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દાદાસાહેબ, ભાવનગર,
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ॐ अहं नमः
श्री कांगड़ा जैन तीर्थ
शान्तिलाल जैन
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* श्री के
ॐ स्वस्ति श्री जिनाय नमः
पंजाब जैन समाज का प्राचीन वैभव
श्री कांगड़ा-जैन-तीर्थ
लेखक
शान्तिलाल जैन 'महरा
होशियारपुर
प्रकाशक
श्री श्वेताम्बर जैन कांगड़ा तीर्थ यात्रा-संघ
___ होशियारपुर (पञ्जाब)
विक्रम सम्वत् २०१२ सन् ईस्वी १९५६
वीर सम्वत् २४८२ आत्म सम्वत् ६०
मूल्य चार आने
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प्रकाशक श्री कांगड़ा तीर्थ यात्रा संघ
होशियारपुर
वीर संवत् २४८२
प्रथमावृत्ति एक हजार
मुद्रक राज कुमार जैन . राज रत्न प्रेस
प्रताप रोड जालन्धर शहर
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द्रव्य सहायक
श्रीमती चम्पादेवी जैन
धर्मपत्नी
सेठ मीरीमल जैन रईस मालेरकोटला
ने
देव गुरु भक्ति निमित्त
इस पुस्तक के प्रकाशन का खर्च देकर अपने धन का सदुपयोग किया
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सादर समर्पण
जिस महापुरुष ने इस पावन तीर्थ का पुनर्प्रकाशन किया
जिन के अमर संदेशों ने सेवकों को उठने में प्रेरणा दी
जिन के आशीर्वाद से । हम ने बढ़ने का साहस किया
जिन का पवित्र नाम ले कर हम सफलता की राह में बढ़ रहे हैं
उन प्राणाधार स्व गुरुदेव भगवान श्रीमद् विजयवलभ सूरीश्वर जी महाराज
के पवित्र कर कमलों में यह पुष्पाञ्जलि सादर समर्पण करता हूँ जय वल्लभ ! जग वल्लभ ! विश्व वल्लम !
शान्तिलाल जैन
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लेखक
शान्तिलाल जैन होश्यारपुर
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श्रीमती चम्पा देवी जैन धर्मपत्नी धर्मप्रेमी ला० मीरीमल जैन रईस
मालेरकोटला (पैप्सू)
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आप ने इस पुस्तक की छपाई के लिए २५१) रु० की द्रव्य सहायता
प्रदान की है। = = = = = =
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श्री कांगड़ा जैनतीर्थ के पुनरोद्धारक
हमारे प्राणाधार पंजाब केसरी श्री विजयवल्लभ सूरीश्वर जी महाराज
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पंजाब-देशोद्धारक
प्रातः स्मरणीय श्री विजयानन्द सूरीश्वर (आत्माराम जी) महाराज
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पृष्ठ संख्या
विषय सूची विषय १. दो शब्द २. प्रस्तावना ३. मंगलाचरण ४. भूतकाल का कांगड़ा तीर्थ ५. वर्तमान का कांगड़ा तीर्थ ६. तीर्थ यात्रा संघ ७. तीर्थोद्धार कमेटी ८. सारांश ६. संदेश और शभ कामनायें १०. तीर्थ स्तवनावलि ११. उपसंहार
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दो शब्द प्राचीन काल से जैन समाज में तीर्थयात्रा का विशेष महत्त्व रहा है । सैंकड़ों हजारों लोग मिल कर बड़े आनन्द और उत्साह से तीर्थयात्रा करते चले आए हैं। वैसे तो प्रत्येक जिन मन्दिर और जिन मूर्ति स्थावर तीर्थ रूप है परंतु विशेषतः तीर्थंकरों के कल्याणक भूमियां समवसरण के क्षेत्र, जैन ऐतिहासिक स्थान, अतिशयक्षेत्र, ओर प्राचीन जैन मंदिर और जिन मृतियों को ही स्थावर तीर्थ के रूप में याद किया जाता है । स्थानीय मन्दिर और मूर्तियों की अपेक्षा ऐसे महत्त्वशाली तीर्थों के दर्शन पूजन से मन को असीम
आनंद और भावनाओं में विशेष आकर्षण पैदा होता है । जिस से प्रेरित हो कर कई भाग्यशाली अपने प्रात्म-कल्याण में तत्पर हो जाते हैं भव्य प्राणियों के तरने में साधन होने से ही ऐसे पुण्य क्षेत्र तीर्थ कहलाते हैं।
श्री कांगड़ा-जैन-तीर्थ ऐसे ही मान्य तीर्थों की गणना में खड़ा हो सकता है क्योंकि यह प्राचीनता को दृष्टि से अद्वितीय, प्राकृतिक दृष्टि से अति सुन्दर और ऐतिहासिक दृष्टि से विशेष महत्त्व रखता है । भगवान् श्री नेमिनाथ के समय की यादगार, हरे-भरे पर्वतों, सुन्दर नदियों, और जलाशयों से शोभायमान, बड़े बड़े नरेशों और धनाढय पुरुषों से पूजित यह पावन तीर्थ समय के हेर फेर से आज । टूटे फूटे खण्डहरों में के रूप में शाही किले में विराजमान है। इस समय इस तीर्थ में केवल भगवान् श्री आदिनाथ की मनोहर मर्ति ही एक छोटी सी कुटिया में शोभा दे रही है।
हमारे पुरातन वैभव का सुन्दर चिन्ह होने से यह एक मूर्ति और यह छोटा सा एक मंदिर हमारे लिए सैंकड़ों साधारण मूत्तियों और विशाल मंदिरों से भी अधिक महत्त्वशाली है इसलिए हमारा Shree Sudharmaswami Gyanbhandar-Umara, Surat www.umaragyanbhandar.com
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( ख )
कर्तव्य हो जाता है कि इसकी सुरक्षा, देख-रेख और पुनरुद्धार करने के लिए शोघ्र कटिबद्ध हो जावें और इसे फिर से प्रतिभाशाली और गौरवसम्पन्न बनाने में प्रयत्नशील हों।
दो तीन शताब्दियों से जैन समाज अपने इस प्राचीन एवं गौरवशाली तीर्थ से अपरिचित रहा। हमारे स्वर्गाय गुरुदेव पंजाब केसरी, युगवीर जैनाचार्य १००८ श्रीमद् विजयवल्लभ सूरीश्वर जी महाराज ही सौभाग्यशाली थे जिन्हें किसी तरह से इस मंदिर और मर्ति की जानकारी प्राप्त हुई अतः उन के दिल में इस मनोहर मर्ति के दर्शनों की विशेष उत्कण्ठा पैदा हुई । उन्होंने दो बार विशाल यात्रा-संघों में सम्मिलित हो कर इस पावन तीर्थ की यात्रा की और अतीव आनन्द प्राप्त किया।
इस प्राचीन पावन तीर्थ से जैनों को परिचित करवाने के लिये तथा इसके दर्शन और पूजन से आत्म-कल्याण का लाभ उठाने की भावना से "श्री श्वेताम्बर जैन कांगड़ा तीर्थ-यात्रा-संघ होशियारपुर" की स्थापना हुई। फलतः कई वर्षों से यात्रा-संघ अपने हजारों भाई बहिनों को इस पावन तीर्थ की यात्रा का लाभ दिलाने का सौभाग्य प्राप्त कर रहा है।
यात्री भाई प्रतिवर्ष सुन्दर कार्यक्रम होने से यात्रा से विशेष आनन्द और उत्साह प्राप्त करते चले आ रहे हैं तथा इस प्राचीन तीर्थ के सुन्दर इतिहास की जानकारी प्राप्त करने की इच्छा भी साथ ही साथ प्रकट करते चले आ रहे हैं । हमारे पास इस साहित्य की कमी होने से हमने यह अनुभव किया कि कांगड़ा तीर्थ का संक्षिप्त इतिहास लिखा जावे । फलस्वरूप यह छोटी सी पुस्तिका आपके कर. कमलों में भेंट है।
इसी सम्बन्ध में निवेदन कर दू' कि इस महान-तीर्थ का पूर्ण इतिहास आज भी हमें उपलब्ध नहीं है तो भी जो थोड़ी बहुत Shree Sudharmaswami Gyanbhandar-Umara, Surat www.umaragyanbhandar.com
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(ग) जानकारी प्राप्त हो सकी है उसे यथायोग्य वर्णन करने का प्रयत्न किया गया है।
मुनि श्री जिनविजय जी महाराज का जितना भी धन्यवाद करें थोड़ा है क्योंकि उन्हीं के विशेष प्रयत्न से हमें इस तीर्थ की सुन्दर रूप-रेखा का कुछ ज्ञान प्राप्त हो सका है। मुनि जी को प्रन्थ-भण्डारों की शोध-वोज करते हुए एक विज्ञप्ति पाटन के भण्डार से प्राप्त हुई जिसमें कांगड़ा तीर्थ की यात्रा का वर्णन था तब उन्होंने इस सम्बंध में और सामग्री भी प्राप्त करने का प्रयत्न किया । शोध-खोज के विभाग के डायरैक्टर जैनरल सर ए. सी. कनींघम की रिपोर्ट से भी उन्हें इस प्रबंध में अच्छा सहयोग मिला। फलतः उनके उद्यम से कांगड़ा तीर्थ का सुन्दर इतिहास प्रकाश में आया जो कि विज्ञप्ति त्रिवेणी के नाम से हमें आनन्दित कर रहा है।
मैंने अपनी इस पुस्तक में इसी ग्रन्थ से विशेष सामग्री ली है।
भूतकाल के कांगड़ा तीर्थ और वर्तमान के कांगड़ा तीर्थ की अवस्था में भारी अन्तर है । पूर्व समय में यह तीर्थ जिस ऋद्धि तथा ऐश्वर्य को प्राप्त था आज इस अवस्था में नहीं है । भूतकाल इसकी यौवनावस्था थी तो वर्तमान इसका बुढ़ापा । अतः इस पुस्तक में तीर्थ के इतिहास को दो भागों में बांट दिया गया है यथाः-भतकाल का कांगड़ा तीर्थ और वर्तमान का कांगड़ा तीर्थ । दोनों अवस्थाओं में उपयोगी सामग्री देने का पूरा प्रयत्न किया गया है।
इस पुस्तक में मैंने कुछ ऐसी घटनाओं का भी वर्णन किया है जो यात्रा के दिनों में हमारे अपने देखने और सुनने से अनुभव में आई हैं। तीर्थ सम्बन्धी कुछ भजन स्तवन तथा योग्य महापुरुषों के शुभ संदेश भी इसमें दे दिये गये हैं और कांगड़ा जिले के सभी ऐसे Shree Sudharmaswami Gyanbhandar-Umara, Surat www.umaragyanbhandar.com
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(घ )
स्थानों का भी वर्णन किया गया है जो हमारे लिये विशेष ऐतिहासिक महत्त्व रखते हैं इस तरह से इस छोटी सी पुस्तक को अधिक से अधिक उपयोगी बनाने का प्रयत्न किया गया है तो भी अभी अल्पजानकारी होने से कई प्रकार की त्रुटियां रहने की सम्भावना है जिस के लिये मैं क्षमा का प्रार्थी हूँ ।
अन्त में इस पुस्तक के प्रकाशन कार्य में तथा तीर्थोद्धार में सहयोग तथा सहायता देने वाले सभी महानुभावों का धन्यवाद करना मेरा कर्तव्य है । सब से पहिले अपने प्रकांड विद्वान् मुनिराज श्री प्रकाशविजय जी महाराज का अति धन्यवादी हूँ जिन्हों ने अपने मूल्य समय को इस पुस्तक के लेख सुनने में भेंट किया और समय समय पर अपनी शुभ सम्मति द्वारा सन्मार्ग दिखाते रहे ।
वन्दनीय श्री प्रकाशविजय जो तथा महान् प्रभाविक साध्वियां जी श्री शीलवति श्री जी श्री मृगवति श्री जी की प्रेरणा से धर्म परायणा बहिन श्रीमति चम्पादेवी जैन धर्मपत्नी सेठ मीरीमल जी रईस मालेरकोटला ने इस पुस्तक की छपाई के लिए २५१) रु० की रकम भेंट करके अपने धन का सदुपयोग किया अतः आप सब का धन्यवाद करता हूँ ।
जैन दर्शन के प्रखर विद्वान् पं० हीरालाल जी दूगड़ जैन शास्त्रो अम्बाला वालों का आभार मानता हूँ जिन्हों ने इस पुस्तक के संशाधन कार्य में अनेक आवश्यक कार्य होते हुए भी अपना अमूल्य समय देकर हमें अनुग्रहीत किया और सच्ची तीर्थ भक्ति का परिचय दिया। जैन समाज के प्रियवक्ता परम विद्वान् लाः पृथ्वीराज जो जैन एम. ए. शास्त्री प्रोफैसर श्री आत्मानन्द जैन कालिज अम्बाला व संयुक्त मन्त्री श्री श्रात्मानन्द जैन महासभा पंजाब का भी विशेष आभारी हूँ जिन्हों ने अपनी शुभ सम्मति द्वारा हमें मार्ग दिखाया और इस पुस्तक के लिये अपनी सुन्दर प्रस्तावना भेज कर कृतार्थ किया ।
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(ङ)
तीर्थोद्धार के सम्बन्ध में सब से पहिले पुरातत्व विभाग नई देहली के सुपरिटेंडेंट साहिब श्री J. H. S. वैडिंग्टन साहिब (M. B. E. F. S. A ) तथा आदरणीय श्रीयुत सीतारामचन्द्रन जी इंचार्ज कांगड़ा वैली तथा शर्मा साहिब आदि प्रेमी महानुभावों को हार्दिक धन्यवाद है जो समय समय पर हमें हर प्रकार की सुविधा देते रहे हैं और प्रेम पूर्वक व्यवहार करते रहे हैं और तीर्थ को उन्नति में यथायोग्य सहयोग और सहायता करने के शुद्ध भाव रखते हैं।
जिस पावन तीर्थ की उन्नति तथा पुनरुद्धार के शुभ कार्य में अपनी प्रेरणा और आशीर्वाद दे कर स्वर्गवासी गुरुदेव श्रीमद् विजय वल्लभ सूरीश्वर भगवान् तथा वर्तमान जैनाचार्य शान्तमूर्ति श्री विजय समुद्र सूरि जी महाराज ने अपने सेवकों को खड़ा करने में उत्साहित किया उस तीर्थ के उद्धार में पूर्ण सहयोग देने वाले और हम जैसे साधारण सैनिकों का नेतृत्व करने वाले अपने कुछ सेनानायकों का धन्यवाद करना भी मेरा परम कर्तव्य हो जाता है ।
आदरणीय सेठ साहिब श्री कस्तूरभाई लालभाई जी अहमदा बाद, माननीय श्री फूलचन्दभाई शामजी बम्बई, सेठ श्री मोहन लालभाई चौकसी बम्बई, सेठ रमणीकलाल जी पारिख बम्बई आदि सज्जनों के प्रेम की जितनी सराहना की जाय कम है जिन्हों ने इतनी दूरी पर विराजमान होते हुए भी हमें पूर्ण सहयोग देने का आश्वासन देकर उत्साहित किया है | धर्मानुरागी ला बाबूराम जी जैन एडवो - क्रेट जीरा प्रधान जैन महासभा पंजाब, प्रिय सैक्रेटरी साहिब श्रीमान् बाबू नेमचन्द जी जैन जीरा वाले, सर्व प्रिय नेता बाबू ज्ञानदास जी जैन सीनियर - सबजज, आदरणीय सेठ श्री कीका भाई रमणलाल जी
पारिख, श्रीयुत प्रो० बढ़रीदास जी देहली, ला० खुशी राम जी साहिब
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(च)
ऐडवोकेट जालन्धर, ला परमानंद जैन भूतपूर्व मंत्री महासभा पंजाब, श्रद्धेय ला० दौलतराम जी जैन ऐडवोकेट होशियारपुर तथा परम उत्साही कार्यकर्ता ला० अमरनाथ जी जैन हैडमास्टर गढ़दीवाला वालों का हार्दिक धन्यवाद करता हूँ जिन्होंने समय समय पर इस तीर्थ के उद्धार के लिए अपना अमूल्य समय दे कर और हमारा नेतृत्व करके हमें आनन्दित और उत्साहित किया है।
तीर्थ यात्रा-संघ के सुयोग्य कार्यकर्ता मेरे उत्साही साथी ला० सरदारीलाल जैन संघचालक ला० प्रीतमचंद जी सहायक संघचालक, डा० एफ० सी जैन प्रधान मन्त्री, ला. धर्मचन्द जी कोषाध्यक्ष ला० देवेन्द्रकुमार आदि सभी प्रेमी मित्रों का हार्दिक प्रेम ही इस लेखनी के चलने में प्रेरक है । इन साथियों के प्रेम ही से यह अल्पज्ञ इतनी भारी जिम्मेदारी उठाने का साहस कर रहा है । अतः इन इष्ट मित्रों का धन्यवाद करते हुए मैं अपने प्यारे बन्धुओं से विनती करता हूँ कि मेरी इस पहली कृति में यदि कहीं कोई भूल हुई हो तो क्षमा का दान प्रदान करें और मेरी भूल को सुझाने की कृपा करें ।
चरणों की रज
विनीत शान्तिलाल. जैन 'नाहर'
होशियारपुर
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प्रस्तावना
पञ्चनद का विशाल भूखंड भारतीय इतिहास में एक विशेष स्थान रखता है । पुरातत्व इस बात का साक्षी है कि आर्यों के भारत में पदार्पण से पर्याप्त समय पूर्व भी इस प्रदेश के कुछ भागों में एक समुन्नत सभ्यता का प्रसार था । भगवान् ऋषभदेव के जीवन काल की घटनाओं को प्रामाणिक माना जाए तो ज्ञात होता है कि उन्होंने दीक्षा लेते समय तक्षशिला का राज्य अपने पुत्र बाहुबलि को दिया था भगवान् ने स्वयं भी एक बार इस नगर को अपनी चरणरज से पवित्र किया था और बाहुबलि ने उनको पावन स्मृति में पद बिम्ब बनवाए थे। इससे स्पष्ट है कि जैनधर्म का किसी न किसी रूप में इस प्रांत में अतीव प्राचीन काल में भी अस्तित्व था । मुहेंजोदरो की सभ्यता के कई अङ्ग ऐसे हैं जो जैनधर्म के अस्तित्व को प्रमाणित करते हैं । विद्वानों का मत है कि वहाँ प्राप्त होने वाली योगस्थ मुद्राएँ जनधर्म सम्मत काउसग्ग की ध्यानावस्था से मिलती हैं । श्रीयुत सी० जे० शाह ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक 'Jainism in Northern India' में सप्रमाण सिद्ध किया है कि पंजाब व निकटवर्ती प्रदेशों में जैनधर्म कैसे फला फूला । बौद्ध विद्वान् चीनी यात्री हूइनचांग क भ्रमण वृत्तांतों में भी कई वर्णन ऐसे है जा पंजाब में जैन मन्दिरों और जैन साधुओ के अस्तित्व का प्रमाण देते हैं ।
परन्तु इन सब अनुसंधानों में सब से आश्चर्यजनक अनुसंधान वह है जिस के आधार पर हमें यह पता चला कि कांगड़ा या उस के समीपवर्ती शहरों और गाँवों में भी किसी समय जैनधर्म की पताका लहरा रही थी। आज उस जिले में शायद सौ से अधिक जैन भी न होंगे और वह भी अधिकतर किसी व्यापार या नौकरी के लिये वहां
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(ज) बसे हुए हैं। पुरातत्व विभाग के तत्कालीन अध्यक्ष सर कनिंघम ने १८७२ ई० में कांगड़े का निरीक्षण किया और उन्होंने अपनी रिपोर्ट में वे बातें लिखों जिनसे जैन अजैन दोनों ही अपरिचित थे। उनकी प्रकाशित रिपोर्ट से पता चला कि कांगड़े के किले के छोटे मन्दिरों में भगवान् पार्श्वनाथ का भी एक मन्दिर है जिसमें आदि तीर्थंकर ऋषभदेव की भव्यमूर्ति विराजमान है ।
पाठकों को यह पढ़कर और भी विस्मय होगा कि कनिंघम महोदय के निरीक्षण के अनुसार कालिदेवी के मन्दिर में भी एक लेख था जो उन्हें दोबारा जाने पर नहीं मिला । उस लेख की नकल उनके पास थी जिसके प्रारम्भिक शब्द थे 'ॐ स्वस्ति श्री जिनाय नमः ।' मर्ति का लेख और यह लेख; दोनों विक्रमीय १६वीं शताब्दी के हैं । उन्होंने इस तथ्य का भी उद्घाटन किया कि कांगड़े के किले में अपार धन सम्पत्ति थी । महमूद ग़ज़नवी यहां से जो माल लूट कर ले गया, इतिहासकारों के कथनानुसार 'उसे ऊँटों की पीठे उठा नहीं सकती थीं, बर्तनों में वह समा नहीं सकता था, लेखक की लेखनी उसका वर्णन नहीं कर सकती थी और गणित-शास्त्री की कल्पना भी गिनने में असफल थी।'
कनिंघम महोदय की रिपोर्ट पर भी सम्भवतः जैनों का ध्यान जैनधर्म के इस प्राचीन केन्द्र की ओर नहीं गया। सौभाग्यवश इतिहास प्रेमी व जैन पुरातत्व के विद्वान मुनि श्री जिनविजय जी को एक भण्डार का निरीक्षण करते हुए सं० १९७२ में 'विज्ञप्ति त्रिवेणी' नामक एक पत्र मिला जो सं० १४८४ का लिखा हुआ था। आगामी वर्ष ही उसका ग्रंथ रूप में प्रकाशन हुआ । इस पत्र की प्राप्ति जैनधर्म व समाज के इतिहास में क्रांतिकारी समझी जानी चाहिये । इसके Shree Sudharmaswami Gyanbhandar-Umara, Surat www.umaragyanbhandar.com
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(झ) प्रकाशन से पूर्व कौन जानता था कि कभी पंजाब में भी भव्य जिनालय, संपन्न श्री संघ, और विद्वान् जैन-प्राचार्यों का अस्तित्व था
और इस धर्म को न केवल राज्याश्रय प्राप्त था, अपितु कुछ राजा भी इसके अनुयायी थे।
अस्तु ! विज्ञप्ति त्रिवेणी के प्रकाशन के बाद यह निश्चित है कि कांगड़ा तीर्थ की ओर हमारा ध्यान आकृष्ट हुआ। स्वर्गीय जैनाचार्य श्रीमद् विजयवल्लभ सूरि जी ने यात्रासंघ का नेतृत्व कर न केवल प्राचीन गौरव को पुनर्जीवन दिया अपितु पंजाब श्रीसंघ में एक विशेष भक्ति का संचार किया । होशियारपुर श्रीसंघ ने इस तीर्थ की यात्रा के लिये जनता में रुचि उत्पन्न की और प्रतिवर्ष यात्रा की व्यवस्था का भार उठा कर समाज सेवा व शासनोन्नति का महान कार्य किया।
