Book Title: Anekant 1986 Book 39 Ank 01 to 04
Author(s): Padmachandra Shastri
Publisher: Veer Seva Mandir Trust
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Page #1 -------------------------------------------------------------------------- ________________ धौर सेवा मन्दिर का त्रैमासिक अनेकान्त (पत्र-प्रवर्तक : प्राचार्य जुगल किशोर मुख्तार 'युगवीर') वर्ष ३९: कि०१ (पुग्मांक ) जनवरी-मार्च १९८६ इस अंक में विषय १. आदिनाथ जिन-स्तवन २. परिग्रह की घुसपैठ में अहिंसा की लाक्षणिक हत्या श्री पपचन्द्र शास्त्री, दिल्ली ३. पुरुदेव-चम्मू का आलोचनात्मक परिशीलन -डा. कपुरचन्द जैन, खातौली ४. अपभ्रंश साहित्य की एक अप्रकाशित कृति : पुण्यासव कहा -डा. राजाराम जैन आरा ८ ५. धर्मसार सतसई : श्री कुन्दनलाल जैन दिल्ली ६. कस्तूरी मग : डा० सविता जैन ७. जैन विद्याओं में शोध एक सर्वेक्षण -डा. नन्दलाल जैन, रीवा ८. आयुर्वेद मे अनेकान्त : -आचार्य राजकुमार जैन, दिल्ली ६. णायकुमार चरिउ में प्रतिपादित धर्मोपदेश -डा० कस्तूरचद 'सुमन', श्री महावीर जी २६ १०. परिग्रह मोह में पंचवतों के नाम बदलाए । -श्री पप्रचन्द्र शास्त्री, नई दिल्ली ११. जरा सोचिए-सम्पादकीय १२. भगवान महावीर प्रथम देशना-राजगृही आ.पृ०२ ३ प्रकाशक वोर सेवा मन्दिर, २१ दरियागंज, नई दिल्ली-२ Page #2 -------------------------------------------------------------------------- ________________ भगवान महावीर प्रथम देशना स्मारक-राजगृही 6 1. पटना से लगभग सौ किलोमीटर नालन्दा से लगभग १७ किलोमीटर दूर स्थित राजगृही एक ऐतिहासिक स्थल है। जिसे भगवान महावीर और गौतम बुद्ध ने अनेक बार अपने बिहार से पवित्र किया था। इसी नगरी में स्थित पांच पहाड़ियों में से प्रथम पहाड़ी विपुलांचल पर्वत पर भगवान महावीर का पहला उपदेश हुआ था। इसी कारण विपुलांचल पर्वत विशेष रूप से जैनियों का अत्यन्त पवित्र स्थल बना हुमा है। यद्यपि कालान्तर में हिन्दूमुसलमान, सिख आदि धमों का भी महत्व इस नगरी से जुड़सा गया और राजगृही सर्वधर्म समन्वय की नगरी बन गई। यहां हर साल देश-भर से लगभग एक लाख जैन और लगभग इतने ही अजैन तीर्थ-यात्री दर्शनार्थ आते हैं । राजगही पंच पहाडियों के मध्य अवस्थित है। इसी कारण महाभारत के पूर्व में एवं हिन्दू पुराणो में इसे गिरीब्रज कहा गया है। जैन पुराणो में बताया गया है कि श्री वासुपूज्य भगवान के अतिरिक्त तेईस तीर्थंकरों का समवशरण राजगृहमें ही हुआ था। बीसवे तीर्थकर भगवान मुनि सुबतनाथ के गर्भ, जन्म तप और ज्ञान ये चारों वल्याणक इसी राजगृही मे हए थे। भगवान महावीर स्वामी के समवशरण मे महारजा श्रेणिक द्वारा किए गए साठ हजार प्रश्नों के उत्तर में रचे गए सैकड़ो ग्रन्थ इसी राजगीर से सबधित है। अब हम इसे कथानकों का उदगम स्थान भी कह सकते है। इस पचकल्याणक मे होने वाले द्वितीय केवली श्री सुधर्माचार्य का निर्वाण माघ सुदी सप्तमी के दिन राजगीर के विपुलांचल पर्वत पर ही हुआ था। राजगीर को जैन हिन्दू बौद्ध सभी पबित्र मानते है। यहां गर्म पानी के स्वास्थ्यवर्द्धक झरने हैं जिनसे अहनिस उष्णजल प्रवाहित होता रहा है। इस गंधक युक्त जल से जनमानस की शारीरिक तथा मानसिक अशान्तियाँ दूर हो जाती है । शीत-ऋतु मे हजारो रोगी स्त्री-पुरुष यहाँ जलवायु परिवर्तनार्थ आकर स्वास्थ्य लाभ करते है। इस गर्म पानी के झरनो तथा अपने शान्त और सुरभ्य प्राकृतिक वातावरण के चलते यह देश का ही नही बल्कि विश्व के पर्यटन स्थली को मानचित्रों मे अपना महत्वपूर्ण स्थान रखता है। राजगीर मे अनेक प्राचीन दर्शनीय स्थल है। प्राचीन मन्दिरों के भग्नावशेष प्राचीन मूर्तियाँ, पाजातशत्रु का किला स्वर्ण भण्डार गुफा आदि जैन ब्राह्मी कला, मन्दिर राजगीर (वीरायतन) देखने योग्य है। इसमे चौबीसों तीर्थंकरों पर दर्शाई गई झाकियाँ अति सुन्दर व मनोज्ञ हैं। अठारह लाख की लागत से राजगीर पर्वत पर रज्जू मार्ग बनाया गया। जिस पर १६० आदमी एक साथ आकाश मार्ग से ऊपर आ जा सकेगे। इस प्रकार इस तीर्थ क्षेत्र के महत्व को देखते हुए १९७४-७५ में भगवान महावीर के निर्वाणोत्सव के समय समारोह के अध्यक्ष समाज सेवक साहू शांतिप्रसाद जैन के नेतृत्व मे समाज ने यह निर्णय किया था कि विपूलाचल पर्वत पर भगवान महावीर के प्रथम उपदेश की स्मृति में एक भव्य स्मारक का निर्माण किया जाए। स्मारक के निर्माण का दायित्व साह जैन ट्रम्ट को सौपा गया। निर्माण का विशेष आकर्षण पहाडी पर खुले आकाश मे अवस्थित चार मनोहारी पांच-पांच फुट ऊंची चतर्मखी पद्मासन प्रतिमाएं है जो ७२ फुट ऊँचे इस स्मारक पर विराजमान है। इसकी रचना समवशरण के रूप में हैं। इसका निर्माण करते समय आध्यात्मिक वातावरण का विशेष रूप से ध्यान रखा गया है। ऐसा लगता है कि जैसे भगवन का उपदेश चारों दिशाओ मे प्रतिध्वनित हो रहा हो। Page #3 -------------------------------------------------------------------------- ________________ मोम महम UULL स HI VAM O वर्ष ३६ किरण १ परमागमस्य बीजं निषिद्धजात्यन्धसिन्धुरविधानम् । सकलनयविलसितानां विरोधमथनं नमाम्यनेकान्तम्॥ वीर-सेवा मन्दिर, २१ दरियागंज, नई दिल्ली-२ ( जनवरी-मार्च वीर-निर्वाण संवत् २५११, वि० स० २०४२ . १९८६ प्रादिनाथ-जिन-स्तवन कायोत्सर्गायताङ्गो जयति जिनपतिनाभिसूनुर्महात्मा मध्याह्न यस्य भास्वानुपरिपरिगतो राजतिस्मोप्रमूर्तिः । चक्रं कर्मेन्धनानामतिबह दहतादूग्मौदाव्यवात-- स्फूर्जत्सद्धयानवह्नरिव रुचिरतरः प्रोद्गतो विस्फुलिङ्गः ॥५॥ -पग्रानन्द्याचार्य कायोत्सर्ग मुद्रा परि वनमें ठाढ़े रिषभ रिद्धि तजि दीनी। निहिचल अंग मेर है मानो दोऊ भुजा छोर जिनि दोनी। फंसे अनन्त जन्तु जग-चहले दुखी देख करुणा चित लोनी । काढ़न काज तिन्हें समरथ प्रभु, किषों बांह ये दीरघ कोनी ॥ -भूधरदास अर्थ-कायोत्सर्ग के निमित्त से जिनका शरीर लम्बायमान हो रहा है, ऐसे वे नाभिराय के पुत्र महात्मा आदिनाथ जिनेन्द्र जयवन्त होवें, जिनके ऊपर प्राप्त हआ मध्यान्ह (दोपहर) का तेजस्वी सूर्य ऐसा सुशोभित होता है मानो कर्म रूप ईन्धनों के समह को अतिशय जलाने वाली एवं उदासीनतारूप वाय के निमित्त से प्रगट हई समीचीन ध्यान रूपी अग्नि की दैदीप्यमान चिनगारी ही उन्नत हुई हो। विशेषार्थ-भगवान आदिनाथ जिनेन्द्र की ध्यानावस्था में उनके ऊपर जो मध्यान्ह काल का तेजस्वी सयं आता था उसके विषय में स्ततिकार उत्प्रेक्षा करते हैं कि वह सूर्य क्या था मानों समताभाव से आठ कर्मरूपी ईन्धन को जलाने के इच्छुक होकर भगवान आदिनाथ जिनेन्द्र द्वारा किए जाने वाले ध्यानरूपी अग्नि का विस्फुलिंग ही उत्पन्न हुआ है। Page #4 -------------------------------------------------------------------------- ________________ विचारणाय-प्रसग: परिग्रह की घुस पैठ में अहिंसा की लाक्षणिक हत्या 0 ले० पप्रचन्द्र शास्त्री स्वामी समन्तभद्रं जैन-दर्शन के ज्ञाता प्रकाण्ड विद्वान है-वहां वे सम्यग्दर्शन-ज्ञान-चारित्र को धर्म कहते हैथे। उन्होंने श्रावकाचार के मंगलाचरण में तीर्थकर वर्ध- "सद्दष्टिज्ञानवृत्तानि धर्म धमेश्वरा: विदुः।" मान को "निर्धत-कलिलात्मने" रूप में नमस्कार किया है श्री उमा स्वामी महाराज सूत्र के प्रारम्भ में "सम्यगऔर "कलिल" को श्री प्रभाचन्द्राचार्य ने ज्ञानावरणादिरूप दर्शनज्ञान-चारित्राणि मोक्षमार्गः" द्वारा तीनो के एकत्व को पाप कहा है । इसी रत्नकरण्ड के दूसरे श्लोक मे स्वामी मोक्षमार्ग बतलाते है जो मुनिपद मे ही संभव है । आचार्य समन्तभद्र ने इन्ही कर्मों के विनाशक धर्म के वर्णन की कुन्दकुन्द देव तो रत्नत्रय मे अभेद होने की बात पहले ही प्रतिज्ञा की है। तथाहि-"नमः श्री वर्धमानाय निर्धत- कह चुके है। लिलात्मने" "देशयामि समीचीनं धर्म कर्मनिवईणम"- सम्यग्दर्शन ज्ञान और चारित्र में एकत्व स्थापित हो उक्त प्रसंग से इतना तो स्पष्ट है कि स्वामी समन्त- और तीनों पृथक न रहे यह मोक्ष प्राप्ति का साक्षात मार्ग भद्र की श्रद्धा आत्मा की परिग्रहातीत निर्मल दशा पर है और पूर्ण अपरिग्रहत्व का यही रूप है जिसमें आत्मा रही है। वे पाप कर्म रहित निर्मल आत्मा को इष्ट मानते पूर्णतया निर्मल होता है-श्रावकाचार तो मात्र अभ्यास हैं। इनसे पूर्व आचार्य कुन्दकुन्द ने भी वन्धरूप होने से दशा है । आचार्यों ने निर्मल आत्मा को रत्नत्रय रूप और कर्म-पर्याय मात्र को पाप कहा है। उन्होने पण्य-पाप मे पूर्ण अपरिग्रही घोषित किया है। क्योंकि परिग्रह मे रत्नवंध की अपेक्षा भेद ही नहीं माना-दोनो को ही कत्सित त्रय को पूर्णता नही और रत्नत्रय की पर्णता के बिना भाव कहा । वे कहते हैं आत्मा का शुद्धत्व भी नही। यतः-सम्यग्दर्शन आत्मान"कम्ममसुह कुसील सुहकम्मं चावि जाणह कुसील। भूति का नाम है और आत्मा की अनुभूति ज्ञानरूप होने से वह त होइ सुसील ज ससार पवेसेदि ॥" सम्यग्दर्शन से अभिन्न है तथा सम्यक्चारित्र आत्म-रमणरूप -जैसे अशुभ कर्म कुशील है वैसे ही शुभ कर्म भी क्रिया होने से सम्यग्दर्शन और सम्यग्ज्ञान से अभिन्न है कुशील है। भला जो संसार में घुमाता हो-प्रवेश कराता और यह अभिन्नता अपने मे रहने पर ही सभव है। जब हो वह सुशील कैसे हो सकता है, अर्थात् नही हो सकता। तक पर अर्थात् परिग्रह मे प्रवेश की बात है तब तक रत्नआचार्य समन्तभद्र ने इन्ही कर्मों के निवहण--विनाश त्रय की पूर्णता नही और तब तक मोक्ष भी नही। सि० करने वाले मार्ग को धर्म कहा है। इससे यह स्पष्ट है कि चक्रवर्ती नेमिचन्द्राचार्य के कथनानुसार "रयण तय ण वट्टइ उक्त आचार्यों के मत मे और समस्त जैन-दर्शन मे धर्म वही है अप्पाण मुयतु अण्णदविय म्हि" और कुन्दकुन्दाचार्य के अनुजो कर्मों से --परिग्रह से छुटकारा दिलाकर स्व-स्वभाव मे सार "ताणि पुण जाण तिणि वि अप्पाण चेव पिच्छयदो" स्थापित कराने वाला हो । अब यह विज्ञों का काम है कि और अमृतचन्द्राचार्य के अनुसार "दर्शन ज्ञान चारिस्त्रिवे ऐसे धर्म को पहचानें । इसी श्रावकाचार मे आगे चल त्वादेकत्वतः स्वयम्" सभी शुद्धात्मा रूप ही ठहरते हैंकरें श्रावकाचार प्रसग में धर्म की जो परिभाषा दी गई है पर अर्थात् परिग्रह के लेश से भी यछते । उसमे उनकी कर्म निवर्हण वाली बात को पूर्ण पुष्टि होती हम "पर" को परिग्रह कहते है चाहे वह पर किसी निधूतं स्फोटित कलिल ज्ञानावरणादिरूप पापमात्मनः ।" -रत्नक० टीका । Page #5 -------------------------------------------------------------------------- ________________ परिग्रह की घुस पैठ में अहिंसा को लाक्षणिक हत्या रूप में ही क्यों न हो। यहां तक कि अपने में अपनेपन यदि प्राण रक्षण रूप उक्त प्रसंग को हम अहिंसा का का विकल्प उठना भी परिग्रह है और इसीलिए मोक्षमार्ग नाम न देकर "शुभ लेश्या" नाम दे दें तो सही बैठ जाता में निर्विकल्प दशा को प्रमुख स्थान दिया गया है। यद्यपि है। क्योकि प्राण हनन और प्राण रक्षण दोनों स्थलों में ही "मूर्छा" को परिग्रह कहा है और व्यवहार में मूर्छा की "कषायोदयानरजित" योग प्रवृत्ति होती है जो लेश्या के 'ममेदं" यह मेरा है, ऐसी परिभाषा की गई है। पर, लक्षण से पूर्ण मेल खा जाती है-प्राण हनन और प्राण वास्तव में यहां पर आचार्य का भाव ममत्व (अपने पन) रक्षण दोनो मे ही कषाय और योग साथ चलते हैं। हनन मात्र से संबंधित न होकर अधिक व्यापक रूप मे है-इसमे और रक्षण मे यदि कोई अन्तर है तो वह अन्तर मात्र ममत्व की भांति परत्व (परायेपन) जैसे अनेको भेद समाए अशुभ और शुभ लेश्या रूपो मे ही है। जबकि अहिंसा में हुए है। यदि ऐसा न हो और मात्र "यह मेरा है" से भिन्न, रागादिकषाय और योग जाति का सर्वथा अभाव हैऐसे भाव जिनमे मेरा पन नही है जैसे---किसी से घृणा "अप्रादुर्भाव: खलु रागादीनां भवत्यहिंसेति ।"करना, किसी को गाली देना, किसी को मार देना आदि यह बात भी ध्यान देने योग्य है कि आचार्यों ने जैसे पाप ममत्व की परिधि से निकल जाएगे।-परिग्रह न प्राण व्यपरोपण को हिंसा कहा वैसे अहिंसा के लक्षण को कहलाएगे। क्योकि ये सभी भाव और कार्य ममत्व न प्राण रक्षण रूप मे नही कहा । क्योकि वे जानते थे किहोकर, उससे विपरीत घणादि के ही फलित कार्य है और प्राण रक्षण विकल्पाधीन होने से प्रमाद के बिना सम्भव ममत्व से अधिक भयावह भी है। भला सोचिए . जब नही और प्रमाद परिग्रह है और परिग्रह हिंसा मे कारण आचार्य ममत्व भाव को परिग्रह बतला रहे है तब घणादि है। इसीलिए उन्होंने प्रमाद के अभाव को अहिंसा कहा। जैसे भाव अपरिग्रह होगे क्या? अर्थात नही हो सकेंगे। और उसे रक्षा करने आदि जैसे विकल्पो से नही जोडा.। एतावता मानना होगा कि राग के साथ पर-प्रेरित घणादि जैसा कि कालान्तर में जोड़ा जाने का प्रचलन चल पड़ा जैसे सभी भाव आत्मा को अहितकारक होने से "मी"- और लेश्याभाव के व्यवहार का सर्वथा लोप हो गया। परिग्रह की श्रेणी में आते है। हनन और रक्षण से लेश्या की व्यवहारिकता कॅसे मल __इसी भांति जब हम अहिंसा के लक्षण की ओर दृष्टि- खाती है इसे विभिन्न आगम लक्षणो से स्पष्ट जाना जा पात करते है तब वहा भी "अप्रादुर्भाव : खलु रागादीना सकता है। तथाहिभवत्यहिंसेति" स्पष्ट लक्षण दिखाई देता है। इसका तात्पर्य कषायोदयरजिता योग प्रवृत्ति लेश्या ।" ऐसा है कि जहा किंचित भी रागादि भाव है, बहा हिंसा -राजवा०२/६ है (और वही मूच्छ भाव-परिग्रह है) जबकि लम्बे समय से "कषायश्लेष प्रकर्षाप्रकर्षयुक्ता योगवत्तिर्लेश्या।" अहिंसा के जनक अपरिग्रह की उपेक्षा कर रागादि पार -राज वा० ६/७ 'कषायोदयतो योगप्रवृत्तिरूपशिता । ग्रह जन्य करुणा, दया आदि जैसे भावो से फलित प्राण -श्लोकवा० २/७/११ रक्षा को अहिंसा नाम दिया जा रहा है। हमारा ऐसा "जोगप उत्ती लेस्सा कसाय उदयाणरजिया हो।" चलन कहां तक उचित है ? विचार दृष्टि से तो ऐसा गोम्मट०.४५ मालूम होता है कि हम जिनवाणी को माता मानकर भी "कषायोदयरजिता योगप्रवृत्तिरिति कृत्वा औरमिकीउसकी अवहेलना कर रहे हैं और प्रमाद-परिहार रूप जैन त्यच्यते ।" -सर्वा० २/६ की अहिंसा के सही रूप से दूर चले जा रहे है-अहिंसा पी सजे जा रहे है. दिमागयोगपरिणामो लेण्या। की मूल व्याख्या को बदल रहे हैं। स्पष्ट है कि रागादिरूप योगस्तु विविधो पि कर्मोदयजन्य एवं ।" विकल्प हुए बिना किसी जीव की प्राण रक्षा के भाव और अन्योग द्वार पर हेमचन्द्रवृत्ति सूत्र १२६ तद्रूप कार्य दोनों ही न हो सकेंगे- . 'उल्टे रागादि जैसे परि- उपर्युक्त सभी लक्षण लेश्या के हैं और कषामोदयान. ग्रह सर्वथा हिंसा ही होगे। (शेष पृ०७ पर) Page #6 -------------------------------------------------------------------------- ________________ शोध प्रबन्ध-सार: पुरुदेव चम्पू का पालोचनात्मक परिशीलन डाल कपूरचन जैन संस्कृत काव्य को गद्य-पद्य और मिश्र इन तीन भागों लोकप्रिय हुई, फलतः लगभग एक सहस्र वर्षों मे विपुल में विभक्त किया गया है। मिश्र रचना शैली के प्राचीनतम चम्पू काव्यो का सृजन हुआ। डा० छविनाथ त्रिपाठी ने उदाहरण वेदों के साथ ही ब्राह्मण ग्रन्थों में पाये जाते है। चम्पू काव्य का आलोचनात्मक एव ऐतिहासिक अध्ययन पालि की जातकथाओ और प्राकृत की 'कुवलयमाला' अथ मे लगभग २५० चम्पू काव्यो की सूची दी है। प्रभति ग्रन्थो में इस शैली के दर्शन होते है । सस्कृत नाटको जैन चम्पू काव्यो मे 'सोमदेव का यशस्तिलक' हरिमें तथा पंचतन्त्र हितोपदेश जैसी रचनाओ में गद्य-पद्य दोनों चन्द्र का 'जीवन्धर' और अहंदास का 'पुरुदेवचम्पू' अत्यन्त का प्रयोग हुआ है। प्रसिद्ध चम्पूकाव्य है। उन्नीसवीं और बीसवी शती मे भी किन्तु यहां गद्य तथा पद्य का अपना विशिष्ट स्थान जैन चम्पूकाव्यो का सृजन हुआ, जिसमे मुनि श्री ज्ञानरहा है । यहां कलात्मक भाग गद्य मे और उसका सार या सागर महाराज का 'दयोदय चम्पू' और श्री परमानन्द उपदेश भाग पद्य मे ग्रथित रहा । जब गद्य तथा पद्य दोनो पाण्डेय का 'महावीर तीर्थकर चम्पू' उल्लेखनीय कृतियां मे ही उत्कृष्टता, प्रौढ़ता और कलात्मकता आने लगी तब हैं। अभी हाल में श्री मूलचन्द शास्त्री ने 'वर्धमान चम्पू' नवगुणानुरागी कवियो ने सम्मिलित प्रौढ़ गद्य और पद्य की रचना की है, जो शीघ्र ही प्रकाशित होकर विद्वत की कसौटी पर अपने आपको परखा, फलतः अनेक कवियों समाज के समक्ष जा रहा है। इनके अतिरिक्त पुण्याश्रवने गद्य की अर्थगरिमा व पद्य की रागमयता मे समन्वित चम्पू', 'भरतेश्वराभ्युदय चम्पू', 'जैनाचार्यविजय चम्पू' गद्य-पद्य मिश्रित काव्यों की रचना की। कालान्तर में यही आदि सुन्दर जैनचम्पू काव्य है। जैनचम्पू काव्यों की इस प्रौढ़ गद्य-पद्यमयी विधा 'चम्पू' नाम से अभिहित हुई। परम्परा में महाकवि अहंदास का नाम अत्यन्त सम्मान सर्वप्रथम दण्डी ने काव्यदर्श में गद्य-पद्यमयी काचित और आदर के साथ लिया जाता है। चम्पूरित्यमिधीयते यह चम्पू की परिभाषा प्रस्तुत की। महाकवि अर्हद्दास की तीन रचनाएं उपलब्ध हैं। दण्डो का समय आलोचको ने सातवी शती स्वीकार किया 'मुनिसुव्रतकाव्य' मे बीसवें तीर्थकर मुनिसुव्रतनाथ का है, जिससे इस अनुमान को पर्याप्त अवकाश मिलता है कि चरित्र चित्रित है, इसमे दस सर्ग है और कथावस्तु उत्तरइससे पूर्व भी चम्पू रचनाए रही होंगी, जो आज भी काल पुराण से ली गई है। स्वय कवि ने इसे 'काव्यरत्न' कहा के गर्त में पड़ी अन्वेषकों की बाट जोह रही है। है। दूसरा काव्य 'भव्यजनकण्ठाभरण' है, जो सचमुच महाकवि हरिचन्द ने लिखा है कि गद्यावली और ही भव्य जीवों द्वारा कंठ मे आभरण रूप से धारण करने पद्यावली दोनों ही, पृथक-पृथक प्रमोद उत्पन्न करती हैं। योग्य है। इसमे दो सो बयालीस पद्य है, जिनमें अहहास फिर दोनों से समन्वित रचना तो बाल्य और तारुण्य से ने देव-शास्त्र-गुरू और सम्यकदर्शन, सम्यक्ज्ञान तथा सम्यकयुक्त कान्सा की भांति असह्लादक होगी, इसमे संशय नही चारित्र का स्वरूप निवद्ध किया है। और हुआ भी यही, दशवी शती से ही यह शैली अत्यन्त अर्हदास का तीसरा काव्य 'पुरुदेवचम्पू' काव्य है। ० रुहेलखड विश्व विद्यालय की पी० एच०डी० उपाधि के लिए स्वीकृत । Page #7 -------------------------------------------------------------------------- ________________ पुष्वेव चम्पू का आलोचनात्मक परिशीलन इसमें प्रथम तीर्थकर वृषभनाथ, आदिनाथ या पुरुदेव का प्रथम परिच्छेद में महाकवि अर्हहास के हरक्तित्व का चरित्र अंकित है। आकलन करते हुए यह निश्चय किया गया है कि वह वेद तीर्थकर वृषभनाथ का चरित्र अनेक जैन पुराणो और पुराणो के अप्रतिम अध्येता थे। वे जन्म पर्यन्त गृहस्थ ही काव्यो में गुंथा हुआ है, प्राकृत, सस्कृत, अपभ्र श और रहे । अपने जीवन के अन्तिम दिनों में वे आशाधर के पास हिन्दी ही नही कन्नड जैसी दक्षिण भारतीय भाषाओं के पहुंचे और उनके 'धर्मामृत से प्रभावित होकर काव्य रचना कवियो ने भी उनके इतिवृत्त को लिखकर अपने आपको में संलग्न हुए। उनका समय आशाधर और अलंकारगौरवान्वित किया है। वैदिक साहित्य में ऋषभदेव का चिन्तामणि के कर्ता अजितसैन के मध्य ठहरता है। अतः उल्लेख बहुचर्चित रहा है और वैदिक परम्परा मे उन्हें अहहास ने आशाधर का उल्लेख बड़े ही सम्मान के साथ आठवां अवतार मानकर वैदिक एवं श्रमण सस्कृतियो के अपनी कृतियो में किया है और अलंकार चिन्तामणि में सह अस्तित्व का सुन्दर उदाहरण प्रस्तुत किया गया है। मुनिसुव्रत काव्य के श्लोक उदाहणस्वरूप प्रस्तुत किये गये ___ मानव जाति के समुन्नयन में जिन महापुरुषो का हैं। अत: इन दोनों के मध्य अहंदास का समय तेरहवीं प्रमुख योगदान रहा है, उनमें तीर्थंकर ऋषभदेव अग्रगण्य शताब्दी का मध्य भाग है। है। वे आद्य कर्मोपदेष्टा और प्रथम तीर्थकर है, जिनकी आगे आलोच्य प्रथ की स्तवकानुसार संक्षिप्त कथावस्तु विचारधारा एवं चिन्तन का मानव-जीवन पर स्थाई प्रभाव प्रस्तुत की गई है। कथावस्तु के मूल श्रोत पर विचारकर पडा है। ऐसे महापुरुष के चरित्र को अपना वर्णन-विषय यह निश्चय किया गया है कि उन्होने जिनसेन कृत आदिबनाने वाला काव्य निश्चय ही उपादेय है। पुराण से पुरुदेवचम्पू की कथावस्तु ग्रहण की है। और पुरुदेवचम्पू के गद्य व पद्य दोनो ही प्राञ्जल तथा प्रौढ उसमे नाम मात्र के परिवर्तन, परिवद्धन किये है। रूप मे रचे गये है, यह कालिदास, हरिचन्द, वाणभट्ट जैसे द्वितीय परिच्छेद मे काव्य-स्वरूप की सामान्य चर्चा महाकवियो की कृतियो से प्रभावित और तुलनीय है। की गई है। काव्य के भेद बताते हुए चम्पू शब्द की व्युइसकी कथावस्तु दस स्तरको मे विभक्त है। आरम्भिक पत्ति दी गई है । विभिन्न चम्पू-परिभाषायें देकर अन्त में तीन स्तवको मे ऋषभदेव के पूर्वभवो का विशद् वर्णन है, कहा गया है कि यद्यपि चम्पू की निष्पक्ष और पूर्ण परिशेष मे ऋषभदेव व उनके पुत्र भरत और बाहुबली का भाषा देना अत्यन्त कठिन कार्य है तथापि 'गद्य पद्य......" चरित्र चित्रित है। इत्यादि डा. त्रिपाठी की परिभाषा को उचित कहा जा ____ इसका कथाभाग अत्यधिक रोचक है, जिस पर अहंद्दास सकता है। आगे चम्पू काव्य की चर्चा कर जनचम्पूकाव्यों की नवनवोन्मेषशालिनी प्रतिभा से सम्पृक्त नई-नई कल्प- की परम्परा का उल्लेख किया गया है तथा यशस्तिलक, नाओं तथा श्लेष, विरोधाभास, परिसंख्या आदि अलकारो जीवन्धर दयोदय तथा महावीर तीर्थकर, वर्धमान, पुण्याश्रव, के पट ने इसके सौन्दर्य को और अधिक वृद्धिंगत कर दिया है। भारत. भरतेश्वराभ्युदय, जैनाचार्यविजय आदि चम्पकाव्यों इतना होने पर भी आधुनिक शोध की दृष्टि से यह का परिचय दिया गया है। ग्रन्थरत्न उपेक्षित ही रहा। इस पर लिखे गये शोधनिबन्धों यद्यपि संख्या की दृष्टि से अत्यल्प ही जैनचम्पूकाव्यों की संख्या भी नगण्य ही है। यतः इस विषय पर शोध का सृजन हुआ, पर गुणवत्ता की दृष्टि से जैनचम्पूकाव्य की महती आवश्यकता स्पष्ट है, अत: मैंने इस ग्रंथ का पीछे नही है। सोमदेव का यशस्तिलक चम्पू काव्यों का आलोचनात्मक रूप से परिशीलन करने का निश्चय किया। मेरु है। जीवनधरचंप, जहां कथातत्व की दृष्टि से अपनी प्रस्तुत शोध-प्रबन्ध को नो परिच्छेदो मे विभक्त किया समानता नही रखता, वहीं पुरुदेवचंपू श्लेष की दृष्टि से गया है, जिनमें साहित्यिक, सांस्कृतिक, राजनैतिक, कथा- अत्यन्त महत्वपूर्ण चंपूकाव्य है। दयोदचंपू आधुनिक शैली त्मक एवं चारित्रात्मक दृष्टि से सर्वांग विश्लेषण प्रस्तुत पर लिखे जाने से स्वतः ही हृदयग्राही बन पड़ा है। महाकिया गया है। परिच्छेदगत सारांश निम्न प्रकार है- वीर तीर्थंकरचंप चौबीस तीर्थकरों का वर्णन करने से Page #8 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ६. वर्ष २, कि० १ निश्चय ही उपादेय है। अन्य चंपू भी महत्वपूर्ण चम्पू काव्य है । तृतीय परिच्छेद में पुरुदेवयंपू का काव्यात्मक अनुशी लन किया गया है। इस दृष्टि से इस काव्य में वर्णित रस, गुण, रीति, छन्द एव अलंकारों का अध्ययन प्रस्तुत है । इस काव्य का अंगीरम शान्त है। आरम्भ के तीन स्तवकों में जगह-जगह संसार की असारता और उस असारता से विभिन्न पात्रो को दीक्षा लेकर वन मे तपस्या करते हुए दिखाया गया है। आगे भी नायक ऋषभदेव को हम संसार की असारता का चिन्तन करके विरक्त होते हुए देखते हैं। अन्यरसों ने श्रीमती मरुदेवी आदि के चित्रण मे शृंगार का, ललितांग के अवसान पर तथा युद्ध आदि में करुण का सैन्य प्रमाण तथा युद्ध मे रौद्र और वीभत्स का सुन्दर परिपाक हुआ है। पुरुदेव का प्रधान रस शान्त होने से उसमे माधुर्य गुण की मधुरता यत्र-तत्र विद्यमान है। साथ ही बच्चदन्त और भरत की दिग्विजय यात्रा-प्रसंगों, भरत बाहुबलियुद्धसन्दर्भों में ओजमयी भाषा भी कम आकर्षित नहीं करती और प्रसाद की प्रासादिकता भी सहृदयों को बलात् आकृष्ट करती है । अर्हद्दास ने रस एवं भाव के अनुसार ही उक्त तीनो गुणो, छन्दो और अलंकारों का प्रयोग किया है। चतुर्थ परिच्छेद में कथातत्व का निरूपण किया गया है । जब कोई घटना या विचार किसी कथानक में बारवार प्रयुक्त होता है तो उसे कथानकरूढि कहा जाता है । पुरुदेवचंपू की कथावस्तु पौराणिक है। अतएव अनेक पौरा 'णिक कथा-रूढ़ियां वहांजलिखित है। अनेक कार्यों के एक साथ उपस्थित होने पर धर्म कार्य को प्रमुखता दिया जाना नष्ट होती आयु, बन्द होते कमल मे भौरे की देखना, सफेद बाल, विलीन हुए बादल को देखकर दीक्षा लेना आदि कथारूढ़िया यहां वर्णित है । कुछ 'प्रकरी' कथायें भी इस काव्य में आई हैं जिनका अलग-अलग विश्लेषण यहां किया - गया है। धार्मिक काव्य होते हुए भी कही कही अर्हद्दास श्रृंगारिकता में कण्ठ निमग्न हो गये है । लोकमंगल, उप- देशात्मकता, अद्भुत तत्वों का समन्वय, कुतूहलवृति और उदात्तीकरण की भावना इस काव्य में दिखाई देती है । पंचम परिच्छेद में पुरुदेवचंपू के पात्रों का तुलनात्मक काले अनुशीलन किया गया गया है। किसी भी महान पुरुष के वर्तमान का सही मूल्यांकन करने के लिए उसकी पृष्ठभूमि को देखना आवश्यक है। इससे हमें यह ज्ञात होता है कि आज के महापुरुष की महत्ता कोई आकस्मिक घटना नही, अपितु जन्म जन्मान्तरों में की गई उसकी साधना का ही परिणाम है। अतः पूर्वभवों का वर्णन उपयोगी है। पुरुदेववधू के सभी प्रमुख पात्रो का अलग-अलग पूर्वभव वर्णन इस परिच्छेद मे किया गया है। ऋषभदेव का मानवीय संस्कृति के विकास मे महत्वपूर्ण योगदान रहा है। उनका व्यक्तित्व इतना विराट है कि वह किसी सम्प्रदाय, जाति, देश अथवा काल की सीमा मे आवद्ध नही किया जा सकता है। प्राकृत भाषा मे 'सूत्रकृतांग', स्थानांग', 'समवायोग', 'जम्बूद्वीपप्रज्ञप्ति' 'जम्बूदीपपत्ति', तिलोयपण्णत्ति, चउपन्नमहापुरिसचरिय आदि ग्रन्थों में तथा महापुराण आदि अपभ्रंश ग्रन्थों में उनका चरित्र वर्णित है । संस्कृत का महापुराण तो ऋषभचरित का आकर ग्रन्थ है | । वैदिक साहित्य में ऋग्वेद के अनेक मन्त्रो में उनकी स्तुति की गई है। लगभग सभी पुराणो मे जताया गया है। कि नाभि के पुत्र ऋषभ और ऋषभ के पुत्र भरत के नाम पर ही इस देश का नाम भारतवर्ष पड़ा। श्रीमद्भागवत के पंचम स्कन्ध मे ऋषभदेव का चरित्र विस्तार से वर्णित है। कन्नड साहित्य के आदिपुराण, जिनराजस्तव त्रिषष्ठिलक्षण महापुराण, भरतेशवैभव आदि ग्रन्थो में ऋषभदेव वर्णित है। ऋषभदेव विषयिक जैन मान्यताओ मे उनके जन्म, वंश, पारिवारिक जीवन, निद्याओं का उपदेश वर्गव्यवस्था प्रवज्या ग्रहण, तपश्चरण, समवसरण, निर्वाण आदि विषयों पर विचार किया गया है । चक्रवर्ती भरत भारतीय इतिहास के प्रतापशाली राजा हैं, जिनके नाम पर इस देश का नाम भारतवर्ष पड़ा। जैन साहित्य मे भरत और बाहुबलि के युद्ध का विस्तृत चित्रण हुआ है। यहां उनके इस युग का तुलनात्मक दृष्टिकोण से विवेचन किया गया है । छठे परिच्छेद में पुरुदेवचपू का सांस्कृतिक विश्लेषण किया गया है। यहां भौगोलिक और सामाजिक दृष्टियों से उपलब्ध सामग्री का विपद विवेचन विवेचित है। Page #9 -------------------------------------------------------------------------- ________________ पुतदेव चम्पू का आलोचनात्मक परिशीलन सप्तम परिच्छेद में राष्ट्रनीति और लोकाभ्युदय का कलाओं का बहुधा उल्लेख हुआ है, पर पुरुदेवचम्पू में विवेचन किया गया है। राजा प्रजा के अनुरंजन के लिए उनकी संख्या निश्चित नही बताई गई है। चित्रकला, नाट्य, तत्पर थे। वे महायशस्वी और स्वाभिमान से परिपूर्ण थे। संगीत-शास्त्र आदि का उल्लेख कर, कहा गया है कि परुदेवचम् मे सापेक्ष राजाओ की स्थिति दष्टिगोचर होती ऋषभदेव ने अन्य पुत्रों को लोकोपयोगी कलाओं का उपहै। ये अपने जीवनकाल में ही पत्र को राज्य-भार सौंप देश दिया। देते हैं । भरत-बाहुबली प्रजानुरजन के लिए सैन्य युद्ध न उत्सवों में वर्षवृद्धिमहोत्सव, अभिषेकोत्सव, राज्याभिकरके परस्पर में ही युद्ध करते है। राज्य का उत्तराधि- कोत्सव आदि उत्सवों तथा जल-क्रीड़ा, बनक्रीड़ा धूलि. कारी ज्येष्ठ पुत्र होता था। अवयस्क बालक को भी राज्य क्रीडा आदि का वर्णन किया है। भार सोप दिया जाता था। राज्य मे मत्रियो का सम्मान नवम परिच्छेद मे उपमहार करते हुए कहा गया है था सेनापति, पुरोहित और दूतो की व्यवस्था थी, प्रजा कि जैनचंपूकाव्यों के विकास मे महाकवि अर्हदास का अव. संतुष्ट थी और सर्वत्र सुख शान्ति थी। दान अनुपेक्षणीय है। अर्हद्दास की कृतियों ने संस्कृत साहित्य ___ आठवें परिच्छेद में कला और मनोरंजन का विवेचन के विपुल भण्डार को नवीन रश्मियों का उपहार दिया है। किया गया है । जैन साहित्य में यद्यपि चौसठ और वहत्तर पाहा (पृ० ४ का शेषांश) रंजित योग प्रवृत्ति से होने वाले प्राण हनन व प्राण रक्षण रूप में स्वीकार करें। यत:-सभी सविकल्प अवस्थानों में जेसे भावों और कार्यों से पूरा मेल खाते हैं । अन्तिम दो रागादि के अंश विद्यमान है-पाप-पुण्य का पूर्ण परिहार लक्षणो मे तो लेश्या को औदयिक भाव बतलाया जाने से तो निर्विकल्प-प्रमादातीत वीतराग अवस्था में ही है, जो यह और भी स्पष्ट हो जाता है कि अहिंसा जैसा औप- जैन धर्म को इष्ट है। शमिक, या क्षायोयशमिक भाव कषाय और योग हम एक निवेदन और कर दें-अपरिग्रह को मूल जैसे औदयिक भावों का कार्य नही हो सकता। जबकि मानकर हमने जो शास्त्रीय तथ्य उजागर किए हैं वे भले कषाय और योग-जन्य प्राण रक्षण जैसे उपक्रम को अहिंसा ही दया, करुणा और दान आदि के आदान-प्रदान के माना जा रहा है और अहिंसा के मूल अप्रमाद (अपरिग्रह) छलावे से यश एवं परिग्रह-अर्जन मे लगे लोगों को पसन्द से नाता तोडा जा रहा है-परिग्रह की बढवारी की जा न आयें-वे इसका विरोध करें, पर, हमे सतोष है कि रही है। प्रबुद्धों ने उन तथ्यो को स्वीकार कर जैन धर्म और जिन___ हा, कदाचित् यदि आचार्य रागादिक के अप्रादुर्भाव वाणी की रक्षा को समर्थन दिया है। हमारे पास समर्थन को अहिंसा का लक्षण घोषित न करते और हिंसा के मे बहुत से पत्र आए हैं, हम सभी का स्वागत करते हैं। लक्षण मे प्रमाद के योग को कारण न मानते मात्र प्राण- यदि कोई समझें और सन्मार्ग पर आयें तो हमें उनका हनन को हिंमा का लक्षण घोषित करते, तो हम ऐसा मान स्वागत करने में भी हर्ष होगा-जिन्होंने परिग्रह की सकते थे कि जैसे मात्र प्राण-हनन हिंसा है वैसे प्राण-रक्षण लालसा में जैन के मूल - अपरिग्रह की उपेक्षा के लिए, भी अहिंसा है। पर, आचार्य ने ऐसा नहीं किया और मिथ्या व प्रच्छन्नरूप से लेश्ण के लक्षण को अहिंसा के सभी पापों मे प्रमाद को प्रमुखता दी। अत. यह आवश्यक लक्षण में फलितकर कु-शील (कुस्वभाव) का परिचय है कि हम पापों के त्याग के पूर्व पापो के कारण भूत दिया--पांचों पापो की वढवारी की और जो अब प्रमाद - परिग्रह का त्याग करे तथा कषाय और योग प्रायश्चिन के सन्मुख हों ; अस्तु, 'सर्वे भवन्तु जैनाः ।' जन्य भाव और कार्यों को शुभ और अशुभ लेश्याओं के वीर सेवा मन्दिर, २१ दरियागंज नई दिल्ली-२ Page #10 -------------------------------------------------------------------------- ________________ गतांक से आगे: अपभ्रश साहित्य की एक अप्रकाशित कृति : पुण्णासवकहा 0 डा. राजाराम जैन, आरा 'पुण्णासवकहा' की आद्य प्रशस्ति के अनुसार महाकवि आश्रयदातारइध ने प्रस्तुत ग्रन्थ भट्टारक कमलकोति की प्रेरणा से उक्त ग्रन्थ प्रशस्ति के अनुसार यह रचना महाकवि लिखा है। वे कहते हैं कि हे कबि रइधू-तुम व्यर्थ में रइधू ने साह नेमदास के आश्रय में रहकर लिखी है । साहू समय क्यो गंवा रहे हो? कवित्व विनोद के साथ ही समय नेमदास के विषय मे कवि ने लिखा है कि उसके पूर्वज व्यतीत करना चाहिए। अत: तुम विशाल 'पुण्णासवकहा' योगिनीपुर के निवासी थे। यह वश साहित्य सेवा को की रचना करो। क्योकि पुण्णाश्रव से ही सुखसिद्धि होती अपना महान् धर्म एव समाज सेवा को अपना पुनीत कर्तव्य है, उसके बिना मनुष्यभव दुर्लभ है। ससार में रहकर समझता रहा है। विद्वानों को ऐसे ही कार्य करना चाहिए जिससे शुभ भावों साह नेमदास के विषय में कवि ने लिखा है कि वह का प्रवर्तन होता रहे । कवि ने लिखा है : अपने समकालीन राजा रुद्रप्रताप चौहान द्वारा सम्मानित एकहि दिखि धम्माएसु दिण्णु । था तथा व्यापार कार्यों मे अग्रसर । उसने हीरा, मोती, भो बुह किं वासरु गमहि सुण्णु ॥ माणिक्य विद्रुम आदि की कई जिन-प्रतिमाओं का निर्माण सकइत्त विणोएँ जाउ कालु । कराकर तथा उनकी प्रतिष्ठा कराकर तीर्थेश गोत्र का वंध पुण्णासउ बिरयहि जणि विसालु ॥ किया था। पुण्य कार्यों से अपनी ऐसी उज्ज्वल महिमा पुण्णासवेण सुहसिद्धि होइ । बनाई थी कि उसके सम्मुख पूर्णमासी के चन्द्रमा की ज्योति ति विणु माणुस भउ विहलु लइ ॥ भी मलिन होती हुई प्रतीत होती थी। उसने अनेक जिनसुहभाउ पवट्ट जेण जेण । भवन बनवाए । बुधजनों के लिए तो वह चिन्तामणि रत्न तं त कायव्वउ इह बुहेण ॥ ही था। उसने अपने व्यवहार से शत्रुओ को भी अपना मित्र पुण्णासव ॥२॥४-७ बना लिया था । कवि ने कहा है :कवि यद्यपि इस कार्य को श्रमसाध्य मानता है, फिर ................"जसमरणिवासु । भी उक्त भद्रारक के आदेश से वह ग्रन्थ रचना में अग्रसर संघाहिव णोमि मिदास ॥ होता है। अग्गेसह णिव वावार कज्जि । उक्त भट्टारक कमलकीति के विषय में मैं अन्यत्र प्रकाश सुमहंत पुरिम पहुरूद्दरज्जि ॥ डाल चुका हूं। अतः यहाँ सक्षेप मे इतना कहना ही पर्याप्त जिबिंब अणेय विसुद्ध वोह । है कि महाकवि रइधू ने इन्हें अपना प्रेरक गुरू माना है णिम्माविवि दुग्गइं पणिरोह ।। और अपनी अन्य रचनाओ-अरिट्टनेमि चरिउ, जसहर सुपइट्ठ कराविवि सुहमणेण । चरिउ प्रभृति ग्रन्थों में भी उनको चर्चा की है । उनका तिच्छेसगोत्तु वंधियउ जेण ॥ समय कई प्रमाणों के आधार पर वि० सं० १५०६ से १५४५ पुणु सुर विमाणुस मुसिहक्खेउ । के मध्य निश्चित होता है। णिय पहकर पिहिया चंदते ॥ Page #11 -------------------------------------------------------------------------- ________________ अपभ्रंश साहित्य की एक मालित कृति : पुण्णासवकहा काराविउ जि जिणणाह भवणु। साह नेमदास के इस प्रकार के आग्रह करने पर कवि मिच्छामय मोहकसाय समणु ।। ग्रन्थ की रचना आरम्भ कर देता है :बहियण चितामणि जसमयं कु। ....."पुण्णासव विरयणि पुण्ण होई। वंदियण विंद थुउ खल असंकु॥ तुव जसु विच्छारमि एच्छ्लोइ ॥ पुण्णासव० १३०६-१२ पुण्णासव०१६।२४ एक बार अवसर पाकर साहू नेमदास ने रइधू से कवि रइधू साहू नेमदास के स्वभाव एवं चरिक से प्रार्थना की कि "हे रइधू कवि तुम मेरे परम हितैषी हो, स इतना अधिक प्रभावित था कि उसने अपने 'पूण्णासवकहा' तुम्हारी जिह्वा पर सरस्वती विराजमान है, तुम्हारे वचना की प्रत्येक सन्धि के अन्त मे विविध छन्द वाले संस्कृत मत का पान करने से मेरे प्राण तृप्त हो जाते हैं। मेरे श्लोको में उसका गुणगान कर उसे आशीर्वाद दिया है। कथन से तुमने मेरे प्रतिष्ठा कार्यों को सम्पन्न कराया है। उन श्लोका एवं पुण्णासवकहा की विस्तृत आदि एवं अन्त की प्रशस्ति को देखने से यह विदित होता है कि साह नेमतुम्हारे आदेश से मैंने याचक जनो को यथेच्छ दान दिया दास पद्मावती पुरवाल जाति के थे। उनके पूर्वज योगिनी. है। तुम्हारे ही आदेश से मैंने जिन बिहार करवाया है। पुर छोड़कर कालिन्दी के तीर पर बसे हुए चन्द्रबाड नामक अब मेरी एक और इच्छा है कि तुम मेरे निमित्त से 'पुण्णा नगर में आकर बस गये थे। सवकहा' नामक ग्रन्थ की रचना कर मुझे अनुग्रहीत करो रइधु ने नेमदास की छह पीढ़ियों तक का विस्तृत जिससे मैं अपने जीवन को शाश्वत सुख-प्राप्ति की ओर वर्णन किया है और प्रसंगवश कई महत्वपूर्ण सूचनाएं दी मोड़ सकें।" यथा हैं । इनमें से दो सूचनाएँ बड़ी ही रोचक हैं। प्रथम तो भो रइधूव्वुह वढि पमोय । यह है कि नेमदास के पुत्र ऋषिराम को उस समय पुत्ररत्न तुम्हहं पसाएं मह विणि लोय ॥ की उपलब्धि हुई जब वे स्वयं निर्मित जिनविम्ब की संसिद्ध जाय तुहु परम मित्तु। प्रतिष्ठा के समय उस पर तिलक निकाल रहे थे। अतः तउ वयणामिय पाणेण त्तिषु ॥ उसी उपलक्ष्य मे साह ने अपने उम नवोत्पन्न पोते का नाम पइकिय पइट्ठ महु सुहमणेण । 'तिलकू' रख दिया । यथा :___जाचय पूरिय धण कंचणेण ॥ जसु जम्थागमि जिणवर बिंवहं।। उरणु तुव उवएसें जिणविहारु । तिलव पदिण्णउ दुरिय-णिसुमहं ॥ ___ कारा विउ मई दुरिया वहारू । कुलहु तिलउ तिलकू ति वुत्तउ । ............... || पइहोंति वंछिय रायल पुण्णु । पुण्णासव०१३।११।१३-१४ एक्कज्जि चिंता वट्टइ पसण्ण ॥ दूसरी मनोरञ्जक घटना यह है कि साहू नेमदास के तुह सकइत्तण फल कामधेणु । दूसरे भाई साधारण को जब वीरदास नामक द्वितीय पुत्र___ महु साणु रायमाणु पुथु अरेण ॥ रत्न की उपलब्धि हुई तब उन्होने प्रसन्नता पूर्वक रइधू पइ विरइयाइं णाणा पुराण । द्वारा विरचित 'पुणणासवकहा' को हाथी पर प्रतिष्ठित सिद्धतायम जुत्तिए पहाण ॥ करके बड़े ही समारोह के साथ नगर में घुमाया था। पुण्णासउ हउ वयणाउं तुझु । जसु जम्मणि पुण्णास उसत्यो । सो हंउ वंछमि इयचित मझु ॥ हत्थि चडिउ पयडिउ परमत्थ ।। सुकयतें थप्पहि मज्झुणामु । पुण्णासव०१३।१२।२ जिह होइ अयलु सास उ सधामु॥ कवि द्वारा उक्त उल्लेख काफी महत्वपूर्ण है। इससे पुण्णासव० १।६।८-१६ यह विदित होता है कि रइधू के समय में चन्द्रवाइ नगर Page #12 -------------------------------------------------------------------------- ________________ १०, १५, कि०४ मनेकान्त में लोग साहित्यकारों एवं साहित्य कृतियों को सर्वोपरि रइधु की साहित्य-साधना का प्रमुख केन्द्र गोपाचल समझते थे तथा साहित्य-सम्मान समाज एवं राज्य का था। वहां के तोमरवंशी राजा डूंगरसिंह एवं उनके पुत्र सर्वश्रेष्ठ उत्सव माना जाता था। राजा कीतिसिंह ने उनकी कवित्व शक्ति से प्रभावित होकर ___ अभी तक इसी प्रकार के दो सम्मान मुझे और पढ़ने राज्य में उन्हें काफी सम्मान दिया था तथा उनकी इच्छाको मिले हैं । दक्षिण भारत में कन्नड कवि विजयण्ण कृत नुसार पिता-पुत्र दोनों ने ही गोपाचल-दुर्ग में लगभग तेतीस 'द्वादशानुप्रेक्षा' नामक ग्रन्थ की समाप्ति पर कवि एवं वर्षों तक लगातार जैनमूर्तियों का निर्माण कराया था। उसकी कृति का गाजे-बाजे के साथ हाथी पर शानदार उत्तर-भारत की सर्वोन्नत ५७ फीट ऊंची आदिनाथ भगजुलस निकालकर उसका सार्वजनिक सम्मान किया गया वान की प्रतिमा की प्राण प्रतिष्ठा भी गोपाचल दुर्ग में था। इसी प्रकार गोपाचल के कमलसिंह संघवी ने भी उन्ही के हाथों सम्पन्न हुई थी। स्वयं के लिए लिखवाये हुए 'सम्मतगुणणिहाणकव्व' एवं रइध ने लगभग तीस ग्रन्थो की रचना की है जिसमे उसके रचयिता महाकवि रइधू को उक्त रचना की परि- से २२ रचनाए अभी तक उपलब्ध हो चुकी है। उनमें से समाप्ति होते ही हाथी पर विराजमान कर गाजे-बाजे के १६ रचनाएं अपभ्रश में, दो रचनाएँ प्राकृत मे तथा एक साथ कवि एवं उसके काव्य की नगर परिक्रमा कराई थी। रचना हिन्दी में है। कवि की अधिकांश रचनाएँ विशाल मध्यकालीन सामाजिक स्थिति के अध्ययन में इस प्रकार हैं। उसकी मेहेसरचरिउ, रिट्ठणेमिचरिउ, जिवधरचरिउ के उल्लेख अपना विशेष महत्व रखते है। मे ३-३ सौ से भी अधिक कड़वक है । अन्य अपभ्रश रच नाएँ १०० से लेकर २५० कड़वको मे है। इसी प्रकार समकालीन राजा इनकी एक प्राकृत रचना सिद्धन्तत्थसार लगभग २००० कवि र इध ने अपने आश्रयदाता को राजा प्रतापरुद्र गाथा प्रमाण है। दो रचनाएँ अत्यन्त लघु है, जिनमे से द्वारा सम्मानित कहा है। यह प्रतापरुद्र चौहानबंशी नरेश एक मे कुल १८ पद्य है तथा दूसरी हिन्दी रचना 'बारारामचन्द्र का पुत्र था। वह जैन धर्म एवं साहित्य का बड़ा भावना' है, जिसकी पद्यसख्या ३७ है । प्रेमी था तथा उसने अपने मन्त्रिमण्डल मे कई जैनो को __ कवि रइधू का यह साहित्य उत्तर मध्यकालीन भाषा मन्त्रिपद प्रदान किया था। इस विषय पर मैं अन्यत्र प्रकाश साहित्य, इतिहास एवं संस्कृत आदि की दृष्टि से अपना डाल चुका हूं। कई सदस्यो के आधार पर राजा रुद्रप्रताप विशेष महत्व रखता है। उसके प्रकाशन से कई नवीन का समय वि० स० १४६८ से १५२५ के मध्य ठहरता है। तथ्य साहित्य जगत मे अवतरित होगे। प्रसन्नता का विषय ग्रन्थ त्र्ता रइधू है कि प्राकृत एव अपभ्रंश के वरिष्ठ महारथी विद्वान प्रो० प्रस्तुत ग्रन्थ-'पुण्ण सवक हा' के कर्ता महाकवि रइध डा० एच० एल० जैन एव प्रो० डा० ए० एन० उपाध्ये के सम्बन्ध मे अन्यत्र काफी प्रकाश डाल चुका हूं। अतः का ध्यान इस साहित्य की ओर आकषित हुआ है और उनकी प्रेरणा उन्ही के निर्देशन में समग्र रइध-साहित्य रइध यहाँ उसके विषय में विस्तृत चर्चा करना पुनरुक्ति मात्र ही होगी। फिर भी सक्षेप मे इतनी जानकारी आवश्यक ग्रन्थावली के १५ भागो मे यथाशीघ्र प्रकाशित होने जा है कि वे गोपाचल या उसके आस-पास के ही निवासी थे। रहा है । उनकी जाति पद्मावती परवाल थी। सरस्वती देवी ने कई अन्तर्बाह्य साक्ष्यों के आधार पर महाकवि रइधू उन्हे स्वप्न में कवि बनने का आदेश दिया था अतः उन्होने का समय वि० सं० १४४० से १५३० के मध्य सिद्ध होता इस दिशा में पर्याप्त अभ्यास किया और इस प्रकार सफल है। महाजन टोली नं० २ महाकवि बन गये। आरा (बिहार) Page #13 -------------------------------------------------------------------------- ________________ गतांक से आग: पं० शिरोमणिदास कृत : 'धर्मसार सतसई' 0 श्री कुन्दनलाल जैन प्रिन्सिपल अथ एकादश प्रतिमा वर्णनविषय सकल सौं होइ उदास, सयम सौ राखो शुभ आस । उदय प्रतिज्ञा दिन दिन काम, प्रतिमा कहिए याको नाम ॥१०४।। दोहा -आठ मूल गुण पालिके, व्यसन त्यागि जिनमानि । मल पच्चीस विवजि के, दर्शन प्रतिमा जानि ॥१०५ पांच अणुव्रत पालिक, तीन गुणव्रत धारि । चउ शिक्षाव्रत मनधरी, व्रत प्रतिमा यह सार ।।१०६ सामायिक तिहुंकाल करि, नियम सौ दृढ़चित्त । सामायिक प्रतिमा कही, यही जान तुम मित्र ॥१०७ दो आठ दो चौदस, प्रोषध कर उत्कृष्ट । प्रोषध प्रतिमा यह कही, कहे वचन जिन इष्ट ॥१०८ सचित्त वस्तु सब त्यागि के, पीव प्रासुक नीर । सचित्त त्याग प्रतिमा कही, छोड हरि तजु धीर ॥१०६ चौपाई-दोय दंड दिन ऊगै जोली, अरु पुनि होय रहै दिन तोलो। तासों दिन कहिए प्रमाण, भोजन स्नान कर विधि पान ॥११० यात रात अवर तुम जान, भोजन सकल तजो हित मान । सूक्ष्म थूल मरै जीव जहां, मूढ़ न जाने हिंसा तहां ॥१११ रात को नीर रुधिर सम होय, अन्न मांस सम जानो लोय । भूत पिशाच जे रातें चलें, जहं तहं आनि इकट्ठे मिलें ।।११२ जेंवत (खाते हुए) लोग देख ठहराय, अन्न अपावन करै छिन मांहि । अशुचि वस्तु लै डारें घनी, नीच स्वभाव निशाचर जनी ॥१:३ पतग अनेक परें अकुनाइ, सूक्ष्म जीव को रहै बढ़ाय । यातें पाप अवर नही कोय, महा पाप तुम जानो लोय ॥११४ जहां वस्तु देखी नही जाय, सो पुन रात कही समुझाय । रसोई रात को त्याग व्रती, यात दोष न लागै रति (रत्ती) ॥११५ दिवस पुनि छोडे निज नारि ___सो निशि प्रतिमा कही सुधारि । इह विधि रात्रि भक्ति जो तज, षष्ठम प्रतिमा तासौं भजे ॥११६ निज पर नारी तर्ज जव व्रती, नवधा शील धरै शुभ मती। सुगन्ध तेल भूषण शृगार, मनोज्ञ वस्तु तजि मिष्ट अहार ॥११७ तुच्छ अहार करै तजि भोग, प्रत्याख्यान लेइ नित जोग । ब्रह्मचर्य यह प्रतिमा कही, जो पाले सो श्रावक सही ॥११८ हिंसा कर्म सकल आरम्भ, विवाह वणिज सब छोड़े दंभ । काट नखन नही अग्नि विराधे, वस्त्र धोय नही आयुध वांध ॥११॥ पशु जीव राख न मन्दिर रच, अस्त्र न नित्य नही तिलकहि रच॥ Page #14 -------------------------------------------------------------------------- ________________ १२, वर्ष ३० कि० ४ पत्र फूल फल लेय न हाथ, वाहन चड़े न चाहे साथ ।।१२० जंत्र मंत्र नही सार्धं घने, वैद्यक ज्योतिष धातु सब मर्ने । यह विधि क्रिया भव्य ज आठवीं प्रतिमा तासौ पलै ।।१२१ दश विधि उपधा बाह्य जु छाड़, भोग उपभोग तजि इन्द्रियन डाडे । कटि कोपीन वस्त्र इक धर नवमी प्रतिमा जिनवर कद्दू ।। १२२ विकया चार तजै उपदेश, हारि जीति मन धरै न लेश । हिंसा कर्म वचन नही भासै, क्षमा भाव सबही सो राखे ।।१२३ मोह काम तजि मान निवारि, क्रोध, लोभ, माया, मद जारि इह विधि क्रिया च गुणवत, अनेकान्तं प्रतिमा दशमी लहे तुरन्त ।।१२४ माटी काठ को पात्र जु लोइ, शौच हेतु पुनि राखे सोइ । पीछी जीव दया हित लेइ, दृष्टि देखु धरनी पगु देइ ।। १२५ कटि कोपीन लुचि विधि पूरी, तजि ग्रह वास तपस्या सूरो पाणि पात्र भोजन शुभ करें, पच घरा फिर नियामा घरं ।। १२६ अस्थि चर्म जीव वध जो देखे, मांस रुधिररी दुर्गंधा पेखें । प्रत्याख्यान क्षीण होय तहां, अंतराय पुनि मानें जहां ॥१२७ इह विधि क्रिया चले आचार, सो एकादश प्रतिमा धार ये प्रतिमा सक्षेप वखानि, कहें शिरोमणि सुनि जिनवर वाणी ।। १२८ षट् पनिमा लौं होइ जघन्य, सात, आठ मध्यम गन्य | प्रतिमा दशमी ग्यारहमी जानि, उत्तम श्रावक कहौ बखानि ॥ १२६ ॥ इति एकादश प्रतिमा ॥ अथ पात्र वर्णन - प्रथम पात्र पुनि दान विचारी, पुनि विधि कही सुनो हितकारी । यथाख्यात चारिण को घारी, सो मुनि महापात्र गुणधारी ॥१३० अभ्यंतर वाहिज (बाह्य) तप शुद्ध, बनवासी तप चारी बुद्ध वीस चार उपधी को त्यागी, देह भोग संसार विरागी ॥१३१ अष्टावीस मूल गुण पाले, सहैं परीसह चित्त न चाले । छटै सातै गुणथाने रहे, उत्कृष्ट पात्र श्री जिनवर कहै ॥ १३२ एकादश प्रतिमा जु कही, श्रावक पाले मन वच सही । पंचम गुण स्थान च गुणवत मध्यम पात्र सो होय तुरन्त ।।१३३ दया क्रिया नही पालै रंच, इन्द्रिय मन पुनि करै न खंच । है केवल दृढ़ता जिनवाणी, श्रद्धा भक्ति करे गुण जानी ॥१३४ मिथ्यात्व सकल छोड़े निज हेतु, समकित गुण सौ घर सुचेत । चढ़ि चौथो गुण थाने धीर, जघन्य पात्र सो जानो बीर ॥१३५ समकित भेद न जाने जो लौं, कोटिक व्रत तप करइ जु बंध मोक्ष को भेद न पावे, सो कुपात्र यह तुरत कहावै ॥ १३६ व्रत आचार कछु नहीं करें, समकित भाव न मन में धरं । महा मिथ्यात्वी विषयनि लीन, तोली । तासी अपात्र कहाँ यह पीन्ह ॥ १३७ ॥ इति पात्र वर्णन ॥ Page #15 -------------------------------------------------------------------------- ________________ पं० शिरोमनिवास . धर्मसार सतसई अथ दान गुण दोष वर्णन-- ज्ञान दान दीजे शुभ सार, दोहा-वण पंचहु त्यागि के, भूषण पचह वास । उत्तम मति होय जातें सार । गुण सात हूं सुनि दान के, नव विधि पुण्य प्रकास ॥१३८ केवल ज्ञान लहै जग पूजा, अप दूषण पुनि सो सिद्ध होय पद दूजा ॥१४७ विलम्ब विमुख अप्रिय वचन, आदर चित्त न होय । औषधि दान देय जो ज्ञानी, देकरि पश्चाताप करि, दूषण पचहु सोय ॥१३६ नीरोग देह सो पावहिं प्राणी। अय भूषण दीरघ आयु मिले शुभ काय, आनंद आदर प्रिय वचन, जनम सफल निज मानि । कीरति है तिहुं जग में छाय ॥१४८ निर्मल भाव जु अति करै, भूषण पंचहु जानि ।।१४० अभय दान सब जीवनि देय, अथ गुण जातें इन्द्र चक्री पद लेय । श्रद्धा ज्ञान अलोभता, दया क्षमा निज शक्ति । बहुत भोग भुगतै सुख पाय, दाता गुण ये सप्त कहि, करै भाव सौं भक्ति ॥१४१ पुनि सो होय मुकति पति राय ॥१४९ अथ नव प्रकार पुण्य सूकर नौरा बांदर वाय, चौपाई-पात्रहिं पड़गाहै कर जोडि, कुरजी वए बहु दुखदाय । चऊ आसन जु धरै समोरि । दान भाव जो मन में भयो, चरण धोय बंद तसु पाय, ___ छिन में भोग भूमि पद लियो ॥१५० पुनि सो विधि सौ पूज कराय । १४२ दोहा-जो नर उत्तम भाव सौ, पात्र दान शुभ देय । मन वच काय रसोई शुद्ध, सो महिमा को गनि सके, गणधर आप कहेय ॥१५१ नव विधि पुण्य कहो सुनि बुद्ध । चौपाई-उत्तम पात्र त्याग फल जानि, पुनि सुनि मल चउदह दुखदाई, तद्भव मोक्ष होइ सुख खानि । ए पुनि दान न दीजे भाई ॥१४३ के फल भोग भूमि मे लहै, अथ चउदह मल वर्णन तीन पल्ल की आयु जु कहै ॥१५२ तीन कोस देह ऊंची होय, कंद मूल फल हरित जु होय, महा सुगध मल वजित सोय । पान फूल बहुबीजा सोय। देह दीप्ति दीसै प्रकाश, मांस रुधिर जो सगति भयो, रोम, चाम, जीव वध तह छयो ॥१४४ ___ चन्द्र सूर्य तहं करै न बास ॥१५३ ग्रीषम, वर्षा, शीतु न जहां, छांउहः स्वाद फफूडा लग, साम्य काल इक दीसै तहां । होइ दुगंध बहुत दिन पगे। ठाकुर दास भाव नहीं जोग, ए चउहह मल वजित होय, एक समान भुगते सुख भोग ॥१५४ निर्मल दान कहावै सोय ॥१४५ ईति भीति चिंता नहीं शोक, अपादान और फल वर्णन जरा, रुजा, भव दोष न लोक । बाहार दाम दीजै शुभ पोष, क्रोध लोभ माया मव नहीं, होय ऋद्धि पुनि छोटे वोष । पाप पुण्य नहीं जाने वहीं ॥११५ भव भव सुख मिले अति धन, दशविधि कल्पवृक्ष सुख देय, निर्मल देर सुभग युति बने ॥१४६ जुगल रूप धरि बहु सुख लेय। Page #16 -------------------------------------------------------------------------- ________________ १४, वर्ष ३६, कि० fiet तीन दिवस जब बीतें जबहीं, पुंगी (सुपारी) समान आहार ले तवही ।। १५६ आलस निद्रा श्रम नही खेद, रात दिवस दीसे नही भेद । मध्यम पात्र दान फल कहे, मध्यम भोग भूमि सुख लहै ।। १५७ आयु पल्ल होय भुगते जहां, कोस टोय देह है उन्नत तहां । अवर भोग सब इह विधि सार, भारज भुगते सुख अपार ॥१४८ जघन्य पात्र दान फल जोग, पावहि जघन्य भूमि के भोग एक पहल तहं आयु जु होय, एक कोस तनु जानो सोय ।।१५९ भाजन भूख न वस्त्र अहार, मनवांछित फल भुगतं सार । इह विधि आयु सब पूरी करें, पुण्य तें देव लोक पद धरं ।। १६० ॥ इति तीन पात्रदान फल वर्णन ॥ अथ कुपान दान फल वर्णन नीच जाति जो तनु ल 1 कुपात्र दान फल तासी कहै । हाथी घोड़े दासी दास, -- देश कोस बहू सुख मे वास ।।१६१ करहि पाप नर अति सुख पाय, नीच स्वभाव न छांडे जाय । करहि विनोद रंग रति मान, अनेकान्त षट् ऋतु सुख भुगतं चित तानि ॥१६२ जे तियंच सुखनि में लीन, कुपात्र दान फल जानो प्रवीन । अपने स्वारय पहि सतावै, पुन ते मर दुर्गति दुख पावे ।।१६३ ॥ इति कुपात्र दान फल वर्णन ॥ अथ अपात्र वान फल वर्णन सर्पहि दूध पियावहि रूप, विष को करहिं न जानहि मूढ़ त्यों अपात्र दान दुख देय, दाता भवभव दुर्गति लेय ॥१६४ ऊसर बरसे फल नहीं होय, पायर नाव तिरे नहीं कोय । दुर्जन संगति गुण नहीं नहे, विषयी पोख न धर्महि लहै ।। १६५ दोहा - छिपनी केला सर्प मुख, स्वाति बूंद जल पाय । मोती शुभ कर्पूर पुनि विष उपजे दुखदाय ।।१६६ सोरठा - जल बरसे अति घोर, भूमि पर सब में जगं । जहं जैसो गुण जोर, तह तेसो फल सो लहै ॥ १६७ अंधकूप धन डारिए, हु भलो करि जानि जे । अपात्र दान मति वारि, जिनवर सीख जु मानिजे ; । १६८ दोहा - कुदान कबहु न दीजिए, दिए पाप अति होय । दुर्गति में सशय नही, भवभव भटकै सोय ॥१६९ ।। इति अपात्र दान फल वर्णन ॥ अथ जल गालन क्रिया-चौपाई सात लाख जल योनि भए, अरु अनत त्रस तामे भए । स की दया जानि जल गालि, यह आचार कर व्रत पालि ।।१७० दीरघ हस्त सवा के जानि, पनहा (अर्ज) एक हस्त के मान नूतन वस्त्र पुनि दूनो करें, इह विधि गानि धर्म व्योपरे ॥ १७१ दोय दण्ड जल गालो रहे, पुनि सो अनंत राशि अति लहै । जब जब जल लीजं निज काम, तव तब जल छानो निज धाम ॥१७२ जो जल छानि छानि घट धरो; पुनि सो जल, जल में लं करो । एक बूंद जो धरनी परं, अनंतराशि जीव छिन में मरं ॥ १७३ सोरठा - ढीमर पारिधि जानि, जुग जुग पाप जु जे किए। इत उत एक प्रमान अनगाल्यौ बूंदक पिये ॥१७४ चौपाई - याम युगल प्रासुक जल रहै; अष्ट प्रहर तासी (तो) निर्वहै । Page #17 -------------------------------------------------------------------------- ________________ पं० शिरोमणिरास कृत 'धर्मसार सतसई' इतनी वेरा (ला) उलंघे जबी, पर दोष नही भास रंच, सन्मूर्छन जीव उपज तबही ॥१७५ जो पुनि देखे कर न खंच । दोहा-वेरा(ला) अधिक न रखिए, गाल दोष न होय। उपगृहन यह अंग कहावै, डार तें हिंसा बढ़े सु बेरा (ला) राखो सोय ॥१७६ पंचम गुण दर्शन को पावै ॥१८४ चौपाई-अनगाले जल स्नान जु कीजै, तप व्रत किया चलत जो देख, होय पाप पुनि धर्महि छीज। महिमा का व्रत को पोखे । उत्तम क्रिया तेही की सार, धीरज देकरि कर सहाय, जो जल गाले विधि सौ ढार ॥१७७ स्थितीकरण यह अंगजु आय ॥१८५ सोरठा-जो नर उत्तम होय जो, जल गाल युक्ति सौं। धर्मवंत व्रत तप जप लीन, सांची दया जु सोय, जिनवर कही सु उक्ति सौ ॥१७८ ___ कम जोग ते भयो जु छीन । ॥ इति जल गालन क्रिया वर्णन ।। ताको सहाय करै गुणवंत, यह वात्सल्य अंग शुभ संत ॥१८६ अथ अंथऊ (सध्या भोजन) क्रिया वर्णन जिनवर धर्म जातै शुभ चल, दोहा-जो नर अंथऊ पाल ही, क्रिया जानि पुनि सोय । महिमा करि मिथ्यात्वहिं गले । सो विधि प्रतिमा मे कही फिर वर्णन नही होय ।।१७६ बहुत हर्ष सौं करहि करावे, ॥ इति अंथऊ क्रिया वर्णन ।। यह प्रभावना अंग कहावै ॥१८७ अथ रत्नत्रय क्रिया वर्णन ये आठहु गुण दर्शन जानो, सत्य जिनेश्वर वाणी माने, पुनि आठ ज्ञान के मानौ। हेयाहेय सुलक्षण जाने । तेरह अंग चारित्र गुण वास, मिथ्या मारग छोड़े सग, यह रत्नत्रय भव दुख नाश ।।१८८ नि शकित यह जानहु अंग ॥१८० ॥ इति रत्नत्रय क्रिया वर्णन ।। व्रत नप जाप पुण्य बहु कियो, ये वेपन क्रिया अनुराग, तीरथ यज्ञ सु दान जु दियो। जो पाले उत्तम बड़भाग । ताको फल बांछ नही धीर, षोडश स्वर्ग इन्द्रपद धरै, सो निःकाछित जानहु वीर ॥१८१ पुनि सो मुक्ति रमणी को वरं ॥१८ विद्या ज्ञान उदो सब जानि, दोहा-सकल सभा मन हर्षियो, सनि गणधर के वैन । साधु शरीर न मानौ ग्लानि । श्रेणिक सुख मन अति भयो, सुधरो धर्म दृढ़ जैन ॥१६० तृतीय अंग कहिए सुख धाम, भव भव जिन शासन मिल, सकल कीर्ति मुनिदेय । निविचिकित्सा याको नाम ॥१८१ पंडित शिरोमणि दास कौं, दीजो जिनकी सेव ॥१९॥ देव शास्त्र गुरु लक्षण जोइ, गुण दोष न पहिचान सोइ । इति श्री धर्मसार ग्रथे भट्टारक श्री सकलकीर्ति उपतीन मूढ़ त्याग सुख लहै, देशात पंडित शिरोमणि विरचिते पन क्रिया वर्णनो नाम अग अमूढ़ दृष्टि यह कहै ॥१८३ तृतीय संधिः समाप्तः । Page #18 -------------------------------------------------------------------------- ________________ न जाने किस चीज की तलाश में, वर्षों से भटक रही हूं मैं । अनेक युगों से, अनेक भवों मे, जी और मर रही हूं मैं । अक्सर सोचती, यह कुछ और नहीं, केवल ज्ञान-पिपासा है; और मैं स्वय को, गागर में ज्ञान सागर की, अथाह जल - राशि भरे हुए, भारी-भरकम ग्रन्थों में डुबो देती । किन्तु वर्षों के अध्ययन के बाद भी, स्वयं को वहीं का वहीं खड़ा पाती । बल्कि महसूस करती, कि मेरी तलाश कुछ और बढ़ गई है । तब ज्ञान को छोड़, मैं भक्ति का मार्ग अपनाती ; न जानें कितने, तीर्थों की खाक छानती । किन्तु वर्षों की यात्रा के बाद भी, जहां से चली थी, वहीं पहुंच जाती । फिर वहीं महसूस करती, पाती कि तलाश कुछ और बढ़ गई है। 'कस्तूरी मृग' डा० (कुमारी) सबिता एक दिन, अपनी इसी पराजय पर, ग्लानि और अवसाद में डूबी, पद्मासन में बैठी, अर्ध उन्मीलित नेत्रों से, पर से उदासीन हो, निज में झाँक रही थी, कि अचानक, न जाने कहां से, हवा का एक तीव्र झोका आया, और अपने साथ समस्त विषाद को बहा ले गया । तभी सहसा, भीतर से झिलमिलाई, चिर आनन्द, चिर स्वतन्त्र, आत्म की एक किरण । तब मैंने जाना, जिसकी तलाश में, युगों से भटक रही हूं, ८४ लाख योनियो मे, जी और मर रही हूं, वह तो कस्तूरी मृग की भाँति, मेरे ही अन्तर मे, विद्यमान है । ७/३५, दरियागंज, नई दिल्ली -२ Page #19 -------------------------------------------------------------------------- ________________ जैन विद्याओं में शोध : एक सर्वेक्षण 0डानन्दलाल जंग यह माना जाता है कि जैनधर्म प्रागैतिहासिक द्रविड़ स्वतंत्ररूप से विचारण अविरत रहती, तो यह सम्भव है संस्कृति का प्रतीक है। इसके सिद्धान्त मानव के प्रारंभिक कि पश्चिम ने जो विचारों की श्रृंखला सोलहवीं सदी के शान व विचारधारा को निरूपित करते हैं। इसके विषय बाद प्रस्तुत की है, वे दसवीं सदी तक ही विकसित हो चुके में पूर्व और पश्चिम के विद्वानों में पर्याप्त मतभेद रहा है होते और भारत की बौद्धिक गरिमा उत्कृष्ट बनी पर अब स्थिति स्पष्ट हो गई है। अब इसे अन्य धर्मों से रहती। समुचित संप्रसारण से विश्व की विचारधारा में पृथक एवं स्वतंत्र माना जाता है। यह महावीर से हजारों आज से काफी प्रगति होती। वर्ष पूर्व (कृष्ण-युग) तक स्वीकृत हो चुका है। इसका यह प्रसन्नता की बात है कि बीसवीं सदी में पूर्वी अध्ययन भारत के बहुमुखी विकास को समग्ररूप में और पश्चिमी विद्वानों का ध्यान जैन विद्याओं में वणित समझने में सहायक है। इसीलिये विभिन्न विश्वविद्यालयों अध्यात्मेतर विषयों की ओर भी गया है। वे इसे के अनेक विभागों में इसका सम्मिलित अथवा स्वतन्त्ररूप तुलनात्मक दृष्टिकोण से भी उद्घाटित कर रहे हैं। इससे से अध्ययन-अध्यापन निरन्तर बढ़ रहा है। इस दिशा में जैन विद्याओ के भारतीय संस्कृति, कला, साहित्य, अनेक भारतेतर देश भी आगे आ रहे है। इसके महत्व इतिहास एव ज्ञान-विज्ञान के क्षेत्र में किये गये योगदान के को दृष्टि में रखते हुए अब अनेक स्थानो पर जैन विद्या महत्त्वपूर्ण पहलुओं ने विश्व के अनेक विद्वानों का ध्यान नाम से नये विभाग खोले जा रहे है जहां इससे संबंधित आकृष्ट किया है। इससे अनुसन्धान एवं ज्ञानवर्धन के नये सामान्य एवं तुलनात्मक अनुसंधान भी किये जाने लगे हैं। क्षितिज उभरे हैं। इससे जैन विद्याओं का महत्व बढ़ा है। बौद्धों की भाषा पालिके समान जैन वाङ्मय की प्रमुख यही क रण है कि जैन विद्याओं के शोधकर्ताओं में जैनेतरों भाषा प्राकृत है। इस भाषा के नाम से भी नये विभाग की सस्था दो-तिहाई तक पहुंच गई है। प्रस्तुत लेख को चालू हो रहे है। इससे एक लाभ यह हुआ है कि जैन उद्देश्य इस क्षेत्र की अनुसन्धानात्मक प्रवृत्ति का विश्लेषणाविद्याओ के अन्तर्गत भाषा-वैज्ञानिक अध्ययन-अनुसन्धान त्मक अध्ययन प्रस्तुत करता है। भी चालू हो गया है। अनुसंधान के रूप - अध्ययन-अध्यापन और अनुसंधान का अन्योन्याश्रय अनुसंधान के मुख्यतः दो रूप हैं- एक वह जो किसी संबंध है। ये दोनो पत्रिकायें एक-दूसरे के विकास तथा उपाधि हेतु किया जाये या जिस पर उपाधि मिल गई ज्ञान के नये क्षितिजो के उद्धाटन में सहायक है। आगम हो। दूसरे रूप में वह अनुसधान है जो उपाधि-निरपेक्ष प्रामाण्य और सर्वज्ञता की धारणाओ के कारण भारत मे एवं समय निरपेक्ष भी हो। प्रथम रूप अनुसंधान-विधा का आत्मानुसंधान की जो भी प्रगति रही हो, लेकिन एक प्रशिक्षणात्मक अनुभव है। इसमें शोधप्रक्रिया के व्यवहारोपयोगी विद्याओं के प्रति माध्यस्थभाव ही दृष्टि- विविध चरणो-विषय चुनाव, प्रस्तुतीकरण या प्रयोगविधि गोचर होता है । इसीलिये इन विषयों का विकास अवरुद्ध- एव समालोचनात्मक विश्लेषण का अभ्यास किया जाता लगता है। इस लेखक तथा अन्य विद्वानों ने जैन ग्रन्थो में है। इस प्रक्रिया में अध्ययनशीलता, मनन एव सार्थक वणित अध्यात्मेतर विषयो के अध्ययन से यह निष्कर्ष पाया लेखन की प्रवृत्ति विकसित होती है। इस रूप में विषय है कि यदि अकलकोत्तर सदियों में भी इन विषयो पर वस्तु एवं ज्ञान-गरिमा का निखार होता है। वर्तमान यग Page #20 -------------------------------------------------------------------------- ________________ १५ वर्ष १८०१ में इसी रूप को उत्तम माना जाता है। यही कारण है कि प्रायः पी०एच०डी० प्राप्त विद्वान् अपने उपाधि-निरपेक्ष water को मान्यता देते प्रतीत नहीं होते । 'पडित परम्परा के योगदान' पर आयोजित एक संगोष्ठी में यह प्रवृत्ति परिलक्षित हुई थी। सम्भवत: इसीकारण, जब भी शोधकार्य का समाकलन होता है, तब उपाधिपरक शोध का ही विवरण मिलता है, उपाधि निरपेक्ष शोध या शोध कर्त्ताओं के अनुसंधान क्षेत्रों या महत्वपूर्ण कृतियों का सामान्य निर्देश तक नहीं किया जाता। यह प्रवृत्ति बहुत चिकर नहीं प्रतीत होती और न ही यह शोध का पूर्ण विवरण हो प्रस्तुत कर पाती है। अनेकान्त भारत में उपाधि निरपेक्ष शोध से हो 'जैन विद्यायें' पल्लवित हुई हैं। इस कोटि में विषय वस्तु और ज्ञान गरिमा का अनूठा रूप देखने को मिलता है। यह शोध स्वान्तः सुखाय होती है और जीवन के लक्ष्य के रूप में होती है। आजीविका इसका गौण लक्ष्य होता है। नाथूराम प्रेमी, मुख्तार सा०, परमानन्द शास्त्री, दलसुख भाई, मुनि कान्ति सागर, बालचंद्र एवं फूलचंद्र शास्त्री, अगरचंद्र नाहटा, बालपद्र और कुंदनलाल जैन आदि के नाम किसे श्रद्धाप्रेरित नही करते ? आज भी अनेक शोधविद्वान् प्रकाशस्तम्भ बने हुए हैं। इनमे जी० आर० जैन, मुनि महेन्द्र कुमार, एल० सी० जैन आदि सुज्ञात है । शोध के ये दोनो ही रूप 'जैन विद्याओं को प्रकाशित करते हैं। इन्हें एक-दूसरे का पूरक और संवर्धक गानना चाहिये। इसलिए लेखक का सुझाव है कि जैन विद्या शोध विवरणिकाओं में उपाधि निरपेक्ष एवं उपाध्युत्तर शोध का भी विवरण होना चाहिए । शोध का संचरण वर्तमान युग में अनुसंधान कार्य का जितना महत्व है, उससे भी अधिक महत्वपूर्ण कार्य है उसका समुचित रूप में संचरण यह न केवल पूर्व-कृत शोध की जानकारी देता है, अपितु यह शोध के नए क्षितिजों की ओर संकेत भी देता है। आज ज्ञान का संचरण अनेक रूपों में किया जा सकता है (अ) शोधकार्यो का समुचित रूप में प्रकाशनइसका एक रूप है। इस विधा में दो कठिनाइयां अनुभव में आई हैं। प्रकाशित शोध-प्रबंध का मूल्य अधिक होता है। दूसरे, अधिकांश शोध प्रबंध असपादित एवं संक्षेपित ही प्रकाशित होते हैं। इन्हें लिखने की विद्या के जानकार यह कहते हैं कि संपादन से प्रवन्ध दो-तिहाई रह जाता है। जिससे उसकी ग्राहकता एवं उपयोगिता बढ़ जाती है। (ब) शोध-संगोष्ठियां परिसंवाद - शोध- सचारण के दूसरे माध्यम हैं । इनमें पठित शोधपत्रो का संपादित प्रकाशन ऐसे आयोजनों का एक अनिवार्य अंग होना चाहिए। पूना और उदयपुर ने इस दिशा मे उदाहरण प्रस्तुत किया है । अनेक आयोजनों मे पठित शोधपत्रो की प्रकाशित या साइक्लो स्टाइलित प्रतियों के वितरण की परम्परा देखी गई है। यह भी और भी अच्छा होता कि इनके बदले इनका एकीकृत पुस्तकाकार रूप ही वितरित किया जाता । (स) शोध संक्षेरिकाएं भी शोध संचरण का एक रूप है। वैज्ञानिक विषयों में विश्व के किसी भी भाग में होने वाली शोध के सार-संक्षेप को प्रकाशित करने वाली पत्रिकायें (जैसे केमिकल एक्स्ट्रेक्ट) राष्ट्रीय या अन्तर्राष्ट्रीय संस्थाओं द्वारा प्रकाशित कर अल्पमूल्य में ही खडश शोधकर्ताओं में प्रसारित की जाती है। जैन विद्याओं के क्षेत्र मे यह परम्परा प्रायः अज्ञात है। जैन संदेश शोधांक ने इस दिशा में नेतृत्व किया था, पर उसके सीमित प्रमारण हो अब तक प्रकाशित विवरणिकाओं में उसका नामोल्लेख नहीं हो सका। अब तो वह भी बंद हो गया है । जैन विद्या के क्षेत्र मे, वर्तमान में, अनेक राष्ट्रीय एव अंतर्राष्ट्रीय मान्यता की स्वायत्त संस्थायें कार्यरत है। इनमें से कम-से-कम एक संस्था को अपनी प्रकाशित पत्रिक पत्रिका को 'जैन शोध वार्षिकी' के विशेषाक के रूप में अथवा स्वतन्त्र प्रकाशन के रूप में 'शोध सार' क्रम से निकालना चाहिये। इसके लिये यह आवश्यक होगा कि यह संस्था प्रत्येक शोध प्रबंध की माइक्रोफिल्म का फोटोकापी प्राप्त करें और उसका स्रक्षेपण कराये। इस समय औसतन जैन विद्या में पच्चीस शोधोपाधियां प्रति Page #21 -------------------------------------------------------------------------- ________________ जन विधानों में शोध एक सर्वेक्षण वर्ष मिल रही है। इनके लिये उपरोक्त कार्य में प्रायः पांच हजार रुपये प्रति वर्ष खर्च होने का अनुमान है। नव स्थापित बी० एल० इन्स्टीट्यूट, दिल्ली यह कार्यक्रम नियमित रूप से अपनायें, तो उसकी महत्ता और उपयोगिता ही बढ़ेगी । (द) शोध-नाभिकायें भी गोध-संचरण करती है । इस दिशा में डा० जैन का कार्य उल्लेखनीय है। उन्होंने अनेक राष्ट्रीय या अन्तरर्राष्ट्रीय सम्मेलनो के अवसर पर जैन विद्याओं में कृत एव क्रियमाण शोध की नाभिकाये संकलित कर अनेक पत्रिकाओं के सामान्य या विशेषाको मे प्रकाशित की है। इनमें एक सकलन १९७३ मे 'महावीर और उनकी विरासत' मे भी प्रकाशित हुआ है। इसका आधार विभिन्न विश्वविद्यालय रहे हैं। इसमें आठ प्रान्तो के छब्बीस विश्वविद्यालयो की २०४ शोधो का विवरण था । जैन ने एक संगोष्ठी में इसको विषयवार वर्गीकृत कर समीक्षा प्रकाशित की है एवं युगानुरूप शोध के अज्ञात का उपेक्षित क्षेत्रो मे अनुसन्धान का सुझाव दिया है । वर्ष १९८३ में उन्होंने पुनः पूर्व-परंपरा के अनुकरण । में एक अन्य शोध नाभिका प्रकाशित की है जब कि काशी से ही एक अन्य शोध नाभिका पुस्तक विषयवार क्रम के आधार पर प्रकाशित हुई है। डा. जैन की नाभिका 'अ' श्रमण-संकाय पत्रिका के अग के रूप में है तथा हिन्दीअंग्रेजी में है। पुस्तक नाभिका 'ब' अग्रेजी में है और उसमे बोद्ध शोध-नामिका भी है। नाभिका 'अ' मे कृत और क्रियमाण शोध-विवरण है जब कि नाभिका 'व' केवल कृत शोध को ही लक्ष्य में रखकर तैयार की गई है। जैन विद्या शोध की दृष्टि से नाभिका 'अ' अधिक उपयोगी दिखती है। फिर भी, दोनों ही बहुमोली है। इसमे उपाधि निरपेक्ष शोध का विवरण नहीं है और न ही पूर्वोक्त विषयवार गुणात्मक एवं परिमाणात्मक समीक्षा का उल्लेख है। यदि दोनों ही नाभिकाओं को कृतशोध के आधार पर आंका जावे, तो आंकड़ों में अन्तर दिखता है। उदाहरणार्थ, नाभिका 'अ' में इस श्रेणी में जहां २४१ नाम है वहीं 'ब' में कुल ३२४ नाम ही है (संभवत: to यह कुछ पहले प्रकाशित हुई होगी। नाचिका 'म' अपूर्ण भी लगती है । उसमें डा० रायनाडे (बनारस), डा० एस० के० जैन (कुरुक्षेत्र) तथा डा० उप जैन (जबलपुर) आदि के नाम नहीं हैं। पंजीकृतो में भी रीवा की सा० प्रियदर्शना श्री सा० सुदर्शना श्री व श्रीमती सरला त्रिपाठी, काशी के कमलेश जैन तथा डा० सी० जैन तथा संस्कृत विश्वविद्यालय की प्रकाशित सूची के नाम नहीं है। स्वविवेक का ऐसा उपयोग समझ में नहीं आया। । अनेक नाम । विषयो मे पुनरावर्तन भी है। यदि किचित सावधानी बरती जाती और कुछ प्रयत्न किया जाता, तो इसकी गुणात्मकता और अच्छी होती । यद्यपि यह १६७३ की नाभिका की तुलना में पर्याप्त प्रगत है, इसमे १५ प्रान्तों के ४९ विश्वविद्यालयों के ४२१ शोधों का विवरण है, फिर भी इसके आंकड़े शताधिक विश्वविद्यालयों के आधार पर अपर्याप्त ही माने जायेंगे। इसमें आठ प्रदेशों एवं आठ केन्द्र शासित क्षेत्रों के सम्बन्ध में कोई विवरण नहीं है। इसमे प्रकाशित शोध प्रबंधों की सूचना तो है, पर प्रकाशन या प्राप्ति स्थान का उल्लेख नहीं है। मूल्य भी नहीं है। शोध निर्देशक के नाम भी नहीं है। ये तथ्य दोनों ही नामिकाओं में लागू होते हैं। यह उत्तम होगा यदि भविष्य में इन बातों पर ध्यान रख कर प्रकाशन किया जावे । जैन विद्या शोध को प्रगति का विश्लेषण 1 उपरोक्त अनेक अपूर्णताओं के बावजूद भी दस वर्षों के अंतराल मे प्रकाशित नाभिकाओं के अध्ययन में भारत मे जैन विद्या शोध की वर्तमान स्थिति, प्रगति का वेग तथ्य दिशाओं की विविधतायो मे वृद्धि का आभास होता है। सारणी १, २३ मे दोनो नामिकाओं (अ) पर । आधारित तुलनात्मक आंकड़े दिये जा रहे हैं। इनमें नाभिका 'व' के विषयों का संक्षेपण किया गया है। इसके प्रायः आधे विषय ललित साहित्य के अन्तर्गत आते हैं। इनके विश्लेषण से हम वर्तमान स्थिति के साथ आगामी वर्णों के लिये शोध-दिशाएं आकलित कर जैन विद्याओं को महत्ता को और भी प्रकाशित कर सकते हैं। । Page #22 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ३२४ - л л ९७, वर्ष ३६, कि०१ अनेकान्त सारणी १. जैन विद्याओं तुलनात्मक (१९७३-६३) विषय (८-१४) ६ ३.