Book Title: Gyanpanchami Katha Author(s): Maheshwarsuri, Jinvijay Publisher: Singhi Jain Shastra Shiksha Pith MumbaiPage 42
________________ प्रस्तावना जेने मनोरमा नामनी स्त्रीथी रूपलावण्यमयी सरूपा नामनी पुत्री हती जेनो हाथ धनपतिए माग्यो एटले तेने धनपति साथे परणावत्रामां आवी. आ बीजी वारनी पत्निथी धनपतिने बंधुदत्त नामे पुत्र थयो. आ बंधुदत्तने तेना मित्रो एकदा कहे छे : ----- "पुन्वजियव्वाईजो भुंजइ महिलिय व्य घरमज्झे । सो पुरिसनामधारी कह नवि लजेह लोयंमि" ॥ १०॥४५॥ ए उपरथी तेना तमाम मित्रोनी इच्छानुसार बंधुदत्ते धनोपार्जन माटे सुवर्णभूमि जवा विचार कर्यो (गाथा २६-५०). भविष्यदत्ते पण बंधुदत्त साथे जवा निश्चय कर्यो. पांचसो माणसोना सार्थ साथे तेओ तो जवा उपड्या. वेपारीओ जवा उपड्या ते पहेलां बंधुदत्तनी माता सरूपाए बंधुदत्तने का पुत्र तुं ए, करजे के जेथी भविष्यदत्त पाछो न आवे' ('तह पुत्त ! करेज तुमं भविस्सदत्तो जह न एई'-१०५८). सार्थ तो चाल्यो. रस्तामा 'मयणाय दीव' आव्यो त्यां आगळ सौ उतरी फळ फूलादिक ग्रहण करवा लाग्या. बंधुदत्ते ज्यारे जोयुं के भविष्यदत्त नथी त्यारे सार्थने उपडवानी आज्ञा आपी दीधी. विवराभिमुख पुराणी सोपानपंक्ति, ए द्वीपमा एकला रही गयेल भविष्यदत्ते देखी. ते उपरथी ते तो उपर व्हडीने जुए छे तो एक नगर (जे द्वीपतिलक होवा संभव छे) तेणे देख्यु (गाथा ५१-७५). ते नगरमां चंद्रप्रभ जिनन देवालय पण तेणे देख्यु. चंद्रप्रभ जिनेश्वरनी भविष्यदत्ते स्तुति-स्तवना करी. बराबर आ वखते, पूर्व विदेहनी अंदर यशोधर केवलिनो कैवल्यमहिमा करी, भविष्यदत्तनो भावि वृत्तांत पूछी, भविष्यदत्तना पूर्व स्नेहने लईने अच्युत कल्पना देवताए चंद्रप्रभ जिनालयमां दिव्याक्षर पंक्तिओ लखी: "एत्तो पंचमगेहे बहुविहरयणेहिं भूसियदुवारे । कन्ना भविस्सरूवा अच्छइ वररूवसंजुत्ता॥ १०९१ ॥ तीए होही भत्ता भविस्सदत्तो ति नत्थि संदेहो। धणवणो घरिणीए कमलसिरीए सुओ सुहओ॥ १०१९२॥" ए उपर्युक्त पंक्तिओ वांची भविष्यदत्तने घणुं आश्चर्य थयु. अने ते तो ते कन्यानी शोधमां चाल्यो. तेनुं नाम लई तेने बारणेथी बोलावी. कन्याए हर्ष अने भयथी द्वार उघाडी तेने आसन आप्यु. भविष्यदत्ते ते युवान कन्याने जोई ते दिवसने धन्य गण्यो (गाथा ७६ -१००). क्षेत्रदेवताए ते बन्नेना पाणिग्रहणनी संमति आपी. बन्नेए खाधुं अने सुखदुःखनी वातो करता हता, तेवामां अशनिवेग नामनो असुर आवी पहोंच्यो. परंतु भविष्यदत्त अने ए असुर बन्ने पूर्वभवना मित्रो होवाने कारणे असुरे तो उग्रता धारण करवाने बदले मित्रकृत्य कर्यु अने विधिपूर्वक बन्नेने परणाव्या. बन्ने खाय - पीए छे अने विषयसुख भोगवे छे. एवामां एकदा भविष्यदत्तना पूछवाथी भविष्यानुरूपा पोतानो पूर्ववृत्तांत कहेवा लागी. द्वीपतिलक नामर्नु पूर्वे एक नगर हतुं. तेनो यशोधर नामे राजा हतो. भवदत्त मारो पिता अने नागसेना मारी माता हती. सहसा देवोए राजा अने प्रजा बन्नेने, मने एकलीने अहिं मुकी, समुद्रमां फेंकी दीधा. आ वृत्तांत तेणे कह्यो. बन्ने आनंदमां दिवसो पसार करवा लाग्या. आ बाजु कमल श्रीए पुत्रविरहथी शोकवाळी बनी सुव्रता नामनी आर्या पासे पोतानुं दुःख कही हैयुं हलकुं कयु. ए दुःखना प्रतिकार रूपे ते श्रमणीए कमलश्रीने ज्ञानपंचमी, व्रत करवा कयुं 'गिण्हावइ पंचमियं वन्नित्ता तीइ फलभावं' १०॥११८ ।। (गाथा १०१-१२५). भविष्यदत्तने हवे मातापिता सांभरे छे. अने तेथी ते गजपुर जवानो विचार सेवी रह्यो छे. तेवामा बंधुदत्त सार्थ समेत त्यां आवी पहोंच्यो. भाईने त्यां देखी शरमींदो थई गयो. बंधुदत्तने पूर्ववृत्तांत सांभरी Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.orgPage Navigation
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