'विज्ञप्ति त्रिवेणी' अब प्रायः उपलब्ध नहीं । इधर हर साल की यात्रा के फलस्वरूप भारत का समस्त श्रीसंघ यह जानने के लिए उत्सक था कि हमारे प्राचीन वैभव के इस केन्द्र का इतिहास क्या है ? ऐसी परिस्थिति में श्री जैन श्वेताम्बर कांगड़ा तीर्थ कमेटी होशियारपुर के उत्साही मन्त्री श्री शान्तिलाल जी नाहर का कांगड़ा के विषय में एक पुस्तक प्रकाशित करना समय की माँग को पूरा करना है । वह न तो इतिहास के विद्वान् हैं और न अध्यापन उन का धन्धा है। फिर भी उन्होंने इसे तैय्यार करने में जो परिश्रम किया है, वह उन की लगन
और अध्ययनशीलता का ज्वलन्त प्रमाण है । पुस्तक पढ़ कर किसी को यह ख्याल तक न आएगा कि एक व्यापारी भी ऐसी सुन्दर शैली व प्रवाहपूर्ण भाषा में लेखनी का चमत्कार दिखा सकता है। उन्होंने भरसक प्रयत्न किया है कि अब तक जो उपलब्ध सामग्री है उस का
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(ब)
उपयोग कर सारांश तीर्थोद्धार के लिए तथा अब तक किए गए कार्य को रिपोर्ट, भावी कार्यक्रम की रूपरेखा आदि देकर उन्होंने पुस्तक को और भी उपयोगी बना दिया है। साथ ही यह यात्रियों के लिए एक पथ प्रदर्शक या Guide का भी काम देगी।
मैं उन के इस महान् परिश्रम का स्वागत करता हूँ। मुझे विश्वास है कि सभी भाई बहिन इसे मनन पूर्वक पढ़ेंगे। साथ ही इतिहासज्ञ अधिक अनुसंधान की ओर प्रेरित होंगे। भारत सरकार ने "Kulu & Kangra' नामक यात्री-पथ-प्रदर्शक पुस्तिका में स्वीकार भी किया है कि यह घाटी ब्राह्मण, जैन व बौद्ध धर्म सम्बन्धी प्राचीन अवशेषों से समृद्ध है।" परन्तु यह निश्चित है कि जैन पुरातत्व को खोज अभी बाकी है। समाज को इस ओर ध्यान देना चाहिए ।
अम्बाला शहर ४-३-१९५६
पृथ्वीराज जैन एम० ए० शास्त्री प्रोफेसर श्री आत्मानन्द जैन कालेज
अम्बाला व संयुक्त मन्त्री श्री प्रा० जैन महासभा
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कांगड़ा-पति भगवान श्री आदिनाथ (ऋषभदेव) जी
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जसदनुवंदनाधर्माखासमायाचिताबादिपिसभतिकदलाफलप्रदाननसम्यगासंक्षमवरामंशावनायएमालघाश्रामद्रिीसर्वबादापिसमुचितशिक्षा याक्षणामकारक्षणायनाविनयविलसितादितितिक्षणायोक्षारक्षणासातघा धुनावकिमयसमंजसासमाधिसहानास्त्रिात नात्यंत शामताप्रसादाहसपरिचदा अपिसमादितास्तथीयामादा अपवावविश्वविधानानपणासयात्यागिदिताहिज्ञानातिनायायवायवधानका शतावनीताल नितिनलिपाशतीतचरतोयानाडावसविलीतततामहापादनामलितनावमाक्षिणातवानविस्मरविद्यांबनिनापसी वापरासादरा गानापरताश्यानजिनसवमरिणदानपानतिसामघराज तिलिवितालवतात्यामादापरिचिरपरिस्फरनाममा वदनायताकायामशिनलाइसविस्यमावतिविज्ञप्तितितमानकाल्यविधानाधविस्ताविकायम नाकालालाबालसाविला विधारिसविनियामकलसवादरिवारदारिया गणय द्य निषापमानमहानिस्त्रांच धिरकाने चलधिवसचुवनसंरवानाईमाघ
निराधमादिवसारसितवासावारसामधिीतायेमहालवयानयवाधिकामसंगतवायदवलिरिवर्तस्यतिबाधांधामद्वितिसा मिवियामाजिशिननरसिंहस्थतमायाविनया नानासारवासाक्षरक्षिपंपांजलि प्रणमामलविनायस्वरुपालक ज्ञाया
नाविलनिवितानामगंण्डHिARIYAमासिटामोकिनहिवदनिकायायादवगुननरामाधुरन्नाधाया। वायदाहरकतदाता विशिथास्सिदायाप्रतिपक्षिालितानपकारतियाशिवमस्त्रसजगतापरहितनिस्तान, नगलादाधापयत नशा पधवसरवीतत्तवालाकास्जिदमानिनवासनायास्वनियासंबायोग्रात्ययावयापशाहलासमाविरसुस्वयमा मामिनिाला FIR
पायं १०००१२
विज्ञप्तित्रिवेणि की हस्तलिखित प्रति का अन्तिम पत्र
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श्री आदिजिनाय नमः
श्री कांगड़ा जैन तीर्थ
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मङ्गलाचरण आदि-जिनंद जिस मन बसे, निर्मल ता मन होय ।
शान्तिनाथ सिमरूं सदा, व्यथा रहे न कोय ।। ! विषय-कषाय मम मिटे, नेमिनाथ भगवन्त ।
पास प्रभु के सिमरण से, होवे दुःख का अन्त ॥ वीरों में महावीर है, तारागण में चाँद । इस निर्बल को बल मिले, कर्म ताप हो मांद ॥ गौतम की लब्धि मिले, पाऊँ सम्यक्-ज्ञान ।
आतम वल्लभ सद् गुरु, मिले शान्ति-भगवान ॥ अम्बे, मां चक्र श्वरी विजया पद्मा ध्याय । 'नाहर' सिमर सरस्वती, कार्य सिद्ध हो जाय ॥ || = = = = = = = =
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(२) भूतकाल का कांगड़ा तीर्थ पंजाब प्रदेश को पर्वतीय श्रेणियों में कांगड़ा जिले का विशाल रमणीय क्षेत्र है जिस में नगर-कोट-कांगड़ा नाम का प्राचीन ऐतिहासिक नगर है । नगर के दक्षिण की ओर रमणोय चोटियों पर एक प्राचीन विशाल किला शोभा दे रहा है जो कि वीरों के समान रण-भूमि में शत्रु के अनेक प्रहारों को बड़े साहस ओर धेय्य के साथ सहन करता हुआ भी पूरी शान के साथ खड़ा है । इसके दोनों ओर बान-गङ्गा
और मांझी नाम की दो सुन्दर नदियां, दो वीरांगनाओं के रूप में मानो इसकी वीर गाथाओं पर मुग्ध हो कर अटखेलियां करती हुई अपने मधुर स्वरों से गाती हुई, मीठी झंकार से रास रचाती हुई बराबर आगे बढ़ती चली जाती है और अन्त में इसे अपनी भुजाओं में लेतो हुई दूध और पानी के समान घुल-मिल गई हैं। यही गौरवशाली किला हमारा कोर्तिस्तम्भ है-हमारा प्राचीन ऐतिहासिक तीर्थ ।
भगवान् श्री नेमिनाथ २२वें तीर्थंकर के समय में महाभारत युग में चन्द्रवंशी कटौच कुल में उत्पन्न महाराजा श्री सुशर्मचन्द्र के कर-कमलों से इस नगर व तीर्थ की स्थापना हुई थी। उन दिनों कांगड़ा का यह विशाल क्षेत्र त्रिर्गत-देश का एक भाग था जो कि एक समय जालन्धर-देश के नाम से भी प्रसिद्ध हुआ। यह नगरी जिसे आज नगर-कोट-कांगड़ा कहते हैं, इन्हों महाराजा सुर्शमचन्द्र के कर-कमलों से स्थापित होने के कारण सर्शमपर नाम से प्रसिद्ध थी । यही
* देखो विज्ञप्ति-त्रिवेणि।
+ कांगड़े की जनता भी इन भावों की पुष्टि करती है । Shree Sudharmaswami Gyanbhandar-Umara, Surat www.umaragyanbhandar.com
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(३)
प्राचीन किला किसी समय कङ्गदक-कोट के नाम से पुकारा जाता था
और कङ्गदक-कोट का नाम बदलते बदलते कांगड़ा कोट के नाम की प्रसिद्धि पा गया। तब धीरे धीरे इसी कांगड़ा कोट के नाम पर इस नगर
और जिले का नाम भी कांगड़ा हो गया और आज तो इस क्षेत्र की पर्वत श्रेणियों को भी 'कांगड़ा के पहाड़' कह कर पुकारा जाता है परन्तु पूर्वकाल में इन पहाड़ियों को सपादलक्ष-पर्वत के नाम से याद किया जाता था। कांगड़े का जिला होश्यारपुर जिले के साथ मिलता है। होश्यारपुर जिले में फैली हुई पर्वत श्रेणियों को शिवालक के नाम से याद किया जाता है। सम्भव है यह 'शिवालक के पहाड़' 'सपादलक्षपर्वत' का बदला हुआ रूप हो ।
कांगड़ा किले के ऐतिहासिक मन्दिर में मूलनायक प्रतिमा श्री आदीश्वर भगवान् की स्थापित की गई थी जो कि बड़ी प्रतिभाशाली और मनोहर थी। मन्दिर जी में और भी अनेकों सुन्दर जिनप्रतिमायें विराजमान थीं। मन्दिर जी की छटा अद्वितीय थी। जिसके सुनहरी कलशों पर इन्द्रध्वजायें बड़े शान से लहराया करती थीं। इस पावन तीर्थ की महिमा दूर दूर तक फैली हुई थी जिस के कारण समय समय पर यात्री लोग इस की यात्रा को बड़े आनन्द और उत्साह से आया करते थे और तीर्थ दर्शन प्ते अपने को धन्य मानते थे। यह तो था कांगड़ा किले का सब से प्राचीन सर्वोत्तम मन्दिर । ____ इस के अतिरिक्त कांगड़ा नगर में तथा आस पास के क्षेत्रों में भी अनेकां जैन मन्दिर शोभायमान थे । जिस से सिद्ध होता है कि कांगड़ा के सारे क्षेत्र में जैनों को हजारों की बस्ती होगी । इतिहास यह भी बताता है कि सुर्शमचन्द्र के कई वंशज जैन धर्म के श्रद्धालू रहे और उन्होंने समय समय पर जैन मन्दिर और जैन मूर्तियों की स्थापना की। Shree Sudharmaswami Gyanbhandar-Umara, Surat www.umaragyanbhandar.com
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राज्य की दीवान-गीरी पर भी जैनों का बहुत समय तक अधिकार रहा इस बात के भी प्रमाण मौजूद हैं । उपर दिये गये अधिकतर भाव की पुष्टि के लिये प्रमाण रूप केवल एक ही ऐतिहासिक ग्रन्थ आज उपलब्ध हो सका है जिस का पवित्र नाम है "विज्ञप्ति त्रिवेणिः"। अतः विज्ञप्ति त्रिवेणिः' का परिचय देना आवश्यक है सो नीचे दिया जाता है।
विज्ञप्ति त्रिवेणिः पिछले समय में जब रेल गाड़ो चालू नहीं हुई थी एक स्थान के समाचार दूसरे स्थानों पर विज्ञप्तियों के द्वारा भेजे जाया करते थे। प्रायः शिष्य अपने गुरुओं की सेवा में चतुर्मास के समाचार विज्ञप्ति पत्रों में लिख कर भेजा करते थे । यह विज्ञप्ति पत्र जन्म-पत्री के स्वरूप समान हुआ करते थे। जो कि प्रायः बड़े बड़े लम्बे हुआ करते थे । कहीं २ तो ६० फुट तक लम्बे विज्ञप्ति पत्र भी सुनने में आये हैं। इन विज्ञप्तिपत्रों के लगभग आधे भाग में प्रायः केवल सुन्दर सुन्दर महत्त्वशाली चित्र हो हुआ करते थे और शेष भाग में चतुर्मास के आवश्यक समाचार होते थे।
यह विज्ञप्ति त्रिवेणि भी इसी प्रकार का एक विज्ञप्ति पत्र है। जिस में लेखों के तीन भाग होने से इसे विज्ञप्ति त्रिवेणि का नाम दिया गया है । यह विज्ञप्ति पत्र संवत् १४८४ के माघ शुदि दशमी के दिन सिंघ देश के मलिकवाहन नामक स्थान से श्री जयसागर उपाध्याय ने खरतरगच्छ के आचार्य श्री जिनभद्र-सूरि की सेवा में गुजरात देश के अणहिल्ल पुर-पाटन नामक नगर में भेजा था। पत्र बड़ो अच्छो आलंकारिक भाषा में सुन्दर रूप से लिखा गया है । पढ़ते समय वृत्तान्त के साथ काव्य का भी कुछ कुछ आनन्द प्राता Shree Sudharmaswami Gyanbhandar-Umara, Surat www.umaragyanbhandar.com
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(५) है। लेखक ने इस में गद्य और पद्य दोनों का उपयोग किया है। जिस से यह अधिक रोचक बन गया है । विज्ञप्ति पत्र तो सारे का सारा संस्कृत में लिखा गया है परन्तु इसके अन्त में जो दो परिशिष्ट लिखे गये हैं वह उस समय की लोक भाषा में लिखे हुए हैं। यह पत्र ताड़पत्र पर लिखा हुआ है और आज जीर्ण अवस्था में पाटन के भण्डार में मौजूद है।
___ इस पत्र का पुनर्लेखन मुनि श्री जिनविजय जी महाराज ने सन् १६१६ में किया था जो कि श्री आत्मानन्द जैन सभा भावनगर द्वारा प्रकाशित हो चुका है। इस ग्रन्थ का नाम भी 'विज्ञप्ति-त्रिवणिः' ही रखा गया है। इसे अधिक उपयोगी बनाने के लिये मुनि श्री जिन विजय जी ने इसका हिन्दी में अनुवाद कर दिया है और पुरातत्व-विभाग के डायरेक्टर जनरल सर, ए० सी. कनिंघम साहिब की रिपोर्टों से भी इस सम्बन्ध की सामग्री प्राप्त करके इस ग्रन्थ में दे दी गई है और भी जो साधन मिल सक हैं उन्हें यहाँ देकर इसे अति सुन्दर बना दिया गया है। विज्ञप्ति-त्रिवेणिः का पूणे परिचय प्राप्त करने के लिये इस प्रन्थ को पढ़ना चाहिये । विज्ञप्ति-त्रिवेणिः को पढ़ने से आप संवत् १४८४ के यात्रा-संघ का पूर्ण परिचय प्राप्त कर सकेंगे जिससे आप को पता लगेगा कि इस पावन तीर्थ की कितनी महिमा थी, कितना. सौंदर्य था, जैन धर्म के प्रति शासकों के क्या भाव थे। जैन समाज की सामाजिक अवस्था क्या थी। इस विशाल यात्रा संघ के नायक थे उपाध्याय श्री जयसागर जी महाराज । इसलिये तीर्थ यात्रा के वर्णन से पहिले उनके सम्बन्ध में कुछ जानकारी देनी ज़रूरी है । सो नीचे दी जाती है।
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उपाध्याय श्री जयसागर जी उपाध्याय श्री के जन्म-स्थान तथा माता पिता आदि के विषय में अभी तक किसी प्रकार से कोई जानकारी प्राप्त नहीं हो सकी। आपके गुरु आदि और आपके कार्यों के सम्बंध में जो कुछ ज्ञान प्राप्त हो सका है वह इनकी अपनी लिखो तथा शिष्य आदिकों की लिखी हुई प्रशस्तियों का ही प्रताप है । आप ने अपने जीवन में अनेकों ग्रन्थों की रचना को और हजारों ग्रन्थों का पुनले खन करवाया था। आप ने कई तीर्थ स्थानों की यात्रायें कों जिनका वर्णन आर ने विज्ञप्ति-त्रिवेणि की एक प्रशस्ति में किया है। कांगड़ा तीर्थ की यात्रा का संक्षिप्त समाचार भी एक कविता में दिया गया है जो कि इस पुस्तक की स्तवनावली में दे दी गई है।
___ उपाध्याय जी की रचनाओं में से निम्नलिखित उल्लेखनीय हैं:'पृथ्वीचन्द्र चरित्र', 'पर्वरत्नावलि', 'संदेहदोलावलील घुटिका', उपसर्गहर-स्तोत्र-वृत्ति', गुरुपारतन्त्र्य-वृत्ति ।
'पृथ्वीचन्द्र चरित्र' नामक ग्रन्थ की प्रशस्ति से यह पता चलता है कि आपके दोक्षा-गुरु खरतरगच्छ के प्राचार्य श्री जिनराज सूरि थे। आपके विद्या-गुरु आपके गुरु-भ्राता श्री जिनवर्धन सूरि थे और आप को उपाध्याय पदवी देने वाले थे आपके गुरु भ्राता श्री जिनभद्र सूरि जी महाराज जिन की सेवा में आप ने यह विज्ञप्ति-त्रिवेणि नामक पत्र मल्लिकवाहन नगर से अणहिल्लपुरपट्टन भेजा था । अनुमान है कि उपाध्याय पदवी प्रापको संवत् १४७५ में दी गई थी जब कि सागरचंद्राचार्य द्वारा श्री जिनवर्धन सूरि के स्थान पर जिनभद्रसूरि को नियुक्त किया गया था। ____ उपाध्याय श्री के शिष्य समुदाय में पं० मेघराज गणि सब से
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बड़े थे जो कि अच्छे विद्वान् थे । इनके और शिष्य भी योग्य और विद्वान थे जिन में सोमकुंजर, स्थिरसंयम और रलचन्द्र उपाध्याय विशेष उल्लेखनीय हैं। इन सब में अधिक विद्वान् थे श्री रत्नचन्द्र उपाध्याय जो उपाध्याय जी को लेखन कार्य में अच्छा सहयोग दिया करते थे।
इन श्री रत्नचंद्र जी उपाध्याय की संतति में अच्छे अच्छे योग्य और विद्वान् मुनि हो गये हैं जिन में श्रीज्ञानविमल मुनि के परम विद्वान् शिष्य श्री वल्लभोपाध्याय विशेष उल्लेखनीय हैं। इनकी जैनशासन में अच्छी प्रतिष्ठा थी । आप की अनेकों कृतियों में से 'विजयदेव माहात्म्य' नाम का ग्रन्थ विशेष उल्लेखनीय है जिस से ज्ञात होता है कि वह गच्छवाद से परे रह कर विद्वान् महात्माओं की, भले ही वह किसी गच्छ के हों, प्रशंसा करने में कभी संकोच नहीं करते थे । इस ग्रन्थ में उन्होंने तपागच्छ के मान्य आचार्य श्री विजयदेव सूरि की बड़ी प्रशंसा की है।
इस प्रकार संक्षेप से उपाध्याय श्री जयसागर महाराज की शिष्य परम्परा का यहां वर्णन किया गया है । उपाध्याय जी की रचनाओं और शिष्य परम्परा के वर्णन के पश्चात् श्री कांगड़ा तीर्थ की यात्रा के सिवा शेष तीर्थ स्थानों की नामावलि, जिन की आप ने यात्रा की थी, नीचे दी जाती है।
___ नगरकोट की यात्रा के पीछे उन्होंने इन स्थानों की यात्रा कीपाटन, वडली, रायपुर, महसाणा, कुणगेर, संखलपुर, धंधूका, शत्रुजय, तलाझा, दाठा, घृतकल्लोल, मेलिगपुर, अजाहर, दीव, ऊना, कोडीनार, प्रभासपाटन, वोर-वाड, वेरावल, मांगलोर, गिरनार, बलदाणा, चूडा, राणपुर, वीरमगाम, मांडल, सीतापुर, पाटरि, भिंभूवाडा, हांसलपुर । इन सभी तीर्थों की यात्रा पर लिखे क्रमानुसार की गई थी। Shree Sudharmaswami Gyanbhandar-Umara, Surat www.umaragyanbhandar.com
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संवत् १४८४ का विशाल यात्रा-संघ
मंगलं भगवान धर्मो मंगलं जिनशासनम् ।
मंगलं तन्मतः सङ्घो यात्रारम्भोऽति मंगलम् ।। श्री कांगड़ा महातीर्थ की इस यात्रा का वृत्तान्त प्रारम्भ करने से पहिले इसके अनुरूप कुछ उचित जानकारी का वर्णन करना आवश्यक जान पड़ता है जिस से आप यह जान सकेंगे कि यात्रा का यह कार्यक्रम क्यों और कैसे बना।
आचार्य श्री जिनभद्र सूरि की आज्ञा लेकर श्री जयसागर उपाध्याय, मेघराजगणि. सत्यरुचिगणि, पं० मतिशीलगणि, और हेमकुञ्जर मुनि आदि अपने शिष्यों के साथ सिन्ध देश में गये । इधर उधर के गाँवों में विचरते टहरते संवत् १४८३ का चतुर्मास मम्मणवाहण नाम के नगर में किया । चौमासे बाद संघपति सीमाक के पुत्र सं० अभयचन्द्र ने मरुकोट्ट महातीर्थ की यात्रा के लिए संघ निकाला । उपाध्याय श्री जयसागर जी भी उस संघ के साथ गए। और यात्रा करके पीछे मम्मण वाहन में आये । इन दिनों फरीदपुर के श्रावक महाराज श्री को अपने नगर में पधारने की विनती करने मम्मणवाहन
आये जो कि महाराज जी ने स्वीकार कर ली और वहाँ से विहार करके द्रोहडोट्ट आदि गाँवों में होते हुए फरीदपुर पहुँचे ।
वहाँ के संघ ने उपाध्याय जी का बड़े समारोह से नगर प्रवेश कराया । उपाध्याय जी प्रतिदिन व्याख्यान देने लगे। व्याख्यान इतना मनोरंजक होता था कि ब्राह्मण, क्षत्रिय, आदि जैनेतर लोग भी आपके उपदेश से आनंद लेने लगे। आपका उपदेश इतना प्रभावशाली निकला कि कई जैनेतर लोग जैन धर्म में दीक्षित हो गये । एक दिन व्याख्यान Shree Sudharmaswami Gyanbhandar-Umara, Surat www.umaragyanbhandar.com
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( 2 )
1
समाप्त हो चुकने के बाद जब कि कुछ श्रद्धालू लोग गुरुभक्ति में लीन होकर गुरु महाराज की स्तुति में गीत गान कर रहे थे एक पथिक व्याख्यान-शाला में आकर गुरु महाराज के चरणों में प्रणाम कर बैठ गया । कुछ अनोखा सा स्वरूप बना हुआ था उस विचारे पथिक का । कपड़े उस के थे फटे हुए, केशों में धूल जमी थी । और दायें हाथ में एक कमण्डलु लिए हुए था वह दुर्बल पथिक । गुरु महाराज ने उसकी इस दशा को देख कर अनुमान कर लिया कि यह भाई किसी दूर स्थान से आ रहा है। महाराज श्री ने उस से पूछा भाई ! कहो कहाँ से आ रहे हो। कोई नया समाचार भी सुनाओगे ? उत्तर में वह पथिक बड़े आनन्द में मग्न हो कर कहने लगा, कृपानाथ ! उस महातीर्थ की यात्रा करके लौट रहा हूँ जिसकी छटा अनुपम है, जिसकी महिमा अपरम्पार । उत्तर दिशा में त्रिगर्त नाम का जो देश है उस में सुशर्मपुर नाम का प्राचीन नगर है वहाँ भगवान् श्री आदिनाथ जी का पावन सुन्दर मंदिर यह महातीर्थ है जो देखने योग्य है इसके दर्शनों से आत्मा को परम आनन्द और शांति प्राप्त होती है। इसकी महिमा का वर्णन करने के लिए मेरे पास शब्द नहीं । ऐसे तीर्थ महिमा का वर्णन करता हुआ कुछ देर वहाँ ठहरा फिर अपने जाने की आज्ञा लेकर गाँव की ओर चल दिया ।
इस तीर्थ की इतनी प्रशंसा सुन कर उपाध्याय जी, विराजमान मुनिराजों और श्रावकों के मन इस तीर्थ की यात्रा के लिए झुक पड़े । फलतः श्री संघ ने इस महातीर्थ की यात्रा करने का निश्चय कर लिया और इसके सम्बन्ध में कार्यक्रम बनने लगा। फरीदपुर के सुश्रावक सेठ राणा तथा उनके सुपुत्र सेठ सोमचन्द्र, पार्श्वदत्त और हेमराज ने यात्रा संघ निकालने की सारी जिम्मेदारी अपने ऊपर लेकर बड़ी