० ५१ १६.५ ४६ (७-१४) में शोध: आंकड़े १४.२० (म) सामान्य १६७३ प्र० १९८३ : अप्र० १९८३ : ब प्र० १६. तुलनात्मक शत शत शत अध्ययन १० ५.० ३३ ७.७ ४० १२-३ १. प्रदेश १५ - १७. विज्ञान ४ २.० ५ १.२ २ ०.६ २. विश्ववि० २५ - १८. विविध ६ ३.० ० ० ३. शोधकर्ता २०४ ४२६ (अ) जैन १० २०४ ४२६ ३२४ (ब) जेनेतर११४ - (अ) शोध और प्रकाशन(स) पजी. ८८ (द) उपाधि सारणी १ से स्पष्ट है कि पिछले दस वर्षों में जैन प्राप्त ११६ विद्याओं में शोधकर्ताओ की सख्या दुगुनी से अधिक हो गई ३२४ ४. शोध-प्रवध है। जनेतर विद्वान् इस क्षेत्र में अधिकाधिक सख्या मे रुचि प्रकाशन ३२ १५.६ ६८ १५.८५ ३६ - ले रहे है। दस वर्ष पहले जहां इनका अनुपात१:१२५. २११, वही अब १ : २.८३ हो गया है। इसके विपर्यास (ब) विषयवार शोधकर्ता मे, शोध प्रवन्ध प्रकाशन की स्थिति में कोई विशेष अन्तर नहीं पड़ा है। यह प्रायः १५.७ प्रतिशत ही है। इस १. ललित प्रकार, जहा जैन विद्याओं का शोध प्रतिशत बढ़ रहा है, माहित्य १०२ ५० १७५ ३६ १५० ४६.२ २. न्याय/दर्शन २७ १३ ३६६ वहां इसके सप्रसारण की स्थिति शोचनीय है। इसे सुधारने की आवश्यकता है। ३. भाषा (प्रा०, ___अ०, वितान) ८ ४ ३४ ८ (ब) शोध क्षेत्र ४. आगम १० ५ १२ ५ ७ २.२ सारणी २ से प्रकट होता है कि जैन विद्याओ के शोध ५. नीति, क्षेत्र की दृष्टि से उत्तर प्रदेश का प्रथम स्थान है जहां आचार, धर्म १०५ ४२ ६.५ ___ १२ ३.७ ३५.६ प्रतिशत शोध हो रही है। उसके बाद बिहार ६. व्यक्तित्व (१५-१५ प्रतिशत) और मध्य प्रदेश (१० प्रतिशत) आते कृतित्व ११ ५ २७ है। महाराष्ट्र और राजस्थान मध्य प्रदेश से कुछ ही पीछे ७. कला, हैं। दिल्ली और गुजराज मध्यम कोटि में है । दक्षिण के पुरातत्व १० ५ १२ सभी प्रदेशों में मिलाकर जैन विद्या शोध का प्रतिशत ६.४ ८. इतिहास है। अन्य प्रान्तो में भी यह काफी कम हैं। ऐसा प्रतीत ६. राजनीति होता है कि नाभिकाओ में जिन क्षेत्रों का विवरण नहीं १०. अर्थ-शास्त्र है, वे जैन विद्या शोध की दृष्टि से शून्य हों। फलतः यह ११. समाज-शास्त्र स्पष्ट है कि वर्तमान में जिन क्षेत्रों मे जैन अधिक संख्या १२. भूगोल में हैं, वहीं शोध प्रतिशत भी अधिक है । ऐतिहासिक दृष्टि १३. मनोविज्ञान से अन्य क्षेत्रों में अधिक शोध होनी चाहिए क्योंकि वहीं १४. शिक्षा जैन इतिहास की निमिति हुई है । यदि१५ अाधुनिक २३ ६.६ Page #23 -------------------------------------------------------------------------- ________________ जैन विद्याओं में शोध : एक सर्वेक्षण सारणी २. जैन विद्या शोध क्षेत्र, १९८३ में एवं ऐतिहासिकता का भान होता है। संभवत: न्याय, क्षेत्र प्रतिशत क्षेत्र प्रतिशत दर्शन, विज्ञान आदि विषय किंचित् गहन अध्ययन, मनन १. उत्तर प्रदेश ३५.६० . हरियाणा २.१० और श्रम चाहते हैं जो अब विराम होता जा रहा है। २. बिहार १५.१५६. पंजाब ०.६० यद्यपि इन क्षेत्रों में कुछ उपाधि-निरपेक्ष काम हो रहा है, ३. मध्यम प्रदेश १०.०२ १०. बगाल फिर भी इस शोध को प्रेरित करने के उपाय करना ४. महाराष्ट्र ६.८० ११. कर्नाटक २.३० चाहिये। इसके लिए यह आवश्यक है कि इन विषयों से ५. राजस्थान ७.७ १२. केरल सम्बन्धित ग्रन्थों का हिन्दी/अंग्रेजी में अनुवाद किया जावे। ६. गुजरात ५.६० १३. आंध्र ०६३ दूसरा संभावित बाधक कारण वर्तमान जैन शोध निर्देशकों, ७. दिल्ली ४.८० १४. तामिलनाडु २.८० विद्वानो के अधिकांश का ललित-साहित्य-आधारित होना १५. उड़ीसा ०.२३ हो सकता है। इस विषय से अनेक विद्वान भाषाओं और विदेशों की जैन विद्या शोध को समाहित किया जावे, तो भाषा विज्ञान तक तो आ गये हैं, पर इससे आगे जाने वहां अनेक देशों मे कुल प्रतिशतता ६.५ है । यह उत्साह योग्य शिष्य ही इन्हें नही मिलते । सम्भवतः इसी कारण और वर्धक तथ्य है। अनेक व्याकरण और दर्शन के आचार्य व्यापारी बन गये? (स) शोध दिशाय यह प्रसन्नता की बात है कि जहां कुछ क्षेत्रों में शोध १९७३ के समीक्षण मे व्यक्त किया गया था कि जैन संख्या में कमी आई है, वहीं जैन विद्याओं में वर्णित विद्या शोधो की प्रमुख दिशा ललित साहित्य ही है। यह आधुनिक विषयो से सम्बन्धित शोधों की ओर शोधार्थियों अब भी सत्य है, यद्यपि इसकी प्रतिशतता १६७३ के ५० की रुचि बढ़ी है। इनमे इतिहास (३३), राजनीति से घट कर १९८३ मे ३६ रह गई है। यह शुभ लक्षण (६), समाज शास्त्र (३), मनोविज्ञान (२), भूगोल है और इस प्रवत्ति को बढ़ना चाहिये । यह कमी अन्य (१) एवं भाषिक विषय (३४) मुख्य है। ये शोधे भारतीय दिशा की शोधो के रूप में प्रतिफलित हुई है जैसा विद्याओ के विकास को समझने के लिए 'मील के पत्थर' सारणी ३ से प्रकट होता है। आलोच्य दशक में कुछ ऐसे सिद्ध हो रही हैं जिससे इस ओर शोध प्रवृत्ति बढ़ रही विषयों की शोधों में भी कमी आई है, जो चिन्तनीय है। है। इन क्षेत्रो मे विभिन्न स्रोतों में उपलब्ध सामग्री को इन विषयों एकत्र करने के विवरणात्मक प्रयास अधिक हो रहे हैं, पर सारणी ३. १९७३-८३ के दशक मे जैन विद्या शोध-विषयो मे हानि-वृद्धि ये ही उत्तरवर्ती गहन अध्ययन के आधार-बिन्दु बनेंगे। विषय प्रतिशत हानि विषय प्रतिशत वृद्धि ऐसा प्रतीत होता है कि पुरातन धर्म, नीति और आचार १. साहित्य ११.०० १. आधुनिक की ओर वर्धमान उपेक्षाभाव को निरस्त करने के लिए विषय अनेक शोधकर्ता जैन विद्याओं में समाहित इन विषयो पर २. न्याय/दर्शन ४.०० २. धर्म, नीति, उपलब्ध सामग्री का आलोचनात्मक या तुलनात्मक अध्ययन आचार ४.५० करने में प्रवृत्त हो रहे है। इनसे प्राचीन मान्यताओं का, ३.विज्ञान १.०० ३. भाषा ४.५० अनेक प्रकरणों में, समर्थन और व्यापकीकरण ही हुआ ४. कला २.५० ४. व्यक्तिस्व है। इन विषयों पर अभी पर्याप्त जैन साहित्य उत्खनन कृतित्व हेतु बचा है और शोध की यह गति अविरत रहना ५. विविध ५. तुलनात्मक चाहिये। इसी प्रकार तुलानात्मक अध्ययन और व्यक्तित्व२.२० अध्ययन २.७० कृतित्व की दिशा में शोध-वृद्धि सराहनीय है। इसे भी २०.७० २०.७० गतिशील बनाये रखने की आवश्यकता है। (क्रमशः) की शोधों से ही जैन विद्या के अनेक क्षेत्र को मौलिकता -गर्ल्स कालेज, रीवा Page #24 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आयुर्वेद में अनेकान्त 0 आयुर्वेदाचार्य राजकुमार जैन, दिल्ली एकान्त से भिन्न या विपरीत अनेकान्त है। एकान्त में यह गुण के अर्थ में भी प्रयुक्त होता है। यही कारण है कि एक ही पक्ष का कथन या प्रतिपादन होता है, जबकि वस्तु के लिए सामान्यतः कहा जाता है कि वह अनेक या अनेकान्त में अन्य पक्ष का भी प्रतिपादन किया जाता है। भिन्न गुण-धर्म बाली है। जैसे आयुर्वेद के अनुसार वात में एकान्त के अनुसार जो कथन किया जाता है उसमें "यह पक्ष, शीत, लघु, सूक्ष्म, चल, विषद, खर आदि अन्यान्य बात ऐसी ही है" इसका प्रतिपादन किया जाता है, जबकि गूण धर्म पाए जाते हैं। पित्त में उष्णता, द्रवता, स्नेह, अनेकान्त के अनुसार "ही" के स्थान पर "भी" शब्द की न पर “भा शब्द का अम्लता' सर, कटु आदि गुण पाए जाते हैं और श्लेषमा अमलता' मर कर आदि विशेष महत्व दिया जाता है । अर्थात् यह बात ऐसी ही है मे शैत्य, श्वत्य, स्निग्ता, गुरुता, श्लक्ष्णता आदि गुण पाए कहने की अपेक्षा" यह बात ऐसी भी है"-इस प्रकार जाते है। इससे स्पष्ट है कि वस्तु या द्रव्य अनेक गुण कहा जाता है। अनेकान्त मे एक ओर जहां पक्ष भी धर्मात्मक है। विशेष या दृस्टिकोण का एक पहलू है वही दूसरी ओर दार्शनिक सन्दर्भ में "अन्त" शब्द का अर्थ "निर्णय" दूसरा पक्ष या पहलू भी कहा जाता है । अत: उसमे दृण्टि भी लिया जाता है। अत: “अनेकान्त" पर विचार करने कोण की व्यापकता विद्यमान रहती है। अनेकान्त में से पूर्व “एकान्त" की विवक्षा भी आवश्यकक है, ताकि दूसरा पक्ष भी उतना ही महत्वपूर्ण होगा, जितना पहला । विषय की विवेचना समुचित रूप से की जा सके । पक्ष । अतः यह समानता के दृष्टिकोण पर आधारित है। एकान्तवाद का अर्थ जिस वाद (कथन) में एक (केवल यही कारण है कि शास्त्र में एक स्थान पर जो बात कही एक धर्म मात्र) का अन्त अर्थात् निर्णय हो वह एकान्तवाद गई है, अन्य स्थान पर वही बात अन्यथा रूप मे या भिन्न कहा जाता है (एक: केवलम् अन्तः निर्णयः यत्र यत्र वादे प्रकार से कही जा सकती है। इसका कारण वहा प्रसग सः एकान्तवादः) वस्तुमें यद्यपि अनेक धर्म एक ही साथ रहते या विषय की भिन्नता है। इसीलिए उसमे व्यापकता का हैं ! किन्तु वे सब धर्म एक शब्द द्वारा एक ही समय में दृष्टिकोण रहता है । ष्टिकोण की व्यापकता उदारता की नही कहे जा सकते है। उन सब धर्मो की विवक्षा मे सूचक होती है, जिससे दूसरे के मत को समझने मे महायता वक्ता भिन्न-भिन्न शब्द और समय द्वारा कहता है ! मिलती है। अनेकान्त के कारण विरोधभाव और विग्रह किन्तु शब्द वाचक है और वस्तु वाच्य है एक शब्द द्वारा की स्थिति उत्पन्न नही हो पाती और वातावरण मे सभ्यता एक धर्म एक समय में बताया जाता है तो भी वाच्य बनी रहती है। (वस्तु) सब धर्मों से युक्त ग्रहण की जाती है। अतः ____ अनेकान्त का अर्थ सामान्यतः इस प्रकार से किया जा एकान्त पक्ष की अनेकान्त पक्ष मे वाधा आती है । वास्तव सकता है-"न एकान्तः इति अनेकान्तः" अर्थात् जिसमें से एक शब्द द्वारा एक समय में कथन करने पर एक ही एकान्त (एक पक्ष का प्रतिपादन) न हो या जो एकान्त धर्म का निर्णय करना सर्वथा युक्ति समत नहीं है। धर्मा से विपरीत हो वह अनेकान्त है। इसी प्रकार अन्य वस्तु से एक ही शब्द द्वारा एक ही समय में सब धर्मों को व्याख्या के अनुसार अनेके अन्ताः धर्मा : यस्मिन् सः- कथन करना सम्व नहीं है। फिर भी वस्तु में अनेक धर्मी बनेकान्तः अर्थात् जिसमें अनेक नन्त यानी धर्म हों वह का निवास रहता ही है। जैसे "जल" शब्द से संघात/ भनेकान्त है। धर्म शब्द यहां स्वभावबाची है। कहीं-कहीं 'सलिल' शब्द से जमना/"वारि" शब्द से वरण आदि का Page #25 -------------------------------------------------------------------------- ________________ बर्वेद में अनेकान्त ग्रहण होता है। तथापि "जल" शब्द से संघात, जमना, वरण आदि अनेक धर्मों से युक्त "जल" पदार्थ ग्रहण होता ही है। इसी प्रकार "हरि" शब्द से "हरण" क्रिया" प्राणो पापों, मन, आदि कर्मों से युक्त करने पर अनेक पदार्थों में प्रयुक्त होता है । प्राणों को हरने वाले "यम" "सर्प" सिंह" आदि मे, पापो को हरने वाले "विष्णु" में, मन को हरने वाले " बन्दर" में "हरि" शब्द के अर्थ का प्रयोग किया जाता है । अतः जैसे "सिद्धान्त" शब्द मे सिद्ध अन्तः निर्णयः यत्र असो "सिद्धान्तः” यह सिद्धान्त" शब्द का अर्थ है उसी प्रकार " एकान्त" शब्द का अर्थ एक ही निर्णय है जिसमे ऐसा अर्थ ग्रहण करना चाहिए। अनेकान्त में आग्रह के लिए कोई स्थान नही है । आग्रह ही दृष्टिकोण को संकुचित या एक पक्षीय बनाता है। किसी भी वस्तु के विषय मे आग्रह पूर्वक जब कहा जाता है तो उससे वस्तु स्वरूप का वास्तविक प्रतिपादन नही हो पाता । यही कारण है कि वस्तु को जैसा समझा जाता है वह केवल वैसी ही नही है, उससे भिन्न कुछ अन्य स्वरूप भी उसका है, जिसे जानना या समझना आवश्यक है जैसे "देवदत्त अमुक लड़के का पिता है" जब यह कहा जाता है तो वस्तुतः पुत्र की अपेक्षा से वह पिता है, अतः यह ठीक है । किन्तु वह देवदत्त केवल पिता ही नही है, अपितु, वह अपने पिता की अपेक्षा से पुत्र भी है और अपनी बहिन की अपेक्षा से भाई तथा मामा की अपेक्षा से भान्जा भी है। इस प्रकार वह एक ही देवदत्त अनेक धर्मात्मक है। इसका स्वरूप अथवा यह वस्तु स्थिति अनेकान्त के द्वारा भली-भांति समझी जा सकती है। आयुर्वेद शास्त्र में भी अनेकान्त का आश्रय लिया गया है और उसके आधार पर वस्तु स्वरूप का प्रतिपादन किया गया है, यह अनेक उद्धरणों से सुस्पष्ट है आयुर्वेद मे जहा अनेकान्त छ आधार पर विभिन्न विषयों का प्रतिपादन एवं गम्भीर विषयों का विनेचन किया गया है, वहां तन्त्र युक्ति प्रकरण के अन्तर्गत उसका परिगणन कर उसके स्वतन्त्र अस्तित्व को भी स्वीकार किया गया है । आयुर्वेद २३ शास्त्र में कुल ३६ तन्त्र युक्तियां प्रतिपादित की गई हैं, जिसमे अनेकान्त भी एक तन्त्रयुक्ति है । आयुर्वेद शास्त्रकारों ने भिन्न-भिन्न प्रकार से अनेकान्त की व्याख्या की है, जो अपने-अपने दृष्टिकोण से उपयुक्त है। सर्वप्रथम आचार्य चक्रपाणि दत्त द्वारा विहित व्याख्या का अनुशीलन करते है जो निम्न प्रकार है "अनेकान्तो नाम अन्यतरपक्षानवधारणं यथा- "ये हातुराः केवलान् भोजादतें त्रियन्ते न च ते सर्व एव भेषजोपपन्नाः समुत्तिष्टेरन् ।" — - चरक संसिता, सिद्धिस्थान २/४३ पर वक्रपाणि टीका अर्थात् दूसरे पक्षों का अनवधारण करना अनेकताम्त कहलाता है। जैसे- जो रोगी केवल भेषज के बिना मर जाते हैं, वे सभी रोगी भेषज से युक्त होने पर ठीक नहीं होते । यहां पर केवल एक का ही कथन महर्षि द्वारा नहीं किया गया है, अपितु अन्य पक्ष का समर्थ भी किया गया है जो रोगी पूर्ण चिकित्सा नहीं मिल पाने के कारण मर जाते हैं, वे सभी रोगी पूर्ण चिकित्सा मिलने पर ठीक हो ही जाते है, यह आवश्यक नहीं है। अर्थात् उसमें से भी कुछ रोगी पूर्ण चिकित्सा मिलने पर भी मर जाते हैंयह आशय है । यहां पर महर्षि ने अपनी बात कहने के लिए अनेकान्त का आश्रय लिया है। इसी को और अधिक स्पष्ट करते हुए आगे कहा गया है कि सभी व्याधियां उपाय साध्य नही होती है। जो रोग उपाय (चिकित्सा) से साध्य है, ये बिना उपाय (चिकित्सा) के अच्छे भी नहीं होते। असाध्य व्याधियों के लिए पोटकल भेषज (चिकित्सा का विधान भी नहीं है, क्योंकि विद्वान् और ज्ञानसम्पन्न वैद्य भी मरणोन्मुख रोगियों को अच्छा करने में समर्थ नहीं होते । अनेकान्त को महसुश्रुत ने कुछ दूसरे ढंग से प्रस्तुत किया है, किन्तु आमय नहीं है। जैसे। --- "क्वचित्तथा वचिदन्थेति यः सोअनेकान्तः यथा-केचिदाचार्याः द्रवते द्रव्य प्रधान, केचिद्वीर्य, केचिद्विपाकमिति । " - सुश्रुत संहिता, उत्तरतन्त्र ६५ / २४ Page #26 -------------------------------------------------------------------------- ________________ २४ वर्ष ३२ कि० १ अर्थात् कही ऐसा और कहीं अन्यथा ( दूसरा ) इस प्रकार जो कथन किया जाता है वह अनेकान्त है । जैसेकुछ आचार्य द्रव्य को प्रधान बतलाते हैं, कुछ रस को, कोई वीर्य को प्रधान मानते हैं, तो कोई विपाक को - यहां जो उदाहरण दिया गया है वह समन्वय एवं व्यापक दृष्टिकोण का प्रतिपादक है। आयुर्वेद-शास्त्र सामान्यतः द्रव्य, रस, गुण वीर्य, विपाक और प्रभाव में में द्रव्य को प्रधान माना गया है किन्तु पृथक्-पृथक् रस गुण, वीर्य, विपाक और प्रभाव को प्रधान मानने वाले आचार्यों के मतों को भी समायुत किया है, जो अनेकान्त पर आधारित है। इसमें यद्यपि कुछ विरोधाभास प्रतीत होता है, किन्तु वस्तुतः वह विरोध या विरोधाभास न हो कर दृष्टिकोण को उदारता और व्यापकता है जो समन्वय मूलक है । महर्षि चरक ने केवल तत्रयुक्ति के रूप मे ही अनेकान्त को नही अपनाया है, अपितु सिद्धान्त रूप मे भी उसका प्रतिपादन किया है। तद्विषयक अनेक उद्धरण चरक संहिता मे उपलब्ध होते है । उन्होने विभिन्न पक्षो के ऐकान्तिक दुराग्रह की निन्दा करते हुए एक स्थान पर कहा है तर्षीणां विवदतामुदावेदं पुनर्वसुः । मैदं वोपत तत्व हि दुष्प्रापं पक्ष संश्रयात् ॥ वादान् सप्रतिवादन् हि वदन्तो निश्चितानिव । पक्षान्तं नैव गच्छान्ति तिलपीडकवद्गता ॥ मुक्त्वेदं [वादसंपद् मध्यात्मनुचिन्त्यताम् । नाविधूते तमः स्कन्धे शेये ज्ञान प्रवर्तते ।। चरक संहिता, सूत्रस्थान २५/२६-२८ अर्थात् इस प्रकार परस्पर विवाद करते हुए ऋषियों के वचन सुनकर पुनर्वसु ने कहा कि आप लोग ऐसा नहीं कहें। क्योंकि अपने-अपने पक्षों का आश्रय लेकर विवाद करने से तत्व को प्राप्त करना दुष्कर होता है । अर्थात् सिद्धान्त का निर्णय नही हो पाता बाद (उत्तर) और प्रतिवाद ( प्रत्युत्तर) को निश्चित सिद्धांत की तरह कहते हुए किसी एक पक्ष के अन्त तक नहीं पहुंचा जा सकता अपे है। जैसे तेल पेरने वाला बैल एक निश्चित घेरे में घूमता हुआ जहां से आरम्भ करता है, पुनः वहीं पहुंच जाता है। उसी प्रकार पक्ष का आग्रह पूर्वक श्राश्रय करने वाला वाद-विवाद करता हुआ अन्य पक्ष के खण्डन और स्वपक्ष के मण्डन पूर्वक पुनः उसी बिंदु पर आ जाता है, जहां से उसने आरम्भ किया (ध) अतः वाद-विवाद की प्रक्रिया को छोड़कर अध्यात्म (यथार्थ तत्व) का चिन्तन करना चाहिये। क्योंकि जब तक अज्ञान रूपी तम का नाश नही होता है, तब तक ज्ञेय (जानने योग्य) विषय में ज्ञान नहीं होता है। । अनेकान्त प्रतिपादन की दृष्टि से पुनर्वसु आश्रय के उपर्युक्त कथन विशेष महत्वपूर्ण है। एकान्तवादियों के द्वारा स्वरूप प्रतिपादन हेतु किए गए प्रयास की तुलना उन्होंने तेल पेरने वाले मनुष्य से की है, जो निरन्तर एक निश्चित दायरे में घूमता हुआ एक ही बिन्दु पर पुनः आ जाता है और अन्य बातें उसके लिए महत्वहीन एवं निःसार होती है । पुनर्वसु आत्रेय ने अपने दृष्टिकोण को व्यापक बनाते हुए इस तथ्य का प्रतिपादन किया है कि जब किसी वस्तु या विषय विशेष के अन्वेषण एवं लक्ष्य प्राप्ति हेतु प्रवृत्ति की जाती है तो आग्रह पूर्वक स्वपक्ष या अपनी बात दूसरो पर नही लादी जानी चाहिये । यदि ऐसा किया जाता है तो इससे न तो वस्तु स्वरूप की मर्यादा की प्रतीति होना सम्भव है और न ही लक्ष्य प्राप्ति की जा सकती है। एकांत सदैव मतभेदों को बढ़ाता है, जबकि अनेकांत उन्हें दूर सार्वमोम सत्य का प्रतिपादन करता है । एकांत एकांगी होता है, अतः इससे वस्तु का एक पक्ष ही उभावित होता है और सत्य की पूर्णता उसे आवृत नहीं कर पाती है सत्य की अपूर्णता वस्तु के यर्थार्थ स्वरूप के प्रतिपादन मे बाधक होती और कई बार उससे भ्रामक बातें ही प्रचारित की जाती है किन्तु अनेकान्त के द्वारा ऐसा नही होता है । यह निर्विवाद और असदिग्ध रूप से कहा जा सकता है कि महत्वपूर्ण विषयों के प्रतिवादन मे आयुर्वेद-शास्त्र में स्थान-स्थान पर अनेकान्त का आश्रय लिया गया है । जैसे वस्तु स्थिति से अनभिज्ञ कतिपय दुराग्रही एव एका Page #27 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आयुर्वेद में बनेकान्त २५ न्तवादी लोगों का यह दृढ़मत है कि विष का प्रयोग सर्वथा तो निश्चय ही वह काल का ग्रास बन सकता है, किन्तु जीवन का हरण करता है। तीक्ष्ण विष के प्रयोग से तो वही विष जब शुद्ध और संस्कारित करके मात्रा पूर्वक मनुष्य का प्राणान्त अवश्यम्भावी है। किन्तु वस्तुस्थिति ओषध रूप में प्रयुक्त किया जाता है तो अनेक भीषण इससे भिन्न है । उसी तथ्य को जब अनेकान्त के परिप्रेक्ष्य व्याधियों का नाश उसके द्वारा किया जाता है। आधुनिक मे देखा गया तो महर्षि अग्निवेष को कुछ और ही अनुभव वैज्ञानिक परीक्षणों ने आमवाद (गठिया वाय) को व्याधि हुआ उन्होंने तीक्ष्ण विष के विषय में स्वानुभूत पदार्थ का में विधि पूर्वक उचित मात्रा में सर्प विष का प्रयोग उपविवेचन इस प्रकार से किया है योगी एव लाभप्रद सिद्ध किया है। इस प्रकार विषत्व की योगादपि विष तीक्ष्णमुत्तम भेषज भवेत् । अपेक्षा से वह विष हैं, किन्तु भेषजत्व की अपेक्षा से वही भेषज चापि दुर्युक्तं तीक्ष्ण सम्पद्यतें विषम् ॥ तीक्ष्ण विष जीवनदायी श्रेष्ठ औषधि है। तस्मान्न भिषजा युक्त युदितअहयेनभेषजम् । इस प्रकार आयुर्वेद-शास्त्र में ऐसे अनेक प्रकरण एवं धीमता किंचिदादेय जीवितारोग्य काक्षिणा ।। उद्धरण विद्यमान है जो अनेकान्त का आश्रय लेकर प्रति-चरक सहिता, सूत्रस्थान १/१२६-२८ पादित किये गये है। इससे न केवल उस विषय की दुरूअर्थात विधि पूर्वक सेवन (प्रयोग) करने से तीक्ष्ण हता ही समाहित हुई है, अपितु अनेक शंकाओ का अनाविष भी उत्तम औषधि हो जाता है और अविधि पूर्वक यास ही निरसन हो गया है। अत: यह कहने में कोई या प्रयोग की गई श्रेष्ठ औषधि भी तीक्ष्ण विष बन जाती है। सकोच नहीं है कि ऐसा करने से आयर्वेद-शास्त्र के दृष्टिइसलिए जीवन और आरोग्य की इच्छा रखने वाले बुद्धि कोण में पर्याप्त व्यापकता आई है और वह पूर्ण उदारता. मान मनुष्य के द्वारा युक्नि बाह्य (युक्ति पूर्वक प्रयोग नही बादी कहलाने का अधिकारी है। जीवन विज्ञान के सदर्भ करने वाले) वैद्य से कोई भी औषधि नही लेनी चाहिए। मे मानव-प्रकृति एव आरोग्य मूलक सिद्धान्तो का प्रति पादन आयुर्वेद-शास्त्र की अपनी मौलिक विशेषता है। यहां पर अपेक्षा पूर्वक विष का विषत्व और भेषजत्व उसमे यदि संकुचित दृष्टिकोण व दुराग्रहों का आश्रय प्रतिपादित किया गया है साथ ही यक्ति पूर्वक प्रयोग की लिया जाता तो निश्चय ही आयुर्वेद-शास्त्र की शाश्वतता अपेक्षा से औषधि का भेषजत्व और विपत्व बतलाया गया और लोकोपकारी भावना का लोप हो जाता, किन्तु ऐसा है। इस प्रकार का प्रतिपादन अनेकान्त का आश्रय लिये नहीं है। इस दिशा में पर्याप्त अध्ययन, मनन और अनबिना सम्भव नही है। क्योकि युक्ति की अपेक्षा से ही चिन्तन के द्वारा पर्याप्त अनुसन्धान अपेक्षित है। अनेकान्त भेषज श्रेष्ठ औषध हो सकती है। यदि यक्ति की अपेक्षा ने आयुर्वेद को कितना सहिष्णु और व्यापक दष्टिकोण न रखी जाय तो वही भेषज रोगी का प्राण हरण कर वाला बनाया है उसका सहज आभास उन स्थलो से मिलता सकती है। जैसा कि आज कल प्राय. देखा जाता है कि है जहाँ अन्य ऋषियो के निम्न दृष्टिकोण मूलक शब्दो को स्टैप्टोमाइसिन पेनिसिलिन के इजेक्सन के प्रयोग में बरती भी समावृत किया गया है । अत: गम्भीर विमर्श पर्वक गई जरा सी असावधानी रोगी का प्राणान्त कर देती है। इस दिशा में पर्याप्त अध्ययन, मनन और अनुचिन्तन द्वारा यही इंजेक्सन अच्छी तरह विचार कर प्रयोग किये जाने अनुसंधान अपेक्षित है। आशा है विद्वज्जन एवं शोधार्थी पर जीवनदायी बन जाता है। उसी प्रकार यदि किसी इस दिशा में प्रयासरत होगे। मनुष्य को संखिया, कुचला, धत्तर आदि विषवर्गीय किसी द्रव्य का सेवन बिना सस्कार किये ही करा दिया जाय ~भारतीय चिकित्सा, केन्द्रीय परिषद्, नई दिल्ली Page #28 -------------------------------------------------------------------------- ________________ णायकुमार चरिउ में प्रतिपादित धर्मोपदेश 0 डा. कस्तूरचन्द 'सुमन' णायकुमार-चरिउ काव्य के कर्ता महाकवि पुष्पदन्त धर्म के भेद-संसार में दो प्रकार के लोग होते हैं । थे। इस चरित काव्य में उन्होंने राजपुत्र नागकुमार से प्रथम वे जो गृहस्थ जीवन यापन करते हैं और दूसरे वे सम्बन्धित घटनाओं को चित्रित किया है। पिता द्वारा जिन्होंने गहस्थी से मख मोड गाईस्थिक बन्धनों से नाता निर्वासित होकर यद्यपि वे नाना प्रदेशों में भटकते हैं किन्तु तोड़, तप से सम्बन्ध जोडा है । ऐसे लोग अनगार कहे है । पुण्योदय के कारण सर्वत्र अपने नैपुण्य से प्रभावशाली गृहस्थो का धर्म आगार-धर्म और जिस धर्म को मुनि व्यक्तियों को भी प्रभावित करते है । अनेक राज-कन्याओं पालते हैं उसे अनगार-धर्म की सज्ञा दी गई है। को विवाह कर अपनी प्रतिष्ठा बढ़ाते है । उन्होंने ऐसे-ऐसे कार्य किये जो साधारण लोगों के लिए अशक्य थे। सागारधर्म गृहस्थ धर्म का निर्वाह तभी होता है जब गही हिंसा, घटनाओं से यह चरित्र वाल्मीकि कृत रामायण में झूठ, चोरी, कुशील और परिग्रह जनित दोषो से बचे । उल्लिखित रामचरित के समान है परन्तु इस काव्य मे ___ इसके लिए उसे जीव दया करना, विनयवान होना, सत्य ला चित्रित धर्मोपदेश काव्य की विशिष्टता का प्रतिबोधक है। । और मधुर वचन बोलना, पर द्रव्य के अपहरण से अपने धर्म का स्वरूप-इस काव्य मे आचार्य श्रतिधर ने हाथ खाच रहना, पर स्त्री से पराङ्मुख रहना और नागकुमार के द्वारा पूछे जाने पर धर्म का स्वरूप समझाते लोभानग्रह हेतु परिग्रह का प्रमाण रखना आवश्य हुए कहा कि "जीवों पर दया करना, क्षीण, भीरू, दीन इसके अतिरिक्त ऐसे गेही को सूर्यास्त से पूर्व ही और अनाथो पर कृपा करना, कर्कश वचन, ताडन, बन्धन भोजन करना पड़ता है, मधु-मांस और मद्य का त्याग व अन्य प्रकार की पीडा विधि का प्रयोग नही करना, करना पडता है, पच उदम्बरों का स्वाद भी त्यागना साथ ही झठ वचन नही कहना, सत्य व शौच मे रुचि पडता है। इसे गुरुओ के अनुसार दिशाओ मे गमनागमन खना मधर करुणापूर्ण वचन बोलने के साथ-साथ दूमर को मर्यादा रखनी पड़ती है। वह शिक्षाक्त पालता है, के धन पर कभी मन नहीं चलाना, बिना दी हुई वस्तु को पापी जीवो की उपेक्षा करता है, वर्षा काल मे बाहर नही ग्रहण नही करना तथा अपनी प्रिय पत्ना स हा रमण जाता, प्रोषधोपवास करता है, पात्रो को आहार देता है, करना. पर स्त्री पर दृष्टि नहीं चलाना आर पराय धन विधिपूर्वक सन्यास ग्रहण करता है, वह कूगुरु, कदेव आदि को तण के समान गिनना, गुणवानों की भक्ति सहित हत को नहीं पूजता। वह तो शुद्ध सम्यष्टि होता है । स्तुति करना। जिनेन्द्र का ध्यान और सामायिक करने में ही अपना इस प्रकार धर्म के विभिन्न अगो का का अभग रूप समय व्यतीत करता है। से गलन करना ही धर्म का स्वरूप बताया गया है। गहस्थों का नित्य कर्म-दान निष्कर्ष यह है कि हिंसा, झूठ, चोरी, कुशील और परिग्रह से विरत होकर अहिंसा, सत्य, अस्तेय, अचौर्य, ब्रह्मचर्य गृहस्थों को आचार्यों ने नित्य करने योग्य छह कर्म और अपरिग्रह इन धमों के अंगों का पालन करना ही धर्म बताए है, अर्हत् पूजा, गुरु-सेवा, स्वाध्याय, संयम, तप है। धर्म का स्वरूप है। और दान । इनमे आचार्य कुन्दकुन्द ने दान को सर्व प्रमुख Page #29 -------------------------------------------------------------------------- ________________ जायकुमार चरिउ में प्रतिपादित धर्मोपदेश माना है। दान के प्रसंग में पात्र, अपात्र, और कुपात्र का उन्होंने मनियों को उत्तम पात्र कहा है दूसरी ओर यह भी विश्लेषण करते हुए प्रस्तुत काव्य में बताया गया कि जो विचारा कि यदि दीन-हीन लोगों को सहयोग नहीं दिया झूठे शास्त्रों में, कुत्सित आचारों तथा तपस्वियों मे अनुरक्त गया तो वे सदैव दुःखी रहेंगे । अतः उन्होंने अपने उपदेशों होता है वह कुपात्र है और जो सम्यकदर्शन तथा पवित्र में ऐसे दीन-हीन, लगड़े लूले, गूगे, बहरे, अन्धे, रोगी, व्रतों से रहित है वह अपात्र है। और दुःखी लोगों को करुणा का पात्र कहा। उन्होंने कहा पात्र उत्तम, मध्यम और जघन्य भेद से तीन प्रकार कि ये करुणा के पात्र है, किन्तु गुणागार मुनीश्वर करुणा के है। इनमें शुद्ध रत्नत्रय रूप मुनिव्रतधारी उत्तम पात्र, के पात्र नहीं है। उन्हें तो परम भक्तिपूर्वक ही दाम देना श्रावक के चारित्र का धारी मध्यम पात्र और जो चाहिये। कुष्टियों के गुणो, का कीर्तन, तथा लौकिक और वैदिक मूढ़ताओ का त्याग कर शका, काँक्षा व जुगुप्सा आदि से आगे उन्होने यह भी कहा कि जो लोग पापियों को रहित सम्यक्त्व को धारण करता है किन्तु दोनो प्रकार के । दान देते है वे पापो को बढ़ाते है। पापियो को दान देकर सयम रहित होता है वह अधम पात्र बताया गया है। उनका पोषण करना कोश को सुखाना है। वह इस भव में तथा परभव मे दोष ही उत्पन्न करता है। आखेट दान पात्र के अनुसार फलित होता है । अपात्र को करना गहस्थ धर्म नही है, वह घोर पाप है अतः गृहस्थ दिया हुआ दान शून्य अथवा फल रहित जाता है तथा जन ऐसे पापो से बचे । कुपात्र को दिये गए दान का फल बुरा ही होता है। तीनो प्रकार के पात्रों को दान देने से भूतल मे लोग तीन प्रकार प्रनगार धर्म के भोग प्राप्त करते है। यह धर्म का दूसरा भेद है । इस धर्म के धारी मुनीश्वर होते है। वे काम के राग-रंग से दूर हटकर परिग्रह से दान-विधि मुक्त हो पर्वत की कन्दराओ मे रहते है। तपरूपी लक्ष्मी धर्मोपदेशो मे अचार्यों ने दान के सम्बन्ध में अपने से समद्ध वे पथ, नगर या देश से बधते नही। मन का विचार व्यक्त करते हुए यह भी कहा है कि दान तभी मर्दन कर शत्र, मित्र, धन और तृण मे समता भाव रखते सार्थक होता है जब वह विधिपूर्वक दिया जाता है । विधि है, शरीर से ममत्व नही रखते, पुत्र और कलत्र से भी के अन्तर्गत उन्होने कहा कि उत्तम पात्र को दान नवधा स्नेह छोड़ देते है। तपस्यारूपी अग्नि में तप्त वे विकार भक्ति से युक्त होकर ही देना चाहिये। उत्तम पात्रो को रहित प्राप्त भोजन मे ही प्रवृत्त होते है। उनके शरीर में पड़गाह कर उन्हें उच्चासन देवें, उनका पाद प्रक्षालन चर्म और अस्थि मात्र ही शेष रहती है। वे केश लोच करें। प्रक्षालित जल की वन्दनां कर, अर्चना करें और करते है, नग्न रहकर शिला या भूमि पर शयन करते हैं। सिर झुका कर प्रणाम करे । तदनन्तर मन-वचन-काय की शरीर मल से लिप्त हो जाने पर भी वे शरीर से निलिष्त शुद्धि सहित निर्लोभ भाव से आहार देवें। विधि का रहते हैं, अधखले नेत्र रख कर नासाग्र दृष्टि से ध्यानस्थ महत्व प्रतिपादित करते हुए बताया गया है कि विधि के रहते है। उनका अन्तरग शुद्ध होता है, जैसे कछआ अंगों अभाव मे दिया गया आहार अरण्यरोदन के समान को संकोच कर लेता है ऐसे ही वे इन्द्रिय और मन का निष्फल होता है। सकोच कर लेते है। उपदेशकों ने समझाया कि यही है आचार्यों ने यह भी लिखा है कि दया भाव से अनाथो अनगार धर्म। उन्होने कहा कि इसी धर्म के द्वारा ही दीनों और निर्धनों को भोजन, वस्त्र, आभूषण, गाय-भैस, मनुष्य कुकृत्यो का नाश कर परम लक्ष्मी के धारी श्रीधर भूमि और भवन रूपी धन दिया जा सकता है। (नारायण) हलधर, (बलदेव) तथा भरत सदृश चक्रवर्ती दान से सम्बन्धित पात्रो के सम्बन्ध मे जहां एक ओर देवेन्द्र और जिनेन्द्र होता है। Page #30 -------------------------------------------------------------------------- ________________ २८, वर्ष ३६, कि०१ अनेकान्त मरण और शरण जेनेतर मान्यताओं की विवेचना उपदेशों मे सांसारिक नश्वरता का मनोहारी चित्रण उपदेशकों ने जैनधर्म मे दृढ़ता उत्पन्न करने के लिए है। यथार्थता को प्रकट करते हुए उन्होने समझाया है कि जैनेतर मान्यताओं को उपदेशो में समझाने का प्रयत्न हे जीव ! मरण आने पर कही भी शरण प्राप्त नही नही किया है। उन्होने कहा कि बुद्ध के क्षणिकबाद में यदि होती। यमराज के सम्मुख कवच बेकार हो जाते है। जीव क्षण-क्षण मे उत्पन्न होता रहता है, तो प्रश्न उत्पन्न अन्त.पुर की स्त्रिया भी मृत्यु के आने पर छाती पीटती होता है कि जो जीव घर से बाहर चला जाता है वही रह जाती है। सुख से रहने वाले राज मुकूटबद्ध लोगो का घर कसे लौटता है। इसी प्रकार शन्यवादी जो जगत् में भी आयुबन्ध क्षीण हो जाता है, आती हुई मत्यु को कोई शून्य का विधान करते है तो उनके सम्बन्ध मे प्रश्न उत्पन्न दुर्ग भी नहीं रोक सकता। यह सच है कि ध्वजा पताका होता है कि उनके पचेन्द्रियदण्डन चीवतरधारण, व्रत से विनाश ढका नही रह सकता। राज्य की आकांक्षा के पालन सात घड़ी दिन रहते भोजन तथा सिर का मुडन वशीभूत एवं लक्ष्मी के सूखो का उपभोग करने वाले कैसे होता है ? राजाओ मे ऐसे कौन है जो नारकी गण द्वारा मारो मारो शैव मतावलम्बी गगन को सदाशिव कहते है। गगन ध्वनि से गजते हए रोरव नरक मे जाकर नही पड़ते। निष्कल है। जो निष्कल है वह स्वय कैसे पढेगा और किसी अन्य को कैसे पढ़ायेगा? मोक्ष का मार्ग कैसे पाप क्षय दिखावेगा ? निष्कल अष्ट प्रकृति रूप अंगो को कैसे धारण __मन और इन्द्रियाँ पापास्रव की हेतु है। इन्हे ज्ञान करता है तथा दूसरो को कैसे प्रेरित करता और रूपी अंकुश से रोका जा सकता है। स्वाध्याय कर सुदृढ़ राकता है । शृंखला के द्वारा शुभध्यान रूपी खम्भे से उन्हें बाधा जा जो निष्फल है वे तो निश्चल वा ज्ञान शरीरी होते सकता है। आचार्यों ने कहा कि ऐसा कौन-सा पाप है जो हुए स्वभावत: सिद्ध रूप से रहते है। न वे स्वय मरते धर्म के द्वारा न खपाया जा सके। है न उत्पन्न होते है, वे ससार यात्रा में अपने को क्यो डालेगे? लोक की स्थिति अवतारवाद के सम्बन्ध में मुनियो ने कहा कि जैसे उपदेशों में लोक के सम्बन्ध में भी कहा गया है कि उबले जो पुनः कच्चे जो में नही बदले जा सकते, घी पुनः यह ससार न ब्रह्मा के द्वारा निर्मित है, न विष्णु द्वारा दूध नहीं बन सकता। इसी प्रकार सिद्ध हुआ जीव पुनः धारण किया गया है और न ही शिव के द्वारा नष्ट किया देह भार का ग्रहण और विमोचन करने रूप भवसागर मे जाता है। त्रैलोक्य के बीच अनेक द्वीप-समुद्रो से शोभित भ्रमण नही कर सकता है। यह मध्य लोक अपने आप अनन्तानन्त आकाश के मध्य ईश्वरवाद के सम्बन्ध मे उपदेशों मे तर्क संगत प्रश्न स्थित है। यह तीन प्रकार है- प्रथम महलक अर्थात् मिलते हैं जैसे, यदि ईश्वर सर्वार्थ सिद्ध है तो उसे बैल शकोरे के समान, द्वितीय बज्र के समान और तृतीय रखने से क्या प्रयोजन ? यदि वे दयालु हैं तो उन्हे रोद्र मृदंग के समान । शूल रखने से क्या लाभ ? जो वे आत्म सन्तोष से तृप्त हैं तो उनके हाथ में भिक्षा के लिए कपाल क्यों ? इसी संसार में सर्वाधिक शक्तिमान मोह ही है, जिससे प्रकार यदि वे पवित्र है तो हड्डियों के भूषण की उन्हें ज्ञानियो का ज्ञान भी ढक जाता है। इससे मिथ्यादर्शन का चाह क्यों ? प्रसार होता है। अतः उपदेशकों की दृष्टि में यह सेव्य वेद अपौरुषेय हैं इस मान्यता के सम्बन्ध में भी मही है। मुनियों ने गहराई गे विचार किया है। उनका कथन है Page #31 -------------------------------------------------------------------------- ________________ णायकुमार चरित में प्रतिपादित धर्मोपदेशा कि बिना जीव के शब्द की प्राप्ति नही हो सकती, जैसे समझाते हुए कहा कि यह आवश्यक है कि मोक्ष के बिना सरोवर के नया कमल और बिना गाय के दूध । उपदेशक हिंसा और तृष्णा से मुक्त रहे। अत: बिना पुरुष के वेद रचना सम्भव नहीं है। उन्होने यह भी कहा कि ज्ञान और मोक्ष की बातें तभी प्रभावशील होती है जब वे आचरण मे उतरती हैं। सच्चा धम धार्मिक मान्यताओ की विवेचना करने के उपरान्त जो स्वय ही कामनियो के कटाक्ष का शिकार हो जाता है है ऐसा उपदेशक यदि ज्ञान का भी क्यो न उपदेश दे तो जब किसी ने प्रान किया कि फिर वह यथार्थ धर्म कौनसा होगा जिसका हम पालन करे। इसके उत्तर मे मुनियो ने भी वह उपदेश प्रभावहीन ही रहता है। कहा कि काम भोग की इच्छा और स्वर्ग प्राप्ति की इस प्रकार कवि पुष्पदन्त की कृति णायकुमार चरिउ कामनाए जैसे परस्पर विरोधी है, ठीक इसी प्रकार जीव केवल चरित काव्य या कथा मात्र नही है कवि ने कथा के घात और धर्म-पालन दोनो मे सम्बन्ध है, वे दोनो साथ माध्यम से प्रस्तुत कृति में जीवों को वे दुःखी क्यों हैं ? साथ नहीं हो सकते । सच्चा धर्म जीव घात से रहित है। दुख स उन्ह कस छुटका दुख से उन्हे कैसे छुटकारा मिले "ऐसे कल्याणकारी तथ्यों का भी समावेश किया है। यह धर्म दर्शन-ज्ञान-चारित्रमयी है। सच्चा दर्शन उन्ही जीवो को प्राप्त होता है जो न केवल धर्मोपदेश धर्मोपदेशो मे जीव कल्याणार्थी जहां एक ओर मोह र अमित उपदेश मनका कषायो का उपशमन करते और अन्यान्य मतो का सक्षेप से उल्लेख है, दूसरी ओर है और सोलह भावनाओ को भाते है। ऐसे लोग अष्ट धर्म का स्वरूप भेद और गृहस्थी के प्रमुख कर्म दान का मूल गुण रूपी वैभव को भी प्राप्त कर लेते है। देव शास्त्र भी आगमानुसार वर्णन उपलब्ध है। ससारिक-स्थिति को गुरु तीनो मूढताओं और जाति कुलादि अष्ट मदो से मुक्त दर्शा करके कवि ने ससार से भयभीत जनो को संसार का होकर वे अनायतनो की भी सेवा नहीं करते। तप से कारण पाप और पापो के हेतु मन तथा इद्रियो को वश कर्म-मल को जला, केवल-ज्ञान प्राप्त कर मोक्ष जाते करने का उपाय भी बताया है। धर्म से ऐसा कौनसा पाप हैं। ऐसे तपस्वियो का जहां वास रहा है वे पवित्र तीर्थ है जो क्षय न हो। इस प्रकार धार्मिक सक्षिप्श किन्त हो गये है। सारगभित तथ्यों से महित इस कृति को देखकर यदि हम धर्मोपदेशक यह कहें कि कवि ने "गागर मे सागर भर दिया है" तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी। उपदेशक कैसा हो? समय-समय पर मुनियो और सन्तो ने अपने उपदेशों के माध्यम से इस सम्बन्ध मे -जैन विद्या संस्थान, श्रीमहावीर जो 'अनेकान्त' के स्वामित्व सम्बन्धी विवरण प्रकाशन स्थान-वीर सेवा मन्दिर, २१ दरियागज, नई दिल्ली-२ प्रकाशक-वीर सेवा मन्दिर के निमिस श्री बाबूलाल जैन, २, अन्सारी रोड, दरियागंज, नई दिल्ली-२ राष्ट्रीयता-भारतीय प्रकाशन अवधि-त्रैमासिक सम्पादक-श्री पपचन्द्र शास्त्री, वीर सेवा मन्दिर २१, दरियागंज, नई दिल्ली-२ राष्ट्रीयता-भारतीय मुद्रक-गीता प्रिंटिंग एजेसी डी-१०५, न्यू सीलमपुर, दिल्ली-५३ स्वामित्व-वीर सेवा मन्दिर २१, दरियागंज, नई दिल्ली-२ मैं बाबूलाल जैन, एतद् द्वारा घोषित करता हूं कि मेरी पूर्ण जानकारी एवं विश्वास के अनुसार उपयुक्त विवरण सत्य है। बाबूलाल जैन प्रकाशक Page #32 -------------------------------------------------------------------------- ________________ परिग्रह-मोह ने पंचवतों के नाम बदलाए उपप्रचन्द्र शास्त्री, नई दिल्ली आचार्य श्री उमा स्वामी तत्त्वार्थ सूत्र के कर्ता है और जितने अशो में परिग्रह से निवृत्त होता जायगा वैसे-वैसे जैन के सभी सम्प्रदायो में सूत्र की प्रामाणिकता व महत्ता उतने-उतने अंशो मे शुद्ध होता जायगा । जीव की ऐसी आबाल-बद्ध प्रसिद्ध है। सूत्र के पाठ करने मात्र से निवृत्ति से उसकी विशेषताओं का स्वय विकास होगा। उपवास का फल मिल जाता है। ~'दशाध्याये परिच्छिन्ने इसे अहिंसक या सत्यवादी बनने के लिए कुछ ग्रहण करना तत्त्वार्थे पठिते सति । फल स्थादुपवासस्य भाषित नहीं होगा- यह निविवाद है। खेद है कि- वस्तु की मुनिपुंगवः ।।' ऐसी मर्यादा होने पर भी लोग सचय करने या पर को उक्त सूत्र ग्रन्थ जैन-दर्शन के हार्द को स्पष्ट करने पकडने की ओर दौड़ रहे है । देने वाले व्रत प्रादि दे रहे वाला है। इसके सातवें अध्याय के प्रथम सूत्र मे आचार्य हैं और लेने वाले ले रहे हैं। दोनो मे से कोई भी विरत ने व्रत शब्द की जो परिभाषा दी है वह पुण्य-पाप जैसे नही हो रहा । इस पकड़ में लोग यहा तक पहुच गये हैं सभी अंतरंग और धन-धान्यादि बहिरग परिग्रहो से निवत्त कि- उन्होंने पकड़ के नशे में व्रतो के नामो तक को होने की दिशा का बोध देती है-उसमे किसी प्रकार के विपरीत दिशा मे मोड़ दिया है। जहा किसी व्रत का नाम संकल्प-विकल्प तक को स्थान नही, जो यह कहा जा सके यह कहा जा सके हिंसावत' था वहां वे उसे 'अहिंसावत' कहने लगे हैं हसावत था वहा व उस . कि-तू अमुक को ग्रहण कर । पर, आज तो ग्रहण करने उन्हान पचव्रता क नाम हा पकड़ रूप में का ग्रहण सब को प्रस रहा है । भौतिक सुख-सम्पदा है, हिंसाऽनृतस्तेया ब्रह्म परिग्रहेभ्यो विरति* व्रतम् ।'तो उसे ग्रहण करो, धर्म का कोई अग है तो उसे ग्रहण यह व्रत की परिभाषा है। इसका अर्थ है कि-हिंसा, करो: आदि गोया, छोड़ने से किसी को प्रयोजन ही नही। अनुत, स्तेय, अब्रह्म और परिग्रह से विरक्ति- विराम . बस्त स्थिति ऐसी है कि तु अपने मे रहने का पूर्ण लेना अर्थात् इन्हें परिवर्जन करना 'व्रत' है। आचार्य ने अधिकारी है और अपने मे रहने के लिए तुझे शुभ-अशुभ व्रत को दो श्रेणियो मे दर्शाया है-१-अणुव्रत २-महाव्रत । जैसे सभी पर-भावों-परिग्रहो से निवृत्ति आवश्यक है। अणु का अर्थ अल्परूप में और महा का अर्थ महान् रूप में प्रवृत्ति करना तो अपने को कर्मों से आच्छादित करना है। लिया गया है। हम पांचों व्रतों का नामकरण इस प्रकार इसीलिए कहा जाता है कि यह जीव जैसे-जैसे जितने- करते है१-श्री प्राचार्य उमास्वामो के मत में:- (वारण अर्थ) अणुव्रत : १. हिंसा से अणुरूप में विरति-हिंसा-+अणु+ब्रत=हिंसाणुव्रत २. अनुत से , " " =अनृत+ अणु+व्रत = अताणुव्रत ३. स्तेय से , , , =स्तेय+ अणु+व्रत = स्तेयाणुव्रत ४. अब्रह्म से , , , = अब्रह्म+अणु+व्रत = अब्रह्माणुवत ५. परिग्रह से , , , परिग्रह+अणु+व्रत-परिग्रहाणुव्रत महावत : १. हिंसा से महानरूप में विरति= हिंसा+महा+व्रत = हिंसामहाव्रत २. अनृत से , ,, -अनृत+महा+वत = अन्त महावत - . तेभ्यो विरमणं विरति'-सर्वा०७/१, "औपशमिकादिचारित्राविर्भावात् विरमणं विरतिः" -त. वा० ७/१ Page #33 -------------------------------------------------------------------------- ________________ परिपह-मोह ने पंचवतों के नाक बदलाए ३. स्तेय से , ,, -स्तेय + महा + व्रत स्तेय महाव्रत ४. अब्रह्म से , , , =अब्रह्म+महा +व्रत= अब्रह्म महाव्रत ५. परिग्रह से ,, ,, परिग्रह+महा+व्रत परिग्रहमहावत २-अन्य कई प्राचार्यों के मत में :- (वरण अर्थ) अणवत : १. अहिंसा से अणुरूप मे रति-अहिंसा+अणु+व्रत-अहिंसाणुव्रत २. अनुत ॥ ॥ ॥ ॥ =अनृत+अणु+व्रत अनृताणुव्रत .. अस्तेय , , , , =अस्तेय+अणु+व्रत-अस्तेयाणुव्रत ४. ब्रह्म से . , , =ब्रह्म+अणु+व्रत ब्रह्माणुव्रत ५. अपरिग्रह , , , अपरिगह+अणु+व्रतअपरिग्रहाणुव्रत महावत : १. अहिंसा से महतुरू। में रति =अहिंसा+महा+व्रत-अहिंसा महाव्रत २. अनृत , , , , =अनृत- महा + व्रत = अनृत महाव्रत ३. अस्तेय से ॥ ॥ ॥ =अस्तेय + महा + व्रत अस्तेय महाव्रत ४. ब्रह्म , , , , ब्रह्म + महा+क्तब्रह्म महाव्रत ५. अपरिग्रह से , ,, अपरिग्रह + महा +व्रत= अपरिग्रह महाव्रत । वर्तमान में व्रतों मे प्रचचित नामो से 'विरति' पोषक अपनाया। अर्थात् उनके मत में जहां हिंसा का वारण आचार्य श्री उमास्वामी सहमत नहीं। प्रचलित नामो से होता है वहां हिंसा-व्रत (हिंसाविरति) होता है; आदि । 'रति' पोषक आचार्यों का ही सम्बन्ध है और ये रति- यदि हम 'व्रत' शब्द को निवारण अर्थ में न लेकर 'वरण' पोषण प्राणियों की राग-भाव प्रवृत्ति के कारण है। करने के अर्थ में लेंगे तो इससे आ० उमास्वामी का क्योंकि जीवो का अभ्यास प्रवृत्तिरूप मे सहज है और वे मन्तव्य पूग बदल जाएगा यानी हिंसा का वरण करना विरत होने के अभ्यासी नही है। -वे विरतहोने को हिंसावत होगा और तब सूत्र का विरति' शब्द भी व्यर्थ कठिन समझते है और रत होने में सुख मानते हैं। यही हो जायगा तथा पाप को बढावा मिलेगा। कारण है कि वे 'वा' धातु के 'वणोति' (वरण करना) आ० उमास्वामी सम्मत 'विरति' को मुख्य मानकर के भाव मे निष्पन्न 'व्रत' शब्द को ग्रहण करने के प्रभ्यासी जब हम 'विरति' अर्थात् अपरिग्रह को मूल जैन-संस्कृति बनते रहे है और उन्होने अहिंसा आदि को अणु या महत् मानने की बात करते है तब कुछ लोग उसे 'महाभारत' के रूप मे वरण करना श्रेष्ठ माना है, जैसा कि देखने में आ 'अहिंसा परमोधर्मः यतो धर्मस्ततः ......'जैसे नारे में रहा है-अहिंमा+ अणु+व्रत आदि। जब कि उन्हें विलीन करने का प्रयास करते है। हमे नहीं मालम कि सोचना चाहिए था कि वरण करने जैसे भाव में परिग्रह उक्त वाक्य किस जैनाचार्य का है (किसी जैनाचार्य का हो से छूट भी सकेगे या नहीं? तो दिशा-बोध दे, हम साभार विचार करेंगे) और-हमारी आचार्य उमास्वामी को दृष्टि बडी गहरी थी। वे दृष्टि मे आत्म-विषयक 'समयसार' जैसे अध्यात्म-ग्रन्थ में निवारण को इष्ट मानते थे। इसलिए उन्होने 'व्रत' की भी 'अहिंसा' शब्द दृष्टिगोचर नही हुआ जिसे हम आत्मपरिभाषा मे 'विरति' को प्रधानता दी-'ति' को गुण या जन-सस्कृति का मूल मानने के लिए विवश हो प्रधानता नहीं दी और इसीलिए उन्होने 'वृन' धातु के सकें। हो, समयसार ग्रन्थ में 'अपरिग्रह' शब्द का उल्लेख 'वृणोति (वरणार्थक) जैसे रूप को न अपनाकर, उसके अनेक बार किया गया है । इस विषय में हम इससे अधिक निवारणार्थक कर्तवाच्य, णिजन्तरूप 'वारयति'* को (शेष पृ० ३ आवरण) * वृणोति इति कर्मनाम । निवृत्तिकर्म-'वारयति'-इति ।' -निरुक्त २/४/१ पृष्ठ ८ । 卐 महाभारत वन पर्व २०७/७४ और शान्ति पर्व १६९/७० के अंश । Page #34 -------------------------------------------------------------------------- ________________ जरा सोचिए ! १. प्रागम रक्षा : एक समस्या के दो खेमों में बंटे होने से भी कोई निर्णय नहीं। आज के लोकालोक के पदार्थों का निरूपण करने वाले आगम समय मे प्राचीन या नवीन कोई ज्ञाता और निष्पक्ष सैद्धाके नाम पर आज लोगो में बड़ी गरमागरमी है। अमुक न्तिक जज भी ऐसा नही जिसे सव मान देते हों और ना आगम है और अमुक आगम नही है अमुक को निकालो, ही कोई निष्पक्ष, अग्रगण्य नेता ही है जिसका आदेश चलता अमुक को रक्खो ऐमी चर्चा चारों ओर है । जिन लोगो को हो। ऐसी स्थिति में निर्णय कसे हो? आगम की परिभाषा और पागम का स्वरूप तक नही सब जानते है कि दि० जैनियों में ऐसा कोई आगम मालम है वे भी समर्थन और विरोध मे उछल रहे है और उपलब्ध नहीं है, जिसे साक्षात् रूप में गणधर की देशना विद्वान् (?) तो काफी अर्से से दो खेमों में बंटे हुए है। पर, कहा जा सके । यहाँ तो परम्परित आचार्यवों द्वारा इन समर्थक और विरोधियो में आगम के स्वरूप को सही वद्ध गाथाओं, सूत्रो, श्लोकों गद्य-पद्यात्मक व्याख्याओं को रूप में कितनों ने कितना समझा है ? समक्षा भी है या ही आगम मानने का प्रचलन रहा है-सभी मूल-ग्रन्थ नही? या वैसे ही अखाडेबाजी कर रहे हैं ? इसे सर्वज्ञ ही आगम है और इन्ही के पढने-पढ़ाने की परिपाटी रही है । जाने। सम-सामयिक विद्वान् इनका वाचन करके श्रोताओ को हमारी समझ मे दिगम्बरो मे श्रुतकेवली और परम्प- अपनी भाषा मे अपनी बुद्धि के अनुसार मौखिक रूप मे रित आचार्यों को देशना का मूल-संकलन आगम कहलाया उसकी व्याख्या सुनाते रहे है। वे ये भी सकेत देते रहे हैं जाता रहा है और इस तथ्य मे किसी को मत-भेद भी नही कि जो व्याख्यान वे कर रहे हैं वह उनकी अल्पबद्धि से ही है और ना ही मूल को लेकर कोई विरोध है। बर्तमान कर रहे है-विशुद्ध-अर्थ और भाव तो श्रुतके वली या विरोध तो भावार्थ, विशेषार्थ, खलासा अर्थ या नवीन परम्परित आचार्य और आगमज्ञ ही जानें। पुस्तकों आदि को लेकर है। किसी व्यक्ति या समूह ने कालान्तर मे जब विद्वान गण मे लेख की परम्परा किसी मल को अपनी बुद्धि या मन्तव्यानुसार अपनी भाषा चली और वे मल को अपनी भाषा मे व्याख्या, विशेषार्थ, और अपने भावों द्वारा प्रकट कर दिया या वैसी कुछ पुस्तकें भावार्थ आदि के रूपो मे लिपिबद्ध करने लगे तो उसे भी लिख दी-उनको लेकर विरोध है। मूलग्रन्थ के साथ जोड़ा जाने लगा और वह भाग भी ___कहा जा रहा है कि विवादस्थ प्रसगों को, विद्वानो से आगम कहलाया जाने लगा और आज ऐसे ही लेखन किसी निर्णय कराकर निर्णायक कदम उठाया जाय-जैसा वे रूप मे विवाद के विषय बन रहे हैं। बात भी सच है कि मान्य करें-वैसा किया जाय, आदि। पर, उक्त कथन आगम तो मूल है-श्रुतकेवली और परम्परित आचार्यों द्वारा कोई वजन नहीं रखता । क्योंकि इस दिशा में कई बार कृत है। भावार्थ, विशेषार्थ और व्याख्या आदि तो अल्पज्ञो ऐसे प्रयत्न होते रहे हैं। खानियां में कई विषयों पर जाने की अपनी समझ के परिणाम हैं और उनकी प्रामाणिकता माने उद्भट विद्वानों की लिखित चर्चा भी हुई--वह चर्चा की भी कोई गारण्टी नही की जा सकती। फिर भी येनछपाई भी गई। बाद को भी समर्थन और विरोध मे काफी केन प्रकारेण यदि हा ऐसा मान भी ले कि यह सब भी ऊहापोह होता रहा और आज भी बही स्थिति है, विद्वानों आगम हैं तो सभी रूपान्तरकारो को उन आगमों के निर्माता * "जिणिन्दमुहाओ विणिग्गयतार, गणिंद विगुम्फिय गंथ-पयार ।' 'तीर्थकर की धुनि, गणधर ने सुनि, अंग रचे चुनि ज्ञानमयी । सो जिनवर वाणी........... Page #35 -------------------------------------------------------------------------- ________________ होने से श्रुतकेवली और परम्परित आचार्यों में मानना क्या होगा? वे कसे स्वाध्याय करेंगे? क्या उन्हें मन्दिरों होगा-जबकि हम ऐसा मानने को तैयार नहीं । फलतः- मे धर्म सूनाने-पढाने के लिए पडितों का निर्माण करना पड़ेगा? सभी जानते है कि इस युग में पंडितों की संख्या हमारी दृष्टि में विवाद शान्त करने और आगम को में ह्रास हो रहा है । सभी बाते सोचने की है। स्बस्थरूप में सुरक्षित रखने का एक ही उपाय है कि मदिरों में मूल के सिवाय कोई भी वह कृति न रक्खी उक्त स्थिति के अनुसार यदि हम तीन मंत्रों को अपना जाय जो किन्ही परम्परित आचार्यवर्य की न हो। किन्त ले तो समस्या हल हो सकती है । वे मंत्र - ऐसी प्रक्रिया से अनुवादकगण सहमत हो सकेगे और वे १. विसर्जन-अनुवादक और व्याख्याकार आचार्यपदअपने लेखन को आगम-बाह्य होने जैसे तथ्य को स्वीकार प्राप्ति के मोह का विसर्जन करें। कर सकेंगे, इसमें सन्देह है। दूसरी समस्या यह है कि २. अन्वेषण -नेतृत्व के मोही नवीन उपयोगी अन्य काय विवाद-शान्त होने पर नेतागण को क्या काम रह जायगा? का अन्वेषण करें। उन्हें तो काम चाहिए, वे कोई दूसरा मोर्चा संभाल लेगे। ३. उत्पादन - दि० जैन समाज बिद्वानों का उत्पादन करे। तो वहा भी फजीता ही खडा हो जायगा। आपकी समझ मे अन्य और क्या उपाय है? तीसरी महत्त्वपूर्ण बात ये है कि यदि मन्दिरो में जरा सोचिए ! मल मात्र ही सुरक्षित रहा, तो मूल भाषा से अनभिज्ञो का -सम्पादक (पृ० ३१ का शेशोष) क्या लिखें कि-शास्त्रों में प्रथमत: लिपिबद्ध * 'कसाय- आदि से तर-तम रूप में रति करने वाला अण या पाहुडसुन' जो मान्य आचार्य का है, उसमे भी अहिंसा महाव्रती हैं, -ऐसा कही नही कहा गया। उक्त स्थिति शब्द एक बार भी देखने को नही मिला जब कि पूरा होने पर भी हम व्रत को शत्रु को भूत 'रति' को प्रमुखता शास्त्र अपरिग्रह और परिग्रह (कर्मानुदय और कर्मोदय) देने के अभ्यामी बन अपने को अहिंसा आदि से रति करने जैसे प्रसगो से पूर्ण है) सहस्रनामो मे भी जिन' को की ओर मोड़ने मे लगे है और अपरिग्रह से नाता तोड़ रहे अहिंसक जैसे विशेषण से विशिष्ट नही किया गया। हैं ; यह आश्चर्य ही है। अस्तु ! इसी प्रकार जिन शासन में राग (रति) की गणना जिनमार्ग मे चारित्र के आधार पर उसके पालकों को परिग्रहों में की गई है और राग को सभी पापों में कारणभूत श्रावक और मनि' जैसी दो श्रेणियो में विभक्त किया माना गया है और अहिंसक या निष्पाप बनने के लिए रागगया है वह परिग्रह और अपरिग्रह की अपेक्षा मे किया रूप परिग्रह के त्याग पर ही बल दिया गया है । एक तथ्य गया है वह परिग्रह और अपरिग्रह की अपेक्षा में किया यह भी है कि 'राग' चारित्र मोहनीय की प्रकृति है और गया है-परिग्रह की मर्यादा मे श्रावक होता है और मुनि चारित्र मोहनीय के उपशम, क्षयोपशम आदि के बिना, अपरिग्रही। यहाँ भी 'चिरत' शब्द की मुख्यता है - वीतरागता रूप संयम मे श्रद्धा-रूप आचरण का प्रादुर्भाव 'देश सर्वतोऽण महती।' देश-विरत को अणुव्रती और सर्वतः भी नहीं हो सकता। ऐमें मे तथ्य क्या है ? इसे पाठक विरत को महाव्रती कहा गया है। उक्त प्रसग में अहिंसा विचारें।* 'कालक्रम से जब लोगों की ग्रहण और धारणा शक्ति निबद्ध द्वादशाग जैन वाड्मय के भीतर अनुसंधान करने का ह्रास होने लगा, तब श्रृतरक्षा की भावना से प्रेरित पर ज्ञात हुआ है कि कसाय पाहुड ही सर्वप्रथम निबद्ध होकर कुछ विशिष्ट ज्ञानी आचार्यों ने उस विस्तृत हुआ है। इससे प्राचीन अन्य कोई रचना अभी तक श्रुत, के विभिन्न अगो का उपसहार करके उसे गाथा उपलब्ध नहीं है।' -कसाय पाहुड सुत्त, प्रकाशकीय सूत्रों में निबद्ध कर सर्वसाधारण में उनका प्रचार 卐दुषिहं संजय चरणं सायार सह णिराया। जारी रखा। इस प्रकार के उपसंहृत एव गाथा-सूत्र सायारं सग्गंथे पग्गिह रहिए णिरायारं ॥ च, प्रा. २१ Page #36 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Regd. with the Registrar of Newspaper at R. No. 10591/62 वीर सेवा-मन्दिर के उपयोगी प्रकाशन समीचीन धर्मशास्त्र : स्वामी समन्तभद्र का गहस्थाचार-विषयक प्रत्युत्तम प्राचीन ग्रन्थ, मुख्तार श्रीजुगलकिशोर जी के विवेचनात्मक हिन्दी भाष्य और गवेषणात्मक प्रस्तावना से युक्त, सजिल्द । बनपन्च-प्रशस्ति स ग्रह, भाग १: संस्कृत और प्राकृत के १७१ अप्रकाशित ग्रन्थों की प्रशस्तियों का मंगलाचरण सहित प्रपूर्व सग्रह, उपयोगी ११ परिशिष्टों और पं० परमानन्द शास्त्री की इतिहास-विषयक साहित्य परिचयात्मक प्रस्तावना से अलंकृत, सजिल्द । ... बनग्रन्थ-प्रशस्ति संग्रह, भाग २ : अपभ्रंश के १२२ अप्रकाशित ग्रन्थों की प्रशस्तियों का महत्त्वपूर्ण संग्रह। पचपन प्रन्थकारो के ऐतिहासिक ग्रंथ-परिचय और परिशिष्टों सहित। स.पं. परमानन्द शास्त्री। सजिल्द। १५.०० समाधितन्त्र पीर इष्टोपवेश : मध्यात्मकृति, पं० परमानन्द शास्त्री की हिन्दी टीका सहित पवणबेलगोल और दक्षिण के अन्य जैन तीर्थ : श्री राजकृष्ण जैन पाय-दीपिका : प्रा० अभिनव धर्मभूषण की कृति का प्रो० डा० दरबारीलालजी न्यायाचार्य द्वारा सं• अनु०। १.... जैन साहित्य प्रौर इतिहास पर विशव प्रकाश : पृष्ठ सख्या ७४, सजिल्द । सायपाहुडसुत्त : मूल ग्रन्थ की रचना प्राज से दो हजार वर्ष पूर्व श्री गुणधराचार्य ने की, जिस पर श्री यतिवृषभाचार्य ने पन्द्रह सौ वर्ष पूर्व छह हजार श्लोक प्रमाण चूर्णिसूत्र लिखे । सम्पादक पं हीरालालजी सिद्धान्त-शास्त्री। उपयोगी परिशिष्टों और हिन्दी अनुवाद के साथ बड़े साइज के १००० से भी अधिक पृष्ठों में। पुष्ट कागज और कपड़े की पक्की जिल्द । २५... मैन निबन्ध-रत्नावली : श्री मिलापचन्द्र तथा श्री रतनलाल कटारिया व्यानातक (प्यानस्तव सहित) : संपादक पं. बालचन्द्र सिद्धान्त-शास्त्री १२.०.. भावक धर्म संहिता : श्री दरयावसिंह सोषिया बन लक्षणावली (तीन भागों में): स० पं० बालचन्द सिद्धान्त शास्त्री प्रत्येक भाग ४.... जिन शासन के कुछ विचारणीय प्रसंग : श्री पनचन्द्र शास्त्री, बहुचित सात विषयों पर शास्त्रीय प्रमाणयुक्त तर्कपूर्ण विवेचन । प्राक्कथन : सिद्धान्ताचार्य श्री कैलाशचन्द्र शास्त्री द्वारा लिखित मूल जैन संस्कृति अपरिग्रह : श्री पप्रचन्द्र शास्त्री २.०० Jaina Bibliography : Shri Chhotelal Jain, (An universal Encyclopaedia of JainReferences.) In two Vol. (P. 1942) Per set 600-00 आजीवन सदस्यता शुल्क : १०१.०० ३० बार्षिक मूल्य : ६) २०, इस अंक का मूल्य : १ रुपया ५० पैसे विद्वान् लेखक अपने विचारों के लिए स्वतन्त्र होते हैं। यह आवश्यक नहीं कि सम्पादक-मण्डल लेखक के विचारों से सहमत हो। पत्र में विज्ञापन एवं समाचार प्रायः नहीं लिए जाते । सम्पादक परामर्श मण्डल ज्योतिप्रसाद जैन, श्री लक्ष्मीचन्द्र जैन, सम्पादक श्री पचनशास्त्री प्रकाशक-बाबूलाल जैन वक्ता, वीर सेवा मन्दिर के लिए, गीता प्रिंटिंग एजेन्रा, डी०-१०५, न्यूसीलमपुर, दिल्ली-५३ से मुद्रित । Page #37 -------------------------------------------------------------------------- ________________ वीर सेवा मन्दिर का मासिक अनकान्त (पत्र-प्रवर्तक : प्राचार्य जुगल किशोर मुख्तार 'युगवीर') वर्ष ३९: कि०२ अप्रैल-जून १९८६ इस अंक मेंकम विषय १. जिनवाणी-महिमा २. अपभ्रंश कविश्री जोइन्दु का माहित्यिक अवदान ____-~डा. आदित्य प्रचडिया ३. वर्णी वाणी से ४. आचार्य सोमदेव की आर्थिक विचारधारा -श्री चन्द्रशेखर एम० ए० ५. प्राच्य भारतीय भाषाओ में पार्श्वनाथ चरित की परम्परा-डा. राजाराम जैन, आरा ६. जैन विद्याओ मे शोध एक सर्वेक्षण -डा० नन्दलाल जैन, रीवा ७. धर्मसार सतसई : श्री कुन्दनलाल जैन दिल्ली १६ ८. उड़ीसा मे प्राचीन गुफाओ मे दशित जनधर्म एवं भारत-श्री हरेन्द्रप्रसाद सिन्हा ६. सुकेतु श्रेष्ठी की कथा १०. संस्थाओ की सुरक्षा : टेढ़ा प्रश्न -श्री पद्मचन्द्र शास्त्री, नई दिल्ली ११. जरा सोचिए : आगम रक्षा एक समस्या -सम्पादकीय १२. महापाप : परिग्रह-५० जुगलकिशोर आ०पृ० २ प्रकाशक वीर सेवा मन्दिर, २१ दरियागंज, नई दिल्ली-२ Page #38 -------------------------------------------------------------------------- ________________ महापाप : परिग्रह परिग्रह को लोक मे हिंसादिक पापों की दृष्टि से नहीं देखा जाता, सभी उसकी चकाचौंध में फंसे हैं, सभी उसके इच्छुक है और सभी अधिकाधिक रूप से परिग्रहधारी बनना चाहते हैं। ऐसे अपरिग्रही सच्चे साधु भी प्रायः नदीं हैं जो अपने आचरण-बल और सातिशय वाणी से अपरिग्रह के महत्त्व को लोक-हृदयों पर भले प्रकार अंकित कर सकते- उन्हें उनकी भूल सुझा सकते, परिग्रह से उनकी लालसा, गद्धता एवं आसक्तता को हटा सकते, अनासक्त रहकर उसके उपभोग करने तथा लोकहितार्थ वितरण करते रहने का सच्चा सजीव पाठ पढ़ा सकते। कितने ही साध तो स्वयं महापरिग्रह के धारी हैं--मठाधीश, महन्न-भट्टारक बने हुए है, और बहुत से परिग्रह भक्त मेठ साहूकारों को केवल हाँ में हाँ मिलाने वाले है, उनकी कृपा के भिखारी है, उनको असत् प्रवत्तियों को देखते हुए भी सदैव उनकी प्रशंसा के गीत गाया करते है-उनको लक्ष्मी, विभूति एवं प िग्रह की कोरी सराहना किया करते हैं । उनमें इतना आत्मबल नहीं आत्मतेन नही, हिम्मत नही, जो ऐसे महापरिग्रही धनिकों की आलोचना कर सक-उनको त्याग-शन्य निग्गल धन-दोलन क संग्रह की प्रवत्ति को पाप या अपराध बतला सके। इस प्रकार जब सभी परिग्रह की की। मे थोड़े बहुन धंसे हुए हैं- सने हुए है, तब फिर कौन किसी की तरफ अंगुली उठावे और उसे अपराधी अथवा पापो ठहरावे? ऐसो हालत में परिग्रह को आमतौर पर यदि पाप नही समझा जाता और न अपराध ही माना जाता है तो इसमें कुछ भी आश्चर्य नही है। X परिग्रह के होने पर उसके संरक्षण अभिवर्धनादि की ओर प्रवृत्ति होती है। सरक्षणादि करने के लिए अथवा उममें योग देते हुए हिंसा करनी पड़ती है, झूठ बानना पड़ता है, चोरी करनी होती है, मैथनकम में चित्त देना पडता है, वित्त विक्षिप्त रहता है, क्रोधादिक व.पाय जाग उठती है, राग-द्वेषादिक सताते है, भय सता धेरे हिना है, गैबध्यान बना रहता है, तृष्णा : द जाती है, आरम्भ बढ़ जाते है, नष्ट होने अथवा क्षति पहुंचने पर शोर-गन्ताप आ दबात है. चिन्ताओं का तांता लगा रहता है और निराकुलता कभी पास नहीं फटनी। ___ मैंने अपनी जरूरत से धिक परिग्रह का सचय करके दूसरों को उसके भोग-उपभोग से वंचित रखने का अपराध किया है, उसके अर्जन-वर्धन रक्षणादि में मुझ कितने ही पाप करने पड़े है. उसका निरर्गल बढ़ते रहना पापका-आत्मा के पतन का कारण है। x "परिग्रह को ग्रह-पिशान के सदश समझ कर, जो उसका अतिसंग- अत्यासक्ति को लिए हुए सेवन या अतिसंचय-नही करता और आवश्यकता से अधिक परिग्रह का दान करके अपने आत्मा मे शुद्धि बनाये रखना है वही ससार में मुखी तथा वृद्धि को प्राप्त होता है।" -पं० जुगल किशोर 'मुस्तार' के विचार Page #39 -------------------------------------------------------------------------- ________________ वर्ष ३६ किरण २ ओम् अर्हम् अनेका परमागमस्य बोजं निषिद्धजात्यन्धसिन्धुरविधानम् । सकलनयविलसितानां विरोधमथनं नमाम्यनेकान्तम् ॥ वीर-सेवा मन्दिर, २१ दरियागंज, नई दिल्ली-२ वीर - निर्वाण सवत् २५११ वि० सं० २०४३ जिनवाणी - महिमा नित पीजो धो-धारी । जिनवानि सुधासम जानके नित पीजो धी-धारी ॥ वीर- मुखारविन्द तें प्रगटी, जन्म जरा गद-टारी । गौतमादिगुरु उर घट व्यापी, परम सुरुचि करतारी ॥ सलिल समान कलित, मलगंजन, बुध-मन-रंजनहारी । भंजन विभ्रमधूलि प्रभंजन, मिथ्या जलद निवारी ॥ कल्यानतरु उपवन धरनी, तरनी भवजल-तारी । बन्धविदारन पैनी छैनी, मुक्ति नर्सनी सारी ॥ स्वपरस्वरूप प्रकाशन को यह, भानु-कला श्रविकारी । मुनिमन- कुमुदिनि मोदन- शशिभा, शम सुख सुमन सुवारी ॥ जाको सेवत, बेवत निजपद, नसत प्रविद्या सारी । तीन लोकपति पूजत जाको, जान त्रिजग हितकारी ॥ कोटि जीभ सौं महिमा जाकी, कहि न सके पविधारी । बौल' अल्पमति केम कहै यह, अधम उधारन हारी ॥ 00 अप्रैल-जून १६८६ Page #40 -------------------------------------------------------------------------- ________________ अपभ्रश कविश्री जोइन्दु का साहित्यिक प्रवदान Cडा आदित्य प्रचण्डिया 'दीति', अलीगढ़ छठी शती' के अपभ्रंश कवयिता जोइंद्र शात, उदार सम्यक्दष्टि, मिथ्यात्वादि का वर्णन है तो द्वितीय अधिकार एवं बिशुद्ध अध्यात्मवेत्ता थे। जैन परम्पग मे दिगम्बर में मोक्ष स्वरूप, मोक्षमार्ग, अभेद रत्नत्रय, समभाव, पापआम्नाय के आप मान्य आचार्य थे और थे उच्च कोटि के पुण्य को समानता, मोक्षफल और परमसमाधि का उल्लेख आत्मिक रहस्यवादी माधक । रूढ़ि विरोधी नवोन्मेष है। शालिनी शक्तियों की सघर्षात्मक धार्मिक अभिव्यक्ति के विषय प्रतिपादन की दृष्टि से कवि काव्य में औसत्य कविश्री प्रकृष्ट निदर्शन थे। आपके काव्य में आत्मानुभति के अभिदर्शन होते है। कविश्री का 'जिन' शिव और बुद्ध का रस लहराता है। पारिभाषिक शब्दो की अध्यात्म- भी है। आपके द्वारा निम्पित परमात्मा की परिभाषा मे परक अर्थव्यञ्जना कवि काव्य की प्रमुख उपादेय विशे- केवल जैन ही नही अपितु वेदांत, मीमांसक और बौद्ध भी पता है। ममा सके है। विभिन्न दृष्टिकोणों से आत्मा का वास्त__ अपभ्रश का 'दोहा' लारला छंद है। अपनी आध्या- विक रहस्य समझना ही कविश्री का अभीष्ट रहा है। स्मवादी विचारणा की अभिव्यञ्जना में कविश्री जोइन्दु आपने जैनेतर शब्दावलि का व्यवहार भी किया है। आप ने ही सर्वप्रथम दोहाशैली' को अपनाया है। ममन्वय की जहां पारिभाषिक तथ्यों का जिक्र करते है वहां कविश्री उदात्तभावना' से अनवाणित आपकी दो रचनाएं है- रुत हो जाते है। विषयो की निस्सारता और क्षणभंगुरता परमप्प-पयासु अर्थात् परमात्मप्रकाश और जोगमा अर्थात का उपदेश देते हुए भी कविश्री ने कही पर भी कामिनी, योगसार' दोनो ही अपभ्रश वृनियां अधिकाशन दाहा कनन और गृहस्थ जीवन के प्रति कटुता प्रःशित नही की छंद मे ही है । परमात्मप्रकाश' प्रश्नोत्तर गैलो मे आत्मा है।' कविश्री ने अनेक उपमाओ और दृष्टान्तो के माध्यम का प्रकाशन करता है। भट्ट प्रभाकर नाम के जिज्ञासु से अपनी भावाभिव्यक्ति को सरल, सुवोध और सुस्पष्ट शिष्य ने कविश्री के सम्मुख मनार के इस की ममस्या बनाया है। उपमा और दृष्टान्तो में आपके उपमान सामान्य रखी। यथा जीवन की घटनाओ और दृश्यो से चयनित है। यथागउ ससारि वसंताह सामिय कालु अणतु । रा, रगिए हिय वडए देउ ण दीसइ संतु । पर मई कि पि ण पत्तु सुह दुक्खु जि पत्तु महतु॥ दप्पणि मइलए बि जिम एहुउ जाणि णिभतु ।। घउ-गइ-दुक्खहें तत्ताहं जो परमप्पउ कोइ। (परमात्म प्रकाश १।१२० चउ-गइ-दुक्ख-विणासया कहहु पसाएँ सो वि ।। अर्थात् राग रति हृदय मे शांत देव इसी प्रकार (परमात्मप्रकाश १९-१०) नही दीखता जिस प्रकार मलिन दर्पण में प्रतिबिम्ब । यह 'परात्मप्रकाश इस समस्या का मून्दर समाधान है। निश्चय जानिए । 'परमात्मप्रकाश' मे श्लेषालकार के भी इस ग्रंथ मे मधुर, सरल आत्मा की अनभूतिया ही तरगित अभिदर्शन होते हैं। यथाहैं । यह दो अधिकारो (मर्ग) में विभक्त है। प्रथम अधि- तलि अहि रणि वरि घण-वडणु संडस्सय-लुंचोडु । कार में बहिरात्मा, अन्तगत्मा और परमात्मा का स्वरूप, लोहह लग्गिवि हुयवहहँ पिक्चु पडतउ तोडु ॥ निकल और सकन परमात्मा का स्वा , जीव के स्वशरीर (परमात्मप्रकाश २०११४) प्रभाग की चर्चा और द्रव्य, गुण, पर्या, कर्म निश्चय, अर्थात् लोहे का सम्बन्ध पाकर अग्नि नीचे रखे हुए Page #41 -------------------------------------------------------------------------- ________________ अपभ्रंश कविश्री जोइन्दु का साहित्यिक अवदान अहरन ( निहाई) के ऊपर घन की चोट, सडासी से खीचना, चोट लगने से टूटना आदि दुखो को सहती है। अर्थात् लोहे की संगत से लोक प्रसिद्ध देवतुल्य अग्नि दुख भोगतो है इसी तरह लोह अर्थात् लोभ के कारण परमात्म तत्त्व की भावना से रहित मिथ्या दृष्टि वाला जीव घनत सदृश नरकादि दुःखों को भोगता है। अलकार प्रयोग की यह परम्परा उपनिषद्, गीता आदि सभी भारतीय आध्यात्मिक ग्रंथो मे मिलती है । 'परमात्मप्रकाश' की भाषा अधिक समास-बहून, जटिल तया 'णत्व' बिधान बहुल दिखाई पड़ती है । वाग्धाराओं और लोकोक्तियों के व्यवहार से भाषा सौव म वर्द्धन हुआ है। वस्तुतः परमात्मप्रकाश' ज्ञान गरिष्ठ और विचारप्रधान है। इसमे कुल ३४५ पद्य है प्रथम अधि कार मे १२६ पौर द्वितीय अधिकार मे २६ है जिनमे ५ गाथाएं एक सारा मानिनी १ चतुपदिका और शेष सभी दोहे है । पुनरुक्ति होते हुए भी इस ग्रन्थ का विषवियन नहीं है। 'परमकाश' के टीकाकार ब्रह्मदेव कहते हैं-'अत्र भावना प्रथेममालिक पुनरुक्त दूषण नाहित' 'परमात्मप्रकाण' पर ब्रह्मदेव की संस्कृत टीका और प० दौलतराम को हिन्दी टीका महत्त्वपूर्ण कविश्री जोइन्दु की दूसरी रचना 'योगसार' है जो कि 'परमात्मप्रकाश' की अपेक्षा अधिक सरल और मुक्त रचना है। विषय विवेचन मे क्रमबद्धता का अभाव है । अपभ्रंश का यह ग्रन्थ वस्तुत 'परमात्मप्रकाश' के विचारो का अनुवर्तन है जो सुबोध और काव्योचित ढंग से वर्णित । १०८ छंदों की इस लघु रचना मे दोहो के अतिरिक्त पाई और दो सोरठो का भी निर्वाह हुआ है । 'योगसार' मे 'कविधी जोइन्दु ने आध्यात्मच की गूढ़ता को बडी ही सरलता से व्यञ्जित किया है जिनमें उनके सूक्ष्मज्ञान एवं अद्भुत अनुभूति का परिचय मिलता है । यथा जो पाउ वि सो पाउ मुणि सन्बु इ को त्रिणे । संदर्भ - संकेत १. (क) 'परमात्मप्रकाश' की भूमिका, श्री ए. एन. उपाध्ये पृ० ६७ । जो पुपु वि पाउ वि भणइ सो घुह को विहवे ।। अर्थात् जो पाप है उसको जो पाप जानता है, यह तो सब कोई जानते हैं किन्तु जो पुण्य को ही पाप कहता है, ऐसा पडित कोई विरला होता है । ग्रथ के प्रणयन का उद्देश्य स्पष्ट करते हुए कविश्री जोइन्दु कहते हैं कि ससार से भयभीत और मोक्ष के ममुरमुक प्राणियों की आत्मा को जगाने के लिए मैंने इन दोहों का सृजन किया है। यथा--- समारह् भय भीयएण जोगिचन्द मुणिएण । अप्पा सवोहण कथा दोन मनेष ॥ ( योगसार ३. १०८ ) 'परमात्मप्रकाश' और 'योगसार' ग्रन्थों का प्रकाशन श्री रायचन्द्र जैन शास्त्रमाला से डा० ए० एन० उपाध्ये के सम्पादन में सम्पन्न हो चुका है ।" 'योगसार पर ब्र शीतलप्रसाद ने सविस्तार टीका लिखी हैं जो सन् १९५२ में गुना से प्रकाशित हुई है।" कविश्री जोइन्दु ने ब्रह्म के स्वरूप, उसकी प्राप्ति के उपाय आदि का माहक विवरण जनसामान्य की भाषा में प्रस्तुत कर अपनी उदार मनोवृत्ति का परिचय दिया है। वस्तुत मुनिश्री जोइन्दु अपभ्रश माहित्य के महान् आध्या वादी कवि कोविंद है जिन्होन सतिकारी विचारों के साथ-साथ आत्मिक रहस्यवाद की प्रतिष्ठा कर मोक्षमार्ग की उपादेयता सिद्ध की है। कविश्री जोइन्द की वाणी में अनुभूति का वेग एवं सवज्ञान की गम्भीरता समाविष्ट है । कविश्री का प्रभाव अपभ्रंश कविया साथ-साथ हिन्दी के मन कवियों पर भी पड़ा है। कबीर के काति कारी विचारधारा का मूलत कविश्री जाइका काव्य अपायक रहस्यवाद निरूपण मे मुनिधी जोइन् का स्थान सर्वोपरि है तथा भावधारा, विषय, छद, शैली की दृष्टि से कविश्री जोइन्दु का साहित्यिक अवदान महनीय है । मंगलकलश (ख) अपभ्रंश काव्यमयी' की भूमिका, श्री गाधी, पृ० १०२-१०३ । २४, सर्वोदयनगर आगरा रोड, अलीगढ़-२०२००१ ( उ० प्र० ) (ग) अपभ्रम भाषा और साहित्य, डा० देवेन्द्रकुमार जैन, पृ० ८० २. जैन साहित्य की हिन्दी साहित्य को देन, श्री रामसिंह तोमर प्रेमी अभिनंदन ग्रंथ, पृ० ४६८ । Page #42 -------------------------------------------------------------------------- ________________ वर्णी-वाणी से "अनेक पाप हैं लेकिन सबसे बड़ा पाप परिग्रह ही है। यह सबके मन चंचल बना देता है । इसकी दशा गुड़ के समान है। एक बार गुड ने सोचा कि जो देखो वही मुझे खा जाता है यदि सूखा होता हूं तो डली की डली लोग खा जाते हैं, यदि कुछ गीला हो जाता हूं तो पकवान बनाकर लोग खा लेते हैं और कहीं अधिक पतला हो गया-राव बनकर बहने लगा तो तमाखू पीने वाले गुड़ाखू बनाकर पी जाते हैं, इस प्रकार तो संसार में जीन्ग बड़ा कष्ट का है। ऐसा विचार कर वह परमेश्वर के सामने गया और बोला- भगवन्, आप तो सबकी रक्षा करने वाले हैं। मैं भी सबमे से एक हूं अतः मेरी भी रक्षा करो; जो देखो वह मुझे चट कर जाता है। गुड़ की प्रार्थना सुनकर परमेश्वर चुप हो रहे। पांच मिनट बाद गुड ने फिर पूछा- महाराज, क्या आज्ञा होती है ? तब परमेश्वर ने कहाजा, भाग जा, तुझे देख मेरे मुंह में भी पानी आ गया। सो मैया, परिग्रह ऐसी ही चीज है । सबके मन को लुभा लेता है। अतः ऐसा अभ्यास करो जिसमे उससे तुम्हारा सम्बन्ध छूटे ।" X X X X 'मेरा यह दृढ़तम विश्वास हो गया है कि धनिक वर्ग ने पण्डितवर्ग को बिल्कुल ही पराजित कर दिया है। यदि उनको कोई बात अपनी प्रकृति के अनुकूल न रुचे तब वे शीघ्र ही शास्त्र - विहित पदार्थ को भी अन्यथा कहलाने की चेष्टा करते हैं ।" २०-६-५१ ( पृ० ३ का शेषांश) ३. दोहाकोष, महापंडित राहुल सांकृत्याययन, पृ० ५ । ४. तीर्थंकर महावीर और उनकी आचार्य परम्परा, भाग २, डा० नेमिचन्द्र शास्त्री, पृ०२४८ । ५. हिन्दी के विकास में अपभ्रश का योग, डा० नामवर सिंह, पृ० २१७ । ६. जैन शोध और समीक्षा, डा० प्रेमसागर जन, पृ० ५६ । ७. गूढ़ आध्यात्म को व्यक्त करने की दो पशैलिया है, उपनिषद् में इन्हें अपरा और परा विद्या कहते है, बौद्धो मे परमार्थ और व्यवहार सत्य कहते है और जैनों में निश्चय और व्यवहार नय की कल्पना है । 5. (i) मध्यकालीन धर्मसाधना, आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी, पृ० ४४ । (ii) अपभ्रंश और हिन्दी में जैन रहम्यवाद, डा० वासुदेवसिंह, पृ० ४४-४५ । ६. अपभ्रंश साहित्य, हरिवंश कोछट, पृ० २७० । १०. परमात्मप्रकाश, २.१३८, २.१४०; २.७४; २७६ | ११. श्री ब्रह्मदेव ईसा की तेरहवी शती और प० दौलतराम अठारहवी शती में हुए । १२. ( अ ) अपभ्रा काव्य परम्परा और विद्यापति, डा० अम्बादत्त पत, पृ० २३६ । (ब) जैन शोध और समीक्षा, डा० प्रेमसागर जैन, पृ० २३६ । १३. 'योगसार' की टीका ब्र० शीतल प्रसाद ने १३ जून १६३६ को बम्बई श्राविकाश्रम से लिखी तथा पूज्यश्री १०८ मुनि विजय सागर जी तथा श्री १०८ मुनि बिमल सागर जी के दिशा निर्देश मे संवत् २००६ मे गुना ( म०प्र०) से प्रकाशित हुई । यह टीका सविस्तार इसमें एक-एक दोहे को व्यास शैली मे व्याख्यायित किया गया है । 7 Page #43 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्राचार्य सोमदेव की प्राथिक विचारधारा चन्द्रशेखर एम० ए० आचार्य सोमदेव सूरि दिगम्बर सम्प्रदाय के उद्भट करना दूसरो का बोझ ढोने के समान है।' धन की वास्तबाचार्य थे। उनकी विद्वता मे किसी को भी संदेह नही हो विक सार्थकता तभी है, जब उससे मन और ईन्द्रियों की सकता। उनका ज्ञान बहमुखी था और वे विविध विषयो पूर्ण तृप्ति हो। के ज्ञाता थे। आचार्य सोमदेव बहुज धर्मशास्त्री महाकवि, कोष का महत्त्वदार्शनिक, तर्कशास्त्री एव अपूर्व राजनीतिज्ञ थे। यशस्तिलक राजशास्त्र प्रणेताओ ने राज्यागो मे कोप को बडा महत्त्व प्रदान किया है। आचार्य सोमदेव लिखते है कि बम्पू एवं नीतिवाक्यासृत के अवलोकन से उनके विशाल कोष ही राजानो का प्राण है।' सचित कोष संकटअध्ययन एवं विविध शास्त्रों के ज्ञाता होने के प्रमाण मिलते काल में राष्ट्र की रक्षा करता है। वहीं राजा राष्ट्र को हैं। उनकी अलौकिक प्रतिभा पाठको को चमत्कृत कर सुरक्षित रख सकता है जिसके पास विशाल कोष है । देती है सोमदेव सूरि कृत साहित्य के अध्ययन से उनका सचित कोप वाला राजा ही युद्ध को दीर्घकाल तक चलाने धर्माचार्य होना निश्चित होता है। धर्माचार्य होने के कारण में समर्थ हो सकता है। दुर्ग मेस्थित होकर प्रतिरोधात्मक उनमें उदारता का महान गुण भी दृष्टिगोचर होता है । वे धार्मिक, लौकिक, दार्शनिक सभी प्रकार के साहित्य के युद्ध को चलाने के लिए भी सुदृढ कोष की नाबश्यकता होती है। इसलिए कोष को क्षीण होने से बचाने तथा अध्ययन के लिए सबको समान अधिकारी मानते है । सचित कोष की वृद्धि करने क लिए प्राचीन आवार्यों ने आचार्य सोमदेव ने अपने प्रसिद्ध ग्रन्थ नीतिवाक्या अनेक उपाय बतलाये है। राजनीति के ग्रन्थो में अपने मृतम में धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष चारो पुरुषार्थों का महत्त्व के कारण ही कोष एक स्वतन्त्र विषय रहा है। वर्णन किया है। अर्थ को धर्म के समकक्ष स्थान प्रदान आचार्य सोमदेव ने भी अन्य आचार्यों की भाति इस विषय करके आचार्य ने प्राचीन परम्परा मे एक महान् सुधार पर भी प्रकाश डाला है। नीतिवाक्यामतम मे कोष स मुद्देश किया है । जैन संन्यासी होते हुए भी उन्होने अर्थ के महत्व सम्बन्धी बातो का दिग्दर्शन कराता हैं। का भली-भांति अनुभव किया है। धर्म के उपरान्त अर्थ ___ आचार्य सोमदेव ने कोष मम्देश के प्रारम्भ में ही पुरुषार्थ की व्याख्या करते हुए आचार्य मोमदेव ने लिखा कोप की परिभाषा दी है। उनके अनुसार जो विपत्ति और है कि "जिससे सब प्रयोजनो की सिद्धि हो वह अर्थ है।" सम्पत्ति के समय राजा के तन्त्र की वृद्धि करता है वह कोष जो मनुष्य सदैव अर्थशास्त्र के सिद्धान्न के अनुसार है। धनाढ्य पुरुष अथवा राजा को धर्म और धन की प्रर्थानुबन्ध (व्यापारिक साधनो से अविद्यमान धन का रक्षा के लिए तथा सेवको के पालन के लिए कोष की रक्षा संचय, संचित की रक्षा और रक्षित को वृद्धि) से धन का करनी चाहिए। कोष की उत्पत्ति राजा के साथ ही हुई उपभोग करता है वह उसका धनाढ्य हो जाता है। है। जैसा कि महाभारत के दस बर्णन से प्रकट होता हैनैतिक व्यक्ति को अप्राप्त धन की प्राप्ति, प्राप्त की 'प्रजा ने मनु के कोष के लिए पशु और हिरण्य का पचासवाँ रक्षा और रक्षित की वृद्धि करने मे प्रयत्नशील रहना। भाग तथा धान्य का दसवाँ भाग देना स्वीकार किया। चाहिए, क्योकि ऐसा करने वाला व्यक्ति ही भविष्य मे समस्त आचार्यों ने कोप के महत्त्व को स्वीकार किया सुखी रहता है। धन के सदुपयोग पर भी नीतिकार ने । है। आचार्य सोमदेव का उपरोक्त कथन---"कोष ही बहुत बल दिया है । वे लिखते है कि जो लोभी पुरुष अपने राजाओ का प्राण है"-इमके महान् महत्त्व का द्योतक धन से तीथों (सत्पात्रों) का आदर नही करता उनको दान है। आचार्य सोमदेव आगे लिखते हैं कि जो राजा कोड़ीनहीं देता उसका धन शहद की मक्खियो के समान अन्य कोडी करके अपने कोष की वृद्धि नहीं करता उसका व्यक्ति ही नष्ट कर देते है ।' मनुष्य को अपने सुखो का भविष्य में कल्याण नहीं होता।' आचार्य सोमदेव लिखते बलिदान करके धन सग्रह नही करना चाहिए। यह बात हैं राज्य की उन्नति कोष से होती है न कि राजा के शरीर नीति के विरुद्ध है। अनेक कष्ट सहन कर धनोपार्जन से ।" आगे वे लिखते हैं कि जिसके पास कोष वरीत Page #44 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ६, वर्ष ३६, कि० २ अनेकान्त में विजयी होता है।" इस प्रकार आचार्य कोष को राज्य छोड़कर अन्यत्र चली जाती है और इस प्रकार राष्ट्र जनकी सवागीण उन्नति एवं उसकी सुरक्षा का अमोघ साधन शन्य हो जाता है। बिना प्रजा के राज्य का अस्तित्व मानते है। कोष वाले राजा को सेवक और सेना सब कुछ भी नहीं रहता। अन्यत्र आचार्य सोमदेव लिखते हैं कि सुलभ होसकते है। परन्तु कोष विहीन राजा को कोई भी यदि राजा प्रयोजनाथियो के इष्ट प्रयोजन न कर सके वस्तु नही हो सकती। तो उसे उनकी भेंट स्वीकार नही करना चाहिए, क्योंकि प्राय-व्यय-सम्पत्ति उत्पन्न करने वाले न्यायोचित ऐसा करने से लोक मे उसकी हंसी और निन्दा होती है। साधन अथवा उपाय, कृषि, व्यापार आदि एव राज्य द्वारा राजा को अपराधियो के जाने से आये हए, जुआ में जीते उचित कर लगाना आदि को कर कहा गया है। स्वामी हुए, युद्ध में मारे गए, नदी, तालाब और मार्गे आदि में की आज्ञानुसार धन खर्च करना व्यय है। आचार्य सोमदेव मनुष्यों के द्वारा भूले हुए धन का तथा चोरी के धन का, का कथन है कि राजा अपनी आय के अनुसार ही व्यय पति पुत्रादि कुटुम्बियों से विहीन अनाथ स्त्री का अथवा करे, क्योकि जो राजा आय का विचार न करके अधिक रक्षकहीन कन्या का धन एव विप्लव आदि के कारण व्यय करता है वह कुबेर के समान असख्य धन का स्वामी जनता द्वारा छोडे हुए धन का स्वय उपभोग कदापि नहीं होकर भी भिक्षक के समान आचरण करने वाला ही करना चाहिए। इस प्रकार के धन का उपयोग प्रजा की जाता है। एक अन्य स्थान पर वे लिखते है कि नित्य भलाई के कार्यों में तो किया जा सकता था किन्तु उसका धन के भय से सुमेरु भी क्षीण हो जाता है। उपयोग राजा के लिए निषिद्ध था। राजकर के सिद्धान्त-प्राचीन काल में कर के कुछ निश्चित गिद्धान्त थे जिनका उल्लेख धर्मशास्त्रो मे प्राय के स्रोत- प्राचीन काल में राज्य की आय के किया गया है। राजा प्रजा पर कर लगाने मे स्वतन्त्र दा प्रमुख स्रोत थं--(१) भूमि कर तथा (3) अन्य वस्तओं नही था, अपितु वह उन्ही करो को प्रजा पर लगा सकता मता पर लगने वाला कर । राजा की आय का प्रमुख साधन था जिनका प्रतिपादन स्मति ग्रन्थो द्वारा किया गया है। भूमि कर ही था, जो उपज का छठा अश ही था । आचार्य आचार्य सोमदेव का मत है कि अधिक कर लगाकर जनता सोमदेव ने इस सम्बन्ध में कुछ नही लिखा है कि भमिकर का मूलोच्छेदन करना सर्वथा अनु चत है। जिस प्रकार की दर क्या हो। किन्तु नीतिवाक्यामत के आधार पर वक्ष के काटने से केवल एक बार ही फल प्राप्त हो सकते यह कहा जा सकता है कि सोमदेव भी भूमिकर के सम्बन्ध है, भविष्य मे नही।" इसी प्रकार य द जनता पर प्रारम्भ मे उसी प्राचीन परम्परा को मानते थे। प्रथी समदेश के मे ही भारी कर लगा दिए जायेग तो राज्य को केवल एक चौबीसवे सूत्र से ज्ञात होता है कि नीतिवाक्यामत में भी बार ही धन प्राप्त हो सकेगा भविष्य में उसे धन की प्राप्ति छठे भाग का ही अनुमोदन किया गया है। नही हो सकेगी क्योकि भारी करो को एक बार अदा करके आचार्य सोमदेव के अनुसार कृषको के साथ राजा जनता गरीब हो जायेगी और फिर वह कर देने योग्य नहीं का व्यवहार उदारतापूर्वक ही होना चाहिए। अनावृष्टि रहेगी। अत. राज्य को कभी लोभ अथवा तृष्णा के वशी- के कारण यदि फसल अच्छी न हो तो उनको लगान में भूत होकर प्रजा पर भारी कर नही लगाना चाहिए। छूट देनी चाहिए या कृषको को लगान से पूर्णरूपेण मुक्त राजकर साधन था न कि साध्य-आचार्य कर देना चाहिए। कर ग्रहण करने में भी उनके साथ सोमदेव ने कोष वृद्धि में केवल धार्मिक और न्यायिक कठोरता का व्यवहार नही करना चाहिए। जो राजा साधनो का प्रयोग करने की अनुमति प्रदान की है। लगान न देने के कारण कृषको की गेह, चावल आदि की अधार्मिक साधनो द्वारा कोष वृद्धि का उन्होंने विरोध अधपकी फसल कटवा कर हस्तगत कर लेता है वह उन्हें किया है। वे लिखते है कि जब कोषहीन राजा अन्याय- देश त्याग के लिए वाध्य करता है। जिसके कारण राजा पूर्वक प्रजा से धन ग्रहण करता है तो प्रजा उसका देश और प्रजा दोनों को ही आर्थिक सकट का सामना करना पाहा Page #45 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आचार्य सोमदेव की माधिक विचारधारा पड़ता है । अतः राजा को कृषकों के साथ इस प्रकार का एवं वाणिज्य पर राजकीय नियंत्रण न होने से व्यापारी अयनय करना सर्वथा अनुचित है। वर्ग मनमानी करने लगता है। पदार्थों में मिश्रण, तौल में आयात और निर्यात कर नीतिवाक्यामृत में न्यूनता तथा पदार्थों के मूल्य में वृद्धि करना व्यापारी वर्ग आयात और निर्यात कर का भी उल्लेख मिलता है। इम की स्वाभाविक मनोवृत्ति होती है। वणिकजनों के नापसम्बन्ध मे भी आचार्य ने कुछ निर्देश दिए है। उनका तौल में अनियमितता करने तथा मिथ्या व्यवहार के कारण कथन है कि जिस राज्य मे अन्य देश की वस्तुओं पर सोमदेव ने उन्हें पश्यतोहर बतलाया है। पश्यतोहर शब्द अधिक कर लगाया जाता है तथा वहा के राजकर्मचारी स्वर्णकार के लिए रूढ है, किन्तु उक्न दूषित प्रतियो के बलपूर्वक अल्प मूल्य देकर व्यापारियो से बहुमूल्य वस्तुए कारग ही आचार्य मोमदेव ने वणिक्जन को भी पश्यतोहर छीन लेते हैं उस राज्य मे अन्य देशों से माल आना बन्द कहा है। व्यापारी वर्ग को अधिक लाभ लेने से रोकने तथा हो जाता है। इससे राज्य की आय का प्रमुख स्रोत समाप्त वस्तुओं का मूल्य निर्धारित करने की योर भी उन्होंने हो जाता है। अत. बाहर के माल पर अधिक कर नहीं सकेत किया है। व्यापारी वर्ग मूल्य में वृद्धि करने के लगाना चाहिए । अल्प कर लगाने से विदेशी व्यापारियो उद्देश्य से सचित धान्य भण्डारी का विक्रय रोक देते है। को देश मे माल लाने की प्रेरणा मिलती है और वे बहुत इससे राज्य की आर्थिक स्थिति बहुत गम्भीर हो जाती है मा माल लाते है। अधिक आयान होने मे उम पर लगने और जनता को अनेक कष्टो का सामना करना पड़ता है। वाले शूल्क से गजा की आय में पर्याप्त वृद्धि होती है। अतः आर्थिक व्यवस्था को ठीक रखने के लिए राजा का शुल्क स्थानों की सुरक्षा--किमी देश मे बाहर के यह कर्तव्य है कि वह व्यापार मे नाप-तौल की व्यापारी तभी आ सकते है जबकि उनकी सरक्षा की उचित की रक्षा कर । इसके माथ ही राज्य में आर्थिक सव्यवस्था व्यवस्था हो । यदि शूल्क स्थानो पर अथवा मार्ग में उनको एवं उसके मम्मान की रक्षा के लिए व्यापारी वर्ग में सत्य चोर आदि लूट ले या वहाँ के अधिकारी अल्प मल्य देकर निष्ठा उत्पन्न करे। उनकी बहुमूल्य वस्तुप हस्तगत कर ले अथवा उनसे उत्कोच जहां व्यापारी लेन-देन में झूठ का व्यवहार करते है, आदि लेने का प्रयत्न करे तो वहा पर विदेशी व्यापारियो जहा की तुला अविश्वसनीय है, उस देश का व्यापारिक का आना बन्द हो जाता है। इसी कारण आचार्य सोमदेव स्तर अन्य देशो की दृष्टि में हीन और अविश्सनीय हो शुल्क स्थानो की पूर्ण सुरक्षा को अत्यन्त आवश्यक समझते जाता है। इसके परिणाम स्वरूप राज्य के व्यापार को है। उनका कथन है कि राष्ट्र के शुल्क स्थान जो कि महान क्षति पहुचती है। इस कारण व्यापार में मत्यता न्याय से सुरक्षित होते है अर्थात् जहा अधिक कर ग्रहण न का पालन परम आवश्यक है। जहां पर व्यापारी लोग करके न्यायोचित कर लिया जाता है तथा चोरो आदि मनमाना मूल्य बढाकर वस्तुओं को बेचते हैं और कम से द्वारा चुराई गई प्रजा की धनादि वस्तु पुन लौटा दी जाती कम मूल्य में खरीदते है वहां की जनता दरिद्र हो जाती है वहाँ पर व्यापारियो को क्रय और विक्रय योग्य वस्तुओं को है"। अत: राजा को वहां की ठीक व्यवस्था करनी अधिक दुकानें होने के कारण वे स्थान राजा को कामधेनु चाहिए। अन्न, वस्त्र और स्वर्ण आदि पदार्थों का मल्य के समान अभिलषित वस्तुए प्रदान करने वाले होते हैं । देश, काल और पदार्थों के ज्ञान की अपेक्षा से होना व्यापारी वर्ग पर राजकीय नियंत्रण-राज्य का चाहिए"। जो राजा यह जानता है कि मेरे राज्य में या अन्तिम लक्ष्य जनता का कल्याण एवं उसकी सर्वतोमुखी अमुक देश में अमुक वस्तु उत्पन्न हुई है अथवा नही उसे उन्नति करना है। व्यापारी वर्ग जन कल्याण के मार्ग मे देशापेक्षा कहते हैं। इस समय अन्य देश से हमारे देश में बाधक बन सकता है। अत. उस पर कठोर नियन्त्रण रखने अमुक वस्तु का प्रवेश हो सकता है अथवा नहीं इसे काला का आचार्य सोमदेव ने राज्य को निर्देश दिया है। व्यापार पेक्षा कहते है। राजा का कर्तव्य है कि वह उक्त देश Page #46 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ८, वर्ष ३६, कि०२ अनेकान्त कालादि की उपेक्षा का ज्ञान करके समस्त वस्तुओं का परामर्श दिया है । आचार्य का कथन है कि राजा को धान्य मूल्य निर्धारित करे जिससे व्यापारी लोग मूल्य बढ़ाकर एव लवण का संग्रह करना चाहिए क्योंकि यही दो वस्तुएँ प्रजा को निर्धन न बना सकें। संकट काल में प्रजा और सेना को जीवित रखती हैं"। इसके माथ ही राजा को उन व्यापारियों की परीक्षा उनका कथन है कि अन्न संग्रह सब संग्रहों से उत्तम"। भी करते रहना चाहिए जो बहमूल्य वस्तुओं में मिलावट इसका कारण यही है कि अन्न के कारण प्रजा और सेना करते है। दो प्रकार की तुना रखते हो तथा नापने तौलने की जीवन यात्रा चलती है। धान्य संग्रह न करने से होने के बाटो आदि मे कमी-वेशी करते हो। यदि व्यापारी वाली हानि की ओर भी आचार्य ने सकेत किया है। इस लोग परस्पर की ईर्ष्या के कारण वस्तुओ का मूल्य बढ़ा संबंध में सोमदेव ने लिखा है कि जो राजा अपने देश में देवें तो ऐसी स्थिति मे राजा का यह कर्तव्य हो जाता है धान्य-सग्रह नही करता और अधिक व्यय करता है तो तो वह बढाये हुए मल्य को व्यापारी वर्ग से छीन ले और उसके राज्य मे सदैव दुर्भिक्ष रहा करता है"। अतः राजा उन्हें केव न उचित मल्य ही दे"। यदि किसी व्यापारी ने को शरद् और ग्रीष्म ऋतु मे दोनो फसलों के समय धान्य किमी की बहुमूल्य वस्तु को धोखा देकर अल्प मूल्य मे संग्रह कर लेना चाहिए। यह धान्य दुभिक्ष के समय क्रय कर लिया है तो राजा विक्रेता की बहुमल्य वस्तु पर प्रजा को भी उचित मूल्य पर दिया जा सकता है। इस अपना अधिकार कर ले एव विक्रेता को उतना मूल्य दे, प्रकार जनता सकट काल का सामना आसानी से कर जितना कि उसने क्रेता को दिया था । अन्न संग्रह करने लेती है। वालो को आचार्य सोमदेव ने राष्ट्र कडकों की सूची में इस प्रकार नीतिवाक्यामत में राज्य की आर्थिक रखा है और उन पर पूर्ण नियंत्रण रखने का राजा को स्थिति को सदढ़ बनाने, कोष वृद्धि करने, व्यापार एवं आदेश दिया है। गजा को उनकी उपेक्षा कभी नही वाणिज्य पर नियत्रण रखने एवं वस्तुओं का मूल्य निर्धाकरनी चाहिए और उनको कठोर दण्ड देना चाहिए, क्योकि रित करने के सम्बन्ध मे बहुत उपयोगी विचार व्यक्त किए वे लोग अन्न संग्रह करके मूल्यों में वृद्धि कर देते है जिससे गये हैं। सोमदेव ने कृषि, व्यापार एवं पशुधन को राज्य जनता को अनेक प्रकार के कष्टो का सामना करना पड़ता की आर्थिक समृद्धि की आधारशिला बतलाया है। इससे है। ये लोग अन्न-सकट के उत्पन्न करने वाले है। अतः स्पष्ट होता है कि एक धर्माचार्य होने के साथ-साथ आचार्य राजा को सदैव इनसे मावधान रहना चाहिए। आचार्य सोमदेव एक बहुत बड़े अर्थशास्त्री भी थे। उनके उपर्युक्त मोमदेव का कथन है कि जो राजा अन्यायो की उपेक्षा आर्थिक सिद्धान्त आधुनिक युग के लिए भी महान उपयोगी करता है उसका राज्य नष्ट हो जाता है। इसके अति- है। राज्य की सुदृढ आर्थिक ब्यवस्था के लिए इनका अनुरिक्त अ चार्य सोमदेव ने दुर्भिक्ष तथा सकट काल का करण अत्यन्त आवश्यक है। मामना करने के सम्बन्ध में भी राजा को बहुत सुन्दर -जैन कालिज, बड़ौत संदर्भ-सूची (नीतिवाक्यामृत) १. २१, २. २।२, ३.२१४, ४. ३१५, ५. ३।६, ६. २११५, २५.१८, १३, २६. ८, १४, २७. ८, २५, २८.८, १९६७ ७. २१११, २६. १८,१८, ३०. ८, १९, ३१. ८, २१, ३२. १८, २७ ६. २११४, १०.२११७, ११. २११८, १२. १६, १८ । ३३. १८, ७१, ३४.१८, ६६, ३५.८,६। १३.८, ५, १४.१४, २६, १५. २१, ६, १६. १७, ५०, ८. यो विपदि सपदि च स्वामिनस्तंत्राभ्युदयं कोशयतीति १७. ६, ५, १८. ध, २४, १६. १६, १५, २०.८, ११-१२, कोशः। २१. १६,२१, २२. ८, १७, २३. ८, १५, २४. १८, १६, --महाभारत शान्तिपर्व ६७,२३-२४ Page #47 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्राच्य भारतीय भाषाओं में पार्श्वनाथ चरित की परम्परा ० डा० राजाराम जैन, आरा भण्डर जयपुर में सुरक्षित है, जिसमें कुल ६६ पत्र हैं । इन पत्रों की लम्बाई एवं चोड़ाई १० X ४॥ " है । उसके प्रत्येक पत्र में १२ पंक्तियां तथा प्रत्येक पं० में ३५-४० वर्ण हैं। इसका प्रतिलिपि काल वि० सं० १५७७ है। यह प्रति शुद्ध एवं स्पष्ट रूप से लिखित है ।" संस्कृत, प्राकृत अपभ्रंश, हिन्दी एवं अन्य भारतीय भाषाओ के कवियों में भगवान् पार्श्वनाथ का जीवन-चरित बड़ा ही लोकप्रिय रहा है । आगम साहित्य एवं विविध महापुराणों में उनके अनेक प्रासंगिक कथानक तो उपलब्ध होते ही हैं, उनके अतिरिक्त स्वतन्त्र, सर्वप्रथम एव महाकाव्य शैली में लिखित जिनसेन (प्रथम कृत पार्श्वभ्युदयकाव्य' (वि०स० वी सदी) एवं वादिराजकृत पार्श्वनाथचरितम्' (वि० सं० २०६२) संस्कृत भाषा मे देवभद्र कृत पासणाहचरियं (वि० सं० १९६८ ) प्राकृत भाषा में तथा कवि पद्मकीति कृत पासणाहचरिउ (वि० सं० १९८१) अपभ्रंश भाषा मे उपलब्ध है। इन काव्य रचनाओ से परवर्ती कवियो को बड़ी प्रेरणा मिली और उन्होने भी विविध कालो एव विविध भाषाओं में एतद्विषयक अनेक रचनाए लिखी, जिनमे से विबुध श्रीधर' (वि०म० १९८६) माणिक्यचन्द्र' (१३वी सदी), भावदेवमूरि ( वि० स० १३५५), असवाल' (१५वी सदी), भट्टारक सकल कीर्ति ' वि० सं० १५वी सदी), कवि रइधू (वि० सं० १५-१६वी सदी) कवि पद्मसुन्दर" एव हेमविजय" (१६वी सदी) तथा पण्डित भूधरदास ३ (१०वी सदी) आदि प्रमुख है। विबुध श्रीधर कृत पासणाह रिउ - 'पार्श्वनाथ चरित' सम्बन्धी उक्त रचनाओं में से विबुध श्रीधर कृत 'पासणाहचरिउ', जो कि अद्यावधि अप्रकाशित है, उस पर प्रस्तुत निबन्ध मे कुछ प्रकाश डालने का प्रयास किया जा रहा है। इसका कथानक यद्यपि परम्परा प्राप्त ही है, किन्तु कथावस्तु-गठन, भाषा, शैली, वर्णन प्रसंग, समकालीन संस्कृति एवं इतिहास - सम्बन्धी सामग्री की दृष्टि में यह रचना विशेष महत्त्व - पूर्ण है । मूल प्रति परिचय उक्त 'पासणाहचरिउ' की एक प्रति आमेर शास्त्र अनेक विबुध श्रीवरों की भिन्नाभिन्नता - जैन साहित्य मे लगभग आठ विबुध श्रीधरों के नाम एव उनकी लगभग उतनी ही कृतिया उपलब्ध होती हैं । यथा – (१) पासणाहचरिउ, (२) बड्ढमाणचरिउ, (1) सुकुमाल चरिउ, (४) भविसयत्तकहा ", (५) भविसयत्त० पचमीचरित्र", (६) भविष्यदत्तपंचमीकथा, (७) विश्वक लोचनकोश" (c) श्रुतावतारकथा " । इनमें से अन्तिम तीन रचनायें संस्कृत भाषा में तथा पांचवीं रचना अप भाषा में निबद्ध है । अन्तर्बाह्य साक्ष्यों के आधार पर तथा उनके रचनाकालों को ध्यान में रखते हुए यह स्पष्ट विदित हो जाता है कि उन चारों कृतियो के लेखक भिन्न. भिन्न विबुध श्रीधर है । क्योकि उनका रचनाकाल वि० से... "तक है, जो कि प्रस्तुत पासणाहचरिउके रचनाकाल ( वि० सं० १९८६ ) से वर्षो के बाद की है। इनका परस्पर में किसी भी प्रकार का मेल नही बैठता । स अवशिष्ट प्रथम चार रचनायें अपभ्रंश की हैं। उनकी प्रशस्तियों से ज्ञात होता है कवि विबुध श्रीधर की हैं, आश्रय मे लिखी गयीं । कवि परिचय - कि वे चारो रचनायें एक ही जो विविध आश्रयदाताओं के सन्दर्भित 'पासणाहचरिउ' की प्रशस्ति में विबुध श्रीधर ने अपने पिता का नाम गोल्ह एवं माता का नाम वील्हा बतलाया है । इसके अतिरिक्त उसने अपना अम्य किसी भी प्रकार का पारिवारिक परिचय नहीं दिया । Page #48 -------------------------------------------------------------------------- ________________ १० वर्ष ३६, ति० २ अनेकान्त ... 'पासणाचरिउ' की समाप्ति के एक वर्ष बाद प्रणीत अपने से कवि का कुल जीवन-काल वि० सं० ११६४ से १२३० बडढमाणचरिउ' में भी उसने अपना भाव उक्त परिचय ही तक माना जा सकता है। प्रस्तुत किया है। वह गृहस्थ था अथवा गृह विरत त्यागी, निवास एवं सावना स्थान तथा समकालीन राजा aani इसकी उसने कोई भी चर्चा नही की। कवि की 'विबुध' 'पासणाहचरिउ' की प्रशस्ति में उसने अपने को हरनामक उपाधि से यह तो अवश्य ही अनुमान लगाया जा याणा देश का निवासी बताया है और कहा है कि वह सकता है कि अपनी काव्य प्रतिभा के कारण उसे सर्वत्र वहा से 'चदप्पहचरिउ' की रचना-समाप्ति के बाद यमुना सम्मान प्राप्त रहा होगा, किन्तु इससे उसके पारिवारिक नदी पार करके 'ढल्ली आया था। उस समय वहां राजा जीवन पर कोई भी प्रकाश नहीं पड़ता। 'पासणाहचरिउ' अनगपाल तोमर का राजा था जिसने । अनगपाल तोमर का राज्य था, जिसने कि हम्मीर जैसे एवं 'वडढमाणचरिउ' की प्रशस्तियों के उल्लेखानुसार कवि बीर राजा को भी पराजित किया था। यथा-णिरुदल ने 'चंदप्पहचरिउ"" एवं संत 'जिणेसरचरिउ नामक दो वट्रिय हम्मीर वीरु......पास ४२। रचनाएं और भी लिखी थीं। किन्तु ये दोनोअभी तक १८वी गदी के अज्ञात कर्तक 'इन्द्रप्रस्थ प्रबन्ध ५८ अनुपलब्ध ही हैं। हो सकता है कि कवि ने अपनी इन नामक ग्रन्थ मे उपलब्ध तोमरवशी १६ राजाओं में से उक्त प्रारम्भिक रचनाओं की प्रशस्तियों में स्व.विषयक कुछ अनंगपाल १६वॉ राजा था। इनमे अनंगपाल नाम के ३ विशेष परिचय दिया हो, किन्तु यह मब तो उन चनामों राजा है। जिनमें से प्रस्तुत अनगपाल तीसरा था। इसने की प्राप्ति के बाद ही कुछ कहा जा सकेगा। जिस सम्मीर वीर को पराजित किया था प्रतीत होता है काल निर्णय - कि वह वागढा नरेश हालिराव हम्मीर रहा होगा, जो विबुध श्रीधर की जन्म अथवा अवसान सम्बन्धी एक बार का भरकर अग्दिल में जा घुसता था और उसे तिथियां भी अज्ञात है। उनकी जानकारी के लिए मन्दर्भ- गैद डालता था। इसी कारण हम्मीर को हालिराव' सामग्री का सर्वथा अभाव है। हनना अवष्य है कि कवि की सज्ञा प्रदान की गई थी, जैसा कि 'पृथिवीराजरासो' मे की उपलब्ध निम्न चार रचनाओ की प्रशस्तियों में उनका एक उल्लेख मिलता है :रचना-समाप्तिकाल अकित है। इनके अनुसार 'पासणाह- "हॉहते ढीलन करियलकारिय अरि मध्य । चरिउ' तथा 'वड्ढमाणचरिउ' का रचना-समाप्तिकाल ताथ विरद हम्मीर को “हाहुलिराव" सुकथ्य ।। क्रमशः वि० सं० ११८६ एवं ११६० तथा समाल चरिउ सम्भवतः इसी हम्मीर को राजा अनगपाल ने हराया एवं भविसयत्तकहा का रचना माप्तिकाल क्रमश ति० होगा। युद्ध मे उसके पराजित होते ही उसके साथी अन्य सं० १२०८ और १२३० है"। जमा कि पूर्व में बनाया राजा भी भाग खड़े हुए थे । यथा - जा चुका है, 'पासणाहचरिउ' एव 'वड्ढमाण चरिउ' गे सेबय सोण कीर हम्मीर वि सगरु मेल्लि चल्लिया ॥छ। जिन पूर्वोक्त 'चंद पहचरिउ' एवं 'स-जिणसरचरिउ' नामक -पास० ४।१३।२ अपनी पूर्वरचित रचनाओ के उल्ने । कवि ने किए है, वे अर्थात मिन्धु, सोन एव कीर नरेशो के साथ राजा आद्यावधि अनुपलब्ध ही हैं। उन्हें छोड़कर बाकी उपलब्ध हम्मीर भी सग्राम छोड़कर भाग गया। चारों रचनाओं का रचनाकाल वि० स० ११८६ से १ ३० विबुध श्रीधर ने जिम दिल्ली नगर की चर्चा की है, तक का सुनिश्चित है । अब यदि यह मान लिया जाय कि आधुनिक दिल्ली का ही वह तत्कालीन नाम है। कवि के कवि को उक्त प्रारम्भिक रचनाओ के प्रणयन मे ५ वर्ष समय में वह हरयाणा-प्रदेश का ही एक प्रमुख नगर था। लगे हो तथा उसने २० वर्ष की आयु से साहित्य-लेखन 'पृथिवीराजरासो' में पृथिवीराज चौहान के प्रसंगों में का कार्यारम्भ किया हो तब अनुमान , कवि की कुल आयु ढिल्ली के लिए 'दिल्ली' शब्द का ही प्रयोग हुआ है। लगभग ६३ वर्ष की सिद्ध होती है और जब तक अन्य उसमे इम नामकरण की एक मनोरंजक कथा भी कही गई ठोस सन्दर्भ सामग्री प्राप्त नहीं होती, तब तक मेरी दृष्टि है, जिसे तोमरवंशी राजा अनंगपाल की पुत्री अथवा Page #49 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्राच्य भारतीय भाषाओं में पाश्र्वनाथ चरित की परम्परा पृथिवीराज चौहान की माता ने स्वय पृथिवीराज को उन्हे कभी तो मारते है और कभी टेढ़ी-मेढ़ी आंखें दिखाते सुनाई थी। उसके अनुसार राज्य की स्थिरता के लिए है अथवा कभी वे उनका हाथ, पैर अथवा सिर ही तोड़ एक ज्योतिषी के आदेशानुसार जिस स्थान पर कीली गाडी देते है। किन्तु मै तो ठहरा सीधा, सादा, सरल स्वभावी, गई थी, वह स्थान प्रारम्भ मे "किल्ली के नाम से प्रसिद्ध अन: मैं किसी के घर जाकर उससे नहीं मिलना चाहता। हुप्रा, किन्तु उस कील को ढीला कर देने से उस स्थान का नाम 'दिल्ली' पड़ गया, जो कालान्तर में दिल्ली के किन्तु अल्हण साहू के पूर्ण विश्वास दिलाने एवं बारनाम से जाना जाने लगा। १५वी सदी तक दिल्ली के ११ बार आग्रह करने पर कवि साहू नट्टल के घर पहुंचा तो नामो में से दिल्ली भी एक नाम माना जाता रहा जैसा । जैसा वह उसके मधुर-व्यवहार से बड़ा सन्तुष्ट हुआ। नट्टल ने कि "इन्द्रप्रस्थ-प्रबन्ध (श्लोक संख्या १४-१५) मे एक कवि को प्रमुदित होकर स्वयं ही आसन पर बैठाया और उल्लेख मिलता है : सम्मान-सूचक ताम्बूल प्रदान किया। उस समय नट्टल एवं शक्रपन्धा इन्द्रप्रस्था शुभकृत् योगिनीपुर । श्रीधर दोनो के मन में एक साथ एक ही जैसी भावना दिल्ली ढिल्ली महापुर्या जिहानाबाद इष्यते ।। उदित हुई। वे परस्पर मे सोचने लगे कि :-- सुषेण महिमायुक्ता शुभाशुभकरा इति । ज पुव जम्मि पविर इउ किंपि इह विहिवसेण परिणवइ तंपि एकादश मित नामा दिल्ली पूरी च वर्तते ।। [शमा ___अर्थात् "हमने पूर्वभव मे ऐमा कोई सुकृत अवश्य इस प्रकार पासणाहचरिउ में राजा अनगपाल, राजा हम्मीर-वीर एव ढिल्ली के उल्लेख ऐतिहासिक दृष्टि से किया था, जिसका आज यह मधुर फल हमे मिल रहा है।" बड़े महत्त्वपूर्ण है। इन सन्दर्भो तथा समकालीन साहित्य साह नट्टल के द्वारा आगमन-प्रयोजन पूछ जाने पर एव इतिहास के तुलनात्मक अध्ययन से मध्यकालीन भार- कवि ने उत्तर में कहा- "मै अल्हण साहू के अनुरोध से तीय इतिहास के कई प्रच्छन्न अथवा जटिल रहस्यो का आपके पास आया है। उन्होंने मुझसे आपके गुणों की चर्चा उद्घाटन सम्भव है। की है और बताया है कि आपने एक 'आदिनाथ-मन्दिर' का निर्माण कराकर उस पर "पचरगे झण्डे" को फहराया है। आश्रयदाता नट्टल साहू-- आपने जिस प्रकार उम भव्य मन्दिर की प्रतिष्ठा कराई है, जैसा कि पूर्व मे लिखा जा चुका है कि प्रस्तुत रचना उसी प्रकार आप एक "पार्श्वनाथ चरित" की रचना कराकी आद्य-प्रशस्ति के अनुमार कवि अपनी 'चदापहचरिउ' कर उसे भी प्रतिष्ठित कराइए जिससे आपको पूर्ण सुखकी रचना-समाप्ति के बाद असख्य कार्य-व्यस्त ग्रामो वाले समृद्धि प्राप्त हो सके तथा कालान्तर में जो मोक्ष-प्राप्ति हरयाणा-प्रदेश को छोड़कर यमुना नदी पारकर ढिल्ली का कारण बन सके। इसके साथ-साथ आप चन्द्रप्रभ स्वामी आया था, तथा वहा राजा अनगपाल के एक मन्त्री साहू की एक मूर्ति अपने पिता के नाम से उस मन्दिर में प्रतिअल्हण से उसकी सर्वप्रथम भेट हुई। साहू अल्हण उसक ष्ठित कराइए" । कवि के कथन को सुनकर साहू नट्टल ने 'चदपहचरिउ' का पाठ सुनकर इतना प्रभावित हुआ कि । तत्काल अपनी स्वीकृति प्रदान कर दी। उसने कवि को नगर के महान् साहित्य रसिक एव प्रमुख सार्थवाह साहू नट्टल से भेट करने का आग्रह किया, किन्तु कुछ भ्रान्तियांकवि बडा सकोची था। अत: उसने उनसे भेट करने की कुछ विद्वानो ने 'पासणाहचरिउ' के प्रमाण देते हुए अनिच्छा प्रकट करते हुए कहा कि- हे साहू, ससार में नट्ठल साहू द्वारा दिल्ली में पार्श्वनाथ मन्दिर के निर्माण दुर्जनों की कमी नही, वे कूट-कपट को ही विद्वत्ता मानते कराए जाने का उल्लेख किया है" और विद्वज्जगत में अब है, सज्जनो से ईष्या एव विद्वेष रखते है तथा उनके सद्- लगभग वही धारणा बनती जा रही है, जबकि वस्तुस्थिति गुणों को असह्य मानकर उनसे दुर्व्यवहार करते है। वे उससे सर्वथा भिन्न है । यथार्थतः नट्टल से दिल्ली में पार्व, Page #50 -------------------------------------------------------------------------- ________________ अनेकान्त १२२०२ नथ मन्दिर नहीं आदिनाथ जिन मन्दिर का निर्माण कराया था जैसा कि आद्य - प्रशस्ति में स्पष्ट उल्लेख मिलता है :सित्ययक पइट्ठावियउ जेण पढमब को भणियइँ सरिसु तेण । [tive] कारावेवि जाहेयो णिकेउ पविइष्णु पंचवण्ण सुकेउ । पप परिय जेम पासही परितु जपु वितेम ।। पास० १।१।१-२ अर्थात् आपने नाभेय-निकेत [आदिनाथ जिनमन्दिर ] का निर्माण कराकर उस पर पाच वर्ण वाले ध्वज को फहराया है। जिस प्रकार आपने उक्त मन्दिर का निर्माण कराकर उसकी प्रतिष्ठा कराई है, उसी प्रकार यदि मैं 'पार्श्वचरित' की रचना करूं तो आप उसकी भी उसी प्रकार प्रतिष्ठा कराइये । उक्त वार्तालाप कवि श्रीधर एव नट्टल साहू के बीच का है। उस कथन में पार्श्वनाथपरित नामक ग्रन्थ के निर्माण एवं उसके प्रतिष्ठित किए जाने की चर्चा तो अवश्य बाई है, किन्तु पार्श्वनाथ के मन्दिर के निर्माण को कोई चर्चा नहीं और कुतुबुद्दीन ऐबक ने नट्टल साहू द्वारा निर्मित जिस विशाल जैन मन्दिर को ध्वस्त करके उस पर "कुब्बतउल-इस्लाम" नाम की मस्जिद का निर्माण कराया थ वह पार्श्वनाथ का नही आदिनाय का मन्दिर था। पार्श्वनाथ मन्दिर के निर्माण कराए जाने के समर्थन मे विद्वानो ने जो भी सन्दर्भ प्रस्तुत किए हैं उनमें से किसी एक से भी उक्त तथ्य का समर्थन नहीं होता" प्रतीत होता है कि पार्श्वचरित को ही भूल से पार्श्व मन्दिर मान लिया गया जो सर्वया भ्रमात्मक है। इसमे सुधार होना अत्यावश्यक है । इसी प्रकार साहू नट्टन को अहस मान लिया गया, जो कि सर्वथा मिथ्या है। विधिवत् अध्ययन न करने अथवा उनकी समझने या आनुमानित आधारों पर प्रायः ऐसी हो भ्रम पूर्ण बातें कह दी जाती है जिनसे यथार्थ तथ्यों का क्रम हो लड़खड़ा जाता है । पासणाहचरिउ की प्रशस्ति के अनुसार अन एवं नट्टल दोनों वस्तुतः घनिष्ट मित्र थे, पिता-पुत्र नहीं । बल्हण राज्यमन्त्री था, जब कि नट्टत साहू दिल्ली नगर का एक सर्वश्रेष्ठ सार्थवाह, साहित्य रसिक उदार, का पुत्र मूलग्रन्थ का भाषा को न दानी एवं कुशल राजनीतिज्ञ वह अपने व्यापार के कारण अग, बग, कलिंग, गौड़, केरल, कर्नाटक, चोल, द्रविड, पांचाल, सिंध, खश, मालवा, लाट, जट्ट, नेपाल, टक्क, कोंकण, महाराष्ट्र, भादानक, हरयाणा, मगध, गुर्जर एवं सौराष्ट्र जैसे देशों में प्रसिद्ध तथा वहां के राजदरबारों में उसे सम्मान प्राप्त या" कवि ने इसी नट्टल साहू के आश्रय में रहकर 'पासणाहचरित' की रचना की थी। इस रचना की आदि एवं अन्त की प्रशस्तियों एवं पुष्पिकाओ में साहू नट्टल के कृतित्व एवं व्यक्तित्व का अच्छा परिचय प्रस्तुत किया गया है। प्रस्तुत "पासणाहचरित" मे कुल मिलाकर १२ संधियएव २४० कवक है। कवि ने इसे २५०० प्रत्य प्रमाण कहा है। कवि ने वर्ण्य विषय का वर्गीकरण निम्न प्रकार किया है : सध १- आद्य प्रशस्ति के बाद वैजयन्त विमान से कनकप्रभदेव का चयकर वामादेवी के गर्भ में आना । मन्धि २ - राजा हयसेन के यहां पार्श्वनाथ का जन्म एव बाल लीलाएँ । सन्धि ३ - हयसेन के दरबार मे यवन नरेन्द्र के राजदूत का आगमन एवं उसके द्वारा हयसेन के सम्मुख यवन नरेन्द्र की प्रशसा । सन्धि ४ - राजकुमार पार्श्व का यवन-नरेन्द्र से युद्ध तथा मामा रविकीर्ति द्वारा उसके पराक्रम की प्रशमा । -- सन्धि ५ रविकीति द्वारा पार्श्व मे अपनी पुत्री के साथ विवाह कर ले का प्रस्ताव। इसी बीच में वन में जाकर जलते हुए नाग-नानी को अन्तिम बेला में मंत्र-प्रदान एवं वैराग्य । सन्धि ६ हयसेन का शोक सन्तप्त होना पार्श्व की घोर तपस्या का वर्णन । सन्धि ७- पार्श्व तपस्या एवं उन पर कमठ द्वारा किया गया घोर उपसर्ग सन्धि ८६ - कैवल्य प्राप्ति एवं समवशरण- रचना एवं धर्मोपदेश | सन्धि १० रविकीति द्वारा दीक्षा ग्रहण सन्धि ११ – धर्मोपदेश । Page #51 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्राच्य भारतीय भाषाओं में पार्वनाथ चरित की परम्परा सन्धि १२-पार्श्व के भवान्तर तथा हयसेन द्वारा दीक्षा- तापस, राज-दरबारो के सूर-सामन्त हों अथवा साधारण ग्रहण । अन्त्य-प्रशस्ति । प्रजाजन, उन सभी के मनोवैज्ञानिक वर्णनो में कवि की पासणाहचरिउ में उपलब्ध समकालीन कछ ऐति- लेखनी ने अदभुत चमत्कार दिखलाया है। इस प्रकार के हासिक तथ्य वर्णनो मे कवि की भाषा भावानुगामिनी एव विविध रस __ पासणाहचरिउ यद्यपि एक पौराणिक महाव्यि है, एव अलकार उनका अनुकरण करते हुए दिखाई देते है। उसमें पौराणिक इतिवृत्त तथा देवी-चमत्कार आदि प्रसगो पार्श्व प्रभु विहार करते हुए तथा कर्वट, खेड, मडव की कमी नहीं। इसका मूल कारण यह है कि कवि विबुध आदि पार करते हुए जब एक भयानक अटवी में पहुंचते श्रीधर का काल संक्रमणकालोन युग था। कामिनी एव है तब वहां उन्हें मदोन्मत्त गजाधिर द्रुतगामी हरिण, काञ्चन के लालची मुहम्मद गोरी के आक्रमण प्रारम्भ हो भयानक सिंह, घुरघुराते हुए मार्जार एव उछल-कूद करते चुके थे , उसकी विनाशकारी लूट-पाट ने उत्तर भारत को हुए लंगूरों के झुण्ड दिखाई पड़ते है। इस प्रसग में कवि पर्रा दिया था। हिन्दू राजाओ मे भी फट के कारण द्वारा प्रस्तुत लगूरो का वर्णन देखिए, कितना स्वाभाविक परस्पर में बड़ी कलह मची हुई थी। दिल्ली के तोमर बन पड़ा है :राजा अनंगपाल को अपनी सुरक्षा हेतु कई युद्ध करने पड़े ....... ....."सिर लोलि र लगूर ॥ मे। कवि ने जिस हम्मीर-वीर के अनगपाल द्वारा पराजित केवि कूरु घुरुहरहिँ दूरस्थ फुरुहरहि ॥ किए जाने की चर्चा की है , सम्भवत वह घटना कवि की केवि करहिं ओरालि णमुवती पउरालि । आँखों देखी रही होगी। कवि ने कुमार पावं का यवन- केवि दाढ दरिसति अइविरसु विरसंति ॥ राज के साथ तथा त्रिपृष्ठ का हयग्रीव के साय जैसे कम- केवि भूरि किलकिलहिं उनलेवि वलि मिलहि ॥ बद्ध एवं व्यवस्थित युद्ध वर्णन किए है, वे वस्तुत. कल्पना कवि णिहय पडिकल महि हणिय लगर ।। प्रसूत नहीं किन्तु हिन्दू-मुसलमानो अथवा हिन्दू राजाओ केवि करु पसारति हिसण ण परति ।। के पारस्परिक युद्धों के आँखो देखे अथवा विश्वस्त गुप्त- केवि गयणयल कमहि अणवरउ परिभभहिं ।। चरों द्वारा सुने गए यथार्थ वर्णन जैस प्रतीत होते है। कवि अरुण णयहि भगुरिय बयणहि ॥ उसने उन युद्धों में प्रयुक्त जिन शस्त्रास्त्री की चर्चा की है, ... ... ... . ." तासात अकयस्थ तसति ॥ वे पौराणिक ऐन्द्रजालिक अथवा देवी नहीं अपितु खुरपा, केवि धुहिं सविसाण, कपविय पर पारण ।। कृपाण, तलवार, धनुष-बाण जैसे वे ही अस्व है जो कवि केवि दृट्ठ कुप्पति परिकाहि झड़प्पति ।। के समय में लोक प्रचलित थे। आज भी वे हरयाण एव केवि पहुण पावति उसणत्थु धावति ।। दिल्ली प्रदेशों में उपलब्ध है और उन्ही नामो से जाने ७१४।४-१६ जाते हैं। ये युद्ध इतने भयंकर थे कि लाखो-लाखों विधवा अन्य वर्णन-प्रसगो में भी कवि का कवित्व चमत्कार नारियों एवं अनाथ बच्चो के करुण-क्रन्दन को सुनकर पूर्ण बन पड़ा है। इनमें कल्पनाओ की उर्वरता, अलकारी वेदन-शील कवि को लिखना पड़ा था: को छटा एव रसो के अमृत-मय प्रवाह दर्शनीय है। इस ......टका होइ रणगण रिउ वाणावलि पिहिय णहगणु। प्रकार के वर्णनो में ऋतु-वर्णन, अटवी-वर्णन, सन्ध्या, संगरणाम जि होइ भयकरु तुरय-दुरय-रह-सुहड-रवयकरु । रात्रि एव प्रभात-वर्णन तथा आश्रम-वर्णन आदि प्रमुख हैं। १॥३, ५ कवि की दृष्टि में सन्ध्या किसी के जीवन मे हर्ष उत्पन्न कवि श्रीधर भावों के अद्भुत चितेरे है । यात्रा-मार्गों करती है तो किसी के जीवन मे विषाद । वस्तुतः वह हर्ष हो अथवा अटवियो मे उछल. एवं विषाद का विचित्र संगम काल है। जहाँ कामीजनों, बजटर बन-विहारो मे क्रीड़ायें करने वाले चोरों एवं उल्लुओं एव राक्षसों के लिए वह श्रेष्ठ वरदान MAT माश्रमों मे तपस्या करने वाले है, वही पर नलिनी-दल के लिए घोर-विषादका काल । Page #52 -------------------------------------------------------------------------- ________________ १४, वर्ष ३६ कि०२ अनेकान्त वह उसी प्रकार मुरझा जाता है, जिस प्रकार इष्ट जन के धूलि-धूसरित रहता था । खेलो सरय उनकी करधनी की वियोग में बधु-बान्धव गण । सूर्य के डूबते ही उसकी शब्दायमान किणियां सभी को मोहती रहती थी।" कवि समस्त किरणे अस्ताचल मे तिरोहित हो गई है। इस के इस बाल-लीला वर्णन ने हिन्दी के भक्त कवि सूरदास प्रसग में कवि उत्प्रेक्षा करते हुए कहता है कि ठीक ही है को सम्भवत: सर्वाधिक प्रभावित किया है। कृष्ण की बालविपत्ति काल में अपने कर्मों को छोडकर और कौन किसका लीलाओ के वर्णनों की सदशता तो दृष्टिगोचर होती ही साथ दे सकता है ? सूर्य के अस्त होते ही अस्ताचल पर है, कही-कही अर्धालियो में भी यत्किञ्चित् हेर-फेर के लालिमा छा गई है, वह ऐसी प्रतीत होती है, मानों अन्ध- साथ उनका उपयोग कर लिया गया प्रतीत होता है। यथाकार के गुफा-ललाट पर किसी ने सिन्दूर का तिलक ही श्रीधर-अविरल धूली धूसरिय गत्त २०१५॥५. जड़ दिया हो। यथा : सूर-धूरि धूसरित गात १०१००१३. अत्थ इरि-सिहरिवि रत्तु पवटल तम-विलउ , श्रीधर-होहल्लरु (ध्वन्यात्मक) २॥१४८. सझए अवर-दिसि वयसियहा सिंदूरे कउ-लिलउ॥ सूर-हलराव (ध्वन्यात्मक) १०१२८१८, ३।१७:१३-१४ श्रीधर-खलियक्खर वर्याणहि वज्जरतु २११४१३. अन्धकार मे गुफा ललाट पर सिन्दूर के तिलक की सूर-बोलत श्याम तोतरी बतियां १०।१४७. कवि-कल्पना सचमुच ही अद्भुत एव नवीन है। श्रीधर-परिवारगुलि लग्गउ सरतु २०१४।४, कवि का रात्रि-वर्णन प्रसग भी कम चमत्कार-पूर्ण सूर-हरिको लाइ अगुरी चलन सिखावत १०॥१२८१८ नहीं । वह कहना है कि समस्त ससार घोर अन्धकार की इस प्रकार दोनो कवियो वे वर्णनो की सदृशताओं को गहराई में डबने लगा है इस का.ण विलासिनियों के कपोल रक्ताभ हो उठे है तथा उनक नीवी-बन्ध शिथिल देखते हुए यदि सक्षेप मे कहना चाहे तो कह सकते हैं कि श्रीधर का सक्षिप्त बाल-वर्णन सूरदास कृत कृष्ण की बालहोने लग है । कवि कहता है : लीलाओ के वर्णन के रूप में पर्याप्त परिष्कृत एवं विकछुड़ नीवी गप सझ विलासिगो अगत्तण गुण-घुसिणविलासिणी।। ३।१८।३ सित हुआ है। वनस्पति-वर्णनबाल-लोल। वर्णन कवि श्रीधर की विविध वनस्पतिया भी कम आश्चर्यकवि श्रीधर ने शिशु पाल की मीलाओ का भी बड़ा जनक नही। अटवी-वर्णन के प्रसग मे विविध प्रकार के सुन्दर वर्णन किया है। उनकी बाल एव किशोर लीलाए, वृक्ष, पौधे, लताएँ, जिमीकन्द आदि के वर्णनो में कवि ने उनके असाधारण सौन्दर्य एव अंग-प्रत्यग की भाव-भंगि- मानो सारे प्रकृति-जगत को साक्षात् उपस्थित कर दिया माओं के चित्रणो मे कवि की कविता मानो सरसता का है। आयुर्वेद एवं वनस्पति शास्त्र के इतिहास की दृष्टि से स्रोत बनकर उमड पडी है। कवि कहता है कि शिशु कवि की यह सामग्री बड़ी महत्वपूर्ण है । कवि द्वारा वर्णित पार्व कभी तो माता के अमृतमय दुग्ध का पान करते, वनस्पतियो का वर्गीकरण निम्न प्रकार है"। कभी अंगठा चूसते, कभी मणि-जटित चनचमाती गेंद शोभा-वृक्ष-हिताल, तालूर, साल, तमाल, मालूर, धव, खेलते तो कभी तुतली बोली में कुछ बोलने का प्रयास धम्मण, वस, खदिर, तिलक, अगस्त्य, प्लक्ष, करते। कभी तो वे स्वय रेग-रेगकर चलते और कभी चन्दन । परिवार के लोगों की अंगुली पकड़कर चलते । जब वे फल-वृक्ष-आम्र, कदम्ब, नीबू, जम्बीर, जामुन, मातुमाता-पिता को देखते तो अपने को छिपाने के लिए वे लिंग, नारगी, अरलू, कोरटक, कोल्ल, हथेलियों से अपनी हो आँखें ढंक लेते। चन्द्रमा को देखकर फणिस, प्रियंगु, खजूर, तिन्दुक, कैथ, ऊमर, वे हंस देते थे। उनका जटाजूट धारी शरीर निरन्तर (शेष पृ० २३ पर) Page #53 -------------------------------------------------------------------------- ________________ गतांक से आगे: जैन विद्यानों में शोध : एक सर्वेक्षण O डा० नन्दलाल जैन विषय-संबद्ध शोधों का विश्लेषण तथा अन्योन्य-भाषा-सम्बन्ध आदि से किया जाता है। (अ) ललित साहित्य उदाहरणार्थ डा. अग्रवाल पाणिनि व्याकरण के आधार इस विषय के अन्तर्गन हिन्दी, प्राकृत, अपभ्रश, पर एक ऐतिहासिक ग्रथ ही लिख दिया है। यह विषय अब भाषा-विज्ञान के नाम से प्रतिष्ठित हो गया है । यह संस्कृत तथा अन्य क्षेत्रीय भाषाओं में लिखित काव्य, महा. प्रसन्नता की वात है कि इस दिशा में शोध में पर्याप्त काव्य, चंपू, पुराण, स्तोत्र, कथा, पूजा, शतक एवं बारह वृद्धि हुई है। विभिन्न क्षेत्रीय भाषाओं का मल भाषाओं मासा आदि रूप समाहित है । सर्वाधिक शोधकार्य राम के साथ तुलनात्मक अध्ययन भी हुआ है। कुछ अध्ययन कथा (१५) के विविध पक्षो पर हुआ है। पउमचरिउ, पाश्चात्य विद्या के अनुमार भी हए है। इनसे विश्व के प्रद्युम्न चरित, कुमारप न चरित, हिवश पुगण, (१५) विभिन्न खण्डों के मनुष्यो की भाषायी दृष्टि से एक पूर्वऔर पुष्पदन्त ने अनेक शोधकर्ताओं को आकृष्ट किया है। जता की धारणा बनी है । इससे सास्कृतिक एकता के अब तक लगभग तीन दर्जन सम्कृत-प्राकृत ग्रन्यो पर परिपोषण मे सहायता मिली है। इन क्षेत्रों में प्राकृत अध्ययन हो चुका है। इनमे क्षत्र चडामणि छूट गया और अपभ्र श के व्याकरण और कोपो मे जैनो के योगदान लगता है, चउपन्न महापुरिम चरिउ भी अछुना है। इस तथा हेमचन्द्र, शाकटायन आदि के विषय में तुलनात्मक वीच अनेक स्रोतों से प्राकृा अपभ्र ग जैन माहि-य की अध्ययन हुए है। यह शोध क्षेत्र पर्याप्त विस्तृत एवं सूचियां प्रकाशित हुई है। अकेले आभ्र श के ही पाव सो व्यापक है । यह निश्चित रूप से प्रगति करेगा क्योकि ग्रन्थों की सूची शास्त्री ने बनाई है। इममे अनुमान लगता मीमित धार्मिक एवं दार्शनिक मान्यताओ के ज्ञान और है कि इस क्षेत्र मे अभी जो शोध हुई है, वह "आरे में लोडन की आवश्यकता नही होती। नमक" के बराबर है। अब यह शोध समन्वित नीति के अनुसार होगी, ऐसी आशा है । इसके लिये यह आवश्यक (स) जन न्याय एवं दर्शन है कि शोध नामिकाए एव सर्वेक्षण ममय-समय पर तैयार सारणी में स्पष्ट है कि १९७३-८३ के वीच इस क्षेत्र कर विश्वविद्यालयों एव शोधकर्ताओ व निर्देशो के पाम में शोध में पर्याप्त कमी हुई है। दार्शनिक मान्यताओं में गोसा निःशुल्क या सशुल्क पहुचते रहें। आत्मतत्व पर सर्वाधिक शोध की गई है। मोक्ष, पुद्गल, (ब) भाषागत विषय परमाण, सर्वज्ञता एव कर्मवाद ने भी शोध में स्थान पाया प्राचीन जैन साहित्य की मुख्य भाषा मागधी, शोर. है। नयवाद, स्यावाद, प्रमाण विद्या, ज्ञान एव ज्ञानोपाय साल और संस्कृत है। मध्यवर्गीय काल में अपभ्रश तथा तर्कशास्त्र पर भी काम हुआ है। अनेक न्यायग्रंथों के भी रही हैं। भाषा और उसका माहित्य दो पृथक विषय हिन्दी या अंग्रेजी के अनुवादों के बावजूद भी परीक्षामख. तथापि नामिका 'ब' में उन्हे सम्मिलित रूप में ही प्रमेयरत्नमाला, अष्ट महस्री, आप्तपरीक्षा, न्यायावतार लिया गया है। भाषाओ का अध्ययन उसके व्याकरण, पर काम नहीं हुआ है । प्रमेयकमन मार्तण्ड तथा न्याय. सद रचना, शब्दोत्पत्ति का इतिहास, शब्द विकास, कुमुदचन्द्र भी अछूते पड़े है । इनमे से अनेक ग्रन्थों के Page #54 -------------------------------------------------------------------------- ________________ १६, वर्ष ३९, कि० २ अनेकान्त सम्पादकों की भूमिकायें महत्वपूर्ण हैं और उपाधिक्षमता गम, षट् खण्डागम, कषाय पाहर एवं शान्ति सरि रखती हैं। इनका अनुवाद और समीक्षण अनेक दृष्टियों का जीव विचार प्रकरणं आदि ऐसे ही अध्ययन चाहते से महत्वपूर्ण होगा। इनमें अनेक विषय-ज्ञानोपाय, शब्द, हैं। इस दिशा में वर्तमान आगमिक विद्वानों का मार्गदर्शन चक्ष-धोत्र की क्रियाविधि, पदार्थवाद, परमाणुवाद, आकाश आवश्यक है। अब यह सभी जैन विचारक स्वीकार करते वाद प्रामाण्यवाद या विश्वसनीयता ख्यातिवाद आदि है कि आगम साहित्य के गहन अनुशीलन से ही जैन धर्म ऐसे हैं जिनका आधुनिक दृष्टि से तुलनात्मक अध्ययन कर और दर्शन की अनेक मान्यताओं के आधार पुष्ट होंगे ज्ञान-प्रवाह के विकास को भापा जा सकता है । इनका जिससे श्रमण संस्कृति अधिकाधिक प्रकाशित होगी। इस अध्ययन वैचारिक प्रगति के सोपानों को भी निर्धारित कार्य में विश्वविद्यालयीय शोध सम्भवतः अपेक्षित सक्रिकरेगा । इन विषयों पर कुछ तुलनात्मक लेख लेखक ने यता न प्रदर्शित कर सके पर जैन शोध संस्थाएं इस दिशा लिखे हैं जिनका शोध दृष्टि मे विस्तार आवश्यक है। मे योजनाबद्ध काम कर सकती है। सारणी 1 से स्पष्ट है (द) मागम कि पिछले दस वर्षों में आगम शोध की प्रतिशतता में कोई सामान्यतः परम्परा से चले आ रहे श्रुत एवं उपदिष्ट वद्धि नही हुई है। ज्ञान के सकलन को आगम कहा जाता है। इनके देश मे (य) नीति, आचार और धर्म इन पर शोध काफी देर से प्रारम्भ हुई, पर विदेशो में यह सारणी ३ से स्पष्ट है कि पिछले दस वर्षों में नीति, बहुत पहले चालू हो चुकी थी। आजकल आगम साहित्य आचार और धार्मिक मान्यताओ से सम्बन्धित शोषों की दो रूपो मे पाया जाता है। (१) मूल आगम और (२) संख्या काफी बढ़ी है। इसमे कुछ तुलनात्मक अध्ययन भी उनके विविध अगों पर आधारित मूल और व्याख्या प्रथ। समाहित है । जैन नीतिशास्त्र के विविध पक्षों पर अनेक ग्यारद्ध उपलब्ध आगमों में आचाराग (४) और उसी के शोधकर्ताओं का ध्यान गया है । यह निश्चियरूप से मथित अनरूप मुलानार तथा भगवती मूत्र पर कुछ अध्ययन हुए होकर आधुनिक युग मे समर्थित ही हुआ है। अहिंसा ने हैं। सूत्र कृताग, उपामक दशांग, ज्ञाता धर्म कथांग भी अनेक लोगो को आकृष्ट किया है । बर्तमान में जैन शास्त्रों पंजीकरण में आ गए है। अन्य आगम अभी उपाधि शोध में वर्णित योग, सर्वोदय, स्याद्वाद आदि पर सामान्य और के क्षेत्र में नहीं आ पाए है। हां, स्थानांग और समवा- तुलनात्मक शोध भी होने लगी है। आचार के क्षेत्र में याँग सानवाद जैन विश्वभारती से प्रकाशित हुये हैं। सागर धर्मामृत, मूलाचार, समन्तभद्र और आचारांग पर इनके टिप्पण शोध, नहीं, पर शोध को निरूपित करते है। अनेक प्रकार के अध्ययन किए गये है। प्राज के विसंवादी अंगवाह्य मे उत्तराध्ययन, अनुयोग द्वार सूत्र, निशीथचूणि अनागारी आचार स्वतन्त्र शोध चाहता है। जैनबाट एव विशेषावश्यक भाष्य शोध क्षेत्र मे आ गए है, पर आचारों के तुलनात्मक अध्ययन के समान अन्य आचार दशवकालिक जैन विश्व भारती ने ही संजोया है। संहिताओं का भी एकीकृत एवं तुलनात्मक अध्ययन अपेतत्त्वार्थसत्र, सर्वार्थसिद्धि, भाष्य एवं कुन्द कुन्द साहित्य क्षित है। आचार शोध भी सामयिक विचारधाराओं के पर काम हआ है । हा० अमरा जैन का तत्त्वार्थ सूत्र की विकास की प्रतीक है । सभी प्रकार के आचारों का वैशाअनेकों टीकाओं का तुलनात्मक अध्ययन निश्चितरूप से निक पद्धति से अध्ययन आज की आवश्यकता है क्योंकि सम्पादित कर प्रकाशनीय है। फिर भी, सम्पूर्ण आगम नई पीढ़ी प्रत्येक परम्परागत आचार के प्रति उपेक्षणीय साहित्य को ध्यान में रखते हुये यह शोध अल्प ही है। वृत्ति प्रदर्शित करती है। इस साहित्य के गहनतर, तुलनात्मक और वैज्ञानिक अध्य- (र) व्यक्तित्व प्रोर कृतित्व यन की आवश्यकता है । भौतिक जगत से सम्बन्ध रखने इस क्षेत्र में भी शोध की संख्या और प्रतिशतता छ बाले अंगवाह्य एवं अंगप्रविष्ट आगमो का समीक्षात्मक और बढ़ी है । कुन्दकुन्द, समन्तभद्र, सिद्धसेन, अकलंक, विद्या. तलनात्मक अध्ययन वर्तमान युग की मांग है । जीवाभि- नन्द, पुष्पदन्त, स्वयम्भू, रइधू, पोन्न, राजचन्द्र आचार्य Page #55 -------------------------------------------------------------------------- ________________ जैन विद्याओं में शोध एक सर्वेक्षण भिक्षु आशावर के साथ भूधरवास, बनारसीदास, टोडरमल, हरिचन्द्र, नयसेन, भागचन्द्र भट्टारक सकलकीर्ति, कुजनलाभ, जिनदास, जिनहर्ष, हस्तिमहल, बादीमसिंह, ज्ञान सागर और नयचन्द्र के विषय मे अध्ययन हुए है । इन अध्ययनों की संख्या अनेक दृष्टियों से कम है। अनेक आचायों के विषय में जानकारी अपूर्ण है, अनिर्णीत । उनके समकालिक एवं उद्धरित साहित्य के अध्ययन के आधार पर इसे निर्णायक रूप देना चाहिए। आगम लेखी आचार्य, पूज्यपाद वीरसेन यतिवृषभ, उम्रा विश्व भूत सागर, द्यानतराय, नेमचन्द चक्रवर्ती आदि के सम्बन्ध मे शोध मौन प्रतीत होती है । यह विषय न केवल व्यक्तिविशेषो के समग्र परिचय में सहायक है अपितु वह उत्तरवर्ती शोध का प्रेरक भी है। जैन कला एवं पुरातत्व इस क्षेत्र में शोध कार्य की गति मे विशेष परिवर्तन नही हुआ है। पूर्व मे अहार, देवगढ़, पश्चिम, उत्तर व दक्षिण भारत की जन मूर्तिकला पर काम हो चुका है। इधर जैन प्रतिमा विषय पर एक-दो पुस्तके भी प्रकाशित हुई है। शिलालेख, ग्रन्थ भण्डारो एवं प्रकाशित सग्रहो पर भी कुछ काम हुआ है। इस दिशा में अभी बुन्देलख के तीर्थक्षत्रो, जैन सिद्ध क्ष ेत्रो एवं खजुराहो तक ने किसी को आकृष्ट नहीं कर पाया पण्डित चन्द्रमूर्तिलेखां के आधार पर जैन इतिहास को सवारना चाहते है । उनके एक-दो लेख शोध-प्रेरक है । इन मूर्तिलेखों के संग्रह, वर्गीकरण और विश्लेषण के आधार पर अनेक जैन उपजातियो एव अज्ञात व्यक्तियो का इतिहास लिखा जा सकता है । मूर्तिकला के साथ मूर्तिकाशे व प्रतिष्ठापको का इतिहास भी जुड़ा होता है। इसे भी शोध में समाहित करने की आवश्यकना है । यद्यपि "जैन कला और स्थापत्य" के प्रकाशन से इस दिशा मे शोध सीमित हो गई है, पर पुरातत्व का विशाल क्षेत्र सदैव आकर्षण का चुम्बकीय व बना रहेगा। (च) प्राधुनिक विषय । १६०३-०४ के बीच जैन विद्यायों मे समाहित आधु निक विषयों पर शोध को क्षमता मे काफी वृद्ध (८०%) हुई है. इन यो से सम्बन्धित व्यक्तियो गणों, राज १७ तन्त्रो, प्रदेशी एवं स्थानो के इतिहास पर काफी काम हुआ है। इनमे लिच्छवि, वैशाली, भट्टारक, कुमारपाल, राजस्थान कर्नाटक, बिहार, आंध्र आदि से सम्बन्धित सामग्री विवेचित की गई है। जैन ग्रन्थों पर वर्णित राब नीतिक विचारो पर छह शोधें हुई है, आर्थिक विचारों पर चार शोधकर्ताओं ने काम किया है। जैन सिद्धांतों की मनोवैज्ञानिक पृष्ठभूमे तो दो शोधों का विषय बनी है। सामान्य एवं नारी की सामाजिक दशा के विवेचन है समाज शास्त्रीय शोध ने भी जन्म लिया है। जैन-शिक्षा और प्राचीन भूगोल पर भी एक-एक शोध हुई है। फिर भी, यह स्पष्ट है कि इन शोध मे अभी दो तिहाई छोड इतिहास से सम्बन्धित हैं। इस दशक की विशेषता यह है कि अन्य विषयो मे शोध चालू हो गई है और इसमें पर्याप्त प्रगति अपेक्षित है। विभिन्न युगों के विविध साहित्य के सांस्कृतिक और सामाजिक विवेचन एवं तुल नात्मक अध्ययन हमे विकास के चरणों का मान कराते हैं और अपनी स्थिति को मूल्यांकित भी करते हैं। (श) तुलन त्मक अध्ययन में अतु मारणी ३ से स्पष्ट है कि १९७२-८३ जंग सिद्धान्त कथाओ एवं अन्य विद्याओ के जेनेटर - रूपी या भाषायी रूपों के तुलनात्मक अध्ययन २-५० प्रतिशत की वृद्धि हुई है। शो की यह दिशा समवायात्मक दृष्टि को विकसित करने, समकालीन एवं भिन्नकालीन विचारों के विकास व इतिहास को समझने के लिए अत्यन्त आवश्यक है। यह प्रत्येक युग के विकास के मूल्यांकन की दृष्टि से भी महत्वपूर्ण है। इस क्षेत्र में राम कथा, प्रमाणशास्त्र, योग, आचारशास्त्र, कर्मवाद, भावा विकास आदि पर अनेक अध्ययन सामने आये हैं। वे अध्ययन प्रायः किन्ही दो विशिष्ट पक्षों पर ही आधारित पाये गये है। उपयोगिता एवं महत्ता की दृष्टि से समग्रतः तुलनात्मक अध्ययन अपेक्षित है। विभिन्न धर्मों एवं देशों मे रामायण का अध्ययन एक प्रारूपिक उदाहरण है। अनेक विषय अभी इन अध्ययनों में समाहित ही नहीं हो पायें है। जैन विधाओं में वर्णित वैज्ञानिक मान्यताओं की समीक्षा इनमे से एक है। इस क्षेत्र में कुछ उपाधिनिरपेक्ष शोध एक नया आयाम दे रही है। इन अध्ययनों का समग्र Page #56 -------------------------------------------------------------------------- ________________ १५ वर्ष ३६, कि०२ प्रतिशत बढ़ाने की महती आवश्यकता है। रूपता की प्रतिष्ठा हमें लोकोत्तरीप पटनामों की सत्वना (ब) विज्ञान : के प्रति भी प्रेरित कर सकेगी। जैन विद्याओं के आगम, आगमेतर धामिक और (स) विदेशों में जैन विद्या शोष: दार्शनिक साहित्यमें भौतिक जगत संबंधी विवरण स्फुट जैन विद्या भारतीय विद्या का एक महत्वपूर्ण बब है। रूप में पाये जाते हैं। ये भौतिकी, रसायन, वनस्पति एवं इसके अध्ययन के बिना भारतविद्या का ज्ञान अधुरा हो प्राणिशास्त्र, भूगोल, ज्योतिष, गणित, आहार और औषधि माना जाता है। फलतः इस देश के अतिरिक्त अन्य देशों शास्त्र आदि से संबंधित हैं। ये विवरण तत्कालीन ज्ञान में भी इस विद्या के अन्तर्गत या स्वतंत्र रूप से बैन के निरूपक है। इन विवरणों का विषयवार संकलन एवं विद्याओं के अध्ययन, अध्यापन और शोध की ओर ध्यान तुलनात्मक अध्ययन आवश्यक है । इन विवरणों की समी- गया। यह एक अचरजकारी तथ्य ही है कि जैन पिवानों क्षात्मक प्रामाणिकता नयी पीढ़ी की धार्मिक आस्था को पर आधुनिक दृष्टि से शोध का प्रारम्भ बारहवीं सदी बलवती बनावेगी। के अन्तिम दशक में विदेशों में ही हआ। इस सम्बन्त में इस क्षेत्र में शोधकर्ता तो अनेक हैं, पर उपाधि हेतु अनेक जैन विद्वानों ने विवरण दिये हैं पर योधनामिकानों शोध की मात्रा में कमी ही आई है। अभी तक गणित(२), में डा. जैन ने ही इन्हें १९७३ और १९८३ में स्थान पुद्गल, परमाणुवाद, भूगोल एवं स्रष्टि विद्या पर एक-एक दिया है। इन्हें देखने से लगता है कि १९८३ की नामिका सामने आई है। आयुर्वेद में दो शोधे पजीकृत हैं, एक नाम को छोड़कर १९७की अनुकृति ही है। दस स्फुट लेख अवश्य प्रकाशित हुए हैं। इस क्षेत्र मे शोध की वर्षों में विदेशों में जैन विद्याओं पर कोई उपाधिहेतुक पर्याप्त संभावनाएं है। इसे प्रेरित करने के लिए वरीयता शोध न हुई हो, इस पर विश्वास नहीं हो पाता। फलतः से इस क्षेत्र में छात्र वतियां देनी चाहिए। साथ ही, शोध- इस नामिका की अपूर्णता के बावजूद भी, यह अनुमान निर्देशको को भी इन विषयों में शोध कराने में गहन रुचि सहज है कि विदेशों मे जैन विद्या शोष अधिकांश में लेनी चाहिए। जर्मनी में हुई है। विभिन्न विवरणों के अनुसार-मांस, यह प्रसन्नता की बात है कि इन दिशाओं में उपाधि आस्ट्रिया, अमरीका, रूस, इंग्लैंड और जापान में भी निरपेक्ष शोध पर्याप्त होती दिख रही है। मध्य प्रदेश ऐसी जैन विद्याओं पर शोध हो रही है। इस शोष को भी शोध का प्रारम्भ से ही अग्रणी रहा है। प्रो० जी० आर० नामिकाओ में समाहित करना चाहिए। इस शोध में जैन, एफ० सी० जैन, जे० सी० सिकदर और एन०एफ० आगम, ललित साहित्य, भाषा विज्ञान एवं न्यायशास्त्र के जैन यही रहे है। मुनि श्री महेन्द्र जी, जे० एस० जवेरी, विविध पक्ष आये हैं। एक अभिनन्दन अन्य में इसकी के० एल० लोढ़ा, एस० एस० लिरक आदि विद्वानो ने झांकी देखी जा सकती है। यह हर्ष का विषय है कि जैन विद्याओ के अनेक वैज्ञानिक पक्षों को सकलित और अनेक जैन विद्वान अब विदेश जाने लगे हैं और पूछ बैन विवेचित कर अनेक पुस्तिकाए और शोधपत्र प्रकाशित संस्थाएं भी इस दिशा में रुचि लेती दिखती हैं। यह संपर्क किए है। इनका एक संक्षिप्त रूप दो अभिनन्दन ग्रंथों के और रुचि भविष्य में प्रकाशित होने वाली नामिकाओं की विज्ञान खण्डो मे देखा जा सकता है। लोकोत्तर गणित के उक्त अपूर्णता दूर कर सकेंगी। कुछ शोधपत्रों ने तो विदेशी पत्रिकाओ मे भी स्थान पाया उपरोक्त विश्लेषण से स्पष्ट है कि १९७३-३ है। ये विषय ऐसे हैं जिनके प्राचीन विवरणों की सत्यता दशक में जैन-विद्या-शोध में ललित साहित्य का ही सहभौतिक या यांत्रिक चक्षुनो से परखी जा सकती है। इनके योग रहा है। अन्य क्षेत्रों में गुणात्मक और परिमाणात्मक अध्ययन से वैज्ञानिक विकास के इतिहाग मे जैन विद्याओं दोनों ही दृष्टियों से शोध काफी कम है। लेखकका के योगदान का मूल्याकन किया जा सकता है। विभिन्न विश्वास है कि नई पीढ़ी अनुसंधान के नये वितिजों की वैज्ञानिक पक्षों का तुलनात्मक अध्ययन और उनकी अनु- ओर अधिक ध्यान देगी। - कानिज, रीय Page #57 -------------------------------------------------------------------------- ________________ पं० शिरोमणिदास कृत : 'धर्मसार सतसई' 0 श्री कुन्दनलाल जैन प्रिन्सिपल, दिल्ली जय चतुर्ष संधि प्रारम्यतेचौपाई-श्रेणिक सुनह कर्म उतपाति, ___जाते जीव होय बहु भांति । ऊंच नीच बह दुख को धरता, आपुही कर्ता आपुही भुक्ता ॥