Book Title: Vasunandi Shravakachar
Author(s): Hiralal Jain
Publisher: Bharatiya Gyanpith

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Page 27
________________ वसुनन्दि-श्रावकाचार बाल-स्त्री-मन्द-मूर्खाणां नृणां चारित्रकांक्षिणाम् । अनुग्रहार्थ तत्त्वज्ञैः सिद्धान्तः प्राकृते कृतः ॥ अर्थात् बालक, स्त्री, मूर्ख, मन्दज्ञानी, पर चारित्र धारण करनेकी आकांक्षा रखनेवाले सर्वसाधारण जनोके अनुग्रहके लिए तत्त्वज्ञानी महर्षियोंने सिद्धान्त-ग्रन्थोंका निर्माण प्राकृत भाषामें किया है। प्रा. वसुनन्दिको भी अपना उपदेश सर्वसाधारण तक पहुँचाना अभीष्ट था; क्योंकि साधारण जनता ही सप्त व्यसनोके गर्तमें पड़ी हुई विनाश की ओर अग्रसर हो रही थी और अपना कर्त्तव्य एवं गन्तव्य मार्ग भूली हुई थी। उसे सुमार्ग पर लानेके लिए लोकभाषामे उपदेश देनेकी अत्यन्त आवश्यकता थी। यही कारण है कि अपने सामने संस्कृतका विशाल-साहित्य देखते हुए भी उन्होंने लोककल्याणकी भावनासे प्रेरित होकर अपनी प्रस्तुत रचना प्राकृत भाषामें की । ३-प्राचार्य वसुनन्दिने समन्तभद्र -प्रतिपादित सरणिका अनुसरण न करते हुए और प्रतिमाओंको आधार बनाकर एक नवीन दिशासे क्यों वर्णन किया, यह एक जटिल प्रश्न है। प्रस्तावनाके प्रारंभमें श्रावक धर्मके जिन तीन प्रतिपादन-प्रकारोका जिक्र किया गया है, संभवतः वसुनन्दिको उनमेंसे प्रथम प्रकार ही प्राचीन प्रतीत हुआ और उन्होंने उसीका अनुसरण किया हो । अतः उनके द्वारा श्रावकधर्मका प्रतिपादन नवीन दिशासे नहीं, अपितु प्राचीन पद्धतिसे किया गया जानना चाहिए । श्रा० वसुनन्दिने स्वयं अपनेको कुन्दकुन्दाचार्य की परम्पराका अनुयायी बतलाया है । अतएव इसमे कोई आश्चर्यकी बात नहीं जो इसी कारणसे उन्होंने कुन्दकुन्दप्रतिपादित ग्यारह प्रतिमारूप सरणिका अनुसरण किया हो। इसके अतिरिक्त वसुनन्दिने श्रा० कुन्दकुन्दके समान ही सल्लेखनाको चतुर्थं शिक्षाबत माना है जो कि उक्त कथनकी पुष्टि करता है। दूसरा कारण यह भी हो सकता है कि वसुनन्दिने प्रस्तुत ग्रन्थमें जिस उपासकाध्ययनका बार-बार उल्लेख किया है, संभव है उसमें श्रावक धर्मका प्रतिपादन ग्यारह प्रतिमाओंको आधार बनाकर ही किया गया हो और वसुनन्दिने अपने ग्रन्थके नाम-संस्कारके अनुसार उसकी प्रतिपादन-पद्धतिका भी अनुसरण किया हो । जो कुछ हो, पर इतना निश्चित है कि दिगम्बर-परम्पराके उपलब्ध ग्रन्थोंसे ग्यारह प्रतिमाओंको आधार बनाकर श्रावकधर्मके प्रतिपादनका प्रकार ही सर्वप्राचीन रहा है। यही कारण है कि समन्तभद्रादिके श्रावकाचारोंके सामने होते हुए भी, और संभवतः उनके श्राप्तमीमांसादि ग्रन्थोके टीकाकार होते हुए भी वसुनंदिने इस विषयमें उनकी तार्किक सरणिका अनुसरण न करके प्राचीन आगमिक-पद्धतिका ही अनुकरण किया है। ४-श्रा० वसुनन्दि ने श्रावक के मूलगुणों का वर्णन क्यों नहीं किया, यह एक विचारणीय प्रश्न है । वसुनन्दि ने ही क्या, श्रा० कुन्दकुन्द और स्वामी कार्तिकेय ने भी मूलगुणो का कोई विधान नहीं किया है। श्वेतांबरीय उपासकदशासूत्र और तत्त्वार्थसूत्र में भी अष्टमूलगुणों का कोई निर्देश नहीं है । जहाँ तक मैंने श्वेतांबर ग्रंथों का अध्ययन किया है, वहाँ तक मैं कह सकता हूँ कि प्राचीन और अर्वाचीन किसी भी श्वे० आगम सूत्र या ग्रंथ में अष्ट मूलगुणों का कोई वर्णन नहीं है। दि० ग्रंथों में सबसे पहिले स्वामी समंतभद्र ने ही अपने रत्नकरण्डक में आठ मूल गुणों का निर्देश किया है। पर रत्नकरण्डक के उक्त प्रकरण को गवेषणात्मक दृष्टि से देखने पर यह स्पष्ट ज्ञात होता है कि स्वयं समन्तभद्र को भी आठ मूलगुणों का वर्णन मुख्य रूप से अभीष्ट नहीं था। यदि उन्हें मूलगुणों का वर्णन मुख्यतः अभीष्ट होता तो वे चारित्र के सकल और विकल भेद करने के साथ ही मूलगुण और उत्तरगुण रूप से विकलचारित्र के भी दो भेद करते। पर' उन्होंने ऐसा न करके यह कहा है कि विकल चारित्र अणुव्रत, गुणव्रत और शिक्षा व्रत-रूप से तीन प्रकार का हैं और उसके क्रमशः पाँच, तीन और चार भेद हैं। इतना ही नहीं, उन्होंने पाँचों अणुव्रतों का स्वरूप, उनके अतीचार तथा उनमें और पापों में प्रसिद्ध होनेवालों के नामों का उल्लेख करके केवल एक श्लोक में आठ मूलगुणों का निर्देश कर दिया है। इस अष्ट मूलगुण का निर्देश करने वाले श्लोक को भी गंभीर दृष्टि १-देखो रखक० श्लो०५१

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