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मन्दिरों में महा-पूजा रचाई गई। मन्दिरों को गर्भागार से लेकर ध्वजदण्ड तक बहुमूल्य ध्वजा पताकाओं से खूब सजाया गया। नाना प्रकार के फल-फूल और नैवेद्य आदि पदार्थों के ढेर के ढेर भगवान् के सम्मुख भेंट किये गये। जगह जगह बाजे बजने लगे, नृत्य होने लगे और स्त्रियां मंगल गोत गाने लगीं संघपति ने निर्धन धनी सभी लोगों को प्रीति भोजन कराया। यह दिन भी सानन्द व्यतीत हुआ।
अष्टमी के दिन शान्तिनाथ प्रभु के मन्दिर में बड़े आनन्द और उत्साह से नन्दी की रचना की गई और मेघराजगणि, सत्यरुचिगणि, मतिशीलगणि, हेमकुंजर मुनि और कुलकेशर मुनि को उपाध्याय जी ने-'पंचमङ्गलमहाश्रुतस्कन्ध' की अनुज्ञा दी । इसी तरह बड़े आनन्द पूर्वक संघ दस दिनों तक आत्मिक आनन्द लेता रहा और प्रभु के पूजन और स्तुति द्वारा अपने जीवन को सफल बनाता रहा । आखिर ११वें दिन सकल संघ ने इकट्ठे होकर सभी मन्दिरों में जाकर भक्ति भाव से सानन्द प्रार्थना की और वापिस चलने की तैय्यारी बांधी । वहाँ के जीदो, वीरो आदि प्रमुख श्रावकों ने उपाध्याय जी को चौमासा के लिये ठहरने की विनति की जिसे वह स्वीकार न कर सके और संघ वापिस रवाना हुआ।
वापिस चलते चलते संघ ने रास्ते में अनेक गाँव और नदी नाले पार किये और गोपाचल पुर में पहुँचा जहाँ पर सं० घिरिराज का बनाया हुआ श्री शान्तिनाथ भगवान का बड़ा विशाल और सुन्दर मन्दिर विराजमान था वहाँ प्रभु शान्तिनाथ के दर्शन पूजन का पाँच दिन तक आनन्द उठाया। वहाँ से चल कर विपाशा (ब्यास) नदी के तट पर बसे हुए नन्दवन पुर (नादौन) में पहुँचा और वहाँ पर भगवान महावीर के सुन्दर मन्दिर के दर्शन किये । वहाँ से चल Shree Sudharmaswami Gyanbhandar-Umara, Surat www.umaragyanbhandar.com