१ पुण्य पाप जब करनी कर, ऊंच नीच पदवी तब धरै । करहि पाप जो मन वच काय, मगन होय आग मद पाय ॥२ इन्द्रियन पंच विषय रस पर्ग, विकथा व्यसन कषायनि लगे। करि मिथ्यात्व पंच दुखदाय, ए छत्तीस प्रकृति सुनि राय ॥३ छत्तीस प्रकृति को बंधन कर, तब जीव इतर निगोद पद घरं । भाव कलंक गहै अति जास, यात निगोद न मुंचइ वास ।।४ जनम मरण दुख सहं अति भयो, अनंतकाल जीव भ्रमतनि गयो। बठारह मरण जनम जीव लहै, एक स्वास में, जिनवर कहै ॥५ पोहा-छयासठ सड्स अरु तीन सौ पुनि छत्तीस बखानि । अंतर्मुहतं एक में निगोद मरण जीव जानि ॥६ काम अनंतानंत जु लहै निगोद दुख जो केवली कहै। तिनसौं दुख कहो नहिं जाय, मैं मनुष्य कंह कहऊ बनाय ॥७ ॥ इति निगोद दुख ॥ चौपाई-पर जीव मारे अपने हेतु, करि हिंसा पुनि औरनि देत । पोरी मुठ भुगते पर नारी, बहु आरंभ कर अति भारी॥८ क्रोध लोभ माया मद साधि, अनंतानुबंधी प्रकृति ते वांधि । लेण्या कर्म कर संताप, रौद्रध्यान करि बांधे पाप | ऐसो कर्म जीव जब करे, तब जीव जाय नरक पद धरै। बहुत दुख भुगतै तहं घोर, ___को बुध कहै न जानहुं ओर ॥१० सात नरक हैं दुख की खानि, तिनके नाम जु कहौं बखानि । घम्मा कहि पुनि वंसा नाम, मेघा अंजन है दुखदाय ॥११ अरिठा मघवी माधवी सात, उपजे जीव गलित तहं गात । तेग गेरा पाथरे (डे) सुनिज, नव पुनि सात पांच जे मुनिज ॥१२ तीन एक जानो दुखदाई, अब सुन बिले कहौं समुझाई। तीस लाख पहले अथ जानि, पुनि पच्चीस लाख दुख दानि ॥१३ तीसरे पन्द्रह लाख जु कहीज' चौथे पुनि दश लाख जु भणिज । पांचइ तीन लाख अति सुन, छटै एक लाख पञ्चानवे ॥१४ सात पांच लाख बिले अति घोर, सर्व लाख चौरासी जोर(ड)। मात धनुष पांच सौ देह, अधं हीन पुनि छटै जु एह ॥१५ Page #58 -------------------------------------------------------------------------- ________________ १०, वर्ष २६, हि०२ अनेकान्त पुनि आधी पांच अघ होइ, ऊपर इह विधि गनिज सोइ । हुड़ उक देह धरै जीव तहां, लिंग नपुंसक कहिए जहां ।।१६ मन मैं दुख उपज बनो, अपनी देह आप आप जो हनौ । उपजै रोग अनेक जु आइ, भूमि स्वभाव न नैकु सुहाइ ॥१७ अवधि विभंगा जु तहाँ प्रकास, पूरव बैर तहां अति भासै। ले ले धन कुटं तहं चंड, बाण बेधि पुनि देहि जु दह ॥१८ कणं नासिका काट दोषी, नेत्र काढ़ मार अति रोषी। एकन जंत्रनि पेरै पापी, मूगरनि मारि कर संतापी ॥१६ एकन सूली रोपन रच, पुनि ल अग्नि कुण्ड मे पचै । झूठ वचन कह पारी वाट, तातै अघ में करवत काट ॥२० रे रे मूढ़ मदिरा तुम पियो, तात तोहि नर्क मे दियो । ऐसो कहि सीसो पिघलाय, मुख मैं भरै महा दुख पाय ॥२१ हा हा करि रोवै तहं दीन, भय चिता कप तनु छीन (क्षीण)। तिल तिल खंडइ तहं पुनि देह, फिर फिर मिल ज्यों पारी नेह ॥२२ तूं रे दुष्ट मांस बहु भख्यो, अब तूं जानि नरक में लख्यो । ऐसो कहि तामो (ताम्र) तहं ओटि, मुख में देहि कर पुनि घोटि ॥२३ पर नारी भुगती सुख हेतु, अब तोहि आनि मिली इह खेत । ताती(गर्म) लोह पुतरिया लाल, ले संयोग करो तत्काल ॥२४ हा हा दव देव नित कर, पुनि तहं देह आपुही जरै। आपस में दुख दें अमि'घोर, अगरनि सेज लुटार जोर ॥२५ बहती नदी बैतरणी जहां, महा दुर्गध रुधिर जल तहा । तामैं बोरि (डुबोकर) कर शत खंड, __ कृमि अनेक काट अति चंड ॥२६ ताड़ वृक्ष दीस असि पत्र, ऊपर परहि आनि बहु जत्र । छिन्न भिन्न होय तिनकी जु देह, गिरे वाण ज्यो बरस मेह ॥२७ करवत काटि कर दो भेद, पुनि छिन मिलहि करहिं बहु खेद । अग्नि कुण्ड मे डार जारि, पुनि लै पारे जल मे डारि ॥२८ पूरब बैर सुनि चित मे धरै, मारो मारोते सब मिल करें। असुर कुमार पुनि देहिं बताय, उठ क्रोध पुनि अंगन माय ॥२६ सर्प सिंह अरु गीध बहु जाति, धरै विक्रिया नाना भाति । आप आप मे पुनि ते भर्ख, पूरव बैर भाव सब लखै॥३० मन एक लक्ष लोह को पिंड, क्षण मे गले महा प्रचंड । शीत उष्ण धरती है जहां, बहुत दुख जीव पावहिं तहां ३१ सकल जीव के पुद्गल पाइ, तउ वन खात न भूख बुझाइ । ऐसी क्षुधा सदा दुख बहै, सरसों समान न के बहूं लहै ॥३२ सकल समुद्र को जल जु पीजे, तउ तृषा नहीं पूरण हूजे । बंद एक नही कबहूं पेखे, ऐसे सदा काल दुख देखें ॥३३ Page #59 -------------------------------------------------------------------------- ________________ पं० शिरोमणिदात 'धर्मसार सतसई' कही आयु उत्कृष्ट वखानि, सागर एक प्रथम अघ जानि । सागर तीन दूसरी मही, ___सागर सात तीसरी कही ॥३४ दस सायर चौथे दुखदाई, पांचे सत्रह सागर आई । छहे में नरक होइ बाबीस, सात में पुनि जानहु तेतीस ॥३५ प्रथम दूसरो अघ दुखदाई, - राजू एक सुनो तुम राय । अघ पांचो की संख्या कही, - राजू एक एक है सही ॥३६ दोहा-राजू एक निगोद पुनि, कही ऊचाई जानि । अधौलोक सब जानिज राज सात प्रमाण ।।३७ नरक सकल इह विधि कहै सकल पाप फल जानि । गणधर जो वर्णन करे तो वन सकइ बखानि ॥३८ इति नरक दुख वर्णन ॥ अथ तियंच करनी फल वर्णन :चौपाई-अप्रत्याख्यान चौकड़ी वाधे, आर्त ध्यान सदा अनि माधै। चिंता शोक मोह अधिकार, ___लेश्या नील काम बहु भार ।।३६ हिंसा हेतु करहि प्रपच, यात जीव होय निर्यच । शीत उष्ण वर्षा अधिकार, क्षुधा तृषा भय दुख अपार ॥४० जबहि जीव मिथ्यात्वै आवै, विकल त्रय गति निश्चय पावै । मिथ्यात्व थापना थाप जबही, नाना योनि जीव धरै तबही ॥४१ नाहर सिंह क्रोध ते होय, - मान उदय खर लभइ सोय । होय परेवा (कबूतर) विषयनि लीन, पुनि ते नर्क पड़े अति हीन ॥४२ बहुत मोह त प्रेत बताइ, . अजगर सर्प लोभ ते जाइ । रात को भोजन जे नर कर, अरुवा गीध हि दुर्गति परै ॥४३ परधन-पाय पोखि निज गात, तप जप सयम धरै न बात । यातै बहुत भार अति वहै, ऊट, वृषभ, महिषा गति कहै ।।४४ अनगाल्यो जल पीवै पापी, .. दुर्गति दुख लहै संतापी। यह तिथंच दुख की खानि, को पडित सब कहै बखानि ।। ४५ ॥ इति तिर्यंच करनी फल ।। . प्रत्याख्यान चौकडी कहिए, होय मनुष्य शुभाशुभ किये । अशुभ कर्म ते खोटी जाति, लहइ जीव गति नाना भांति ।। ४६ मुनि की निन्दा कोढ़ी होय, . महा दुःख भुगतं नर मोय । जिनवर धर्म द्रोह अति कर, होय नीच पुनि दुर्गति पर ॥४७ पर नारी देखे अकुलाय, बहुत विकार करै दुखदाय । दर्सनावरणी होय जु बध, यात जीव होय पुनि अध ॥४८ करि कुतीर्थ हिंसा आनद, . मिथ्या मारग थाप फद । पर जीव छेदन देखे अग, यात जीव होय मरं पगु ॥४६ ले निर्माल्य पोखं गात, कुटुम्ब सहाय कर सुख वात । यात कुटुम्ब नाश अति होय, भव भव दुख देखे नर सोय ॥५० धन जे पाय धर्म नहि कर, तृष्णा कर हिंसा शिर धरै । होय निर्धनी यात रीख, घर पर फिरहिं न पावै भीख ॥५१ Page #60 -------------------------------------------------------------------------- ________________ २२, 441 कि०२ पूजा हेतु काहुं फल दियो, लोभ जानि के आपहि लियो। यात होय पुत्र करि हीन, संतति मुख देखे नहीं दीन ॥५२ पर वियोग करि परहिं सतावै, इष्ट हानि नर यात पावं। बार बार अति करहिं जु शोक, यात होय अनिष्ट सजोग ॥५३ जिनवर वाणी लोपं मूढ़, विकथा वचन कहै अति गूढ़। ज्ञानावरणी बंध सोय, यात भव भव मूरख होय ॥५४ कुत्सित त करि दड देह, समकित भेद न जाने एह। भवनत्रिक मे जे नर भ्रम, अनंतकाल तहं मिथ्या गर्म ॥५५ जिन गुरु देख न माथो नमै, अपनी इच्छा जह तहं भ्रम । यात पर घर होय जु दास, शीत उष्ण भुगतै अति त्रास ॥५६ वेश्या दासी भुगत पापी, कुत्सित विषय करै सतापी। यात होय नपुंसक दोषी, मनसा विष जर अति रोषी ॥५७ माया करि जे फंद बनाव, पर को मोहि आप सुख पाये। सदा करै विषयनि की बात, नारी देह घरे जीव यात ॥५० उत्तम करनी मनसा आनं, उत्तम देव धर्म गुरु जाने । छोड़े कपट मुद्ध मति लीन, यात पुरुष होय प्रवीण ॥५६ विद्या दान सदा हित देहि, ते नर पंडित पदवी लेहि। दुखित देखकै करुणा आवै, ते नर रोग लेश नहीं जाने ॥६. अल्प वित्त में देहि जुदान, गुरु की सेवा कर पति मान। भव भव ते नर भुगतै भोग, बहु धन पाय भलो संयोग ॥६१ पर उपकार कर जे प्राणी, दीरष बायु लहै शुभ वाणी। कर साधु सगत मन लाय, ___ उत्तम कुल उपज सुखदाय ॥१२ जे जिन मन्दिर रहि अनूप, तहां धर्म बहु बढे सरूप । पुनि जिन विम्ब भरावं सार, लक्षण व्यंजन सहित सुडार ॥६३ भत्र चंवर सिंहासन घर, चन्द्रोपम भा मण्डल करे। दुदुभी सहित कर करताल, झालर घण्टा ताल रसाल ॥६४ झारी कलश धूप घट-जहां, जलोट कनिका सोहै तहो । गीत नृत्य वादित बजाय, करहि महोत्सव बहु धन लाय॥ संघ सहित पनि तीरथ चल. सित क्षेत्र बह पुण्य मिल। पूजा वस्तु द्रव्य अति धनी, महा सुगंध उज्वल अति बनी॥६१ पूजा वस्तु भग नही की, होय पाप अति धर्महि छोज । सकल वस्तु जैसी गुरु कही, विधि सौ कर बाप नर सही ॥६७ संघ सहित देहिं बहु दान, पूजा करिबद्ध रावं मान। इह विधि करहि प्रतिष्ठा होय, पक्रवर्ती पद पावं सोय ॥१५ होय ऋषि अति सुब की बानि, को पंडित सहं कहरवानि । र अब गज चौरासी लाख, कोटि चौरासी किंकर राख Page #61 -------------------------------------------------------------------------- ________________ पं० शिरोमविदास कृत 'धर्मसार सतसई' जस पम नम में चर्बाह सुरंग, कोटि अठारह कहे तुरंग । छहस चालीस जे पत्तन जानि, कोटि छपान ग्राम बखानि ॥७० बीस सस सुन्दर पुर कहीजं, चौदह सहस वाहन पुनि लहीजे । बस निन्यानवे कहै बताय, द्रोणा मुख तुम जानहु राम ॥७१ बेट सहस षोडश अति वसं, ' दीप जो छप्पन तिनकै दिसं । सहस अट्ठाईस वन वहं सोईं, कोटि एक पारी मन मोहे ।।७२ कोटि एक हल चलहि जुसीर, तीन कोटि गो बिरका भीर । कुल काय रूप चतुर अधिकारी, सहस छयानवे नारी प्यारी ।।७३ सहस बत्तीस नर्तकी जानि, दासी दास को कहै बवानि । चौरासी बन मन्दिर साल, नव निधि चौदह रतन विशाल ॥७४ (पृष्ठ १४ का शेषांश) कठूमर, चिंचणी, (चिलगोजा ) नारिकेल, बट, सेंवल, ताल । पुण्य-वृक्ष- चम्पक, कचनार, कणवीर, (कर्नर ), टउह, कउह, बबूल, जासवण्ण, (जाति ?), शिरीष, पलाश, बकुल, मुचकुन्द, अर्क, मधुवार । स एवं पुष्प लताएं लवंग, पूगफल, बिरिहिल्ल, सल्ल, सन्दर्भ-सूची १. निर्णयसागर प्रेस बम्बई से प्रकाशित (१६०२ ई०)। २. माणिकचन्द्र दि० जैन ग्रंथमाला बम्बई से प्रकाशित ( १३१६ ई०) । ३. देखो भारतीय संस्कृति के विकास में जैनधर्म का योगदान पृ० ११५ । ४. प्राकृत टैक्स्ट सोसाइटी, वाराणसी से प्रकाशित ( १९१४ ई०) । १२. दे० र साहित्य का आलोचनात्मक परिशीलन खाली १९७४ ई०) । अठारह सहस म्लेच्छपति राय, कर जोड़े सोने बसु पाय । बत्तीस सहस विद्याधर ईस, १४.३० वारशास्त्र भण्डार जयपुर की प्रथसूचियां भा. २ १४-२२. ६० वढ्ढमाणचरिउ (सम्पा० डा० राजाराम जैन ) भारतीय ज्ञानपीठ दिल्ली पृ० ४-७ । कर जोड़े पुनि नावे शीस ॥७५ व्यंतर देव सेवा बहु करें, भोग्य वस्तु ले आगे धरं । मिष्ट आहार सेज सुखदाई, भोग विलास करं सुख पाई ।।७६ दोहा - सेवालीस सहस जोजन कहै, दो सौ त्रेसठ जानि । दृष्टि चक्रवर्ती जानिजं, गणधर कही बखानि ॥७७ बारह योजन शब्द सुनि पुनि धरै विक्रिया रूप | सहस छयानवे रूप धरि, सुभुगतं भोग अनूप ॥ ७८ सोरठा - चक्रवर्ती पद सार, जिनवर पूजा तं लहैं । उपजे ऋद्धि अपार, को पंडित तहं गिनु कहै ॥७६ चौपाई - जो जिनेन्द्र पूजें मन लाय, मन वच काय शुद्ध धरि माय । प्रात काल जिन पूजा करें, सो नर पाप पुंज परि हरं ॥५० (क्रमशः ) २३ केतकी, कुरव, कणिकार, पाटलि, सिन्दूरी, द्राक्षा, पुनर्नवा, बाण, वोर, कच्चूर । कन्द - जिमीकन्द, पीलू, मदन एवं गंगेरी । युनिवर्सिटी प्रोफे० ( प्राकृत) एवं अध्यक्ष संस्कृत प्राकृत विभाग, ३० दा० जन कालेज, आरा ( बिहार ) ( मगध विश्वविद्यालय) २३-२४. पासणाह• १४२२१-४ । २५-२७. दे० बड्ढमाणचरिउ, भूमिका पृ० ३०-११ । २८-२६. पासणाहू० ११२।५-१६ । ३०. राजस्थान पुरातत्त्व विद्यामन्दिर जोधपुर से प्रकाशिव (१९६३ ई० ) 1 ३१-३२. बढ्माणचरिउ भूमिका पृ० ७० । ३३. पासणा० १२/७-८ । ३४. वे० पासणाह० १।६।१-४ | ३५-३७. दे० दिल्ली जैन डाइरेक्टरी पृ० ४ । ३८. तीर्थंकर महावीर एवं उनकी आचार्य परम्परा ४११३८ एवं जैन ग्रंथ प्रशस्ति संग्रह द्वि० भाग भूमिका पृ. ०४. ३९. दे० वासणाह० अस्य प्रशस्ति । ४०. वासणाह ७२. Page #62 -------------------------------------------------------------------------- ________________ उड़ीसा की प्राचीन गुफाओं में दशित जैन धर्म एवं समाज श्री हरेन्द्र प्रसाद सिन्हा उदयगिरि एवं खंडगिरि पर्वतों की प्रसिद्धि प्राचीन प्रतीक मथुरा के जैन आयाग पट्टों पर अंकित पाए गये हैं। जैन गुफाएं उड़ीसा राज्य के पुरी जिले में स्थित है। ये मध्ययुगीन काल में जब इन गुफाओं का पुनरुद्धार भवनेश्वर रेलवे स्टेशन से लगभग ८ किलोमीटर पश्चिम हुआ, तब यहां की दीवारों पर तीर्थंकरो एवं उनकी शासन: में अवस्थित हैं। खंडगिरि पर एक प्राधुनिक जैन मन्दिर देवियों की मूर्तियां उत्कीर्ण की गयीं, जो हमें आज भी इन भी निर्मित हैं। गुफाओ की दीवारों पर देखने को मिलती हैं। __यहां पर जैन मुनियो के लिये उत्खनित ये प्राचीन प्रारम्भिक उत्किणियो से हमें तत्कालीन समाज की गफाएँ मेघवाहन वश के तीसरे प्रसिद्ध शासक खारवेल की हल्की सी झलक हल्की सी झलक भर मिलती है। तत्कालीन वेश-भूषा एवं fre: कृतियाँ हैं, जिनकी तिथि प्रथम शताब्दी ईसा पूर्व है खार आभूषण इन मूर्तियों मे ईमानदारी से प्रदर्शित किये गये वेल का एक अत्यन्त महत्वपूर्ण अभिलेख उदयगिरि के हैं। पुरुष मुख्यतः धोती ही धारण करते थे, जबकि स्त्रियां हाथी गुम्फा की एक दीवार पर उत्कीर्ण है । इम अभिलेख साडियां। स्त्रियो की सादियां कमर पर एक कमर-बन्ध से ज्ञात होता है कि खारवेल जैन धर्म का अनुयायी था। से बन्धी होती थीं, तथा आंचल सामने झूलता था । स्त्रीअपने शासन के तेरहवे वर्ष मे उसने जैन मुनियो के लिए पुरुष कोई ऊर्ध्व वस्त्र नही पहनते थे । फलतः उनका शरीर ये गफाये खदवायी। हालांकि, यहाँ जैन गति-विधियो के, कमर से ऊपर वस्त्र-हीन होता था। विशेष अवसरों पर और भी पहले प्रारम्भ होने की सम्भावनाओ से इन्कार। वे गले में एक कपडा लपेटते थे। पुरुष पगड़ी बांधते थे, नहीं किया जा सकता। जिसमें सामर्थ्यानुसार रत्न आदि जड़े होते थे। महिलाएं हमे इन गुफाओ के माध्यम से जैन धर्म से सम्बन्धित सर पर साड़ी तो डालती थी, किन्तु धूंघट का प्रचलन नहीं Hशत अधिक सचनाये नही मिलती, क्योंकि, जैसे कि उन था। स्त्रियो का वेश-भूषा में विभिन्नता थी तथा आभहितों जैन धर्म के स्थानीय नियम थे-मानव रूप मे षगों की बहुतायत थी। पुरुष कर्णाभूषण, हार तथा कड़े तीर्थकरो की मूर्ति-पूजा वजित थी। परिणामतः इन पहनते थे, तो स्त्रिया इन सबके अलावा मेखला, बांह तथा गफाओं की दीवारो पर तत्कालीन समय में तीर्थंकरों की सर के आभूषण भी पहनती थी। . . मातियां उत्कीर्ण नहीं की गई। किन्तु प्रतीक पूजा के प्रचुर घर के उपस्करों मे चारपाई, स्ट्रल, मेज, मोढ़ा; प्रमाण मिलते है। उदाहरण स्मरूप उदयगिरि की जय- बर्तनों में कटोरियां, प्लेट एवं घड़े; एवं घरों के अन्य विजय गुम्फा (सख्या-५) तथा खडगिरि को अनन्त गुम्फा सामानों मे छतरी, पंखे, मंजूषा आदि इन गुफाओं में (संख्या-३) की दीवारो पर एक-एक वृक्ष अङ्कित है, जिन उत्कीर्ण दृश्यों में देखे जा सकते हैं । उदयगिरि की रानी पर पुष्पांजलि अर्पित करते हुए भक्तगण चित्रित किये गये. . गुम्फा (सख्या-१) से.उत्कीर्ण सिर्फ एक दृश्य में एक दोहै। पुन: उदयगिरि की मंचपुरी गुम्फा (संख्या-६) मे , मंजिला मकान दिखलाया गया है । हालांकि, मुझ्यतः वहां राज-परिवार को एक अस्पष्ट प्रतीक की पूजा करते हुए पायेगार एक मंजिले मकानों का ही प्रचलेन भाम रहा या गया है। अनन्त गुम्फा को पिछली दीवारों पर होगा, जैसा कि उत्किणियों के अध्ययन से पता चलता है जैनों के 'अष्ट मंगलो' मे से कुछ, यथा :-नदीपाद, घरों को वेदिकाओं से घेरने की प्रथा भी आम तथा लोकस्थापना, स्वस्तिक तथा श्रीवत्स उत्कीर्ण हैं। ठीक ऐसे ही प्रिय थी। —(शेष पृ० १२ पर) Page #63 -------------------------------------------------------------------------- ________________ सुकेतु श्रेष्ठी की कथा जम्बूद्वीप- पूर्वविदेह पुष्कलावती देश पुण्डरीकिणी नगरी मे वसुपाल नाम का राजा राज्य करता था । वहाँ एक जैनधर्म में अतिशय श्रद्धालु सुकेतु नाम का वैश्य अपनी स्त्री धारिणी सहित रहता था। वह एक बार व्यापार के लिए द्वीपान्तर जाने को घर से निकलकर शिवंकर उद्यान मे नागदत्त श्रेष्ठी के बनवाये हुए नागभवन के निकट प्रस्थान करके ठहरा था। धारिणी मध्याह्न के समय उसके लिए घर से रसोई तैयार करके वहाँ से गई । सुकेतु अतिथि संविभाग व्रत धारण किये था. इसलिए वह मुनियों के आने की बाट देखने लगा। इतने में गुणसागर मुनि अपनी प्रतिक्षा के पूरी होने पर वर्या के लिए वहां से निकले सुकेतु ने उनका विधिपूर्वक पड़गान करके अत रायरहित आहार दिया, जिसके प्रभाव से पंचाश्चर्य हुए तथा सुकेतु के अधिक निर्मल परिणामो के कारण साढ़े तीन करोड़ रत्नों की वर्षा हुई। नागदत्त श्रेष्ठी ने यह कहकर कि "ये मेरे नागभवन के आंगन में बरसे हैं, इसलिए मेरे हैं" उन्हें अपने घर ले गया। परन्तु वे रत्न थोड़ी देर मे आप ही आप जहा के तहां चले गये । तब नागदत्त फिर इकट्ठे करके उन्हें ले गया परन्तु आश्चर्य की बात है कि वे वहीं के वही फिर पहुच गये। यह देख कर क्रोधित हो नागदत्त ने उन रत्नों को फोड़ने का विचार करके एक रत्न को शिला पर दे मारा, किन्तु वह फूटा नहीं, उलटा लौटकर उसके ललाट में जोर से लगा। यह देखकर देवो ने हॅमी करके उसका नाम मणिनागदत्त रख दिया । । तब नागदत अतिशय क्रोधित हो महाराज असुपाल के समीप लाकर बोला- हे देव, मैंने जो नागभवन बनवाया है, उसके आगे रत्नों की वर्षा हुई है। मो आपको उन्हें अपने भडार मे मंगाकर रखना चाहिए। राजा ने कहा- ऐसा अकारण द्रव्य मुझे नही चाहिए परन्तु नागदत्त माना नही पैशे में जा गिरा। तब राजा ने उसके अधिक आग्रह से उन्हें अपने भंडार में मंगाकर रख लिया। परन्तु थोड़ी ही देर मे वे वहीं के वहीं पहुंच गये। राजा ने पूछा- ऐसा क्यों हुआ ? तब किसी ने कह दिया कि सुकेतु श्रेष्ठी के दिए हुए मुनिदान के प्रयास से ये रत्न बरसे है, इसीलिए शायद ऐसा हुआ होगा । तब राजा ने 'बिना विचारे हाय ! मैंने यह क्यों किया', इस प्रकार पश्चाताप करते हुए सुकेतु को बुलाया । वह पंचरत्न और कल्पवृक्षो के फूल लेकर आया और महाराज को भेंट किए। उन्होंने कहा सेठ जी मैंने जो बिना सोचे-विवारे अकृन किया है, उसे क्षमा करके मुख से अपने घर रहिए। तब श्रेष्ठी ने - कहा - महाराज, आप मेरे स्वामी हैं, क्षमा करने की कौन सी बात है । रत्नो की क्या बड़ी बात है ? प्रयोजन हो बो जितने चाहे रत्न इस सेवक के घर से मगा लीजिए। राजा ने कहा- तुम्हारे घर में रखे हुए रत्न क्या मेरे नहीं हैं ? जब आवश्यकता होगी, तब मगा लूगा । श्रेष्ठी प्रसन्न होकर अपने घर गया और सुख से रहने लगा । राजा सुकेतु पर इतना प्रसन्न हुआ कि जो कोई सुकेतु की प्रशसा करता था उससे वह प्रसन्न होता था और मणिनागदत्त की जो स्तुति करता था उससे द्वेष करता था। एक दिन राजा ने सुकेतु की बहुत प्रशंसा की, परंतु उसे जिनदेव नाम का एक श्रेष्ठी सह न सका । इसलिए बोला- महाराज आप सुकेतु के रूप गुण की प्रशंसा करते हैं तो कीजिए । और यदि धन-वैभव की करते हो, तो पहले मेरे साथ धन-वाद कराइए और जो जीते उसी की प्रशंसा कीजिए। यह सुनकर सुकेतु ने कहा-ऐश्वर्य का क्या घमंड करता है ! चुप रह जिनदेव ने कहा-पुरुष को कोई कीर्ति का काम करना चाहिए, इसलिए मैंने प्रार्थना की है कि तुम मेरे साथ धन-वाद करो । सुकेतु बोला - जैनी को बाद करना उचित नहीं है तथापि जिनदेव ने आग्रह नहीं छोड़ा और सुकेतु को धन-वाद स्वीकार करना पड़ा। 1 Page #64 -------------------------------------------------------------------------- ________________ २६, वर्ष ३९, फि०२ अनेकान्त दोनों ने प्रतिज्ञापत्र लिखकर राजा के हाथ सौप दिए कि जो हारेगा, जीतने बाला उसकी लक्ष्मी ले लेगा। पश्चात् दोनों ने अपने-अपने घर जाकर मैदान मे सारे धन का ढेर लगाया और राजादिकों ने दोनों के धन की परीक्षा कर सुकेतु को विजयपत्र दे दिया। क्योंकि धन भडार उसी के यहां अधिक था। तब जिनदेव बोला कि यथार्थ में मैं जीता हूं। क्योंकि सुकेतु सरीखे सखा की सहाय से आज आनद संसार को बढ़ाने वाले मोह-महारिपु को मैंने जीत लिया है। ऐसा कहकर सबसे क्षमा मांग सुकेतु के रोकने पर भी जिन देव ने ससार-देह-भोगों से विरक्त हो जिनदीक्षा ले ली। तब सुकेतु जिनदेव के पुत्र को उमकी सम्पूर्ण लक्ष्मी देकर दानादिक सत्कार करता हुआ सुख से रहने लगा। मणिनागदत्त सुकेतु के वैभव को देख नही सकता था, इसलिए उसने एक दिन अपने नागालय में तपश्चरण पूर्वक नागों का आराधन किया। पहले नागदत्त का पुत्र भवदत्त एक अर्जुन नाम के चांडाल को सबोधन करती हुई यक्षी को देखकर कामज्वर से पीड़ित होकर मर गया था और उस नागालय मे उत्पल नाम का देव हुआ था । सो नागदत्त के आराधन से प्रसन्न हो वह बोला-हे नागदत्त, यह कायक्ने श क्यो करता है ? नागदत्त--तुम्हारा आराधन करता हूं। उत्पल देव बोला-किस लिए? नागदत्त-जिस लक्ष्मी से मैं सुकेतु की लक्ष्मी को जीत सक, वह मुझे तुम्हारे प्रसाद से मिल जावे, इसलिए। उत्पल-तुम पूण्यहीन हो, इमलिए तुम्हें उसकी लक्ष्मी नहीं दे सकता हूँ। नागदत्त-पुण्यहीन हूं, इसीलिए तो तुम्हारी आराधन करता हूं, नही तो तुम्हारी आराधना का प्रयोजन ही क्या था? उत्पल- लक्ष्मी को छोड़कर और जो कुछ तुम कहोगे, मो करूगा । नागदत्त-तो, सुकेतु को मार डालो। उत्पल-निर्दोष पुरुष को नहीं मार सकता । उसे कुछ दोष लगाकर अलबत्ता मार डालूंगा । नागदत्त-किसी भी उपाय से मारो, परत मारो। उसके मरने से मैं सतुष्ट हो जाऊगा । उत्पन-तो मैं बन्दर का रूप धारण करता है। मुझे सांकल से बाँधकर तुम सुकेतु के निकट ले चलो। वह जब पूछे कि यह बन्दर क्यों न आये? तब तुम करना मैं वन में गया था, वहां मुझे यह बन्दर दिखलाई दिया। देखते ही इसने पूछा कि क्या देग्यते हो? मैन कहा-तू बन्दर होकर मनुष्य सरीखा बोलता है ! इसने कहा-मैं बदर नही हूँ, पुण्यदेवता हु। मेरा स्वभाव उलटा है। मैने कहा-सा कैसा? तब यह बोला-जो मेरा स्वामी होता है, वह जो कुछ आज्ञा करता है, उसे मैं कर लाता है। परन्तु यदि वह कुछ आज्ञा नहीं दे पा है, तो मैं उसे मार डालता हूं। और इसी विरुद्ध स्वभाव से किसी का आश्रय नही लेकर मैं वन मे रहता है। इसकी उक्त आश्चर्यजनक बातें सुनकर इसे आपके पास ले आया हूं, यदि आप मे आज्ञा देते रहने की सामर्थ्य है तो इसे रख लीजिग, नहीं तो मैं इसे छोड़ देता हूं। उत्पल की बातें सुनकर न गदत्त ने वैमा ही किया और सूकेतु ने उस बन्दर को अपने यहां रख लिया। रखते देर नहीं हुई थी कि वह बोना-स्वामिन, आज्ञा कीजिए। सुकेतु ने कहा-इम नगर के बाहर अनेक जिनमदिरो से युक्त एक रत्नमयी नगर बनाओ। बन्दर ने कहा मुझे छोड़ दीजिए, अभी जाकर बनाता हूं। सुकेतु ने उसे छोड़ दिया। तब उसने बाहर जाकर थोडे ही समय में मनुष्यो को कौतुक उत्पन्न करने वाला वैसा ही नगर तैयार कर दिया । और लौट कर फिर आज्ञा मागी। तब सूकेतु ऐसा कहकर कि 'मैं राजा के समीप जाकर आता है, तब तक त ठहर' राजा के पास गया, और बाला-देव, मैंने एक नगर बनवाया है, वहाँ आप राज्य कीजिए। राजा ने कहातुम्हारे पुण्य के उदय से वह नगर बना है, मो अब वहां का राज्य तुम्ही करो। यह सुनकर सुकेतु राजा का आभार (शेष आवरण पृ० ३ पर) Page #65 -------------------------------------------------------------------------- ________________ संस्मरण : संस्थानों की सुरक्षा : टेढा प्रश्न जिन लोगों को सम्पन्नता ने राग-रम और सुख भौगो का कीड़ा बना दिया है, उन्हें राग-रग मे लिप्तता के कारण पढ़ने का समय नही मिलता और जो विपन्न है उन्हें गुजारे योग्य आवश्यक सामग्री जुटाने से फुरसत नही मिलती। ऐसे मे सिद्धान्त सम्बन्धी खोज पूर्ण पर मनन चिन्तन करने वाले कहा, कितने सम्भव है ? हा, यदा कदा जो पढ भी लेते होंगे उनमें कुछ तो विचकते भी होंगे कि कहा से नई बाते पैदा करके दी जा रही है? उदाहरण के लिए जैसे 'अपरिग्रह को मूल जैन संस्कृति' बतलाकर भूले हुए मूल सूत्र का उद्घाटन करना, जीवरक्षण, करुणा, दया आदि जैसे भावों को अहिंसा न कह 'लेश्या' नाम देना और व्रतों मे जैन के अनुकूल वित भाव पोषक 'हिसाव्रत' जैसे नामों की पुष्टि कर जैनत्व विरोधी, रतिपोषक, 'अहिमावत' जैसे नामों को निरस्त करना, जैसी बाते पाठको के गले कहा तक उतरती होगी । यह हम नहीं जानते हा इतना अवश्य कहते है कि जैन समाज धार्मिक और प्रधान समाज है । पिछले समय में इसमे पर्याप्तनिक भी रहे हैं और थोड़े बहुत अब भी है। कुछ लोग ऐसे विचारों को पढ भी है और कुछ लोग अपने अभिमत भी भेजते है। हम भी हो लिखते है वह बिना किसी पूर्वाद्ध के यह मान कर लिखते है कि पाठकों के समका दृष्टिकोण रखे और पाठक उसमे निश्चित ही ऐसा करने से तत्व वितन तो होता ही है, साथ ही निर्णायक दौर की सन्निकटता का मार्ग भी प्रशस्त होता है । 1 वर्तमान के वातावरण को तो सभी जानते है । लोगों मे सिद्धान्त ज्ञान और आचार-विचार पालन का स्थान मिट्टी, पत्थर और जड़ की खोज ने बेठे है नए-नए स्थानों श्री पद्मचन्द्र शास्त्री, नई दिल्ली को पुराने तीर्थों की जगह दिलाने की कोशिशें भी लोग करने लगे है, सभी ओर आत्मज्ञान का हास है। अधिक क्या कहे जो सस्थाएं धार्मिक तत्व चितन खोज और सुधार हेतु स्थापित उनमे भी कही कही दुष्प्रवृत्ति दृष्टिगोचर है हमे स्मरण है कि पहिले कभी जब हम एक सस्था का कार्यभार संभालने पहुचे तो एक दिन हमने देखा किसन्या के मुख्य कक्ष में संस्था के कुछ कर्णधार सामूहिए रूप मे बैठे ताश खेल रहे थे, चाय, पान का दौ चल रहा था और उनमें से कई को सिगरेटो के धुए प्रागण धूमायमान हो रहा था। हम आश्चर्य मे पड़ गये, सर्विस पर नए-नए गए थे। अधिकारियों के बीच क्या कहते ? चुपचाप अपना सिर धुनते रहे और सोचते रहे हाय री दिगम्बर समाज और उसके ऐसे ये कर्णधार तथा हम जैसे गुलाम पंडित, जिन्होंने पढ़कर भी खो दिया जो दुराचार के विरोध में जूं तक न कर सके। कुछ दिनो बाद अवसर पाकर बड़ी हिम्मत जुटाकर डरते-डरते हमने सस्था के मुख्याधिकारी से एकान्त में ऐसे निवेदन किया जैसे मानो हम किसी वरदान पाने की साधम किसी देवता को मना रहे हो हम सोचते भी रहे कि यदि कही इन्हे बुरा लग गया या इन्होने अपनी और अपन पर की बेइज्जती (Insult ) समझी तो हमारा पत्ता साफ होने मे सन्देह नहीं । और यदि इन्होंने हमें कोई इल्जाम लगाकर नौकरी से निकाल दिया तो गृहस्थी भूखो मर जायेगी। क्योंकि निश्चय ही ऐसे लोगों पर निकाल देने से बडा अन्य हथियार सुरक्षित नही होता । पर गनीमत हुई कि निकल जाना हमे बड़ी बात नही थी हम निकाले जाने की सजा के स्थान से तो इसी प्रकार के अभ्यासी हो चुके थे—एक सुकार्य के कारण हम बुरी Page #66 -------------------------------------------------------------------------- ________________ २९, ३९, कि०२ अनेकान्त हर निकाले भी जा चुके थे। ऐसे लोगो की दृष्टि मे ऐसी अधिकाश संस्थाएँ किन्हीं कमेटियों के अधीन होती हमारा सुकार्य अक्सर कुकार्य होता था। हम आश्वस्त रहे। है। और कमेटियो के सदस्यों के चुनाव, संस्था की कार्य एक जगह तो रुष्ट होकर अधिकारी ने बड़े रोब से विधि या तदनुकूल योग्यता पर आधारित न होकर जन दया भाव दिखाते हुए कहा--पडित जी, आपको निकाल या धन शक्ति के साथ होते हैं। और ये शक्तियां अपने कर हम आपका रिकार्ड खराब नहीं करना चाहते, अच्छा स्वभावानुसार संस्था की कार्य विधि में जन, धन शक्ति हो आप इस्तीफा दे दें। हमें उनकी बुद्धि पर तरस आया की बढ़वारी सोचने तक सीमित रह जाती है-संस्था के कि उन्हें यह नही मालूम कि उनकी खुद की कीमत क्या उद्दश्या का पूति से इन्हें प्रयोजन नहीं रहता। कई सदस्य 7 जो समाज की सम्पत्ति पर चौधरी बने बैठे है और तो यह भी सोचते हों कि सस्था में उनके जन अधिकारों संस्था की चल-अचल सम्पत्ति पर उनके जन और उनका जिनके निकालने से हमारा रिकार्ड खराब हो जायगा। पूरा अधिकार हो और पीढ़ी दर पीढी रहता रहे, तो हमने कहा-आपकी मर्जी है तो हमे निकाल दीजिए। बस उन्होंने हमे निकाल दिया। और हमारा रिकार्ड बना आश्चर्य नही। धन और जन शक्ति अपने अधिकारत्व में रखने की ऐसी दौड़ में कही कही तो केवल हाथ उठाऊ ही रहा, जब कि कुछ वर्षों के बाद सस्था के चुनाव में वे लोग तक सदस्यो मे चुने जाते रहे हो तब भी आश्चर्य अपना रिकार्ड गँवा चुके । हम अभी तक के जीवन में जैन संस्थाओं में हैं, रहे और रहेंगे। संस्थाए हमारा जीवन है। नही। ऐसे मे संस्थाएं धीरे-धीरे विवाद बन जाती है और कई समझदार उनसे हाथ खींच लेते हैं। संस्था में भाग न हमें खुशी हुई कि सांकेतिक सस्था के तत्कालीन लेने तक जो शान्त होते है वे अशान्त हो जाते है। मुख्याधिकारी ने हमारी बात गौर से सुनी और हमे 'दाद' दी। उनके बाद जब तक हम उस सस्था में रहे वहा ऐसा सर्वथा ही होता हो-यह भी नहीं है। हमने ताश खेलना सिगरेट पीना, आदि जैसे निद्य कार्य नहीं हुए ऐसे अधिकारियो के साथ भी काम किया है जो संस्था से बोर ना ही संस्था क्लव रूप मे लोगा का अड्डा रही--- निस्पृही, सेवाभावी और हमारे (विद्वान) पद के प्रति सदा जैसे पहले थी। ये सब मुख्याधिकारी को समझदारी से विनम्र रहे हों। और ऐसो के पास भी काम किया जिन्हें अपने काया से फुसत नहीं और जो बात-बात मे ताना होगी। मारते हों "हम कोई नोकर तो नहीं है, हमे तनख्वाह थोड़े प्रसंग वश हम 'जैन स्तोत्र' निर्वाणकाण्ड का म्मरण ही मिलती है आदि।" करा दें। इसके पढ़ने से जैन की प्राचीन आधुनिक दणाएं तात्पर्य ऐसा कि सस्थाओं मे योग्य-अयोग्य सभी तरह सामने आ जाती हैं। पाठक सोचे. तब धर्मात्माओ के लोग आते रहते है। प्रयत्न होना चाहिए कि योग्य लोग निष्परिग्रहियों की कितनी सख्या थी एक-एक संघ में सस्थाओं की बागडोर संभाले और यह चुनाव विधि पर हजारों मुनिराज होते थे और मोक्ष जाने वालो की संख्या निर्भर है कि किस प्रकार उपयुक्त, योग्य और उदार व्यक्ति भी सैकड़ों में होती थी। सघरूपी सस्थाओ के कर्णधार का चुनाव हो। फलतः ऐसे व्यक्ति की क्या परख हो, इसे तीर्थकर और आचार्य अपने आदर्शो मे आदर्श थे। उन सभी को देखना होगा। अन्यथा, जन साधारण के लिए संस्थाओं से आज की सस्थाओ की तुलना कीजिए। तब आज की अधिकांश-संस्थाएँ प्राय: इंट, पत्थर, चूने और पूरी बागडोर कर्मठो के हाथों थी और अब गाहे-बगाहे दूध धन के ढेर जैसी चल-अचल सपत्ति मात्र बनकर रह गई की रखवाली बिल्ली के हाथ जाना भी अपवाद नही । है और कतिपय जन उन्है बात्मसात् किए बैठे हों तब भी बुरा न मानें। यहां हम व्यक्तिगत सस्थाओं की बात आश्चर्य नहीं। ऐसे लोगों की दृष्टि में सस्थाओं की परिनहीं कर रहे और कहने के अधिकारी भी नहीं। हमारा भाषा ही बदली होगी। अस्तु, "जो जो देखी वीतराग ने, प्रयोजन उन संस्थाओं से है जो सामाजिक धरोहर है। सो सो होमी वीरा रे।" Page #67 -------------------------------------------------------------------------- ________________ जरा सोचिए ! प्रागम-रक्षा : एक समस्या सर्वमान्य आगम तत्त्वार्थ सूत्र की टीका सर्वार्थसिद्धि मे आचार्य पूज्यपाद स्वामी ने 'श्रुत मतिपूर्वं द्वयनेकद्वादशभेद' सूत्र की व्याख्या में आगम-वक्ता के तीन रूप प्रस्तुत किए हैंऔर वे वक्ता रत्नकरण्ड मे मान्य देव, गुरु के लक्षण से पूर्ण मेल खाते हैं और मूल आगम के सच्चे वाहक ये ही हो सकते हैं तथाहि - 'त्रयो वक्तारः । सर्वज्ञ तीर्थंकर. । इतरो वा श्रुतवली | आरातीयश्चेति । तत्र सर्वज्ञेन परमर्षिणा परमचिन्त्य केवलज्ञान विभूति विशेषेण अर्थतः आगम उद्दिष्टः । तस्य प्रत्यक्षदर्शित्वात्प्रक्षीणदोषत्वाच्च प्रामाण्यम् । तस्य साक्षाच्छिष्ये वृद्धयति गर्द्धियुक्तं गंगधरं श्रुतके वलिभि रनुस्मृतग्रन्थ रचन मंगपूर्वलक्षण तत्प्रमाण, तत्प्रामाण्यात् । आरातीयेपुनराचार्यैः कालदोषसक्षिप्तायुर्मतिवलशिक्षानुग्रहा दशवेकालिकाद्युपनिबद्ध तत्प्रमाणमर्थतस्तदेवेदमिति । क्षीरार्णव जलं घटगृहीतमिव ।' -- सर्वार्थ १-२० अर्थात् वक्ता तीन प्रकार के है (१) सर्वज्ञ तीर्थकर व सामान्य केवली (२) श्रुतकेवली और (३) आरातीय इनमें से परम ऋषि सर्वज्ञ उत्कृष्ट और अचिन्त्य केवलज्ञान रूपी विभूति विशेष से युक्त हैं। इस कारण उन्होने अर्थ रूप से आगम का उपदेश दिया। ये सर्वज्ञ प्रत्यक्षदर्शी और दोषमुक्त हैं इसलिए प्रमाण हैं । इनके साक्षात् शिष्य और बुद्धि के अतिशय रूप ऋद्धि से युक्त गणधर श्रुतकेवलियो ने अर्थरूप आगम का स्मरण कर अंग और पूर्वग्रथो की रचना की। सर्वज्ञदेव की प्रमाणता के कारण ये भी प्रमाण हैं तथा बारातीय आचार्यों ने, काल दोष से जिनकी आयु, मति और बल घट गया है ऐसे शिष्यों का उपकार करने के लिए दशवेकालिक प्रादि ग्रन्थ रचे । जिस प्रकार क्षीर सागर का जल घट में भर लिया जाता है उसी प्रकार वे ग्रन्थ भी अर्थरूप में वे ही हैं इसलिए प्रमाण है । पाठकों की जानकारी के लिए यहां आगम के कुछ लक्षण दिये जा रहे हैं। ये सभी लक्षण आगमों से उद्धृत है, इसलिए प्रमाण है, कल्पित नही । देखें - १. 'तसमुहग्गद वयणं पुव्वाव रदोसविरहिय सुद्धं । आगमपिदि परिकहिय' || नियमसार ८ १ ' आगमो हि णाम केवलणाणयुरस्सरो पाएण अणिदियत्य विसओ अचितिय सहाओ जुत्तिगोयरातीदो ।' - धवला पु० ६ पृ० १५१ 'आगम: सर्वज्ञेन निरस्तरागद्वेषेण प्रणीत । २. ३. - भग० आ० विजयो० टी० २३ ४. 'आप्त वचनादि निबधनमर्थज्ञानमागमः ।' - परीक्षा ३६६ न्यातदी० पृ० ११२ 'आगमो वीतराग वचनम् ।' धर्म र प्र स्वो वृ. पृ. ५९ 'अत्तस्सवयणमागमो ।' - अनु० चू७ पृ० १६ 'आप्तोपज्ञ मनुल्लध्यम दृष्टेष्टविरोधकम् । तत्त्वोपदेशकृत्सार्वं शास्त्र कापथघट्टनम् ।' ५. ६. ७. -न्यायावतार, रत्नकरण्ड ६ अर्थात् - केवली के मुख से प्रकट वचन पूर्वापर दोषरहित, शुद्ध है। उनके द्वारा कहे गये वचन आगम है। जो केवलज्ञान पूर्वक उत्पन्न हुआ है, प्राय. अतीन्द्रिय पदार्थों को ( भी ) विषय करने वाला है, अचिन्त्य स्वभावी है और युक्ति के विषय से परे है उसका नाम आगम है । सर्वज्ञ जो ( नियमत. ) राग द्वेष रहित है उनके द्वारा रचा गया आगम है। आप्त वचनादि से होने वाले पदार्थ ज्ञान का नाम आगम है। वीतराग वचन को आगम कहते है । आप्त के वचन आगम है । आगम लक्षण के उपर्युक्त क्रम में सातवा क्रम न्यायावतार और स्वामी समतभद्र के मन्तब्यो का है । श्लोक की उत्थानिका में क्रमश: - 'तत्किभूतमिति तद्विशेषणान्याह ' ( शास्त्र कैसा है, उसके विशेषण कहते है) और 'कीदृश तच्छास्त्रं यत्तेन प्रणीतमित्याह' (जो उन्होने रचे है वे शास्त्र कैसे है) लिखा है । अर्थात् श्लोक में दिए गए सभी विशे पण आप्तोपज्ञ ( आगम) के हैं और ये विशेषण आप्तोपज्ञ होने के कारण से ही हैं। कहा भी है- 'यस्मात्तदाप्तोपज्ञ Page #68 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ३०, वर्ष ३९,कि. २ अनेकांत तस्मादिन्द्रादीनामनुल्लघ्यं । कस्मात् ? तदुपज्ञत्वेन तेषामनु- है और जिसके कारण इसे निकालो, इसे रखो जैसा आंदोलंध्यं सर्वज्ञ प्रणीतं शास्त्र ततस्तत्सावं ।'-(प्रभाचन्द्र चल पड़ा है। वृत्ति ६) अर्थात् वे आप्त द्वारा कथित होने से इन्द्र आदि यद्यपि पं० प्रवर टोडरमल जी से पहिले, चामुण्डराय, (आचार्यों) द्वारा अनुल्लध्य है, सर्वज्ञप्रणीत होने से सर्व- पं० आशाधर और राजमल प्रति श्रावकों द्वारा अनेक हितकारी-सार्वजनीन है। अत हम ऐसा मानते हैं कि ग्रंथ लिखे गये और वे पडित जी के समक्ष (जानकारी में) आगम सर्वज्ञवाणीरूप होने से स्वय प्रमाण और अपरीक्ष्य थे, पर पडित जी ने अपने स्वाध्याय ग्रंथों में उन्हें स्मरण हैं । इसके सिवाय ऊपर लिखे आगम लक्षण (न० २) मे न कर परम्परित मान्य आचार्यों (निर्ग्रन्थ गुरुओं) के ग्रंथों तो धवलाकार ने स्पष्ट निर्देश दिया है कि --- आगम युक्ति को ही मम्मान दिया।* यदि सग्रन्थो द्वारा रचित ग्रंथ आदि के गोचर नहीं है। ऐसी अवस्था मे स्वय अप्रमाणिक, आग म होते तो पडित जी उनमे से किसी एक के नाम का हम जैसा कोई मन्दबुद्धि यदि अपनी कमजोर बुद्धिरूपी तो उल्लेख करते, जैसा उन्होने नही किया। फलित कमजोर कसौटी पर कस कर आगम में प्रामाणिकता लाने होता है ५० जी की दृष्टि परपरित आचार्यों को प्रामाकी बात करे तो इसे आगम की अवहेलना ही कहा णिक मानने तक ही सीमित रही है। सर्वार्थसिद्धि में जायगा। भला, काई मदबुद्धि सर्वज्ञवाणी (आगम) को आचार्यों को आगम वक्ता स्वीकार किया ही है-गृहस्थों परीक्षा करेगा भी कैसे? एक ओर तो हम आगम को को नही। स्वत: प्रामाण्य माने और दूसरी और किन्ही विशेषणो से तात्पर्य यह है कि वर्तमान में आगम वे ही हैं जो उसकी परख की बात कर, आगम को परत प्रामाण्यसिद्ध आप्तकथित और परम्परित प्रामाणिक निर्ग्रन्थ-गुरुओं द्वारा करने की बात करे तो यह आगम के स्वत. प्रामाण्य का (जमा कि सर्वार्थ सिद्धि में कहा गया है) निवद्ध हों । अन्य विरोध ही होगा। कृतियो को हम आगमानसारी कह सकते हैं और वह भी सच तो यह है कि हम दिगम्बर सर्वज्ञ की मूलवाणी गारण्टी के बिना । कारण स्पष्ट है कि गहस्थियों मे 'अनाऔर श्रुत केवलियो द्वारा सकलित अग पूर्वो का सर्वथा त्मार्थ विना रागः' पन घटित नही होता और वे विषयो लोप मान बैठे* या शेष रहे दृष्टिवाद श्रुत * की सीमा में की आशा से रहित, निरारम्भी और निष्परिग्रही नही होते न रह सके और कुछ लोग 'अनात्मार्थ विनारागः' की और इन गुणों के बिना वे आप्त ओर निर्ग्रन्थ गुरुओं जैसा अवहेलना कर सग्रंथो और आरम्भियो की कृतियो को आगम निर्दोष व्याख्यान नही कर सकते। आगम लक्षणों से और मे मिश्रित कर उन्हे आगमरूप मे अर्घ चढ़वाने लगे, तब सर्वार्थसिद्धि १-२० की टीका से भी हमारे कथन की पूर्ण आगम की परीक्षा की बात पैदा हुई। जबकि अल्पबुद्धि पुष्टि होती है। और परिग्रहियो के लिए आगम-परीक्षण कार्य सर्वथा अशक्य अमुक को रक्खो, अमुक को निकालो जैसी एक लक्ष्यहै-'मुण्डे मुण्डे मतिभिन्नाः ।'- जैसा कि आज हो रहा विकृति के निवारणार्थ हम पहिले भी कह चुके हैं कि * "दिगम्बरो ने पाटलिपुत्र मे सकलित आगमो को मानने से इन्कार कर दिया और उन्होंने यह घोषणा कर दी कि अग और पूर्व नष्ट हो गये।' -जैन साहि० इति-पूर्व पीठिका पृ० ४६६ * 'श्वेताम्बर परम्परा जिम दृष्टिबाद श्रुत का उच्छेद मानती है उसी दृष्टिवाद श्रुत के अग्रायणीय और ज्ञानप्रवाद पूर्व से षट् खडागम, महावध, कषायपाहुड आदि दिगम्बर सिद्धान्त ग्रन्थो की रचना हुई है।' -जैनदर्शन (प. महेन्द्रकुमार न्यायाचार्य) पृ०१३ ...... उपयोगी ग्रन्थनि का किंचित अभ्यास करि टीका सहित समपसार, पंचास्तिकाय, प्रवचनसार, नियमसार, गोम्मटसार, लब्धिसार, त्रिलोकसार, तत्स्वार्थसत्र इत्यादि शास्त्र अर भरणासार, पुरुषार्थसिद्धयुपाय, अष्टपाहुड, आत्मानुशासन आदि शास्त्र अर श्रावक मुनि का आचार के प्ररूपक अनेक शास्त्र, अर सुष्ठुकथा सहित पुराणादि शास्त्र इत्यादि अनेक शास्त्र हैं।' -मोक्षमा० प्रकाशक (प्रयम अधिकार) - Page #69 -------------------------------------------------------------------------- ________________ जरा सोचिए 'मन्दिरों में मूल के सिवाय कोई भी वह कृति न रखी जब हमने परम्परित प्रामाणिक निग्रन्थ आचार्यों की जाय जो किन्ही परम्परित आचार्यवर्य की न हो। इसमें मूल कृतियों मात्र को मन्दिरो में रखने की बात कही तो हमारा भाव 'आगमरूप में न रखी जाय' ऐसा रहा है। एक प्रमुख ने हमसे कहा- इससे तो आगम भाषा से अजान जैसा कि हमने अपने लेख के प्रारम्भ मे स्पष्ट भी कर लोगों का संकट बढ़ जायगा। हमने कहा-अपना संकट दिया है-'अमुक आगम है, और अमुक आगम नहीं है, बचाओ या मूल आगम की रक्षा करो। दोनों बातें तभी अमुक को निकालो, अमुक को रखो ऐमी चर्चा चारों ओर हो सकती है जब विद्वन्मुख से मूल का (मौखिक रूप) अर्थ है', आदि । उक्त प्रसंग हम आज भी दुहराते है और चाहते सुना जाय । अर्थ के मौखिक होने से किसी गलत रिकार्ड हैं कि विवाद शान्त करने के लिए सभी प्रकार की घुसपैठ बनने की शंका भी न रहेगी और आगम भी सुरक्षित रोक दी जाय । पूर्वाचार्यों के आदेश नुसार परम्परित रहेगा। प्रारम्भिक समय मे ऐसा ही होता रहा है। निग्रन्थ आचार्यों की रचनाए ही आगम श्रेणी में मानी जांय भापान्तरकारो की लेखरूप में भाषान्तर करने की उदारता और अन्यों-कृत भावार्थ, विशेषार्थ, खुलासा अर्थ और स्व. भी आज संभाविन भावी विद्वत्ममाज के वंश को ले बैठने तंत्र रचनाओं को (जिनसे मतभेद --विवाद पनप सकता है) में एक कारण बनी है ? क्योंकि आज सभी को भाषान्तर आगमन कहा जाय । भले ही उमे आगमानुसारी श्रेणी मे, सुलभ हैं - चाहे वे गलत ही क्यो न हो-लोग उन्हें पढ़ते (बिना किसी गारण्टी के) रख लिया जा सकता हो। है। उन्हें विद्वानों की आवश्यकता प्रतीत नहीं होती और किसी प्रकार की कोई मीमा न होने से एक मन्दिर मे तो वे विद्वानों के उत्पादन से मुख मोड़ बैठे हैं। पाठशालाएं हमने एक अभिनन्दन ग्रन्थ तक को शास्त्र की चौकी पर, भी समाप्त प्राय हैं। पंडिनों ने आनी पीढी तैयार करने स्वाध्याय के रूप मे देखा है । यानी कुछ भी हो, कोई ग्रंथ से भी इसीलिए विराम लिया है कि अब ममाज को उनकी हो, चल मन्दिर मे --2मी परम्परा चल पड़ी है। मोच आवश्यकता नहीं । भाषान्तरों की बहुतायत से पहिले एक लेना चाहिए कि ममोसरण कोई ऐमी लाइब्रेरी नहीं है समय था जब सरस्वती सदा लक्ष्मी के सिर पर बैठती थी जहां सभी प्रकार के ग्रंथ रख दिए जाय । मन्दिर की अपनी -लोग पडितों को सम्मान देते थे, जबकि आज लक्ष्मी ने मर्यादा है, मन्दिर मे शास्त्र-भण्डार है, जिसमे मूल और सरस्वती को दासी बना लिया है। दूसरी बात इन भाषाप्रामाणिक दिव्यध्वनि ही स्थान पा सकती है। पूजा और जैन तरो से यह हुई कि पागम मे अनागम भी घसपैठ करने पदों की पुस्तकें वीतरागभक्ति के लिए रखी जा सकती है। लगा --गलत भाषान्तर भी अर्घ पाने लगे-जिनवाणी हम जिन, जैन, जिनवाणी और अपने विद्वान् गुरुगण अप्रामाणिक (मिश्रित) होने लगी। और तीसरी बात जो तथा गुरुसमो के श्रद्धालु है। लोग जिन भाषातरकार विद्वानो सर्वाधिक भयावह है वह है --मूल आगम के भावो लोप का के गुणगान करेंगे, शायद उन विद्वानो के अपेक्षाकृत हम प्रसग । जब सभी लोग मूल की उपेक्षा कर मात्र भाषान्तर अधिक भक्त होंगे। कितनो ही को तो हम किसी हद तक पढ़ते रहेगे तो एक समय ऐमा भी आयेगा जब मन्दिरों में प्रामाणिक भी मानते होगे। पर, हमसे यह पाप न हो शेष बचा मूल-आगम भी रखा-रखा जीर्ण-शीर्ण हो जायगा। सकेगा कि हम उन्हे 'जिन' और निर्ग्रन्थ आचार्यों के सम लोगों के ज्ञान में तो उसके रहने का प्रश्न ही नही। बिठा, उनके भाषान्तरो आदि को जिनवाणी के साथ अर्घ हम यह भी जानते है कि हमारी उक्त योजना से दिला जिनवाणी की अवहेलना करें। उनके भाषान्तर चाहे धार्मिक-साहित्य के प्रति व्यापारी मनोवृत्ति के लोगों के बहमत की दृष्टि में ठीक ही क्यो न हो? हम तो उन मन और उनके व्यापार को धक्का लग सकता है, वे इसका भाषान्तरों को आगमानुकूल भी हो सकते है ऐसा कह, विरोध भी करें तो हमे आश्चर्य नही। पर, हमें यह भी आगम नहीं हैं- ऐमा ही कहेंगे । हमारा यह भी विश्वास इष्ट नहीं कि किसी व्यापार के लिए धर्म और आगम का है कि स्वयं कोई भाषान्तरकार भी अपने भाषान्तर को स्वरूप ही बदल दिया जाय । सोचने की बात यह है कि आगम घोषित करने की चेष्टा न करेगा। अस्तु : जिस धर्मके अपने मूल-आगम ही सुरक्षित नही रहें उस धम Page #70 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ३२, बर्ष ३६, कि.२ के अन्यायो कैसे सुरक्षित रह सकते हैं ? फिर तो ऐसा ही नए प्रकाशन के व्यापार को बन्द कर प्राचीन मूल मागम होगा कि अपने को जन घोषित करते रहो और जैसी चाहो ग्रन्थों के प्रकाशन, पठन-पाठन पर बल दिया जाय। धर्मविमुख प्रवृत्तियां करते रहो । आखिर, रजनाश भा ता क्या कहें ? आज जन-दृष्टि प्रायः 'पर' पर केन्द्रित भगवान न होते हुए, अपने को भगवान धोषित 'कए बैठे हैं। हो बैठी है, सभी 'पर' के सुधार को लक्ष्य बनाए हुए है। हम एक बात फिर कह दें कि हम जो विचार देते है पूछते हैं हमारा लड़का कैसे धर्मात्मा रह सकेगा या अमुक नम्र होकर देते हैं और वे हर व्यक्ति को विचार कर निर्णय अन्य का सुधार कैसे हो सकेगा? नई पुस्तकें छपाने और के लिए होते है, किसी खंडन-मंडन या उत्तर-प्रत्युत्तर के अन्य साधारण में उनके प्रचार को भी उन्होंने इसीलिए लिए नही होते । पसद आएँ तो ग्रहण करें अन्यथा छोड़ चुन रखा है । ऐसे लोगों को मालूम होना चाहिए कि यदि दें। यह हम इसलिए भी लिख रहे हैं कि कोई सज्जन इन्हें उनका ज्ञान, ध्यान और आचरण ठीक होगा तो आगे सभी समाज में विघटन का मुद्दा न बना लें जैसी कि आज प्रथा ठीक होगा । अतः उन्हें पहिले अपना व्यवहार सुधारने पर चल पडी है। हमारी भावना यही है कि-मूल आगम बल देना चाहिए। आज नेता चिल्लाते हैं, कोई सनता सरक्षित-निर्दोष रहे, विद्वानों का उत्पादन हो, पाठशालाएं नहीं, नेता को खीम उठती हैं। यही खीम यदि नेता को चलें और मल-आगम को विद्वन्मुख से मौखिक रूप मे पढ़ा अपने आचरण के प्रति उठे, तब कार्यसिद्धि हो। हमारा और सना जाने की परिपाटी पुन: चाल हो। मोखिक इम- निवेदन है कि नेतागण और सर्वसाधारण, सभी मल जिनलिए ताकि कोई गलत रिकार्ड न बने-मभी विद्वान् वाणी को गुरुमुख से पढ़े, उसे समझें और तदनुरूप आचरण विभिन्नमति हो सकते है--कोई अर्थ मे चक भी सकते है। करें तो सभी धार्मिक प्रसग सहज स्थिर और उन्नत हो हम बारम्बार विनम्र प्रार्थना करते रहे है कि अमूल्य जिन- सकते है और जिनवाणी भी सुरक्षित रह सकती है। वाणी की रक्षा हेतु हल्के और काल्पनिक यद्वा-तद्वा लेखन -सम्पादक (पृ० २४ का शेषांश) गुफाओ में उत्कीर्ण दश्यो से हमे तत्कालीन जैन-समाज अंकन है। राजा अपनी दिग्विजयों में हमेशा दो परिचायकों में प्रचलित आमोद-प्रमोद के माध्यमो एवं साधनों का भी द्वारा घिरा दिखाया गया है, जिनमें एक करा आभास मिलता है। मनोरजन के लिए खेल-कूद, संगीत, है तथा दूसरा पताका । ये दोनो चीजें राजकीय महत्व की नत्य तथा झील-विहार प्रादि का प्रचलन आम था। नृत्य- है। युद्ध-विजय कर वापस आने पर राजा का समारोह संगीत पर स्त्रियों का एकाधिपत्य लक्षित होता है । बांसुरी पूर्वक भव्य स्वागत होता था। एव मदंग आदि वाद्य-वन्द गुफाओ में उत्कीर्ण दृश्यों में स्त्रियों की दशा पर भी इन कलाकृतियों से सकते हैं। आखेट के दश्यों में लोगों को हिरण का पडता है। समाज में स्त्रियों का सम्मान था। उस्किषियों शिकार तीर-धनुष से, सिंह का शिकार भालों से तथा में कई स्त्रियों को अपने पतियों ने साथ धार्मिक अनुष्ठानों का शिकार गदा एवं बड़े-बड़े डंडों से करते हुए एवं अन्य समारोहो में भाग लेते हुए दधित किया गया MATAT या है। यद्ध एवं द्वन्द्व के दृश्य भी देखने को है। उन्हें हाथी की सवारी करते हुए तथा आखेट में भाग मिलते है। युद्ध के दृश्यों का अध्ययन करने से पता चलता लेते हए भी चित्रित किया गया है। है कि युद्ध मे तीर-कमान तथा तलवार एव ढाल आदि इस प्रकार हम पाते हैं कि यदि इन प्राचीन स्मारकों व्यवहार होता था। सतरियों को तलवार एवं उनमें उत्कीर्ण मतियों आदि का गहन अध्ययन किया के अलावा भाला एवडे से लेस भी दिखलाया गया है। जाए तो तत्कालीन जैन समाज के विभिन्न पहलों पर जाना पडसवारों तथा हाथी-बल का समावेश विस्तृत प्रकाश पड़ेगा तथा बहुत-सी नई जानकारियां था। युद्ध में राजा को स्वय सेना का नेतृत्व करते हुए मिलेंगी। नेहरू नगर, पटना-१०००१३ दिखबाया गया है। एक दृश्य में चार घोड़ो से जुते रथ का Page #71 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रात्मानुभवी परम्परित निर्ग्रन्थ प्राचार्यों का ग्रन्थ-कर्तृत्व 'दिव्य ध्वनि करि उपदेश हो है । ताके अनुसरि गणधरदेव अंग प्रकीर्णकरूप ग्रन्थ गूंथे हैं। बहुरि तिनके अनुसारि अन्य-अन्य आचार्यादिक नाना प्रकार ग्रन्थादिक की रचना करें है।' 'बहरि केतक कालताई थोरे अंगन के पाठी रहे (तिनने यह जानकर जो भविष्य काल में हम सारिखे भी ज्ञानी न रहेंगे, तातै ग्रन्थ रचना आरम्भ करी और द्वादशागानुकल प्रथमानुयोग, करणानुयोग, द्रव्यानयोग के ग्रन्थ रचे) पीछे तिनका भी अभावभया । तब आचार्यादिकनिकरि तिनके अनुसारि बनाए ग्रन्थ वा ग्रन्थनि के अनुसारि बनाए ग्रन्थ तिनही की प्रवृत्ति रही।' 'प्रथम मूल उपदेश दाता तो तीर्थकर भए सो तो सर्वथा मोह के नाशत सर्व कषायनिकरि रहित ही हैं। बहरि ग्रन्थकर्ता गणधर वा आचार्य ने मोह का मन्द उदय करि सर्व बाह्य-आभ्यन्तर परिग्रह को त्यागि महामन्दकषायी भए है। तिनके तिस मंदकषायरि किंचित् शुभोपयोग ही की प्रवृत्ति पाइए है।' 'मूलग्रन्थ कर्ता तो गणधर देव है ते आप चार ज्ञानधारक है अर साक्षात् केवली का दिव्यध्वनि उपदेश सुन हैं ताका अतिशय करि सत्यार्थ ही भाष है। अर ताही के अनुसारि ग्रन्थ बनाव हैं। सो उन ग्रन्थनि विर्ष तो असत्यार्थपद कैसे गूथे जांय अर अन्य आचार्यादि ग्रन्थ बनाव हैं तो भी यथायोग्य मम्यग्यान के धारक हैं। बहुरि ते तिन मूल ग्रन्थनि की परम्परा करि ग्रन्थ बनाव है।' 'बहरि वक्ता का विशेष लक्षण ऐसा है जो याकै व्याकरण, न्यायादिक वा बड़े-बडे जैन शास्त्रनि का विशेष ज्ञान होय तो विशेषपने ताको वक्तापनो शो में । बहुरि ऐसा भी होय अर अध्यात्म-रमकरि यथार्थ अपने अनुभव जाके . न भया होय सो जिन धर्म का मर्म जाने नाही, पद्धतिकरि ही वक्ता होय है। अध्यात्म रसमय सांचा जिन धर्म का स्वरूप वाकरि कैसे प्रगट किया जाय । नाते आत्मज्ञानी होइ तो सांचा बक्सापनो होइ ।' -मोक्षमार्ग प्रकाशक, पहिला अधिकार (पृ० २६ का शेषाश) मानता हुआ घर आया । आते ही बन्दर बोला-स्वामिन् , आज्ञा दीजिए । सुकेतु बोला-अच्छा अब सबको ले जाकर मेरे उस नवीन नगर में ठहराओ। बात की बात मे उसने ऐसा ही कर दिखाया। और सूकेतु को उसकी स्त्री धारिणी महित राजभवन मे ले जाकर मिहामन पर बैठाया और फिर आज्ञा मागने लगा। तब मुकेतु ने कहा-गंगाजल लाकर धारिणी सहित मेरा राज्याभिषेक करके राज्यमुकुट पहनाओ। बन्दर ने वैमा ही किया और आज्ञा मागने लगा। सुकेतु बोला-नागदत्तादि सब लोगो को महल मकान देकर उनको अक्षय धनधान्यादि से पूर्ण कर दो। उसने तत्काल ही वैसा भी कर दिया, और फिर आज्ञा मांगी। तब सुकेतु ने खिसियाकर कहा, अच्छा मेरे राजमहल के आगे एक खंभा गाड़कर उसकी जड से एक साकल बांध उस साकल के सिरे पर एक कड़े मे अपना सिर फंसाकर जब तक मैं नही रोक, तब तक खभे के ऊपर चढ और नीचे उतर । बेचारे बन्दर ने इस आज्ञा के अनुमार दो-तीन दिन तक खभे पर वह कसरत की, परन्तु जब सुकेतु ने नहीं रोका, तब थककर वह वहा से भाग गया। सकेत सेठ बहुत समय तक राज्य करके एक दिन अपने सिर में श्वेत बाल देखकर ससार से विरक्त हो गया। इसलिए वह अपने पुत्रको राज्य देकर राजा वसुपाल से अपने को छुड़ा अर्थात् आज्ञा ले मणिनागत्तादि बहत लोगों के साथ भीम भट्टारक के निकट दिगंबर मुनि हो गया और तपस्या करके मोक्ष को प्राप्त हुआ। धारिणी भी तपकर अच्युत स्वर्ग में देव हई। मणिनागदत्तादि यथायोग्य गतियों को प्राप्त हुए। सुकेतु के घर से निकलते ही वह देवमयी नगर लोप हो गया। इस प्रकार एक बार के दान के फल से सुकेतु को देवदुर्लभ सुख प्राप्त हुए और अंत मे मोक्ष प्राप्त हुआ। इसलिये सब लोगों को दान-धर्म में तत्पर रहना चाहिए। Page #72 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Regd. with the Registrar of Newspaper at R.No. 10591/62 वीर-सेवा-मन्दिर के उपयोगी प्रकाशन समीचीन धर्मशास्त्र : स्वामी समन्तभद्र का गृहस्थाचार-विषयक मत्युत्तम प्राचीन ग्रन्थ, मुख्तार श्रीजुगलकिशोर जी के विवेचनात्मक हिन्दी भाष्य पौर गवेषणात्मक प्रस्तावना से युक्त, सजिल्द । नग्रम्प-प्रशस्ति संग्रह, भाग १: संस्कृत और प्राकृत के १७१ अप्रकाशित ग्रन्थों की प्रशस्तियों का मंगलाचरण सहित अपूर्व संग्रह, उपयोगी ११ परिशिष्टों और पं. परमानन्द शास्त्रो की इतिहास-विषयक साहित्य परिचयात्मक प्रस्तावना से अलंकृत, सजिल्द । ... नवग्य-प्रशस्ति संग्रह, भाग २: अपभ्रंश के १२२ अप्रकाशित ग्रन्थों की प्रशस्तियों का महत्त्वपूर्ण संग्रह। पचपन प्रन्थकारो के ऐतिहासिक ग्रंथ-परिचय और परिशिष्टों सहित। सं.पं. परमानन्द शास्त्री। सजिल्द। १५.०. समाधितन्त्र और इण्टोपदेश: प्रध्यात्मकृति, पं० परमानन्द शास्त्री की हिन्दी टीका सहित पवणबेलगोल पोर दक्षिण के अन्य जैन तीर्थ : श्री राजकृष्ण जन .. प्याय-दीपिका : मा० अभिनव धर्मभूषण की कृति का प्रो० स० दरबारीलालजी न्यायाचार्य द्वारा सं.अनु.। १.... जैन साहित्य और इतिहास पर विशर प्रकाश : पृष्ठ संख्या ७४, सजिल्द । कसायपाहुबसुत्त : मूल ग्रन्थ की रचना प्राज से दो हजार वर्ष पूर्व श्री गुणपराचार्य ने की, जिस पर श्री यतिवृषभाचार्य ने पन्द्रह सौ वर्ष पूर्व छह हजार श्लोक प्रमाण णिसूत्र लिखे । सम्पादक पं हीरालालजी सिद्धान्त-शास्त्री। उपयोगी परिशिष्टो भौर हिन्दी अनुवाद के साथ बड़े साइज के १००० से भी अधिक पृष्ठों में । पुष्ट कागज और कपड़े की पक्की जिल्द । जैन निबन्ध-रत्नावली : श्री मिलापचन्द्र तथा श्री रतनलाल कटारिया ज्यानशतक (ध्यानस्तव सहित) : संपादक पं. बालचन्द्र सिद्धान्त-शास्त्री भावक धर्म संहिता : श्री दरयावसिंह सोषिया जन लक्षणावली (तीन भागों में): सं०५० बालचन्द सिद्धान्त शास्त्रा प्रत्येक भाग ४.... जिन शासन के कुछ विचारणीय प्रसंग : श्री पचन्द्र शास्त्री, बहुचित सात विषयों पर शास्त्रीय प्रमाणयुक्त तर्कपूर्ण विवेचन । प्राक्कथन : सिद्धान्ताचार्य श्री कैलाशचन्द्र शास्त्री द्वारा लिखित २-०० मूल जैन संस्कृति अपरिग्रह : श्री पपचन्द्र शास्त्री Jaina Bibliography : Shri Chhotelal Jain, (An universal Encyclopaedia of JainReferences.) In two Vol. (P. 1942) Per set 600-00 आजीवन सदस्यता शुल्क : १०१.०० १० वार्षिक मूल्य : ६) १०, इस अंक का मूल्य : १ रुपया ५० पैसे विद्वान् लेखक अपने विचारों के लिए स्वतन्त्र होते हैं। यह आवश्यक नहीं कि सम्पारक-मण्डल लेखक के विचारों से सहमत हो। पत्र में विज्ञापन एवं समाचार प्रायः नहीं लिए जाते। सम्पादक परामर्श मण्डल म. ज्योतिप्रसाद जैन, श्री लक्ष्मीचन्द्र जैन, सम्पादक भी पप्रच्या शास्त्री प्रकाशक-बाबूलाल जैन वक्ता, वीर मेवा मन्दिर के लिए, गीता प्रिंटिंग एजेन्सा, री०-१०५, न्यूसीलमपुर, दिल्ली-५॥ से मुद्रित । Page #73 -------------------------------------------------------------------------- ________________ बोर सेवा मन्दिर का त्रैमासिक अनकान्त (पत्र-प्रवर्तक : प्राचार्य जुगल किशोर मुख्तार 'युगवोर') वर्ष ३६ : कि०३ जुलाई-सितम्बर १९८६ इस अंक मेंक्रम विषय १. अनेकान्त-महिमा २. गणीन्द्र गौतम का २५००वां निर्वाण वर्ष ___ --डा. ज्योति प्रसाद जैन ३. कामदेव प्रद्य म्न-डा. इन्दुराय ४. धर्मसार सतसई : श्री कुन्दनलाल जैन दिल्ली १३ ५. महाकवि धवल और उनका 'हरिवंशपुराण' –श्रीमती अलका प्रचंडिया ६. महाकवि अर्हदास : व्यक्तित्व एवं कृतित्व -डा० कपूरचन्द जैन, खतौली ७. भगवती आराधना मे तप का स्वरूप -कु. निशा, बिजनौर ८. मुक्ति मे करुणा : एक विसंगति -श्री पद्मचन्द्र शास्त्री, नई दिल्ली ६. पतन का कारण : परिग्रह -श्री पप्रचन्द्र शास्त्री, नई दिल्ली १०. जरा सोचिए: -सम्पादकीय ११. वरी-वाणी-स्मरण आ०पृ० २ प्रकाशक वीर सेवा मन्दिर, २१ दरियागंज, नई दिल्ली-२ Page #74 -------------------------------------------------------------------------- ________________ कर्णी-वाणी-स्मरण -संसार में जहां परिग्रह होता है वही पारस्परिक सौमनस्य की प्रक्रिया समाप्त हो जाती है। अत: मनुष्यों ने विचार किया कि जब परिग्रह अनर्थ का मूल है तब इसे ऐसे कार्यों में लगाओ जहां इसके द्वारा अशान्ति न हो। परन्तु यह तो जिस परिणाम का है, जहाँ गया अपना कार्य करेगा। और की कथा छोड़ो, मन्दिर मे गया तो वहां पर भी इसने अपना राजमाया । मन्दिर के निधि-रक्षक के हृदय में ऐसा अभिमान उत्पन्न किया कि "मैं मन्दिर का खजाञ्ची हूं।" फूलकर कुप्पा हो गया। (२०-१-५१) -द्रव्य अनर्थकारी है परन्तु मन्दिर का द्रव्य तो सबसे अधिक अनर्थकारी है। जो मनुष्य मन्दिर के द्रव्य का स्वामी बन जाता है वह शेष को तुच्छ समझने लगता है और जो मन्दिर का द्रव्य जिसके हाथ में रहता है उसको अपना समझने लगता है । परिणाम यह होता है कि समय पाकर दरिद्र बन जाता है और अन्त में जनता की दृष्टि में उसकी प्रतिष्ठा नहीं रहती। अतः मनुष्यता की रक्षा करने वाले को उचित है कि मन्दिर का द्रव्य कभी भी अपने निजी उपयोग में न लावे। द्रव्य वह वस्तु है जिसके वशीभूत होकर मनुष्य न्यायमार्ग से च्युत होने की चेष्टा करने लगता है। (१०-३.५३) -वासना में अनेक प्रकार के सकल्प रहते है जो प्रायः प्रत्येक मनुष्य के अनुभव में आ रहे हैं। यही कारण है जो लोक मे प्राय: सभी दुःखी देखे जाते हैं। सुख का अनुभव उसी को होगा जो सब चिन्ताओ से रहित हो जावे। अन्य की कथा छोडो जो घर छोड देते हैं वे भी गृहस्थो के सदश व्यग्र रहते है । कोई तो केवल परोपकार के चक्र मे पड़कर स्वकीय ज्ञान का दुरुपयोग कर रहे है । कोई हम त्यागी है, हमारे द्वारा संसार का कल्याण होगा ऐसे अभिमान मे चर रहकर काल पूर्ण करते हैं। (३१-५-५१) -यदि अन्तरग गृद्धता है तब त्यागी होना समाज को भार है। आत्मा ज्ञाता-दृष्टा है, इसका उपयोग करो। उसमे हर्ष-विपाद मत करो; अन्यथा वह उ.य जो आया है, निर्णि होकर भी आगामी बन्ध का जनक होगा। जैसेगज स्नान तो करता है; स्नान में पूर्व धूलि का सम्बन्ध विलग हो जाता है। परन्तु फिर नवीन धलि का संडके द्वारा सम्बन्ध कर लेता है और प्राचीन दशा का भोक्ता होता है। (आपाढ सुदी ५) -शान्ति का मार्ग इस लोकेषणा से परे है। लोक प्रतिष्ठा के अर्थ त्याग व्रत सयमादि का अर्जन करना धूल के अर्थ रत्न को चर्ण करने के समान है। पचेन्द्रिय के विषयो को सुख के अर्थ सेवन करना जीवन के लिए विष भक्षण करना है। जगत के मनुष्य आत्मीय स्वार्थ के लिए ही कोई कार्य करते है । यह कोई निन्दा की बात नही । सामान्य मनुष्यो की कथा तो छोडो किन्तु जो विद्वान् है वह भी जो कार्य करते है आत्मप्रतिष्ठा के लिए ही करते है । यदि वह व्याख्यान देते है तब यही भाव उनके हृदय में रहता है कि हमारे व्याख्यान की प्रशंसा हो अर्थात् लोग कहें कि महाराज ! आप धन्य है, हमने तो ऐसा व्याख्यान नहीं सुना जसा श्रीमुख से निर्गत हुआ। हम लोगों का सौभाग्य था जो आप जैसे सत्पुरुषों द्वारा हमारा ग्राम पवित्र हुआ। ग्राम ही नही आज हम लोगो के गृह आपके चरणस्पर्श से पवित्र हो गये। महान पुण्य का उदय होता है तभी आप जैसे महात्माओ का मिलाप होता है। इत्यादि वाक्यों को सुनकर व्याख्याता महोदय हृदय मे प्रसन्न हो जाते है। (२४-६-५१) -आजकल सब मनुष्य नेता बनने के प्रयास मे हैं । जो मनुष्य आत्मीय गुणो का विकास करने में असमर्थ है, निरन्तर व्यन रहता है, जिसका कोई लक्ष्य नही ऐसा उद्देश्य शून्य मनुष्य क्या उपकार करेगा ? जो स्वयं दरिद्र है वह पर का पोषण क्या करेगा ? जो स्वय अन्धा है वह पर को मार्ग नही दिखा सकता। इसी तरह जो स्वयं आत्मज्ञानशुन्य है वह पर के हित की वार्ता क्या करेगा? (२६-७-५१) (वर्णी-वाणी भाग ३ से साभार) Page #75 -------------------------------------------------------------------------- ________________ वर्ष ३६ किरण ३ } मी मन अनेका परमागमस्य बीजं निषिद्धजात्यन्धसिन्धुरविधानम् । सकलनयविलसितानां विरोधमयनं नमाम्यनेकान्तम् ॥ वीर-सेवा मन्दिर, २१ दरियागंज, नई दिल्ली-२ वीर - निर्वाण संवत् २५११ वि० सं० २०४३ अनेकान्त महिमा अनंत धर्मणस्तस्वं पश्यन्तो प्रत्यगात्मनः । कान्मयो मूर्तिनित्यमेव प्रकाशताम् ॥ जेण विरता लोगस्स वि ववहारो सव्वा रग डिइ । भवनेकगुरुणो णमो प्ररणेगंतवायस्स ॥ परमागमम्य बोजं निमिद्ध जात्यन्ध-सिन्धुरभिधानम् । तम्स जुलाई-सितम्बर १६८६ नयमितानां विरोधमथनं नमाम्यनेकान्तम् ॥ ममिच्छारण समूह महियस्स प्रमयसारस्स । जिणवरणस्स भगवओ संविग्गसुहाहिगमस्स ॥ परमागम का वीज जो, जैनागम का प्राण । 'अनेकान्त' सत्सूर्य सो, करो जगत कल्याण ॥ 'अनेकान्त' रवि किरण से, तम अज्ञान विनाश । मिट मिथ्यात्व- कुरीति सव हो सद्धर्म प्रकाश ॥ धर्मा eat अथवा चैतन्य-परम- आत्मा को पृथक-भिन्न रूप दर्शाने वाली, अनेकान्तमयी मूर्ति - जिनवाणी, नित्य त्रिकाल ही प्रकाश करती रहे- हमारी अन्तज्योति को जागृत करती रहे । जिसके बिना लोक का व्यवहार सर्व था ही नहीं बन सकता, उस भुवन के गुरु — असाधारणगुरु अनेकान्तवाद को नमस्कार हो । . जन्मान्ध पुरुषों के हस्तिविधान रूप एकांत को दूर करने वाले, समस्त नयों से प्रकाशित, वस्तु स्वभावों के विरोधों का मन्थन करने वाले उत्कृष्ट जैन सिद्धान्त के जीवनभूत, एक पक्ष रहित अनेकान्तस्याद्वाद को नमस्कार करता हूं । मिथ्यादर्शन समूह का विनाश करने वाले, अमृतसार रूप; सुख पूर्वक समझ में आने वाले; भगवान जिनके ( अनेकान्त गर्भित) बचन के भद्र (कल्याण) हों । 