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44... पूजा विधि के रहस्यों की मूल्यवत्ता - मनोविज्ञान एवं अध्यात्म... चाहिए। फटे हुए, जले हुए, सांधे हुए, सिले हुए या किसी अन्य के द्वारा प्रयोग में लिए गए वस्त्र पूजा में नहीं पहनने चाहिए।
• श्रावकों को पूजा के लिए दो वस्त्र-धोती एवं दुपट्टा तथा श्राविकाओं को तीन वस्त्रों का प्रयोग करना चाहिए।
• श्रावकों को अलग से रूमाल नहीं बांधना चाहिए। धोती और दुपट्टे की किनारियां ओटी हुई नहीं होनी चाहिए। दुपट्टे की किनारी पर रेशम के कुंदे होने चाहिए जिससे कि प्रमार्जना आदि कार्य अच्छे से हो सकें।
• पूजा के वस्त्र सामायिक अथवा अन्य गृह कार्य हेतु प्रयुक्त नहीं करने चाहिए।
• पूजा के वस्त्र रेशमी अथवा सूती होने चाहिए। सूती वस्त्र रोज पानी से निकालने चाहिए।
• शौच, मैथुन सेवन आदि क्रियाओं में पहने हुए वस्त्रों को पूजा हेतु उपयोग में नहीं लेना चाहिए।
• वस्त्रों को इस प्रकार पहनना चाहिए कि वे अन्यों के लिए विकार, ईर्ष्या या द्वेष के कारण न बनें और न ही उन्हें देखकर किसी के मन में हीन भाव उत्पन्न हो।
• पूजा के वस्त्रों के साथ घड़ी Wallet, Hand bag आदि का उपयोग नहीं करना चाहिए। Lipstick, Cream, Powder आदि सौंदर्य प्रसाधन भी पूजा के वस्त्रों में नहीं लगाने चाहिए। केश आदि संवारने का काम पूजा के वस्त्र पहनने से पहले ही कर लेना चाहिए।
• बाथरूम में पूजा के वस्त्र नहीं पहनने चाहिए। • मुखकोश के आठ पट्ट बनाकर ही उसे बाँधना चाहिए।
• दर्शनार्थी शुद्ध धुले हुए वस्त्र पहनकर मन्दिर आ सकते हैं। उन्हें भी उत्तरासंग अवश्य धारण करना चाहिए।
• महिलाओं को सिर ढंके बिना पूजा नहीं करनी चाहिए। • पूजा के वस्त्र पहनकर चप्पल, स्लीपर आदि नहीं पहनने चाहिए।
• पूजा के वस्त्रों में पानी आदि नहीं पीना चाहिए। यदि किसी विशेष कारण से पीना पड़े तो उन्हें धोने के बाद ही दुबारा पूजा हेतु प्रयोग में लेना चाहिए।