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सर्वदर्शनसंग्रहे
इसके अतिरिक्त आपने ( सांख्य- दार्शनिकों ने ) जो कहा है कि पुरुष के काम के लिए प्रधान की प्रवृत्ति होती है, उसका विश्लेषण ( स्पष्टीकरण ) कीजिये | क्या प्रधान केवल भोग के लिए प्रवृत्त होता है या केवल मोक्ष के लिए या दोनों कामों के लिए ?
पहला विकल्प ठीक नहीं माना जा सकता, क्योंकि जो पुरुष अतिशय ' ( सुखप्राप्ति, दुःखनिरोध आदि के अतिशय ) से रहित है तथा जो कूटस्थ ( निर्विकार) एवं नित्य भी है उसका तात्त्विक भोग ( प्रकृति के द्वारा परिणत तत्त्वों का भोग ) असम्भव है । दूसरे, ऐसा होने से पुरुष को मोक्ष प्राप्ति का कभी अवसर ही नहीं मिलेगा । प्रधान जिस काम के लिए प्रवृत्त हुआ है वही काम तो वह करेगा न ? यदि प्रधान [ पुरुष के ] भोग के लिए प्रवृत्त हुआ है तो वही विहित होगा, मोक्ष नहीं [ क्योंकि पुरुष के मोक्ष के लिए तो प्रधान प्रवृत्त हुआ ही नहीं ] ।
नापि द्वितीयः । चिद्धातोनित्यशुद्धबुद्धमुक्तस्वभावतया कर्मानुभववासनानामसम्भवेन प्रधानप्रवृत्तेः प्रागपि मुक्ततया तदर्थं प्रवृत्त्यनुपपत्तेः । शब्दाद्युपभोगार्थमप्रवृत्तत्वेन प्रधानस्य तदजनकत्वप्रसङ्गाच्च । नापि तृतीयः । प्रागुक्तदूषणलङ्घनालङ्घितत्वात् । प्रवृत्तिस्वभावायाः प्रकृते रौदासोन्यायोगाच्च ।
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दूसरा विकल्प भी ठीक नहीं है क्योंकि चेतन ( पुरुष ) का स्वभाव है नित्य रूप से शुद्ध, बुद्ध (जागृत) और 'मुक्त' रहना । कर्मों के अनुभव को छाप ( वासना ) उस पर नहीं पड़ सकती । वह प्रधान की प्रवृत्ति के पहले भी मुक्त ही है अतः [ पुरुष के मोक्ष के लिए ] प्रधान का प्रवृत्त होना असिद्ध है । [ पुरुष विशुद्ध है अतः कर्यानुभव को वासनायें उस पर नहीं पड़ सकतों । अनादि वासनाओं का आधार प्रकृति है । मुक्ति ( स्वरूप में अवस्थिति ) तो पुरुष को पहले से ही प्राप्त अतः फिर मुक्ति के लिए प्रकृति क्यों प्रत्यत्न करेगी ? इसके अतिरिक्त [ जब पुरुष के मोक्ष के लिए ही प्रकृति प्रवृत्त होगी तब तो ] शब्दादि के उपभोग के लिए उसकी प्रवृत्ति नहीं होगी अतः प्रधान को शब्दादि का उत्पादक भी नहीं माना जा सकता ।
तीसरा विकल्प भी ठीक नहीं है क्योंकि पूर्वोक्त दोषों की परिधि से पार हो ही नहीं सकते । [ यह प्रकृति की प्रवृत्ति पुरुष के भोग और मोक्ष दोनों के लिए है तो भोग और मोक्ष दोनों में अलग-अलग लगाये गये दोष इस विकल्प में भी लग जायेंगे । पुरुष कूटस्थ, नित्य तथा अतिशय - रहित है - वह तत्त्वों का भोग नहीं कर सकता । दूसरे, पुरुष स्वतः मुक्त है अतः प्रधान की प्रवृत्ति मोक्ष के लिए भी नहीं हो सकती । जब दोनों कामों के लिए प्रकृति की प्रवृत्ति का पृथक्-पृथक् खण्डन हो जाता है तब दोनों कामों के लिए एक साथ भी प्रकृति की प्रवृत्ति नहीं हो सकेगी। ] इसके अतिरिक्त यह भी बात है कि प्रकृति को १. अतिशय = Excellences, विशेषतायें,
सद्गुण ।