000 Page #76 -------------------------------------------------------------------------- ________________ गणीन्द्र गौतम का २५००वां निर्वाण वर्ष 01. ज्योति प्रसाद जैन अन्तिम तीर्थंकर भगवान बद्धमान महावीर (ई०पू० हो गई। और उसने अपने समस्त शिष्यों सहित भगवान ५००-५२७) के धर्मतीर्थ में उन सर्वज्ञ-वीतराग-हितोपदेशी महावीर का शिष्यत्व सहर्ष स्वीकार कर लिया। तभी से जिननाथ के पश्चात् सर्वप्रथम स्थान उनके अग्रशिष्य एवं वह पावन आषाढी पूर्णिमा लोक मे गुरुपूर्णिमा के नाम से प्रधान गणधर भगवत् इन्द्रभूति गौतम का है। प्रत्येक शुभ- प्रसिद्ध रहती आई है। गौतम स्वामी के अनुज वायभति कार्य के प्रारंभ में पढ़े जाने वाले मंगल-श्लोक-"मगल एवं अग्निभूति तथा अन्य उन्ही जैसे आठ दिग्गज पण्डित भगवान वीरो, मंगलं गौतमो गणी" आदि में भी भगवान भी अपने-अपने शिष्य समूहों सहित उसी समय दीक्षित हुए, महावीर के साथ ही साथ गौतम गणेश का मंगल स्मरण और गौतम सहित भगवान महावीर के ये ग्यारह गणधर नित्य किया जाता है। बने । अगले दिन, श्रावण कृष्ण प्रतिपदा के प्रात:काल वस्तुतः भगवान महावीर का तीर्थङ्करत्व तब तक सूर्योदय की प्रथम किरण के साथ, अभिजित नक्षत्र में, सार्थक नही हुआ जब तक कि उन्हें गौतम स्वामी के रूप निकटस्थ विपुलाचल के शिखर पर, जहाँ उस समय में सर्वथा उपयुक्त गणधर का सुयोग प्राप्त नहीं हो गया। समवसरण-सभा जुडी थी, चतुर्विध श्रीसघ (मुनि-आयिकाभगवान को केवल ज्ञान की प्राप्ति वर्तमान बिहार राज्य श्रावक-श्राविका) के समक्ष त्रैलोक्य-पूजित जगद्गुरु तीर्थकर मे ऋजुकूला नदी के तटवर्ती जभिक (जम्हइ) ग्राम के महावीर की सर्वकल्याणकारी दिव्य ध्वनि खिरी, वाहर एक शालवृक्ष के नीचे, ईसा पूर्व ५५७ को वैशाख क्योंकि उसे झेलने मे सर्वथा समर्थ गौतम रूपी गणीन्द्र का शुक्ल दशमी के अपराह्न में, हुई थी। इन्द्रादि देवों ने सुयोग मिल गया था। परिणामस्वरूप, उसी दिन, उसी आकर पूजोत्सव किया, समवसरण भी रचा गया, किन्त समय, उसी स्थान पर वीर प्रमु की प्रथम देशना के साथ भगवान की वाणी नही खिरी-वह ६६ दिन तक मौन उनके धर्मतीथं की उत्पत्ति हुई, उनके धर्मचक्र का प्रवर्तन रहकर विहार करते रहे, और आषाढ़ शुल्क पूर्णिमा के हुआ, श्री वीर उनके शासन का ॐनमः हुआ। भगवान दिन मगध महाराज्य की राजधानी राजगृह अपरनाम महावीर रूपी हिमाचल से प्रसूत वह श्रुत-सरिता रूपी पञ्चशैलपुरके वैभार पर्वत पर आ विराजे। उसी दिन, ज्ञानगगा, गुरुगोतम के मुखरूपी कुण्ड से निःसृत होकर ही वहीं स्वतः प्रेरित होकर, अथवा वटक-वेषी इन्द्र की प्रेरणा "सबंसत्त्वानाहिताय, सर्वसत्त्वानां सुखाय" लोक में प्रवाहित से समस्त वेद-वेदांगों का अधिकारी आचार्य द्विजोत्तम इन्द्रभूति गौतम अपने शिष्य समुदाय सहित, आत्म-तत्व सर्वज्ञ भगवान के दिव्योपदेश को हृदयंगम् करके विषयक अपनी शंकाओं के समाधानार्थ पधारा । समवसरण गौतम गणेश ने उसके सार-संक्षेप को सुव्यवस्थित रूप से के मध्य गन्धकुटी के ऊपर अन्तरीक्ष विराजमान उन अंग-पूर्व ज्ञान में निबद्ध किया। तीर्थकर भाषित एवं श्रीमत् केवलज्ञान-साम्राज्य-पदशाली परम तेजस्वी अहंत गणधर गंथित इस दिव्य श्रृत के दो विभाग थे-अंगपरमात्मा के साक्षात् दर्शन प्राप्त करते ही उस ख्याति प्रविष्ट में आचारांग आदि बारह अंग थे, जिनमें से अन्तिम प्राप्त विद्वत् शिरोमणि विप्रश्रेष्ठ महापण्डित इन्द्रमति दष्टिप्रवादांग के पांच विभाग थे। इन विभागों में सर्वाधिक गोतम का सम्पूर्ण ज्ञानमद विगलित हो गया, वह विनम्र महत्वपूर्ण पूर्वगत-ज्ञान जो चौदह पूर्वो में विभक्त था, और एवं विनयाभूत हो गया, उसकी समस्त शंकाएँ स्वत:निमल जिसमें जनोपदिष्ट्र तत्वज्ञान, सिद्धान्त एवं दर्शन का पूर्व Page #77 -------------------------------------------------------------------------- ________________ गणीन्द्र गौतम का २५०० वा निर्वाण वर्ष परंपरा से चला आया ज्ञान समाविष्ट था। एक विभाग में भगवान महावीर के साधिक एक दर्जन चरित्र है, उनके पौराणिक अनुश्रुतियों एवं इतिहास के आधारभूत प्रथमानु- समसामयिक एवं उत्तरवर्ती श्रेणिक, जीवंधर सुवर्शन सेठ, योग या धर्मकथानुयोग का सूत्र रूप से व्याख्यान था । इस अभयकुमार, धन्यकुमार, शालिभद्र, जम्बू स्वामी आदि के अंगप्रविष्ट के अतिरिक्त अगव ह्य श्रुत में १४ प्रकीर्ण या चरित्र रचे गये, भद्रबाह, स्यूलिभद्र, कालक, कुन्दकुन्द पयन्ना सकलित थे। सामान्यतया इस सम्पूर्ण ज्ञान को आदि कई आचार्यों के भी चरित्र लिखे गये, परन्तु द्वादशांग-श्रुत अथवा 'ग्यारह अग-चौदह-पूर्व' कहा जाता गणधरदेव गौतम स्वामि का एक भी नहीं। गोतम-पृच्छा, है। जैन-धर्म-सस्कृति के मूलाधार इस द्वादशांग श्रुत के गौतम स्वामि समाय जैसी दो एक परवर्ती प्रकीर्णक मूलस्रोत एवं अर्थकर्ता तो भगवान तीर्थंकर देव है, किन्तु रचनाएँ हैं, किन्तु वे चरित्र कोटि में नहीं आतीं। उसके ग्रन्थकर्ता, उपसंहारकर्ता, व्याख्याता एवं प्रकाशन दिगम्बर परम्परा के गुणभद्रीय उत्तरपुराण, पुष्पकर्ता श्री गणधर देव हैं। दन्तीय महापुराण तथा अन्य महापुराणों के अन्तर्गत तदनन्तर, कई शतब्दियों तक यह श्रुतागम रूपी ज्ञान- महावीर चरित मे, और असग, विवुध, श्रीधर रइघु, गंगा गुरु-शिष्य परम्परा से मौखिक द्वार से ही प्रवाहित सकलकीति आदि के महावीर-चरित्रो में प्रकाण्ड वैदिक होती रही। कालदोष से उसमे शनैः-शनैः ह्रास एव आचार्यो, गोतय गोत्रीय ब्राह्मण इन्द्रभूति गौतम के भगवान व्युच्छत्ति भी होने लगो। अन्तत: ईस्वी सन् के प्रारम के महावीर के समक्ष आने, उनका शिष्यत्व स्वीकार करने लगभग, श्रुतरक्षा की भावना से प्रेरित होकर कई श्रुत और उनके प्रधान गणधर के पद पर प्रतिष्ठित होकर धराचार्यों ने अग-पूर्वो के तदावशिष्ट ज्ञान के अधिक उनकी दिव्य ध्वनि की द्वादशांगो में गूथने का संक्षिप्त महत्वपूर्ण एवं उपयोगी अशो को पुस्तकारूढ़ कर दिया उल्लेख मात्र है। और कई अन्यों ने मूलश्रुतागम के आधार से तदनुसारी विविध-विषयक स्वतन्त्र ग्रन्थ भी रचने प्रारभ कर दिये। दिगम्बर परम्रा के सर्वोपरि सिद्धान्तग्रन्थों, धवल एवं पाचवी शती ई० के उत्तरार्ध मे श्वेताम्बर परम्परा-सम्मत जयधवल मे भगवान महावीर के अर्थकर्तृत्व एवं तीर्थोत्पादन तदावशिष्ट आगम या आगमाश भी पुस्तकारूढ़ कर दिये की द्रव्य-क्षेत्र-काल-भावरूप से प्राचीन गाथाओ के आधार गये। उभय आम्नायो के इनआगमो एव आगमिक ग्रन्थो से प्ररूपणा करते हुए जो विशद एव महत्वपूर्ण वर्णन किया पर विविध एव विपुल टीका साहित्य भी रचा जाने लगा। गया है वह इस परिप्रेक्ष्य मे ध्यातव्य है । गौतम को इस प्रकार जिन-भारती का एक भव्य प्रासाद उत्तरोत्तर भगवान के सम्मुख लाने वाले प्रेरक निमित्त के रूप में उन्नत एव विशाल हाता चला गया जो किसी भी अन्य सौधर्मेन्द्र का भी बहुधा उल्लेख है। दिगम्बर परम्परा के परपर। के घामिक साहित्य से गुणवत्ता, वैविध्य एवं पूराणो, पौराणिक चरित्रो एव कथाग्रन्थो आदि के प्रारभ विपुलता की दृष्टियो से इक्कीस ही है, उन्नीस नही। मे प्राय: यह कथन रहता है कि राजगृह के विपुलाचल तो जैन सास्कृतिक परम्परा की इस महतो उपलब्धि पर रचित समवसरण मे मगध नरेश श्रेणिक गीतम स्वामी का प्रधान श्रेय शायद भगवान महावीर से भी अधिक से उक्त कथानक विशेष को जानने की जिज्ञासा करता है, उनके अपशिष्य, प्रधान गणधर एव सुयोग्य उत्तराधिकारी और तब गौतम स्वामि उस पुराण, चरित्र या कचा का इन्द्रभूति गौतम को है। किन्तु विचित्र बात है कि सम्पूर्ण व्याख्यान करते हैं। वायुभूति और अग्निभूति, दोनों जैन साहित्य मे उनका एक भी व्यवस्थित पुरातन जीवन- इन्द्रभूति गौतम के अनुज-सहोदर थे भारी विद्वान थे और चरित्र उपलब्ध नही है, न तो दिगम्बर परम्परा में और उन्ही के साथ दीक्षा लेकर द्वितीयादि गणधर बने यह न हो श्वेताम्बर परम्परा मे। भगवान महावीर के पूर्ववर्ती उल्लेख भी है। यह भी प्रायः सर्वत्र प्रतिपादित है कि जिस तीर्थकरों अनेक शलाका पुरुषो तथा अन्य कई प्रसिद्ध पुरुषो दिन भगवान महावीर ने निर्वाण लाभ किया उसी दिन, एवं महिलाओं के भी पौराणिक चरित्र लिखे गये। स्वयं प्रायः उसी समय, गौतम स्वामि ने केवल ज्ञान प्राप्त Page #78 -------------------------------------------------------------------------- ________________ वर्ष ३६ कि. किया। महाकवि असंग के अनुसार गौतमादि का जन्म एवं तथापि दिगम्बर परम्परा के वृत्तान्तों से वे सब मिलकर निवास स्थान गौतम नामक ग्राम था, रईधु उन्हें पोलासपुर पर्याप्त अधिक एवं विस्तृत हैं। उनके अनुसार गौतम आदि ग्राम का निवासी रहा बताते हैं, और श्वेताम्बर साहित्य अपापापुरी (पावापुर) में आयोजित सोमिल नामक गृहस्थ में उन्हें गोबर या गोबर ग्राम का निवासी बताया है। के यज्ञ में भाग लेने आये थे-वे वही से भगवान के समयवहाँ यह भी बताया है कि उनके पिता का नाम वमुभूति सरण में आये थे, अपने ग्राम में नही। सभी गणधर मौर माता का पृथ्वी था। इस विषय मे भी दोनों परम्पराएं विभिन्न गोत्रीय ब्राह्मण विद्वान थे। इन ग्रन्थों में भगवान एकमत हैं किगौतम स्वामि का निर्वाण महावीर-निर्वाण से महावीर और गौतम स्वामि के संबंधों को लेकर अनेक १२ वर्ष बाद हुआ किन्तु निर्वाण स्थल के विषय में कुछ रोचक एवं बोधप्रद प्रसग भी प्राप्त होते हैं। उत्तराध्ययन मतभेद है-एकमत गुणशील-चैत्य बताया है जिसका समी- सूत्र में तो ती० पार्श्व की परम्परा के आचार्य केशिकुमार करण पावापुरी के निकटस्थ वर्तमान गुणावा से किया और ती० महावीर के गणधर गौतम के मध्य हुआ रोचक जाता है, कुछ अन्य विपुलाचल को तथा कुछ सम्मेदशिखर संवाद भी। गौतम भ० महावीर से ८ वर्ष जेठे थे, अर्थात् को उनका निर्वाण स्थल बताते हैं । यतिवृषभ, गुणभद्र, उनका जन्म ईसा पूर्व ६०७ मे हुआ था, दीक्षा एवं गणधर पुष्पदन्त आदि ने भगवान महावीर के बारह गणधरों के पद प्राप्ति ई०पू० ५५७ मे, केवल ज्ञान ई० पू० ५२७ मे नाम भी दिये हैं, किन्तु यह स्पष्ट नहीं किया कि क्या वे और निर्वाण ई० पू० ५१५ में । इस प्रकार १९८५ ई० में सब ब्राह्मण थे, अथवा उनमें कोई क्षत्रिय आदि भी था। गणधरदेव गौतम स्वामि के निर्वाण को २५०० वर्ष हो उनके माता-पिता, निवास स्थान आदि का भी उल्लेख हो चके । श्वेताम्बर समाज मे तो इस महोत्सव को मनाने नहीं है। उत्तरपुराण में गौतमस्वामि को आदित्य नामक का अभियान भी चला, कई पत्र-पत्रिकाओ में विशेषांक भी देवविमान से चयकर इस भव में आया भी बताया है। निकाले, किन्तु विशेष कुछ हुआ नही । दिगम्बर समाज इस यह भी प्रायः सभी ने प्रतिपादित किया है कि गौतम समस्त । विषय मे उदासीन ही प्रतीत होते हैं। जिन शासन के वेद-वेदांगों (चार वेद, छ: बेदांग, तथा चार उपांगों) में परम उपकारक परम गुरु गणधर देव गौतम स्वामि का निष्णात था. और गणधर पद पर प्रतिष्ठित होते ही वह गुण स्मरण और उनके, सुचरित्र का प्रकाशन प्रचार तो मति-श्रुत-अवधि-मन:पर्यय नामक चार ज्ञानों और सप्त- होना ही चाहिए। ऋद्धियों का स्वामी बन गया था। श्वेताम्बर परम्परा के भगवतीसूत्र, उपासकदशांग. उत्तराध्ययन, आवश्यक नियुक्ति ज्योति निकुञ्ज, आदि आगमों में गौतम विषयक फुटकर ज्ञातव्य मिलते हैं, चारबाग, लखनऊ-२२६०१६ (पृ० १२ का शेषांश) विवाह का प्रस्ताव भेजती है जिसे रुक्मी अस्वीकृत पूछता है तो वह कुछ नहीं बताती। अतः क्रुद्ध पिता कर देता है तब प्रद्युम्न और शाम्ब चाण्डाल का रूप उसे चाण्डालों (प्रद्युम्न शाम्ब) को दे देता है। बाद बनाकर "भोजकट" नगर पहुंचते हैं। अपने मधुर में अनुचरों से वस्तुस्थिति ज्ञात होने पर रुक्मी उत्सव संगीत से रुक्मी का मन मोह लेते हैं और सगीत के पूर्वक दोनों का विवाह करवाता है। साधारुकृत के प्रभाव से ही उन्मत्त गज को वशीभूत करते हैं। उप- "प्रद्य श्न चरित" में इस वेशधारी प्रद्युम्न शाम्ब, हार के रूप में वे रुक्मी से वैदर्भी की मांग करते हैं "रूपचन्द" (रुक्मिणी का भाई को पकड़ द्वारिका ले पर भोजकट नरेश उन्हें तिरस्कृत करता है। रात्रि जाते हैं। वहां कृष्ण एव रुक्मिणी से स्वागत आतिथ्य मे प्रद्युम्न विद्याबल से वैदर्भी के कक्ष में प्रविष्ट पाकर रूपचन्द सहर्ष वैदर्भी का विवाह प्रद्युम्न से होकर उससे गन्धर्व विवाह कर लेता है। प्रात:काल कर देता है (५४) सहाण चिमा देखकर मी वर्षी से पसके विषय में Page #79 -------------------------------------------------------------------------- ________________ कामदेव प्रथम्न जैन परम्परा में मान्य चौबीस कामदेवों में से इक्कीसवें कामदेव प्रद्युम्न कुमार थे। ये तीर्थंकर नेमिनाथ के समय में हुए तथा ये नेमिप्रभु के चचेरे भाई नारायण श्रीकृष्ण के गर्भ से उत्पन्न ज्येष्ठ पुत्र थे। प्रयुम्न अपने अतिशय सौन्दर्य, भद्भुत बल पराक्रम और कौतुक पूर्ण लीलाओं के कारण अत्यधिक प्रसिद्ध हुए। उनके आकर्षक जीवन-चरित को विभिन्न पुराणो एव चरित-काव्यो मे विस्तार पूर्वक वर्णित किया गया है। इस निबन्ध मे प्रद्युम्न कुमार की कथा को आचार्य जिनसेन कृत हरिवश पुराण के आधार पर प्रस्तुत किया है क्योंकि वह प्राचीन ग्रंथो मे से एक होने के साथ-साथ अधिकांश "प्रद्युम्नचरित" काव्यों का उपजीव्य रहा है। अन्य ग्रन्थो की कथा का अन्तर एवं वैषम्य "फुटनोट" मे स्पष्ट किया गया है । आकाशचारी नारद मुनि के "द्वारिका" आगमन के साथ ही "प्रद्युम्नकथा का बीजारोपण हो जाता है।' नारद, यादवराज श्रीकृष्ण की सभा मे सम्मान प्राप्त करने के अनन्तर सत्यभामा (कृष्ण पत्नी) के अन्त पुर में पहुंचते है। सत्यभामा अपने शृगार मे व्यस्त रहते हुए नारद जी की अवमानना करती है । उसी क्षण नारद भी सत्यभामा का मान भंग करने की ठान, उसके रूप को अतिक्रांत करने वाली सुन्दर कन्या की खोज करते-करते कुण्डिनपुर पहुंचते हैं वहा राजा भीष्म की अपरूप सुन्दरी कन्या रुक्मिणी को देख स्तम्भित रह जाते है । रुक्मिणी जैसे ही नारद को अभिवादन करके उठती है, वे उसे आशीर्वाद देते है "द्वारकाधीश कृष्ण तुम्हारे स्वामी हों इस प्रकार रुक्मिणी के हृदय में कृष्ण के प्रति अनुरक्ति उत्पन्न करके नारद उसका चित्र एक पट पर अंकित करके' पुनः कृष्ण की सभा मे उपस्थित होते है। चित्रपट में रुक्मिणी का सौन्दर्य देखकर कृष्ण के मन में डा० इन्दुराय, लखनऊ उससे परिणय की तीव्र लालसा उत्पन्न हो जाती है। उधर कुण्डिनपुर के राजा भीष्म की बहन' रुक्मिणी को बताती है कि एक बार अतिमुक्तक मुनि वहाँ आए थे और उन्होने कहा था कि "रुक्मिणी नारायण श्री कृष्ण के वक्षस्थल का आलिंगन करेगी" परन्तु तुम्हारा भाई म तो तुम्हारा विवाह शिशुपाल से निश्चित कर चुका है, तब रुक्मिणी के आग्रह पर उसकी बुभा अपना दूत श्रीकृष्ण के पास इस सन्देश के साथ भेजती है कि "माघ शुक्ला अष्टमी को रुक्मिणी नाग पूजा हेतु नगर के बाहर उद्यान मे जाएगी आप उसका हरण कर लें। योजना के अनुसार ही कृष्ण और बलराम रुक्मिणी का हरण कर लेते है और शब द्वारा उसकी उसकी उदघोषणा भी कर देते है, जिसे सुनते ही रुक्म एवं शिशुपाल विशाल सेना के साथ युद्ध करने प्राते है । रुक्मिणी के आग्रह पर कृष्ण रुक्म को क्षमा कर देते है परन्तु शिशुपाल का शिरोच्छेदन करने के पश्चात् " रेवतक" पर्वत पर रुक्मिणी से विधि विवाह करते है ।' द्वारिका लौट कर श्रीकृष्ण रुक्मिणी का महल सत्यभामा के भवन के निकट ही बनवाते है । कृष्ण के व्यवहार से सौत के सौभाग्य को लक्ष्य कर सत्यभामा रुक्मिणी से मिलने की उत्सुकता व्यक्त करती है । तब श्रीकृष्ण सत्यभामा को उस उद्यान मे भेजते है जहां रुक्मिणी मणिमय आभूषणो से सज्जित आलता को पकड़े खड़ी थी । सत्यभामा उसे देवांगना समझ कर उसके चरणों में पुष्प समर्पित कर अपने सौभाग्य की याचना करती है। उसी समय श्रीकृष्ण उपस्थित होकर दोनों का परस्पर परिचय करवाते है और वह दोनों मित्रतापूर्वक रहने लगती है। एक दिवस कुरुराज दुर्योधन अपने दूत द्वारा नारायण कृष्ण के पास प्रस्ताव भेजता है कि सत्यभामा और Page #80 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ६,बर्ष ३६,कि०३ अनेकान्त रुक्मिणी में से जिस किसी के पुत्र होगा, वह अपनी कन्या दुर्व्यवहार करेंगे तो मुझसे देखा नहीं जाएगा।" इस बालका विवाह उसी से करेगा । कृष्ण यह प्रस्ताव सहर्ष संवर कान का सृवर्ण पत्र लेकर बालक का युवराज पद स्वीकार कर लेते हैं । यह समाचार जानकर सत्यभामा हेतु पट्ट बन्ध कर देता है। मेघकूट नगर पहुचकर वह रुक्मिणी के पास अपनी दासी भेजकर शर्त' रखती है कि निपण विद्याधर यह घोषणा करता है कि गूढ़ गर्भ को "उस विवाह के समय जिनके पुत्र न होगा उसी की कटी धारण करने वाली महादेवी कनकमाला ने इस पुत्र को कटी हुई केशलता को रो के नीचे रखकर ही वर-वधु जन्म दिया है। तब नगर में जन्मोत्सव मनाए जाते हैं। स्नान करेगे।" रुक्मिणी और सत्यभामा लगभग एक और स्वर्ण की कान्ति वाले इस बालक का नाम प्रद्युम्न समय में गर्भवती होती है तथा दोनों एक ही दिन पुत्रो रखा जाता है।" मेघकूट नगर में प्रद्युम्न दिन पर दिन का प्रसव करती है । यह शुभ समाचार कृष्ण को सुनाने बद्धि. वल व सौन्दर्य मे बढने तगता है। हेतु दोनो रानिया अपने-अपने सन्देशवाहक भेजती है। उधर द्वारकापुरी मे जब रुक्मिणी मायनिद्रा से उस समय कृष्ण शयन कर रहे थे। रुक्मिणी के दूत जागती है तो समीप पुत्र को न पाकर विलाप करती है। श्रीकृष्ण के चरणो के समीप तथा सत्यमामा के अनुसार कृष्ण भी चिंतित हो जाते है तभी वहा नारद आते हैं और उनके सिर के समीप खड़े हो जाते है।" बालक के विषय में जानकरी प्राप्त करने का आश्वासन जब कृष्ण निद्रा से उठते हैं तो उनकी दृष्टि पहने देकर पूर्व विदेह क्षेत्र की पुण्डरीकणी नगरी पहुंचते है। रुक्मिणी के सेवको पर पड़ती है और उनके शुभ समाचार तीर्थकर सोमन्धर के समवशरण मे पहुच कर नारद उनसे प्राप्त कर वे आभूषण आदि से उन्हें पुरस्कृत करते हे रुक्मिणी पत्र के विषय मे जिज्ञासा करत है तो सीनन्धर तदुपरात सत्यभामा के पुत्र की सूचना सुन, उसके वाहकों स्वामी बताते है कि उस बालक का नाम प्रद्युम्न है। को भी पुरस्कार देकर विदा करते है। सोलहवा वर्ष आन पर वह सालह लाभ प्राप्त करक तथा धूमकेतु नामक असुर उस समय आकाश मार्ग से प्रज्ञप्ति नामक महाविद्या से समलकृत होकर पुनः अपने बिहार कर रहा था। रुक्मिणी के महल के ऊपर उसका माता पिता से मिलेगा ।" तत्सवात वे प्रद्युम्न और विमान स्वतः रुक जाता है। विर्भगावधि जान से रुक्मिणी शाम्ब (कृष्ण-जाम्बता पुत्र) क पूर्व भवो की कया सविके पुत्रजन्म की बात जानकर तथा पूर्व जन्म के बैर का स्तार सुनाते है।' समस्त वृतान्त जानकर नारद स्मरण आते ही वह सबको मायामयी निद्रा में मग्न करके पहल कालसवर के प्रासाद के महन मे जाते है । वहा शिशु का अपहरण कर लेता है। पहले तो उसके हृदय मे प्रद्युम्न को आशीर्वाद देकर द्वारिका लौटते है और सभी शिशु को मार डालने का विचार आता है फिर यह सोच- समाचार रुक्मिणी को बताते है।" कर कि “यह तो मास पिंड है इसे मारने से क्या लाभ" विजयार्ध पर्वत पर प्रद्युम्न का विकास होने लगा। वह शिशु को खदिर अटवी मे तक्षशिला के नीचे छोड़कर । बाल्यावस्था म ही वह विद्याधरो की विद्या मे पारगत हो चला जाता है।" गया। अपन रूप लावण्य, सोभाग्य और पौरुष द्वारा वह सयोगवश मेघकूट नगर का राजा (विद्याधर) काल- शत्रु, मित्र, पुरुष-स्त्री, सभी का मन हर लेता । युवा होने सवर अपनी रानी कनकमाला' के साथ विमान में विहार पर कामदेव प्रद्युम्न समस्त अस्त्र-शस्त्रों की विद्या मे पूर्ण करते हुए उस ओर आता है । तक्षशिला के ऊपर उसका कुशल हो जाता है, तथा काम, मनोभव, कामदेव, मन्मथ, विमान स्वतः रुक जाता है तब वह नीचे उतरकर बालक मदन, अनंग इत्यादि नामो से युक्त होता है। कालसंवर को शिला के नीचे से निकालकर कनकमाला को यह कहते के पाच सौ पुत्र उसके विरोधी सिंह रथ" को परास्त नहीं हुए सौप देता है कि "तुम्हारे कोई पुत्र नहीं है अतः यह कर पाते, उस सिंहरथ को प्रद्युम्न पराजित कर युवराज तुम्हारा पुत्र हुआ।" रानी कनकमाला कहती है "आपके पद प्राप्त करता है। अतः ईष्यावश वे पांच सौ कुमार कुल में उत्पन्न पांच सौ पुत्र हैं भोर यदि इसके साथ प्रद्युम्न के विनाश का उपाय करने, उसे सिवायतन योपुर, Page #81 -------------------------------------------------------------------------- ________________ कामदेव प्रघुम्न के अग्रभाग पर चढ़ने को तत्पर करते हैं। प्रद्युम्न गोपुर उसे प्रशप्ति विद्या प्राप्त होने वाली है। पुन: भवन में पर चढ़कर वहां से मुकुट और निधि प्राप्त करके लौट लौटकर प्रद्यम्न रानी से प्रज्ञप्ति विद्या के विषय में आता है। जिज्ञासा करता है। उत्तर में कनकमाला कहती है कि इसी प्रकार पांच सौ कुमारों द्वारा प्रेषित प्रद्य म्न- "यदि तुम मुझे चाहते हो तो गौरी एवं प्रज्ञप्ति नामक कुमार महाकाल नामक गुफा के निवासी देव को वशीभूत विद्याएं तुम्हें देती हैं।" करके तलवार, ढाल, छत्र एवं चंवर लेकर आता है। विद्याएं प्रात कर लेने पर प्रधुम्न कनकलता को नाग गुफा के देव से उत्तम पादपीठ, नागशय्या, वीणा अपनी माता और गुरू बनाबर चला जाता हैं ।" इस तथा भवन निर्माण विद्या प्राप्त होती है । वापिका के देव प्रकार स्वयं को छला गया जानकर कनकमाला अपने अंगों को पराजित करके प्रद्यम्न मकर-चिन्हित वजा प्राप्त को क्षत-विक्षत करके पति से प्रद्युम्न की चरित्रहीनता का करता है। तदनन्तर अग्नि कुण्ड में प्रविष्ट हो अग्नि दोषारोपण करती है। ऋद्ध कालसवर अपने पांच सौ नामक वस्त्र लेकर लौटता है। मेषाकृति पर्वत की गुफा कुमारों को प्रद्युम्न को मार डालने का आदेश देता है। के निवासी देव से कानों के कुण्डल प्राप्त होते हैं। इसके कुमार जब उसको मारने पहुंचते है," तो प्रद्युम्न कृत्रिम पश्चात पाण्डुक नामक वन का देव प्रद्युम्न कुमार को शरीर से वापिका मे कूद जाता है। उसके पीछे-पीछे सभी मुकुट तथा अमतमयी माला देता है। "कापित्थ" वन के सवर पुत्र भी कृद जाते हैं तो वह एक को छोड़कर शेष विद्यामय हस्ती की उपलब्धि होती है। इसी प्रकार सभी को अधोमुख करके कील देता है तथा उस एक को "बाल्मीक" वनदेव से कवच, कड़ा, बाजूबन्द, कण्ठाभरण सम्पचार राजा तक पहुंचाने हेतु भेज देता है। जब अत्य. और "शूकर" वन से शंख एवं धनुष प्राप्त होते है। मनो- धिक क्रोधित कालसवर" स्वय वापिका तक पहुंचता है वेग नामक विद्याधर को छुडा देने पर हार तथा इन्द्रजाल तब तक प्रद्युम्न विद्या के प्रभाव से एक बड़ी सेना तयार उपहार स्वरूप मिलता है, आगे एक भव के अधिपति से कर लेता है। यह स्थिति देखकर कालसवर अपनी रानी पुष्पमय धनुष तथा पंचशर (उन्माद, मोह, सताप, मद कनकमाला से प्रज्ञप्ति विद्या मांगता है तो वह झूठ ही तथा शोक उत्पन्न करने वाले वाण) उपलब्ध होते है कह देती है कि "बाल्यावस्था मे दूध के साथ ही वह विद्या दुसरी नाग गुफा में जाने पर चन्द हार, फूनो का छत्र में प्रद्यम्न को दे चकी हैं।"" । इस उत्तर से दुखित एवं पुष्प शैय्या प्राप्त करता है और अन्त मे जयन्तगिरि राजा पून भीषण युद्ध के लिए तत्पर होता है तभी नारद पर्वत पर विद्याधर की रति नामक कन्या को लेकर पांच वहा उपस्थित होकर समस्त वृत्तात सुनाकर उनमें परस्पर सो कुमारों के पास लौटता है। प्रीति उत्पन्न करते है। प्रद्युम्न सभी कुमारों को मुक्त विभिन्न लाभों५ से युक्तं प्रद्युम्न मेघदूत नगर पहुच कर देता है। तत्पश्चात् विद्याधर से आज्ञा प्राप्त कर वह कर रानी कनकलता को प्रणाम करता है तो कामदेव के नारद के साथ विमान से द्वारका के लिए प्रस्थान अपरूप सौन्दर्य को देखकर रानी के भावों में परिवर्तन हो करता है। जाता है। वह विचार करती है “यदि मुझे प्रद्युम्न का हस्तिनापुर के कुछ आगे उन्हें सैन्य जमाव दिखाई आलिंगन प्राप्त होता है तभी मेरा रूप, लावण्य, सौभाग्य देता है । प्रद्युम्न के जिज्ञासा करने पर नारद बताते है कि सफल है अयथा सब व्यर्थ है।" प्रद्युम्न का प्रणय प्राप्त कुरुराज दुर्योधन की पुत्री उदधि, सत्यभामा के पुत्र करने की चिन्ता मे कनकमाला अस्वस्थ हो जाती है, तब भानुकुगार से विवाह करने हेतु द्वारिका जा रही है। कुशल क्षेम पूछने प्रद्युम्न उपके समीप जाता है । रानी प्रद्युम्नकुमार भील का वेश धारण करके दुर्योधन के की अनुचित चेष्टाओ से चकित प्रद्युम्न, सागरचन्द मुनि- सैनिकों से शुल्क के रूप मे सारभूत वातु की मांग करता राज से इसका कारण पूछता है तो वे उसे पूर्व भव का है। सैनिको के यह कहने पर "सर्वाधिक सार वस्तु तो वृत्तान्त बताते हैं तथा यह भी कहते है कि कनकमाला से स्वय उदधि लु मारी है तथा उन्हे केवल विष्णु से उत्पन्न Page #82 -------------------------------------------------------------------------- ________________ वर्ष ३६, कि०३ पुत्र को ही दिया जा सकता है" । सैनिक प्रद्युम्न पर राम स्वयं वहां आते हैं परन्तु द्वार पर लेटे विप्ररूप धारी प्रहार करने को उद्यत होते हैं सब प्रद्युम्न विद्यावल से प्रद्युम्न को टस से मस नहीं कर पाते और आश्चर्य मे पड़ भील सेना तैयार करके सभी को परास्त कर उदधि का जाते हैं । हरण कर लेता है।" तथा विमान में आरूढ होने के इसी अवसर पर रुक्मिणी मे मातृत्व भाव जाग्रत पश्चात् अपने वास्तविक रूप में आ जाता है । नारद के होता है और प्रद्युम्न भी वास्तविक रूप में प्रकट होकर साथ द्वारका पहंचने पर प्रद्यम्न नगरोधाम में भानुकूमार माता को प्रणाम करता है। रुक्मिणी के यह करने पर कि को घोर्ड को व्यायाम करवाते देखता है तो एक मायामयो "कनकमाला धन्य है जिसने तेरी बालक्रीड़ाओं का दुर्लभ घोडा निर्मित करके स्वयं वृद्ध का वेश धारणकर, भानु- सुख प्राप्त किया।" प्रद्युम्न पुन: बालक बनकर बालकुमार के पास पहुंचता है। भानु जब उस अश्व पर सुलभ कोडाओं द्वारा मां को सुख प्रदान करतात . आरूढ होने का प्रयास करता है तो अश्व उसे विभिन्न परान्त वह रुक्मिणी को विपान में बैठाकर यादव सभा में प्रकार से प्रताडित करता है । प्रद्युम्न के हंसने पर भानु ऊपर पहुंच यदुराज कृष्ण को ललकारता है कि मैं उसे ही आरूढ होने को कहता है। वृद्ध वेषधारी प्रद्युम्न रुक्मिणी का हरण करके ले जा रहा है यदि किसी में आरूढ होने के लिए भानु का सहयोग मांगता है और शक्ति हो तो उसे छुडा ले" तब आकाशस्थित प्रद्युम्न से विद्याबल से अपने शरीर को इतना भारी कर लेता है कि नारायण कृष्ण का युद्ध होता है। उसे उठाना दुर्भर हो जाता है । अन्ततः वह स्वयं अश्वा- कृष्ण को सफलता नहीं मिलती तो वे निर्णायक बाह रूढ होतीव्रगति से सत्यभामा के उपवन पहुंच कर वाक- युद्ध को तत्पर होते हैं तभी नारद स्थल पर पहुंचकर पिता चातरी से माली को मर्ख बनाकर सारा उपवन उजाड पुत्र का परिचय करवाते हैं। दीर्घ अवधि के बाद पुत्र को देता है। तत्पश्चात् सत्यभामा के भवन में विप्र बनकर पाकर श्रीकृष्ण अत्यन्त हर्षित होते हैं। तदनन्तर प्रद्युम्न जाता है।" और वहां ब्राह्मणों के लिए जितना भी का उदधि," वैदी आदि सुन्दर कन्याओं से विवाह भोजन बनाया गया था अकेले ही खा जाता है और होता है । बहत काल तक सुखपूर्ण भोग-विलास का जीवन तत्काल ही वमन भी कर देता है. फिर क्षल्लक वेश व्यतीत करने के बाद तीर्थंकर नेमिनाथ से द्वारिका की धारण कर रुक्मिणी से प्राप्त 'मोदक' खाकर ही सन्तुष्ट विनाश की गाथा सुनकर प्रद्युम्न में वैराग्य भाव जागत होता है। उसी समय सत्यभामा का नाई पूर्व निश्चित हो जाता है । घोर तपस्या द्वारा समस्त घाति अघाति "शर्त" के अनुसार रुक्मिणी के केश लेने आता है, तो कर्मों का क्षय करके वह मोक्ष पद प्राप्त करता है। प्रद्युम्न उसे तिरष्कृत कर वापस भेज देता है। तब बल संदर्भ-सूची १. हरिवंशपुराण-सर्ग ४२, श्लोक । त्रिषष्टिशलाका. वर्णन तथा यदुराज वंश परिचय वर्णित है। पुरुषचरित श्लोक ७ उत्तरपुराण में नारद प्रसंग में ब्रह्मरायल्ल ने भी "प्रद्युम्नरास" ग्रंथ में प्रारम्भिक नहीं है। बलराम की जिज्ञासा पर गणधर वरदत्त आठ छन्दों में स्तुति बन्दना एवं कृष्ण परिचय देकर द्वारा शाम्ब प्रद्युम्न के पूर्वभव वृतांत वर्णन से कथा नारद आगमन का उल्लेख किया है। कवि साधारु ने का आरम्भ हुआ है। "प्रद्युम्न चरित" २५वीं चौपाई में नारद के द्वारिका "प्रद्युम्न शम्भषोत्परत्तिसंबन्धः पृच्छयते स्म सः। वरदत्त गणेन्द्रो नु एन्द्रबुद्धयेत्यमब्रवीत पर्व ७२/२ आगमन की कही है इससे पूर्व वन्दना एवं द्वारिका महासेनाचार्य कृत "प्रद्युम्न चरित" १४ सर्गों का वैभव वर्णन है। ब्रह्म नेमिदत्त के "नेमिनाथ पुराण" स्वतंत्र महाकाव्य है अतः उसमें प्रमुख कथा द्वितीय में उत्तर पुराण की भांति पूर्वभव वर्णन से प्रद्युम्न सर्ग से आरम्भ हुयी है प्रथम सर्ग में स्तुति, द्वारिका कथा प्रारम्भ हुयी है (१५वां सर्ग) Page #83 -------------------------------------------------------------------------- ________________ कामदेव प्रघुम्न २. (क) तवस्या रूप सौभाग्यगवं पवंत चूरणम् । (क) त्रिषस्टि में भी यही उल्लेख है परन्तु प्रद्युम्न प्रतिपक्ष बद्ध बज्रसमातेन करोम्यहम् ।। चिरत (साधाकृत) में हरण की समस्त योजना हरि० पु. ४२/३० (ख) त्रिषष्टि ८/६/E नारद स्वयं बनाते हैं और रुक्मिणी कृष्ण । पहचान सकें इसके लिए सात ताल बींधने की (ग) इक स्याली अरु वीछी खाई, योजना रखते हैं।६४१ इक नारद अरुचलीउ रिमाई ।३४ इड रूप जु आगली, सो परणाउणारि३६ ८. त्रिषस्टिशलाकापुरुष परित के अनुसार बलराम प्रद्युम्नचरित-साधारु कवि रुक्मिन को केशविहीन करके छोड़ देते हैं इस लज्जा(च) हो नारदादि हियह बात विचारी, वश वह कुण्डिन नगर न लौटकर "भोजकट" प्रदेश हो नारायण आणी नारी । में नगरी बसाकर रहने लगता है। इहि थे रूपि जो आगली जी, ६. द्वन्द युद्धे शिरस्ङ शिशुपालस्य पातितन ।.." हो कि तण दुखि धणे विसूरै । रुक्णिी परणीयासी गिरी खेतक हरिः । राति दिवसि कुढि वो कर जी. हरि० पु० ४२/६४, ६६ हो बहुडि पराया मरमन चगे।। (क) सिरछेद्यो सिसाल को जी हो रूपकुमार साधिकर लीय प्रद्युम्न रास-ब्रह्मरायमल्ल । खेत पर्वति ते गयाजी, हो ब्याह रुक्मिण कसो कीयो। ३. द्वारिकापतिपत्या, सोऽभ्यनन्दमदानताम् । प्र. रास ५२ (क) नारुद हिन्दी आसिका जी, (ख) उत्तरपराण में तीर्थकर नेमिनाथ के समवशरण में हो होजे किस्न तपी पटराणी ।३।। रुक्मिणी की जिज्ञासा पर वरदत्त गणधर बताते हैंप्रद्युम्न राम-ब्रह्मरायमल्ल "तुम्हारे पिता वासव (कुण्डल नरेश) तुम्हारा विवाह (ख) देखि रुक्मिणी बोलइ मोड, भेषज पुत्र शिशुपाल से कराने को तत्पर हो गये तब पाटधरपि नारायपि होई । ४३। युद्ध को चाह रखने वाले नारद ने यह वृत्तांत श्रीकृष्ण प्रद्युम्नचरित-कवि साधारु को सुनाया । अतएव नारायण ने छः प्रकार की सेना (ग) त्रिषष्टि ८/६/१० के साथ जाकर शिशुगल का वध किया और तुम्हें ४. "विलिख्य पट्टके स्पष्ट क्पिण्या रूपमभ्द्तम । महादेवी के पद पर नियुक्त किया। हरये दर्शयादगत्वा त्रिसंमोहकारपम । उत्तर पुराण ६१/३५५-३५६ हरि० पु० ४२/४५ (ग) त्रिशस्टि० में शिशुपाल के पलायन का वर्णन है वध ५. त्रिषष्टिशलाकापुरुष चरित में नारद से रुक्मिणीसौन्दर्य की चर्चा सुनकर श्रीकृष्ण विवाह प्रस्ताव का नहीं। रुक्मिन रुक्मिणी का भाई के पास भेजते हैं जिसे वह १०. निरूप्याक्मि गी सत्यादेवताभव रूपिणीम । यह कहकर अस्वीकृत कर देता है कि "कृष्ण गोप है देवतेयामितिध्यात्वा विक्रीर्य कुसुमांजलिम ।। व नीचे कुल में उत्पन्न है"। तदुपरांत ही श्रीकृष्ण निपत्य पादयोस्तस्याः स्व सौभाग्यम यावत । रुक्मिणी हरण की सोचते हैं। विपस्पस्यतुदोर्भाग्यमी व्यशिल्यकलंकिता ।। ६. हरिवंश पुराण में बहन के नाम का उल्लेख नही है हरि० पु. ४३/१३-१४ परन्तु त्रिषष्टि में उसका नाम "धति" और साधारु- (क) त्रिषष्टि के अनुसार श्रीकृष्ण उद्यान में रखी "श्री" कृत, प्रद्युम्न चरित में "सुरसुन्दरी" है।। की मूर्ति को हटाकर उसके स्थान पर रुक्मिणी को ७. शुक्लाष्टभ्यां हिमापत्य वदि माधव । रुक्मिणीम । स्थापित कर देते हैं अतः उसे ही देवी लक्ष्मी जान; स्वमैत्यहरसि छिप्रं तवेयमविसंशयम । हरि०पु०४२/६१ सत्यभामा अपने सौभाग्य की कामना करती है। Page #84 -------------------------------------------------------------------------- ________________ पादान्तेतस्युरम्य ४३/३६ २० प्रद्युम्न वर्ष प्राप्त १०: ३६ कि. मनमान ११. तापत्यविहीनाया विलूनालवल्लरीम । (क) कालसंवर ।..."प्रकृष्टद्युम्नधामत्वात प्रद्युम्न इति स्नास्यतस्तीमंधः कृत्वा पायोस्तु वप्पूवरी ॥ संज्ञितः । ह० पु० ४३।५६, ६१ हरि० पु० ४३/२६ (ख) उत्तरपुराण के अनुसार विद्याधर शिशु का नाम देव(क) विष्टिशलाकापुरुष चरित एवं "प्रद्युम्न चरित" में दत्त रखता है। ७०६० सत्यभामा यह शर्त बलराम की ताक्षी में रखती हैं। (ग) त्रिषष्टि में कृष्ण शिशु का नाम प्रद्युम्नं रख चुके १२. त्रिषष्टि के अनुसार एक दासी श्री कृष्ण को थे पर संवर भी गंयोगवश उसका नाम "प्रद्युम्न" रुक्मिी के पुत्र जन्म की सूचना देती है। नारायण रखता है। कृष्ण रुक्मिणी-भवन में जाते हैं और नवजात शिशु १६. साधारुकृत "प्रद्यम्न चरित" की प्रकाशित प्रति में को गोद में उठाकर, उसकी अभूतपूर्व कान्ति देख १२वें वर्ष में लौटने का उल्लेख है। जबकि अन्य उसका नाम तक्षण 'प्रद्युम्न" रखते हैं। सभी कृतियों में १६वें वर्ष ही वापस आने का वर्णन १३. शिरोन्ते सत्यपविष्णोः पादान्तेतस्युरन्यया । ह० पु० ४३/३६ २० प्रद्युम्न इतिनाम्ना सो पितुभयां माक्ष्यते पुनः । १४. विशष्टि में धूम्रकेतु स्वयं रुक्मिणी का वेश बनाकर संप्राप्त षो शेवर्ष प्राप्त षो शलाभकः । आता है और शिशु का हरण करके उसे बताठ्यगिरि स प्रज्ञप्ति महा विद्याप्रधोतित पराक्रमः । में भूतरमण उद्यान की तक्षशिला के नीचे छोड़ जाता हरी० पु० ४३।१६ १५. (क) हरि० पु० ४३।३६-४८ २१. "प्रद्युम्न" एवं जाम्बवती पत्र "शाम्ब", के पूर्वभवों (ख) उत्तरपुराण ३२२५१-५३ में उनके क्रमश: शृगाल अग्निमति वायुभूति, स्वर्ग (ग) बाधनहाय सिला सोपेखि, विमान के देव, पर्णभद्र-मणिभद्र, सोधर्म, स्वर्ग के देव, इहितल धरउ मरउ दुख देखि । मधु-कैटभं, अच्युत स्वर्ग के देव. इन भवों का हरिप्रद्युम्न चरित-साधारु कृत छन्द ।२५ वंश पुराण, नेमिनाथ पुराण, प्रद्युम्न चरित (महा१६.(क) उत्तरपुराण, प्रद्युम्न चरित (महासेना चार्य) सेना चार्य) त्रिषष्टि शलाकापुरुष चरित सभी में प्रद्युम्न चरित (साधारु) में कालसंवर की पत्नी समान एवं विस्तृत वर्णन है। उत्तर पुराण में भी का नाम कांचन माला है। इन्हीं पूर्वभवों का वर्णन है केवल इसमें कैटभ के (ख) त्रिशष्टि में कालसंवर के लिए विद्याधर की स्थान पर "क्री इव" नाम दिया है। अपेक्षा खेचर (आकाशचारी होने के कारण) २२. उत्तर पुराण के नारद पहले से ही पूर्व विदेह क्षेत्र के सम्बोधन प्रयुक्त है। पत्नी का नाम कनकमाला स्वयंप्रभ तीर्थकर से प्रद्यम्न के विषय में सारी जानही दिया है। कारी प्राप्त करके आते हैं और रुक्मिणी के विलाप (ग) कवि साधारु ने कालसंवर के स्थान पर, कदम. पर बताते हैं कि तीर्थकर प्रभु के अनुहार वह पुत्र वित अधसाश्य की दृष्टि से, "यमसंवर" नामक विभिन्न लाभों से युक्त है। १६ वर्ष बाद माता पिता प्रयोग किया है। से समागम करेगा। उ०पु० ७२।६१-७० १७. इत्युकते सान्त्वयित्वा तां गृहीत्वा कर्णपत्रकम् । २३. हरिवंश पुराण-४७२५ (क) युवराजो येमित्युक्त्वा पट्टमस्य बबन्ध सः। २४. उत्तरपुराण में कालसंवर के विरोधी का नाम अग्निहरि० पु० ४३१५७ राज दिया है।। ७२।७३ (ख) तत्कणेगन सौवणपत्रेणारवि पट्टकः । उ०प० ७२१५६ २५. हरिवशपुराण, उत्तरपुगण, 'प्रद्युम्न-चरित' आदि मे १८. गृहं गर्भा महादेवी प्रसूता तनयं शुभम । उक्त लाभों की प्राप्ति का वर्णन है यद्यपि उनके "इतिवार्तापरेकृत्वा कोविदः । नामों में किंचित भेद है परन्तु त्रिषष्टि में इस प्रसंग Page #85 -------------------------------------------------------------------------- ________________ कामदेव प्रद्युम्न का कोई तल्लेख नहीं है। "प्रद्युम्न रास" में सम्पूर्ण प्रद्युम्न द्वारा उसके प्रणय निवेदन को अस्वीकृत करने प्रसंग को केवल तीन छन्दो में व्यक्त किया गया है। पर वह उस पर दोषारोपण कर अपने पांच सौ पुत्रों २६.(क) उत्तरपुराण २१७७ को प्रद्युम्न के वध का उपदेश देती है। विद्युददंष्ट्र (ख) त्रिषष्टिशलाकापुरुष चरित के अनुसार कनक- आदि पांच सौ कुमार जब प्रद्युम्न के विनाश के उद्दे___ माला की प्रारम्भ से ही प्रद्युम्न मे आसक्ति की श्य से उसे विभिन्न गुफाओं से ले जाते हैं तभी वह और प्रद्युम्न के युवा हो जाने पर वह उससे प्रणय विभिन्न लाभ प्राप्त करता है। जबकि हरिवंशपुराण निवेदन करती है। मे वह युवराज बनने के बाद ही कुमारों की ईष्या के २७. रूपलावण्य सौभाग्य वैदग्ध्य गुणगोरवरण । फलस्वरूप षोडश लाभ प्राप्त कर चुका था। कामश्लेषस्य सौलभ्ये दोलभ्येस्यातुणं तु मे ॥ उ० पु०७२-७७ से १३० तक htra २६. त्रिषष्टि में यह प्रसंग अत्यन्त सक्षिप्त है उसमें २८. (क) प्रसरितकरो विद्य गृहीत्वा प्रमदी स ताम । केवल इतना ही उल्लेख है कि प्रद्युम्न सरलता से प्राण विद्याप्रदानान्मे गुरुस्त्वामिति सद्वचा। सभी संवर पुत्रो का सहार कर देता है। हरि० पु० ४७।६५ ३०. वीर रसप्रिय कवि साधारु ने इस सन्दर्भ में लिखा है (ख) त्रिषष्टि० मे कनकमाला स्वय प्रद्युम्न को अपने कि क्रोधित यम सवर चतुरगिणी सेना सजा कर पिता निध से प्राप्त “गौरी" और पति से प्राप्त प्रद्युम्न से लड़ने पहुचा:"प्रज्ञाप्त" विद्याओ के विषय में बताती है विद्याये जाई पहुतल दल अतिवत, नहा हाकि भी गयगत । हस्तगत कर लन में पहचान यहा भी प्रद्युम्न कनक- रावत सा रावत रण भिरई, पाइल स्यौपाइक अभिइ। माला को माता और गुरू कहकर प्रेम प्रस्ताव अस्वीकार कर देता है। ३१. (क) स्तन्ये सह बाल्ये स्मे मया दतिति सावदत। (ग) प्रद्युम्न रास म कचनमाला द्वारा प्रद्युम्न को तीन हरि.पु.४७१७७ विद्याय देन का उल्लख है : (ख) त्रिशष्टि० मे प्रद्युम्न ही कालसवर को बताता है कि हो गणी यणे राउ रमान; हो विद्या तीनि लेहुधो धाने किस प्रकार उसे विद्यायें कनकमाला से प्राप्त हुयीं "खेचर तब क्षमा मांगता है। (घ) साधारु कृत प्रद्युम्न चरित मे मुनि महाराज प्रद्युम्न (ग) प्रद्युम्न चरित (साधारु) में रानी कहती है कि सेकहते है कि "पूर्वजन्म में अनुराग वश कनकमाला प्रद्युम्न ने विद्यायें उससे छीन ली। इसी सन्दर्भ में तुम्हारे में अनुरूप है उसे छल कर तीनो विद्याये प्राप्त कवि ने स्त्री की चरित्रहीनता पर बारह स्वतंत्र छंद कर लो। तदनुसार हा प्रद्युम्न रानी से यह कहकर रच डाले है। "यदि तुम मुझ तीनो विद्याए दे तो मै तुश्ह प्रसन्न ३२. (क) हरिवश पुराण ४७९४ से ६ तक करने का उपाय कर सकता हू" विद्याए प्राप्त कर (ख) उत्तरपुराण म भीलवेश धारी प्रद्युम्न द्वारा दुर्योधन लेता है। फिर जैसे माता और गुरू बता चला जाता के सैनिक के तिरस्कार का वर्णन है परन्तु शुल्क प्र० च० २४० से ३४८ तक मांगने और उदधि हरण का उल्लेख नहीं है। (च) उमरपुराण में यह प्रसग हरिवशपुराण के अनुरूप हा (ग) त्रिशष्टि० मे उदधिहरण प्रसंग है परन्तु वहाँ प्रधुम्न है परन्तु कथा के क्रम में अन्तर है। उत्तरपुराण क का भील का वेश बनाने और शुल्क मांगने जैसी अनुसार रानी कचनमाला प्रद्युम्न को "प्रज्ञप्ति" बात नहीं है। विद्या उसी समय दे देती है जब वह सवर के विरोधी (घ) साधारु कृत प्रद्युम्न परित में सम्पूर्ण घटना हरिवंश मग्निराज को पराजित करके आता है। बाद में पुराण जैसी है। (छन्द २९६ से ३०९ तक) किर क Page #86 -------------------------------------------------------------------------- ________________ १२, वर्ष ३९, कि० ३ (च) “प्रद्युम्न चरित " ( महासेनाचार्य कृत) " बनचर" का वेश बनाकर उदधि का है । (देखें नवम सर्ग ) ३३. (क) हरिवंश पुराण ४७।१०१-१०७ (ख) उत्तरपुराण, नेमिनाथ, प्रद्युम्नचरित सभी में उक्त प्रसग प्राय: समान ही है । अनेकान्त में प्रश्न हरण करता ३४. त्रिशष्टि० के अनुसार विप्ररूप धारी प्रद्युम्न सत्यभामा की एक व अंगों वाली दासी को पुन: रूपवान कर देता है और वही दासी प्रद्युम्न को रानी के भवन ले जाती है । विप्र मे महात्म्य के विषय में जानकर सत्यभामा निवेदन करती है - "मुझे रुक्मिणी से भी सुन्दर बना दीजिए तब विप्रवेश धारी प्रद्य ुम्न उसे सुझाव देता है ! सौन्दर्य शून्यता ही सौन्दर्य को अतिक्रान्त कर सकती है अतः तुम केश कटवाकर शरीर पर कालिख लगा फटे वस्त्र धारण कर लो" सत्यभामा वैसा ही करती है । ३५. उत्तरपुराण, त्रित्रष्टि०, प्रद्युम्न चरित ( महासेन) में "वमन" करने का उल्लेख नही है । १६. (क) संकर्षणस्य हत्वेच्छा वादाकर्षणकारिणः । अरराम चिरं स्वेच्छ लोक विस्मयकृत्कृतो ॥ हरि० पु० ४७।११२ (ख) उत्तरपुराण मे प्रद्युम्न सिंह का वेश धरकर बलभद्र को निगलकर अहत्य कर देता । ७२१६२ (ग) साधारु कृत "प्रद्युम्न चरित" में भी सिंह बन कर बलराम को अखाड़े मे फेक देने का वर्णन है । ( ४५२) (घ) त्रिषष्टि के अनुसार बलभद्र जब रुक्मिणी के भवन पहुचते है तो प्रद्य ुम्न कृष्ण बनकर, रुक्मिणी को आलिंगन बद्ध कर लेता है। यह दृश्य देखकर हलधर लौट जाते है और सभा मे भी उपस्थित कृष्ण को देख आश्चर्य मे पड़ जाते है । वे श्री कृष्ण से पूछते है कि वे एक ही समय मे दो स्थानों पर कैसे ? तब वास्तविक स्थिति जानने के लिए दोनो पुनः रुक्मिणी कक्ष की ओर जाते है पर तभी प्रद्युम्न शंखनाद द्वारा रुक्मिणी हरण की सूचना देता है। ३७. (क) बालभवमहं मातर्दर्शयामी दृश्यताम | हरि० पु० ४७।१२० (ख) उत्तरपुराण और त्रिषष्टि० में बाल लीलाओं की पुनरावृत्ति का उल्लेख नहीं है पर महासेन ने "प्रद्युम्न चरित" में प्रद्युम्न द्वारा विद्याबल से बाल क्रीड़ाओं द्वारा माता रुक्मिणी को हर्ष प्रदान करने का वर्णन किया है । साधारु के "प्रद्य ुम्न चरित" मे प्रद्युम्न माता के आग्रह पर बाल्यकाल वाया । की घटनाओं को विस्तार पूर्वक सुनाते हैं । ३८. (क) उत्तरपुराण के अनुसार जब श्रीकृष्ण रुक्मिणी को छुडाने के लिए आए तो भील रूपधारी प्रद्युम्न ने 'नरेन्द्र जाल' नामक विद्या से उन्हें जीत लिया । तत्पश्चात् ही नारद ने उपस्थित हो परिचय कर७२/१६२-१६६ (ख) 'प्रद्युम्न रास' तथा 'प्रद्य ुम्न चरित' ( साधारुकृत) में कृष्ण के अतिरिक्त पाँचो पाण्डवो को भी अलग-अलग ललकारने का वर्णन है। प्रद्य ुम्नरास कृष्ण प्रनयुद्धका वर्णन निम्न शब्दो मे है - हो असवारां मारै असवारा, हो रथ सेधी रथजुरे झुझारी । हस्यीस्यो हस्ती भीडे जी, हो घणी कहां तो होई विस्तारी ॥ १७४ परन्तु कवि साधारु ने इस भयंकर युद्ध का वर्णन करने में पूरे ६८ छंद रच डाले है । ( ४७४ रे ४५२ तक ) ३६. (क) हरिवंश पुराण ४७।१३६-१३७ (ख) उत्तर पुराण ७२/१७८-१८० (ग) साधारुकृत प्रद्युम्न चरित में प्रद्युम्न उदधि विवाह के समय बिद्याधर कालसवर एवं उसकी पत्नी के उपस्थित होने का उल्लेख है यहां वर्णन महासेनाचार्य के 'प्रद्युम्न चरित' मे भी है । (घ) त्रिषष्टि के अनुसार प्रद्युम्न उदधिका विवाह ४०. सत्यभामा के पुत्र भानुकुमार से ही करवाता है । हरिवश पुराण, उत्तर पुराण, प्रद्युम्न चरित ( महासेन ) प्रद्युम्न और वैदर्भी विवाह की घटना संक्षेप में व्यक्त है जबकि त्रिषष्टि० में विस्तार पूर्वक वर्णित है । त्रिषष्टि के अनुसार : - वैदर्भी रुक्मी ( रुक्मिणी के भाई) की पुत्री थी । रुक्मिणी प्रद्युम्न के वैदर्भी से (शेष पु० ४ पर) Page #87 -------------------------------------------------------------------------- ________________ गतांक से आगे : पं० शिरोमणिदास कृत 'धर्मसार सतसई' : मध्य काल पूजे जिनराय, पुत्र कलत्र सब पूरं काज । आथ में (अस्तकाल ) जिन पूजा चित देय, कामदेव पद सो नर तेय ।।८१ दोहा - सोम श्री कन्या भली, दीनी जल की धार । राज ऋद्धिपद साधकै देव भयो द्युति धार ॥८२ मदनावली विद्याधरी जिनपद चदन चचि । छिन मे रोग विनाशकं सुभई देवकरि अचि ॥ ८३ अक्षत सो जिन पूजकै सुवा सुई निज हेत । देवलोक पद तिन लहे अष्टो ऋद्धि समत ||८४ दादुर पखुरी ले चल्यो जिन पूजा मनु लाय । मरकै सुरलोकहि गयो, देव भयो सुखदाय ॥६५ चरु सौ जिन पद पूजिकै हालिक सेठ सुजान । राज ऋद्धि सुख पायर्क, पुनि पहुचे निर्वान ||८६ जिन को दीप चढ़ाइक, विनयधर जुकुमार । देवलोक पद पायकै भयो इन्द्रद्युति धार ॥६७ जिन पद धूप चढ़ाइक, रोग सकल तह छीन । धवकुमार पदवी लही, गये देव परवीन ॥८८ फल सौ श्री जिन पूजकै, जिन मत नारी नाम | क्षणमे स्त्री पद नाशकै, देव भयो सुख धाम ॥८६ चौपाई - जो नर अष्टौ विधि बनाय, नियम सहित पूजे जिन राय । ते नर लहै सुख अधिकार, पुनिते होय मुक्ति उर हार ||६० जे पुष्पांजलि व्रत मन लावै, ते नर खेचर पदवी पार्ष ॥ ६१ चढ़ विमान विद्या बहु सिद्धि, भोग अनेक भुगते धन ऋद्धि । जो दश लक्षण धरं प्रवीन, मारें ते शील महा तप लीन । [D] श्री कुन्दनलाल जैन प्रिन्सिपल, दिल्ली ते नर ब्रह्म ऊपजै स्वर्ग, लोकातिक पद पावै वर्ग ॥६२ दोहा -- सहस तिहत्तर जानिके दोकरि अधिक जु एव । चार लाख पुनि ते कही, लोकातिक वर देव ॥३ रत्नत्रय व्रत जे नर करें, भव सागर तें लीजै तरं । अवर अनेक कहै जिनराय, सो महिमको कहै बढ़ाय ॥६४ त्रेपन क्रिया पालहि व्रती, लेश्या शुक्ल धरै बहुमती । आतं रौद्र कुध्यानहि त्यागे, धर्म ध्यान के मारग लागे ॥६५ संज्ज्वलन चौकड़ी जावही उदै (य), तप व्रत सयम पालहि मुदं । धरि संवेग निर्वेद जु लीन, समाधि मरण कर पापहि छीण ॥६६ चार प्रकार आराधना राधे, तब जीव स्वर्ग लोक पद सार्धं । सपुट सिला उपज्जइ एव, जय जय सब करें शुभ देव ॥६७ पुष्प वृष्टि वरषँ असरार, वायु सुगंध चलै हितकार । अनहद बाजे घने, देवी देव बहुत सुख जने ॥६६ बहुत पुण्य तुम पूरब कियो, तातें आनि इन्द्र पद लियो । यह इन्द्रासन तुम्हरौ देव, ये सब देव करें तुम सेव ॥ ६६ रत्न भूमि कोमल सुख हेत, कल्प वृक्ष तह सब सुख देत । निधि चिता मणि दीर्त मूरि बाजे कामधेनु तहं बहु सुख पूरि । १०० Page #88 -------------------------------------------------------------------------- ________________ १४, वर्ष २६, ०६ शची मष्ट सुन्दर शुभ गात, विकसित बदन कहें ते बात । सदा काल नव, योवन रहे, कोमल देह सुगंध अति बहे ॥१०१ कठिन नीक उर कुच कलस.विराज, मुख की ज्योति कोटि शशि लाज। कोटि सत्ताईस देवी मन हरनी, भोग विलास रूप सुख धरनी ॥१०२ शृंगार बहुत आभूषण लिए, हाव भाव विघ्रम रस किए। अति कटि क्षीण, कमल दल नैन, कला गीत बोले शुभ न ॥१०३ जनम सफल पुनि हमरो भयो, जब तुम आनि देव पद लयो। ऐसे वचन सुने सुखदाई, भयो आनन्द महा सुख पाई ॥१०४ एक घड़ी मे अवधि प्रकाश, पूरब पुण्य सकल हित भास । में तप पूरब कोन्हों घोर, व्रत क्रिया पाली अति जोर ॥१.५ में जिनेन्द्र पूजे अति शुद्धि, पात्रहिं दान दियो हित बुद्धि । सो वह पुण्य फलो मोहि आज, सकल मनोरथ पूरे काज ॥१०६ सकल हेतु जानो सुर राय, वह व्रत तप पुण्य यहाँ न बाय । है जिनेन्द्र पूजा इक सार, सो मैं करौं सकल सुख कार ॥१०७ यह विचारि उठि ठाड़े भये, देविन सहित स्नान हित गये । अमृत वापिका रत्ननि जड़ी, महा सुगंध कमल बहु भरी ॥१०५ तहां स्नान करे सुख हेतु, बढयो प्रेम, रस, बहु सुख देत । करी विनोद क्रीड़ा सुख पाय, मानन्द - उमग्यो अत न आय ॥१०॥ उज्ज्वल कोमल वस्त्र सुगंध, पहरें देव महा सुख बंध । कंकम कुण्डलमुक्कट अनूप, भूषण अनेक को कहै स्वरूप ॥११० गीत नृत्य वादित्र निघोष, देविन सहित चल्यो सुर पोष । जिनवर मन्दिर देखे जाय, बहु आनन्द करे. सुर राय ॥१११ अष्टो विधि ले - पूजा करी, शीस नवाय जिन.स्तुति विस्तरी। जनम सफल मेरो. अति भयो, जब - मैं तुम्हरौ दर्थत लमो ॥११२ सकल धर्म फल प्रकटयो बाज़, नन 'नहारि देने. जिमसज । देविन सहित प्रदक्षिणा दई, बहुत भक्ति करि शुभ मति भई॥११३ कर जोड़े, ते बंढे, पाय, पुनि.. इलामन पे बैठे, आय । बीणा-बैन मग डफदाल,. नचे अप्सरा रूप रसाल, ११४ किनन्नर गावे (स्वर) सुरधरि जी, बहुत सौम्य रस उपज उहाँ । विकसित वदन देवी मुंह मुख देखें, रूप राशि छवि भानु विशेष ॥११५ शीत उष्ण, वर्षा, नही. तहाँ, जरा रुजा. भय ,दुख न जहाँ । रात दिवस दीस नही भेद, भल.पुनि-मूत्र विजित स्वेद ॥११६ शुक्र रुधिर तहां- अस्थिन वर्म, मांस · नसा भेवा, नहीं कर्म । धातु उपधातु रहित तनु आग, मम स्फटिक मणि सोहे काय ॥११७ निद्रा आलस. पल महीं भेष, चढह विमान विक्रिया भेष । दीप समुद्र असंख्यनि फिर जिन बाबा करि पातक हरै॥११८ Page #89 -------------------------------------------------------------------------- ________________ 4.सिनिस त 'धर्मसार सतसई' बणिम महिमा गरिमा सार, लघिमा ईसत्व वसत्व गुणधार । काम कामत्व बुद्धि बहु लहीज, ए अष्टो ऋद्धिदेव की कहीं जै ॥१ दोहा -देव सुख को गेनि कहै, सौलह स्वर्ग प्रमाण । नाम आयु विधि सुख कहै. सुनि हो चतुर सुजान ॥१२० चौपाई-सौधर्म प्रथम ईशान जुजानि, तहां पटल इकतीस वखानि । विमान साठ लाख युति धार, ऊंची सकल सुनी विस्तार ॥१२१ दोहा-मरे तरें (नीचे) ते लेखि जे राजु हेढ उचित्त । सौधर्म कही ईशान पुनि यह प्रमाण सुनिमित्त ॥१२२ चौपाई-सागर दीय आयु उत्कृष्ट, हाथ सात उन्नत तनु इष्ट । काया सौ सुख भुगतें धीर, अव सुनु जु (यु) गल दूसरो वीर ॥१२३ सनतकुमार माहेन्द्र जु नाम, बीस लाख तहं कहे विमान । सात पटल पुनि सोहै जहां, राजु डेढ़ उचित है जहां ॥१२४ सागर सात आयु तहं कहीज, कर छह उन्नत देह लहीज। देह स्पर्शन सुख हित काम, युगल तीसरो कहीजे नाम ॥१२५ ब्रह्म ब्रह्मोत्तर जानहु स्वर्ग, विमान चार लाख सुनि वर्ग। राजु आध उचित्त अवकाश, -चार पटल सोहै सुख वासु ॥१२६ सागर दस तहं आयु जु लीन, पंच हाथ तहं देह प्रवीन । रति . सुख माने देखे रूप, 'चौथो युगल सुनो पुनि भूप ॥१२७ लातव अरु कापिष्ट बखानि, "राजु अर्ध उचित्त सु जानि । पटल दोय तहं सोहै घने, सहस पचास विमान अति बने ॥१२५ चौदह सागर मायु जु कही, पंच हाथ तनु उन्नत सही। रूप देख पुनि माने भोग, पंचम युगल सुनो नृप जीग ॥१२६ 'शुक्र जु महाशुक्र अभिराम, सहस चालीस विमान शुभ धाम । पटलं एक सुनि श्रेणिक भूप, राजू एक उचित्त स्वरूप ॥१.. सोलह स्वर्ग आयु तह लहै, हाथ चार देह उन्नत शुभ कहे। शब्द ? सुनै मानं शुभ काम, 'युगल घटी सुनियो तुम राम ॥१३१ 'संसार जुअरि कहिए सहवार, विमान सहस षट सौहे सार । 'राजु उचित्त आध तंह लेखि, पटल एक पुनि कहिये पेखि ॥१३२ साढ़े तीन हाथ तनु उच्च, शब्द "सुनै सुख मान उच्च । भठारह सागर आयु शुभ अंत, सातवा जुगल कही पुनि संत ॥१३३ ऑनत प्राणत है सुख (इ) दाय, सागर बीस आयु तहं आई। करत तहां तीन देह अति सोहै, मन की उमंग यहां सुख मोहे ॥१३४ अष्टम युगल सुनो तुम नाम, आरण अच्युत है सुख धाम । हाथ अढ़ाई सौ है देह, मन ते सुख भुगतं रतिनेह ।।१३५ सागर आयु कही बाईस, पुनि तुम पटल सुनो न रईस । स्वर्ग चार छःह पटल वखानि, राजु एक ऊंच सब जानि ॥१३६ विमान सात सौ चार हुंथोक, ___ इह विधि कहो सुनो सुरलोक । अधोग्रेवेयक पटला है तीन, विमान एक सौ ग्यारह लीन ॥१७ (शेष पृ० २६ पर) Page #90 -------------------------------------------------------------------------- ________________ महाकवि धवल और उनका 'हरिवंशपुराण' श्रीमती अलका प्रचण्डिया 'दीति' एम० ए० अपभ्रंश काव्यधारा में पुराणकाव्य ओर चरितकाव्य जिनमें अधिकांश कवि नवौं शती के हैं। यह आश्चर्य का दो प्रभेद उल्लिखित । पराने कवियों की मल रचना विषय है कि महाकवि धवल ने महाकवि पुष्पदंत का नामोहोने से इस प्रभेद को 'पुराण' कहा जाता है । पुराणों का ल्लेख नहीं किया जबकि वह एक असाधारण कवि थे। प्रणयन प्राय: जैन प्रणेताओं द्वारा हुआ है। पुराण की प्रो० हीरालाल जैन ने महाकवि धवल को पुष्पदंत का परम्परा अपभ्रंश में संस्कृत के हिन्दू पुराणों से सर्वथा समकालीन मानते हुए उन्हें दसवीं शताब्दी में रखा है। भिन्न है। जैन वाङमय आगम कहलाते हैं। आगम के चार निर्दिष्ट कवियों में से असग को छोडकर सब नवीं शताब्दी अनुभाग निर्दिष्ट हैं-(१) प्रथमानुयोग (२) करणानुयोग के लगभग या उससे पूर्व हए हैं। असग ने 'अपना वीर(३) चरणानुयोग (४) द्रव्यानुयोग । प्रथमानुयोग के ग्रंथ चरित' हत. शक सं० अर्थात् ९८८ ई. से लिखा था। ही पुराण संज्ञा से सम्बोधित हुए हैं । इतिहास और पुराण अतः कल्पना की जा सकती है कि महाकवि धवल भी में भेदक रेखा खींचते हुए कहा जा सकता है कि इतिहास १०वी शताब्दी के बाद ही हए होंगे। वस्तुतः धवल शक एक पुरुष की कथा होती है और पुराण तिरमठ पुरुषों की संवत की १०वीं शती के अन्तिम पाद या ११वीं शती के जीवन कथा । वस्तृतः अपभ्रश के पुराण पोराणिक शैली प्रथम पाद के महाकवि थे। में रचित प्रबंधकाव्य अथवा महाकाव्य है। हरिवंशपुराण' में २२वें तीर्थकर यदुवंशी नेमिनाथ अपभ्रश वाङ्मय के प्रबंधकाव्य-प्रणेताओं में महाकवि का जीवन वन अंकित है। साथ ही महाभारत के पात्र धवल का नाम अग्रगण्य है । प्रो. हीरालाल जैन ने कौरव और पाण्डव तथा श्रीकृष्ण आदि महापुरुषों के "इलाहाबाद यूनिवमिटी स्टडीज" भाग १, सन १६२५ जीवन वत भी गमिफन हैं। १२२ सन्धियों के इम काव्य में कवि धवल द्वारा १२२ सन्धियों एवं १८ हजार पद्यों में ग्रंथ में प्रत्येक मयों में कड़वकों की संख्या भिन्न-भिन्न विरचित 'हरिवंशपुराण' का निर्देश किया था। कैटलाग ही है । ७वी सन्धि में २१ कहतक है और ११ वी सन्धि में में का आफ संस्कृत एण्ड प्राकृत मेनस्किप्ट्स इन दि सी० पी. केवल चार । संधियों के अंतिम घता में 'धवल' शब्द का एण्ड बरार, नागपुर सन् १९२६ में पृष्ठ ७६५ पर भी प्रयोग परिलक्षित है। ग्रंय में प्रायः प्रत्येक सन्धि की इस प्रथ का कुछ उल्लेख मिलता है। प्रस्तुत ग्रंय श्री ममानि पर महाकवि ने भाषा वर्ण:, पंचम वर्णः, मालदिगम्बर जैन मदिर (वडा १३ पथियों का) जयपुर में वेसिका वर्णः, कोड वणं : इत्यादि शब्दों का प्रयोग किया विद्यमान है। इस महाकाव्य की हस्तलिखित प्रति का है। इस प्रकार के शब्दों में मगलपंच, टकार, पंचम, हिंदोअवलोकन डा० कोछड ने डा. कस्तुरचंद जी कासलीवाल लिका, वकार. कोलाह आदि शब्दों का भी व्यवहार हुआ है। की कृपा से किया था। पंडित नाथराम प्रेमी ने भी धवल ग्रंयारम्भ में महाकवि ने 'हरिवंशपुराण' को 'सरोरुह' कृत 'हरिव पुराण' का उल्लेख अपने इतिहाम में "कुछ (कमल) कहा है और इस कथा के पूर्व वक्ताओं में चतुअप्राप्य ग्रथ" शीर्षक में किया है। मुख और व्यास को आदर पूर्वक स्मरण किया है तदनंतर ____ महाकवि धवल के पिता श्री का नाम सूर और मातु मंगनाचार के रूप में चौबीस तीर्थंकरों का स्तवन किया श्री का नार केसुल्ल था। आपके गुरू का नाम अम्बसेन गया है । महाकवि धवल क्षणभंगुर शरीर की सश्वरता का था। आप ब्राह्मण कुल में उत्पन्न हा थे परन्तु बाद में आप वर्णन करते हुए स्थायी अविनाशी काव्यमय शरीर रचना ने जैन धर्म अपनाया था। कवि द्वारा निर्दिष्ट उल्लेखों के का विचार करते हैं। यथाआधार पर उनकी प्रतिभा और कवित्व शक्ति का परिज्ञान जो णवि मरइ ण छिज्जइ णवि पीडिज्जइ, हो जाता है। 'हरिव शपुराण' के आरम्भ में महाकवि धवल अक्खउ भुवणि भुवणि मैं भीरुवि । ने अपने पूर्ववर्ती कवियों एवं काव्यों का उल्लेख किया है (शेष पृ० कवर ३ पर) Page #91 -------------------------------------------------------------------------- ________________ महाकवि प्रहदास : व्यक्तित्व एवं कृतित्व 0 डा० कपूर चन्द जैन, खतौली भाषा भावों की संवाहिका है, प्राचीन भारतीय विशेषण जैसा हीं मालूम पड़ता है। अतः सम्भव है कि भाषाओं में संस्कृत को वरेण्य स्थान प्राप्त है किन्तु उनका नाम कुछ और ही रहा हो। प्राचीन संस्कृत है या प्राकृत ? यह आज भी विवाद का वे जन्मपर्यन्त गृहस्थ ही रहे। गृहस्थ रहते हुए भी विषय बना हुआ है। प्राकत' और 'संस्कत नामों से तो उन्होंने अपनी ओजस्वी वाणी का उपयोग साधारण व्यक्ति प्राकृत ही प्राचीन सिद्ध होती है। जन मनीषी और के चित्रग में नहीं किया। 'मुनिसुव्रतकाव्य' तथा 'पुरूदेव कवियों ने आरम्भ में प्राकृत भाषा में ही ग्रंथों का प्रण- चम्पू' में उन्होंने मुनिसुव्रत तथा ऋषभदेव के चरित्र को यन प्रारम्भ किया इसी कारण प्राचीन जैन साहित्य प्रतिपाद्य बनाया, तो भव्यजनकण्ठाभरण में आप्तादि प्राकृत भाषा में ही उपलब्ध होता है, किन्तु 'अनुयोग्द्वार तथा सम्यग्दर्शन की महिमा का विवेचन किया है। प्राकत सूत्र', जैसे ग्रंथों में संस्कृत और प्राकृत दोनों भाषाओं को व्यक्ति की प्रशंसा करने वाले कवियों को अर्हद्दास तुच्छ ऋषिभाषित कहने के कारण' संस्कृत में भी विपुल मात्रा दृष्टि से देखते थे। और राजा महाराजा आदि धनमें जैन साहित्य का निर्माण हआ जिसमें से अधिकांश भाग सम्पन्न मनुष्यों की कविता द्वारा प्रशंसा करना जिनवाणी आज भी अलमारियों में पड़ा अन्वेषकोंकी बाट जोह रहा है। का अत्यधिक अपमान समझते थे। प्राचीन जैन वाङ्मय में 'द्वादशांगवाणी' को सर्वोपरि "सरस्वती कल्पलता स को वा स्थान प्राप्त है। आचार्य समन्तभद्र ने जैन काव्य निर्माण सम्वर्द्धयिष्यन् जिनपारिजातम् । का श्रीगणेश किया और तब से यह धारा अब तक विमुच्य काजीरतरूपमेषु व्यारोपयेत्प्राकृतनायकेषु ॥ अविच्छिन्न रूप में चली आ रही है। ___ अहंद्दास की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि उनके ईसा की तेरहवी चौदहवी शताब्दी जैन काव्यग्रंथ- ग्रंथो में व्यर्थ का विस्तार नही है। हां 'पुरूदेवचम्पू' जैसे निर्माण की दृष्टि से अत्यधिक महत्त्वपूर्ण है क्योंकि इस ग्रंथो मे जहां उन्होंने अपनी कला की कलाबाजियां दिखाई समय अनेक जैन काव्य ग्रंथों का प्रणयन हुआ। अहंद्दास हैं, वहां उनके वर्णन देखते ही बनते हैं। न केवल उनके जैसा प्रतिभाशाली महाकवि भी इसी समय हुआ जिसने गद्य ही 'गद्यः कवीनां निकष वदन्ति' की कसौटी पर 'पुरूदेव चम्पू' "मुनिसुव्रत काव्य" और "भव्यजनकण्ठा- सही उतरते है अपितु पद्य भी विभिन्न छन्दों में गुथे और भरण" रूप तीन रश्मियों का सुन्दर उपहार जैन साहित्य श्लेषानुप्राणित होकर सहृदयों को बलात अपनी ओर को दिया। आकृष्ट कर लेते हैं। भव्यजनकण्ठाभरण के अध्ययन से यह स्पष्ट हो जाता जन्मस्थान: है कि वे हिन्दू शास्त्रों के अप्रतिम अध्येता तथा विद्वान् महाकवि अर्हद्दास ने अपने स्थान के सम्बन्ध में कोई थे ।उक्त पथ मे जगह-जगह दिये गये हिन्दी-शास्त्रों के सूचना नहीं दी। श्री नाथूराम प्रेमी ने उनके ग्रंथों का उद्धरण इसके समुज्ज्वल निदर्शन है। इसी आधार पर प्रचार कर्नाटक में अधिक होने के कारण उनके द शास्त्री ने उनके जैन धर्मानुयायी न होकर कर्नाटक में रहने का अनुमान लगाया है।' पण्डित अन्य धर्मानुयायी होने का अनुमान लगाया है। श्री नाथ- आशाधर अपने अन्तिम समय मे अवन्ती के नलकच्छपुर राम प्रेमीका अनमान है कि अहहास नाम न होकर मे रहे थे और वहीं उन्होंने जिनयज्ञकल्प, अनगारधर्मामत Page #92 -------------------------------------------------------------------------- ________________ १८ वर्ष ३६, कि. ३ अनेकान्त टीका आदि ग्रंथ लिखे थे, यदि अहहास आशाधर के तीनों ग्रंथों की प्रशस्तियां देना असमीचीन न होगा। मुनिअन्तिम समय में उनके पास पहुंचे तो उनका स्थान अवंती सुव्रत काव्य का अन्तिम पद हैप्रदेश मानना होगा किन्तु समुचित प्रमाणों के अभाव में मिथ्यात्व कर्मपटलैश्चिरमावृते मे कुछ निश्चित लिख पाना सभव नही है। युग्मे दृशो, कुपथयाननिदानभूते । श्री नाथूराम प्रेमी ने मदनकीर्ति यतिपति के ही आशाधरोक्तिलसदजन संप्रयोगेअहंदास बन जाने का अनुमान लगाया है। मदनकीर्ति रच्छीकृते पृथलसत्पथमाश्रितोस्मि। यतिपति, वादीन्द, विशाल कीर्ति, जिन्होंने पं० आशाधर से अर्थात् मेरे नयनयुगल चिरकाल से मिथ्यात्वकर्म के न्यायशास्त्र पढ़कर विपक्षियों को जीता था, के शिष्य थे। पटल से ढके हुए थे और मुझे कुमार्ग में ले जाने के कारण वि. स. १४०५ में रचित राजशेखरसूरि के "चतविशति थे । आशाधर के उक्तिरूपी अंजन के प्रयोग से स्वच्छ कीर्तिप्रवन" नाम का एक न होने पर मैंने जिनेन्द्र भगवान के सत्पथ का आश्रय लिया, जिसमें मदन कीर्ति के कर्णाटक जाकर विजयपुर नरेश इसी प्रकार पुरूदेव चपू का अन्तिम पद्य हैकुन्तिभोज की सभा में काव्य-रचना करने और उनकी मिथ्यात्वपककलुषे मम मानसेस्मिन् पुत्री में विवाह करने का वर्णन है। मदनकीति का बनाया आशाधरोनितकतक प्रसरैः प्रसन्ने । "शासनचतुरिशिका" ग्रंथ उपलब्ध है । प्रेमी जी ने उल्लासितेन शरदा पुरु देवभक्त्या लिखा है-"चतुर्विशति कथा को पढ़ने के बाद हमारा तच्चंपु दंभजलजेन समुज्जजृम्भे ॥ यह कल्पना करने को जी अवश्य होता है कि कही मदन- अर्थात जो पहले मिथ्यात्वरूपी पंक से मलिन था कीर्ति ही कूमार्ग में ठोकरे खाते-खाते अन्त मे आशाधर तथा पीछे चलकर आशाधर जी के सुभाषित रूपी कतक की सुक्तियों से अईहास न बन गए हो । पूर्वोक्न ग्रन्थों में फल के प्रभाव में निर्मल हो गया ऐसे मेरे इस मानसमन (पुरूदेवचम्प आदि में) जो भाव व्यक्त किये गए है, उनमे रूपी मानसरोवर मे पुरूदेव जिनेन्द्र की भक्तिरूपी शरद इरा कल्पना को बहुत कुछ पुष्टि मिलती है और फिर यह ऋतु के द्वारा उल्लास को प्राप्त हुआ यह पुरूदेवचंपू रूपी अर्हदास नाम भी विशेषण जैसा ही मालूम पडता है। कमल वृद्धि को प्राप्त हुआ है। सभव है उनका वास्तविक नाम कुछ और ही रहा हो, यह इन दोनो पद्यों से इतना तो स्पष्ट है कि उहंद्दस नाम एक तरह वी भावुकता और विनयशीलता ही प्रकट की दृष्टि या मानस आशाधर की सूक्तियो से निर्मल हुआ करता है।"" पृष्ट प्रमाणी के अभाव में इ7 मन को भी था पर उनके साक्षात शिष्य होने का प्रमाण नही मिलता, वास्तविक रूप में स्वीकार नहीं किया जा सकता। भव्य जनकण्ठाभरण का यह पद भी द्रष्टव्य है-- पण्डित आश धर महान विद्वान होते हुए भी मुनि सूक्त्येव तेषा भरभीरवो ये गहाथमस्थाश्चरितात्मघर्माः । नही बने अपितु उन्होंने मुनियो के चरित्र में पनप रही तएव शेषाश्रमिणा सहाय्या धन्याः स्युराशाधरसूरिमुख्याः।' तत्कालीन शिथिलता की कड़ी आलोचना की है, वे गृहस्थ अर्थात् उन आचार्य वगैरह के सद्वचनों को सुनकर पण्डित थे अत: उनके शिष्य अहंद्दास का भी पण्डित होना ससार से डरे हुए जो गृहस्थाश्रम मे रहते हुए आत्मधर्म सभव है। डा. गुलाबचन्द्र चौधरी ने अहंदास को गृहस्थ का पालन करते है और बाकी के ब्रह्मचर्य, वानप्रस्थ तथा पण्डित ही माना है। साधु आश्रम में रहने वालो के सहायक होते हैं वे आशाआशाधर का शिष्यत्व : घर सूरि प्रमुख धन्य है। यह विवादास्पद विषय है कि महाकवि अहंदास पंडित इस पद्य के आधार पर डा० नेमिचन्द्र शास्त्री ने आशाधर के साक्षात शिष्य थे या नहीं । उन्होने अपने लिखा है कि "इस पद्य मे प्रकारान्तर से आशाधर की तीनों ग्रन्थों की प्रशस्तियो में पण्डित आशाधर का नाम प्रशंसा की गई है और बताया गया है कि गृहस्थाश्रम में बडे आदर और सम्मान के साथ लिया है। अतः यहाँ रहते हुए भी वे जैन धर्म का पालन करते थे तथा अन्य Page #93 -------------------------------------------------------------------------- ________________ महाकवि अर्हदास : 'व्यक्तित्व एवं कृतित्व आश्रमवासियों की सहायता भी किया करते थे। इस पद्य में आशायर की जिस परोपकार वृत्ति का निर्देश ि गया है, उसका अनुभव कवि ने सभवतः प्रत्यक्ष किया है और प्रत्यक्ष में कहे जाने वाले सदवचन भी सूक्ति कहनाते हैं, अतएव बहुत संभव है कि अदास आशाधर के समकालीन हों। पण्डित कैलाशचन्द्र शास्त्री ने भी उक्त आधार पर अद्दास का आशाधर के लघुसमकालीन होने का अनुमान किया है।" किन्तु इस सन्दर्भ में पण्डित नाथूराम प्रेमी और पण्डित हरनाथ द्विवेदी के मनों को दृष्टि से ओझल नही किया जा सकता। प्रेमीजी ने लिखा है कि इन पदों में स्पष्ट ही उनकी सूक्तियो या उनके सद्ग्रन्थों का ही संकेत है, जिनके द्वारा अहंस को सन्मार्ग की प्राप्ति हुई थी, गुरू शिष्यत्व का नहीं।" इसी प्रकार माणिकवन्द दिगम्बर जैन प्रथमाना से प्रका शित पुरूदेवचंपू के सपादक पण्डित जिनदान शास्त्री फड कुले के मत पर कटाक्ष करते हुए पण्डित हरनाथ द्विवेदी ने लिखा है- पुरुदेवचपू के विज्ञ सादक फड़कुले महोदय ने अपनी पाण्डित्वपूर्ण भूमिका मे लिखा है कि उल्लिखित प्रशस्तियों से कविवर अदास पण्डिताचार्य आशावर जी के समकालीन निर्विवाद सिद्ध होते है किन्तु कम से कम मैं आपकी इस निर्णायक सरणी से सहमत हो आपकी निविवादिता स्वीकार करने में असमर्थ हूं क्योंकि प्रणस्तियों से यह नही सिद्ध होता कि आशाधर जी को साक्षात्कृति अदास जी को थी कि नहीं सूक्ति और उक्ति की अधिकता से यह अनुमान करना कि साक्षात् आशाधर सूरि से अदास जी ने उपदेश ग्रहण कर उन्हे गुरू मान रखा था, यह प्रामाणिक प्रतीत नही होता । क्योंकि सूनि और उविन का अर्थ रचना-बद्ध ग्रन्थ-संदर्भ का भी हो सकता है। " हमारे अनुमान से यह अधिक उचित प्रतीत होता है कि आशाधर के अन्तिम समय अर्थात् वि० स० १३०० मे अहंदास आशाधर जी के पास पहुंचे होगे और १-२ वर्ष साक्षात् शिष्यत्व प्राप्त कर उनके धर्मामृत से प्रभावित होकर काव्य रचना में प्रवृत्त हुए होगे। जैसा कि उनके "धावनकापथ" (मुनिसुव्रत काव्य १० / ६४ ) पद्म से भी व्यक्त होता है। १६ अहंद्दास नाम के अनेक विद्वान् अदास नाम के दूसरे कवि र कवि अहंदास है। यह जैन ब्राह्मण थे और इनके पिता का नाम नागकुमार था जो गंगा मारसिंह के चमूपति का डमरस १५वी पीढ़ी मे हुए थे। इनका समय भी १३०० ई० के आसपास स्वीकार किया गया है। कवि अर्हास कन्नड़ भाषा के प्रकाण्ड विद्वान् थे। उन्होंने करनड़ भाषा मे अहमत नाम के महत्वपूर्ण ज्योतिष ग्रन्थ की रचना की है। यह ग्रंथ पूरा नही मिलता। शक संवत् की चौदहवी शताब्दी में भास्कर नाम के आंध्र कवि ने इस ग्रथ का तेलगु भाषा में अनुवाद किया था । इस ग्रंथ के उपलब्ध भाग मे वर्षा के चिह्न, शकुन, वायु-चक, गृहप्रवेश, भूकम्प भूजात फल, उत्पात- लक्षण, इन्द्रधनु लक्षण आदि विषयो का निरूपण किया गया है।" पर ये अहंदास पुरूदेवचम्पू के कर्ता अहंहास से भिन्न है । श्रद्दास का समय : संस्कृत के अन्य महाकवियों की तरह महाकवि अर्हदास का समय भी अन्धकाराच्छन्न है । यतः उन्होने अपने जन्म समय, जन्म स्थान, माता पिता आदि के संबंध मे कोई उल्लेख नहीं किया है। फिर भी कतिपय प्रमाण ऐगे है, जिनसे उनका समय निर्धारण करना सम्भव है। अदास के काल-निर्धारण में पूर्व और अपर सीमा निर्धारण के लिए क्रमशः आशाधर और अतिसेन महत्त्व पूर्ण मानदण्ड है। अदास ने अपनी कृतियो मे र का नामोल्लेख जिस सम्मान और धद्धा से किया है, उससे तो इस अनुमान के लिए पर्याप्त अवकाश मिलता है कि वे आमाघर के संक्षिप्त शिष्य रहे होंगे। किन्तु आशाधर ने अपने ग्रंथों में जिन आचार्यों और कवियों का उल्लेख किया है, उनमे अहंदास का उल्लेख नही है । यहा तक कि उनकी रचना अनगारधर्मामृत की टीका मे अर्हद्दास या उनके किसी ग्रन्थ का कोई उल्लेख नही है ।" अन्तिम इससे इतना तो निर्विवाद सिद्ध है कि वे आगाधर के पश्चात्वर्ती है। साथ ही आचार्य अजितसेन ने अपनी अलंकार चिन्तामणि में जिनसेन, हरिचन्द्र वाग्भट आदि के साथ ही अहंदास के मुनिसुतकाव्य के अनेक श्लोक Page #94 -------------------------------------------------------------------------- ________________ २०, वर्ष ३६,कि.