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________________ जरा सोचिए ! प्रागम-रक्षा : एक समस्या सर्वमान्य आगम तत्त्वार्थ सूत्र की टीका सर्वार्थसिद्धि मे आचार्य पूज्यपाद स्वामी ने 'श्रुत मतिपूर्वं द्वयनेकद्वादशभेद' सूत्र की व्याख्या में आगम-वक्ता के तीन रूप प्रस्तुत किए हैंऔर वे वक्ता रत्नकरण्ड मे मान्य देव, गुरु के लक्षण से पूर्ण मेल खाते हैं और मूल आगम के सच्चे वाहक ये ही हो सकते हैं तथाहि - 'त्रयो वक्तारः । सर्वज्ञ तीर्थंकर. । इतरो वा श्रुतवली | आरातीयश्चेति । तत्र सर्वज्ञेन परमर्षिणा परमचिन्त्य केवलज्ञान विभूति विशेषेण अर्थतः आगम उद्दिष्टः । तस्य प्रत्यक्षदर्शित्वात्प्रक्षीणदोषत्वाच्च प्रामाण्यम् । तस्य साक्षाच्छिष्ये वृद्धयति गर्द्धियुक्तं गंगधरं श्रुतके वलिभि रनुस्मृतग्रन्थ रचन मंगपूर्वलक्षण तत्प्रमाण, तत्प्रामाण्यात् । आरातीयेपुनराचार्यैः कालदोषसक्षिप्तायुर्मतिवलशिक्षानुग्रहा दशवेकालिकाद्युपनिबद्ध तत्प्रमाणमर्थतस्तदेवेदमिति । क्षीरार्णव जलं घटगृहीतमिव ।' -- सर्वार्थ १-२० अर्थात् वक्ता तीन प्रकार के है (१) सर्वज्ञ तीर्थकर व सामान्य केवली (२) श्रुतकेवली और (३) आरातीय इनमें से परम ऋषि सर्वज्ञ उत्कृष्ट और अचिन्त्य केवलज्ञान रूपी विभूति विशेष से युक्त हैं। इस कारण उन्होने अर्थ रूप से आगम का उपदेश दिया। ये सर्वज्ञ प्रत्यक्षदर्शी और दोषमुक्त हैं इसलिए प्रमाण हैं । इनके साक्षात् शिष्य और बुद्धि के अतिशय रूप ऋद्धि से युक्त गणधर श्रुतकेवलियो ने अर्थरूप आगम का स्मरण कर अंग और पूर्वग्रथो की रचना की। सर्वज्ञदेव की प्रमाणता के कारण ये भी प्रमाण हैं तथा बारातीय आचार्यों ने, काल दोष से जिनकी आयु, मति और बल घट गया है ऐसे शिष्यों का उपकार करने के लिए दशवेकालिक प्रादि ग्रन्थ रचे । जिस प्रकार क्षीर सागर का जल घट में भर लिया जाता है उसी प्रकार वे ग्रन्थ भी अर्थरूप में वे ही हैं इसलिए प्रमाण है । पाठकों की जानकारी के लिए यहां आगम के कुछ लक्षण दिये जा रहे हैं। ये सभी लक्षण आगमों से उद्धृत है, इसलिए प्रमाण है, कल्पित नही । देखें - १. 'तसमुहग्गद वयणं पुव्वाव रदोसविरहिय सुद्धं । आगमपिदि परिकहिय' || नियमसार ८ १ ' आगमो हि णाम केवलणाणयुरस्सरो पाएण अणिदियत्य विसओ अचितिय सहाओ जुत्तिगोयरातीदो ।' - धवला पु० ६ पृ० १५१ 'आगम: सर्वज्ञेन निरस्तरागद्वेषेण प्रणीत । २. ३. - भग० आ० विजयो० टी० २३ ४. 'आप्त वचनादि निबधनमर्थज्ञानमागमः ।' - परीक्षा ३६६ न्यातदी० पृ० ११२ 'आगमो वीतराग वचनम् ।' धर्म र प्र स्वो वृ. पृ. ५९ 'अत्तस्सवयणमागमो ।' - अनु० चू७ पृ० १६ 'आप्तोपज्ञ मनुल्लध्यम दृष्टेष्टविरोधकम् । तत्त्वोपदेशकृत्सार्वं शास्त्र कापथघट्टनम् ।' ५. ६. ७. -न्यायावतार, रत्नकरण्ड ६ अर्थात् - केवली के मुख से प्रकट वचन पूर्वापर दोषरहित, शुद्ध है। उनके द्वारा कहे गये वचन आगम है। जो केवलज्ञान पूर्वक उत्पन्न हुआ है, प्राय. अतीन्द्रिय पदार्थों को ( भी ) विषय करने वाला है, अचिन्त्य स्वभावी है और युक्ति के विषय से परे है उसका नाम आगम है । सर्वज्ञ जो ( नियमत. ) राग द्वेष रहित है उनके द्वारा रचा गया आगम है। आप्त वचनादि से होने वाले पदार्थ ज्ञान का नाम आगम है। वीतराग वचन को आगम कहते है । आप्त के वचन आगम है । आगम लक्षण के उपर्युक्त क्रम में सातवा क्रम न्यायावतार और स्वामी समतभद्र के मन्तब्यो का है । श्लोक की उत्थानिका में क्रमश: - 'तत्किभूतमिति तद्विशेषणान्याह ' ( शास्त्र कैसा है, उसके विशेषण कहते है) और 'कीदृश तच्छास्त्रं यत्तेन प्रणीतमित्याह' (जो उन्होने रचे है वे शास्त्र कैसे है) लिखा है । अर्थात् श्लोक में दिए गए सभी विशे पण आप्तोपज्ञ ( आगम) के हैं और ये विशेषण आप्तोपज्ञ होने के कारण से ही हैं। कहा भी है- 'यस्मात्तदाप्तोपज्ञ
SR No.538039
Book TitleAnekant 1986 Book 39 Ank 01 to 04
Original Sutra AuthorN/A
AuthorPadmachandra Shastri
PublisherVeer Seva Mandir Trust
Publication Year1986
Total Pages144
LanguageHindi
ClassificationMagazine, India_Anekant, & India
File Size8 MB
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