Book Title: Nandanvan Kalpataru 2014 04 SrNo 32
Author(s): Kirtitrai
Publisher: Jain Granth Prakashan Samiti
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आजन्मतोऽपि विषयेन धृतं प्रशान्तं,
स्वान्तं त्वया स्ववशतो विहितं नितान्तम् । शब्दादिनाऽप्यचलिता दृढता नु काचित्,
किं मन्दरादिशिखरं चलितं कदाचित् ॥१५॥ सबुद्धिवर्तिरभितो हृदयान्तराल
गाढान्तरालहरणप्रवणोऽकरालः । स्नेहेन शास्त्ररुचिना रुचिरं चकासद्
दीपोऽपरस्त्वमसि नाथ! जगत्प्रकाशः ॥१६॥ सूर्यः खरैः करभरैर्भुवनं निहन्ति,
न त्वां तथा बुधजना उपमां नयन्ति । प्रीतिं दधासि सततं ननु भव्यलोके,
सूर्यातिशायिमहिमाऽसि मुनीन्द्र! लोके ॥१७॥ ज्योत्स्ना समग्रभुवनेऽस्ति यशःस्वपा,
त्वत्संस्थितिर्न च कदापि बुधादिरूपा । त्वदर्शनं मधुरयेत् कटुकं नु निम्बं,
विद्योतयज्जगदपूर्वशशाङ्कबिम्बम् ॥१८॥ सम्यक्त्वबीजवपनात् परमात्मभूते, ,
क्षेत्रे वचोमृतप्रवर्षणतः प्रसूते । धान्यं शिवं सलिलदोऽयमसारकनैः,
कार्यं कियज्जलधरैर्जलभरननैः ॥१९॥ नैसर्गिकं सुजनजाड्यहरं चिरत्ने,
तेजश्चकास्ति भगवंस्तव चित्तरले । नाऽन्यत्र दृष्टमथवाऽस्ति विभाकरेऽपि,
नैवं तु काचशकले किरणाकुलेऽपि ॥२०॥ संसारवारिनिधिजातदुरन्तदोष,
हृत्वा सदाऽऽचरितमत्र सदात्मपोषम् । जैनं वचस्तव तथा लसदन्तरेऽपि,
कश्चिन्मनो हरति नाऽथ भवान्तरेऽपि ॥२१॥ श्रीमद्यशोविजयवाचकमुख्यग्रन्थान्,
विश्वे तवैव प्रतिभा कृतवत्यकन्थान् ।
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