Book Title: Nandanvan Kalpataru 2014 04 SrNo 32
Author(s): Kirtitrai
Publisher: Jain Granth Prakashan Samiti
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आशाः पराः प्रसवते परमर्कमालं,
प्राच्येव दिग् जनयति स्फुरदंशुजालम् ॥२२॥ सद्दर्शनाविकलचिच्चरणानि तानि,
___मार्गोऽयमेव ननु पारगतोदितानि । उद्घोषितं नु भवताऽपि भवस्य मन्था
नाऽन्यः शिवः शिवपदस्य मुनीन्द्र ! पन्थाः ॥२३॥ व्याख्यानभूरतिविशालतरा यदीयं,
स्यात् श्रोतुमात्महितकूद्वचनं त्वदीयम् । कीर्णाऽऽगतैः समजनस्तदिहोल्लसन्तो,
ज्ञानस्वरूपममलं प्रवदन्ति सन्तः ॥२४॥ दुर्गत्यभावकरणालरकान्तकोऽसि,
को मोदकारकतया नु कुमोदकोऽसि । दुर्दान्तकामदमनान्नु बलिन्दमोऽसि,
___ व्यक्तं त्वमेव भगवन् ! पुरुषोत्तमोऽसि ॥२५॥ अद्यापि तत्स्मृतिपथं न जहाति सूक्तं,
भक्त्या त्वया जिनवरं प्रणिपत्य सूक्तम् । तुभ्यं नमस्त्रिजगतः परितोषणाय,
तुभ्यं नमो जिन! भवोदधिशोषणाय ॥२६॥ दीक्षाङ्गनां विरतितः परिणीय प्रीत्या,
तामेव चारु रमयस्यनिशं सुरीत्या । रागङ्गतस्तरललोचनयेक्षितोऽपि,
स्वप्नान्तरेऽपि न कदाचिदपीक्षितोऽसि ॥२७॥ निर्लोचकेशचयमध्यगतं सुहासं,
तेजस्वितप्ततपनीयतरप्रभावम् । आस्यं त्वदीयमतुलं विलसत्यनर्ति,
बिम्बं रवेरिव पयोधरपार्श्ववर्ति ॥२८॥ जन्माभिषेकसमयेकनकाद्रिशृङ्गे,
कीदृग विभाति जिनबिम्बममर्त्यभृङ्गे । बिम्बं सुचारु भवतोपमितं सदश्मे,
तुङ्गोदयादिशिरसीव सहस्ररश्मेः ॥२९॥
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