्छराणं कीसत्ताए भुजो २ परिणमंति', गोयमा सोतिदियत्ताए जाव फासिंदियत्ताए इतृत्ताए कंतत्ताए जाव भुजो २ परिणमंति' अस्यापि सपातनिका ब्याख्या प्राग्वत्, नवरमस्मिन् स्पर्शप्रवीचारे शुक्रपुद्गलसहमो दिन्यप्रमावादवसेयः,एवं रूपपरिचारादावपि भावनीयं, तदेवमुक्ताः स्पर्शपरिचारकाः, सम्प्रति रूपपरिचारणां विभावयिषुराह-'तत्थ णमित्यादि, सुगमं तावत् यावत् विकुर्वित्वा जेणामेव'त्ति यत्रय देवलोके विमाने प्रदेशे च ते देवाः सन्ति तत्रैव स्थाने ता अप्सरस उपागच्छन्ति, उपागम्य च तेषां देवानां 'अदूरसामंते' इति अदूरसमीपे स्थित्वा तानि पूर्व विकुर्चितानि उदाराणि यावदुत्तरवैक्रियाणि रूपाणि उपदर्शयन्त्यस्तिष्ठन्ति, ततस्ते देवास्ताभिरप्सरोभिः सार्द्ध रूपपरिचारा-परस्परं सबिलासघष्टिविक्षेपाङ्गप्रत्यङ्गनिरीक्षण- ५शा निजनिजानुरागप्रदर्शनपटिष्टचेष्टाप्रकटनादिरूपां कुर्वन्ति, 'सेसं तं चेय'त्ति शेषं से जहा नामए' इत्यादि तदेव यावत् 'भुजो २ परिणमन्तीति वाक्यम् , तदेवं भाविता रूपपरिचारणा, सम्प्रति शब्दपरिचारणां भावयितुकाम [५८७ -५९३] For P OW ~209~ Page #210 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (१५) प्रत सूत्रांक [३२१ -३२७] दीप अनुक्रम [५८७ -५९३] - - उपांगसूत्र - ४ ( मूलं + वृत्ति:) “प्रज्ञापना" ------ उद्देशक: [-], - दारं [-], - मूलं [३२१-३२७] पूज्य आगमोद्धारकश्री संशोधितः मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र [१५],उपांगसूत्र-[४] "प्रज्ञापना" मूलं एवं मलयगिरि-प्रणीता वृत्तिः पदं [३४], आह- 'तत्थ णमित्यादि कण्ठ्यं, नवरमदूरसमीपे स्थित्वा अनुत्तरान् — सर्वमनः प्रल्हादजनकतया अनन्यसदृशान् उच्चावचान् - प्रबल २तरमन्मथोद्दीपकसभ्यासभ्यरूपान् शब्दान्, सूत्रे नपुंसक निर्देशः प्राकृतत्वात्, समुदीरयन्त्यस्तिष्ठन्ति, शेषं तथैव, 'एवं तत्थ ण'मित्यादि, मनःपरिचारकसूत्रमपि तथैव यावन्मनः परिचारे मनसि कृते सति क्षिप्रमेव ता अप्सरसस्तत्र गता एव सौधर्मेशानदेवलोकान्तर्गतखख विमानस्थिता एव सन्त्योऽनुत्तराणि - परमसन्तोषजनकतया अनन्यसदृशानि उच्चावचानि -- कामानुषक्तसभ्यासभ्यरूपाणि मनांसि प्रचारयन्त्यस्तिष्ठन्ति, इह 'तत्थगया चैव समाणीओ' इति वदता देव्यः सहस्रारं यावद् गच्छन्ति न परत इत्यावेदितं द्रष्टव्यं तथा चाह सनहणिमूलटीकाकारो हरिभद्रसूरिः- “ सनत्कुमारादिदेवानां रताभिलाषे सति देव्यः सत्यपरिगृहीताः सहस्रारं यावद् गच्छन्ती"ति, तथा स एव प्रदेशान्तरे आह— "इह सोहम्मे कप्पे तासिं देवीणं पलिओममाउगं ताओ तद्देवाणं चेष दवंति, जासिं पुण पलिओ माई समयाहिया ठिई दुसमयतिसमयसंखेज्जासंसेज्जसमयाहिया जाव दसपलिया सोहम्मगदेवीओ ताओ सणकुमाराणं गच्छति, एवं दसपलिओषरि जासिं समयाहिया ठिई जान वीसं पलिया ताओ बंभलोगदेवाणं गच्छति, एवं बीसपलिओवरि जार्सि समयाहिया टिई जाव तीसं पलिया ताओ महासुकदेवाणं गच्छेति, एवं तीसं पलिओवरि जासिं समयाहिया ठिई जाब चत्तालीसं पलिया ताओ आणयदेवाणं तत्थ |ठिया चेव झाणावलंगणं होंति, एवं चत्तालीसं पलिओवरि जार्सि समयाहिया ठिई जाब पंचास पलिया ताओ Educator Internationa For Parts Only ------ ~210~ Page #211 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (१५) “प्रज्ञापना" - उपांगसूत्र-४ (मूलं+वृत्ति:) पदं [३४], -------------- उद्देशक: -,------------- दारं -1, -------------- मूलं [३२१-३२७] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र-[१५]उपांगसूत्र-[४] "प्रज्ञापना" मूलं एवं मलयगिरि-प्रणीता वृत्ति: ANA प्रत सूत्रांक [३२१ -३२७] दीप अनुक्रम प्रज्ञापना-18 आरणदेवाणं तत्थ ठियाओ चेव झाणावलंबणं होंति" तथा "ईसाणे जासिं देवीण पलिओवममहियमाउयं ताओ ३४ प्रवीयाः मल- तद्देवाणं चेव होंति,जासिं पुण अहियपलिओवमाई समयाहिया ठिई दुसमयतिसमयसंखेज्जासंखेज्जसमयाहिया जान चारपदं सू. य. वृत्ती. पण्णरसपलिया ताओ माहिंददेवाणं गच्छंति, एवं पन्नरसपलिओवरि समयाहिया ठिई जाक पणवीसं पलिया ताओ३२३-३२७ ॥५५था 18लंतगदेवाणं, जार्सि पुण पणवीसपलिओवरि समयाहिया ठिई जाव पंचतीसं पलिया ताओ सहस्सारदेवाणं, जार्सि कापण पंचतीसपलिओवरि समयाहिया ठिई जाव पणयालीसं ताओ पाणयदेवाणं तत्थ ठियाओ चेष झाणावलंवर्ण । होंति, जासिं पुण पणयालीसं पलिओवरि समयाहिया ठिई जाव पणपन्नपलिया ताओ अचुयदेवाणं तत्थ ठियाओ। चेच झाणावलंबणं हवंति" इति, 'तए ण'मित्यादि, ततो णमिति पूर्ववत्, ते देवाः ताभिरप्सरोभिः सार्दू मन:परिचारणं-सुरतानुबन्धि परस्परं सभ्यासभ्यमनःसङ्कल्पकरणरूपं कुर्वन्ति, 'सेस'मित्यादि, शेषं से जहा नामए सीया पोग्गला' इत्यादि निरवशेषं तावद् वक्तव्यं यावत् 'भुजो २ परिणमन्तीति सर्वान्तिम वाक्य, व्याख्या |चास प्राग्वत् , तत ऊर्ध्वं तु अवेयकादयो मनसाऽपि योषितो न प्रार्थयन्ति, प्रतनुवेदोदयत्वात् , यथोत्तरं चैतेऽनन्त-II गुणसुखमाजः, तथाहि-कायप्रयीचारेभ्योऽनन्तगुणसुखाः स्पर्शपरिचारकास्तेभ्योऽप्यनन्तगुणसुखाः रूपपरिचार-IMI५५२॥ कास्तेभ्योऽपि अनन्तगुणसुखाः शब्दपरिचारकास्तेभ्योऽप्यनन्तगुणसुखा मनःपरिचारकास्तेभ्योऽपि अपरिचारकाः अनन्तगुणसुखाः। साम्प्रतमेतेषामेव परस्परमल्पबहुत्वमभिधित्सुराह-एएसि णमित्यादि, सर्वस्तोका देवा अपरिचा Researceaeteceae [५८७ -५९३] wirelaamarary.org ~211 Page #212 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (१५) “प्रज्ञापना" - उपांगसूत्र-४ (मूलं+वृत्ति:) पदं [३४], -------------- उद्देशक: -,------------- दारं -1, -------------- मूलं [३२१-३२७] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र-[१५]उपांगसूत्र-[४] "प्रज्ञापना" मूलं एवं मलयगिरि-प्रणीता वृत्ति: प्रत सूत्रांक [३२१-३२७] etcersekseelersearceae4 रकाः, ते हि येयकानुत्तरोपपातिनस्ते च सर्वसङ्ख्यया क्षेत्रपल्योपमासयेयभागवर्त्तिनमःप्रदेशराशिप्रमाणा इति, तेभ्योऽपि मनःपरिचारका देवाः सङ्ख्येयगुणाः, तेषामानतादिकल्पचतुष्टयवर्त्तित्वात् , तद्वर्तिनां च पूर्वदेवापेक्षया सोयगुणक्षेत्रपल्योपमासङ्ख्येयभागगताकाशप्रदेशराशिप्रमाणत्वात् , तेभ्यः शब्दपरिचारका असङ्ख्यगुणाः, ते हि महाशुक्रसहस्रारकल्पवासिनः, ते च घनीकृतलोकस्य एकप्रादेशिक्याः श्रेणेरसङ्ख्येयतमे भागे यावन्त आकाशप्रदेशास्तावत्प्रमाणाः, तेभ्योऽपि रूपपरिचारका देवा असङ्ख्येवगुणाः, ते हि ब्रह्मलोकलान्तककल्पनिवासिनः, ते च पूर्वदेवा-| नधिकृत्यासङ्ख्येयगुणश्रेण्यसङ्ख्येयभागगतनभःप्रदेशराशिप्रमाणाः, तेभ्योऽपि स्पर्शपरिचारका देवा असङ्ख्येयगुणाः, तेषां ।। सनत्कुमारमाहेन्द्रकल्पवर्तित्वात् तद्वर्त्तिनां च ब्रह्मलोकलान्तकदेवानपेक्ष्यासययगुणश्रेण्यसबेयभागवाकाशप्रदेशपरिमाणतयाऽधीतत्वात् , तेभ्यः कायपरिचारका देवा असङ्ख्येयगुणाः, भवनपत्यादीनामीशानान्तानां सर्वेषां काय-13 परिचारकत्वात् , तेषां सर्वसङ्ख्यया प्रतरासङ्ख्येयभागवर्तिनभःप्रदेशराशिप्रमाणत्वात् इति ॥ इति श्रीमलयगिरिविर०19 प्रज्ञा० चतुर्विंशत्तम पदं समासम् ॥ दीप अनुक्रम Recemesesserses. [५८७ -५९३] SAREastatinintennational अत्र पद (३४) "प्रविचारणा" परिसमाप्तम् ~212~ Page #213 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (१५) प्रत सूत्रांक [३२८] गाथा: दीप अनुक्रम [५९४ -५९६] “प्रज्ञापना” – उपांगसूत्र - ४ ( मूलं + वृत्ति:) पदं [३५], ---------- TÈRM: [-], ------------- TTỶ (-), --------- - मूलं [३२८] + गाथा: पूज्य आगमोद्धारकश्री संशोधितः मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित.. आगमसूत्र - [१५],उपांगसूत्र-[४] "प्रज्ञापना" मूलं एवं मलयगिरि-प्रणीता वृत्तिः प्रज्ञापनायाः भल य० वृत्तौ. ॥५५३॥ अथ पञ्चत्रिंशत्तमं वेदनाख्यं पदं ॥ ३५ ॥ तदेवमुक्तं चतुखिंशत्तमं पदं, सम्प्रति पञ्चत्रिंशत्तममारभ्यते, अस्य चायमभिसम्बन्धः - इहानन्तरपदे वेदपरिणामविशेषः प्रवीचारः प्रतिपादितः, अत्र तु गतिपरिणामविशेषा वेदना प्रतिपाद्यते, तत्र आदौ सकटवक्तव्यतासङ्ग्रह परे इसे द्वे गाथे- Education International सीता व दसरीरा साता तह वेदणा भवति दुक्खा । अग्भुवगमोव कमिया निदाय अणिदाय नायवा ।। १ ।। सायमंसायं सर्व्वे सुहं च दुक्खं अदुक्खमसुहं च । माणसरहियं विगलिंदिया उ सेसा दुविहमेव ॥ २ ॥ कइविहा णं भंते ! वेदणा पं० १, गो० ! तिविहा वेदणा पं० तं०-सीता उसिणा सीतोसिणा, नेरइया णं भंते । किं सीतं वेदणं वेदेति उसिणं वे० दे० सीतोसिणं वे० वेदेति १, गो० ! सीतंपि वेदणं वेदेति उसिपि वे० दे० नो सीतोसिणं वे० दे०, केई एकेक पुढवीए वेदणाओ भणति, रयणप्पभापुढविनेरइयाणं भंते ! पुच्छा, गो० ! नो सीतं वेदणं वे० उसिणं वे० वे० नो सीतोसिणं ००, एवं जाव वायप्पभापुढविनेरश्या, पंकप्पभापुढविनेरयाणं पुच्छा, गो० ! सीतंपि वे० दे० उसिपि वे० दे०, नो सीतोसिणं वे० दे०, ते बहुयतरागा जे उसिणं वेदणं वेदंति, ते थोक्तरागा जे सीतं वेदणं वे०, धूमप्पभाए एवं चैव दुविहा, नवरं ते बहुतरागा जे सीतं वे० दे० ते थोक्तरागा जे उसिणं वे० वेदेति, तमाए य तमतमाए य सीयं वे० दे० नो For Parts Only अथ पद (३५) “वेदना" आरब्धम् ~ 213~ ३५वेदना पदं सू. ३२८ ॥५५३॥ wor Page #214 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (१५) प्रत सूत्रांक [३२८] गाथा: दीप अनुक्रम [५९४ -५९६] “प्रज्ञापना” – उपांगसूत्र - ४ ( मूलं + वृत्ति:) पदं [३५], - मूलं [३२८] + गाथा: ---------- उद्देशकः [-], ------------- दारं [-], पूज्य आगमोद्धारकश्री संशोधितः मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित.. आगमसूत्र [१५]उपांगसूत्र-[४] "प्रज्ञापना" मूलं एवं मलयगिरि-प्रणीता वृत्तिः Education International उसिणं वे० वे०, नो सीतोसिणं वे० वेदेति, असुरकुमाराणं पुच्छा, गो० ! सीतंपि वे० दे० उसिपि वे०वे० सीतोसीणंपि वे० वे०, एवं जाय वैमाणिया । कतिविहा णं भंते ! वेदणा पं० १, गो० ! चउविहा वेदणा पं० [सं० - दबतो खेचतो कालतो भावतो, नेरइयाणं भंते! किं दवतो वेदणं वे० दे० जाव किं भावतो वे० दे० १, गो० ! दबओवि वे० दे० जाव भावओवि वे० दे०, एवं जाव वैमाणिया । कतिविद्या णं भंते ! वेदणा पं० १, गो० ! तिविहा वेदना, पं० तं०-सारीरा माणसा सारीरमाणसा, नेरहया णं भंते । किं सारीरं वे० दे० माणसं वेयणं वे० सारीरमाणसं वे० वे० १, गो० ! सारीरंपि वे० दे० माणसंपि वे० दे० सारीरमाणसंपि वे० वे०, एवं जाव वेमाणिया, नवरं एगिंदियविगलिंदिया सारीरं वे० वे० नो माणसं वे० दे० नो सारीरमाणसं वे० दे० । कहविहा णं भंते! बेयणा पं० १, गो० ! तिविहा वेयणा पं० सं०साता असावा सातासाता, नेरइया णं भंते । किं सायं वेदणं वेदंति असातं वे० दे० सायासायं वे० दे० १, गोयमा ! तिविहंपि वे ० वे०, एवं सवजीवा जाव वेमाणिया । कतिविद्या णं भंते ! वेदणा पं० १, गो० ! तिविहा पं० तं०- दुक्खा सुद्दा अदुक्खसुहा, नेरइया णं भंते ! किं दुक्खं वेदणं वे० दे० इच्छा, गो० ! दुक्खंपि वे० दे० सुर्हषि वे० दे० अदुक्खमसुपि वे० दे० एवं जाव बेमाणिया । (सूत्रं ३२८ ) 'सीया य दवेत्यादि, वेदना प्रथमतः शीता चशब्दादुष्णा शीतोष्णा च वक्तव्या, तदनन्तरं द्रव्यक्षेत्रकालभावैर्बेदना वक्तव्या, ततः शारीरी उपलक्षणान्मानसी च वेदना वाप्या, ततः साता तथा दुःखा वेदना सभेदा वक्तव्य -------- For Penal Use On ~ 214~ Page #215 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (१५) प्रत सूत्रांक [३२८] गाथा: दीप अनुक्रम [५९४ -५९६] पदं [३५], ---------- उद्देशकः [-], ------------- दारं [-], - मूलं [३२८] + गाथा: पूज्य आगमोद्धारकश्री संशोधितः मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित.. आगमसूत्र - [१५],उपांगसूत्र-[४] "प्रज्ञापना" मूलं एवं मलयगिरि-प्रणीता वृत्तिः प्रज्ञापनाया मल य० वृत्ती. ॥ ५५४॥ “प्रज्ञापना” – उपांगसूत्र - ४ ( मूलं + वृत्ति:) तया ज्ञातव्या भवति, तदनन्तरमाभ्युपगमिकी औपक्रमिकी च वेदना वक्तव्यतया ज्ञातव्या, ततोऽप्यनन्तरं निदा चानिदा चेति, सातसुखादीनां विशेषमाभ्युपगभिक्यादिशब्दानामर्थं त्वमे वक्ष्यामः, सातादिवेदनां अधिकृत्य यो | विशेषो वक्ष्यते तत्सङ्ग्राहिका द्वितीया गाथा- ' सायम साय' मित्यादि, सर्वे संसारिणः सातामसातां चशब्दात् साता- ४ सातां च वेदनां वेदयन्ते, तथा सुखां दुःखां अदुःखामुखां च, तथा विकलेन्द्रिया - एकद्वित्रिचतुरिन्द्रियाः तुशब्दस्याधिकारार्थसंसूचनार्थत्वादसंज्ञिपञ्चेन्द्रियाश्च मानसरहितां - मनोविकलां वेदनां वेदयन्ते, शेषास्तु द्विविधामेव शरीरमनोनिबन्धनां शारीरी मानसीं तदुभयसमुद्भवां चेति भावः, निदाऽनिदादिगतस्तु विशेषो न सङ्गृहीतो, विचित्रत्वात् सूत्रगतेः । तत्र 'यथोद्देशं निर्देश' इति न्यायात् प्रथमतः शीतादिवेदनाः प्रतिपादनार्थमाह – 'कहविहा णं मंते !" इत्यादि, शीता-शीत पुद्गलसम्पर्कसमुत्था, एवमुष्णा, या च अवयवभेदेन शीतोष्णपुङ्गलसम्पर्कतः शीता उष्णा च सा शीतोष्णा, एनामेव त्रिविधां वेदनां नैरयिकादिचतुर्विंशतिदण्डकक्रमेण चिन्तयति- 'नेरइया ण'मित्यादि, तत्राद्यासु तिसृषु पृथिवीपूष्णां वेदनां वेदयन्ते, ते हि शीताः ये नरकावासाश्च तदाश्रयभूताः सर्वतो जगप्रसिद्धखादिराङ्गारातिरिक्त बहुप्रतापोष्णपुद्गलसम्भूताः, चतुर्थ्यां तु पङ्कप्रभाभिधानायां पृथिव्यां केचिनैरथिका उष्णवेदनां केचिच शीतवेदनामनुभवन्ति, तत्रत्यनरकावासानां शीतोष्णभेदतो द्विधा भेदात्, केवलं ये उष्णवेदनां वेदयन्ते ते प्रभूततराः प्रभूतेषु नरकावासे पूष्ण वेदना सद्भावात्, इतरे शीतवेदनामनुभवन्तः स्तोकाः, स्तोकतरेषु नर Education Internation For Pasta Use Only ~215~ ३५वेदना पदं सू. २२८ ॥ ५५४॥ Page #216 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (१५) प्रत सूत्रांक [३२८] गाथा: दीप अनुक्रम [५९४ -५९६] “प्रज्ञापना” – उपांगसूत्र - ४ ( मूलं + वृत्ति:) पदं [३५], ---------- TÈRM: [-], ------------- TTỶ (-), --------- - मूलं [३२८] + गाथा: पूज्य आगमोद्धारकश्री संशोधितः मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित.. आगमसूत्र [१५]उपांगसूत्र-[४] "प्रज्ञापना" मूलं एवं मलयगिरि-प्रणीता वृत्तिः कावासेषु शीतवेदनासम्भवात्, धूमप्रभायामपि पृथिव्यां केचित् शीतवेदनाकाः केचिदुष्णवेदनाकाः, नवरं शीतवेदनाकाः प्रभूततराः, प्रभूतेषु नरकावासेषु शक्तिवेदनासम्भवात्, स्तोका उष्णवेदनाः, कतिपयेष्वेव नरकावासेपूष्णवेदनाभावात्, अधस्तन्योस्तु द्वयोः पृथिव्योः शीतवेदनामेव नैरयिका अनुभवन्ति, तत्रत्यनैरयिकाणां सर्वेषामुष्णयोनिकत्वात्, नरकावासानां त्वनुषमहिमानुषक्तत्वात्, एतावत्सूत्रं चिरन्तनेष्वविप्रतिपत्या श्रूयते केचिदाचार्याः पुन| रेतद्विषयमधिकमपि सूत्रं पठन्ति, ततस्तन्मतं आह- 'केर एकेकीए पुडवीए श्रेयणं भणति' इति केचिदाचार्या एकेकस्मां पृथिव्यां प्रश्ननिर्वचनरूपतया वेदनां भणति, यथा भणन्ति तथोपदर्शयन्ति — 'श्यणप्प में 'त्यादि सुगमं, तदेवं नैरयिकाणां चिन्तिता शीतादिवेदना, सम्प्रत्यसुरकुमाराणां तां चिचिन्तयिपुरिदमाह - 'असुरकुमाराणं पुच्छा' असुरकुमाराणां शीतादिवेदनाविषये पृच्छासूत्रं च वक्तव्यं, 'असुरकुमारा णं भंते । किं सीयं वेदणं येयंति उसिणं बेयणं वेयंति सीओसिणं वेयणं वेयंति ? इति भगवानाह - 'गोयमे' त्यादि, शीतामपि वेदनां वेदयन्ते यदा शीतलजलसम्पूर्णहदादिषु निमज्जनादिकं विदधति, उष्णामपि वेदनां वेदयंते यदा कोऽपि महर्द्धिकस्तजातीयोऽन्यजातीयो वा कोपवशात् विरूपतया दृष्ट्याऽवलोकमानः शरीरे सन्तापमुत्पादयति, यथा प्रथमोत्पन्नः ईशानेन्द्रो बलिचञ्चराजधानीवास्तव्यानामसुर कुमाराणामुत्पादितवान्, अन्यथा वा तथाविधोष्णपुद्गलसम्पृक्तामुष्ण वेदनामनुभवन्तो वेदितव्याः, यदा त्ववयवभेदेन शीतपुद्गलसम्पर्क उष्णपुद्गलसम्पर्कश्वोपजायते तदा शीतोष्ण वेदनां वेदयन्ते, Education Internation For Parts Only ~216~ Page #217 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (१५) “प्रज्ञापना" - उपांगसूत्र-४ (मूलं+वृत्ति:) पदं [३५], -------------- उद्देशक: -, ------------- दारं -1, -------------- मूलं [३२८] + गाथा: पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र-[१५]उपांगसूत्र-[४] "प्रज्ञापना" मूलं एवं मलयगिरि-प्रणीता वृत्ति: प्रत सूत्रांक [३२८] गाथा: प्रज्ञापना- ननु उपयोगः क्रमेण जीवानां भवति, तथाखाभाव्यात्, कथमत्र शीतोष्णवेदनानुभवो युगपत् प्रख्याप्यते इति?, ३५वेदनापाः मल-INउच्यते, इहापि वेदनानुभवः क्रमेणैव, तथाजीवखाभाच्यात्, केपलं शीतोष्णवेदनाहेतुपुद्गलसम्पर्को युगपदुपजायत। | पदं सू. यवृत्ती. इति सूक्ष्ममाशुसञ्चारिणमुपयोगक्रममनपेक्ष्य यथैव ते वेदयमाना युगपदभिमन्यन्ते तथैव प्रतिपादितमिति न कधि शोषः, सामान्यतः सूत्रस्य प्रवृत्तत्वात् , 'एवं जाव वेमाणिय'त्ति एवं-असुरोक्तेन प्रकारेण यावद् वैमानिकास्तावत् ॥५५५॥ सूत्रं वक्तव्यं, तचैवम्-'पुढषिकाइया णं भंते ! किं सीयं वेयणं वेयंति उसिणं वे सीओसिणं वेयणं वेयंति KI गो! सीयंपि ये वे० उसिणंपि बे०वे. सीतोसिणंपि वे वेयंति' इत्यादि, तत्र पृथिवीकायिकादयो मनुष्यपर्य-11 वसानाः शीतवेदनां हिमादिप्रपातेऽभिवेदयमाना वेदितव्याः उष्णवेदनामझ्यादिसम्पर्के शीतोष्णवेदनामवयवशः शीतोष्णपुदलसम्बन्धे इति, व्यन्तरज्योतिष्कवैमानिकास्त्वसुरकुमारवत् भावनीयाः। उक्ता शीतादिभेदात् त्रिविधा वेदना, सम्प्रति तामेव वेदना प्रकारान्तरेणाभिधित्सुः प्रश्ननिर्वचनसूत्रे आह-'काविहा णं भंते' इत्यादि, इह का वेदना व्यक्षेत्रकालभावसामग्रीवशादुत्पद्यते, सर्वस्यापि वस्तुनो द्रव्यादिसामग्रीवशादुत्पद्यमानत्वात् , तत्र यदा-1 स्यैव वेदना पुद्गलद्रव्यसम्बन्धमधिकृत्य चिन्त्यते तदा द्रव्यवेदना, द्रव्यतो वेदना द्रव्यवेदना, नारकाधुपपातक्षेत्रम- ||५५५॥ धिकृत्य चिन्त्यमाना क्षेत्रवेदना, नारकादिभवकालसम्बन्धेन विवक्ष्यमाणा कालवेदना, वेदनीयकर्मोदयादुपजायमा-14 18नत्वेन परिभाव्यमाना भाववेदना, एतामेव चतुर्विधां वेदनां चतुर्विशतिदण्डकक्रमेण चिन्तयति-निरइया णं भंते ! दीप अनुक्रम [५९४-५९६] ~217~ Page #218 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (१५) “प्रज्ञापना" - उपांगसूत्र-४ (मूलं+वृत्ति:) पदं [३५], -------------- उद्देशक: -,------------- दारं -], -------------- मूलं [३२८] + गाथा: पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र-[१५]उपांगसूत्र-[४] "प्रज्ञापना" मूलं एवं मलयगिरि-प्रणीता वृत्ति: प्रत सूत्रांक [३२८] गाथा: किं दवतो वेयणं वेदंति' इत्यादि, सकलमपि सुगम। प्रकारान्तरेण वेदनांपि प्रतिपिपादयिषुः प्रश्ननिर्वचनसूत्रे | आह-'कइविहा णं भंते !' इत्यादि, शरीरे भवा शारीरी मनसि भवा मानसी तदुभयभवा शारीरमानसी, शारीरी च मानसी च शारीरमानसी, 'पुंषत्कर्मधारय' इति पुंवद्भावः, एतामेय चतुर्विंशतिदण्डकक्रमेण चिन्तयति-'नेर-19 इया णं भंते ! किं सारीरं वेयणं वेदेति' इत्यादि, तत्र यदा परस्परोदीरणतः परमाधार्मिकोदीरणतो वा क्षेत्रानुभावितो वा शरीरे पीडामनुभवन्ति तदा शारीरी वेदनां वेदयन्ते, यदा तु केवलं मनसि दुःखं परिभावयन्ति पाश्चात्य या भवमात्मीयं दुष्कर्मकारिणमनुसृत्य पश्चात्तापमतीव कुर्वते तदा मानसीं वेदनां वेदयन्से, यदा तु शरीरे मनसि चोक्तप्रकारेण युगपत् पीडां अनुभवन्ति तदा शारीरमानसी, इहापि वेदनानुभावः क्रमेणेव केवलं विवक्षिततावत्कालमध्ये शरीरे च पीडामनुभवन्ति मनसि च एतावन्तं कालं एकं विवक्षित्वा युगपच्छरीरमनःपीडानुभवः प्रतिपादित इत्यदोषः, 'एवं जाव वेमाणिया' इत्यादि, एवं-नैरयिकोक्तेन प्रकारेण सूत्रं तावद् वक्तव्यं यावद्वैमानिकाः, नवरमेकेन्द्रियषिकलेन्द्रियाः शारीरी वेदनां वेदयन्ते न मानसी, तेषां मनसोऽभावात् , ततस्तदनुसारेण तद्विषयं सूत्र वक्तव्यं । प्रकारान्तरेण वेदनामभिधित्सुःप्रश्ननिर्वचनसूत्रे आह-'काविहा णं भंते ।' इत्यादि, तत्र साता-सुख| रूपा असाता-दुःखरूपा सातासाता-सुखदुःखात्मिका, एतामेव नैरयिकादिचतुर्विशतिदण्डकक्रमेण चिन्तयति।'नेरइया णमित्यादि, तत्र तीर्थकरजन्मादिकाले सातवेदनां वेदयन्ते, शेषकालमसातवेदनां वेदयन्ते, यदा तु पूर्वस-18॥ दीप अनुक्रम [५९४-५९६] ~218~ Page #219 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (१५) “प्रज्ञापना" - उपांगसूत्र-४ (मूलं+वृत्ति:) पदं [३५], -------------- उद्देशक: -, ------------- दारं -1, -------------- मूलं [३२८] + गाथा: पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र-[१५]उपांगसूत्र-[४] "प्रज्ञापना" मूलं एवं मलयगिरि-प्रणीता वृत्ति: प्रत सूत्रांक ३२९ [३२८] गाथा: प्रज्ञापना- ऋतिको देवो दानवो वा वचनामृतैः सिञ्चति तदा मनसि सातं शरीरे तु क्षेत्रानुभावतोऽसातं यदिया मनस्येव तह- ३५वेदनाया मळ- शेनतः तद्वचनश्रवणतच सातं पश्चात्तापानुभवनतस्त्वसातमिति तदा सातासातवेदनामनुभवन्ति, अत्रापि तावन्तं पदं सू. य.वृत्ती . विवक्षितकालमेकं विवक्षित्वा सातासातानुभवो युगपत् प्रतिपादितः, परमार्थप्तस्तु क्रमेणैव च वेदितव्य इति, एवं'-IN ॥५५६॥ मित्यादि, एवं-नैरयिकोक्तप्रकारेण सर्वे जीवास्तावद्वक्तच्या यावद्वैमानिकाः, तत्र पृथिव्यादयो थावन्नाधाप्युपद्रवः।। सन्निपतति तावत् सातवेदनां वेदयन्ते उपद्रवसम्पाते त्वसातवेदनामवयवभेदेनोपद्रवसम्पातभावे सातासातवेदनां, व्यन्तरज्योतिष्कवैमानिका देवाः सुखमनुभवन्तः सातवेदनां च्यवनादिकाले त्वसातवेदनां परविभूतिदर्शनतो मात्सयोधनुभवे खवलभदेवीपरिष्वज्ञाद्यनुभवे च युगपज्जायमाने सातासातवेदनां वेदयन्ते इति । भूयः प्रकारान्तरेण एतामेव प्रतिपादयन् प्रश्ननिर्वचनसूत्रे आह–'कइविहा णं भंते !' इत्यादि, या वेदना नैकान्तेन दुःखा भणितुं IM शक्यते सुखस्यापि भावात् नापि सुखा दुःखस्यापि भावात् सा अदुःखसुखा सुखदुःखात्मिका इत्यः, अथ साता सातयोः सुखदुःखयोव परस्परं का प्रतिविशेषः १, उच्यते, ये क्रमेणोदयप्राप्तवेदनीयकर्मपुद्गलानुभवतः सातासाते | ते सातासाते उच्यते, ये पुनः परोदीर्यमाणवेदनारूपे सातासाते ते सुखदुःखे इति, एतामेव चतुर्विशतिदण्डकक्रमण ॥५५६॥ चिन्तयति-'नेरइया ण'मित्यादि ॥ वेदनामेव प्रकारान्तरेण चिन्तयन्नाह कत्तिविहा णं भंते ! वेदणा पं०१, गो० ! दुविहा वेयणा पं०, तं०-अब्भोवगमिया य उवकमिया य, नेरइया णं भंते ! दीप अनुक्रम [५९४-५९६] ~219~ Page #220 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (१५) “प्रज्ञापना” – उपांगसूत्र-४ (मूलं+वृत्ति:) पदं [३५], -------------- उद्देशक: [-], ------------- दारं -1, -------------- मूलं [३२९] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र-[१५]उपांगसूत्र-[४] "प्रज्ञापना" मूलं एवं मलयगिरि-प्रणीता वृत्ति: प्रत सूत्रांक [३२९] अन्मोवगमियं वेदणं वे० ० उवक्कमियं वेदणं वे० ३०१, गो० नो अब्भोवगमियं वे० वे० उवकमियं वे० वे०, एवं जाव चउरिंदिया, पंचिदियतिरिक्खजोणिया मासा य दुविहंपि वे० वे०, वाणमंतरजोतिसियवेमाणिया जहा नेरइया (मत्र ३२९) 'कतिविहा णं भंते !' इत्यादि, तत्राभ्युपगमिकी नाम या खयमभ्युपगम्यते, यथा साधुभिः केशोलुञ्चनातापनादिभिः शरीरपीडा, अभ्युपगमेन-खयमङ्गीकारेण निवृत्ता आभ्युपगमिकीति व्युत्पत्तेः, उपक्रमणमुपक्रमः-खयमेव समीपे भवनमुदीरणाकरणेन वा समीपानयनं तेन निवृत्ता औपक्रमिकी, खयमुदीर्णस्य उदीरणाकरणेन वा उदयम-18 पनीतस्य वेदनीयकर्मणो विपाकानुभवनेन निवृत्ता इत्यर्थः, तत्र पञ्चेन्द्रियतिर्यञ्चो मनुष्याच द्विविधामपि घेदना वेदयन्ते, सम्यग्रशां पश्चेन्द्रियतिरां मनुष्याणां च कर्मक्षपणार्थमाभ्युपगमिक्या अपि वेदनायाः सम्भवात् , शेषास्त्वीपक्रमिकीमेव वेदनां वेदयन्ते नाभ्युपगमिकी, पृथिव्यतेजोवायुवनस्पतिद्वित्रिचतुरिन्द्रियाणां मनोविकलतया विवेकाभावतस्तथाप्रतिपत्तेरभावात्, नारकभवनपतिव्यन्तरज्योतिष्कवैमानिकानां च तथाभवखाभाब्यादिति, एतदेव |सूत्रकृत् प्रतिपादयति-'नेरइया णं भंते ! इत्यादि सुगम । पुनः प्रकारान्तरेण वेदनामेवाभिधित्सुराह कतिविहा णं भंते ! वेदणा पं०१, गो ! दुविहा वेदना पं०, तं०-निदाय अणिदाय, नेरहया ण भते ! कि निदायं बेयर्ण बेदयंते अणिदायं ० ०१, गो० निदायपि वे०० अणिदायपि वेदणं वे०,से केण टेणं मंते ! एवं बु०-नेरहया निदान यपि अनिदायपि वे०के०१, गो! नेरइया दुविहा पं०,०-सण्णीभूया य असण्णीभूया य, तत्थ णं जे ते सण्णिभूया दीप अनुक्रम [५९७] REarainrainind ~220~ Page #221 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (१५) “प्रज्ञापना” – उपांगसूत्र-४ (मूलं+वृत्ति:) पदं [३५], -------------- उद्देशक: [-], ------------- दारं [-], -------------- मूलं [३३०] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र-[१५]उपांगसूत्र-[४] "प्रज्ञापना" मूलं एवं मलयगिरि-प्रणीता वृत्ति: प्रत प्रज्ञापनाया: मलय. वृत्ती. ३२९ सूत्रांक [३३०] ॥५५७|| दीप अनुक्रम [५९८] ते णं निदायपि वे० वे०, तत्थ णं जे ते असण्णीभूता ते णं अणिदार्य वेदणं वे०, से तेणडेणं० १, गो०! एवं नेरड्या ३५वेदनानिदायपि वेपणं वे० अणिदायपि वे वे०, एवं जाव थणियकुमारा, पुढविकाइयाणं पुच्छा, गो० नो निदाय के थे. पदं सू. अणिदाय वे वे०, से केणटेणं भंते ! एवं० पुढचीकाइया नो निदायं वे०वे० अनिदायं वे वे०१, गो. पुढविकाइया सो असण्णी असण्णिभूयं अणिदाय वे०के०, से तेणडेणं गो०! एवं० पुढविकाइया नो निदायं ००, अणिदायं वे. वे०, एवं जाव चरिंदिया, पंचिंदियतिरिक्खजोणिया मणूसा वाणमंतरा जहा नेरइया, जोइसियाणं पुच्छा, गो! निदायपि चेयणं वे वे० अणिदायपि वेयणं बेद०, से केणद्वेणं भंते ! एवं वु०-जोइसिया निदायपि अणिदायपि चेयणं वेदें। ति?, गो.! जोइसिया दुविहा पं०, त०-माइमिच्छद्दिहिउबवण्णमा य अमाइसम्मदिट्टीउबवण्णगा य, तत्थ णं जे ते माइमिच्छदिहिउपवण्णमा ते णं अणिदार्य चेयर्ण चेयंति, तत्थ णं जे ते अमाईसम्मदिट्ठीउ० ते णं निदायं वे वे०, से एतेणटेणं गो०! एवं० जोइसिया दुविहंपि वेदणं वे०, एवं वेमाणियावि ॥ (सूत्रं ३३०) ।। पण्णवणाए वेयणापयं समत्तं ॥३५॥ 'कतिविदा णं भंते ।' इत्यादि, निदा च अनिदा च, तत्र नितरां निश्चितं वा सम्यक् दीयते चित्तमस्यामिति निदा, बहुलाधिकाराद् 'उपसर्गादात' इसधिकरणे पञ् , सामान्येन चित्तवती सम्यग्विवेकवती वा इत्यर्थः, इतरा त्वनिदा-चित्तविकला सम्यगविवेकविकला वा, एतामेव चतुर्विशतिदण्डकक्रमेण प्रतिपादयति-'नेरइया णमित्यादि, II द्विविधा हि नैरयिकाः-संज्ञिभूता असंज्ञिभूताश्च, तत्र ये ते संज्ञिभ्य उत्पन्नास्ते संज्ञिभूताः, ये त्वसंजिभ्यस्तेऽसं-18 SanEauratoniane ~221~ Page #222 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (१५) “प्रज्ञापना” – उपांगसूत्र-४ (मूलं+वृत्ति:) पदं [३५], -------------- उद्देशक: [-], ------------- दारं [-], -------------- मूलं [३३०] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र-[१५]उपांगसूत्र-[४] "प्रज्ञापना" मूलं एवं मलयगिरि-प्रणीता वृत्ति: प्रत सूत्रांक [३३०] दीप ज्ञिभूताः, असंज्ञिनश्च पाश्चात्यं न किमपि जन्मान्तरकृतं शुभमशुभं वैरादिकं वा स्मरन्ति, स्मरणं हि तत्र प्रवर्तते । यत्तीनेणाभिसन्धिना कृतं भवति, न चासंज्ञिभवे पाश्चासे तेषां तीब्राभिसन्धिरासीत्, मनोविकलत्वात् , ततो यामपि काञ्चिद्वेदनां नैरयिका वेदयन्ते तामनिदां, पाश्चात्यभवानुभूतिविषयस्मरणपटुचित्तासम्भवात् , संज्ञिभूतास्तु सर्व पाश्चात्यमनुस्मरन्तीति ते निदा वेदनां चेदयन्ते इति, एवमसुरकुमारादयः स्तनितकुमारपर्यवसाना भवनपतयो वक्तव्याः, तेषामपि संज्ञिभ्योऽसंज्ञिभ्यश्चोत्पादसम्भवात् , पृथिव्यप्तेजोवायुवनस्पतिद्वित्रिचतुरिन्द्रियाः सम्मूञ्छिमा इति मनोविकलत्वात् अनिदामेव वेदनां वेदयन्ते, पंचिंदियतिरिक्खजोणिया मणूसा वाणमंतरा जहा नेरइया' इति, पञ्चेन्द्रियतिर्यग्योनिका मनुष्या व्यन्तराश्च यथा नैरयिकास्तथा वक्तव्या इति शेषः, निदामपि वेदनां वेदयन्ते अनिदामपि वेदनां वेदयन्ते इति वक्तव्या इत्यर्थः, कस्मादिति चेत्, उच्यते, इह पञ्चेन्द्रियतिर्यग्योनिका मनुष्याश्च द्विधा भवन्ति, तद्यथा-सम्मूछिमा गर्भव्युत्क्रान्तिकाश्च, तत्र ये ते सम्मूछिमास्ते मनोविकलत्वादनिदां वेदनां वेदयन्ते, ये तु गर्भव्युत्कान्तास्ते समनस्का इति निदां वेदनामनुभवन्ति, व्यन्तरास्तु संज्ञिभ्योऽपि उत्पद्यन्ते असंज्ञिभ्योऽपि ततस्तेऽपि नैरयिकवत् निदां चानिदां च वेदनां वेदयमाना भावनीयाः, 'जोइसिया ण'मित्यादि, ज्योतिष्कास्तु संज्ञिभ्य एयोत्पद्यन्ते, ततस्तेषु न नैरयिकोक्तेन प्रकारेण निदानिदे वेदने सम्भावनीये, किन्तु प्रकारान्तरेण, ततस्तमेव प्रकारं बुभुत्सुः प्रश्नसुत्रमाह-'से केणटेणं भंते !' इत्यादि सुगम, भगवानाह-गोयमें'त्यादि, ज्योतिष्का हि अनुक्रम [५९८] SAREaratunXHI T urmurary on ~222~ Page #223 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (१५) “प्रज्ञापना” – उपांगसूत्र-४ (मूलं+वृत्ति:) पदं [३५], -------------- उद्देशक: [-], ------------- दारं [-], -------------- मूलं [३३०] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र-[१५]उपांगसूत्र-[४] "प्रज्ञापना" मूलं एवं मलयगिरि-प्रणीता वृत्ति: प्रत सूत्रांक [३३०] प्रज्ञापना- द्विविधाः-मायिमिथ्यादृष्टयुपपन्नकाः अमायिसम्यग्दृष्टयुपपन्न काश्च, तत्र मायानिर्तितं यत्कर्म मिथ्यात्वादिकं तद-३५वेदना याः मल- पि माया, कार्य कारणोपचारात् , माया विद्यते येषां ते मायिनः, अत एष मिथ्यात्वोदयात् मिश्या-विपर्यस्ता दृष्टि:- पदं सू. य० वृत्ती. वस्तुतत्वप्रतिपत्तिर्येषां ते मिथ्यादृष्टयो मायिनश्च ते मिथ्यादृष्टयश्च मायिमिथ्यारष्ट्रयस्ते च ते उपपनकाय मायिमि-18 ३२१ श्यादृष्टधुपपन्नकाः तद्विपरीता अमायिसम्यग्दृष्टयुपपन्नकाः, तत्र ये ते मायिमिथ्यादृष्टयुपपन्नकास्तेऽपि मिथ्यादृष्टित्वा-18 ॥५५८॥ देव व्रतयिराधनातोऽज्ञानतपोवशाद्वा वयमेवंविधा उत्पन्ना इति न जानते, ततः सम्यगयथावस्थितपरिज्ञानामावादनिदा वेदनां वेदयमानास्ते वेदितव्याः, ये त्वमायिसम्यग्रएषुपपन्नास्ते सम्यग्दृष्टित्वात् यथावस्थितं स्वरूपं जानन्ति, ततो या काञ्चन वेदनां वेदयन्ते तां सर्वामपि निदामिति, 'एवं चेव वेमाणियावि' इति एवं-ज्योतिष्फोक्तेन Iप्रकारेण वैमानिका अपि निदामनिदां च वेदनां वेदयमाना वेदितव्याः, तेषामपि मिथ्यारष्टिसम्यग्दृष्टिभेदतो द्वि विधत्वात् ॥ इति श्रीमलयगिरिविरचितायां प्रज्ञापनाटीकायां वेदनाख्यं पञ्चत्रिंशत्तमं पदं समाप्तं ॥३५॥ दीप अनुक्रम [५९८] ॥५५८ Rurasurare.org अत्र पद (३५) “वेदना" परिसमाप्तम् ~223~ Page #224 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (१५) “प्रज्ञापना” – उपांगसूत्र-४ (मूलं+वृत्ति:) पदं [३६], -------------- उद्देशक: -,------------- दारं --------------- मूलं [३३०...] + गाथा पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र-[१५]उपांगसूत्र-[४] "प्रज्ञापना" मूलं एवं मलयगिरि-प्रणीता वृत्ति: अथ षट्त्रिंशत्तमं समुद्घाताख्यं पदं ॥ ३६ ॥ प्रत सूत्रांक [३३०...] गाथा तदेवं व्याख्यातं पञ्चत्रिंशत्तमं पदं, सम्प्रति पत्रिंशत्तममारभ्यते, तस्य चायमभिसम्बन्धः-इहानन्तरपदे गतिपरिणामविशेपो वेदना प्रतिपादिता, इहापि गतिपरिणामविशेष एव समुद्घातश्चिन्त्यते, तत्र समुद्घातवक्तव्यताविषये इयमादौ सङ्ग्रहणिगाथावेयणकसायमरणे वेउवियतेयए य आहारे । केवलिए चेव मवे जीवमणुस्साण सत्तेव ॥१॥ 'वेयणे त्यादि, इह समुदूघाताः सप्त भयन्ति, तद्यथा-'यणकसायमरणे' इति, वेदनं कपायाश्च मरणं च वेदनकषायमरणं समाहारो द्वन्द्वस्तस्मिन् विषये त्रयः समुद्घाता भवन्ति, तद्यथा-वेदनासमुदूपातः कषायसमुद्घातो मरणसमुद्घातच, 'बेउविय'त्ति वैक्रियविषयश्चतुर्थः समुद्घातः, तेजसः पञ्चमः समुद्घातः, षष्ठ आहार इतिआहारकशरीरविषयः, सप्तमः केवलिकः-केवलिषु भवति, 'जीवमणुस्साण सत्तेवत्ति सामान्यतो जीवचिन्तायां मनुष्यद्वारचिन्तायां सप्तैव-सप्तपरिमाणाः समुद्घाता वक्तव्याः, न न्यूनाः, ससानामपि तत्र सम्भवात् , 'सत्तेवत्ति एवकारोऽत्र परिमाणे, वर्तते च परिमाणे एवशब्दः, यदाह शाकटायनन्यासकृत्-'एवोऽवधारणपृथक्त्वपरिमाणे दीप अनुक्रम [५९९] अथ पद (३६) “समुद्घात:" आरब्धम् ~224~ Page #225 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (१५) [ ३३०...] ཎྜནྡྲིཝཱ ཏྠ , [५९९] “प्रज्ञापना” – उपांगसूत्र - ४ ( मूलं + वृत्ति:) पदं [३६], ----- - FÈRT: (-), ------------- GT (-), -------------- मूलं [ ३३०...] + गाथा पूज्य आगमोद्धारकश्री संशोधितः मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र [१५],उपांगसूत्र - [४] "प्रज्ञापना" मूलं एवं मलयगिरि-प्रणीता वृत्तिः प्रज्ञापनायाः मलय० वृत्ती. ॥५५९॥ Eucation In ष्यिति, शेषद्वारचिन्तायां तु यथासम्भवं वाच्याः, ते चाग्रे स्वयमेव सूत्रकृताऽभिधास्यन्ते इत्येष सङ्ग्रहणिगाथासङ्केपार्थः । अथ समुद्घात इति कः शब्दार्थः १, उच्यते, समित्येकीभावे उत्प्राबल्ये, एकीभावेन प्राबल्येन घातः समुद्घातः, केन सह एकीभावगमनमिति चेत्, उच्यते, अर्थाद्वेदनादिभिः तथाहि - यदाऽऽत्मा वेदनादिसमुद्घात गतो भवति तदा वेदनाद्यनुभवज्ञानपरिणत एव भवति, नान्यज्ञान परिणतः, प्राबल्येन कथं घात इति चेत्, उ उच्यते, इह वेदनादिसमुद्घातपरिणतो बहून् वेदनीयादिकर्मप्रदेशान् कालान्तरानुभव योग्यानुदीरणा करणेना कृष्योदयावलिकायां प्रक्षिप्यानुभूय च निर्जरयति, आत्मप्रदेशैस्सह सक्लिष्टान् सातयतीति भावः, 'पुत्रकयकम्मसाडणं निजरा' [ पूर्वकृतकर्मशाटनं तु निर्जरा ] इति वचनात्, तथाहि — वेदनासमुद्घातोऽसद्वेद्यकर्माश्रयः, कपायसमुद्रघातः कषायाख्यचारित्रमोहनीय कर्माश्रयः, मारणान्तिकसमुद्घातः अन्तर्मुहूर्त्तशेषायुःकर्माश्रयः, वैकुर्वि कतैजसाहारकसमुद्घाता यथाक्रमं वैक्रियशरीरतैजसशरीराहारकशरीरनामकर्माश्रयाः, केवलिसमुद्घातः सदसद्वेद्य शुभाशुभनामोचनीचैर्गोत्रकर्माश्रयः, तत्र वेदनासमुद्घातगत आत्मा असातावेदनीयकर्मपुद्गलपरिशातं करोति, तथाहिवेदनापीडितो जीवः स्वप्रदेशाननन्तानन्तकर्मस्कन्ध वेष्टितान् शरीराद्वहिरपि विक्षिपति, तैश्च प्रदेशैर्वदनजठरादिरन्धाणि कर्णस्कन्धाद्यपान्तरालानि चापूर्यायामतो विस्तरतश्च शरीरमात्रं क्षेत्रमभिव्याप्यान्तर्मुहूर्त्त यावदवतिष्ठते, तस्मिंचान्तर्मुहूर्त्ते प्रभूतासातावेदनीयकर्मपुद्गलपरिशातं करोति, कषायसमुद्घातसमुद्धतः कषायाख्यचारित्रमोहनीयकर्म For Parts Only ~225~ ३६ समु द्यातपदं सू. ३३० 1144811 nary org Page #226 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (१५) “प्रज्ञापना” – उपांगसूत्र-४ (मूलं+वृत्ति:) पदं [३६], -------------- उद्देशक: -,------------- दारं --------------- मूलं [३३०...] + गाथा पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र-[१५]उपांगसूत्र-[४] "प्रज्ञापना" मूलं एवं मलयगिरि-प्रणीता वृत्ति: प्रत सूत्रांक [३३०...] गाथा पुदलपरिशातं विधत्ते, तथाहि-कषायोदयसमाकुलो जीवः प्रदेशान् बहिर्विक्षिपति,तैः प्रदेशैर्यदनोदरादिरन्माणि कर्णस्कन्धाधन्तरालानि चापूर्यायामतो विस्तरतश्च देहमानं क्षेत्रमभिव्याप्य वर्तते, तथाभूतश्च प्रभूतान् कषायकर्मपुद्गलान् । परिशातयति, एवं मरणसमुद्घातगत आयुःकर्मपुद्गलान् परिशातयति, नवरं मरणसमुद्घातगतो विक्षिप्तखप्रदेशो IS पदनोदरादिरन्त्राणि स्कन्धाद्यपान्तरालानि चापूर्य विष्कम्भवाहल्याभ्यां खशरीरप्रमाणमायामतः खशरीरातिरेकतो जघन्यतोऽनुलासयेयभागं उत्कर्षतोऽसत्येयानि योजनान्येकदिशि क्षेत्रमभिव्याप्य वर्तत इति वक्तव्यं, वैक्रियसमुद्धा-18 तगतः पुनर्जीवः खप्रदेशान् शरीरादहिनिष्काश्य शरीरविष्कम्भवाहल्यमानमायामतः सङ्खयेययोजनप्रमाणं दण्ड निसृजति, निसृज्य च यथास्थूलान् वैक्रियशरीरनामकर्मपुद्गलान् प्राग्वत् शातयति, तथा चोक्तम्-'घेउषियसमुग्घाएणं समोहणइ संमोहणिता संखिज्जाई जोयणाई दंडं निसिरह, निसिरित्ता अहाबायरे पुग्गले परिसाडेई'इति, एवं तैजसाहारसमुद्घातावपि भावनीयौ, नवरं तेजससमुद्घातस्तेजोलेश्याविनिर्गमकाले तैजसनामकर्मपुद्गलपरिशातहेतुः, आहार-11 कसमुद्घातगतस्त्वाहारशरीरनामकर्मपुद्गलान् परिशातयतीति, केवलिसमुद्घातगतः केवली सदसवेद्यादिकमपुद्ग-100 लपरिशातं करोति, स च यथा कुरुते तथा विनेयजनानुग्रहाय भाव्यते इति, केवलिसमुद्घातोऽष्टसामयिकः, तं च || कुर्वन् केवली प्रथमसमये बाहल्यतः खशरीरप्रमाणमूर्ध्वमधश्च लोकान्तपर्यन्तं आत्मप्रदेशानां दण्डमारचयति, द्विती-18] यसमये पूर्वापरं दक्षिणोत्तरं वा कपाटं तृतीये मन्धानं चतुर्थेऽवकाशान्तराणां पूरणं पञ्चमेऽवकाशान्तराणां संहार दीप अनुक्रम [५९९] donesiranyara ~226~ Page #227 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (१५) “प्रज्ञापना” – उपांगसूत्र-४ (मूलं+वृत्ति:) पदं [३६], -------------- उद्देशक: -,------------- दारं --------------- मूलं [३३०...] + गाथा पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र-[१५]उपांगसूत्र-[४] "प्रज्ञापना" मूलं एवं मलयगिरि-प्रणीता वृत्ति: प्रत समुन सूत्रांक [३३०...] गाथा प्रज्ञापना पष्टे मथः सप्तमे कपाटस्य अष्टमे खशरीरस्थो भवति, वक्ष्यति च-"पढमे समये दंडं करेई, बीए कवाडं करेइ"॥२५ या मल- इत्यादि, तत्र दण्डसमयात प्राक् या पल्योपमासङ्ख्येयभागमात्रा वेदनीयनामगोत्राणां स्थितिरासीत् तस्या बुद्धया घातपदं यवृत्ती. असङ्येयभागाः क्रियन्ते, ततो दण्डसमये दण्डं कुर्वन् असङ्ख्ययान् भागान् हन्ति, एकोऽसक्यो भागोऽवतिष्ठते. सू. ३३० यश्च प्राकर्मत्रयस्यापि रसस्तस्याप्यनन्ता भागाः क्रियन्ते, ततस्तस्मिन् दण्डसमये असातवेदनीय१प्रथमवर्जसंस्थान ६ ॥५६॥ ISसंहननपश्चका ११ प्रशस्तवर्णादिचतुष्टयो १५ पघाता १६ प्रशस्तविहायोगति १७ दुःखर १८ दुर्भगा १९ स्थिरा पर्यायका २१ शभा २२ नादेया २३ यशः कीर्ति २४ नीचैर्गोत्ररूपाणां २५ पञ्चविंशतिप्रकृतीनामनन्तान भागान् हन्ति, एकोऽनन्तभागोऽवशिष्यते, तस्मिन्नेव च समये सातवेदनीय १ देवगति २ मनुष्यगति ३ देवांनुपूर्वी ४ मनुष्यानुपूर्वी ५ पञ्चेन्द्रियजाति ६ शरीरपञ्चको ११ पाङ्गत्रय १४ प्रथमसंस्थान १५ संहनन १६ प्रशस्तब र्णादिचतुष्टया २० गुरुलघु २१ पराघातो२२च्छास १३ प्रशस्तविहायोगति २४ त्रस २५ बादर २६ पर्याप्त २७ प्रत्ये-18 कातपो २९ द्योत ३० स्थिर ३१ शुभ ३२ सुभग ३३ सुखरा ३४ देय ३५ यशःकीर्त्ति ३६ निर्माण ३७ तीर्थकरो|३७ चैर्गोत्ररूपाणा ३९ मेकोनचत्वारिंशतः प्रकृतीनामनुभागोऽप्रशस्तप्रकृत्यनुभागमध्यप्रवेशनेनोपहन्यते, समुद्घा ॥५६०॥ तमाहात्म्यमेतत् , तख चोद्धरितस्य स्थितेरसङ्ख्येयभागस्यानुभागस चानन्तभागस्य पुनर्यथाक्रमं असङ्खयेया अनन्ताश्च भागाः क्रियन्ते, ततो द्वितीये कपाटसमये स्थितेरसङ्ख्येयान् भागान् हन्ति, एकोऽवशिष्यते, अनुभागस्य चानन्तान् Sentence दीप अनुक्रम [५९९] ~227~ Page #228 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (१५) “प्रज्ञापना” – उपांगसूत्र-४ (मूलं+वृत्ति:) पदं [३६], -------------- उद्देशक: -,------------- दारं --------------- मूलं [३३०...] + गाथा पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र-[१५]उपांगसूत्र-[४] "प्रज्ञापना" मूलं एवं मलयगिरि-प्रणीता वृत्ति: प्रत सूत्रांक [३३०...] गाथा ANभागान् हन्ति एकं मुञ्चति, अत्राप्यप्रशस्तप्रकृत्यनुभागमध्यप्रवेशनेन प्रशस्तप्रकृत्यनुभागघातो द्रष्टव्यः, पुनरप्ये तत्समयेऽवशिष्टस्य स्थितेरसङ्ख्येयभागस्यानुभागस्य चानन्ततमभागस्य पुनर्बुद्ध्या यथाक्रममसङ्ख्येया अनन्ताश्च भागाः क्रियन्ते, ततस्तृतीये समये स्थितेरसल्ययान् भागान् हन्ति, एकं मुञ्चति, अनुभागस्य चानन्तान् भागान् हन्ति, एकमनन्तभागं मुञ्चति, अत्रापि प्रशस्तप्रकृत्यनुभागघातोप्रशस्तप्रकृत्यनुभागमध्यप्रवेशनेनावसेयः, ततः पुनरपि है तृतीयसमयावशिष्टस्य स्थितेरसङ्घयभागस्थानुभागस्य चानन्ततमभागस्य बुध्ध्या यथाक्रममसङ्ख्यया अनन्ताश्च भागाः क्रियन्ते, ततश्चतुर्थसमये स्थितेरसङ्ख्येयान् भागान् हन्ति, एकस्तिष्ठति, अनुभागस्याप्यनन्तान् भागान् हन्त्येकोऽव8 शिष्यते, प्रशस्तप्रकृत्यनुभागघातश्च पूर्ववदवसेयः, एवं च स्थितिघातादि कुर्वतश्चतुर्थसमये खप्रदेशापूरितसमस्त-18 लोकस्य भगवतः केवलिनो वेदनीयादिकमंत्रयस्थितिरायुषः सङ्घयेयगुणा जाता, अनुभागस्त्वद्याप्यनन्तगुणः, चतुथेसमयावशिष्टस्य च स्थितेरसङ्ख्ययभागस्थानुभागस्य चानन्ततमभागस्य भूयोऽपि बुद्धया यथाक्रमं सद्धयेया अनन्ताश्च भागाः क्रियन्ते, ततोऽवकाशान्तरसंहारसमये स्थितेः सङ्ख्ययभागान् हन्ति, एकं सङ्ख्येयभार्ग शेषीकरोति, अनुभागस्यानन्तान् भागान् हन्ति एकं मुञ्चति, एवमेतेषु पञ्चसु दण्डादिसमयेषु प्रत्येकं सामयिकं कण्डकमुत्कीर्ण,N समये २ स्थितिकण्डकानुभागकण्डकघातनात्, अतः परं पष्ठसमयादारभ्य स्थितिकण्डकमनुभागकण्डक चान्तमुहर्तेन कालेन विनाशयति, प्रयत्नमन्दीभावात् , षष्ठादिषु च समयेषु कण्डकस्य प्रतिसमयमेकैकं शकलं ताबदु Seeleeperateeketkese दीप अनुक्रम [५९९] ~228~ Page #229 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (१५) “प्रज्ञापना” – उपांगसूत्र-४ (मूलं+वृत्ति:) पदं [३६], -------------- उद्देशक: -,------------- दारं --------------- मूलं [३३०...] + गाथा पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र-[१५]उपांगसूत्र-[४] "प्रज्ञापना" मूलं एवं मलयगिरि-प्रणीता वृत्ति: प्रत प्रज्ञापनाया:मलयवृत्ती. ३६ समुघातपद सू.३३१ सूत्रांक [३३०...] गाथा ccceseseseseमरठeseces किरति यावदन्तर्मुहचरमसमये सकलमपि तत्कण्डकमुत्कीर्ण भवति, एवमान्तमौहर्तिकानि स्थितिकण्डकान्य- नुभागकण्डकानि च घातयन् तावद्वेदितव्यः यावत् सयोग्यवस्थाचरमसमयः, सर्वाण्यपि चामूनि स्थित्यनुभाग- कण्डकान्यसबेयान्यवगन्तव्यानीति कृतं प्रसनेन, प्रकृतं प्रस्तुमः । तत्र संग्रहणिगायोक्तमय स्पष्टयन् प्रथमतः समुद्-18 घातसयाविषयं प्रश्नसूत्रमाह कति गं भंते। समुपाया पं०१, गो० सत्त समुग्धाया पं०, तं०-वेदणासमुग्धाते १ कसायसम्मुग्धाते २ मारणंतियसमु० ३ वेउधियस०४ तेयास०५ आहारस०६ केवलिसमुग्घाते ७॥ वेदणासमुग्धाए णं भंते! कतिसमइए पं०१, गो.! असंखेजसमइए अंतोमुचिते पं०, एवं जाव आहारसमुग्धाते, केवलिसमुग्धाए णं भंते ! कतिसमइए पं०१, मो०! अट्ठसमइए पं० । नेरइयाणं भंते ! कति सामुग्धाया पं०१, मो० चत्तारि समुग्धाया पं०, तं०-वेदणासमुग्याए कसायस. मारणंतियस बेउवियस०, असुरकमाराणं मंते ! कति समुग्धाया पं०१, गो01 पंच समुग्धाया पं०, तं०-वेदणास कसायस. मारणंतियसबेउबियस० तेयास मुग्याए, एवं जाव चणियकुमाराणं, पुढचिकाइयाण भंते । कति समुग्धाया पं०, गो०1 तिष्णि समुपाया पं०, तं०-वेदणास कसायस० मारणंतियस०, एवं जाव चउरिदियाण, नवरं वाउकाइयाणं चत्वारि समुपाया पं०, तं०-वेदणास कसायस. मारणंतियस वेउवियस०, पचिंदियतिरिक्खजोणियाणं जाव बेमाणियाणं भंते ! कति समग्घाया पं०१, गो०ी पंच समुपाया पं०, ०-वेयणास कसायस. मारणंतियस० दीप अनुक्रम [५९९] ॥५६॥ SARERainintamanna For P OW ~229~ Page #230 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (१५) “प्रज्ञापना” – उपांगसूत्र-४ (मूलं+वृत्ति:) पदं [३६], -------------- उद्देशक: [-], ------------- दारं --------------- मूलं [३३१] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र-[१५]उपांगसूत्र-[४] "प्रज्ञापना" मूलं एवं मलयगिरि-प्रणीता वृत्ति: प्रत सूत्रांक [३३१] दीप अनुक्रम [६००] बेउशियस० तेयास, नवरं मणूसाणं सत्तविहे सम्बग्घाए पं०, तं०-वेदणास कसायस० मारणंतियस० वेउ० तेया० । आहार० केवलिसमुग्धाते (सूत्रं ३३१) 'का 'मित्यादि, कति-किंपरिमाणा णमिति वाक्यलकारे 'भदन्ते'ति भगवतो वर्द्धमानखामिन भामत्रणं, IS भदन्तत्वं च भगवतः परमकल्याणयोगित्वात् , यदिवा भवान्तेति द्रष्टव्यं, सकलसंसारपर्यन्तवर्त्तित्वात् , अथवा || भयान्त ! इहपरलोकादिभेदभिन्नसप्तप्रकारभयविनाशकत्वात् , समुद्घाताः-उक्तशब्दार्थाः प्रज्ञताः, भगवानाइISI'गोयमे सादि, गौतम! सप्त समुद्घाताः प्रज्ञप्ताः, तद्यथा-वेदनासमुद्घात इत्यादि, वेदनायाः समुद्घातो बेदना-19॥ समुद्घातः, एवं यावदाहारकसमुद्घात इति, 'केवलिसमुद्धात' इति केवलिनः समुद्घातः केवलिसमुद्घातः सम्प्रति कः समुद्घातः कियन्तं कालं यावद्भवतीत्येतन्निरूपणार्थमाह-वेयणे'त्यादि, सुगम, नवरं 'जा'त्यादि, एवमुक्तप्रकारेणाभिलापेनान्तर्मुहूर्तप्रमाणतया च समुद्घा ताः क्रमेण तावद्वाघ्याः यावदाहारकसमुद्रातः, एते परप्याथा आन्तर्मुर्तिकाः, केवलिसमुद्घातस्त्वष्टसामयिका, सचानन्तरमेव भावितः, एतानेष समुषातान् चतुर्विंशतिदण्डकक्रमेण चिचिन्तयिषुराह-'नेरयाण'मित्यादि, नैरयिकाणामाघाश्चत्वारः, तेषां तेजोलब्ध्याहाकारकलब्धिकेवलित्वाभावतः शेषसमुदूधातत्रयासम्भवात्, असुरकुमारादीनां दशानामपि भवनपतीनां तेजोलेश्यालपाधिभावात् आघाः पञ्च समुद्घाताः, पृथिवीकायिकाकायिकतैजस्कायिकवनस्पतिकायिकद्वित्रिचतुरिन्द्रिया-M ~230 Page #231 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (१५) प्रत सूत्रांक [३३१] दीप अनुक्रम [६००] “प्रज्ञापना” – उपांगसूत्र - ४ ( मूलं + वृत्तिः ) - मूलं [ ३३१] पदं [३६], --------------उद्देशक: [-1, -------------- दारं [-], पूज्य आगमोद्धारकश्री संशोधितः मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र [१५],उपांगसूत्र-[४] "प्रज्ञापना" मूलं एवं मलयगिरि-प्रणीता वृत्तिः प्रज्ञापमाया मल य० वृत्ती. ॥५६२॥ णामाद्यास्त्रयः, तेषां वैक्रियादिलन्ध्यभावतः उत्तरेषां चतुर्णामपि समुद्घातानामसम्भवात् वायुकायिकानामायाश्चत्वारस्तेषां वैक्रियलब्धिसम्भवेन वैक्रियसमुद्घातस्थापि सम्भवात् पञ्चेन्द्रियतिर्यग्योनिकानामाद्याः पञ्च, केषांचित्तेषां तेजोलब्धेरपि भावात्, मनुष्याणां सप्त, मनुष्येषु सर्वसम्भवात् व्यन्तरज्योतिष्कवैमानिकानामाद्याः पञ्च, वैक्रियतेजोलब्धिभावाद, उत्तरौ तु द्वौ न सम्भवतः, आहारकलब्धिकेवलित्वायोगात् ॥ सम्प्रति चतुर्विंशतिदण्डकमधिकृत्य एकैकस्य जीवस्य कति वेदनादयः समुद्घाता अतीताः कति भाविन इति चिचिन्तविषुराह - ------ एगमेगस णं भंते! नेरइयस्स केवइया वेदणासमुग्धाया अतीता-१, गो०! अनंता, केवइया पुरेक्खडा ?, गो० ! कस्सह अस्थि कस्सर नरिथ, जस्सत्थि तस्स जहणेणं एको वा दो वा तिष्णि वा उकोसेणं संखेजा वा असंखेजा वा अनंता वा, एवमरकुमारस्सवि निरंतरं जाव वैमाणियस्स, एवं जाव तेयगसमुग्धाते, एवमेते पंच चडवीसा दंडगा । एगमेगस्स भंते! नेरइयस्स केवइया आहारसमुग्धाया अतीता ?, कस्सइ अस्थि कस्सर नस्थि, जस्स अत्थि तस्स जह० एको वा दो वा उको तिण्णि, केवइया पुरेक्खडा ?, कस्सइ अस्थि कस्सइ नत्थि, जस्सत्थि जह० एको वा दो वा तिष्णि वा उको० चत्तारि एवं निरंतरं जाव वैमाणियस्स, नवरं मणूसस्स अतीतावि पुरेक्खडावि जहा नेरइयस्स पुरेक्खडा, एगमेगस्स णं मंते! नेरइयस्स केवतिया केवलिसमुग्धाया अतीता ?, गो० ! नत्थि, केवड्या पुरेक्खडा ?, गो० ! कस्सह For Parts Only ~ 231~ ३६ समुद्घातपदं सू. ३३१३३२ ॥५६२॥ Page #232 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (१५) “प्रज्ञापना" - उपांगसूत्र-४ (मूलं+वृत्ति:) पदं [३६], --------------- उद्देशक: [-], ------------- दारं [-], -------------- मूलं [३३२] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र-[१५]उपांगसूत्र-[४] "प्रज्ञापना" मूलं एवं मलयगिरि-प्रणीता वृत्ति: प्रत सूत्रांक [३३२] टररररseeeeeserceae अस्थि कस्सइ नत्थि, जस्सस्थि एको, एवं जाव वेमाणियस्स, नवरं मणसस्स अतीता कस्सइ अस्थि कस्सइ नत्थि, जस्सस्थि एको, एवं पुरेक्खडावि (सूत्रं ३३२) 'एगमेगस्स णं भंते।' इत्यादि, एकैकस्य सूत्रे मकारोऽलाक्षणिकः, भदन्त ! नैरयिकस्य सकलमतीतं कालमधिकृत्य 'केवइय'त्ति कियन्तो वेदनासमुधाता अतीता-अतिक्रान्ताः?, भगवानाह-गौतम! अनन्ताः, नारकादि स्थानानामनन्तशः प्रासत्वादे केकश्चि नारकादिस्थानप्राप्तिकाले प्रायोऽनेकशो वेदनासमुपातानां भावात्, एतष Mबाहुल्यापेक्षयोच्यते, बहवो हि जीवा अनन्तकालमसंव्यवहारराशेरुदृत्ता वर्तन्ते, ततस्तदपेक्षया एकेकस्य नेरयिक स्थानन्ता अतीता वेदनासमुपाता उपपद्यन्ते, ये तु स्तोककालमसंध्यवहारराशेपत्तासेषां यथासम्भवं सङ्ख्यया। असङ्ख्येया वा प्रतिपत्तव्याः, केवलं ते कतिपये इति न विवक्षिताः, केवइया पुरेक्सड'त्ति इदं सूत्रं पाठसूचामात्रं, सूत्रपाठस्त्वेवम्-'एगमेगस्स णं भंते ! नेरइयस्स केवइया वेयणासमुग्धाया पुरेक्खडा'? इति, सुगम, नवरं पुरेअग्रे कृताः-तत्परिणामप्राप्सियोग्यतया व्यवस्थापिताः, सामर्थ्यात् तत्कर्तृजीवेनेति गम्यते, पुरस्कृता-अनागतकालभाविन इति तात्पर्यार्थः, अत्र भगवानाह-कस्यापि सन्ति कस्यापि न सन्ति, यस्यापि सन्ति तस्यापि जघन्यत एको द्वौ वा त्रयो वा, उत्कर्षतः सङ्ख्यया वा असङ्ख्येया वा अनन्ता वा, इयमत्र भावना-यो नाम विवक्षितप्रश्नसमयानन्तरं बेदनासमुपातमन्तरेणैव नरकादुदृत्त्यानन्तरमनुष्यभवे वेदनासमुद्घातमप्राप्त एव सेत्स्यति ccaeeeeeeeeररला दीप अनुक्रम [६०१] ~232~ Page #233 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (१५) “प्रज्ञापना” – उपांगसूत्र-४ (मूलं+वृत्ति:) पदं [३६], -------------- उद्देशक: [-]------------- दारं [-], -------------- मूलं [३३२] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र-[१५]उपांगसूत्र-[४] "प्रज्ञापना" मूलं एवं मलयगिरि-प्रणीता वृत्ति: प्रत सूत्रांक [३३२] दीप अनुक्रम [६०१] प्रज्ञापना तस्य पुरतो वेदनासमुद्घात एकोऽपि नास्ति, यस्तु विवक्षितप्रश्नसमयानन्तरमायुःशेषे कियत्कालं नरकभवे स्थित्वा । ३६ समुया: मल- तदनन्तरं मनुष्यभवमागत्य सेत्स्यति तस्य एकादिसम्भवः, सङ्ख्यातकालसंसारावस्थायिनः सङ्ख्याता असङ्ख्यातकाल- द्घातपदं य० वृत्ती. संसारावस्थायिनोऽसयाताः अनन्तकालसंसारावस्थायिनोऽनन्ताः, 'एवं मित्यादि, एवं नैरयिकोक्तप्रकारेणासुरकु सू.३३२ मारस्थापि यावत् स्तनितकुमारख वाच्यं, ततश्चतुर्विंशतिदण्डकक्रमेण निरन्तरं तावद्वाच्यं यावद्वैमानिकस्य, किमुक्त। ॥५६॥ IN भवति?-सर्वेष्वपि असुरकुमारादिषु स्थानेषु अतीता बेदनासमुद्घाता अनन्ता वाच्याः, पुरस्कृतास्तु कस्यापि सन्ति । कस्यापि न सन्ति, यस्यापि सन्ति तस्यापि जघन्यत एको द्वौ वा त्रयो वा उत्कर्षतः सङ्ख्या असङ्ख्यया अनन्ता वा इति वाच्याः, भावनापि पूर्वोक्तानुसारेण खयं परिभावनीया, एवं चतुर्विशतिदण्डकक्रमेण कषायसमुद्घातो मारणान्तिकसमुद्घातो वैक्रियसमुद्घातस्तैजससमुद्घातश्च प्रत्येकं, तत एव पञ्च चतुर्विंशतिदण्डकसूत्राणि भवन्ति, | तथा चाह-एवं जाव तेयगसमुग्धाए' इत्यादि, एवं वेदनासमुद्घातप्रकारेण शेषसमुद्घातेष्वपि प्रत्येकं तानद्वक्तव्यं । यावचैजससमुद्घातः, शेषं सुगमं, 'एगमेगस्स ण'मित्यादि, एकैकस्य भदन्त ! नैरयिकस्य पाश्चात्वं सकलमतीतं कालमपेक्ष्य कियन्त आहारकसमुद्घाता अतीताः१, भगवानाह-गौतम! कस्यापि 'अत्थि'त्ति अस्तीति निपातः | ॥५६॥ सर्वलिङ्गवचनो, यदाह शाकटायनन्यासकृत्-"मस्तीति निपातः सर्वलिङ्गवचनेवि"ति, ततोऽयमर्थः-कस्यापि अतीता माहारकसमुद्घाताः सन्ति कस्यापि न सन्ति, येन पूर्व मानुष्यं प्राप्य तथाविधसामन्यभावतश्चतुर्दशी ~233~ Page #234 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (१५) “प्रज्ञापना” – उपांगसूत्र-४ (मूलं+वृत्ति:) पदं [३६], -------------- उद्देशक: [-]------------- दारं [-], -------------- मूलं [३३२] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र-[१५]उपांगसूत्र-[४] "प्रज्ञापना" मूलं एवं मलयगिरि-प्रणीता वृत्ति: प्रत सूत्रांक [३३२] 222880000 पूर्वाणि नाधीतानि, चतुर्दशपूर्वाधिगमे वा आहारकलग्ध्यभावतः तथाषिधप्रयोजनाभावतोबा आहारकशरीरं ना कृतं तस्य न सन्तीति, यस्खापि सन्ति तस्यापि जघन्यतः एको वा द्वौ वा उत्कर्षतस्तु त्रयो, न तु चत्वारः, चतुःकृत्वः कृताहारकशरीरस्य नरकगमनाभावात्, आह च मूलटीकाकार:-"आहारसमुग्घाया उक्कोसेणं तिन्नि, तदुवरि नियमा नरगं न गच्छद जस्स चत्वारि भवन्ति" इति, पुरस्कृता अपि कस्यापि सन्ति कस्यापि न सन्ति, तत्र यो मानुष्यं प्राप्य तथाविधसामन्यभावतचतुर्दशपूर्वाधिगममाहारकसमुपातं चान्तरेण सेत्स्यति तस्य न सन्ति, शेषस्य तु यथासम्भवं जघन्यत एको द्वौ वा त्रयो वा उत्कर्षतश्चत्वारः, तत ऊर्ध्वमवश्यं गत्यन्तरासंक्रमेणाहारक-18 समुपातमन्तरेण च सिद्धिगमनभावात्, 'एच'मित्यादि, एवं नैरयिकोकेन प्रकारेण चतुर्विंशतिदण्डकक्रमेण निर-IS पान्तरं तावद् वाच्यं यावद्वैमानिकस सूत्र, नवरं मनुष्यस्थातीता अपि पुरस्कृता अपि यथा नेरयिकस्य पुरस्कृतास्तथा । वाच्याः, अतीता अपि चत्वारः पुरस्कृता अपि चत्वार उत्कर्पतो वाच्या इत्यर्थः, सूत्रपाठवम्-'एगमेगस्स गं मणूसस्स भंते ! केवइया आहारसमुग्धाया अतीता ?, गोयमा! कस्सइ अस्थि कस्सद नस्थि, जस्स अस्थि जहनेणं| एको वा दो वा तिन्नि वा उकोसेणं चचारि, केवइया पुरेक्खडा !, गोयमा! कस्सह अस्थि कस्सद नत्थि, जस्स अत्थि जहन्नेणं एको वा दो वा तिनि वा उकोसेणं चचारि' अत्र भावना-इह यश्चतुर्थवेलमाहारकशरीरं करोति स नियमात् तद्भव एव मुक्तिमासादयति, न गत्यन्तरं, कथमेतदवसीयते इति चेत्, उच्यते, सूत्रपौर्यापर्यपर्या दीप अनुक्रम [६०१] 0 SAREDuratinin For P OW ~234~ Page #235 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (१५) “प्रज्ञापना" - उपांगसूत्र-४ (मूलं+वृत्ति:) पदं [३६], -------------- उद्देशक: [-], ------------- दारं --------------- मूलं [३३२] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र-[१५]उपांगसूत्र-[४] "प्रज्ञापना" मूलं एवं मलयगिरि-प्रणीता वृत्ति: प्रत सू.३३२ सूत्रांक [३३२] लोचनात् , तथाहि-यदि चतुर्थवेलमप्याहारकशरीरं कृत्वा गत्यन्तरं संक्रामेत ततो नैरयिकादावन्यतरस्यां गतौ|३६ समु. प्रज्ञापनायाः मलउत्कर्षतश्चत्वारोऽप्याहारकस्य समुद्घाता उच्येरन्, न चोच्यन्ते, ततोऽवसीयते-चतुर्थवेलमाहारकशरीरं कृत्वा घातपदं यवृत्ती. नियमात् तद्भव एव मुक्तो भवति, न गत्यन्तरगामी, तत्र यः प्रागाहारकशरीरं कदाचनापि न कृतवान् तस्या तीत आहारकसमुद्घातो नास्ति, ततस्तदपेक्षयोक्तं 'कस्सइ नस्थिति, यस्यापि सन्ति सोऽपि यदि पूर्वमेकबारमा॥५६४॥ हारकशरीरं कृतवान् तस्यैकोऽतीत आहारकस्य समुद्घातः द्वौ वारौ कृतवतो द्वौ त्रीन् वारान् कृतवतस्त्रयो| यचतुर्थवेलमाहारकशरीरं कृत्वा आहारकसमुद्घाताचतुर्थात्प्रतिनिवृत्तो वर्त्तते न चाद्यापि मनुजभवं विजहाति । तस्य चत्वारः, पुरस्कृता अपि समुदूधाताः कस्यापि सन्ति कस्यापि न सन्ति, तत्र यश्चतुर्थवेलमाहारकशरीरं कृत्वा आहारकसमुद्घातात् प्रतिनिवृत्तो यदिवा पूर्वमकृताहारकशरीरोऽप्यथवा एकवारकृताहारकशरीरोऽपि यदिवा द्विकृत्वः कृताहारकशरीरोऽपि यदिवा विकृत्वः कृताहारकशरीरोऽपि तथाविधसामध्यभावात् उत्तरकालमाहारक-| ISIशरीरमकवेव मुक्तिमवाप्स्यति तस्य पुरस्कृता आहारकसमुद्घाता न सन्ति, यस्यापि सन्ति तस्यापि जघन्यत एको वा द्वौ वा प्रयो वा उत्कर्षतश्चत्वारः, तत्र एकादिसम्भवः पूर्वोक्तभावनानुसारेण खयं भावनीयः, यस्तु पूर्वकाल-IAusam मेकवारमपि आहारकशरीरं न कृतवान् अथ चोत्तरकालं तथाविधसामग्रीभावतो यावत्सम्भवमाहारकशरीरको तस्य चत्वारो न शेषस्य । सम्प्रति केवलिसमुद्घातविषयं दण्डकसूत्रमाह-'एगमेगस्स णमित्यादि, एकैकस्य दीप अनुक्रम [६०१] स्वररररररर RELIGuninternational Parelimstaram.org ~235~ Page #236 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम “प्रज्ञापना" - उपांगसूत्र-४ (मूलं+वृत्ति:) पदं [३६], -------------- उद्देशक: -,------------- दारं [-], -------------- मूलं [३३२] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र-[१५]उपांगसूत्र-[४] "प्रज्ञापना" मूलं एवं मलयगिरि-प्रणीता वृत्ति: प्रत सूत्रांक [३३२] भदन्त ! नैरयिकस्य निरवधिकमतीत कालमधिकृत्य कियन्तः केवलिसमुद्घाता अतीताः?, भगवानाह-'नत्यि'त्ति नास्त्यतीत एकोऽपि केवलिसमुद्घातः, केवलिसमुद्घातानन्तरं अन्तर्मुहूर्तेन नियमतो जीवाः परमपदमावते, ततो यद्यभविष्यत्केवलिसमुद्घातस्तहि नरकमेव नागमिष्यद्, अथ च सम्प्रति नरकगामिनो वर्त्तन्ते तस्मानास्त्येकस्याप्यतीतः केवलिसमुद्घातः, 'केवइया पुरेक्खड'त्ति कियन्तः पुरस्कृताः केवलिसमुद्घाता इति प्रश्नः, भगवानाह'गोतमा! कस्सइ अस्थि कस्सइ नत्यि'त्ति, इह केवलिसमुद्घात एकस्य प्राणिन आकालमेक एव भवति, न द्वित्राः, ततोऽस्तीति निपातोऽत्र एकवचनान्तो वेदितव्यः, ततश्चायमर्थः कस्यापि केवलिसमुद्घातः पुरस्कृतोऽस्ति, यो दीर्घतरेणापि कालेन मुक्तिपदप्रात्ययसरे विषमस्थितिकर्मा इति, कस्यापि नास्ति, यो मुक्तिपदमवाप्तुमयोग्यो योग्यो | वा केवलिसमुद्घातमन्तरेणैव मुक्तिपदं गन्ता, तथा च वक्ष्यति-"अगंतूण समुग्धायमणंता केवलीजिणा । जरमरणविष्पमुका, सिद्धिं वरगई गया ॥१॥" [अगत्वा समुद्घातमनन्ताः केवलिनो जिनाः । जरामरणविप्रमुक्ताः सिद्धिं वरगतिं गताः॥१॥] इति, इह अस्तीति निपातः सर्वलिङ्गवचन इत्यविदितसिद्धान्तस्य बहुत्वाशङ्कापि कस्यचित् स्यात् ततस्तदपनोदार्थमाह-'जस्स अत्थि' एको यस्यास्ति पुरस्कृतः केवलिसमुद्रातस्तस्य एको, भूयः संसाराभावात्, ‘एवं जाव वेमाणियस्स'त्ति एवं-नैरयिकगताभिलापप्रकारेण चतुर्विशतिदण्डकक्रममनुसृत्य ताबद्ध वक्तव्यं यावद्वैमानिकस्य सूत्रं, तच्चेदम्-'एगमेगस्स णं भंते ! वेमाणियस्स केवइया केवलिसमुग्धाया अतीता ?, दीप अनुक्रम [६०१] Reserseseseseseseseesesese ~236~ Page #237 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (१५) “प्रज्ञापना" - उपांगसूत्र-४ (मूलं+वृत्ति:) पदं [३६], --------------- उद्देशक: [-], ------------- दारं [-], -------------- मूलं [३३२] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र-[१५]उपांगसूत्र-[४] "प्रज्ञापना" मूलं एवं मलयगिरि-प्रणीता वृत्ति: प्रत पातपदं सू.१३२ सूत्रांक [३३२] दीप अनुक्रम [६०१] प्रज्ञापना-18|गोयमा! नत्थि, केवइया पुरेक्खडा ?, गोयमा! कस्सइ अत्थि कस्सइ नत्यि, जस्सत्थि एको' इति, तत्रैव विशेया: मल- पमाह-'नवर'मिस्यादि, नवरमयं विशेषः-मनुष्यस्य केवलिसमुद्घातस्य चिन्तायामतीतः कस्याप्यस्ति कस्यापि। यवृत्ती. नास्तीति वक्तव्यः, तत्र यः केवलिसमुद्घातात् प्रतिनिवृत्तो वर्तते न चाद्यापि मुक्तिपदमवानोति तस्यास्त्यतीतः ॥५१॥ केवलिसमुपातः, ते च सर्वसञ्जयया उत्कर्षपदे शतपृथक्त्वप्रमाणा वेदितव्याः, कस्यापि नास्ति अतीतः केवलिसमुद्धातो, यो न समुदूघातं गतवान् , ते च सर्वसङ्ख्यया असोया द्रष्टव्याः, शतपृथक्त्वव्यतिरेकेणान्येषां सर्वेषामप्यसम्प्राप्तकेवलिसमुपातत्वात् , अत्राप्यस्तीति निपातस्य सर्वलिङ्गवचनत्वात् , 'कस्सइ अस्थि कस्सइ नत्थिा इत्युक्ती बहुत्वाशका स्यात् ततस्तदन्यवच्छेदार्थमाह-यस्य मनुष्यस्वातीतः केवलिसमुद्घातस्तस्य नियमादेको न द्वित्राः, एकेनैव समुद्घातेन प्रायः समस्तघातिकर्मणां निर्मूलकाषंकषितत्वात् , 'एवं पुरेक्खडाविति एवं भतीतगतेन प्रकारेण पुरस्कृता अपि केवलिसमुद्घाता वाच्याः, ते चैवम्-'कस्सइ अस्थि कस्सइ नत्थि, जस्सस्थि एक्को इति, अत्र भावना पूर्वोक्तानुसारेण खयं भावनीया ॥ तदेवमतीतमनागतं च कालमधिकृत्य एकैकस्य नैरयिकादेर्वेदनादिसमुद्घातचिन्ता कृता, सम्प्रति नैरयिकादेः प्रत्येकं समुदायरूपस्य तचिन्तां चिकीर्घराहनेरहयाणं भंते ! केवइया वेदणासमुग्धाया अतीता', गो०! अणंता, केवइया पुरेक्खडा, गो0 अणंता, एवं जाव बेमाणियाणं, एवं जाव तेयगसमग्याए, एवं एतेवि पंच चउधीसदंडगा, नेरइयाणं ! भंते ! केवइया माहारगसमग्माया ५६५|| SARERainintenmarana ~237~ Page #238 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (१५) “प्रज्ञापना" - उपांगसूत्र-४ (मूलं+वृत्ति:) पदं [३६], -------------- उद्देशक: -, ------------- दारं ], -------------- मूलं [३३२-R] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र-[१५]उपांगसूत्र-[४] "प्रज्ञापना" मूलं एवं मलयगिरि-प्रणीता वृत्ति: प्रत सूत्रांक [३३२R] 82892222200 Recease अतीता, गो०! असंखेज्जा, केवइया पु०, गो! असंखेजा, एवं जाव चेमाणियाणं, नवरं वणस्सइकाइयाण मसाण य इमं णाणत-वणस्सइकाइयाणं भंते! केवड्या आहारसमुग्धाया अईया ?, गो०! अणंता, मणसाणं भने। केवइया आहारसमुग्धाया अईया , गो.! सिय संखेजा सिय असं०, एवं पुरेक्खडावि। नेरइयाणं भंते ! केवइया केवलिसमुग्घाया अतीता?, गोणस्थि, केवइया पुरेक्खडा, गो० असंखेजा, एवं जाव बेमाणियाणं, नवरं बणस्सइमसेसु इम नाण-वणस्सइकाइयाणं भंते! केवइया केवलिसमुग्धाया अतीता, गो० णत्थि, केवइया पुरे०१, गो! अणंता, मणूसाणं भंते । केवइया फेवलिस अतीता, गो! सिय अस्थि सिय नत्थि, जइ अत्थि जद्दण्णेणं एको वा दो वा तिणि वा, उकोसेणं सतपुहुतं, केवति. पुरेक्खडा, सिय संखेजा सिय असं० (सूत्रं ३३२) . 'नेरइयाण'मित्यादि, नैरयिकाणां विवक्षितप्रश्नसमयभाविनां सर्वेषां समुदायेन भदन्त ! कियन्तो वेदनासमुद्घाता अतीताः, भगवानाह-गौतम! अनन्ताः, बहनामनन्तकालसंव्यवहारराशेरुदत्तत्वात्, कियन्तः पुरस्कृताः, अत्रापि प्रश्नसूत्रपाठः परिपूर्ण एवं द्रष्टव्यः-'नेरइयाणं भंते! केवइया वेयणासमुग्घाया पुरेक्खडा' इति, भगवानाह-गौतम। अनन्ताः, बहूनामनन्तकालभाविसंसारावस्थानभावात् , एवं चतुर्विशतिदण्डकक्रमेण तावद् वक्तव्यं ।। याबढमानिकानां, यथा च वेदनासमुदपातश्चविंशतिदण्डकक्रमेण चिन्तितः तथा कषायमरणवे क्रियतेजस-1 समुद्राता अपि चिन्तनीयाः, तथा चाह-एवं-जाव तेथगसमुग्धाए' एवं च सति एतान्यपि बहुत्वविषयाणि पञ्च दीप अनुक्रम [६०२] म.९५ PRO मूल-संपादने अत्र सूत्र-क्रमांकने मुद्रण-दोषात् (सूत्रं 332) इति (सूत्रं ३३२)' क्रम द्विवारान् मुद्रितं ~238~ Page #239 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (१५) “प्रज्ञापना" - उपांगसूत्र-४ (मूलं+वृत्ति:) पदं [३६], -------------- उद्देशक: [-], ------------- दारं [-], -------------- मूलं [३३२-R] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र-[१५]उपांगसूत्र-[४] "प्रज्ञापना" मूलं एवं मलयगिरि-प्रणीता वृत्ति: प्रत सूत्रांक [३३२R] दीप अनुक्रम [६०२] चतुर्विंशतिदण्डकसूत्राणि भवन्ति, एतदेवाह-'एवमेएवि व पंच चउच्चीसदंडगा' इति, आहारकसमुद्घात- ३६ समुया मल- चिन्तां कुर्वन्नाह-'नेरइयाण मित्यादि, अत्र प्रश्नसूत्रं सुगम, भगवानाह-गौतम! असङ्ख्येयाः, इयमत्र भावना- घातपदे यवृत्ती. इह नैरयिकाः सर्वदाऽपि प्रश्नसमयभाविनः सर्वसङ्ख्ययाऽप्यसयेयाः, तेषामपि मध्ये कतिपयाः सङ्ख्यातीताः कृतपूर्वा- सामान्ये |हारकसमुद्घातास्ततोऽसङ्ख्येया एव तेषामतीताहारसमुद्घाता घटन्ते, नानन्ता नापि सङ्ख्येयाः, एवं पुरस्कृता नातीताः ॥५६६॥ अपि भावनीयाः, एवं चतुर्विशतिदण्डकक्रमेण ताबद्वाच्यं यावद्वैमानिकानां, आह च-'एवं जाव वेमाणियाणं अत्रैव यो विशेषस्तं दिदर्शयिषुराह-'नवर मित्यादि, नवरं वनस्पतिकायिकचिन्तायां मनुष्यचिन्तायां च नैरयिकापे ३३२ क्षया नानात्वमबसेयं, तदेव नानात्वमाह-वणप्फइकाइयाण'मित्यादि,अत्र प्रश्नसूत्रं सुगम,भगवानाह-गौतम! अन-IN न्ताः, अनन्तानामधिगतचतुर्दशपूर्वाणां कृताहारकसमुद्घातानां प्रमादवशतः उपचितसंसाराणां वनस्पतिषु भावात्, MI पुरस्कृता अनन्ताः,अनन्तानां वनस्पतिकायादुदत्य चतुदेशपूर्वाधिगमपुरस्सरं कृताहारकसमुद्घातानां भाविसिद्धिगम-IM नभावात् , मणुस्साणं भंते ! इत्यादि,अत्रापि प्रश्नसूत्रं प्रतीतं,भगवानाह-गौतम! स्यादिति निपातोऽनेकान्तद्योती, ततोऽयमर्थः-कदाचित् सङ्ख्ययाः कदाचिदसङ्ख्ययाः, कथमिति चेत्, उच्यते, इह सम्मूछिमगर्भव्युत्क्रान्तसमुदाय-19॥५६॥ चिन्तायां उत्कृष्टपदे मनुष्या अङ्गुलमात्रक्षेत्रे यावान् प्रदेशराशिस्तस्य यत्प्रथमं वर्गमूलं तत् तृतीयवर्गमूलेन गुणितं सत् यावत्प्रमाणं भवति एतावत्प्रदेशनमाणानि खण्डानि धनीकृतस्य लोकस्य एकप्रादेशिक्या श्रेणी यावन्ति भवन्ति सरररर ~239~ Page #240 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (१५) प्रत सूत्रांक [३३२R] दीप अनुक्रम [६०२] - • उपांगसूत्र - ४ ( मूलं + वृत्ति:) “प्रज्ञापना” पदं [३६], ------------उद्देशक: [-], ------ , दारं [-], -------------- • मूलं [ ३३२-R] पूज्य आगमोद्धारकश्री संशोधितः मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र [१५],उपांगसूत्र-[४] "प्रज्ञापना" मूलं एवं मलयगिरि-प्रणीता वृत्तिः एतावत्प्रमाणा एकहीनाः, ते चातीव शेषनारकादिजीवराश्यपेक्षया स्तोकाः, तत्रापि ये पूर्वभवेषु कृताहारकशरीरास्ते कतिपयाः, ते च कदाचित् विवक्षितप्रश्नसमये सङ्ख्येयाः कदाचिदसत्येयाः, तत उक्तम्- 'सिय संखेजा सिय असंखेज्जा' इति, अनागतेऽपि काले विवक्षितप्रश्नसमय भाविनां मध्ये कतिसङ्ख्या एवाहारकशरीरमारप्स्यन्ति तेऽपि कदाचित् सङ्ख्येयाः कदाचिदसङ्ख्येयाः, तत आह- 'एवं पुरेक्खडावित्ति एवं अतीतगतेन प्रकारेण वनस्पतिकायिकानां मनुष्याणां च पुरस्कृता अपि आहारकसमुद्घाता वेदितव्याः, ते चैवम्- 'बणप्फइकाइयाणं भंते! केवइया आहारगसमुग्वाया पुरेक्खडा ?, गो० ! अयंता, मणुस्साणं भंते ! केवइया आहारगसमुग्धाया पुरेक्खडा १, गो० ! सिय संखेज्जा सिय असंखेज्जा' इति, केवलिसमुद्घातविषयं प्रश्नसूत्रमाह- 'नेरइयाणं भंते ' इत्यादि सुगमं, भगवानाह - गौतम । न सन्ति केचनातीता नैरयिकाणां केवलिसमुद्घाताः कृतकेवलिसमुद्घातानां नारका दिगमनासम्भवात्, कियन्तः पुरस्कृता इति प्रश्नः, भगवानाह - गौतम ! असझयेयाः, सर्वदा विवक्षितप्रश्चसमयभाविनां मध्येऽसङ्ख्यातानां भाविकेवलिसमुधातत्वात् तथा केवलवेदसोपलब्धेः एवं चतुर्विंशतिदण्डकक्रमेण निरन्तरं तावद् वाच्यं यावद् वैमानिकानां सूत्रं, तथा चाह-' एवं जाव वेमाणियाणं' अत्रैव विशेषमाह – 'नवर' मित्यादि, नवरं वनस्पतिकायिकेषु मनुष्येषु चेदं वक्ष्यमाणलक्षणं नानात्वं, तदेवाह 'वणप्फइकाइयाण' मित्यादि, अत्र प्रश्नसूत्रं सुप्रतीतं, उत्तरसूत्रे निर्वचनं - अनन्ताः, अनन्तानां भाविकेवलिसमुदघातानां तत्र भावात्, 'मणुस्साण' मित्यादि, अत्रापि प्रश्नसूत्रं सुगमं, भगवानाह - For Parts Only ~ 240 ~ 2১৩,১0: Page #241 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (१५) प्रत सूत्रांक [३३२R] दीप अनुक्रम [६०२] “प्रज्ञापना” – उपांगसूत्र - ४ ( मूलं + वृत्तिः ) पदं [३६], ------------उद्देशक: [-], ------ , दारं [-], [-------------- • मूलं [ ३३२-R] पूज्य आगमोद्धारकश्री संशोधितः मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र [१५],उपांगसूत्र-[४] "प्रज्ञापना" मूलं एवं मलयगिरि-प्रणीता वृत्तिः प्रज्ञापनाया मल य० वृत्ती. ॥