Book Title: Gommatsara Jivkand
Author(s): Nemichandra Siddhant Chakravarti, Jawaharlal Shastri
Publisher: Raghunath Jain Shodh Sansthan Jodhpur

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Page 740
________________ ७०६/गो. मा. जीवकाण्ड गाथा ६४६-६४० मिथ्यात्व-मम्यग्मिथ्यात्व-सम्यक्त्व प्रकृति दर्शनमोहनीय कर्म की इन तीन प्रकृतियों के क्षय मे, इस प्रकार सात प्रकृतियों के क्षय से जो सम्यक्त्व होता है वह क्षायिक सम्यक्त्व है। प्रतिपक्ष कर्मों के अत्यन्त क्षय से उत्पन्न होने के कारगा क्षायिक सम्यक्त्व अतिनिर्मल होता है। क्षायिक सम्यकव प्राप्त होकर फिर कभी छूटता नहीं है, अतः नित्य है। विशुद्धि की वृद्धि को प्राप्त होता हुमा असंयत सम्यम्हष्टि, संयतासंयत, प्रमत्तसंयत और अप्रमत्त संघत इन चार गुणस्थानों में में किसी एक गुणस्थान में सात प्रकृतियों का क्षय करके क्षायिक सम्पष्टि होकर क्षपक श्रेणी पर प्रारोडगा करने के योग्य होता है। इसलिए क्षायिक सम्यग्दर्शन सर्व कर्मों के क्षय का हेतु कहा गया है। ! दर्णनमोहनीय का क्षपण करता हा जीव सर्वप्रथम अधःप्रवृत्त करण, अपूर्वकरण और अनिवृत्तिकरण, इन तीन करणों को करके अनन्तानुबन्धिचतुक का विसंयोजन करता है। अधःप्रवृत्तकरण में स्थितिघात, अनुभागघात, गुरणश्रेणी और गुणसंक्रमण नहीं होता है। केवल अनन्न गुणो विशुद्धि मे विशुद्ध होता हा अध:प्रवृनकरण काल के अन्तिम समय तक चला जाता है। केवल विशेषता यह है कि अन्य स्थिति को बांधता हुप्रा पहले के स्थितिबन्ध की अपेक्षा पल्योगम के संख्यानवें भाग से हीन स्थिति को बांधता है। इस अधःप्रवृत्तकरण के प्रथम समय में होने वाले स्थिति मे अन्तिम समय में होनेवाला स्थिनिबन्ध संख्यातगणा हीन होता है । अपूर्व करण के प्रथम समय में पूर्व स्थिति बन्ध मे फ्ल्योपम के संख्यानवें भाग से हीन अन्य स्थितिबन्ध होता है। उसी समय में आयु कर्म को छोड़कर शेष कर्मों के पल्योरम के संख्यात भाग मात्र पायामवाले अथवा मागरोपम पृथक्त्व पाया मवाले स्थिति कांडकों को प्रारम्भ करता है । तथा उसी समय अप्रशस्त कर्मों के अनुभाग के अनन्त बहुभाग मात्र अनुभाग कांडकों को ग्रारम्भ करता है। उसी समय में अनन्तानुबन्धी कषायों का गुगसंक्रमण भी प्रारम्भ करता है । प्रथम समय में पहले संक्रमण किये गये द्रव्य से असंभवातगुणित प्रदेश का संक्रमण करता है। दूसरे समय में उससे असंख्यातगुणित प्रदेशाग्र का संक्रमण करता है । इस प्रकार यह कम सर्वसंक्रममा से पूर्व समय तक ले जाना चाहिए। प्रायुकर्म को छोड़कर शेष कर्मा की गलितावशेष गूगथणी को करता है। इस प्रकार सम्पूरर्ग अपूर्वकरणकाल में गुणधेशी करने की विधि कहनी चाहिए । केवल विशेषता यह है कि प्रथम समय में अपकर्षित प्रदेशाग्र मे दुसरे समय में असंख्यात गणित प्रदेशों का अपकर्षण करता है। इस प्रकार यह क्रम अनिवृत्तिकरण के अन्तिम समय तक ले जाना चाहिए। प्रथम समय में दिये जानेवाले प्रदेशाग्र में द्वितीय समय में गुणश्रेणी के द्वारा दिये जाना बाना प्रदेशाग्र असंख्यात गुणित होता है। इस प्रकार यह क्रम अनिवृत्तिकरण के अन्तिम समय तक ले जाना चाहिए। इस प्रकार उपयुक्त विधान से अपूर्वकरण का काल समाप्त हुया । अपूर्वकरण के प्रथम समय सम्बन्धी स्थिति सत्त्व से और स्थिति-बन्ध से अपूर्वकरण के अन्तिम समय में स्थितिमत्त्व और स्थितिबन्ध संख्यातगुणित हीन होता है । अनिवृत्तिकरण के प्रथम समय में अन्य स्थिति बन्ध, अन्य स्थिति काण्डक, अन्य अनुभाग काण्डक और अन्य गुणश्रेणी एक साथ प्रारम्भ होती है। इस प्रकार अनिवृतिकरण काल के संख्यात बहुभाग व्यतीत होने पर विशेष घात से पान किया जाता हुया अनन्तानुबन्धी चतुक का २. म. मि. १०/१1३. प्रवल पु. ६ पृ. २४८-२४६ । ४. चवल १, म्बर का. अ. गा. ३०८ टीका। पु. ६ पृ. २४६-२५१ ।

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