Book Title: Savruttik Aagam Sootraani 1 Part 11 Bhagavati Mool evam Vrutti Part 4
Author(s): Anandsagarsuri, Dipratnasagar, Deepratnasagar
Publisher: Vardhaman Jain Agam Mandir Samstha Palitana
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Page #1 -------------------------------------------------------------------------- ________________ नमो नमो निम्मलदसणस्सा (भाग पूज्य आनंद-क्षमा-ललित-सुशील-सुधर्मसागर-गुरुभ्यो नमः सवृत्तिक-आगम-सुत्ताणि 11 आगम - ५ 'भगवती' मूलं एवं वृत्ति: [४] आजम मूल संशोधक :- पूज्यपाद आगमोद्धारक आचार्यश्री आनंदसागरसूरीश्वरजी महाराजसाहेब अभिनव संकलनकर्ता :- आगम दिवाकर मुनिश्री दीपरत्नसागरजी [M.Com., M.Ed., Ph.D., श्रुतमहर्षि पूज्य शासनप्रभावक आचार्यश्री हर्षसागरसूरिजी की प्रेरणा से 'वर्धमान जैन आगम मंदिर संस्था' पालिताणा Page #2 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ईस प्रोजेक्ट के संपूर्ण-अनुदान-दाता श्री आगम मंदिर पालिताणा ADHAN HTEOREOE desK arnaSanilesaleda ~ 2 Page #3 -------------------------------------------------------------------------- ________________ नमो नमो निम्मलदसणस्स सवृत्तिक-आगम-सुत्ताणि मूल संशोधक अभिनव-संकलनकर्ता ARRIAL पूज्यपाद आगमोद्धारक आचार्य श्री आनंदसागरसूरीश्वरजी महायज आगम दिवाकर मुनिश्री दीपरत्नसागरजी [M.Com., M.Ed., Ph.D., श्रुतमहर्षि] प्रत-प्राप्ति और पेज-सेटिंग कर्ता : के चेरमन श्री प्रवीणभाई शाह, अमेरिका मुद्रक : नवप्रभात प्रिटींग प्रेस अमदाबाद Mo 9825598855 19825306275 Page #4 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ਰਾਗਸ ਰਸ ਰੰਗ ਦਾ ਯਤਨ ਹੈ ਤਾ ਤਕ ਉਨ੍ਹਾਂ ਆਸ ਸਤਰ ਉਲ . आराम नाशताब्द ਸ਼ ਸ਼ ਸ਼ ਸ਼ ਸ਼ ਹਾਸ ਰਸ . ਸ਼ ਸੈਨਤ Page #5 -------------------------------------------------------------------------- ________________ [भाग-११] श्री भगवती-अंगसूत्रम्- भाग-४ नमो नमो निम्मलदसणस्स पूज्य श्रीआनंद-क्षमा-ललित-सुशील-सुधर्मसागर गुरुभ्यो नमः "भगवती" मूलं एवं वृत्ति: (अपरनाम- "व्याख्याप्रज्ञप्ति") शतक- २१ से ४१ मूलं एवं अभयदेवसूरि रचित वृत्तिः ] [भाद्य संपादक: - पूज्य आगमोद्धारक आचार्यदेव श्री आनंदसागर सूरीश्वरजी म. सा. 1 (किञ्चित् वैशिष्ठ्यं समर्पितेन सह) पुन: संकलनकर्ता- मुनि दीपरत्नसागर (M.com., M.Ed., Ph.D., श्रुतमहर्षि) 28/07/2017, शुक्रवार, २०७३ श्रावण शुक्ल ५ 'सवृत्तिक-आगम-सुत्ताणि' श्रेणि भाग-११ श्री आगमोद्धारक-वाचना-शताब्दी-वर्ष-निमित्त : प्रोजेक्ट ~5~ Page #6 -------------------------------------------------------------------------- ________________ सामाचारी-संरक्षक, ज्ञानधनी, आगम-संशोधक, तीव्र-मेधावी, समाधिमृत्यु-प्राप्त, बहुमुखीप्रतिभाधारक पज्यपाद आगमोद्धारक आचार्यदेव श्री आनंदसागरसरीश्वरजी महाराज साहेब • जिन्होने शुद्ध-श्रद्धा, सम्यक्-श्रुत आराधना, यथाख्यातचारित्र के प्रति गति और अंत समय देह-ममत्व के त्याग के द्वारा कायोत्सर्ग नामक | अभ्यंतर-तप कि मिशाल कायम कि है ऐसे बहुश्रुत आचार्य श्री सागरानंदसूरीश्वरजी महाराज का परिचय कराना मेरे लिए नामुमकिन है, फ़िर भी गुरुभक्ति | : बुद्धि से श्रद्धांजली स्वरुप एक मामुली सी झलक पैस करने का यह प्रयास मात्र है। .चारित्र-ग्रहण के बाद अल्प कालमे जो अपने गुरुदेव की छत्रछाया से दूर हो गये, तो भी गुरुदेव के स्वर्ग-गमन को सिर्फ कर्मो का प्रभाव मानकर | | अपने संयम के लक्ष्य प्रति स्थिर रहते हुए अकेले ज्ञान-मार्ग कि साधना के पथ पर चले | पढाई के लिए ही कितने महिनो तक रोज एकासणा तप के साथ : - बारह किल्लोमिटर पैदल विहार भी किया | लेकिन अपने मंझिल पे डटे रहे, और परिणाम स्वरुप संस्कृत एवं प्राकृत भाषा का, प्राचीन लिपिओ का, व्याकरण-न्याय-साहित्य आदि का सम्पूर्ण ज्ञान प्राप्त किया | जैन आगमशास्त्रो के समुद्र को भी पार कर गए। .एक अकेला आदमी भी क्या नहीं कर शकता? इस प्रश्न का उत्तर हमें इस महापुरुष के जीवन और कवन से मिल गया, जब वे चल पड़े | देवर्द्धिगणी क्षमाश्रमण के स्थापित पथ पर. बिना किसी सहाय लिए हुए सिर्फ अकेले ही "जैन-आगम-शास्त्रो" को दीर्घजीवी बनाने के लिए अनेक हस्तप्रतो से | : शुद्ध-पाठ तैयार किये | दो वैकल्पिक आगम, कल्पसूत्र और नियुक्तिओ को जोड़कर ४५ आगम-शास्त्रो को संशोधित कर के संपादित किया | फिर | पालीताणामें आगम मंदिर बनवाकर आरस-पत्थर के ऊपर ये सभी आगम-साहित्य को कंडारा, सूरतमें तामपत्र पर भी अंकित करवाए और “आगम मंजूषा" नाम से मुद्रण भी करवा के बड़ी बड़ी पेटीमें रखवा के गाँव गाँव भेज दिए | वर्तमानकालमे सर्व प्रथमबार ऐसा कार्य हुआ | .सिर्फ मूल आगम के कार्य से ही उन के कदम रुके नही थे, उन्होंने आगमो की वृत्ति, चूर्णि, नियुक्ति, अव चूरी, संस्कृत-छाया आदि का भी | संशोधन-सम्पादन किया | उपयोगी विषयो के लिए उन्होंने एक लाख श्लोक प्रमाण संस्कृत-प्राकृत नए ग्रंथो की रचना भी की | कितने ही ग्रंथो की : प्रस्तावना भी लिखी | ये सम्यक्-श्रुत मुद्रित करवाने के लिए आगमोदय समिति, देवचंद लालभाई इत्यादि विभिन्न संस्था की स्थापना भी की। .ज्ञानमार्ग के अलावा सम्मेतशिखर, अंतरीक्षजी, केशरियाजी आदि तीर्थरक्षा कर के सम्यक-दर्शन-आराधना का परिचय भी दिया | राजाओं को - प्रतिबोध कर के और वाचनाओ द्वारा अपनी प्रवचन-प्रभावकता भी उजागर करवाई | बालदिक्षा, देवद्रव्य-संरक्षण, तिथि-प्रश्न इत्यादि विषयोमे सत्य-पक्षमें । अंत तक दृढ़ रहे | जैनशासन के लिए जब जरुरत पड़ी तब अदालती कारवाईओ का सामना भी बड़ी निडरता से किया था । • सागरानंदजी के नाम से मशहूर हो चुके पूज्य आनंदसागरसूरीश्वरजीने अपने परिवार स्वरुप ७०० साधू-साध्वीजी भी शासन को भेट किये | ....ये थे हमारे गुरुदेव “सागरजी"... ___......मुनि दीपरत्नसागर... | . - .. - .. - .. - .. - .. - . Page #7 -------------------------------------------------------------------------- ________________ संयमैकलक्षी, उपधान-तप-प्रेरक, चारित्र-मार्ग-रागी, प्रवचन-पटु, सुपरिवार-युक्त । पूज्य गच्छाधिपतिआचार्यदेव श्री देवेन्द्रसागरसूरीश्वरजी महाराज साहेब ... परमपूज्य आचार्यश्री आनंदसागरसूरीश्वरजी के पाट-परंपरामे हुए तिसरे गच्छाधिपति थे पूज्य आचार्य श्री देवेन्द्रसागरसूरीश्वरजी, जो एक पून्यवान् । | आत्मा थे, दीक्षा ग्रहण के बाद अल्पकालमे ही एक शिष्य के गुरु बन गये | फ़िर क्या । शिष्यो कि संख्या बढती चली, बढ़ते हुए पुन्य के साथ-साथ वे आखिर 'गच्छाधिपति' पद पे आरूढ़ हो गए | इस महात्मा का पुन्य सिर्फ शिष्यों तक सिमित नही था, वे जहा कहीं भी 'उपधान-तप' की प्रेरणा करते थे, तुरंत ही वहां 'उपधान' हो जाते थे | प्रवचनपटुता एवं पर्षदापुन्य के कारण उन के उपदेश-प्राप्त बहोत आत्माओने संयम-मार्ग का स्वीकार किया | खुद भी | संयमैकलक्षी होने के कारण चारित्रमार्ग के रागी तो थे ही, साथसाथ ज्ञानमार्ग का स्पर्श भी उन का निरंतर रहेता था | आप कभी भी दुपहर को चले जाइए, । • वे खुद अकेले या शिष्य-परिवार के साथ कोई भी ग्रन्थ के अध्ययन-अध्यापनमें रत दिखाई देंगे। | ... ये तो हमने उनके जीवन के दो-तीन पहेलु दिखाए | एक और भी अनुसरणीय बात उन के जीवनमें देखने को मिली थी- 'आराधना-प्रेम'. कैसी भी शारीरिक स्थिति हो, मगर उन्होंने दोनों शाश्वती ओलीजी, [पोष)दशमी, शुक्ल पंचमी, त्रिकाल देववंदन, पर्व या पर्वतिथि के देववंदन आदि आराधना कभी | नहीं छोड़ी | आखरी सालोमें जब उन को एहसास हो गया की अब 'अंतिम-आराधना' का अवसर नजदीक है, तब उन के मुहमें एक ही रटण बारबार चालु हो : गया- “अरिहंतनुं शरण, सिद्धनुं शरण, साधुनुं शरण, केवली भगवंते भाखेला धर्मनुं शरण " इसी चार शरणो के रटण के साथ ही वे समाधि-मृत्यु-रूप सम्यक् निद्रा को प्राप्त हुए थे | ऐसे महान् सूरिवर को भावबरी वंदना | ... मुनि दीपरत्नसागर... ... श्री वर्धमान जैन आगम मंदिर संस्था, पालिताणा ... | पूज्यपाद आनंदसागर-सूरीश्वरजी की बौद्धिक-प्रतिभा का मूर्तिमंत स्वरुप ऐसी इस संस्था की स्थापना विक्रम संवत १९९९ मे महा-वद ५ को हुइ। : आचार्य हर्षसागरसूरिजी की प्रेरणा से जिन की तरफ़ से इस सवृत्तिक-आगम-सुत्ताणि के लिए संपूर्ण द्रव्य-सहाय की प्राप्ति हुइ । शिल्प-स्थापत्य, शिलोत्कीर्ण आगम और समवसरण स्थित नयनरम्य ४५ चौमुख जिन-प्रतिमाजी से सुशोभित ऐसा ये 'आगममंदिर' है, जो शत्रुजयगिरिराज कि तलेटीमे स्थित है | वर्तमान २४ जिनवर, २० विहरमान जिनवर और १ शाश्वत मिलाकर ४५ चौमुखजी यहा बिराजमान है | जहां ४० समवसरण की रचना मेरु पर्वत के तिनो काण्ड के वर्णो के अनुसार चार अलग-अलग रंगो के आरस-पत्थर से बना है, देवो दवारा रचित समवसरण के शास्त्र वर्णनअनुसार आगम-मंदिर कि समवसरण का स्थापत्य है | ऐसी अनेक विशेषता से युक्त ये आगममंदिर है। - मुनि दीपरत्नसागर... . - . . - . . ~74 Page #8 