Book Title: Gommatsara Jivkand
Author(s): Nemichandra Siddhant Chakravarti, Jawaharlal Shastri
Publisher: Raghunath Jain Shodh Sansthan Jodhpur
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गाथा ६८५
अन्तर्भाव/७४१
प्राहारक समद्घात छठे गुरणस्थान में ही होता है । छठे गुरगस्थानवालों के अपय पित-अवस्था में आहार मिश्र काययोग होता है। उस प्राहारकमिश्न काययोगी के एक प्रमत्त संयत हा गुणस्थान होता है। इस प्राद्वारक-मिश्र काययोग का काल अन्तम है. क्योंकि प्राडारक-मिश्र काययोगी का मरण नहीं होता है । पर्याप्ति पूर्ण होने में अन्तम हर्न काल लगता ही है, इससे कम काल में पर्याप्ति पूर्ण भी नहीं होती।
औदारिकमिथ काययोग के समान कामरण काययोग में मिथ्यात्व, सासादन, अविरतसम्यादष्टि और मांगनी अथात् पहला, दूसरा, वाधा और रहवा ये चार गुणस्थान होते हैं। इतनी विशेषता है कि प्रौदारिकमिश्न काययोग तो मात्र मनुष्य व तिर्यचों के होता है, किन्तु कार्मण काययोग चारों गतिवाले जीवों के विग्रहगति में होता है। तेरहवें गुरणस्थान में भी औदारिकमिश्र काययोग कपाट समुद्धात में होता है, किन्तु कार्मरण काययोग प्रतर व लोकपूरण समुद्घात में होता है।
कपाट ममद्घात के समय चौदह राजू पायाम से और सात राज विस्तार से अथवा चौदह राजु मायाम से और एक राजू को आदि लेकर बढ़े हुए विस्तार से व्याप्त जीब के प्रदेशों का संख्यात अंगुल की अवगाहना वाले पूर्व शरीर के साथ सम्बन्ध नहीं हो सकता। यदि सम्बन्ध माना जायेगा, तो जीव के प्रदेशों के परिमारण वाला ही औदारिक शरीर को होना पड़ेगा। किन्तु ऐसा हो नहीं सकता, क्योंकि विप्निाट बन्ध को धारण करने वाले शरीर के पूर्वोक्त प्रमाग रूप से पसरने की शक्ति का अभाव है। यदि मूल शरीर के प्रसरण शक्ति मानी जाये तो उनके औदारिकमिध व कार्मणकाययोग नहीं बन सकता प्रतः कपाट, प्रतर व लोकपूरण समुद्घातकेवली के पुराने मूल शरीर के साथ सम्बन्ध है ही नहीं ।
वेद मार्गणा में गुणम्थानों का कथन थावरकायप्पहदी संढो सेसा असण्णिमादी य । परिणयट्टिस्स य पढमो भागोत्ति जिणेहि गिट्टि ॥६५॥
गाथार्थ-नपुसक वेद में स्थावर काय से लेकर अनिवृत्तिकरण गुणस्थान के प्रथम भाग नक होते हैं। शेष स्त्रीवेद व पुरुपवेद में प्रसन्नी पंचेन्द्रिय से लेकर अनिवृत्तिकरण गुणस्थान के सवेदभाग तक होते हैं । ऐसा जिन (श्रुत के वली) ने कहा है ।।६८५।।
विशेषार्थ--एकेन्द्रिय से चतुरिन्द्रिय तक जीव सम्मूर्च्छन होने के कारण नसक वेदी ही होते हैं । इसलिए स्थावर काय को अर्थात् एकेन्द्रियों के प्रथम गुणस्थान को प्रादि करके अनिवृत्तिकरण नवें गुणस्थान के प्रथम भाग तक नौ गुणस्थान नपुंसक बेद में होते हैं। स्त्रीवेद और पुरुषवेद गर्भजों व उपपाद जन्म वाले देवों के होता है। असंज्ञी पंचेन्द्रिय जीव गर्भज भी होते हैं और उनके त्रिीवेद व पुरुषवेद होता है। इसलिए स्त्री वेद व पुरुषवेद में असंजी पंचेन्द्रिय जीव के प्रथम गुणस्थान से लेकर अनिवृत्तिकरण गृगणस्थान के सवेद भाग तक नौ गुणस्थान होते हैं। इस प्रकार तीनों वेदों (स्त्रीवेद, पुरुषदेद, नपुसकवेद) में नौ-नौ गुणस्थान होते हैं अर्थात् मिथ्यात्व गुरगस्थान से लेकर
१. चवन पु. २ पृ. ६६० । २. 'नारकमम्मूच्छिनो नपुसकानि ।। २१५०।।" [त नु.] ।