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(१०)
उदारता दिखाई और सकल श्रीसंघ को उत्साहित किया। साथ ही
आस पास के श्रीसंघों को भी यात्रा-संघ में सम्मिलित होने के निमन्त्रण पत्र भेजे गये और तैय्यारियाँ होने लगों । इन्हीं दिनों माबारषपुर, जहाँ जैनों के १०० घर थे, के श्रावक उपाध्याय जी को अपने गाँव में पधारने की विनति करने आये जिसे उचित समझ मुनिराजों ने कुछ दिनों के लिये माबारपपुर के लिये विहार कर दिया और वहाँ पर धर्म-देशना द्वारा जैन जैनेतर लोगों को धर्म का बोध कराते हुए कुछ दिन वहाँ ठहर कर वापिस फरीदपुर आ पहुँचे । माबारपपुर में आपने श्री आदिनाथ की प्रतिमा को प्रतिष्ठा भी करवाई थी जिस के उपलक्ष्य में सेठ हरिचन्द्र शिवदत्त ने स्वधर्मीवात्सल्य भी किया था। फरीदपुर पहुँचने पर तीर्थ यात्रा के प्रस्थान के लिये शुभ मुहूर्त निकलवाया गया और मंगल समय में यात्रा-संघ रवाना हआ।
सेठ राणा के सुपुत्र सेठ सोमचन्द्र संघ का नेतृत्व कर रहे थे सभी यात्री लोग सानंद बढ़ते जा रहे थे । संघ की रक्षा निमित्त कुछ सिपाही भी साथ ले लिये गये थे जो कि तलवार, ढाल और तीर कमान आदि सुसजित शस्त्रों को उठाये सकल संघ की रक्षा कर रहे थे । सारा सामान बैल गाड़ियों पर लादा गया था और सवारी के लिये कुछ घोड़ा गाड़ियाँ भी साथ थीं। कितने ही धर्म प्रेमी लोग मुनिराजों के साथ साथ नंगे पांवों यात्रा का आनन्द उठा रहे थे । चलते चलते संघ विपाशा (व्यास) नदी के तट पर पहुंचा और रेतीले मैदान में अपना पहिला पड़ाव डाल दिया । दूसरे रोज नदी को पार कर संघ जालन्धर की ओर चला और निश्चिन्दीपुर पहुँच कर सरोवर के किनारे अपना पड़ाव डाल दिया। संघ को देख वहाँ पर सैंकड़ों मनुष्य इकट्ठे हो गये । गाँव का सुरत्राण (सुलतान) भी अपने दीवान समेत वहाँ Shree Sudharmaswami Gyanbhandar-Umara, Surat www.umaragyanbhandar.com
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(११) आ पहुँचा और जैन साधुओं के पहली बार दर्शन पाकर बहुत प्रसन्न हुआ और सेठ सोमचन्द्र आदि को सम्मान देता हुआ वापिस चला गया। वहाँ से चल कर संघ तलपाटक पहुँचा जहाँ देवपालपुर का श्रीसंघ अपने नगर में पधारने की विनति करने आया परन्तु उपाध्याय श्री समयानुसार इस विनति को स्वीकार न कर सके। वहाँ से प्रयाण कर विपाशा (व्यास) नदी के किनारे किनारे चलते हुए संघ मध्यप्रदेश में जा पहुँचा। मध्य-प्रदेश को पार करते समय संघ को एक भयंकर परिस्थिति का सामना करना पड़ा । षोषरेश-यशोरथ और सिकन्दर की सेनाओं में मुठभीड़ हो रही थी और भग-दौड़ मची हुई थी, जिस से सब भयभीत हो उठे और प्रभु को याद करते हुए अपनी सुरक्षा का ढंग विचारने लगे। आखिर यही निश्चय ठहरा कि वापिस चल कर नदी को पार किया जाये । फलतः संघ वापिस हो लिया और नदी को पार करके कुगुद नाम के घाट में हो कर मध्य, जांगल, जालंधर और काश्मीर के मध्य में रहे हुए हरियाणा नाम के स्थान पर पहुँचा और वहाँ अपना पड़ाव डाल दिया।
यहां पर सकल श्रीसंघ ने सेठ सोमा को संघपति के पद से अलंकृत करने का निश्चय किया और बड़े ठाठ बाठ से बैंड बाजों की मधुर ध्वनि के मध्य में मंगलगान गाते हुए सेठ सोमा के मनाही करते हुए भी उन्हें संघपति का विरुद सौंप कर सम्मानित किया इनके साथ ही मलिकवाहन के सं० मागट के पौत्र और सा० देवा के पुत्र उद्धर को महाधर के पद से विभषित किया । सा० नीवा, सा० रूपा, सा० भोजा को भी महाधर के पद सौंप कर सम्मान दिया गया
और बुचास-गोत्रीय सा० जिनदत्त को 'सल्लहस्त्य' का विरुद समर्पण किया गया। पदवी धारण करने वाले सभी महानुभावों ने इसके उत्तर Shree Sudharmaswami Gyanbhandar-Umara, Surat www.umaragyanbhandar.com
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(१२) में प्रोति भोजन तथा प्रभावना आदि द्वारा सकल संघ को बहुमान दिया और याचकों को भी दान दिया। इस प्रसन्नता पर मेघ भी उमड़
आये और जोर जोर से बरसने लगे। यह झड़ी पांच दिन तक चलती रही।
छटे दिन संघ ने कांगड़ा के पर्वतीय क्षेत्रों में कदम रखा और सघन झाड़ियों और ऊँची ऊँची चोटियों को पार करते हुए रास्ते में आने वाले गाँवों के लोगों से मिलते हुए उनके आचार विचार आदि का अनुभव करते हुए संघ विपाशा (व्यास) के तट पर पहुँचा उसे पार करके आगे बढ़ा और पातालगंगा नदी को भी पार करते हुए और रास्ते के पर्वतीय दृश्यों का आनन्द लेते हुए संघ ने दूर से, सोने के कलशों वाले प्रासादों की पंक्ति वाला नगरकोट जिसका दूसरा नाम सुमिपुर भी था, देखा।
अपनी पुण्य-भूमि के दर्शन पाकर सभी यात्री गद्गद् हो उठे और नगरकोट के तट पर बहने वाली बानगंगा नाम की नदी को पार करने लगे। इतने में नगरकोट का श्रीसंघ जिसे यात्रा संघ के पहुँचने के समाचार प्राप्त हो गये थे बैंड बाजों के साथ स्वागत को आ पहुँचा
और बड़े सम्मानपूर्वक जयजयकारों के साथ यात्रासंघ का नगर प्रवेश करवाया। नगर के सभी प्रसिद्ध बाजारों और मुहल्ला को लांघते हुए संघ सर्वप्रथम साधु क्षीमसिंह के बनवाये भगवान् श्री शान्तिनाथ के मन्दिर के सिंघद्वार पर पहुँचा और बड़े भक्तिभाव से श्री मन्दिर जी में प्रवेश कर खरतरगच्छ के श्री जिनेश्वर सूरि के करकमलों से प्रतिष्ठित हुई श्री शान्तिनाथ प्रभु की मनोहर मूर्ति के दर्शनों से आनन्द को प्राप्त हुआ और भगवान् के वन्दन स्तवन कीर्तन आदि द्वारा अपनी आत्मा
को कृतार्थ किया । यहाँ से चलकर संघ कांगड़ा नगर के दूसरे जिनालय Shree Sudharmaswami Gyanbhandar-Umara, Surat www.umaragyanbhandar.com
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(१३)
में पहुँचा जो चौदहवीं शताब्दि में महाराजा रूपचन्द्र ने स्थापित किया था और जिसमें भगवान् श्री महावीर प्रभु की स्वर्ण प्रतिमा विराजमान की थी। यहाँ भी बड़े भावपूर्वक वन्दन नमस्कार करके संघ फिर देवल के दिखाये हुए मार्ग से आदियुगीन के भव्य मन्दिर में पहुँचा और प्रभु आदिनाथ का गुणगान करके अपने निवास स्थान पर जा पहुंचा। संवत् १४८४ की ज्येष्ठ शुदि पंचमी का यह शुभ दिन था जो कांगड़ा तीर्थ के इतिहास में सदा अमर रहेगा।
दूसरे दिन प्रातःकाल होते ही संघ ने अपने उस पावन तीर्थ के दर्शनों के लिये प्रस्थान किया जिसके लिये वह इतना उत्सुक हो रहा था अतीव आनन्द और उत्साह के साथ चलते संघ अपनी आशाओं के सपने कङ्गदक नाम के किले के समीप आ पहुँचा और तीर्थ दर्शनों से गद्गद् हो उठा । चारों ओर जयजयकारों की ध्वनि उठने लगी। संघपति ने वहाँ इकट्ठ हुए याचकों को दान देकर प्रसन्न किया । इन दिनों यहाँ महाराजा सुशर्मचन्द्र के वंशज कटौच क्षत्रिय राजा नरेन्द्रचन्द्र राज्य करते थे । उन्होंने संघ को सम्मानपूर्वक किले से गुजर कर देव दर्शनों के लिये जाने की आज्ञा दे दी और रास्ते आदि की जानकारी के लिये अपने हेरंब नामक प्रतिहार को साथ भेजकर सुविधा प्रदान की। प्रतिहार के साथ चलते संघ ने रास्ते में आने वाले सांत द्वारों को पार किया और अपने निश्चित स्थान-भगवान श्री आदिनाथ के मन्दिर के द्वार पर आ पहुँचा । सब ने मिलकर, बड़े उत्साहपूर्वक, जयजयकारों के मध्य में भगवान् की मनोहर मूर्ति के दर्शन किये और अपने को धन्य माना । फिर प्रभु पूजन की तैय्यारियां होने लगीं। फल-फूल नैवेद्य आदि सुन्दर सुन्दर सामग्रियां इकट्ठी की गई और बड़े उल्लास से भगवान् का अभिषेक कराया गया और विधि सहित
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(१४) पूजा रचाई गई और साथ ही सब ने स्तवन कीतन आदि का भी खूप आनन्द उठाया। मुनिराजों ने भावपूजा द्वारा अपनी आत्मा को आनंदित किया । इस अवसर पर वहाँ राजकीय और प्रजाकीय पुरुषों की भारी भीड़ लग गई थी। संघ ने उन से खूब प्रेम वार्तालाप किया।
वहाँ विराजमान कुछ वृद्ध लोगों ने इस तीर्थ की बड़ी प्रशंसा की और तीर्थ सम्बन्धी अपनी जानकारी की कथा सुनाने लगे उन्हों ने बताया कि यह तीर्थ भगवान् श्री नेमिनाथ २२वें तीर्थकर के समय में कटौच वंशीय महाराजा सुशर्म चन्द्र के कर-कमलों से स्थापित हुआ था और कहने लगे कि यह भगवान् श्री आदिनाथ की जो प्रतिमा है वह बड़ी प्रभाविक है और किसी को बनाई हुई न होकर स्वयंभू है और अनादि है । इसका बड़ा भारी अतिशय चमत्कार है जो आज भी प्रत्यक्ष है । देखिये-भगवान के चरणों की सेवा करने वाली जो अम्बिका देवी (देवी की मूर्ति) है, इसके प्रक्षालन का पानी चाहे वह फिर एक हजार घड़ों जितना हो, भगवान् के प्रक्षालन के पानी के साथ, बिल्कुल पास पास होने पर भी कभी नहीं मिल जाता । मन्दिर के मुख्य गर्भागार में, चाहे कितना ही स्नात्र जल क्यों न पड़ा हो और फिर बाहिर से दरवाजे इस प्रकार बन्द कर दिये जावें कि एक कोड़ी भी अन्दर न जा सके तो भी क्षण भर में वह सब पानी सूख जायेगा। ऐसे और भी प्रभाव इस प्रतिमा के आज भी दीख रहे हैं। इस प्रकार वृद्ध लोगों की जबान से सब लोग तीर्थ महिमा सुन रहे थे कि इतने में राजा नरेन्द्रचन्द्र जो के प्रधान मनुष्यों ने उपाध्याय श्री की सेवा में संघ सहित दरबार में पधारने की विनति की।
राजा नरेन्द्रचन्द बड़े न्यायो, सुशील, सद्गुणी और धर्म प्रेमी थे । यह विशुद्ध क्षत्रिय थे । इनका कुल सोमवंशीय कहलाता Shree Sudharmaswami Gyanbhandar-Umara, Surat www.umaragyanbhandar.com
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(१५) था। इन्हों ने सपादलक्ष पर्वत के पहाड़ी राजाओं को पराजित करके उन्हें गत-गर्व किया था । श्वेताम्बर साधुओं पर इनका बड़ा प्रेम
और आदर था । अपने महल में पूर्वजों की स्थापित की हुई आदिनाथ भगवान् की प्रतिमा के यह उपासक थे । राजा जी के बुलाने पर उपाध्याय जी संघ सहित दरबार में पहुँचे । राजा जी ने मस्तक झुका कर बड़े आदर के साथ उपाध्याय जी तथा मुनिराजों को प्रणाम किया इस पर गुरु महाराज ने निम्रन्थों का खजाना अपना सर्वस्व भत 'धर्म-लाम' दे कर आशीर्वाद दिया । फिर सभी लोग यथायोग्य स्थानों पर बैठ गये तो राजा नरेन्द्रचन्द्र ने महाराज श्री को कुशलक्षेम पूछा और श्रद्धापूर्वक वार्तालाप करने लगे । वहाँ पर राज-दरबार में कई ब्राह्मण, क्षत्रिय आदि जैनेतर विद्धान भी विराजमान थे उन्होंने भी गुरु महाराज से कुछ ज्ञान चर्चा की। एक काश्मीरी पंडित भी वहाँ पर पधारे हुए थे उन्हों ने कुछ समय तक गुरु महाराज से शास्त्रार्थ भी किया। उपाध्याय श्री के विद्वतापूर्ण उत्तर पा कर सभी गद्-गद् हो उठे और सभी ने महाराज श्री की भूरी भूरी प्रशंसा की। इसके बाद राजा ने अपना निजी देवागार दिखलाया जिस में स्फटिक
आदि विविध पदार्थों की बनी हुई तीर्थकर आदि अनेक देवों की मूर्तियां विराजमान थीं इस प्रकार दिन का बहुत मा भाग यहीं व्यतीत होने पर और अपने क्रिया कांड का समय होने पर महाराज श्री और संघ ने राजा जी से विदाई मांगी। उन्होंने भी यही उचित समझ कर उनका जाना स्वीकार कर लिया और फिर भी दर्शन देने की प्रार्थना की । इस प्रकार जैन-शासन का बहुमान करवा कर उपाध्याय जी स्वस्थान पर पहुंचे।
सप्तमी के रोज़ संघ की ओर से नगर और किले में चारों Shree Sudharmaswami Gyanbhandar-Umara, Surat www.umaragyanbhandar.com
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(१६)
मन्दिरों में महा-पूजा रचाई गई। मन्दिरों को गर्भागार से लेकर ध्वजदण्ड तक बहुमूल्य ध्वजा पताकाओं से खूब सजाया गया। नाना प्रकार के फल-फूल और नैवेद्य आदि पदार्थों के ढेर के ढेर भगवान् के सम्मुख भेंट किये गये। जगह जगह बाजे बजने लगे, नृत्य होने लगे और स्त्रियां मंगल गोत गाने लगीं संघपति ने निर्धन धनी सभी लोगों को प्रीति भोजन कराया। यह दिन भी सानन्द व्यतीत हुआ।
अष्टमी के दिन शान्तिनाथ प्रभु के मन्दिर में बड़े आनन्द और उत्साह से नन्दी की रचना की गई और मेघराजगणि, सत्यरुचिगणि, मतिशीलगणि, हेमकुंजर मुनि और कुलकेशर मुनि को उपाध्याय जी ने-'पंचमङ्गलमहाश्रुतस्कन्ध' की अनुज्ञा दी । इसी तरह बड़े आनन्द पूर्वक संघ दस दिनों तक आत्मिक आनन्द लेता रहा और प्रभु के पूजन और स्तुति द्वारा अपने जीवन को सफल बनाता रहा । आखिर ११वें दिन सकल संघ ने इकट्ठे होकर सभी मन्दिरों में जाकर भक्ति भाव से सानन्द प्रार्थना की और वापिस चलने की तैय्यारी बांधी । वहाँ के जीदो, वीरो आदि प्रमुख श्रावकों ने उपाध्याय जी को चौमासा के लिये ठहरने की विनति की जिसे वह स्वीकार न कर सके और संघ वापिस रवाना हुआ।
वापिस चलते चलते संघ ने रास्ते में अनेक गाँव और नदी नाले पार किये और गोपाचल पुर में पहुँचा जहाँ पर सं० घिरिराज का बनाया हुआ श्री शान्तिनाथ भगवान का बड़ा विशाल और सुन्दर मन्दिर विराजमान था वहाँ प्रभु शान्तिनाथ के दर्शन पूजन का पाँच दिन तक आनन्द उठाया। वहाँ से चल कर विपाशा (ब्यास) नदी के तट पर बसे हुए नन्दवन पुर (नादौन) में पहुँचा और वहाँ पर भगवान महावीर के सुन्दर मन्दिर के दर्शन किये । वहाँ से चल Shree Sudharmaswami Gyanbhandar-Umara, Surat www.umaragyanbhandar.com
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( १७ )
कर संघ कोटिलग्राम गया और भगवान् पाश्र्श्वनाथ की यात्रा की । तदनन्तर पर्वतों की घाटियां तथा शिखरों को पार करते हुए कोठीपुर नगर में पहुँचा और यहाँ पर दस दिनों तक ठहर कर भगवान् महावीर की बड़े भक्ति भाव से आराधना की । यहाँ पर श्रावकों के बहुत घर थे इसलिये उनकी विशेष प्रेरणा से यहाँ पर इतने दिन ठहरना पड़ा । संघपति ने बड़े ठाठ से यहाँ पर साधर्मी वात्सल्य किया और कई प्रकार की प्रभावनाएँ भी कीं ।
११ वें दिन संघ ने यहाँ से विहार किया और कुछ दिनों के बाद सप्तरुद्र नाम के भारी प्रवाह वाले जलाशय के निकट पहुँचा । यहाँ पर नावों में बैठ कर संघ ने चालीस मील के लगभग रास्ता पार किया और देवपालपुर पत्तन जा पहुँचा ! वहाँ पर मृदुपक्षीय सं० घटसिंह तथा खरतरगच्छीय सा० सारंग आदि मान्य श्रावकों ने संघ का बड़े सम्मान पूर्वक नगर प्रवेश कराया । यहाँ भी संघ दस दिन ठहरा और कोठीपुर की तरह यहाँ भी संघपति ने माधर्मीवात्सल्य किया । यहाँ के श्रीसंघ ने उपाध्याय जी को चतुर्मास करने की प्रार्थना की जिस पर महाराज ने श्री मेघराजगणि, सत्यरुचिगणि, कुल केसरमुनि और रत्नचन्द्र चुल्लक इन चार शिष्यों को चतुर्मास ठहरने की आज्ञा दी और संघ सहित फरीदपुर की ओर रवाना हो पड़े और विपाशा नदी के तटों को लांघते हुए संघ उसी मैदान में आ पहुँचा जहाँ पर उसने अपना पहला पड़ाव डाला था ।
फरीदपुर के श्रावकों को संघ के आने के समाचार मिले तो सभी स्वागत को आए और मिलाप करके बहुत प्रसन्न हुए तथा बड़े चाव से तीर्थ यात्रा के समाचार सुन कर उत्साहित हुए । संघपति सोमा के भाई सा० पासदत्त और हेमा ने सभी को नारियल सुपारी और
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(१८) ताम्यूल भेंट करके उनका सत्कार किया तथा सब ने बड़े अानन्द से अपने नगर में प्रवेश किया एवं यात्रा सम्पूर्ण हुई।
__ फरीदपुर पहुँचने के समाचार पा कर मलिकवाहन नगर के मान्य श्रावक उपाध्याय श्री को अपने नगर में ले जाने के लिये विनति करने आए । उनकी विनति को स्वीकार करके उपाध्याय जी मलिकवाहन पहुँचे जहाँ पर पाटन में विराजमान श्री जिनभद्रसूरि जी की ओर से आदेश पहुँचा कि आपके नगरकोट महा-तीर्थ की यात्रा करने के समाचार सुने हैं सो उसका पूरा वृत्तांत भेजो। उनकी आज्ञा को मान देते हुए यहाँ से उपाध्याय जी ने यह विज्ञप्ति त्रिवेणिः नामक पत्र बड़ी आलंकारिक भाषा में लिख कर उन की सेवा में पाटन भेजा।
इति शुभम् ॐ अहं नमः
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वर्तमान का कांगड़ा तीर्थ
बीते समय के गौरवशाली कांगड़ा तीर्थ का ऐतिहासिक वर्णन हो चुका । इसकी धार्मिक, सामाजिक तथा नैतिक अवस्था की कहानी लिखी जा चुकी । अब इसकी वर्त्तमान अवस्था पर दृष्टि देना आवश्यक है । वैसे तो कांगड़े के सारे क्षेत्र में ही हमारे गौरव के अनेकों स्मारक मौजूद थे परन्तु विशेष महत्त्वशाली प्रमुख स्थान था कांगड़ा किले का सौंदर्यपूर्ण प्राचीन जैन मन्दिर । अब किले के इस जैन मन्दिर और मूर्तियों का वर्णन किया जायेगा और शेष स्थानों के जिन भवनों की अवस्था के सम्बन्ध में भी प्रकाश डाला जायेगा ।
I
किले का जैन मन्दिर :- कांगड़े का यह प्राचीन किला जिस में हमारा प्रमुख जैन मन्दिर विराजमान है कांगड़ा की नवीन बस्ती से लगभग दो मील दूरी पर प्राचीन कांगड़ा नगर की दक्षिण दिशा में स्थित है । इसके दानों और आज भी वही दोनों नदियां कलर करती बहती चली जा रही हैं और किले की ठोक पीठ की ओर जा कर मिल जाती हैं ।
यद्यपि यह प्राचीन किला - हमारा पवित्र तीर्थ आज भी उसी स्थान पर वीरों की भाँति पूरा शान से खड़ा है परन्तु इसकी अवस्था उस घायल सैनिक की तरह है जिस का बलवान शत्रु के कठोर प्रहारों से अंग-अंग टूट चुका हो । अनेकों बार इस पर महमूद गजनवी, फिरोज तुगलक आदि कर आक्रमणकारियों के भारी आक्रमण हुए । इस की ईंट से ईंट बजा दी गई । इस में शोभायमान मन्दिर और मूर्तियों को नष्ट-भ्रष्ट कर दिया गया, इसकी करोड़ों रुपये की धन सम्पत्ति, सोना, चाँदी, हीरे ज्वाहरात लूट लिये गये जिसका सम्पूर्ण वर्णन जनरल सर कर्नीींघम के शब्दों में पढ़ने योग्य है । जिन में किले
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(२०) और नगर के मन्दिरों को लूटने का पूरा विवरण दिया है । इस प्रकार कई बार यह ध्वंस हुआ परन्तु इस पर अंतिम आक्रमण प्रकृति का हुआ अर्थात सन् १६०४ के भूकम्प से यह प्रायः समूचा ध्वंस हो गया, गौरवशून्य हो गया। इसका मुख्यद्वार तथा कुछ बाहरी दीवारें यद्यपि दृढ़ता से खड़ी हैं परन्तु आसानी से इसका पुनरुद्धार हो सके, यह बात अति कठिन है।