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ‘सागर-समुदाय-एकता-संरक्षक, तीर्थ उद्धार कार्य-प्रवृत्त, गुणानुरागी' इस “सवृत्तिक-आगम-सुत्ताणि' श्रेणि भाग १ से ४० के संपूर्ण अनुदान के प्रेरणादा पूज्य शासनप्रभावक आचार्य श्री हर्षसागरसूरिजी महाराज साहेब पूज्यपाद स्व. गच्छाधिपति देवेन्द्रसागर सूरीश्वरजी के विनयी शिष्य एवं दो गच्छाधिपतिओ के मुख्य सहायक के रुपमे 'सागर समुदाय' के सुचारु • संचालक पूज्य हर्षसागरसूरिजी, जिन की प्रेरणा से ये “सवृत्तिक-आगम-सुत्ताणि" के मुद्रण के लिए संपूर्ण द्रव्यराशि प्राप्त हुई, उनका अत्यल्प परिचय यहां करेंगे| समुदाय-एकता के लिए सदैव प्रयत्नशील रहते हुए ये महात्मा समुदाय के साधु-साध्वीजी की आवश्यकताओकी पूर्ती के लिए भी प्रवृत्त रहेते है, प्राचीनअर्वाचीन तीर्थो के जीर्णोद्धार एवं विकाश के लिए भी उत्साहित रहेते है, ज्ञान-क्षेत्र अछूता न रहे इसीलिए अनुमोदना, अनुदान एवं समय मिलने पर शास्त्रवांचनमें भी रूचि रखते है । समुदाय के जरूरतमंद साध्वीजी भगवंतो के आवास का विषय हो या साध्वीजी के विहारमें मजदूर का वेतन चुकाना हो, ऐसे छोटेछोटे कार्यों के प्रति भी उन का लक्ष्य रहेता है। दर्शन-शुद्धि के लिए जब उन्होंने समग्र भारतवर्ष के १०० साल तक के पुराने जिनालयों में १८ अभिषेक की प्रेरणा की, उस वक्त लगभग सभी अभिषेक सामग्री की द्रव्य-शुद्धि का ख़याल रखते हुए अपनी मेधावी बुद्धि का परिचय दिया था, साथमे अनुकंपा भाव से | पुजारी या विधि करानेवाले को यत्किंचित् बहुमान प्रगट करते हुए कुछ धन राशि प्रदान करवाई | : ऐसे बहुगुण-संपन्न महात्मा पूज्य आचार्यश्री हर्षसागर सूरिजी को हम भावभरी वंदना करते हुए इस श्रुतकार्य का प्रारंभ करने जा रहे है | मुनि दीपरत्नसागर [कात्रेज]पूना, शंखेश्वर, कपडवंज, प्रभासपाटण आदि स्थानोमे आगममंदिर के प्रेरक, कर्मग्रंथ अभ्यासु, निस्पृह महात्मा पूज्यपाद गच्छाधिपति आचार्य श्री दौलतसागर सूरीश्वरजी महाराज साहेब (एवं ) अजातशत्रु, स्वाध्याय- रसिक, प्रशांतमूर्ती और अपने गुरु के प्रीतिपात्र परम पूज्य आचार्य श्री नंदीवर्धनसागर सूरिजी महाराज साहेब इस पवित्र श्रुत-कार्यमे दोनो सूरिवरो का स्मरण करते हुए कोटि कोटि वंदना के साथ मुनि दीपरत्नसागर ~8~ *** Page #9 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (०५) [भाग-११]"भगवती"-अंगसूत्र-५ (मूलं+वृत्ति:) शतक [-], वर्ग [-], अंतर्-शतक -], उद्देशक [-], मूलं [-] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र- [०५], अंगसूत्र- [०५] "भगवती मूलं एवं अभयदेवसूरि-रचिता वृत्ति: प्रत सूत्रांक HAMARNAMAAVAANARTARNAATARWAAMANANAANANAANANARia ॥ अहम् ।। श्रीमत्सुधर्मस्वामिगणभृत्प्ररूपितं श्रीमगौतमगणधारिवाचनानुगतं श्रीमचन्द्रकुला लकारश्रीमदभयदेवसूरिसूत्रितविवरणयुतं श्रीमद्भगवतीसूत्रम् । प्रकाशयित्री-श्रीमत्सुरतबन्दरवास्तव्यश्रेष्ठिवर्यमूलचन्द्रात्मजसुपुत्रोत्तमचन्द्राभयचन्द्रविहितपूर्ण द्रव्यसाहाय्येन शाह वेणीचन्द्र सुरचन्द्रद्वारा श्रीआगमोदयसमितिः STARNAKANNANAANWARNAL अनुक्रम मुद्रित मोहमय्यां निर्णयसागरमुद्रणयन्त्रे रा०रा० रामचन्द्र येसू शेडगेवारा वीरसंवत् . २४४४ विक्रमसंवत्. १९७४ क्राइष्ट. १९१८ पग्यं ३-५-. सपाईनं रूप्यकत्रयं DUUUUUUUUUUUUNMMMNMNUNUNUMUANMNMN प्रतबः १००० | भगवती-(अगसूत्रस्य मूल “टाइटल पेज" ~9~ Page #10 -------------------------------------------------------------------------- ________________ .... २७१ मूलाका: ८६८ + ११४ भगवती (अग)सत्रस्य विषयानुक्रम दीप-अनुक्रमा: १०८७ | मलांक:: | विषय: पृष्ठांक: मूलांक: विषय: पृष्ठांक: मूलांक: पृष्ठांक: | शतक -१ ... ......शतकं - ३ ......शतक -५ ००१ | उद्देशक: ०१ चलन १७० | उद्देशक: ०२ चमरोत्पात २६४ | उद्देशक: ०९ राजगृह ०२६ | उद्देशक: ०२ दुःख १४८ | उद्देशक: ०३ क्रिया | उद्देशक: १० चन्द्रमा ०३४ | उद्देशक: ०३ कांक्षाप्रदोष १८४ | उद्देशक: ०४ यान शतकं-६ ०४६ | उद्देशक: ०४ कर्मप्रकृति १८९ | उद्देशक: ०५ स्त्री २७२ | उद्देशक: ०१ वेदना ०५२ | उद्देशक: ०५ पृथ्वी १९१ | उद्देशक: ०६ नगर २७७ उद्देशक: ०२ आहार ०६९ | उद्देशक: ०६ यावंत १९३ | उद्देशक: ०७ लोकपाल રા૦૮ | उद्देशक: ०३ महा-आश्रव ०७९ | उद्देशक: ०७ नैरयिक २०१ | उद्देशक: ०८ देवाधिपति २८६ उद्देशक: ०४ सप्रदेशक ०८५ | उद्देशक: ०८ बाल २०५ | उद्देशक: ०९ इन्द्रिय २९१ | उद्देशक: ०५ तमस्काय ०९४ | उद्देशक: ०९ गुरुत्व २०६ | उद्देशक: १० परिषद ३०० | उद्देशक: ०६ भव्य १०२ उद्देशक:१० चलत | शतकं -४ ३०२ | उद्देशक: ०७ शाली शतक - २ २०७ | उद्देशका: १-४ लोकपाल-विमान ३१३ उद्देशक: ०८ पृथ्वी १०५ | उद्देशक: ०१ स्कंदक २१० | उद्देशका: ५-८लोकपालराजधानी ३१७ | उद्देशक: ०९ कर्म ११८ | उद्देशक: ०२ समुदघात २११ | उद्देशक: ०९ नैरयिक ३२० | उद्देशक: १० अन्ययूथिक ११९ | उद्देशक: ०३ पृथ्वी २१२ | उद्देशक: १० लेश्या शतकं - ७.... १२२ | उद्देशक: ०४ इन्द्रिय ... शतक - ५..... ३२७ उद्देशक: ०१ आहार १२३ | उद्देशक: ०५ अन्यतीर्थिक २१५ | उद्देशक: ०१ रवि ३३९ | उद्देशक: ०२ विरति | उद्देशक: ०६ भाषा २२० | उद्देशक: ०२ वाय ३४५ | उद्देशक: ०३ स्थावर १३९ | उद्देशक: ०७ देव २२३ | उद्देशक: ०३ जालग्रंथिका ३५१ उद्देशक: ०४ जीव १४० | उद्देशक: ०८ चमरचंचा २२५ | उद्देशक: ०४ शब्द ३५३ उद्देशक: ०५ पक्षी १४१ | उद्देशक: ०९ समयक्षेत्र २४१ | उद्देशक: ०५ छद्मस्थ ३५५ | उद्देशक: ०६ आयु १४२ | उद्देशक: १० अस्तिकाय २४४ | उद्देशक: ०६ आय | उद्देशक: ०७ अनगार शतकं- ३..... २५३ | उद्देशक: ०७ पुदगल ३६५ | उद्देशक: ०८ छद्मस्थ उद्देशक: ०१ चमरविकुर्वणा । २६२ | उद्देशक: ०८ निर्ग्रन्थीपुत्र ३७१ उद्देशक: ०९ असंवृत पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र- [०५] अंगसूत्र- [०५] "भगवती" मूलं एवं अभयदेवसूरि-रचिता वृत्ति: १५१ ~10~ Page #11 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Woo . ५६० मूलाका: ८६८ + ११४ भगवती (अग)सूत्रस्य विषयानुक्रम दीप-अनुक्रमा: १०८७ मूलांक: विषय: | पृष्ठांक: । मूलांक: विषय: पृष्ठांक: मलांक: | विषय: पृष्ठांक: | .....शतक -७ .....शतकं -१० .....शतकं - १२ ३७७ उद्देशक: १० अन्यतीर्थिक ४८२ उद्देशक: ०३ आत्मऋद्धि | उद्देशक: ०५ अतिपात शतकं-८ ४८७ उद्देशक: ०४ श्यामहस्ती ५४६ | उद्देशक: ०६ राह ३८१ उद्देशक: ०१ पद्गल ४८८ | उद्देशक: ०५ देव ५५० उद्देशक: ०७ लोक ३८९ | उद्देशक: ०२ आशीविष ४९० | उद्देशक: ०६ सभा ५५२ | उद्देशक: ०८ नाग ३९७ | उद्देशक: ०३ वृक्ष ४९३ उद्देशका: ०७-३४ अंतर्दवीप ५५४ | उद्देशक: ०९ देव उद्देशक: ०४ क्रिया | शतकं- ११ | उद्देशक: १० आत्मा ४०१ उद्देशक: ०५ आजीविक ४९४ | उद्देशक: ०१ उत्पल शतकं - १३ ४०५ | उद्देशक: ०६ प्रासकआहार ४९९ |उद्देशक: ०२ शालक ५६३ | उद्देशक: ०१ पृथ्वी ४१० | उद्देशक: ०७ अदत्तादान ५०० | उद्देशक: ०३ पलाश ५६७ | उद्देशक: ०२ देव | ४१२ | उद्देशक: ०८ प्रत्यनिक ५०१ | उद्देशक: ०४ कुम्भिक ५६८ उद्देशक: ०३ नरक ४२२ उद्देशक: ०९ प्रयोगबन्ध १०२ | उद्देशक: ०५ नालिक ५६९ | | उद्देशक: ०४ पृथ्वी ४३० | उद्देशक: १० आराधना ५०३ | उद्देशक: ०६ पद्म ५८४ | उद्देशक: ०५ आहार | शतक - १ ५०४ | उद्देशक: ०७ कर्णिक ५८५ | उद्देशक: ०६ उपपात ४३८ | उद्देशक: ०१ जम्बू ५०५ उद्देशक: ०८ नलिन ५८९ उद्देशक: ०७ भाषा ४४० | उद्देशक: ०२ ज्योतिष्क ५०६ उद्देशक: ०९ शिवराजर्षि ५९३ उद्देशक: ०८ कर्मप्रकृति ४४४ | उद्देशका: ०३-३० अंतविप ५१० उद्देशक: १० लोक ५९४ | उद्देशक: ०९ अनगारवैक्रिय ४४५ | उद्देशक: ३१ असोच्चा ५१४ | उद्देशक: ११ काल ५९५ उद्देशक: १० समुदघात | उद्देशक: ३२ गांगेय ५२५ उद्देशक: १२ आलभिका ... शतकं- १४..... ४६० उद्देशक: ३३ कुण्डग्राम | शतकं - १२..... ५९६ उद्देशक: ०१ चरम उद्देशक: ३४ परुषघातक ५२९ उद्देशक: ०१ शंख ६०० उद्देशक: ०२ उन्माद शतकं - १०..... ५३४ उद्देशक: ०२ जयंति ६०३ उद्देशक: ०३ शरीर ४७३ | उद्देशक: ०१ दिशा ५३७ उद्देशक: ०३ पृथ्वी ६०७ उद्देशक: ०४ पुदगल ४७७ | उद्देशक: ०२ संवृतअनगार ५३८ । उद्देशक: ०४ पुदगल ६१२ उद्देशक: ०५ अग्नि पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र- [०५], अंगसूत्र- [०५] "भगवती" मूलं एवं अभयदेवसूरि-रचिता वृत्ति: | | | | | | | | !| 15 EE !! | FIRST ... .. ~114 Page #12 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ... ४२१ ४८१ मूलाइका: ८६८ + ११४ भगवती (अगसूत्रस्य विषयानुक्रम दीप-अनुक्रमा: १०८७ मूलांक::| विषय: पृष्ठांक: मलांक: | विषय: पृष्ठांक: मूलांक: विषय: पृष्ठांक: |.....शतक - १४ ... .....शतक - १७ .....