Book Title: Dwatrinshada Dwatrinshika Prakran Part 7
Author(s): Yashovijay Upadhyay, Yashovijay of Jayaghoshsuri
Publisher: Andheri Jain Sangh

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Page 23
________________ 22 .....२००५ .............१९८६ |जयतविनय माता3 .. ................... • विषयमाहा . द्वात्रिंशिका भक्ति-विनयशालिनो मोक्षविद्यासिद्धिः .............. १९८४ | व्यवहारस्यापि बलाधिकता .... જ્ઞાન માટે શિથિલાચારીનો પણ વિનય કર્તવ્ય. ૧૯૮૪ | ઉગ્રવિહારી વિનય વિના મોક્ષમાર્ગનાશક ..... ૨૦૦૫ प्रकटसेविनोऽपि ज्ञानार्थं वन्दनीयता ..............१९८५ | विनयस्य चत्वारि कारणानि ........................ २००६ ज्ञानस्य वन्द्यत्वे ज्ञानिनोऽपि वन्द्यता थित विनय मोक्षाय ....... २००६ अग्रहिलग्रहिलनृपन्यायोपदर्शनम् .....................१९८७ શ્રદ્ધાને બુદ્ધિથી ચકાસીએ .................. २००७ ज्ञानादिभावस्य भाववन्दनहेतुता ................... १९८८ | पा२५॥ शतिनी हुशणता ................... २००८ मोक्षमार्गानुगामिगुणानां विनयार्हतानिमित्तत्वम् .. १९८९ ३०.केवलिभुक्ति व्यवस्थापन द्वात्रिंशिका विनयेन विना प्रवचनाद्यन्नत्यसम्भवः ..............१९९० पा-पवन समान विनयनी मावश्यता .... १९८० बुभुक्षाया दोषत्वमीमांसा ......................... २००९ देववद् गुरुभक्तिकरणे परमार्थोलब्धिसम्भवः ...... १९९१ | उपदी seमो न छोय - ५२ ........ २००८ वाचयितुमनर्हाणां निर्देशः. .........................१९९२ केवलिनः कृतकृत्यतादिविचारः .................... २०१० अविनीताय विशिष्टश्रुतदातुः सङ्घबाह्यता .......१९९३ परद्रव्यपप्रवृत्तिकारणताविचारः ....................... विनयथा सुप, मविनयथा दुः५ ............ १८८3 | प्रमादकारणविमर्शः . .....२०१२ आचार्यपरिभवे विद्यावैफल्यम् ........................ १९९४ | परमौदारिकशरीरस्थितिविमर्शः ........... ........२०१३ गुसापेक्ष पूयता... ૧૯૯૪ | श्वेताम्बरसिद्धान्तपरामर्शः ...................... ...........२०१४ समाधिस्वरूप-प्रकारादिमीमांसा .....१९९५ | उक्सानी ५९ मो४न ४३ - श्वेतांब२ ...... २०१४ ચાર પ્રકારની સમાધિ ૧૯૯૫ | अष्टादशदोषानामाऽऽविष्करणम् .................... २०१५ विनय समाधिना या२ २ ................ १८८५ | १cer | भूप-त२४. घोषात्म नथी - श्वेतांबर ....... २०१५ वेदव्युत्पत्तिप्रदर्शनम .....................................१९९६ | क्षुधाया यावद्दहस्थित्यवस्थानम् ......................२०१६ स्वाध्यायगुणवर्णनम् .....................................१९९७ | क्षुधः कैवल्यप्रतिबन्धकत्वाऽयोगः २०१७ श्रुतसमाधिना यार प्रहार ...................१८८७ |घात ४वाथी 3qcा कृतकृत्य ...... ૨૦૧૭ संसक्त-राजसादितपःप्रदर्शनम् ....................... १९९८ | केवलिनि कृत्यत्वमीमांस | केवलिनि कृत्यत्वमीमांसा ....................... ...........२०१८ त५ भने मायारनी समाधिना यार-यार मे १९९८ | सज्ञापदार्थपरामर्शः ......... २०१९ व्यवहारभाष्ये चतुर्विधवविनयविस्तरः .............१९९९ | अप्रमत्तयतीनामाहारपरामर्शः ... २०२० स्पर्शज्ञानफलमीमांसा | कर्ममात्रस्य परिणामदुःखहेतुता .. २०२१ समाधियित्तम विनय३णस्पर्शान ४न्मे......... २००० | केवलिनि वेदनीयविपाकोदयसिद्धिः स्पर्शशान शी हात ...................२००० | २५होरी तुल्यतानी साथी मोग........... भावरसेन्द्रात् सिद्धकाञ्चनता ......................२००१ | दग्धरज्जुसमकर्ममर्मद्योतनम् ......................... विनय विनाषी भारापना व्यर्थ .......... २००१ | रसापेक्षया दग्धरज्जुसमत्वाभावः ................... सर्वविद्याप्राप्तौ गुरुभक्तिरमोघकारणम् ..............२००२ | केवलिकर्मणि सर्वथा दग्धरज्जुसमत्वाभावः .... विनय मेटले. प्रतापी सूर्यत ............... २००२ | दिगम्बराणामर्धजरतीयन्यायग्रस्तत्वम् ................ २०२६ पञ्चविधगुरुविनयविद्योतनम् ..................... २००३ | बाह्याध्यात्मिकसुखादिकारणविचारः ................ २०२७ विनय विना शास्त्राभ्यास अनर्थ.30 ........ २००3 | आध्यात्मि: सुपाहिनी विविधता ............ २०२७ तीर्थकृतः तीर्थप्रणामप्रयोजनम् ....................... २००४ | केवलिनि परिषहविमर्शः ............................. २०२८ तीर्थ४२ ५९ विनय भने छोउ नलि......... २००४ |न्द्रियशान सुपाहियो४६ नथी - श्वेतांन२. .. २०२८ महारपरामर्शः.............. ..... ...... Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org

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