किले के पतन के साथ हो साथ इस में शोभायमान वह जैन मंदिर भी ध्वंस हो गया तथा प्रतिभाशाली मूर्तियां भी गतगौरव हो गई आँखों से ओझल हो गई। उस विशाल मन्दिर के स्थान पर आज इस का केवल एक छोटा सा भाग ही शेष बचा हुआ है जिस में दो छोटे छोटे शिखरबंध जैन-मन्दिर और प्राचीन मंदिर के भाग रूप ही एक शिखरबंध चबूतरा खड़ा है। इनके आस-पास कई कमरों के नष्टप्रायः भाग (ध्वंसावशेष) साफ नजर आते हैं जिन्हें देखने से यह स्पष्ट मालूम पड़ता है कि यह सभी किसी विशाल मंदिर के ही भाग थे। कहीं कहीं टूटे स्तम्भ बिखरे पड़े हैं और कहीं कहीं प्राचीन कला-कौशल के सुन्दर चिह्न भग्नावशेष दिखाई पड़ते हैं । कई कमरे मिट्टी और खण्डहरों से दबे पड़े हैं तो कुछ जेन मूर्तियों के स्मारक भी बिगड़े रूप में पड़े दिखाई पड़ते हैं । ऐसा प्रतीत होता है कि यदि इस क्षेत्र की खुदाई हो तो बहुत सम्भव है कि यहाँ से कुछ महत्वशाली स्मारक मिलें जिस से हमारे गत-गौरव के प्रमाणों की पुष्टि हो सके।
श्री मुनिलाल जी, जो होश्यारपुर के सुश्रावक हैं, ने मुझे बताया कि भकम्प से पहिले मैंने मंदिर क्षेत्र की सीढ़ियों के साथ वाले कमरे को, जो अब खण्डित पड़ा है, देखा था उन दिनों यह ठीक अवस्था में मौजूद था और इस में एक चौमुखा सिंहासन विराजमान Shree Sudharmaswami Gyanbhandar-Umara, Surat www.umaragyanbhandar.com
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( २१ )
था परन्तु इस पर मूर्त्ति कोई मौजूद नहीं थी । इस से यह स्पष्ट प्रतीत होता है कि यह कमरा भी जैन मंदिर का ही भाग था जिस की किसी समय किसी कारण वश हमारी आँखों से ओझल हो गई ।
मूर्त्तियां
इस विशाल मन्दिर में अनेकों जैन तीर्थकरों का मूर्त्तियों के स्थान पर आज एक छोटे से मन्दिर में केवल भगवान् श्री आदिनाथ की विशाल प्रभाविक मूर्त्ति ही विराजमान है जो तीर्थ सम्बंधी हमारी ऐतिहासिक सामग्री का एक विशेष अंग है । यह मूर्त्ति हल्के श्याम रंग के पत्थर की बनी है जिसकी गद्दी पर एक सुन्दर बैल का चिन्ह खुदा हुआ है जो भगवान् ऋषभदेव (आदिनाथ) का चिह्न है । मूर्त्ति की गर्दन पर कानों के दानां ओर बालों के गुच्छे लटकते दिखाई पड़ते हैं यह भी भगवान् ऋषभदेव के स्वरूप को ही प्रदर्शित करते हैं। मूर्त्ति की गद्दी पर एक लेख खुदा हुआ है जिससे यह पता चलता है कि यह मूर्त्ति महाराजा संसार चंद्र प्रथम के समय में सन् १४६६ संवत् वि० सं० १५२३ स्थापित हुई । भगवान् ऋषभदेव (आदिनाथ) की वह प्रतिमा जो वि० में सं० १४८४ के यात्रासंघ के समय विराजमान थी इससे जुदा थी । वह मूर्ति कहां गयी इसके संबंध में आज कोई जानकारी प्राप्त नहीं है । भगवान् आदिनाथ की वर्त्तमान मूर्त्ति जिस सिंहासन पर विराजमान है उसके और सिंहासन के क्षेत्रफल को देखने से मालूम पड़ता है कि यह मूर्ति इस स्थान पर इसी मन्दिर के किसी भग्नावशेष स्थान से लाकर रक्षा निमित्त यहाँ पर स्थापित कर दी गई है।
मूर्त्ति जिस स्थान पर विराजमान है उसके द्वार का मुख पश्चिम दिशा की ओर है और उस द्वार के ठीक सामने कोई चार फीट की दूरी पर एक दीवार खड़ी है जिस पर कुछ देवी-देवताओं की मूर्तियां खुड़ी हैं जो कि जैनों को मान्यता के अनुकूल इसी मन्दिर के अधि ट्रायक देव हैं। इस समय जहाँ मर्त्ति स्थापित है उस मन्दिर जी के
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(२२) भीतर का क्षेत्रफल इतना थोड़ा है कि कठिनता से तीन चार पुरुष ही खड़े हो सकते हैं। इस मंदिर का द्वार भी ऊंचाई में बहुत छोटा है जिसके कारण कुछ झुककर हा बाहर आना पड़ता है। इस मंदिर के द्वार पर आस पास और ऊपर की ओर तीन तरफ चौबीस तीर्थंकरों की पद्मासन में विराजमान मूर्तियों के चिन्ह मौजूद हैं जिसमें से कुछ तो स्पष्ट दिखाई देते हैं और कुछ अस्पष्ट रूप में दीख पड़ते हैं और कुछ एक के स्वरूप संपूर्णरूप से मिटचु के हैं।
इसी प्रकार इस मंदिर के साथ वाल जैन मंदिर के द्वार पर भी ऊपर की ओर ठोक मध्य में पद्मासन में विराजमान तीर्थकर की एक मूर्ति का चिन्ह मौजूद है जो इस मन्दिर को जैन मन्दिर घोपित कर रहा है । द्वार के आस पास की दोनों दीवारों पर कुछ देवी-देवताओं के भी चिन्ह खड़े हैं जो इस मंदिर के अधिष्ठायक देवता ही जान पड़ते हैं इस मन्दिर में इस समय मूर्ति कोई मौजूद नहीं है परन्तु एक खाली सिंहासन अवश्य विराजमान है जो कि इस बात का द्योतक है कि इम सिंहासन पर भी श्री जैन तीर्थंकरों की मूर्तियाँ विराजमान थीं।
भगवान आदिनाथ की वर्तमान मूर्ति कांगड़ा की जनता में पार्श्वनाथ के नाम से प्रसिद्ध है और पुरातत्व विभाग के डायरैक्टर जनरल सर ए. सी. कनिंघम ने अपनी रिपोर्ट में 'पार्श्वनाथ के मन्दिर में आदिनाथ की प्रतिमा' इस प्रकार लिखा है और मन्दिर के क्षेत्र के समीप ही जो बड़ा द्वार है वह भी पार्श्वनाथ गेट के नाम से सुनने में
आता है इन बातों से सिद्ध है कि यहाँ कोई श्री पार्श्वनाथ की प्रभाविक प्रतिमा अवश्य होगी।
जैन मन्दिरों के समीप ही अम्बिकादेवी का एक स्थान है जहाँ पूर्व में अम्बिकादेवी की एक मूर्ति विराजमान थी जो सन् १९३२ में कुछ मुसलमान युवकों द्वारा तोड़ दी गई कही जाती है । अम्बिकादेवी Shree Sudharmaswami Gyanbhandar-Umara, Surat www.umaragyanbhandar.com
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( २३)
जैन शासन में भगवान् श्री नेमिनाथ की अधिष्ठायक शासन देवी मानी जाती है। किले के स्मारकों की कुछ जानकारी का वर्णन हो चुका अब भगवान् आदिनाथ की वर्तमान मूत्ति के सम्बन्ध में एक अद्भुत घटना का वर्णन किया जाता है।
मूत्ति का चमत्कार-सन् १९५३ को बात है कि हम लोग प्रभु पूजन करके वापिस जाने लगे थे कि मेरी किले में काम करने वाले कुछ मिस्त्री लोगों से इस तीर्थ सम्बन्धी बातें चल पड़ीं। बातों बातों में मिस्त्री लोग कहने लगे कि यह मूर्ति बड़ी प्रभाविक और चमत्कारी है। बड़ा मिस्त्री बोला कि सन् १९३२ को बात है कि कुछ मुसलमान युवक किले के मन्दिरों की मूर्तियों को तोड़ने की भावना से किले में दाखिल हुए । ऊपर जाकर उन्होंने पहिले अम्बिकादेवी की मूर्ति को तोड़ डाला और उसके खण्डों को नदी में कहीं फैंक दिया फिर वह भगवान् श्री
आदिनाथ की इस मूर्ति को तोड़ने की भावना से इस मन्दिर में • दाखिल हुए। एक युवक ने इस मूर्ति पर पूरे जोर से ठोकर लगाई।
प्रहार होने की देर थी कि मूर्ति के पेट में से बड़ी भयानक धू धू करती ध्वनि छूट पड़ी जिसे सुनते ही वह लोग भयभीत होकर वहाँ से भाग खड़े हुए । कांगड़ा नगर की हिन्दु जनता को यह समाचार मिला तो उन्हें अम्बिकादेवी की मूर्ति को तोड़ने और भगवान् श्रादिनाथ (मान्य पार्श्वनाथ) की मूर्ति को ठोकर लगाए जाने से बड़ा दुःख हुआ। उन्होंने इस सम्बंध में अपना रोष प्रकट करने के लिये एक खुली सभा माननीय राजा साहिब लम्बाग्राम की अध्यक्षता में बुलाई और एक प्रस्ताव पास करके सरकार से विनती की कि अपराधियों को गरिफ़्तार करके उन्हें कड़ा दण्ड दिया जाये । इस सम्बन्ध में सरकार
ने दो मुसलमान युवकों को गरिफ्तार किया, न्यायालय में उन के विरुद्ध Shree Sudharmaswami Gyanbhandar-Umara, Surat www.umaragyanbhandar.com
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( २४ ) केस चला और उन्हें छः छः महीनों की कैद की सजा दी गई।
मिस्त्री बोले कि जिस युवक ने इस मूर्ति पर वार किया था उन का सारा वंश नष्ट हो गया।
प्राचीन कांगड़ा नगर के कुछ स्मारक दो जैन मूर्तियां :-पिछले लेख में बताया जा चुका है कि किला के सिवा कांगड़ा नगर में भी तीन जैन मन्दिर शोभायमान थे। परन्तु हमें अभी कत इन तीनों मन्दिरों के सम्बन्ध में कोई जानकारी प्राप्त नहीं हो सको । प्राचीन कांगड़ा नगर के बाज़ार में इन्द्र श्वर का एक हिन्दू मन्दिर है उसकी दीवारों पर दो जैन मूर्तियां विराजमान हैं जिनका उल्लेख आर्कीयोलोजिकल सर्वे आफ इण्डिया की सन् १९०५-१६०६ को एन्युल रिपोर्ट के १६ में पृष्ठ पर संक्षेप से इस प्रकार दिया है :
"............(कांगड़ा शहर में इन्द्रेश्वर के मन्दिर) की दक्षिण ओर एक दूसरा कमरा है जो पूर्व का असली मन्दिर होना चाहिये । जनरल कनींघम के वर्णन मुताबिक इसके अन्दर जाते समय दोनों तरफ दो जिन मूर्तियां दिखाई पड़तो हैं । इस में एक ऊपर सप्तर्षि अथवा लौकिक संवत् ३०वें वर्ष का शिलालेख है । डाक्टर बुल्हर, जिन्होंने
नोट :-तीर्थंकरों की मूर्तियों के चमत्कार कई बार सुनने में आते हैं, यह चमत्कार तीर्थंकरों की ओर से कभी नहीं होते क्योंकि तीर्थकर मोक्षगामी होते हैं और राग द्वेष से परे । यह चमत्कार अधिष्ठायक देवताओं द्वारा कभी कभी प्रकट में आते हैं। मूर्ति की आशातना होने पर यदि उनकी दृष्टि पड़ जाये तो रक्षा निमित्त वह चमत्कार दिखला जाते है।
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( २५ )
इस लेख को प्रकट किया है, के कथनानुसार, इस लेख की लिपि कीरग्राम की बैजनाथ प्रशस्ति की लिपि (शारदा लिपि) से मिलती जुलती है । इस से सन् ८५४ में यह लेख लिखा गया होना चाहिये ।" जिस लेख का ऊपर के अवतरण में ज्रिकर किया गया है वह लेख डाक्टर बुल्हर (G. Buhler Ph. D., L. L. D. C. I. E.) एपिग्राफिका इंडिका के प्रथम भाग में संक्षिप्त नोट के साथ प्रकट
किया है जिसकी नकल यहाँ दी जाती है । प्राचीन कांगड़ा नगर के बाज़ार में पार्श्वनाथ प्रतिमा का जैन लेख नीचे दिये हुए आठ पंक्तियों का शिलालेख कांगड़ा बाज़ार में आए हुए इन्द्रवर्मा के हिन्दू मन्दिर की कमान में रखी हुई एक पार्श्व - नाथ की प्रतिमा की गद्दी के ऊपर खोदा हुआ है। तेल और सिन्धूर से यह लेख इतना दब गया है कि इसके बहुत से अक्षर बिल्कुल दिखाई नहीं देते । अन्तिम पंक्ति सर्वथा नष्ट हो गई है ।
लेख
(१) ओम् संवत् ३० गच्छे राजकुले सूरिरभूच (द) - (२) भयचंद्रमाः [1] तच्छिष्यो मलचन्द्राख्य [स्त ] - (३) त्पदा (दां) भोजषट्पदः [ ॥ ] सिद्धराजस्ततः ढङ्गः (४) ढङ्गादजनि [चे ] कः । रल्हेति गृ[िहण] [त(५) स्य ] पा-धर्म-यायिनी । अजनिष्ठां सुतौ । (६) [तस्य ] [ जैन ] धर्मध (9) रायगौ । ज्येष्ठः कुण्डलको (७) [] [ता] कनिष्ठः कुमाराभिधः । प्रतिमेयं [च] (5)......FORT...... 7......gan | kan......[0] भाषान्तर
श्रम् ३० वें वर्ष में
राजकुलगच्छ में अभयचन्द्र नाम के आचार्य थे कि जिन के
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शिष्य अमलचन्द्र हुए। उनके चरण-कमलों में भ्रमर के समान सिद्धराज था । उसका पुत्र ढंग हुआ ढंग से चेष्टक का जन्म हुआ । उसकी स्त्री राल्ही थी...... उसके धर्म परायण ऐसे दो पुत्र हुए जिन में से बड़े का नाम कुण्डलिक था और छोटे का कुमार ।......की आज्ञा से यह प्रतिमा बनाई गई।
दूसरी जो जैन मूर्ति है वह इसी मूर्ति के पास में रखी हुई है और बैठी हुई स्त्री की आकृति की सी है।
एक महत्त्वशाली लख :-माननीय डायरेक्टर जनरल सर. ए० सी० कनींघम साहिब ने अपनी वार्षिक रिपोर्ट सन् १८७२-७३ भाग ५ में एक महत्वशालो लेख का ज़िकर किया है जो इस प्रकार है_ "कालीदेवी के मन्दिर में भी एक लेख था । ... .. मैंने जब इस मन्दिर को मुलाकात ली तब मुझे यह लेख नहीं मिल सका । इस के विषय में किसी ने मुझ से कोई हाल भी नहीं कहा । सोभाग्य से, इस लेख की दो नकलें मेरे पास हैं जो सन् १८४६ में मैंने अपने हाथ से लिख ली थी। इसकी मिति सं० १५६६
और शाका १४१३ है जो दोनों ई० सं० १५०६ के बराबर होती हैं । इस के प्रारम्भ में :
"श्राम स्वस्ति श्री जिनाय नमः।"
इस प्रकार जिन को नमस्कार किया गया है। और जिन शब्द तीर्थंकर का पर्यायवाची है।
कांगड़ा क दीवान :-सर कनींघम की रिपोर्ट सन् १८७२-१८७३
नोट :- इस लेख की लिपि प्राचीन शारदा लिपि है और बैजनाथ प्रशस्ति की लिपि से बिल्कुल मिलती है इसलिये इस में बताया गया । लौकिक संवत् ३० कदाचित् ई० सं०८५४ हो सकता है।
राजकुल गच्छ शब्द से जाना जाता है कि अभयचंद्राचार्य श्वेताम्बर थे। Shree Sudharmaswami Gyanbhandar-Umara, Surat www.umaragyanbhandar.com
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(२७) भाग ५ में दिये गये शब्द नीचे दिये जाते हैं जिन से पता चलता है कि कांगड़ा के दोवान जैन धर्म के उपासक थे। ____ "यद्यपि वर्तमान समय में कांगड़े में कोई जैन नहीं है परन्तु पहिले दिल्ली के बादशाहों के हाथ नीचे जैन यहाँ की दीवानगीरी किया करते थे।"
जैन मूर्तियां परिवर्तित रूप में :-कांगड़ा नगर में कुछ ऐसी मुत्तियां भी देखने में आई हैं जो वास्तव में पद्मासन में बैठो हुई जैन तीर्थंकरों की मूर्तियां हैं परन्तु उनके पद्मासन के स्वरूप को कुरेद कर बदला हुआ रूप स्पष्ट दिखलाई देता है और श्याम रंग की होने से उनको भैरव का रूप दे कर उन्हें तैल और सिन्धूर से पूजा जाता है।
भावड़यां दा खूह :-प्राचीन कांगड़ा में एक कुआं है जिसे. + भावड़यां दा खूह अर्थात् जैनों का कुआं कह कर पुकारा जाता है।
कांगड़ा में जैन :-कांगड़ा के मान्य कांग्रेस कार्यकर्ता श्री. हीरालाल गुप्ता ने बातचीत के दौरान में हमें बताया कि उन्हों ने कांगड़ा में जैनों को रहते स्वयं देखा है । उन्हों ने कांगड़ा के एक जैन वंश का जिकर किया जिस का एक मेम्बर नानकचन्द अपने रिश्तेदारों के पास होश्यारपुर में रहा करता था। इस पर मैंने इस बात की जांच की और उनका कथन सत्य सिद्ध हुआ।
जयन्ति देवी का स्थान :-किला कांगड़ा से कुछ दूर एक. टीले पर जयन्ति देवी का स्थान बना हुआ है जो कि किले से साफ. दिखाई देता है। उपाध्याय श्री जयसागर जी ने विज्ञप्ति त्रिवेणिः के
अन्त में जो परिशिष्ट नं. १ दिया है उस में अम्बिकादेवी ज्वालामुखी तथा वीर-लउंकड़ के सिवा जयन्तिदेवी को भी सम्मान दिया गया है। सम्भव है कि जयन्तिदेवी का भी जैन शासन से कुछ सम्बन्ध हो । + पंजाब में भावड़ा शब्द श्वेताम्बर जैनां के लिये प्रयोग होता है। Shree Sudharmaswami Gyanbhandar-Umara, Surat www.umaragyanbhandar.com
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( २८ ) भगवान महावीर की एक परम भक्त श्राविका का भी नाम जयन्ति था। इस विषय की खोज होनी चाहिये ।
कांगड़ा जिले में जैन स्मारक कांगड़ा किला और कांगड़ा नगर के स्मारकों के सम्बन्ध में जो थोड़ी बहुत जानकारी प्राप्त हो सकी उस का वर्णन कर चुके हैं अब कांगड़ा के आस-पास के क्षेत्रों से प्राप्त कुछ जानकारी का वर्णन किया जाता है।
ज्वालामुखी के जैन स्मारक-ऊपर लिख चुके हैं कि उपाध्याय श्री जयसागर जी के परिशिष्ट नं. १ के अन्त में ज्वालामुखी को भी मान दिया गया है जिस से अनुमान होता है कि ज्वालामुखी का भी जैनधर्म से कुछ सम्बन्ध रहा हो इस विषय की भी खोज होनी चाहिए।
वैसे तो ज्वालामुखी में कई जैन मूर्तियों के खण्डहरों के इधर उधर पड़े होने के समाचार प्राप्त हुए हैं परन्तु दो जैन स्मारक तो ऐसे हैं जिन को कई जैन बन्धु अपनी आंखों से देख चुके हैं । ज्वालामुखी के समीप एक चोटी पर अर्जुननांगा का स्थान है । यहां पर धातु की बनी तीर्थंकर की एक मूर्ति आज भी मौजूद है और इसके साथ ही धातु का बना एक यन्त्र जिस पर चौबीस तीर्थंकरों के नाम लिखे हुए हैं भी पड़ा है । जैनधर्म में नागार्जुन एक मान्य मुनीश्वर हो गये हैं जिन के नाम की अर्जुन-नांगा के साथ पूरी समानता होने से यह भी एक खोज का विषय हो जाता है । ज्वालामुखी के स्मारकों के कारण अनुभव होता है कि यहाँ पर भी जैनों की अवश्य बस्ती तथा जैन मन्दिर होंगे।
बैजनाथ पपरोला के स्मारक-बैजनाथ पपरोला कांगड़ा जिले का एक प्रसिद्ध स्थान है । यहाँ पर एक बहुत प्राचीन, भारतीय प्राचीन Shree Sudharmaswami Gyanbhandar-Umara, Surat www.umaragyanbhandar.com
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( २६ )
कला का सुन्दर नमूना, एक देवालय शोभायमान है। यह मन्दिर संवत् एक का बना हुआ है जिस का लेख इस मन्दिर के द्वार पर मौजूद है। यह मन्दिर भी महाराजा सुशर्मा का बनाया हुआ कहा जाता है। परन्तु महाराजा सुशर्मा जो पाडव काल में हुए और मन्दिर जी का संवत् एक का बनाया जाना, यह दोनों बातें परस्पर विरुद्ध होने से अभी इस का कुछ निर्णय नहीं किया जा सकता परन्तु यह तो निर्विवाद है कि यह मन्दिर है अति प्राचीन ।
मन्दिर जी के मूल-द्वार के बाहर आस-पास की दोनों दीवारों पर शारदा लिपि में लिखे दो प्राचीन विशाल शिला-लेख मौजूद हैं जो बड़े महत्त्व के होने चाहिये इन की जानकारी प्राप्त करनी अति
आवश्यक है । मन्दिर जी के मूल भाग में एक शिवलिङ्ग स्थापित है परन्तु मन्दिर जी का मूल स्थान बिल्कुल नया बना प्रतीत होता है जब कि बाकी का सारा भाग अति प्राचीन दिखाई दे रहा है। मन्दिर जी के बाहरी भाग पर चारों तरफ राजा आदि और देवी देवताओं की हजारों छोटी छोटी मूर्तियाँ खुदी हुई हैं जिन में पद्मासन में विराजमान कुछ जैन तीर्थंकरों की मूर्तियों के चिन्ह भी दिखाई देते हैं
और कुछ जैन साध्वियों की मूर्तियों के चिन्ह भी स्पष्ट दीख रहे हैं जिन के एक हाथ में रजोहरण है और दूसरा हाथ मुंहपत्ती को धारण किये है। इसी प्रकार मन्दिर जी के आस-पास दीवारों पर भी अनेकों ऐसी ही मूर्तियाँ देखने में आती हैं। इन सभी मूर्तियों के स्वरूप का जानना ऐतिहासिक दृष्टि से बड़े महत्त्व का होगा। इसी मन्दिर में हमारे कुछ और भी गौरव चिह्न जैन मूत्तियों के खण्डों के रूप में एक
ओर पड़े दिखाई देते हैं जिन्हें हमारे कई जैन भाई जो इधर भ्रमणार्थ जाते रहे हैं, स्वयं अपनी आँखों से देख चुके हैं । इस मन्दिर के शिखर Shree Sudharmaswami Gyanbhandar-Umara, Surat www.umaragyanbhandar.com
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। ३० ) पर लगे हुए पत्थर के गोल से चक्रों का स्वरूप कांगड़ा किले में पड़े पत्थर के चक्रों के स्वरूप से विल्कुल मिलता जुलता है। सम्भव है कि यह दोनों मन्दिर एक ही समय के बने हुए हों।।