शतकं- १९ ६१५ | उद्देशक: ०६ आहार ७०६ | उद्देशक: ०४ क्रिया ४७० उद्देशक: ०८ निर्वृत्ति ६१८ | उद्देशक: ०७ संश्लिष्ट | उद्देशका: ६-११ पृथ्व्यादिकाय | उद्देशक: ०९ करण ६२४ | उद्देशक: ०८ अंतर ७१५ | उद्देशक: १२ एकेन्द्रिय ७७५ | उद्देशक: १० व्यंतर ६३१ | उद्देशक: ०९ अनगार ७१६ | उद्देशका:१३-१७ नागादिकुमार शतक - २० ६३६ | उद्देशक: १० केवली शतकं - १८ ७७९ | उद्देशक: ०१ बेईन्द्रिय शतकं - १५ | उद्देशक: ०१ प्रथम | उद्देशक: ०२ आकाश ६३७ | --गोशालक હરક | | उद्देशक: ०२ विशाखा ७८३ उद्देशक: ०३ प्राणवध शतकं - १६ ७२८ | उद्देशक: ०३ माकंदीपत्र ४८५ | उद्देशक: ०४ उपचय ६६० उद्देशक: ०१ अधिकरण ७३३ | उद्देशक: ०४ प्राणातिपात ७८६ | उद्देशक: ०५ परमाण ६६६ । उद्देशक: ०२ जरा ७३६ उद्देशक: ०५ असुरकुमार ७८९ उद्देशक: ०६ अंतर ६७० | उद्देशक: ०३ कर्म ७४० | उद्देशक: ०६ गुडवर्णादि ७९२ उद्देशक: ०७ बन्ध ६७२ | उद्देशक: ०४ जावंतिय ७४२ | उद्देशक: ०७ केवली ७९३ | उद्देशक: ०८ भूमि ६७३ | उद्देशक: ०५ गंगदत्त ७४९ | उद्देशक: ०८ अनगारक्रिया ८०१ उद्देशक: ०९ चारण ६७७ | उद्देशक: ०६ स्वप्न ७५० | उद्देशक: ०९ भव्यद्रव्य ८०३ | उद्देशक: १० आय ૬૮૨ | उद्देशक: ०७ उपयोग ७५३ उद्देशक: १० सोमिल शतक - २१ ६८३ | उद्देशक: ०८ लोक | शतकं - १९..... | वर्ग: १ शाली-आदि ०१५ ६८७ उद्देशक: ०९ बलिन्द्र ७५८ | उद्देशक: ०१ लेश्या | वर्गा:२-८ मूलअलसी, वंश, ०१८ ६८८ उद्देशक: १० अवधि ७६० उद्देशक: ०२ गर्भ | इक्षु,सेडिय, अमरुह, तुलसी ६८९ उद्देशक: ११-१४ दविपादि० ७६१ | उद्देशक: ०३ पृथ्वी शतक - २२ | शतकं- १७..... ७६५ | उद्देशक: ०४ महाश्रव ८२२ वर्गा:१-६ताड़,निम्ब,अगस्ति ०२१ ६९३ | उद्देशक: ०१ कुंजर ७६६ उद्देशक: ०५ चरम | बैंगन, सिरियक,पष्पकलिका ६९९ | उद्देशक: ०२ संयत ७६८ | उद्देशक: ०६ दवीप शतक - २३ ७०३ | उद्देशक: ०३ शैलेशी ७६९ उद्देशक: ०७ भवन ८२९ वर्गा:१-४आलू,लोही,आय,पाठा | ०२२ पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र- [०५] अंगसूत्र- [०५] "भगवती" मूलं एवं अभयदेवसूरि-रचिता वृत्ति: ०१५ ८०६ ०२१ ... ०२२ ~12~ Page #13 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ०२५ 345 ... ८५७ मूलाका: ८६८ + ११४ मूलांक:: | विषय: पृष्ठांक | शतक - २४ ८३५ | उद्देशक: ०१ नैरयिक ०२५ ८४३ | उद्देशक: ०२ परिमाण ०५१ ८४४ | उद्देशक: ०३-११नागादिकुमारा | ०५७ ८४६ | उद्देशक: १२-१६ पृथ्व्यादि। ०६१ ८५३ | उद्देशक: १७-२० बेईन्द्रियादि ०८२ उद्देशक: २१-२४ मनुष्यादि शतक - २५ ११९ उद्देशका: १-१२ लेश्या, द्रव्य, | संस्थान, युग्म,पर्यव, निर्गन्थ संयत, ओघ, भव्य, अभव्य, सम्यग्दृष्टि, मिथ्यादृष्टि शतक - २६ ९७५ उद्देशका: १-११ जीव, लेश्या, રાકર पखिय, दृष्टि, अज्ञान, ज्ञान, संज्ञा,वेद,कषाय,उपयोग,योग शतक - २७ २९१ | उद्देशका: १-११ जीव आदि-- ___जाव २६ शतक भगवती (अङ्ग)सूत्रस्य विषयानुक्रम मुलांक: | विषयः पृष्ठांक: | शतक - २८ २९२ ९९२ | उद्देशका: १-११ जीव आदि- | २९२ जाव २६ शतक | शतक - २९ २९५ ९९५ | उद्देशका: १-११ जीव आदि-- २९५ जाव २६ शतक शतकं-३० २९९ ९९८ उद्देशका: १-११ समवसरण, २९९ लेश्या आदि | शतक - ३१ ३११ १००३ | उद्देशका: १-२८ युग्म, नरक, | ३११ उपपात आदि विषयका: शतकं - ३२ ३१७ | उद्देशका: १-२८ नारक्स्य --- ३१७ | उद्वर्तन, उपपात, लेश्यादि | शतकं - ३३ ३१८ १०१८ | एकेन्द्रिय शतकानि-१२ ३१८ शतकं - ३४ ३२४ १०३३ | एकेन्द्रिय शतकानि-१२ ३२४ दीप-अनुक्रमा: १०८७ मलाक: विषय: पृष्ठाक: शतकं - ३५ ३४४ १०४४ । एकेन्द्रिय शतकानि-१२ | शतकं - ३६ | बेन्द्रिय शतकानि-१२ | शतकं - ३७ १०६१ | त्रिन्द्रिय शतक शतकं - ३८ १०६२ चतुरिन्द्रिय शतक शतकं - ३९ असंज्ञीपंचेन्द्रिय शतकानि शतकं-४० ३५९ १०६४ संजीपंचेन्द्रिय शतकानि शतकं - ४१ १०६८ से | उद्देशका: १-१९६ राशियुग्म, | ---१०७९ | व्योजराशि, दवापरयुग्मराशि कल्योजराशि इत्यादि १०६३ ९९१ २९१ 3७३--- | १०८० से | उपसंहार गाथा ---१०८६ | परिसमाप्त: -3 पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र- [०५], अंगसूत्र- [०५] "भगवती मूलं एवं अभयदेवसूरि-रचिता वृत्ति: ~13 Page #14 -------------------------------------------------------------------------- ________________ [भगवती- मूलं एवं वृत्ति:] इस प्रकाशन की विकास-गाथा यह प्रत सबसे पहले "(श्रीमद्) भगवतीसूत्र” के नामसे सन १९१८ (विक्रम संवत १९७४) में आगमोदय समिति द्वारा प्रकाशित हुई, इस के संपादक-महोदय थे पूज्यपाद आगमोद्धारक आचार्यदेव श्री आनंदसागरसूरीश्वरजी (सागरानंदसूरिजी) महाराज साहेब | __इसी प्रत को फिर से दुसरे पूज्यश्रीओने अपने-अपने नामसे भी छपवाई, जिसमे उन्होंने खुदने तो कुछ नहीं किया, मगर इसी प्रत को ऑफसेट करवा के, अपना एवं अपनी प्रकाशन संस्था का नाम छाप दिया. जिसमे किसीने पूज्यपाद् सागरानंदसूरिजी के नाम को आगे रखा, और अपनी वफादारी दिखाई, तो किसीने स्वयं को ही इस पुरे कार्य का कर्ता बता दिया और श्रीमदसागरानंदसूरिजी तथा प्रकाशक का नाम ही मिटा दिया | हमारा ये प्रयास क्यों? * आगम की सेवा करनेके हमें तो बहोत अवसर मिले, ४५-आगम सटीक भी हमने ३० भागोमे १२५०० से ज्यादा पृष्ठोमें प्रकाशित करवाए है, किन्तु लोगो की पूज्य श्री सागरानंदसूरीश्वरजी के प्रति श्रद्धा तथा प्रत स्वरुप प्राचीन प्रथा का आदर देखकर हमने इसी प्रत को स्केन करवाई, उसके बाद एक स्पेशियल फोरमेट बनवाया, जिसमे बीचमे पूज्यश्री संपादित प्रत ज्यों की त्यों रख दी, ऊपर शीर्षस्थानमे आगम का नाम, फिर शतक-वर्ग-उद्देशक-मूलसूत्र- आदि के नंबर लिख दिए, ताँकि पढ़नेवाले को प्रत्येक पेज पर कौनसा शतक, उद्देशक आदि चल रहे है उसका सरलता से ज्ञान हो शके, बायीं तरफ आगम का क्रम और इसी प्रत का सूत्रक्रम दिया है, उसके साथ वहाँ 'दीप अनुक्रम' भी दिया है, जिससे हमारे प्राकृत, संस्कृत, हिंदी गुजराती, इंग्लिश आदि सभी आगम प्रकाशनोमें प्रवेश कर शके | हमारे अनुक्रम तो प्रत्येक प्रकाशनोमें एक सामान और क्रमशः आगे बढते हुए ही है, इसीलिए सिर्फ क्रम नंबर दिए है, मगर प्रत में गाथा और सूत्रों के नंबर अलग-अलग होने से हमने जहां सूत्र है वहाँ कौंस [-] दिए है और जहां गाथा है वहाँ ||-|| ऐसी दो लाइन खींची है। हमने एक अनुक्रमणिका भी बनायी है, जिसमे प्रत्येक शतक, वर्ग एवं उद्देशक लिख दिये है और साथमें इस सम्पादन के पृष्ठांक भी दे दिए है, जिससे अभ्यासक व्यक्ति अपने चहिते शतक या विषय तक आसानी से पहँच शकता है | अनेक पृष्ठ के नीचे विशिष्ठ फूटनोट भी लिखी है, जिसमे उस पृष्ठ पर चल रहे ख़ास विषयवस्तु की, मूल प्रतमें रही हुई कोई-कोई मुद्रण-भूल की या क्रमांकन सम्बन्धी जानकारी प्राप्त होती है । शासनप्रभावक पूज्य आचार्यश्री हर्षसागरसूरिजी म.सा. की प्रेरणासे और श्री वर्धमान जैन आगममंदिर, पालिताणा की संपूर्ण द्रव्य सहाय से ये 'सवृत्तिक-आगम-सुत्ताणि' भाग-११ का मुद्रण हुआ है, हम उन के प्रति हमारा आभार व्यक्त करते है । ......मुनि दीपरत्नसागर. ~14~ Page #15 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (०५) [भाग-११]"भगवती"-अंगसूत्र-५ (मूलं+वृत्ति:) शतक [२१], वर्ग [-], अंतर्-शतक [-], उद्देशक [१], मूलं [४७०-४७२] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र- [०५], अंगसूत्र- [०५] "भगवती मूलं एवं अभयदेवसूरि-रचिता वृत्ति: प्रत सूत्रांक [४७०-४७२] CAREE "भगवती-सूत्र" [शतक-२१] Reserne दीप अनुक्रम [५६३-५६६] व्याख्यातं विंशतितमशतम् , अथावसरायातमेकविंशतितममारभ्यते, अस्य चादाषेवोदेशकवर्गसनहायेय गाथासालि कल अयसि से इक्खू दम्भे य दम्भ तुलसी य । अढेए दस वग्गा असीतिं पुण होंति उद्देसा ॥१॥ रायगिहे जाच एवं वयासी-अह भंते ! साली वीही गोधूमजवजवाणं एपसिणं भंते ! जीवा मूलत्ताए बकर्मति ते णं भंते । जीवा कओदितो उब० किं नेरइएहितो उच० तिरि० मणु देव जहा वकंतीए तहेव अथ एकविंशतितमं शतकं आरभ्यते | अत्र एकविंशतितमे शतके प्रथम-वर्ग: आरब्ध: ~15 Page #16 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (०५) [भाग-११]"भगवती"-अंगसूत्र-५ (मूलं+वृत्ति:) शतक [२१], वर्ग [१], अंतर्-शतक [-], उद्देशक [१-१०], मूलं [६८८] + गाथा पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र- [०५], अंगसूत्र- [०५] "भगवती मूलं एवं अभयदेवसूरि-रचिता वृत्ति: प्रत सूत्रांक [६८८] गाथा व्याख्या-18 उववाओ नवरं देववजं, ते णं भंते ! जीवा एगसमएणं केवतिया उववर्जति ?, गोयमा ! जहन्नेणं एको वा २१शतके प्रज्ञप्तिः ||दो वा तिन्नि वा उक्कोसेणं संखेज्जा वा असंखेजा वा उबवजंति, अवहारो जहा उप्पलुसे, तेसि गंभंते ! || वर्गः १ अभयदेवी- जीवाणं केमहालिया सरीरोगाहणा प०?, गोयमा ! जहन्नेणं अंगुलस्स असंखेजइभागं उकोसेणं घणुहपुरतं,8 शालीमु. था वृत्तिःशातेणं भंते जीचा ! नाणावरणिजस्स कम्मरस किं बंधगा अबंधगा ? जहा उप्पलुसे, एवं वेदेवि उदएवि लोदेशकः 10001 उदीरणाएवि । ते णं भंते ! जीवा किं कण्हलेस्सा नील० काउ० छवीसं भंगा विट्ठी जाव इंदिया जहा उप्पलु से, ते णमंते ! सालीवीही गोधूम जवजवगमूलगजीचे कालओ केवचिरं होति ?, गोयमा जह० अंतोमु०६ उकोसे. असंखेज़ कालं ॥ से णं भंते ! साली वीही गोधूमजवजवगमूलगजीवे पुढवीजीवे पुणरवि साली-| चीही जाय जवजवगमूलगजीवे केवतियं काल सेवेजा, केवतियं कालं गतिरागतिं करिजा?, एवं जहा उष्पलालुद्देसे, एएणं अभिलावेणं जाव मणुस्सजीवे आहारो जहा उप्पलुद्देसे ठिती जह• अंतोमुक सकोसे वासपु हुतं समुग्घायसमोहया उबट्टणा य जहा उप्पलुद्देसे । अह भंते ! सबपाणा जाव सहमत्ता साली बीही जाव जवजवगमूलगजीवसाए उववन्नपुवा ?, इंता गोयमा! असतिं अदुवा अर्णतखुत्तो । सेवं भंते !