Book Title: Nandanvan Kalpataru 2010 04 SrNo 24
Author(s): Kirtitrai
Publisher: Jain Granth Prakashan Samiti
View full book text
________________
Desafios
Jain Education International 2010_04
पायैः पूजितपादकः परपथः प्राप्तप्रकर्षः प्रभुः पार्श्वः पातु परप्रभावपरमः पापात् परं प्राणिनाम् ॥८॥
॥ अथ कविनामगर्भश्चक्रबन्धः ॥
यस्मात्प्रापुरशेषशोक कलहक्रोधव्रजा अत्ययं शोभाभासितभूघनप्रकलितो विश्वप्रपूज्य मुनिः ॥ विज्ञैर्वन्दितपूज्यपादक मलः पार्श्वः सतां बल्लभः जन्तुक्षेमकरो वरस्सकनकाभासः श्रिये स्तान्मम ॥९॥
सर्वेऽखर्वकु गर्वपर्वरहिताः प्राज्ञाः प्रियं प्राणिनाम् सर्पहरं वरं शिवकरं सारं सदा सादरम् ॥ श्री पार्श्वस्य नवन्नवन्नवनरा भक्त्या भवच्छेदनं
कण्ठाग्रे कलयन्तु कौतुककरं कौटिल्यकुण्ठा इदम् ॥१०॥
पादिप्रबन्धक लिता वचनावलीयं पार्श्वस्य पादकमले भ्रमरावलीव भूयात् सदा सुखमधुक्षरणा निविष्टा स्वाराधनैकनिपुणस्य बुधस्य चिते ॥११॥
इति श्रीविततपाण्डित्यताण्डवताण्डवितकीर्त्तिकौमोदीक श्रीमद्विजयनेमिसूरीश्वरपादपद्मनिर्यन्मकरन्दविन्दुतुन्दिलचितभ्रमस्य शोचिजयविरचितं पादिपदकदम्बमयपार्श्वाष्टकं स्तोत्रं समाप्तम् ॥
For Private & Personal Use Only
www.jainelibrary.org

Page Navigation
1 ... 18 19 20 21 22 23 24 25 26 27 28 29 30 31 32 33 34 35 36 37 38 39 40 41 42 43 44 45 46 47 48 49 50 51 52 53 54 55 56 57 58 59 60 61 62 63 64 65 66 67 68 69 70 71 72 73 74 75 76 77 78 79 80 81 82 83 84 85 86 87 88 89 90 91 92 93 94 95 96 97 98 99 100 101 102 103 104 105 106 107 108 109 110 111 112 113 114 115 116 117 118 119 120 121 122 123 124 125 126 127 128 129 130 131 132