Book Title: Gyanpanchami Katha Author(s): Maheshwarsuri, Jinvijay Publisher: Singhi Jain Shastra Shiksha Pith MumbaiPage 35
________________ ६ नाणपंचमीकहाओ त्यार बाद विक्रमनी वीसमी सदीमा आजथी लगभग ओगणीश वर्ष पहेलां एटले वि. सं. १९८२ मा दिगंबर जैन विद्वान ब्रह्मचारी रायमल्ले संस्कृतमा 'भविष्यदत्त-चरित' लख्यानुं वांच्युं छे. पत्र संख्या ४५नी गणावी छे अने लिपि संवत् १९८२ मुकेल छे. हिन्दीमां तेना उपर भगवतदासे टीका पण करेली छे. आ ग्रन्थ पण नाम उपरथी तो पंचमी व्रत उपर ज लागे छे. जोवाथी वधारे मालुम पडे. हजु ते प्रकट थयो होय एवं जाणवामां नथी. उपर्युक्त दिल्हीमां धर्मपुरा महोल्लाना नया मंदिरना भंडारमा तेनी प्रति छे. अहिं सुधी तो आपणे पंचगी माहात्म्य उपर संस्कृत, प्राकृत, अपभ्रंशादि भाषामां कोणे क्यारे लख्युं ते संबंधे चर्चा करी. हते आपणे ते संबंधे जूनी गूजरातीमां कोणे क्यारे शुं लत्युं छे तेनो पण विचार करी लइए. सत्तरमी सदीना अंतभागमां एटले के लगभग वि. सं. १६८५ मा तपागच्छीय हीरविजयसूरि-मेहमुनि-कल्याणकुशल शिष्य दयाकुशले 'ज्ञान पंचमी- नेमिजिनस्तवन' जूनी गूजरातीमां लल्यु." आदिमां तेमां लख्युं छे: " शारदमात पसाउले निजगुरुचरण नमेवि पंचमी तपविधि हुँ भणुं हिअडे हरष धरेवि." दयाकुशले उपर्युक्त स्तवन रच्युं तेज अरसामां खरतरगच्छीय जिनचंद्रसूरि-सकलचंद्र उपाध्यायना शिष्य समयसुंदर उपाध्याये वि. सं. १६८५ आसपासमां जेसलमेरमा 'पंचमी वृद्ध (मोटुं) स्त०' (ज्ञान पंचमीपर ३ ढाळ २५ कडीनुं स्तवन) तथा 'पंचमी लघु स्तवन' ५-कडीमां जूनी गूजरातीमा लख्यां." नमूना नीचे प्रमाणे छे:'पंचमी वृद्धस्तवन'नी आदि : "प्रणमुं श्री गुरुपाय निर्मलज्ञान उपाय, पंचमी तप भणुं ए, जनम सफळ गिणुं ए". 'पंचमी लघुस्तवन'नी आदि : "पंचमी तप तुमें करोरे प्राणि, निर्मळ पामो ज्ञान". अंत: 'पार्श्वनाथ प्रसाद करीने, महारी पूरो उमेद रे, समयसुंदर कहे हुँ पण पामुं, ज्ञाननो पंचमो भेद रे." लगभग आज समये तपागच्छीय सकलचंद्र उपाध्याय शिष्य सूरचंद्र शिष्य भानुचंद्र शिष्य देवचंद्र बीजाए पण 'सौभाग्य पंचमी स्तुति' लखी छे." अढारमी सदीना पहेला दसकामां तपागच्छीय विजयसिंह - विजयदेव-संजमहर्ष-गुणहर्ष शिष्य लब्धिविजये ‘मौन एकादशी स्तवन' उपरांत 'सौभाग्य पंचमी - ज्ञान पंचमी स्तवन' जूनी गूजरातीमां रच्यानो दाखलो मळे छे:-३८ ३४ जुओ "अनेकांत"-१९४१, जून-पृ. ३५० ३५ जुओ उपर्युक्त जै. गू. क. प्रथम भाग, पृ. २९९. ३६ जुओ उपर्युक्त जै, गू. क. प्रथम भाग, पृ. ३८०, ३७ जुओ उपर्युक्त जै. गू. क. प्रथम भाग, पृ. ५७९. ३८ जुओ जै. गू. क. बीजो भाग, पृ. १२३. Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.orgPage Navigation
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