५६७॥ Education T गौतम ! स्यात् सन्ति स्वान्न सन्ति, किमुक्तं भवति ? - यदा प्रश्नसमये समुद्घातान्निवृत्ताः प्राप्यन्ते तदाः सन्ति, शेषकालं न सन्ति तत्र 'जइ अस्थि'त्ति यदि प्रश्नसमये कृतकेवलिसमुद्घाता मनुष्यत्वमनुभवन्तः प्राप्यन्ते तदा जघन्यत एको द्वौ त्रयो वा उत्कर्षतः शतपृथक्त्वं एतावतामेककालमुत्कृष्टपदे केवलिनां केवलिसमुद्घातासा- १) स्वपरस्थाने वेदना दनात् 'केवइया पुरेक्खड 'ति कियन्तो मनुष्याणां केवलिसमुद्घाताः पुरस्कृताः १, भगवानाह - स्यात् सङ्ख्याः स्यादसङ्ख्येया, मनुष्या हि सम्मूच्छिमा गर्भव्युत्क्रान्ताश्च सर्वसमुदिता उत्कृष्टपदे प्रागुक्तप्रमाणास्तत्रापि विवक्षितप्रश्नसमयभाविनां मध्ये कदाचित्केवलिसमुद्घाताः सङ्ख्येयाः, बहूनामभव्यानां भावात्, कदाचिदसङ्गमेयाः, बहूनां भाविकेवलिसमुद्घातानां भावात् । सम्प्रति एकैकस्य नैरयिकत्वादिभावेषु वर्त्तमानस्य प्रत्येकं कति वेदनासमुद्घाता अतीताः कति भाविन इति निरूपयितुकाम आइ एगमेगस्स णं भंते 1 नेरइयस्स नेरइयत्ते केवइया वेदणास० अतीता १, गो० ! अनंता, केवइया पुरेक्खडा ?, गो० ! कस्सइ अस्थि कस्सह नत्थि, जस्स अस्थि जह० एको वा दो वा तिष्णि वा, उकोसेणं संखेजा वा असंखेज्जा वा अनंता चा, एवं असुरकुमारते जाव वेमाणियते । एगमेगस्स णं भंते ! असुरकुमारस्स नेरइयत्ते केवइया वेदणासमुग्धाया अतीता ?, गो० ! अता या पु० 1, गो० ! कस्सद अस्थि कस्सति नत्थि, जस्सत्थि तस्स सिय सं० सिय अ० सिय अनंता; एगमेगस्स णं भंते! असुरकुमारस्स असुरकुमारते केवइया वेदणासमुग्धाया अतीता १, गो० ! अनंता, केवइया पु० १, For Parts Only ~ 241~ २६ समु द्यातपदं समु. सू. ३३३ ॥५६७॥ nirror Page #242 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (१५) “प्रज्ञापना” – उपांगसूत्र-४ (मूलं+वृत्ति:) पदं [३६], -------------- उद्देशक: [-], ------------- दारं -1, -------------- मूलं [३३३] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र-[१५]उपांगसूत्र-[४] "प्रज्ञापना" मूलं एवं मलयगिरि-प्रणीता वृत्ति: प्रत सूत्रांक [३३३] यो ! कस्सइ अस्थि कस्सइ नत्थि, जस्सत्थि जहएको वा दो वा तिणि वा उ० संखे० असंखे० अर्णता पाएवं नागकुमारचेवि जाव येमाणियचे, एवं जहा०वेयणासमुग्धातेणं असुरकुमारे नेरइयादिवेमाणियपज्जवसाणेसु भणितो तहा नागकुमारादिया अवसेसेसु सहाणेसु परहाणेसु भाणितवा जाव वेमाणियस्स वेमाणियचे, एवमेते चउबीसा चउडीसं दंडगा भवंति । (सूत्रं ३३३) । 'एगमेगस्स णमित्यादि, एकैकस्य भदन्त । नैरयिकस्य सकलमतीतं कालमषधीकृत्य तदा तदा नैरपिकत्वे वृत्तस्य सतः सर्वसङ्ख्यया कियन्तः वेदनासमुद्घाता अतीता, भगवानाह-गौतम! अनन्ताः, नरकस्थानस्थानन्तशः प्रासत्वादेककस्मिंश्च नरकभवे जघन्यपदेऽपि सङ्ख्येयानां वेदनासमुघातानां भावात् , 'केवइया पुरेक्खड'त्ति कियन्तो भदन्त ! एककस्य नरयिकस्थासंसारमोक्षमनागतं कालमवधीकृत्य नैरयिकत्वे भाविनः सतः सर्वेसयया पुरस्कृता वेदनासमुद्घाताः, भगवानाह-गौतम! कस्सइ अत्थि'इत्यादि, तत्र य आसन्नमृत्युर्वेदनासमुदधातमप्राप्यान्तिकमरणेन नरकादुनृत्य सेत्स्यति तस्य नास्ति नैरयिकत्वे भावी एकोऽपि पुरस्कृतो वेदनासमुद्घातः, शेषस्य त.सन्ति, तस्यापि जघन्यत एको द्वौ वा त्रयो वा, एतच्च क्षीणशेषायुषां तद्भवजानामनन्तरं सेत्स्यतां द्रष्टव्यं, न भूयो नरकेपूत्पत्स्यमानानां, भूयो नरकेषूत्पत्ती जघन्यपदेऽपि सोयानां प्राप्यमाणत्वात् , यदाह मूलटीकाकार:-श "नरकेषु जघन्यस्थितिपुत्पन्नस्य नियमतः सोया एव वेदनासमुद्घाता भवन्ति, वेदनासमुद्घातप्रचुरत्वाकारका-। दीप अनुक्रम [६०३] RELIGunintentiational ~242~ Page #243 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (१५) “प्रज्ञापना" - उपांगसूत्र-४ (मूलं+वृत्ति:) पदं [३६], -------------- उद्देशक: [-], ------------- दारं --------------- मूलं [३३३] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र-[१५]उपांगसूत्र-[४] "प्रज्ञापना" मूलं एवं मलयगिरि-प्रणीता वृत्ति: प्रत सूत्रांक [३३३]] दीप अनुक्रम [६०३] मज्ञापना णा"मिति, उत्कर्षतः संलयेया असङ्ख्येया वा अनन्ता वा, तत्र सकृत् नरकेषु जघन्यस्थितियूत्पत्स्यमानस सोया 18 २६ समुबा: मल- अनेकशो दीघस्थितिषु असकृद्वा उत्पत्स्वमानस्स असोयाः अनन्तशः उत्पत्स्वमानस्य अनन्ताः, 'एव'मित्यादि, एवं धातपदं य.वृत्ती . निरयिकगतेनाभिलापप्रकारेणासुरकुमारत्वेन तदनन्तरं चतुर्विंशतिदण्डक क्रमेण निरन्तरं तावद्वाच्यं यावद्वैमानिकत्वे, स्वपरस्था ने वेदना ॥१६८० तचैवम्-'एगमेगस्स णं भंते ! नेरइयस्स असुरकुमाराओ केवइया वेयणासमुग्घाया अतीता?, गो. अनंता, समु.सू. केवइया पुरेक्खडा?, गो ! कस्सइ अत्थि कस्सइ नत्थि, जस्स अस्थि जहन्नेणं एको वा दो वा तिन्नि वा उक्को सेणं सोज्जा वा असोजा वा अणंता वा' तत्रातीतसूत्रेऽनन्तशोऽसुरकुमारत्वस्य प्राप्सत्वादुपपद्यते तद्भावमापथानस्यानन्ता अतीता वेदनासमुदूधाताः, पुरस्कृतचिन्तायां योऽनन्तरभवेन नरकाददत्तो मानुष्यं प्राप्य सेत्स्यति प्रासो वा परम्परया सकृदसुरकुमारभवं न वेदनासमुद्घातं गमिष्यति तस्य नास्त्येकोऽपि पुरस्कृतो असुरकुमारत्वे वेदनासमुद्र घातः, यस्तु सकृदसुरकुमारत्वं प्राप्तः सन् सकृदेव वेदनासमुद्घातं गन्ता तस्य जघन्यत एको दो या त्रयो वा, शेषस्य | सङ्ख्ययान्वारान् असुरकुमारत्वं यास्यतः सायया असङ्ख्येयान् वारान् असोया अनन्तान वारान् अनन्ताः, एवं चतुर्वि|| शतिदण्डकक्रमेण नागकुमारत्वादिषु स्थानेषु निरन्तरं सूत्रपाठस्तावद वक्तन्यो याबद्वैमानिकत्वविषयं सूत्रं, 'एगमेगस्स | ॥५६८॥ ण' मित्यादि, एकेकस्य भदन्त। असुरकुमारस्य पूर्व नेरयिकत्वेन वृत्तस्य सतः सकलमतीतं कालमपेक्ष्य सर्वेसवयया कि-II || यन्तो वेदनासमुदधाता अतीताः१, भगवानाह-गौतम ! अनन्ता अतीताः,अनन्तशो नैरयिकत्वस्य प्राप्तत्वात् , एक eatestroeseseceaesesenterstiseaks ~243~ Page #244 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (१५) “प्रज्ञापना” – उपांगसूत्र-४ (मूलं+वृत्ति:) पदं [३६], -------------- उद्देशक: [-], ------------- दारं [-], -------------- मूलं [३३३] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र-[१५]उपांगसूत्र-[४] "प्रज्ञापना" मूलं एवं मलयगिरि-प्रणीता वृत्ति: प्रत सूत्रांक [३३३] कमिश्च नैरयिकस्य भवे जघन्यपदेऽपि सङ्ख्ययानां वेदनासमुद्घातानां भावात् , कियन्तः पुरस्कृताः, स्यात् सन्ति । स्थान सन्ति, कस्यचित्सन्ति कस्यचिन्न सन्ति इति भावः, अत्रापीयं भावना-योऽसुरकुमारभवादुत्तो न नरकं यास्यति किन्त्वनन्तरं परम्परया वा मनुजभवं प्राप्य सेत्स्यति तस्य नैरयिकत्वावस्थाभाविनः पुरस्कृता वेदनास-IN मुद्याता न सन्ति, नैरयिकत्वावस्थाया एवासम्भवात् , यस्तु तद्भवादूर्ध्वं पारम्पर्येण नरकं गमिष्यति तस्य सन्ति, तत्रापि कस्यचित्सङ्ख्येयाः कस्यचिदसङ्ख्ययाः कस्यचिदनन्ताः, तत्र यः सकृजघन्यस्थितिषु मध्ये समुत्पत्स्यते तस्य। जघन्यपदेऽपि सङ्घययाः, सर्वजघन्यस्थितावपि नरकेषु सङ्ख्येयानां वेदनासमुपातानां भावात् , वेदनाबहुलत्वान्नार-| Nकाणां, असकृद् जघन्यस्थितिषु दीर्घस्थितिषु सकृदसकृद्वा गमने असक्येयाः, अनन्तशो नरकगमने अनन्ताः, तथा । पाएकैकस्य भदन्त ! असुरकुमारस्यासुरकुमारत्वे स्थितस्य सतः सकलमतीतकालमधिकृत्य कियन्तो वेदनासमुदघाता। Mअतीताः१, भगवानाह-गौतम । अनन्ताः, पूर्वमप्यनन्तशस्तद्भावस्य प्राप्तत्वात्, प्रतिभवं च बेदनासमुदघातस्य प्रायो भावात् , पुरस्कृतचिन्तायां कस्यचित् सन्ति कस्यचिन्न सन्ति, यस्य प्रश्नसमयादूर्वमसुरकुमारत्वेऽपि वत्तेISमानस्य न भावी वेदनासमुद्घातो नापि तत उद्धृत्त्य भूयोऽप्यसुरकुमारत्वं प्राप्स्यति तस्य न सन्ति, यस्तु सकृत। प्राप्स्यति तस्य जघन्यपदे एको द्वौ वा त्रयो वा उत्कर्षतः सङ्ख्यया असहयया अनन्ता वा, सोयान् वारान् उत्पत्वमानस्य सङ्ख्येयाः असहयेयान् वारान् असाधेयाः अनन्तान् वारान् अनन्ताः, एवं चतुर्विंशतिदण्डकक्रमेण नाग 728202032002023200202 दीप अनुक्रम [६०३] ~244~ Page #245 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (१५) प्रत सूत्रांक [३३३] दीप अनुक्रम [६०३ ] “प्रज्ञापना” – उपांगसूत्र - ४ ( मूलं + वृत्तिः ) - मूलं [३३३] पदं [३६], --------------उद्देशक: [-1, -------------- दारं [-], पूज्य आगमोद्धारकश्री संशोधितः मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र [१५],उपांगसूत्र-[४] "प्रज्ञापना" मूलं एवं मलयगिरि-प्रणीता वृत्तिः प्रज्ञापनायाः मल य० वृत्ती. ॥५६९॥ कुमारत्वादिषु खस्थानेष्वसुरकुमारस्य निरन्तरं तावद्वक्तव्यं यावद्वैमानिकरवे, तथा चाह - 'एवं नागकुमारत्तेवि' इत्यादि, तदेवमसुरकुमाराणां वेदनासमुद्घातश्चिन्तितः सम्प्रति नागकुमारादिष्वतिदेशमाह - 'एव' मित्यादि, उपदर्शितामिलापेन यथा चतुर्विंशतिदण्डकक्रमेण असुरो नैरयिकादिषु वैमानिकपर्यवसानेषु भणितस्तथा नागकुमारादयोऽवशेपेषु समस्तेषु खस्थानपरस्थानेषु भणितव्या यावद्वैमानिकस्य वैमानिकत्वे, एवं चैतानि नैरयिक चतुर्विंशतिदण्डकसूत्रा|दीनि वैमानिकचतुर्विंशतिदण्डकसूत्र पर्यवसानानि चतुर्विंशतिः सूत्राणि भवन्ति, तदेवं चतुर्विंशत्या चतुर्विंशतिदण्डकसूत्रैर्वेदनासमुद्घातश्चिन्तितः, सम्प्रति चतुर्विंशत्यैव चतुर्विंशतिदण्ड कसूत्रैः कषायसमुद्घातं चिचिन्तयिषुरिदमाह - ------ एगमेगस्स णं मंते ! नेरइयस्स नेरहयचे केवइया कसायसमुग्धाया अतीता ?, गो० । अनंता, केवइया पु०१, गो० क० अस्थि क० नत्थि, जस्सत्थि एगुत्तरियाते जाव अनंता । एगमेगस्स णं भंते! नेरइयस्स असुरकुमारते केवइया कसासमुग्धाया अतीता ?, गोयमा ! अणता, केवइया पु० १, गो० ! कस्सति अत्थि कस्सति नत्थि, जस्सत्थि सिय संखेज्जा सिय असंखेज सिय अन्ता, एवं जाव नेरइयस्स यणियकुमारत्ते, पुढविकाइयत्ते एगुत्तरियाए नेतवं, एवं जाब मणुयचे, वाणमंतरचे जहा असुरकुमारते, जोइसियत्ते अतीता. अगंता, पुरेक्खडा कस्सति अस्थि कस्सति नत्थि, जस्सत्थि सिय असंखेजा सिग अनंता, एवं वैमाणियतेवि सिय असंखेज्जा सिय अनंता, असुरकुमारस्स नेरइयत्ते अतीता अर्णता, पुरेक्खडा कस्सति अस्थि कस्सति नत्थि, जस्सत्थि सिय संखेज्जा सिय असंखेजा सिय अनंता, असुरकुमारस्त' असुरक For Parts Only ~245~ ३६ समु द्वातपदे स्वपरस्थाने कषायस मु. सू. ३३४ ॥५६९|| Page #246 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (१५) “प्रज्ञापना” – उपांगसूत्र-४ (मूलं+वृत्ति:) पदं [३६], --------------- उद्देशक: [-], ------------- दारं [-], -------------- मूलं [३३४] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र-[१५]उपांगसूत्र-[४] "प्रज्ञापना" मूलं एवं मलयगिरि-प्रणीता वृत्ति: प्रत 93025280 सूत्रांक [३३४] मारने अतीता अणंता पुरेक्खडा एगुत्तरिया, एवं नागकुमारते जाव निरंतरं वेमाणियत्ते जहा नेरइयस्स भणितं तहेव माणितवं, एवं जाव धणियकुमारस्सवि वेमाणियत्ते, नवरं सबेसि सहाणे एगुत्तरियाए परहाणे जहेब असुरकुमारस्स, पुढविकाइयस्स नेरइयचे जाव थणियकुमारते अतीता अणता, पुरेक्खडा कस्सति अस्थि कस्सति नस्थि, जस्सस्थि सिय संखेजा सिय असंखेजा सिय अणंता, पुढविकाइयस्स पुढविकाइयचे जाव मणूसत्ते अतीता अर्णता पुरे० क अस्थि क. नत्थि जस्स अस्थि एगुत्तरिया, वाणमंतरचे जहा णेरइयत्ते, जोतिसियवेमाणियचे अतीता अणंता, पुरेक्खडा कस्सइ अस्थि कस्सइ नत्थि, जस्स अस्थि सिय असंखेजा सिय अणंता, एवं जाव मणूसत्तेवि नेयवं, वाणमंतरजोइसियवेमाणिया जहा असुरकुमारा, गवरं सहाणे एगुत्तरियाए माणितवे जाव वेमाणियस्स वेमाणियत्ते, एवं एते चउहीसं चउघीसा दंडगा, (सूत्रं३३४) 'एगमेगस्स णमित्यादि, तत्र नैरयिकस्य नैरयिकत्वविषयं प्रश्नसूत्रं सुगम, पुरस्कृतचिन्तायां तु कस्यचित् सन्ति कस्यचिन्न सन्ति, तत्र यः क्षीणशेषायुः प्रश्नसमये भवपर्यन्ते वर्तमानः कषायसमुघातमप्राप्त एव नरकभवादत्यानन्तरं पारम्पर्येण वा सेत्स्यति न भूयो नरकवासगामी तस्स न सन्ति पुरस्कृता नैरयिकत्वे कषायसमुद्घाताः, शेषस्य तु सन्ति, तस्यापि जघन्यत एको द्वौ वा त्रयो वा, ते च क्षीणायु शेषाणां तद्भावभाजामवसेयाः, उत्कर्षतः सोया असङ्ख्येया वाअनन्ता वा, तत्र सोयवर्षायुःशेषाणां सङ्ख्ययाः असोयवर्षायुःशेषाणामसोयाः, यदिवा सकृत् जघन्यस्थिती उत्पत्स्यमानानां सोयाः असकृत् जघन्यस्थिती सकृदसकदीस्थितावुत्पत्स्वमानानामस दीप अनुक्रम [६०४] ~246~ Page #247 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (१५) प्रत सूत्रांक [३३४] दीप अनुक्रम [६०४ ] “प्रज्ञापना” – उपांगसूत्र - ४ ( मूलं + वृत्तिः ) • मूलं [ ३३४] पदं [३६], --------------उद्देशक: [-1, -------------- दारं [-], पूज्य आगमोद्धारकश्री संशोधितः मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित.. आगमसूत्र -[१५]उपांगसूत्र-[४] "प्रज्ञापना" मूलं एवं मलयगिरि-प्रणीता वृत्तिः प्रज्ञापनायाः मल य० वृत्ती. 1140011 Jan Eucatur येथाः अनन्तश उत्पत्स्यमानानामनन्ताः, तथा नैरयिक स्येवासुर कुमारत्वविषयेऽतीतसूत्रं, तथैव पुरस्कृतसूत्रे 'कस्सर अत्थि कस्सइ नत्थि'त्ति यो नरकादुदृत्तोऽसुरकुमारत्वं न प्राप्स्यति तस्य न सन्ति पुरस्कृता असुरकुमारत्वविषयाः ४ कषाय समुद्घाताः, यस्तु प्राप्स्यति तस्य सन्ति, ते च जघन्यपदे सङ्ख्या जघन्यस्थितावप्यसुरकुमाराणां सङ्ख्येयानां कषायसमुद्घातानां भावात्, लोभादिकषाय बहुलत्वात् तेषां उत्कृष्टपदेऽसङ्ख्येया अनन्ता वा तत्र सकृद्दीर्घस्थितावसकृज्जघन्यस्थितिषु वा उत्पत्स्यमानानामसङ्ख्येयाः, अनन्तश उत्पत्स्यमानानामनन्ताः, एवं नैरयिकस्य नागकुमारत्यादिषु स्थानेषु निरन्तरं तावद्वक्तव्यं यावत् स्तनितकुमारत्वे, तथा चाह - ' एवं जावे त्यादि, पृथिवीकायिकत्वेऽतीतसूत्रं तथैव, पुरस्कृतचिन्तायां तु कस्यचित् सन्ति कस्यचिन्न सन्ति, तत्र यो नरकादुद्धृतो न पृथिवीकायभवं गमी तस्य न सन्ति योऽपि गन्ता तस्यापि जघन्यपदे एको द्वौ वा त्रयो वा उत्कर्षतः सङ्ख्येया असङ्ख्येया वा अनन्ता था, ते चैवं तिर्यक्पञ्चेन्द्रिय भवान्मनुष्य भवाद्देवभवाद्वा कपायसमुद्घातसमुद्धतः सन् य एकवारं पृथिवीकायिकेषु गन्ता तस्य एको द्वौ वारी गन्तुद्व त्रीन् वारान् श्रयः सत्येयान् वारान् सोया असङ्ख्येयान् वारान् असङ्ख्या अनन्तान् वारान् अनन्ताः, तथा चाह-- 'पुढविकाइयत्ते एगुत्तरियाए नेयवं'ति तथा 'एवं ताव मणूसत्ते' इति एवं पृथिवीकायिकगतेनाभिलापप्रकारेण तावद् वक्तव्यं यावन्मनुष्यत्वे तचैवम्— 'एगमेगस्स णं भंते । -नेरद्दयस्स आउकाइयत्ते केवइया कसायसमुग्धाया अईया ?, गोयमा ! अनंता, केवइया पुरेक्खडा ?, गो० ! कस्सह For Parts Only ------ ~ 247~ ३६ समु द्वातपदे स्व परस्था ने कपायस मु. सू. ३३४ ॥५७०॥ Page #248 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (१५) “प्रज्ञापना" - उपांगसूत्र-४ (मूलं+वृत्ति:) पदं [३६], -------------- उद्देशक: [-], ------------- दारं [-], -------------- मूलं [३३४] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र-[१५]उपांगसूत्र-[४] "प्रज्ञापना" मूलं एवं मलयगिरि-प्रणीता वृत्ति: प्रत सूत्रांक [३३४] रररररररररररररर अत्थि कस्सइ नत्थि, जस्सस्थि जहरणेणं एको वा दो वा तिन्नि वा उकोसेणं सखेजा वा असोज्जा वा अणंता वा' एवं यावन्मनुष्यसूत्रं, तत्राप्कायादिवनस्पतिपर्यन्तसूत्रभावना पृथिवीकायसूत्रवत् , द्वीन्द्रियसूत्रे पुरस्कृतचिसन्तायां जघन्येन एको द्वौ वा त्रयो वेति सकृत् जघन्यस्थितिकं वीन्द्रियभवं प्रामुकामय, सक्येयान् वारान् प्राप्तु कामस्य सङ्ग्वेया असक्वेयानसङ्ख्येया अनन्तान् अनन्ताः, एवं त्रीन्द्रियचतुरिन्द्रियसूत्रे अपि भावनीये, तिर्यक-18 पञ्चेन्द्रियमनुष्यसूत्रविषया त्वेवं भावना-सकृत्पञ्चेन्द्रियभवं प्राप्सुकामस्य खभावत एवाल्पकषायस्य जघन्यत एको हो प्रयो वा शेषस्य सङ्ग्येयान् वारान् तिर्यपञ्चेन्द्रियभवं प्राप्तुकामस्य सङ्ख्यया असङ्खयेयान् वारान् असोया अनन्तान् वारान् अनन्ताः, मनुष्यसूत्रे तु पुरस्कृतविषया भावनैवं-यो नरकभवादुद्दत्वोऽल्पकषायः सन् मनुष्यभवं प्राप्य कषायसमुपातमप्राप्त एव सिद्धिपुरं गन्ता तख न सन्ति, शेषस्य सन्ति, तथापि एक ही श्रीन वारान् || कषायसमुद्घातान प्राप्य सेत्स्थत एको द्वी त्रयो वा सहयेयान् भवान् यदिवा एकस्मिन्नपि भवे सङ्ख्येयान् कपाय|समुद्घातान् गन्तुः सङ्ख्यया असङ्ख्येयान् भवान् प्राप्तुकामस्यासङ्ख्येयाः अनन्तान् अनन्ताः, 'वाणमंतरत्ते जहा असुर| कुमारत्ते' प्रागुक्तं, किमुक्तं भवति-पुरस्कृतचिन्तायां एवं वक्तव्यं-'जस्सत्धि सिय सखेज्जा सिय असोज्जा | सिय अणंता वा' इति न त्वेकोतरिका वक्तव्याः, व्यन्तराणामप्यसुरकुमाराणामिव जप यस्थितावपि सक्येयानां कायसमुद्घातानां लभ्यमानत्वात् , असङ्ख्येयानन्तभावनाप्यसुरकुमारवत् , 'जोइसियचे' इत्यादि, ज्योतिष्क दीप अनुक्रम [६०४] AJulturary.com ~248~ Page #249 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (१५) “प्रज्ञापना" - उपांगसूत्र-४ (मूलं+वृत्ति:) पदं [३६], -------------- उद्देशक: [], ------------- दारं [-], -------------- मूलं [३३४] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र-[१५]उपांगसूत्र-[४] "प्रज्ञापना" मूलं एवं मलयगिरि-प्रणीता वृत्ति: प्रत सूत्रांक [३३४] दीप अनुक्रम [६०४] प्रज्ञापना- सत्वेऽतीता अनन्ता वक्तव्याः, पुरस्कृतास्तु कस्यापि सन्ति कस्यापि न सन्ति, एतदपि प्राग्वदू भावनीयं, यस्यापि ३६ समुया:मल सन्ति तस्यापि कस्यचिदसोयाः कस्यचिदनन्ताः, न तु स्यात् सङ्ख्येया इति वक्तव्यं, कुत इति चेत् १, उच्यते, घातपदे य. वृत्ती. ज्योतिष्काणां जघन्यपदेऽप्यसङ्ख्येयकालायुष्कतया जघन्यतोऽपि असङ्खोयानां कषायसमुद्घातानां लभ्यमानत्वात् , स्वपरखाअनन्तशस्तत्र जिगमिषूणामनन्ताः, एवं वैमानिकत्वेऽपि पुरस्कृतचिन्तायां स्वादसङ्ख्येयाः स्वादनन्ता इति वक्तव्यं, ॥५७१॥ INने कषायस भावना प्राग्वत् । तदेवं नैरयिकस्य खस्थाने परस्थाने च कषायसमुद्घाताश्चिन्तिताः, सम्प्रत्यसुरकुमारेसु तान् । मु.सू.५२४ चिचिन्तयिषुराह-एगमेगस्स 'मित्यादि, एकैकस्य असुरकुमारस्य नैरयिकत्वे कषायसमुद्घाता अतीताअनन्ता, भाविनः कस्यचित्सन्ति कस्खचिन्न सन्ति, तत्र योऽसुरकुमारभवादुत्तो नरकं न यास्यति तस्य न सन्ति, यस्तु यास्यति तस्य सन्ति, तस्यापि जघन्यतः सञ्बेयाः, जघन्यस्थितावपि सोयानां कषायसमुद्घातानां नरकेषु भावात्, उत्कर्षतोऽसोया अनन्ता था, तत्र जघन्यस्थितिष्यसकृद्दीस्थितिषु सकृदसकृद्वा जिगमिपोरसङ्घरया अनन्तशो जिगमिपोरनन्ताः, असुरकुमारस्वासुरकुमारत्वे अतीता अनन्ताः, 'पुरेक्खडा एगुत्तरिया' इत्यादि, पुरस्कृतास्तु कस्यापि सन्ति कस्यापि न सन्ति, तत्र योऽसुरकुमारभवे पर्यन्तवर्ती न च कषायसमुद्घातं याता नापि तत्र प्रभ्रष्टो 1॥५७१॥ भूयोऽसुरकुमारभवं लब्धा किन्त्वनन्तरं पारम्पर्येण वा सेत्स्यति तस्य सन्ति, शेषस्य तु न सन्ति, यस्यापि सन्ति तस्यापि जघन्यत एको द्वौ वा त्रयो वा उत्कर्षतः सोया असङ्ख्येया अनन्ता वा, तत्र एकादयः क्षीणायुःशेषाणां तद्भव For P OW ~249~ Page #250 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (१५) “प्रज्ञापना” – उपांगसूत्र-४ (मूलं+वृत्ति:) पदं [३६], -------------- उद्देशक: [-], ------------- दारं [-], -------------- मूलं [३३४] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र-[१५]उपांगसूत्र-[४] "प्रज्ञापना" मूलं एवं मलयगिरि-प्रणीता वृत्ति: प्रत सूत्रांक [३३४] भाजां भूयस्तत्रैवानुत्पत्स्यमानानामवगन्तव्याः, सोयादयो नैरयिकत्वे इव भावनीयाः, 'एच'मित्यादि, एवं उक्तेन प्रकारेण नागकुमारत्वे तत ऊई चतुर्विशतिदण्डकक्रमेण निरन्तरं यावद्वैमानिकत्वे-वैमानिकत्वविषयं सूत्र, पायथा नैरयिकस्य भणितं तथैव भणितव्यं, किमुक्तं भवति ?-नागकुमारत्वादिषु स्तनितकुमारपर्यवसानेषु पुरस्कृत चिन्तायां 'कस्सइ अत्धि कस्सइ नत्थि, जस्स अस्थि सिय संखेजा सिय असंखेज्जा सिय अणंता' पृथिवीकायिकवादिषु मनुष्यत्वपर्यवसानेषु 'जस्स अस्थि जहन्नेणं एको वा दो वा तिन्नि वा उकोसेणं संखेजा वा असंखेज्जा वा अर्णता पा' व्यन्तरत्वे 'जस्स अस्थि सिय संखेज्जा सिय असंखेज्जा सिय अणता' ज्योतिष्कत्वे 'जस्स अस्थि सिय असंखेजा सिय अणंता' वैमानिकत्वेऽप्येवमेवेति वक्तव्यमिति, 'एवं जावे'त्यादि, एवं-उक्तेन प्रकारेण असुरकुमा-11 लावन्नागकुमारस्य यावत् स्तनितकुमारस्य प्रत्येकं यावद वैमानिकत्वे-वैमानिकत्वविषयं सूत्रं तावद्वक्तव्यं, अत्रैव विशेष-11 माह-नवरं सर्वेषां नागकुमारादीनां स्तनितकुमारपर्यवसानानां स्वस्थाने नियमतः पुरस्कृता एकोतरिकाः, परस्थाने यथैवासुरकुमारस्य तथैव वक्तव्याः, 'पुढविकाइयस्स नेरइयत्ते' इत्यादि, पृथिवीकायिकस्य नैरयिकत्वे यावत् स्तनि|तकुमारत्वे अतीता अनन्ताः, अत्र भावना प्रागिन, पुरस्कृताः कस्यापि सन्ति कस्यापि न सन्ति, तत्र यः पृथिवी कायभवादुत्तो नरकेष्वसुरकुमारेषु यावत् स्तनितकुमारेषु न गमिष्यति किन्तु मनुष्यभवं प्राप्य सिद्धिं गन्ता तस्स। 18न सन्ति, शेषस्य तु सन्ति, यस्यापि सन्ति तस्यापि जघन्यतः सकयेयाः, जघन्यस्थितावपि नरकादिपु सङ्ख्ययाना। दीप अनुक्रम [६०४] प्र. ९६ Santaratinila Mandiarary.om ~250~ Page #251 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (१५) “प्रज्ञापना” – उपांगसूत्र-४ (मूलं+वृत्ति:) पदं [३६], -------------- उद्देशक: [-], ------------- दारं --------------- मूलं [३३४] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र-[१५]उपांगसूत्र-[४] "प्रज्ञापना" मूलं एवं मलयगिरि-प्रणीता वृत्ति: se प्रज्ञापनाया मलयवृत्ती e प्रत सूत्रांक [३३४] ५७२॥ कषायसमुदघाताना भावात् , उत्कर्षतोऽसोया अनन्ता बा, ते च प्राग्वदू भावयितव्याः, पृथिवीकायिकत्वे यार- कषायसमुद्घाताना समु|मनुष्यत्वेऽतीतास्ते तथैव, भाविन एकोतरिकया वक्तव्याः, ते चैवम्-'कस्सइ अस्थि कस्सइ नत्थि, जस्स अत्थिीदघातपदे जहण्णणं एको वा दो वा तिषिण वा उक्कोसेणं सैखेजा वा असंखेजा वा अणंता वा' ते च नैरयिकस्य पृथिवीका-8 स्वपरस्था|यिकत्व इव भावनीयाः, 'याणमंतरते जहा नेरइयत्ते' इति व्यन्तरत्वे यथा नैरयिकत्वे तथा बक्तव्यं, किमुक्तं भव- न कषायस नि?-एकोतरिका न वक्तव्याः, किन्तु 'सिय संखेजा सिय असंखेज्जा सिय अणंता' इति वक्तव्यं, 'जोइसिय' सू. १२४ इत्यादि, ज्योतिष्कत्वे वैमानिकत्वे चातीतास्तथैव, पुरस्कृता यदि सन्ति ततो जघन्यपदे असङ्ख्येयाः उत्कृष्टपदे। अनन्ताः, एवमप्कायिकस्य यावन्मनुष्यत्वे नेतव्यं, व्यन्तरज्योतिष्कवैमानिकानां यथा असुरकुमारस्य, नवरं पुरस्कृतचिन्तायां सर्व स्वस्थाने एकोतरिकया वक्तव्यं, परस्थाने यथा असुरकुमारस्य सूत्र, सूत्रपर्यन्तं दर्शयति–जाव माणियस्स वेमाणियत्ते' इति यावद्वैमानिकस्य वैमानिकत्वे-वैमानिकत्वविषयं सूत्र, एवमेते कपायसमुद्घातगताश्चतुर्विंशतिः-चतुर्विंशतिसङ्ख्याश्चतुर्विंशतिदण्डकाः भणितव्याः २४ । तदेव मुक्तश्चतुर्विंशत्या चतुर्विंशतिदण्डक-M सूत्रः कषायसमुद्घातः, सम्प्रति चतुर्विशत्यैव चतुर्विंशतिदण्डकसूत्रैारणान्तिकसमुद्घातमाहमारणतियसमुग्घातो सहाणेवि परहाणेवि एगुत्तरियाए नेयहो जाव वैमाणियस्स वेमाणियत्ते, एवमेते चउवीसं चउवीसदंडगा भाणियवा वेउवियसमुग्घातो जहा कसायस० तहा निरवसेसो भाणितबो, नवरं जस्स नस्थि तस्स दीप अनुक्रम [६०४] stat ॥५७२॥ SARERainintenatural Nirauasaram.org ~251~ Page #252 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (१५) “प्रज्ञापना” – उपांगसूत्र-४ (मूलं+वृत्ति:) पदं [३६], -------------- उद्देशक: [-]------------- दारं [-], -------------- मूलं [३३५] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र-[१५]उपांगसूत्र-[४] "प्रज्ञापना" मूलं एवं मलयगिरि-प्रणीता वृत्ति: प्रत सूत्रांक [३३५] 980899 दीप न वुवति, एत्थवि चउवीसं चउथीसा दंडगा भाणियहा । तेयगसमु० जहा मारणंतियस०, णवरं जस्सास्थि, एवं एतेवि चउबीसं चउबीसा दंडगा भाणितवा। एगमेगस्स णं भंते ! नेरइयस्स नेरइयत्ते केवइया आहारसमुग्धाया अतीता, गो! गस्थि, केवइया पु०१, गो०! णत्थि, एवं जाव वेमाणिय त्ते, नवरं मणूसत्ते अतीता कस्सइ अस्थि कस्सइ नत्थि, जस्सत्थि जह० एको वा दो वा उ० तिनि, केवइया पु०१, गो! कस्सति अस्थि क. नथि, जस्सस्थि जह एको वा दो वा तिण्णि वा उ० चत्तारि, एवं सबजीवाणं मणुस्साणं भाणिय, मासस्स मणूसत्ते अतीता कस्सति अस्थि कस्सति नस्थि, जस्सत्थि जहएको वा दो वा तिणि वा उ०चत्तारि, एवं पुरेक्खडावि, एवमेते चउवीस चउवीसा दंडगा जाव वेमाणियचे । एगमेगस्सणं भंते ! नेरइयस्स नेरइयचे के. केवलिसमुग्याया अतीता १, गो! पत्थि, केवइया पुरेक्खडा, गो.! नत्थि, एवं जाव वेमाणियते, णवरं भगृसत्ते अतीता नत्थि, पुरेक्खडा क० अस्थि क. नथि, जस्सत्थि इको, मासस्स मणूसचे अतीवा कस्स ति अस्थि क० नस्थि, जस्सस्थि एको, एवं पुरेक्खडावि, एवमेते चउबीसं चउबीसा दंडगा (मूत्र ३३५) 'मारणंतिए'त्ति मारणान्तिकसमुद्घातः पुरस्कृतचिन्तायां खस्थाने परस्थाने वा एकोत्तरिकया नेतव्यो यावद्वैमानिकस्म वैमानिकत्वे-वैमानिकत्वविषयं सूत्र, तचैवम्-एगमेगस्स भंते ! नेरइयस्स नेरयत्ते केवइया मारगंतियसमुग्पाया अतीता, गोयमा ! अणंता, केवइया पुरेक्खडा ?, गोयमा ! कस्सइ अस्थि कस्सइ नत्वि, सारिeseseesesesese अनुक्रम [६०५] REaratunmhaninaina AJulturary.com ~252~ Page #253 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (१५) “प्रज्ञापना” – उपांगसूत्र-४ (मूलं+वृत्ति:) पदं [३६], -------------- उद्देशक: [-]------------- दारं [-], -------------- मूलं [३३५] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र-[१५]उपांगसूत्र-[४] "प्रज्ञापना" मूलं एवं मलयगिरि-प्रणीता वृत्ति: प्रत सूत्रांक [३३५] ॥५७३॥ दीप जस्सत्थि जहन्नेणं एको वा दो या तिषिण वा उक्कोसेणं संखेज्जा वा असंखेजा वा अणंता वा' तत्र यो मारणा- प्रज्ञापना ३६ या: मल- न्तिकसमुद्घातमन्तरेण कालं कृत्वा नरकादुद्वृत्तः अनन्तरं पारम्पर्येण वा मनुष्यभवं प्राप्य सेत्स्यति न भूयो नरक- धातपदे ब०वृत्ती. |गामी तस्य न सन्ति पुरस्कृता मारणान्तिकसमुद्घाताः, यः पुनस्तद्भवे वर्तमानी मारणान्तिकसमुद्घातेन कालं कृत्वा नारकादेनरकादुवृत्तः सेत्स्यति तस्मैकः पुरस्कृतो मारणान्तिकसमुद्घातो, यः पुनभूयोऽपि नरकमागत्य सर्वसङ्ख्यया द्वौ मार- नारकत्वाणान्तिकसमुद्घातो गन्ता तस्य द्वी, एवं त्रिप्रभृतयोऽपि भावनीयाः, सङ्घयेयान् वारान् नरकमागन्तुः सबेयाः अस-दीमारणायेयान्वारान् असङ्ख्येयाः अनन्तान् वारान् अनन्ताः, एवमसुरकुमारत्वे आलापको वाच्यः, नवरमत्रैवं भावनायो नर Kन्तिकाद्याः कादुत्तो मनुष्यभवं प्राप्य सेत्स्यति यदिवा तस्मिन् भवे मारणान्तिकसमुद्घातमगत्वा मृत्युमासाद्य ततोऽज्यभवे सिद्धि सू. ३३५ गन्ता तस्यैव न सन्ति, शेषस्य त्वेकादिभावना प्रागिव, व्यन्तरज्योतिष्कवैमानिकेषु यथा नैरयिकस्य, (यथा नैरयिकस्य) निरयिकादिषु चतुर्विंशतिस्थानेषु चिन्ता कृता तथाऽसुरकुमारादीनां वैमानिकपर्यवसानानां चतुर्विशतिदण्डकक्रमेण | कर्तव्या, तदेवमन्यान्यपि चतुर्विंशतिर्दण्डकसूत्राणि भवन्ति, तथा चाह-एवं एए चउवीस चउचीसा दंडगा भाणियबा' इति, उक्तो मारणान्तिकसमुदघातश्चतविशत्या चतुर्विशतिदण्डकसूत्रः, साम्प्रतमेतावत्सवबाकेरेव सूत्रे क्रियसमुद्घातं विवक्षुराह-वेउविए' इत्यादि, वैक्रियसमुद्घातो यथा कपायसमुपातःप्रा प्रतिपादितः तथा निरविशेषो भणितव्यः, केवलं यस्य वैक्रियसमुद्घातो नास्ति वैक्रियलब्धेरेवासम्भवात् तस्य नोच्यते, शेषस्य उच्यते, स अनुक्रम [६०५] ॥५७३॥ JAMERuratioLAM. Waturasurare.org ~253 Page #254 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम “प्रज्ञापना” – उपांगसूत्र-४ (मूलं+वृत्ति:) पदं [३६], --------------- उद्देशक: [-], ------------- दारं [-], -------------- मूलं [३३५] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र-[१५]उपांगसूत्र-[४] "प्रज्ञापना" मूलं एवं मलयगिरि-प्रणीता वृत्ति: प्रत सूत्रांक [३३५] दीप शिर्ष-'एगमेगस्स णं भंते ! नेरइयस्स नेरइयत्ते केवइया वेउषियसमुग्घाया अतीता ?, गो ! अणंता, केवइया पुरे-1। क्खडा, गो.! कस्सइ अत्थि कस्सइ नत्थि, जस्स अस्थि जहण्णेणं एको वा दो वा तिण्णि वा उकोसेणं सिय संखेजा वा सिय असंखेजा वा सिय अणता वा । एगमेगस्स णं भंते ! नेरइयस्स असुरकुमारचे केवइया वेउधिय-1 समुग्घाया अतीता, गो! अणता, केवइया पुरेक्खडा ?, गो! कस्सइ अस्थि कस्सइ नत्थि, जस्सस्थि सिय संखिज्जा सिय असंखिज्जा सिय अणंता वा, एवं नेरइयस्स जाव थणियकुमारते । एगमेगस्स णं भंते ! नेरइयस्स पुढविकाइयत्ते केवइया वेउवियसमुग्धाया अतीता, गोनत्थि, केवइया पुरेक्खडा ?, गो! नत्थि, एवं जाव तेउवाइयत्ते, एगमेगस्स णं भंते ! नेरदयस्स बाउकाइयत्ते केवइया वेउचियसमुग्घाया अतीता, गो018 |अणंता, केवइया पुरेक्खडा, गो० ! कस्सइ अस्थि कस्सइ नस्थि, जस्सत्थि जहण्णेणं एको वा दो वा तिण्णि वा उक्को संखेजा वा असं० अणंता वा, वणस्सइकाइयत्ते जाव चउरिदियचे जहा पुढविकाइयत्ते, तिरिक्खपं|चिंदियत्ते मणुसत्ते जहा बाउकाइयत्ते, वाणमंतरजोइसियवेमाणियत्तेसु जहा असुरकुमारत्ते' इह यत्र वैक्रियसमु घातसम्भवस्तत्र भावना कषायसमुद्घातवद् भावनीया, अन्यत्र तु प्रतिषेधः सुप्रतीतो, वैक्रियलधिरेवासम्भवात, यथा च नैरयिकस्य चतुर्विशतिदण्डकक्रमेण सूत्रमुपदर्शितमेवमसुरकुमारादीनामपि चतुर्विशतिदण्डकक्रमेण प्रत्येकं । सूत्रमवगन्तव्यं, नवरमसुरकुमारादिषु स्खनितकुमारपर्यवसानेषु व्यन्तरादिषु च परस्परं स्वस्थाने एकोतरिका पर अनुक्रम [६०५] ~254~ Page #255 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (१५) “प्रज्ञापना” – उपांगसूत्र-४ (मूलं+वृत्ति:) पदं [३६], -------------- उद्देशक: [-]------------- दारं [-], -------------- मूलं [३३५] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र-[१५]उपांगसूत्र-[४] "प्रज्ञापना" मूलं एवं मलयगिरि-प्रणीता वृत्ति: ३६ समु घातपर्द प्रत सूत्रांक [३३५] प्रज्ञापनायामल4. वृत्ती. ॥५७४॥ taeeeeeeeeeeeeectatiseas दीप स्थाने सहावेयादयो वक्तव्याः, वायुकायिकतिर्यपञ्चेन्द्रियमनुष्येषु तु परस्परं स्वस्थाने परस्थाने वा एकोतरिकाः,S | शेषं तथैव, एषमेतान्यपि चतुर्विंशतिश्चतुर्विशतिदण्डकसूत्राणि भवन्ति, तथा चाह-'एवमेते चउषीसं चउवीसगा दंडगा भाणितवा' एवं-उपदर्शितेन प्रकारेण अत्रापि-बैक्रियसमुद्घातविषयेऽपि चतुर्विशतिः-चतुर्विंशतिसङ्ख्याः 'चउवीसा' इति चतुर्विशतिः-चतुर्विंशतिस्थानपरिमाणा दंडका-दण्डकसूत्राणि भणितन्याः। सम्प्रति तैजससमुद्घात नारकत्वा दी मारणामतिदेशत आह-'तेयगे'सादि, तैजससमुद्घातो यथा मारणान्तिकसमुद्घातस्तथा वक्तव्यः, किमुक्तं भवति - खस्थाने परस्थाने च एकोतरिकया स वक्तव्य इति, नवरं यस्य नास्ति-न सम्भवति तैजससमुद्घातस्तस्य न वक्तव्यः, न्तिकाद्याः तत्र नैरयिकपृथिव्यप्तेजोवायुवनस्पतिद्वित्रिचतुरिन्द्रियेषु न सम्भवतीति न वक्तव्यः, शेषेषु तु वक्तव्यः, स चैवम्'एगमेगस्स णं मंते ! नेरइयस्स नेरइयत्ते केवइया तेउसमुग्घाया अतीता ?, गो। नस्थि, केवइया पुरेक्खडा, गो० ! नत्थि, एगमेगस्स णं भंते ! नेरइयस्स असुरकुमारत्ते केवइया तेयगसमुग्धाया अतीता ?, गो.! अर्णता, केवइया पुरेक्खडा ?, गो.! कस्सइ अस्थि कस्सद नत्थि, जस्सत्थि जहन्नेणं एको वा दो वा तिणि वा उक्को-|| सेणं संखेज्जा वा असंखेज्जा वा अणंता वा' इत्यादि सूत्रोक्तं विशेषमुपजीव्य स्वयं परिभावनीयं, अत्रापि सूत्रसङ्ख्यामाह-एवं'मित्यादि, एवं-मारणान्तिकसमुद्घातगतेन क्वचित् सर्वथा निषेधरूपेण च प्रकारेण एतेऽपि-तैजससमुद्घातगता अपि चतुर्विशतिः चतुर्विशतिका-दण्डका भणितव्याः। सम्प्रत्याहारकसमुपातं चिन्तयन्नाह-'एगमे 9829092029707990 अनुक्रम [६०५] ५७४॥ ~255~ Page #256 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (१५) प्रत सूत्रांक [३३५] दीप अनुक्रम [ ६०५ ] “प्रज्ञापना” – उपांगसूत्र - ४ ( मूलं + वृत्तिः ) - • मूलं [ ३३५] पदं [३६], --------------उद्देशक: [-1, -------------- दारं [-], पूज्य आगमोद्धारकश्री संशोधितः मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित.. आगमसूत्र - [१५],उपांगसूत्र-[४] “प्रज्ञापना" मूलं एवं मलयगिरि-प्रणीता वृत्तिः गस्स णमित्यादि, इह सर्वेष्वपि स्थानेषु मनुष्यत्वचिन्तायामतीता जघन्यत एको द्वौ या उत्कर्षतस्त्रयश्च पुरस्कृता जघन्यत एको वा द्वौ वा त्रयो वा उत्कर्षतश्चत्वारः, शेषेषु स्थानेषु अतीताः पुरस्कृताश्च प्रतिषेद्धव्याः, मनुष्यस्य मनुष्यत्व चिन्तायामतीताः पुरस्कृताश्च जघन्यत एको वा द्वौ वा त्रयो वा उत्कर्षतश्चत्वारः, अत्रार्थे च कारणं प्रागेवोक्तं, अत्रापि सूत्रसङ्ख्यामाह – 'एव' मित्यादि, एवम् - उपदर्शितेन प्रकारेण एते आहारकसमुद्घातविषयाश्चतुर्विंशतिसङ्ख्याकाः दण्डका वक्तव्याः कियद्दूरं यावदित्याह -- यावद्वैमानिकस्य वैमानिकत्वे-वैमानिकत्वविषयं सूत्रं, तबेवम् -' एगमेगस्स णं भंते । वेमाणियस्स वेमाणियत्ते केवइया आहारग समुग्धाया अतीता १, गो० 1 नत्थि, केवइया पुरेक्खडा ?, गो० ! नत्थि' इति । अधुना केवलिसमुद्यातमभिधित्सुराह - 'एगमेगस्स णं भंते' इत्यादि, अत्राप्ययं तात्पर्यार्थः- सर्वेष्वपि स्थानेषु मनुष्यत्यचिन्ताव्यतिरेकेणातीताः पुरस्कृताश्च प्रतिषेद्धव्याः, मनुष्यवर्जेषु मनुष्यत्व चिन्तायामतीताः प्रतिषेद्धव्याः, पुरस्कृतस्तु कस्याप्यस्ति कस्यापि नास्ति, यस्याप्यस्ति तस्याप्येक एवेति वक्तव्यः, मनुष्यस्य मनुष्यत्यचिन्तायामतीतः कस्यापि अस्ति कस्यापि नास्ति, यस्याप्यस्ति तस्याप्येक एव, एतच प्रश्नसमये केवलिसमुद्घातादुत्तीर्ण केवलिनमधिकृत्य, पुरस्कृतोऽपि कस्यापि अस्ति कस्यापि नास्ति, यस्याप्यस्ति | तस्याप्येक इति वक्तव्यं, अत्रापि सूत्रसङ्ख्यामाह - ' एवं ' मिलादि एवम् - उपदर्शितेन प्रकारेण एते केवलिसमुद्घातविष| याश्चतुर्विंशतिश्चतुर्विंशतिसङ्ख्याका दण्डका भवन्ति, तदेवं सर्वसङ्ख्यया एकत्वविषयाणां चतुर्विंशतिदण्डकसूत्राणाम For Pernal Use On ------ ~256~ Page #257 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (१५) प्रत सूत्रांक [३३६ ] दीप अनुक्रम [६०६] मूलं [३३६ ] पदं [३६], --------------उद्देशक: [-1, -------------- दारं [-], पूज्य आगमोद्धारकश्री संशोधितः मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित.. आगमसूत्र -[१५]उपांगसूत्र-[४] "प्रज्ञापना" मूलं एवं मलयगिरि-प्रणीता वृत्तिः प्रज्ञापनायाः मल ० वृत्ती. १५७५॥ “प्रज्ञापना” – उपांगसूत्र - ४ ( मूलं + वृत्तिः ) - Education Internationa पथ्यधिकं शतं जातं, एतावत्सङ्ख्याकान्येव बहुत्वविषयाण्यपि सूत्राणि भवन्ति, तान्युपदिदर्शयिषुराह- नेरइयाणं भंते ! नेरइयत्ते० के० वेदणास० अतीता १, गो० ! अनंता, के ० पुरे० १, गो० ! अगंता, एवं जाव वैमाणियत्ते, • एवं सवजीवाणं भणितवं जाव वैमाणियाणं वेमाणियत्ते, एवं जात्र तेयमस०, गवरं उवउजिऊण ने यह जस्स्रत्थि वेउचियतेयगा । नेरइयाणं भंते ! नेरइयचे केवतिता आहारगस० अतीता १, गो० ! नत्थि, केवतिता पु० १, गो० 1 णत्थि एवं जाव वेमाणियत्ते, णवरं मणूसते अतीता असं० पुरेक्खडा असंखेजा एवं जाव बेमाणियाणं, णवरं वणस्सइकाइयाणं मणूसते अतीता अनंता पुरेक्खडा अनंता, मणूसाणं मणूसते अतीता सिय संखेजा सिय असंखेजा, एवं पुरेक्खडावि, सेसा सबै जहा नेरइया, एवं एते चडवीसं चउवीसा दंडगा । नेरइयाणं मंते ! नेरइयत्ते केव० केवलिसमुग्धाया अती ?, गो० 1 स्थि, के० पु० १, गो० । नत्थि, एवं जाव वेमाणियत्ते, णवरं मणूसत्ते अतीता णत्थि, पुरे० असंखेजा, एवं जाव वैमाणिया, नवरं वणस्सइकाइयाणं मणूसत्ते अतीता नत्थि, पु० अणंता, मणूसाणं मणूसते अतीता सिय अस्थि सिय णत्थि, जइ अत्थि जह० एको वा दो तिष्णि वा उक्को० सतपुडुतं, केवइया पुरे० १, गो० ! सिय संखेजा सिय असंखेजा, एवं एते चउबीसं चउडीसा दंडगा सबै पुच्छाए भाणितवा जाव वेमाणियाणं वेमाणियते (सूत्रं ३३६) 'नेरइयाण' मित्यादि, नैरयिकाणां विवक्षितप्रश्नसमयभाविनां सर्वेषां भदन्त ! पूर्व. सकलमतीतं कालमवधीकृत्य For Para Use Only ------ ~ 257 ~ ३६ समुद्घातपदं नारकादीनां नारकत्वादी समुद्धाताः सू. ३३६ ।।५७५।। Page #258 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (१५) “प्रज्ञापना" - उपांगसूत्र-४ (मूलं+वृत्ति:) पदं [३६], -------------- उद्देशक: [-], ------------- दारं [-], -------------- मूलं [३३६] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र-[१५]उपांगसूत्र-[४] "प्रज्ञापना" मूलं एवं मलयगिरि-प्रणीता वृत्ति: प्रत सूत्रांक [३३६] दीप म यथासम्भवं नैरयिकत्वे वृत्तानां सतां समुदायेन सर्वसङ्ख्यया कियन्तो घेदनासमुद्घाता अतीताः, भगवानाह गौतम ! अनन्ताः, बहूनामनन्तकालमसंव्यवहारराशेरुद्वृत्तत्वात् , कियन्तः पुरस्कृताः १, एतच्च सूत्रं सूचामात्र, परिपूर्णस्तु पाठ एवं-'नेरइयाणं भंते ! नेरइयत्ते केवइया वेयणासमुघाया पुरेक्खडा ?' इति भगवानाह-गौतम । अनन्ताः, बहूनामनन्तशो भूयोऽपि नरकेष्वागमनसम्भवात् , 'एवं'मित्यादि, एवमुक्तेन प्रकारेणासुरकुमारत्वादिषु । स्थानेषु क्रमेण तावद् वक्तव्यं यावद्वैमानिकत्वे-वैमानिकत्व विषयं सूत्र, तचेदं-'नेरइयाणं भंते ! वेमाणियत्ते केव इया वेयणासमुग्घाया अतीता ?, गो! अणंता, केवइया पुरेक्खडा ?, गो ! अणंता' इति, अत्र अतीता अनशान्ताः सुप्रतीताः, सर्वसांव्यवहारिकजीवैः प्रायोऽनन्तशो वैमानिकत्वस्य प्राप्तत्वात् , पुरस्कृतास्वनन्ताः, प्रश्नसमय-18 भाविना नैरयिकाणां मध्ये बहुभिरनन्तशो वैमानिकत्वस्य प्राप्स्यमानत्वात् , एवमपान्तरालयतिध्वपि असुरकुमार-IM त्वादिषु स्थानेषु भावना भावनीया, यथा च नैरयिकाणां नैरयिकत्वादिषु चतुर्विशतिदण्डकक्रमेणातीताः पुरस्कृताश्च वेदनासमुद्घाता भणिता एवं सर्वजीवानामसुरकुमारादीनां भणितव्याः, कियडूरं यावदित्याह-यावद्वैमा|निकानां वैमानिकत्ये-वैमानिकत्व विषयाः, ते चैवं-वेमाणियाणं भंते ! वेमाणियत्ते केवझ्या बेयणासमुग्घाया अतीता ?, गो! अणंता, केवइया पुरे०१, गो! अणंता' इति, एवं कपायमरणवैक्रियतैजससमुद्घाता अपि | नरयिकादीनां वैमानिकपर्यवसानानां सर्वेषु नैरयिकत्वादिषु स्थानेषु चतुर्विंशतिदण्डकक्रमेण वक्तव्याः, तथा चाह अनुक्रम [६०६] SARELatunintinational PRurasurary.org ~258~ Page #259 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (१५) प्रत सूत्रांक [३३६ ] दीप अनुक्रम [६०६] “प्रज्ञापना” – उपांगसूत्र - ४ ( मूलं + वृत्तिः) -------------- दारं [-], मूलं [३३६ ] पदं [३६], --------------उद्देशक: [-1, पूज्य आगमोद्धारकश्री संशोधितः मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र [१५],उपांगसूत्र-[४] "प्रज्ञापना" मूलं एवं मलयगिरि-प्रणीता वृत्तिः प्रज्ञापना मलय० वृत्ती. ॥५७६॥ 'एवं जावे त्यादि, एवं - वेदनासमुद्घातगतेन प्रकारेण कषायादिसमुद्घाता अपि तावद्वक्तव्याः यावत्तैजससमुद्घांतः, किमविशेषेण वक्तव्याः १, नेत्याह- 'नवर 'मित्यादि, नवरमुपयुज्य उपयोगं कृत्वा सर्वे सूत्रं बुद्ध्या नेतव्यं, किमुक्तं भवति ? – ये यत्र समुद्घाता घटन्ते ते तत्रातीताः पुरस्कृताश्चानन्ता वक्तव्याः, शेषेषु च स्थानेषु प्रतिषेद्धव्याः, एतदेव वैविक्त्येनाह - 'जस्स अत्थी' त्यादि, यस्य जीवराशेनैरयिकादेरसुरकुमारादेश्व सन्ति वैक्रियतैजससमुद्घाता से तस्य वक्तव्याः, शेषेषु पृथिव्यादिषु स्थानेषु प्रतिषेद्धव्या इति सामर्थ्यलभ्यं, कषायमारणान्तिकसमुद्घाताः पुनः सर्व| त्रापि वेदनासमुद्घातवद्विशेषेणातीताः पुरस्कृताश्चानन्ता वक्तव्याः, न तु क्वापि निषेद्धव्याः । सम्प्रति आहारसमु|द्घातविषयं सूत्रमाह- 'नेरइयाण' मित्यादि, आहारकसमुद्घातो बाहारकलब्धौ सत्यामाहा रकशरीरप्रारम्भकाले भवति, नान्यथा, आहारकलब्धिश्चोपजायते चतुईशपूर्वाधिगमे, तेषां चतुर्द्दशानां पूर्वाणामधिगमो मनुष्यत्वावस्थाय न शेषायामवस्थायामिति मनुष्यत्ववर्जासु शेषास्ववस्थास्वतीतानां पुरस्कृतानां चाहारकसमुद्घातानां प्रतिषेधः, मनुव्यत्वावस्थायामपि पूर्वमतीता असङ्ख्येयाः, प्रश्नसमयभाविनां नारकाणां मध्ये बहूनामस बेयानां नारकाणां पूर्व तदा २ मनुष्यत्वमवाप्य अधिगतचतुर्द्दशपूर्वाणां प्रत्येकं सकृद् द्विः त्रिर्वा कृताहारकसमुद्घातत्वात्, पुरस्कृता अपि असङ्ख्येयाः, प्रश्नसमयभाविनां नारकाणां मध्ये बहुभिरसङ्ख्येयैर्नारिकैर्नर कादुदृस्यानन्तर्येण पारम्पर्येण वा तदा तदा मनुष्यत्वावाप्तौ चतुर्द्दश पूर्वाण्यधीत्य प्रत्येकमाहारकसमुद्यातानामेकशो द्विः त्रिश्चतुर्वा करिष्यमाणत्वात्, 'एवं जाव For Parts Only ------ ~259~ ३६ समु दूधातपदं नारकादी नां नारकत्यादौ स मुद्धाताः सू. ३३६ ॥५७६ ॥ janrary or Page #260 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (१५) “प्रज्ञापना" - उपांगसूत्र-४ (मूलं+वृत्ति:) पदं [३६], -------------- उद्देशक: [-], ------------- दारं -1, -------------- मूलं [३३६] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र-[१५]उपांगसूत्र-[४] "प्रज्ञापना" मूलं एवं मलयगिरि-प्रणीता वृत्ति: प्रत सूत्रांक [३३६] दीप माणियाण मिति नैरयिकाणां चतुर्विंशतिदण्डकक्रमेण चिन्ता कृता एवमसुरकुमारदिीनामपि प्रत्येक चतुर्विंशतिद-| |ण्डकक्रमेण तावद्वक्तच्या यावद्वैमानिकानां, केवलंयत्रास्ति विशेषस्तं दर्शयति-'नवर'मित्यादि, नवरं वनस्पतिकायिकानां मनुष्यत्वचिन्तायामतीताः पुरस्कृताश्च प्रत्येकमनन्ता वक्तव्याः, अनन्तानां पूर्वमधिगतचतुर्दशपूर्वाणां यथायोगमेकशो| द्वित्रिर्वा कृताहारकसमुद्घातानां वनस्पतिष्ववस्थानात् अनन्तरमेव वनस्पतिकायादुवृत्यानन्तर्येण पारम्पर्येण वा मानु-8 पत्यमवाप्य यथायोगमेको द्विः त्रिचतुर्वाऽऽहारकसमुद्घातानां निर्वयिष्यमाणत्वात् , मनुष्याणां मनुष्यत्वावस्थाया-18 मतीताः पुरस्कृताश्च स्यात्सङ्ग्येयाः स्यादसङ्ख्येयाः,कथमिति चेत् ,उच्यते, ते हि प्रश्नसमयभाविनः उत्कर्षपदेऽपि सर्वस्तोकार, श्रेण्यसङ्ख्येयभागगतप्रदेशराशिप्रमाणत्वात् , ततो विवक्षितप्रश्नसमयभाविनां मध्ये कदाचिदसधेयाः-यथायोग प्रत्येकमेकशी द्विः त्रिश्चतुर्वा कृतकरिष्यमाणाहारकसमुद्घाताः प्राप्यन्ते, उपसंहारमाह-एव'मित्यादि, एवमुक्तेन प्रकारेण एते आहारकसमुद्घातविषयाश्चतुर्विंशतिश्चतुर्विशतिसङ्ख्याका दण्डका वक्तव्याः, सम्प्रति केवलिसमुद्घातं चिन्तयति-'नेरइयाण मित्यादि, केवलिसमुद्घातोऽपि मनुष्यत्वावस्थायां भवति, न शेषाखवस्थासु, न च कृतकेवलिसमुद्घातः संसारं पर्यटति, केवलिसमुद्घातानन्तरमन्तर्मुहूत्तैनावश्यं निःश्रेयसपदाधिगमात्, ततो नारकाणां मनुष्यत्ववर्जासु शेषाखवस्थाखतीताः पुरस्कृताश्च केवलिसमुद्घाताः प्रतिषेद्धव्याः, मनुष्यत्वावस्थायामप्यतीताः प्रतिषेव्याः, कृतकेवलिसमुद्घातानां नरके गमनाभावात् , भाविनश्च भविष्यन्ति, प्रश्नसमयभाविनां मध्ये बहूनामसङ्ख्ये अनुक्रम [६०६] SARERatininemarana ~260~ Page #261 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (१५) प्रत सूत्रांक [३३६ ] दीप अनुक्रम [६०६] मूलं [३३६ ] पदं [३६], --------------उद्देशक: [-1, -------------- दारं [-], पूज्य आगमोद्धारकश्री संशोधितः मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र [१५],उपांगसूत्र-[४] "प्रज्ञापना" मूलं एवं मलयगिरि-प्रणीता वृत्तिः प्रज्ञापनाया मलय० वृसौ. ॥५७७॥ “प्रज्ञापना” – उपांगसूत्र - ४ ( मूलं + वृत्तिः ) - Education f यानां नारकाणां मुक्तिपदगमनयोग्यत्वात्, ततः पुरस्कृता असङ्ख्येया इत्युक्तं, 'एव' मित्यादि, यथा नैरविकाणां केवलिसमुद्घातचिन्ता कृता एवमसुरकुमारादीनामपि कर्त्तव्या, सा च तावत् यावत् वैमानिकानां, अत्रैव विशेपमाह - 'नवर' मित्यादि, नवरं वनस्पतिकायिकानां मनुष्यत्वावस्था चिन्तायामतीताः प्रतिषेद्धव्याः, कृतकेवलिसमुयातानां संसाराभावात्, पुरस्कृतास्त्वनन्ता वाच्याः, प्रश्नसमय भाविनां वनस्पतिकायिकानां मध्ये बहूनामनन्तानां वनस्पतिकायिकानां वनस्पतिकायादुद्धृत्यानन्तर्येण पारम्पर्येण वा कृतके वलिसमुद्घातानां सेत्स्यमानत्वात्, मनुष्याणां मनुष्यत्वावस्था चिन्तायामतीताः कदाचित्सन्ति कदाचिन्न सन्ति कृतकेवलिसमुद्घा तानां सिद्धत्वभावादन्येषां चाद्यापि केवलिसमुद्घाताप्रतिपत्तेः, यदापि सन्ति तदाऽपि जघन्यत एको द्वौ वा त्रयो वा उत्कर्षतः शतपृथक्त्वं, पुरस्कृताः स्यात्सङ्ख्येयाः स्यादसङ्ख्येयाः, प्रश्नसमयभाविनां मनुष्याणां मध्ये कदाचित्सयेयानां कदाचिदसङ्ख्यानां यथायोगमानन्तर्येण पारम्पर्येण कृतकेवलिसमुद्घातानां सेत्स्यमानत्वात् सूत्रसर्वसङ्ख्यामाह - एवमुकेन प्रकारेण एते केवलिसमुद्घातविषयाश्चतुर्विंशतिश्चतुवैिशतिदण्डकाः ते च सर्वेऽपि पृच्छायां पृच्छापुरस्सरं भणितव्याः कियद्दूरं यावदित्याह - वैमानिकानां वैमानिकत्वविषयं सूत्रं, तवेदं- 'वेमाणियाणं भंते ! बेमाणियचे केवइया केवलिसमुग्धाया अतीता ?, गो० ! नत्थि, के० पु० १, गो० ! नत्थि' इति ॥ वदेवमुक्ता नैरयिकादिषु वैमानिकपर्यवसानेष्येकत्वविशिष्टेषु बहुत्वविशिष्टेषु च भूतभाविवेदनादिसमुद्घातसम्भवासम्भवपुरस्सरं सङ्ख्या प्रमाणप्ररूपणा, सम्प्र For Parts Only ------ ~261~ ३६ समुधातपदं नारका दीनां नारकत्वादी समुद्धा ताः सू. ३३६ ॥५७७॥ Page #262 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (१५) प्रत सूत्रांक [३३७ -३३८] दीप अनुक्रम [६०७-६०८] “प्रज्ञापना” – उपांगसूत्र - ४ ( मूलं + वृत्ति:) पदं [३६], - दारं [-], - मूलं [ ३३७-३३८] ------- उद्देशक: [ - ], पूज्य आगमोद्धारकश्री संशोधितः मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र [१५],उपांगसूत्र-[४] "प्रज्ञापना" मूलं एवं मलयगिरि-प्रणीता वृत्तिः ➖➖➖➖➖➖➖➖➖➖➖➖➖ ति तेन तेन समुद्घातेन यावत् केवलिसमुद्घातेन समुद्धतानामसमुद्धतानां च परस्परमल्पबहुत्वमभिधित्सुराहएतेसि णं भंते ! जीवाणं वेदणासमुग्धातेणं कसायस० मारणंतिय० बेडवियस० तेयस आहारगस० केवलिस० समोहयाणं असमोहयाण य करेहिंतो अ० ब० तु० वि० १, गो० ! सवत्थोवा जीवा आहारगसमुग्धाएणं समोहया केवलिसमुग्धाणं संमोहता संखे० तेयमसमुग्धाएणं समोहया असं० वेउच्वियसमुग्धाएणं समो० असं मारणंतियसमु० समो० अनंतगुणा कसायस० स० असं० वेदणास विसेसाहिया असंमोहया असंखिजगुणा (सूत्रं ३३७ ) एतेसि णं भंते ! नेरइयाणं वेदणासमुग्धाएणं कसायस० मारणंतियस० वेउडियस समोहयाणं असमोहयाण य कतरेर हिंतो अप्पा वा ४, गो० ! सवत्थोवा नेरइया मारणंतियसमुग्धातेणं समोहया वेउचियसमुग्धावेणं समोहया असं० कसायसम्मुघाणं समोहता संखे वेदणासमुग्धा समो० संखे० असमोहया संखे० । एतेसि णं भंते ! असुरकुमाराणं वेदणासमुग्धाणं कसायस० मारणंतियस बेउल्वियस० तेयगस० समोहताणं असमोहताण य कयरेर हिंतो अप्पा वा ४ १, गो० ! सबत्थोवा असुरकुमारा तेयगसमुग्धाएणं समोहया मारणंतियस० स० असं० वेदणास० स० असं० कसायसमु० स० [सं०] वेउचियसम्र० स० संखे० असमोहया असंखेजगुणा एवं जाव थणियकुमारा। एएसि णं भंते! पुढविकाइयाणं वेदणास० ३१, गो० ! सहत्थोवा पुढविकाइया मारणंतियसमुग्धाएणं समोहया कसायसमुग्धाएणं समोहया सं० वेदणासमु० स० विसेसाहिया असमोहया असं०, एवं जाव वणस्सइकाइया, णवरं सहत्थोवा बाउकाइया वेउचियसमुग्धाएणं समोहया मारणंतियसमु० समो० असंखेजगुणा कसायसमुग्धा० स० सं० वेदणास० स० विसेसाहिया असमो For Parts Only ~262~ 59৯90/99299 Page #263 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (१५) “प्रज्ञापना" - उपांगसूत्र-४ (मूलं+वृत्ति:) पदं [३६], -------------- उद्देशक: -,------------- दारं -1, -------------- मूलं [३३७-३३८] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र-[१५]उपांगसूत्र-[४] "प्रज्ञापना" मूलं एवं मलयगिरि-प्रणीता वृत्ति: प्रत सूत्रांक [३३७-३३८] प्रज्ञापनाया: मलय.वृत्ती. द्घातपर्द समुदातानामल्पब| हुत्वं सू. ३३७-३३८ Iષ૮ कटe दीप अनुक्रम हया असंखेजगुणा । बेइंदियाणं भंते ! बेदणासमुग्घाएणं कसायस मारणंतियस० समोहयाणं असमोहयाण य कतरे२ हितो अप्पा वा ४१, गो! सबथोवा बेइंदिया मारणतियसमुग्धाएणं समोहया वेदणासमुग्धातेणं समोहया असंखे० कसायस० समो० असंखे० असमोहया संखे०, एवं जाव चारिदिया । पंचिंदियतिरिक्खजोणियाणं भंते ! वेदणास समो० कसायसमुग्धातेणं मारणंतियस० वेउबियस० तेयासमु० समोहयाणं असंमोहयाण य कतरे।हिंतो अप्पा वा ४१, गो! सबथोवा पंचिदियतिरि० तेयासमु० समोहया वेउ० समु० समो० असं० मारणंतियस० समो० असं० वेदणास समो. असं० कसायस० समो० संखे० असमवहता संखे । मणुस्साणं भंते । वेदणासमुपातेणं समोहयाणं कसायसमु० मारणंतियस० वेउबियस. तेथगस आहारगसमुग्धाएणं केवलिस० समोहयाणं असमोहयाण य कयरे २हिंतो अप्पा वा ४१, गो०! सबथोवा मणुस्सा आहारगस समोहया केवलिस० स० संखे० तेयगस० समो० संखे० चेउबियस समो० संखे० मारणंतियस समो० असं० वेदणास० स० असं० कसायस० स० संखे० असमोहया असं०।वाणमंतरजोइसियवेमाणियाणं जहा असुरकुमाराणं (मूत्र ३३८) 'एएसि ण'मित्यादि, एतेषां-यथायोगं प्राक् समवहतासमयहतत्वेन निरूपितानां भदन्त ! सामान्यतो जीवानां वेदनासमुदघातेन यावत् केवलिसमुद्घातेन समवहतानामसमवहतानां च मध्ये कतरे कतरेभ्योऽल्पाः कतरे कतरेभ्यो बहुकाः-सङ्ख्येयासक्येयादिगुणतया प्रभूताः कतरे कतरेस्तुल्या:-समसयाकाः, अत्रार्थे सूत्रे विभक्तिपरिणामः खयं योजनीयः, कतरे कतरेभ्यो विशेषाधिकाः-मनागधिकाः, वाशब्दाः सर्वेऽपि विकल्पार्थाः, भगवानाह-गौतम! Prade202030 [६०७ ॥५७८॥ -६०८] SAREauratonintimational ~263 Page #264 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (१५) “प्रज्ञापना" - उपांगसूत्र-४ (मूलं+वृत्ति:) पदं [३६], -------------- उद्देशक: -,------------- दारं -1, -------------- मूलं [३३७-३३८] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र-[१५]उपांगसूत्र-[४] "प्रज्ञापना" मूलं एवं मलयगिरि-प्रणीता वृत्ति: e प्रत सूत्रांक [३३७-३३८] सर्वस्तोका जीवा आहारकसमुद्घातेन समुद्धताः, आहारकशरीरिणो हि कदाचिदिह लोके षण्मासान् यावन्न भवन्त्यपि, यदापि भवन्ति तदापि जघन्यत एको द्वौ त्रयो वा उत्कर्षतः सहस्रपृथक्त्वं, केवलमाहाकसमुद्घात आहारकशरीरप्रारम्भकाले न शेषकालं ततः स्तोका एष युगपदाहारकसमुद्घाताः प्राप्यन्ते इति सर्वस्तोका आहारकसमुदघोतन समुद्धताः, तेभ्यः केवलिसमुद्घातेन समुद्धताः सङ्ख्येयगुणाः,तेषामेककालं शतपृथक्त्वेन प्राप्यमाणत्वात्, यद्यप्याहारकशरीरिणः सत्तया समकालं एको द्वौ वा त्रयो वा उत्कर्षतः सहस्रपृथक्त्वमानाः प्राप्यन्ते तथाप्या(पिस्तोकानामा)हारकसमुद्घातसम्भवात् एककालमतिस्तोकाः प्राप्यन्ते इति न तेभ्यः केवलिसमुद्घातसमुद्धतानां सङ्ख्येयगुणत्वविरोधः, केवलिसमुद्घातसमुद्धतेभ्यः तैजससमुद्घातेन समवहताः असङ्ख्यगुणाः, पञ्चेन्द्रियतिर्यग्योनिकानां मनुष्याणां देवानामपि च तैजससमुदूघातसम्भवात् , तेभ्योऽपि वैक्रियसमुद्घातेन समुद्घताः असङ्ख्येयगुणाः, नारकवातकायिकानामपि वैक्रियसमुद्घातसम्भवात् , वातकायिकाश्च वैक्रियलब्धिमन्तोन स्तोकाः, किन्तु देवेभ्योप्यसोयगुणाः, कथमेतदिति चेत्, उच्यते, इह बादरपर्याप्तवायुकायिकाः स्थलचरपञ्चेन्द्रियेभ्योऽसोयगुणाः, महादण्डके तथा पठितत्वात् , स्थलचरपञ्चेन्द्रियाश्च देवेभ्योऽप्यसोयगुणाः, ततो यद्यपि बादरपर्याप्तवायुकायि कानां सोयभागमात्रस्य वैकियलब्धिसम्भवो, यत उक्तम्-“तिण्हं ताव रासीणं घेउषियलद्धी चेव नत्थि, पायपरपजत्ताणपि संखेज्जइभागमेत्ताणं"ति, तथापि सङ्ख्येयभागमात्रा वैक्रियलब्धिमन्तो देवेभ्योऽप्यसङ्ख्येयगुणा भवन्ति, दीप अनुक्रम बरserceaeeseseksemedeceme [६०७ -६०८] ~264~ Page #265 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (१५) “प्रज्ञापना" - उपांगसूत्र-४ (मूलं+वृत्ति:) पदं [३६], -------------- उद्देशक: -,------------- दारं -1, -------------- मूलं [३३७-३३८] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र-[१५]उपांगसूत्र-[४] "प्रज्ञापना" मूलं एवं मलयगिरि-प्रणीता वृत्ति: प्रत सूत्रांक [३३७-३३८] ततो नैरयिकाणां वायुकायिकानां च वैक्रियसमुद्घातसम्भवादुपपद्यन्ते तैजससमुद्घातसमुद्धतेभ्यो वैक्रियसमुद्घातेन । प्रज्ञापना ३६ समुया मलसमुद्धताः असङ्ख्ययगुणाः, तेभ्योऽपि मारणान्तिकसमुद्घातेन समुद्धता अनन्तगुणाः, कथं ?, उच्यते, इह निगोद- द्घातपदं यावृत्ती. जीवानामनन्तानामसोयो भागः सदा विग्रहगती वर्तमानः प्राप्यते, ते च प्रायो मारणान्तिकसमुद्घातसमुद्धता NANसमुद्धाताइति पूर्वेभ्योऽनन्तगुणाः, तेभ्योऽपि कषायसमुद्घातसमुद्धता असङ्ख्येयगुणाः, निगोदजीवानामेयानन्तानां विग्रहग-1 नामल्पन॥५७९॥ त्यापन्नेभ्योऽसङ्ख्येयगुणानां कषायसमुद्घातसमुद्धतानां सदा प्राप्यमाणत्वात् , तेभ्योऽपि वेदनासमुद्घातेन समुद्धता | हुत्वं सू. विशेषाधिकाः,तेषामेव निगोदजीवानामनन्तानां कषायसमुद्घातसमुद्धतेभ्यो मनाक् विशेषाधिकानां सदा वेदनासमु-३३७-३३८ द्घातेन समुद्घततयाऽवाप्यमानत्वात् , तेभ्योऽपि एकेनापि समुद्घातेनासमुद्धता असङ्ख्येयगुणाः,वेदनाकषायमरणसमुद्घातसमुदूघतेभ्यो निगोदजीवानामेवासङ्ख्ययगुणानामसमवहतानां सदा लभ्यमानत्वात् ।सम्प्रत्येतदेवाल्पबहुत्वं जीवविशेषेषु नैरयिकादिषु चतुर्विशतिदण्डकक्रमेण यथायोगं चिचिन्तयिषुराह-'नेरइयाण मित्यादि प्रश्नसूत्रं, भगवानाह-सर्वस्तोका नैरयिका मारणान्तिकसमुद्घातेन समुद्धताः, मारणान्तिको हि समुद्घातो मरणकाले भवति, मरणं च शेषजीवन्नारकराश्यपेक्षयाऽतितोकानां, न च सर्वेषां नियमाणानामविशेषेण मारणान्तिकसमुद्घातः, किन्तु कतिपयानां, 'समोहयावि मरति असमोहयावि मरंतीति वचनात् , अतः सर्वस्तोका मारणान्तिकसमुद्घात18 समुद्धताः, तेभ्योऽपि वैक्रियसमुपातेन समुद्धताः असङ्ख्येयगुणाः, सप्तखपि पृथिवीषु प्रत्येकं बहूनां परस्परवेदनो escenceरयररररर दीप अनुक्रम [६०७ -६०८] REaratima S uniorary.orm ~265~ Page #266 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (१५) “प्रज्ञापना” – उपांगसूत्र-४ (मूलं+वृत्ति:) पदं [३६], -------------- उद्देशक: -,------------- दारं -1, -------------- मूलं [३३७-३३८] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र-[१५]उपांगसूत्र-[४] "प्रज्ञापना" मूलं एवं मलयगिरि-प्रणीता वृत्ति: प्रत सूत्रांक [३३७-३३८] eceaeseseisease दीरणाय निरन्तरमुत्तरक्रियसमारम्भसम्भवात् , तेभ्योऽपि कपायसमुद्घातेन समुद्धताः सङ्ख्येयगुणाः, कृतोत्तरक्रियाणामकृतोत्तरवैक्रियाणां च सर्वसङ्ख्ययोत्तरवैक्रियारम्भकेभ्योऽसङ्ख्येयगुणानां कषायसमुद्घातसमुद्धतत्वेन प्राप्यमाणत्वात् , तेभ्योऽपि वेदनासमुद्घातेन समुद्धताः सङ्ख्येयगुणाः, यथायोग क्षेत्रजपरमाधार्मिकोदीरितपरस्परोदी-. |रितवेदनाभिः प्रायो बहूनां सदा समुद्धतत्वेन प्राप्यमाणत्वात् , तेभ्योऽप्ये केनापि समुद्घातेनासमवहताः सङ्ख्येयगुणाः, वेदनासमुद्घातमन्तरेणाप्यतिबहूनां सामान्यतो वेदनामनुभवतां सम्भवात् । सम्प्रत्यसुरकुमाराणामल्पबहुत्वमाह-एएसि ण'मित्यादिप्रश्नसूत्रं सुगम, भगवानाह-गौतम ! सर्वस्तोकाः असुरकुमारास्तैजससमुद्घातेन समुद्धताः, तैजसो हि समुद्घातो महति कोपावेशे क्वचित् कदाचित्केषाञ्चिद्भवति, ततस्तेन समुद्घातेन समुद्धताः। सर्वस्तोकाः, तेभ्यो मारणान्तिकसमुद्घातेन समुद्धताः असङ्ख्येयगुणाः, तेभ्यो वेदनासमुद्घातेन समुद्धताः असङ्खयेयगुणाः, परस्परं युद्धादी बहूनांवेदनासमुघातेन समुद्घतानां प्राप्यमाणत्वात् , तेभ्योऽपि कपायसमुधातेन समु. द्धताः सङ्खयेयगुणाः, येन तेन वा कारणेन बहूनां कषायसमुद्घातगमनसम्भवात् , तेभ्योऽपि वैक्रियसमुघातेन समुद्धताः सङ्ख्येयगुणाः, परिचारणाधनेकनिमित्तमतिबहूनामुत्तरक्रियकरणारम्भसम्भवात् , तेभ्योऽप्यसमवहता असोयगुणाः, बहूनामुत्तमजातीनां सुखसागरायगाढानां पूर्वोक्तेभ्योऽसहयगुणानां केनापि समुद्घातेनासमवहतानां सदा लभ्यमानत्वात् , 'एवं'मित्यादि, यथा असुरकुमाराणामल्पबहुत्वमुक्तमेवं सर्वेषां भवनपतीनां द्रष्टव्यं Escorseenetratecomes दीप अनुक्रम [६०७ -६०८] " murary.org ~266~ Page #267 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (१५) “प्रज्ञापना" - उपांगसूत्र-४ (मूलं+वृत्ति:) पदं [३६], -------------- उद्देशक: -,------------- दारं -1, -------------- मूलं [३३७-३३८] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र-[१५]उपांगसूत्र-[४] "प्रज्ञापना" मूलं एवं मलयगिरि-प्रणीता वृत्ति: प्रत सूत्रांक [३३७-३३८] प्रज्ञापनायामलयवृत्ती. 1५८०॥ दीप यावत् स्तनितकुमाराणामिति । सम्प्रति पृथिवीकायिकगतमल्पबहुत्वमाह-एएसि 'मित्यादि, अत्र कषायसमु-|३६ समुघातसमदतांनां वेदनासमुद्रातसमुद्धतानां च सजयेयगुणत्वे असमवहतानां चासोयगुणत्वे भावना स्वयं भाव- धातपद नीया, सुगमत्वात् , 'एव'मित्यादि, पृथिवीकायिकगतेन प्रकारेणाल्पबहुत्वं तावद्वक्तव्यं यावद्वानस्पतिकायिका: समुखातावायुकायिकान् प्रति विशेषममिधित्सुराह-'नवर मित्यादि, नवरं वातकायिकानामल्पबहुत्वचिन्तायामेयं वक्तव्यं-ना हुत्वं सू. सर्वस्तोका वातकायिका वैक्रियसमुद्घातन समुद्धताः, बादरपर्याससक्येयभागस्य वैक्रियलब्धेः सम्भवात् , तेभ्योऽपि |मारणान्तिकसमुद्घातेन समुद्धता असोयगुणाः, पर्याप्तापर्याससूक्ष्मवादरभेदभिन्नानां सर्वेषामपि पातकायिकानां मरणसमुद्घातसम्भवात् , तेभ्योऽपि कषायसमुद्घातेन समुद्धताः सवयगुणाः, तेभ्योऽपि वेदनासमुद्घातेन समुद्धता विशेषाधिकाः, तेभ्योऽसमवहता असङ्ख्येयगुणाः, सकलसमुद्घातगतघातकायिकापेक्षया खभावस्थानां वातकायिकानां खभावत एवासङ्ख्येयगुणतया प्राप्यमाणत्वात् । हीन्द्रियसूत्रे सर्वस्तोकाः द्वीन्द्रिया मारणान्तिकसमुद्घातेन समुद्धताः, प्रतिनियतानामेव प्रश्नसमये मरणसद्भावात् , तेभ्यो वेदनासमुद्घातेन समुद्धता असङ्ख्येयगुणाः, शीतातपादिसम्पर्कतोऽतिप्रभूतानां वेदनासमुद्घातभावात् , तेभ्यः कषायसमुद्घातेन समुद्धता असङ्ख्येयगुणाः, अतिप्र- ५८०॥ भूततराणां लोभादिकषायसमुद्घातभावात् , तेभ्योऽप्यसमवहताः सङ्ग्येयगुणाः, 'एव'मित्यादि, एवं द्वीन्द्रियगतेन । प्रकारेण तावद् वक्तव्यं यावच्चतुरिन्द्रियाः । तिर्यपञ्चेन्द्रियसूत्रे सर्वस्तोकास्सैजससमुद्घातेन समुद्धताः, कतिपयाना अनुक्रम [६०७ -६०८] ~267~ Page #268 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (१५) “प्रज्ञापना" - उपांगसूत्र-४ (मूलं+वृत्ति:) पदं [३६], -------------- उद्देशक: -,------------- दारं -1, -------------- मूलं [३३७-३३८] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र-[१५]उपांगसूत्र-[४] "प्रज्ञापना" मूलं एवं मलयगिरि-प्रणीता वृत्ति: प्रत सूत्रांक [३३७-३३८] 8 मेव तेजोलब्धिभावात, तेभ्यो वेदनासमुद्घातेनासमबहताः असङ्ख्येयगुणाः, तेभ्योऽपि वैक्रियसमुद्घातेन समवहताः & असङ्ख्येयगुणाः, प्रभूतानां वैक्रियलब्धेर्भावात् , तेभ्योऽपि मारणान्तिकसमुद्घातेन समवहता असङ्ख्येयगुणाः, सम्मूछिमजलचरस्थलचरखचराणामपि सर्वेषां वैक्रियलब्धिरहितानां प्रत्येकं पूर्वोक्तभ्योऽसद्धयेयगुणानां केषाश्चित् गर्भजानामपि वैक्रियलन्धिरहितानां चैकियलब्धिमतां च मरणसमुद्घातसम्भवात् , तेभ्योऽपि वेदनासमुद्घातेन समुद्धताः असङ्ख्येयगुणाः, म्रियमाणजीवराश्यपेक्षया अपि अम्रियमाणानामसोयगुणानां वेदनासमुद्रातभावात्, तेभ्यः कपायसमुद्घातेन समुद्धताः सङ्ग्येयगुणाः, तेभ्योऽप्यसमवहताः सङ्ख्येयगुणाः, अत्र भावना प्रागिव । मनुष्यसूत्रे सर्वस्तोका आहारकसमुद्घातेन समुद्धताः, अतिस्तोकानामेककालमाहारकशरीरप्रारम्भसंभवात् , तेभ्यः केवलिसमुघातेन समुद्धताः सङ्घयेयगुणाः, शतपृथक्त्वसङ्ख्यया प्राप्यमाणत्वात् , तेभ्यस्तैजससमुद्घातेन समवहताः सङ्घयेयगुणाः, शतसहस्रसङ्घयया तेषां प्राप्यमाणत्वात् , तेभ्योऽपि वैकियसमुद्घातेन समुद्धताः सङ्ख्ययगुणाः, कोटीसङ्ख्यया लभ्यमानत्वात् , तेभ्योऽपि मारणान्तिकसमुद्घातेन समवहता असोयगुणाः, सम्मूछिममनुष्याणामपि तद्भावात् , तेषां चासशवेयत्वात् , तेभ्योऽपि वेदनासमुद्घातेन समुद्धता असलयेयगुणाः, म्रियमाणराश्यपेक्षया असोयगुणानामनियमाणानां तद्भावसम्भवात् , तेभ्यः कपायसमुद्घातेन समुद्धताः सहबेयगुणाः, प्रभूततया तेषां प्राप्यमाणत्वात्, तेभ्योऽप्यसमवहता असङ्ख्येयगुणाः, सम्मूछिममनुष्याणामल्पकषायाणामुत्कटकपायिभ्योऽसद्धयेयगुणानां सदा Sececece sectroectseeeeeees selcerseatisemesteerce दीप अनुक्रम [६०७ -६०८] ~268~ Page #269 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (१५) “प्रज्ञापना" - उपांगसूत्र-४ (मूलं+वृत्ति:) पदं [३६], -------------- उद्देशक: -,------------- दारं -1, -------------- मूलं [३३७-३३८] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र-[१५]उपांगसूत्र-[४] "प्रज्ञापना" मूलं एवं मलयगिरि-प्रणीता वृत्ति: प्रत सूत्रांक [३३७-३३८] प्रज्ञापनायाः मल- यवृत्ती. ॥५८॥ स. सू. ३३९ दीप अनुक्रम लभ्यमानत्वात् । व्यन्तरज्योतिप्कवैमानिका यथा असुरकुमारास्तथा वक्तव्याः । तदेवमुक्तं समुद्धतासमुद्धतवि-1 10३६ समुषयमल्पबहुत्वं, अधुना कषायसमुद्घातगतां विशेषवक्तव्यतामभिधित्सुराह द्घातपर्द कति णं भंते ! कसायसमुग्धाया पणत्ता ?, गो०! चत्तारि कसायसमुम्घाया पं० तं-कोहसमुग्धाते माणस० मायास० स्वपरस्थालोहस०, नेरइयाणं भंते ! कतिकसायसमुग्धाया पं०१, गो! चत्तारि कसायसमुग्धाता पं० एवं जाव वेमाणियाणं, ने कषायएगमेगस्सणं मत! नेरइयस्स केवतिता कोहसमुग्धाता अतीता, गो! अणंता, केवतिता पुरे०, गो०! कस्सइ अस्थि कस्सइ नत्थि, जस्सत्थि जहण्णेणं एको वा दो वा तिणि वा उको संखेजा वा असंखेजा वा अणता वा, एवं जाव वेमाणियस्स, एवं जाव लोभसमुग्धाते एते चत्तारि दंडगा । नेरइयाणं भंते ! केवइया कोहसमु० अतीता, गो.! अणंता, के० पु.१, मो०! अणंता, एवं जान चेमाणियाणं, एवं जाव लोभसमुग्याए, एवं एएवि चत्वारि दंडगा। एगमेगस्स णं मंते ! नेरइयस्स नेरइयचे केवइया कोहस० अतीता, गो ! अणंता, एवं जहा वेदणासमुग्धातो भणितो तहा कोहसमुग्घातोवि निरवसेस जाव बेमाणियत्ते, माणसमुग्धाए मायासमुग्धातेवि निरवसेसं जहा मारणतियसमुग्धाते ॥५८॥ लोहसमुग्घातो जहा कसायसमुग्धातो नवरं सबजीवा असुरादिनेरइएसु मोहकसाएणं एगुत्तरियाते नेतबा । नेरइइयाणं भंते ! नेरइयत्ते केवइया कोहसमु० अतीता, गो० अर्णता, के० पु०१, गो० अर्णता, एवं जाव वेमाणियत्ते, एवं सहाणपरहाणेसु सवत्थ भाणियबा, सबजीवाणं चचारिवि समुन्धाया जाव लोभसामुग्धातो जाव वेमाणियाणं वेमाणियत्ते (सूत्र ३३९) [६०७ 9868800 -६०८] Judurary.com ~269~ Page #270 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (१५) “प्रज्ञापना” – उपांगसूत्र-४ (मूलं+वृत्ति:) पदं [३६], -------------- उद्देशक: [-], ------------- दारं --------------- मूलं [३३९] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र-[१५]उपांगसूत्र-[४] "प्रज्ञापना" मूलं एवं मलयगिरि-प्रणीता वृत्ति: प्रत सूत्रांक [३३९] दीप 'कइ णमित्यादि, इदं सामान्यतः कषायसमुद्घातविषयं चतुर्विंशतिदण्डकक्रमगतं च सूत्रं सुप्रतीतं, सम्प्रत्येक| कस्य नैरयिकादेश्चतुर्विंशतिदण्डकक्रमेण वैमानिकपर्यवसानस्य तद्वक्तव्यतामाह-'एगमेगस्स णं भंते !' इत्यादि, | अत्रातीतसूत्रं सुप्रतीतं, पुरस्कृतसूत्रे 'कस्सइ अस्थि कस्सइ नत्थिति यो नरकभवप्रान्ते वर्तमानः खभावत एवाल्पकपायः कषायसमुद्घातमन्तरेण कालं कृत्वा नरकादुवृत्तो मनुष्यभवं प्राप्य कपायसमुद्घातमगत एवं | सेत्स्यति तस्य नास्ति पुरस्कृत एकोऽपि कषायसमुद्घातो, यस्यापि सन्ति तस्यापि जघन्यत एको द्वौ त्रयो वा, ते 8 च प्रागुक्तस्वरूपस्य सकृत्कषायसमुद्घातगामिनो वेदितव्याः, उत्कर्षतः सङ्ख्येया असङ्खयेया अनन्ता वा, तत्र सङ्ख्येयं ॥ कालं संसारावस्थायिनः सहयेयाः असावेयं कालमसद्धबेयाः अनन्तकालमनन्ताः, एवमसुरकुमारादिक्रमेण तावद् वाच्यं यावद्वैमानिकस्य, एव'मित्यादि, एवं-चतुर्विंशतिदण्डकक्रमेण मानादिकषायसमुद्घातसमुद्धतास्तावद्वक्तव्याः यावल्लोभसमुद्घातः, एवमते चत्वारः चतुविशतिदण्डका भवन्ति, एते चैकैकनरयिकादिविषया उक्ताः, सम्प्रत्येतानेव चतुश्चतुर्विंशतिदण्डकान् सकलनारकादिविषयानाह-'नेरइयाण'मित्यादि, अतीतसूत्रं सुप्रतीतं, पुरस्कृता अनन्ताः, प्रश्चसमयभाविनां नारकाणां मध्ये बहूनामनन्तकालमवस्थायित्वात् , एवं-नैरयिकोक्तेन प्रकारेण तावद् वक्तव्यं यावद्वैमानिकानां । यथा चैषः क्रोधसमुद्घातश्चतुर्विंशतिदण्डकक्रमेणोक्तः एवं मानादिसमुद्घाता अपि तावद् वक्त|व्या यावलोभसमुदूपातः । एवमेतेऽपि सकलनारकादिविषयाश्चत्वारश्चतुर्षिशतिदण्डका भवन्ति, साम्प्रतमेकेकस्य | अनुक्रम [६०९] ~270~ Page #271 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (१५) “प्रज्ञापना" - उपांगसूत्र-४ (मूलं+वृत्ति:) पदं [३६], -------------- उद्देशक: [-]------------- दारं [-], -------------- मूलं [३३९] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र-[१५]उपांगसूत्र-[४] "प्रज्ञापना" मूलं एवं मलयगिरि-प्रणीता वृत्ति: प्रत सूत्रांक [३३९] १० सू. दीप प्रज्ञापना- निरयिकादेनैरयिकादिषु भावेषु वर्तमानस्य कति क्रोधसमुद्घाता अतीताः कति भाविन इति निरूपयितुकाम आह-1|२६ समुया: मल- 'एगमेगस्स णमित्यादि, एकैकस्य भदन्त ! नैरयिकस्य विवक्षितप्रश्नसमयकालात् पूर्व सकलमतीतं कालमवधी- द्घातपदं यवृत्ती. कृत्य तदा तदाऽस्य नैरयिकत्वं प्राप्तस्य सतः सर्वसज्ञवया कियन्तः क्रोधसमुद्घाता अतीताः, भगवानाह-गौतम स्वपरस्था ने कषाय॥५८२॥ अनन्ताः, नरकगतेरनन्तशः प्राप्सत्वात् , एकैकस्मिंश्च नरकभये जघन्यपदेऽपि सङ्ख्ययानां क्रोधसमुद्घातानां भावात् , 'एवं जहे'त्यादि, एवमुपदर्शितेन प्रकारेण यथा वेदनासमुद्घातः प्राग भणितः तथा क्रोधसमुद्घातोऽपि भणितव्यः, कथं भणितव्य इत्याह-निरवशेष, क्रियाविशेषणमेतत्, सामस्येनेत्यर्थः, कियरं यावत् भणितव्यमित्याहयाबद वैमानिकत्वे, पैमानिकस्य वैमानिकत्व इत्यालापकं यावदित्यर्थः, स चैवं-केवइया पुरेक्खडा ?, गोयमा ! कस्सइ अस्थि कस्सइ नत्थि, जस्सस्थि जहणणं एको वा दो या तिषिण वा उकोसेणं संखेजा वा असंखेजा वा अणंता वा, एवमसुरकुमारत्ते जाव वेमाणियत्ते,''एगमेगस्स णं भंते ! असुरकुमारस्स नेरइयत्ते केवइया कोहसमुग्घाया अईया?, गो.! अणंता, केवइया पुरेक्खडा, गो! कस्सइ अस्थि कस्सइ नत्थि, जस्सत्थि तस्स सिय संखेजा सिय असं० सिय अणंता, एगमेगस्स णं भंते! असुरकुमारस्स असुरकुमारत्ते केवइया कोहसमुग्घाया ॥५.ना अतीता, गो.! अर्णता, केव. पुरे०, गो०! क. अस्थि क.नस्थि, जस्सस्थि जहएको वा दो वा तिण्णि वा उक्को संखेजा वा असंखेजा वा अर्णता वा, एवं नागकुमारत्ते जाव वेमाणियत्ते, एवं जहा असुरकुमारेसु नेर-11 अनुक्रम [६०९] 202929202 Home ~271 Page #272 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (१५) “प्रज्ञापना” – उपांगसूत्र-४ (मूलं+वृत्ति:) पदं [३६], -------------- उद्देशक: [-]------------- दारं [-], -------------- मूलं [३३९] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र-[१५]उपांगसूत्र-[४] "प्रज्ञापना" मूलं एवं मलयगिरि-प्रणीता वृत्ति: प्रत सूत्रांक [३३९] दीप |इया बेमाणियपजवसाणेसु भणिया तहा णागकुमारादिया सहाणपरहाणेसु भणियवा जाव वेमाणियत्ते' इति.IN अस्वार्थ:-कियन्तो भदन्त ! एकैकस्य नारकस्यासंसारमोक्षमनन्तं कालं मर्यादीकृत्य नैरयिकत्वे भाविनः सतः सर्व-18 सङ्ख्यया पुरस्कृताः क्रोधसमुद्घाताः ?, भगवानाह-'कस्सइ अस्थि' इत्यादि,य आसन्नमरणः क्रोधसमुद्घातमना-IN साद्यात्यन्तिकमरणेन नरकादत्तः सेत्स्यति तस्य नास्ति नेरयिकत्वभाविन एकोऽपि पुरस्कृतः क्रोधसमुद्घातः, शेप-15 स्य तु सन्ति, यस्यापि सन्ति तस्यापि जघन्यत एको द्वौ त्रयो वा, एतच क्षीणशेषायुषां तद्भवस्थानां भूयो नरकेषु । उ(प्वनुत्पद्यमानानां वेदितव्यं, भूयो नरके पूत्पत्ती हि जघन्यपदेऽपि सङ्खयेयाः प्राप्यन्ते, नरयिकाणां क्रोधसमुद्घा-1 तप्रचुरत्वात्, उत्कर्षतः सङ्ख्यया वा असहयेया वा अनन्ता वा, तत्र सकृन्नरकेषु जघन्यस्थितिकेषत्पत्स्यमानस्य सक्वेया अनेकशो यदिवा दीपस्थितिकेपु सकृदपि उत्पत्स्यमानस्यासस्ययाः अनन्तश उत्पत्स्यमानस्थानन्ताः, 'एच'मित्यादि, एवं-नैरयिकोक्तप्रकारेणासुरकुमारत्वे तदनन्तरं चतुर्विशतिदण्डकक्रमेण तावद् वक्तव्यं यावद्वैमानिकत्व-18 विषय सूत्रं, तथैव-'एगमेगस्स णं भंते ! नेरइयस्स चेमाणियत्ते केवइया कोहसमुग्घाया अईया?, गो.! अणंता, | केवइया पुरे०१, गो.! कस्सइ अस्थि क नत्थि, जस्सस्थि जहएको वा दो या तिणि वा उको संखेजा वा असं० अणंता वा, अत्राप्ययं भावार्थ:-अतीतचिन्तायामनन्ताः, अनन्तशो वैमानिकत्वस्य प्राप्तत्वात्, पुरस्कृतचिन्तायां योऽनन्तरभवे नरकादुत्तो मानुषत्वमवाप्य सेत्स्यति प्राप्तो वा परम्परया सकृद्वैमानिकभयं न क्रोधस-11 अनुक्रम [६०९] ~272 Page #273 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (१५) “प्रज्ञापना" - उपांगसूत्र-४ (मूलं+वृत्ति:) पदं [३६], -------------- उद्देशक: [-]------------- दारं [-], -------------- मूलं [३३९] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र-[१५]उपांगसूत्र-[४] "प्रज्ञापना" मूलं एवं मलयगिरि-प्रणीता वृत्ति: प्रत सूत्रांक प्रज्ञापनायाः मलयवृत्ती. ॥५८३॥ [३३९] दीप eeseeneteesecesरटरट मुद्धातं गन्ता तस्यैकोऽपि पुरस्कृतः क्रोधसमुद्घातो वैमानिकत्वे न विद्यते, यस्त्वसकृद्वैमानिकत्वं प्रासः सन् सकदेव कोधसमुद्घातं याता तस्य जघन्यत एको द्वौ वा त्रयो वा, शेषस्य सङ्ख्यातान् वारान् वैमानिकत्वं प्राप्स्यतःद्घातपदं सङ्ख्येयाः असङ्ख्येयान् पारान् असङ्ख्येयाः अनन्तान् वारान् अनन्ताः, 'एगमेगस्स ण'मित्यादि प्रश्नसूत्रं सुगम, स्वपरस्था'गो! अणता' इति, अनन्तशो नैरयिकत्वं प्रासस्य, एकैकमिश्च नैरयिकभवे जघन्यपदेऽपि सहयेयानां क्रोधसमु- ने कषायघातानां भावात् , पुरस्कृताः कस्यचित्सन्ति कस्यचिन्न सन्ति, किमुक्तं भवति-योऽसुरकुमारभवादुदृत्तो न स० सू. नरकं यास्यति किन्त्वनन्तरं परम्परया वा मनुष्यभवमवाप्य सेत्स्यति तस्य नैरयिकावस्थाभाविनः पुरस्कृताः क्रोध-11 | समुद्घाता न सन्ति, नैरयिकत्वावस्थाया एचासम्भवात्, यस्तु तद्भवादूयं पारम्पर्येण नरकगामी तस्य सन्ति, तस्यापि कस्यचित् समयेयाः कस्यचिदसङ्ख्येयाः कस्यचिदनन्ताः, तत्र यः सकृजघन्यस्थितिकेषु नरकमध्येषु समुत्पत्स्यते तस्य जघन्यपदेऽपि सङ्ख्येयाः दशवर्षसहस्रप्रमाणायामपि स्थितौ सङ्ख्येयानां क्रोधसमुद्घातानां भावात् , क्रोधबहुलत्वान्नारकाणां, असकृत् दीर्घस्थितिषु सकृद्वा गमनेऽसङ्ख्येयाः अनन्तशो नरकगमनेऽनन्ताः, तथा एफैकस्य । भदन्त ! असुरकुमारस्य असुरकुमारत्वे स्थितस्य सतः सकलमतीतकालमधिकृत्य कियन्तः क्रोधसमुद्घाता अतीताः?, भगवानाह-अनन्ताः अनन्तशोऽसुरकुमारभावस्व प्राप्सत्वात् , प्रतिभवं च क्रोधसमुद्घातस्य प्रायो भावात्, पुर JO॥५८३॥ स्कृतचिन्तायां कस्यापि सन्ति कस्यापि न सन्ति, यस्य प्रश्नकालादूर्व असुरकुमारत्वेऽपि वत्तेमानस्य न भावी अनुक्रम [६०९] ~273~ Page #274 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (१५) प्रत सूत्रांक [३३९] दीप अनुक्रम [६०९ ] प्र. ९८ पदं [ ३६ ], - - उपांगसूत्र - ४ ( मूलं + वृत्ति:) दारं [-1, “प्रज्ञापना" ------- उद्देशकः [-], ------- क्रोधसमुद्घातो नापि तत उद्वृत्तो भूयोऽप्यसुरकुमार याता तस्य न सन्ति यस्तु सकृदसुरकुमारत्वमागामी तस्य जघन्यपदे एको वा द्वौ वा त्रयो वा उत्कर्षतः सङ्ख्येया असङ्ख्येया अनन्ता वा सङ्ख्येयान् वारान् आगामिनः सङ्ख्या असलेयान् वारान् असयेयाः अनन्तान् वारान् अनन्ताः एवं चतुर्विंशतिदण्डकक्रमेण नागकुमारत्वादिपु स्थानेषु असुरकुमारस्य निरन्तरं तावद्वक्तव्यं यावद्वैमानिकत्वे, तथा चाह- 'एवं नागकुमारत्तेऽवी'त्यादि, तदेवमसुरकुमारेषु क्रोधसमुद्घातश्चिन्तितः सम्प्रति नागकुमारादिष्यतिदेशमाह - ' एव' मित्यादि, एवमुक्तेनाभिलापगतेन प्रकारेण यथा चतुर्विंशतिदण्डकक्रमेण असुरकुमारो नैरविकादिषु वैमानिकपर्यवसानेषु भणितः तथा नागकुमारादयः समस्तेषु स्वस्थानपरस्थानेषु भणितव्याः यावद्वैमानिकस्य वैमानिकत्वे आलापकः, एवमेतानि नैरयिकचतुर्थिशतिदण्डकादिसूत्राणि वैमानिकचतुर्थिशतिदण्डकपर्यवसानानि चतुर्विंशतिः सूत्राणि वेदितव्यानि । तदेवं चतुर्विंशतिदण्डकसूत्रैः क्रोधसमुद्घातश्चिन्तितः सम्प्रति चतुर्विंशत्यैव चतुर्विंशतिदण्डकसूत्रैर्मानसमुद्घातं मायासमुद्घातं चाभिधित्सुरतिदेशमाह- 'माणसमुग्धाए मायासमुग्धाए निरवसेसं जहा मारणंतियसमुग्धाए' इति, यथा-प्राकू मारणान्तिकसमुद्घातेऽभिहितं सूत्रं तथा मानसमुद्घाते मायासमुद्घाते च निरवशेषमभिधातव्यं तचैवं8 'एगमेगस्स णं भंते । नेरइयस्स नेरइयत्ते केवइया माणसमुग्धाया जईया १, गोयमा ! अनंता, केवइया पुरेक्खडा १, गो० 1 कस्सह अत्थि कस्सर नत्थि, जस्स अस्थि जहन्नेणं एको वा दो वा तिष्णि वा उक्कोसेणं संखे For FunPrs at Use Only ~274~ मूलं [३३९] incibrary.org Page #275 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (१५) “प्रज्ञापना" - उपांगसूत्र-४ (मूलं+वृत्ति:) पदं [३६], -------------- उद्देशक: [-]------------- दारं [-], -------------- मूलं [३३९] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र-[१५]उपांगसूत्र-[४] "प्रज्ञापना" मूलं एवं मलयगिरि-प्रणीता वृत्ति: प्रत सूत्रांक [३३९] या: मलयवृत्ती ||५८४॥ दीप eserveerse यावा असंखेवा कामणता वा, एक्मसुरकुमारचे जाच माफ्तेि , गमेनस्सयते। जनुरकुमारस्स नेश- ५ समुवत्ते केपश्या माणसमुग्धाया अतीता, गोषमा! वर्षता, केवड्या रेस्खडा,गोकस्सइ जत्यि कस्सघातपर्द नधि, जस्सत्थि जहन्ने एको वा दो वा तिन्नि वा उको संखेबा वा असंखेजा का असा चा, एवं नामकमा- स्वपरस्थातेजाव वेमाणिवत्ते, एवं जहा असुरकुमारे मेवया वेमाणिपषजयसाणेसु भणिया तहा नामकुमाराहमा सदाणाने कपायराणेस भाणियबा जाव येमाणिमस्स वेमाणियत्ते' अस्थावमधे:-अतीतेपु सूत्रेषु सर्वत्रावनन्तवं सुप्रतीतं. नैरवि- .. 8 ३३९ कत्वादिस्थानानि प्रत्येकमनन्तशः प्राप्तत्वात् , पुरस्कृतचिन्तायां स्वेचं नैरविकस नैरविकत्वे भावना-यो नैरविकार प्रश्नकालाय मानसमुदयातमन्तरेण कालं कृत्वा नरकादुहृत्तोऽनन्सरं पारम्पर्वण वा मनुष्यभवमवाप्य सेत्स्यति न भूयो नरकमागन्ता तस्य न सन्ति पुरस्कृता मानसमुद्घाताः, कपुनस्तद्भवे वर्चमानो भूयो वा नरकमागत्यैकं वारं मानसमुद्घातं गत्या कालकरपेन नरकादुत्तः सेत्स्वति तस्यैकः पुरस्कृतो मामसमुद्घातः, एवमेव कस्यापि द्वी कस्यापि त्रयः सक्ययान् वारान् नरकमागन्तुः सययाः असहवेयान् वारान् असोवाः अनन्तान् वारान् अनन्ताः, नरयिकस्यैवासुरकुमारत्वे पुरस्कृतचिन्तायामियं भावना-यो नरकादुहृत्तो असुरकुमारत्वं न यास्यति तस्य न सन्ति ॥५८४॥ पुरस्कृता मानसमुद्घाताः, यस्त्वेकं वारं गन्ता तस्स एको द्वौ ध्यादयो वा सङ्घबेयान् वारान् गन्तुः सङ्ख्ययाः असयेयान् वारान् असद्धयेयाः अनन्तान् वारान् अनन्ता, एवं तावद् भणनीयं यावत् तिर्यपञ्चेन्द्रियत्वे पुरस्कृत अनुक्रम [६०९] ~275~ Page #276 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (१५) “प्रज्ञापना” – उपांगसूत्र-४ (मूलं+वृत्ति:) पदं [३६], -------------- उद्देशक: [-], ------------- दारं [-], -------------- मूलं [३३९] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र-[१५]उपांगसूत्र-[४] "प्रज्ञापना" मूलं एवं मलयगिरि-प्रणीता वृत्ति: प्रत सूत्रांक [३३९] चिन्ता, मनुष्यचिन्तायां चैवं भावना-यो नरकादुहृत्तो मनुष्यभवं प्राप्य मानसमुद्घातमगत्वा सेत्स्यति तस्य नास्से-13 कोऽपि पुरस्कृतो मानसमुद्घातो, यस्तु मनुष्यत्वं गतः सन्नेक वारं मानसमुद्घातं गन्ता तस्यैकोऽपरस द्वावन्यस्य व्यादयः सङ्ख्येयान वारान् गन्तुः सङ्ख्येयाः असवयेयान् वारान् असङ्ख्ययाः अनन्तान् वारान् अनन्ताः, व्यन्तरज्योतिष्कवैमानिकत्वेषु भावना यथा असुरकुमारत्वे यथा च नैरयिकस्य नैरयिकत्वादिषु चतुर्विंशतिस्थानेषु भावना |कृता तथा असुरकुमारादीनामपि वैमानिकपर्यवसानानां चतुर्विशतिदण्डकक्रमेण कर्तव्या, यथा च मानसमुघातस्य चतुर्विशतिः सूत्राणि चतुर्विंशतिदण्डकक्रमेणोक्तानि तथा मायासमुद्घातस्यापि चतुर्विशतिसूत्राणि चतुर्विंशतिदण्डकक्रमेण वक्तव्यानि, तुल्यगमकत्वात् , अधुना लोभसमुद्घातमतिदेशत आह-'लोभसमुग्घातो जहा कसायसमुग्धातो, नवरं सबजीया असुराई नेरइएसु लोभकसाएणं एगुत्तरियाए नेतबा' इति, यथा प्राक् कषायसमुद्घात उक्तस्तथा लोभकपायोऽपि वक्तव्यः, नवरं तत्रासुरकुमारादीनां नैरयिकत्वे पुरस्कृतचिन्तायां स्यात् सङ्ख्येयाः स्यादसङ्ख्यया स्यादनन्ता इत्युक्तं अत्र तु सर्वे जीवा असुरकुमारादयो नैरपिकेषु पुरस्कृतचिन्तायां चिन्त्यमाना एको-11 तरिकया ज्ञातव्याः, एकोत्तरस्य भाव एकोतरिका 'द्वन्द्वचुरादिभ्यो वुप्रिति चौरादेराकृतिगणतया बुभिति, एको, द्वौ त्रय इत्यादिरूपा तया, एकोत्तरतया इत्यर्थः, नरयिकाणां निरतिशयदुःखवेदनाभिभूततया नित्यमुद्विग्नानां प्रायो लोभसमुदुधातासम्भवात् , सूत्रालापकचैवम्-'एगमेगस्स णं भंते ! नेरइयस्स नेरइयत्ते केव० लोभसमु० अतीता ?, RAKorla- Researce दीप अनुक्रम [६०९] Janearanyou ~276~ Page #277 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (१५) “प्रज्ञापना" - उपांगसूत्र-४ (मूलं+वृत्ति:) पदं [३६], -------------- उद्देशक: [-], ------------- दारं --------------- मूलं [३३९] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र-[१५]उपांगसूत्र-[४] "प्रज्ञापना" मूलं एवं मलयगिरि-प्रणीता वृत्ति: प्रज्ञापना- प्रत सूत्रांक [३३९] य०वृत्तौ. ॥५८५॥ दीप गो ! अणंता, के० पु.१, गो! कस्लइ अस्थि कस्सइ नत्थि, जस्स अस्थि एमो वा दो वा तिषिण या उक्कोसणं संखेज्जा वा असं०. अनंता वा, एगमेगस्स णं भंते ! नेरइयस्स असुरकुमारत्ते केव० लोभस. अतीता, गोदघातपर्द अर्णता, के० पु.?, गो! क. अत्धि क नत्थि, जस्सस्थि सिय संखेजा सिय असं० सिय अणंता, एवं जाव स्वपरस्थानेरइयस्स थणियकुमारते, एगमेगस्स णं भंते ! नेरइयस्स पुढविकाइयत्ते के० लोभस० अतीता ?, गो! अर्णता, ने कषायके. पुरे०१, गो०! क. अस्थि क.नस्थि, जस्स अस्थि जहएको वा दो वा तिणि चा उको संखे. असं. स. सू. अणंता वा, एवं जाव मणूसत्ते, वाणमंतरत्ते जहा असुरकुमारत्ते, एगमेगस्स णं भंते ! नेरइयस्स जोइसियत्ते के । लोभस० अतीता?, गो०! अर्णता, केवइया पुरे०१, गो! कस्सइ अस्थि कस्सइ नत्थि जस्सस्थि जह० एको वा दो वा तिण्णि वा उक्कोसेणं सिय संखेजा सिय असंखेजा सिय अणंता, एवं जाव वेमाणियत्तेऽपि भाणियचं, एगमेगस्स णं भंते ! असुरकुमारस्स नेरइयत्ते के० लोभस अतीता ?, गो ! अणंता, केवइया पुरे०१, गो! कस्सइ अस्थि कस्सइ नत्थि, जस्सस्थि जह० एको वा दो वा तिषिण वा उक्को.सं. असं० अणंता वा, एगमे-IN गस्स णं भंते । असुरकुमारस्स असुरकुमारसे के. लोभस. अतीता, गो.! अणंता, के. पु.१, गो01 का। अ.क० नत्थि, जस्सत्थि जह० एको वा दो वा तिण्णि वा उक्को०सं० असं० अर्णता वा, एगमेगस्स णे भंते ! ॥५८५] असुरकुमारस्स नागकुमारत्ते पुच्छा, गो! अणंता, के० पु.१, गो. क. अस्थि कस्सद नस्थि, जस्सस्थि सिय अनुक्रम [६०९] esesed SHARERucatunmahilone ~277 Page #278 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (१५) “प्रज्ञापना" - उपांगसूत्र-४ (मूलं+वृत्ति:) पदं [३६], -------------- उद्देशक: [-]------------- दारं [-], -------------- मूलं [३३९] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र-[१५]उपांगसूत्र-[४] "प्रज्ञापना" मूलं एवं मलयगिरि-प्रणीता वृत्ति: प्रत सूत्रांक [३३९] संसिय असं०सिय अणंता, एवं जाव थणियकुमारते । पुढधिकाइयत्ते जाव वेमाणियत्ते जहा नेरइयस्स भणितं तहेव भाणियचं, एवं जाव बणियकुमारस्स वेमाणियत्ते। एगमेगस्सणं भंते ! पुढविकाइयस्स नेरइयत्ते केव० लोभस अतीता ?, गो० अर्णता, केवइ० पु.,गो !क. अस्थि क. नस्थि, जस्सस्थि जह० एको वा दो| वा तिन्नि वा उको संखेजा वा असं० अणं, पुढवि. असुरकुमारत्ते अतीता अणंता, केव. पु.१, गो.! कस्साइ अस्थि क. नस्थि, जस्स अस्थि सिय संसिय असं०सिय अणंता, एवं जाव थणियकुमारत्ते, पुढविकाइ-18 यत्ते अतीता अणंता, पुरेक्खडा कस्सइ अस्थि क. नत्थ, जस्सत्थि जह• एक्को वा दो वा तिपिण वा उक्को सं0 असं० अणंताबा, एवं जाब मणूसत्ते, वाणमंतरचे जहा असुरकुमारत्ते, जोइसियत्ते वेमाणियत्ते अतीता अणंता, पुरक्ख० क. अस्थि क० नस्थि, जस्सस्थि सिय संखे० सिय असं० सिय अर्णता, एवं जाव मणूसस्स माणियत्ते, वाणमंतरस्स जहा असुरकुमारस्स एवं जोइसियवेमाणियाणंपि' अस्थायमर्थः-नैरयिकस्य नैरयिकत्वे 1. अतीता लोभसमुपाता अनन्ताः, अनन्तशो नैरयिकत्वस्य प्राप्सत्वात् , पुरस्कृतचिन्तायां कस्यचित् सन्ति कस्य-1 चिन्न सन्ति, तत्र यः प्रश्नसमयावलोभसमुद्घातमप्राप्त एव नरकभवादुदृत्त्यानन्तरं पारम्पर्यण वा सेत्स्यति न च । भूयो नरकमागामी न चागतोऽपि लोभसमुद्घातं गन्ता तस्य नैकोऽपि पुरस्कृतो लोभसमुद्घातः, शेषस्य तु भावी, तस्थापि कस्यचिदेकः कस्यचित् द्वौ कस्यचित् त्रयः, एतच प्रश्नसमयादू मपि तद्भवभाजां सकृन्नरकभवगामिनां 20400728024724402 दीप अनुक्रम [६०९] EetEE REaratinidhi murary.au ~278~ Page #279 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (१५) “प्रज्ञापना" - उपांगसूत्र-४ (मूलं+वृत्ति:) पदं [३६], -------------- उद्देशक: [-]------------- दारं [-], -------------- मूलं [३३९] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र-[१५]उपांगसूत्र-[४] "प्रज्ञापना" मूलं एवं मलयगिरि-प्रणीता वृत्ति: प्रत सूत्रांक [३३९] प्रज्ञापनाया मलयवृत्ती. १८६॥ दीप या वेदितव्यं, उत्कर्षतः सङ्ख्येवा वा असङ्ख्यया वा अनन्ता वा, तत्र सञ्जयवान् वारान् नरकमवमागामिनः सङ्ख्ययाः ३६ समुअसक्वेयान् वारान् असावेयाः अनन्तान् वारान् अनन्ताः, तथा नैरयिकत्वस्थासुरकुमारत्वविषयेऽतीतसूत्र तथैषपातपदं भावनीयं, पुरस्कृतसूत्रे 'कस्सह अस्थि क. पत्थि'त्ति यो नरकभवादुदृत्तो नामरकुमारत्वं प्राप्स्यति तस्य न सन्स- स्वपरस्थासुरकुमारत्वविषयाः पुरस्कृताः लोभसमुद्घाताः, वस्तु प्राप्स्यति तस्य सन्ति, ते च जघन्यपदे सज्ञयेयाः, जघन्य-18 ने कपायस्थितावप्यसुरकुमाराणां सङ्ख्येयानां लोभसमुद्घातानां भावात् , लोमबहुलत्वात् तेषां, उत्कृष्टपदेऽसङ्ख्येया अनन्ता ३३९ वा, तत्र सकदीर्घस्थितावसकृजघन्यस्थितिषु दी स्थितिषु वा उत्पत्स्यमानानामवसेयं, अनन्तश उत्पत्स्यमानानामनन्ताः, एवं नैरयिकस्य नागकुमारत्वादिषु स्थानेषु निरन्तरं तावद्वक्तव्यं यावत्स्तनितकुमारत्वे, तथा चाह-एवं जाच यणियकमारते' पृथिवीकायिकत्वेऽतीतसूत्रं तथैव, पुरस्कृतचिन्तायां तु कस्यापि सन्ति कस्यापि न सन्ति, तत्र नर-18 कादुत्तो यो न पृथिवीकायिकत्वं प्राप्स्यति तख न सन्ति, योऽपि गन्ता तस्य जघन्यपदे एको द्वौ वा त्रयो वा 8 उत्कर्षतः सङ्ख्यया असङ्ख्येया अनन्ता वा, ते चैवम्-तिर्यपञ्चेन्द्रियभवात् मनुष्यभवाद्वा लोभसमुद्घातेन समुद्धतः सन् य एकं वारं पृथिवीं गन्ता तस्स एको द्वौ वारौ गन्तुद्वौं त्रीन् वारान् गन्तुस्त्रयः सङ्ख्येयान् वारान् सङ्ख्येयाः ॥५८६॥ असोयान् वारान् असावेयाः अनन्तान् बारान् अनन्ताः, 'एवं जाय मणसत्ते' इति एवं-पृथिवीकायिकगतेना-IN मिलापप्रकारेण तायद्वक्तव्यं यावन्मनुष्यत्वे, तथैवं-'एगमेगस्स णं भंते ! नेरइयस्स आउकाइयत्ते' इत्यादि, याव अनुक्रम [६०९] ~279~ Page #280 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम “प्रज्ञापना” – उपांगसूत्र-४ (मूलं+वृत्ति:) पदं [३६], --------------- उद्देशक: [-], ------------- दारं [-], -------------- मूलं [३३९] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र-[१५]उपांगसूत्र-[४] "प्रज्ञापना" मूलं एवं मलयगिरि-प्रणीता वृत्ति: प्रत सूत्रांक [३३९] II मनुष्यसूत्र, तत्राप्कायिकादिवनस्पतिपर्यन्तसूत्रभावना पृथिवीकायसूत्रवत्, द्वीन्द्रियसूत्रे पुरस्कृतचिन्तायां जघ शान्येन एको द्वौ वा प्रयो वेति एतत् सकृत् द्वीन्द्रियभवं प्रामुकामख वेदितव्यं, उत्कर्षेण सङ्ख्यया असोया अनNन्ता वा, तत्र सङ्ख्येयान् वारान् द्वीन्द्रियभवं प्राप्मुकामस्य सङ्ख्यया असङ्ख्येयान् वारान् असङ्ख्येयाः अनन्तान् वारान् अनन्ताः, एवं त्रीन्द्रियचतुरिन्द्रियसूत्रे अपि भावनीये, तिर्वपञ्चेन्द्रियसूत्रविषया वेवं भावना-सकृत् पञ्चेन्द्रियभवं गन्तुकामस्य खभावत एवाल्पलोभस्य जघन्यतः एको द्वी प्रयो वा, शेषस्य तत्कर्षतः सङ्ख्येयान् वारान् तिर्यरुपञ्चेन्द्रियभवं गन्तुः सङ्ख्ययाः असावेयान् वारान् असङ्ख्येयाः अनन्तान् वारान् अनन्ताः, मनुष्यसूत्रे तु पुरस्कृतविषया |भावना मूलत एवं-यो नरकभवादुत्तोऽल्पलोभकषायः सन् मनुष्यभवं प्राप्य लोभसमुद्धातममत्वा सिद्धिपुरं यास्यति । तस्य न सन्ति पुरस्कृता लोभसमुद्घाताः, शेषस्य तु सन्ति, यस्य सन्ति तस्यापि जघन्यत एको द्वौ वा यो ना, ते च एक द्वीत्रीन् वा लोभसमुद्घातान् प्राप्य सेत्स्यतो वेदितव्याः, सङ्ख्ययादयः प्राग्वदू भावनीयाः, 'वाणमंत-IN रत्वे जहा असुरकुमारा' इति यथा नेरयिकस्यासुरकुमारत्वे पुरस्कृतविषये सूत्रमुक्तं तथा व्यन्तरेष्वपि वक्तव्यं, किमुक्तं भवति ?-पुरस्कृतचिन्तायामेवं वक्तव्यं-'कस्सइ अस्थि क. नत्यि, जस्स अस्थि सिय संखेज्जा सिय असं० सिय अणंता' इति, नत्वेकोतरिका वक्तव्या, व्यन्तराणामप्यसुरकुमाराणामिव जघन्यस्थितावपि सङ्ख्येयानां लोभसमुदघातानां भावात् , 'जोइसियत्ते' इत्यादि, ज्योतिष्कत्वे अतीता अनन्ताः, अनन्तशो ज्योतिष्कत्वस्य प्राप्त दीप 12239200220002020 esesentenceseaeeeeeeectrcenera अनुक्रम [६०९] ~280~ Page #281 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (१५) “प्रज्ञापना” – उपांगसूत्र-४ (मूलं+वृत्ति:) पदं [३६], -------------- उद्देशक: [-], ------------- दारं --------------- मूलं [३३९] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र-[१५]उपांगसूत्र-[४] "प्रज्ञापना" मूलं एवं मलयगिरि-प्रणीता वृत्ति: प्रत सूत्रांक [३३९] दीप प्रज्ञापना त्वात् , पुरस्कृताः कस्यापि सन्ति कस्यापि न सन्ति, एतत् प्राग्यदू भावनीयं, यस्यापि सन्ति तस्यापि कस्यचिद- ३६ समुया: मल- | सद्ध्येयाः कस्यचिदनन्ताः, न तु जातुचित् सहययाः, ज्योतिष्काणां जघन्यषदेऽप्यसवयेयवर्षायुष्कतया जघन्यतो- घातपर्द य. वृत्ती. प्यसङ्ख्ययानां लोभसमुद्घातानां भावात् , लोभबहुलत्वात्तजातेः, एवं चैमानिकत्वेऽपि पुरस्कृतचिन्तायां वक्तव्यं स्वपर स्थ तदेवं खस्थाने परस्थाने च लोभसमुद्घातश्चिन्तितः, सम्प्रत्यसुरकुमारस्य तं चिचिन्तयिपुरिदमाह-'एगमेगस्स ण'-INने काय मिलादि, एकैकस्य असुरकुमारस्य नैरयिकत्वे लोभसमुद्घाता अतीता अनन्ताः, नैरयिकत्वस्थानन्तशः प्राप्तत्वात. स. सू. पुरस्कृताः कस्यचित् सन्ति कस्यचिन्न सन्ति, तत्र योऽसुरकुमारभवादुदृत्तो न नरकं याता नापि सकृद् गतोऽपि लोभसमुद्घातं गन्ता तस्य न सन्ति, यस्तु यास्यति तस्य जघन्यत एको द्वौ त्रयो वा उत्कर्पतः सङ्ख्येया असङ्ख्येया। अनन्ताः, तत्र सकृन्नरकगामिनः एकादयो नैरयिकाणामिष्टद्रव्यसंयोगाभावतः प्रायो लोभसमुद्घातस्थासम्भवात्, उक्तं च मूलटीकायाम्-"नेरइयाणं लोभसमुग्घाया थोवा चेंब भवन्ति, तेसिमिट्टदवसंजोगाभावातो एगादिसं भव" इति, सोयान् वारान् नरकं गन्तुः सहबेयाः असङ्ख्येयान् वारान् असजयया अनन्तान् वारान् अनन्ताः, || असुरकुमारस्थासुरकुमारत्वे अतीता अनन्ताः सुप्रतीताः, पुरस्कृताः कस्यापि सन्ति कस्यापि न सन्ति, तत्र योऽ-1 ४॥५८७॥ सुरकुमारभवे पर्यन्तवर्ती न च लोभसमुद्घातं याता नापि तत उदृत्तो भूयोऽप्यसुरकुमारत्वं याता किन्त्वनन्तरं पारम्पर्येण वा सेत्स्यति तख न सन्ति, यस्य तु सन्ति तस्यापि जघन्यत एको द्वौ वा त्रयो वा उत्कर्षतः सङ्ख्येया अनुक्रम [६०९] SAREarathi ~281~ Page #282 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (१५) “प्रज्ञापना” – उपांगसूत्र-४ (मूलं+वृत्ति:) पदं [३६], -------------- उद्देशक: [-]------------- दारं [-], -------------- मूलं [३३९] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र-[१५]उपांगसूत्र-[४] "प्रज्ञापना" मूलं एवं मलयगिरि-प्रणीता वृत्ति: प्रत सूत्रांक [३३९] दीप | असहयया अनन्ताः, तत्र एकादयः क्षीणायुःशेषाणां तद्भवभाजां भूयस्तथैवानुत्पद्यमानानामवगन्तव्याः, सोयादयो नैरयिकस्येव भावनीयाः, असुरकुमारस्य नागकुमारत्वेऽतीताः प्राग्वत्, पुरस्कृताः कस्यापि सन्ति कस्यापि । न सन्ति, तत्र योऽसुरकुमारभवादुदृत्तो न नागकुमारभवं गन्ता तस्य न सन्ति, शेषस्य तु सन्ति, यस्यापि सन्ति | तस्यापि स्यात् सङ्खयेयाः स्यादसयेयाः स्यादनन्ताः, तत्र सकृन्नागकुमारभवं प्राप्नुकामस्य सङ्ख्ययाः, जघन्यस्थिताविपि सशयानां लोभसमुदघातानां भावात् ,असक्वेयान वारान् प्राप्तुकामस्य असहयेयाः अनन्तान वारान् अनन्ताः,ISM एवं यावत् स्तनितकुमारत्वे, पृथिवीकायिकत्वे यावद्वैमानिकत्वे यथा नरयिकस्य भणितं तथैव भणितव्यं, एवमसुरकुमारस्पेव नागकुमारादेरपि तावद्वक्तव्यं यावत्स्तनितकुमारस्य वैमानिकत्वे-वैमानिकत्वविषयं सूत्र, तथैवं-'एग-1॥ मगरस णं भंते ! थणियकुमारस्य वेमाणियत्ते केवइया लोभसमुग्घाया असीता?' इत्यादि, एवं 'एगमेगस्स गं| भंत ! पुढविकाइयस्स नेरइयत्ते' इत्यायपि सूत्र पूर्वोक्तभावनानुसारेण खयं भावनीयं, तदेवं नैरयिकादेरेकत्वषि-18 पयाः क्रोधादिसमुद्घाताः प्रत्येक चविंशत्या चतविशतिदण्डकसूत्रविचिन्तिताः, सम्प्रति तानेव नरयिकादिबहु-18 त्वविषयान् चिचिन्तयिपुरिदमाह-नेरइयाणं भंते' इत्यादि, नैरयिकाणां भदन्त ! नरयिकत्वे कियन्तः क्रोधसमु-I |घाता अतीताः ?, भगवानाह-गौतम ! अनन्ताः, अनन्तशो नैरयिकत्वस्य सर्वजीवैः प्राप्तत्वात् , कियन्तः पुरस्कृताः १, गौतम ! अनन्ताः, प्रश्नसमयभाविनां मध्ये बहूनामनन्तशो नैरयिकत्वं प्राप्तुकामत्वात् 'एव'मित्यादि, अनुक्रम [६०९] ~282~ Page #283 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम “प्रज्ञापना" - उपांगसूत्र-४ (मूलं+वृत्ति:) पदं [३६], -------------- उद्देशक: [-]------------- दारं [-], -------------- मूलं [३३९] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र-[१५]उपांगसूत्र-[४] "प्रज्ञापना" मूलं एवं मलयगिरि-प्रणीता वृत्ति: प्रज्ञापना- ए प्रत सूत्रांक [३३९] याः मलया वृत्ती. ॥५८८॥ दीप caceeeeeeees एवं-नैरयिकगतेनाभिलापप्रकारेण चतुर्विशत्या चतुर्विंशतिदण्डकसूत्रैर्निरन्तरं तावद्वक्तव्यं यावद्वैमानिकस्य वैमानि-18|३६ कत्वे-वैमानिकविषयं सूत्रं, तचैवं-'वेमाणियाणं भंते ! वेमाणियत्ते केवइया कोहसमुग्घाया अतीता ?, गोदघातपदे अर्णता, केवइया पुरेक्खडा ?, गो ! अणंता' भावना प्राग्वत् , यथा च क्रोधसमुद्घाताः सर्वेषु जीवेषु खस्थाने क्रोधादिपरस्थाने चातीताः पुरस्कृताश्चानन्तत्वेनाभिहिताः तथा मानादिसमुद्घाता अपि वाच्याः, तथा चाह-'एव'मि-समुद्धातात्यादि, एवं-क्रोधसमुद्घातगतेन प्रकारेण चत्वारोऽपि समुद्घाताः सर्वत्रापि स्वस्थानपरस्थानेषु वाच्याः, यावलोभ-Mद्यल्पबहुत्वं समुद्घातो वैमानिकत्वषिषय उक्तो भवति, स चैवं-'वेमाणियाणं भंते ! येमाणियत्ते केवइया लोभसमुग्धाया सू. ३४० अतीता ?, गो! अणता, केवइया पुरेक्खडा?, गो! अयंता' सुगमं । तदेवं नरयिकादिबहुत्वविषया अपि क्रोधादिसमुद्घाताः प्रत्येकं चतुर्विशत्या चतुर्विशतिदण्डकसूत्रश्चिन्तिताः,सम्प्रति क्रोधादिसमुद्घातैः शेषसमुद्घातैश्च समवहतानामसमवहतानां च परस्परमल्पबहुत्वमभिघित्सुः प्रथमतः सामान्यतो जीवविषयं तावदाहएतेसि प मंते ! जीवाणं कोहसमुग्धातेणं माणसमुग्धातेणं मायासमुन्धातेणं लोभसमुग्धातेण य समोहयाणं अकसायसमुग्यातेणं समोहयाणं असमोहयाण य कयरे हितो अप्पा वा ४१, गो! सवत्थोवा जीवा अकसायसमुग्धाएणं समो०, ॥५८८॥ माणसमुग्धाएणं समोहया अणत०, कोहस० समो. विसेसाहिया मायासमुग्याएणं स० विसे० लोभसमु० स० वि० असमोहया संखेज्जगुणा, एतेसिणं भंते ! नेरइयाणं कोहस० माणस० मायास. लोभस समोहयाणं असभोहयाण य अनुक्रम [६०९] ~283~ Page #284 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (१५) प्रत सूत्रांक [३४०] दीप अनुक्रम [६१०] “प्रज्ञापना” – उपांगसूत्र - ४ ( मूलं + वृत्तिः ) - मूलं [ ३४० ] पदं [३६], --------------उद्देशक: [-1, ------------- दारं [-], पूज्य आगमोद्धारकश्री संशोधितः मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र [१५],उपांगसूत्र-[४] "प्रज्ञापना" मूलं एवं मलयगिरि-प्रणीता वृत्तिः कयरेर हिंतो अप्पा वा ४१, गो० ! सबत्थोवा नेरइया लोभसमुग्धाएणं समोहया मायास० स० संखेअ० माणस० स० संखे० कोहस० संखे० असमोहया संखे, असुरकुमाराणं पुच्छा, गो० ! सवत्थोवा असुरकुमाराणं कोहस० समो० माणसाए स० संखे० मायास० स० सं० लोभस समो० संखे० असमोहया संखेजगुणा, एवं सचदेवा जाव वेमाणिया, पुढविकाइयाणं पुच्छा, गो० ! सवत्थोवा पुढविकाइया माणसमुग्धाएणं समोहया कोहसमु० स० विसे० मायासमु० स० विसे० लोभस० स० विसे० असमो० संखे, एवं जाव पंचिदियतिरिक्खजोणिया, मणुस्सा जहा जीवा, वरं माणस० स० असं० ( सूत्रं ३४० ) ----- 'एएसि णमित्यादि, एतेषां भदन्त ! जीवानां क्रोधसमुद्घातेन मानसमुद्घातेन मायासमुद्घातेन लोभसमुद्घा तेन च समवहतानां 'अकषायेणे'ति कषायव्यतिरेकेण शेषेण समुद्घातेन समवहतानामसमवहतानां च कतरे कतरेभ्यः अल्पा वा बहवो या 'अर्थवशाद्विभक्तिपरिणाम' इति न्यायात् पञ्चम्याः स्थाने तृतीयापरिणामनान्तु कतरैः कतरैस्तुल्या वा, तथा कतरेरभ्यो विशेषाधिकाः, एवं गौतमेन पृष्टे भगवानाह — गौतम ! सर्वस्तोका जीवा अकपायसमुद्घातेन-कपायव्यतिरिक्तेन शेषवेदनादिसमुद्घातपट् केन समवहताः कषायव्यतिरिक्त समुद्घातसमुद्धता हि कचित् कदाचित् केचिदेव प्रतिनियता लभ्यन्ते, ते चोत्कर्षपदेऽपि कपायसमुद्घातसमवहतापेक्षया अनन्तभागे वर्त्तन्ते, ततः स्तोकाः, तेभ्यो मानसमुद्घातसमवहता अनन्तगुणाः, अनन्तानां वनस्पतिजीवानां पूर्वभवसं For Pale Only ~284~ 12ayor Page #285 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (१५) “प्रज्ञापना" - उपांगसूत्र-४ (मूलं+वृत्ति:) पदं [३६], -------------- उद्देशक: [-]------------- दारं [-], -------------- मूलं [३४०] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र-[१५]उपांगसूत्र-[४] "प्रज्ञापना" मूलं एवं मलयगिरि-प्रणीता वृत्ति: प्रत सूत्रांक [३४०] दीप प्रज्ञापना-18स्कारानुवृत्तितो मानसमुद्घाते वर्तमानानां प्राप्यमाणत्वात्, तेभ्यः क्रोधसमुद्घातेन समयहता विशेषाधिकाः,३६ समुया: मल-13 मानापेक्षया क्रोधिनां प्रचुरत्वात् , तेभ्यो मायासमुद्घातेन समबहता विशेषाधिकाः, क्रोध्यपेक्षया मायाविनांदघातपदे य० वृत्ती. प्रचुरत्वात् , तेभ्योऽपि लोभसमुद्घातेन समवहता विशेषाधिकाः, मायाविभ्यो लोभवतामतिप्रभूतत्वात् , तेभ्यो-18 क्रोधादिalષ૮૧ |ऽपि केनाप्यसमवहता सङ्ख्येयगुणाः, चतसृष्वपि गतिषु प्रत्येकं समषहतेभ्योऽसमवहतानां सदा सहयगुणतया 8 प्राप्यमाणत्वात् , सिद्धास्त्वेकेन्द्रियापेक्षयानन्तभागवर्त्तिन इति ते सन्तोऽपि न विवक्षिताः, एतदेवाल्पबहुत्वं रूपवत्व - स.३४० चतुर्विंशतिदण्डकक्रमेण चिन्तयन्नाह-एएसि ण'मित्यादि सुगम, नवरं सर्वस्तोका नैरयिका लोभसमुपातेन । समवहता इति, नैरयिकाणामिष्टद्रव्यसंयोगाभावात् प्रायो लोभसमुद्घातस्तावन्नोपपद्यते, येषामपि च केषाश्चिद्भवति ते कतिपया इति शेषसमुद्घातसमवहतापेक्षया सर्वस्तोकाः, असुरकुमारविषयाल्पबदुत्वचिन्तायां सर्वस्तोकाः क्रोधसमुद्घातसमुद्धता इति, देवा हि खभावतो लोभवहुलास्ततोऽल्पतरा मानादिमन्तः ततोऽपि कदाचित्कतिपये क्रोधवन्त इति शेषसमुद्घातसमवहतापेक्षया सर्वस्तोकाः, एवं सबदेवा जाय वेमाणिया' इति एवं-असुरकुमारगतेना-1 |ल्पबहुत्वप्रकारेण सर्वे देवा नागकुमारादयस्तायद्वक्तव्याः यावद्वैमानिकाः, पृथिवीकायिकचिन्तायां सामान्यतो ५८|| जीवपदे इस भावना भावनीया, समानत्वात् , 'एवं जाये'त्यादि, एवं-पृथिवीकायिकोक्केन प्रकारेण तावद्वक्तव्यं । यावत् तिर्यक्रपञ्चेन्द्रियाः, मनुष्या यथा जीवाः, नवरमकषायसमुद्घातसमवहतापेक्षया मानसमुदुघातेन समयहता। रररररररररर अनुक्रम [६१०] SAREILLEGunintentiational ~285 Page #286 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (१५) प्रत सूत्रांक [३४१] दीप अनुक्रम [६११] “प्रज्ञापना” – उपांगसूत्र - ४ ( मूलं + वृत्तिः ) - मूलं [ ३४१] पदं [३६], --------------उद्देशक: [-1, ------------- दारं [-], पूज्य आगमोद्धारकश्री संशोधितः मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र [१५],उपांगसूत्र-[४] "प्रज्ञापना" मूलं एवं मलयगिरि-प्रणीता वृत्तिः असङ्ख्येयगुणा वक्तव्याः । सम्प्रति कति छास्थिकाः समुद्घाता इति निरूपणार्थमाह कइ णं भंते ! छाउमत्थिया समुग्धाया पं० १, गो० छ छाउमत्थिया स० पं० तं०-वेदणास कसायस० मारणंतियस वेडवियस ० तेयास आहारगसमुग्धाते, नेरइयाणं भंते ! कति छाउमत्थिया स० पं० १, गो० ! चचारि छाउमत्थिया स० पं० [सं० वेदणास कसायस० मारणंतियस० वेउडियस०, असुरकुमाराणं पुच्छा, गो० ! पंच छाउ० समु० पं० [सं० - वेदणासमु० कसायसमु० मारणंतियस० वेउब्वियस० तेयगसमु०, एगिंदियविगलिंदियाणं पुच्छा, गो० ! विष्णि छाउ समु० पं० सं०- वेदणासमु० कसायस० मारणंतियस०, णवरं वाउकाइयाणं चचारि स० पं० [सं० वेदणास कसायस०] मारणंतियस० बेडवियस० पंचिदियतिरिक्खजोणियाणं पुच्छा, गो० 1 पंच० स० पं० तं०-वेदणास कसायस० मारणंतियस० वेउचियस० तेयगस, मणूसाणं कति छाउमत्थिया समु० पं० १, गो० छ छाउमत्थिया स० पं० तं०-वेदणास० कसायस० मारणंतियस० वेडवियस तेयगस आहारगस० ( मूत्रं ३४१ ) ------ 'कणं भंते !' इत्यादि सुगमं, अथ कति केषां छास्थिकाः समुद्घाता इति चतुर्विंशतिदण्डकक्रमेण निरूपयति - 'नेरइयाण' मित्यादि, नैरयिकाणामाथाश्चत्वारो वेदनादिसमुद्घाताः तेषां तेजोलब्ध्याहारकलब्ध्यभावतस्तैजस समुद्घाताहारक समुद्घातासम्भवात् असुरकुमारादीनां सर्वेषामपि देवानामाहारकस मुद्धातवः शेषाः पञ्च समुदूधाताः, तेषां तेजोलब्धिसम्भवात् तैजससमुद्घातस्यापि सम्भवात् यस्त्वाहारकसमुद्घातः स तेषां न For Parts Only ~286~ nary org Page #287 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम “प्रज्ञापना" - उपांगसूत्र-४ (मूलं+वृत्ति:) पदं [३६], -------------- उद्देशक: [-], ------------- दारं --------------- मूलं [३४१] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र-[१५]उपांगसूत्र-[४] "प्रज्ञापना" मूलं एवं मलयगिरि-प्रणीता वृत्ति: प्रत सूत्रांक [३४१] प्रज्ञापनाया मल- यवृत्ती. ॥