मन्दिर जी के मूल भाग और बाहरी भाग के स्वरूप की भारी भिन्नता, महाराजा सुशर्मा के हाथों प्रतिष्ठित होने के लोक प्रवाद और जैन मतियों के अस्तित्व से हमें दृढ़ विश्वास हो रहा है कि यह पूर्वकाल का कोई जेन मन्दिर ही होना चाहिये।
नन्दनवनपुर (नादौन)-संवत् १४८४ का यात्रा-संघ कांगड़ा नगर से विहार करके गोपाचलपुर, नन्दनवनपुर, कोटिल-ग्राम और कोठोपुर आदि स्थानों पर गया था जिन के अस्तित्व के सम्बंध में अभी कोई पक्की जानकारी प्राप्त नहीं हो सकी । इनमें से केवल नंदनवनपुर के सम्बन्ध में मालूम हुआ है कि इसे आजकल नादौन कहते हैं । यहाँ पर विराजमान प्राचीन मन्दिर के बारे में अभी कुछ मालूम नहीं हो सका। हां यहाँ पर आज स्थानकवासी जैनों के थोड़े से घर मौजूद हैं। नादौन से दस बारह मील दूरी पर सुजानपुर नाम का एक कसबा है यहाँ भी स्थानकवासी जैनों के थोड़े से घर में इन दो स्थानों के सिवा कांगड़ा के सारे जिले में आज जैनों की कहीं बस्ती नहीं है।
सुना है कुछ वर्ष पूर्व पालमपुर के सुन्दर कसबे में भी जैनों की थोड़ी सी बस्ती थी परन्तु आज वहाँ कोई जैन नहीं है । इसके अतिरिक्त और भी कई स्थानों पर जैन मूर्ति आदि स्मारकों के मौजूद होने के समाचार सुने जा रहे हैं। इस बात की भारी आवश्यकता है कि कांगड़े के सारे क्षेत्र की शोध खोज की जावे ऐसा होने पर यहाँ से ऐतिहासिक महत्त्व की विशेष सामग्री मिलने की पूरी सम्भावना है।
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तीर्थ-यात्रा-संघ पूर्वकाल के संवन् १४८४ के विशाल यात्रा संघ का सम्पूर्ण हाल पीछे लिख चुके हैं । अब वर्तमान काल के कुछ यात्रा-संघों का संक्षिप्त समाचार यहाँ दिया जाता है।
संवत् १९८० का यात्रा-संघ-यह विशाल यात्रा-संघ संवत् १९८० में हमारे परम उपकारी, पंजाब केसरी, युगवीर, स्वर्गवासी, जैनाचार्य श्रीमद् विजयवल्लभ सूरीश्वर जी महाराज की छत्रछाया में होश्यारपुर के श्री हीरालाल भाबू के संघपतित्व में होश्यारपुर से निकाला गया था । आचार्य श्री के सिवा वयोवृद्ध शांतमूर्ति मुनि श्री सुमतिविजय जी, महान् तपस्वी मुनि श्री गुणविजय जी, होश्यारपुर के सुन्दर रत्न युगल भ्राता पन्यास श्री विद्याविजय जी तथा मुनि श्री विचारविजय जी और मुनि श्री उपेन्द्रविजय जी भी इस यात्रा संघ में शामिल थे सारे पंजाब से तथा पंजाब से बाहर बम्बई आदि दूर स्थानों से भी सैंकड़ों की संख्या में नर और नारी दादा के प्रथम दर्शन की अभिलापा से उमड़ पड़े थे । सारा सामान बैल गाड़ियों पर लादा गया था और सभी यात्री मुनि महाराजों के साथ नंगे पैरों प्रसन्नचित्त हो कर बढ़ते चले जाते थे । जहाँ पर पड़ाव पड़ता वहाँ ही मानी जंगल में मंगल हो जाता था । प्रभु भक्ति और गुरु भक्ति के प्रभाविक गान और कीर्तन से दिशायें गूंज उठती थीं। जगह जगह ठहरते हुए यह संघ कोई दस दिनों के बाद कांगड़ा पहुँचा था और सभी ने बड़े प्रेम और भक्ति-भाव से भगवान् की पूजा और प्रभावना का तीन दिन तक आनन्द लूटा था । पहिली यात्रा माघ शुदी पंचमी रविवार के दिन बड़ी धूम धाम से की गई थी। कांगड़ा नगर में मानो एक मेला सा लग गया था। इस तरह नृत्य-गान, भजन Shree Sudharmaswami Gyanbhandar-Umara, Surat www.umaragyanbhandar.com
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( ३२ )
कीर्तन करते, नगर निवासियों से बड़े प्रेम से मिलते तीन दिनों तक तीर्थ-यात्रा का लाभ उठाने के बाद उसी रास्ते से संघ सुख शान्ति पूर्वक वापिस होश्यारपुर पहुँचा ।
दूसरा संघ - यह यात्रासंघ भो श्री हीरालाल भात्र होश्यारपुर के संघपतित्व में ही वयोवृद्ध शान्तमूर्ति मुनि श्री सुमतिविजय जी महाराज की छत्र छाया में संवत् १६ के लगभग निकाला गया था । पन्यास श्रीविद्याविजय जी उनके जन्म युगल भ्राना सहदीक्षित मुनि श्री विचारविजय जी तथा मुनि श्री उपेन्द्र विजय जी भी संघ में शामिल थे । इस यात्रा संघ में भी अच्छी रौनक थी और बड़े आनन्दपूर्वक
यात्रा का लाभ उठाया गया था ।
संवत् १९९६ का यात्रा संघ - यह यात्रा संघ संवत् १६६६ में पंजाब केसरी, कलिकालकल्पतरु, युगवीर, जैनाचार्य श्रीमद् विजवयल्लभ सूरीश्वर जी को छत्र-छाया में होश्यारपुर के धर्मप्रेमी श्रावक ला० नानकचन्द्र जो नाहर के संघपतित्व में होश्यारपुर से निकाला गया था । पन्यास श्री समुद्रविजय जी गणि, मुनि श्री शिवविजय जी, मुनि श्री विशुद्ध विजयजी आदि मुनिराज भी पधारे थे । पूर्व की भाँति इस यात्रासंघ में भी सैकड़ों नर-नारियों की भीड़ थी, बड़ी रौनक थी । बड़े उत्साहपूर्वक सारा कार्यक्रम चलता रहा और पूरे भक्ति-भाव से सैंकड़ों नर-नारियों ने यात्रा का आनन्द लिया था । क्रमबद्ध वार्षिक यात्रासंघ और उसकी रूप-रेखा
यूं ही भारत स्वतंत्रता-युद्ध सफलता को प्राप्त हुआ और भारत में गणतंत्र राज्य की स्थापना की घोषणा कर दी गई। हमारा मान्यतीर्थ भी सफलता की राह को प्राप्त करने के लिये करवट लेने लगा । सन् १९४७ की बात है कि होश्यारपुर के कुछ नव-युवकों के मन में विचार
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संवत् १९९६ के यात्रा-संघ का एक दृश्य
मान्य संगीतकार उस्ताद बृजलाल जैन होश्यारपुर
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श्री कांगड़ा तीर्थ के पुनरोद्धारक श्रीमद् विजयवल्लभ सूरीश्वर जी महाराज संवत् १६६६ के यात्रा-संघ के संघपति ला० नानकचन्द नाहर के साथ
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(३३) पैदा हुआ कि होली के दिन जब कि हमारे नगर में रंग उड़ाने के साथ साथ धूलि आदि भी उड़ाने की प्रथा है और इससे यह पवित्र दिन अपवित्र बनकर रह जाते हैं और होली के अन्तिम दो तीन दिन तो कारोबार भी लगभग बन्द सा ही रहता है, क्यों न यह दो चार दिन कांगड़ा की पुण्य भूमि में गुजारे जायें इससे जहाँ कांगड़ा के सौंदर्यपूर्ण प्राकृतिक दृश्यों से और वहाँ के जलवायु से मनोरञ्जन हो सकेगा वहाँ अपने प्राचीन पवित्र तीर्थ और भगवान् श्री आदिनाथ की मनोहर मूर्ति के दर्शन पूजन से आत्मिक अानन्द की प्राप्ति का लाभ भी मिल सकेगा। इन शुभ विचारों के साथ सब ने एक मन हो कर कांगड़ा तीर्थ की यात्रा के लिये जाने का निश्चय कर लिया और सन् १६४७ फाल्गुण शुदि त्रयोदशी, चतुर्दशी और पूर्णमाशी की यात्रा बड़े आनन्द और उत्साह से की । इस वर्ष १३ प्रेमी इस पहिले तीर्थयात्रासंघ में सम्मिलित हुए।
तीर्थ यात्रा से उन्हें इतना आनन्द प्राप्त हुआ कि उन्होंने प्रतिवर्ष होली के दिनों में यात्रा के लिये कांगड़ा जाने का निश्चय कर लिया
और इसी विचार के अनुसार दूसरे वर्ष भी इन्हीं दिनों में यात्रा के लिये कांगड़ा गये और सन् १६४८ की यात्रा का आनन्द लूटा। इस वर्ष यात्री-संख्या ११ थी।
इसके बाद सन्.१६४६ आया और होली के दिन भी समीप आने लगे। फिर सभी प्रेमी सजन इकट्ठहुए । इस वर्ष उनके उत्साह में एक विशेष जागृति पैदा हुई । उन्होंने सोचा कि हम तो तीर्थयात्रा का आनन्द उठायेंगे ही क्यों न बाकी नगरों के भाईयों को भी इस शुभ अवसर से लाभ दिलाने का सौभाग्य प्राप्त करें। यह भाव सभी को प्रिय लगे और उन्होंने पंजाब के सभी नगरों में विज्ञापन भेजकर उन्हें Shree Sudharmaswami Gyanbhandar-Umara, Surat www.umaragyanbhandar.com
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( ३४ )
तीर्थयात्रा करने का आमन्त्रण दिया । इस प्रकार सन् १९४६ का भी तीर्थयात्रा का कार्यक्रम पिछले दोनों वर्षों की अपेक्षा अधिक रोचक रहा । इस वर्ष पंजाब के दूसरे शहरों से भी भाई बहिनें शामिल हुए। इस वर्ष यात्री-संख्या लगभग ६५ हो गई।
इसके बाद प्रतिवर्ष होली के दिनों में यात्रा का कार्यक्रम अविच्छिन्न रूप से चालू हो गया और प्रतिवर्ष इसकी संख्या वृद्धि पाते सैकड़ों तक पहुंच गई और पंजाब के अच्छे अच्छे मान्य प्रतिष्ठित व्यक्ति भी इन संघों में शामिल होने लगे और तीन दिनों के लिये भगवान् को पूजा, सेवा, स्तवन कीर्तन आदि से आत्म-आनन्द का लाभ उठाने लगे। भगवान के पूजन की बोलियां होकर अष्ट प्रकारी पूजा रचाई जाती और चौदश के रोज जयजयकारों के मध्य में श्री मन्दिर जी पर ध्वजारोहण होने लगा। भावुक यात्री उत्सव के खर्चे के लिये अपने धन को देकर अपनी कमाई का सार्थक बनाते रहे । यह सारा कार्यक्रम होश्यारपुर के उन्हीं युवकों के कन्धों पर रहा और उनके सहयोग में और भी सज्जनों ने हाथ बटाना प्रारम्भ कर दिया। कार्यक्रम को रोचक बनाने के लिये अच्छे अच्छे संगीतकारों और वक्ताओं को बुलावा भेजा जाने लगा। इस तरह प्रतिवर्ष रौनक में वृद्धि होने लगी।
___ फलतः इन युवकों ने भारी जिम्मेवारी को अनुभव करते हुए अपने होश्यारपुर के सकल श्रीसंघ की सहानुभूति और सहयोग लेने की इच्छा प्रकट की जिस पर सकल श्रीसंघ ने सन् १६५१ में तारीख २७ फर्वरी की अपनी एक मीटिंग में श्री कांगड़ा तीर्थ की वार्षिक क्रमबद्ध यात्रा को चालू रखने के लिये एक कमेटी नियत कर दी जिसका नाम
"श्री श्वेताम्बर जैन कांगड़ा तीर्थयात्रा संघ होश्यारपुर" रक्खा गया Shree Sudharmaswami Gyanbhandar-Umara, Surat www.umaragyanbhandar.com
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(३५) और उन सभी सजनों को जो यात्रा सम्बन्धी सेवाभाव रखते थ इस संघ में शामिल कर लिया गया और उनमें से एक कार्यकारिणी बनाई गई जो आज तक यह कार्यक्रम भली-भाँति चलाती आ रही है। कार्यकारिणी के सदस्यों की नामावलि इस प्रकार है :
(१) ला० सरदारीलाल जैन फर्म सरदारीलाल प्रेमसागर (संघचालक)।
(२) ला० प्रीतमचंद जैन सुपुत्र ला० कुन्दनलाल जैन (सहायक संचालक)।
(३) डाक्टर फकीरचंद जैन (प्रधान मन्त्री)। (४) ला० शान्तिलाल जैन नाहर सुपुत्र ला० गोकलचंद (मन्त्री)। (५) ला धर्मचंद जैन फर्म धर्मचंद अभयकुमार (कोषाध्यक्ष)।
(६) ला० डोगरमल जेन प्रधान श्री आत्मानन्द जैन सभा होश्यारपुर।
(७) ला० ज्ञानचंद जैन मन्त्री श्री आत्मानन्द जैन सभा होश्यारपुर ।
इस प्रकार यह कार्यकारिणी निश्चित करके उन्हें काम करने की पूरी स्वतन्त्रता देते हुए, पूर्ण सहयोग देने का श्री संघ ने आश्वासन दिया। तब से यह कार्यकारिणी अपने प्रेमी साथियों के सहयोग से बड़े उत्साह पूर्वक कार्य कर रही है। प्रति वर्ष वार्षिक रिपोर्ट प्रकाशित कर के हिसाब किताब का सारा चिट्ठा प्रकट किया जाता है ताकि किसी प्रकार से कोई शंका न रहे। उत्सव के विज्ञापन पत्र छपवा कर दूसरे नगरों में सूचना रूप भेजे जाते हैं और उनमें सारा कार्यक्रम दे दिया जाता है।
इस सारे उत्साह के कारण हमारे वह मान्य सुश्रावक हैं जोकि समय समय पर हमें तन, मन और धन से सहयोग देते चले आ रहे Shree Sudharmaswami Gyanbhandar-Umara, Surat www.umaragyanbhandar.com
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( ३६ ) हैं । ला० रत्नचन्द ऋषभदास जैन सराफ होश्यारपुर हमें आर्थिक सहायता से विशेष उत्साहित करते चले आ रहे हैं । ला० बाबू राम जी जैन सराफ होश्यारपुर वालों ने भी तीर्थ सम्बन्धी सेवाओं में विशेष योग दिया है । ला० मस्तराम जो जैन बजाज ने अपनी पूज्य माता श्रीमति इन्द्रकौर की याद में कुछ चाँदी के बर्तन, तल की ५० सुन्दर रकाबियां तथा ५० कौलियाँ भेंट की हैं और प्रति वर्ष पूजा की सब मोटी सामग्री केसर, धूप, कपूर, इतर, चाँदी के वर्क तथा अंगलूहूने आदि कई वर्षों से देते आ रहे हैं और आजीवन देते रहने का विश्वास दिला चुके हैं । पूज्य ला. मुन्शीराम जी (हमारे मान्य पण्डित जी) कांगड़ा तीर्थ के बड़े प्रेमी हैं और शुरु से ही इनका आशीर्वाद हमें प्राप्त रहा है । हमारे वयोवृद्ध मान्य उस्ताद जी श्री बृजलाल जी (बी० ऐल) हमारी समाज के पुराने संगीतकार हैं जिनके रचित कांगड़ा प्रेम से भरपूर कुछ गाने इसी पुस्तक में दिये जा रहे हैं, कांगड़ा तीर्थ के बड़े प्रेमी हैं और प्रति वर्ष यात्रा में शामिल होकर अपने मनोहर संगीत से जनता को आनन्दित करते चले आ रहे हैं।
और इसी प्रकार और भी युवक तथा मान्य सज्जन हैं जिनके अपार प्रेम से हम नित्य सफलता प्राप्त कर रहे हैं। उनका सच्चा प्रेम ही उनका यशोगान है। दूसरे शहरों से भी हमें अच्छा सहयोग मिल रहा है। जिन में नारोवाल वाले ला० धर्मचन्द गुलजारी लाल, पूर्णचन्द तथा रत्नचन्द जी वकील बटाला निवासी आदि प्रेमी महानुभावों के नाम विशेष उल्लेखनीय हैं जो कि तन, मन और धन से प्रेम-पूर्वक कई वर्षों से हमें सहयोग देते चले आ रहे हैं।
इस तरह अपने प्रेमी महानुभावों के सहयोग से तथा देव-गुरु की अपार कृपा से हम अपने पथ पर बराबर आगे बढ़ रहे हैं । अब तो पंजाब से बाहर कहीं दूर दूर से बम्बई, जयपुर, मुरादाबाद, आगरा Shree Sudharmaswami Gyanbhandar-Umara, Surat www.umaragyanbhandar.com
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सन् १९५३ के श्रावक-यात्रियों का सामूहिक चित्र
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सन् १९५५ का यात्रा-संघ तीर्थ क्षेत्र में
हमारे प्रिय नेतागण-(१) श्री ज्ञान दास जी पी. सी. एस. सीनियर सब-जज (२) सेठ फूल चंद शाम जी भाई बम्बई ।
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(३७) तथा देहली आदि स्थानों से भी प्रेमी सज्जन इस तीर्थ की यात्रा का लाभ उठा चुके हैं।
इस प्रकार सन् १९४६ के बाद प्रति वर्ष यात्रा में विशेष उत्साह और जागृति देखने में आ रही है । सन् १९५० में हमारे प्रखर विद्वान् मुनिराज पन्यास श्री विकाशविजय जी तथा हीरविजय जी भी यात्रा उत्सव पर पधारे थे जिस से विशेष प्रेरणा प्राप्त हुई थी। १६५१, १९५२ तथा १९५३ के वर्षों में दिन प्रति दिन रौनक बढ़ती गई।
परन्तु सन् १६५४ का उत्सव कांगड़ा के इतिहास में विशेष स्थान रखता है क्योंकि इतिहास में सर्वप्रथम उत्सव के इन्हीं दिनों में इसी नगर कांगड़ा में पंजाब के जैनों की मुख्य सभा-श्री आत्मानन्द जैन महासभा पंजाब का वाषिक अधिवेशन भी पूरी शान के साथ मनाया गया था। हमारे मान्य नेता धर्म प्रेमो ला० बाबू राम जी वकील जीरा निवासी इस अधिवेशन के प्रधान थे । अधिवेशन के कारण अनेकों मान्य प्रतिष्ठित व्यक्ति इस वर्ष उत्सव पर पधारे थे जिन में श्री श्वेताम्बर जैन कान्स के उप-प्रधान माननीय सेठ मोहन लाल जी चौकसी बम्बई, माननीय ला० ज्ञानदास जी सीनियर सबजज देहली, सेठ कीका भाई रमणलाल जी पारिख देहली, ला० दौलतराम जी ऐडवोकेट होश्यारपुर, ला० खुशीराम जी ऐडवोकेट जालन्धर, जैन दर्शन के प्रकांड विद्वान् पं० हंसराज जी शास्त्री लुधियाना, प्रभाविक वक्ता ला० पृथ्वी राज जी जैन प्रोफैसर जैन कालिज अम्बाला, मान्य संगीतकार मास्टर नत्थासिंह जी लुधियाना आदि महानुभावों का नाम विशेष उल्लेखनीय है । महासभा के अधिवेशन से समाज में विशेष जागृति पैदा हुई और आनन्द बना रहा । इस Shree Sudharmaswami Gyanbhandar-Umara, Surat www.umaragyanbhandar.com
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(३८)
वर्ष यात्री-संख्या चार पाँच सौ के लग भग थी।
सन् १६५५ के यात्रा संघ में यद्यपि यात्री-संख्या पिछले वर्षे जितनी नहीं थी तो भी उत्साह काफी था । समाज के अच्छे अच्छे अग्रगण्य इस उत्सव पर पधारे थे। भारतीय जैन समाज के प्रमुख नेता श्रीयुत सेठ फूलचंद शाम जी भाई बम्बई, श्रीमान् सेठ रमणीकलाल जी पारिख बम्बई, माननीय सेठ कीका भाई रमणलालजी पारिख देहली, पंजाब जैन समाज के सर्वप्रिय नेता बाबू ज्ञानदास जी सीनियर-सब-जज देहली तथा जैन दर्शन के प्रखर विद्वान् महान् तार्किक पं० हीरालाल जी जैन शास्त्री अम्बाला के नाम विशेष लिखने योग्य हैं। इन महानुभावों के पधारने से उत्सव की शोभा में चार चाँद लग गये थे।
अब १६५६ के वर्ष का स्वागत करना है । यह यात्रा उत्सव भी पूर्व के समान फाल्गुण शुदि त्रयोदशी, चतुर्दशी तथा पूर्णमासी तीन दिनों के लिए चालू रहेगा । इस वर्ष हमारे प्रखर विद्वान् मुनिराज श्री प्रकाशविजय जी, श्री नन्दनविजय जी, श्री वसंतविजय जी तथा महान प्रभाविक साध्वियां श्री शीलवती जी, श्री मृगावती जी, श्री सुज्येष्ठा श्री जी महाराज भी पधारने को कृपा कर रही हैं जिससे इस वर्ष चतुर्विध संघ सम्मेलन भरने की पूरी पूरी सम्भावना है जिससे अनुमान किया जाता है कि यह उत्सव कांगड़ा तीर्थ के इतिहास में अद्वितीय होगा। चारों ओर से यात्री भाई और बहिनों के पधारने के समाचार प्राप्त हो रहे हैं। प्रोग्राम को विशेष रोचक बनाने के लिए संगीत और भाषणों का अति सुन्दर कार्यक्रम बन रहा है अतः पूरी सम्भावना है कि यह उत्सव विशेष ऐतिहासिक महत्त्व का होगा और सफल रहेगा।
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तीर्थोद्धार कमेटी प्रातः स्मरणीय परमोपकारी पंजाब देशोद्धारक न्यायाम्भोनिधि जैनाचार्य श्रीमद् विजयानन्द सूरि (आत्मा राम जी) महाराज के समय में इस तीर्थ से समाज परिचित नहीं हो सका था अन्यथा उनके समय में ही इस प्राचीन तोर्थ को उन्नति पर अवश्य दृष्टि दो जाती। पूज्यपाद गुरुदेव जैनाचार्य १००८ श्रीमद् विजय वल्लभ सूरि जी म. ने जब इस तीर्थ की ऐतिहासिक जानकारी प्राप्त की और संवत् १६८० में इस तीर्थ की पहली बार यात्रा की तभी से उनके मन में विशेष उत्कंठा पैदा हुई कि इस प्राचीन गौरवशाली तीर्थ का फिर से उद्धार किया जाये।
गुरु महाराज को इस सद्भावना के कारण श्री संघ ने भो इस पुण्य कार्य में योग देना अपना कर्तव्य समझा और इस कार्य को सिद्धी के लिये " अखिल भारतीय कांगड़ा तीर्थोद्धार कमेटी " नाम की एक संस्था स्थापित की गई जिस के प्रधान होश्यारपुर के माननीय ला० दौलतराम जी जेन वकील तथा मन्त्री ला० अमरनाथ जी जैन बजाज़ होश्यारपुर निश्चित हुए । उन्होंने इस सम्बन्ध में उचित लिखा पढ़ो जारी को और कुछ समय तक यह कार्य सुचारु रूप से चलाते रहे परन्तु किप्सी कारण से यह काम आगे न बढ़ सका।
