Book Title: Gems Of Jaina Wisdom
Author(s): Dashrath Jain, P C Jain
Publisher: Jain Granthagar

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Page 67
________________ अष्टाशीति) तेरासी लाख (सप्ततिम्) सात हजार (च) और (शतसंख्याष्टा अष्टांशीति) आठ सौ अठासी (पदवर्णनम्) पद के अक्षर हैं। The total number of letters in the above mentioned words (Pada) is 1634crore,83 lac 07thousand 888.i.e. 16348307888 only. Explanation :- The canonical literature of Jainas mention three types of words/combination of words-determinating words, (artha Pada), medium words and words relating to organs of knowledge (pramāna pāda). Arthapāda means and includes all the words which are used by a speaker to express his ideas. The number of letters constituting medium words (madhyam pāda) is fixed. The aggrigates of eight, forteen and similar other number of letters - which are used in poetry-are called words relating to organs of knowledge (pramāna pāda). The number of medium words alone is fixed and always remains so. The canons mentioned that there are sixty four basic letters (moolaAksar) consisting of twenty seven vowels (swara), thirty three consonents (vyanjana), four ayogavaha in devanāgiri script. सामायिकं चतुर्विंशति-स्तवं वन्दना प्रतिक्रमणम् । वैनयिकं कृतिकर्म च पृथु-दशवैकालिकं च तथा।।24।। वर-मुत्तराध्ययन-मपि कल्पव्यवहार-मेव-मभिवन्दे। कल्पाकल्पं स्तौमि महाकल्पं पुण्डरीकं च।।25।। परिपाटया प्रणिपतितोअस्म्यहं महापुण्डरीकनामैव। निपुणान्यशीतिकं च प्रकीर्णकान्यंग-बानानि।।26।। (प्रणिपतितः अहम्) नम्रीभूत हुआ मैं (परिपाटया) परिपाटी क्रम से (सामयिक) सामायिक (चतुर्विंशतिस्तव) चतुर्विंशति स्तवन, (वन्दना) वन्दना (प्रतिक्रमणम्) प्रतिक्रमण (वैनयिक) वैनयिक (च) और कृतिकर्म (पृथुदशवैकालिकम्) विशाल दशवैकालिक (तथा च) और (वरम्) उत्कृष्ट (उत्तराध्ययनम् अपि) उत्तराध्ययन को भी (एवम्) इसी प्रकार (कल्पव्यवहारम्) कल्प-व्यवहार को (अभिवन्दे) नमस्कार करता हूँ। (कल्पाकल्पं महाकल्पं पुण्डरीकं च) कल्पाकल्प, महाकल्प और पुण्डरीक की (स्तौमि) मैं स्तुति करता हूँ तथा (महापुण्डरीक नामैव अशीतिकं च) महापुण्डरीक और निषिद्धिका के प्रति (प्रणिपतितः अस्मि) मैं नम्रीभूत हूँ (निपुणानि) वस्तु तत्व Gems of Jaina Wisdom-IX 65

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