५९० दीप सम्भवति, चतुर्दशपूर्वाधिगमाभावतो भवप्रत्ययाच तेषामाहारकलब्ध्यभावात् , वायुकायवर्जेकेन्द्रियविकलेन्द्रियाणामाद्या वेदनाकषायमरणलक्षणास्त्रयः समुद्घाताः, तेषां वैक्रियाहारकतेजोलब्ध्यभावतस्तत्समुद्घातासम्भवात् , घातपदं वायुकायिकानां पूर्वे त्रयो क्रियसमुद्घातसहिताश्चत्वारः समुद्घाताः, तेषां बादरपर्याप्तानां वैक्रियलब्धिसम्भवतो छानस्थि| वैक्रियसमुद्घातस्यापि सम्भवात् , पञ्चेन्द्रियतिर्यग्योनिकानामाहारकसमुद्घातवर्जाः शेषाः पञ्च छानस्थिकाः समु-। काः समु याताः, यस्त्वाहारकसमुदूधातः स तेषां न सम्भवति, चतुर्दशपूर्वाधिगमाभावतस्तेपामाहारकलब्ध्यसम्भवात् , दाताः सू. मनुष्याणां पडपि, मनुष्येषु सर्वभावसम्भवात् । तदेवं यति येषां छामस्थिकाः समुद्घातास्तति तेषां निरूपिताः, ३४१समुसम्प्रति यस्मिन् समुद्घाते वर्तमानो यावत् क्षेत्रं समुद्घातवशतस्तैस्तैः पुद्गलैयाप्नोति तदेतन्निरूपयति द्धातपुद्ग लपूरणादि जीवे णं भंते ! वेदणासमुग्याएणं समोहते समोहणित्ता जे पोग्गले निच्छुभति तेहि णं भंते । पोग्गलहि केवइते खेचे । सू. ३४२ अण्णे केवतिते खेते फुडे, गो सरीरप्पमाणमेचे विक्खंभवाहल्लेणं नियमा छदिसि एवतिते खेते अफुण्णणे एवतिते खेते फुडे, से गं भंते ! खित्ते केवतिकालस्स अप्फुडे केव० फुडे ?, गो! एगसमइएण वा दुसमइएण वा तिसमइएण वा विग्गहेणं एवतिकालस्स अफुण्णे एवइयकालस्स फुडे, ते णं मंते ! पोग्गले केवतिकालस्स निच्छुभति ,गो०! जहण्यो] ॥५९०॥ अंतोमुहुत्तस्स उक्को वि० अंतो, ते णं भंते ! पोग्गला निच्छूढा समाणा जाति तत्थ पाणातिं भूयातिं जीवाति सचार्ति अभिहणति वति लेसेंति संघाएंति संघटुंति परिताउँति किलामेंति उद्दति तेहितो पं भंते ! से जीवे कतिकिरिए, अनुक्रम [६११] REaratinia ~287~ Page #288 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (१५) “प्रज्ञापना" - उपांगसूत्र-४ (मूलं+वृत्ति:) पदं [३६], -------------- उद्देशक: [-], ------------- दारं -1, -------------- मूलं [३४२] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र-[१५]उपांगसूत्र-[४] "प्रज्ञापना" मूलं एवं मलयगिरि-प्रणीता वृत्ति: प्रत सूत्रांक [३४२] दीप अनुक्रम [६१२] गो01 सिय तिकिरिए सिय चउकिरिए सिय पंचकिरिए, ते णं भंते ! जीवा तातो जीवाओ कतिकिरिया, गो! सिय तिकिरिया सिय चउकिरिया सिय पंचकिरिया, से णं भंते ! जीवे ते य जीवा अण्णेसिं जीवाणं परंपराधाएणं कतिकिरिया, गो। सिफिरियावि चउकिरियावि पंचकिरियावि, नेरइए णं भंते ! वेदणासमुग्धाएणं समोहते, एवं जहेब जीवे, णवर नेरइयाभिलावो, एवं निरवसेसं जाव वेमाणिते । एवं कसायसमुग्घातोवि भाणितधो । जीवे गं भते ! मारणतियसमुग्धातेणं समोहणइ समोहणित्ता जे पोग्गले णिच्छुभति तेहि णं भंते ! पोग्गलेहिं केवतिते खेत्ते अप्फुण्णे केवतिते खेत्ते फूडे , गो०! सरीरप्पमाणमेचे विक्खंभवाहल्लेणं आयामेणं जहण्णेणं अंगुलस्स असंखेजतिभागं उक्कोसेणं असंखेजाति जोयणाति एगदिसि एवतिते खेत्ते अफुण्णे एवतिए खेत्ते फुडे, से णं भंते । खेते फेवतिकालस्स अफुण्णे केवतिकालस्स फुडे , गो०। एगसमइएण या दुसमइएण वा तिसमइएण वा चउसमइएण वा विग्गहेणं एवतिकालस्स अफुण्णे एवतिकालस्स फुडे, सेसं तं चेव जाच पंचकि०, एवं नेरइएवि, णवरं आयामेणं जहणेणं साइरेगं जोयणसहस्सं उको० असंखेज्जाति जोअणाति, एगदिसि एव तिते खेने अस्फुण्णे एवतिते खिचे फुडे, विग्गहेणं एगसमइएणवा दुसमइएण वा तिसमइएण वा चउसमतिएण वा भन्नति, सेसं तं चेव जाव पंचकिरियावि, असुरकुमारस्स जहा जीवपदे, णवर विग्गहो तिसमइओ जहा नेरइयस्स, सेसं तं चेव जहा असुरकुमारे, एवं जाव वेमाणिते, गवरं एगिदिये जहा जीवे निरवसेसं (सूत्रं ३४२) 'जीवे णं भंते ! इत्यादि, जीयो णमिति वाक्यालकारे-वेदनासमुद्घाते वर्तमानः तस्मिन् समवहतो भवति ee99.9922829092e totoedeseseseace T asurary.com ~288~ Page #289 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (१५) प्रत सूत्रांक [३४२] दीप अनुक्रम [६१२] “प्रज्ञापना” – उपांगसूत्र - ४ ( मूलं + वृत्तिः ) मूलं [ ३४२ ] पदं [३६], --------------उद्देशक: [-1, -------------- दारं [-], पूज्य आगमोद्धारकश्री संशोधितः मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र [१५],उपांगसूत्र-[४] "प्रज्ञापना" मूलं एवं मलयगिरि-प्रणीता वृत्तिः प्रज्ञापना या मल य०वृत्ती. ॥५९१ ॥ समवहत्य च यान् पुद्गलान् वेदनायोग्यान् खशरीरान्तर्गतान् 'निच्छुभइ' इति विक्षिपति आत्मविश्लिष्टान् करोतीत्यर्थः, 'तेहि ण' मिति तैः पुद्गलैः कियत् क्षेत्रमापूर्ण, आपूर्णत्वमपान्तराले कियदाकाशप्रदेशासंस्पर्शनेऽपि व्यवहारत उच्यते तत आह-कियत् क्षेत्रं स्पृष्ट-प्रतिप्रदेशापूरणेन व्याप्तं, एवं गौतमेन प्रश्ने कृते सति भगवानाह - 'सरीरे 'त्यादि नियमात् नियमेन छहिसिं'ति पद्ध दिशो यत्रापूरणे स्पर्शने वा पदिक तथथा भवति एवं विष्कम्भतो- विस्तरेण बाहल्यतः - पिण्डतः शरीरप्रमाणमात्रं यावत्प्रमाणः खशरीरस्य विष्कम्भो यावत्प्रमाणं च बाहल्यं एतावन्मात्रमापूर्ण स्पृष्टं चेति वाक्यशेषः, तदेव निगमनद्वारेणाह - 'एवइए खेत्ते अफुण्णे एवइए खेत्ते फुडे' इति, इह वेदनासमुद्घातो वेदनातिशयात्, वेदनातिशयश्च लोकनिष्कुटेषु जीवानां न भवति, निरुपद्रवस्था - नवर्त्तित्वात् तेषां, किन्तु त्रसनाढ्या अन्तः, तत्र परोदीरणसम्भवात्, तत्र च पदिकसम्भव इति नियमाच्छदिशिमित्युक्तं, अन्यथा 'सिय तिदिसिं सिय चउदिसिं सिय पंचदिसि' मित्याद्युध्येत, अथ खशरीरप्रमाणविष्कम्भवाहल्यमेव क्षेत्रमापूर्ण स्पृष्टं च विग्रहगतौ जीवस्य गतिमधिकृत्य कियद्दूरं यावद्भवति कियन्तं च कालमित्येतन्निरूपणार्थमाह- 'से णं भंते !' इत्यादि, नपुंसकत्वे पुंस्त्वं प्राकृतत्वात् तत् — अनन्तरोक्तप्रमाणं णमिति प्राग्वत् भद न्त ! क्षेत्रं कालस्स इति प्राकृतत्वात् तृतीयार्थे षष्ठी कियता कालेन पूर्ण कियता कालेन स्पृष्टं, किमुक्तं भवति :-कियन्तं कालं यावत् स्वशरीरप्रमाणविष्कम्भवाहल्यं क्षेत्रं निरन्तरं विग्रहगती जीवस्य गतिमधिकृत्यापूर्ण स्पृष्टं च Education Internationa For Penal Use On ----- ~289~ ३६ समु दुद्घातपदे समुद्धातपुद्गलपूरणादि सु ३४२ ॥५९१॥ Page #290 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (१५) “प्रज्ञापना" - उपांगसूत्र-४ (मूलं+वृत्ति:) पदं [३६], -------------- उद्देशक: [-]------------- दारं [-], -------------- मूलं [३४२] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र-[१५]उपांगसूत्र-[४] "प्रज्ञापना" मूलं एवं मलयगिरि-प्रणीता वृत्ति: e seae प्रत सूत्रांक [३४२] दीप अनुक्रम [६१२] लभ्यते इति ?, भगवानाह-गौतम ! एकसमयेन वा द्विसमयेन वा त्रिसमयेन वा विग्रहेण, किमुक्तं भवति -1 एकसमयेन वा द्विसमयेन वा त्रिसमयेन वा विग्रहेण यावन्मात्रं क्षेत्रं व्याप्यते इयडूरं यावत् खशरीरप्रमाणविष्क-19 म्भवाहल्यं क्षेत्रं वेदनाजननयोग्यैः पुद्गलैरापूर्ण-भृतं जीवस्य गतिमधिकृत्यावाप्यते, तत एतद्गतमुत्कर्षतखिसामयिकेन विग्रहेण यावन्मात्रं क्षेत्रमभिव्याप्यते एतावदात्मविश्लिष्टर्वेदनाजननयोग्यैः पुद्गलैरापूर्ण लभ्यते, इह | चतुःसामयिकः पञ्चसामयिकश्च विग्रहो यद्यपि सम्भवति तथापि घेदनासमुद्घातः प्रायः परोदीरितवेदनावशत उपजायते, परोदीरिता च वेदना त्रसनाड्यां व्यवस्थितस्य न बहिः, सनाडीव्यवस्थितस्य च विग्रह उत्कर्षतोऽपि |त्रिसामयिक इति उत्कर्षतोऽपि त्रिसामयिकेन विग्रहेणेत्युक्तं, न चतुःसामयिकेन पञ्चसामयिकेन चेति, उपसं-IS हारवाक्यमाह-'एवइयकालस्स अफुण्णे एवइयकालस्स फुडे' एतावता उत्कर्षतोऽपि त्रिसमयप्रमाणेनेत्यर्थः कालेनापूर्णमेतावता कालेन स्पृष्टं, किमुक्तं भवति ?-विग्रहगताबुत्कर्षतः त्रीन् समयान् यावत् त्रिभिश्च समययोMR वन्मात्रं व्याप्यते इयन्ती सीमामभिच्याप्य स्वशरीरप्रमाणविष्कम्भवाहल्यं क्षेत्र वेदनाजननयोग्यैः पुद्गलेरापूर्ण भृतं |च जीवस्य गतिमधिकृत्य ब्याप्यते, अथवा 'केवइय कालस्स'त्ति षष्ठ्येव व्याख्येया, ततः खशरीरप्रमाणविष्कम्भ बहिल्यं क्षेत्रं वेदनाजननयोग्यः पुद्गलरापूर्ण भृतं च जीवस्य विग्रहगतिमधिकृत्य कियतः कालस्य सम्बन्धि, कियन्त । | कालं यावदवाप्यते इत्यर्थः, भगवानाह-एकसमयेन द्विसमयेन त्रिसमयेन वा विग्रहेणापूर्ण स्पृष्टं च लभ्यते इति । PoesceseseseleaseR ~290~ Page #291 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (१५) प्रत सूत्रांक [३४२] दीप अनुक्रम [६१२] मूलं [ ३४२ ] पदं [३६], --------------उद्देशक: [-1, -------------- दारं [-], पूज्य आगमोद्धारकश्री संशोधितः मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित.. आगमसूत्र -[१५]उपांगसूत्र-[४] "प्रज्ञापना" मूलं एवं मलयगिरि-प्रणीता वृत्तिः प्रज्ञापनाया मल य० वृसौ. ॥५९२ || “प्रज्ञापना” – उपांगसूत्र - ४ ( मूलं + वृत्तिः ) - Ja Education International वाक्यशेषः, तत एतावता उत्कर्षतः त्रिसमयप्रमाणस्य कालस्य सम्बन्धि यथोक्तप्रमाणं क्षेत्रं वेदनाजननयोग्यैः पुलैरा पूर्णमेतावता कालस्य सम्बन्धि स्पृष्टमिति । सम्प्रति यावन्तं कालं वेदनाजननयोग्यान् पुद्गलान् विक्षिपति तावत्कालप्रमाणं प्रतिपादनार्थमाह-'ते णं भंते !' इत्यादि, तान् वेदनाजननयोग्यान् पुद्गलान् णमिति वाक्याल - ङ्कारे भदन्त ! - परमकल्याणयोगिन् परमसुखयोगिन् वा पुद्गलान् कियतः कालस्य सम्बन्धिनो विक्षिपति १, कियत्कालं वेदनाजननयोग्यान् विक्षिपतीति भावः, भगवानाह - जघन्येनाप्यन्तर्मुहूर्त्तस्य सम्बन्धिन उत्कर्षतोऽप्यन्तर्मुहर्त्तस्य, केवलं मना बृहत्तरस्य सम्बन्धिनः विक्षिपति, किमुक्तं भवति ?-ये पुद्गला जघन्यत उत्कर्षतश्चान्तर्मुहूर्त्त यावत् वेदनाजननसमर्थाः तान् तथा २ वेदनार्त्तः सन् खशरीरगतान् खशरीराइहिरात्मप्रदेशेभ्योऽपि विश्विष्टान् विक्षिपति, यथाऽत्यन्तदाहज्वरपीडितः सन् सूक्ष्मपुद्गलान्, प्रत्यक्षसिद्धं चैतदिति, 'ते णं भंते !' इत्यादि, ते यमिति पूर्ववत् भदन्त ! पुद्गला विक्षिप्ताः सन्तः शरीरसम्बद्धा असम्बद्धा वा 'जाई तत्थे'त्यादि प्राकृतत्वात् पुंस्त्वेऽपि नपुंसकता यान् तत्र वेदनासमुद्घातगत पुरुषसंस्पृष्ठे क्षेत्रे प्राणान् द्वित्रिचतुरिन्द्रियान् शङ्खकीटिकामक्षिकादीन् भूतान् वनस्पतीन् जीवान् पञ्चेन्द्रियान् गृहगोधिकासपदीन् सत्त्वान् शेषपृथिवीकायिकादीन् अभिन्नन्ति - अभि मुखमागच्छन्तो नन्ति वर्त्तयन्ति - आवर्त्तपतितान् कुर्वन्ति लेशयन्ति मनाक् स्पृशन्ति सङ्घातयन्ति परस्परं तान् सङ्घातमापन्नान् कुर्वन्ति सङ्घट्टयन्ति - अतीव सङ्घातविशेषमापादितान् कुर्वन्ति परितापयन्ति पीडयन्ति लमय For Pasta Lise Only ----- ~ 291~ ३६ समु दद्यातपदे समुद्धातपुनलपूरणादि सू. ३४२ ॥ ५९२ ॥ Page #292 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (१५) “प्रज्ञापना” – उपांगसूत्र-४ (मूलं+वृत्ति:) पदं [३६], -------------- उद्देशक: [-]------------- दारं [-], -------------- मूलं [३४२] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र-[१५]उपांगसूत्र-[४] "प्रज्ञापना" मूलं एवं मलयगिरि-प्रणीता वृत्ति: प्रत सूत्रांक [३४२] दीप अनुक्रम [६१२] |न्ति-मूर्छापन्नान् कुर्वन्ति अपद्रावयन्ति-जीवितात् व्यपरोपयन्ति, तेभ्यः पुद्गलेभ्यः तेषां प्राणादीनां विषये भद-18 न्त ! सः-अधिकृतो वेदनासमुद्घातगतो जीवः कतिक्रियः प्रज्ञप्सः ?, भगवानाह-गौतम ! 'सिय तिकिरिए' इति, स्यात्शब्दः कथञ्चित्पर्यायः, कथञ्चित् कदाचित् कांश्चिच जीवानधिकृत्येत्यर्थः त्रिक्रियः, किमुक्तं भवति -यदा न केषाञ्चित् सर्वथा परितापनं जीविताद् व्यपरोपणं वा करोति तदा सर्वथा त्रिक्रिय एव, यदापि केषाश्चित्परि-IN तापं मरणं वाऽऽपादयति तदापि येषां नाबाधामुत्पादयति तदपेक्षया त्रिक्रियः, 'सिय चउकिरिए' इति केषा|श्चित्परितापकरणे तदपेक्षया चतुष्क्रिय इति, केषाश्चिदपद्रावणे तदपेक्षया पञ्चक्रिय इति, सम्प्रति तमेवाधिकृतं वेदनासमुद्घातगतं जीवमधिकृत्य तेषां वेदनासमुद्घातगतपुरुषपुद्गलस्पृष्टानां जीवानां क्रिया निरूपयति-ते णं भंते !' इत्यादि, ते-वेदनासमुद्घातगतपुद्गलस्पृष्टा णमिति पूर्ववत् भदन्त ! जीवास्ततो-वेदनासमुधातपरिगतान् जीवान् अत्र 'स्थानियपः कर्माधारयोः' इति स्थानिनं यपमधिकृत्य पञ्चमीयं, अयमर्थः-तं वेदनासमुघातपरिगतं जीवमधिकृत्य कतिक्रियाः प्रज्ञप्ताः ?, भगवानाह-गौतम ! स्वात्रिक्रियाः यदा न काश्चित्तस्याबाधामापादयितुं प्रभविष्णवः, स्थाचतुष्क्रिया यदा तं परितापयन्ति, दृश्यन्ते शरीरेण स्पृश्यमानाः परितापयन्तो वृश्चिकादयः, स्यात् पञ्चक्रियाः ये तं जीवितादपि व्यपरोपयन्ति, सिद्धाश्च प्रत्यक्षतः शरीरेण स्पृश्यमाना जीविताच्यावयन्तः सदिय इति, सम्प्रति तेन वेदनासमुद्घातगतेन जीवेन व्यापाद्यमानीवर्येऽन्ये जीवा व्यापाद्यन्ते वे चान्यैी ~292~ Page #293 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (१५) “प्रज्ञापना" - उपांगसूत्र-४ (मूलं+वृत्ति:) पदं [३६], -------------- उद्देशक: [-], ------------- दारं --------------- मूलं [३४२] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र-[१५]उपांगसूत्र-[४] "प्रज्ञापना" मूलं एवं मलयगिरि-प्रणीता वृत्ति: प्रत सूत्रांक [३४२] प्रज्ञापनाया:मलय. वृत्ती. sese ॥५९॥ दीप वापाद्यमाना. घेदनासमुद्घातगतेन जीवेन व्यापाद्यन्ते तानधिकृत्य तस्य वेदनासमुद्धातपरिगतस्य तेषां च |३६ समुसमुद्घातगतजीवसम्बन्धिपुद्गलस्पृष्टानां जीवानां क्रियानिरूपणार्थमाह-से णं भंते ! जीवे ते य जीवा' इत्यादि, घातपदे स:-अधिकृतो वेदनासमुद्घातगतो जीवः ते च वेदनासमुद्घातपरिगतजीवसम्बन्धिपुद्गलस्पृष्टाः अन्येषां जीवानामु समुद्धातपदर्शितेन प्रकारेण यः परम्पराघातस्तेन परम्पराघातेन कतिक्रियाः प्रजासाः १, भगवानाह-गीतम! स्थात् त्रि-1 पुद्गलपूरक्रिय इत्यादि पूर्वषत् भावयितव्यः, एनमेव वेदनासमुद्घातमुक्तेन प्रकारेण नैरयिकादिषु चतुर्विशतिस्थानेषु चिन्त | णादि सू. यन्नाह-'नेरइए णं भंते !' इत्यादि, एवं-उक्तेन प्रकारेण यथैव प्राक् सामान्यतो जीवो वेदनासमुद्घातमधिकृत्य ३४२ चिन्तितः तथा नैरयिकोऽपि चिन्तयितव्यः, नवरं जीवाभिलापस्थाने नैरयिकामिलापः कर्तव्यो, यथा 'नेरदए थे। भिंते ! वेयणासमुग्घाएणं समोहए समोहणित्ता जे पोग्गले निच्छुभई' इत्यादि, 'एवं निरवसेसं जाव वेमाणिए। इति एवं-नैरपिकोक्तेन प्रकारेण शेषेष्वपि स्थानेषु खस्खामिलापपूर्वकं निरवशेष तायद्वक्तव्यं यावद्वैमानिकाःवैमानिकाभिलापः । तदेवमुक्तो वेदनासमुद्घातः, सम्प्रति कषायसमुद्घातं समानवक्तव्यत्वादतिदेशतोऽभिधित्सुराह-एवं कसायसमुग्घाओऽवि भाणियों' इति, एवं-वेदनासमुद्घातगतेन प्रकारेण सामान्यतो जीवपदे चतुविशतिदण्डकक्रमेण च कषायसमुद्घातोऽपि वक्तव्यः, स चैवम्-'जीवे गंभंते ! कसायसमुग्धाएणं समोहए समो-| ॥५९शा हणित्ता जे पोग्गले निच्छुभई' यान् पुद्गलान् शरीरान्तर्गतान् कषायसमुद्घातवशसमुत्थप्रयत्नविशेषतः खशरीरादू अनुक्रम [६१२] Dotaracele airatmaram.org ~293~ Page #294 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (१५) “प्रज्ञापना” – उपांगसूत्र-४ (मूलं+वृत्ति:) पदं [३६], -------------- उद्देशक: [-], ------------- दारं --------------- मूलं [३४२] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र-[१५]उपांगसूत्र-[४] "प्रज्ञापना" मूलं एवं मलयगिरि-प्रणीता वृत्ति: प्रत सूत्रांक [३४२] बहिरात्मप्रदेशेभ्योऽपि विश्लिष्टान् करोति, 'तेहि णं भंते ! पोग्गलेहि केवइए खेत्ते अप्फुण्णे केवइए खित्ते फुडे, गो! सरीरप्पमाणमेत्ते विक्खंभवाहलेणं नियमा छदिसि एवइए खेते अफुण्णे एवइए खेत्ते फुडे' कषायसमुघातो हि प्रथमं उद्भवति सजीवानां, तेषामेव तीव्रतराध्यवसायसम्भवादू, एकेन्द्रियाणां तु पूर्वभवानुवृत्तितः, प्रसजीवाथ प्रसनाख्यां न ततो बहिः, प्रसनाख्यां च व्यवस्थितः खशरीरप्रमाणं विष्कम्भवाहल्यं क्षेत्रमात्मविश्लिष्टै पुद्गलैः भृतं पद्ददिक्त्वमवश्यमुपपद्यते इति 'नियमा छद्दिसिमित्युक्तम्, 'एचइए खेत्ते अफुण्णे एवइए खेत्ते फुडे' इत्यादि सर्व समानं । सम्प्रति मरणसमुद्घातमभिधित्सुराह-'जीवेणं भंते ! मारणंतियसमुग्घाएण'मित्यादि, इति । पूर्ववत्, भदन्त ! कश्चिन्मारणान्तिकसमुद्घातेन समवहतः समवहत्य च यान् पुद्गलान् तैजसादिशरीरान्तर्गतान् 'निम्छुभइ' इति विक्षिपति, आत्मप्रदेशेभ्यो विश्लिष्टान् करोति तेर्भदन्त ! पुद्गलैः कियत् क्षेत्रमापूर्ण कियत् क्षेत्र भृतम्, भगवानाह-गौतम 1 विष्कम्भवाहल्यतः शरीरप्रमाणमायामतो जघन्यतः खशरीरातिरेकामुलासङ्ग्येयभागमात्र यदा तावन्मात्रे क्षेत्रे उत्पद्यते उत्कर्षतोऽसक्येयानि योजनानि एतच्च यदा तावति क्षेत्रे अन्यथा वा द्रष्टव्यम्, एकदिशि-एकस्यां दिशि न तु विदिशि खभावतो जीवप्रदेशानां दिशि गमनसम्भवात्, एतावत् क्षेत्रमापूर्णमेतावत् | |क्षेत्रं स्पृष्टं, जघन्यतः उत्कर्पतो वा आत्मप्रदेशैरपि एतावत् क्षेत्रस्य पूरणसम्भवात् , सम्प्रति विग्रहगतिमधिकृत्या| पूरणविषयं स्पर्शनविषयं च कालप्रमाणमाह-से भंते !' इत्यादि, तत् उत्कर्षेणायामतोऽनन्तरोक्तप्रमाणं भद-1 EASElseiseaseatsescriserseasease दीप अनुक्रम [६१२] Saintaintina R उसल amuraryau ~294~ Page #295 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (१५) “प्रज्ञापना" - उपांगसूत्र-४ (मूलं+वृत्ति:) पदं [३६], -------------- उद्देशक: [-]------------- दारं [-], -------------- मूलं [३४२] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र-[१५]उपांगसूत्र-[४] "प्रज्ञापना" मूलं एवं मलयगिरि-प्रणीता वृत्ति: प्रत सूत्रांक [३४२] प्रज्ञापनाया: मलयवृत्ती. SEAS ॥५९४॥ दीप न्त ! क्षेत्रं विग्रहगतिमधिकृत्य 'केवइयकालस्सति तृतीयाथै पठ्या भावात् कियता कालेनापूर्ण कियता कालेन 8/३६ समुस्पृष्टं, किमुक्तं भवति -विग्रहगतिमधिकृत्य कियता कालेनोत्कर्षतोऽसोययोजनप्रमाणं क्षेत्रमायामतः पुद्गलै- घातपदे रापूर्ण स्पृष्टं भवतीति, भगवानाह-गौतम ! एकसमयेन वा द्विसमयेन वा त्रिसमयेन वा चतुःसमयेन वा विन- समुद्धात| हेणापूर्ण स्पृष्टं, इह पञ्चसामयिकोऽपि विग्रहः सम्भवति परं स कादाचित्क एव इति न विवक्षितः, इयमत्र पुद्गलपूरभावना-उत्कृष्टपदे आयामतोऽसयेययोजनप्रमाणं क्षेत्र विग्रहगतिमधिकृत्योत्कर्षतः चतुर्भिः समयैरापूर्ण स्पृष्टं वा। णादि सू. ३४२ भवतीति, अथ कथं चतुःसामयिकः पञ्चसामयिको वा विग्रहः सम्भवति ?, उच्यते, त्रसनाच्या बहिरधस्तनभागादुपरितने भागे यद्वोपरितनभागादधस्तने भागे समुत्पद्यमानो जीयो विदिशो वा दिशि दिशो वा विदिशि यदोत्पद्यते तदा एकेन समयेन त्रसनाडी प्रविशति द्वितीयेनोपरि अधो वा गमनं तृतीयेन बहिनिःसरणं चतुर्थेन दिशि उत्पत्तिदेशप्राप्तिः, अयं चतु:सामयिको विग्रहः, एवं पञ्चसामयिकस्तु प्रसनाच्या बहिरेप विदिशो विदिशि उत्पत्ती लभ्यते, तद्यथा-प्रथमसमये असनाच्या बहिरेव विदिशो दिशि गमनं द्वितीये त्रसनाच्या मध्ये प्रवेशः तृतीये उपर्यधो वा गमनं चतुर्थे बहिनिस्सरणं पञ्चमे विदिश्युत्पत्तिदेशगमनमिति, उपसंहारमाह-'एवइयकालस्स ५९४॥ अप्फुण्णे एवइयकालस्स फुडे' इति एतायता कालेनापूर्णमेतावता कालेन स्पृष्टमिति, 'सेसं तं चेव जाव पंचकिरिए' इति अत ऊर्दू शेषं तदेव सूत्र-'ते णं भंते ! पुग्गला निच्छूढा समाणा जाई तत्थ पाणाई इत्यादि यावत् अनुक्रम [६१२] ~295 Page #296 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (१५) प्रत सूत्रांक [३४२ ] दीप अनुक्रम [६१२] “प्रज्ञापना” – उपांगसूत्र - ४ ( मूलं + वृत्तिः ) - मूलं [ ३४२ ] पदं [३६], --------------उद्देशक: [-1, ------------- दारं [-], पूज्य आगमोद्धारकश्री संशोधितः मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र [१५],उपांगसूत्र-[४] "प्रज्ञापना" मूलं एवं मलयगिरि-प्रणीता वृत्तिः Education m पंचकिरिया' इति पदं, तदेवं सामान्यतो जीवपदे मारणान्तिकसमुद्घातश्चिन्तितः सम्प्रति एनमेव चतुर्विंशतिदण्डकक्रमेण चिन्तयन् प्रथमतो नैरयिकातिदेशमाह - 'एवमित्यादि, एवं - सामान्यतो जीवपद इव नैरयिकेऽपि वक्तव्यं, नवरमयं विशेषः- सामान्यतो जीवपदे क्षेत्रमायामतो जघन्येनाङ्गुला सङ्ख्येयभागमात्रमुक्तं इह तु जघन्यतः सातिरेकं योजनसहस्रं, किमत्र कारणमिति चेत् ?, उच्यते, इह नैरयिकाः नरकादुवृत्ताः खभावत एव पञ्चेन्द्रियतिर्यक्षु मध्ये उत्पद्यन्ते मनुष्येषु वा नान्यत्र, सर्वजघन्यचिन्ता चात्र क्रियते, ततो यदा पातालकलशसमीपवर्त्ती नैरयिकः पातालकलशमध्ये द्वितीये तृतीये वा त्रिभागे मत्स्यतयोत्पद्यते तदा पातालकलशठिकरिकाया योजनसहस्रमानत्वात् यथोक्तं जघन्यमानं नातोऽपि न्यूनतरं कथंचनेति, उत्कर्षतोऽसङ्ख्येयानि योजनानि तानि सप्तमपृथिवीगतनारकापेक्षया भावनीयानि अत्रैवोपसंहारमाह - 'एगदिसिं एवइए' इत्यादि, एकस्यां दिशि जघन्यत उत्कर्षतश्च एतावत् — अनन्तरोक्तप्रमाणं क्षेत्रमापूर्णमेतावत् क्षेत्रं स्पृष्टं विग्रहगतिमधिकृत्य विशेषमाह - 'विग्गहेणेत्यादि, विग्रहेणापूर्ण स्पृष्टं वा वक्तव्यमेकसामयिकेन द्विसामयिकेन त्रिसामयिकेन वा नन्येतत् सामान्यतो जीवपदेऽप्युक्तं तत्कोऽत्र विशेषस्तत आह- 'नवरं चउसमइएण वा ण भन्नइ' इति नवरमत्र सामान्यजीवपद इव चतुःसामयिकेनेति न भण्यते, नैरयिकाणामुत्कर्षतोऽपि विग्रहस्य त्रिसामयिकत्वात्, ते च त्रयः समया एवं भवन्ति - इह कश्चिन्नैरथिको वायव्यां दिशि वर्त्तमानो भरतक्षेत्रे पूर्वस्यां दिशि तिर्यक्पञ्चेन्द्रियतया मनुष्यतया For Pale On ----- ~296 ~ Page #297 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (१५) “प्रज्ञापना" - उपांगसूत्र-४ (मूलं+वृत्ति:) पदं [३६], -------------- उद्देशक: [-]------------- दारं [-], -------------- मूलं [३४२] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र-१५Jउपांगसूत्र-[४] "प्रज्ञापना" मूलं एवं मलयगिरि-प्रणीता वृत्ति: प्रत सूत्रांक [३४२] प्रज्ञापनायाः मलय० वृत्ती. ॥५९५॥ दीप अनुक्रम [६१२] वोत्पित्सुः प्रथमसमये ऊर्द्धमागच्छति द्वितीयसमये वायव्या दिशः पश्चिमदिशं तृतीये ततः पूर्वदिशमिति, एवम-18|३६ समु सुरकुमारादिष्वपि यथायोगं त्रिसमयविग्रहभावना कार्या, 'सेसं तं चेव जाव पंचकिरियावि' इति शेषं सूत्रं तदेव घातपदे या वेदनासमुदघातगतं, 'ते णं भंते! पोग्गला केवइया कालस्स निच्छभंति १. गो! जहन्नेणवि अंतो. उको अंतो- समुद्धातमुहुत्तस्से'त्यादि तावद्वक्तव्यं यावदन्तिमं पदं 'पंचकिरियावि' इति, असुरकुमारविषये अतिदेशमाह-'असुरकु पुद्गलपूरमारस्स जहा जीवपदे' इति यथा सामान्यतो जीवपदेऽभिहितं तथा असुरकुमारस्याप्यभिधातव्यं, एतावता णादि सू. ३४२ किमुक्तं भवति ?-यथा जीवपदे आयामतः क्षेत्रं जघन्यतोऽङ्गुलासयेयभागमानं उत्कर्षतोऽसोयानि योजनानि तथाऽत्रापि वक्तव्यं, कथं जघन्यतोऽङ्गलासङ्ख्येयभागमात्रमिति चेत् , उच्यते, इहासुरकुमारादय ईशानदेवपर्यन्ताः पृथिव्यम्बुवनस्पतिष्यप्युत्पद्यन्ते, ततो यदा कोऽप्यसुरकुमारः सहिष्टाध्यवसायी खकुण्डलाघेकदेशे पृथिवीकायिकत्वेनोस्पित्सुमरणसमुद्घातमादधाति तदा जघन्येनायामतः क्षेत्रमनुलासङ्खयेयभागप्रमाणमवाप्यते इति यथा जीवपदे इत्युक्तं, ततोऽत्रापि विग्रहगतिश्चतुःसामयिकी प्राप्नोति तत.आह-नवरं विग्रहस्त्रिसामयिको यथा नैरयिकस्य, शेष सूत्रं तदेव यत् सामान्यतो जीवपदे, नागकुमारादिष्वतिदेशमाह-'जहा असुरकुमारे' इत्यादि, यथा ॥५९५॥ असुरकुमारेऽभिहितमेवं नागकुमारादिषु तावद् वक्तव्यं यावद्वैमानिकविषयं सूत्र, नवरमेकेन्द्रिये पृथिव्यादिरूपे। यथा जीवे-सामान्यतो जीवपदे तथा निरवशेष वक्तव्यं, किमुक्तं भवति ?-यथा जीवपदे चतुःसामयिकोऽपि विग्रह SARERainintennasana For P OW ~297 Page #298 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (१५) प्रत सूत्रांक [३४२ ] दीप अनुक्रम [६१२] “प्रज्ञापना” – उपांगसूत्र - ४ ( मूलं + वृत्तिः ) - पदं [३६], --------------उद्देशक: [-1, ------------- दारं [-], मूलं [ ३४२ ] पूज्य आगमोद्धारकश्री संशोधितः मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र [१५],उपांगसूत्र-[४] "प्रज्ञापना" मूलं एवं मलयगिरि-प्रणीता वृत्तिः अ. १०० | उक्तः तथा पृथिव्यादिष्वपि पञ्चसु स्थानेषु वक्तव्यः । शेषं तथैवेति, तदेवमुक्तो मारणान्तिकसमुद्घातः, साम्प्रतं वैक्रिन्यसमुद्घातमभिषित्सुराह ------ जीवे णं भंते ! वेउद्वियसमुवाएणं समोहते समोहणिचा वे पुग्गले निच्छुमति तेहि णं भंते! पोग्गलेहिं केवलिते खेत्ते अण्णे केवतिए खिचे फुडे १, गो० ! सरीरष्पमाणमेचे विवखभवाहल्लेणं आयामेणं जह० अंगुलस्स संखेजतिभागं उको ० संखिजति जोअणातिं एगदिसिं विदिसिं वा एवइए खित्ते अकुष्णे एवतिते खेचे फुडे, से णं भंते! केवतिका अये के सिकारु फुडे १, गो० ! एगसमइरण वा दुखमइएण वा तिसमइएण वा विग्गणं एवतिकालस्स वकालस्स फुडे, सेसं तं वेव जाव पंचकिरियावि, एवं नेरइएवि, नवरं आयामेणं जह० अंगुलस्त असंखेअतिमागं उको संखिबाई जोजनाएं एगदिसिं, एवतिते खेचे, केवतिकालस्स १, तं चैव जहा जीवपदे, एवं जहा नेरइक्स हा असुरकुमार, नवरं एगदिसि विदिसिं वा, एवं जाव यणियकुमारस्स, बाउकाइयस्स जहा जीवपदे, णवरं एमदिसिं, पंचिदिमतिरिक्खजोबियस्स निरवसेसं जहा नेरइयस्स, मणूसवाणमंतरजोइ सियवेमाणियस्स निरवसेस जहा अरकुमारस्त | जीवे णं मेरो ! तेयगसम्याएणं समोहते समोहणिता जे पोगले निच्छुभति तेहि णं भंते ! पोरगलेहिं केवसिते बोचे के किले फुडे, एवं जदेव वेडधिते समुग्धाते तद्देव, नवरं आयामेणं जह० अंगुलस्स असंखेअविभाग से वं चैव एवं जाब वैमाणियम्स, गवरं पंचिदियतिरिक्खजोणियस्स एगदिसि एवविते खेत्ते अण्णे एवखित For Parts Only ~298~ onetary or Page #299 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (१५) “प्रज्ञापना” – उपांगसूत्र-४ (मूलं+वृत्ति:) पदं [३६], -------------- उद्देशक: [-]------------- दारं [-], -------------- मूलं [३४३] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र-[१५]उपांगसूत्र-[४] "प्रज्ञापना" मूलं एवं मलयगिरि-प्रणीता वृत्ति: प्रत प्रज्ञापनाया: मलप.वृत्ती सूत्रांक [३४३] १५९६॥ दीप अनुक्रम [६१३] celeeees स्स फुडे । जीवे णं भंते ! आहारगसमुग्यातेणं समोहते समोहणिवा जे पोग्गले निच्छुब्भति तेहि णं भंते ! पोग्गलेहि केवइए खित्ते अफुष्णे केवइए खेत्ते फुडे १, गो०! सरीरप्पमाणमेत्ते विक्खंभवाहल्लेणं आयामेणं जहण्णेणं अंगुलस्स असं- द्घातपदं खेजतिभागं उको संखेजाई जोयणाई एगदिसिं, एवतिते खेत्ते एगसमतिएण वा दुसम० तिसम० विग्गहेणं एवतिका- समुद्धातलस्स अफुष्णे एवतिकालस्स फुडे, ते णं भंते ! पोग्गला केवतिकालस्स निच्छुमति ?, गो०! जह० अंतो• उको० पुद्गलस्पअंतोमुहुत्तस्स, ते गं भंते ! पोग्गला निच्छूढा समाणा जाति तत्थ पाणातिं भूयाति जीवाति सवाति अभिहणंति जाब शादि सू. उहवेति, ते ण मंते ! जीवे कतिकिरिए ?, गो०! सिय तिकि० सिय चउ० सिय पंचकिरिए, ते णं भंते ! जीवाओ ३४३ कतिकिरिया ?, गोएवं चेव, सेणं मंते ! ते य जीवा अण्णेसि जीवाणं परंपराघातेणं कतिकिरिया, गो! तिकिरियावि चउकिरियावि पंचकि०, एवं मासेवि (सूत्र ३४३) 'जीवे णं भंते । वेउचिए' इत्यादि प्राग्वत् , नवरमायामत उत्कर्षतः सत्ययानि योजनानि, एतच वायुकायिक-1 वर्जनैरयिकाद्यपेक्षया द्रष्टव्यं, ते हि वैक्रियसमुद्घातमारभमाणास्तथाविधप्रयत्नविशेषभावतः सङ्ख्येयान्येव योजना-M न्युत्कर्षतोऽप्यात्मप्रदेशानां दण्डमारचयन्ति, नासङ्ख्येयानि योजनानि, वायुकायिकास्तु जघन्यतो वा उत्कर्षतो वा १५९६॥ अङ्गुलासङ्ख्येयभागं, तावत्प्रमाणं चोत्कर्षतो दण्डमारचयन्तस्तावति प्रदेशे तेजसादिशरीरपुद्गलान् आत्मप्रदेशेभ्यो विक्षिपन्ति, ततस्तैः पुठूलै तं क्षेत्रमायामत उत्कर्षतोऽपि सङ्ख्येयान्येव योजनान्यवाप्यन्ते, एतचैवं क्षेत्रप्रमाणं ~299~ Page #300 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (१५) “प्रज्ञापना” – उपांगसूत्र-४ (मूलं+वृत्ति:) पदं [३६], -------------- उद्देशक: [-]------------- दारं [-], -------------- मूलं [३४३] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र-[१५]उपांगसूत्र-[४] "प्रज्ञापना" मूलं एवं मलयगिरि-प्रणीता वृत्ति: प्रत सूत्रांक [३४३] दीप अनुक्रम [६१३] Recedenteekerseree केवलं वैक्रियसमुद्घातसमुद्भवं प्रयत्नमधिकृत्योक्तं, यदा तु कोऽपि वैक्रियसमुदूधातमधिरूढो मरणमुपश्लिष्टः कथ-15 मप्युत्कृष्टदेशेन त्रिसामायिकेन विग्रहेणोत्पत्तिदेशमभिगच्छति तदा सङ्ख्यातीतान्यपि योजनानि यावदायामक्षेत्रम-1|| वसेयं, तावत्प्रमाण क्षेत्रापूरणं मरणसमुद्घातप्रयत्नसमुद्भवमिति सदपि न विवक्षितं, 'एकदिसि विदिसि वा' इति, तत् जघन्यत उत्कर्षतो वा यथोक्तप्रमाणमायामक्षेत्रमेकस्यां दिशि विदिशि वा द्रष्टव्यं, तत्र नैरविकाणां पञ्चेन्द्रियतिरश्चां । वायुकायिकानां च नियमादेकदिशि, नैरयिका हि परवशा अल्पर्द्धयश्च तिर्यक्पञ्चेन्द्रियावाल्पर्द्धय एवं वायुकायिका विशिष्टचेतनाविकलास्ततस्तेषां वैक्रियसमुद्घातमारभमाणानां यदि परं तथाखाभाव्यादेवात्मप्रदेशदण्डविनिर्गमस्तेभ्यश्चात्मप्रदेशेभ्यो विश्लिष्य पुगलानां च स्वभावतोऽनुश्रेणिगमनं न तु विश्रेणितः ततो दिश्येव नैरयिकतिर्य-18 पञ्चेन्द्रियवायुकायिकानामायामतः क्षेत्रं द्रष्टव्यं, नतु विदिशि, ये तु भवनपतिव्यन्तरज्योतिष्कवैमानिका मनुप्याश्च ते खेच्छाचारिणो विशिष्टलब्धिसम्पन्नाश्च भवन्ति ततस्ते कदाचित्प्रयत्नविशेषतो विदिश्यप्यात्मप्रदेशानां पदण्डं विक्षिपन्तस्तत्र तेभ्य आत्मप्रदेशेभ्यः पुगलान् विक्षिपन्तीति तेषामेकस्यां दिशि विदिशि वा प्रत्येतव्यं । वैक्रियसमुद्घातगतश्च कोऽपि कालमपि करोति विग्रहेण चोत्पत्तिदेशमभिसर्पति ततो विग्रहगतिमधिकृत्य कालनिरूपणार्थमाह-से णं भंते !' इत्यादि, तत् भदन्त ! क्षेत्रं विग्रहगतिमधिकृत्योत्पत्चिदेशं यावत् 'केवइकालस्स'त्ति तृतीया) षष्ठी कियता कालेनापूर्ण कियता कालेन स्पृष्टं !, भगवानाह-गौतम! एकसामयिकेन वा द्विसाम ~300~ Page #301 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (१५) “प्रज्ञापना" - उपांगसूत्र-४ (मूलं+वृत्ति:) पदं [३६], -------------- उद्देशक: [-]------------- दारं [-], -------------- मूलं [३४३] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र-[१५]उपांगसूत्र-[४] "प्रज्ञापना" मूलं एवं मलयगिरि-प्रणीता वृत्ति: प्रत सूत्रांक [३४३] प्रज्ञापनाया मल- यवृत्ती. ॥५९७॥ दीप विकेन वा त्रिसामयिकेन का विग्रहेण आपूर्ण स्पृष्टमिति गम्यते, किमुक्तं भवति ?