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Vol. XXVII, 2004 धर्माचरण का एक पर्याय - सत्यवाणी
87 "जहाँ पर ऋत (अर्थात् सत्य) बोलने पर शूद्र, वैश्य, क्षत्रिय या ब्राह्मण का वध हो सकता है, वहाँ पर साक्षी को असत्य बोलना चाहिए और ऐसे प्रसङ्गो में किया गया असत्यभाषण सत्य से भी बढ़कर है ।"
इस तरह मनुस्मृतिकार ने पूर्वोक्त सन्दर्म में असत्यभाषण को अनुमति भी दी है। परंतु 'अनृत तो अनृत ही है' इस महासत्य को भी स्वीकार करते हुए पूर्वोक्त श्लोक के अनन्तर ही ऐसे असत्यभाषण के लिए प्रायश्चित्त कर्म का विधान भी किया है । यहाँ पर विचारणीय बात तो यह है कि - क्या अनृतवाणी का प्रयोग करके, केवल प्रायश्चित कर्म कर लेने से असत्य वागुच्चारण के दोष से मुक्ति मिल सकती है ? एवञ्च असत्यवाणी का प्रयोग करके दोषी व्यक्ति के प्राण की रक्षा करने से क्या फायदा ? परन्तु अह आश्चर्यजनक बात है कि इसी तरह का विधान प्रायः अन्य स्मृतिकारों ने भी किया है । (जैसे कि - वसिष्ठस्मृति १६-३६, याज्ञवल्क्यस्मृति २-८३, विष्णुधर्मसूत्र ८-१५) ॥ परन्तु कोई भी सत्यनिष्ठ व्यक्ति तो यही कहेगा कि - (१) असत्यवचन बोलने के बाद, श्रुतिस्मृतिविहित किसी भी प्रायश्चित्त कर्म से मुक्ति नहीं मिल सकती है । एवञ्च, (२) दोषी व्यक्ति को जूठ बोलकर क्यों बचाया जाय ?१ इस सन्दर्भ में मनुस्मृति के टीकाकार कुल्लूक भट्ट कहते है कि - अनृतभाषण की पूर्वोक्त अनुमति तो प्रमादस्खलित (अनवधानप्रयुक्त) अधर्माचरण के लिए ही है: परन्त जो व्यक्ति अत्यन्त अधार्मिक है, जानबझ कर पाप करता है. जैसा कि - सन्धिकार स्तेनादि लोग, उसके विषय में तो असत्यवाणी का प्रयोग करना ही नहीं चाहिए ।१२ उनकी प्राणरक्षा करना, उनके प्रति दया प्रदर्शित करना सर्वथा अनुचित ही है । कुल्लूक भट्टने जो स्पष्टीकरण दिया है, उसका मूल "गौतमधर्मसूत्र' में दिखाई पड़ता है । जैसा कि -
नानृतवचने दोषो, जीवनं चेत्तदधीनम् । - गौ. ध. सू. १३-२४ न तु पापीयसो जीवनम् । - गौ. ध. सू. १३-२५.
"अनृतवचन में दोष नहीं है, यदि जीवन (की रक्षा) उस असत्यकथन पर निर्भर हो तो। परन्तु अत्यन्त पापी व्यक्ति का जीवनरक्षण करने के लिए यह असत्यकथन की अनुमति नहीं हो सकती ।" इस गौतमधर्मसूत्र के उपर मस्करिभाष्य में लिखा है कि - कोई पापी (किसी साक्षी के असत्य कथन से) जीवित रह जाने के बाद भी यदि पापकर्म में ही रति रखनेवाला हो और स्तेनादि कर्म करता ही रहता है, तभी तो सत्य ही बोलना चाहिए ।१३ मनुस्मृतिकार ने किसी के प्राण की रक्षा के लिए असत्यभाषण का अपवाद रखा है; परंतु जो बात गौतमधर्मसूत्रकार ने कही है, और टीकाकार कुल्लूकने स्पष्टीकरण के रूप में जोड़ी है, उसका निरूपण मनुस्मृति में प्रकटरूप में नहीं किया गया है । संक्षेप में कहे तो मनुस्मृति में असत्यवचन के लिये प्रायश्चित का विधान है; परन्तु गौतमधर्मसूत्र में जैसा - “न तु पापीयसो जीवनम्” (१३-२५) शब्दों से 'अपवाद का अपवाद' दिया है ऐसा मनुस्मृति में नहीं है । अतः सत्यवाणी के प्रयोग का निरूपण जो मनुने दिया है, वह अधूरा और आलोचनीय बनता है ।