Book Title: Agam 01 Ang 01 Aacharang Sutra Part 03 Sthanakvasi Gujarati
Author(s): Ghasilal Maharaj
Publisher: A B Shwetambar Sthanakwasi Jain Shastroddhar Samiti
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अनु. विषय
२० प्राभासस्त मनुष्य, इस क्षाराभंगुर निस्सार शरीरडी पुष्टिनिमित्त प्राशिहिंसा और तनित अर्भजन्ध या डरते हैं ।
२१ ग्यारहवें सूत्रा अवतरा, ग्यारहवां सूत्र और छाया । २२ आर्त्त और जहुहुःज युक्त अज्ञानी मनुष्य, जनेऽ विध दुष्कर्म पर सोलह प्रडारडे रोग आतंकडे लागी होते हैं, और झिर वे उन रोगोंडी यिङित्सानिमित्त खेडेन्द्रियाहि भवोंडी हिंसा डरते हैं ।
पाना नं.
२३ जारहवें सूत्रा अवतरा, जारहवां सूत्र और छाया । २४ प्रध्यrनित रोगोंडी निवृत्ति में यिङित्साये समर्थ नहीं हैं । अतः रोगनिवृत्यर्थप्राविधसे निष्पन्न यिडित्सा, विवेडियों के लिये हेय हैं । इस प्रकारडी यिङित्साविधि, ४न्भभरएशाहि३य महालयोंडी द्वारा है । इस लिये डिसी ली प्रशा उपभर्हन नहीं डरना चाहिये ।
२५ तेरहवां सूत्र और छाया ।
२६ अष्टविध विनाश धूतवाहो समझो सुनो। स संसार में आत्मत प्रभडे परिणामस्वरूप भुव अय्यनीयाहि हुलों में न्म लेते २ मि मुनित्व प्राप्त डरते हैं । २७ यौहवें सूत्र और अवतरएा ।
२८ ीक्षा लिये धुस्त मनुष्यडे लिये माता- 1-पिता जाहि विसाथ डरते है, और आडोश वयन जोलते हैं । २८ पन्द्रहवें सूत्रा अवता, पन्द्रहवां सूत्र और छाया । 30 संयमाभिलाषी मनुष्य, दीक्षा समय में रोते हुये अपने भाता पिता आहिडी ओर जिल्डुल ध्यान नहीं देता । सा सि प्रकारडा व्यवहार उचित ही है, ज्यों डि वह संसारडी वास्तवितासे अलिज्ञ, नर5 - भैसे गृहवास में रह ही ऐसे सता ! हे शिष्य ! सि धूतवाघेडत ज्ञाना सर्वा चिन्तन झरो ।
શ્રી આચારાંગ સૂત્ર : ૩
॥ इति प्रथम उद्देश ॥
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