२सि || (सर्व ६८८)॥२१-१॥ ॥८००॥ 6 साली त्यादि सूत्रम्, 'सालि'त्ति शाल्यादिधान्यविशेषविषयोद्देशकदशात्मकः प्रथमो वर्गः शालिरेवोच्यते, एचमन्य नापीति, उद्देशकदशकं चैवं-"मूले १ कंदे २ खंधे ३ तया य ४ साले ५ पवाल ६ पत्ते य ७। पुप्फे ८फल १ बीए १० SACROCACANCCC दीप अनुक्रम [८०६ [واه۔ • अत्र प्रत्येक वर्गे दश-दश उद्देशका; सन्ति ~16 Page #17 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (०५) [भाग-११]"भगवती"-अंगसूत्र-५ (मूलं+वृत्ति:) शतक [२१], वर्ग [१], अंतर्-शतक [-], उद्देशक [१-१०], मूलं [६८८] + गाथा पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र- [०५], अंगसूत्र- [०५] "भगवती मूलं एवं अभयदेवसूरि-रचिता वृत्ति: प्रत सूत्रांक [६८८] गाथा विय एकेको होइ उद्देसो ॥१॥” इति, 'कल'त्ति कलायादिधान्यविषयो द्वितीयः २'अयसित्ति अतसीप्रभृतिधान्य-| विषयस्तृतीयः इ 'वंसे'त्ति वंशादिपर्वगविशेषविषयश्चतुर्थः ४'इक्खुत्ति इक्ष्वादिपर्वगविशेषविषयः पञ्चमः ५'दन्भे'त्ति दर्भशब्दस्योपलक्षणार्थत्वात् 'सेडियभडियकोन्तियदन्भे' इत्यादितृणभेदविषयः षष्ठः ६ 'अन्भे'त्ति वृक्षे समुत्पन्नो विजातीयो वृक्षविशेषोऽध्यवरोहकस्तत्प्रभृतिशाकपायवनस्पतिविषयः सप्तमः ७ 'तुलसी यत्ति तुलसीप्रभृतिवनस्पतिविषयोऽ-६ टमो वर्ग: ८ 'अद्वैते दसवग्ग'त्ति अष्टावेतेऽनन्तरोक्ता दशानां दशानामुद्देशकानां सम्बन्धिनो वर्गाः-समुदाया दशवर्गा अशीतिः पुनरुदेशका भवन्ति, वर्गे वर्गे उद्देशकदशकभावादिति, तत्र प्रथमवर्गस्तत्रापि च प्रथम उद्देशको व्याख्यायते, 18 तस्य चेदमादिसूत्रम्-'रायगिहें इत्यादि, 'जहा वकंतीए'त्ति यथा प्रज्ञापनायाः षष्ठपदे, तत्र चैवमुत्पादो-नो नारकेभ्य ||४ | उत्पद्यन्ते किन्तु तिर्यग्मनुष्येभ्यः, तथा व्युत्क्रान्तिपदे देवानां वनस्पतित्पत्तिरुक्ता इह तु सा न वाच्या मूले देवानामनुत्पत्तेः पुष्पादिष्वेव शुभेषु तेषामुत्पत्तेरत एवोकं 'नवरं देववनं'ति । 'एको वेत्यादि, यद्यपि सामान्येन वनस्पतिषु प्रतिसमयमनन्ता उत्पद्यन्त इत्युच्यते तथाऽपीह शाल्यादीनां प्रत्येकशरीरत्वादेकाद्युत्पत्तिन विरुद्धेति । 'अवहारो जहा उप्पलु-५ देसपत्ति उत्पलोद्देशक एकादशशतस्य प्रथमस्तत्र चापहार एवं-ते णं भंते ! जीवा समये २ अवहीरमाणा २ केवतिकालेणं अवहीरंति ?, गोयमा ! ते णं असंखेजा समए २ अवहीरमाणा २ असंखेज्जाहिं उस्सप्पिणीहिं अवसप्पिणीहिं अवहीरंति नो चेव णं अवहिया सिय'त्ति 'ते णं भंते ! जीवा णाणावरणिज्जस्स कम्मस्स किं बंधगा अबंधगा?" इतः परं यदुक्तं | || 'जहा उप्पलुसए'त्ति अनेनेदं सूचित-गोयमा! नो अबंधगा बंधए वा बंधगा येत्यादि, एवं वेदोदयोदीरणा अपि वाच्या, दीप अनुक्रम [८०६ [واه۔ अत्र प्रत्येक वर्गे दश-दश उद्देशका; सन्ति ~17~ Page #18 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (०५) [भाग-११]"भगवती"-अंगसूत्र-५ (मूलं+वृत्ति:) शतक [२१], वर्ग [१], अंतर्-शतक [-], उद्देशक [१-१०], मूलं [६८८] + गाथा पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र- [०५], अंगसूत्र- [०५] "भगवती मूलं एवं अभयदेवसूरि-रचिता वृत्ति: प्रत IAN सूत्रांक [६८८] गाथा व्याख्या. हा लेश्यासु तु तिसषु पडूविंशतिर्भङ्गाः-एकवचनान्तवे ३ बहुवचनान्तत्वे ३ तथा त्रयाणां पदानां त्रिषु द्विकसंयोगेषु प्रत्येक २१ शतके प्रज्ञप्तिः चतुर्भङ्गिकाभावाद् द्वादश एकत्र च त्रिकसंयोगेऽष्टाविति षड्विंशतिरिति । 'दिट्ठी'त्यादि, दृष्टिपदादारभ्येन्द्रियपदं यावदु वर्ग:१ अभयदेवी- दुत्पलोद्देशकवन्नेयं, तत्र दृष्टौ मिथ्यादृष्टयस्ते ज्ञानेऽज्ञानिनः योगे काययोगिनः उपयोगे द्विविधोपयोगाः, एवमन्यदपि तत | शालीक. या वृत्तिः२/४ | एव वाच्यं । 'से णं भंते इत्यादिना 'असंखेज काल' मित्येतदन्तेनानुबन्ध उक्तः, अथ कायसंवेधमाह-'से ण'मित्यादि, न्दादिउद्दे. 1८०॥ ४ 'एवं जहा उप्पलुद्देसपत्ति, अनेन चेदं सूचितं-'गोयमा ! भवादेसेणं जहन्नेणं दो भवग्गहणाई उकोसेणं असंखेज्जाई २-१०कभवग्गणाई कालादेसेणं जहन्नेणं दो अंतोमुहुत्ता उक्कोसेणं असंखेज काल मित्यादि, 'आहारो जहा उप्पलुद्देसए'त्ति एवं लायादिचासौ-'ते णं भंते ! जीवा किमाहारमाहारेंति !, गोयमा! दवओ अणंतपएसियाई' इत्यादि, 'समुग्धाए' इत्यादि, मूलादिव अनेन च यत्सूचितं तदर्थलेशोऽयं-तेषां जीवानामाधास्त्रयः समुद्धातास्तथा मारणान्तिकसमुद्घातेन समवहता नियन्ते | असमवहता वा, तथोसास्ते तिर्यक्षु मनुष्येषु चोत्पद्यन्त इति ॥ एकविंशतितमशते प्रथमः ॥ २१-१॥ द६८९.६९० अह भंते ! साली वीही जाव जवजवाणं एएसिणं जे जीवा कंदत्ताए वक्कमति ते णं भंते!जीवा कओहिंतो उववजंति एवं कंदाहिकारेण सचेव मूलुद्देसो अपरिसेसो भाणियबो जाव असति अदुवा अर्णतखुत्तो है ॥८०१॥ सेवं भंते २ त्ति ॥२१-२॥ एवं खंधेवि उद्देसओ नेयवो ॥२१-शा एवं तयाएवि उद्देसो भाणियबो ॥ २१-४॥ सालेवि उद्देसोभाणियत्वो॥२१-५॥ पवालेवि उद्देसो भाणियबो॥२१-६॥ पत्तेवि उद्देसो भाणियहो।।२१-७॥ एए SANCHAR दीप अनुक्रम [८०६ [قاهے۔ अत्र एकविंशतितमे शतके प्रथम-वर्ग: परिसमाप्त: अथ एकविंशतितमे शतके द्वितियात् अष्टमपर्यन्ता: वग्र्गा: आरब्धा: • अत्र प्रत्येक वगर्गे दश-दश उद्देशका; सन्ति ~18~ Page #19 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (०५) [भाग-११]"भगवती"-अंगसूत्र-५ (मूलं+वृत्ति:) शतक [२१], वर्ग [२-८], अंतर्-शतक [-], उद्देशक [१-१०], मूलं [६८९-६९०] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र- [०५], अंगसूत्र- [०५] "भगवती मूलं एवं अभयदेवसूरि-रचिता वृत्ति: प्रत सूत्रांक [६८९-६९० SACROSROSSASSACROR सत्तवि उसगा अपरिसेसं जहा मूले तहा नेयवा ॥ एवं पुप्फेवि उद्देसओ नवरं देवा ववज्जति जहा उष्पलसे चत्तारि लेस्साओ असीति भंगा ओगाहणा जह• अंगुलस्स असंखेजइभागं उक्कोसेणं अंगुलपुहुत्तं * सेसं तं चेव सेवं भंते ! २॥२१८॥ जहा पुप्फे एवं फलेवि उद्देसओ अपरिसेसो भाणियबो॥२१-९॥ एवं बीएवि ४/ & उद्देसओ ॥२१-१०॥ एए दस उद्देसगा। पढमो वग्गो समत्तो॥२१-१(सूत्रं ६८९)। अह भंते कलायमसूरति लमुग्गमासनिष्फावकुलत्थआलिसंदगसडिणपलिमंथगाणं एएसि णं जे जीवा मूलत्ताए वक्कमंति ते णं भंते! जीवा कओहिंतो उवव०१ एवं मूलादीया दस उद्देसगा भाणियबा जहेव सालीणं निरवसेसं तं चेव ॥४ चितिओ वग्गो समत्तो॥२१-२॥ अह भंते ! अयसिकुसुंभकोहवकंगुरालगतुवरीकोदूसासणसरिसवमूलग-18 बीयाणं एएसिणं जे जीवा मूलत्ताए वक्कमति ते णं भंते ! जीवा कओहिंतो उक्वजंति ? एवं एत्थवि मूला दीया दस उद्देसगा जहेब सालीणं निरवसेसं तहेव भाणियचं ॥ तइओ बग्गो समतो ॥ २१-३ ॥ अह भंते ! दावंसवेणुकणकककासपारवंसदंडाकुडाविमाचंडावेणुयाकल्लाणीणं एएसि णं जे जीवा मूलत्ताए बक्कमति एवं एथवि मूलादीया दस उद्देसगा जहेव सालीणं, नवरं देवो सबस्थवि न उववजति, तिनि लेसाओ सबथवि। छवीसं भंगा सेसं तं च ॥च उत्थो वग्गो समत्तो ॥२१-४॥ अह भंते ! उक्खुइक्खुवाडियावीरणाइकडभमाहाससंठिसत्तवेत्ततिमिरसतपोरगनलाणं एएसिणं जे जीवा मलत्ताए वकर्मति एवं जहेव बंसवग्गो तहेव एस्थवि मूलादीया दस उद्देसगा, नवरं खंधुद्देसे देवा उववजंति, चत्तारि लेसाओ सेसं तं चेव ॥ पंचमो अनुक्रम [८०८-८२१] अत्र प्रत्येक वर्गे दश-दश उद्देशका; सन्ति ~19 Page #20 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (०५) [भाग-११]"भगवती"-अंगसूत्र-५ (मूलं+वृत्ति:) शतक [२१], वर्ग [२-८], अंतर-शतक [-], उद्देशक [१-१०], मूलं [६८९-६९०] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र- [०५], अंगसूत्र- [०५] "भगवती मूलं एवं अभयदेवसूरि-रचिता वृत्ति: प्रत सूत्रांक [६८९-६९० वग्गो समत्तो ।। २१-५ ॥ अह भंते । सेडियमंडियदम्भकोतियभकुसदभगयोहदलअंजुलआसाढगरोहि- २१ शतके यसमुतवखीरभुसएरिंडकुरुभकुंदकरवरसुंठविभंगुमहुवयणधुरगसिप्पियसंकलितणाणं एएसिणं जे जीवा वर्ग: १ अभयदेवी-|| मूलत्ताए वकर्मति एवं एस्थति दस उद्देसगा निरचसेसं जहेव वंसस्स ॥ छट्टो वग्गो समत्तो ॥ २१-६ ॥ अह|| IN शालीकया वृत्तिः२ भंते ! अम्भरुहयोयाणहरितगतंदुलेवगतणवत्धुलचोरगमज्जारयाईचिल्लियालक्कदगपिपलियदविसोधिकसा न्दादिउद्दे २-१० क. ॥८०२॥ यमंडुक्किमूलगसरिसवअंबिलसागजिवंतगाणं एएसि णं जे जीवा मूल एवं एत्थवि दस उद्देसगा जहेव पंसस्स ॥3 सत्तमो वग्गो समत्तो ॥ २१-७ ॥ अह भंते ! तुलसीकण्दलफणेजाअज्जाचूयणाचोराजीरादमणामरुयाई दीव-13 मूलादिव. लायादिरसयपुप्फा णं एएसिणं जे जीवा मूलंत्ताए वकर्मति एत्थवि दस उद्देसगा निरवसेसं जहा साणं॥अट्ठमो वग्गो :२-१० समत्तो।।२१-८॥ एवं एएम अहसु बग्गेसु असीर्ति उद्देसगा भवंति।। (सूर्व ६९०) एकचीसतिमं सर्य समत्तं ॥२१॥ ____ एवं समस्तोऽपि वर्गः सूत्रसिद्धः, एवमन्येऽपि नवरमशीतिर्भङ्गा एवं-चतसृषु लेश्यास्वेकत्वे ४ बहुवे ४ तथा पदच- ६८९.