-विग्रहगतिमधिकृत्य मरणद-M३६ समु. शादारभ्य उत्पतिदेशं यावत् क्षेत्रस्यापूरणमुत्कर्षतः त्रिभिः समयैरवाप्यते न चतुर्थेनापि समयेन, वैक्रियसमुद्घात- घातपर्द गतो हि वायुकायिकोऽपि प्रायनसनाच्यामेवोत्पद्यते, सनाख्यां च विग्रह उत्कर्षतोऽपि त्रिसामयिक इति, उप- समुबातसंहारमाह-'एवरकालस्स' इत्यादि सुगम, 'सेस तं चेवेत्यादि अत ऊर्द्ध शेष सूत्रं तदेव-यत्नाक वेदनासमुद्घाते पुद्गलस्पउक्तं, तच तापत् यावदन्तिमपद 'पंचकिरियावि' इति, एवं 'नेरइएणवि' इत्यादि सूत्रं तु स्वयं भावनीयं, यस्तु शोदि स. दिगविदिगपेक्षया विशेषः स प्रागेव दर्शितः । सम्प्रति तैजससमुद्घातमभिधित्सुराह-'जीवे भते! तेयगसमु-। ३४३ पापण मित्यादि, सुगम, नवरमयं तेजससमुद्घातमतुर्देवनिकायतिर्यक्पञ्चेन्द्रियमनुष्याणां सम्भवति न शेषाणां, ते च महाप्रयत्बवन्त इति तेषां तेजससमुद्घातमारममाणानां जघन्यतोऽपि क्षेत्रमायामतोऽङ्गुलासङ्ख्येयभागप्रमाणं भवति, न तु समयेयभागमानं, उत्कर्षतः सङ्ग्येययोजनप्रमाणं, तब अपन्यत उत्कर्षतो वा यथोक्तप्रमाण क्षेत्रं तिर्यपञ्चेन्द्रियवर्जामामेकस्यां दिशि विदिशि वा वक्तव्यं, तिर्यक्पश्चेन्द्रियाणां तु दिश्येव, अत्र युक्तिः प्रागुक्तैवानुस व्या, तथा चाह-एवं जहा बेउवियसमुग्धाए' इत्यादि । तदेवमुक्तस्तैजससमुद्घातः, साम्प्रतमाहारकसमुदूपात प्रतिपिपादयिषुराह-'जीवेणं मंते। इत्यादि, एतच सूत्रं तेजससमुद्घातवद्भावनीयं, नवरमयमाहारकसमुद्घातो मनुष्याणां तत्राप्यधीतचतुर्दशपूर्वाणं सत्रापि केषाञ्चिदेषाहारकलब्धिमतां न शेषाणां, ते चाहारकसमुन्धातमारभ अनुक्रम [६१३] sesses ~301~ Page #302 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (१५) “प्रज्ञापना” – उपांगसूत्र-४ (मूलं+वृत्ति:) पदं [३६], -------------- उद्देशक: [-]------------- दारं [-], -------------- मूलं [३४३] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र-[१५]उपांगसूत्र-[४] "प्रज्ञापना" मूलं एवं मलयगिरि-प्रणीता वृत्ति: 12. प्रत सूत्रांक [३४३] दीप अनुक्रम [६१३] माणा जघन्यत उत्कर्षतो वा यथोक्तप्रमाणमायामतः क्षेत्रमात्मप्रदेशविश्लिष्टः पुद्गलैरापूरयन्त्येकस्यां दिशि, न तुम विदिशि, विदिशि तु प्रयत्नान्तरविशेषादात्मप्रदेशदण्डविक्षेपः पुद्गलैरापूरणं च, न च ते प्रयत्नान्तरमारमते प्रयोजना-191 9 भावात् गम्भीरत्वाचेति, माहारकसमुद्घाप्तगतोऽपिच कोऽपि कारं करोति विग्रहेण चोत्पद्यते विग्रहशोत्कर्षत खिसामयिक इति 'एगदिसिं एवइए खेचे फुडे' तथा 'एगसमइएण वा दुसमइएण वा' इत्याधुक्तं, तथा मनुष्याणाRI मेबापमाहारकसमुद्धात इति चतुर्विशतिदण्डकचिन्तोपक्रमे 'एवं मणूसेवि' इत्युक्तं, अस्सायमर्थः-एवं सामान्यतो जीवपदे इव मनुष्येऽपि-मनुष्यचिन्तायामपि सूत्रं वक्तव्यं, जीवपदे मनुष्यानेवाधिकृय सूत्रस्य प्रपत्तत्वाद्, अन्येषामाहारकसमुपासासम्मवात् ॥ तदेवं पण्णामपि डामस्थिकानां समुद्घातानामारम्भे जघन्यतः उत्कर्षतो वा यानलामाणं क्षेत्रमात्मविश्विष्टः पुद्गलैपयायोममौदारिकादिशरीराद्यन्तर्गतरापूरितं भवति तावत्प्रमाणमावेदितं, सम्प्रति केवलिसमुद्धातविधी यथाखरूपैः पुलावत्प्रमाषस क्षेत्रस्यापूरणमुपजायते तथाखरूपैः पुद्रलेखावत्माणय घेवस्यापूरणमनिधित्सुराह अषमारस्स में भो!भावियप्पणो केवलिसमग्वातेणं समोहयस्स जे चरमा निजरापोग्गला सुटुमा ण ते पोग्गला पं०१ समभाउसो 1, सबलोगंपिय से फुसित्ताणं चिति , हता! गो. अणगारस्स भावियप्पणो केवलिसमुग्धारणं समोहमस्स जे परमा निजरापोग्गला सुहमा ते पोग्गला पं० समणाउसो, सबलोगपिय गं फुसिसाणं चिट्ठति । छउ ~302~ Page #303 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (१५) “प्रज्ञापना" - उपांगसूत्र-४ (मूलं+वृत्ति:) पदं [३६], -------------- उद्देशक: [-], ------------- दारं [-], -------------- मूलं [३४४] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र-[१५]उपांगसूत्र-[४] "प्रज्ञापना" मूलं एवं मलयगिरि-प्रणीता वृत्ति: प्रज्ञापना या मलयवृत्ती. प्रत सूत्रांक [३४४] IM९८॥ सूक्ष्मता सू.१४४ दीप अनुक्रम [६१४] मातेमणसे तेसिं णिजरापोग्गलाणं किंचि वणेणं वणं गंधेणं गंध रसेण वा रसं फासेण वा फास जाणति पासति', गो०!णो इणढे समढे, से केणगुणं भंते ! एवं वुचति छउमत्थे णं मणसे तेसिं णिजरापोग्गलाणं णो किंचि वण्णेणं २ गंधेणं २ रसेणं २ कासेणं २ णो जाणति पासति !, गो.! अयण्णं जंबूद्दीवे दीवे सवदीवसमुदाणं सबभतराए सबखुड्डाए बट्टे तेल्लापूयसंठाणसंठिते बट्टे रहचकवालसंठाणसंठिए चट्टे पुक्खरकणियासंठाणसंठिए चट्टे पडिपुण्णचंदसंठाणसंठिए एग जोअणसयसहस्सं आयामविसंभेणं तिण्णि जोयणसयसहस्साई सोलस सहस्साई दोणि सत्तावीसे जोयणसते तिण्णि य कोसे अट्ठावीसं च घणुसतं तेरस य अंगुलाई अद्धंगुलं च किंचिविसेसाहिते परिक्खेवेर्ण पं०, देवेणं महिडीते जाव महासोक्खे एगं मई सविलेवणं गंधसमुम्गतं गहाय ते अवदालेति तं मह एग सविलेवणं अंधसमुग्गतं अवदालहत्ता इणामेव कहु केवलकप्पं जंबुद्दीव दीवं तिहिं अच्छराणिवातेहिं तिसत्तखुत्तो अणुपरियहित्ताणं हत्वमागच्छेजा, से नूर्ण गो० से केवलकप्पे जंबुद्दीवे दीवे तेहिं पाणपोग्गलेहि फुडे', हता! फुडे, छउमत्थे णं गोतमा । मासे नेसि घाणपुग्गलाणं किंचि वण्णेण चण्णं गंधेणं गंध रसेणं रस फासेणं फासं जाणति पासति , भगवं ! नो इणढे समहे, से एएणडेणं गोयमा ! एवं वुचा-छउमत्थे ण मणूसे तेसि निजरापोग्गलाणं नो किंचि वण्णेणं वणं गंधेणं गंधं रसेणं रस फासेणं फासं जाणति पासति, सुहुमा णं ते पोग्गला पं० समणाउसो !, सबलोगंपिय णं फुसिचाणं चिहति (मूत्र ३४४) 'अणगारस्स णं भंते ।' इत्यादि, इह केवलिसमुद्घातः केवलिनो भवति, न छमस्थस्य, केवली निश्चयनयमते ५९८॥ ~303~ Page #304 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (१५) “प्रज्ञापना” – उपांगसूत्र-४ (मूलं+वृत्तिः ) पदं [३६], -------------- उद्देशक: [-], ------------- दारं -1, -------------- मूलं [३४४] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र-[१५]उपांगसूत्र-[४] "प्रज्ञापना" मूलं एवं मलयगिरि-प्रणीता वृत्ति: प्रत सूत्रांक [३४४] दीप अनुक्रम [६१४] नानगारो न गृहस्थो नापि पाखण्डी, स च नियमाद् भावितात्मा विशिष्टशुभाध्यवसायकलितत्वात् , अन्यथा केव-II |लित्वानुपपत्तेः, तत उक्तमनगारख भावितात्मन इति, केवलिसमुद्घातेन-उक्तखरूपेण समवहतस्य ये चरमाः-चरमसमयभाविनश्चतुर्थसमयमाविन इत्यर्थः, तैरेव सकललोकापूरणात् , निर्जरापुद्गला' इति निर्जरागुणयोगात् निर्ज-18 रा:-निर्जीर्णा इत्यर्थः ते च ते पुद्गलाश्चेति विशेषणसमासः, किमुक्तं भवति ?-ये लोकापूरणसमये पुद्गला आत्मप्र-8 देशेभ्यो विश्लिष्टाः परित्यक्तकर्मत्वपरिणामा इति, 'सुहुमा णं ते पुरगला' इति णमिति निश्चये नियतमेतत् सूक्ष्माःचक्षुरादीन्द्रियपथमतिकान्तास्ते पुद्गलाः प्रज्ञप्ताः भगवद्भिहें श्रमण हे आयुष्मन् !, गौतमकृतं भगवतः सम्बोधनमेतत् , तथा णमिति निश्चितमेतत् सर्वलोकमपि ते पुद्गलाः स्पृष्टा णमिति वाक्यालङ्कारे तिष्ठन्ति ? इति गौतमेन प्रश्ने कृते भगवानाह-'हंता गोयमा इत्यादि, हन्तेति प्रीती, यदाह शाकटायन:-'हन्तेति सम्प्रदानप्रीतिविषादादि-18 वि'ति, प्रीतिश्चात्र यथावस्थितखरूपप्रतिपादकत्वात् प्रश्नसूत्रस्य साम्मत्यलक्षणा बेदितव्या, न तु हर्षरूपा, क्षीण| मोहत्वेन भगवतो हर्षविषादातीतत्वात् साम्मत्यमेव ख्यापयति, यदुक्तं गौतमेन तदेवानुवदति-'अणगारस्से'त्यादि भावितार्थ । सूक्ष्माः पुद्गला इत्युक्तं, तच्च सूक्ष्मत्वमापेक्षिकमपि भवति यथा बदरादीनामामलकाद्यपेक्षया, ततश्चक्षुरादीन्द्रियगोचरातिकान्तरूपं तत्प्रतिपिपादयिषुरिदमाह-'छउमत्थे णं भंते !' इत्यादि, छद्मस्थो भदन्त ! मनुष्यः तेपां-अनन्तरोद्दिष्टानां निर्जरापुद्गलानां किश्चिदिति प्रथमतः सामान्येन प्रयुक्तं जानाति पश्यतीति सम्बध्यते, ब्याटenese SAMERamumana ~304~ Page #305 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम “प्रज्ञापना” – उपांगसूत्र-४ (मूलं+वृत्ति:) पदं [३६], -------------- उद्देशक: [-], ------------- दारं [-], -------------- मूलं [३४४] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र-[१५]उपांगसूत्र-[४] "प्रज्ञापना" मूलं एवं मलयगिरि-प्रणीता वृत्ति: प्रत सूत्रांक [३४४] १९९० दीप प्रशापना- एतदेव विशेषतो व्याचष्टे-'वर्णेन' वर्णग्राहकेण चक्षुरिन्द्रियेण वर्ण्यते-यथावस्थितं वस्तुखरूपं निर्णीयते अनेनेति NI, या मल- वर्ण इति व्युत्पत्तेः वर्ण-कृष्णादिरूपं 'गन्धेन' गन्धग्राहकेण नासिकेन्द्रियेण 'गन्ध आमाणे' 'चुरादिभ्यो णिच् धातपर्व ब० वृत्तौ. गन्ध्यते-आधारते शुमोऽशुमो वा गन्धोऽनेनेति गन्ध इति व्युत्पादनात् गन्धं शुभमशुभं वा 'रसेन' रसपाह- वलिस केण रसनेन्द्रियेण रखते-आखाद्यतेऽनेनेति शब्दार्थत्वात् रसं-तिक्तादिरूपं, 'स्पर्शन' स्पर्शग्राहकेण स्पर्शनेन्द्रि- मुद्धातनि वेण स्पृश्यते कर्कशादिरूपः परिच्छेद्यवस्तुगतः स्पर्शोऽनेनेति स्पर्श इति व्युत्पादनात् 'स्पर्श' कर्कशादिरूपरापुद्रलIS जानाति पश्यतीति, मगपानाह-गौतम । नायमर्थः समर्थः उपपन्न इत्यर्थः, पुनीतमः प्रश्नयति-से केण-II सूस्मता टेणं भंते इत्यादि, उत्तानार्थ, भगवानाह-गौतम ! 'अयण मित्यादि, अयं-प्रत्यक्षत उपलभ्यमाना, णमिति सू. ३४४ I] वाफ्यालारे, मष्टयोजनोस्तिया रखमय्या जम्न्या उपलक्षितो द्वीपो जम्बूद्वीपो द्वीपः, 'सर्वाभ्यन्तरक' इति सर्वे | धामम्यन्तरो मध्यवर्ती सर्वाभ्यन्तरः सर्वाभ्यन्तर एव सर्वाभ्यन्तरक: “जाती वा खार्थे क" इति प्राकृतलक्षणवशात् । खार्थे कालयः, केषां सर्वेषामन्वन्तर इत्याह-सर्वद्वीपसमुद्राणां, तथाहि-सर्वे-अशेषा द्वीपसमुद्रा जम्बूद्वीपादारभ्यागमामिहितेन क्रमेण द्विगुणद्विगुणविस्तारा व्यवस्थिताः ततो भवति द्वीपसमुद्राणामेव जम्बूद्वीपोऽभ्यन्तर, तथा 'सबसुहाम इति सर्वेम्यो द्वीपसमुद्रेभ्यः क्षुल्लको-इखः सर्वक्षलका, तथाहि-सर्वे लवणादयः समुद्राः सबै पपातकीखण्डात्यो दीपा मसाजम्बूद्वीपादारभ्य प्रवचनोकेन क्रमेण द्विगुणद्विगुणचकवालवितताः ततः शेष-1 अनुक्रम [६१४] ~305~ Page #306 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (१५) “प्रज्ञापना" - उपांगसूत्र-४ (मूलं+वृत्ति:) पदं [३६], -------------- उद्देशक: [-], ------------- दारं [-], -------------- मूलं [३४४] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र-[१५]उपांगसूत्र-[४] "प्रज्ञापना" मूलं एवं मलयगिरि-प्रणीता वृत्ति: प्रत सूत्रांक [३४४] दीप अनुक्रम [६१४] दीपसमुद्रापेक्षयाऽयं सर्वलघुरिति, तथा वृत्तो-वर्नुलो, यतस्तैलापूपसंस्थानसंस्थितः, तैलेन हि पक्कोऽपूपः प्रायः परिपूर्णवृत्तो मवति न घृतपक्क इति तैलविशेषणं, तस्येव संस्थानसंस्थितः, तथा वृत्तो जम्बूद्वीपो द्वीपो यतो रथच वालसंस्थानसंस्थितः, रथस्य-रथाङ्गस्य चक्रस्य चक्रवालं-मण्डलं तस्येव यत् संस्थानं तेन संस्थितः, एवं सूत्रोक्तमन्यदपि पदयं भाषनीयं, आयामविक्खंभेणं ति आयामश्च विष्कम्भश्चेति समाहारो द्वन्द्वः तेन आयामेन विष्कम्भेन प्रत्येकमेकं योजनशतसहसमित्यर्थः,परिधिपरिमाणानयनगणितं च जम्बूद्वीपप्रज्ञत्वादावनेकशो भावितमिति ततोRऽवधायें देवेणमित्यादि, देवश्च णमिति वाक्यालङ्कारे 'महर्द्धिक' इति महती ऋद्धिः-विमानपरिवारादिका यस्या सी महद्धिकः 'जाव महासोक्खे' इति यावतशब्दकरणात् 'महज्जइए महाबले महायसे' इति द्रष्टव्यं, तत्र महती तिम् पारीरामरणविषया यस्य स महाधुतिः, महलं-शारीरःप्राणो यस्य स महाबलः, महत् यशः-ख्यातियस्थ इस महायशाः, तथा महत्-प्रभूतं सौख्यं यस्य प्रभूतसद्वेचकर्मोदयभावादिति महासौख्यः, कचित्-'महेसक्खें' इति का पाठः, तत्र महान् ईश-ईवर इत्याख्या-शब्दप्रथा यस्य लोके स महेशाख्या, अथवा ईशनमीशो, भावे पश्प्र सया, ऐश्चर्यमित्यर्थः, ईश ऐश्व इति पचनात्, तत ईशं-ऐश्वर्यमात्मनः ख्याति-अन्तर्भूतण्यर्थतया ख्यापयति प्रकाशपति तथा परिवारादिस्फीत्या वर्चते इति ईशाख्यः महाश्वासावीशारुयक्ष महेशाख्या, अन्यत्र 'महासक्ने' इति वा पाठः, सत्रैवं वृद्धव्याख्या-बाशगमनादर्थ-मनः अक्षाणि-इन्द्रियाणि खखविषयव्यापकत्वात् , अक्ष SANERurabinal. ~306~ Page #307 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (१५) प्रत सूत्रांक [३४४] दीप अनुक्रम [६१४] “प्रज्ञापना” – उपांगसूत्र - ४ ( मूलं + वृत्तिः ) - मूलं [ ३४४ ] पदं [३६], --------------उद्देशक: [-1, -------------- दारं [-], पूज्य आगमोद्धारकश्री संशोधितः मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र [१५],उपांगसूत्र-[४] "प्रज्ञापना" मूलं एवं मलयगिरि-प्रणीता वृत्तिः प्रज्ञापनाया मल म० वृत्तौ. ॥६००॥ ३६ समुद्घातपर्द केवलिस सूक्ष्मता शब्दो हि प्रायेणाशुद्ध व्याप्तावित्यस्य धातोर्निष्पाद्यते, अश्वश्वाक्षाणि च अश्वाक्षाणि महान्ति स्फीतिमन्ति अश्वाक्षाणि यस्यासौ महाश्वाक्षः, स्फीतमनाः स्फूर्त्तिमचक्षुरादीन्द्रियश्चेत्यर्थः, एकं महान्तं - अति गुरुकमन्यथा स्तोकतया तद्गतैर्गन्धपुद्गलैः सकलस्य जम्बूद्वीपस्य व्याप्तुमशक्यत्वात्, 'सविलेवण' मिति सह विशिष्टं - अतिसूक्ष्मरंत्राणामपि स्थगनात् लेपनं लेपो - जत्वादिकृतं पिधानमुपरि वर्त्तते येन स तथा तं विशिष्टलेपप्रदानाभावे हि बहवः सूक्ष्मर- १ मुद्धातनिस्त्रैर्गन्धपुद्गला निर्गच्छन्ति तत उद्घाटनवेलायां तेषां खोकीभावेन सकलजम्बूद्वीपापूरणं नोपपद्यते, 'गंधसमुग्गयं'ति ४ जेरापुलगन्धद्रव्यैरतिविशिष्टैः परिपूर्ण भ्रतः समुद्रको गन्धसमुद्द्रकस्तं 'अबदाले 'ति अवदालयति उत्पादयतीत्यर्थः, 'इणामेवे'ति एवमेवेत्यर्थः 'केवलकप्पं ति केवलं – केवलज्ञानं तत्कल्पं परिपूर्णतया तत्सदृशं परिपूर्णमित्यर्थः, जम्बूद्वीपं | द्वीपं त्रिभिः अप्सरोनिपातो नाम-चप्पुटिका ततस्तिसृभिः चप्पुटिकाभिरिति द्रष्टव्यं, चप्पुटिकाश्च कालोपलक्षणं, ततोऽयमर्थः --- यावता कालेन तिनचप्पुटिकाः पूर्यन्ते तावत्कालमध्ये इति, त्रिसप्तकृत्वः - एकविंशतिवारान् अति| परिवर्त्य - सामस्त्येन परिभ्रम्य 'हवं' शीघ्रमागच्छेत्-समागच्छेत् 'से नृणं' इत्यादि, सेशब्दो मगधदेशप्रसिद्ध्या अथशब्दार्थे, अथशब्दस्य चार्थो वाक्योपन्यासादयः, उक्तं च- 'अथ प्रक्रियाप्रमानन्तर्यमङ्गलाधिकारवाक्योपन्यासेषु' तत्रायं वाक्योपन्यासे, तद्भावना च एवं-उक्तस्तावत् विवक्षितार्थप्रतिपत्तिहेतोर्दृष्टान्तस्य पीठिकाबन्धः, सम्प्रति विवक्षितार्थप्रतिपत्तिहेतुदृष्टान्तवाक्यमुपन्यस्य ते, नूनं निश्चितं, गौतम ! स केवलकल्पो जम्बूद्वीपस्तैर्ग सू. ३४४ For Parts Only ----- ~307~ ॥ ६००॥ org Page #308 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (१५) “प्रज्ञापना" - उपांगसूत्र-४ (मूलं+वृत्ति:) पदं [३६], -------------- उद्देशक: -, ------------- दारं -1, -------------- मूलं [३४४-३४७] + गाथा: पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र-[१५]उपांगसूत्र-[४] "प्रज्ञापना" मूलं एवं मलयगिरि-प्रणीता वृत्ति: अपना असर मान लिया . प्रत सूत्रांक [३४४३४७] रिटरटseeneces गाथा: न्धसमुद्काद्विनिर्गतैः प्राणपुद्गलैः-गन्धपुद्गलैः स्पृष्टो-व्याप्तः, काका चेदं सूत्रमधीयते ततःप्रश्नोऽवगम्यते, अथवा प्रश्नाथः सेशब्दस्ततोऽजसा प्रश्नयतीति, गौतम ! आह-हंत ! स्पृष्टो गन्धपुद्गलानां सर्वतोऽगिसर्पणशीलत्वात् , पुनरपि भगवानाह-'छउमत्थे ण'मित्यादि सुगमम् , एष चात्र भावार्थः-यथा ते सकलजम्बूद्वीपव्यापिनो गन्धपुगलाः सूक्ष्मत्वात् न छमस्थानां चक्षुरादीन्द्रियगम्यास्तथा सकललोकव्यापिनो निर्जरापुद्गला अपीति, उपसंहारमाह'एसुहुमाण'ति एतावत्सूक्ष्माः अथ यनिमित्तं केवली समुद्घातमारभते तत्पिपृच्छिपुरिदं प्रश्वसूत्रमाह कम्हा भंते ! केवली समुग्धाय गच्छति ?, गो. केवलिस्स चचारि कम्मंसा अक्खीणा अवेदिया अणिजिण्णा भवति. त०-वेदणिज्जे आउए नामे गोए, सबबहुप्पएसे से वेदणिज्जे कम्मे हवति सबत्थोवे आउए कम्मे हबइ, विसमं समं करेति बंधणेहिं ठितीहि य, विसमसमीकरणयाए बंधणे हिं ठितीहि य एवं खलु केबली समोहणति, एवं खलु समुग्धाय गच्छति, सोविणं भंते ! केवली समोहगंति सबेवि गं भंते ! केवली समुग्यातं गच्छति', गो०! णो इणहे समडे, "जस्साउएण तुल्लाति, बंधणेहिं ठितीहि य । भवोवग्गह कम्माई, समुपातं से ण गच्छति ॥१॥ अगंतूर्ण समुग्धातं, अणंता केवली जिणा । जरमरणविप्पमुका, सिद्धिं वरगतिं गता ॥२॥ (सूत्रं ३४५) कतिसमतिए णं भंते ! आउजीकरणे पं०१, गो! असंखेजसमतिए अंतोमुहुत्तिए आउजीकरणे पं० (सूत्र ३४६) कतिसमतिए णं भंते ! केवलिसमुग्धाए पं०१, गो! अट्ठसमतिते पं०, तं-पढमे समए दंड करेति बीए समए कवाडं करेति ततिए समए मंथं दीप अनुक्रम [६१४ -६१९] ~308~ Page #309 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (१५) प्रत सूत्रांक [ ३४४ ३४७] + गाथा: दीप अनुक्रम [६१४ -६१९] “प्रज्ञापना” – उपांगसूत्र - ४ ( मूलं + वृत्तिः ) - पदं [३६], -------------- उद्देशक: [-], दारं [-], मूलं [ ३४४ ३४७] + गाथा: पूज्य आगमोद्धारकश्री संशोधितः मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र [१५],उपांगसूत्र-[४] "प्रज्ञापना" मूलं एवं मलयगिरि-प्रणीता वृत्तिः प्रज्ञापनाया मल य० वृत्ती. ॥१०१॥ Education in ------------- करेति चउत्थे समए लोग पूरेति पंचमे समए लोयं पढिसाहरति छट्टे समय मधे पडिसाहरति सचमए समए कवाडं पडिसाहरति अट्टमे समए दंड पडिसाहरति, दंडं पडिसाहरेता तओ पच्छा सरीरत्थे भवति । से णं भंते । तहा समुमायगते किं मणजोग भुंजति बजोगं जुंजति कायजोगं जुंजति १, गो० ! नो मणजोगं जुंजति नो बहजोगं जुंजति कायजोगं मुंजति, कायजोगे णं भंते 1 जुंजमाणे किं ओरालियकायजोगं जुंजति ओरालियमीसासरीर कायजो० किं उडिaritaruni tीसासरीरकायजोगं० किं आहारगसरीरका० आहारगमीसासरीरका ० किं कम्मगसरीरका० १, गो० ! ओरालियसरीरकायजोगंषि जुजति ओरालियमीसासरीरकायजोगंपि भुंजर, नो वेउधियसरीरका० नो वेउद्दियमीसा० नो आहारसरीरका० नो आहारगमीसास० कम्मगसरीरकायजोगंपि जुंजति, पढमट्टमेसु समएस ओरालिबसरीरकायजोगं जुजति वित्तिय सत्तमेसु समएस ओरालियमीसासरीरकायजोगं जुंजति, ततियच उत्थपंचमेसु समएस कम्मगसरीरकायजोगं जुंजति (सूत्रं ३४७ ) 'कम्हाण 'मित्यादि, कस्मात् कारणात् णमिति वाक्यालङ्कारे भदन्त । 'केवली' केवलज्ञानोपेतः समुद्घातं गच्छति - आरभते, कृतकृत्यत्वात् किल तस्येति मावः, भगवानाह - 'गोयमे'त्यादि, गौतम ! केवलिनश्चत्वारः 'कर्मा|शाः' कर्मभेदाः 'अक्षीणाः' क्षयमनुपगताः, कुत इत्याह-अवेदिताः, अत्र 'निमित्तकारणहेतुषु सर्वासां विभक्तीनां | प्रायो दर्शन मिति न्यायात् देती प्रथमा, ततोऽयमर्थः यतोऽवेदिताः ततोऽक्षीणाः, कर्मणां हि क्षयो नियमतः For Penal Use Only ~309~ ३६ समु दद्यातपदे केवलिस! मुद्धातमयोजन आवर्जीकरणं केव लिसमु दातः सू. ३४५-३४६ २४७ ॥ ६०१ ॥ r Page #310 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (१५) “प्रज्ञापना” – उपांगसूत्र-४ (मूलं+वृत्ति:) पदं [३६], --------------उद्देशक: -, ------------- दारं [-], -------------- मूलं [३४४-३४७] + गाथा: पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र-[१५],उपांगसूत्र-[४] "प्रज्ञापना" मूलं एवं मलयगिरि-प्रणीता वृत्ति: प्रत सूत्रांक [३४४३४७] awwa00000000000 गाथा: प्रदेशतो विपाकतो या वेदनाद् भवति, 'सवं च पएसतया भुजइ कम्ममणुभावतो भइय' [ सर्वच प्रदेशतया । भुज्यते कर्मानुभावतो भक्तं ] मित्यादि वचनात् , ते चत्वारः कर्माशा अपि अवेदिता अतोऽक्षीणाः, एतदेव पर्यायेण ब्याचष्टे-'अनिर्जीर्णाः' सामस्त्येनात्मप्रदेशेभ्योऽपरिशारिताः भवन्ति' तिष्ठन्ति, तानेव नामग्राहमभिधित्सु-18 राह-'तंजहे'त्यादि सुगम, तत्र यदा 'से' तस्य केवलिनः सर्वबहुप्रदेशं वेदनीयमुपलक्षणमेतत् नामगोत्रे च तथा सर्वस्तोकप्रदेशमायुःकर्म तदा स 'बंधणेहिं ठिइहिन्ति वध्यते-भवचारकात् विनिर्गच्छन् प्रतिबध्यते यैस्ते बन्धनाः, 'करणाधारे' इति करणेऽनट्प्रत्ययः, अथवा बध्यन्ते-आत्मप्रदेशैः सह लोलीभावेन संश्लिष्टाः क्रियन्ते योगवशात् ये ते बन्धनाः 'कृद्धहुल मिति वचनात् कर्मणि अनद्र, उभयत्रापि कर्मपरमाणवो वाच्याः, स्थितयो-वेदनाकालाः, तथा चोक्तं भाष्यकृता-"विसमं स करेइ समं समोहओ बंधणेहि ठिइए य । कम्मदवाई बंधणार्ति | कालो ठिई तेसिं ॥१॥" [विषमं स करोति समं समवहतो बन्धनैः स्थित्या च । कर्मद्रव्याणि बन्धनानि कालः स्थितिस्तेषाम् ॥१॥] ततश्च तैवन्धनैः स्थितिभिश्च विषमं सत् वेदनीयादिकं समुद्घातविधिना सममायुषा सह करोति, स एवं खलु केवली बन्धनैः स्थितिभिश्च विषमस्य सतो वेदनीयादिकस्य कर्मणः 'समीकरणयाए' इति । अत्र ताप्रत्ययः स्वार्थिकः, ततोऽयमर्थः-समकरणाय, 'समोहनह' इति समवहन्ति-समुद्घाताय प्रयतते, एवं खलु समुद्घातं गच्छति, उक्तं च-"आयुषि समाप्यमाने शेषाणां कर्मणां च यदि समाप्तिः। न स्यात् स्थितिवैष दीप अनुक्रम [६१४ -६१९] प्र.१०१ IN ~310~ Page #311 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (१५) “प्रज्ञापना” – उपांगसूत्र-४ (मूलं+वृत्ति:) पदं [३६], --------------उद्देशक: -, ------------- दारं [-], -------------- मूलं [३४४-३४७] + गाथा: पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र-[१५]उपांगसूत्र-[४] "प्रज्ञापना" मूलं एवं मलयगिरि-प्रणीता वृत्ति: प्रत सूत्रांक [३४४३४७] आवर्जी गाथा: प्रज्ञापना- म्यात् गच्छति स ततः समुपातम् ॥१॥ स्थित्या च बन्धनेन च समीक्रिया) हि कर्मणां तेपाम । अन्तर्मड-IN ३६ समुया: मल Mशेष तटायपि समजिघांसति सः ॥२॥" ननु प्रभूतस्थितिकस्य वेदनीयादेरायुषा सह समीकरणार्थ समुदयात घातपदे यवृत्ती मारभते इति यदुक्तं तन्नोपपत्रं, कृतनाशादिदोषप्रसङ्गात्, तथाहि-प्रभूतकालोपभोग्यस्य वेदनीयादेरारत एवाप-1 केवलिस गमसम्भवात् कृतनाश, वेदनीयादियश्च कृतस्यापि कर्मक्षयस्य पुननाशसम्भवान्मोक्षेऽप्यनाश्वासप्रसङ्गः, तदसत्, मुद्रातम॥६०२॥ कतनाशादिदोषाप्रसङ्गात् , तथाहि-इह यथा प्रतिदिवसं सेतिकापरिभोगेन वर्षशतोपभोग्यस्य कल्पितस्याहारस्थान भस्मकव्याधिना तत्सामथ्योत् स्तोकदिवसैनिःशेषतः परिभोगान्न कृतनाशोपगमः तथा कर्मणोऽपि वेदनीयादेः करणं केव१|तथाविधशुभाध्यवसायानुबन्धादुपक्रमेण साकल्यतो भोगान्न कृतनाशरूपदोषप्रसङ्गः, द्विविधो हि कर्मणोऽनुभवःII प्रदेशतो विपाकतश्च, तत्र प्रदेशतः सकलमपि कर्मानुभूयते, न तदस्ति किश्चित् कर्म यत्प्रदेशतोऽप्यननुभूती नमूतदातः स. सत् क्षयमुपयाति, ततः कथं कृतनाशदोषापत्तिः, विपाकतस्तु किञ्चिदनुभूयते किञ्चिन्न, अन्यथा मोक्षा- ३४५-३४६ भावप्रसङ्गात् , तथाहि-यदि पिाकानुभूतित एव सर्व कर्म क्षपणीयमिति नियमः तसंसङ्ख्यातेषु भवेषु तथा-1 ३४७ विविचित्राध्यवसायविशेषैर्यन्नरकगत्यादिकं कर्मोपार्जितं तस्य नैकस्मिन् मनुष्यादाषेष भवेऽनुभवः, खखभवनिव-M on न्धनत्वात् तथाविधविपाकानुभक्स्य, क्रमेण च खखभवानुगमनेन वेदने नारकादिभवेयु, चारित्राभावेन प्रभूततर-1 कर्मसन्तानोपचयात् तस्यापि खखभवानुगमनेनानुभवोपगमात् कुतो मोक्षः ?, तस्मात् सर्वे कर्म विपाकतो भाज्यं दीप अनुक्रम [६१४ -६१९] ~311 Page #312 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (१५) “प्रज्ञापना” – उपांगसूत्र-४ (मूलं+वृत्ति:) पदं [३६], -------------- उद्देशक: -, ------------- दारं -1, -------------- मूलं [३४४-३४७] + गाथा: पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र-[१५]उपांगसूत्र-[४] "प्रज्ञापना" मूलं एवं मलयगिरि-प्रणीता वृत्ति: प्रत सूत्रांक [३४४३४७] प्रदेशप्तोऽवश्यमनुभवनीयमिति प्रतिपत्तव्यं, एवं च न कश्चिदोषः, नन्वेवमपि दीर्घकालभोग्यतया तन्दनीयादिक कर्मोपचितं अथ च परिणामविशेषादुपक्रमेणारादेव तदनुभवति ततः कथं न कृतनाशदोषापत्तिः, तदप्यसम्यक, बन्धकाले तथाविधाम्यवसायवशादादावुपक्रमयोग्यस्यैव तेन बन्धनात्, अपिच-जिनक्चनप्रामाण्यादपि वेदनीयादिकर्मणामुपक्रमो मन्तव्यः, यदाह भाष्यकृत्-"उदयक्खयक्खओक्समोवसमा जंच कम्मुशो भणिया । दवाई पंचगं पड़ जुत्तमुवकमणमेचोषि ॥१॥" [उदयक्षयक्षयोपशमोपशमा यस्माध कर्मणो भणिताः। द्रव्यादिपश्चकं । प्रति युक्तमुपक्रमणमितोऽपि ॥१॥] न चैवं मोक्षोपक्रमहेतुः कश्चिदस्ति येन तत्रानाथासप्रसङ्गा, यथा चन मोक्षोपक्रमहेतुः कश्चिदस्ति तथाऽन्तिमसूत्रे भावयिष्यते, ततो यदुक्तं 'वेदनीयादिवच कृतस्थापि कर्मक्षयस्खे'सादि न तत्सम्यगुपपन्नमित्ति स्थितं, अपर आह-ननु यदा वेदनीयादिकमतिप्रभूतं सर्वस्तोकं चायुस्तदा समधिकवेदनीवा-18|| दिसमुद्घातार्थ समुपातमारभता, वेदनीयादेः सोपक्रमत्वात्, यदा त्वधिकमायुः सर्वस्तोकं च वेदनीयादिकं तदा का वार्ता १, न खल्वायुषः समधिकस्य समुद्घाताय समुद्घातः कल्प्यते, चरमशरीरिणामायुषो निरुपक्रमत्वात् । 'चरमसरीरा य निरुवकमा' इति वचनात् , तदयुक्तं, एवंविधभावस्ख कदाचनाप्यभावात् , तथाहि-सर्वदैव वेदनीयाद्येवायुषः सकाशादधिकस्थितिकं भवति, न तु कदाचिदपि वेदनीयादेरायुः, अथैवंविधो नियमः कुतो लभ्य-IN ते ?, उच्यते, परिणामखाभाच्यात्, तथाहि-इत्थंभूत. एवात्मनः परिणामो येनास्यायुर्वेदनीयादेः समं भवति गाथा: दीप अनुक्रम [६१४ -६१९] N arainrary.om ~312~ Page #313 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (१५) “प्रज्ञापना” – उपांगसूत्र-४ (मूलं+वृत्तिः ) पदं [३६], --------------उद्देशक: -, ------------- दारं [-], -------------- मूलं [३४४-३४७] + गाथा: पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र-[१५]उपांगसूत्र-[४] "प्रज्ञापना" मूलं एवं मलयगिरि-प्रणीता वृत्ति: प्रत सूत्रांक [३४४३४७] प्रज्ञापना- न्यूनं वा न तु कदाचनाप्यधिकं, यथैतस्यैवायुषः खल्वध्रुवबन्धः, तथाहि-ज्ञानावरणादीनि कर्माणि आयुर्वजानि यां: मल- सप्तापि सदैव बध्यन्ते, आयुस्तु प्रतिनियत एव काले खभवत्रिभागादिशेषरूपे, तत्र चैवंविधवैचित्र्यनियमे न ख- यवृत्ती. भावारतेऽपरः कश्चिदस्ति हेतुरेवमिहापि खभावविशेष एव नियामको द्रष्टव्यः, आह च भाष्यकृत्-"असमठिईणं| नियमो को थेवं आउयं न सेसंति । परिणामसहायाओ अदुवबंधोवि तस्सेव ॥१॥" [ असमस्थितिषु को निय॥६०३॥ मा-स्तोकमायुःन शेषाणि । परिणामस्वभावात् अभुववन्धोऽपि तस्यैव ॥१॥] अथ विशेषपरिज्ञानाय गौतमो भगवन्तं पृच्छति-सवेवि 'मित्यादि, णमिति निश्चये सर्वेऽपि खलु केवलिनः समवमन्ति-समुद्घाताय प्रय तन्ते, प्रयवानन्तरं च सर्वेऽपि खलु केवलिनः समुद्घातं गच्छन्ति, इति गौतमेन प्रश्ने कृते सति भगवान्निर्वचनNमाह-'गोयमे स्यादि, गौतम ! नायमर्थः समर्थ:-नायमर्थः उपपन्नः, किमुक्तं भवति -सर्वेऽपि केवलिनः समु द्घाताय न प्रयतन्ते नापि समुद्घातं गच्छन्ति, किन्तु येषामायुषः समधिकं वेदनीयादिकं, यस्य पुनः खभावत एवायुषा सह समस्थितिकानि वेदनीयादीनि कर्माणि सोऽकृतसमुद्घात एव तानि क्षपयित्वा सिध्यति, तथा चाह-'जस्से'त्यादि, यस्य केवलिन आयुषा सह भवे-मनुष्यभवे उप-समीपेन गृखते-अवष्टभ्यते यैस्तानि भवोपनहाणि तानि च तानि कर्माणि च भयोपग्राहकर्माणि वेदनीयनामगोत्राणि बन्धनैः-प्रदेशः स्थितिमिश्च तुल्यानि-समानि भवन्ति स समुदघातं न गच्छति, अकृतसमुद्घात एव तानि क्षपयित्वा स सिद्धिसौधमध्यास्ते इति ३६ समुद्घातपदे केवलिसमुद्धातप्रयोजन आवर्जीकरणं केवलिसमुद्धातः सू. ३४५-३४६ ३४७ गाथा: दीप ॥६०३३ अनुक्रम [६१४ -६१९] ~313~ Page #314 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (१५) प्रत सूत्रांक [ ३४४ ३४७] + गाथा: दीप अनुक्रम [६१४ -६१९] “प्रज्ञापना” – उपांगसूत्र - ४ ( मूलं + वृत्तिः ) - पदं [३६], --------------उद्देशक: [-], - दारं [-], मूलं [ ३४४ ३४७] + गाथा: पूज्य आगमोद्धारकश्री संशोधितः मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित.. आगमसूत्र [१५] उपांगसूत्र- [४] "प्रज्ञापना" मूलं एवं मलयगिरि-प्रणीता वृत्तिः भावः, उक्तं च- "जस्स उ तुतं भवइ य कम्मचउकं सभावतो जो य । सो अकयसमुग्धाओ सिज्झर जुगवं खवेऊणं ॥ १२ ॥” [ यस्य तु तुल्यं भवति तु कर्मचतुष्कं स्वभावतो यश्च (समकर्मा) । सोऽकृतसमुद्घातः सिध्यति युगपत् क्षपयित्वा ॥ १ ॥ ] अथायं कदाचित्को भाव उत बाहुल्यभावः १, तत आह- 'अगंतून समुग्धाय' मिलादि, अगत्वा समुद्घातं - केवलिसमुद्घातं 'सिद्धि' चरमगतिं गता इति सम्बन्धः कियत्सङ्ख्याका इत्याह- अनन्ताः - अनन्तसङ्ख्याकाः 'केवलिनः' केवलज्ञानदर्शनोपेताः, अनेन ये नवानामात्मगुणानामत्यन्तोच्छेदो मोक्ष इति प्रतिपनास्तेऽपास्ता द्रष्टव्याः, ज्ञानस्य निरुपचरितात्मखभावत्वात् तस्य च विनाशायोगाद्, अन्यथाऽऽत्मन एवाभावापत्तेः, नं चात्मनो निरन्वयो विनाशः, सतः सर्वथा विनाशायोगात्, 'नासतो विद्यते भावो नाभावो विद्यते सत' इति न्यायात्, तथा जिना - जितरागादिशत्रवः, अनेन गोशालकम तापाकरणमाह, ते हि मुक्तिपदमध्यासीनमपि न तत्त्वतो वीतरागमपि मन्यन्ते, 'अवाप्तमुक्तिपदा अपि तीर्थेनिकार दर्शनादिहागच्छन्तीति वचनात् तत्त्वतो वीतरागस्य च पराभवबुद्धे रिहागमनस्य चासम्भवात् पुनः कथंभूता इत्याह- 'जरामरण विप्रमुक्ता' जरा च मरणं च जरामरणे ताभ्यां विप्रमुक्ता जरामरणविप्रमुक्ताः, जरामरणग्रहणमुपलक्षणं तेन समस्तरोगशोकादिसांसारिकक्लेशविमुक्ता इति द्रष्टव्यं एतेन एकान्ततो मोक्षसौख्यस्योपादेयतामाह, अन्यस्यैवंविधस्वरूपस्य स्थानस्यासम्भवात् नहि संसारे प्रकसुखप्राप्तमपि स्थानमेवंविधमस्ति, सर्वस्यापि मरणपर्यवसानत्वात्, सेधनं सिद्धिः - अशेषकर्माशापगमेनात्मनः For Parts Only ~314~ Page #315 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (१५) “प्रज्ञापना” – उपांगसूत्र-४ (मूलं+वृत्ति:) पदं [३६], -------------- उद्देशक: -, ------------- दारं -1, -------------- मूलं [३४४-३४७] + गाथा: पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र-[१५],उपांगसूत्र-[४] "प्रज्ञापना" मूलं एवं मलयगिरि-प्रणीता वृत्ति: प्रत सूत्रांक [३४४३४७] मुबातम गाथा: प्रज्ञापना- खरूपेऽक्वान्ता वरा-सर्वगतीमामुत्तमा गम्यते इति गतिरगतिस्तां वरगतिस्पामित्यर्थः गता:-प्राप्ताः, इ ३६ समुयाः मल-18 सर्वोऽपि केवली केवलिसमुद्घातं गच्छम् प्रथमत आवर्जीकरणमुपगच्छति, तथा च केवलिसमुद्रातप्रक्रियां बिम- घातपदे य० वृत्ती.णिपुः समुपातशब्दथ्याख्यानपुरस्सरमाह भाग्यकार:-"तल्याउथअंससाहियकम्मसमुग्घायणं समाधाओ। केवलिस॥१०॥ गंतुमणा पुर्व आउजीकरणं उवे ॥१॥" [तत्रायुरंशाधिककर्मसमुद्घातनं समुद्घातः । तं गन्तुमनाः पूर्वमाफ योजन र्जीकरणमुपयाति ॥१॥] अथावर्जीकरणमिति का शब्दार्थः ।, उच्यते, आवर्जममावर्ज:-आस्मानं प्रति मोक्ष-1 | आवर्जी. स्वाभिमुखीकरणं आत्मनो मोक्षं प्रत्युपयोजनमित्ति तात्पर्यायः, अथवा आपय॑ते-अभिमुखीक्रियते मोक्षोऽनेनेति करण केवAमावर्ज-शुममनोवाकायापारविशेषः, उक्कं च-आबवणमुवमोगो कावारो का' इति, तत उभयत्रापि अतस्य || लिसमु तस करणमिति विपक्षायां शिवप्रत्ययः आवर्जीकरण, अमरे आवर्जितकरणमिसाए, तवायं शब्दार्थ-आवर्जितो दातः सू. नाक अभिमुखीकृता, तसाच लोके वकारू 'आर्जितोऽयं मथा, सम्मुखीकृत' इत्यर्थः, तत्तथा तथाभन्यत्वेनावर्जित- ३४५-३४६ ३४७ ख-मोकामनं प्रत्यभिमुखीतक कारणं-क्रिया शुभयोगव्यापारणं आवर्जितकरणं, अपरे 'आउज्जियाकरण मिति का पठन्ति, तत्रैवं शब्दसंस्कारमाचक्षते-आयोजिकाकरणमिति, जयं चात्रान्वयार्थ:-माङ मर्यादायां आ-मर्यादवा ६०४॥ बलिरला. योजन-गुभानां योगानां व्यापारणभायोजिका, भाये कुन्, तस्याः करणमायोजिकाकारणे, अन्वे आउस्सियफरण मिति युवते, तत्राण्ययमन्वर्थ:-आवश्यकेन-अवश्यंभावन करणमायककरणं, तथाहि-समः । दीप अनुक्रम [६१४ -६१९] ~315 Page #316 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (१५) प्रत सूत्रांक [ ३४४ ३४७] + गाथा: दीप अनुक्रम [६१४ -६१९] “प्रज्ञापना” – उपांगसूत्र - ४ ( मूलं + वृत्तिः ) - मूलं [ ३४४ ३४७] + गाथा: पदं [३६], -------------- उद्देशक: [-], - दारं [-], पूज्य आगमोद्धारकश्री संशोधितः मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र [१५],उपांगसूत्र-[४] "प्रज्ञापना" मूलं एवं मलयगिरि-प्रणीता वृत्तिः दूधातं केचित्कुर्वन्ति केचिच न कुर्वन्ति इदं त्वावश्यक सर्वेऽपि केवलिनः कुर्णातीति, सम्प्रलम्बैकावणारपण कलममाणनिरूपणार्थ प्रश्वनिर्वचनसूत्रे आह- इसमइए 'मित्यादि सुपमं, आवर्जीकरणानन्तरं चाव्यवधानेनः केोवलिसमुद्वात्तमारभते, सः क कतिसामयिक इत्याज्ञायां तत्समयनिरूपणार्थमाह- कसमए पः मिलादि सुगमं तत्रः बचिन् समये यत्करोति तर्शयति--- 'तंजदा-पदमे समय' इत्यादि, इदमपि सुगमं प्रागेव व्याख्यातत्वात्, नवरमेषं माषार्थी - क्वाऽऽचैश्चतुर्भिः समयैः क्रमेणात्मप्रदेशन विचारणं तथैव प्रतिलोमं श्रमेण ण| मिति, उक्तं तदन्यत्रापि — “उहुंअहो य लोगंतनामिणं सो सदेहविक्संमं । पढने समयंमि दंड करेह नियिं य कवाडं ॥ १ ॥ तश्यसमर्थमि मंत्रं चउत्थर लोगपूरणं कुजइ । पडिलोमं साहरणं काउं तो दोर देशत्वों ॥२॥” [ ऊर्ध्वमध्य लोकान्तगामिनं स खदेहविष्कम्भम् । प्रथमे समये दण्डं करोति द्वितीये च कपाटम् ॥ १ ॥ तृतीये मन्धानं चतुर्थे लोकपूरणं करोति । प्रतिलोमं संहरणं कृत्वा ततो भवति देहस्थः ॥ २ ॥ ] अस्मिंश्च समुद्घाते क्रियमाणे सति यो योंगो व्याप्रियते तमभिधित्सुराह से णं भंते !' इत्यादि, तत्र मनोयोगं वाग्योगं वा न व्यापारयति प्रयोजनाभावात्, आह च धर्म्मसारमूलटीकायाँ हरिभद्रसूरिः- “मनोवचसी तदा न व्यापारवति, प्रयोजनाभावात्" काक्योगं पुनर्युआन औदारिककाययोगमौदारिकमिश्रकाययोगं कार्मणकाययोगं का युनक्ति, न | शेषं लब्ध्युपजीवनाभावेन शेषस्य काययोगस्यासम्भवात्, तत्र प्रथमे अष्टमे च समये केवलमोदारिकमेच शरीरं व्या For Parts Only ~316~ Page #317 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (१५) “प्रज्ञापना” – उपांगसूत्र-४ (मूलं+वृत्ति:) पदं [३६], --------------उद्देशक: -, ------------- दारं [-], -------------- मूलं [३४४-३४७] + गाथा: पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र-[१५]उपांगसूत्र-[४] "प्रज्ञापना" मूलं एवं मलयगिरि-प्रणीता वृत्ति: प्रत सूत्रांक [३४४३४७] गाथा: प्रज्ञापना- प्रियते इत्यौदारिककाययोगः, द्वितीये षष्ठे सप्तमे च समये कार्मणशरीरस्यापि व्याप्रियमाणत्वात् औदारिकमिश्रका- ३६ समुः याः मलपाययोगः, तृतीयचतुर्थपञ्चमेषु तु समयेषु केवलमेव कार्मणशरीरव्यापारमागिति कार्मणकाययोगः, आह च भाष्य-11 द्घातपद यवृत्ती. कृत्-"न किर समुगघातगतो मणवइजोगप्पयोयणं कुणइ । ओरालियजोगं पुण जुजइ पढमट्ठमे समए ॥१॥ | कृतसमुउभयधावाराओ तम्मीस बीयछटुसत्तमए । तिचउत्थपंचमे कम्मगं तु तम्मत्तचेट्ठाओ ॥२॥" अत्रैव विशेषपरि द्वातस्य योगाः ज्ञानायाह सू. ३४८ से णं भंते ! तहा समुग्धातगते सिज्झति पुज्झति मुञ्चति परिनिवाति सबदुक्खाणं अंतं करेति ?, गो० नो इणढे समडे, से णं ततो पडिनियति पडिनियतिता ततो पच्छा मणजोगपि जुजति बइजोगपि जुंजइ कायजोगपि जुजति, मणजोगं जुजमाणे किं सच्चमणजोगं जुजति मोसमणजोगं गँजति सच्चामोसमणजोग जुजति असचामोसमणजोग जुंजति ?, गो! सचमणजो० नो मोसमणजो० नो सच्चामोसमणजोगं जुजति असञ्चामोसमणजोगं जुजति, पतिजोगं जुजमाणे किं सच्चवइजोगं झुंजति मोसवइजोगं र्जु० सञ्चामोसवहजोगं असच्चामोसवइजो०१, गो.! सञ्चवतिजो० नो मोसवइजो० नो सच्चामोसवतिजो. असच्चामोसवइजोगपि जुजति, कायजोगं जुजमाणे आगच्छेज वा गच्छेज वा चिद्वेज्ज वा निसीएज ॥६०५॥ वा तुयहेज वा उलंघेज वा पलंघेज वा पडिहारियं पीढफलगसेज्जासंथारगं पञ्चप्पिणेज्जा । (सूत्र ३४८) 'सेणं भंते । इत्यादि, स भदन्त ! केवली तथा-दण्डकपाटादिक्रमेण समुपातं गतः सन् सिमति 30003390925292020amaerat दीप अनुक्रम [६१४ -६१९] ~317 Page #318 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (१५) प्रत सूत्रांक [३४८] दीप अनुक्रम [६२०] “प्रज्ञापना” – उपांगसूत्र - ४ ( मूलं + वृत्तिः ) - मूलं [ ३४८ ] पदं [३६], --------------उद्देशक: [-1, ------------- दारं [-], पूज्य आगमोद्धारकश्री संशोधितः मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र [१५],उपांगसूत्र-[४] "प्रज्ञापना" मूलं एवं मलयगिरि-प्रणीता वृत्तिः निष्ठितार्थो भवति १, स च 'वर्त्तमानसामीप्ये वर्त्तमानवद्वेति वचनात् सेत्स्यन्नपि व्यवहारत उच्यते तत आहबुध्यते - अवगच्छति केवलज्ञानेन यथाऽहं निश्वयतो निष्ठितार्थो भविष्यामि निःशेषकर्माशापगमतः तत आहमुच्यतेऽशेषकर्माशैरिति गम्यते, सुज्यमानश्च कर्माणुवेदनापरितापरहितो भवति तत आह-परिनिर्वाति सामस्त्येन शीतीभवति, समस्तमेतदेकेन पर्यायेण स्पष्टयति - सर्वदुःखानामन्तं करोतीति, भगवानाह - गौतम ! नायमर्थः समर्थी - नायमर्थः सङ्गतो यः समुद्घातं गतः सर्वदुःखानामन्तं करोतीति, योगनिरोधस्याद्याप्यकृतत्वात्, सयोगस्य च वक्ष्यमाणयुक्त्या सिद्ध्यभावादिति भावः, ततः किं करोतीत्यत आह- 'से णमित्यादि, सःअधिकृतसमुद्घातगतः णमिति वाक्यालङ्कारे ततः समुद्घातात् प्रतिनिवर्त्तते, प्रतिनिवर्त्य च ततः --प्रतिनिवर्त्तनात् पश्चादनन्तरं मनोयोगमपि वाग्योगमपि काययोगमपि युनक्ति-व्यापारयति यतः स भगवान् भवधारणीयकर्मसु नामगोत्रवेदनीयेष्वचिन्त्यमाहात्म्यसमुद्घातवशतः प्रभूतेष्वायुषा सह समीकृतेष्वप्यन्तर्मुहूर्तभाविपरमपदत्वतस्तस्मिन् काले यद्यनुत्तरोपपातिकादिना देवेन मनसा पृच्छयते तर्हि व्याकरणाय मनःपुद्गलान् गृहीत्वा मनोयोगं युनक्ति, तमपि सत्यमसत्यामृषारूपं या, मनुष्यादिना पृष्टः सन्नपृष्टो वा कार्यवशतो वाकूपुद्गलान् गृहीत्वा वाग्योगं तमपि सत्यमसत्यामृषा वा न शेषान् वाग्मनसोर्योगान्, क्षीणरागादित्वात्, | आगमनादौ चौदारिकादिकाययोगं, तथाहि —भगवान् कार्यवशतः कुतश्चित् स्थानात् विवक्षिते स्थाने आगच्छेत्, For Parts Only ------ ~318~ Page #319 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम “प्रज्ञापना” – उपांगसूत्र-४ (मूलं+वृत्ति:) पदं [३६], -------------- उद्देशक: [-], ------------- दारं --------------- मूलं [३४८] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र-[१५]उपांगसूत्र-[४] "प्रज्ञापना" मूलं एवं मलयगिरि-प्रणीता वृत्ति: प्रत EVECwe5c624 सूत्रांक ३६ समु द्घातपदं कृतसमुद्वातस्य योगा: सू.३४८ [३४८] दीप अनुक्रम [६२०] प्रज्ञापना यदिवा कापि गच्छेत् , अथवा तिष्ठेत्-अईस्थानेन वावतिष्ठेत् निषीदेवा तयाविषश्रमापगमाय त्ववर्तनं वा याः मल-कुर्यात् , अथका विवक्षिते स्थाने तथाविधसम्पातिमसत्त्वाकुलो भूमिमवलोक्य तत्परिहाराय जन्तुरक्षानिमित्तमुलयवृत्ती. चनं प्रलचनं वा कुर्यात् , तत्र सहजात् पादविक्षेपान्मनायधिकतरः पादविक्षेपः उत्तपनं स एवातिक्किटः प्रलइन, यदिवा प्रातिहारिक पीठफलकशय्यासंस्तारकं प्रयप्पयेत्, यस्मादानीतं तस्मै समर्पयेत् , इह भगवता आर्यश्यामेन प्रातिहारिकपीठफलकादीना प्रत्यर्पणमेवोक्तं ततोऽवसीयते नियमादन्तर्मुहविशेषायुष्क एवापीकरणादिकमार- भते, प्रभूतावशेषायुष्का, अन्याया ब्रहणस्यापि सम्भवाचदप्युपादीयेत, एतेन यदाहुरेके-'जघन्यतोऽन्तर्मुह शेषे | समुद्घातमारमते उत्कर्षतः पसु मासेषु शेपेविति तदपारतं द्रष्टव्यं, पदसु मासेषु कदाचिदपान्तराले वर्षाकालसम्भवात् तनिमित्तं पीठफलकादीनामादानमभ्युपपोत, न च तत्सूत्रसम्मतमिति तत्प्ररूपणमुत्सूत्रमवसेयं, एत्योसूत्रं आवश्यकेऽपि समुद्घातानन्तरमव्यवधानेन शैलेश्वभिधानात्, (यत्तः) तत्सूत्रं 'दण्डकवाडे मंथंतरे य साहारणा सरीरथे। भासाजोगनिरोहे सेलेसी सिझमा चेव ॥१॥ यदि पुनस्कपतः पण्मासरूपमपान्तरालं भवेतत दबमिकीयेत, न चोकं, तस्मादेव अयुक्तमेतदिति, तया चाह भाष्यकार:--"कम्मलहुयाएँ समओ मिजमुहु- चाबसेसओ कालो । अन्ने जहन्नमेवं छम्मासुकोसमिच्छति ॥१॥ ततोऽनंतरखेलेसीक्वणो जंच पाडिहारीणं ।। चप्पणमेव सुए इहरा महणंपि होजाहि ॥२" अत्र कमलधुतानिमिचं समुद्घातस्य समयः-अक्सरो। ०६॥ SAREauratoninternational ~319~ Page #320 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (१५) “प्रज्ञापना" - उपांगसूत्र-४ (मूलं+वृत्ति:) पदं [३६], -------------- उद्देशक: [-], ------------- दारं [-], -------------- मूलं [३४८] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र-[१५]उपांगसूत्र-[४] "प्रज्ञापना" मूलं एवं मलयगिरि-प्रणीता वृत्ति: प्रत सूत्रांक [३४८] भिन्नमुहविशेषकाला, शेष सुगम, तदेवमन्तर्मुहर्तकालं यथायोग योगत्रयव्यापारभाछ केवली भूत्वा तदनन्तरम-R त्यन्ताप्रकम्पं लेश्यातीतं परमनिर्जराकारणं ध्यानं प्रतिपित्सुरवश्यं योगनिरोधायोपक्रमते, योगे सति यथोक्तरूपस्स ध्यानस्सासम्भवात् , तथाहि-योगपरिणामो लेश्या, तदन्थयव्यतिरेकानुविधानात्, ततो यावद्योगस्तावदवश्यंभाविनी लेश्येति न लेश्यातीतध्यानसम्भवः, अपिच-यावद्योगतावत्कर्मवन्धोऽपि, 'जोगा पयडिपएसं ठिइअणुभागं कसायओ कुणई' इति वचनात् , केवलं स कर्मबन्धः केवलयोगनिमित्तत्वात् समयत्रयावस्थायी, तथाहि-प्रथमसमये कर्म बध्यते, द्वितीयसमये वेद्यते, तृतीये तु समये तत्कर्माकर्मीभवति, तत्र यद्यपि समयद्वयरूपस्थितिकानि कर्माणि क्रियन्ते, पूर्वाणि २ कर्माणि प्रलयमुपगच्छन्ति, तथापि समये समये सन्तत्या कर्मादाने । प्रवर्त्तमाने सति न मोक्षः स्याद्, अथ चावश्यं मोक्षं गन्तव्यं तस्मात् कुरुते स योगनिरोधमिति, उक्तं च-"स ततो योगनिरोधं करोति लेश्यानिरोधमभिकाजन् । समयस्थितिं च बन्धं योगनिमित्तं स निररुत्सुः॥१॥ समये। 18 समये कर्मादाने सति सन्ततेनं मोक्षः स्यात् । यद्यपि हि विमुच्यन्ते स्थितिक्षयात् पूर्वकर्माणि ॥२॥नाकर्मणो हि वीर्य योगद्रव्येण भवति जीवस्य । तस्यावस्थानेन तु सिद्धः समयस्थितेर्वन्धः ॥ ३ ॥" अत्र बन्धस्य समयमात्रस्थितिकता बन्धसमयमतिरिच्य बेदितव्या, भाष्यमप्येनं पूर्वोक्त सकलमपि प्रमेयं पुष्णाति, तथा च तद्वतो ग्रन्थः"विणिवित्तसमुरघाओ तिषिणवि जोगे जिणो पउंजिजा। सचमसचामोसं च सो मणं तह वईजोगं ॥१॥ ओरा दीप अनुक्रम [६२०] samagranepal हट REautam M urmurary.org ~320 Page #321 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (१५) “प्रज्ञापना" - उपांगसूत्र-४ (मूलं+वृत्ति:) पदं [३६], -------------- उद्देशक: [-], ------------- दारं --------------- मूलं [३४८] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र-[१५]उपांगसूत्र-[४] "प्रज्ञापना" मूलं एवं मलयगिरि-प्रणीता वृत्ति: प्रत ३६ समु: घातपर्द योगनिरो धः सू. सूत्रांक [३४८] प्रज्ञापना- लियकाययोगं गमणाई पाडिहारियाणं वा। पचप्पणं करेजा जोगनिरोहं तओ कुणइ ॥२॥ किन्न सयोगो सिज्झइ याः मल-18स बंधहेउत्ति जं सजोगोऽयं । न समेइ परमसुकं स निजराकारणं परमं ॥३॥" अत एवाहय० वृत्तौ. से ण भंते ! तहा सजोगी सिज्झति जाव अंतं करेति !, गो० नो इणढे समहे, से णं पुवमेव सपिणस्स पंचिंदियपज्जत॥६०७॥ यस्स.जहष्णजोगिस्स हेडा असंखेजगुणपरिहीणं पढम मणजोगं निरंभति, ततो अणंतर इंदियपजत्तगस्स जहण्णजोगिस्स हेडा असंखिजगुणपरिहीणं दोश्चं वतिजोगं निरंभति, ततो अणंतरं च णं सुहुमस्स पणगजीवस्स अपजत्तयस्स जहष्णजोगिस्स हेवा असंखेनगुणपरिहीणं तचं कायजोगं निरंभति, से गं एतेण उवाएणं-पढम मणजोगं निरंभति मणजोगं निमंभित्ता वतिजोगं निरुभति वयजोगं निरुभित्ता कायजोगं निरंभइ कायजोगं निलंभित्ता जोगनिरोह करेति जोगनिरोहं करेता अजोगतं पाउणति अजोगयं पाउणिचा इसि हस्सयंचक्खरुचारणद्वाए असंखेजसमइयं अंतोमुहुत्तियं सेलेसि पडिवज्जइ, पुषरइयगुणसेढीयं च णं कम्म, तीसे सेलेसिमदाए असंखेज्जाहिँ गुणसेढीहि असंखेजे कम्मखंधे खवयति खवइत्ता वेदणिज्जाउणामगोने इचेते चत्वारि कम्मंसे जुगर्व खवेति, जुगवं खवेत्ता ओरालियतेयाकम्मगाई सबाहिं विष्पजहण्णाहिं विष्पजहति, विप्पजहिता उन्जुसेढीपडिवण्णो अफुसमाणगतीए एगसमएणं अविग्गहेणं उडे गंता सागारोवउत्ते सिज्झाइ बुझाइ तत्थ सिद्धो भवति, ते णं तत्थ सिद्धा भवंति असरीरा जीवघणा देसणणाणोवउचा णिद्वियवाणीरया जिरेपणा वितिमिरा विमुद्धा सासयमणागयर्द्ध कालं चिति, से केणद्वेण भंते । एवं बुचड़ ते णं Sersesecrate दीप अनुक्रम [६२०] erestsee ॥६०७॥ ~321 Page #322 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (१५) “प्रज्ञापना” – उपांगसूत्र-४ (मूलं+वृत्ति:) पदं [३६], -------------- उद्देशक: [-], ------------- दारं [-], -------------- मूलं [३४९] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र-[१५]उपांगसूत्र-[४] "प्रज्ञापना" मूलं एवं मलयगिरि-प्रणीता वृत्ति: प्रत सूत्रांक [३४९] गाथा certaReseseselcersersersecca तत्थ सिद्धा भवंति असरीरा जीपघणा देसणणाणोवउत्ता निट्ठियट्ठा नीरया निरयणा वितिभिरा विसुद्धा सासयमणागयदं कालं चिट्ठति !, गो० ! से जहाणामए बीयाणं अग्गिदड्डाणं पुणरवि अंकुरुष्पची ण भवति, एवामेव सिद्धाणवि कम्मबीएमु दड्डेसु पुणरवि जम्मुप्पत्तीण भवति, से तेणद्वेणं गोतमा! एवं बु० तेणं तत्थ सिद्धा भवंति असरीरा जीवघणा दसणणाणोवउत्ता णिट्ठियहा णीरया णिरेयणा वितिमिरा विमुद्धा सासयमणागतद्धं कालं चिट्ठतित्ति ।-'निच्छिण्यसबदुक्खा जाइजरामरणपंधणविमुक्का । सासयमबाबाहं चिट्ठति सुही सुह पत्ता ॥१॥ (सूत्र ३४९) इति पण्णवणाए भगवतीए समुग्धायपर्य छत्तीसतिमं पयं समत्तं ॥३६॥ [प्रत्यक्षरं गणनया अनुष्टुपछंदसा मानमिदम्- ७७८७] ॥ 'से णं भंते ! तहा सजोगी सिज्झई' इत्यादि, सुगम. योगनिरोधं कुर्वन् प्रथम मनोयोग निरुणद्धि, तब पर्या-1 समात्रसंज्ञिपञ्चेन्द्रियस्य प्रथमसमये यावन्ति मनोद्रव्याणि यावन्मात्रश्च तद्व्यापारः तस्मादसङ्ख्येयगुणहीनं मनो-| योग प्रतिसमयं निरुग्धानोऽसङ्ग्येयैः समयैः साकल्येन निरुणद्धि, उक्तंच-पजत्तमेत्तसण्णिस्स जत्तियाई जहपणजोगिस्स । होति मणोदधाई तबावारो य जम्मत्तो॥१॥ तदसंखगुणविहीणं समए समए निरंभमाणो सो।। मणसी सबनिरोहं करेअसंखेजसमएहि ॥२॥" एतदेवाह-'से णं भंते ! इत्यादि, सः--अधिकृतकेवली योगनिरोध चिकीर्षन् पूर्वमेव संजिनः पर्याप्तस्य जघन्ययोगिनः सत्कस्य मनोयोगखेति गम्यतेऽधस्तात् असहयगुण-10 पारहान समये २ निरन्धानोऽसहययः समयैः साकल्येनेति गम्यते प्रथमं मनोयोग निरुणद्धि, 'ततोऽनंतरं च। Poesteroerserselesekeepees दीप अनुक्रम [६२१-६२२] म.१०२ For P OW ~322~ Page #323 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम “प्रज्ञापना” – उपांगसूत्र-४ (मूलं+वृत्ति:) पदं [३६], -------------- उद्देशक: [-], ------------- दारं --------------- मूलं [३४९] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र-[१५]उपांगसूत्र-[४] "प्रज्ञापना" मूलं एवं मलयगिरि-प्रणीता वृत्ति: N प्रत सूत्रांक [३४९]] प्रज्ञापना- यवृत्ती या। मल ॥६०८॥ ३४९ गाथा मित्यादि, तस्मात् मनोयोगनिरोधादनन्तरं चशब्दो वाक्यसमुधये णमिति वाक्यालङ्कारे द्वीन्द्रियस्य पर्यासस्य ३६ समुः जघन्ययोगिनः सत्कस्य वागयोगस्येति गम्यतेऽधस्तात् वाग्योगं असङ्ख्येयगुणपरिहीनं समये समये निरुन्धानो- घातपर्द सङ्ख्येयैः समयैः साकल्येनेति गम्यते द्वितीयं वाग्योग निरुणद्धि, आह च भाष्यकृत्-"पज्जत्तमित्तबिंदिय जह योगनिरोपणवइजोगपजवा जे उ । तदसंखगुणविहीणं समये समये निरंभंतो ॥१॥ सववइजोगरोह संखाईएहिं कुण धः सू. समपहि" 'ततोऽणंतरं च ण'मित्यादि, ततो वाग्योगादनन्तरं च णं प्राग्वत् सूक्ष्मस्य पनकजीवस्य अपर्याप्तकस्य । प्रथमसमयोत्पन्नस्येति भावार्थः जघन्ययोगिनः-सल्पिवीर्यस्य पनकजीवस्य यः काययोगस्तस्याधस्तादसङ्ख्येयगु-N णहीनं काययोग समय समये निरुन्धन् असोयैः समयैः समस्तमपीति गम्यते तृतीयं काययोगं निरुणद्धि, ती च काययोग निरन्धानः सूक्ष्मनियमप्रतिपाति ध्यानमधिरोहति, तत्सामर्थ्याञ्च वदनोदरादिविधरपूरणेन सकुचि-IN तदेहत्रिभागवर्तिप्रदेशो भवति, तथा चाह भाष्यकृत्-"तत्तो य सुहुमपणगस्स पढमसमयोववण्णस्स ॥जो किर जहण्णजोगी तदसंखेजगुणहीणमेकेके । समएहिं रुंभमाणो देहतिभागं च मुंचतो ॥१॥ रंभइ स कायजोगं |संखाईएहिं चेव समएहिं' काययोगनिरोधकालान्तरे चरमे अन्तर्मुहूर्ते वेदनीयादित्रयस्य प्रत्येकं स्थितिः सर्वापव-IS६०८॥ नया अपवायोग्यवस्थासमाना क्रियते गुणश्रेणिक्रमविरचितप्रदेशा, तद्यथा-प्रथमस्थिती स्तोकाः प्रदेशाः,18 द्वितीयस्यां स्थिती ततोऽसङ्ख्येयगुणाः, तृतीयस्यां ततोऽप्यसङ्ख्येयगुणाः, एवं तावद्वाच्यं यावञ्चरमा स्थितिः, स्था दीप अनुक्रम [६२१-६२२] Auditurary.com ~323 Page #324 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (१५) “प्रज्ञापना” – उपांगसूत्र-४ (मूलं+वृत्ति:) पदं [३६], -------------- उद्देशक: [-], ------------- दारं [-], -------------- मूलं [३४९] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र-[१५]उपांगसूत्र-[४] "प्रज्ञापना" मूलं एवं मलयगिरि-प्रणीता वृत्ति: प्रत सूत्रांक [३४९] गाथा पना, एताः प्रथम- ०००००००००००० समयगृहीतदलिकनिर्त्तिता गुणश्रेणयः, एवं प्रतिसमयगृहीतदलिकनिवर्तिताः कर्मत्र- .. .. .. यस्य प्रत्येकमसङ्ख्येया द्रष्टव्याः अन्तर्मुहुर्तसमयानामसङ्ख्यातत्वात् , आयुषस्तु स्थितिय-. . . थावद्धवावतिष्ठते, सा च गुणश्रेणिक्रमविपरीतक्रमदलिकरचना, स्थापना चेयम्- अयं च सर्वोऽपि मनोयोगादिनिरोधो मन्दमतिसुखावबोधार्थमाचार्येण स्थूरदृष्ट्या प्रतिपादितः, यदि पुनः सूक्ष्मदृष्टया तत्खरूपजिज्ञासा भवति तदा पञ्चसङ्ग्रहटीका निभालनीया, तस्यामतिनिपुणं प्रपञ्चेन तस्याभिधानादू, इह च ग्रन्थगौरवभयानास्माभिरभिहितः, 'से 'मित्यादि, सोऽधिकृतः केवली णमिति पूर्ववत् एते|| नानन्तरोदितेनोपायेन-उपायप्रकारेण, शेष सुगम, यावदयोगतां 'पाउणहत्ति प्राप्नोति, अयोगताप्राप्त्यभिमुखो। भवति इति भावार्थः, अयोगतां च प्राप्य-अयोगताप्राप्त्यभिमुखो भूत्वा 'ईसिति स्तोकं कालं शैलेशी प्रतिपद्यते | इति सम्बन्धः, कियता कालेन विशिष्टां इत्यत आह-इखपञ्चाक्षरोचारणाद्धया, किमुक्तं भवति ?-नातिद्रुतं नातिविलम्बितं किन्तु मध्यमेन प्रकारेण यावता कालेन ङञणनम इत्येवंरूपाणि पश्चाक्षराणि उच्चार्यन्ते तावता कालेन विशिष्टामिति, एतावान् कालः किंसमयप्रमाण इति निरूपणार्थमाह-असङ्ख्येयसामयिका-असङ्ख्येयसमयप्रमाणां, यचासयेयसमयप्रमाणं तच जघन्यतोऽप्यन्तर्मुहूर्तप्रमाणं तत एषाऽप्यन्तर्मुहूर्तप्रमाणेति ख्यापनायाह दीप अनुक्रम [६२१-६२२] ~324~ Page #325 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम “प्रज्ञापना" - उपांगसूत्र-४ (मूलं+वृत्ति:) पदं [३६], -------------- उद्देशक: [-]------------- दारं [-], -------------- मूलं [३४९] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र-[१५]उपांगसूत्र-[४] "प्रज्ञापना" मूलं एवं मलयगिरि-प्रणीता वृत्ति: प्रत सूत्रांक [३४९] गाथा प्रज्ञापना- 'आन्तमहर्तिकी शैलेशी मिति, शीलं-चारित्रं तह निश्चयतः सर्वसंबररूपं तद् ग्रावं, तस्यैव सर्वोत्तमत्वात् , तस्येशः18|३६ समुयाः मल-18 शीलेशः तस्य याऽवस्था सा शैलेशी तां प्रतिपद्यते, तदानीं च ध्यानं ध्यायति व्यवच्छिन्नक्रियमप्रतिपाति, उक्तद्धातपर्द यवृत्ती. च-"सीलं व समाहाणं निच्छयओ सबसंवरो सो य । तस्सेसो सीलेसो सेलेसी होइ तदवत्था ॥१॥हस्सक्ख-18 योगनिरो॥६०९॥ ४राई मज्झेण जेण कालेण पंच भण्णंति । अच्छइ सेलेसिगतो तत्तियमित्तं तओ कालं ॥२॥ तणुरोहारंभाओ झायह सुहुमकिरियानियहि सो । वोच्छिन्नकिरियमप्पडिबाई सेलेसिकालंमि ॥३॥" न केवलं शैलेशी प्रतिपद्यते ३४९ पूर्वरचितगुणश्रेणीकं च वेदनीयादिकं कर्म अनुभवितुमिति शेषः, प्रतिपद्यते च तत्पूर्व काययोगनिरोधगते घरमेऽन्तमुहर्ने रचिता गुणश्रेणयः-प्रागनिर्दिष्टवरूपा यस्य तत्तथा, ततः किं करोतीत्यत आह-तीसे सेलेसिअद्धाए' इत्यादि, तस्यां शैलेश्यद्धायां वर्तमानोऽसङ्ख्येयाभिर्गुणश्रेणीभिः पूर्वनिर्वतिताभिः प्रापिता ये कर्मत्रयस्य पृथक् प्रति-IN समयमसमवेयाः कर्मस्कन्धास्तान् 'क्षपयन्' विपाकतः प्रदेशतो वा वेदनेन निर्जरयन् चरमे समये वेदनीयमायुर्नाम |गोत्रमित्येतान् चतुरः 'कर्माशान्' कर्मभेदान् युगपत् क्षपयति, युगपञ्च क्षपयित्वा ततोऽनन्तरसमये औदारिकतैजसकार्मणरूपाणि त्रीणि शरीराणि 'सचाहिं विष्पजहणाहि' इति सर्विप्रहानः, सूत्रे स्त्रीत्वं प्राकृतत्वात् , विप्र R६०९॥ जहाति, किमुक्तं भवति ?-यथा प्राक् देशतस्त्यक्तवान् तथा न त्यजति, किन्तु सः प्रकारैः परित्यजतीति, उक्तं च-"ओरालियाइ चयह सबाहिं विष्पजहणाहिं जं भणियं । निस्सेस तहा न जहा देसञ्चारण सो पुषिं ॥१॥" दीप अनुक्रम [६२१-६२२] Desccesselseceases SAREauratonintamatkind ~325 Page #326 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (१५) “प्रज्ञापना" - उपांगसूत्र-४ (मूलं+वृत्ति:) पदं [३६], -------------- उद्देशक: -,------------- दारं [-], -------------- मूलं [३४९] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र-[१५]उपांगसूत्र-[४] "प्रज्ञापना" मूलं एवं मलयगिरि-प्रणीता वृत्ति: प्रत सूत्रांक [३४९] गाथा परित्यज्य च तस्मिन्नेव समये कोशवन्धविमोक्षलक्षणसहकारिसमुत्थखभावविशेषादेरण्डफलमिव भगवानपि कर्मस|म्बन्धविमोक्षणसहकारिसमुत्थखभावविशेषादूई लोकान्ते गत्वेति सम्बन्धः, उक्तं च-"एरण्डफलं च जहा बंधच्छे|देरियं दुयं जाति । तह कम्मबंधणछेदणेरितो जाति सिद्धोवि ॥१॥" कथं गच्छतीत्यत आह-'अविग्रहेण'N विग्रहस्साभावोऽविग्रहः तेन एकेन समयेनास्पृशन् , समयान्तरप्रदेशान्तरास्पर्शनेनेत्यर्थः, ऋजुश्रेणिं च प्रतिपन्नः एतदुक्तं भवति यावत्वाकाशप्रदेशेष्विहावगाढस्तावत एव प्रदेशानू मृजुश्रेण्याऽवगाहमानो विवक्षिताच समयादन्यत् समयान्तरमस्पृशन् गत्वा, तथा चोक्तमावश्यकचूर्णी-“जत्तिए जीयोऽवगाढो तावइयाए ओगाहणाए उहं| उज्जुगं गच्छति न वंक, बिइयं च समयं न फुसई" इति, भाष्यकारोऽप्याह-"रिउसेटिं पडिवन्नो समयपएसंतरं अफुसमाणो । एगसमएण सिज्झइ अह सागारोबउत्तो सो॥१॥" इत्थमूर्य गत्वा किमित्याह-साकारोप-N युक्तः सन् सिध्यति-निष्ठितार्थों भवति, सर्वा हि लब्धयः साकारोपयोगोपयुक्तस्य उपजायते नानाकारोपयुक्तस्य, सिद्धिरप्येषा सर्वलब्ध्युत्तमा लब्धिरिति साकारोपयोगोपयुक्तस्योपजायते, आह च-"सबाओ लद्धीओ जं सागा-IN रोवओगलाभाओ। तेणेह सिद्धिलद्धी उप्पजइ तदुवउत्तस्स ॥१॥" तदनन्तरं तु क्रमेणोपयोगप्रवृत्तिः । तदेवं| यथा केवली सिद्धो भवति तथा प्रतिपादितमिदानी सिद्धा यथाखरूपास्तत्रावतिष्ठन्ते तथा प्रतिपादयति-ते णं तत्थ सिद्धा भवंती सादि, ते-अनन्तरोतक्रमसम्भूता णमिति वाक्यालङ्कारे तत्र-लोकान्ते सिद्धा भवन्ति, अश दीप अनुक्रम [६२१-६२२] REaratun ~326~ Page #327 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम “प्रज्ञापना” – उपांगसूत्र-४ (मूलं+वृत्ति:) पदं [३६], -------------- उद्देशक: [-], ------------- दारं --------------- मूलं [३४९] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र-[१५]उपांगसूत्र-[४] "प्रज्ञापना" मूलं एवं मलयगिरि-प्रणीता वृत्ति: प्रत सूत्रांक [३४९] प्रज्ञापना- याः मल- यवृत्ती. ३६ समुघातपदं ॥६१०॥ ३४९ गाथा दीप रीरा:-औदारिकादिशरीरविप्रमुक्ताः तेषां सिद्धत्वप्रथमसमये एव सर्वात्मना त्यक्तत्वात् , जीवधना-निचितीभूत- जीवप्रदेशरूपाः, सूक्ष्मक्रियाऽप्रतिपातिध्यानप्रतिपत्तिकाले एव तत्सामर्थ्यतो वदनोदरादि विवराणामापूरितत्वात् , दर्शनज्ञानोपयुक्ता जीवखाभाव्यात् , निष्ठितार्थाः कृतकृत्यत्वात् , नीरजसो बध्यमानकर्माभावात् , निरेजनाः कम्पक्रियानिमित्तविरहात्, वितिमिराः कर्मतिमिरवासनापगमात्, विशुद्धाविविधसम्यग्दर्शनादिमार्गप्रतिपत्त्या अत्यन्तशुद्धीभूतत्वात् , ते चेत्थंभूतास्तत्र गतास्तिष्ठन्ति शाश्वतं यथा भवत्येवं 'अनागताई' अनागता-भाविनी अद्धा समस्ता यत्र सोऽनागताद्धः ते कालं यावत् , अत्रैव मन्दमतिविबोधायाक्षेपपरिहारावाह-'से केण?णं भंते । इत्यादि सुगम, नवरं 'कम्मवीएसुति कर्मरूपाणि बीजानि-जन्मनः कारणानि कर्मवीजानि तेषु दग्धेषुनिर्मूलकाकषितेषु पुनरपि-भूयो जन्मन उत्पत्तिर्न भवति, कारणमन्तरेण कार्यासम्भवात् , अथ तान्येव कर्माणि भूयः कस्मान्न भवन्ति ?, उच्यते, रागादीनामभावात् , रागादयो सायुःप्रभृतीनां कर्मणां कारणं, न च ते तेषां सन्ति, प्रागेच क्षीणमोहावस्थायां क्षीणत्वात्, न च तेऽपि क्षीणा अपि भूयः प्रादुष्प्यन्ति, सहकारिकारणामावात् , रागादीनां धुत्पत्ती परिणामिकारणमात्मा सहकारिकारणं रागादिवेदनीयं कर्म, न चोभयकारणजन्यं कार्यमे कतरस्थाप्यभावे भवति, अन्यथा तस्याकारणत्वप्रसङ्गात्, न च सिद्धानां रागादिवेदनीय कर्मास्ति, तस्य प्रागेच शुक्लध्यानामिना भस्मीकृतत्वात्, न च वाच्यमत्रापि स एव प्रसङ्गः, यथा तदपि रागादिवेदनीयं कर्म भूयः कस्मान्न अनुक्रम [६२१-६२२] Beesce SURESHIMonal ~327 Page #328 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (१५) प्रत सूत्रांक [ ३४९ ] गाथा दीप अनुक्रम [६२१ -६२२] “प्रज्ञापना” – उपांगसूत्र - ४ ( मूलं + वृत्तिः ) - पदं [३६], --------------उद्देशक: [-1, -------------- दारं [-], • मूलं [ ३४९ ] पूज्य आगमोद्धारकश्री संशोधितः मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र [१५],उपांगसूत्र-[४] "प्रज्ञापना" मूलं एवं मलयगिरि-प्रणीता वृत्तिः अत्र पद (३६) "समुद्घातः" परिसमाप्तम् भवतीति १, तत्कारणस्य सशस्याभावात्, रागादिवेदनीयानां हि कर्मणामुत्पत्ती रागादिपरिणतिरूपः सङ्केशः, 'जं वेयर से बंध' इति, न च रागादिवेदनीय कर्मविनिर्मुक्तस्य तथाभूतं सक्लेशोत्थानमस्ति ततस्तदभावाद्रागादिवेदनीयकर्माभावः, तदभावाच्च भूयो रागादीनामभावः तथा च रागादीनामेव पुनरुत्पत्तिचिन्तायां धर्म्मसङ्घहण्यामुक्तम्- " खीणा य ते न होंती पुणरवि सहकारिकारणाभावा । नहि होह संकिलेसो तेहिं विउत्तस्स जीवस्स ॥ १ ॥ तयभावा न य बंधो तप्पा उग्गस्स होइ कम्मस्स । तदभावे तदभावो सबद्धं चैव विन्नेओ ||२||” इति, ततो रागादीनामभावादायुःप्रभृतीनां कर्म्मणां पुनरुत्पादाभावस्तदभावाच न भूयो जन्मोत्पत्तिः, अत एवोकमन्यत्रापि - " दग्धे वीजे यथाऽत्यन्तं प्रादुर्भवति नाङ्कुरः । कर्मबीजे तथा दग्धे, न रोहति भवाङ्कुरः ॥ १ ॥” उपसंहारमाह- 'से एएणद्वेण' मित्यादि, एतदेव सिद्धखरूपं परममङ्गलभूतं शास्त्रस्य शिष्यप्रशिष्यादिवंशगतत्वेनाव्यवच्छित्तिर्भूयादित्यन्तमङ्गलत्वेनोपसंहारव्याजत आह- 'निच्छिणे'त्यादि, निस्तीर्ण सर्वदुःखं यैस्ते तथा, सकलसांसारिकदुःखपारगता इत्यर्थः कुत इत्याह- 'जातिजरामरणवन्धनविप्रमुक्ताः' जातिश्च जरा च मरणं च बन्धनानि च - ज्ञानावरणीयादीनि कर्माणि तैर्विप्रमुक्ताः, अत्र हेती प्रथमा, यतो जातिजरामरणबन्धनविप्रमुक्ताः ततो निस्तीर्ण सर्वदुःखाः, ते इत्थंभूताः परमखास्थ्यरूपं 'शाश्वतं ' शश्वद्भावि 'अन्यावाघ' बाधारहितं, रागादयो हि न तद्वाधितुं प्रभविष्णवो न च तेषां ते सन्तीत्यनन्तरमेव भावितं, सुखं प्राप्ताः, अत एव सुखिनः सन्तस्तिष्ठन्ति ॥ For Parts Only ------ ~328~ 30১0/20/20 ১৩ ১৬৯৬১ andra org Page #329 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (१५) “प्रज्ञापना" - उपांगसूत्र-४ (मूलं+वृत्ति:) पदं [३६], -------------- उद्देशक: [-], ------------- दारं --------------- मूलं [३४९] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र-[१५]उपांगसूत्र-[४] "प्रज्ञापना" मूलं एवं मलयगिरि-प्रणीता वृत्ति: प्रत सूत्रांक [३४९] प्रज्ञापनाया: मल- यवृत्ती. नमत नयभङ्गकलितं प्रमाणबहुलं विशुद्धसद्बोधम् । जिनवचनमन्यतीर्थिककुमतिनिरासैकदुर्ललितम् ॥१॥ जयति हरिभद्रसूरिष्टीकाकृद्विवृतविषमभावार्थः । यदचनवशादहमपि जातो लेशेन विवृतिकरः ॥२॥ कृत्वा प्रज्ञा- पनाटीकां पुण्यं यदवाप मलयगिरिरनधम् । तेन समस्तोऽपि जनो लभतां जिनवचनसद्धोधम् ॥ ३॥" ३६ समुद्घातपदं योगनिरो ११॥ ३४९ गाथा इति श्रीमन्मलयगिरिविरचितायां प्रज्ञापनाटीकायां षट्त्रिंशत्तमं पदं समर्थितम्॥ प्रज्ञापनाटीका समासा ग्रन्थाग्रं १६००० दीप अनुक्रम [६२१-६२२] भाग प्रज्ञापना -उवंगसूत्र [४/३] मूलं एवं मलयगिरिसूरिजी रचिता टीका परिसमाप्ता: मूल संशोधकः सम्पादकश्च पूज्य आनंदसागरसूरीश्वरजी महाराज साहेब किंचित् वैशिष्ट्य समर्पितेन सह पुन: संकलनकर्ता मुनि दीपरत्नसागरजी M.Com., M.Ed., Ph.D., श्रुतमहर्षि) । ~329~ Page #330 -------------------------------------------------------------------------- ________________ भाग कुलपृष्ठ ३१४ ५८६ ४९८ ३९२ ५९४ ४९४ ३३८ ५९२ ५५२ सवृत्तिक-आगम-सत्ताणि भाग १ से ४० में कहां क्या मिलेगा? इस भागमे समाविष्ट आगम के नाम और आगम-क्रम 01 | आगम ०१ आचार मूलं एवं वृत्ति भाग-१ श्रुतस्क्न्ध -१, अध्ययन-१,२ 02 | आगम ०१ आचार मूलं एवं वृत्ति, भाग-२ श्रुतस्क्न्ध -१, अध्ययन- ३ से ९, श्रुतस्कन्ध-२ 03 | आगम ०२ सूत्रकृत मूलं एवं वृत्ति, भाग-१ श्रुतस्क्न्ध -१, अध्ययन-१ से १३ 04 | आगम ०२ सूत्रकृत मूलं एवं वृत्ति, भाग-२ श्रुतस्क्न्ध -१, अध्ययन १४ से १६, श्रुतस्कन्ध-२ 05 | आगम ०३ स्थान मुलं एवं वत्ति, भाग-१ स्थान- १ से ४ 06 | आगम ०३ स्थान मूलं एवं वृत्ति, भाग-२ स्थान- ५ से १० संपूर्ण 07 | आगम ०४ समवाय मूलं एवं वृत्ति. 08 | आगम ०५ भगवती मूलं एवं वृत्ति, भाग-१ शतक-१ से ६ 09 | आगम ०५ भगवती मूलं एवं वृत्ति, भाग-२ शतक-७ से ११ 10 | आगम ०५ भगवती मूलं एवं वृत्ति, भाग-३ शतक- १२ से २० 11 | | आगम ०५ भगवती मूलं एवं वृत्ति, भाग-४ शतक- २१ से ४१ संपूर्ण 12 | आगम ०६ ज्ञाताधर्मकथा मूलं एवं वृत्ति. 13 | आगम-७,८,९,१०उपासकदशा, अंतकृतदशा, अनुत्तरोपपातिकदशा, प्रश्नव्याकरण मूलं एवं वृत्ति. 14 | आगम-११,१२, विपाक, उववाई मूलं एवं वृत्ति. 15 | आगम १३ राजप्रश्नीय मूलं एवं वृत्ति. 16 | आगम१४ जीवाजीवाभिगम भाग-१ मूलं एवं वृत्ति. [प्रतिपत्ति-३-अतर्गत] सूत्र-१ से १३८ 17 | आगम१४ जीवाजीवाभिगम भाग-२ मूलं एवं वृत्ति. [प्रतिपत्ति-३-अतर्गत सूत्र- १३९ से प्रतिपत्ती-१० संपूर्ण 18 | | आगम १५ प्रज्ञापना भाग-१ मूलं एवं वृत्ति. पद-१ से ५ 19 | आगम १५ प्रज्ञापना भाग-२ मलं एवं वृत्ति. पद-६ से २२ 20 | आगम १५ प्रज्ञापना भाग-३ मुलं एवं वत्ति. पद- २३ से ३६ संपूर्ण 21 | आगम १६ सूर्यप्रज्ञप्ति मूलं एवं वृत्ति. ५१४ ३८४ ५२२ ५३८ ३८४ ३१४ ४८० ४८८ ૪૨૬ ५१४ ३३६ ६१० ~330~ Page #331 -------------------------------------------------------------------------- ________________ कुलपृष्ठ ६१४ ૩૭૬ ४२६ ३४४ ३१२ ३३० ४६६ ४४२ | | क मा क क क का नाम न का नाम की मात्रा का का सवृत्तिक-आगम-सुत्ताणि भाग १ से ४० में कहां क्या मिलेगा? भाग इस भागमे समाविष्ट आगम के नाम और आगम-क्रम आगम १७ चन्द्रप्रज्ञप्ति मूलं एवं वृत्ति. आगम१८ जंबूद्विपप्रज्ञप्ति भाग-१ मूलं एवं वृत्ति. वक्षस्कार- १ एवं २. | आगमा८ जंबूदविपप्रज्ञप्ति भाग-२ मूलं एवं वृत्ति. वक्षस्कार- ३ एवं ४. आगम१८ जंबूद्विपप्रज्ञप्ति भाग-३ मूलं एवं वृत्ति. वक्षस्कार- ५ से ७. आगम १९-३२ निरयावलिका, कल्पवतंसिका, पुष्पिका, पृष्पचूलिका, वृष्णिदशा, चतुःशरण, आतुरपरत्याख्यान, महाप्रत्याख्यान, भक्तपरिज्ञा, तंदलवैचारिक, संस्तारक, गच्छाचार, गणिविदया, देवेन्द्रस्तव मलं एवं छाया 27 | आगम ३३ थी ३९ मरणसमाधि मूलं एवं छाया, निशीथ, बृहत्कल्प, व्यवहार, दशाश्रुतस्कंध, जीतकल्प/पंचकल्प, महानिशीथ मूलं एव 28 आगम ४० आवश्यक मूलं एवं वृत्ति, भाग-१, नियुक्ति-१ से ५२१ 29 आगम ४० आवश्यक मूलं एवं वृत्ति, भाग-२, नियुक्ति- ५२२ से ९५१ आगम ४० आवश्यक मूलं एवं वृत्ति, भाग-३ नियुक्ति- ९५२ से १२७३ अपूर्ण, [अध्ययन- १ से ४ अपूर्ण] आगम ४० आवश्यक मूलं एवं वृत्ति, भाग-५ नियुक्ति- १२७३ अपूर्ण से १६२३, [अध्ययन-४ अपूर्ण से ६ संपूर्ण) | आगम ४१/१ ओघनियुक्ति मूल एवं वृत्ति. आगम ४१/२ पिंडनियुक्ति मूलं एवं वृत्ति. | आगम ४२ दशवैकालिक मूलं एवं वृत्ति. 35 आगम ४३ उत्तराध्यन मूलं एवं वृत्ति, भाग-१, अध्ययन- १ से ५ 36 | आगम ४३ उत्तराध्यन मूल एवं वृत्ति, भाग-२, अध्ययन- ६ से २१ 37 | आगम ४३ उत्तराध्यन मूलं एवं वृत्ति, भाग-३, अध्ययन- २२ से ३६ | आगम ४४ नन्दिसूत्र मूलं एवं वृत्ति. 39 | | आगम ४५ अनुयोगद्वार मूलं एवं वृत्ति. 40 | कल्प[बारसा]सूत्र... चतुःशरण, तन्दुलवैचारिक, गच्छाचार मूलं एवं वृत्ति. ४६४ ४२६ ४७२ ३७६ ५९० ५२२ ४८२ ४६६ 38 | ५२८ ५६० ३९४ ~331~ Page #332 -------------------------------------------------------------------------- ________________ नमो नमो निम्मलदंसणस्स पूज्य आनंद-क्षमा-ललित-सुशील-सुधर्मसागर गुरुभ्यो नमः आगम [15/3] पूज्य आगमोध्धारक आचार्य श्री सागरानंदसूरीश्वरेण संशोधित: संपादितश्च प्रज्ञापना (उपांगसूत्र”-४/३) [मूलं एवं मलयगिरि-प्रणिता वृत्तिः] किंचित् वैशिष्ठ्यं समर्पितेन सह) मुनि दीपरत्नसागरेण पुन: संकलित: "प्रज्ञापना" मूलं एवं वृत्तिः” नामेण परिसमाप्त: "सवृत्तिक-आगम-सुत्ताणि" श्रेणि, भाग-20 ~332~ Page #333 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ਉਸ ਦੇਸ਼ ਦੀ ਤਰਸ ਕਾਲ ਕਰ ਸਕਣ ਕਾਰਨ ਸਾਨੂੰ ਗੁਗਲ . ਸਰਕਾਰੀ ਹਾਸਲ ਕਰ ਸਕਦੇ ਸ਼ਾਸਤਰ आगम dico नाशताब्दा ਮਹਿਲਾ ਸ਼ਹਿਰ ਹਰਬਲ ਗੁਰੂ * 333 ~ Page #334 -------------------------------------------------------------------------- ________________ नमो नमो निम्मलदसणस्स सवृत्तिक-आगम-सुत्ताणि मूल संशोधक अभिनव-संकलनकर्ता Antara MANY PORA पूज्यपाद आगमोद्धारक आचार्य श्री आनंदसागरसूरीश्वरजी महाराज आगम दिवाकर मुनिश्री दीपस्नसागरजी [M.Com., M.Ed., Ph.D., श्रुतमहषि] ivitiwwwitmental प्रत-प्राप्ति और पेज सेटिंग कर्ता : के चेरमन श्री प्रवीणभाई शाह, अमेरिका मुद्रक : नवप्रभात प्रिन्टींग प्रेस अमदाबाद Mo 9825598855798253062751 ~334~ Page #335 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ईस प्रोजेक्ट के संपूर्ण-अनुदान-दाता श्री आगम मंदिर पालिताणा HIEO alisotela ~335~ Page #336 -------------------------------------------------------------------------- ________________ राणम् आगम आगम मुल संशोधक शाजामा आजमा पूज्यपाद आगमोद्धारक आचार्य श्री आनंदसागरसूरीश्वरजी महाराजसाहेब म आज आम आजम आजम आगम आगम आगम आगम आगम 15 “प्रज्ञापना” मूलं एवं वृत्ति: [3] आज अभिनव-संकलनकर्ता आजम आगम दिवाकर मुनिश्री दीपरत्नसागरजी आगम [M.Com., M.Ed., Ph.D., श्रुतमहर्षि] आम आण राणम् आगम आजम आगम ~336~