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सागरमल जैन
SAMBODHI
अर्थात् इस प्रकार वह सिद्ध, बुद्ध, विरत, निष्पाप, जितेन्द्रिय, करुणा से द्रवित एवं पूर्ण त्यागी बनता है और पुनः इस संसार में नहीं आता है। आदि कहा गया है अतः देहात्मवादी होकर लोकायत दार्शनिक भौतिकवादी या भोगवादी नहीं थे, वे भारतीय ऋषिपरम्परा के ही अंग थे, जो निवृत्तिमार्गी, नैतिक दर्शन के ही समर्थक थे । वे अनैतिक जीवन के समर्थक नहीं थे - उन्हें विरति या दान्त कहना उनको त्यागमार्ग एवं नैतिक जीवन का सम्पोषक ही सिद्ध करना है।
वस्तुतः लोकायत दर्शन को जो भोगवादी जीवन का समर्थक कहा जाता है, वह उनकी तत्त्वमीमांसा के आधार पर विरोधियों द्वारा प्रस्तुत निष्कर्ष हैं । यदि सांख्य का आत्म-अकर्तावाद, वेदान्त का ब्रह्मवाद, बौद्धदर्शन का शून्यवाद और विज्ञानवाद तप, त्याग के सम्पोषक माने जा सकते हैं तो देहात्मवादी लोकायत दर्शन को उसी मार्ग का सम्पोषक मानने में कौन सी बाधा है ? वस्तुतः चार्वाक या लोकायत दर्शन देहात्मवादी या तज्जीवतच्छरीरवादी होकर नैतिक मूल्यों और सदाचार का सम्पोषक रहा है। इस सीमित जीवन को सन्मार्ग में बिताने का संदेश देता है, उसका विरोध कर्मकाण्ड से रहा है न कि सात्त्विक नैतिक जीवन से । यह बात ऋषिभाषित के उपर्युक्त विवरण से सिद्ध हो जाती है।
सन्दर्भ १. जैन साहित्य का बृहद् इतिहास भाग-१, भूमिका पृ. ३९ २. दीघनिकाय पयासी सुत्त ३. राजप्रश्नीयसूत्र (मधुकर मुनि), भूमिका पृ. १८ ४. ऋषिभाषित (इसिभासियाई) अध्याय २० ५. विशेषावश्यकभाष्य गाथा १५४९-२०२४ ६. आचारांग (मधुकर मुनि) १/१/१/१-३
"एवमेगेसि णो णातं भवित-अत्थि मे आया उववाइए... . ... से आयावादी लोगावादी कम्मावादी किरियावादी।" ७. आचारांग १/२/६/१०४-परिण्णाय लोग सणं सव्वसो ८. सूत्रकृतांग (मधुकर मुनि) १/१/१/७-८ ९. वही ११-१२ १०. उत्तराध्ययनसूत्र ५/७–जणेणसद्धि होक्खामि । ११. वहीं ५/५-७ १२. जहा य अग्गी अरणी उ सन्तो खीरे घटां तेल्ल महातिलेसु ।
एमेव जाया ! सरीरंसि सत्ता संमुच्छई नासइ नावचिढ़े। ..... उत्तराध्ययनसूत्र, १४/१८ १३. नो इन्दियग्गेज्झां अमुत्तभावा अमुत्तभावा वि य होई निच्चो । ... वहीं, १४/१९ १४. सूत्रकृतांग द्वितीय श्रुतस्कन्ध, अध्याय १, सूत्र ६४८-६५६ ।
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