Book Title: Swasthya Sadhan
Author(s): Mohandas Karamchand Gandhi, Gandhiji
Publisher: Gandhi Granthagar Banaras

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Page 34
________________ लत में पड़कर अपनी पाचन-शक्ति खो बैठी थी, लेकिन चाय को छोड़ते ही उसका स्वास्थ्य सुधरने लगा। इंगलैंड में पैटर-सी म्युनिसिपल्टी का रहने वाला एक डाक्टर यह कहा करता था कि वहाँ पर हजारों स्त्रियों का सिर चकराता है. जिसका कारण चाय पीने की अधिकता है। मेरा स्वयं ऐसा कई आदमियों से परिचय है, जो चाय पीने के कारण अपना स्वास्थ्य खो बैठे हैं। यह ठीक है कि कहवा का को कम करता है, लेकिन खून को उत्तेजित और पतला कर देता है। जो व्यक्ति कहवे को इस आधार पर पीते हैं कि उनका कफ इससे दबता है, इ हे मेरी राय में अदरक के रस का प्रयोग करना ठीक है। लाभदायक होने की अपेक्षा कहवा अधक हानिप्रद होता है। जब खून इससे अधिक उत्तेजित होकर विषैला हो जाता है तो नाण निकलने में कोई आश्चर्य नहीं। कोकीन भी उतना ही हानिप्रद है जितना कि कहवा और चाय । इसमें एक प्रकार का विष होता है जो चमड़े के सूराखों को बन्द कर देता है। जो लोग सदाचार के पक्ष में हैं उन्हें यह बात अवश्य याद रखनी चाहिए कि चाय, कहवा एवं कोकीन उन मजदूरों द्वारा तैयार किये जाते हैं जो एक प्रकार के गुलाम ही हैं। अगर हम लोग स्वयं अपनी आँखों उनके साथ किये जाने वाले बर्तावों को देखें, तो शायद हम कभी फिर उनका उपभोग करने को नहीं तैयार होंगे। सचमुच यदि हम जाँच करें, तो पता चलेगा कि हम लोगों के ९० प्रतिशत खाद्यपदार्थ इसी तरीके से तैयार किए जाते हैं। कहवा, चाय और कोकीन के बदले पीने के लिए एक दूसरी वस्तु इस तरीके से तैयार कर सकते हैं जिसे अच्छे-से-अच्छे पीने वाले चाय, कहवा और उसमें कुछ अन्तर नहीं पायेंगे। एक सेर अच्छा गेहूँ एक कड़ाही में रख कर आग

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