________________ सातवां उद्देशक] [161 विवेचन-चूर्णिकार के सामने जो प्रति रही होगी उसके मूल पाठ में और शब्दों के क्रम में प्रस्तुत प्रतियों से भिन्नता रही है / चूर्णिकार 'कुडल' शब्द की सर्वप्रथम व्याख्या करते हैं और भाष्यकार 'कडगाई आभरणा' इस प्रकार का कथन करते हैं / आचारांगसूत्र श्रु. 2 अ. 13, में तथा श्रु. 2, अ. 15 में 'हार' शब्द प्रारम्भ में है तथा याचारांगसूत्र श्रु. 2, अ. 2, उ. 1 में 'कुडल' शब्द प्रारम्भ में है। चूर्णिकार के सामने संभवत: प्राचारांग श्रु. 2, अ. 2, उ. 1 के समान पाठ था, ऐसा स्पष्ट प्रतीत होता है / प्रायः उन शब्दों की ही क्रमपूर्वक व्याख्या की गई है। दोनों तरह के प्रमाण मिलने के कारण इसे केवल विवक्षाभेद समझना चाहिये। वस्त्र-निर्माण प्रादि के प्रायश्चित्त 10. जे भिक्खू माउग्गामस्स मेहुणवडियाए 1. आइणाणि वा, 2. सहिणाणि वा, 3. सहिणकल्लाणाणि वा, 4. आयाणि वा, 5. कायाणि वा, 6. खोमियाणि वा, 7. दुगुल्लाणि वा, 8. तिरोडपट्टाणि वा, 9. मलयाणि वा, 10. पत्तुण्णाणि वा, 11. अंसुयाणि वा, 12. चिणंसुयाणि वा, 13. देसरागाणि वा, 14. अमिलाणि वा, 15. गज्जलाणि वा, 16. फालिहाणि वा, 17. कोयवाणि वा, 18. कंबलाणि वा, 19. पावराणि वा, 20. उद्दाणि वा, 21. पेसाणि वा, 22. पेसलेसाणि वा, 23. किण्हमिगाईणगाणि वा, 24. नीलभिगाईणगाणि वा, 25. गोरमिगाईणगाणि वा, 26. कणगाणि वा, 27. कणगंताणि वा, 28. कणगपट्टाणि वा, 29. कणगखचियाणि वा, 30. कणगफुसियाणि वा, 31. वग्घाणि वा, 32. विवग्याणि वा, 33. आभरण-चित्ताणि वा, 34. आभरण-विचित्ताणि वा करेइ, करेंतं वा साइज्जइ। 11. जे भिक्खू माउग्गामस्स मेहुणवडियाए आइणाणि वा, 'जाव' आभरण-विचित्ताणि वा धरेइ, धरतं वा साइज्जइ। 12. जे भिक्खू माउग्गामस्स मेहुणवडियाए आइणाणि वा 'जाव' आभरण-विचित्ताणि वा पिणखेइ, पिणखेंतं वा साइज्जइ। 10. जो भिक्षु स्त्री के साथ मैथुन सेवन के संकल्प से 1. मूषक आदि के चर्म से निष्पन्न वस्त्र, 2. सूक्ष्म वस्त्र, 3. सूक्ष्म व सुशोभित वस्त्र, . 4. अजा के सूक्ष्म रोम से निष्पन्न वस्त्र, 5. इन्द्रनीलवर्णी कपास से निष्पन्न वस्त्र, 6. सामान्य कपास से निष्पन्न सूती वस्त्र, 7. गौड देश में प्रसिद्ध या दुगुबल वृक्ष से निष्पन्न विशिष्ट कपास का वस्त्र, 8. तिरीड वृक्षावयव से निष्पन्न बस्त्र, Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org