अब जब कि यात्रा-संघ की ओर से यात्रा का कार्यक्रम चालू हुआ और उत्साही तथा योग्य सज्जन कांगड़ा पहुँचने प्रारम्भ हुए तो एक बार फिर इस तीर्थ के उद्धार के भाव पैदा हुए फलतः कुछ सज्जन इस काम के लिये आगे बढ़े जिन में से विशेष कर के हमारे माननीय योग्य कार्यकर्ता ला० अमरनाथ जो जैन बी० ए० बी० टी० हैड मास्टर गढ़दीवाला वालों का नाम उल्लेखनीय है। उन ही के उत्साह से फिर वही कमेटी "श्री कांगड़ा जैन तीर्थोद्धार कमेटी"
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(४०) नाम से पुनर्जीवित हुई जिस के प्रधान ला० दौलतराम जी जैन ऐडवोकेट होश्यारपुर, प्रधान मन्त्री ला० अमरनाथ जैन हैडमास्टर गढ़दीवाला वाले और मन्त्री श्री शान्तिलाल जैन नाहर होश्यारपुर निश्चित हुए । इस कमेटी ने पूरे उत्साह और लग्न से अपना कार्य
प्रारम्भ कर दिया। ___कांगड़ा में जैनों का कोई घर न होने से हमारे लिये अपने तीर्थ की देख-रेख और सुरक्षा करना अति कठिन था। सौभाग्यवश वहाँ पर हमारे प्रिय-बन्धु नकोदर निवासी ला० गुरदित्तामल जो जेन खण्डेलवाल अपने निजी काम के कारण कुछ समय से निवास कर रहे थे। वह बड़े धर्मप्रेमी और समाज-सेवी सजन थे। हमें विशेष दुःख है कि कुछ समय हुआ मृत्यु ने उन्हें हम से जुदा कर दिया । उस तीर्थ-प्रेमी ने अपने तीर्थ की कुछ बिगड़ी दशा का अनुभव किया। कुछ स्वार्थी लोग दादा की इस मनोहर मूर्ति द्वारा अनुचित लाभ उठा रहे थे और दोप पूर्ण कार्य करने से महान् अशान्ति पेदा कर रहे थे। उन्होंने यह समाचार हम तक पहुँचाये जिसे सुनकर हमें अति दुःख हुआ।
कमेटी ने सब से पहिले इसी ओर दृष्टि देनी उचित समझी और इस काम को सुचारु रूप से चलाने के लिये अपनी प्रमुख सभा श्री आत्मानन्द जैन महासभा पंजाब का सहयोग प्राप्त किया गया । श्री आत्मानन्द जैन महासभा पंजाब की ओर से तीर्थ की सुरक्षा निमित्त एक डैपूटेशन कांगड़ा के डिप्टी कमिश्नर श्री के० एल० कपूर साहिब से धर्मसाला के स्थान पर मिला और उन्हें तीर्थ सम्बन्धी दुर्व्यवस्था को सूचित करके उनसे सुधार की प्रार्थना की गई जिसे
उन्होंने सहर्ष स्वीकार किया और सहयोग देने का पूरा विश्वास दिलाया। Shree Sudharmaswami Gyanbhandar-Umara, Surat www.umaragyanbhandar.com
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हमारे तीर्थ-प्रेमी
सेठ फूलचन्द शाम जी भाई बम्बई
सेठ कीका भाई रमणलाल जी पारिख देहली
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( ४१ )
इस डैपुटेशन में निम्नलिखित महानुभाव शामिल हुए :ला० खुशीराम जो जैन ऐडवोकेट जालन्धर, ला० दौलतराम जी जैन ऐडवोकट होश्यारपुर । ला० जिनदासमल जेन ऐडवोकेट होश्यारपुर, ला अमरनाथ जी जैन हैडमास्टर गढ़दिवाला, ला० परमानन्द जी मन्त्री महासभा पंजाब, ला० कपूरचंद जो प्रधान श्री संघ जालन्धर, ला० कुन्दनलाल जी हैडमास्टर नकोदर, ला० ज्ञानचंद जी मन्त्री श्री संघ होश्यारपुर, ला० सरदारीलाल जी संघचालक कांगड़ा तीर्थयात्रा संघ, श्री० शान्तिलाल जी मन्त्री तीर्थोद्धार कमेटी होश्यारपुर ।
डैपुटेशन से डी० सी० साहिब बड़ी सहानुभूति के साथ मिले । हमारी विनति को बड़े ध्यान से सुना और कांगड़ा तीर्थ के इतिहास को भी सुना और पूर्ण सहयोग देने का आश्वासन दिलाया। इधर पुरातत्व विभाग (Archaeological Deptt.) नई दिल्ली ने भी हमें पूरा पूरा सहयोग दिया । फलतः हमें सफलता प्राप्त हुई और आज यह प्रतिमा जैन मूर्त्ति घोषित हो चुकी है और जैनमूत्ति के तरीके से ही पूजी जा रही है और कोई अनुचित कार्यवाही करे ऐसा भय नहीं रहा ।
परन्तु यात्रा के समय से आगे पीछे व्यक्तिगत रूप में आने वाले. यात्रियों को पूजा करने में रुकावट हो गई जिस से हमें दुःख हुआ क्योंकि पुरातत्व विभाग के कुछ ऐसे ही प्रतिबंध थे । जिस पर हमारे पूज्यपाद गुरुदेव श्रीमद् विजयवल्लभ सूरीश्वर जो महाराज ने विशेष दृष्टि दी और उनकी अपार कृपा से हमें हमारे कुछ ऐसे प्रतिष्ठित महानुभावों का सहयोग प्राप्त हो गया जो देहली ही में विराजमान थे क्योंकि हम इतनी दूर बैठे महकमा वालों से मिलने और बातचीत: करने में बड़ी कठिनाई का अनुभव करते थे । माननीय श्रीमान् सेठ कोका भाई रमणलाल जी पारिख, श्रीमान् बाबू ज्ञानदास जी सीनियर सब- जज, आदरणीय सैक्रेटरी साहिब श्री नेमचन्द जी तथा
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( ४२ )
प्रो० बदरीदास जी जैन देहली वालों ने गुरुदेव की तीर्थ सम्बन्धी सद्भावनाओं से प्रेरित होकर तीर्थोद्धार में हमें पूर्ण सहयोग दिया और बड़ी लग्न से तीर्थोद्धार के लिये परिश्रम करने लगे । और अब हमारे यह माननीय नेतागण सर्वदा के लिये स्वतंत्रतापूर्वक पूजा के पूर्ण अधिकार प्राप्त करने तथा प्रभु प्रतिमा का योग्य सिंहासन पर विराजमान कराने में प्रयत्नशील हैं । हमें पूरा विश्वास है कि हम देवगुरु की कृपा से अवश्य सफल होंगे ।
भूमि-दान :- कांगड़ा में कोई जैन- घराना नहीं है और न ही कोई अपना स्थान | हमें विचार पैदा हुआ कि वहाँ पर कोई जगह खरीद की जाये ताकि समयानुसार वहाँ कोई धर्मशाला, विद्यालय अथवा चिकित्सालय आदि खाल कर कुछ जैनों को बसाया जाये जिस से तीर्थ की देख रेख, मुरक्षा आदि कार्यों में सहयोग मिल सके । परिणाम स्वरूप किले के समीप ही उचित स्थान पर एक विशाल टुकड़ा ( जमीन ) बिक रहा था । उचित स्थान होने से और सरकार की इस क्षेत्र को फिर से बसाने की दृढ़ भावना देखते हुए सब योग्य सज्जनों ने यही सम्मति दी कि यह स्थान खरीद लिया जाये जिस पर बम्बई में आचार्य भगवान् श्रीमद् विजय वल्लभ सूरीश्वर जी महाराज की सेवा में अपने भाव रखे गये । उन्होंने हमें उत्साह दिया जिस पर उन की प्रेरणा से गुजरांवाले के धर्मप्रेमी गुरु भक्त ला० मकनलाल प्यारे लाल जी जैन मिन्हानी अम्बाला निवासियों ने यह स्थान लग-भग ग्यारह सौ रुपया खर्च करके तीर्थोन्नति के भाव से भेंट किया । हमें विश्वास है कि श्रीमानों के शुभ भाव से दिया गया यह भूमि दान तीर्थ की उन्नति में अवश्य सहायक बनेगा और कोई समय आयेगा जब कि यहाँ पर देव-गुरु के शुभ नाम की कोई अमर स्थापना कायम होकर रहेगी।
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देखने योग्य स्थान श्री कांगड़ा तीर्थ के जैन ऐतिहासिक स्मारकों का वर्णन हो चुका अब कांगड़ा के अन्य आकर्षणीय स्थानों का वर्णन किया जाता है जिस से जहाँ आप तीर्थ यात्रा द्वारा आत्मिक आनन्द का लाभ उठा सकेंगे वहाँ इन रमणीय स्थानों की छटा को देखकर मनोरन्जन भी प्राप्त कर सकेंगे। अतः इस विषय के दो भाग किये जाते हैं :
(१) ऐतिहासिक स्थान । (२) रमणीय स्थान ।
ऐतिहासिक स्थान :-कांगड़े का सारा क्षेत्र ही देवी और देवताओं का घर है । वैसे तो देवी देवताओं के अनगिनत स्थान
आप के देखने को यहाँ मिलेंगे परन्तु तीन प्राचीन मन्दिरों को इधर बहुत मान्यता है । जिनका वर्णन नीचे किया जाता है :
वज्र श्वरी देवी :-कांगड़ा की नई बस्ती में वज्र श्वरी देवी का एक प्राचीन विशाल मन्दिर है जो देखने में बहुत मनोहर है । दूर दूर से यात्री लोग इसके दर्शनों को आते हैं । यहाँ पर नवरात्रों में बड़ा भारी मेला लगता है। ___ज्वालामुखी-कांगड़ा नगर के पूर्व की ओर कोई चौदह मील की दूरी पर यह स्थान दूर दूर तक प्रसिद्ध है। यहाँ पर एक बहुत प्राचीन विश ल मन्दिर है जिस में दो चार स्थानों से पृथ्वी में से अग्नि की ज्वालायें लगातार निकलती रहती हैं यही इसकी विशेषता है। इसी कारण यह ज्वालामुखी के नाम से प्रसिद्ध है। यहाँ पर नवरात्रों के दिनों में बड़ा भारी मेला लगता है । यू०पी० की तरफ के सैंकड़ों लोग प्रति वर्ष नंगे पांवों इसके दर्शनों को पाते हैं।
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( ४४ )
चिन्तपुर्णी-यह मन्दिर भी बहुत प्रसिद्ध है। पंजाब के मुख्य २ नगरों से हजारों यात्री इस के दर्शनों को प्रति वर्प आते हैं। श्रावण मास में बड़ा भारी मेला लगता है । माता के मन्दिर पर सैंकड़ों ध्वजायें चढ़ाई जाती हैं यह मन्दिर कांगड़ा से होश्यारपुर को जाने वाले रास्ते पर आता है । कांगड़े से तीस मील की दूरी पर स्थित है।
रमणीय स्थान-धर्मसाला, भागसूनाथ पालमपुर, बैजनाथपपरोला आदि कितने ही सौन्दर्य पूर्ण रमणीय स्थान इधर देखने योग्य हैं । सभी कांगड़े से बीस पञ्चोस मीलों की दूरी पर स्थित हैं । इनका जल और वायु बड़ा स्वच्छ और स्वास्थ्यप्रद है । प्रकृति की छटा देखने योग्य है । गरमी के मौसम में लोग मनोरञ्जन के लिये आते हैं।
योगिन्द्र नगर-हिमाचल की बर्फानी घाटियों में शोभायमान यह सुन्दर स्थान बिजली-उत्पादन का विशाल घर है । यहाँ पर बड़े बड़े बंध बांध कर पहाड़ों में बहने वाली छोटी छोटी नदियों का जल इकट्ठा करके बिजली पैदा की गई है जो कि सारे पंजाब में दूर दूर तक अपने प्रकाश से अन्धकार को दूर कर रही है। इसके कल-कारखाने देखने योग्य हैं।
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जाने आने की जानकारी इस महातीर्थ के दर्शनों को जाने के लिये दो मुख्य रास्ते हैं। होश्यारपुर से कांगड़ा तथा पठानकोट से कांगड़ा । होश्यारपुर से कांगड़ा चौसठ मील की दूरी पर है। बस सर्विस की पूरी सुविधा है। रास्ता अच्छा है। जिन लोगों को मोटर में बैठ कर पहाड़ी सफर करने से उल्टियां आ जाती हैं उनके लिये इधर से जाना योग्य नहीं।
पठानकोट से कांगड़ा के लिये दो मुख्य साधन हैं । बस द्वारा भी कांगड़ा पहुँचने में कोई कठिनाई नहीं । थोड़े थोड़े समय पर पठानकोट से बसें मिलती रहती हैं। रेल्वे ट्रेन भी कांगड़ा जाती है। पठानकोठ से कांगड़ा के लिये छोटो लाईन चलती है । छोटा सा इञ्जन और छोटे छोटे डिब्बे । पर्वतीय दृश्य देखने योग्य हैं । जलवायु के कलरव से मन को बड़ा आनन्द प्राप्त होता है । पठानकोट से कांगड़ा ५७ मील की दूरी पर है। कांगड़ा के दो रेल्वे स्टेशन हैं । 'पहले स्टेशन का नाम कांगड़ा और दूसरे का कांगड़ा मन्दिर । कांगड़ा नगर की भी दो बस्तियां हैं । एक का नाम है पुराना कांगड़ा
और दूसरे का नवीन कांगड़ा अथवा कांगड़ा भवन । स्टेशन कांगड़ा पुराने कांगड़े के समीप है जहाँ किले में हमारा जैन मन्दिर है यहाँ के स्टेशन पर कांगड़ा को नवीन बस्ती को जाने के लिये रेल्वे बस मौजूद होती है। स्टेशन "कांगडा मन्दिर" नवीन वस्ती के समीप है जहाँ यात्रा के दिनों में धर्मशाला में हम ठहरा करते हैं । स्टेशन से बस्ती को जाने के लिये सवारी का कोई प्रबन्ध नहीं । पैदल ही चलना होता है । सामान उठाने के लिये कुली मिल जाते हैं । ठहरने के लिये नवीन बस्ती ही योग्य है जहाँ धर्मशाला आदि सब प्रकार की सुविधा है । रौनक भी यहीं है ओर देवी का मन्दिर और अच्छर-कुण्ड आदि देखने योग्य स्थान भी यहीं हैं। यहाँ से दो मील की दूरी पर किले में .हमारा जैन मन्दिर है।
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सारांश
* श्री कांगड़ा तीर्थ को स्थापना भगवान् श्री नेमिनाथ के समय में ___ महाराजा सुशर्म चन्द्र के कर-कमलों से हुई। * कांगड़ा तोथ का प्रमुख मन्दिर नगरकोट कांगड़ा के
ऐतिहासिक किले में विराजमान है। * इस मंदिर में भगवान् श्री आदिनाथ को विशाल मनोहर मूर्ति
शोभायमान है। * मंदिर जी के द्वार पर २४ जैन तीर्थकरों की पद्मासन में
विराजमान मूर्तियों के चिह्न शोभा दे रहे हैं। * तीर्थ के संस्थापक महाराज सुशर्मचन्द्र चन्द्रवंशोय कटौच
क्षत्रिय थे। * इस वंश के कई महाराजे जैन धर्म के श्रद्धालू रहे ।
महाराजा रूपचन्द्र ने चौदहवीं शताब्दि में कांगड़ा नगर में भगवान महावीर की स्वर्ण प्रतिमा तथा मंदिर स्थापित किया। * संवत् १४८४ में महाराजा नरेन्द्रचन्द्र ने उपाध्याय श्री जय
सागर जी के नेतृत्व में सिन्ध देश से आने वाले विशाल यात्रा संव को बहुमान दिया और उपाध्याय जी के उपदेश को सुना। ॐ महाराजा नरेन्द्र चन्द्र के अपने निजी देवागार में स्फटिक. रत्नों की बनी तोर्थंकरों को मूर्तियां विराजमान थीं । महाराजा
जैन तीर्थंकरों की पूजा करते थे। के कांगड़ा के दीवान भी जैन धर्म के उपासक थे। * किले के सिवा कांगड़ा नगर में भी तीन जैन मंदिर
मौजूद थे।
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(४७) * कांगड़ा के आस पास भी कई क्षेत्रों में जैनी बड़ी संख्या में
बसते थे। * संवत् १४८४ का यात्रा संघ कांगड़ा जिले के गोपाचलपुर, नन्दनवनपुर (नादौन)कोटिल ग्राम और कोठीपुर में भी गया
और वहाँ जैन मन्दिरों के दर्शन किये। * प्राचीन कांगड़ा के बाजार में इन्द्रवर्मा के हिन्दू मन्दिर में
आज भी दो जैन मतियां दीवारों में लगी हुई हैं जो नवमी शताब्दि की बनी हुई हैं। * कुछ वर्ष पहले कालीदेवी के मंदिर में यह शिलालेख मौजूद
था। "ॐ स्वस्ति श्री जिनाय नमः।" के प्राचीन कांगड़ा नगर में एक कुआं है जिसे "भावड़यां दा
खूह" अथवा 'जैनों का कुआं' कहा जाता है। के ज्वाला मुखी में अर्जुन-नांगा का स्थान है वहाँ दो जैन
के स्मारक बाज भी पड़े हुए हैं। * बैजनाथ पपरोला के प्राचीन मंदिर में आज भी जैन मत्तियों के खण्डहर पड़े दीखते हैं तथा जैन साध्वियों की मूर्तियों के चिन्ह खुद्दे साफ दिखाई देते हैं। * हमारे पावन तीर्थ का यशोगान करने वाले सन् १६३२ के
रचित कुछ स्तवन आज भी मौजूद हैं। * कांगड़ा जिले में और भी कई स्थानों पर जैन मतियों के
अस्तित्व के समाचार मिल रहे हैं । जिन को शोध-खोज की परम आवश्यकता है।
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संदेश और शुभ-कामनायें (१) जैन समाज के प्राणाधार श्रीमद् विजयवलभ सूरीश्वर जी
महाराज के शुभ-संदेश परम पूज्य गुरुदेव जैनाचार्य श्रीमद् विजयवल्लभ सूरीश्वर जी महाराज ही इस कांगड़ा तीर्थोद्धार के प्राणाधार थे। उन ही के आशीर्वाद तथा प्रेरणा से ही हम आज तक इस भारी जिम्मेदारी को सफलता पूर्वक निभाते चले आ रहे हैं। उन की ओर से आये अनेकों पत्र हमारे पास मौजूद हैं जिन के पढ़ने से उन की इस तीर्थ सम्बन्धी सद्भावनायें प्रकट हो रही हैं । उत्सव के उपलक्ष्य में हम कुछ वर्षों से उन के शुभ संदेश मंगवाते आ रहे है । गुरुदेव के हृदय में इस तोथे की उन्नति तथा उद्धार के लिये कितनी तड़प थो उन के भेजे पत्र स्वयं बोल रहे हैं । उन के दो पत्रों के पूर्ण भाव नीचे दिये जा रहे हैं जो गुरुदेव के मन के उद्गार तथा सद्भावनायें पेश कर रह हैं। इनमें से पहिला पत्र तारीख १४ मार्च १९५४ का लिखित है । गुरुदेव का यह पहिला पत्र उन के हस्ताक्षरों वाला अन्तिम पत्र है इसलिये कांगड़ा तीथे सम्बंधी विशेष ऐतिहासिक महत्त्व रखता है । सो नीचे दिया जाता है।
श्री महावीर जैन विद्यालय, ग्वालिया टैंक रोड।
बम्बई २६. सैक्रेटरी श्री कांगड़ा तीर्थ,
धर्मलाभ। उम्मीद है आठ दस भाई बम्बई से कांगड़ा को आवेंगे और उम्मीद है कि तुम्हारे काम में काफी इमदाद देवेंगे। जो जगह एक हजार
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(४६) रुपये में मिलने की आशा है उस के लिये एक हजार की रकम या कुछ थोड़ा सा ज्यादा गुजरांवाला वाले लाला मकनलाल सुपुत्र श्री रामशाह मन्हानी ने देनी स्वीकार कर ली है। इन का नाम आपने अपनी रिपोर्ट में दे देना । हमारी तरफ से श्रीसंघ को धर्मलाभ कह देना और तुम श्रीसंघ अपने काम में सफल होवें ऐसो देवगुरु से प्रार्थना है। लेखक-केवलकृष्ण
(हस्ताक्षर) (भाषा उर्दू)
वल्लभ सुरि का धर्म लाभ
दूसरा पत्र बम्बई से मुनि श्री विशुद्धविजय जी से उर्दू भाषा में लिखवाया गया है सो नीचे दिया जाता है।
बम्बई शहर।
१५-४-४५. मास्टर अमरनाथ व ला० शान्तिलाल
श्री कांगड़ा तीर्थयात्रा संघ होश्यारपुर । धर्मलाभ के साथ मालूम हो कि इस जगह सुखसाता है धर्मध्यान में उद्यम रखना, सब को धर्मलाभ कह देना। आगे कांगड़ा उत्सव के सब पत्र मिले और आल इण्डिया श्वेताम्बर कान्फ्रेंस के वाईस प्रैजीडेंट श्रीयुत मोहनलाल जी चौकसी बम्बई निवासी ने कांगड़ा के उत्सव तथा महासभा पंजाब के अधिवेशन व यात्रासंघ से बातचीत तथा पहाड़ों के खूबसूरत नजारों के हालात सुनाये। सुन कर बहुत खुशी हुई। और मोहनलाल भाई ने यह भी कहा कि वहाँ यात्रियों के ठहरने के लिये धर्मशाला की बड़ी जरूरत है। यहाँ के कुछ भाईयों से बातचीत को थो उन्होंने कहा कि जो भाई कांगड़ा तीर्थ कमेटी के कार्यकर्ता हैं वे भी यहाँ गुरु महाराज के पास आवें और हम को Shree Sudharmaswami Gyanbhandar-Umara, Surat www.umaragyanbhandar.com
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( ५० )
भी उस वक्त बुला लेवें गुरु महाराज की मौजूदगी में वे कांगड़ा के सब हालात पेश करें और वे क्या करना चाहते हैं और वहाँ की कमेटी के कौन कौन मैम्बर हैं यह सब हालात खुलासावार जाहिर करें। फिर हम यहाँ बम्बई के चीदा चीदा भाईयों को बुला कर सब हालात समझायेंगे । फिर उमीद है कि यहाँ से कुछ न कुछ इमदाद मिल जायेगी । आपके कार्य में सफलता होगी। कांगड़ा तीर्थ मशहूर हो जायेगा। फिर यात्रियों की अामदोरफत बहुत ज्यादा हो जायेगी फिर
आहिस्ता आहिस्ता सब कुछ बन जायेगा और यहाँ से कान्स भी कुछ प्रचार करेगी । यहाँ के लोगों को ख्याल तो है मगर एक दफा तुम लोग यहाँ बम्बई में आकर रूबरु में सब हालात जाहिर करो।
इस लिये तुम को लिखा जाता है कि इस खत के पहुंचने पर फौरन ही तुम लोग जो कांगड़ा तीर्थ कमेटी के कार्यकर्ता-कारकुन ही वे बम्बई पहुँच जावें । भाई मोहनलाल चौकसी ने यह भी कहा था कि "मैंने उन भाईयों को कहा था कि तुम बम्बई में आओ। श्री आचार्य भगवान की मौजूदगी में सब बातें जाहिर करो फिर उम्मीद है कि काम बन जावेगा"। इस लिये दोबारा लिखा जाता है कि इस खत के पहुँचते ही तुम लोग जो भी काम करने वाले होश्यार और सब हालात को समझाने वाले हैं वे सब भाई चन्द योम तक ज़रूर बम्बई पहुँच जावें ताकीद दर ताकीद है । सब संघ को श्री आचार्य भगवान् आदि मुनिमण्डल की तरफ से धर्मलाभ कह देवें । मुनि विशुद्धविजय की तरफ से धर्मलाभ । जवाब जल्द ।
अज़ आचार्य भगवान् श्रीमद् विजयवल्लभ सूरि जी महाराज श्री महावीर जैन विद्यालय, ग्वाल्यिा टेंक रोड, बम्बई २६ । .
