Book Title: Gommatsara Jivkand
Author(s): Nemichandra Siddhant Chakravarti, Jawaharlal Shastri
Publisher: Raghunath Jain Shodh Sansthan Jodhpur
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७३२ / गो. सा. जीवकएण्ड
गाथा ६६६
स्थित रहता है, वह कपाट समुद्धात कहा जाता है, क्योंकि इस समुद्घात में स्पष्ट रूप से ही कपाट जैसा आकार पाया जाता है ।'
तीनों वातवलयों को छोड़ कर सम्पूर्ण लोक में ग्रात्मप्रदेश जब फैलते हैं तब तृतीय समयवाला प्रतर समुद्धरत होता है। चतुर्थ समय में तीनों वातवलयों में भी आत्मप्रदेश फैल जाते हैं। यही लोकपूरण समुद्घात है।
समुद्धातों को दिया
श्राहारमारणंति य दुर्ग पिरियमेरा एगविलिगं तु । दसदिसि गदा हु सेसा पंच समुग्धादया होंति ।।६६६ ।।
गाथार्थ - प्रहारक समुद्घात और मारणान्तिक समुद्घात इन दो समुद्घातों में तो एक ही दिशा में श्रात्मप्रदेशों का गमन होता है। शेष पाँच समुद्घातों में दसों दिशाओं में गमन होता
।। ६६६।।
विशेषार्थ - आहारक और मारणान्तिक समुद्धात एक दिशा में होते हैं। आहारक शरीर की रचना के समय श्रेणीगति होने के कारण एक ही दिशा में (जिस ओर केवली या श्रुतकेवली होते हैं ।) असंख्यात आत्मप्रदेश निकल कर एक अरत्नि प्रमाण आहारक शरीर की रचना करते हैं । जहाँ नरक आदि में जीव को ( पूर्ववद्ध आयु अनुसार) मरकर उत्पन्न होना है, उसी दिशा में प्रात्मप्रदेश निकलते हैं । शेष पाँच समुद्घात श्रेणी के अनुसार ऊपर-नीचे पूर्व-पश्चिम उत्तर-दक्षिण इन छहों दिशाओं में श्रात्मप्रदेश निकलते हैं । आहारक समुद्घात में एक हाथ प्रमाण प्रहारक पुतला उसी दिशा में गमन करता है जिस दिशा में केवली या धुनकेवली होते हैं। अन्य दिशा में गमन नहीं करता। यदि केवली या श्रुतकेबली विदिशा में होते हैं तो आहारक शरीर मोड़ा लेकर उस स्थान पर पहुँचता है, क्योंकि आहारक पुतले की अनुश्रेणि गति होती है। मारणान्तिक समुद्घात में भी जहाँ पर उत्पन्न होता है उसी क्षेत्र की ओर ग्रात्मप्रदेश फैलते हैं, अन्य क्षेत्र की ओर ग्रात्मप्रदेश नहीं जाते। इसमें भी अनुश्रेणी गति होती है। अतः इन दोनों समुद्घातों को एक दिक् कहा गया है। वेदना आदि पाँचों समुद्घातों में ग्रात्मप्रदेश चारों ओर और ऊपर नीचे फैलते हैं, इसलिए छह दिशाओं में फैलते हैं ऐसा कहा गया है। किन्तु जब श्रात्मप्रदेश शरीर के चारों ओर फैलते हैं तो विदिशाओं में भी जाते हैं अतः विदिशाओं को पृथक् गिन कर दनों दिशाओं में फैलते हैं, ऐसा कहा गया है। छह दिशा व दश दिशा कहने में मात्र शब्दभेद है, अर्थभेद नहीं है क्योंकि दोनों का अभिप्राय एक है ।
वेदना, कपाय, वैक्रियिक, मारणान्तिक, तेजस और बाहारक इन छह समुद्घातों का काल असंख्यात समय है । केवलि समुद्घात का काल माठ समय है । दण्ड, कपाट, प्रतर, लोकपूर के चार समय पुनः प्रतर कपाट, दण्ड और स्वशरीर में प्रवेश के चार समय इस प्रकार केवलसमुद्घात का काल ग्राठ समय होता है । "
१. जयभवन फलटण पृ. २२७६ २. स्वा. का. अनु. ग. ४६७ टीका पृ. ३०८ ॥ ४. ग. वा. १/२० / १२ ।
३. राजवार्तिक १ /२०/१२ |