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________________ आगम (१५) “प्रज्ञापना” – उपांगसूत्र-४ (मूलं+वृत्ति:) पदं [३०], -------------- उद्देशक: [], ------------- दारं [-], -------------- मूलं [३१३] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र-[१५]उपांगसूत्र-[४] "प्रज्ञापना" मूलं एवं मलयगिरि-प्रणीता वृत्ति: प्रत प्रज्ञापनायाः मलयवृत्ती. घटन सूत्रांक ल ॥५२९॥ [३१३] दीप अनुक्रम [५७३] अणागारपासणयाए केवलदसणं नथि, एवं जाव थणियकुमारा । पुढविकाइयाणं पृच्छा, गो० पूढ विकाइया सागारप- ३० पश्यस्सी गो अणागारपस्सी, से केणटेणं भंते! एवं चु०-गो! पुढविकाइयाणं एगा सुयअण्णाणसागारपासणया पं०, से ते. तापदं सू. गो०, एवं जाव वणस्सतिकाइयाणं, बेईदियाणं पुच्छा, गो सागारपस्सी णो अणा०, से केणद्वेणं भंते । एवं बुचति, ३१३ गो०! बेइंदियाणं दुविहा सागारपासणया पं०, तं०-सुयणाणसागारपा० सुअअण्णाणसागारपा०, से एएणद्वेणं गो०! एवं बु०, एवं तेइंदियाणवि, चउरिदियाणं पुच्छा, गो! चउरिदिया सागारपस्सीवि अणामारपस्सीवि, से केणटेणं०१, गो!जेणं चरिंदिया सुयणाणी सुयअनाणी ते णं चउरिदिया सागारपस्सी, जे णं चउरिदिया चक्खुदंसणी ते गं चरिंदिया अणागारपस्सी, से एएणडेणं गो! एवं बु०, मणूसा जहा जीवा, अवसेसा जहा नेरइया जाब | वेमाणिया (सूत्रं ३१३) 'कतिविधा ण भंते' इत्यादि, कतिविधा-कतिप्रकारा, णमिति वाक्यालङ्कारे, भदन्त ! 'पासणय'ति 'शिर प्रेक्षणे' पश्यतीति 'सति वानिता विति अतृड्प्रत्ययः कर्त्तर्यनदादेशः, 'पानाध्मास्थानादाणुदृश्यर्तिश्रौतिकवुधिखुशदसदः पिबजिप्रधमतिष्ठमनयच्छपश्यञ्जेशृकृधिशीयसीद'मिति दृशेः पश्यादेशः, पश्यतो भावः पश्यत्ता, 'भावे तत्वला'विति तत्प्रत्ययः, 'आदापू' सैव पासणयेत्युच्यते, एष च पासणयाशब्दो रूढिवशात् साकारानाकारबोधन- ५२९॥ |तिपादकः उपयोगशब्दवत् , तथा चोपयोगविपये प्रश्नोत्तरसूत्रे इमे-'कइविहे गं भंते ! उवओगे पण्णत्ते ?, गोयमा|| SAREauratoninternational ~165
SR No.035020
Book TitleSavruttik Aagam Sootraani 1 Part 20 Pragyapana Mool evam Vrutti Part 3
Original Sutra AuthorN/A
AuthorAnandsagarsuri, Dipratnasagar, Deepratnasagar
PublisherVardhaman Jain Agam Mandir Samstha Palitana
Publication Year2017
Total Pages336
LanguagePrakrit, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari & agam_pragyapana
File Size71 MB
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