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( ५१ )
निवेदन हमारे प्राणाधार गुरुदेव तो अपने अमर सन्देश दे कर चले गए। अब उनके चमन की रखवाली का काम उनकी सुयोग्य शिष्य परम्परा ही के सुपुर्द है । हमारे आदरणीय महात्मा जैनाचार्य श्रीमद् विजयसमुद्र सुरि जी महाराज, जैनाचार्य श्रीमद् विजयउमंग सूरि जी महाराज, आगम-दिवाकर मुनि श्री पुण्यविजय जी महाराज तथा जैनाचार्य श्रीमद् विजयपूर्णानन्द सूरि जी महाराज जैसे सुयोग्य और विद्वान् संत अपने गुरुदेव के चमन को हरा भरा रखने के उद्यम में कभी पीछे नहीं रहेंगे हमें ऐसी पूर्ण आशा है ।
पिछले वर्ष सन् १६५५ के वार्षिक उत्सव पर हम ने गुरुदेव के सच्चे सेवक शांतमति जैनाचार्य श्रीमद् विजयसमुद्र सूरि जी महाराज की सेवा में अपना शुभ सन्देश भेजने की विनती की थी जिस पर उन्होंने अपना आशीर्वाद दे कर हमें कृतार्थ किया था सो वह सन्देश नीचे दिया जाता है।
(२) सन्देश विजयानन्द सूरीशं, वल्लभं सद्गुरु तथा शिरसा वचसा वन्दे मनसा च मुदं तथा (१) श्री तीर्थपान्थरजसा विरजी भवन्ति, तीर्थेषु बंभमणतो न भवं भवन्ति तीर्थव्ययादिह नरास्थिरसंपदः स्यु,
पूज्या भवन्ति जगदिश मया चयन्तः । तीर्थ यात्रा की धूलि के स्पर्श से मानव कर्म रूपी धूल से रहित होता है । तीर्थों में परिभ्रमण से मनुष्य संसार के परिभ्रमण का नाश करता है । तीर्थों में धन व्यय करने से मनुष्य की सम्पत्ति स्थिर हो जाती है और तीर्थकर की पूजा करने से पूजक पूज्य बन जाता है । Shree Sudharmaswami Gyanbhandar-Umara, Surat www.umaragyanbhandar.com
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(५२) श्री श्वेताम्बर जैन कांगड़ा तीर्थ यात्रा संघ योग्य धर्म-लाभ के साथ विदित होवे कि आप ने इस शुभ प्रसंग पर सन्देश मंगवाया सो ठीक है।
विश्वपूज्य सुगृहीत नामधेय पांचालदेशोद्धारक न्यायाम्भोनिधि जैनाचार्य १००८ श्रीमद् विजयानन्द सूरीश्वर जी (प्रसिद्ध नाम
आत्माराम जी महाराज साहब) महाराज साहब के पट्टधर पूज्यपाद प्रातः स्मरणीय, स्वनाम धन्य, सुविहितशिरोमणि, अज्ञानतिमिरतरणी, भारत-दिवाकर, कलिकाल-कल्पतरु, पंजाबकेशरी, युगवीर, जैनाचार्य १००८ श्रीमद् विजयवल्लभ सूरीश्वर जी महाराज साहब जो प्रतिवर्ष
आप श्री संघ को सन्देश भेजा करते थे । उसी सन्देश पर मनन किया जाए और आचरण में लाया जाय तो आप सब का उद्धार हो सकता है । तथापि आप श्रीसंघ के पत्र को मान दे कर कुछ लिख रहा हूँ।
कांगड़ा तीर्थ बहुत प्राचीन है। प्राचीन तीर्थ का उद्धार करना यह अपना परम कर्तव्य है।
महापुरुष फरमाते हैं कि नूतन जिनालय के निर्माण की अपेक्षा प्राचीन जिनालय के, प्राचीन तीर्थ के उद्धार करने में आठ गुणा फल होता है।
__आज के युग को देखते हुए अपने को सम्पूर्ण संगठित होकर ऐसे परम पावन प्राचीन तीर्थ को रक्षा करनी चाहिए । अन्य कई तीर्थों को भाँति यह तीर्थ भी अपने हाथों से न चला जाए इस बात को ध्यान में रखते हुए प्रत्येक जैन का कर्तव्य है कि तन मन धन से सहयोग देकर इस पावन तीर्थ की रक्षा करें।
इस तीर्थ के उद्धार के लिए पूज्यपाद परम गुरुदेव आचार्य भगवन्त ने कई बार उपदेश दिया, कमेटी बनाई गई। गतवर्ष श्री Shree Sudharmaswami Gyanbhandar-Umara, Surat www.umaragyanbhandar.com
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आत्मानन्द जैन महासभा का अधिवेशन भी हुआ परन्तु अभी तक तीर्थ को अपने हस्तगत न कर पाए ।
मेरे सुनने में आया है कि सरकार अपने सेवा पूजा के अधिकार को भी लेना चाहती है यदि यह बात सत्य हो तो बहुत ही दुःख की बात है।
अपने पूजा सेवा भक्ति के अधिकार को कायम रखने के लिए जबरदस्त आन्दोलन करना चाहिये और कोई भी जैनी जाय तो उसको सेवा पूजा करने के लिए कोई रोक टोक न करे और की हुई आंगी वगैरह को तात्कालिक दूर कर देते हैं, ऐसा न होना चाहिये। अगर इस समय इतना भी प्रबन्ध हो सके तो अच्छा है।
सुज्ञेषु किं बहुना वहाँ पर आए हुए सब भाई बहनों को धमलाभ विक्रम संवत् २०११
समुद्रसूरि का धर्मलाभ वीर संवत २४८१
फाल्गुन शुदि तृतीया आत्म संवत् ५६
ता० २५. २. १६५५ वल्लभ संवत १.
बगवाड़ा जिला सूरत
(३) परमपूज्य गुरुदेव भगवान् श्रीमद् विजयवल्लम सूरीश्वर जी. महाराज के शिष्यरत्न गुरुभक्त स्वर्गीय जैनाचार्य विजयललित सूरि जी महाराज के प्रभाविक शिष्य उपाध्याय श्री पूर्णानन्दविजय जी महाराज (आचार्य श्री विजयपूर्णानन्द सूरि जी) में हमारी विनति को स्वीकार करते हुए श्री माटुंगा, बम्बई से ३-३-५५ को वार्षिक उत्सव पर अपना शुभ आशीर्वाद हमें भेजा था जिस में परम श्रद्धय गुरुवर्य श्रीमद् विजयवल्लभ सूरीश्वर जी महाराज के गुणानुवाद के बाद संस्कृत भाषा में सुन्दर कविता के रूप में तार्थ महिमा का गान Shree Sudharmaswami Gyanbhandar-Umara, Surat www.umaragyanbhandar.com
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( ५४ ) किया गया है जिसे इसी पुस्तक की स्तवनावलि में दे दिया गया है । जिसके बाद आप फरमाते हैं कि :
विशेष लिखने का यह है कि श्री कांगड़ा तीर्थ अतिप्राचीन है। बड़ा रमणीय स्थान है । गरमी के दिनों के लिये यह साक्षात् कैलाशस्थान है। इसके उदय के लिए अत्यन्त जोर से प्रचार करना आवश्यक है।
श्री गुरु भगवन्त जी का श्री तीर्थ कांगड़ा के विषय में अधूरा रहा हुआ कार्य पूर्ण करना अनिवार्य हमारा कर्तव्य है।
पंजाब केशरी आचार्य भगवन्त श्री विजयवल्लभ सूरीश्वर जी महाराज साहब के पट्ट प्रभाकर पट्टधर परम गुरुभक्त मरुधर देशोद्धारक आचाय श्री विजयललित सूरीश्वर जी महाराज साहब के प्रशिष्य-रत्न मुनि श्री प्रकाश विजय जी पंजाब में आये हुए हैं एवं कांगड़ा तीर्थ की यात्रा के लिए भी कांगड़ा तीर्थ में आवेंगे तो मुनि श्री प्रकाशविजय जा आदि को कांगड़ा तीर्थोद्धार के विषय में मैं सूचित करूगा जिस से वह लोग भी ध्यान देंगे।
कांगड़ा को उन्नति के लिए तो श्रो गरु महाराज का समस्त परिवार सब प्रकार से तैय्यार है। किसी भी प्रकार से अविचारणीय वस्तु है नहीं।
विशेष में आप कांगड़ा तीर्थ की सेवा करते हैं एवं भविष्य में भी करते रहेंगे। इस विषय में आप को अभिनन्दन दिया जाता है। खूब आनन्दपूर्वक एवं उत्साह पूर्वक कार्य करते रहें यही।
दः उपाध्याय पूर्णानन्द विजय का धर्मलाभ ।
(४) अखिल भारतीय श्वेताम्बर जैन समाज के प्रसिद्ध नेता गरुभक्त धर्मप्रेमी श्रीमान् माननीय सेठ फूलचन्दभाई श्यामजी
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( ५५ )
पिछले वर्ष सन् १६५५ के उत्सव पर पधारे और वहाँ रात के समय एक खुली सभा में इस महातोर्थ के बहुमान में जो शुभ सन्देश दिया वह सदा अमर रहेगा । आप ने फरमाया :
" मेरी हार्दिक भावना है कि श्री कांगड़ा तीर्थ पंजाब का शत्रु जय बन जाये । जिस से गुजरात तरफ के लोग इस महातीर्थ की यात्रा को आने आरम्भ हो जायें जिससे उधर के लोगों का पंजाब के लोगों से मेल-जोल बढ़े और आपसी प्रेम पैदा हो | मैं और मेरे साथी यथाशक्ति कांगड़ा तोर्थ की उन्नति के लिए तन मन और धन से सहयोग देने का तैय्यार हैं ।"
(५)
श्री श्रात्मानन्द जैन गुरुकुल गजरांवाला के भूतपूर्व गवर्नर धर्मप्रायण शान्तमूर्ति श्रीमान् बाबू कीर्तिप्रशाद जी जैन वकील बिनोलो जिला मेरठ अपनी सद्भावनायें तारीख ३ फरवरी १६५२ के पत्र में यूं प्रकट करते हैं :
"हृदय से चाहता हूँ कि कांगड़ा तीर्थ दिनोदिन उन्नति करे । अगर आप भाई वहाँ विद्याभवन खोलने का प्रयत्न करें तो बहुत ही अच्छा हो । अगर पंजाबी भाई चाहें तो वहाँ गुरुकुल आसानी से खोल सकते हैं। मैं समझता हूँ वहाँ का जलवायु अच्छा होगा । यात्रा उत्सव की पूर्ण सफलता चाहता हूँ । सब भाई बहिनों को जय जिनेश्वरदेव और सब मुनि महाराजों को वन्दना ।"
"
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(६)
साहित्य तथा इतिहास के इतिहास के परम विद्वान् माननीय डा० बनारसी दास जी जैन अप्रवाल एम० ए० पी० एच० डी
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अपने कृपा पत्रों में हमें निम्न सन्देश देते हैं :
- "श्री कांगड़ा तीर्थ यात्रा का हाल पढ़ कर प्रसन्नता हुई । घुटनों में दर्द रहने से मैं शामिल नहीं हो सकता । इस में कोई शंका नहीं कि जलसों ते भावना बहुत बढ़ती है परन्तु मैं इस कमी को जैन साहित्य और इतिहास के अध्ययन से पूरी कर लेता हूँ। मैं इस में बड़ी दिलचस्पी रखता हूँ । सन् १९४७ में बन्नू और कोहाट से हस्तलिखित पुस्तकें इघर लाई गई थीं परन्तु वहाँ पंजाब से बाहिर भेज दी गई। इसी प्रकार वैरोवाल के भण्डार में से भी ग्रन्थ आये और वह भी पंजाब से बाहिर चले गये । यहाँ इनका अध्ययन लाभ-प्रद होता। मतियों के लेख और मन्दिरों का इतिहास तैय्यार होना चाहिये । पंजाब ऐतिहासिक सामग्री से भरा पड़ा है। अब भी बहुत कुछ प्राप्त है जो कि धीरे धीरे ओझल हो रहा है और नष्ट हो रहा है।"
श्रीमान् माननीय ला० बाबूराम जी प्रधानं श्री आत्मानन्द जैन महासभा पंजाब, जीरा से १३ फरवरी १६५६ के पत्र में लिखते हैं।
"यह मालूम करके हार्दिक प्रसन्नता हुई कि आप ने श्री कांगड़ा तीर्थ का इतिहास लिखा है । यह अति आवश्यक कार्य था जिस के लिए आप ने परिश्रम किया है । मुझे आशा है कि आप को अवश्य सफलता प्राप्त होगी।
इस में किंचितमात्र सन्देह नहीं कि कांगड़ा की खुशनमा वादी मध्यकाल में जैन धर्म का केन्द्र थी और इस पुण्यभूमि के प्रसिद्ध जैन मन्दिरों की यात्रा के लिये दूर दूर के यात्रा संघ आया करते थे । डा० सीताराम जी जो १९३२ सन् में सैंट्रल म्यूजियम लाहौर के क्यूरेटर थे श्री आत्मानन्द जैन गुरुकुल पंजाब के वार्षिक उत्सव पर
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(५७ )
गुजरांवाला पधारे थे तब उन्हों ने श्री आत्मानन्द जैन महासभा पंजाब की कांगड़ा सब-कमेटी को बताया था कि कांगड़ा प्रांत में ऐतिहासिक जैन मन्दिर मौजूद थे। उनका कथन था कि आर्कियोलोजिकल डिपार्टमैंट की तरफ से जब भी कांगड़ा के आस पास खुदाई का काम होगा तब खण्डरात में दबी हुई बहुत सी जैन मूतियां निकलेंगी जो भारतवर्ष के इतिहास पर प्रकाश डालेंगी. । रिसर्च-स्कालरों का अपना ध्यान कांगड़ा प्रात की ऐतिहासिक खोज की तरफ देना चाहिये । जैन समाज का भी कर्तव्य है कि कांगड़ा तीर्थ की उन्नति के लिए यत्न करे।"
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तीर्थ-स्तवनावली (१) रचियता-संवत् १४८४ के यात्रा-संघ के नायक
उपाध्याय श्री जयसागर जी विज्ञप्ति त्रिवेणीः की परिशिष्ट संख्या (१) मुझ मन लागिय खंति जालन्धर देसह भणिय । तीर्थ वंदण रेसि नगरकोटि तउ प्रावियउ ॥११॥ बानगंगा पातालगंग व्याहनइ जसु तडिहिं । वणराई घण घाट वाट ति घाटिहिं आगलिया ॥२॥ तहि महिमा भण्डार पहिल उं पहिलइ जिणभवणिं । दीठउ संतिजिणिद नयण अमियरस पारणउं ॥३।। जिणहरि बीजइ रीजुमणि अधिकेर ऊपजए । जहि सोवनमय बिंब रूपचंद रायह तणउं ॥४|| जिणि दीठइ संतोसु मण आणदिहिं ऊससए । अंधारइ उद्योत जयउ सुजगगुरु वीरवरु ॥५॥ जइ त्रीजइ प्रासादि सरवरि राजमराल जिम । संभाविउ रिसहेसु चंपकि चंदनि थुति जलिहिं ॥६।। हिव चडियउ चमकंत अति ऊंचइ गढ़ि कांगड़ए । इहु जाणे मइ किद्ध सिद्धिसिला आरोहणउ ॥७॥ अलजउ अंगि न माइ माइ ताय घरु वीसरिय । सरिय सयल मह कज्ज तहिं रिसहेसर दसणिहि ।।८।। जो हीमालय हुँत राय सुसम्मिहिं. जाणियउ । नेमिसरि जयवंति कंगड़कोटिहि आणियउ ||६|| चन्द्रवंसि जे राय राणी जसु पयतलि लुलइ । अंबिकदेवि पसाइ तहिं मनवंछित फल मिलई ॥१०॥ Shree Sudharmaswami Gyanbhandar-Umara, Surat www.umaragyanbhandar.com
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( ५६ )
भास
कंचणमय कालसिहि सहिय ए च्यारइ प्रासाद । च्यारइ चिहुँ वरणिहिं नमिय च्यारइ हरई विषाद ॥ गोपाचलपुर सिरिमउड संतिनाह जगसामि । कामियफल कारणि रसिय लीणउ छउं तसु नामि ॥११॥ नंदवणिहिं नंदउ सुचिरु चरमजिणेसर चंद । जग चकोरु जमु दंसणिहिं पामइ परमाणंद ॥ पास पसंसउ कोटिलए गामिहिं महि अभिरामि । मह मन कोइलि जिम रमउ तस गुण अंबारामि ॥१२॥ हेमकुभ सिरिजिणभवणिः ए सवि थुणिया देव । देवालइ कोठिनयरि करउं वीरजिण सेव । दुक्खह दिन्नु जलंजलिय सुखह लधु पसारु.। तीरथ पंचइ जइ नमिय पामिय मोख दयार ॥१३॥ मंगल तीरथ पंथियह मंगल तीरथ पंथ. । जं सुखेहि किर मई कलिय मुकति-नारि-सीमंथ । नारि अच्छइ धरि धरि धणिय जणणी-सा-परुधन्न ।
जासु कुक्खि उत्पन्न नरु संचइ तीरथ पुन्नु ॥१४॥ इय जयमायर समरिय ताय सवालखपव्वय जिणराय । ता अम्हारिय फूगो आस हडं बोलउं जिणसासण दास ॥१५॥ इणि समरणि नासइ नरग जोग इणि समरणि लाभइ सरग भोग । इणि कारणि तुम्हि मो भविय आज इह पभणहु, निसुणहु सरई काजा ॥ इय नगरकोट पमुक्ख ठाणिहिं जे य जिण मई वंदिया । ते वीरलउंकड देवि जालामुखिय मन्नइ वंदिया ॥ अन्नेवि जे केवि सम्गि महियलि नागलोइहि संठिया । कर जोड़ि ते सवि अज्ज वंदउं फुरउ रिद्धि अचिंतिया ॥१६॥ ।
॥ इति श्री नगरकोट्ट-महातीर्थ चैत्यपरिपाटी ॥
॥ कृतिरियं श्री जयसागरोपाध्ययानाम् ॥ Shree Sudharmaswami Gyanbhandar-Umara, Surat www.umaragyanbhandar.com
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(६०)
(२) रचयिता-पूज्यपाद श्रीमद् विनयवल्लभ सूरीश्वर जी महाराज
__चाल :-(ऋषभदेव विमलगिरि मण्डन) कांगड़ा तीर्थपति प्रभु प्यारा, ऋषभजिनंद जुहारा रे । मन वच काया तीन योग से, सेवा करू निरधारा रे । कां० अंक। मानू उसको शुभ मन प्रभु जी, जिसमें ध्यान तुम्हारा रे। वचन पवित्तर उसको मानू, प्रभु का नाम उच्चारा रे । का० ॥१|| काया वह सुखदायी जानू, पूजन सेवन सारा रे। धर्मकृत्य में काम जो आवे, बाकी पुदगल भारा रे। कां० ।।२।। आदि नरेश्वर आदि जिनेश्वर, आदि ऋषीश्वर धारा रे । आदिनाथ प्रभु श्रादि योगीश्वर, आदि तीरथ करतारा रे। कां ॥३॥ तू ब्रह्मा हरिहर शिव शंकर, तू पुरुपोत्तम प्यारा रे। रामनाम सुखधाम जिनेश्वर, आवागमन निवारा रे । कां ॥४॥ नमन करू त्रिभुवन दुखहर्ता, तू त्रिभुवन शृङ्गारा रे। नमन करू त्रिजग परमेश्वर, भवोदधि पार उतारा रे । कां ॥१॥ कल्पतरु सम वांछित, पूरण. चूरण करम पहारा रे। रोगसोग दुख दोहग नासे, जिम तरणी अंधकारा रे । कां० ॥६॥ सुशर्मा नप ने बनवाया, जिन मन्दिर सुखकारा रे। नेमिनाथ स्वामि के होते, तीरथ तारणहारा रे । कां ॥७॥ दिव्य प्रभाव अतिशय वर्णन, तीरथ का नहीं पारा रे। महिमा अब भी अद्भुत तीरथ, गुप्तपने चमकारा रे । कां०८। विज्ञप्ति त्रिवेणि पढ़कर, जान्या यह अधिकारा रे। होश्यारपुरा से दरस को, आया संघ उदारा रे । कां ॥६॥ साधु श्रावक और श्राविका, तीनों संघ मंझारा रे। संघपति हीराचंद भाभू, आनंद मंगलकारा रे। कां० ॥१०॥ Shree Sudharmaswami Gyanbhandar-Umara, Surat www.umaragyanbhandar.com
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( ६१ )
सुमतिविजय जी वल्लभ, तपसी, विद्या साथ विचारा रे । नाम उपेन्द्रविजय षट्साधु, षटकाया रखवारा रे | कां० ||११|| गगन वसु गुह इन्दु विक्रम, माघ सुदि रविवारा रे । पंचमी मिल सबकीनी प्रभु की, यात्रा जयजयकारा रे । कां० ॥ १२ ॥ तपगच्छ नायक विजयानन्दसूरि, आतमराम श्रधारा रे । आतम लक्ष्मी संपद पाई, वल्लभ हर्ष अपारा रे | कां० ||१३||
(३) रचयिता - उपाध्याय श्री पूर्णानन्दविजय जी महाराज पुण्यं प्राचीनतीर्थं विविधसुखकरं कांगडाख्यं नितान्तम् कैलासाद े: समीपे वृजिनचयहरादादिनाथाद्विराजत् । अब्देऽस्मिं षोडशाग्रे खगगनलसिते वैक्रमे वैभवाऽभे प्रासोच्छलाध्यश्चभूमा सुरपुर तुलितस्स्वेष्ट दैरिन्द्रमुख्यैः ॥१॥ तीऽर्थेस्मिं कांगडाख्ये जनसुकृवशाज्जैनधर्मावलम्बी सङ्घो वासं चकार प्रभुपदकृपया चार्ध साहस्रसंख्यः । विंशेक्रूरे शताब्देऽवनिविचलनतश्चास्तभावं प्रयातः . ह्यादीशस्य स्वरूपं पवनसुत इति ख्याति तीर्थावशेषम् ||२|| संवतवाभूमौ दिविकृतकसनो वल्लभः सूरिवर्यः तीर्थोद्धारव्रती वै तनुहृदयवचस्संप्रयासैर्बभूव । तच्छिष्यः पट्टभानुर्विजयललितसूरिः प्रभूतं प्रचारं कृत्वा श्रो होशियारे प्रथितजनमतं पत्तनेऽतिष्ठिपद्यः ||३|| अष्टापदस्य प्रतिमास्वरूपं
श्रीकांगडातीर्थमिदं पुनातम् ।
प्राप्नोतु चाष्टापदतां पुराणी विधोत्तमानं हिमपर्वता ॥ ॥
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(६२) अन्येनाष्टापदेन क्षितितलविदितं कांगडातीर्थराजम सधोमुक्तेश्च पन्थारसुमहित विजयानन्दसूरेः कृपातः । सिद्धीनां प्रोद्वमो वै जिनपदविलसन्वल्लभप्रेरणात्तो भूयात्साध्वीभिरेतत्क्षपणकशतकै श्रावकैनित्यसेव्यम् ।।५।। ह्रींकारविजयनायं पूर्णानन्दोयतीश्वरः
सङ्घस्याभ्युदयाननाना, याचतेजिनदेवतः ।।६।। (४) रचयिता-पूज्यनीय उस्ताद बृजलाल जैन होश्यारपुर (बी०एल)
__ तज़: - सिद्धगिरी तीरथ पर जाना जी
कांगड़े तीरथ पर जाना जी......जाना जी सुख पाना जी १. ऐ तीरथ प्राचीन कहाये, इसदी महिमा कही न जाये
सतगुर दा फरमाना जी......कांगड़े तीरथ पर... २. उच्चे किले विच है इक मन्दिर, जिसमें प्रतिमा प्रभु. की सुन्दर
आदिनाथ गुण गाना जी......कांगड़े ३. राजा सुशर्मा ने बनवाया, दुनिया दे विच पुन्न कमाया
लिखया लेख पुराना जी......कांगड़े ४. संवत् चौदा सौ चौरासी, आया संघ दर्श अमिलापी
सिंध से हो के रवाना जी......कांगड़े ५. उपाध्याय श्री जयसागर जी, छत्र-छाया में आया उनकी
यात्रा लाभ उठाना जी......कांगड़े ६. नरेन्द्रचंद्र थे राजा दानी, नगरकोट जिनकी राजधानी
जिनवर का दीवाना जी......कांगड़े ७. राजाजी ने अर्ज गुज़ारी, धन्यभाग आये नगरी हमारी
__ सत् उपदेश सुनाना जी......कांगड़े
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___
८. सत्गुर ने उपदेश सुनाया, सुनके राजा अति हर्षाया
जयजयकार बुलाना जी......कांगड़े . बी० एल० शुद्ध मन से जो ध्याये, भवसागर से वह तर जाये
मुक्ति का फल पाना जी......कांगड़े
तर्ज-सिद्धाचल के वासी तुम को लाखों प्रणाम आदीश्वर भगवान ! तुम को लाखों प्रणाम, तुमको कोटि प्रणाम
___कोट कांगड़ा वाले तुम को लाखों प्रणाम ........... १. नाभी के तुम नन्द प्यारे, मोरांदेवी माता के दुलारे
तुम हो दया निधान, तुम को लाखों प्रणाम..... २. कोट कांगड़े दे वित्र मन्दिर, जिस विच प्रतिमा तेरी सुन्दर
महिमा बड़ी महान......तुम को......... ३. दूर दूर से यात्री आवन, रल मिल गीत तेरे ही गावन
जय जयकार बुलान.......तुम को......... ४. भक्तां दी रख लाज प्रभु जो, पूरण कर दे काज प्रनु जो
मंग्गे जो वरदान......तुम को......... ५. जाप तेरा जो निशदिन करदे, भवसागर से पार उतरदे
मुक्ति दा फल पान, तुम का........ ६. दर तेरे जो आया सवाली, बी० एल कदे न जाए खाली
झोलियां भरदे जान, तुम को........
(३) नैय्या मेरी लगा दे किनारे प्रभु श्राया, आया मैं तेरे द्वारे प्रभु
.
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(६४)
१. तेरा है नाम दुनियां में तारनतरन,
काटो मेरे प्रभु जी भी जन्मोमरण
देखा मुक्ति दे जा मैं नज़ारे प्रभु..... आया २. श्रआया तूफान पैंदे ने ओले प्रभु।
नैय्या मेरो ए डगमग डोले प्रभु
रुडदी जांदी पई बे सहारे प्रभु......पाया ३. नैय्या मेरी अटक कर भंवर में पड़ी
सब को छोड़ प्रभु आस तेरी धरी
और तेरे विना कौन तारे प्रभु..... अाया ४. तेरे दर्शन का अभिलापी आया हूँ मैं
ध्यान तेरे ही चरणों में लाया है मैं
___मारांदेवी माँ के दुलारे प्रभु......ाया ५. मेरे देवाधिदेव दया कीजिये
अपने चरणों में मुझको जगह दीजिये ___यही बी० एल है अर्ज गज़ारे प्रभु..... पाया
(४) आये तेरे द्वार प्रभु जी आये
हम आये तेरे द्वार प्रभु जी आये १. आदीश्वर भगवान हमारे, मोरांदेवी माता के दुलारे
तुम हो तारणहार......... २. शुद्ध मन से जो तुम्हें ध्यावे, भवसागर से वह तर जावे।
होवे बेड़ा पार.........प्रभु जी आये ३. दूर दूर से यात्री आवन, रल मिल गीत तेरे ही गावन
बोलन जय जयकार........ प्रभु जी आये
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( ६५ )
४. देवाधि तुम देव जिनेश्वर, पार- ब्रह्म तुम ही परमेश्वर तुम हो दया भण्डार......प्रभु जी आये ५. बी० एल बन गया चरण पुजारी, जिंद तेरे चरणां तों वारी दर्श दयो इक वार . (५) रचियता - शान्तिलाल जैन 'नाहर' होश्यारपुर
......
( १ )
आदीश्वर भगवान हमारे सभी पुकारें जय हो ! हाथ जोड़कर खड़े हैं सारे, सब उच्चारें जय हो ! १. मीठी वानी से बनगंगा के मधुर गान है गावे
घूम घूम और भूम भूम कर सुन्दर रास रचावे गुण गाथा को सुन कर तेरी, चरणी सीस झुकावे
जीवन नैय्या के रखवारे, जय जयकारे जय हो आदीश्वर भगवान हमारे, सभी पुकारें जय हो
२. वेदों ने भी मुक्त कंठ से आप के यश को गाया जैनधर्म ने जिस ज्योति से अपना वैभव पाया भारत की संस्कृति का जो था जन्मदाता कहलाया
• प्रभु जो
ऋषि मुनि गुणगाते हारे, धर्म दुलारे जय हो श्रदीश्वर भगवान् हमारे, सभी पुकारें जय हो
३. ब्राह्मण, क्षत्रि, वैश्य, शूद्र हैं एक पिता की माया जैन, सनातन, सिक्ख, आर्य हैं एक वृक्ष की छाया. नदियां सारी जहाँ मिलें, वह सागर तू कहलाया
भारत जननी खड़ी पुकारे, मेरे सहारे जय हो आदीश्वर भगवान हमारे, सभी पुकारें जय हो
+ बनगंगा नदी जो किले के साथ बहती है ।
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४.
(६६ ) त्याग तपस्या के बल से तू ब्रह्म रूप दिखलाया सत्य अहिंसा की ज्योति से भारत को चमकाया शिल्पकला और तत्त्वज्ञान को तू ने ही सिखलाया
'नाहर' के सब दुखड़े टारे मैं बलिहारे जय हो आदीश्वर भगवान हमारे, सभी पुकारें जय हो
श्री कांगड़ा-तीर्थ ध्वजारोहण आज कांगड़ा की चोटी पर ध्वज अपना लहराना है
यह तीरथ है याद पुरानी, प्रेम के फूल चढ़ाना है १. युवको जागो उठो बढ़ो और शूरवीर बन दिखला दो बहिनों तुम वीरांगना बन कर जाति को फिर चमका दो
तुम्हारे ही उत्साह से हम ने फिर गौरव पाना है
आज कांगड़ा की चोटी पर ध्वज अपना लहराना है २. दादा आदिनाथ हमारे तीनलोक के स्वामो हैं अहो! काल के हेरफेर से कुटिया के विश्रामो हैं
इनकी शोभा में हम ने इक सुन्दर महल सजाना है
आज कांगड़ा की चीटी पर ध्वज अपना लहराना है ३. माता अम्बे ! कहाँ छिपी हो, वैभव अपना दिखला दो सत्य अहिंसा की ज्योति को फिर से जग में फैला दो
दादा नेमिनाथ की हम ने जयजयकार बुलाना है
आज कांगड़ा की चोटी पर ध्वज अपना लहराना है ४. वर देवें चौबीस जिनेश्वर, पार्श्वनाथ की दृष्टि हो महावीर के पुण्य तेज की तीन लोक में वृष्टि हो
विजयानन्द गुरु वल्लभ की जय का नाद बजाना है
आज कांगड़ा की चोटी पर ध्वज अपना लहराना है Shree Sudharmaswami Gyanbhandar-Umara, Surat www.umaragyanbhandar.com
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( ६७ )
५. माननीय सुशर्मा गजा, आज तेरा यश गाते हैं श्रीमान् नरेन्द्रचन्द्र और रूपचन्द्र मन भाते हैं 'नाहर' अपनी पुण्य भूमि को हम ने शीश झुकाना है आज कांगड़ा की चोटी पर ध्वज अपना लहराना है
तर्ज (जागृति ) – आओ बच्चो तुम्हें दिखायें......
........
बहनो भाइयो तुम्हें सुनाएँ कथा एस अस्थान की ॥ इस मिट्टी से तिलक करो यह धरती है भगवान की । आदीश्वर भगवान
२. पराक्रमी राजा सुशरमचन्द्र ने यह मन्दिर बनवाया था । दूर दूर से संघ प्रभु के दर्शन करने आया था । यहाँ की जनता ने मिल करके जैनधर्म अपनाया था । सुन लो यह सब बातें अपने गौरव और अभिमान की । .......
२. स्वर्ग समान यह सुन्दर नदिया प्रभु चरणों में बहती थी ।
बल स्वाती इठलाती आवे सब के मन को भाती थी । ती निज सखियों को अपने साथ मिलाती थी।
ती
प्रभु
व्याकुल रहती थी,
गावे भगवान की .......
के चरणों में आने को हरदम कल कल करती शोर मचाती स्तुति ३. पर्वत की चोटी पर मंदिर सब के मन को भाया है, नीला अम्बर इस मंदिर पर करता अपनी छाया है, बादल के संग आँखमचोली चन्दा खेलने आया है तारों के संघ चांदनी ने इस मंदिर को दीपाया है,
देवी देवता फुल बरसाते प्रतिमा पर भगवान की .......
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(६८) ४. यह कांगड़ा तीर्थ भाइयो उत्तम और निराला है,
आंधी वर्षा और भूचालों ने मंदिर को पाला है, प्रकाशविजय, शील श्री ने मिल कर संघ निकाला है, मृगा श्री की अमृत रूपी वाणी किया उजाला है, विमल कहे अब बोलो मिल कर जय आदी भगवान की......
(विमल जैन)
बटाला
-
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उपसंहार
प्यारे बन्धुओ ! आपने अपने प्राचीन तीर्थ श्री कांगड़ा जी के गौरवमय इतिहास को पढ़ा । मुझे विश्वास है कि इसे पढ़ कर आप के हृदय - सागर में प्रेम की तरंगें उठने लगी होंगी और इसके पुनरुद्धार के लिये आपकी सद्भावनाओं को अवश्य प्रेरणा मिली होगी ।
इस तीर्थ का सम्बन्ध किसी एक सोसायटी अथवा नगर से नहीं है । इसका सम्बंध तो सारी जैन समाज से है । इस लिये सार समाज का विशेषतः पंजाब के जैनों का यह परम कर्तव्य हो जाता है कि इसके उदय तथा उन्नति के लिये पूर्ण सहयोग दें ।
स्वर्गीय डा० बनारसीदास जी जैन एम० ए० पी० एच० डी० अपने पत्रों द्वारा समाज को जो चेतावनी दे गये हैं उस पर अवश्य ध्यान देना चाहिये । उनका फरमान है कि जैन समाज अपनी ऐतिहासिक सामग्री यथा प्राचीन मन्दिर, मूर्त्तियाँ और प्रन्थादि की सुरक्षा पर उचित दृष्टि न देकर महान् भूल कर रही है । उन्होंने कहा है कि पंजाब ऐतिहासिक सामग्री से अब भी भरा पड़ा है इसकी सुरक्षा करना परम आवश्यक है । इस दृष्टि से कांगड़ा तीर्थ विशेष महत्व रखता है । अतः इस ओर सारे समाज को अवश्य दृष्टि देनी चाहिये ।
६६
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( ७० )
जैसा कि हमारे माननीय आचार्य श्री विजयसमुद्र सूरि जी महाराज ने अपने पत्र में फरमाया है कि नवीन मन्दिर के निर्माण की अपेक्षा प्राचीन मन्दिर के उद्धार करने में आठ गुणा फल होता है अतः भाग्यवान् इस पावन तीर्थ की सेवा करके पुण्य के भागी बनें।
आप को यह जान कर प्रसन्नता होगी कि हमारी समाज के सर्वानुप्रिय नेतागण श्रीमान् सीनियर सबजज बाबू ज्ञानदास जी साहिब, सेठ श्री कीकाभाई रमणलाल जी पारिख देहली और प्रो० बदरीदास जी जैन देहली जैसे महानुभाव तोर्थ के उद्धार में विशेष दिलचस्पी ले रहे हैं और जैन समाज के सुप्रसिद्ध सेठ साहिब महामान्य श्री कस्तूरभाई लालभाई जो अहमदाबाद, श्रीयुत सेठ फूलचन्द शामजी भाई बम्बई तथा श्रीमान् सेठ मोहनलाल भाई चौकसी आदि अपना पूर्ण सहयोग देने का विश्वास दिला चुके हैं जिससे हमें विश्वास होना चाहिये कि हम अपने मनोरथ में अवश्य सफल होकर रहेंगे तो भी सभी भाइयों का कर्तव्य है कि वे भी यथायोग्य तीर्थ सेवा करने में अपना हाथ बटाते रहें ।
तीर्थोद्धार के विषय में प्रथम तो हमें पूजा सेवा करने की स्वतन्त्रता नहीं है जिसका प्रबंध करना परम आवश्यक है। इसके साथ ही साय प्रभु प्रतिमा को यथायोग्य सुन्दर सिंहासन पर विराजमान करना है जिसके लिये हमारे मान्य नेतागण पुरुषार्थ कर रहे हैं।
तीर्थ की देख-रेख और पूजा-सेवा के लिये प्रबंधकों और यात्री लोगों के ठहरने के लिये एक धर्मशाला भी चाहिये जिसके लिये हमारे धर्मप्रेमी ला० मकनलाल प्यारेलाल जी गुजरांवाला वालों ने कांगड़ा में किले के समीप ही भूमि का एक विशाल टुकड़ा खरीद कर तीर्थोन्नति
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( ७१ )
निमित्त समर्पण कर दिया है अतः वहां धर्मशाला खड़ी करने में हमें सुविधा हो गई है ।
पूर्व समय में कांगडा में सैंकड़ों जैन बसते थे परन्तु अब वहाँ एक भी जैन घराना नहीं है इसलिए यदि वहाँ ऐसे साधन जुटाए जायें जिस से अधिक जैन वहाँ बस सकें तो बहुत अच्छा हो। इस से सेवा पूजा का भी विशेष आनन्द रहेगा और तीर्थ की सुरक्षा में भी सुविधा रहेगी।
जैसे वरकारणा जी तीर्थ की सुरक्षा के लिए विद्यालय की स्थापना की गई उसी भाँति स्वर्गीय बाबू कीर्तिप्रसाद जी जैन वकील बिनोल वालों ने अपने एक पत्र द्वारा यह शुभ विचार प्रकट किया था कि वहाँ एक विद्यालय अथवा गुरुकुल का स्थापित किया जाना लाभप्रद रहेगा । अतः समाजसेवी विद्वान् महानुभावों को इस विचार को भी ध्यान में रखना चाहिए ।
इसी प्रकार कांगड़े का यह क्षेत्र मधुर स्वास्थ्यप्रद जल-वायु का सुन्दर स्थान है अतः समाज की ओर से यदि वहाँ एक सुन्दर सैनीटोरीयम अथवा हस्पताल खोल दिया जावे तो अत्यन्त लाभकारी सिद्ध हो सकता है जिस से जहाँ हम समाज सेवा का सुअवसर प्राप्त कर सकेंगे वहाँ तीर्थ की उन्नति में भी अच्छा सहयोग प्राप्त हो सकेगा ।
आत्मचिन्तन करने वाले महानुभावों को पर्वतीय क्षेत्र अति लाभकारी सिद्ध होते हैं क्योंकि एक तो वहाँ का वायुमण्डल शुद्ध श्रीर शान्त होता है दूसरे एकान्त स्थान सुविधा पूर्वक मिल जाने से मन को एकाग्र करने में सहायता मिलती है । जैसे श्राबूमाउन्ट वाले महात्मा श्रद्धेय गुरुदेव परम - योगीराज श्री विजयशान्ति सूरीश्वर जी
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(७२)
महाराज आबू पहाड़ की शान्त गुफाओं में रह कर बिशेष आत्मिकअानन्द का अनुभव करते थे । इसी प्रकार कांगड़ा का यह रमणीय क्षेत्र भी अपने शान्त वातावरण से अपने प्रेमियों को मुग्ध कर सकता है । वहाँ पर स्थापित एक सुन्दर श्राश्रम जहाँ अपने भावुकों की इस मनोकामना को पूरी कर सकेगा वहाँ प्रभु पूजा और तीर्थ सेवा के सुअवसर को भी जुटा सकेगा।
विशेष कहने का अभिप्राय यही है कि वहाँ किसी भी उचित साधन से कुछ जैनों को अवश्य बसाना होगा तभी इस महातीर्थ की देख-रेख और उन्नति करने में सहायता मिल सकेगी।
भद्रमस्तु जिनशासनाय । स्वस्ति श्री सङ्घाय । आयुष्यमस्तु गुणगृह्य भ्यः । स्माधिरस्तु स्वयूथ्यानामिति ॥
ॐ शान्ति शान्ति शान्ति
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