SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 97
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ आगम “प्रज्ञापना" - उपांगसूत्र-४ (मूलं+वृत्ति:) पदं [२६], -------------- उद्देशक: [], ------------- दारं [-], -------------- मूलं [३०१] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र-[१५]उपांगसूत्र-[४] "प्रज्ञापना" मूलं एवं मलयगिरि-प्रणीता वृत्ति: प्रत सूत्रांक [३०१] प्रज्ञापनायाः मलय.वृत्ती. ॥४९५|| २६कर्मवेदबन्धपद सू.१०१ दीप अनुक्रम [५४८] eceaeese छबिह० एगविह० ९, एवं एते नव भंगा, अवसेसाणं एमिंदियमणूसवजाणं तिषभंगो जाव वेमाणियाणं, एगिदियाण सत्तविहवंधगा य अट्ठविह०, मणसाणं पुच्छा, गो०! सबेवि ताव होज सत्तविहबंधगा १ अहवा सत्तविहबंधगा व अट्ठविहबंधगे य २ अहवा सत्तविहबंधगा य अवविहबंधगा य ३ अहवा सत्तविहबंधगा य छबिहबंधए य४, एवं छविहबंधएणवि समं दो भंमा, एगविहबंधएणवि समं दो भंगा, अहवा सत्तविहबंधगा य अट्टविहबंधए य छबिहबंधए य चउभंगो १ अहवा सत्तविहबंधगा य अट्टविहबंधए य एगविहधगे य चउभंगो २, अहवा सत्तविहबंधगा य छविधए य एगविहबंधए य चउभंगो ३ अहवा सत्तविहवंधगा य अवविहबंधए य छविहबंधए य एगविहबंधए य भंगा अह, एवं एते सत्तावीसं भंगा, एवं जहा गाणावरणिज तहा दसणावरणिज्जंपि अंतराइयंपि, जीवेणं भंते ! वेदणिजं कर्म वेदेमाणे कति कम्मपगडीतो बंधति', गो01 सत्तविहबंधते बा अद्दविहबंघते वा छबिहबंधए वा एगविहबंधए वा अधए वा, एवं मणूसेवि, अवसेसा णारयादीया सत्तविहबं० अवविहर्ष एवं जाव वेमाणिता । जीवा णं भंते । वेदणिज कम्भ वेदेमाणा कति बंधंति , गो! सबेवि ताव होज्जा सत्तविहबंधगा य अट्टविहबंधगा य एगविहबंधगा य अहवा सत्तविहवंधगा य अडवि० एगवि. छबिहबंधगे य, अहवा सत्तविहबंधगा य अवविहबंध. एगविहबंध० छबिहबंधगा य, अबंधगेणवि समं दो भंगा भाणितबा, अहवा सचविहबंधगा य अट्ठविहबंध. एगविहबंध० छविहवंधगे य अबंधगे य चउभंगो, एवं एए नव भंगा, एगिदियाण अभंगतं, नारगादीणं तियभंगा जाव बेमाणियाणं, नवरं मनसाणं पुच्छा, सवेवि ताव होआ सचविहबंधगा एगविहबंधगा य अहवा सत्तविहबंधगा य एगविहबंधगा य छविहवंधते य अङ्कविहर्व ॥४९॥ ~97~
SR No.035020
Book TitleSavruttik Aagam Sootraani 1 Part 20 Pragyapana Mool evam Vrutti Part 3
Original Sutra AuthorN/A
AuthorAnandsagarsuri, Dipratnasagar, Deepratnasagar
PublisherVardhaman Jain Agam Mandir Samstha Palitana
Publication Year2017
Total Pages336
LanguagePrakrit, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari & agam_pragyapana
File Size71 MB
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy