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(२) रचयिता-पूज्यपाद श्रीमद् विनयवल्लभ सूरीश्वर जी महाराज
__चाल :-(ऋषभदेव विमलगिरि मण्डन) कांगड़ा तीर्थपति प्रभु प्यारा, ऋषभजिनंद जुहारा रे । मन वच काया तीन योग से, सेवा करू निरधारा रे । कां० अंक। मानू उसको शुभ मन प्रभु जी, जिसमें ध्यान तुम्हारा रे। वचन पवित्तर उसको मानू, प्रभु का नाम उच्चारा रे । का० ॥१|| काया वह सुखदायी जानू, पूजन सेवन सारा रे। धर्मकृत्य में काम जो आवे, बाकी पुदगल भारा रे। कां० ।।२।। आदि नरेश्वर आदि जिनेश्वर, आदि ऋषीश्वर धारा रे । आदिनाथ प्रभु श्रादि योगीश्वर, आदि तीरथ करतारा रे। कां ॥३॥ तू ब्रह्मा हरिहर शिव शंकर, तू पुरुपोत्तम प्यारा रे। रामनाम सुखधाम जिनेश्वर, आवागमन निवारा रे । कां ॥४॥ नमन करू त्रिभुवन दुखहर्ता, तू त्रिभुवन शृङ्गारा रे। नमन करू त्रिजग परमेश्वर, भवोदधि पार उतारा रे । कां ॥१॥ कल्पतरु सम वांछित, पूरण. चूरण करम पहारा रे। रोगसोग दुख दोहग नासे, जिम तरणी अंधकारा रे । कां० ॥६॥ सुशर्मा नप ने बनवाया, जिन मन्दिर सुखकारा रे। नेमिनाथ स्वामि के होते, तीरथ तारणहारा रे । कां ॥७॥ दिव्य प्रभाव अतिशय वर्णन, तीरथ का नहीं पारा रे। महिमा अब भी अद्भुत तीरथ, गुप्तपने चमकारा रे । कां०८। विज्ञप्ति त्रिवेणि पढ़कर, जान्या यह अधिकारा रे। होश्यारपुरा से दरस को, आया संघ उदारा रे । कां ॥६॥ साधु श्रावक और श्राविका, तीनों संघ मंझारा रे। संघपति हीराचंद भाभू, आनंद मंगलकारा रे। कां० ॥१०॥ Shree Sudharmaswami Gyanbhandar-Umara, Surat www.umaragyanbhandar.com