३ अनेकान्त उदाहरण स्वरूप दिये है रधर्मामृत की टीका' वि० स० १३०० में पूर्ण की थी।" चन्द्रप्रभं नौमि यदंगकान्ति इससे पूर्व वे त्रिषष्टिस्मृतिशास्त्र', 'जिनयज्ञकल्प', सागारज्योत्स्नेति मत्वा द्रवतीन्दुकान्तः । धर्मामृत' की टीका' आदि महत्त्वपूर्ण ग्रन्थों की रचना कर चकोरयूथं पिबति स्फुटन्ति चुके थे। ऐसा उक्त ग्रन्थों की प्रशस्तियों से विदित होता कृष्णेऽपि पक्षे किलकरवाणि ।।" है। यतः उन्होंने अपनी अन्तिम कृति 'अनगारधर्मामृत की 'अत्र चन्द्रप्रभागकान्तौ ज्योत्स्ना बुद्धिः ज्योत्स्नासा- टीका' १३०० वि० स० (१२४३ ई०) में पूर्ण की थी। दृश्यं बिना न स्यादिति सादृश्यप्रतीतो भ्रान्तिमदलंकारः।' अतः उनका रचना काल ईसा की १३वीं शताब्दी का 'अत्रारोपविषये जिनांगकान्ती चकोरादीनां ज्योत्स्ना- पूर्वार्द निश्चित है । अलंकार चिन्तामणि के कर्ता अजितनुभवः। अलंकार चिन्तामणि ज्ञानपीठ सस्करण, सेन का रचनाकाल डा० नेमिचन्द्र शास्त्री ने वि० सं० पृष्ठ १२३, १३५ तथा २६६ । १३०७-१३१७ तथा डा. ज्योतिप्रसाद जैन ने १२४०. __ इसी प्रकार मुनिसुव्रत काव्य के १२३४. २०३१, १२७० ई० (१२६७-१३२७ वि० स०) माना है । २१३२ तथा २१३३ श्लोक अलंकार चिन्तामणि के पृष्ठ २०५, २२८,२२८ तथा २११ पर उदाहरण स्वरूप प्रस्तुत आशाधर और अजितसेन के मध्यवतो होने के कारण किए गए हैं। अहंदास का समय १३वी शताब्दी ई० का मध्य-भाग इन श्लोको से यह स्पष्ट है कि अर्हहास अलंकार- मानना (क्रमशः) चिन्तामणि के कर्ता आचार्य अजितसेन से पूर्ववर्ती हैं। सौभाग्य से हमें आशाधर के काल निर्धारणार्थ अधिक अध्यक्ष संस्कृत विभाग, जैन कालेज नही भटकना होगा उन्होंने अपनी अन्तिम रचना 'अनगा बड़ा बाजार खतौली २५१२०१ (उ० प्र०) संदर्भ-संकेत १. 'सक्कया पायया चेय भणिईओ होति-दोण्णिवा। वाणवा। भाग-४. पृ०५० सरमंडलम्मि गिज्जन्ते पसत्था इसिभासिया ॥ ११. भव्यजनकण्ठाभरण, प्रस्तावना, पृ० १० अनुयोग द्वारसूत्र : व्यापार २०१० सत्र १२७ १२. जैन साहित्य और इतिहास, पृ० १४२ (सन्दर्भ जैन : संस्कृत काव्य के विकास मे जैन कवियो १३. मुनिसुव्रतकाव्य भूमिका, पृ० ख १ कां योगदान)। १४. जैन धर्म का प्राचीन इतिहास, द्वितीय भाग, पृ०२४५ २. भव्यजनकण्ठाभरण, भूमिका, पृ०८ १५. गुरु गोपालदास वरया स्मृतिग्रन्थ पृ० ५०१ तथा ३. जैन साहित्य और इतिहास, पु० १४३ भारतीय ज्ञानपीठ से प्रकाशित अनगारधर्मामृत की ४. दामो भवाम्यहतः, (मुनिसुव्रत काव्य १०.४६) से भी प्रस्तावना । __यही ध्वनित होता है। १६. मुनिसुव्रतकाव्य, १.२ ५. मुनिसुव्रतकाव्य, १.१२ १७. 'नलकच्छपुर श्रीमन्नेमि चैत्यालयेसिधत् । ६. जैन साहित्य और इतिहास, पृ० १४३ विक्रमाब्दशतेष्वेषा त्रयोदशसु कातिके ॥' ७. जैन साहित्य और इतिहास पृ० १४३ अनागारधर्मामृत टीका प्रशस्ति, ३१ ८. जन साहित्य का बृहत् इतिहास, भाग-६, पृ० १४ १८. अलंकार चिन्तामणि, प्रस्तावना, पृ० ३४ भारतीय ६. भन्यजनकण्ठाभरण पद्य सं० २३६ ज्ञानपीठ संस्करण। १०. तीर्थकर महावीर और उनकी आचार्य परम्परा, १६. व्यक्तिगत पत्र दिनांक २७-६-६२ के आधार पर। Page #95 -------------------------------------------------------------------------- ________________ भगवती अाराधना में तप का स्वरूप ] कु. निशा, विननीर कर्मक्षयार्थ तप्यत इति तपः अर्थात् कर्मक्षय के लिए आभ्यन्तर परिणामों की विशुद्धि का चिह्न अनशनादि जो तपा जाता है वह तप है। इसी प्रकार सम्यग्ज्ञानरूपी बाह्य तप है, जैसे किसी मनुष्य के मन में क्रोध उत्पन्न हान नेत्र को धारण करने वाले साधु के द्वारा जो तपा जाता है पर उस क्रोध का चिह्न मकुटी चढाना होता है। इस प्रकार उसे तप कहते है । यह तप का निरुक्तयर्थ है । कर्त्तव्य और बाह्य और आभ्यन्तर तपो में लिङ्ग-लिङ्गी भाव है।' अकर्तव्य को जानकर अकर्तव्य का त्याग करना चारित्र बाह्य तप के भेदहै वही ज्ञान है और वही सम्यग्दर्शन है, उस अकर्तव्य के (१) अनशन-न अशन अर्थात् अशन के न करने त्यागरूप चारित्र मे जो उद्योग और उपयोग होता है, उसको ___को या अप भोजन को अनशन" कहते हैं । यह तप तभी जिन भगवान ने तप कहा है अर्थात् चारित्र मे उद्योग और माना जाता है जब कर्मक्षय के लिए किया जाता है । अनउपयोग ही तप है। तप शब्द का अर्थ समीचीनतया निरोध शन तप दो प्रकार का होता है.-१. अद्धाशन २. सर्वानकरना होता है। रत्नत्रय की प्राप्ति के लिए इष्ट-अनिष्ट शन । विषयों की आकांक्षा के निरोध का नाम ही तप है। इसके अद्धाशन (चतुर्थ उपवास से छह मास का उपवास) दो भेद हैं-१. बाह्य तप, २. आभ्यन्तर तप । उनमें भी गृहणकाल और प्रतिसेवनाकाल में किया जाता है तथा प्रत्येक के छह-छह भेद हैं। अनशन, अवमोदर्य, रसों का सर्वानशन सन्यास ग्रहण करने से लेकर मरणपर्यन्त तक त्याग, वृत्तिपरिसंख्यान, कायक्लेश और विविक्तशय्या ये किया जाता है। छह प्रकार के बाह्य तप है और प्रायश्चित, विनय, वेया- (२) प्रवमौदर्य-बत्तीस ग्रास प्रमाण पुरुष के और वृत्त्य, स्वाध्याय, व्युत्सर्ग और ध्यान ये आभ्यन्तर तप है। अट्ठाइस ग्रास प्रमाण स्त्री के आहार मे से एक-दो ग्रास बाह्य और माभ्यन्यर तप-बाह्य जन अन्य मत आदि की हानि के क्रम से जब तक एक ग्रास मात्र भी शेप वाले और गृहस्थ आदि भी इन तपों को जानते है, इसी होता है वह अवमोदर्य तप है।" यह तप उत्तम क्षमा आदि कारण अनशनादि तपों को बाह्य तप कहते है तथा जो रूप धर्म की, छह आवश्यको की, आतापन आदि योग की सन्मार्ग को जानते हैं, उनके द्वारा जिसका आचरण किया प्राप्ति के लिए, वायु आदि विषमता को दूर करने के लिए जाता है, ऐसे तप आभ्यन्तर तप कहे जाते है। प्रायश्चित्त निद्रा को जीतने आदि के लिए किया जाता है। आदि तपो मे बाह्य द्रव्यों की अपेक्षा न होकर अन्तरग परि- (३) रसपरित्याग- दूध, दही, घी, तेल, गुड़, पत्रणामों की मुख्यता रहती है तथा इनका स्वयम् ही सवेदन शाक, लवण आदि सबका अथवा एक-एक का त्याग रसहोता है, ये देखने में नहीं आते तथा इनको अनाहत लोग परित्याग' नामक तप है। इसकी चार महाविकृतियां होती धारण नहीं कर सकते, इसी कारण प्रायश्चित्तादि को अत- हैं-नवनीत, मद्य, मांस और मधु । ये क्रमशः अभिलाषा रंग तप' कहा जाता है। कमों की निर्जरा मे समर्थ आभ्य- प्रसंग, दर्प और असंयम को उत्पन्न करने वाली है। इन्हें न्तर तपो की वृद्धि के लिए अनशनादि बाह्य तप किये जाते महाविकृतियाँ इसलिए कहा जाता है, क्योंकि ये मन को हैं । अतः आभ्यन्तर तप ही प्रधान है। यह आभ्यन्तर तप अत्यधिक विकासयुक्त कर देती है। अत: जिन भगवान शुद्ध और शुभ परिणामो से युक्त होता है, इसके बिना की आज्ञा को धारण करने वाले. पाप से भयभीत तथा बाह्य तप निर्जरा में समर्थ नहीं होता है। तप में एकाग्रता के इच्छुक को इन महाविकृतियों का सर्वथा Page #96 -------------------------------------------------------------------------- ________________ २२, वर्ष ३६, कि० ३ अनेकान्त त्याग कर देना चाहिए।" उत्पादन और एषणा दोषो से रहित, शय्या रहित हो ऐसी (४) वृत्तिपरिसंख्यान-मुमुक्षु को यह तप आशा वसतिका के अन्दर या बाहर खड़ा होना बैठना अथवा की निवृत्ति के लिए इन्द्रिय सयम के लिए, तथा मोक्ष प्राति शयन करना विविक्तःशयनासन नाम का तप है। ऐसे के लिए सदैव करना चाहिए। श्रमण भिक्षा से सम्बद्ध, एकान्त स्थान मे निवास करने वाले साधु असाधु लोगों के दाता, चलना, पात्र गृह आदि विषयों से सम्बन्धित अनेक ससर्ग से उत्पन्न होने वाले मोह, राग और द्वेष से सन्तप्त प्रकार के सकल्पों के द्वारा शरीर के लिए वृत्ति करता है नही होते ।" और यही वृत्तिपरिसख्यान तप है।" उदाहरणार्थ-पूर्ब बाह्य तप की विशेषता--बाह्य तप के करने से गमन किये हुए मार्ग से लौटते हुए भिक्षा मिलने पर ही यति में अनेक गुणों का प्रादुर्भाव हो जाता है, जसे-बाह्य ग्रहण करूंगा, सीधे मार्ग से जाने पर यदि मिली तो ग्रहण तप से आत्मा, सपना कुल, गण, शिष्यपरम्परा सुशोभित करूँगा अन्यथा नही आदि मार्ग विषयक ।" सोने, चाँदी, होती है। आलस्य नष्ट हो जाता है। विशेषत: संसार का कांसी अगवा मिट्टी के पात्र द्वारा दी गयी भिक्षा ही ग्रहण मूलकर्म नष्ट होता है।" बाह्य तप से बहुत से प्राणी समार करूंगा अन्यथा नही आदि पात्रविषयक । स्त्री, वालिका, से भयभीत हो जाते है, मिथ्यादष्टियों मे सौम्यता आ जाती युवती, वृद्धा अथवा अलकार युक्त वा अल कार रहित स्त्री है तथा इस तप के करने से मोक्ष मार्ग प्रकाशित होता है। से ही ग्रहण करूंगा अन्यथा नही आदि दाता विषयक । क्योकि तप के अभाव में कमों की निर्जग सम्भव नहीं है कूल्माष आदि से युक्त भात, चारो ओर व्यञ्जन के मध्य इसके साथ ही जिन भगवान की आज्ञा का पालन हो जाता में पूष्पावली के समान रखते चावल आदि भोजन मिलने है। इस तप से शरीर मे लघुता और उससे सम्बद्ध रनेह पर ही ग्रहण करूँगा, अन्यथा नहीं। इस प्रकार के अनेक का नाश, रागादि का उपशम होता है । २ अनशनादि तप भोजन सम्बन्धी नियम लेना वृत्तिपरिसख्यान है। से अनर्थकारी सुखशीलता का नाश, शरीर मे कृशता, ५) कायक्लेश-कायोत्सर्ग करना, शयन, बैठना ससार से विरक्ति होती है, इन्द्रियां दान्त होती है, वीर्याऔर अनेक विधिनियम ग्रहण करना, उनके द्वारा आगगा- चार में प्रवृत्ति तथा यति के जीवन के प्रति इच्छा भी नूसार शरीर को कष्ट देना ही कायक्लेश नाम का तप समाप्त हो जाती है। बाह्य तप से शरीर, रस और सुख है।" उदाहणार्थ-तेज धूप में सूर्य की ओर मुख करक में आमक्ति नही रहती तथा कषायों का मर्दन होता है । गमन करना, जिस ग्राम में मुनि ठहरे हो उस ग्राम से अन्य मरणकाल मे जिस समस्त आहार का साधु को त्याग करना ग्राम मे भिक्षा के लिए गमन करना और जाकर लौटना, पड़ता है, उसका अभ्यास उसे बाह्य तप से ही हो जाता है. चिकने स्तम्भ आदि के सहारे खड़ा रहना, एक स्थान पर वह दुःख-सुख मे समभाव को प्राप्त होता है, निद्रा पर निश्चल स्थित रहना, एक पैर से खड़े रहना, वीरासन विजय प्राप्तकर लेता है और ब्रह्मचर्यको धारण करता है।" प्रावि आसन लगाना, मृतक के समान निश्चेष्ट सोना, आभ्यन्तर तप के भेदखले आकाश मे शयन करना, न थूकना, न खुजाना, केश- १ प्रायश्चित-अपराध को प्राप्त हुआ जीव जिस लोच, रात्रि-जागरण तथा आतापन आदि योग करना तप के द्वारा अपने पहले किये हुए पापो से विशुद्ध हो जाता कायक्लेश नामक तप है।५ है, वह प्रायश्चित्त" नामक आभ्यन्तर तप है। यह तप (६) विविक्तशय्या-जिस वसति में मनोज्ञ अथवा आलोचना, प्रतिक्रमण, तदुभय, विवेक, व्युत्सर्ग, तप छेद, अमनोज्ञ शब्द, रस, रूप, गन्ध और स्पर्श के द्वारा अशुभ मूल परिहार और श्रद्धान के भेद से दस प्रकार का है।५ परिणाम नही होते अथवा स्वाध्याय और ध्यान में विघ्न भगवती-आराधना विजयोदया टीका मे आलोचना आदि नहीं होता। जो खुले हुए अथवा बन्द द्वार वाली सम प्रकार का प्रायश्चित तप कहा है।" प्रकार इस अथवा ऊँची-नीची भूमि वाली, बाहर के भाग में स्थित प्रकार हैं-आलोचना, प्रतिक्रमण, तदुभय, विवेक, व्युत्सर्ग, हो। स्त्री, नपुंसक पशुओं से रहित, ठडी या गर्म", उदगम, तप, छेद, परिहार और उपस्थापन ।" Page #97 -------------------------------------------------------------------------- ________________ भगवती अराधना में तप का स्वरूप आचार्य आदि के समक्ष अपने दोषों का चारित्र आचारपूर्वक निवेदन करना आलोचना नामक प्रायश्चित है ।" यह दो प्रकार का है - सामान्य और विशेष । जिस मुनि को मूल नामक प्रायश्चित दिया जाता है वह सामान्य आलोचना तथा इसके अभाव में वह विशेष आलोचना करता है ।" अनेक अपराध करने वाला तथा सम्यक्त्व व्रत आदि का घात करने वाला मुनि सामान्य आलोचना करता है। मैं आज से मुनि दीक्षा लेना चाहता हूं और मैं रत्नत्रय से हीन हूं इस प्रकार आलोचना करना ही सामान्य आलोचना है। दीक्षा से लेकर सब काल और क्षेत्र में जिस भाव और क्रम से जो दोष दिया गया है, उसकी उसी प्रकार आलोचना करना ही विशेष आलोचना है ।" विशुद्ध परिणाम वाले क्षपक के आलोचना प्रतिक्रमण आदि किया प्रशस्त क्षेत्र में पूर्वाह्न अथवा अपराह्न काल में, शुभ दिन शुभ नक्षत्र और शुभ समय में होती है । " सुचारित्र सम्पन्न क्षपक दक्षिण पार्श्व मे पीछी के साथ हाथों की अंजलि को मस्तक से लगाकर मन, वचन, काय की शुद्धि पूर्वक गुरु की वन्दना करके सभी दोषों से रहित होकर आलोचना करता है।" प्रतिक्रमण -- ससार से भयभीत और भोगों से विरक्त साधु के द्वारा किये गये अपराध को मेरे दुष्कृत मिथ्या हो, मेरे पाप शान्त हो। इत्यादि उपायों के द्वारा दूर करने को प्रतिक्रमण" नामक प्रायश्चित कहते हैं। अर्थात् दोषो की निवृत्ति को प्रतिक्रमण कहते है । यह नाम प्रतिक्रमण स्थापना प्रतिक्रमण, द्रव्यप्रतिक्रमण क्षेत्रप्रति क्रमण, कालप्रतिक्रमण और भावप्रतिक्रमण के भेद से छह प्रकार का है।" भट्टिनी, दारिका आदि अयोग्य नामो का उच्चारण न करना नामप्रतिक्रमण है। लिखित या खोदी हुई आप्तभासों की मूर्ति, जस और स्थावरों की आकृतियों को स्थापना शब्द से कहा गया है, उनमें आप्तभासो की मूर्तियों के समक्ष पूजन न करना स्थापना प्रतिक्रमण है तथा त्रस, स्थावर आदि रचनाओं को नष्ट न करना स्थापना प्रतिक्रमण है। गृह, खेत आदि दस परिग्रहों का उद्गम, उत्पादन और एषणा दोषो से दूषित वसतिकाओं का, उप करणों का और भिक्षाओं का अयोग्य आहारादि का और तृष्णा, मद तथा सकने के कारणरूप द्रव्यों का त्याग २३ करना द्रव्यप्रतिक्रमण है। जल कीचड़ और उस स्थावर जीवों से युक्त क्षेत्रों में गमन आगमन का त्याग क्षेत्र प्रतिक्रमण है अथवा जिस क्षेत्र में रहने से रत्नत्रय की हानि हो, उसका त्याग क्षेत्र प्रतिक्रमण है। रात तीनों सन्ध्या, स्वाध्याय और छह आवश्यकों के काल में गमन - आगमन आदि का व्यापार न करना कालप्रतिक्रमण है। मिध्यात्व, असंयम, कषाय, राग-द्वेष, आहारादि संज्ञा, निदान, आतं रोग आदि अशुभ परिणामो का तथा पुण्यासवभूत शुभ परिणामों का त्याग भावप्रतिक्रमण है। तदुभय - दुःस्वप्न, संक्लेश आदि से होने वाले दोषों के निराकरण के लिए जो आलोचना और प्रतिक्रमण दोनों प्रायश्चित किये जाते हैं, उसे तदुभय" प्रायश्चित कहते हैं । विबेक " - ससक्त अन्नादि में दोषों को दूर करने में असमर्थ साधु जो संसक्त अन्नादि के उपकरणादि को अलग कर देता है, उसे विवेक प्रायश्चित्त कहते हैं । इसी प्रकार यदि साधु भूल से स्वयं अथवा दूसरों के द्वारा कभी अप्रासुक वस्तु को ग्रहण कर लेता है, तब स्मरण होते ही उसको छोड़ देना विवेक प्रायश्चित है, अथवा त्यागी प्रामुक वस्तु भी यदि साधु ग्रहण कर लेता है तो स्मरण होते ही उसका त्याग कर देना विवेक है । यह गणविवेक और स्थानविवेक के भेद से दो प्रकार का है।" हुई मूल पार्श्वस्थ, संसक्त, स्वच्छन्द, अवसन्न और कुशीत मुनियों को अपरिमित अपराध होने से सम्पूर्ण दीक्षा छेदकर पुन: दीक्षा देना मूल प्रायश्चित है । जो सुखशील होने से बिना कारण अयोग्य का सेवन करता है वह पार्श्वस्य कहलाता है अथवा जो निरतिचार संयम का मार्ग जानते हुए भी उसमें प्रवृत्ति नहीं करता, किन्तु संयम के पार्श्ववर्ती मार्ग में चलता है, वह न तो एकान्त से असंयमी और न निरतिचार से संयमी है, अतः उसे पार्श्वस्थ " कहते है एक अन्य स्थान पर पार्श्वस्थ के विषय में कहा गया है कुछ साधु इन्द्रियरूपी चोरों और कषायरूपी हिंसक जीवों के द्वारा पकड़े जाकर साधु संघ के मार्ग को छोड़कर साधुओं के पार्श्ववर्ती हो जाते हैं, यही कारण है कि यह पासत्य या पार्श्वस्थ कहे जाते हैं।" संसक्त साधु-नट के समान अनेक रूप धारण करने वाला होता है वे पार्श्वस्थ के संसर्ग से पार्श्वस्य कुशील के संसर्ग । Page #98 -------------------------------------------------------------------------- ________________ २४, वर्ष ३६ कि.. भनेकान्त से कुशील, और स्वच्छन्द के संसर्ग से स्वच्छन्द हो जाते खिन्न होने के कारण अवसन्न कहा जाता है। कुत्सित हैं अर्थात् वे दूसरे में मिलकर उन जैसे ही हो जाते हैं। शील वाले मुनि को कुशील कहा जाता है। यह कौतुक इसी कारण संसक्त कहे जाते हैं।" जो मुनि साधु संघ से कुशील, यूतिकर्मकुशील, प्रसेनिका कुशील, अप्रसेनिका निकल कर आगम विरुद्ध मार्ग की इच्छानुसार कल्पना कुशील, निमित्तकुशील, आजीव कुशील, कक्वकुशील, करता है वह यथाछन्द साधु है । इन्द्रिय और कषाय- कुहन कुशील, सम्मूर्छनकुशील, प्रवातन कुशील आदि रूपी तीव्र परिणाम होने के कारण सुखपूर्वक समाधि में अनेक प्रकार का होता है।" लगा जो साधु तेरह प्रकार की क्रियाओं में आलसी है और तप-शास्त्रविहित आचरण में दोष लगाने वाला, चरित्र भ्रष्ट साधु की क्रिया करता है ऐसा साधु अवसन्न किन्तु सत्त्व, धैर्य आदि गुणों से युक्त श्रमण जो प्रायश्चित कहलाता है। जिस प्रकार जो कोई कीचड़ में फंस गया शास्त्रोक्त उपवास आदि करता है, वह तप प्रायश्चित है। या मार्ग में थक गया तब उसको अवसन्न कहा जाता है छेद-असंयम के प्रति ग्लानि प्रकट करने के लिए और वह अवसन्न द्रव्यरूप से है, उसी प्रकार चारित्र दीक्षा काल को कम कर देना छेद प्रायश्चित है। अनअशुद्ध के भावसे अवसन्न होता है । वह उपकरण, वसतिका, गार धर्मामृत (गा० ७.५३) में कहा है-जो साधु चिरस्वाध्याय, विहार करने की भूमि के शोधन में ईर्यासमिति काल से दीक्षित है, निर्मद है, समर्थ है और शर है यदि आदि में स्वाध्याय के काल का ध्यान रखने में तथा उससे अपराध हो जाए तो दिन, पक्ष या मास आदि का समिति में तत्पर नहीं रहता, छह आवश्यकों में आलस्य विभाग करके दीक्षा छेद देने को छेद प्रायश्चित कहते हैं। करता है। इस प्रकार चरित्र का पालन करते हुए वह खेद (क्रमश:) सन्दर्भ सूची १. सर्वार्थसिद्धि ६, २. पयनन्दिपंचविंशतिका १८, २५. भ०भ० २४४-२३९, २६. म. आ. गा० २३०, ३. भगवती आराधना गा० ६.१०, ४. अनगार धर्मामा २७. भ०आ० गा० २३१, २८. भ०आ०गा० २३२, गा० ७२, ५. मूलाचार गा० ३४५, ६.भ. आ० गा० २६, अं० धर्मा० ७/३१ । २१०, मू० आ० गा० ३४६, ७ मू० आ० गा० ३६०, ३०. आदा कुलं गणो पवयण च सो भाविदं हवदि सव्वं । ८. भ. आ० गा० १०६ की विजयोदया टीका, ६. अनगार अलसत्तणं च विजई कम्मं च विणियं होदि ॥२८॥ धर्मामत ७।३३, १०. भ. आ० गा० १३४२ की वि०, ३१. बहुगाणं सवेगो जायदि सोमत्तणं च मिच्छाण । ११. भ.आ. गा. १३४४, १२. अं० धर्मा. गा. ७.११ टीका ४४ 0 अं० धर्मा. गा. ७११ टीका मग्गो य दीविदो भगवदो य अणणालिया आणा ॥२४५ १३. अद्धाणसणं सव्वाणसणं दुविहं तु अणसण भणियं । ३२. देहस्स लाधव संवेगो जायदि सोमत्तणं च मिच्छाणं । विहरंतस्स य अदाणसणं इदरं च चरिमते ॥२११म.आ. जवणाहारो संतोसदा य जहसंभवेण गुणा ॥२४६ भ.आ. १४. एगुत्तरसेढीय जावय कवलो वि होदि परिहीणो। ३३. भ०आगा० २२६-२४२, ३४. मृ०आगा० २६१ । अमोदरियतवो सो अद्धकवलमेव सिच्छं च ॥२१४॥ ३५. म०आगा० २६२, ३६. भ० आगा० ४ण४ की वि. भ.आ., म.आ.गा० ३५० १५. अं.धर्मा. ७।२२, १६. भ. आ. गा. २१७, मू.आ. ३५२ ३७. उमास्वामी त० सूत्र ६।२२, ३८. मू०आ० पृ० २६३ १७. चत्तारि महाविडीओ होंति एवणीदमज्जमंसमहू । ३६. भ०आग० ५३५, ४०. वही ५३६, ४१. वही ५३७ करवाफ्संगदप्पाइसंजमकारीओ एदाओ ॥२१।। ४२. वही ५५६, ४३. वही ५६३, ४४. अं. धर्मा. गा. ७४७ भ० आ०, म0आ०३५३ ४५. भ०आगा० ११८ की वि०४६. वही ११ की वि १८.०धर्मा.पृ० ५०७, १६. भ.आ. २१६, म.आ. ३५४, ४७. अ० धर्मा० ७.४८, ४८. वही ७४४-५०। २०. अं. धर्मा. ७।२६, २१. भ. आ० गा० २२०, ४६. मू.आ. गा. ३६२ की आचा. ५०. अं.धमी. गा.७५५ २२. भ० आ० गा० २२३, २३. भ. आ० गा० २२२ । ५१. भ.आ गा. १६४४ को वि. ५२. भ. आ. गा. १२६. २४. ठाणसयणासहिं य विवि हेहि य उग्गयेहिं बहुए हिं। ५३. भ.मा. १९४४ वि. ५४. भ.आ. १३०४, १९४४ वि. अणवीसीपरिताओकायकिलेसो हवदि एसो ॥३५६॥ ५५.भ.प्रा. १२८६५६. भ. आ. गा.१९४४५७. वही। Page #99 -------------------------------------------------------------------------- ________________ मुक्ति में करुणा : एक विसंगति सर्व विदित है कि करुणा, अहिंसा धर्म का एक अग है और करुणा को आचार्य कुन्दकुन्द ने मोह का चिन्ह कहा है-मोह की सत्ता को इंगित करने का साधन कहा है। तत्र कर्म -रहित मुक्त आत्माओं में करुणा की पुष्टि करना, उन्हें मोह से आवृत मानना, आसत्र युक्त मानना कहां का न्याय है ? ऐसे में मुक्त और संसारियों में अन्तर ही क्या होगा ? आचार्य कुन्दकुन्द महाराज कहते हैं 'अट्ठे अजधागहणं, करुणाभावो य तिरिय मणुएसु । विसएसु च पसंगो, मोहस्सेदाणि लिगाणि ॥' प्रवचनसार ८५ पदार्थ का अयथार्थ ग्रहण और तिथंच मनुष्यों के प्रति करुणा का भाव तथा विषयों का प्रसंग ( इष्ट विषयों में प्रीति और अनिष्ट विषयों में अप्रोति) ये तीनों ही मोह के चिन्ह - मोह के अस्तित्व को इंगित करने वाले हैं । 'अर्थानामययातथ्य प्रतिपत्स्था, तिर्यङ्मनुष्येषु प्रेक्षाsafe कारुण्य बुद्धया च मोहमभोष्ट विषय प्रसनरागमभीष्ट विषयप्रीत्या द्वेषमिति त्रिभिलिङ्ग रधिगम्य झगिति संभवन्नपि त्रिभूमिको अपि मोहो निहन्तव्यः ।' - प्रव० सा० तत्त्वदीपिका ८५ पदार्थों की अययातथ्यरूप प्रतिपत्ति और प्रेक्षकभावयोग्य तियंवों मनुष्यों में करुणाबुद्धि तथा इष्ट विषयों की आसक्ति से राग और अनिष्ट विषयों की अप्रीति से द्वेष उक्त तीनों चिन्हो से मोह की पहिचान कर मोह को (संभावित भी जानकर ) तुरन्त त्याग देना चाहिए । उक्त गाथा की तात्पर्यवृत्ति मे तो आचार्य ने शुद्धामोपलब्धि में करुणा को संयमभाव से विपरीत यानी असंयमभाव तक कह दिया है । तथाहि 'शुद्धात्मोपलब्धिलक्षणपरमोपेक्षा, संयमाद्विपरीतः करुणाभावो दयापरिणामश्च अथवा व्यवहारेण करुणाया अभाव:' । वही Jaro वृ० पद्मचन्द्र शास्त्री, नई दिल्ली उक्त तथ्य होते हुए भी यदि कोई मुक्त आत्माओं में करुणा के अस्तित्व को स्वीकार करता है तो हम उसके पक्षपाती नहीं और ना ही हम उसे मूल आगम-रक्षक मानने को तैयार हैं । जैसा कि हम पहिले से लिखते रहे हैं कि हम मूल आगम को प्रमाण मानते हैं, भाषान्तरों की प्रामाणिकता में हमारी सहमति नहीं, कुछ भाषान्तर सिद्धान्तघातक भी हो सकते हैं; और कुछ जनसाधारण की समझ से बाहर भो । गत दिनों किसी ने हमारा ध्यान एक पोस्टर की ओर खींचा, जिसे पढ़कर हम अवाक् रह गए । पोस्टर में प्रवचन का विषय छारा था- 'करुणा आत्मा और परमाहमा का भाव है ।' जब हमने छानबीन की तो पता चला कि उक्त शीर्षक का आधार एक श्लोक का भाषारूपान्तर है, जिसने पोस्टर छाने वालों को भरमा दिया। पाठकों की जानकारी के लिए हम उसे यथावत् दे रहे हैं। प्रसंगमुक्त जीव का है। वहां कहा गया है 'जानत पश्यतश्चोत्वं जगतः पुनः । तस्यबन्ध प्रसंगीन, सर्वास्ररिक्षयात् ॥' भाषान्तरकार का अर्थ - 'मुक्तजीव मुक्त होने के बाद भी करा पूर्वक जगत को जानते तथा देखते हैं, पर इससे उनके पंध का प्रसग नहीं आता, क्योंकि उनके सर्व प्रकार काप से क्षय हो चुकता है ।' के विचारना यह है कि क्या उक्त अर्थ पूर्ववर्ती आचार्य कुन्दकुन्द और समस्त जैन आगम की मान्यता में ठीक है ? जबकि कुन्दकुन्द करुगा को मोह का चिन्ह मान रहे हैं और समस्त जैन आगम मुक्त आत्मा में कर्मों का सर्वथा अभाव मान रहे है । श्लोक में मुक्ति में सर्व आस्रव क्षय होने का स्पष्ट निर्देश होने से यह भी सिद्ध होता है कि करुणा को मोह का चिन्ह मानने पर 'करुणापूर्वक' अर्थ की संगति नहीं बैठती, क्योंकि जहां करुणा है वहां आस्रव और बम्ध दोनों ही अवश्यंभावी हैं । फलतः --- Page #100 -------------------------------------------------------------------------- ________________ उक्त भाषान्तर से तो ऐसा प्रतिभासित होता है जैसे प्रस्तुत प्रसंग में यह भी ध्यान रखना चाहिए कि भाषान्तरकार की दृष्टि मल जैन सिद्धान्त को ओझन कर जैसे व्यवहार में आहार, भय, मैथुन, परिग्रह संज्ञाओं को मरल अन्वय और शब्दार्थ पर ही केन्द्रित हो गई हो। वभाविक-कर्मोदयजन्य होते हुए भी जीव की स्वाभाविक स्मरण रहे-आगम का अर्थ करने की कुछ मीमाएं हैं। संज्ञाएं कह दिया गया है अथवा जैसे गति, इन्द्रिय, काय, जहाँ मुल सिद्धान्त का व्या घात होता हो, वहाँ दविड. योग आदि मार्गणाओं को जीव की कह दिया गया हैप्राणायाम करना पडता है और शब्द, अर्थ तथा फलितार्थ कोई भी संसारी जीव क्यों न हो सब में ये सब होना में पर्वापर मोनना पड़ता है तथा रोमा अन्वयार्थ करना स्वाभाविक हैं। और ये सब कथनी संसारी जीवों के लिए होता है जो सिद्धान्त का घात न करे। जबकि ऊपर के और संसारियों में है। वैसे ही आगम में करुणा को वभाभाषान्तर मे ममम्न जैन-मिद्धान्त का ही घात हो गया बिक होते हा भी कही-कहीं जीव का स्वभाव कह दिया है। यदि अर्जनों-मान्य वर की भांति जैन-मान्य पर. गया है। पर, यह सब मंमारी जीवों तक ही सीमित मात्मा में भी करुणा की कल्पना की गई तो हम में मन्देह व्यवहार है। वास्तव में तो करुणा मोहनीय के क्षयोपनहीं कि कालान्तर जैन-परमात्मा में भी जगकतत्व, शम मे और अकरुणा मोहगीय के उदय से होती है। यह कर्मफलदातृत्व और मुक्ति मे पनरावनिन्त्र के चक्कर में सब अपेक्षा-भाव के कारण हैं, जब कि शुद्ध-स्वभावी मक्त पड जागि । अन्यों की भांति वे भी करुणा-वश मब कुछ आत्माओं में अपेक्षा का सर्वथा अभाव है। यह भी स्मरण करने लगेंगे, आदि। रहे कि मूल-स्वभाव सदा पर-निरपेक्ष और सदाकालभावी लोकवानिक में शंका उठाई है कि मुक्त आत्मा करुणा होता है और विभाव पर-सापेक्ष और सीमित काल भावी पूर्वक जानते-देखते हैं तो उनके पुनः बन्ध होगा? आचार्य होता है और संमारी जीवों में ही होता है। कहते हैं कि उनके मर्व प्रास्रवों के श्रय होने से पुन: बन्ध ये हम इमलिए लिख रहे हैं कि पाठक कहीं धबला नहीं होता। यह भी सष्टीकरण देते हैं कि वीतराग में १३-५-५ पृष्ठ ३६२ पर आए व्याख्यान 'करुणाएजीव. स्नेह की पर्याय रूप करुणा की असंभावना है...। तथाहि- सहावस्स' से ऐसा न मान लें कि करुणा आत्मा और पर 'पुनः प्रवर्तनप्रसंगो जानतः पश्यतश्च कामप्यादिति मात्मा का स्वभाव है। यह उक्त कथन तो संमारी जीवों चेन्न, सर्वास्रव परिक्षयात । वीतरागे स्नेहपर्यायस्यकारुण्या- की मार्गणाओं के व्याख्यान प्रसंग में है और संसारी-जीवों संभवाद्भक्ति स्पृहादिवत् ।'-त० श्लो० वा० १०४. के लिए ही है मुक्तात्मा के लिए नही। ___इसी प्रसंग को राजवातिक में ऐसे उठाया गया है- प्रश्न होता है कि क्या जीव और आत्मा की परि'स्यादेतत्-व्यसनार्णवे निमग्नं जगदशेषं जानतः पश्यतश्च भाषा जुदा-जुदा है ? हां, वास्तव में जीव शब्द व्याप्य कारुण्यमुत्पद्यते ततश्च बन्ध इति; तन्न; कि कारणम? (मात्र संसारियों तक सीमित) है और आत्मा शब्द व्यापक सवस्रिवपरिक्षयात् । भक्ति स्नेहकृपा स्पृहादीनां रागवि. है। जाव-श पानी व है। जीव-शब्द कर्म-सत्ता की अपेक्षा मात्र तक सीमित है। कल्पत्वाद्वीतरागे न ते सन्ति इति ।' राज० वा० १०४५ जब तक जीवन है, आयु हैं, प्राण हैं तब तक इसे जीव यदि शंकाकार को ऐसी सम्भावना हो कि व्यसन कहने का व्यवहार है, पर मूल में तो वह आत्मा ही है । समुद्र में डबे समस्त जगत को जानते देखते हुए मुक्त जीवों जब इसका संसार से (आयु, प्राण, जीवन से) छुटकारा को करुणा उत्पन्न होगी और उससे उसे बध होगा? हो जाता है इसे शुद्वात्मा या परमात्मा' कहा जाता है। आचार्य समाधान करते हैं कि ऐसी बात नहीं है। (उनके न कही भी इसे परमात्मा के बजाय 'परम जीव' नाम से करुणा होती है और ना ही बंध होता है), क्योकि उनके संबोधित नहीं किया गया। यदि कही कर भी दिया गया सब आस्रवों का क्षय हो गया है, और भक्ति, स्नेह, कपा, हो तो उसे व्यवहार कथन ही समझना चाहिए और ऐमा स्पृहर आदि सब राग रूप विकल्प हैं और ये सभी विकल्प सब अभ्यास दशा से ही हुआ है। कहा भी है -'आउ वीतरागी में नहीं हैं। पमाणं जीविदं णाम' अर्थात् आयु के प्रमाण का नाम Page #101 -------------------------------------------------------------------------- ________________ मुक्ति में करुणा एक विसंगति जीवित है। जहाँ तक आयुक्म है वहाँ तक जीव, जीवन उक्त सभी तथ्यो के प्रकाश में हमें सोचना होगा कि या जीवित निर्देश है। हम 'मूल' की सुरक्षा को बढ़ावा दें या भाषान्तरों के जीव और आत्मा के स्वरूप के सम्बन्ध में धवला प्रचार का सम्मान करें। हमने तो ऐसा देखा है कि कहींपुस्तक १४, ५, ६, १६ पृ०१३ में जो प्रसंग शंका-समा- कही अर्थकर्ता अपने भाषान्तर में पद के पद विना अर्थ के धान द्वारा उठाया है वह दाटव्य है। वहां जीवत्व को ही छोड़ देते हैं, इससे पाठक वास्तविकता से अजान औदयिकभाव तक कह दिया है। तथाहि रह जाते है जैसे हमने एक गाथा का अर्थ इस भांति देखा 'सिद्धा ण जीवा जीविदपुवा इदि। सिद्धाणं पि ह विदपवा हिसिला है जो अधूरा हैजीवत्तं किण्ण इच्छिज्जदे ? ण, उवयारस्स सच्चत्ताभावा. 'गोम्मर सगहसुत्तं गोम्मटदेवेण गोम्मटं रइयं । दो। सिद्धेस पाणाभावण्णहाणव वत्तीवो जीवत्तं ण पारि कम्माण णिज्जरलैं तच्चठ्ठवधारणळंच ।। णामियं किंतु कम्मविवागज......॥ तत्तो जीवभावो ओव- जो यह गोम्मटसार ग्रथ का सग्रहरूप सूत्र है वह श्री इओ त्ति सिद्धं ।' वर्धमान नामा तीथंकर देव ने नयप्रमाण के गोचर कहा है और वह ज्ञानावरणादि कर्मों की निर्जरा के लिए तथा -सिद्ध जीव नही है, जीवित पूर्व है। तत्त्वो के स्वरूप का निश्चय होने के लिए जानना शंका-सिद्धो के भी जीवत्व स्वीकार क्यो नही चाहिए।' किया जाता? उक्त अर्थ में 'गोम्मट देवेण गोम्मट रदय' का मूल समाधान-नही, सिद्धों में जीवत्व उपचार से (कहा) अर्थ छोड़कर, गाथा में अनिदिष्ट शब्दो का अर्थ 'श्री वधहै (और) उपचार को सत्य मानना ठीक नहीं। सिद्धों मे मान नामा तीर्थकर देव ने नय प्रमाण गोचर कहा है' प्राणो का अभाव अन्यथा बन नही सकता। इसलिए जोड़ दिया है। जीवत्व पारिणामिक भाव (स्वभाव-भाव) नही है किन्तु इस प्रकार की विसतिया इकट्ठी न हो और मूल कर्मोदय जन्य है । इसलिए 'जीव' (ये) भाव औद- आगम सुराक्षत रह, इस दृष्टि से हम यद्वा-तद्वारूप भाषायिक है, ऐसा सिद्ध है। न्तरा क अनुकूल नहा । हम ता एस सिद्धान्तज्ञा क निर्माण धवलाकार ने सिद्धान्त को सुरक्षित रखने की दृष्टि के पक्ष म ह जा भविष्य म मूल-आगमो का सुरक्षित रखसे इस बात को भी खोला है कि तत्त्वार्थ सूत्र मे जिस कर मूल मर्थ का सही प्रतिपादन कर सके। उक्त प्रसग जीवत्व को पारिणामिक भाव कहा है, वह (सांसारिक) में ऊपर आए 'जानत. पश्यतश्चोध्वं' श्लाक का आगमानुप्राणो पर आधारित न होकर आत्मा के चेतना गुण को कूल अर्थ भी सोचिए ! हम तो इतना ही प्रार्थना करग लक्ष्य कर ही कहा है। भाव ऐसा है उनकी दृष्टि व्यवहार किप्ररूपित जीव पर न होकर व्यापक शब्द आत्मा के चेतन __ 'देवदेवस्य यश्चक्र , तस्य चक्रस्य या प्रभा। गुण पर ही रही है । तथाहि तयाच्छादित सर्वांगं, विद्वासानन्तु मागमम् ॥' 'तच्चत्थे जं जीवभावस्स पारिणामियत्तं परविदतं पाण तीर्थकर समूह को ज्ञानप्रभा से जिसका सर्वाङ्ग धारणतं पड़ध ण परुविद किंतु चेवणगुणमवविय तत्य आच्छादित है, ऐस आगम की विद्वद्गण हत्या न करे। पावणा कदा। धव० पु० १४।५।६।१६ पृ० १३ Page #102 -------------------------------------------------------------------------- ________________ पतन का कारण : परिग्रह D श्री पप्रचन्द्र शास्त्रो, नई दिल्ली आज विश्व संत्रस्त है, चारों ओर आपा-धामी, मारा- उन अनर्थों को अपरिग्रह धर्म के प्रचार से ही दूर किया मारी की भरमार है। भले ही शाकाहारी-पशु मिल-बाँट जा सकता है। लोगो की विस्तार-लालसा जैसे जैसे न्यून कर खा लें यह संभव है। पर, यह कदापि सभव नहीं कि होतो जायगी वैसे वैसे उन अंशों में सुख-शान्ति होती अभक्ष्य-भक्षी मानवरूपी र दानव मार-धाड़ और छीना- जायगी। क्या कहें ? आज महान परिग्रही व्यसनसेवी व्यक्ति झपटी से विराम ले सके, जबकि साधारण और शाकाहारी तक अहिंसा का नारा लगाकर दूसरों को जगाने का दम्भ व्यक्ति भी परिग्रह लालसा और एक छत्र राज्य की चाह भरने में लगा है। राज-चोर भी अधिक पूजा-पाठ और में दूसरे के अस्तित्व को ही समाप्त करने की चाह मे अधिक स्वाध्याय में लीन तक देखा जाता है। पर, इससे देखे जाते हैं। आज इस विसंगति को दूर करने के लिए उसके चौर-कर्म या संचय-भाव मे शायद ही कोई कमी हिंसा, करुणा, दया जैसे पुग्यो के सवय और हिंसा, आती हो। दूसरे शब्दो में वह पराए-अश को आत्मसात् निर्दयता तथा क्रूरता जैसे पापो के परिहार पर जोर करने के कारण पर-दुखदायी होने से महान हिंसक भी है। दिया जा रहा है, चारो और मासाहारी और शाकाहारियो नीतिकारो ने कहा है-जैसे शुद्ध जल से सागर नहीं भरते द्वारा इनके प्रचार की धम मची है। किसी अश मे मासा- वैसे कोई एक व्यक्ति भी शुद्ध-न्याय-नीति से उपाजित धन रिक-निविघ्न जीवन के लिए यह शुभ सकेत है। हम से धनी नहीं हो सकता। अति परिग्रही बनने के लिए ही चाहते है लोगो का ध्यान और भी गहराई पर जाए अनेक पाप-पुंजों के साधन अपनाने पड़ते हैं। फिर भी खेद और वे इस अनर्थ ताण्डव की जड़ को पकड़े। जब तक है कि यह मानव अपने में समाहित दानवपन छोड़ने के इसके मूल पर प्रहार नहीं किया जाता,आत्म-तोष और लिए मूल-अपरिग्रह धर्म को नहीं अपनाता । अपितु अपनी पर-परिग्रह-सचय की मर्यादा नही बाधी जाती, परिग्रह- दानवता को छुपाने के लिए भ. महावीर की अहिंसा निर्वृत्ति को लक्ष्य नहीं बनाया जाता तब तक चाहे जैस आदि जैसे बचकाने नारे लगाकर अन्य लोगो को भरमाता भी, जितना भी शोर मचाएं-सुख-शान्ति सर्वथा ही है और स्वयं मे महान हिंसक बना रहता है, झूठ बोलता असभव है। है, चोरी आदि दृष्कर्म करता रहता है। यहा तक कि कई ___हम कहते रहे है कि सब पापो का मूल परिग्रह है। लोग बाह्य छोड़ने का दिखावा कर परायो के उपकार के जैन-तीर्थकरो ने दिगम्बर-निष्परिग्रही होकर ही सर्व बहाने धन के सग्रह मे लगे तक देखे जाते हैं। हालांकि पापों के परिहार-रूप धर्म का मार्ग प्रशस्त किया। हम उद्देश्य की पूर्ति होना, न होना भवितव्याधीन है। हाँ ऐसे यह मानने को कदापि तैयार नही कि परिग्रह के होते हुए लोग परोपकार के बहाने प्रत्यक्ष मे अपना अपकार अवश्य अन्य कोई व्रत अणु या महाव्रत रूप में पूर्णता को प्राप्त कर लेते हैं। वे स्वयं भगवद् भजन से वंचित रह जाते है। हो सकता हो। यदि ऐसा सभव होता तो वस्त्र या राग- कहा भी हैदेषरूप परिग्रह की बढ़वारी मे भी अहिंसा, सत्य आदि 'माए हरिभजन को ओटन लगेकपास ।' महाव्रतपूर्ण फलित हो जाते और सवस्त्र श्रावक भी महाव्रती वर्षों पहिले एक चर्चा के मध्य हमने काशी में चन्दा बन सकते थे-परिग्रह में भी मुक्त हो जाती; पर, ऐसा इकट्ठा करने वाले, भभूतधारी एक गैरक संन्यासी से नही है। इसी भांति आज दुनियां मे जो अनर्थ हैं और जो कहा-महाशय, जब मापने गैरुकवाना धारण कर भगवद राहिले होते रहे है वे सब परिग्रह-भावना के ही फल है। भजन काय बना लिया, तबमापको पराई चिन्ता का Page #103 -------------------------------------------------------------------------- ________________ २० पतन का कारण : परिग्रह प्रश्न ही कहाँ रह गया? जो आप घर-घर, दुकान-दुकान नासी । मूड़ मुड़ाय भए संन्यासी' के चक्कर में संन्यासी धमकर इस गरुक थेली में पैसा इकट्ठा कर रहे हैं। हर हैं।' हमने सोचा कि आज न जाने कितने संन्यासी बोले-हम पैसा छूते नहीं-भक्तों को ही दे देते है वे इस श्रेणी के होंगे ? ही धर्मशाला का निर्माण कार्य कराते हैं-इस काम से हमने पढ़ा है-राजकुमार सिद्धार्थ (गौतम बुद्ध) को लोगों को लाभ होगा। हमने कहा-आपने सन्यास भग- वैराग्य तब हुआ जब उन्होने अर्थी (मुर्दे के जनाजे) को वद् भजन को लिया है या धर्मशाला निर्माण कराने को? देखकर 'अर्थ' (पदार्थ) स्वभाव का चिन्तवन किया। पर, बोले-हम कृतघ्न तो नही, जो प्राण-दान देने वालो का आज का वातावरण बदला हुआ है। अब तो लोग अर्थी प्रत्युपकार न करें। लोग अन्नदान देकर हमारे प्राणो की (धनिक) को देखकर अर्थ (धन) का चितवन करते हैं रक्षा करते है और शास्त्रों मे अन्न को प्राण कहा गया है। और इसी भाव मे वे धनिको को प्रथम दर्जा देते है । जैसा यदि लोग हमें अन्न न दे तो हम मर जाएगे और तब- कि नही होना चाहिए। हमारे जैनाचार्यों ने परिग्रह और जिसके लिए हमने संन्यास ग्रहण किया है वह भगवद् परिग्रही दोनो से दूर रहने का सदेश दिया है। हमारे यहां भजन ऐसे ही रखा रह जायगा। हमने कहा- यदि प्राण जब परिग्रह त्याग का प्रसग आया, तब आचार्यों ने स्पष्ट रक्षा ही मुख्य है तो वह तो पाप गृहस्थी में ही भली- कहा कि तिल-तुपमात्र परिग्रह भी ससार का बीज हैभांति कर रहे होगे; सन्यासी क्यो बने ? वे बोले-हमारा अत. बही कल्याण कर सकेगा जो सब कुछ (अन्तरंग. जीवन चरित्र आपको मालूम नहीं है, इसी लिए आप बहिरंग) परिग्रह छोड़कर परम दिगम्बर बन जायगा और ऐसी बाते कर रहे है। हम तो 'नारि मुई घर संपति वही कर्म-बन्धन को काटने में समर्थ हो सकेगा। . पता. (पृ० १५ का शेषाश) मध्यम प्रवेयक सख्या कही, दोहा-सठ पटल जुगन कहे, सकल सुखनि की खानि । पटल तीन तहं सो है सही। पुण्य जोग तै पाइए, उत्तम करनी जानि ॥१४३ विमान एक सो सात विराज, ऊपर सोलह स्वर्ग ते, मोक्ष स्थान पर्यन्त । देवि निसग विजित राज ॥१३८ ऊचौ राजु एक सब, इह विधि गनि जै सत ॥१४४ ऊपर अवेयक सो है जहां, चौपाई-अब सुनिए देविन आयु जु सही, पटल तीन पुनि कही तह जानि । पल्ल पांच सोधर्म जु कही। विमान एकानवै तह जु वखान । सात पल्ल ईशान बताई, दो कर देह कही तहं जान ॥१३९ दो दो बढ़स बार है जाई ॥१४५ सागर तीस आयु अधिकाई, सात सात पुनि ऊपर कहीज, सोलहे पचपन पल्ल जु लही जै। अवर भेद को कहै बढ़ाई। यह सक्षेप समुच्चय कही, नव निमतर नौ जु विमान, अन्य भेद ग्रन्थनि में सही ॥१४६ एक पटल तह कहऊ प्रमाण ॥१४० दोहा-कर्म विपाक सब विधि कही, सुनी जु श्रेणिक भूप । मर तहं डेढ़ शरीर सुख देइ, मिथ्या धर्म जु छोड़िकं, धरो धर्म दृढ़ रूप ॥१४७ सागर इकतीस आयु तहं लेइ । वीतराग जिनदेव जू, सकल कीर्ति मुनि धीर । पपराग मय छबि तह लीन, पडित शिरोमणिदास को, करह कर्म सब दूरि॥१४८ पंचपंचोत्तरे कहऊ प्रवीन ॥१४१ इति श्री धर्मसार प्रथे भट्टारक श्री सकल कीति उपपटल एक तह छबि अधिकाई, देशात पंडित शिरोमणिदास विरचिते कर्मविपाक कथन पंच विमान कहे समुझाई। नाम चतुर्ष संधि समाप्तः। सागर आयु तहां तेतीस, ६८, विश्वास रोग, विश्वास नर, कर हक देह कही जगदीश ॥१४२ शाहदरा दिल्ली-११.०० Page #104 -------------------------------------------------------------------------- ________________ जरा सोचिए ! १. धार्मिक शिक्षा के कम्प्यूटर यह कम्प्यूटर युग है और विश्व तथा अपने देश भारत ने इस दिशा में पर्याप्त प्रगति की है। जो कार्य पहिले महीनो और सालो मे पूरा किया जाता था, वह अब कम्प्यूटरो द्वारा त्वरित सपन्न कर लिया जाता है । इस प्रक्रिया मे समय और द्रव्य दोन की बचत है । यद्यपि थोड़ी हानि भी हे और वह है-क्लर्कों आदि की छँटनी के आसार की, उनके बेकार हो जाने की सभावनाओ की पर, सरकार बड़ी समझदार है । जब वह सरकार बनी है, तो वह प्रजा के हितो के मार्ग भी खोजेगी । यह उसका कार्य और फर्ज है हमे इससे क्या लेना-देना । अस्तु ।' हम तो इस समय धर्म-क्षेत्र मे बंठ है और धर्म की बात कर रहे है | स्मरण होगा कि पहिले समय मे जीवन का तिहाई अश व्यय कर वह भी बड़े परिश्रम से शिक्षा ग्रहण की जाती थी और फिर भी निष्णात ज्ञान में सदर जाता या कार वप-दो व ट्रॉन-सन्टर चक्कर लगाकर उस सन्दह का दूर किया जाता था तब कहो सतोष हाता था। आज तक के सभी निष्णात विद्वान् बुजुर्गों का इसी मार्ग से गुजरना पड़ा है। ऐसी स्थिति बार आजको स्थिति का मुकाबला करन से अब तो एसा स्पष्ट होने लगा है कि वास्तव म आज धम-क्षत्र में शिक्षा के साधन में कम्प्यूटर का निमारा हो चुका है। कार्य दीर्घकाल में सम्पन्न होता था वह काय अब साप्ताहिक या पाक्षिक शिक्षण शिविरा द्वारा अल्प समय में पूरा होने लगा है । नेताओं के शब्दा म इस चमत्कार तक कह दिया जाय ता भी सन्देह नहीं ! ठाक भी है वह नता हो क्या जो कोई चमत्कार न कर । अस्तु, - हमने ऐसे कम्प्यूटराइज्ड कई शिक्षण शिविरो को देखा है और आप उद्घाटन विसर्जन पर्यन्त देखा हूँ व्यवस्थापका शिक्षका ओर शिक्षाथियों को भी देखा हूँ हमने किसा शिक्षण शिविर के उद्घाटन में नेताओं का स्टेज पर विराजमान देखा, उन्हें मालाएं पहनते देखा और 1 'परस्पर प्रशंसन्ति' का अनुसरण करते हुए देखा। यह सब हमारे मन्तव्य के अनुकूल न हो ऐसी बात भी नही । परन्तु हमे दुख तब होता है जब किसी बारात में बर को पीछे फेक स्वयं बाराती पहिले से मालाएँ पहिनने लग जायें और यश लूटने लग जायें एक शिविर उद्घाटन में हमने देखा कि शिविर में निमन्त्रित शिक्षक विद्वान् नीचे जन सधारण मे मौन से नीचा मुख किए बैठे थे मानो वे अपनी अब जना के दर्द म हो और आयोजक तथा नेता ऊँची स्टेज पर विराजमान थे । हमारा शिर शर्म से नीचे झुक गया । एक शिक्षक ने हमें इसका इशारा भी किया । इससे ऐसा न समझे कि हम किसी के सम्मान के पक्षपाती नहीं हम सम्मान देना चाहते है पर लक्ष्मी से पहिले सरस्वती को । और ऐसा करना दखना हमारी धमनियों और रक्त मे समाया हुआ है । हम तब भी पीड़ा होती है जब कोई किसी विद्वान् व्यक्ति कभी अमु का धन या धन का सम्मान न कर; उसका खुशामद करें । यतः हमारी दृष्टि में सन्मान और खुशामद दानां क्रमश उठे और गिरे, दो मिन स्तर है । हाँ, ता कम्प्यूटर की बात है। हम तो ऐसे शिक्षणसत्रों का कम्प्यूटर और कम्प्यूटर तैयार करने की फैक्टरी ही कहूँगे, जिनस अल्पकाल में ही शिक्षक रूपी- कम्प्यूटर नए कम्प्यूटर का तैयार करत हा और तैयार नय कम्प्यूटर अन्य नए कम्प्यूटरो का इनसे एक साथ यह भो होगा कि हम स्वयं आचार-विचार पारूकर बच्चा का कोई आदर्श उपस्थित करने के कष्ट से छुटकारा भी मिला रहेगा कम्प्यूटर, कम्प्यूटरो का निर्माण सस्ते मे ही करते रहुग । अस्तु; इस विषय में हम ता बाद में लिखेगे । पहिले आप ही सोचिए कि यह उपाय धर्म-शिक्षा म कितना कारगर रहूँगा कही ऐसा ता नहीं कि जैसे सरकारी कम्प्यूटर कभी-कभी प्रायः गलत बिजली बिल बनाते है, वैसे अक्षकचरे धर्म-कम्प्यूटर जैन धर्म की गलत तस्वीर खींच धर्म को विकृत करने में सहायी सिद्ध हो । सोचिए Page #105 -------------------------------------------------------------------------- ________________ इससे ऐसा भी न समझें कि हम सत्रों के प्रतिकन हैं, छाग डाल दे, तो ऐसी घटनाओं के बटन को आप उस अपित हम तो नाहते हैं-पत्र लम्बे चलें। जिन्हें ममय हो व्यक्ति का दुर्भाग्य कहकर घटना के सूत्रधार चोर, डाक उनके रंगलर चलें। हमें खशी होगी। यदि कुछ प्रशिक्षणार्थी सम्बन्धित राज्याधिकारियों को कोसेंगे तथा जिसके साथ लम्ने मपय तक, नियमित 'वीर सेवा मन्दिर' का सहयोग रोमी घटनाएं घटी हों उसके प्रति सहानुभूति प्रकट करेंगे। लेने की दिशा में मोचें। वीर मेवा मन्दिर उनके शिक्षण या कों? इसीलिए न कि वह आपका हमसफर है-आप की मपचिन Bातम्था करेगा सा हमारा ति गम है। भी सी श्रेणी के जिसमें रखकर वह लोगों में जीवित कपणा दम मंबंध में मोचें और 'महासचिव' में संपर्क कर है। आप मौनते कि कल को हमारे साथ भी मीही मार्ग प्रशस्त करें। घटना हो सकती है। हम सब एक ही थैली के चट्टे-बटटे एक बान और समाज में चारों ओर जोर है कि विद्वान ही नो। यदि नहीं पा हमारे साथ घट गया तब हमें मटीं मिलते। इसलिए भी शाम पाने के लिए शिक्षक कौन लेगा? कोई मान्वना भी न देगा और न कोई वैयार किा जा रहें । बडी खगी की बात है कि काम मागे महायता ही करेगा। बम, आप उसके हमदर्द हो आगे बहै और सभी नगर कफ न कफ धारणिया नलनी जाते है। रकों में अनग विगणों के अध्यापकों को णिक्षित कर अब जरा मंबंधित व्यक्ति की विशेषताओं का विश्लेषण जा अतिरिक्त अलाराणि देकर काम नलाया जाने की सजा का THE AATA गों स्कीम ठीक हो। पर टप गह मोनने कि कर्णोपान में प्रामाणिक और मदाचारी भी है फिर भी उसके छापा हो जाय कि हममे किन्हीं म्कलों में जमे हा धार्मिक पद गया. चोरी हो गई । इम में आप आश्चर्य न करें क्योंकि निणात विद्वानों को हानि नठानी पड जाय । क्योंकि यह अयिक मगवादी आदि के माथ ऐसी घटनाओं का कोई अर्थ-यग है. हर व्यक्ति पैमा जगाटा चाहता है. और देने विरोध नहीं--अहिंमक मन्यवादी, प्रामाणिक और मदा. वाला भी पैमा बनाना नाहना है। रोये ों महगे विद्वानों नारी हाक्तित्व में पन हो सका है और धन होने पर को कौन रखेगा? जन उसे मम्ते में शिक्षक मिलने हों। चोरी भी हो सकती है. डाका भी पड़ सकता है और छापा इस दिशा में यदि प्रवन्धकों की दरि मही रहे और वे भी पद सकता है। हां यदि उसके पाम धन (परिग्रह) न विद्वानों को जो जहां जमे रने दें और पहिने पूर्ण निरुणान न पण निरुणान होना तो ऐमी नौवन की संभावना मे अवश्य बचा जा सोही विद्वानों को स्थान दें. और पैमा का लोच न करें तभी ठीक मकता था। और इसी धन आदि पर-वस्तु को हम परिग्रह होगा। अपथा, अर्थ की दष्टि में संक्रवित लोग, पंमा के नाम से संबोधित कर रहे हैं। जो समस्त संकटों का र बचाने के ख्याल में, लगे हरा विद्वाना तक का जवाब दकर कारण बनता है। यह नारा और वलन्द न कर दें कि-विद्वान मिलते ही शायद आप हमारी दष्टि से सहमत हो सकें, इसीलिए नहीं हैं। आगे क्या होगा इमे तो हम नहीं जानते, समय हम उसका संकेत दे रहे हैं। क्या आपने कभी सोचा है कि ही बतायेगा कि विद्वानों को ठोकरें खानी पडेगी या उनका कोई भी व्यक्ति हिमा आदि पाप करने को कब और क्यों सम्मान रहेगा या धर्म की पहाई ठीक चलेगी भी या मजबूर होता है ? वह हिंसा आदि पाप तभी करता है जब नहीं ? हो सकता है कही ये धर्म-वृद्धि के सस्ते बहाने, धर्म उसमें मिथ्यात्व, क्रोध-मान माया, लोभ की मात्रा हो और ह्रास का ही श्रीगणेश न हो! जरा सोचिए। इनकी मात्रा तभी होगी जब उसमें राग-द्वेष हों और राग२. अपरिग्रह ही क्यों ? द्वेष के कारण ही उसमें हास्य, रति-अरति, शोक भय, ऊंचे स्वर में अहिंसा का जयकारा देने वाले तथा जुगुप्सा और वेद भी होंगे। इन सभी बातों को जैन-दर्शन अपनी सत्यवादिता, ईमानदारी और सुशीलपने का दावा में अन्तरंग-परिग्रह कहा गया है और इन्हीं के कारण करने वाले किसी व्यक्ति के घर चोरी हो जाय, डाका पड़ बहिरंग-परिग्रह की तर-तम मात्रा भी होती है। अत: जाय, या कोई आयकर अधिकारी व विक्रीकर अधिकारी सब पापों का मूल-परिग्रह है ऐसा मानना चाहिए और पंच Page #106 -------------------------------------------------------------------------- ________________ 14, at 12; fr. 1 परमेष्ठी का पद भी परिग्रह के बिना अर्थात् अपरिग्रह में ही होता है। कोई भी परिग्रही, परमेष्ठी पद में नहीं पहुंचा और कोई भी परिग्रही अन्य चार पापों का त्याग भी पूर्ण न कर सका। फिर भी आश्चर्य है कि लोग अहिंसा को ही बढ़ावा क्यों दे रहे हैं और अहिंसा के मूल अरिग्रह की उपेक्षा कर रहे हैं ? आए दिन घटनाएं घट रही हैं। एक जैनी ने किमी परिवार के आठ सदस्यों को मौत के घाट उतार दिया। अमुक किसी अन्य ने मंदिर से नामों की चोरी कर भी और किसी ने किमी राजकीय कार्यालय में जाकर नहीं के स्टाफ के साथ अभद्र व्यवहार किया। इन सभी काण्डों की जट में हिमादि की भावनाएँ प्रमुख नहीं थीं अपितु ये सब घटनाएँ को लेकर घटित हुईं। परिग्रह को लालसा ने हत्या कराई, परिग्रह की लालसा ने चोरी कराई और तीव्र राग, तीव्ररुषाय व मुरूपी परिषद ने ही अभद्र व्यवहार की प्रेरणा दी। जैन आगमों में जहां जो और जितना भी उपदेश है, सभी मोहरूपी परियत के स्थान पर विशेष बल देने के प्रसंग में है और मोहनीय कर्म आठों कर्मों का राजा है । इसी कर्म के उदय से पार होते हैं। मोह को हम भी करते हैं और परिवर है। हम मोह की महिमा विचित्र है। यदि किसी का भाई, भतीजा या बेटा कुव्यमनी है और वह संकट में है तो मोह ही संरक्षकों को उसकी बुराइयों को छिपाकर उसकी सहायता और उपचार में लाखों-लाखों द्रव्य व्यय करने को मजबूर करता है कही-कहीं ऐसी कृध्यमनी पेशकारी और अबहेलना करने वाली सभ्नान को भी माता-पिता आदि छाती से लगाकर रखते हैं और स्वयं मोन है। जब कि धार्मिक जगन की दृष्टि में वे सभी त्याज्य होते हैं। भला, पापी में अपनापन कैसे न्याय हो सकता है ? तत्वज्ञ को दृष्टि में जो बुरा है वह बुरा ही है- हेय है। यदि मानव ऐसा दृढ हो और ऐसे में मोह-परिग्रह को जड-मूल से काटने का यत्न करे तो वह शेष चारों पापों का सहज ही परिहार कर सकता है पर दिक्कत यह है कि इस मोही ने परिग्रह की चाह में अहिंसा आदि को संग्रह का मार्ग बना रखा है। आज अहिंसा का नारा देने वाला कहीं अधिक परिग्रही भी हो सकता है - अपेक्षाकृत जन साधारण के आज अधिक परिवती ( यदि वह मोही है तो) दवा के नाम पर अधिक दानी बनकर लोगों में यह लड़ने और दूसरों पर अपनी थोथी निःस्वार्थता की धाक जमाने की कोशिश करे तो भी आश्चर्य नहीं। ऐसा मनुष्य अवसर बिना चुके अनकल समय आने पर अपने धन और यश के भण्डार भरता रहे तो भी कोई बड़ी बात नहीं । दानी जो पहिया के मिस किमी अनुष्ठान वा किसी निर्माण आदि के निमित माहवारों का दान देने हैं। क्या वास्तव में वे सभी स्वद्रव्य का सही मायनों में उत्म करते हैं? क्या सभी दान की परिभाषा जानते हैं ? या सभी को धर्म से ज्यादा लगाव होता है ? नहीं। हां, कुछ लोग जानने वाले होते होंगे। अधिकांश में कोई देखादेखी कोई लिहाज या शर्मा-शर्मी ही देने होंगे। उनमें भी अधिकांश यश के लिए पैसा देने हों या कोई अकाम-निर्जरा जैसी करते हों तब भी आश्चर्य नहीं। ये सभी चिह्न परियह के हैं और इनसे पर वस्तु के प्रति अपनत्व ही पुष्ट होता है छूटता कुछ नहीं और जब तक पर से छुटकारा नहीं होता तब तक जिन या जैन नही बना जाता। फलत: जैन बनने के लिए हमें मन-वचन काया मे सही मायनों में परिग्रह का त्याग करना होगा। जब तक ऐसा नहीं होता तब तक कोई भी व्रत नहीं पल सकता और ना ही जैन सुरक्षित रह सकता है यह निश्चय समझिए । ३. कुन्दकुन्द भारती एक प्रभ्युदय : जैन मुनि और जैन धारकों में आचार्य कुन्दकुन्द का नाम बडी आदर-भक्ति से लिया जाता है और शास्त्र प्रवचन से पूर्व सभी उन्हें मंगल रूप में स्मरण करते हैं। आज दिगम्बरों में धर्म-विषयक जो और जितना ज्ञान, आचार विचार है वह सब भी कुन्दकुन्द आम्नाय की देन कहा जाता है। शास्त्र पढ़ने से पूर्व सभी लोग 'मंगलं कुन्दकुन्दाय' तथा 'कुन्दकुन्वाम्नायी विरचित' आदि बोलते हैं। आज भी कुन्दकुन्दाचार्यकृत शास्त्रों के अपूर्व भण्डार हैं केवल उन्हें पढ़ने और तदनुरूप आचरण करने की आवश्यकता है; बिना इनके लोग भटक रहे हैं। हम आशा करें कि कुन्दकुन्द भारती इन प्रसंगों की भटकन को दूर करेगी। ך Page #107 -------------------------------------------------------------------------- ________________ स्मरण रहे कि कुछ वर्षों पूर्व मुनि श्री विद्यानन्द जी है। आर्थिक दृष्टि से भी हमने उन्हें कभी सन्तोष की सांस का ध्यान इस ओर गया और उन्होंने 'कुन्दकुन्द-भारती लेते नहीं देखा-समाज से सर्वथा असन्तुष्ट । जब भी नामक सस्था की योजना बनाई। उनकी भावना रूप आज मिलते अपनी व्यथा सुनाते । कहते-"हमने दिगम्बरों में दिल्ली में विशाल-भवन तैयार है और भावी कार्यक्रम के जन्म लिया, पढ़ा-लिखा और आजीविका के निमित्त श्वेलिए अर्थ-संग्रह भी मुनि श्री के लिए साधारण सी बात ताम्बरों में भी रहे। जब कही आत्म-सन्तोष न हुआ तो है। हम आश्वस्त हैं कि इस दिशा में मुनि श्री का लक्ष्य अब श्री महावीर की शरण में आ पड़े । अब हमें विश्वास पूरा होगा। हो गया कि हमने दिगम्बर रूप में जन्म लिया और दिगरही बात कुन्दकुन्द कृत पागमों के शुद्ध रूप में म्बरत्व में ही कूच करेंगे।" विधिवत् सजन, पठन-पाठन और तदनुरूप आचरण की। उपर्युक्त शब्द उनकी अन्तर्वेदना-सूचन में पर्याप्त हैं। सो मुनि श्री की लगन से ये विधियां भी सहज संपन्न अब समाज को सोचना है कि उसने पंडित जी की विद्वत्ता होंगी। ऐसा हमें विश्वास है। हाँ, हमें इतनी चिन्ता का क्या लाभ लिया और बदले में क्या दिया और ज्ञान अवश्य है कि जैनियों में विद्वान् कहाँ मिलेंगे ? पर, हम लेने मे आगे कौनसा मार्ग अपनाएगा? जरा सोचिए ! आश्वस्त भी है कि जब महाबीर भगवान के समय में कोई अन्तिम बार वे जुलाई ८६ मे, दिल्ली चिकित्सार्थ जैन न मिला तो गौतम ब्राह्मण ने जैनी दीक्षा लेकर मार्ग आए और अहिंसा मन्दिर में श्री प्रेमचन्द जैन के पास प्रशस्त किया-शर्त जैन होने की जरूरी थी और वह इस ठहरे, तब मैने उन्हे 'मुक्ति में करुणा : एक विसंगति' लेख लिए कि बिना तद्रूप श्रद्धान और आचरण के इस धर्म सुनाया, तो बड़े सन्तुष्ट हुए। उन्होंने लेख को पुनः पुनः का प्रकाश करना सर्वथा असभव था और वह बधन अब स्वयं पढ़ा और बोले-'आप बड़ी निर्भीकता से लिखते भी यथावत् स्थित है । अस्तु, जब महाराज श्री की इतनी रहते हैं; यह लेख भी सर्वथा युक्ति-संगत और अकाट्य लगन है तब वे कुन्दकुन्द के अनुरूप जैनी-नीति, जैनाचार है।' जब वे चले गये तो अगले दिन श्री प्रेमचन्द जैन ने अनुसा, जैनत्व में दढ़ कोई पात्र खोज चके होगे या उनकी मुझे एक श्लोक दिया और कहा पण्डित जी जाते जाते दे दृष्टि उधर जमी होगी ऐसा हमें विश्वास है । हम सस्था गए हैं और कह गए है कि इसे अपने लेख के अन्त में के अभ्युदय की कामना करते हैं । -सपादक प्रार्थनारूप में जोड़ दें।' हमने उसे लेख में जोड़ दिया है। फिर भी पाठको के स्मरणार्थ पुनरावृत्ति कर रहे हैं। ज्ञान-स्तम्भ को नमन : पण्डित जी द्वारा प्रदत्त यह अन्तिम और अपूर्व निधि है । दुखद-समाचार मिला, एक स्तम्भ गिरने का-श्री देव देवस्य यश्वकं तस्य चक्रस्य या प्रभा। पंडित मूलचन्द्र शास्त्री, श्री महावीर जी वाले नहीं रहे। तयाच्छादित सर्वांगं, विद्वांसो घ्नन्तु मागमम् ॥' वे विद्वत्ता के गौरव थे और सभी भांति वृद्ध। हम उन्हें उक्त अमूल्य-तथ्य प्रदानता के लिए हम स्वर्गीय आयुवद्ध, ज्ञानवृद्ध और जीपन भर अभाव-बृद्ध मानते रहे पंडितात्मा के प्रति नत-मस्तक हैं। -सपादक (पृ० १६ का मेषांश) करमि सुयण संभावउ. करवल सतावउ, शृंगार, वीर, करुण और शांत रसों का परिपाक भी हउ कब्वमउ सरोरुवि ।। (हरि० पु. १-२) उल्लेखनीय है। महाकवि ने नगर, वन, पर्वत आदि का महाकवि ने अपने पुराण को नाना पुष्प-फलो से अलकृत महत्त्वपूर्ण चित्रण किया है। इस काव्यकृति में प्रकृति के और बद्धमूल महातरु कहा है। इसी प्रसंग में कवि ने उद्दीपन रूप का सुन्दर वर्णन हुआ है। मधुमास के द्वारा आत्मविनय प्रदशित किया है। सज्जन-दुर्जन स्मरण और मदन के उद्दीप्त होने का मोहक स्वरूप प्रभावकारी बन आत्मविनय के पश्चात ही कथारम्भ होती है। पड़ा है। ___ हरिवशपुराण' की कथा का क्रम स्वयंभू आदि प्राचीन इस प्रकार महाकवि धवल विरचित 'हरिवंश पुराण' कवियों की परम्परा के अनुकूल है। ग्रंथ में स्थान-स्थान पर अपभ्रश काव्य की निरुपमेय निधि है। अलंकृत और सुन्दर भाषा में अनेक काव्यमय वर्णन उप मंगलकलश लब्ध होते हैं । पज्झटिका, अल्लिलह, सोरठा, पत्ता, विला ३९४, सर्वोदयनगर, आगरा रोड, सिनी सीमराज प्रभति छंदों का प्रयोग ग्रंथ में हुआ है। अलीगढ़-२०२००१(उ० प्र०) Page #108 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Regd. with the Registrar of Newspaper at R. No. 10591/62 वीर-सेवा-मन्दिर के उपयोगी प्रकाशन । समीचीन धर्मशास्त्र : स्वामी समन्तभद्र का गृहस्थाचार विषयक प्रत्युत्तम प्राचीन ग्रन्थ, मुख्तार श्रीजुगल किशोर जी के विवेचनात्मक हिन्दी भाग्य और गवेषणात्मक प्रस्तावना से युक्त, सजिल्द नत्र प्रशस्ति संग्रह, भाग १ संस्कृत और प्राकृत के १७१ प्रकाशित ग्रन्थों की प्रशस्तियों का मंगलाचरण सहित पूर्व संग्रह उपयोगी ११ परिशिष्टों पोर पं० परमानन्द शास्त्रों की इतिहास विषयक साहित्यपरिचयात्मक प्रस्तावना से अलंकृत सजिल्द जनप्रन्थ-प्रशस्ति संग्रह, भाग २ : अपभ्रंश के १२२ प्रप्रकाशित ग्रन्थों की प्रशस्तियों का महत्त्वपूर्ण संग्रह । पचपन प्रत्यकारों के ऐतिहासिक पंथपरिचय और परिशिष्टो सहित सं. पं. परमानन्द शास्त्री सजिल्द १५-०० समातिन्त्र और इष्टोपदेश : प्रध्यात्मकृति, पं० परमानन्द शास्त्री की हिन्दी टीका सहित भवणबेलगोल और दक्षिण के अन्य जैन तीर्थ श्री राजकृष्ण जंन 11-00 : ... ... ५-५० ३-०० न्याय दीपिका : मा० अभिनव धर्मभूषण को कृति का प्रो० डा० दरबारीलालजी न्यायाचार्य द्वारा स० प्र० । १०-०० जैन साहित्य और इतिहास पर विशेष प्रकाश पृष्ठ संख्या ७४, सजिल्द कसा पाहुडसुत: मूल ग्रन्थ की रचना ग्राज से दो हजार वर्ष पूर्व श्री गुणधराचार्य ने की, जिस पर श्री ७-०० पतिवृषभाचार्य ने पन्द्रह सौ वर्ष पूर्व छह हजार श्लोक प्रमाण चूर्णिसूत्र लिखे सम्पादक हीरालाल जी सिद्धान्त - शास्त्री | उपयोगी परिशिष्टो और हिन्दी अनुवाद के साथ बड़े साइज के १००० से भी अधिक पृष्ठों में । पुष्ट कागज और कपड़े की पक्की जिल्द न निबन्ध - रत्नावली : श्री मिलापचन्द्र तथा श्री रतनलाल कटारिया ध्यानशतक (ध्यानस्तव सहित ) : संपादक पं० बालचन्द्र सिद्धान्त-शास्त्री भावक धर्म संहिता : श्री दरयावसिंह सोबिया जैन लक्षणावली (तीन भागों में सं० पं० बालचन्द सिद्धान्त शास्त्रा आजीवन सदस्यता शुल्क : १०१.०० ३० वार्षिक मूल्य ६) ० इस अंक का मूल्य १ रुपया ५० पैसे , जिन शासन के कुछ विचारणीय प्रसंग श्री पद्मचन्द्र शास्त्री बहुत सात विषयों पर शास्त्रीय प्रमाणयुक्त तर्कपूर्ण विवेचन प्राक्कथन सिद्धान्ताचार्य श्री कैलाशचन्द्र शास्त्री द्वारा लिखित मूल जैन संस्कृति अपरिग्रह श्री पद्मचन्द्र शास्त्री Jaina Bibliography: Shri Chhotelal Jain, (An universal Encyclopaedia of JainReferences.) In two Vol. (P. 1942 ) Per set ४-५० ५००० प्रत्येक भाग ४०-०० विद्वान लेखक अपने विचारों के लिए स्वतन्त्र होते हैं। यह आवश्यक नहीं कि सम्पादक मण्डल लेखक के विचारों से सहमत हो । पत्र में विज्ञापन एवं समाचार प्रायः नहीं लिए जाते । २५-०० ७-०० १२-०० २-०० २.०० 600-00 सम्पादक परामर्श मण्डल डा० ज्योतिप्रसाद जैन, श्री लक्ष्मीचन्द्र जैन, सम्पादक श्री पद्मचन्द्र शास्त्री प्रकाशक- बाबूलाल जैन वक्ता, वीर सेवा मन्दिर के लिए, गीता प्रिंटिंग एजे, डी०-१०५, न्यूसीलमपुर, दिल्ली-५३ ये मुद्रित Page #109 -------------------------------------------------------------------------- ________________ घोर सेवा मन्दिर का त्रैमासिक अनेकान्त (पत्र-प्रवर्तक : प्राचार्य जुगल किशोर मुख्तार 'युगवीर') वर्ष ३६ : कि०४ अक्टूबर-विसम्बर १९५६ इस अंक में क्रम विषय १. णमोकार-महिमा २. तीर्थकर पार्श्वनाथ की केवलज्ञान भूमि : अहिच्छत्रा-- डा. ज्योति प्रसाद जैन ३. समवशरण सभा के १२ कोठे -रतनलाल कटारिया, केकड़ी (अजमेर) ४. नेमि शीर्षक हिन्दी साहित्य --डा० कु० इन्दुराय जैन ५. महाकवि अहंदास : व्यक्तित्व एवं कृतित्व ___ -डा. कपूरचन्द जैन, खतौली ६. भगवती आराधना मे तप का स्वरूप डा० कु. निशा, बिजनौर ७. नीतिवाक्यामृत में राजकोष की विवेचना -चन्द्रशेखर एम० ए० (अर्थशास्त्र) ८. शिरोमणिदास कृत धर्मसार सतसई - श्री कुन्दनलाल जैन दिल्ली १. जरा सोचिए : -सम्पादकीय १०. अनेकान्त पर लोकमत २६ आ.पृ० २ प्रकाशक : वीर सेवा मन्दिर, २१ दरियागंज, नई दिल्ली-२ Page #110 -------------------------------------------------------------------------- ________________ अनेकान्त पर लोकमत श्री पं० फूलचन्द्र जैन सिद्धांताचार्य : हस्तिनापुर 'और पढ़ या समय न मिले तो न पढ , पर, आपके विचार अवश्य पढ़ता है। आप हो कि किसी की चिन्ता न करके तथ्यपूर्ण लिखते हो। यह प्रवृत्ति सराहनीय है। २७-६-८६ श्री डा० जिनेन्द्र कुमार शास्त्रो पी-एच. डी. : सासनी 'आगम और सिद्धान्त की ऐसी ऐतिहासिक खोज, बिना लाग-लपेट के प्रस्तुत करना, समाज की आंखें खोलना है। वीर सेवा मन्दिर अब सार्थक हो रहा है। समाज में अनेकान्द जैसी पत्रिका की आवश्यकता है-जिसकी पूर्ति वीर सेवा मन्दिर कर रहा है।' २६-६-८६ डा०कन्छेदीलाल शास्त्री: सह-सम्पादक, 'जन-सन्देश' (शहडोल) अनेकान्त मिला : आपके 'मुक्ति मे करुणा एक विसगति, पतन का कारण परिग्रह, जरा सोचिए' तीनों शब्दश: पढें आपके तर्क एव युक्तियाँ आगम के परिप्रेक्ष्य में भी तथा लौकिक दृष्टि से भी उचित है। वीतराग के करुणा कहाँ ? राग-द्वेष की तरह करुणा व कठिनता परस्पर सबद्ध है । श्री प० मूलचन्द्र जी प्रतिभाशाली संस्कृत कवि थे। उनके अभाव की जानकारी मुझे नही थी। फिर भी वे 'विद्वामो घ्नन्तु मागमम्' लिख कर दे गए । लक्ष्मी का सम्मान ही समाज करती है । सरस्वती भी लक्ष्मी का सम्मान करती है, यह आश्चर्य की बात है। आपने दो टूक बात लिखी है। ३-१०-८६ डा० ज्योति प्रसाद जैन : लखनऊ 'आपके लेख बडे ज्ञान-वर्द्धक, बोधक एव मामयिक भी हैं'-चाव से पढता ह, लिखे जाइए। ६.१०.८६ श्री पं० भंवरलाल न्यायतीर्थ : सम्पादक-वीरवाणी, जयपुर-३ आप दिगम्ब रत्व के लिए लिखते हैं-खूब लिखते है । वास्तविक धर्म जो जीवन मे अपनाया जाना चाहिये उस पर आपकी लेखनी कमाल रखती है। मै आपके लेखो को वीरवाणी मे स्थान देने में अपना अहोभाग्य मानता हूं। आप लिखते रहिये, भेजते रहिए। ३-४-८६ डा० नन्दलाल जैन : (रीवां म० प्र०) श्री पद्मचन्द्र शास्त्री के माध्यम से अनेकान्त की दिशा व्यापक और विकसित हो रही है । इसके स्तर को बनाये रखने मे पण्डित जी महत्त्वपूर्ण योगदान कर रहे है-उनके स्पष्टवादी लेखो से जागरूकता आ रही है। ७-४-८६ श्री पं० रतनलाल कटारिया : केकड़ी "जानतः पश्यतश्चोवं जगत्कारुण्यतः पुनः । तस्य बन्ध प्रसंगो न, सर्वाश्रव परिक्षयात् ।।" इसका अर्थ इस प्रकार है जानते देखते भी (मुक्त जीव) सासारिक करुणा से ऊपर हैं-ऊपर उठ गए है अतः उनके कर्म-बन्ध का पुनः प्रसंग नही होता क्योकि सब आस्रवो का पूर्ण क्षय हो गया है। यहाँ ऊवं को 'जगत्कारुण्यतः' के साथ लगाना चाहिए । अर्थात् संसार के प्रति करुणा से ऊँचे हो गए है । ४-१०-६६ Page #111 -------------------------------------------------------------------------- ________________ मोमबहम IIIIIII, 7 TAIR - परमागमस्य बीजं निषिद्धजात्यन्धसिन्धुरविधानम् । सकलनयविलसितानां विरोधमथनं नमाम्यनेकान्तम्॥ वीर-सेवा मन्दिर, २१ दरियागंज, नई दिल्ली-२ वीर- निर्वाण सवत् २५१३, वि० स० २०४३ वर्ष ३६ किरण ४ अक्टूबर-दिसम्बर १९८६ णमोकार-महिमा घणघाइकम्ममहणा, तिवरणवरभव्व-कमलमत्तण्डा । अरिहा प्रतणारणी, अणुबमसोक्खा जयंतु जए ॥१॥ अट्टविहकम्मवियला, रिपट्टियकज्जा परगट्ठसंसारा । दिट्ठसयलत्थसारा, सिद्धा सिद्धि मम दिसंतु ॥२॥ पंचमहन्वयगा, तक्कालिय-सपरसमय-सुदधारा । रणारणागुरगगरणमरिया, पाइरिया मम पसीदंत ॥३॥ अण्णाणघोरतिमिरे, दुरंततीरम्हि हिंडमारणारणं । ___ भवियारगणुज्जोययरा, उवझाया वरमदि देंतु ॥४॥ थिरधरियसीलमाला, बवगयराया जसोहपडिहत्था । बहुविरणयभूसियंगा, सुहाइं साहू पयच्छंतु ॥५॥ भावार्थ- सघन-घाति कर्मों का आलोडन करने वाले, तीनों लोकों में विद्यमान भव्यजीवरूपी कमनों को विकसित करने वाले सूर्य अनंतज्ञानी और अनुपम सुखमय अरहंतों की जगत् में जय हो। अष्टकर्मों से रहित, कृत्यकृत्य, जन्ममृत्यु के चक्र से मुक्त तथा सकलतत्त्वार्थ के दृष्टा सिद्ध मुझे सिद्धि प्रदान करें। पंचमहावतों से समुन्नत, तत्कालीन स्व-समय और पर-समयरूप श्रुत के ज्ञाता तथा नानागुणसमूह से परिपूर्ण आचार्य मुझ पर प्रसन्न हों। जिसका ओर-छोर पाना कठिन है, उस अज्ञानरूपी घोर अंधकार में भटकने वाले भव्यजीवों के लिए ज्ञान का प्रकाश देने वाले उपाध्याय मुझे उत्तम मति प्रदान करें। सो माला को स्थिरतापूर्वक धारण करने वाले, संगरहित, यशःसमूह से परिपूर्ण तथा प्रवर विनय से अलंकृत शरीर वाले साधु मुझे सुख प्रदान करें। 000 Page #112 -------------------------------------------------------------------------- ________________ तीर्थंकर पार्श्वनाथ की केवलज्ञान भूमि : प्रहिच्छत्रा डा० ज्योति प्रसाद जंन श्रमण जैन परम्परा के तेइसवें तीर्थंकर भगवान पार्श्वनाथ ( ईसा पूर्व ८७७ ७७७ ) की ऐतिहासिकता आधुनिक इतिहासज्ञों द्वारा भी प्रायः सर्वमान्य तथ्य के रूप में स्वीकृत हो चुकी है । वह काशी-वाराणसी के काश्यपगोत्री उरगवंशी नरेश अश्वसेन और उनकी सहधर्मिणी वामादेवी के सुपुत्र थे । बाल्यावस्था से ही वह अत्यन्त निर्भय. शरवीर, मेधाबी एवं प्रतिभासम्पन्न, ससार-भोगो से प्रायः उदासीन, करुणामूर्ति एवं विन्तनशील व्यक्तित्व के धनी थे । अपने मातुल, कुशस्थलपुर (कन्नौज) नरेश के आव्हान पर एक दुर्दान्त विदेशी आक्रान्ता से उनके राज्य की रक्षार्थं राजकुमार पार्श्व वहाँ पहुचे और उक्त आक्रमणकारी को पूर्णतया पराजित करने मे सफल हुए। वही वन-विहार करते एकदा उन्होने कतिपय हठयोगि तप स्वियों से एक मरणासन्न नाग-नागि युगल की रक्षा की। इस घटना के परिणामस्वरूप पार्श्वकुमार का चित्त संसार से विरक्त हो गया. और उन्होने समस्त सांसारिक बधनों को तोड़कर, निःस्पृह, निष्परिग्रही एव अकिञ्चन हो वन की राह ली । साधिक चार मास की आत्मशोधनार्थ की गई तपः साधना के मध्य विचरते हुए कुरु जनपद की महानगरी हस्तिनापुर ( गजपुर ) पहुंचे। वहां पारणा करके, गंगा के किनारे-किनारे विहार करते हुए वह भीमाटवी नामक महावन में योग धारण कर कायोत्मर्ग मुद्रा मे ध्यानमग्न हो गए। इस अवस्था मे वहाँ उन पर शवर ( अपर नाम मेघमाली एव कमठ) नामक दृष्ट असुर ने भीषण उपसर्ग किये | नागराज धरणेन्द्र और यक्षेश्वरी पद्मावती ने उक्त विविध भयकर उपसर्गो का निवारण करने का यथाशक्य प्रयास किया । नागराज (अहि) ने भगवान के सिर के ऊपर अपने सहस्र फणो का वितान या छत्र बना दिया। स्वयं योगिराज पार्श्व तो शुद्धात्मस्वरूप मे लवलीन थे; उक्त उपसर्गों का उन्हें कोई भान ही नही था, बल्कि उन्हें तभी केवलज्ञान की प्राप्ति हो गई, वह अर्हत् जिनेन्द्र बन गए। वन के बाहर आसपास के क्षेत्रों के निवासी लोगों की अपार भीड़ वहाँ एकत्र हो गई । भगवान की अर्चना वन्दना स्तुतिगान हुआ । उनकी समवसरण सभा जुड़ गई और लोग उनके सर्वकल्याणकारी दिव्य उपदेश को सुनकर कृतार्थं हुए । इस पुनीत स्थल से नातिदूर भीमाटवी वन के बाहिर, उत्तर पांचाल जनपद की राजधानी पांचालपुरी, अपर नाम परिचक्रा एवं शंखावती, अवस्थित थी । इस अभूतपूर्व घटना के कारण वह स्थान ही नहीं, वह नगरी भी छत्रावती या अहिच्छत्रा नाम से लोकप्रसिद्ध हुई । जैन पुराणों एवं पौराणिक काव्यों आदि में वर्णित तीर्थंकर पार्श्वनाथ के चरित्र के अन्तर्गत गहन वन मे ध्यानस्थ उन योगिराज पर असुर द्वारा किये गए भीषणउपसर्ग का तथा उसके निवारणार्थं नागराज धरणेन्द्र एव पद्मावती देवी द्वारा किये गए फणच्छत्र लगाने आदि प्रयासो का और वही उसी समय भगवान को केवलज्ञान प्राप्ति का सर्वत्र उल्लेख है । ११वी शती ई० मे अपभ्रंश भाषा में निबद्ध आचार्य पद्मकीर्ति के 'पासागाह - चरिउ' मे तो इस घटना का अति विस्तृत एव स्पष्ट वर्णन है । वहाँ उपसर्ग-स्थान का नाम भीमाटवी नामक महावन दिया है, जहा तपस्वी पार्श्व गजपुर ( हस्तिनापुर ) मे पारणा करने के पश्चात् विचरण करते हुए पहुंचे थे, किन्तु पांचाल, शंखावाती या अहिच्छत्रा नामो का कोई उल्लेख नही है । हां, ११ वी शती ई० के हरिषेणीय ! वृहत्कथा कोष', प्रभाचन्द्रीय 'आराधना-सत्कथा-प्रबन्ध' तथा कई उत्तरवतीं कथा कोपों- 'पुण्यास्रव कथाकोष', 'आराधना- कथाकोष', आदि मे भी अहिच्छत्रा के पार्श्व जिनालय में पद्मावती देवी के प्रभाव से ब्राह्मण विद्वान पात्रकेसरि स्वामी के मतपरिवर्तन, अर्थात् जिनेन्द्र के स्याद्वाददर्शन की श्रद्धानी Page #113 -------------------------------------------------------------------------- ________________ तीर्थकर पार्श्वनाथ की केवलज्ञान भमि : अद्विच्छत्रा बन जाने की कथा प्राप्त है। पात्र केसरी स्वामी का इन खम्हरों में मिली है, स्थान का अहिच्छत्रा नाम स्पष्ट समय छठी शती० ई० के लगभग अनुमानित है। इसके लिखा मिला है। उससे भी लगभग ३०० वर्ष पूर्व के अतिरिक्त, अचारांग-नियुक्ति में भी पार्श्व-उपसर्ग की कौशाम्बी के निकट पभोसा की पहाड़ी पर के एक गुहाघटना का प्रायः उपरोक्त पुराणो जैसा ही वर्णन है, लेख से प्रकट है कि उसका निर्माण कोशाम्बी-नरेश बहविशेष इतना है कि उस क्षेत्र का नाम कुरूजांगल देग सतिमित्र के मातुल, अहिच्छत्रा-नरेश आषाढ़सेन ने वहां किया है और नगरी का नाम शखावती, जिसके निकट- जाकर मुनियो के निवास के लिए कराया था-पभोसा वर्ती निर्जन वन मे यह घटना घटी थी। यह भी लिखा है कौशाम्बी मे जन्मे छठे तीर्थकर पपप्रभु का तप एवं मान कि कालान्तर मे उक्त स्थान मे भक्तजनो ने एक उत्तम कल्याणक स्थल है। इससे अहिच्छत्रा एवं कौशाम्बी के जिनालय बनाकर उसमे भगवान पार्श्व की नागफणालकृत तत्कालीन राजानों का जैन धर्मानुयायी होना भी सूचित प्रतिमा प्रतिष्ठित की थी यह तीर्थ अहिच्छत्रा-पार्श्वनाथ होता है। दूसरी शती ई० के अन्तिम पाद में इसी अहिनाम से लोक प्रसिद्ध हुआ और निकटवर्ती सखावती नगरी च्छत्रा के राजा पद्मनाभ के दद्दिग एवं माधव नामक का नाम भी तभी से अहिच्छत्रा पड़ा। जिन प्रभसूरि ने पत्रद्वय ने दक्षिण देश में जाकर सिंहनन्दि के आशीर्वाद अपने "विविध-तीर्थ-कल' (ल. १३३० ई.) के अतर्गत एवं मार्गदर्शन में मैसूर के सुप्रसिद्ध गंगवाडी राज्य की 'अहिच्छत्रा नगरी कल्प' मे आचारागनियुक्ति के उपरोक्त स्थापना की थी, जो साधिक एक सहस्र वर्ष पर्यन्त स्थायी कथन का प्रायः अक्षरशः समर्थन किया है, साथ ही उन्होंने मयनाकया है, साथ हा उन्हाने रहा जिसमे जैन धर्म की प्रवृत्ति प्रायः निरन्तर बनी रही। अहिच्छत्रा के दुर्ग एव प्राचीर के भग्नावशेषों, कुण्डो, नावशेषा, कुण्डो, गुप्त सम्राट समुद्र गुप्त की प्रयाग-प्रशस्ति से प्रकट है कपो, वानस्पतिक महोषधियो; खनिजो, धरणेन्द्र पद्मावती कि चौथी शती ई. के पूर्वार्द्ध में अहिच्छत्रा का राजा समन्वित पार्व-जिनालय, स्तूपो, अन्य जनार्जन देवालयो अच्यत नाग था। तदनन्तर गुप्तों आदि के सामन्तों के आदि का भी विस्तृत वर्णन किया है। १७वी शती ई० रूप मे अहिच्चत्रा पर नागवशी राजे राज्य करते रहे । के पूर्वार्द्ध मे (ल. १६३० ई० में) पं. बनारसीदासजी ने यवन भगोलवेत्ता टालेमी (२री शती ई०) की 'आदिमुद्रा' अहिच्छत्रा की यात्रा की थी, और १७८४ ई० मे कवि तथा चीनी यात्री युवान बाग (७वी शती ई०) की आसाराम ने क्षेत्र पर ही 'अहिच्छत्रा पार्श्वनाथ स्तोत्र' 'ओहिचितालो' का समीकरण इसो अहिच्छत्रा से किया (भाषा) की रचना की थी। प्राकृत निर्वाण काण्ड के गया है और महाभारत में उल्लिखित उत्तर पांचाल राज्य अतिशय क्षेत्र काण्ड मे भी 'महुराए अहिछत्ते वीरं पास को राजधानी अहिच्छत्रा का अभिप्राय भी इसी स्थान से तहेव वदामि' पाठ द्वारा भगवान पार्श्वनाथ के साथ है। कूरु राज्य (हस्तिनापुर) के उत्तर में, गगा के पार अहिच्छत्रा का सम्बन्ध सूचित किया है। फैला हुआ हिमालय की तराई का विस्तृत अरण्य कुरुइस अहिच्छत्रा की पहचान, गत लगभग डेढ़ सौ वर्षों जांगल क्षेत्र कहलाया तथा उसके पूर्वी भाग मे उत्तर में विभिन्न देशी-विदेशी विद्वानों ने, ऐतिहासिक, साहि- पांचाल राज्य था, जिसकी राजधानी यह पांचालपुरी या त्यिक, पुरातात्विक, शिलालेखीय, मुद्गल शास्त्रीय आदि अहिच्छत्रा थी । ऐसा प्रतीत होता है कि सातवी शती ई० विविध पुष्ट साक्ष्यों के प्राधार पर वर्तमान उत्तर प्रदेश के आसपास अहिच्छत्रा की राज्यसत्ता समाप्त हो गई, राज्य के बरेली जिले की आंवला तहसील में स्थित राम- परन्तु नगर व उसका महत्त्व हो गया, परन्तु नगर ब नगर (या राम नगर किला) नामक कस्बे के बाहर घने उसका महत्त्व कम से कम ११वी शती पर्यन्त बनः रहा । बन में फैले एक प्राचीन दुर्ग के अवशेषों एवं टीलों आदि यहां से प्राप्त अन्तिम शिलालेख १००४ ई० का है और से की है। कई पुरातात्विक सर्वेक्षणों एवं उत्खननों के प्रायः उसी काल में शायद इसी अहिच्छत्रा में महाकवि फलस्वरूप यहां से विविध एवं विपुल सामग्री प्राप्त हुई वाग्भट्ट ने अपने 'नेमि-निर्वाण' काव्य की रचना की थी। है। लगभग दूसरों शती ई. की एक यक्ष मूर्ति पर, जो तदुपरान्त यह नगर विघटित होता तथा बन खण्ड में Page #114 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ४,पर्व ३६,०४ भनेकान्त परिणत होता चला गया। तथापि पूरे मध्यकाल में, बिशे- (सवालाख) पर्वत मालाओं का द्योनक है, अतएव वह षकर आसपास के जिलों के निवासी जैन अपने पवित्र अहिच्छत्रा, जहां से अजमेर के चौहान (चाडमान) वंश तीर्थ के रूप में इसकी यात्रा एव कथंचित् सरक्षण भी का पूर्वज सामन्त आया था, गंगा-यमुना के ऊपरी भाग में करते रहे। उन्होंने अहिच्छत्रा का नाम और स्मृति सुर- कही होना चाहिए । अर्थात् वह स्थान कुरुजांगल क्षेत्र में क्षित बनाए रखो। अस्तु, इस विषय में कोई सन्देह नही स्थित उत्तर पांचाल राज्य की प्राचीन राजधानी अहिहै कि पार्श्वनाथीय जनश्रुति का पावन जैन तीर्थ अहि. च्छत्रा ही हो सकती है। पछत्रा यही उ०प्रदेश के बरेली जिले का राम नगर यों पुराण प्रसिद्ध प्राचीन नगरों के अनुकरण पर देश किला है। के अन्य भागों में कई तन्नाम नगर कालान्तर में प्रसिद्ध इधर कुछ वर्षों से एक विवाद चल पड़ा है कि हो गए हैं । अयोध्या, मथुरा, काशी ही ऐसे अफेले उदाअहिच्छत्रा यह नहीं, वरन् राजस्थान में जोधपुर के निकट हरण नहीं है। हस्तिनापुर के अपरनाम गजपुर और स्थित नागौर अथवा अजमेर के निकट बिजोलिया पार्व नागपुर रहे हैं, और नागपुर नाम के जितने अन्य नगर नाथीय प्राचीन अहिच्छत्रा है। इसका आधार यह बताया बसे वे अनुकरण पर ही बसे । विजय नगर साम्राज्य की जाता है कि उक्त बिजोलिया के सन् ११६९-७० ई० के सुप्रसिद्ध राजधानी का नाम भी हिरेआवलां से प्राप्त शिलालेख में शाकंभरी (सपादलक्ष) के चाहमान (चौहान) १३६५ ई० के एक शि० ले. में 'श्रीमदराय राजधानी नरेशों का जो इतिहास दिया है, उसके अनुसार वश का हस्तिनापुर विजयानगर' लिखा है। (ए० क० १११, प्रथम पुरुष वाडमान था, जिसका पुत्र वासुदेव और पोत्र सौर ता०, न०१०३) और दमवी शती ई. के एक सामन्त था, तथा वह सामन्त अहिच्छत्रपुर मे जन्मा वत्स शिलालेख से दक्षिणापथ के कर्नाटक प्रदेश में भी एक गोत्री ब्राह्मण था। उसका पुत्र पुर्णतल्ल शाकम्भरी के । अहिच्छत्रा रहे होने का पता चला है । बहत्तर भारत के चौहान राज्य का सस्थापक था। उसी की सन्तति मे , बर्मा, स्याम, कम्बुज आदि भारतीयकृत राज्यों में भी आगे चलकर विग्रहराज पृथ्वीराज, अणोराव, सोमेश्वर, अयोध्या, मथुरा आदि नामों के नगर रहे पाए गये हैं। पृथ्वीराज तृतीय (दिल्लीपति) आदि राजा हुए । पण्डित पुराणप्रसिद्ध मूल स्थानों के अनुकरण पर परवर्ती कालों में गौरीशंकर हरीचन्द ओझा ने उक्त अहिच्छत्रा की पहचान स्थापित उक्त तन्नाम नवीन नगरो आदि को विद्यमानता जोधपुर के निकट स्थित नागौर (सस्कृतरूप नागपुर) से से मूल स्थानों की स्थिति में कोई अन्तर नहीं पड़ता। की, जिसे उन्होने किसी समय जांगल् या जांगलदेश की राजधानी रहा बताया। किन्तु पं० भगवानलाल इद्रजी अस्तु, तीर्थकर पार्श्वनाथ की केवलज्ञान भूमि, उत्तर. तथा डा० डी० आर० भण्डारकर के मतानुसार शाकंभरी प्रदेश बरेली जिले की रामनगर वाली अहिच्छत्रा ही है। का अपर नाम सपादलक्ष (सवालाख) है और यह उत्तर नागौर, बिजोलिया, अथवा अन्य कोई तथाकथित अहिप्रदेश के मेरठ कमिश्नरी के उत्तर में स्थित सिवालिक च्छा नही। सन्दर्भो के लिए देखिए लेखक कृत१. रुहेल खण्ड-कुमायं और जैन धर्म, लखनऊ, १९७० दिल्ली १९७५-७६, पृ० ५९-६० ७१ २. रुहेल खण्ड-कुमायूं जैन डायरेक्टरी, काशीपुर १९७०, ६. बरेली जिले का नवीन गजेटियर, अध्याय २ (इतिहास) पृ० १२३ अ० १६ पृ० ३६३-३६६ ३. उत्तरप्रदेश और जैनधर्म, लखनऊ, १६७६, पृ. ४७-४८ ७. जिन प्रभसूरिकृत विविध तीर्थ कल्प', अनु० अगरचंद भंवर लाल नाहटा, बालोतरा १९७८: पृ० ३०-३२ ४. भारतीय इतिहास : एक दृष्टि, द्वि० सं०, दिल्ली ८. प्रो. कृष्णदत्त बाजपेयीकृत 'अहिच्छत्रा', लखनऊ १९५६ १६६६, पृ० ४५-४६, १३६ ६. जनाबिबलियोग्राफी (दिल्ली १९८२), न० २८, १७१, ५. प्रमुख ऐतिहासिक जन पुरुष और महिलाएँ, २५७ Page #115 -------------------------------------------------------------------------- ________________ समवशरण सभा के १२ कोठे - रतनलाल कटारिया, केकड़ी (अजमेर) निर्ग्रन्थ कल्पवनिता प्रतिकाभभौम, तेषु मुन्यप्सरः स्वार्या द्यौति भौमा सुरास्त्रियः । नाग स्त्रियो भवन भौम भ कल्पदेवाः । नागव्यन्त र चन्द्राद्या: स्वर्भूनपशवः क्रमात् ॥७९॥ कोष्ठ स्थिता नपशवोऽपि नमंति यस्य, सौधर्मेन्द्र की प्राज्ञा से कुबेर समवशरण की रचना तस्मै नमस्त्रिमुवन प्रभवे जिनाय ॥४॥ (नदी०भक्ति) करता है । इसमे ११ भूमियां होती है। आठवी सद्गण पहले कोठे में-निर्ग्रन्थ मुनि। दूसरे कोठे में-कल्प- भूमि है इसी के मध्य मे तीन पीठ पर श्री मडप है। बीच वासी देवियां। तीसरे कोठे में-आर्यिकादि सब स्त्रियां। में गधकूटी पर भगवान विराजमान रहते है उनको चौथे कोठे में-ज्योतिष्क देवियां। पांचवें कोठे में-व्यंतर प्रदक्षिणा रूप से १२ सभा-कोठे होते है जो निर्मल स्फटिक देवियां । छठे में-नाग (भवनवासी) देवियां । सातवें मणि की १६ दीवालों से युक्त होते हैं। में-भवनवासी देव । आठवें में-व्यंतर देव । नवमे मे-- देव मनुष्य तियंच (पचेन्द्रिय) के इन कोठों की ऋमिक ज्योतिष देव । दशवें में-कल्पवासी देव । ग्यारहवें मे- व्यवस्था बडी बुद्धिमानी शालीनता के साथ आदर्शरूप में सर्व मनुष्य (चक्रवर्ती, विद्याधर, क्षुल्लक ऐलकादि)। की गई है। बारहवें में-तियंच (पशु-पक्षी)॥ सर्वप्रथम भगवान् के सामने निर्ग्रन्थ मुनियों का ऐसा ही सब प्राचीन ग्रन्थों में लिखा है, देखो कोष्ठक रखा है जिसमे केवली गणधर मनःपर्यय ज्ञानी १. महापुराण (जिनसेनाचार्य कृत) पर्व २३, अवधि ज्ञानी ऋद्धिधारी ऋषि मुनि यति अनगार बैठते स्लोक १९३-१६४ । हैं जो सर्व प्राणियों मे श्रेष्ठ है । अत: इनका प्रथम कोष्ठक २. हरिवंशपुराण (जिनसेन कृत) सर्ग २ श्लोक ७६ रखा है। "Ladies First" सभा में महिलाएं प्रागे रहती से ८८, सर्ग ५७ श्लोक १५७-१६१ । है, इस भारतीय नियमानुसार दूसरे से छठे कोठे में देवियों ३. अतिशय भक्ति-निर्वाण भक्ति। और स्त्रियो को रखा है। इनमे भक्ति भी विशेष होती है ऋषिकल्पज वनितार्या, ज्योतिवनभवन युवति भावनजाः। इसलिए भी इन्हे आगे रखा है। ज्योतिवन कल्पदेवा, नरतियंचो वसंति तेष्वनुपूर्वम् । स्त्रियो को दूसरे कोठे मे न रखकर तीसरे में रखने ४. जयसेन प्रतिष्ठा पाठ ___ का कारण उनसे मुनीश्वरों के सानिध्य का अभाव करना बुद्धीशामर नायिकार्यमहती ज्योतिष्क सद् व्यंतर, है ताकि शालीनता बनी रहे और कोई लोकापवाद उत्पन्न नागस्त्री भवनेश किं पुरुष सज्जयोतिष्के कल्पामराः। न हो । देविया मनुष्यगति की न होने से उन्हें दूसरे कोठे मा वा पशवश्च यस्य हि सभा आदित्य संख्या वृष, में रख दिया है। शालीनतादि की दृष्टि से ही देव और पीयूषं स्वमतानुरूप मखिलं स्वादंति तस्मै नमः ॥५४॥ देवियों तथा मनुष्य और स्त्रियों के कोठे पास-पास नहीं ५. सिलोय पण्णत्ती (यतिवषभाचार्य कृत) अधि- रखे हैं। छठा एवं सातबा कोठा एक ही जाति के देवीकार ४ गाथा ५५६ से ८६३ । देव का होने पर भी छठे कोठे के आगे डबल दीवाल होने ६. समवशरण स्तोत्र-संस्कृत (विष्णुसेन कृत) से कोई दोष नहीं रहता। ७. धर्मसंग्रह श्रावकाचार (पं० मेधावी कृत) अधि- प्रश्न-आयिका गृहत्यागी साध्वी हैं उसे मुनियों के कार २ साथ पहले कोठे में न रखकर सामान्य स्त्रियों के साथ Page #116 -------------------------------------------------------------------------- ________________ वर्ष ३९, कि०४ अनेकान्त तीसरे कोठे में क्यों रखा? मनुष्यों में तीन कोठे रखे गये। उत्तर-वह उपचार से साध्वी हैं, वस्तुतः नही। इस तरह चतुर्णिकाय के देवों के दो-दो कोठे होने से सवस्त्र होने से उसका गुणस्थान शास्त्रों में पांचबा ही कुल ८ कोठे देवगति के और ३ कोठे मनुष्यगति के तथा बताया है वह संयत नही है इसी से उसे पंच परमेष्ठी मे १ कोठा तिर्यंच गति का कुल १२ ही कोठे रखे हैं न कम स्थान नहीं है। जिस वेश से और पर्याय से मुक्ति हो और न ज्यादा । नरकगति के नारकी न अन्यत्र जा सकते सकती है उसे ही पूज्य होने योग्य माना है। आयिका हैं न कोई उन्हे ला सकता है अत: तीन गतियो के आधार इसमें नहीं हैं। अत: परमेष्ठियो के प्रथम कोष्ठ मे उसे पर ये १२ ही कोठे होते है । नहीं रखा है । दूसरा कारण यह है कि उसका और मुनि- ये कोठे भगवान के चारों ओर गोलाकार होते हैं। रत्नों का सानिध्य आचार शास्त्र से निषिद्ध है। अतिशय के कारण एक ही भगवान् चारो दिशाओं में प्रश्न-ऐलक क्षुल्लक तो गृहत्यागी और कुमार चतुर्मख दिखाई देते है। वे सिंहासन पर चार अगुल ऊँचे श्रमण है आचार शास्त्र से भी मुनियों के साथ रहने मे अधर पद्मासन से विराजमान होते है सब जीव उन्हें हाथ कोई दोष नहीं है। फिर उन्हें प्रथम कोठे मे न रखकर जोड़े अपने-अपने कोठो मे बैठे हुए दिव्य ध्वनि का असृतसामान्य मनुष्यो के साथ ११वें कोठे मे क्यो रखा ? पान करते है। उत्तर-ऐलक क्षुल्लक भी वस्त्रधारी होने से पचम- प्रश्न---देवा को पुरूषो से पहिले क्यो रखा? गुणस्थानी है। परमेष्ठी, पूज्य-देव नही है। अतइन्हे उत्तर ---- (क) गोल वस्तु का कही से भी आदि और प्रथम कोठे मे स्थान न देकर ११वें मे दिया है। प्रथम कही पर भी अत किया जा सकता है। समवशरण के कोठे मे केवली-गणधर-उपाध्याय-साधु ये चार परमेष्ठी ही कोठे भी गोलाकार होने से उनमे कोई भी पहिले पीछे होते है। कल्पित किये जा सकते है । ___प्रश्न -- आयिका के कोठे मे सब स्त्रियो को रख दिया (ख) गुणस्थान की अपेक्षा भी आगे पीछे का क्रम तो मुनियो के कोठे में सब मनुष्यों को क्यों नही रखा? नही है क्योकि देवो में चार गुणस्थान तक ही सभव है उत्तर-नायिका पचमगुणस्थान से ऊपर नही हो जबकि तियचो तक में भी पचम गुणस्थान सभव है। सकती जबकि मुनि षष्ठादि गुण स्थानी होते है । आर्यिका मनुष्यो मे तो सर्व ही गुणस्थान है । की तरह अन्य व्रती श्राविकाए भी पचम गुणस्थानी हो (ग) देवो मे मनुष्यों की अपेक्षा विशेष भक्ति होती जाती हैं जबकि मुनियो की तरह ऐलक क्षुल्लकादि कभी है नियोग ड्यूटी भी विशेष होती है। इसी से कल्याणकों षष्ठ गुणस्थानी नहीं हो सकते। अत: आयिका और मुनि मे स्वर्गों के समस्त देव और इन्द्र आते है जबकि सर्व के पद में महान् अन्तर होने से इनके कोठों की योग्यता. मनुष्य नही आते। देव ही भगवान् के चमर ढोरते हैंपात्रता में भी महान् अन्तर है। इससे आयिका के कोठे वष्टि करते है, सिंहासन छत्र भामंडलादि अष्ट प्रातिहार्य मे तो पचमगुणस्थान की सम्भावना से सब स्त्रियां आ करते हैं मनुष्य नही। मूर्ति में भी यक्ष गंधर्व किन्नरादि गई किन्तु मुनि के कोठे में सब मनुष्य नहीं आये क्योंकि का यह सब करते हुए अंकन है, मनुष्य का नही। उनके कुछ न कुछ वस्त्र-परिग्रह है। (घ) कोई भी देवता भगवान् का कभी अवर्णवाद प्रश्न-चार प्रकार के देवो के दो दो कोठे रखे तो नहीं करता सब देवता जैन होते है। कोई अन्य धर्मी मनुष्यों के दो कोठे न रखकर तीन कोठे क्यों रखे गये। मनुष्य ही या मिथ्यात्वी जैनी मनुष्य ही कभी भगवान् का उत्तर-देवों में देव देवी के रूप में दो ही पद होते अवर्णवाद करते हैं जैसे पोते मरीचि ने भगवान ऋषभहै संयत (पूज्य) पद नहीं होता जबकि मनुष्यों में नर-नारी नाथ का किया था। के रूप मे दो पद के सिवा एक संयत (पूज्य-परमेष्ठी) पद (ङ) देवियों के बाद देवो को एक ही गति वाले और होता है अतः देवों में दो-दो कोठे ही रखे गये और होने की वजह से रखा गया बीच में मनुष्यो के आने पर Page #117 -------------------------------------------------------------------------- ________________ समवशरण सभा के १२ कोठे गतिभिन्नता हो जाती और स्त्री सानिध्य से शालीनता में शुभ दिशा आग्नेय विषे कही, लसत कोठा तीन भलें तहीं। भी दोष आता। मुनि आर्या कल्पवासनी, तिया, मनुषणी तिसरे यह बैठिया ।। रत्नकरण्ड श्रावकाचार की पं० सदासुखदास जी कृत (चारों दिशाओं में तीन-तीन कोठे के हिसाब से १२ हिन्दी वचनिका में १२ कोठों के क्रम में एक अन्तर इस कोठे बताये हैं। प्रथम आग्नेय दिशा (पूर्व दक्षिण कोण) प्रकार है। (देखो षष्टम अधिकार के उपान्त्य में) में तीन कोठे इस प्रकार हैं-१. मुनि और आयिका, __ "भगवान् गंध कुटी में पूर्व दिशा अथवा उत्तर दिशा । २. कल्पवासी देवियां, ३. मनुष्यणी-सामान्य स्त्रियां ।) के संमुख तिष्ठे है उनकी प्रदक्षिणा रूप संमुख पहली सभा शेष कथन प्राचीन शास्त्रानुसार ही है। सिर्फ स्त्रियो के में गणधरादि मुनीश्वर तिष्ठे है, दूसरी सभा में कल्पवासी तीसरे कोठे से आयिकाओ को निकालकर मुनियो के प्रथम देवियां तीसरी मे आयिका अर मनुष्यणी चौथी में चक्र कोठे में रख दिया है यह गलती है। वादि सहित मनुष्य पांचबी में ज्योतिष देवियां छठी मे छद्मस्थतादि की वजह से, अपेक्षाभेद से, आचार्य व्यंतरिया सातवी मे भवनवासी देविया आठवी मे भवन आम्नाय की दृष्टि से, मुद्रण-लेखन प्रति लेखन की भूल से वासी देव नवमी मे व्यंतरदेव दशवी में ज्योतिष्क देव शास्त्रों में विभिन्न कथन हो जाते है। जिस तरह हम ग्यारहवी मे कल्पवासीदेव बारहवी में तिथंच हैं।" अनाज के ककरादि को शोध बीन कर पानी को छान कर ___ सब शास्त्रों में मनुष्यो का कोठा ११वा दिया है फिर काम में लेते है उसी तरह शास्त्रों को भी पूर्वापर किन्तु यहां उसे चौथे स्थान पर रख दिया है। इससे यहीं मिलाकर युक्तिपूर्वक शोधकर सम्यक् अध्ययन करना से सब का भंग हो गया है। पांचवें देवी और तीसरे चाहिए। धवल जयधवल मे भी अनेक जगह इन बातों मनष्यणी के कोटे के बीच चौथा मनुष्य कोठा रखने से का उल्लेख है। ये सब स्वाभाविक है संभाव्य है इन्ही के शालीनता मे भी दोष आया है। ऐसा क्यों किया गया? शायद पडित जी को मनुष्य जाति की उच्चता ने ऐमा प्रवाहित करना अग्नि समर्पण करना घोर मूढ़ता और करने को बाध्य किया हो। यह कथन सापेक्ष है । कोई अविवेक है। कषाय और अनुदारता से यह सब अपनी सैद्धान्तिक भूल नहीं है फिर भी विद्वानी को इस पर निधि का अपने ही हाथो बरबाद करना है। ऐसी प्रवत्ति विचार करना चाहि ! । यहाँ पडित जी ने १२ कोठो को मे बचना चाहिए। कोई चीज अभी हमे समभ नही आई १२ सभा कहा है किमी ने १२ गण कहा है। यह राव हो तो उसे आगे के लिए छोड देना चाहिए इस दूरदर्शिता शब्द भेद है अर्थ भेद नही। महापुराण मे १२ गण और को तो हमें कम से कम अगीकार करना ही चाहिए। १२ कोष्ठ कहा है एव जयसेन प्रतिष्ठा पाठ मे १२ सभा कहा है। जैनधर्म लह मद बढ़े, वैद न मिलि है कोई। समवशरण पाठ (प० भगवानदासजी कृत) पृ० १४८ अभत पान विष परिणवे, तांहि न औषधि होई। में--पहले मुनि कोष्ठक मे ही आयिकाओ को भी रख जो चरचा चित मे नही चढ़े, सो सब जैन सूत्र सो कढ़े। दिया है और तीसरे कोष्ठक में सिर्फ सामान्य स्त्रियों को अथवा जे श्रुत मरमी लोग, तिन्हें पंछ लीजे यह जोग । रहने दिया है। यह स्पष्टतः सैद्धातिक भूल है इससे संयत इतने पर संशय रह जाय, सो सब केवल ज्ञान समाय। असयत एक होकर गुड़ गोबर हो गया है शालीनता और यो नि.शल्य कीजे निजभाव, चरचा में हठ को नही दाव॥ आचार शास्त्र का भी हनन हुआ है । मूल पद्य इस प्रकार केकडी (अजमेर) ३०५४०४ Page #118 -------------------------------------------------------------------------- ________________ नेमि शीर्षक हिन्दी साहित्य 0 डा० कुमारी इन्दुराय जैन जैन परम्परा के बाईसवें तीर्थंकर नेमिनाय की ऐति- हैहासिक प्रामाणिकता भले ही मिद्ध न हो सकी हो परन्तु नेमिनाथ फागु-इसके रचयिता राज शेखर सरि यह निर्विवाद है कि उनका ब्यक्तित्व जैन साहित्यकारो को हैं जो हर्षपुरीय गच्छ के कोटिक गण से सम्बन्धित मुनि अधिक प्रिय रहा है। वर-वेश में सुगज्जिन नेमिकुमार का तिलक सरि के शिष्य थे। पशुओं का करुण क्रन्दन सुनने मात्र पर वाग्दत्ता राजुल २७ पद्यों वाले इस फागु की रचना कवि ने वि० (राजीमती) को विवाह मण्डप में विग्ह दग्ध छोडकर सं० १४०५ के लगभग की थी । काव्य भक्ति प्रधान है अक्षय वैराग्य धारण कर लेना तथा रेवतक पर्वत पर तदपि राजुन के सौन्दर्य चित्रण सम्बन्धी पद दृष्टव्य हैंदुर्धर तपश्चर्या द्वारा केवल ज्ञान प्राप्त करना, साथ ही किम किय राजल देवि तणऊ सिणगारु भणेवऊ, राजुल के संयम, अनन्य निष्ठा एवं अन्त में वैराग्यपूर्वक चपइ गोरी अइधोइ अगि चन्दन लेवउ । मुक्तिलाभ की घटनाओं ने कवियों को कितना अधिक खूप भरविड जाइ कुसुम कस्तूरी सारी, प्रभावित किया है इसका प्रत्यक्ष प्रमाण हैं उनके जीवन सीमतइ सिंदूर रे मोति सरि सारी ॥ नेमिनाथ नव रस फागु-इसके रचयिता सोम पर लिखी गयी विपुलात्मक कृतियां । सुन्दर सूरि हैं तथा फागु की भाषा पर प्राकृत एवं गुजयं तो आगम ग्रन्थों जैसे कल्पसूत्र, उत्तराध्ययन सूत्र, राती का पर्याप्त प्रभाव है कवि ने तीर्थंकर नेमिनाथ के अन्तकृद्दशा, ऋषिभाषित आदि, विभिन्न पुराणों में यथा प्रति अपनी अनन्य भक्ति को निवेदित किया है। हरिवंश पुराण, महापुराण, नेमिनाथ पुराण, पाण्डवपुराण, नेमिनाथ विवाहलो-उपाध्याय जयसागर रचित उत्तर पुराण आदि तथा अन्य काव्य ग्रन्थों यथा त्रिषष्टि इस कृति का परिचय डा० प्रेम सागर जैन ने 'हिन्दी जैन शलाका पुरुष चरित, च उपन महापुरुष चरित्र, प्रद्युम्न- भक्ति काव्य और कवि' पुस्तक में पृष्ठ ५२ पर दिया है। चरित्र, सौरिचरित्र, श्रीचिह्न काव्य, द्विसंधान काव्य, काव्य का रचना काल वि० सं० १४७८ लगभग है। वसुदेव हिण्डी जैसी महत्त्वपूर्ण रचनाओं में तीर्थकर नेमि- नेमीश्वर का बारह मासा-विवेच्य काव्य कृति नाथ का जीवन वर्णित है परन्तु प्रस्तुत लेख में विस्तारभय के रचनाकार बूचराज विक्रम की १६वी शती के अन्तिम से, केवल हिन्दी भाषा मे विरचित नेमि शीर्षक कृतियों चरण के प्रमुख व वियो में से थे । इनके बूचा, वल्ह, वील्ह का परिचय देना अभीष्ट है । १४वी १५वी शताब्दी तक वल्हव नाम भी लोकप्रिय रहे तथा ये भट्टारक भुवनकीति उत्तर भारत में अपभ्रंश भाषाओं का प्रसार और प्राचर्य के शिष्य थे । 'नेमीश्वर का बारहमासा' में राग बड़हंस रहा तदपि खडी बोली हिन्दी तथा अन्य स्थानीय बोलियो निवद्ध कुल १२ पद्य हैं तभा प्रारम्भ श्रावण मास से करके का स्वरूप लिखना प्रारम्भ हो गया था अतः नेमि शीर्षक आषाढ पर समाप्त किया है । इसके अतिरिक्त बूचराज ने रचनाओं में जो हिन्दी भाषा की सर्व प्राचीन रचना मिली 'नेमिनाथ वसन्तु' तथा 'वील्हब नाम से 'नेमीश्वर गीत' है वह 'नेमिनाथ फाग' है जिसके रचयिता राजशेखर सरि गीत की रचना की थी। 'कवि बूचराज एवं उनके समहैं तथा कृति का रचनाकाल संवत् १४०', लगभग है कालीन कवि' नामक पुस्तक में लेखक, सम्पादक डा० अतएव लेख में इस कृति से लेकर बीसवी शताब्दी तक कस्तूरचन्द कासलीवाल ने 'नेमीश्वर का बारहमासा' तथा की रचनाओं का कालक्रमानुसार संक्षिप्त उल्लेख प्रस्तुत 'नेमिनाथ बसन्तु' का मूल पाठ प्रस्तुत किया है। 'नेमी. Page #119 -------------------------------------------------------------------------- ________________ नेमि शीर्षक हिन्दी साहित्य श्वर गीत' में कुल १५ पद्य हैं तथा भाषा अभ्रश प्रधान नेमि रंग रत्नाकर छन्द-प्रस्तुत कृति के रचहै और इसकी हस्तलिखित प्रति बधीचन्द जी के मन्दिर यिता कवि लावण्य समय हैं इनके बचपन का नाम लघुके शास्त्र भण्डार गुटका नं० २५ में तथा एक प्रति श्री राज था और ये १६वी शताब्दी के प्रसिद्ध कवियों में से महावीर जी के शास्त्र भण्डार में संग्रहीत है। एक हैं। 'नेमिरंग रत्नाकर छन्द' जिसे 'नेमि जिन प्रबंध' नेमिनाथ रास-इसके रचयिता आचार्य जिनसेन भी कहा गया है, की रचना संवत् १५४६ में की थी। भद्रारक यश:कीति के शिष्य थे । 'राम' की रचना इन्होंने भाषा पर अपभ्रश का काफी प्रभाव है । इसकी १७ पत्रों संवत् १५५८ में जवाहर नगर में की थी । नेमिनाथ के वाली प्रति आमेर शास्त्र भण्डार (जो अब श्री महाबीर जन्म, कुमार अवस्था, विवाह हेतु प्रयाण, तोरण द्वार से जी में स्थानान्तरित हो गया है) में संग्रहीत है। लावण्य लौट आने, वैराग्य, कैवल्य प्राप्ति तक की घटनाओं को समय कृत 'राजुल विरह गीत' अथवा राजुल नेमि कवि ने ६३ छन्दों में वर्णित किया है। भाषा राजस्थानी. अबोला' की प्रति भी उक्त शास्त्र भंडार में है। गुजराती मिश्रित है तथा विवेच्य रास की एक पूर्ण प्रति नेमिनाथ स्तवन-इसके रचनाकार कवि धनपाल जिसका लिपिकाल सं० १६१३ है दिगम्बर जैन मन्दिर हैं । जो प्रसिद्ध कवि देल्ह के पुत्र तथा ठक्कुरसी के अनुज बड़ा तेरापंथियो का, जयपुर वेष्टन ६२४ में उपलब्ध है। थे। इनका समय संवत् १५२५ से १५६० तक माना नेमोरर को उरगानो--श्रावक चतरुमल अथवा जाता है । नेमिनाथ स्तवन अथवा नेमि जिन वन्दना ५ चवमल विरचित यह एक मात्र 'उरगानो संज्ञक रचना छन्दों की लघु कृति है जिसमें नेमिनाथ के तोरणद्वार से है। कवि ने स्पष्ट किया है कि गुणों को विस्तार से कहने लौटने, राजुल का त्याग, गिरनार पर्वत पर तप एवं नेमि वाले काव्य को उरगानो कहते हैं । कृति की रचना संवत् निर्वाण का सुन्दर वर्णन हुआ है। १५७१ मे की थी। कवि ने तीर्थ नेमि द्वारा विवाह मंडप नेमीश्वर रास-इसके रचयिता ब्र.जिनदास हैं। से विरक्त हो लोट आने और वैराग्य धारण की मार्मिक जिनदास नाम के कई कवियों का उल्लेख मिलता है, कथा को ४५ पदो में प्रभावपूर्ण ढंग से अभिव्यक्त किया परन्तु विवेच्य जिनदास भट्टारक सकलकीति के शिष्य एवं है। 'कविवर चराज एवं उनके समकालीन' कवि शीर्षक अनुज थे। ये सस्कृत के प्रकाण्ड विद्वान थे और पहले पुस्तक में डा० कामलीवाल ने 'नेमीश्वर को उरगानो' का नेमिनाथ पुराण (या हरिवंश पुराण) की रचना संस्कृत मूल पाठ प्रकाशित किया है साथ ही उन्होने चतरुमल कृत भाषा में की थी परन्तु बाद मे बहु जन हिताय, सवत 'नेमचरित्र' अथवा 'नेमि राजल गीत' का भी उल्लेख १५२० में स्वयं ही 'नेमिश्वर रास' की रचना हिन्दी में किया है। की। इस कृति को हरिवश रास भी कहते हैं । कवि ने नेमि राजमती बेलि-इसके रचयिता ठक्कुरसी नेमिनाथ के गर्भ च्यवन से लेकर निर्वाण तक की कथा हैं। ये राजस्थान के ढूंठाहण क्षेत्र के १६वी शताब्दी के कही है और प्रासगिक रूप में कृष्ण और पांडवों की कथा उत्तराई के कवि थे। 'नेमि राजमती बेलि' को 'नेमीश्वर भी अनुस्यूत है । डा० प्रेमचन्द रावंका ने 'महाकवि ब्रह्म. की बेली' भी कहा गया है । कृति की हस्तलिखित प्रतियां जिनदास : व्यक्तित्व एव कृतित्व' नामक पुस्तक में जयपुर के विभिन्न शास्त्र भण्डारों में संग्रहीत है परन्तु 'नेमीश्वर रास' के कुछ अंश प्रस्तुत किये हैं। २० छन्दों वाली इस बेलि को डा० कासलीवाल ने 'कवि- नेमिनाथ रास-मुनि पुण्ण रतन ने राजस्थानी वर बूचराज एव उनके समकालीन कवि' पुस्तक में प्रका- मिश्रित हिण्दी भाषा में प्रस्तुत नेमिनाथ रास की रचना शित करवा दिया है । अन्त निम्न प्रकार है संवत् १५९६ में की थी। इस कुति की एक पूर्ण प्रति जर जनमु मरणु करि दूरे. हुउ सिद्ध गुणहुँ परि पूरे भट्टारकीय दिगम्बर जैन मन्दिर. अजमेर के शास्त्र भंडार करि घेल्ह सुतन ठाकुरसी किये नेमि राजमती सरसी वेष्ठन ७३६ में बद्ध है। कुल पद्य संख्या ६६ है तथा नर नारि जाको नित गावे जो चित सो फल पावै ॥२०॥ प्रारम्भ निम्न प्रकार से है Page #120 -------------------------------------------------------------------------- ________________ १०, वर्ष ३९, कि०४ अनेकान्त दवन्द्र सारदा पय प्रणमी करि नेमि तणा गुण हीय घरेवि। नेसिनाथ के वैराग्य ले लेने पर राजुल ने चारित्र चुनरी रास भणु रत्नीया गुण गरु वड गइ सु सुख संखेवि ॥ को किस प्रकार धारण किया इसका १६ पद्यों में मार्मिक पुण्य रतन कवि विरचित 'नेमिनाथ फागु' का भी वर्णन हुआ है। उल्लेख मिलता है जिसकी प्रति दिगम्बर जैन मन्दिर नेमोश्वर चन्द्रायण-इसके कृतिकार भट्रारक विजयराम पांड्या, जयपुर के शास्त्र भण्डार में गुटका नरेन्द्रकीति थे जो आमेर गादी के संस्थापक भट्टारक नं० १४ वेष्टन १०२ मे सकलित है। देवन्द्रकीर्ति के शिष्य थे। नेमीश्वर चन्द्रायण की रचना नेमिनाथ गीत--१६वी शताब्दी के प्रसपात कवि संवत् १६९० में की थी और इसकी प्रति श्री महावीर जी ब्रह्म० यशोधर ने 'नेमिनाथ गीत' नाम से तीन सर्जनाएं के शास्त्र भण्डार में संग्रहीत है। की थीं। प्रथम 'नेमिनाथ गीत' की सरचना संवत् १५८१ नेमीश्वर रास-रासकार ब्रह्म रायमल्ल १७वीं में बांसवाडा नगर में की थी। इस गीत मे २८ अन्तरे शताब्दी के प्रतिनिधि कवियों में हैं । नेमीश्वर रास की हैं पर इसकी कोई पूर्ण प्रति अभी उपलब्ध नही हो सकी रचना इन्होंने सवत् १६१५ के लगभग की थी। कृति मे है। दूसरा गीत राग सोरठा मे निबद्ध है तथा गीत में कुल १४५ कड़क छन्द हैं जिनमें नेमिनाथ के गर्भ से कुल पांच छन्द ई। तीसरा नेमिनाथ गीत अपेक्षाकृत बड़ी निर्वाण तक की घटनाएं वर्णित हैं । बधीचन्द जी के मदिर, रचना है। इसमे कुल ७१ छन्द है जो राग गौड़ी में बद्ध जयपुर से लेखिका को प्राप्त प्रति के अन्त मे लिखा हैहैं । गीत की भाषा राजस्थानी है तथा इसका मूल पाठ अहो सोलह से पंद्रारह रच्यो, 'आचार्य सोमकीर्ति एव ब्रह्म यशोधर' संस्थापक डा. रास सांवलि तेरसि सावण मास । कस्तूरचन्द कासलीवाल कत में प्रकाशित हो गया है। ___वार तो बुधवार भलो अहो, काव्य का टेक निम्न प्रकार है __ जैसी जी मति दीने अवकास । सामला ब्रण वीनवी राजिल नारि पंडित कोई जी मति हसो, पूरव भव नेह संभारि तैसी जी बुधि कीयो परगास ॥ दयाल राय वीनवी राजिल नारि ।। नेमीश्वर रास के अतिरिक्त ब्रह्म, रायमल्ल 'नेमि नेमिनाथ स्तवन-भट्रारक शुभचन्द्र (प्रथम) जो निर्वाण काव्य भी लिखा था यह एक अतान्त लघु कृति है १६वी शताब्दी के मूर्धन्य भट्रारक रहे तथा जिन्होंने जिसमे तीर्थकर नेमि की भक्तिपूर्वक वन्दना की है इसकी 'पांडव पुराण जैसा महत्त्वपूर्ण ग्रथ लिखा उन्होने ही हिंदी प्रति भट्टारक दिगम्बर जैन मन्दिर, अजमेर के भण्डार भाषा में नेमिनाथ स्तवन की रचना की थी। स्तवन में मे है। कूल २५ छन्द है और इस कृति को 'नेमिनाथ छन्द भी नेमि गोत-इस गीत की रचना बाई अजीतमती ने कहते हैं । कृति का उल्लेख 'जिन रत्नकोश: मे हुआ है। की थी। ये भट्टारक वादिचन्द्र की प्रमुख शिष्या थी। वस्तुत. नेमिनाथ के जीवन पर सर्वाधिक रचनाएँ इन्होने कई स्फुट पदो और गीतो की रचना को 'नेमिगीत' सत्रहवी शताब्दी में लिखी गयी जैसा कि आगामी पृष्ठों से राग बसन्त मे निबद्ध है और कुल छन्द सख्या छ: है। स्वतः स्पष्ट हो जाएगा। गीत का प्रथम छन्द प्रस्तुत हैनेमोश्वर गीत–प्रस्तुत गीत के रचयिता जयसागर श्री सरस्वती देवी नमीय पाय, भट्टारक रत्नकीर्ति के प्रमुख शिष्यो में से थे परन्तु इनके गाए सुं गुण श्री नेमि जिन राय । जीवन के सम्बन्ध में अधिक जानकारी नही मिलती। जेह नामि सौस अनत थाय, 'नेमीश्वर गीत' की भी कोई प्रति उपलब्ध नहीं तदपि भूरि पातिग भर दुरे पलाय ॥१॥ इनके द्वारा रचित 'चुनडी गीत' प्रकाशित हो गया है। नेमि जी को मंगल-इसके रचयिता श्री विश्वजिसे 'चारित्र चुनड़ी' भी कहते हैं। इस रूपक गीत में बलात्कार गण की अटेर शाखा के ख्याति प्राप्त भट्टारक Page #121 -------------------------------------------------------------------------- ________________ नेमि शीर्षक हिन्दी साहित्य थे । नेमि जी को मंगल रचना आपने संवत् १६९८ में नेमीर राजुल विवाह-इसके रचनाकार ब्रह्म की थी। कृति की एक पूर्ण प्रति दिगम्बर जैन मन्दिर ज्ञान सागर के विषय में अधिक जानकारी उपलब्ध नही पाटोदी का, जयपुर, गु० न० १२ मे सकलित है । कवि हो सकी। कृति की एकमात्र प्रति गुटका नं०५० (पत्र विश्वभूषण कृत 'लक्षुरि नेमीश्वर की' की प्रति दिगम्बर संख्या २६ से ३१ तक पाटोदी के मन्विर जयपुर के शास्त्र जैन मन्दिर विजयराम पाड्या, जयपुर के भडार मे गुटका भण्डार मे है अन्त इस प्रकार है - नं. ४ मे सग्रहीत है। राजमती प्रबोध के सुध भाव सयम लीयो। नेमिनाथ रास-यं तो रूपचन्द नाम के अनेक ब्रह्म ज्ञान सागर कहे वाद नेमि राजुल कीयो । कवि हुए है परन्तु आलोच्य कृति के रचनाकार पाण्डे नेमिनाथ फाग-कृतिकार भट्टारक रत्नकीत्ति रूपचन्द भगवानदास के पुत्र थे । नेमिनाथ रास की रचना सत्रहवीं शताब्दी के मूर्धन्य सत एव साहित्यकार थे। सवत् १६९० के लगभग की थी। रूपचन्द कवि विरचित भट्टारक अभयनन्दी ने सवत १६३० में भट्टारक पद पर 'राजल विनती' (मुटका न० ८१ शास्त्र भण्डार, श्री महा इनका महाभिषेक किया था। नेमिनाथ भाग की रचना वीर जी) तथा 'नेमिनाथ स्तवन' (गुटका न० ७६ भट्टार गुजरात के हासोट नगर गहुयी थी। इस कति मे कुल कीय दि० जैन मन्दिर, अजमेर) का भी उल्लेख मिला है। ६६ पद्य है जो राग केदारमें निबद्ध है । भट्टा. रत्नकीति ने नेमि जनंद ब्याहलो-इसके रचनाकार खेतसी गुजरात के हो घोघा नगर मे 'नेमिनाथ बारहमासा' लिखा अथा खेतसिह है । ये सादू शाखा के चारण कवि और था। यह २४ पद्यो की सुन्दर लघु कृति है जिसमे राजुल जोधपुर नरेश के आश्रित थे। 'ब्याहलो' का सृजन इन्होने की व्यथा सशक्त रूप में व्यंजित है। इनके अतिरिक्त सत सवत् १६६१ मे किया था । कविता मे खेतसी अपना कवि ने नेमिराजीमती से सम्बन्धित अनेक स्फुट गीतो की 'सहि' या 'साहि' नाम प्रयुक्त करते थे । नेमि जिनद रचना की थी। ये गीत विभिन्न रागो मे यथा मल्हार. व्याहलो की प्रतिया-(१)गुटका न० ६५ पाटोदी का मदिर केदार मारुणी, सारग, आसावरी आदि मे निबद्ध है। फाग, जयपुर, (२) गुटका न० ६ दिगम्बर जैन मन्दिर पार्श्व बारहमासा तथा कुछ गति डा० कस्तूरचन्द कासलीवाल नाथ, जयपुर (५) गुटका न० ४२ शास्त्र भण्डार श्री लिखित पुस्तक 'भट्टारक रत्नकीत्ति एव कुमुदचन्द्र : महावीर जी मे उपलब्ध हैं। व्यक्तित्व एवकृतित्व' में प्रकाशित हुए हैं। नेमीश्वर के दश भवान्तर-रचयिता ब्रह्म० राजुल का बारहमासा-इसके रचयिता सत्रहवीं धर्मरुचि अभयचन्द प्रथम के शिष्य थे और इनका रचनाकाल सत्रहवीं शताब्दी का पूर्वार्ध रहा था। प्रस्तुत कृति शताब्दी के ही कवि पद्मराज हैं। सभवतः ये ही पदमराज मे तीर्थंकर नेमिनाथ के पूर्व जन्मो का विस्तृत वर्णन है। 'अभयकुमार प्रबध' के रचयिता हैं और ये खतरगच्छीय आचार्य जिनहस के प्रशिष्य और पुण्यसागर के शिष्य थे। काव्य की प्रतियां, गुटका न० १३६ बधीचन्द जी का विवेच्य रचना की एक प्रति बधीचन्द जी के मन्दिर, जयपुर मन्दिर, जयपुर तथा गुटका नं० ८टका नं० ८५ गोधों का मन्दिर, जयपुर के शास्त्र भण्डारों में संग्रहीत है। के शास्त्रभण्डार मे गुटका न. ६२ वेष्ठन १०६८ में है। नेमीश्वर को डोरडो-विवेच्य काव्य के कवि नेमिनाथ रास-रचनाकार मुनि अभयचन्द भट्टारक हर्षकीर्ति हैं। ये सत्रहवी शताब्दी के उत्तरार्ध में राजस्थान कुमुदचन्द्र के योग्य शिष्य थे और ये संवत् १६८५ मे के ख्यात सत रहे । नेमीश्वर को डोरडो में कुल २१ पद्य हैं गादी पर विराजमान हुए। नेमिनाथ रास का सृजन और काव्य भाषा राजस्थानी प्रधान है। इसकी प्रति शास्त्र । सत्रहवीं सती के उत्तरार्द्ध में किया था और इसकी प्रति भण्डार श्री महावीर जी मे है। हर्षकीति ने ही नेमिनाथ गुटका न ५३ वेष्टन ५६२ में भट्टारकीय दिग० जैन मन्दिर का बारहमासा, (गुटका न० १६२ वधीचन्द्र जी का मन्दिर अजमेर के शास्त्रभण्डार में है। कवि की एक अन्य प्रसिद्ध जयपुर) तथा नेमिराजुल की भक्ति विषयक ६६ स्फुट पदो हो कति 'चन्दागीत' है जिसमें कालिदास के मेघदूत की विरही कृति च की रचना की थी। यक्ष की भांति राजुल भी अपना संदेश चन्द्रमा के माध्यम Page #122 -------------------------------------------------------------------------- ________________ १२, बर्व ३९, कि.४ अनेकान्त से नेमिनाथ के पास भेजती है। यह गीत डा० कासलीवाल कुमुदचन्द्र व्यक्तित्व' (लेखक डा० कासलीवाल) मे प्रकाशित संपादित, अिखित पुस्तक 'महा० रत्नकोति एव कुमुदचन्द्र: हुआ है। व्यक्तित्व एवं कृतित्व' में प्रकाशित किया गया है। नेमिगीत-रचयिता ब्रह्म० सयम सागर भट्टा० नेमाश्वर रास-भट्टारक वीरचन्द्र सत्रहवी शती के कुमुदचन्द्र के शिष्य थे। कवि की कोई बड़ी रचना प्राप्त प्रतिभा सम्पन्न कवि और भट्टारक लक्ष्मीचन्द के शिष्य नहीं हुयी है। नेमिगीत का सृजन सत्रहवी शताब्दी के दूसरे थे नेमीश्वर रास एक लघु कृति है जिसमे केवल नेमिनाथ चरण में किया था इसके अतिरिक्त इन्होंने नेमि विषयक के विवाह की घटना का वर्णन है तथा इसकी रचना संवत् स्फुट पद रचे जो बिभिन्न गुटको मे संकलित है। १६३३ मे पूर्ण हुई थी। वीरचन्द्र ने ही नेमिराजुल के नेमिनाथ रास-खतरगच्छीय शाखा मे नयकमल जीबन वृत पर १३३ पद्यों काएक खण्ड काव्य 'वीर विलास के शिष्य और जयमन्दिर के शिष्य कनककीत्ति ने नेमिनाथ फाग नाम है लिखा था। रास फी रचना १६३५ ई० मे की थी रास की भाषा नेमिनाथ द्वादशमासा- इसके रचयिता सुमति गुजराती प्रधान है और इसकी प्रति विनयचन्द्र ज्ञान भण्डार, सागर (सवत् १६००-१६६५) भट्टा० अभयनन्दी के शिष्य जयपुर मे उपलब्ध है। थे। प्रस्तुत बारहमासे में १३ पद्य है प्रथम १२ पद्यों में सत्रहवी शताब्दी मे ही कवि सिंहनन्दि विरचित विरहिणी राजुल की व्यथा व्यजित है और अन्तिम पद में नेमोश्वर राजमती गीत (गुटका न० २६२ भट्टारकीय कवि प्रशस्ति है । सुमति सागर ने ही एक सुन्दर 'नेमि गीत' दि० जैन मन्दिर, अजमेर) एव 'नेमीश्वर चौमासा' तथा की रचना की थी जिसमे बड़े मार्मिक ढग से वणित है कि साधुकीति रचित 'नेमिस्तवन' एवं नमिगीत का उल्लेख स्वामी के अभाव मे अबला नारि राजुल स्वयं को कैसा मिलता है। रचनाक्रम अविकल रूप से अठारहवी शती में निरीह, अनाथ, परिमल विहीन पुष्प, कमल रहित सरोवर, भौ प्रवहमान रहा। प्रतिमा विहीन मन्दिर जैसा अनुभव करतो है। गीत नेमीश्वर रास- इसके रचयिता मलूक पुत्र भाऊ है 'भट्टा० रत्नकीत्ति एव कुमुदचन्द्र : व्यक्तित्व एवं कृतित्व' जो अठारहवी शताब्दी के पूर्वाधं के ख्यात कवि रहे । पुस्तक मे प्रकाशित हुआ है। प्रस्तुत गस में कुल १५५ चौपाई छन्दो मे नेमि के वैराग्य, नेमिनाथ हमची-रचनाकार भट्टा० कुमुदचन्द्र राजुल के संयम और नेमिनाथ के निर्माण का मार्मिक (सवत् १६५६-१६८५) प्रसिद्ध भट्टा० रत्नकीति के प्रमुख निरूपण हुआ है। इसकी प्रतिया गुटका न. ६५ पाटोदी शिष्य थे। नेमीश्वर हमची मे कुल ८७ छन्द हे और भाषा का मन्दिर जयपुर तथा गुटका न० २३२ भट्टारकीय राजस्थानी-मराठी मिश्रित है। कुमुदचन्द्र कृत 'त्रण्यरति दिगम्बर जैन मन्दिर अजमेर मे सग्रहीत है। गीत' एक विरहात्मक गीत है जिसमे तीन प्रमुख ऋतुओं नेमिराजुल बारहमाता-रचनाकार जिनहर्ष मे प्रिय वियोग जनित, राजूल की मनोव्यथा का बड़ा 'जसराज' नाम से प्रख्यात थे और इसी नाम के आधार मर्मस्पर्शी चित्रण है। इसी प्रकार ३१ छन्दो बाले पर 'जसराज बावनी' को तिखा था। नेमिराजुल बारह'हिन्बोल गीत' मे कवि ने विरह विदग्धा राजीमती के मासा जिसे नेमिराजीमती बारहमास सवैया भी कहा गया सन्देश विभिन्न वाहकों के माध्यम से नेमिनाथ तक पहुंचाए है की रचना सवत् १७१५ के लगभग की थी। काव्य मे है। 'नेमिनाथ का दावशमाशा' भी कुमुदचन्द्र रचित कुल १२ सवैया छन्द है और इसकी प्रतियाँ अभय जैन १४ छन्दों की लघु कृति है अषाढ़ से सावन मास तक ग्रथालय बीकानेर तथा शास्त्र भण्डार श्री महावीर जी में प्रसारित इस गीत मे राजुल के उद्गारो की सुन्दर अभि- उपलब्ध है। जिनहर्ष कवि ने ही 'नेमोश्वर गीत' (वेष्ठन व्यक्ति हुयी है। इनके अतिरिक्त कवि ने नेमिभक्ति विषयक १२४५, बधीचन्द जी का मन्दिर जयपुर) एवं 'नेमिराजलविभिन्न रागो में बद्ध, स्फुट पदो की भी रचना की। उक्त स्तवन' गुटका नं० ६७ गेलियों का मन्दिर, जयपुर) की सभी रचनाओं का मूल पाठ 'भट्टा० रत्नकीर्ति एवं रचना की थी। Page #123 -------------------------------------------------------------------------- ________________ नेमि शीर्षका हिन्दी साहित्य नेमीश्वर गीत-रचयिता ब्रह्म धर्मसागर अठा- इसकी संवत् १७६८ में लिपिबद्ध प्रति गुटका नं. १०८ रहवीं शती के पूर्वार्द्ध के संत कवि और ये भट्टारक अभय- ठोलियों का मन्दिर, जयपुर के शास्त्र भण्डार में प्राप्य है। चन्द द्वितीय के संघ में थे। नेमीश्वर गीत में कुल १२ नेमि राजुर बारहमासा- रचनाकार लक्ष्मी छन्द है जिसमें राजुल के सौन्दर्य और विरह का सुन्दर वल्लभ खतर गच्छीय शाखा के उपाध्यक्ष लक्ष्मीकीर्ति के निरूपण हुआ है। यह गीत डा० कासलीवाल सम्पादित शिष्य थे। प्रस्तुत बारहमासा इन्होने अठारहवी शताब्दी पुस्तक 'भट्टा० रत्नकीति एवं कुमुदचन्द्र व्यक्तित्व एव के दूसरे चरण में लिखा था। काव्य में कुल १४ पद्य है कृतित्व' में दिया गया है। कवि ने इसके अतिरिक्त भी जो सभी सवैया छन्द मे निबद्ध हैं अतः गेयात्मकता सराहस्फुट गीत लिख कर नेमि प्रभु के प्रति अनन्य भक्ति का नीय बन पड़ी है। एक उदाहरण प्रस्तुत हैप्रदर्शन किया है। उमड़ी विकट घनघोर घटा चिहुं.नेमिनाथ का बारहमासा-इसके कृतिकार ओरनि मोरनि सोर मचायो। विनोदीलाल (वि० सं० १७५०) तीर्थकर नेमि के एक- चमके दिवी दामिनी यामिनी कुपंथ, निष्ठ भक्त थे अतः इनकी अनेक रचनाएँ नेमि राजुल से भामिनी कुं पिय संग भायरे । सम्बन्धित है । इनकी कृतियां अत्यधिक लोकप्रिय हुयी लिव चातक पीउ ही पीड़ लइ भई, कारण कई शास्त्र भण्डारों मे एकाधिक प्रतियां भी संग्र राजभती भुई देह छिपायों। हीत है। यह बारहमासा 'जैन पुस्तक भवन कलकत्ता' पतिया व न पादरी प्रीतम की अलि, से प्रकाशित हो चुका है । विनोदीलाल कृत 'नेमि श्रावण आयो पै नेम न आयो। व्याह' सुन्दर खण्ड काव्य है, 'राजुल पच्चीसी' २५ नेमि राजमती जखड़ी-हेमराज नाम के चार छन्दो की लघु कृति है 'नेमिनाथ के नव मगल' मे ६ छन्दो कवि हो चुके हैं । विवेच्य कृति के रचनाकार पाण्डे हेममे नेमि कथा वणित है, 'नेमि राजल रेखता' उर्दू फारसी राज है । डा० कासलीवाल ने अपनी पुस्तक 'कविवर मिश्रित हिन्दी भाषा की रचना है तथा नेमिश्वर राज्ल बुलाखीदास, बुलाकीदास एव हेमराज' में पांडे हेमराज सवाद मे शीर्षक के अनुरूप सवाद शैली मे नेमि के वैराग्य- रचित जखडी की जिस प्रति का परिचय दिया है उसे पूर्ण उत्तर और विरहिणी राजुल के प्रश्न मार्मिक रूप से तिलोकचन्द पटवारी चाकसू वाले ने सवत् १७८२ मे प्रस्तुत है। दिल्ली मे लिपिबद्ध किया था। इस लघु रचना की एक नेमिनाथाष्टक-रचयिता भूधरदास अठारहवी। प्रति बधीचन्द जी के मन्दिर, जयपुर गुटका न० १२४ शताब्दी मूर्धन्य साहित्यकारों में से है। 'नेमिनाथाष्टक' में भी है। आठ छन्दों को एक स्वतन्त्र लघु कति है जिसकी प्रति, नामकुमार को चू दड़ा-एक मुनि हेमचन्द्र रचित गुटका न० ३६५ शास्त्र भण्डार श्री महावीर जी मे है। 'नेमि कुमार की चूदड़ी' देखने का लेखिका को अवसर कवि भधरदास ने 'भघर विलास' नामक पद सग्रह मे मिला । यह कुल ६ पृष्ठो की लघु कृति है और इसकी नेमि राजल पर अनेक पद लिखे है जिनका परिचय पूर्ण प्रति दिगम्बर जैन मन्दिर बड़ा तेरापथियो के शास्त्रडा० प्रेमसागर जैन ने अपनी पुस्तक हिन्दी जैन भक्ति भण्डार के वेष्ठन ६१५ मे सकलित है । गीत की टेक है काव्य और कवि' मे दिया है। "मेरी सील सू रगी चूदड़ी"। नेमिनाथ चरित्र-कवि अजयराज पाटणी ने सवत नेमोश्वर रास -कवि नेमिचन्द्र ने नेमीश्वर रास १७९३ मे नेमिनाथ चरित्र की रचना की थी। काव्य- की रचना संवत् १७६६ मे की थी लेखिका को बधीचन्द सृजन की प्रेरणा इन्हे अम्बावती नगर के जिन मन्दिर मे जी के मन्दिर, जयपुर (वेष्ठन १००८) से जो प्रति प्राप्त स्थापित तीर्थकर नेमिनाथनाथ की मनोज्ञ प्रतिमा को देख हुई उसका लेखन काल स० १७८२ है। वस्तुतः यह एक कर मिली। प्रस्तुत काव्य में कुल २६४ पद्य हैं और सुन्दर वारह मासा है और कुल १२ छन्दो में राजुल की Page #124 -------------------------------------------------------------------------- ________________ १४, वर्ष ३९, कि०४ अनेकान्त व्यथा का हृदयस्पर्शी चित्रण हुअा है। रास का प्रारम्भ छन्द संख्या ८६ है। कन्नौजी भाषा प्रभावित इस खण्ड मंगसिर मास सेकिया है तथा गीत की टेक पक्नि है- काव्य को कवि ने दोहा, चौपाई, सोरठा प्रादि छन्दों में 'कू तो मोहि साहिब सांवला, निबद्ध किया है। इस कति पर समीक्षात्मक लेख डाक्टर राणी राजल इमि पर वीन वै।' नेमिचन्द शास्त्री ने 'हिन्दी जैन साहित्य परिशीलन' पुस्तक नेमि राजुल गीत-१८यो शताब्दी के भट्रा० शूभ- के भाग १ मे लिखा है। चन्द्र (द्वितीय) जो कि अभयचन्द्र के शिष्य थे ने भी नमि- नेमि-चरित्र-जयमल कवि विरचित इस कृति राजुल के जीवन घटनाओं पर आधारित भक्तिपरक गीतो का रचनाकाल सवत् १८०४ है और इसकी प्रतियां श्री की सृष्टि की थी। एक गीत की दो पक्तियां प्रस्तुत है- महावीर जी के शास्त्र भडार, जयपुर में संग्रहीत है । कौन सखि सुधि लावे श्याम की। नेमिनाथ के दश भव-इसकी रचना सेवण कवि मधुरी धुनि मुखचन्द विराजति राजमती गुण गावे ॥ ने की थी।। इस सधु कृति की संवत् १९१८ में लिपि नेमिनाथ रास- इसके रचयिता विजयदेव सूरि बद्ध प्रति दिगम्बर जैन मन्दिर विजयराम पांडया, जयपुर है। रास की एक पूर्ण प्रति जिसकी पत्र संख्या ४ तथा के शास्त्र भदार (वेश्ठन ३५४) तथा एक प्रति श्री महालिपिकाल सवत् १८२६ है । पाटोदी के मन्दिर, जयपुर वीर जी के शास्त्र भण्डार के गुटका न० १६० में (वेष्ठन न० १०२६) मे एव दो प्रतिया श्री महावीर जी उपलब्ध है। के शास्त्र भण्डार (गुटका न० ३५ और २.६) में नेम जी का चरित्र-आणंद कवि विरचित 'नेमि सग्रहीत है। जी का चरित्र' का रचनाकाल सवत् १८०४ है । इसकी नेमिनाथ का बारहमासा-रचनाकार श्यामदास सवत् १८५१ मे लिखो गई प्रति पाटोदी के मन्दिर, जयगोधा है और काव्य-रचना सवत् १७८६ में की थी। पुर (वेष्ठन २२५७) तथा एक श्री महावीर जी के शास्त्र बारह मासे को पूर्ण प्रति बधीचन्द जी के मन्दिर जापुर भण्डार (गुटका न० १४ मे है।) के शास्त्र भण्डार गुट का न १६१ मे है। नम जी राजुल पाहलो-कवि गोपीकृष्ण कृत उपर्युक्त रचनाओ के अतिरिक्त अठारहवी शताबी सवत् १८६३ की रचना है। इसकी अपूर्ण प्रति पाटोदी मे कवि भवानीदास ने 'नेमिनाथ बारह मासा', नेमि के मदिर, जयपुर मे है जिसकी प्रारम्भिक पक्तियां हैहिण्डोलना; राजमतो हिण्डोलना, और नेमिनाथ राजमती, श्री जिन चरण कमल नमो नमो अणगार । गीत' लिखे तथा कवि विनय विजय ने 'नेमिनाय भ्रमर नेमिनाथ रठाल तणे ब्याहलो कहुं सुखद्राय । गीत स्तवन' और 'नेमिनाथ बारह मासा' की थी। इनका नेमि ब्याहलो-इसको सवत् १८४८ मे कवि हीरा उल्लेख डा. प्रेमसागर जैन ने हिन्दी जैन भक्ति काव्य ने लिखा था। काव्य की एक पूर्ण प्रति जिसकी कुल पृष्ठ कवि' शीर्षक पुस्तक में किया है। नेमि विषयक साहित्य सख्या ११ है वधीचन्द जी के मन्दिर, जयपुर के शास्त्र की रचना उन्नीसवी शताब्दी मे भी रुकी नही पर प्रमाण भण्डार, वेष्ठन ११५० मे है। मे अवश्य कमी आ गई । इस शती की रचनाओ का परि- नेमिनाथ पुराण-भागचन्द लिखित यह एक मात्र चय निम्नलिखित है। गद्य कृति है । इसकी पत्र संख्या १६६ तथा रचनाकाल नेमि चन्द्रिका १६वी शताब्दी की महत्त्वपूर्ण सवत् १०७ है । लेखिका ते जिस प्रति का अध्ययन कृतियो में मनरगलाल विरचित 'नेमि चन्द्रिका' है। इसको किया वह गोधो के मन्दिर, जयपुर के भण्डार मे (वेष्ठन रचना सवत् १८८० में हुई थी। लेखिका को दिगम्बर १५३) सग्रहीत है । कृति के प्रारम्भ मे ही लेखक ने स्पष्ट जैन मदिर बड़ा तेरापथियो का जयपुर (वेष्ठन ६१६) से किया है "जो पुराण पूर्व गुण भद्रादि आचार्य निकरि जो प्रति मिली उसका लिपिकाल सवत् १८८३ व लिपि- कह्या ताही में अल्पज्ञानी कहूगा।" अतः कथ्य की दृष्टि कार खुशालचन्द पल्लीवाल है। पत्र सख्या १६ तथा कुल से तो नही परन्तु खड़ी बोली हिन्दी की गद्य भाषा के Page #125 -------------------------------------------------------------------------- ________________ नेमि शीर्वक हिन्दी साहित्य विकास क्रम को जानने की दृष्टि से यह पुराण महत्त्व- का शास्त्र भंडार गुटका ५५ वेष्ठन २७२ । नेम ब्याह पञ्चीसो-कवि वेगराज । पूर्ण प्रति, बीसवीं शताब्दी के विवेच्य विषय से सम्बन्धित केवल दिगम्बर जैन मन्दिर वोरमली, कोटा काशास्त्र भंडार एक कति का परिचय मिला है वह है कवि बालचन्द्र जैन गुटका न० ३ वेष्ठन ३५२ । रचित 'राजुल' खण्ड काव्य । यह काव्य साहित्य साधना नेमिनाथ स्तवन-५० कुशलचन्द । इसकी प्रति समिति काशी से सन् १९४८ में प्रकाशित हआ था। कथा श्री महावीर जी के शास्त्र भडार मे गुटका नं० ५६ में है. में नवीनता यह है कि कवि ने विवाह सम्बन्ध निश्चित नेमिनाथ का ब्याहला-नाथ कवि । एक प्रति होने से पूर्व ही नेमि कुमार और राजल का साक्षत्कार बधीचन्द जी का मन्दिर जयपुर वेष्ठन ६७थ तथा एक द्वारिका की वाटिका में कराया है। वहां नेमिनाथ एक प्रति दिगम्बर जैन दीवान जी का मन्दिर, गटका नं०११ मतवाले गज से उग्रसेन-कन्या राजीमती की रक्षा करते वेष्ठन ३६ । हैं । इस प्रकार पूर्व राग से राजुल की विरह-व्यथा की राजुन नेम का बारह मामा-कांतिविजय रचित मर्मस्पर्शिता और भी बढ़ गई है। एक अश प्रस्तुत है... इस कति की प्रति श्री महावीर जी के शास्त्र भंडार मे किया समर्पित हृदय आज तन भी मैं गौ । सग्रहीत है। जीवन का सर्बस्व और धन उनको सौप ।। नेमि जी की लहर-4 इंगो। इसकी प्रति श्री रहें कही भी किन्तु सदा वे मेरे स्वामी। महावीर जी के भडार में 'नेमिनाथ फा' ना. से है तथा मैं उनका अनुकरण करूं बन पथ अनुमागी।। बधीचन्द जी के मन्दिर जयपुर मे 'नेमि जो की लहर' अनेक ऐसौ रचनाएं भी है जिनके रचनाकाल के शीपं से (वेष्ठन १२७८)। सम्बन्ध में अभी जानकारी नहीं प्राप्त हो सको उ का ने म राजन गीत-बुगरमी बैनाडा । प्रति बधीसंक्षिप्त उल्लेख अभीष्ट है। हा । उन कृतियों का, चन्द जी का मदिर, जयपुर वेष्ठन १२७६ । नमिश को विनती-चद कवि आमेर शास्त्रजिनकी संख्या भी कुछ नही, उल्लेख नहीं किया जा रहा जिनके रचनाकार और रचनाकाल क भी पता नहीं । भदार, श्री महावीर जी, गुटका २५। नेमिनाथ राराकवि ऋषि समन द कन पत्र नंग गोत-लब्धि विजय कन । ढोलियो का मदिर संख्या ३ । पूर्ण प्रति, पाटोदी का मन्दिर जनार, बेठन जापुर, गुटका न०६७ । नदिनाप मंगल-लालचद कवि । एक प्रति २१४० । नेमि स्तवन-ऋषि शिव , पत्र संख्या २ । पूर्ण दोलियो का मदिर, जयपुर गुटका १२४ एक प्रति पाटोदी प्रति पाटोदी का मन्दिर, जयपुर बेष्टन १०८ का मदिर, जयपुर गुटका न० ४१ तथा एक प्रति दिगम्बर नेमि स्तवन--जित मागर मणि । कुल पृष्ठ मख्या जैन अग्रवाल पचायती मदिर, अलवर, गुटका न०६ मे १। पूर्ण प्रति उक्त भण्डार वेष्ठा १२१५ । सग्रहो।। नेमि गीत-कवि पाम वन्द । उक्न भण्डार, वेऽटन बारहमासा र जुल -- कवि हरदैदास । शास्त्र१८४७ । भण्डार श्री महावीर जी गुट का न० ४६१ । नेमि राजमतो गीत-कवि हीरानन्द । उक्त ननि जी की मेरी ब्रह्म नाथु । पूर्ण प्रति, दि. भंडार, वेऽटन २१७४ । जैन पचायती मदिर, बयाना के शास्त्र भडार गुटका न. नमि राजमती गीत-छीतरमल । पत्र संख्या १। १, वेष्ठन १५० में सकालत है। उक्त शास्त्र भंडार वेष्ठन २१३५ । नोट--विद्वानो की आलोचनात्मक सम्मतियां राजुल सज्झाय-पं० जिनदास कृत ३७ पदो की आमन्त्रित है। ३, सदर बाजार रचना। दिगम्बर जैन मन्दिर विजयराम पाध्या, जयपुर लखनऊ-२२६००२। Page #126 -------------------------------------------------------------------------- ________________ गतांक से आगे : महाकवि प्रहदास : व्यक्तित्व एवं कृतित्व D डा० कपूर चन्द जैन, खतौली पुरुदेव चम्पू सुविध राजा बाद में अच्युतेन्द्र तदनन्तर ब्रजनाभि राजमहाकवि अहंदास की प्रतिभा का चरम निदर्शन 'पुरू- पुत्र और अन्त में अहमिन्द्र हुआ। (चतुर्थ स्तबक) महादेव चम्पू' है। इसमें आद्य तीर्थंकर भगवान ऋषभदेव की राज नाभिराज और रानी मरुदेवी से उक्त अहमिन्द्र कथा वणित है। आरम्भ के तीन स्तवकों में ऋषभदेव के वषभ नामक राजपत्र आतीथंकरोनित । पूर्व भवों का सातिशय वर्णन है। बाद के ७ स्तवकों में और जन्मकल्याणक मनाये गए । (पंचम स्तबक) इसमे ऋषभ देव, भरत एवं बाहुबली का चरित्र चित्रित है। भगवान के अभिषेक और बाल-क्रीड़ाओं का सुन्दर वर्णन इसका कथा भाग अत्यन्त रोचक है, जिस पर हुआ है। अहंदास की नवनवोन्मेष शालिनी प्रतिभा से सम्पृक्त नई (षष्ठ स्तवक) इसमें ऋषभदेव की विवाह और उनके नई कल्पनाओं तथा श्लेष, विरोधाभास, परिसख्या आदि १०१ पुत्र तथा ब्राह्मी और सुन्दरी नामक दो कन्याओं के अलंकारों के पुट ने इसके सौन्दर्य को और अधिक वृद्धिगत __ जन्म का वर्णन है भरत की वाल्यावस्था का सुन्दर चित्रण कर दिया है। यही कारण है कि अजितसेन जैसे काव्य यहां हुआ है । (सप्तम स्तबक) ऋषभदेव ने पुत्र पुत्रियों शास्त्रियों ने पुरूदेव चम्प के पद्यों को उदाहरण के रूप म को विभिन्न शास्त्रों और कलाओं का उपदेश दिया। प्रस्तुत किया है। ऋषभदेव के राज्याभिषेक के बाद नीलांजना का नृत्य इसकी कथावस्तु महापुराण से ली गई है जिसमें और भगवान के वैराग्य तथा दीक्षा कल्याणक का सुन्दर अनेक परिवर्तन किये गए हैं । इसका अंगीरस शात है। वर्णन हुआ है। वर्णन हुआ है। (अष्टम स्तबक) इसमें ऋषभदेव की रसानुकूल माधुर्य गुण की मधुरता यत्र तत्र विद्यमान है। तपस्या और राजा श्रेयांस द्वारा इक्षुरस के आहार का अनेक गद्य वाणभट्ट की टक्कर लेते है। कुल २३ छन्दों वर्णन है । फाल्गुन कृष्ण एकादशी को भगवान को केवलका प्रयोग पुरूदेव चम्पू में हुआ है । अर्हद्दान का प्रिय ज्ञान हुआ। देवताओं ने दीक्षा कल्याणक मनाया। (नवम अलंकार श्लेष है इसमें भरत बाहुवलि के युद्ध का सुन्दर । स्तबक) इस में भरत की दिग्विजय और अयोध्या लौटने चित्रण हुआ है। संक्षिप्त कथा वस्तु निम्न है का वर्णन है। (दशम स्तबक) में भरत और बाहुबलि के प्रथम स्तवक में मंगलाचरण के उपरान्त कहा गया तीन युद्धों, बाहुबलि की दीक्षा, केवल ज्ञान, मुक्ति तथा राजा अतिबल के पुत्र महाबल के मन्त्री का नाम भरत को दीक्षा और मुक्ति का वर्णन है। माघ कृष्ण स्वयंबद्ध था। महाबल २२ दिन की सल्लेखना के साथ चतुर्दशी को भगवान ऋषभदेव निवांण को प्राप्त हुए । मरकर ललितांग देव हुआ। वही स्वयं प्रभा नाम को अन्तिम मंगलाचरण के साथ काव्य समाप्त हो जाता हैदेवी उत्पन्न हुई । (द्वितीय स्तबक) ललिताग का जीव जयतां मद्गम्भीरर्वचनैः परिनिवृत्तेर्हेतुः । वजजंध और स्वय प्रभा का चोव श्रीमती राजपुत्री सुरसार्थ सेवितपदः पुरूदेवस्तत्प्रबन्धश्च ।। हुआ। पण्डिता धाय के माध्यम से दोनों का मिलन मनि सव्रत काव्य : हुआ। (तृतीय स्तबक) बजजध और श्रीमती ने पचास अहंद्दाम की दूसरी महत्त्वपूर्ण कृति मुनिसुव्रतकाव्य युगल पुत्रों को उत्पन्न किया और आर्य दम्पती हुए, इसके है। स्वय कवि ने इसे 'काव्य रत्न' कहा है । यह दस सगो बाव श्रीधर तथा स्वयप्रभदेव हुए । श्रीधर का जीव का महा काव्य है जिसमें बीसवें तीर्थकर मुनिसुव्रत स्वामी Page #127 -------------------------------------------------------------------------- ________________ महाकवि अहंदास : व्यक्तित्व एवं कृतित्व का जीवन चरित्र अंकित है। कथा मूलत: महापुराण से लोंच पञ्चाश्चर्य, आहारदान आदि का वर्णन है यहीं ली गई है। कवि ने कथानक को मूलरूप में ग्रहण कर दीक्षा कल्याणक का भी वर्णन है। नवम सर्ग का नाम प्रांसगिक और अवान्तर कथाओं की योजना नहीं की है। भगवत्तपो वर्णन है जिसमें मुनिसुव्रत नाथ की तपस्या का इस पर एक प्राचीन संस्कृत टीका प्राप्त है जिसे ग्रंथ के वर्णन है अन्तिम दशम सर्ग से भगवान की जीवन और सम्पादक पं० हरनाथ द्विवेदी ने अहंदास कृत होने की विदेह मुक्ति का वर्णन में इसी कारण इसका नाम 'भगवसम्भावना प्रकट की है। टीका में वर्णनानुसार सर्गों के दुभय-मुक्ति वर्णन है । इस प्रकार तीर्थंकर मुनिसुव्रत नाथ नाम दिये गए हैं। काव्य में कुल ४.८ श्लोक हैं। डा० का समग्र चरित्र अत्यन्त मनोरम शैली में उक्त महाकाव्य श्यामशरण दीक्षित इसे पौराणिक महाकाव्य मानते हैं। हममें में चित्रित है। धार्मिक भावनाओं का प्राधान्य है। स्वयं अहंडास ने इसे तीर्थकर मुनि सुव्रतनाथ जैन धर्म के चौबीस तीर्थंकरों जिन स्तुति कहा है। इसके नायक तीर्थकर मुनि सुखत में से २०वें तीर्थंकर हैं । 'मुनि सुवत काव्य' के अतिरिक्त नाथ धीर प्रशान्त है। महाकाव्य के लक्षणानुसार इसमें अन्य कोई महाकाव्य उनके चरित्र पर लिखा सम्भवतः मंगलाचरण, सज्जन प्रशंसा तथा दुर्जन निन्दा है । अंगीरस उपलब्ध नहीं है। शान्त है। अंग रसों मे शृंगारादि पूर्णरूपेण प्रस्फुटित हुए हैं। भव्यजनकण्ठाभरण : इसका कथानक ऐतिहासिक है तथा चार पुरुषार्थों में महाकवि अहंद्दास की प्रतिभा का तीसरा निदर्शन से धर्म और मोक्ष-प्राप्ति इसके फल हैं। संध्या, सूर्योदय, " 'भव्यजनकण्ठाभरण' है जो सचमुच मे भव्यजीवों के द्वारा चन्द्रोदय ऋतु आदि का विस्तृत वर्णन यहां हुआ है। सभी कण्ठ में आभरण रूप से ही धारण करने योग्य है । महाकाव्यात्मक गुणो से विभूषित इस काव्य की सर्गानुसार कवि ने २४२ पद्यों में देव, शास्त्र, गुरू, सम्यग्दर्शन, सम्यकथा वस्तु निम्न है ग्यान, सम्यक्चारित्र का यथार्थ स्वरूप प्रस्तुत किया है। 'भगवभिजन वर्णन' नामक प्रथम सर्ग में मगला. भव्यजनकण्ठाभरण की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि चरणोपरान्त कहा गया गया है कि जम्बूद्वीपस्थ आर्यखंड उसमें कहीं भी व्यर्थ विस्तार नहीं हैं, हां जितना आवश्यक में मगध नाम का एक देश है । 'भगवज्जननी जनक वर्णन' है, उतना छोड़ा भी नही गया है । संक्षेप में आवश्यक दूसरे सर्ग में राजगृह के शासक सुमित्र और उसकी रानी बात को निबद्ध करना अहंदास की अपनी विशेषता है। पद्मावती का सौन्दर्य चित्रण है। 'भगवत् गर्भावतार वर्णन' अन्तिम पद्य में 'अहंद्दास' नाम आने से इसमें कोई संशय नामक तीसरे सर्ग में कहा गया है कि रानी पद्मावती ने नही कि यह कृति अहंदास को ही है। इसके साथ ही, सोलह स्वप्न देखे अनन्तर श्रावण कृष्ण द्वितीया को श्रवण जैसा कि हम पीछे बता चुके हैं, पुरूदेव चम्पू तथा मुनि नक्षत्र तथा शिव योग में गजाकरा से मुनि सुव्रतनाम सुब्रत काव्य की तरह भव्यजनकण्ठाभरण के पद्य २३६ में तीर्थकर ने पद्मावती के शरीर मे प्रवेश किया देवताओं भी आशाधर का नाम बड़े सम्मान के साथ अहंदास ने ने गर्भ कल्याणक मनाया । लिया है। भव्यजनकण्ठाभरण पर समन्तभद्र के रत्नकरण्ड . भगवज्जननोत्सव वर्णन' मे देवताओ द्वारा पौराणिक श्रावकाचार का अत्यधिक प्रभाव पड़ा है। और जैन परस्परा प्राप्त जन्म कल्याणक में इन्द्राणी द्वारा काव्य के प्रथम पांच पद्यों में कवि ने पंच परमेष्ठी जिनेन्द्र को लेने के लिये अन्तःपुर मे जाने का वर्णन है। को नमस्कार करने के बाद भव्यजनकण्ठाभरण के निर्माण 'भगवन्मन्दरानयन वर्णन' नामक पाचवें सर्ग तथा 'भग- की प्रतिज्ञा की है। आगे काव्य का प्रारम्भ करते हुए एक वज्जन्माभिषेक वर्णन' में सुमेर पर्वत की पाण्डुक शिला पर ही पद्य के द्वारा बड़े सुन्दर ढंग से ग्रन्थ मे वर्ण्य विषय का अभिषेक का तथा 'भगवत्कौमारयौवनदारकर्म साम्राज्य निर्देश कर दिया है। तदनन्तर तर्कपूर्ण शैली में आप्त की वर्णन' सर्ग मे नामानुरूप कुमारावस्था और साम्राज्य का परिभाषा दी गई है । १२बें पद्य में कहा है कि यदि सब वर्णन है। देशों और कालों को जानकर आप कहते हैं कि प्राप्त नही भगवत्परिनिष्क्रमण वर्णन सर्ग में भगवान के केश (शेष पृ० २६ पर) Page #128 -------------------------------------------------------------------------- ________________ गतांक से आगे: भगवती प्राराधना में तप का स्वरूप 0 कु.