Book Title: Pali Hindi Shabdakosh Part 01 Khand 01
Author(s): Ravindra Panth and Others
Publisher: Nav Nalanda Mahavihar

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Page 644
________________ Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailassagarsuri Gyanmandir अवलेप 617 अवसर चूळव. 263; - पीठर पु., तत्पु. स., खरोंचने के लिए ए. व. - अनवत्थितचारिकन्ति अववत्थितचारिक अ. नि. प्रयुक्त काष्ठखण्डों को रखने वाला पात्र - रं द्वि. वि., ए. अट्ठ. 3.83. व. - अनुजानामि, भिक्खवे, अवलेखनपिठरन्ति, चूळव. अवस त्रि., ब. स. [अवश], क. पराधीन, बेवश, अस्वतन्त्र, 263; - रो प्र. वि., ए. व. -- अवलेखनपीठरोति परतन्त्र - सो पु., प्र. वि., ए. व. - विवसो त्ववसो भवे, अवलेखनकवानं ठपनभाजनविसेसो, वि. वि. टी. 2.223; - अभि. प. 743; अवसोनुभविस्सामि निरये पापजं फलं, सत्थक नपुं.. तत्पु. स. [अवलेखनशस्त्रक], काटने, छीलने सद्धम्मो. 290; ख. स्वतन्त्र, दूसरे के वश में न रहने वाला, या खरोंचने का औजार या उपकरण - केन त. वि., ए. स्वाधीन - अनिच्चतावसमवसो उपागतो, म. वं. 2.33; व. -- अवलेखनसत्थकेन तेलसिङ्गलिखन्तो विय सरीरमंसं सब्बस्स समारकस्स सब्रह्मकस्स लोकस्स ओतारेत्वा दस्सामि, जा. अट्ठ, 4.360. इस्सरियवसमनुपगमनेन अवसोति वुच्चति, म. वं. टी. अवलेप पु., अव + लिप से व्यु., क्रि. ना. [अवलेप], शा. 107(ना.). अ. लीपना, पोतना, अलङ्करण - पो प्र. वि., ए. व. - अवसक्कति अव + /सक का वर्त, प्र. पु., ए. व., पीछे की लेपगब्बेस्ववलेपो, अभि. प. 1079; ला. अ. गर्व, अहङ्कार, ओर जाता है, काम से उपरत होता है - दळहपहारं अभिमान - पो प्र. वि., ए. व. - धम्मे ठितो अभिकङ्घमानो, अवसक्कती दस्सति सुप्पहारन्ति, जा. अट्ठ. विगतकोधमदावलेपो, तेल. 1; अवलेपोति अहङ्कारो, सद्द. 3.71. 2.473. अवसट/ओसट/अवस्सट त्रि., अव + /सर का भू. क. अवलोकन नपुं., अव + Vलोक से व्यु., क्रि. ना. [अवलोकन], कृ. [अवसृत], शा. अ. प्रवेश कर चुका, आ पहुंचा हुआ, अवलोकन करना, करुणापूर्वक देखना या दृष्टि डालना, ला. अ. किसी एक धार्मिक संप्रदाय को छोड़ दूसरे दृष्टि में रखना, पर्यवेक्षण करना - नं प्र. वि., ए. व. - सम्प्रदाय में पहुंचा हुआ - टं पु., द्वि. वि., ए. व. - तमेनं अवलोकनन्ति नागावलोकितं, सद्द. 2.520. मनसाकटतो तावदेव अवसट मनसाकटस्स मग्गं पुच्छेय्यु. अवलोकित त्रि., अव + Vलोक का भू. क. कृ. [अवलोकित], दी. नि. 1.224; तस्मा तावदेव अवसटन्ति आह, तवणमेव देखा हुआ, दृष्टि, नजर - तं नपुं. प्र. वि., ए. व. - निक्खन्तन्ति अत्थो, दी. नि. अट्ठ 1.305; - टा स्त्री., प्र. अवलोकनन्ति नागावलोकितं, सद्द. 2.520. वि., ए. व. - यदा च सा तिता वा अस्स... अवस्सटा वा. अवलोकेति/ओलोकेति/अपलोकेति अव + Vलोक का पाचि. 291; अवस्सटा नाम तित्थायतनं सङ्कन्ता वुच्चति, वर्त, प्र. पु., ए. व. [अवलोकयति], करुणा भरी दृष्टि से । पाचि. 292. दृष्टिपात करता है, नीचे की ओर देखता है, पर्यवेक्षण अवसनाकार पु., तत्पु. स., नहीं बसने देने की योजना - करता है - सो न उद्धं उल्लोकेति न अधो ओलोकेति, म. रो प्र. वि., ए. व. - 'इमस्मि विहारे एतस्स अवसनाकारो नि. 2.346; नटुं काकणिक वा मासकं वा परियेसन्तो विय मया कातुं वट्टती ति तेन उपहानवेलाय आगतेन सद्धि न अधो ओलोकेति, म. नि. अट्ठ. (म.प.) 2.275; - केय्याथ । किञ्चि न कथेसि, जा. अट्ठ. 1.233. विधि., म. पु.. ब. व. - विजानेय्य सकं अत्थं, अवलोकेय्याथ अवसन्नसम्मासङ्कप्पचित त्रि., ब. स. पावचनं, थेरगा. 587; ... तस्मा तस्स वादो निय्यानिको ति [अवसन्नसम्यक्संकल्पचित्त], वह, जिसके चित्त के सम्यक् सत्थु सासनमहन्ततं ओलोकेय्याति अत्थो, थेरगा. अठ्ठ. 2.178. संकल्प निराशा से भरे हैं - त्तो पु., प्र. वि., ए. व. - अववत्थान नपुं., वि + अव + Vठा के क्रि. ना., ववत्थान संसन्नसंकप्पमनोति तीहि मिच्छावितक्कोहि सुद्ध का निषे. [अव्यवस्थान], अनिर्धारण, अनिश्चय, काल आदि अवसन्नसम्मासङ्कप्पचित्तो, ध. प. अट्ठ. 2.236. का सुनिश्चित न रहना - तो प. वि., ए. व. - अनिमित्ततोति अवसमान त्रि., Vवस के वर्त. कृ. का निषे०, नहीं बसने अववत्थानतो, परिच्छेदाभावतोति अत्थो, विसुद्धि. 1.227, वाला, नहीं निवास कर रहा - नो पु.. प्र. वि., ए. व. - अववत्थानतोति कालादिवसेन ववत्थानाभावतो, विसुद्धि. अनाचेरकुलं वसन्ति आचरियकुलेपि अवसमानो, जा. अट्ठ. महाटी. 1.276. अववत्थितचारिका स्त्री., कर्म. स. [अव्यवस्थितचारिका]. अवसर पु.. [अवसर], समय प्रसङ्ग, सुविधा का समय, मौका, अनिश्चित प्रकृति की चारिका (जीवनवृत्ति) - कं द्वि. वि., प्रस्ताव - रो प्र. वि., ए. व. - पत्थावो वसरो समा, अभि. 1.418. For Private and Personal Use Only

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