Book Title: Gommatsara Jivkand
Author(s): Nemichandra Siddhant Chakravarti, Jawaharlal Shastri
Publisher: Raghunath Jain Shodh Sansthan Jodhpur
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गाथा ६५४
७१८/गो. मा. जीवकाश
विशेषार्थ-देव और नारकियों के न अणुव्रत होते हैं और न महावत होते हैं । तियंत्रों के अणुव्रत होते हैं । यदि तियंचों के नरक, तिर्यंच या मनुष्यायु का बन्ध होगया है तो वे अणुव्रत भी धारण नहीं कर सकते ; किन्तु सम्यक्त्व हो सकता है । मनुष्य के अणुयत व महाव्रत दोनों हो सकते हैं। यदि उसके नरक प्रायु, तिर्यंचायु या मनुष्यायु का बन्ध हो गया हो तो अणुव्रत या महावत धारण नहीं कर सकता, किन्तु सम्यक्त्व की उत्पत्ति हो सकती है। देव व नारकी के तिर्यंचायु या मनुष्यायु का बन्ध हो जाने पर भी सम्यक्त्व उत्पन्न हो सकता है ।
सासादन सम्ममइष्टि को क्षमा ण य मिच्छत्तं पसो सम्मत्तादो य जो य परिवडिदो।
सो सासणोत्ति गयो पंचमभावेण संजुत्तो ॥६५४।।' गाथार्थ जो जीव सम्यक्त्व से च्युत हो गया है और मिथ्यात्व को प्राप्त नहीं हुआ है, वह सासादन सम्यग्दृष्टि जीव है । वह पाँचवें भाव से संयुक्त होता है ।।६५४।।
विशेषार्थ-सासादन गुणस्थान प्रथमोपशम सम्यग्दर्शन से परिपतित होने पर ही होता है अन्य सम्यक्त्व से च्युत होने पर नहीं होता, किन्तु कषायपाहुड़ के मतानुसार द्वितीयोपणम सम्यक्त्व से पतित होने पर भी सासादन गुणस्थान सम्भव है। सासादन सम्यग्दृष्टि के पंचमभाव अर्थात् पारिणामिक भाव कहा गया है, किन्तु यह पारिगामिक भाव भव्यत्व आदि के समान अनादि नहीं है परन्तु दर्शनमोहनीय कर्म की अपेक्षा यह पारिणामिक कहा गया है जो सादि है। इस गाथा सम्बन्धी विशेष कथन गाथा १६ के विशेषार्थ में है। वहाँ से देखना चाहिए । पुनरुक्ति के दोष के कारण यहाँ पर नहीं लिखा जा रहा।
जिस सम्यादृष्टि जीव ने विसंयोजना द्वारा अनन्तानुबन्धी चतुष्क को निःसत्त्व कर दिया है, वह जब मिथ्यात्व या सासादन को प्राप्त होता है तब मिथ्यात्व या सासादन के प्रथम समय में अनन्तानुबन्धी चतुष्क का स्थितिसत्त्व पाया जाता है।
शंका - असद्रूप अनन्तानुवन्धी चतुष्क की सामादन में सत्तारूप से उत्पत्ति कैसे हो जाती है ? समाधान-मासादन परिणामों से । शंका-वह सासादन रूप परिणाम किस कारण से उत्पन्न होते हैं ? समाधान-अनन्तानुबन्धी चतुक के उदय से । शंका-अनन्तानुबन्धी चतुष्क का उदय किस कारण से होता है ?
समाधान-परिणाम विशेष के कारण अनन्तानुबन्धी चतुष्क का उदय होता है। परिणामों के माहात्म्यवश शेष कषायों का द्रव्य सासादन गुणस्थान में उसी समय अनन्तानुबन्धी रूप से परिणम कर उसका उदय देखा जाता है।'
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१. प्रा. पं. सं पृ. ३५ गाथा १६८।
२. जयधवल पु. ४ पृ. २४।
३. जयधवन पु. १० पृ. १२४ ।