निशा, विजनौर परिहार-आगम मे कथित विधान के अनुसार आदि का नाम न छिपाकर तथा जिस आगम का अध्ययन दिवस आदि के विभाग से अपराधी मुनि को संघ से दूर करना है उसके लिए विशेष ता अपनाते हुए, आगम में कर देना परिहार प्रायश्चित है। यह निजगुणानुपस्थान, तथा उसके ज्ञाताओं में भक्ति रखते हुए, स्वाध्याय के सपरगणोपस्थान और पारंचिक के भेद से तीन प्रकारका है। लिए शास्त्रविहित काल में, पीछी सहित हाथ जोड़कर, व्युत्सर्ग-मलोत्सर्ग आदि में अतीचार लगने पर एकाग्रचित्त से मन, वचन, काय की शुद्धिपूर्वक जो युक्तिप्रशस्त ध्यान का अवलम्बन लेकर अन्तर्महतं आदिकाल- पूर्वक आगम का अध्ययन, चिन्तन, व्याख्यान आदि किया पर्यन्त कायोत्सर्ग पूर्वक अर्थात् शरीर से ममत्व त्यागकर जाता है वह ज्ञानविनय है, वह आठ प्रकार का है। खड़े रहना व्युत्सर्ग प्रायश्चित है। दर्शन विनय-उपगृहन आदि तथा भक्ति आदि श्रयान---जिसने अपना धर्म त्यागकर मिथ्यात्व गणों को धारण करना और शका आदि का त्याग करना को स्वीकार कर लिया है, उसे पुन: दीक्षा देने को श्रद्धान ही दर्शन विनय है । एक अन्य स्थान पर कहा गया है कि प्रायश्चित कहते हैं । उसको उपस्थान प्रायश्चित भी कहा भक्ति, पूजा, वर्णजनन और अवर्णवाद का नाश करना जाता है। आसादना को दूर करना दर्शन विनय है । अनगार धर्माविनय-विनयतीति विनयः "विनय' वि उपसर्गपूर्वक मृत में दर्शन विनय को इस प्रकार कहा है-का, कांक्षा 'नी नयने' धातु से बना है। यह विनय का निरुक्त्यर्थ है। आदि अविचारों को दूर करना दर्शन विनय है। इसी विनयति के दो अर्थ हैं-दूर करना और विशेष रूप से प्रकार उप-गूहन , स्थितिकरण आदि गुणों से युक्त करना प्राप्त करना । अर्थात् जो अप्रशस्त कर्मों को दूर करती है भी दर्शन विनय है। नथा अर्हन्त आदि के गुणों मे अनुरागरूप और विशेष रूप से स्वर्ग और मोक्ष को प्राप्त कराती है शक्तिपूजा, विद्वानों की सभा में युक्ति बल से जिन शासन वह विनय है। इसी प्रकार क्रोधादि कपायो और स्पर्शन को यशस्वी बनाना और उस पर लगे मिथ्या दोषों को आदि इन्द्रियों का सर्वथा निरोध करने को या शास्त्र- दूर करना, अवज्ञा भाव दूर करके आदर उत्पन्न करना विहित कर्म में प्रवृत्ति करने को या सम्यग्दर्शन आदि और ये सभी दर्शन विनय हैं। उनसे सम्पन्न साधकों पर अनुग्रह करने वाले राजाओ का चारित्र विनय-इन्द्रिय और कषाय रूप से आत्मा यथायोग्य उपकार करने को विनय कहते है । ज्ञान विनय, की परिणित न होना गुप्तियां और समितियाँ संक्षेप रूप से दर्शन विनय, चारित्र विनय और तप विनय और उपचार पालना चारित्र विनय है। एक अन्य स्थान पर कहा गया विनय के भेद से विनय पांच प्रकार की होती है। तत्त्वार्थ है-कर्मों के ग्रहण मे निमित्त क्रियाओं को त्यागना ही शास्त्र के विचारकों ने दर्शन ज्ञान, चारित्र और उपचार चारित्र विनय है । इन्द्रियों के रुचिकर और अरुचिकर ये चार भेद विनय के कहे है। विषयों मे राग-द्वेष को त्यागकर, उत्पन्न हुए क्रोध, मान, ज्ञान विनय-काल, विनय, उपधान, बहुमान, माया और लोभ का छेदन करके, समितियो मे उत्साह निह्नव, व्यञ्जन शुद्धि; अर्थशुद्धि उभय शुद्धि ये ज्ञान करके, शुभ मन, वचन, काय की प्रवृत्तियों में आदर रखते सम्बन्धित विनय आठ प्रकार की हैं । सागार धर्मामृत में हुए तथा व्रतों की सामान्य और विशेष भावनाओ के द्वारा लिखा है-शब्द, अर्थ और दोनो की शुद्धतापूर्वक गुरु अहिंसा आदि व्रतों को निर्मल करता हुआ पुण्यात्मा साधु Page #129 -------------------------------------------------------------------------- ________________ भगवती आराधना में तप का स्वरूप स्वर्ग और मोक्ष लक्ष्मी के पोषक चारित्र विनय को विवरण इस प्रकार है-उनके आने पर आदर पूर्वक खड़े करता है। होना, उनके योग्य पुस्तक आदि देना, ऊँचे आसन पर नहीं तप विनय-उत्तर गुण अर्थात् सयम मे उद्यम, बैठना, जाते हुए के साथ कुछ दूर तक जाना, उनके लिए सम्यक् रीति से भूख-प्यास आदि को सहन करना, तप मे आसनादि लाना, काल भाव और शरीर के योग्य कार्य श्रद्धा, उचित छह आवश्यको मे न्यूनता या आधिक्य न करना और प्रणाम करना है। होना, तपोधिक साधु मे और तप मे भक्ति तया अपने से वाचिक विनय-पूजापूर्वक वचन, हितकारी, मित तप में हीन मुनियो का तिरस्कार न करना यह आगमा- भाषण, मधुर भाषण, गृहस्थों के सम्बन्ध से रहित वचन, नुसार आचरण करने वाले मुनि की तप विनय है । रोग सूत्रानुसार वचन, अनिष्ठर और अकर्कश वचन, उपशान्त आदि होने पर अथवा रागादि को दूर करने के लिए जो वचन, किया से रहित वचन, अवज्ञा से रहितवचन बोलना पूर्वोक्त आवश्यको को पालता है, परिग्रहो को सहता है, वाचिक विनय है। यह वाचिक विनय यथायोग्य करने उत्तर गुणों मे अथवा ऊपर के गुण स्थानो मे जाने का योग्य होती है । वाचिक विनय चार प्रकार की है-हित इच्छुक है, जो तपोवृद्धो और अनशन आदि तो का सेवन वचन, मित वचन, परिमित वचन और सूत्रानुसार वचन । करता है तथा जो तपोहीन की अवहेलना न करके यथा अनगार धर्मामृत में भी विनय के इन्हीं चार भेदों का योग्य आदर करता है, वह साधु तप विनय का पालक उल्लेख किया गया है। होता है। मानसिक विनय-पाप को लाने वाले परिणामों उपचारविनय--पाँचवी औपचारिक विनय कायिक, को न करना, प्रिय और हित में ही परिणाम लगाना वाचनिक और मानसिक के भेद से तीन प्रकार की है और सक्षेप मे यही मानसिक विनय है। मानसिक विनय के दो वह तीनो विनय प्रत्यक्ष और परोक्ष के भेद से दो प्रकार भेद है-अशुभ मन की निवृत्ति तथा शुभ मन की प्रवृत्ति, की है। अनगार धर्मामत में कहा है कि अशुभ भावों को रोकता कायिक विनय-खड़े होना, वन्दना करना, शरीर हुआ और धर्मापार के काया मे तथा सम्यग्ज्ञानादि विषय को नम्र करना, दोनो को जोड़ना, सिर को नवाना, गरु मे मन को लगाता हुआ मुमुक्ष दो प्रकार की विजय को के बैठने अथवा खड़े होने पर उनके सामने जाना, जाते प्राप्त होता है। हुए के पीछे-पीछे गमन करना, नीचा स्थान, नीचा गमन, इस प्रकार यह प्रत्यक्ष विनय है, तथा गुरु के अभाव नीचा आसन, नीचे सोना, आसन देना, उपकरण देना और में भी आज्ञा निर्देश का आचरण करने पर परोक्ष विनय अवकाश दान ये उपचार विनय के प्रकार हैं। इसी प्रकार होती है । अत: मुनि को प्रमाद रहित होकर यह विनय गुरु गुरू आदि के अनुकूल स्पर्शन, अवस्था के अनुरूप वैयावृत्य के अतिरिक्त अपने से उत्कृष्ट तथा अपने से हीन मुनि में करना, आज्ञा का पालन करना, तृण आदि का संथारा आर्यिकाओ मे, गृहस्थो मे भी करनी चाहिए। करना, उपकरणों की प्रति लेखना करना इसी प्रकार और विनय का महत्व-विनय मोल का द्वार है। भी जो उपकार यथायोग्य अपने शरीर द्वारा किया जाता विनय से सयम और ज्ञान की प्राप्ति होती है ! उसके है वह कायिक विनय है । कायिक विनय के सात भेद है। द्वारा आचार्य और सर्वसघ आराधित होता है। विनय से ७ भेद इस प्रकार हैं-अभ्युत्थान, सन्नति, आसनदान, ही मनुष्य की सम्पूर्ण शिक्षा सफल है । विनय शिक्षा का अनुप्रवान, प्रतिरूप क्रियाकर्म, आसन, त्याग और अनु- फल है। और विनय का फल सर्वकल्याण है। आचार, प्रजन । अनगार धर्मामृत में कहा है-सिद्धि के इच्छुक जीवो गुणों का प्रकाशन, आत्मशुद्धि, वैमनस्य क साधुओं को गुरुजनों के उपस्थित होने पर सात प्रकार की अभाव, आर्जव, मार्दव, लघुत्व, भक्ति, अपने और दूसरों काय सम्बन्धी औपचारिक विनय करनी चाहिए। उनका को प्रसन्न करना, कीति. मित्रता, मान का नाश, गुरुषों Page #130 -------------------------------------------------------------------------- ________________ २०, वर्ष ३६ कि.४ का बहुमान, तीर्थंकरों की आज्ञा का पालन और गुणों को साधुओं पर मुक्ति मार्ग का घात करने वाली कोई भी अनुमोदना ये सब विनय के गुण हैं। विपत्ति आने पर, उसे अपने ही ऊपर आई हुई जानकर शारीरिक चेष्टा से अथवा सयम के अविरुद्ध औषधि, वेयावत्य-सोने बैठने के स्थान और उपकरणों की आहारादि द्वारा मान्त करता है अथवा मिथ्यात्वादिप्रति लेखना करना, योग्य आहार, योग्य औषध का देना, विष को प्रभावशाली शिक्षा के द्वारा दूर करता है वह स्वाध्याय कराना, अशक्त मुनि के शरीर का शोधन महात्मा इन्द्र, अहमिन्द्र तो क्या तीर्थकर पद के योग्य करना तथा एक करवट से दूसरी करवट लिटाना आदि होता है । इससे एकाग्रचिन्ता, ध्यान, सनाथता, ग्लानि का उपकार वैयावृत्य है । मार्ग के श्रम से थकित, चोरों हिंस्र अभाव, साधर्मीवात्सल्य आदि साधे जाते हैं। जन्तुओं, नदी रोधकों और भारी रोग से जो मुनि पीड़ित है तथा दुर्भिक्ष में फसे है, ऐसे मुनियों को धर्य आदि देना स्वाध्याय-ज्ञानावरणादि कर्मों के विनाश के लिए तथा उनका संरक्षण करना वैयावृत्य कहा जाता है । तत्पर मुमुक्षु को नित्य स्त्र ध्याय करना चाहिए । क्योकि आचार्य, उपाध्याय, तपस्वी, शैक्ष, ग्लान, गुण, कुल, संघ, ' 'स्व' अर्थात् आत्मा के लिए हितकारक परमागम के साधु और मनोज्ञ के भेद से वैयावृत्य दस प्रकार का है। 'अध्याय' अर्थात् अध्ययन को स्वाध्याय कहते हैं अथवा आचार्य आदि इन दस प्रकार के मुनियों के क्लेश और 'सु' अर्थात् सम्यक् श्रुत के अध्ययन को स्वाध्याय कहते संक्लेश को दूर करने में जो साधु मन, वचन और काय हैं। इस प्रकार स्वाध्याय की दो निरुक्तियां है। वाचना, का व्यापार करता है, वह वैयावत्य है और उसे करना चाहिए । वैयावृत्य के गुणपरिणाम, श्रद्धा, वात्सल्य, भक्ति, प्रश्न, अनुप्रेक्षा, आम्नाय और धर्मोपदेश के भेद से पात्रलाभ, सन्धान, तप, धर्म तीर्थ की परम्परा का विच्छेद स्वाध्याय के पांच भेद है । निर्दोष ग्रन्थ के पढ़ने को न होना तथा समाधि आदि अनेक गुण है । वैयावृत्य से वाचना कहते हैं । सन्देह निवारण के लिए अथवा निश्चित सर्वश की आज्ञा का पालन, आज्ञा का सयम, वैयावृत्य । को दृढ़ करने के लिए सूत्र और अर्थ के विषय में पूछना करने वाले का उपकार, निर्दोष रत्नत्रय का दान, संयम प्रश्न है । जाने हुए अर्थ का चिन्तन करना अनुप्रेक्षा है। में सहायता, ग्लानि का विनाश, धर्म की प्रभावना तथा कण्ठस्थ करना आम्नाय है । आक्षेपणी, विक्षेपणी, सवेजनी कार्य का निर्वाह होता है। और निवेदनी इन चार कथाप्रो के करने को धर्मोपदेश निन्दनीय वैयावत्य--अपने बल और वीर्य को न कहते है । मूलाचार में स्वाध्याय के परिवर्तन, वाचना, पृच्छना, अनुप्रेक्षा, और धर्मकथा भेद कहे हैं । अन्यत्र छिपाने वाला जो मुनि समर्थ होते हुए भी जिन भगवान वाचना आदि स्वाध्याय के सम्बन्ध में कहा है-विनय के द्वारा कथित क्रमानुसार यदि वयावृत्य को नही करता आदि गुणों से युक्त पान को शुद्ध प्रन्थ और अर्थ प्रदान तब वह मुनि धर्म से बहिष्कृत होता है । वैयावृत्य न करने करना वाचना स्वाध्याय है । प्रय और अर्थ के विषय मे से तीर्थंकरों को आज्ञा का भंग, श्रुत में कथित धर्म का 'क्या ऐसा है या नहीं' इस सन्देह के निवारण के लिए नाश, आचार का लोप तथा आत्मा, साधु वर्ग और प्रवचन अथवा 'ऐसा ही है' इस प्रकार के निश्चित को दृढ़ करने का त्याग होता है। के लिए प्रश्न करना पृच्छना है । अध्ययन की प्रवृत्ति मे वयावृत्य का फल-यावृत्य से साधु गुणपरिणा- होने के कारण प्रश्न को भी अध्ययन कहा जाता है अतः मादि कारणों के द्वारा तीनों लोकों को कम्पित करने वाले वह भी स्वाध्याय है। जाने हुए या निश्चित हुए अर्थ का तीर्थकर नामक पुण्यकर्म का बन्ध करता है । वयावृत्य से मन से बार-बार चिन्तन करना अनुप्रेक्षा है इसमें भी अपना और दूसरों दोनों का ही उपकार होता है । अन्यत्र स्वाध्याय का लक्षण पाया जाता है ' ग्रन्थ के शुद्धतापूर्वक कहा है कि जिस साधु या धावक का हृदय मुक्ति में पुन: पुनः उच्चारण को आम्नाय कहते हैं । देव वन्दना के तत्पर साधुओं के गुणो मे आसक्त होने के कारण उन साथ मंगल पाठपूर्वक धर्म का उपदेश देना धर्मोपदेश है। Page #131 -------------------------------------------------------------------------- ________________ भगवती आराधना में तप का स्वरूप स्वाध्याय का माहात्म्य-स्वाध्याय तप को सभी पर कदाचित् भी वियोग न हो, इस प्रकार चिन्तन करना तपों से विशेष बताते हुए कहा गया है कि सर्वज्ञ के द्वारा इष्टवियोग आत ध्यान है । क्षुधा, तृषा आदि परिषह के उपदिष्ट बाह्य और आभ्यन्तर रूप बारह प्रकार के आने पर उनको दूर करने के लिए चिन्तन करना तीसरा तपों में स्वाध्याय के समान कोई तप नहीं है और न आर्त ध्यान है। इस लोक मे पुत्रादि की प्राप्ति और परहोगा। जो मुनि विनय से युक्त होकर स्वाध्याय करते है लोक में देवादि होकर मुझे स्त्री, वस्त्रादि सभी प्राप्त हो वे उस समय पचेन्द्रियो के विषय व्यापार से रहित हो जाएंगे। इस प्रकार का चिन्तन करना चौथा निदान जाते हैं और शास्त्र का अध्ययन करने, चिन्तन करने में नामक आतं ध्यान है। एकाग्रचित्त वाले हो जाते है। स्वाध्याय भावना से मुनि रौद्र ध्यान-कषाययुक्त रौद्र ध्यान भी वोरी, झूठ, की सभी गप्तिया भावित होती है और गुप्तिया की भावना हिंसा का रक्षण तथा छह आवश्यको के भेद से चार प्रकार से मरते समय रत्नत्रय रूप परिणामों की आराधना मे का होता है। परद्रव्य के हरण करने में तत्पर होना चोरी तत्पर होती है । सम्यग्ज्ञान से रहित अज्ञानी जिस कर्म नामक प्रथप रौद्र ध्यान है। दूसरो को पीड़ा देने वाले को लाखों, करोड़ो भवो मे नष्ट करता है उसी कर्म को असत्य वचन बोलने मे यत्न करना झूठ नामक रोद्र ध्यान सम्यग्ज्ञानी तीन गुप्तियो मे युक्त होकर क्षण भर मे नष्ट है। पशु, पुत्रादि के रक्षण के विषय मे चोर, दायाद कर देता है। स्वाध्याय से मुमुक्षु की तर्कशील बुद्धि का अर्थात भागीदार आदि के मारने मे प्रयत्न करना तीसरा उत्कर्ष होता है । परमागम की बुद्धि का पोषण होता है। रोद्र ध्यान है। छह प्रकार के जीवो (पृथ्वी, जल, अग्नि, मन, इन्द्रिया और सज्ञा अर्थात् भय, मैथुन और परिग्रह वाय. वनस्पति और प्रस) के मारने के आरम्भ मे अभिकी अभिलाषा का निरोध होता है । सन्देह का छेदन होता प्राय रखना चौथा रौद्र ध्यान है। है, क्रोधादि कषायो का भेदन होता है, प्रतिदिन तप में धर्म ध्यान-आर्जव, लघुता, मार्दव, उपदेश और शर्म ध्यान-आर्जव ता. मात वृद्धि होती है, संवेग भाव बढ़ता है । परिणाम प्रशस्त होते जिनागम में स्वाभाविक रूचि ये धर्म ध्यान के लक्षण है। है समस्त अतीचार दूर होते है । अन्यवादियो का भय नष्ट एकाग्रतापूर्वक मन को रोक कर धर्म मे लीन होना ही होता है तथा मुमुक्ष जिनागम की भावना करने मे समर्थ धर्मध्यान है। यह अज्ञिाविचय, अपायविचय, विपाकहोता है। विचय और संस्थान विचय के भेद से चार प्रकार का ध्यान-राग-द्वेष और मिथ्यात्व से अछूते, वस्तु के होता है। यथार्थ स्वरूप को ग्रहण करने वाले और अन्य विषयो में आज्ञाविचय-पांच आस्तिकाय, छह जीवनिकाय संचार न करने वाले ज्ञान को ध्यान कहते है । वस्तु के और कालद्रव्य तथा अन्य कर्म बन्ध मोक्ष आदि को जो यथार्थ स्वरूप का जो ज्ञान निश्चल होता है वही ध्यान सर्वज्ञ की आज्ञा से गम्य है। आज्ञाविचय नामक धर्मध्यान तत्त्वार्थ सत्र में उत्तम सहनन वाले के एकाग्रचिन्तानिरोध के द्वारा विचारा जाता है। अच्छे उपटेहरा को ध्यान कहा है। यह आर्त ध्यान, रौद्र ध्यान, धर्मध्यान अपनी नतमस्ट होने से और ना और शुक्ल ध्यान के भेद से चार प्रकार का है। इनमे यूक्ति और उदाहरण की गति न हो तब ऐसी अवस्था में प्रथम दो ध्यान अप्रशस्त और शेष दो ध्यान प्रशस्त हैं। सर्वज्ञ के द्वारा कहे गए आगम को प्रमाण मानकर गहन पदार्थ का श्रद्धान करना कि 'यह ऐसा ही है' आज्ञाप्रार्त ध्यान-कषाययुक्त आर्तध्यान के चार भेद विचय है। हैं-अनिष्ट संयोग, इष्ट वियोग, परीषह और निदान। ज्वर, शूल, शत्रु आदि अनिष्ट से मेरा वियोग कब होगा अपाय विचय-जिन भगवान के द्वारा कथित उपइस प्रकार से चिन्तन करना अनिष्ट सयोग नामक आर्त देश के अनुसार कल्याण को प्राप्त कराने वाले उपाय का ध्यान है। पुत्र-पुत्री आदि इष्टजनों के साथ सयोग होने विचार अथवा जीवों के शुभ और अशुभ कर्म विषयक Page #132 -------------------------------------------------------------------------- ________________ २२, वर्ष , कि०४ अनेकान्त अणपों का विचार करना अपायविचयक है। मोक्ष के काययोग के होने पर ही होता है, इसी कारण इसे सूक्ष्म अभिलाषी होते हुए भी जो कुमार्गगामी है उनका विचार क्रिया कहा जाता है । सूक्ष्म काययोग मे स्थित केवली उस करते रहना कि वे मिथ्यात्व से किस तरह छूटे-यही सूक्ष्म काययोग को भी रोकने के लिए इस शुक्ल ध्यान विचय है। को ध्याता है। विपाक विचय-जीवों के एक भव या अनेक भव व्यत्सर्ग-परिग्रह का त्याग करना व्युत्सर्ग तप है। सम्बन्धी पुण्य कार्य और पाप कर्म के फल का तथा उदय, व्युत्सर्ग तप ही वि+उत+सर्ग के मेल से बना है। 'वि' उदीरण, संक्रमण, बन्ध और मोक्ष का चिन्तन करना ही अर्थात् विविध, उत अर्थात् उत्कृष्ट और सर्ग का अर्थ विपाक विचय नामक धर्म है। त्याग है । कर्मबन्ध के कारण विविध बाह्म और आभ्यन्तर संस्थान विचय-पर्याप्त अर्थात भेद रहित तथा दोषो का उत्तम त्याग अर्थात् जीवन पर्यन्त के लिस्लाभादि वैत्रासन, झल्लरी और मृदग के समान आकार सहित की अपेक्षा से रहित त्याग व्युत्सर्ग है । यह व्युत्सर्ग का ऊर्ध्वलोक, अधोलोक और मध्यलोक का चिन्तन करना निरूक्र्थ है । यह आभ्यन्तर और बाह्य के भेद से दो सस्थान विचय नामक धर्म ध्यान है और इसी से संबधित प्रकार का है। क्रोधादि आभ्यन्तर तथा क्षेत्रादि द्रव्य अनुप्रेक्षाओं का भी विचार किया है। लोक के आकार बाह्य व्युत्सर्ग है। तथा उसकी दशा का विचार करना ही सस्थानविचय है। आभ्यन्तर व्यत्सर्ग-मिथ्यात्व, वेद, राग, हास्य, शक्ज्ञ ध्यान-धर्म ध्यान पूर्ण कर लेने के पश्चात रति, अरति, शोक, भय, जुगुप्सा, चार कषायें इन चौदह क्षपक अति विशुद्ध लैश्या के साथ शुक्ल ध्यान को ध्याता अन्तरग परिग्रहों का त्याग आभ्यन्तर व्युत्सर्ग है । अनहै। शुक्ल ध्यान भी चार प्रकार का होता है--पृथक्त्व गार धर्मामृत मे व्युत्सर्ग का स्वरूप इस प्रकार किया सवितर्क, सवितर्क एकत्व, सूक्ष्मक्रिया और समुच्छिनकिया। है-पूर्वाचार्य कायत्याग को भी अन्तरंग परिग्रह का त्याग मानते हैं । यह कायत्याग नियतकाल और सार्वकालिक पथक्त्व सवितर्क-क्योकि अनेक द्रव्यो को, तीन भेद से दो प्रकार का है। उनमे नियतकाल के भी नित्य योगो के द्वारा उपशान्त मोहनीय गुणस्थान वाले मुनि और नैमित्तिक दो भेद है तथा सार्वकालिक त्याग के भक्त ध्याते हैं, इसी कारण इसे पृथक्त्व कहते है। श्रुत को वितर्क प्रत्याख्यान मरण, इगिनी मरण और प्रायोपगमन मरण कहा जाता है और पूर्वगत अर्थ में कुशल साधु ही ध्याता ये तीन भेद कहे हैं। है। इसी कारण इस ध्यान को सवितर्क कहा जाता है। बाह्य व्युत्सर्ग-क्षेत्र, वास्तु, धन, धान्य, द्विपद, तथा अर्थ व्यञ्जन और योगो के परिवर्तन रूप वीचार के चतुष्पाद, यान, शयन, आसन, कुप्य और भाण्ड इन दस होने के कारण इस शुक्ल ध्यान को सवीचार भी कहा । परिग्रहों का त्याग करना बाह्य व्युत्सर्ग है। जिस प्रकार गया है। तुष सहित चावल का तुष दूर किए बिना उयका अन्तर्मल एकत्व विसर्क-क्योकि क्षीण कषाय गुण स्थानवर्ती का शोधन करना शक्य नहीं है, उसी प्रकार वाह्य परि. मुनि के द्वारा एक ही योग का अवलम्बन लेकर एक ही ग्रह रूपी मल के त्याग के बिना उससे सम्बद्ध आभ्यन्तर द्रव्य का ध्यान किया जाता है अतः एक ही द्रव्य का अव- कर्ममल का शोधन करना शक्य नहीं है लम्बन लेने के कारण इसे एकत्व कहते है। व्युत्सर्ग तप से परिग्रहों का त्याग हो जाने से सक्ष्म क्रिया-यह शुक्ल ध्यान श्रुत के अवलम्बन निग्रंथता की सिद्धि होती है। जीवन की आशा का अन्त, से रहित होने के कारण सवितर्क है और अर्थ व्यञ्जन निर्भयता तथा रागादि दोषों की समाप्ति हो जाती है और और योगों का परिवर्तन रूप होने के कारण अवीचार । रत्नत्रय के अभ्यास में तत्परता आती है। इसमें सोच्छ्वासादि क्रिया सूक्ष्म हो जाती है और सूक्ष्म Page #133 -------------------------------------------------------------------------- ________________ 'नीतिवाक्यामृत' में राजकोष की विवेचना 0 चन्द्रशेखर एम० ए० (अर्थशास्त्र) 'नीतिवाक्यामृत' आचार्य सोमदेव सूरि की प्रसिद्ध कोष को क्षीण होने से बचाने तथा संचित कोष की वृद्धि रचना है । इस ग्रन्थ का प्रणयन विक्रम की ग्यारहवी करने के लिए प्राचीन आचार्यों ने अनेक उपाय बतलाये शताब्दी में किया गया और इसकी रचना चालुक्यों के हैं। राजनीति के ग्रन्थों मे अपने महत्व के कारण ही राज्याश्रम में हुई। यह ग्रन्थ आचार्य सोमदेव के विख्यात कोष एक स्वतन्त्र विषय रहा है। आचार्य सोमदेव ने भी चम्पू महाकाव्य के उपरा-त लिखा गया था। नीति- अन्य राजशास्त्र-प्रणेताओ की भांति इस विषय का भी वाक्यामृत का प्रधान विषय है राजनीति । राज्य एव विशद विवेचन किया है । नीतिवाक्यामृत मे कोष समुद्देश्य शासन-व्यवस्था से सम्बन्ध रखने वाली प्राय: सभी आव. कोष सम्बन्धी बातों का दिग्दर्शन करता है। श्यक बातों का विवेचन किया गया है। राज्य के सप्तांग- कोष की परिभाषा-आचार्य सोमदेव ने कोष अमात्य, जनपद, दुर्ग, कोश, बल एवं मित्र के लक्षणो पर समुद्देश्य के प्रारम्भ मे ही कोष की परिभाषा प्रस्तुत की पूर्ण प्रकाश डाला गया है । साथ ही राजधर्म की बड़े है। उनके अनुसार जो विपत्ति और सम्पत्ति के समय विस्तार के साथ व्याख्या की गई है । इस राजनीति प्रधान राजा के तन्त्र की वृद्धि करता है और उसको सुसंगठित ग्रन्थ में मानव के जीवन-स्तर को समुन्नत करने वाली करने के लिए धन की वृद्धि करता है वह कोष है। धर्मनीति, अर्थनीति एवं समाजनीति का विशद विवेचन धनाढ्य पुरुष तथा राजा को धर्म और धन की रक्षा के मिलता है। यह ग्रंथ मानव-जीवन का विज्ञान और दर्शन लिये तथा सेवको के पालन पोषण के लिए कोष की रक्षा है। यह वास्तव में प्राचीन नीति साहित्य का सारभूत करनी चाहिए । कोष की उत्पत्ति राजा के साथ ही हुई अमत है। मनुष्यमात्र को अपनी-अपनी मर्यादा मे स्थिर जैमाकि महाभारत के वर्णन से स्पष्ट होता है। उसमें रखने वाले राज्यप्रशासन एव उसे पल्लवित-सधिन एवं लिखा है कि प्रजा ने मनु के कोष के लिए पशु और सरक्षित रखने वाले राजनीतिक तत्वो का इममे वैज्ञानिक हिरण्य का पचीसवां भाग तया धान्य का दसवां भाग देना दष्टिकोण से विश्लेषण किया गया है। स्वीकार किया। जैन सन्यासी होते हुए भी उन्होने अर्थ के महत्त्व का कोष का महत्त्व-सम्पूर्ण आचार्यों ने कोष का भली-भांति अनुभव किया है । यह बात उनको दूरदर्शिता महत्व स्वीकार किया है । आचार्य सोमदेव का पूर्वोक्त की परिचायक है। नीतिवाक्यामृत मे धर्म, अर्थ और कथन-कोष ही राजाओ प्राण है-इसके महान महत्व काम की विशद व्याख्या की गई है। अर्थ पुरुषार्थ की का द्योतक है । आचार्य सोमदेव आगे लिखने हैं कि जो व्याख्या करते हुए आचार्य सोमदेव लिखते हैं-जिमसे राजा कोड़ी-कोड़ी करके अपने कोष की वृद्धि नही करता प्रयोजनों की सिद्धि हो वह अर्थ है। उमका भविष्य में कल्याण नहीं होता । आचार्य कौटिल्य राजशास्त्र प्रणेताओं ने राज्यांगो मे कोष को बहुत कोष का महत्व बतलाते हुए लिखते है कि सबका मूल महत्त्व दिया है। आचार्य सोमदेव लिखते है कि कोष ही कोष ही है । अतः राजा को मर्वप्रथम कोष की सुरक्षा के राजाओं का प्राण है। संचित कोष सकट काल मे राज्य लिए प्रयत्नशील रहना चाहिए। महाभारत में भी ऐसा रक्षा करता है । वही राज्य राष्ट्र को सुरक्षित रख सकता वर्णन आता है कि राजा को कोष की सुरक्षा का पूर्ण है जिनके पास विशाल कोष है। सचित कोप वाला राजा ध्यान रखना चाहिये । क्योकि राजा लोग कोष के ही ही युद्ध को दीर्घकाल तक चलाने में समर्थ होता है। दुर्ग अधीन है तथा राज्य की उन्नति भी कोष पर आधारित में स्थित होकर प्रतिरोधात्मक युद्ध को चलाने के लिए है। कामन्द ने कहा है कि प्रत्येक से यही सुना जाता है भी सुदृढ़ कोष की अत्यन्त आवश्यकता होती है । इसलिए कि राजा कोष के आश्रित है । कोष के इस महत्त्व के Page #134 -------------------------------------------------------------------------- ________________ २४, वर्ष २९, कि०४ अनेकान्त कारण ही मनु ने लिखा है कि सरकार तथा कोष का रहती है, क्योंकि सेना और अन्य राजकर्मचारियों को वेतन निरीक्षण राजा स्वयं ही करे क्योंकि इनका सम्बन्ध राजा में नाणक (प्रचलित मुद्रा) ही देना पड़ता है। इस मुद्रा से से ही है । याज्ञवल्क्य राजा को यह आदेश देते है कि उसे व्यक्ति अपनी आवश्यकता की वस्तुओं का सरलतापूर्वक प्रति दिन राज्य की आय-व्यय का स्वयं निरीक्षण करना क्रय कर सकता है । स्वर्ण और रजत की अधिक मात्रा चाहिए तथा इस विभाग के कर्मचारियों द्वारा संग्रहीत होने से नाणक तैयार किए जा सकते हैं । इसीलिए उत्तम स्वर्ण एवं धनराशि को कोष में जमा करना चाहिए। कोष वही है जिसमें सोना और रजत अधिक मात्रा में आचार्य सोमदेव का कथन है कि राज्य की उन्नति कोष हो। इसके अतिरिक्त यदि कोई शत्रु राजा के देश पर से होती है, न कि राजों के शरीर से । आगे वे लिखते हैं आक्रमण कर दे और उसके पास युद्ध करने के लिए कि जिसके पास कोष है, वही युद्ध मे विजयी होता है। पर्याप्त सेना न हो तो राजा साम-दामादि से शत्रु को इस प्रकार आचार्य कोष को राज्य की सर्वाङ्गीण लोटा सकता है । शत्रु को तभी धन से सतुष्ट किया जा उन्नति एवं उसकी सुरक्षा का अमोघ साधन मानते हैं। सकता है जबकि राजा का कोष स्वर्ण एवं रजत से परिकोष वाले राजा को सेवक और सैन्य सब कुछ मूलभ हो पूर्ण हो। सकते हैं परन्तु कोषहीन राजा को कोई भी वस्तु सुलभ कोष-विहीन राजा की स्थिति नहीं होती। कोषविहीन राजा नाम मात्र का ही राजा आचार्य सोमदेव सूरि ने धनहीन राजा की निन्दा की है। क्षीण कोष वाला राजा अपनी प्रजा पर धन-संग्रह के हैं, क्योकि उनकी दृष्टि में राज्य की प्रतिष्ठा एव सुरक्षा लिए अनेक प्रकार के अत्याचार करता है। जिसके परि- की आधारशिला कोष ही है। आचार्य सोमदेव का कथन णामस्वरूप प्रजा दुखी होती है और वह उसके अत्याचार है कि धनहीन व्यक्ति को तो उसकी स्त्री भी त्याग देती से तंग आकर उस देश को छोडकर अन्यत्र चली जाती हैं, फिर अन्य पुरुषों का तो कहना ही क्या ? इसका अभिहै। इससे राजा जन-शक्ति-विहीन हो जाता है। प्राय यही है कि धनहीन राजा को उसके सेवक तथा उत्तम कोष-इस बात का समर्थन सभी विद्वान् पदाधिकारी त्यागकर अन्य राजा की सेवा मे चले जाते करते हैं कि राज्य की प्रतिष्ठा, रक्षा एवं विकास के लिए है। जिससे वह असहाय अवस्था को प्राप्त होकर नष्ट हो कोष की परम आवश्यकता है। इसके साथ ही आचार्यों ने जाता है। आचार्य का यह भी कहना है कि धनहीन इस बात पर भी प्रकाश डाला है कि कौन-सा कोष उत्तम व्यक्ति (राजा) चाहे कितना ही कुलीन एव सदाचारी है । आचार्य सोमदेव उत्तम कोष का वर्णन करते हए क्यो न हो, सेवकगण उसकी सेवा करने को प्रस्तुत नही लिखते हैं कि जिस में स्वर्ण, रजत का प्राबल्य हो और होते क्योकि वहां से उन्हे धन प्राप्ति की कोई आशा नही व्यावहारिक नाणको (प्रचलित मुद्राओ) की अधिकता हो होती। इसके विपरीत नीच कुल मे उत्पन्न हुए एव चरित्र तथा जो आपात्काल मे बहत व्यय करने में समर्थ हो वह भ्रष्ट व्यक्ति से धनाढ्य होने के कारण उसे धन का स्रोत उत्तम कोष है। समझ कर सभी लोग उसकी सेवा को प्रस्तुत रहते हैं। कोष के गुण-आचार्य सोमदेव ने कोष के गुणों उक्त विवेचन का अभिप्राय है कि कुलीन और सदाकी जो व्याख्या की है वह आर्थिक दृष्टि से बहुत महत्त्व. चारी होने पर राजा को राजतन्त्र के नियमित तथा व्यवपूर्ण है । आपत्तिकाल में धान्य और पशुओ के विक्रय से स्थित रूप से चलाने के लिए न्यायोचित उपायो द्वारा पर्याप्त धन प्राप्त नहीं हो सकता। अत: जिन वस्तुओं का कोष की वृद्धि करनी चाहिए। विक्रय तुरन्त हो सके, ऐसी ही वस्तुओ का अधिक मात्रा आचार्य सोमदेव ने आगे लिखा है कि उस तालाब के में संग्रह राजकोष में होना आवश्यक है। इसी उद्देश्य से विस्तीर्ण होने से क्या लाभ है जिसमे पर्याप्त जल नही सोमदेव ऐसी वस्तुओ का संग्रह करने के लिए राजा को है। परन्तु जल से परिपूर्ण छोटा तालाब भी इससे कही परामर्श देते है । नाणक की भी कोष मे बड़ी आवश्यकता अधिक प्रशंसनीय है । सारांश यह है कि मनुष्य कुलीनता Page #135 -------------------------------------------------------------------------- ________________ 'नीतिवाक्यामृत' में राजकोष की विवेचना २५ मादि से बड़ा होने पर भी यदि दरिद्र है तो उसका बड़प्पन महान अनर्थ होगा। उसका राष्ट्र और कोष सभी कुछ व्यर्थ है क्योंकि उससे कोई भी कार्य सिद्ध नहीं हो सकता। नष्ट हो जाएगा। इसके साथ ही सोमदेव ने उन उपायों अतः नैतिक उपायों द्वारा धन का संग्रह करना महत्त्वपूर्ण का भी उल्लेख किया है, जिनके द्वारा उन राज्याधिबतलाया गया है। कारियों से उत्कोच की धन राशि पुनः प्राप्त हो सकती रिक्त राजकोष की पूर्ति के उपाय है। इसका सर्व प्रमुख उपाय यही है कि राज्याधिकारियों आचार्य सोमदेव ने रिक्तराजकोष की पूर्ति के उपायों पर पूर्ण नियन्त्रण रखा जाए, जिससे कि वे प्रजा से पर प्री प्रकाश डाला है। उनके अनुसार राजकोष को उत्कोच लेने का साहस ही न कर सकें। यदि नियंत्रण पूर्ति के निम्नलिखित उपाय हैं . रखने पर भी उन्होंने इस अनुचित रीति से धन संग्रह कर (१) ब्राह्मण और व्यापारियों से उनके द्वारा संचित लिया है तो उस धन को राजा विभिन्न उपायों से ग्रहण किए गए धन मे से क्रमशः धर्मानुष्ठान, यज्ञानुष्ठान और कर ले। कोटम्बिक पालन के अतिरिक्त जो धनराशि शेष बचे उसे अधिकारी लोग दुष्टवण के समान बिना कठोर दण्ड लेकर राजा को अपनी कोष-वृद्धि करनी चाहिए। दिए घर में उत्कोच द्वारा संचित किया हुआ धन आसानी (२) घनाढ्य पुरुष, सन्तान-विहीन धनी व्यक्ति विध- से देने को प्रस्तुत नही होते। उन्हें बार-बार उच्च पदों से वाओं का समूह और कापालिक-पाखण्डी लोगों के धन साधारण पदों पर नियुक्त करके भयभीत करना चाहिए। पर कर लगाकर उनको सम्पत्ति का कुछ अंश लेकर अपने अपनी अवनति से घबराकर वे उत्कोच का धन स्वामी को कोष की वृद्धि करे। देने के लिए प्रस्तुत हो जाते हैं । जिस प्रकार वस्तु को (३) सम्पत्तशाली देशवासियों की प्रचुर धन राशि बार-बार प्रस्तर पर पटकने से साफ किया जाता है उसी का विभाजन करके उनके भली-भांति निर्वाह योग्य धन प्रकार अधिकारियों को उनके अपराध सिद्ध होने पर छोड़कर उनसे प्रार्थना पूर्वक धन ग्रहण करके राजा को बारम्बार दण्डित करने से वे उत्कोच का धन राजा को अपने कोष की वृद्धि करनी चाहिए। सौप देते हैं । अधिकारियों में आपसी फट होने से भी (४) अचल समत्तिशाली, मन्त्री, पुरोहित और अधी- राजा के कोष की वृद्धि होती है । इसका तात्पर्य यह है नस्थ सामन्तो से अनुनय विनय करके घर जाकर उनसे कि अधिकारी वर्ग आपस में फूट के कारण एक दूसरे का वन याचना करनी चाहिए। अपराध राजा के सम्मुख प्रकट कर देते हैं, जिसके कारण इस प्रकार उक्त साधनों से राजा को अपने रिक्त उत्कोच आदि से संचित किया हुआ घन अधिकारी वर्ग से राज कोष की वृद्धि करने का प्रयत्न करना चाहिए। राजा को सरलतापूर्वक प्राप्त हो जाता है। इस प्रकार राजा को सदैव इस कार्य में प्रयत्नशील रहना चाहिए। इन समस्त साधनो से राजकोष की वृद्धि की जाती थी। कोष ही राज्य की प्राणशक्ति है और उसके अभाव में वह आचार्य सोमदेव ने अधिकारियों की सम्पत्ति को राजाओं नष्ट हो जाता है। का द्वितीय कोष बतलाया है जो कि यथार्थ ही है। उत्कोच लेने वाले राज्याधिकारियों से मापत्तिकाल में राजा अधिकारियों से प्रार्थनापूर्वक धन धन प्राप्त करना प्राप्त कर सकता है ऐसा आचार्य का मत है। इसी आचार्य सोमदेव ने उत्कोच लेने वाले राज्पाधिका- कारण अधिकारियो की सम्पत्ति को राजाओं का द्वितीय रियो की घोर निन्दा की है और उनसे राजा को सावधान कोष बतलाया गया है। रहने का परामर्श दिया है। आचार्य का मत है कि राजा उपरोक्त विवरण में यह बात पूर्णतः स्पष्ट हो जाती को उन लोगों पर कठोर नियत्रण रखना चाहिए और है कि आचार्य सोमदेव सूरि केवल एक धर्माचर्य उच्चउनके साथ कभी नहीं मिलना चाहिए । यदि राजा भी कोटि के दार्शनिक, अलौकिक तार्किक, विभिन्न विद्याओं उनमें धन के लोभ से साझीदार हो जाएगा तो इससे के ज्ञाता एवं उद्भट विद्वान ही नहीं थे, अपितु वे उच्च Page #136 -------------------------------------------------------------------------- ________________ २६, बर्ष ३६, कि०४ अनेकान्त कोटि के अर्थशास्त्री भी थे । अर्थशास्त्र के सूक्ष्म से सूक्ष्म सेवन का आदेश दिया है । आचार्य तीनों पुरुषार्थों में अर्थ सिद्धांतों का आचार्य को पूर्ण ज्ञान था। वे एक व्यावहा- को सबसे अधिक महत्व देते है, क्योंकि यही अन्य पुरुषार्थों रिक राजनीतिज्ञ थे और इस बात को भली-भांति जानते का आधार है। इनके द्वारा वणित अर्थ की परिभाषा थे कि धन के बिना राज्य का कोई भी कार्य सम्पन्न नहीं बड़ी महत्वपूर्ण एवं सारगभित है। जिससे सब प्रयोजनों हो सकता । इसी कारण उन्होंने अपने प्रण नीतिवाक्यामत सिद्धि हो उसे वह अर्थ कहते है । वास्तव में उनका कथन में कोष समुद्देश्य का समावेश किया तथा अन्य समद्देश्यो यथार्थ ही है। क्योंकि विश्व मे ऐसा कोई भी कार्य नही में भी यत्र-तत्र अर्थशास्त्रों के गूढ़ सिद्धान्तों की विवेचना जो धन से पूर्ण न हो सके । अर्थ व्यक्ति की समस्त कामकी है। धर्माचार्य होते हुए भी उन्होंने अर्थ के महत्त्व को नाओं को पूर्ण करने में समर्थ है। इसी कारण आचार्य ने है तथा कोष को राजाओ का प्राण बतलाया है। उन्होंने अर्थ को सर्वाधिक महत्व प्रदान किया है। धर्म, अर्थ, और काम तीनो पुरुषार्थों का ही समरूप से दिगम्बर जैन कालिज, बडौत (मेरठ) (पृ० १७ का शेषाश) है तो आप स्वय ही सर्वज आ'त ठहरते है और यदि सब और मांस भी जीव का शरीर है, फिर भी आर्य पुरुषों देशों और कालों को जानकर नहीं कहते तो आपका कथन को अन्न ही खाना चाहिए, माम नही । जैसे माता भी प्रमाणित नहीं माना जा सकता । आप्त के नाम पर स्त्री है और पत्नी भी स्त्री है किन्तु लोग पली को ही आप्ताभासों का बाहुल्य है । अत: आप्ताभासो (बनावटी भोगते है, माता को नही। इस प्रकार आप्त की परीक्षा आप्त) को जान लेना अत्यावश्यक है। इसी कारण ग्रन्थ- कर ११७वें श्लोक मे आप्त का स्वरूप बताते हा कहा हैकार ने आप्ताभासों का विस्तार से वर्णन किया है। शिव, आप्तोर्थतः स्यादम रागमाघरच्छांगताधे रपि भूष्यमाणः । शिवगण, गंगा, पार्वती, गणेश, वीरभद्र, ब्रह्मा, सरस्वती, तीर्थकरपिछन्नसमस्त दोषावत्तिश्चमुक्ष्मादि पदार्थदर्शी ॥ नारद, विष्णु, राम, परशुराम, बुद्ध, इद्र, आठों दिक्पाल, तदनन्तर तीर्थकर का अर्थ बताते हुए जिनेन्द्र देव का सर्य, चन्द्रमा, बद्ध, मगल, भैरव, सर्प, भैरवियाँ, गोमाता, स्वरूप बताया है और कहा है कि उनके ही श्रीमान पृथ्वी, नदी, समुद्र आदि जो भी देवी-देवता के रूप में पूजे स्वम्भ, वृषभ, शिव, विष्ण, आदि अनेक नाम है । इसके जाते हैं, एक-एक को लेकर उनकी समीक्षा की है। इतना बाद जीवाजीवादि मात तत्वो का स्वरूप और उसके बाद ही नही जैनो के भी श्वेताम्बर, यापनीय काष्ठ संघी, सम्यग्दर्शन का वर्णन है इसी सन्दर्भ मे लोक मूढ़ता का द्रविड़ सघी, निष्कुण्डिका आदि भी उनकी आलोचना स्वरूप बताया है। आठ मद और छ. अनायतनों को परिवि से बाहर नही हो पाए है। इस सन्दर्भ मे उन्होने बता कर सभ्यग्दर्शन के नि.शाक्तिनादि आठ अंगों का जो भी प्रमाण दिये हैं वे पुराण प्रसिद्ध हैं, जिससे यह वर्णन किया है। सभ्यग्दर्शन के आठ दोषों का भी विवेचन अनुमान सहज ही लगाया जा सकता है कि अहंदास जैन यही किया है । इसके बाद आठ अगों में प्रसिद्ध हुए पुराणों के साथ ही हिन्दू पुराणों के भी अशेष पण्डित थे। व्यक्तियो के नाम और सम्म ग्दर्शन का माहात्म्य बताया बुद्ध की की गई आलोचना से उनका बौद्ध दर्शन सम्बन्धी है। सात परम स्थानो का कथन कर दो पद्यों में सम्यक्अगाध पाण्डित्य प्रकट होता है। ग्यान का स्वरूप बताया है। आगे सम्यक् चरित्र का मांस भक्षण के प्रसगो को भी ग्रन्थकार ने उठाया है स्वरूप बताकर कहा गया है कि इन तीनों की पूर्णता से और बड़े वैदुष्यपूर्ण शब्दो मे मास भक्षण का निषेध किया हो मोक्ष होता है। तदनन्तर आचार्य, उपाध्याय और है। यहां भी कवि की ताकिक शैली ने विराम नही लिया साधू का स्वरूप बताकर उनकी स्तुति की गई है । अन्त है। वें श्लोक में कहा गया है कि-'यदि कोई कहे में उपसंहार करते हुए कहा हैकि अन्न जीव का शरीर है अत: अन्न की तरह मास इत्युक्तमाप्तादिवषट्स्वरूप सशृण्वतोस्वैव दृढा रुचिःस्यात् । भक्षण करना कोई बुरा नहीं है, तो उसका ऐसा कहना सज्ज्ञानमस्याश्चरितततोस्मात्कर्मक्षमोस्मात्सुखमप्यदुःखम् । ठीक नहीं है, क्योकि यद्यपि अन्न भी जीव का शरीर है जैन कालेज, खातोली। पाण Page #137 -------------------------------------------------------------------------- ________________ गतांक से आगे: पं० शिरोमणि दास कृत धर्मसार सतसई ॥ श्री कुन्दनलाल जन प्रिन्सिपल, दिल्ली अथ पंचम संधि प्रारभ्यते : चौपाई-कर जोड़े नृप पूछ बात, गणधर देव कहो तुम बात । तीर्थकर पद कसे होय, मुनिवर धर्म कहो पुनि सोय ।।१।। षोडश कारण व्रत को कर, केवली सति क्षायक धरै । छट सात गुणथान विराज, होय दिगम्बर मुनिवर राजै ॥२॥ गणधर कहै सुनो हो राय, यतिवर धर्म महा सुखदाय । महा कठिन कहिये ससार, जात भवधि पावै पार ॥३॥ क्रोध लोभ माया मद त्यागी, देह भोग ससार विरागी। आशा विषय तजे जब व्रती, ____ सो जग मे यह कहिये जती ।।४।। त्रस थावर की जो करहिं सुरक्षा, दया महाव्रत यह जिन शिक्षा । निज पर हेतु मृषा जब तर्ज, अनन्त महा व्रत सो मुनि भजे ॥५॥ पर धन इच्छा कर न बाधु, निज दोषन नही गोप साधु । मन-वच-काय तज जब दोष, स्तेय महा व्रत यह सुख पोप ॥६॥ दोहा-बउ विधि नारी जानिए, जे त्यागे मन वच काय । ब्रत कीरति अनुमोद है, इह विधि गुनि जै राय ॥७॥ पांचक इद्रिय लिंग दस, काम विकिन दस जानि । शील भेद इह विधि गुन, अठारह सहस बखानि ।।८।। चौपाई-इह विधि शील धर मुनि कोई, महावत ब्रह्मचर्य है सोई। दश विधि उपधी वाहिज कहै, चौदह पुनि अभ्यन्तर रहे ॥६॥ ए चौबीस उत्पागै शुद्ध, महाव्रत यह आकिंचन बुद्ध । अब सुनु पाचों समिति भेद, ___ जाते होय पाप बहु छेद ॥१०॥ भूमि शोध पग धरै जु साधु, जात जीव लहै नही बाधु । नीची दृष्टि मद अति चले, ईया समिति यह तासौ पलं ॥११।। धर्म वचन बोले शुभ बन, के घरि मोन रहै दृढ़ जैन । विकया वचन तजै जब मुनी, भाषा समिति जान यह गुनो ॥१२॥ पहर उठे दिन चढइ जु जो लौ, रहइ पहर उठे पुनि तो लौ । आहार शुद्धि नव कोटि बखानि, एषणा समिति कही जिन वानि ॥१३॥ घरहि कमडल घरनी देख, अरु पुनि ताहि लेहि पत रेख । आदान निक्षेपण समिति बनाई, धरै मुनीन्द्र सकल सुखदाई ॥१४॥ भूमि देख मल मूत्रहिं क्षिप फिर पुनि आनि जाप नित जपं । धरहिं जो गुनिय भासो नित्त, प्रतिष्ठापन यह समिति जु मित्त ॥१५॥ पाचो इन्द्रिय विषय विरोधे, तप सों अग्नि महा तनु सोधे । षट् आवश्यक साधे जती, भूमि शयन पुनि राचे व्रती ॥१६॥ स्नान रहित सोहै मुनिराज, वसन विजित पुनि दिगंबर वास । Page #138 -------------------------------------------------------------------------- ________________ २८ वर्ष ३६ कि.४ निज शिर केश लुंच विधि कर, पर हित सार जर तरु जाति, पंच घरा फिर भिक्षा धरै ॥१७॥ सहइ जीव दुख नाना भांति ॥२६॥ ठा भोजन लेह प्रवीन, दोहा-तहां ध्यान दृढ मुनि धरै, कर्म क्षय निज हेत । पाणि पात्र अति पर धर लीन । द्वादशानुप्रेक्षा चितव, सु वर्णनि करौं सुचेत ॥३०॥ दातून रहित सोहै मुनिराइ, चौपाई-धन यौवन नारी सुख नेह, एक बार भोजन तनु आइ ॥१८॥ पुत्र कलत्र मित्र तनु एह । दोहा-ऐ अट्ठाईस मूल गुण, जो पाले मुनि राय । रथ गज घोड़े देश भंडार, सो मुनिवर गणधर कहै, तारन तरन सहाय ॥१६॥ इन्ही जात नही लाग वार ॥३१॥ उत्तर गुण जो पालहिं, लक्ष चौरासी धीर । जैसे मेघ पटल क्षण क्षीण; ते जिन शासन में कहे, यतिवर गुणनि गंभीर ॥२०॥ तसो जानो कुटुम्ब सगु दीन । चौपाई-जो मुनि देह भोग सुख आशा, जल संयोग आम घट जैसो, धन इक कोड़ि न राखै पासा । सकल भोग बिधि जानहुं तसो ॥३२॥ धरि यति भेष करै व्रत भंगु, दोहा-जो उपजो सो विनशई, यह देखो जग रीति । बहुत मोह कर बांध संगु ॥२१॥ अध्रुव सकल विचारि के, करहु धर्म सौ प्रीति ॥३३॥ सुख यश हेतु महा व्रत धरै, -इति अध्र वोनुप्रेक्षा हिंसा करि माया को परे । चौपाई-जैसे हिरण सिंह बस परयो, ते मुनि दुर्गति जैहैं सही, तैसे जीव काल ने धरयो । यह गाथ (ह) श्री गणधर कही ॥२२॥ कोऊ समर्थ नही ताहि बचाव, दोहा-तप जप संयम शील शुभ, दयाक्षमा परमार्थ । कोटि यत्न करि जो दिखरावै ॥३४॥ ते गुरु निश्चय जानिज, तारण तरण समर्थ ॥२३॥ मत्र तन्त्र जे औषधादि धनी, बल विद्या ज्योतिष अति गुनी। चौपाई-जो पर्वत पर मंडहि जोग, ए सब निष्फन होहिं विशाल, नियमा पर छांड सब भोग । जब जीव आनि परै वश काल ॥३५॥ ग्रीषम मघा मौ पर पर, दोहा-इन्द्र चक्री हरि हर सबै, विद्याधर बलवत । ___अरुदपारि (दावाग्नि) पुनि वन में जर ॥२४॥ काल पाश तें उपरे सुको किह रक्षहि अन्त ॥३६॥ दोहा-सुःख दु:ख सम जानि के, शत्रु मित्र सम रूप । -इति अशरणानुप्रेक्षा धरि सन्तोष निराश मति, सहई परीषह भूप ॥२५॥ चौपाई-द्रव्य क्षेत्र पुनि काल जुआनि, चौपाई-वर्षा काल वृक्ष तल जाय, भव अरु भाव तही जुव खानि । धरै जोग तहं मन वच काय । यह संसार पंच विधि कही जै, वरसै मेह महा मति घोर, जीवन मरण जीव दुख लहीजे ॥|| चहुंधा वायु झकोरइ जोर ।.२६।। समय अनता नत जु लए, दोहा-करकेंटा अरु विषहनरा, वृश्चिक सर्प जु क्रूर । अनतकाल तह पूरण भए। ऊपर चढ़ जु भाइक, सहइ परी वह शूर ॥२७॥ समय एक कहुं बचिऊ न तीव, शीतल बंद जो टपकही, बेलें लपटें अंग। जामन मरण लहौं नही जीव ॥३८॥ आशा देह जु त्यागिक, धरै ध्यान नि:संग ॥२८. दोहा - जिनतें बहु सुख पाइए ते भए दुख को रूप । चौपाई-शीतकाल पुनि जानहु धीर, परावर्तन बहु पूरियो, यह संसार स्वरूप ॥३६ धरै जोग सरवर के तीर । (शेष अगले अक में) Page #139 -------------------------------------------------------------------------- ________________ जरा सोचिए ! १. अपरिग्रह धर्म को कैसे बचायें । आचार्य कहते हैं 'विरम किमपरेण कार्य कोलाहलेन, जैन धर्म का मूल अपरिग्रह है और इस धर्म में वर्णित । स्वयमपि निभृतः सन् पश्य षण्मासमेकम् ।' समयसार कलश; देव और गुरू दोनों ही अपरिग्रही शौच-पूर्ण है। हमारे -हे भव्य, अन्य कार्य-कोलाहलों से (तेरा लाभ) देव-'जिन' पूर्ण अपरिग्रही है, उनका धर्म जैन भी अपरि क्या ? तू विराम लें-उनसे अपना विघटन कर और छह ग्रहत्वपूर्ण है और गुरु-मुनि गण भी अपरिग्रही है। इसी मास अपने मे रहकर देख । तुझे परमानन्द प्राप्त होगा। बात को यदि हम अभेद रूप से कहें तो अपरिग्रह हो । देवत्व है ओर अपरिग्रहत्व मे ही गुरुत्व या दिगम्बरत्व है; ___ स्मरण रहे-विघटन जिन, जैन, दिगम्बर और मुनि के शुद्ध-रूप में आने का उपाय है। जब तक हमारा परऐसा कह सकते है । अर्थात् अपरिग्रहत्व की पराकाष्ठा परिग्रह से विघटन न होगा तब तक हमारे द्वारा जिन, होने पर वीतरागी-जिन 'देव' है; उनका धर्म 'जैन' भी जैन, दिगम्बर और मुनि जैसे रूपों में एक भी रूप ग्रहण अपरिग्रह की पराकाष्ठा है और दिगम्बर मुनि भी अपरि नही किया जा सकेगा; क्योंकि-पर-परिग्रह से तो हम ग्रह की ही जीती-जागती मूर्ति है। सदा से ही संगठित होते रहे है, हमें उक्त चारों रूपों में से ऊपर की कथनी से हमें स्पष्ट समझ लेना चाहिए ए एक भी रूप नही मिल सका है। भी कि-जैनत्व एकाकी शुद्ध-रूप मे, पर से नाता तोडने मे मगलोत्तम-शरण पाठ यानी चत्तारि मंगलम् आदि फलित होता है। हमारे यहा दा शब्द आत ह-सयाग पाठ तो आप नित्य पढ़ते है। यह पाठ अनादि है। आप और वियोग। सयोग अशुद्धि का द्योतक है और वियोग देखे कि इसमे अरहंत, सिद्ध, साधु और धर्म इन चार को र शुद्धि का द्योतक है। सयोगी अवस्था संसारी है और मंगल रूप और शरणभूत कहा गया है। दूसरी ओर वियोगी अवस्था शुद्धि की परिचायिका है। आश्चर्य है। विनय-रूप णमोकार-मत्र पर भी दृष्टिपात करें, वहां कि वस्तु की ऐसी मर्यादा होने पर भी अज्ञानीजीव आचार्य उपाध्याय का नाम जुड़ा हुआ है। जबकि चत्तारि परिग्रह-संयोग (अशुद्धि) मे खुश और परिग्रह-वियोग मंगल पाठ में उन्हें छोड़ दिया गया है। ऐसा क्यों ? व्यव(शुद्धि) में नाखुश देखे जाते है। हार में हम समाधान कर लेते हैं कि आचार्य-उपाध्याय इसी प्रकार संगठन और विघटन जैसे दोनो शब्दो पर दोनों पद साधू पद मे गभित हैं। पर, यदि ऐसा ही है तो विचार करें तो धर्म-वस्तु का स्वभाव, पर से विघ. णमोकार मन्त्र में भी उक्त दोनों पद न देकर इन्हें साधु-पद टन में होता है और वस्तु की विकृति पर-संगठन से मे क्यों नही गभित कर लिया गया ? सूत्र भी लघु हो • होती है। जबकि आज के लोग विघटन को तिरस्कृत कर जाता और भाव भी फलित हो जाता । पर ऐसा नहीं संगठन पर जोर देते देखे जाते हैं । स्पष्ट है कि-भिन्न किया गया; क्योंकि णमोकार मन्त्र मात्र विनय-मन्त्र है, व्यक्तित्वों का एक समुदाय में होना सगठन है और हर नमस्कार मन्त्र है, और मंगलोत्तम शरण-मन्त्र वस्तु-स्वरूप व्यक्ति का स्वतन्त्र-स्व-रूप मे रहना विघटन है । कृपया परिचायक है। यत:-जैसे, सिद्ध और साधु पूर्ण अपरि. सोचिए जनत्व में आने के लिए आप विघटन को चुनेंगे ग्रहत्व रूप है वैसे आचार्य और उपाध्यायों के साथ पूर्ण या विकारी भाव संगठन को? हमारी राय में आप एक अपरिग्रहत्व नही। उनके शिष्य परिवार है, उसकी शिक्षाबार विघटन करके तो देखिए, पर से अलग अपने को दीक्षा आदि विकल्प रूप शुभ,परिग्रह है। भले ही वे व्यव. देखिए : आप स्वयं ही बोल उठेंगे-जैन धर्म की जय ! हार दृष्टि से हमारा मंगल करते हों, लोक दृष्टि में उत्तम Page #140 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ३०, वर्ष ३९, कि० ४ अनेकान्त और शरणभूत हों फिर भी शुद्ध-वस्तु रूप में स्वयं मे शब्द होता है ऐसे ही दो आदमी होने पर बातें भी हो (जिम्मेदारी समझने-शिष्यगण को अनुशासन में रखने रूप सकती है । पर कुमारी कन्या के हाथ में पड़ा कड़ा अकेला विकल्प के कारण स्व-मंगलरूप और उत्तम नहीं, क्योकि होने से शब्द नहीं करता-शान्त रहता है । इसी प्रकार उनमें उक्त परिग्रह का अंश है। इसीलिए जो आचार्य उग्र- प्रकार यदि मुनि एकाकी, निर्जन स्थान में रहेगा वह शांत तप के इच्छुक हों, समाधि मे जाना चाहें उन्हें आदेश है रहने में सरलता से समर्थ होगा। कि आचार्य पद का भार (परिग्रह) किसी योग्य शिष्य को प्रसग है, अपने गुरु मुनि श्री विद्यानन्द जी के सौप दें और साधु रूप में विचरण करें तथाहि साथ हमारे हरिद्वार भ्रमण का। जब हम हरिद्वार 'गच्छाणु पालणत्थं आहोइय अत्तगणसम भिक्ख । मे थे, हमने देखा-श्री गंगा जी का मुनि-मन सम निर्मल तो तम्मिगणविसगं अप्पकहाए कुणदि धीरो ॥' जल, पर्वत से नीचे उतरता, कल-कल करता, नगर में -मूलाराधना-२७४, प्रवेश के बाद दूषित-मलिन होकर सड़को के नीचे बने -अपने गण के समान जिसके गण है ऐसा वह गटरो (नाले-नालियों) में बह रहा है। मानों वह नगरबालाचार्य गच्छ का पालन करने योग्य है ऐसा विचार प्रवेश को अपनी भूल मानकर शमिन्दा हो, अपना मुंह कर उस पर अपने गण को विसर्जित करते है, अर्थात् सड़क के नीचे बने गटरो में छिपा रहा हो। वायु की भी अपना पद छोडकर सम्पूर्ण गण को बालाचार्य को छोड़ यही स्थिति थी। जो वायु पर्वतो पर पहले कुछ समय पूर्व देते हैं। शीतल, सुगन्धित और मन-भावन थी; वह नगर प्रवेश के यहां अपरिग्रही होने-एकाकी होने की बात है और बाद दूषित हो गई थी। हम सोचते रहे जब उन्मुक्त बहने इसी को ध्यान में रखकर आचार्य कुन्द कुन्द ने मुनियो के वाले स्वच्छ जल और चलती शुद्ध वायु की नगर प्रवेश में रहने योग्य स्थानो को चुना है। वे कहते हैं ऐसी दशा है तब वे साधु धन्य है जो यहाँ निवास कर 'सुण्णहरे तरुहिढे उज्जाणे तह मसाणवासे वा, अपने भावो को अपने मे थामे हुए हो । फिर दिगम्बर सत गिरि-गृह गिरि-सिहरे वा भीमवणे अहव वसिमे वा।। तो धन्य है, त्याग-तप की पराकाष्ठा है, उन्हें अपने मे सवसासत्त तित्थ व च चइदालत्तयं वृत्तेहि, स्थिरता के लिए सर्वाधिक प्रयास करना पड़ता होगा। जिणभवण अह वेज्झ, जिणमग्गे जिणवरा विति ॥ धन्य है वे ! अन्यथा कहावत तो यह है कि -कुन्दकुन्द, बोधपाहुड, ४२.४३ "काजल की कोठरी मे कैसो ही सयानों जाय । -मुनियो को शून्य घर मे अथवा वृक्ष के नीचे काजल की एक रेख लागे 4 लाग है।" उद्यान मे अथवा श्मशान भूमि मे अथवा पर्वतो की गुफा अभी कुछ दिन पूर्व हमने धर्म-संरक्षणी भा० दि० जैन मे अथवा पर्वत के शिखर पर अथवा भयकर वन मे महासभा के मुख-पत्र जैन गजट मे सम्पादक का लेख अथवा वसतिका में रहना चाहिए । ये सभी स्थान स्वाधीन 'शत-शत बार नमन' पला । हम चौक पडे । सभी जानते है। जो अपने आधीन हो ऐसे तीर्थ, व चैत्यालय और है कि महासभा धर्म की यथास्थिति रखने मे सदा कट्टर उक्त स्थानो के साथ-साथ जिन-भवन को जिनेन्द्रदेव उत्तम और मुनि-भक्त रही है : वह मुनियो मे कमजोरी बताने मानते हैं। मे सदा उपगृहन अंग का पालन करती रही है। पर लेख उक्त विधान अपरिग्रहपोषक, एकान्त और स्वाधी- से ऐसा लगा कि इस परिग्रह को लेकर आज वह भी नता संरक्षण की दृष्टि से है क्योकि जन-सकुल स्थान मे चिन्तित दिखती है। आत्मध्यान भी नही हो पाता । किसी ने कहा भी है तथाहिवासे वहना कलहो भवेद् वार्ता द्वयोरपि । "आज साधुओ मे मठ-मन्दिर-पाश्रम बनाने की एक एव चरेत्तस्मात्कुमार्या इव ककणम् ॥ प्रवृत्ति बढ़ रही है। उनका ममत्व भाव इन संस्थाओं के -सुहागिन के हाथों मे अनेक चूड़ियां होती है जिससे प्रति इतना गहरा है कि वर्ष का अधिकांश समय उनका Page #141 -------------------------------------------------------------------------- ________________ बरा सोधिए एक ही स्थान पर बीतने लगा है। यदि इसे रोका न गया अन्यथा-अहिंसा, सत्य, अचौर्य ओर ब्रह्मचर्य पर तो सभी तो भ्रम है कि निकट भविष्य मे जैन-साधु अन्य धमा- धर्म वाले ओर राजनीति चलानेवाले, सभी जन-साधारण वलम्बी साधुओ की तरह कही उपाययवामी बनकर न जोर देते देखे जाते हैं। रह जाएं। ___* साधु या त्यागी भले ही पैमा हाथ से छूते न हों २. एक पत्र के अंश (जो हमने लिखा) किन्तु उसका हिसाब-किताब रखते देखे जाते है। धर्म स्नेही, जय जिनेन्द्र ! *आज कुछ साधु अपने साथ पिच्छी, कमण्डल और आपके कई प्रकाशन मिलते रहे । विचार कर निवेशास्त्र के अतिरिक्त टेपरिकार्डर, ट्राजिस्टर आदि भी दन कर रहा हूं।..... मुनि श्री के बहाने हम ऐसी किसी रखते हैं। लोगों से कहकर कैसिट आदि मगाते है। भी सस्था के खडे करने के पक्ष मे नही, जिसमें अर्थ संग्रह *आचार्य शान्ति सागर जी कहा करते थे कि नकद करने या उसके हिसाब के रख-रखाव का प्रसंग हो। हम पैसा लेने वाला साधु तो नरक जायेगा ही, देने वाला उनमे तो मुनि श्री को प्रचार के साधनो-टेप-रिकार्डर, माइक, पहिले जाता है। चन्दा-चोकडा करना यह साधु का काम बीडियो और मच आदि से भी दूर देखना चाहते है। हम नहीं है। वैराग्य का व्यापार नहीं हो सकता।" चाहते है कि-मुनि श्री का घेराव न किया जाए। यदि _ (जैन गजट २१ अक्तूबर १९८६ से) उनसे कुछ धर्मोपदेश सुनना हो तो उनके ठहरने के स्थान उक्त बाते कहां तक, कितनी ठीक है, हम नहीं पर जाकर ही सुना जाय । मुनि श्री का जयकारा करनाजानते । हा, यह अवश्य कहते है कि ये सब बात परिग्रह कराना, उन्हे समूह की और खीचना, उन्हे मार्ग से च्युत रूप होने से विकारी-धर्मभ्रष्ट करने वाली है। इनसे करने जैसे मार्ग है । इनसे साधु का अह बढ़ता है, यशबचकर ही जिन-शासन को सुरक्षित रखा जा सकता है। लिप्सा होती है, राग-रंजना होती है, और वह जिसके लिए हम तो यह भी कहेगे कि आज गानव-स्वभाव इतना दीक्षित हआ है उस स्व-साधना से वचित रह जाता है, दूषित बन गया है कि जब हम छोडने की, अपरिग्रही और गर-सुधार के चक्कर में पड़ जाता है : आदि । जैन बनने की बात करते है तब यह जोड़ने को बात करता ये हम इमलिये भी लिख रहे है कि आज मुनि-मार्ग है और जोड़ने की इस धुन मे वह अपरिग्रही को भी नहीं विकृत रूप ले रहा है : सस्थाओ से बधे त्यागी अर्थ संग्रह बख्शता । उसे भी घेरे रहकर उसके धार्मिक क्रिया-काण्डो में लगे देखे जाते है, उनके प्रति लोगों को श्रद्धा भी घट के समय तक को अपने उपकार में ही लगवाना चाहता रही होती है। ऐसे में जब इस काल में कोई सच्चा हीरा है। कई लोग तो अपरिग्रहयो के बहाने धन्ध चलाने की हमारे सामने आया है तो हम आदर्श रूप में उसका सदुपधन में भी देखे जाते है । कोई उनके प्रवचन छपाकर योग अपने आत्मोद्धार-मार्ग मे करे-उसे घेरकर उसकी बेचते हैं तो कोई अन्य बहानो से पैमा इकट्ठा करते है। ज्योति के अवरोधक न हो। "भले ही जबकि साधु को उनसे प्रयोजन भी न हो, आदि । प्रसंग में हम इतना ही कहना चाहेगे कि लोग अरि- ३. "सिद्धा ण जीवा" (धवला) त र यो का घेराव न करे केवल जीवन-मरण आवागमन का नाम है। और आवा. उनके धर्म-उपकरणों को ही जुटाए। यदि हमारी स्वार्थ- गमन को शास्त्रों मे ससार कहा है -'ससरणं संसार।' रूपी करनी से साधु का साधुत्व और अपरिग्रहत्व जाता है जब कोई व्यक्ति शुद्ध-आत्म-स्वरूप के विवेचन में तो सच समझिये कि जो धर्म अवशेष है, वह भी चला 'आत्मा जीता है', आदि जैसे शब्दो का व्यवहार करता है जायगा। यतः केवल जैन ही ऐसा है, जिसमे वीतरागता तो बडा अटपटा लगता है, फिर चाहे वह 'चेतन गुण से और अपरिग्रह की प्रमुखता और पराकाष्ठा है और इसी. जीता है ऐमा ही क्यों न कहे ? सोचने की बात है कि लिये सर्वज्ञता है, और इसी की पूजा है, यही धर्म है। जब चेतना-जान-दर्शन को स्वभाव मान लिया तो उसमें Page #142 -------------------------------------------------------------------------- ________________ १२, १६, कि.४ बनेकान्त आवागमन कैसा, जीना-मरना कैसा ? स्वभाव तो न कभी रुपादेयो ह्यात्मा ।' (अमृतचन्द्र) जीता है और न कभी मरता है-सदा एक रूप ही रहता -जीवादि वाह्य तत्त्व हेय हैं, इस आत्मा को मात्मा है। स्वभाव में अन्य पर्याय का विकल्प ही नही होता। ही उपादेय है। यह आत्मा कर्म की उपाधि से पैदा होने व्यवहार में जिसे हम जीना-मरना कहते हैं वह सर्वथा पर- वाले गुण पर्यायों से भिन्न है। पर-द्रव्य होने से जीव आदि आश्रित है, अशुद्ध अवस्था का द्योतक है और वह अन्य ही सप्त तत्त्व मात्र उपादेय नहीं हैं।'....."प्रखर ज्ञानी परम किन्हीं कारणों से होता है। और इसीलिए आचार्यों ने भी जिन-योगीश्वरो के द्वारा आत्मा ही ग्राह्य है। जीवन-मरण का आधार कर्मोदयादि को बतलाया है। स्वामी अकलंकदेव जीव के स्वरूप का विश्लेषण करते संसारी जीवो में कर्मोदय से प्राण होते हैं और प्राणों के हुए कहते हैं-'औपमिकादि भाव पर्यायो जीवः पर्याधारण-विसर्जन को जीवन-मरण की संज्ञा दी गई है। यादेशात् ।' राजवा० १७१३ तथा 'ओपशमिकादि भाव 'जीव' शब्द भी इसी प्रक्रिया में फलित हुआ है और साधनश्च व्यवहारतः ।'-११७९ अर्थात् -पर्यायार्थिक आचार्यों ने भी 'माउपमाणं जीविदं णाम' ऐसा-कहा है। नय से औपशमिकादि भाव रूप जीव है । व्यवहार नय से पिछले दिनों हमने मान्य-आगम धवला का उद्धरण औपशमिकादि भावों से जीव (स्वरूप लाभ करता) है। देते हुए लिखा था कि 'सिद्ध' जीव नही हैं, जीवित पूर्व सिद्धान्त चक्रवर्ती नेमिचन्द्राचार्य विरचित गो. जी. हैं । वह कथन प्राणों की औदयिक भावो को दृष्टि से था कां० की जीव तत्त्व प्रदीपिका टीका में कहा है-- और युक्त-युक्त तथा पूर्वाचार्य श्री कुन्दकुन्द समत था। 'कर्मोपाधि सापेक्षज्ञानदर्शनोपयोग चैतन्य प्राणेन जीवतीति हम कुन्दकुन्दाम्नायी हैं और तत्त्वार्थ सूत्र के कर्ता श्री जीवः ।'-२२२१०८ उमास्वामी महाराज, उसी परम्परा के उत्तरवर्ती आचार्य कर्मोपाधि की अपेक्षा सहित ज्ञानवर्शन उपयोग रूप हैं और धवलाकार आचार्य भी इसी परम्परा के हैं । सूक्ष्म चैतन्य प्राणों द्वारा जीने वाला जीव है। दष्टि से देखें तो सभी का मन्तव्य एक है और सभी ने स्मरण रखना चाहिए कि जीवन कर्मोपाधि सहित मुक्त आत्माओं को जीव सज्ञा से बाहर रखा है। चेतन का व्यापार है और वह प्राणों पर आधारित है 'जीव' संशा केवल जीवन-मरण-ससार अवस्था तक ही तथा प्राण आयुकाल-पर्यन्त विभिन्न कर्माश्रित है । प्राणों सीमित रखी है। सभी ने आत्मा के चेतन गुण को के सम्बन्ध में जीवकाण्ड मे बड़े खलासा रूप मे लिखा हैस्वीकार किया है। उन्होंने आत्मा अथवा चेतन को ससारी 'पचवि इन्दिय पाणा मण वच काएस तिणि बलपाणा । और मक्त या जीव और सिद्ध इन दो रूपो मे स्वीकार आणा पाणप्पाणा आउग पाणेण होति दस पाणा ॥१२॥ किया है। संसारी को जीव और मुक्त को सिद्ध (सशक) वीरियजुदमदिखउवसमुत्था णोइंदियेसु बला। बतलाया है। आचार्य कुन्दकुन्द ने तो जीवादि-तत्त्वमात्र देहृदये कायाणा बचीवला आउ आउदये ॥१३०॥ को भी हेय बतला, शुद्ध-आत्मा मात्र को उपादेय स्वीकार पांच इन्द्रिय प्राण है, मन वचन काय तीन बल प्राण किया है। यदि उन्हें सिद्धो में जीव-संज्ञा कचित् भी इष्ट हैं. श्वासोच्छवास प्राण हैं और एक आयु प्राण है। मनोहोती तो वे उसे कभी भी हेय न बतलाते । वे कहते हैं- बलप्राण और इन्द्रियप्राण वीर्यान्तराय कर्म और मतिज्ञाना 'जीवादि वहिंतच्चं हेयम्पादेयमप्पणो अप्पा । वरण कर्म के क्षयोपशमरूप अन्तरग कारण से उत्पन्न होते कम्मोपाधि समुभव गुणपज्जाएहि वदिरित्तो।' हैं। शरीरनाम कर्म के उदय से कायबल प्राण होता है। -नियमसार ३८ श्वासोच्छ्वास और शरीर नाम कर्म का उदय होने पर टीका -जीवादि सप्त तत्त्वजातं परद्रव्यत्त्वान्न पा वचन बल प्राण होता है, आयु कर्म के उदय से आयु प्राण देयम् । आत्मनः सहज-वैराग्यप्रसादशिखरंशिक्षामणे होता है । इसी गोम्मटसार जीव काण्ड मे यह भी लिखा परं द्रव्य पराङमुखम्य पंचेन्द्रिय-प्रसरवजितगात्र मात्र है कि सिद्धों में सभी ससारी उपाधियों व प्राणों का सर्वथा परिग्रहस्य, परमजिन योगीश्वरस्य, स्व-द्रव्य-निशितमते- अभाव है Page #143 -------------------------------------------------------------------------- ________________ 'गुण जीव ठाण रहिया सण्णा पजत्ति पाण परिहीणा। शास्त्र में मुक्ति-मार्ग में सात तत्त्वों का वर्णन करते समय सेसणवयग्गणूणा सिद्धा सुद्धा सदा होंति ॥'-७३१ संसारियों को लक्ष्य में रखकर उनके बद्ध होने के कारण, सिद्ध परमेष्ठी सर्वथा शुद्ध होते हैं; वे गुणस्थान, जीव- उन्हें जीव नाम से समझाया गया है ताकि वे प्रसगगत तत्त्वों स्थान, संज्ञा पर्याप्ति प्राण रहित होते हैं। उनमें ज्ञान, से परिचित हों-अपने को बद्ध समझ मुक्ति-शुद्ध अवस्था दर्शन, सम्यक्त्व और अनाहार को छोड़ कर शेष मार्गणाएं की प्राप्ति को उत्सुक हो सके । जो उनकी वास्तविक नहीं पाई जाती। होनी चाहिए और जिसे आचार्य उमा स्वामी ने भी दशम पंचास्तिकाय मे तो सिद्धों को जीव के स्वभाव से अध्याय मे (जीवत्व संज्ञा से बदलकर) सिद्धत्व-संज्ञा रूा सर्वथा भिन्न तक कह दिया है में स्वीकृत किया है। 'जेसि जीव सहावो णत्थि, अभावोय सब्वहा तस्स*। स्मरण रहे कि पारिणामिक-भाव का अर्थ स्व-स्वभाव ते होंति भिण्ण देहा, सिद्धा वचि गोयरमदीदा ॥'-३५ नही है, अपितु पारिणामिक भाव ससारी अवस्था के कर्मो. जिनमे ।का स्वभाव नहीं है और उसका सर्वथा दयादि की अपेक्षा-रहित वे भाव है जो आत्मा की स्वाभाअभाव है, वे सिद्ध, शरीर-रहित हैं और वचन अगोचर विक विकास-शक्ति को इगित करने के भाव में व्यवहत हैं। स्मरण रखना चाहिए कि यदि जीव की परिभाषा होते हैं और संसारावस्था के बाद व्यवहार मे नही पातेशुद्ध रूप में चेतना या उपयोग रूप होती-कर्म प्रभावित छूट जाते है । जीवत्व भी छूट जाता है, उसका स्थान न होती, तो आचार्य उमा स्वामी-जो संसारावस्था मे सिद्धत्व' ले लेता है । यदि पारिणामिक भाव, स्वभाव इसे जीव नाम का सम्बोधन देते रहे, इसका नाम बदलकर (निर्मल दशा रूप) होते तो क्षायिक (मुक्ति मे वणितमुक्त में इसे सिद्ध नाम न देते-- 'अन्यत्र केवल सम्यक्त्व सम्यक्त्वादि) भावो को भी पारिणामिक भावो में ही ज्ञान दर्शन सिद्धत्वेभ्यः।' णमोकार मत्र मे णमो सिद्धाणं गर्भित कर लिया गया होता-प्राचार्यों ने उसके लिए और 'मंगलोत्तमसरण' पाठ में सिद्धामंगलम् आदि का पृथक् सूत्र न रचा होता। इसी तरह तत्त्वार्थसूत्रादि मे समावेश भी जीव संज्ञा के अभाव की पुष्टि करते है कि वणित 'ससारिणो मुक्ताश्च' जैसे भेद आत्मा की अशुद्ध कर्मवश होने वाली जीव पर्याय संसारी तक सीमित है- और शुद्ध-पर्याय के दिग्दर्शन मात्र में है और इन्हें संसारीमुक्त में नहीं। आत्मा अर्थात् जीव (अशुद्ध आत्मा) को समझाने की दृष्टि आखिर, अनादि-मन्त्र मे जीव जैसे प्रसिद्ध तत्त्व का से कहा गया है। अत. हे जीव (अशुद्ध आत्मा-संसारी) नाम न लेकर उसे 'सिद्ध' रूप मे कहने का कोई तो मूल तेरा स्वरूप तो सिद्धत्व है, तू जीवत्व पे न रह सिद्धत्व मे कारण होना ही चाहिए। हमारी दृष्टि में तो कारण यही आ। यही जिन वाणी का सार है और यही मुक्तात्मा का है कि जीव अवस्था कर्मबद्ध है और सिद्ध अवस्था कर्म- स्वरूप है । 'नम: सिद्धेभ्यः' ! रहित परम-आत्मा है। अन्त मे हम लिख दे और लिखते भी रहे हैं कि जो तत्त्वार्थ सूत्र ऐसे शास्त्र है जो संसारी-जीवो को विचार हम देते है वे विचार के लिए होते हैं-किसी मोक्ष-मार्ग बतलाने की दृष्टि से लिखे गए है । फलतः इस आग्रह के बिना। विद्यारिए और सोचिए। -सम्पादक * ग्रन्थो में गाथा के दूसरे पद का अर्थ--'सर्वथा उसका अभाव भी नहीं है' ऐसा किया गया है। हमारी दृष्टि मे यह न्याय्य नही ठहरता । हां, यदि 'य' शब्द के स्थान पर 'वि' शब्द होता तो उक्त अर्थ 'वि' (अपि) के कारण ठीक बैठ जाता-यह विचारणीय है। फिर यदि चेतना के कारण कदाचित् जीव की कथचित् (प्रसग मे) सत्ता भी स्वीकार कर ली जाय तो उसे भी 'कर्मोपाधि-सापेक्षज्ञानदर्शनोपयोग चैतन्य प्राणेन जीवति इति जीवः' के प्रकाश मे बाधित ही माना जायगा। 'अशुद्ध चेतना लक्षणो जीवः, शुद्धचतना लक्षण: सिद्धः ।' Page #144 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Regd. with the Registrar of Newspaper at R. No. 10591/62 वीर-सेवा-मन्दिर के उपयोगी प्रकाशन समीचीन धर्मशास्त्र : स्वामी समन्तभद्र का गृहस्थाचार-विषयक प्रत्युत्तम प्राचीन ग्रन्थ, मुख्तार श्रीजुगलकिशोर जी के विवेचनात्मक हिन्दी भाष्य और गवेषणात्मक प्रस्तावना से युक्त, सजिल्द / 45. अनन्य-प्रशस्ति संग्रह, भाग 1 : संस्कृत और प्राकृत के 171 अप्रकाशित ग्रन्थों की प्रशस्तियों का मगलाचरण महित अपूर्व संग्रह, उपयोगी 11 परिशिष्टों और पं० परमानन्द शास्त्रो की इतिहास-विषयक साहित्य परिचयात्मक प्रस्तावना से अलंकृत, सजिल्द / ... नयम-प्रशस्ति संग्रह, भाग 2 : अपभ्रश के 122 अप्रकाशित ग्रन्थों की प्रशस्तियों का महत्त्वपूर्ण संग्रह। पचपन ग्रन्थ कारों के ऐतिहासिक ग्रंथ-परिचय और परिशिष्टों सहित / सं. पं. परमानन्द शास्त्री। सजिल्द / 15.00 समापितन्त्र प्रौर इष्टोपदेश : प्रध्यात्मकृति, पं० परमानन्द शास्त्री की हिन्दी टीका सहित 5-50 श्रवणबेलगोल और दक्षिण के अन्य जैन तीर्थ : श्री राजकृष्ण जैन .. 3.0. पाय-दीपिका : प्रा० अभिनव धर्मभूषण की कृति का प्रो० डा० दरबारीलालजी न्यायाचार्य द्वारा स. अनु। 10.00 जैन साहित्य पोर इतिहास पर विशद प्रकाश : पृष्ठ सख्या 74, सजिल्द / कसायपाहुउसुत्त : मूल ग्रन्थ की रचना प्राज से दो हजार वर्ष पूर्व श्री गुणधराचार्य ने की, जिस पर श्री यतिवषभाचार्य ने पन्द्रह सौ वर्ष पूर्व छह हजार श्लोक प्रमाण चूणिसूत्र लिखे / सम्पादक प हीरालालजी सिद्धान्त-शास्त्री। उपयोगी परिशिष्टों और हिन्दी अनुवाद के साथ बड़े साइज के 1000 से भी अधिक पृष्ठों मे। पृष्ट कागज और कपडे की पक्की जिल्द / 25.00 जन निबन्ध-रत्नावली : श्री मिलापचन्द्र तथा श्री रतनलाल कटारिया ध्यानशतक (ध्यानस्तव सहित) : संपादक पं. बालचन्द्र सिद्धान्त-शास्त्री 12-0. बावक धर्म संहिता: श्री दरयावसिंह सोषिया जैन लक्षणावली (तीन भागों में): स०प० बालचन्द सिद्वान्त शास्त्री प्रत्येक भाग 40... जिन शासन के कुछ विचारणीय प्रसंग : श्री पनचन्द्र शास्त्री, बहुचित सात विषयो पर शास्त्रीय प्रमाणयुक्त तर्कपूर्ण विवेचन / प्राक्कथन : सिद्धान्ताचार्य श्री कैलाश चन्द्र शास्त्री द्वारा लिखित मूल जैन संस्कृति अपरिग्रह : श्री पद्म चन्द्र शास्त्री 2... Jaina Bibliography : Shri Chhotelal Jain, (An universal Encyclopaedia of JainReferences.) In two Vol. (P. 1942) ___Per set 600-00 आजीवन सदस्यता शुल्क : 101.00 30 वार्षिक मूल्य : 6) 20, इस अंक का मूल्य : 1 रुपया 50 पैसे विद्वान लेखक अपने विचारों के लिए स्वतन्त्र होते हैं / यह आवश्यक नहीं कि सम्पादक-मण्डल लेखक के विचारों से सहमत हो। पत्र में विज्ञापन एवं समाचार प्रायः नहीं लिए जाते। मम्पादक परामर्श मण्डल डा० ज्योतिप्रसाद जैन, श्री लक्ष्मीचन्द्र जैन, सम्पादक श्री पनचन्द्र शास्त्री प्रकाशक-बाबूलाल जैन वक्ता, वीर सेवा मन्दिर के लिए, गीता प्रिटिंग एजेन्सी, डी०-१०५, न्यूसीलमपुर, दिल्ली-५३ से मुद्रित /