६९० PIतुष्टये षट्सु द्विकसंयोगेषु प्रत्येक चतुर्भनिकासद्भावात् २४ तथा चतुर्ष त्रिकसंयोगेषु प्रत्येकमष्टानां सद्भावात् १२ चतु कसंयोगे च १६ एवमशीतिरिति, इह चेयमवगाहनाविशेषाभिधायिका वृद्धोक्का गाथा-"मूले कंदे खंधे तयाय साले प-14 वाल पत्ते य । सत्तसुवि धणुपुहुत्तं अंगुलिमो पुप्फफलवीए ॥१॥"[मूले कन्दे स्कन्धे त्वचि शाले प्रवाले पत्रे च सप्तस्वपि IT ॥८०२॥ धनुष्पृथक्वं पुष्पफलबीजेष्वङ्गलीपृथक्त्वम् ॥ १॥] इति ॥ ॥ एकविंशतितमशतं वृत्तितः परिसमाप्तम् ॥ एकविंशं शतं प्रायो, व्यक्तं तदपि लेशतः। व्याख्यातं सद्गुणाधायी, गुडक्षेपो गुडेऽपि यत् ॥१॥ अनुक्रम [८०८-८२१] अथ एकविंशतितमे शतके द्वितियात् अष्टमपर्यन्ता: वर्गा: परिसमाप्ता: • अत्र प्रत्येक वर्गे दश-दश उद्देशका; सन्ति तत् परिसमाप्ते एकविंशतितमं शतकं अपि परिसमाप्तं -~-20~ Page #21 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (०५) [भाग-११]"भगवती"-अंगसूत्र-५ (मूलं+वृत्ति:) शतक [२२], वर्ग [१-६], अंतर्-शतक [-], उद्देशक [१-१०], मूलं [६९१] + गाथा पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र- [०५] अंगसूत्र- [०५] "भगवती" मूलं एवं अभयदेवसूरि-रचिता वृत्ति: प्रत सूत्रांक [६९१] गाथा व्याख्यातमेकविंशतितमं शतम् , अथ क्रमायातं बाविंशं व्याख्यायते, तस्य चादावेवोद्देशकवर्गसनहायेयं गाथा-1 तालेगट्टियषहुबीयगा य गुच्छा य गुम्म वल्ली य । छद्दस वग्गा एए सढि पुण होंति उद्देसा ॥१॥रायगिहे जाव एवं वयासी-अह भंते ! तालतमालतकलितेतलिसालसरलासारगल्लाणं जाव केयतिकदलचम्मरुक्खगुंतरुक्खहिंगुरुक्खलवंगरुक्खपूयफलखजूरिनालएरीणं एएसिणं जे जीवा मूलत्साए वकमंति ते णं भंते ! जीवा कओहिंतो उपवजंति ?, एवं एस्थति मूलादीया दस उद्देसगा कायया जहेव सालीणं, नवरं इमं नाणत्तं मूले कंदे खंधे तयाय साले य एएसु पंचसु उद्देसगेसुदेवो न उववजति, तिन्नि लेसाओ, ठिती जहन्नेणं अंतोमु०४ उकोसेणं दसवाससहस्साई, उवरिल्लेसु पंचसु उद्देसएसु देवो उववज्जति, चत्तारि लेसाओ ठिती जहन्नेणं अंतोमु० उक्कोसेणं वासपुहुत्तं ओगाहणा मूले कंदे घणुहपुरत्तं खंधे तयाय साले य गाउयपुहुत्तं पवाले पत्ते |धणुहपुरतं, पुप्फे हत्थपुहत्तं, फले बीए य अंगुलपुहुतं, सबेसिं जहन्नेणं अंगुलस्स असंखेजहभागं सेसं जहा सालीणं, एवं एए दस उद्देसगा ॥ पढमो वग्गो समत्तो ॥२२-१॥ अह भंते ! निबंधजंबुकोसंवतालअंकोक्लपीलुसेलुसल्लइमोथइमालुयचउलपलासकरंजपुत्तंजीवपरिवहेडगहरितगभल्लायउंबरियखीरणिधायईपिया लपूझ्यणिवायगसेण्हयपासियसीसवअयसिपुन्नागनागरुक्खसीवन्नअसोगाणं एएसि णं जे जीवा मूलत्ताए वक्क-31 5 मंति एवं मूलादीया दस उद्देसगा कायबा निरवसेसं जहा तालवग्गो । वितिओ वग्गो समसो ॥ २२-२॥ अह भंते ! अस्थियातिंदुयवोरकविट्ठअंबाडगमाउलिंगविल्लामलगफणसदाडिमभासत्थउंबरवडणग्गोह-|| दीप CACANCCAKASH अनुक्रम [८२२-८२८] अत्र द्वाविंशतितमं शतकं आरभ्यते दवाविंशतितम-शतके षड़ वर्गा: वर्तते, प्रतेक वर्गे दश-दश उद्देशका: सन्ति ~21 Page #22 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (०५) [भाग-११]"भगवती"-अंगसूत्र-५ (मूलं+वृत्ति:) शतक [२२], वर्ग [१-६], अंतर्-शतक [-], उद्देशक [१-१०], मूलं [६८८] + गाथा पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र- [०५], अंगसूत्र- [०५] "भगवती मूलं एवं अभयदेवसूरि-रचिता वृत्ति: प्रत सूत्रांक [६९१] मूलादि गाथा व्याख्या- नंदिरुक्खपिप्पलिसतरपिलक्खुरुक्खकाउंबरियकुच्छंभरियदेवदालितिलगलउयछत्तोहसिरीससत्तवन्नदहिवन २२ शतके प्रज्ञप्तिः लोधवचंदणअजुणणीचकुडुगकलंबाणं एएसि ण जे जीवा मूलत्ताए वकमंति ते णं भंते ! एवं एस्थवि || | तालादिअभयदेवी-द मूलादीया दस उद्देसगा तालवग्गसरिसा नेयवा जाव बीयं ॥ तइओ वग्गो समत्तो ॥२२-३ ॥ अह भंते ! या वृत्तिः२वाइंगणिअल्लइपोडइ एवं जहा पन्नवणाए गाहाणुसारेणं णेयई जाव गंजपाडलावासिअंकोल्लाणं एएसिणं | वर्गाः६सू ॥४०॥13 जे जीवा मूलत्ताए वकर्मति एवं एथवि मूलादीया दस उद्देसगा तालवग्गसरिसा नेयमा जाव बीयंति ६९१ दानिरवसेसं जहा सवग्गो । चउत्थो घग्गो समत्तो ॥२२-४ ॥ अह भंते ! सिरियकाणवनालियकोरंटगबंधु-ट जीवग मणोजा जहा पन्नवणाए पढमपदे गाहाणुसारेणं जाव नलणी य कुंदमहाजाईणं एएसिणं जे जीवा मूलत्ताए वक्कमंति एवं एत्यवि मूलादीया दस उद्देसगा निरवसेसं जहा सालीर्ण ॥ पंचमो वग्गो सम्मत्तो C॥२२-५ ॥ अह भंते ! पूसफलिकालिंगीतुंबीत उसीएलावालंकी एवं पदाणि छिदियवाणि पनवणागाहाणसारेणं जहा तालवग्गे जाव धिफोल्लइकाकलिसोक्कलिअकबोंदीणं एएसिणं जे जीवा मूलत्ताए वकर्मति एवं मूला-12 दीया दस उ. कायबा जहा तालवग्गो नवरं फलउद्देसे ओगाहणाए जहन्ने अंगुल० असंखे० भागं उको |धणुहपुहुत्तं ठिती सवत्थ जहन्नेणं अंतोमु० उक्कोसेणं वासपुहत्तं सेसं तं चेव । छट्ठो बग्गो समत्तो ॥२२-६ ॥ 11८०३!! एवं छवि बग्गेस सहि उद्देसगा भवति ॥ (सूत्र ६९१) बावीसतिम सयं सम्मत्तं ॥२२॥ 'ताले त्यादि, तत्र 'ताले'त्ति ताडतमालप्रभृतिवृक्षविशेषविषयोद्देशकदशकात्मकः प्रथमो वर्गः, उद्देशकदशकं च ४ दीप RA अनुक्रम [८२२-८२८] द्वाविंशतितम-शतके षड़ वर्गा: वर्तते, प्रतेक वगर्गे दश-दश उद्देशका: सन्ति ~22 Page #23 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (०५) [भाग-११]"भगवती"-अंगसूत्र-५ (मूलं+वृत्ति:) शतक [२२], वर्ग [१-६], अंतर्-शतक [-], उद्देशक [१-१०], मूलं [६८८] + गाथा पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र- [०५], अंगसूत्र- [०५] "भगवती मूलं एवं अभयदेवसूरि-रचिता वृत्ति: प्रत सूत्रांक [६९१] २%ABAR ६ मूलकन्दादिविषयभेदात् पूर्ववत् । 'एगट्टिय'त्ति एकमस्थिकं फलमध्ये येषां ते तथा, ते च निम्बाघजम्बूकौशाम्बादयस्ते | द्वितीये वाच्याः । 'बहुबीयगा यत्ति बहुनि बीजानि फलानि येषां ते तथा, ते चास्थिकतेन्दुकबदरकपित्थादयो वृक्षविशे पास्ते तृतीये वाच्याः। 'गुच्छा पति गुच्छा-वृन्ताकीप्रभृतयस्ते चतुर्थे वाच्याः 'गुम्म'त्ति गुल्माः सिरियकनवमालिका४ कोरण्टकादयस्ते पञ्चमे वाच्याः 'चल्ली यत्ति वायः पुंफलीकालिङ्गीतुम्बीप्रभृतयस्ताः षष्ठे वर्गे वाच्या इत्येवं पष्ठवर्गो बल्लीत्यभिधीयते 'छदसवग्गा एए ति षड्दशोद्देशकप्रमाणा वर्गा 'एते' अनन्तरोक्ताः अत एव प्रत्येकं दशोद्देशकममाणत्वात् वर्गाणामिह षष्टिरुद्देशका भवन्तीति ॥ इदं च शतमनन्तरशतवत्सर्वं व्याख्येयं, यस्तु विशेषः स सूत्रसिद्ध एव, इयं चेह वृद्धोक्ता गाथा-"पत्त पवाले पुप्फे फले य बीए य होइ उववाओ । रुक्खेसु सुरगणाणे पसत्थरसवन्नगंधेसु ॥१॥[सुरग-10 णानामुत्पादः प्रशस्तरसवर्णगन्धवतां वृक्षाणां पत्रे प्रवाले पुष्पे फले बीजे च भवति ॥ १॥] इति ॥ द्वाविंशतितमशतं । वृत्तितः परिसमाप्तम् ।। २२ ॥ द्वाविंशं तु शतं व्यक्तं, गम्भीरं च कथञ्चन । व्यक्तगम्भीरभावाभ्यामिह वृत्तिः करोतु किम् ॥१॥ गाथा R दीप अनुक्रम [८२२-८२८] ECORDERS व्याख्यातं द्वाविंशं शतम् , अधावसरायातं त्रयोविशं शतमारभ्यते, अस्य चादावेवोद्देशकवर्गसङ्गाहायेयं गाथा नमो मुयदेवयाए भगवईए ॥ आलुयलोहो अषया पाढी तह मासवन्निवल्ली य । पंचेते दसवग्गा पन्नासा ल होति उद्देसा ॥१॥ रायगिहे जाव एवं० अह भंते ! आलुयमूलगसिंगबेरहलिहरुक्खकंडरियजारुच्छीरबिरालि अत्र द्वाविंशतितमं शतकं परिसमाप्तं अत्र त्रयोविंशतितमं शतकं आरभ्यते ~230 Page #24 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (०५) [भाग-११]"भगवती"-अंगसूत्र-५ (मूलं+वृत्ति:) शतक [२३], वर्ग [१-५], अंतर्-शतक [-], उद्देशक [१-१०], मूलं [६९२] + गाथा पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र- [०५], अंगसूत्र- [०५] "भगवती मूलं एवं अभयदेवसूरि-रचिता वृत्ति: प्रत सूत्रांक [६९२] व्याख्या-किढिकुंदुकण्हकडडसुमहुपयलइमहुर्सिगिणिरुहासप्पसुगंधा छिन्नरूहा बीयरुहा णं एएसिणं जे जीवा मूलत्साए २३ शतके प्रज्ञप्तिःवकर्मति एवं मूलादीपा दस ज० कायवा वंसवग्गसरिसा नवरं परिमाणं जहनेणं एको वा दो वा तिन्नि वा आलुकाअभयदेवी- उकोसेणं संखेजा असंखेज्जा चा अणंता वा उवववति, अवहारो गोयमा! ते णं अणंता समये अवहीरमाणा २ सू६९२ या वृत्तिः२४ अर्णताहि ओसप्पिणीहिं उस्सप्पिणीहिं एवतिकालेणं अवहीरंति नो चेव णं अवहरिया सिया ठिती जहन्नेणवि 11८०४॥ उक्कोसेणवि अंतोमुहुत्तं, सेसं तं चेव ॥ पढमो वग्गोसमत्तो ॥२२-२॥ अहभंते ! लोहीणीहधीहथिवगा अस्स-x कन्नी सीउंदी मुसंढीणं एएसिणं जीवा मूल एवं एत्थवि दस उद्देसगा जहेव आलुबग्गे, गवरं ओगाहणा ताल. 5 वग्गसरिसा, सेसं तं चेव सेवं भंते ! ॥ वितिओ वग्गो समत्तो ॥२३-२॥ अह भंते। आयकायकुहुण-19 कुंदुरुकउवह लियासफासजाउत्तावंसाणियकुमाराणं एतेसि णं जे जीवा मूलत्साए एवं एस्थवि मूलादीया दस उद्देसगा निरवसेसं जहा आलुवग्गो नवरं ओगाहणा तालुवग्गसरिसा, सेसं तं चेव, सेवं भंते।२त्ति॥ तइओ वग्गो समत्तो ॥२३-३ ॥ अह भंते ! पाढामिए वालंकि मधुररसारा वल्लिपउमामोंढरिइंतिचंडीणं एतेदसिणं जे जीवा मूल एवं एथवि मूलादीया दस उद्देसगा आलुयवग्गसरिसा नवरं ओगाहणा जहा वल्लीण, सेसं तं चेव, सेवं भंते !२त्ति ॥ चउत्थो वग्गो समत्तो ॥२३-४॥ अह भंते ! मासपन्नीमुग्गपन्नीजीवस- ८०४॥ रिसवकएणुयकाओलिखीरकाकोलिभंगिणहिकिमिरासिभहमुच्छणंगलापओयकिणापउलपाढेहरेणुयालोहीणं । एएसि णं जे जीवा मूल एवं एस्थचि दस उद्देसगा निरवसेसं आलयवग्गसरिसा ॥ पंचमो बग्गो गाथा - 2450- 545-60% दीप अनुक्रम [८२९-८३४] •त्रयोविंशतितमं शतके पञ्च-वग्र्गा: वर्तते, प्रत्येक वर्गे दश-दश उद्देशका: सन्ति ~24 Page #25 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (०५) [भाग-११]"भगवती"-अंगसूत्र-५ (मूलं+वृत्ति:) शतक [२३], वर्ग [१-५], अंतर्-शतक [-], उद्देशक [१-१०], मूलं [६९२] + गाथा पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र- [०५], अंगसूत्र- [०५] "भगवती मूलं एवं अभयदेवसूरि-रचिता वृत्ति: X प्रत सूत्रांक [६९२] X X समत्तो ॥ २३-५ ॥ एवं एत्थ पंचसुचि बग्गेसु पन्नासं उद्देसगा भाणियचा सवत्थ देवा ण उववजंतित्ति तिन्नि | |लेसाओ। सेवं भंते।२॥ तेवीसइमं सयं समत्तं ॥ २३ ॥(सूत्र ६९२) __'आलुए'त्यादि, तत्र 'आलुय'त्ति आलुकमूलकादिसाधारणशरीरवनस्पतिभेदविषयोद्देशकदशकात्मकः प्रथमो वर्गः, 'लोही'ति लोहीप्रभृत्यनन्तकायिकविषयो द्वितीयः 'अवईत्ति अवककवकप्रभृत्यनन्तकायिकभेदविषयस्तृतीयः 'पाढत्ति पाठामृगवालुङ्कीमधुररसादिवनस्पतिभेदविषयश्चतुर्थः 'मासवनीमुग्गवन्नी यत्ति माषपर्णीमुद्गपर्णीप्रभृतिवल्लीविशेषवि-x षयः पञ्चमः तन्नामक एवेति, पञ्चैतेऽनन्तरोक्ता दशोद्देशकप्रमाणा वर्गा दशवर्गाः यत एवमतः पञ्चाशदुद्देशका भवन्तीह है शत इति ॥ त्रयोविंशतितमशतं वृत्तितः परिसमाप्तम् ॥ २३ ॥ प्राक्तनशतवनेय, अयोविंशं शतं यतः । प्रायः समं तयो रूपं, व्याख्याऽतोऽत्रापि निष्फला ॥१॥ गाथा दीप ********** अनुक्रम [८२९-८३४] व्याख्यातं त्रयोविंशं शतम् , अथावसरायातं चतुविशं शत, व्याख्यायते, तस्य चादावेवेदं सर्वोदेशकद्वारसग्रहगाथाद्वयम् उवचायपरीमाणं संघयणुचत्तमेव संठाणं । लेस्सा दिट्ठी णाणे अन्नाणे जोग उवओगे ॥१॥ सन्नाकसायइंदि| यसमुग्धाया वेदणा य वेदे य । आ अज्झवसाणा अणुबंधो कायसंवेहो ॥२॥ जीवपदेजीवपदे जीवाणं दंडगंमि उद्देसो । चउचीसतिमंमि सए चउचीसं होंति उद्देसा ॥३॥रायगिहे जाव एवं वयासी-णेरइयाणं | weredturary.com अत्र त्रयोविंशतितमं शतकं परिसमाप्तं अत्र चतुर्विंशतितमं शतकं आरभ्यते -~-25 Page #26 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (०५) [भाग-११]"भगवती"-अंगसूत्र-५ (मूलं+वृत्ति:) शतक [२४], वर्ग [-], अंतर्-शतक [-1, उद्देशक [१], मूलं [६९३] + गाथा: पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र- [०५], अंगसूत्र- [०५] "भगवती मूलं एवं अभयदेवसूरि-रचिता वृत्ति: प्रत सूत्रांक [६९३]] गाथा व्याख्या- भंते ! कओहिंतो उववनंति किं नेरइएहितो उववजति तिरिक्खजोणिएहितो उववजंति मणुस्सेहितो उव-18 २४ शतके प्रज्ञप्तिः कवचंति देवेहितो उववज्जति ?,गोयमाणो नेरइएहितो उवयजति तिरिक्खजोणिएहितोवि उववजंति मणुस्से- उद्देशः१ अभयदा-15 हितोवि ववजति णो देवेहिंतो उववजंति, जइ तिरिक्वजोणिएहिंतो उववजंति किं एगिदियतिरिक्खजोणि-1|| असज्ञिपया वृत्तिः२ । एहिंतो उववर्जति बेइंदियतिरिक्खजोणिय तेइंदियतिरिक्खजोणिय० चरिंदियतिरिक्खजोणिय पचिं यन्तोत्पादः ॥८०५ दियतिरिक्खजोणिएहितो उपवजंति ?, गोयमा ! नो एगिदियतिरिक्खजोणिएहिंतो उववजंति णो दिया। सू ६९३ णो तेइंदिय० णो चरिंदिय० पंचिंदियतिरिक्खजोणिएहिंतो उववजति, जइ पचिंदियतिरिक्खजोणिएहितो उववजति किं सनीपंचिंदियतिरिक्खजोणिएहिंतो उववजंति असन्नीपंचिंदियतिरिक्खजोगिएहितो उवव-18 जंति ?, गोयमा ! सन्निपंचिंदियतिरिक्खजोणिएहिंतो उववजंति असन्निपंचिंदियतिरिक्खजोणिएहिंतोषि |उववजंति, जह सन्निपंचिंदियतिरिक्खजोणिएहिंतो उववजंति किं जलचरेहिंतो उवधाजंति थलचरेहिंतो उव-|| वजति खहचरेहिंतो उववनंति ?, गोयमा ! जलचरेहिंतो उववजंति थलचरेहिंतोवि उववनंति खहचरेहि| तोवि उववजंति, जइ जलचरथलचरखहचरेहितो उपवजंति किं पजत्तएहिंतो उवववति अपजत्तएहितो उववजंति ?, गोयमा! पजत्तएहिंतो उववनंति णो अपजत्तएहिंतो उववजंति, पजत्ताअसन्निपंचिंदियतिरि-1211८०५॥ क्खजोणिए णं भंते ! जे भविए नेरइएमु अववजित्तए से णं भंते ! कतिसु पुढवीसु उववज्जेजा ?, गोयमा || एगाए रयणप्पभाए पुढचीए उववजेजा, पजत्ताअसन्निपंचिंदियतिरिक्खजोणिए णं भंते ! जे भविए रयण दीप अनुक्रम [८३५ -८३८] weredturary.com असंज्ञी-पर्यंत: उत्पत्ति: ~26 Page #27 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (०५) [भाग-११]"भगवती"-अंगसूत्र-५ (मूलं+वृत्ति:) शतक [२४], वर्ग [-], अंतर्-शतक [-1, उद्देशक [१], मूलं [६९३] + गाथा: पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र- [०५], अंगसूत्र- [०५] "भगवती मूलं एवं अभयदेवसूरि-रचिता वृत्ति: कर प्रत सूत्रांक [६९३] गाथा SASARASSES प्पभाए पुढचीए नेरइएमु उववजित्तए से णं भंते ! केवतिकालहितीएसु उववजेजा?, गोयमा ! जहन्नेणं दसवाससहस्सद्वितीएसु उकोसेणं पलिओचमस्स असंखेजइभागद्वितीएसु उववजेजा १,ते णं भंते ! जीवा का एगसमएणं केवतिया उववज्जति ?, गोयमा ! जहलेणं एको वा दो वा तिन्नि वा उक्कोसेणं संखेना वा असं| खेज्जा वा उववर्जति २, तेसि णं भंते ! जीवाणं सरीरगा किंसंघयणी पन्नत्ता ?, गोयमा! छेवट्ठसंघयणी प०३, तेसिणं भंते ! जीवाणं केमहालिया सरीरोगाहणा पन्नत्ता ?, गोयमा ! जहन्नेणं अंगुलस्स असंखेजइभागं उक्कोसेणं जोयणसहस्सं ४, तेसि णं भंते ! जीवाणं सरीरगा किंसंठिता पन्नत्ता ?, गोयमा ! हुंडसंठाणसंठिया पन्नता, ५तेसि णं भंते ! जीवाणं कति लेस्साओ प, गोतिमि लेस्साओ पतं०-कण्हशालेस्सा नीललेस्सा काउलेस्सा ६, ते णं भंते ! जीवा किं सम्मदिही मिच्छादिट्ठी सम्मामिच्छादिट्ठी, गोयमा! णो सम्मदिही मिच्छादिट्टी णो सम्मामिच्छादिट्टी७, ते णं भंते ! जीवा किं णाणी अन्नाणी ?, | गोयमा ! णो णाणी अन्नाणी नियमा दुअन्नाणी तं०-महअन्नाणी य सुयअन्नाणी य ८-१,ते णं भंते ! जीवा | | किंमणजोगी वयजोगी कायजोगी?, गोयमा! णो मणजोगी चयजोगीवि कायजोगीवि१०, तेणं भंते ! जीवा || किं सागारोवउत्ता अणागारोवउत्ता?, गोयमा! सागारोवउत्तावि अणागारोवउत्तावि ११, तेसि णं भंते ! जीवाणं कति सन्नाओ पन्नत्ताओ?, गोयमा ! चत्तारि सन्ना पं०२०-आहारसन्ना भयसन्ना मेहुणसन्ना परिग्गहसन्ना १२, तेसि णं भंते ! जीवाणं कति कसाया प०१, गो!चत्तारि कसाया प०, तं०-कोहकसाए दीप अनुक्रम [८३५ -८३८] असंज्ञी-पर्यंत: उत्पत्ति: ~27~ Page #28 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (०५) प्रत सूत्रांक [६९३] गाथा दीप अनुक्रम [८३५ -८३८] [भाग-११]“भगवती” - अंगसूत्र - ५ ( मूलं + वृत्ति:) शतक [२४], वर्ग [-], अंतर् शतक [-], उद्देशक [१], मूलं [ ६९३] + गाथा: पूज्य आगमोद्धारकश्री संशोधितः मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित.. आगमसूत्र - [०५] अंगसूत्र- [ ०५] "भगवती" मूलं एवं अभयदेवसूरि-रचिता वृत्तिः ॥८०६ ॥ व्याख्या- ५ माणकसाए मायाकसाए लोभकसाए १३, तेसि णं भंते ! जीवाणं कति इंदिया प० १, गो० पंचिंदिया प० प्रज्ञप्तिः तं०-सोईदिए चक्खिदिए जाव फार्सिदिए १४, तेसि णं भंते ! जीवाणं कति समुग्धाया प० १, गो० ! तओ अभयदेवी- समुग्धाया प०, सं०-वेयणासमुग्धाए कसायसमुग्धाए मारणंतिय समुग्धाए १५, ते णं भंते! जीवा किं सायावेया वृत्तिः २ यगा असायाबेयगा ?, गो० 1 सायावेयगावि असायावेयगावि १६, ते णं भंते! जीवा किं इत्थीवेयगा पुरिसवेयगा नपुंसगवेयगा ?, गो० ! णो इत्थीवेयगा को पुरिसवेयगा नपुंसगवेयगा १७, तेसि णं भंते । जीवाण केवलियं कालं ठिली प० १, गो० ! जहन्नेणं अंतोमुहुत्तं उक्कोसेणं पुचकोडी १८, तेसि णं भंते ! जीवाणं केवतिया अज्झवसाणा प० १, गो० ! असंखेजा अज्झवसाणा प०, ते णं भंते । किं पसत्था अप्पसत्था ?, गोयमा ! पसत्थावि अप्पसत्थावि १९, से णं भंते! पज्जन्त्ता असन्निपंचिदिद्यतिरिजोणियेति कालओ केचचिरं होइ ?, गोधमा ! जहनेणं अंतोमुद्दत्तं उक्कोसेणं पुचकोडी २०, से णं भंते! पज्ञत्ताअसन्नीपंचिंदियतिरिक्खजोणिए रयणप्पभाए पुढचिए रइए पुणरवि पज्जन्ताअसन्निपचि दियतिरिक्खजोणिएत्ति केवतियं कालं सेवेज्जा केवतियं कालं गतिरागतिं करेजा ?, गोयमा ! भवादेसेणं दो भवग्गहणाईं कालादेसेणं जहनेणं दस वाससहस्साई अंतोमुहुत्तमम्भहियाई उक्कोसेणं पलिओ मस्स असंखेजइभागं पुचकोडि मन्महियं एवतियं कालं सेवेज्जा एवतियं कालं गतिरागति करेजा २१ । पज्ञत्ताअसन्निपचिंदियतिरिक्खजोणिए णं भंते ! जे भविए जहन्नकाल द्वितीएस रयणप्पभापुढविनेरइएस उववज्जिसए से णं भंते! केवइकालद्वितीएस उवब असंज्ञी पर्यंत: उत्पत्ति: For Parks Use One ~28~ २४ शतके उद्देशः १ असशिपर्यन्तोत्पादः सू ६९३ ॥८०६ ॥ Page #29 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (०५) [भाग-११]"भगवती"-अंगसूत्र-५ (मूलं+वृत्ति:) शतक [२४], वर्ग [-], अंतर्-शतक [-1, उद्देशक [१], मूलं [६९३] + गाथा: पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र- [०५], अंगसूत्र- [०५] "भगवती मूलं एवं अभयदेवसूरि-रचिता वृत्ति: प्रत सूत्रांक [६९३]] गाथा ***XXXSGAAAXXIS जेज्जा ?, गोयमा ! जहन्नेणं दसवाससहस्सहितीएसु उक्कोसेणवि दसवाससहस्सद्वितीएसु उववज्जेज्जा, ते णं 8 | भंते ! जीवा एगसमएणं केवतिया उववजंति ?, एवं सच्चेव वत्तवया निरवसेसा भाणियचा जाव अणुवंधोत्ति, से णं भंते ! पजत्ताअसन्निपंचिंदियतिरिक्खजोणिए जहन्नकालाहितीए रयणप्पभापुढविणेरइए जहन्नकाल०२ पुणरचि पज्जत्तअसन्नि जाव गतिरागर्ति करेजा', गोयमा ! भवादेसेणं दो भवग्गहणाई कालादेसेणं जहन्नेणं दसवाससहस्साई अंतोमुहुत्तमम्भहियाई उकोसेणं पुषकोडी दसहिं वाससहस्सेहि अम्भहियाई एवतियं कालं सेवेजा एवतियं कालं गतिरागतिं करेजा शपजत्ताअसन्निपंचिंदियतिरिक्खजो-12 णिए णं जे भविए उक्कोसकालाहितीएम रयणप्पभापुढविनेरइएमु उववजिसए से णं भंते ! केवतियकालठिई-४ एसु उववज्जेज्जा',गोयमा! जहन्नेणं पलिओवमस्स असंखेजहभागठिईसु उववज्जेजा उकोसेणवि पलिओवमस्स असंखेजइभागहितीएम उवव०, ते गंभंते ! जीवा अवसेसं तं चेव जाव अणुबंधो । से गं भंते ! पज्जत्ताअसन्निपंचिंदियतिरिक्वजोणिए उकोसकालहितीयरयणप्पभापुढविनेरइए पुणरवि पजत्ता जाप करेजा, गोयमा ! भवादेसेणं दो भवग्गणाई कालादेसेणं जहन्नेणं पलिओवमस्स असंखेजइभागं अंतोमुहुत्तमम्भ*हियं उकोसेणं पलिओवमस्स असंखेजहभागं पुवकोडिअम्भहियं एवतियं काल सेवेजा एवइयं कालं | गतिरागतिं करेजा ३। जहन्नकालद्वितीयपज्जत्ताअसन्निपंचिंदियतिरिक्खजोणिए णं भंते ! जे भविए रयणप्पभापुढविनेरइएसु उववज्जित्तए से णं भंते ! केवतियकालठितीएसु उववजेजा, गोयमा ! जहनेणं दसवा दीप अनुक्रम [८३५ -८३८] असंज्ञी-पर्यंत: उत्पत्ति: -~-29~ Page #30 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (०५) [भाग-११]"भगवती"-अंगसूत्र-५ (मूलं+वृत्ति:) शतक [२४], वर्ग [-], अंतर्-शतक [-1, उद्देशक [१], मूलं [६९३] + गाथा: पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र- [०५], अंगसूत्र- [०५] "भगवती मूलं एवं अभयदेवसूरि-रचिता वृत्ति: प्रत सूत्रांक [६९३] सू६९३ गाथा व्याख्या-15 ससहस्सहितीएमु उकोसे० पलिओवमस्स असंखेज्जहभागहितीएसु उयव०, ते णं भंते ! जीवा एगसमएणं ||२४ शतके प्रज्ञप्तिः केव० सेसं तं चेव णवरं इमाई तिन्नि णाणताई आ अज्झवसाणा अणुबंधो य, जहन्नेणं ठिती अंतोमुहुर्त उद्देशः१ अभयदेवी-IIN||उकोसेणवि अंतोमु० तेसि णं भंते! जीवाणं केवतिया अज्झवसाणा प०, गो० असंखेजा अज्झवसाणा प०, या वृत्तिः२|| ते णं भंते ! किं पसस्था अप्पसत्था ?, गोयमा ! णो पसस्था अप्पसस्था, अणुबंधी अंतोमुहत्तं सेसं तं चेव । यन्तोत्पादः से णं भंते ! जहन्नकालहितीए पजत्ताअसन्निपंचिंदिया रयणप्पभा जाव करेजा, गोयमा ! भवादेसेणं दो |भवग्गहणाई कालादेजह दसवाससह अंतोमु० अब्भहियाई उकोसेणं पलिओवमस्स असंखेजाभागं| |अंतोमुहुत्तमम्भहियं एवतियं कालं सेविजा जाव गतिरागति करेजा ४। जहन्नकालाहितीयपज्जत्तअसन्निपंचिंदियतिरिक्खजोणिए णं भंते ! जे भविए जहन्नकाल द्विइएसु रयणप्पभापुढविनेरइएसु उववजि ए से णं | भंते ! केवतियकाल द्वितीएसु उववज्जेजा, गोयमा ! जह० दसवाससहस्सट्टितीएसु उक्कोसेणवि दसवाससहस्सहितीएसु उववज्जेजा, ते णं भंते ! जीवा सेसंत चेव ताई चेव तिन्नि णाणत्ताई जाव से णं भंते ! 12 जहन्नकाल द्वितीयपज्जत्तजाव जोणिए जहन्नकालद्वितीयरयणप्पभा पुणरवि जाच गोयमा ! भवादेसेणं दो IMIL||८०७॥ भवग्गहणाई कालादेसेणं जहन्नेणं दसवाससहस्साई अंतोमुहत्तमन्भहियाई उक्कोसेणवि दसवाससहस्साई अंतोमुहुत्तमम्भहियाई एवइयं काल सेवेजा जाव करेजा ५जहन्नकालद्वितीयपज्जत्तजाय तिरिक्खमोणिया॥ण भंते ! भविए उकोसकालट्टितीएस रयणप्पभापुढविनेरइएसु उववजिसए से गं भंते ! केवतियकालठि SAROBARAHASKAR दीप अनुक्रम [८३५ -८३८] असंज्ञी-पर्यंत: उत्पत्ति: ~30 Page #31 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (०५) [भाग-११]"भगवती"-अंगसूत्र-५ (मूलं+वृत्ति:) शतक [२४], वर्ग [-], अंतर्-शतक [-1, उद्देशक [१], मूलं [६९३] + गाथा: पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र- [०५], अंगसूत्र- [०५] "भगवती मूलं एवं अभयदेवसूरि-रचिता वृत्ति: प्रत सूत्रांक [६९३]] गाथा तीएसु उबवजेज्जा ?, गो ! जहन्नेणं पलिओषमस्स असंखेजहभागहितीएम उववजेज्जा उकोसेणवि पलिओवमस्स असंखेजइभागहितीएमु उववजेज्जा, ते णं भंते ! जीवा अवसेसं तं चेव ताई चेव तिन्नि णाणत्ताई जाव से णं भंते ! जहन्नकालद्वितीयपजत्तजावतिरिक्खजोणिए उकोसकालद्वितीयरयणजाव करेजा, गोयमा! भवादेसेणं दो भवग्गहणाई कालादेसेणं जहन्नेणं पलिओयमस्स असंखेजइभागं अंतोमुत्तमम्भहियं उकोसेणवि पलिओवमस्स असंखेजाभागं अंतोमुहुत्तेणभहियं एवतियं कालं जाव करेज्जा ६ । उक्कोसकालट्ठियपज्जत्तअसन्निपंचिंदियतिरिक्खजोणिए णं भंते ! जे भविए रयणप्पभापुढविनेरइएसु उववजित्तए से णं भंते ! केवतिकालस्स जाव उवव.?, गोयमा! जहन्नेणं दसवाससहस्सठिइएमु उक्कोसेणं पलिओवमस्स असंखेजइजावउववज्जेजा, ते णं भंते ! जीवा एगसमएणं अवसेसं जहेव ओहियगमएणं तहेव अणुर्गतवं, नवरं इमाइं दोन्नि नाणत्ताई-ठिती जहन्नेणं पुषकोडी उक्कोसेणवि पुषकोडी एवं अणुबंधोवि अवसेसं || तं चेव, सेणं भंते ! उकोसकालद्वितीयपज्जत्तअसनिजाव तिरिक्खजोणिए रयणप्पभाजाच गोयमा ! | भवादेसेणं दो भवग्गहणाई कालादेसेणं जहन्नेणं पुच्चकोडी दसहि वाससहस्सेहिं अन्भहिया उकोसेणं पलि ओवमस्स असंखेजाभार्ग पुचकोडीए अभहियं एवतियं जाव करेजा ७ । उकोसकालहितीयपजते तिरिक्खजोणिए णं भंते । जे भविए जहनकालद्वितीएसु रयणजाय उवव० से भंते ! केवति जाव उववज्जेज्जा ?,II गो! जह० दसवाससहस्सद्वितीएसु उकोसेणवि दसवाससहस्सद्वितीएसुउववजेजा, ते णं भंते ! सेसं तं दीप अनुक्रम [८३५ -८३८] असंज्ञी-पर्यंत: उत्पत्ति: ~31 Page #32 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (०५) [भाग-११]"भगवती"-अंगसूत्र-५ (मूलं+वृत्ति:) शतक [२४], वर्ग [-], अंतर्-शतक [-1, उद्देशक [१], मूलं [६९३] + गाथा: पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र- [०५], अंगसूत्र- [०५] "भगवती मूलं एवं अभयदेवसूरि-रचिता वृत्ति: प्रत सूत्रांक [६९३] गाथा व्याख्या-1 चेव जहा सत्तमगमए जाच से णं भंते ! उकोसकाल द्विती जाव तिरिक्खजोणिए जहन्नकाल द्वितीयरयणमज्ञप्तिः | पभा जाव करेजा, गोयमा भवादेसेणं दो भव० कालादे जह० पुवकोडी दसहि वाससहस्सेहिं अन्भहि | उद्देशः१ अभयदेवी- या उक्कोसेणवि पुषकोडी दसवाससहस्सेहिं अन्भहिया एवतियं जाव करेजा ८। उक्कोसकालद्वितीयपज्जत्त असन्ज्ञिपजाव तिरिक्खजोणिए णं भंते ! जे भविए उक्कोसकालहितीएसु रयणजाव उववज्जित्तए से णं भंते ! केव कायन्तोत्पाद तिकालं जाव उववज्जेज्जा ?, गोयमा ! जहन्नेणं पलिओवमस्स असंखेजहभागहितीएमु उक्कोसेणवि पलिओ-18 ॥८०८॥ विमस्स असंखेजहभागहितीएसु उववज्जेजा, ते णं भंते ! जीवा एगसमएणं सेसं जहा सत्तमगमए जाव से भंते ! उकोसकालद्वितीयपजत्तजापतिरिक्खजोणिए उक्कोसकालद्वितीयरयणप्पभाजावकरेजा, गोयमा!|* भवादेसेणं दो भवग्गहणाई कालादेसेणं जहन्नेणं पलिओवमस्स असंखेजहभागं पुचकोडीए अम्भहियं उक्कोसेणवि पलिओवमस्स असंखेजहभागं पुषकोडीए अन्भहियं एवतियं काल सेवेजा जाच गतिरागतिं करेजा ९ एवं एते ओहिया तिन्नि गमगा ३ जहन्नकालहितीएम तिनि गमगा उक्कोसकालहितीएसु तिन्नि गमगा ९ सबे ते णव गमा भवंति (सूत्रं ६९३)॥ ॥८०८॥ | 'उववाए'त्यादि, एतच्च व्यक्तं, नवरं 'उववाय'त्ति नारकादयः कुत उत्पद्यन्ते? इत्येवमुपपातो वाच्यः 'परीमाण'ति येत कनारकादिषूत्पत्स्यन्ते तेषां स्वकाये उत्पद्यमानानां परिमाणं वाच्यं 'संघयणं'ति तेषामेव नारकादिषुत्पिस्सूनां संहननं वाच्यम् 'उच्चत्तंति नारकादियायिनामवगाहनाप्रमाणे वाच्यम्, एवं संस्थानाद्यध्यवसेयम् 'अणुबंधो'त्ति विवक्षितपर्याये-13 दीप अनुक्रम [८३५-८३८] असंज्ञी-पर्यंत: उत्पत्ति: ~32 Page #33 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (०५) [भाग-११]"भगवती"-अंगसूत्र-५ (मूलं+वृत्ति:) शतक [२४], वर्ग [-], अंतर्-शतक [-1, उद्देशक [१], मूलं [६९३] + गाथा: पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र- [०५], अंगसूत्र- [०५] "भगवती मूलं एवं अभयदेवसूरि-रचिता वृत्ति: प्रत सूत्रांक [६९३]] गाथा तणाव्यवच्छिन्नेनावस्थानं कायसंवेहोत्ति विवक्षितकायात कायान्तरे तुल्यकाये वा गत्वा पुनरपि यथासम्भवं तत्रैवागम नम् ।। अथाधिकृतशतस्योद्देशकपरिभाणपरिज्ञानाथू गाथामाह-'जीवपए'इत्यादि, इयं च गाधा पूर्वोक्तद्वारगाथास्यात् क्वचित् पूर्व दृश्यत इति । तत्र प्रथमोद्देशको व्याख्यायते, तत्र च कायसंवेधद्वारे-से णं भंते ! पजत्ताअसन्नी'त्यादि,४ दाभवादेसेणं'ति भवप्रकारेण 'दो भवग्गहणाईति एकत्रासज्ञी द्वितीये नारकस्ततो निर्गतः सन्ननन्तरतया सज्ञित्वमेव मालभते न पुनरसज्ञित्वमिति, 'कालाएसेणं'ति कालप्रकारेण कालत इत्यर्थः दश वर्षसहस्राणि नारकजघन्यस्थितिरन्तम-10 हूर्ताभ्यधिकानि असज्ञिभवसम्बन्धिजघन्यायुःसहितानीत्यर्थः, 'उक्कोसेण'मित्यादि, इह पल्योपमासयेयभागः पूर्वभवासज्ञिनारकोत्कृष्टायुष्करूपः पूर्वकोटी चासन्झ्युत्कृष्टायुष्करूपेति, एवमेते सामान्येषु रलप्रभानारकेपूत्पित्सवोऽसन्जिनः प्ररूपिताः, अथ जघन्यस्थितिषु तेषूस्पित्तूंस्तान् प्ररूपयन्नाह–'पजत्ते त्यादि, सर्व चेदं प्रतीतार्थमेव, एवमुत्कृष्टस्थितिषु रत्नप्रभानारकेपूत्पित्सवोऽपि प्ररूपणीयाः, एवमेते त्रयो गमा निर्विशेषणपर्याप्तकासन्झिनमाश्रित्योक्ताः, एवमेत एव तं| जघन्यस्थितिकं ३ उत्कृष्टस्थितिकं ३ चाश्रित्य वाच्यास्तदेवमेते नव गमाः, तत्र जघन्यस्थितिकमसज्ञिनमाश्रित्य सामान्यनारकगम उच्यते-'जहन्ने त्यादि, 'आउ अज्झवसाणा अणुबंधो यत्ति आयुरन्तर्मुहूर्तमेव जघन्यस्थितेरसन्निनोऽधिकृतत्वात् , अध्यवसायस्थानान्यप्रशस्तान्येवान्तर्मुहूर्तस्थितिकत्वात् , दीपस्थितेहिं तस्य द्विविधान्यपि तानि संभवन्ति कालस्य बहुत्वात् , अनुबन्धश्च स्थितिसमान एवेति । कायसंवेधे च नारकाणां जघन्याया उत्कृष्टायाश्च स्थितेरुपर्यन्तर्मुहूर्त वाच्य| मिति ४ । एवं जघन्यस्थितिक तं जघन्यस्थितिकेषु तेषूत्पादयन्नाह-जहन्नकालट्ठिई'त्यादि ५॥ एवं जघन्यस्थितिक दीप अनुक्रम [८३५ 15600-40-56k -८३८] AM असंज्ञी-पर्यंत: उत्पत्ति: ~33~ Page #34 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (०५) [भाग-११]"भगवती"-अंगसूत्र-५ (मूलं+वृत्ति:) शतक [२४], वर्ग [-], अंतर्-शतक [-1, उद्देशक [१], मूलं [६९३] + गाथा: पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र- [०५], अंगसूत्र- [०५] "भगवती मूलं एवं अभयदेवसूरि-रचिता वृत्ति: प्रत सूत्रांक [६९३]] गाथा व्याख्या- तमुस्कृष्टस्थितिषु तेषूत्पादयन्नाह-जहन्ने'त्यादि ६, एवमुत्कृष्टस्थितिक तं सामान्येषु तेषूत्पादयन्नाह-'उकोसकाले त्यादि प्रप्तिः ७, एवमुत्कृष्टस्थितिक तं जघन्यस्थितिकेषु तेषत्पादयन्नाह-'उक्कोसकाले'त्यादि ८, एवमुत्कृष्टस्थितिषूत्पादयन्नाह-'उक्को- उद्देशः १ अभयदेवी-18 सकाले'त्यादि ९॥ एवं तावदसज्ञिनः पञ्चेन्द्रियतिरश्चो नारकेधूत्पादो नवधोक्तः, अथ सञ्जिनस्तस्यैव तथैव तमाह- सज्युया वृत्ति | जइ सन्निपंचिंदियतिरिक्खजोणिएहिंतो उववज्जति किं संखेजबासाउयसन्निपंचिंदियतिरिक्खजोणिएहिंतो में त्पाद: ॥८०९॥ उववज्जति असंखेलवासाउयसन्निपंचिंदियतिरिक्खजाव उवचजंति ?, गोयमा ! संखेजवासाउयसग्निपंचिंदि सू६९४ यतिरिक्खजोणिएहितो उपवजंति णो असंखेजवासाउयसन्निपंचिदियजाव उववजंति, जइ संखेजवासा-8 उयसनिपचिंदियजाव उववजति किं जलचरेहितो उपवजति? पुच्छा, गोयमा! जलचरेडिंतो उधवजंति जहा* असन्नी जाव पजत्तएहितो उववजति णो अपज्जत्तेहिंतो उववजंति, पज्जत्तसंखेज्जवासाउयसन्निपंचिंदियतिरि-|| क्खजोणिए णं भंते ! जे भविए णेरहपसु उववजित्तए से णं भंते ! कतिमु पुढवीसु उववज्जेज्जा ?, गोयमा ! सत्तसु पुढवीसु उववज्जेज्जा तंजहा-रयणप्पभाए जाव अहेसत्तमाए, पजत्तसंखेजवासाउयसन्निपंचिंदियतिरिक्खजोणिए णं भंते ! जे भविए रयणप्पभपुढविनेरइएमु उववजित्तए सेणं भंते ! केवतियकालद्वितीएम || उपवज्जेजा, गोयमा ! जहन्नेणं दसवाससहस्सहितीएस उकोसेणं सागरोवमहितीएसु उबवलेवा, ते णं ||sk भंते ! जीवा एगसमएणं केवतिया उववज्जति ?, जहेव असन्नी, तेसिणं भंते ! जीवाणं सरीरगा किंसंघ-18||८०९॥ यणी प०१, गोयमा ! छबिहसंघयणी प०, तं०-वइरोसभनारायसंघयणी उसभनारायसंघयणी जाव छेवट्ठ दीप अनुक्रम [८३५-८३८] संजी-जीवानाम् उत्पत्ति: ~34 Page #35 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (०५) [भाग-११]"भगवती"-अंगसूत्र-५ (मूलं+वृत्ति:) शतक [२४], वर्ग [-], अंतर्-शतक [-], उद्देशक [१], मूलं [६९४] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र- [०५], अंगसूत्र- [०५] "भगवती मूलं एवं अभयदेवसूरि-रचिता वृत्ति: प्रत सूत्रांक [६९४] संघयणी, सरीरोगाहणा जहेव असन्नीणं जहन्नेणं अंगुलस्स असंखेजइभागं उक्कोसेणं जोयणसहस्सं, तेसि | दाणभंते ! जीवाणं सरीरगा सिंठिया प०१, गोयमा छविहसंठिया प०, तंजहा-समचउरंस निग्गोह जाव-|| साहंडा, तेसिणं भंते ! जीवाणं कति लेस्साओ प०१, गोयमा ! छल्लेसाओ पन्नत्ताओ. तंजहा-कण्हलेस्सा | जाव सुकलेस्सा, दिट्ठी तिचिहावि तिन्नि नाणा तिन्नि अन्नाणा भयणाए जोगो तिथिहोवि सेसं जहा असनीणं जाव अणुबंधो, नवरं पंच समुग्धाया प० तं०-आदिल्लगा, वेदो तिबिहोवि, अवसेसं तं चेव जाव से णं भंते ! पजत्तसंखेज्जवासाउय जाच 'तिरिक्खजोणिए रयणप्पभा जाव करेजा, गोयमा! भवादेसेणं जहन्नेणं दो भवग्गहणाई उक्कोसेणं अट्ठ भवग्गणाई कालादेसेणं जहन्नेणं दसवाससहस्साई अंतोमुहुत्तम-18 भहियाई उकोसेणं चत्तारि सागरोवमाई चउहिं पुवकोडीहिं अभहियाई एवतियं कालं सेवेजा जाव करेजा १ पजत्तसंखेज जाय जे भविए जहन्नकालजाव से णं भंते ! केवतियकालठितीएम उववज्जेज्जा ?./ ठगो!जह दसवा० ठितीएसु उक्कोसेणवि दसवाससहस्सद्वितीएसु जाव उवचनेजा, ते ण भंते जीवा एवं सो चेव परमो गमओ निरवसेसो भाणियचो जाच कालादेसेणं जहन्नेणं दसवाससहस्साई अंतोमुत्तमम्भ-IKI Iहियाई उकोसेणं चत्सारि पुषकोडीओ चत्तालीसाए वाससहस्सेहि अब्भहियाओ एवतियं काल सेवेज्जा एव-|| |तियं कालं गतिरागतिं करेजा २, सो चेव उक्कोसकालहितीएम उववन्नो जहन्नेणं सागरोवमहितीएसु उकोसेदणचि सागरोवमद्वितीएसु उववजेजा, अवसेसे परिमाणादीओ भवादेसपज्जबसाणो सो चेव पढमगमो णेयचो दीप अनुक्रम [८३९] संज्ञी-जीवानाम् उत्पत्ति: ~35 Page #36 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (०५) [भाग-११]"भगवती"-अगसूत्र-५ (मूल+वृत्ति:) शतक [२४], वर्ग [-], अंतर्-शतक [-], उद्देशक [१], मूलं [६९४] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र- [०५], अंगसूत्र- [०५] "भगवती मूलं एवं अभयदेवसूरि-रचिता वृत्ति: प्रत सूत्रांक [६९४] व्याख्या- जाव कालादेसेणं जहन्नेणं सागरोवमं अंतोमुहुत्तमम्भहियं उक्कोसेणं चत्तारि सागरोवमाई चउहिं पुवकोडीहिं २४ शतके प्रज्ञप्तिः ॥ अमहियाई एवतियं काल सेविजा जावकरेजा ३, जहन्नकालद्वितीयपजत्तसंखेजवासाउयसन्निपंचिदियतिरि-15 | उद्देशः१ अभयदेवी- खजोणिए णं भंते ! जे भविए रयणप्पभपुढविजाव उववजित्तए से णं भंते ! केवतिकालद्वितीएसु उववजेया वृत्तिः२|| | ज्जा ?, गोयमा ! जहन्नेणं दसवाससहस्सद्वितीएसु उक्कोसेणं सागरोवमट्टितीएसु उववजेज्जा, ते णं भंते ! जीवा त्पादः सू ६९४ ८१०॥ अवसेसो सो चेव गमओ नवरं इमाई अहणाणत्ताई-सरीरोगाहणा जहन्नेणं अंगुलस्स असंखेजइभागं उक्कोसेणं धणुहपुहुतं, लेस्साओ तिन्नि आदिल्लाओ, णो सम्मदिही मिच्छादिट्ठी को सम्मामिच्छादिही, णोणाणी दो अन्नाणा णियमं, समुग्घाया आदिल्ला तिन्नि, आउं अज्झवसाणा अणुबंधो य जहेव असन्नीण अवसेस जहा पढमगमए जाव कालादेसेणं जहन्नेणं दसवाससहस्साई अंतोमुत्तमम्भहियाई उफोसेणं चत्तारि साग-1 रोवमाई चाहिं अंतोमुहुत्तेहिं अन्महियाई एचतियं कालं जाव करेजा ४, सो चेव जहन्नकालहितीएसु उवहि वन्नो जहन्नेणं दसवाससहस्सद्वितीएमु उक्कोसेणवि दसवाससहस्सहितीएसु उववजेजा, ते णं भंते ! एवं सो चेव चउत्थो गमओ निरवसेसो भाणियचो जावकालादेसेणं जहन्नेणं दसवाससहस्साई अंतोमुहुत्तमन्भहियाई उकोसेणं चत्तालीसं वाससहस्साई चाहिं अंतोमुहुत्तेहिं अन्भहियाई एवतियं जाव करेजा ५।सो चेव उक्कोसकालहितीएम उववन्नो जहन्नेणं सागरोवमहितीएसु उववज्जेज्जा उक्कोसेणवि सागरोवमहितीएसु Is उववजेजा ते णं भंते ! एवं सो चेव चउत्थो गमओ निरवसेसो भाणियबो जाव कालादेसेर्ण जहनेणं साग-द दीप अनुक्रम [८३९] संजी-जीवानाम् उत्पत्ति: ~36 Page #37 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (०५) [भाग-११]"भगवती"-अंगसूत्र-५ (मूलं+वृत्ति:) शतक [२४], वर्ग [-], अंतर्-शतक [-], उद्देशक [१], मूलं [६९४] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र- [०५], अंगसूत्र- [०५] "भगवती मूलं एवं अभयदेवसूरि-रचिता वृत्ति: PROCRACY प्रत सूत्रांक OES [६९४] BIरोचमं अंतोमुत्तमम्भहियं उक्कोसेणं चत्तारि सागरोवमाई चाहिं अंतोमुहुत्तेहिं अम्भहियाई एवतियं जाव करेजा ६।उकोसकालहितीयपज्जत्तसंखेजवासा जाब तिरिक्खजोणिए णं भंते ! जे भविए रयणप्पभापुढविनेरइएमु उचव जित्तए से णं भंते ! केवतिकालहितीएसु उववजेजा, गोयमा! जहन्नेणं दसवाससहस्सहितीएस उकोसेर्ण सागरोवमहितीएम उववजेजा, ते णं भंते ! जीवा अवसेसो परमाणादीओ भवाएसपजवसाणो एएसि चेव पढमगमओ यचो नवरं ठिती जहन्नेणं पुवकोडी उक्कोसेणवि पुवकोडी, एवं अणुवंघोषि, सेसं तं चेव, कालादेसेणं जहन्नेणं पुषकोडी दसहि वाससहस्सहिं अन्भहिया उकोसेणं चत्तारि सागरो|वमाई चाहिं पुषकोडीहिं अम्भहियाई एवतियं कालं जाव करेजा७।सो चेव जहन्नकालहितीएसु उववन्नो जहनेणं दसवाससहस्सद्वितीएसु उक्कोसेणवि दसवाससहस्सद्वितीएसु उववजेजा ते णं भंते ! जीवा सो चेव सत्तमो गमओ निरवसेसो भाणियहो जाव भवादेसोत्ति, कालादेसेणं जहन्नेणं पुनकोडी दसहिं वाससहस्सेहिं अन्भहिया उक्कोसेणं चत्तारि पुचकोडीओ चत्तालीसाए वाससहस्सेहिं अन्भहिआओ एवतियं जाय करेजा, उक्कोसकालद्वितीयपज्जत्तजाव तिरिक्खजोणिए गंभंते जे भविए उक्कोसकालद्वितीय जाव उववज्जित्तए से णं भंते! केवतिकालहितीएसु उववजेजा?, गोयमा जहन्नेणं सागरोवमहितीएमु उक्कोसेणवि सागरोवमट्टितीएमु उववजेजा, ते णं भंते ! जीवा सो चेव सत्तमगमओ निरवसेसो भाणियचो जाव भवादेसोत्ति, कालादे दीप अनुक्रम [८३९] CORNES159460% संज्ञी-जीवानाम् उत्पत्ति: ~37 Page #38 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (०५) [भाग-११]"भगवती"-अंगसूत्र-५ (मूलं+वृत्ति:) शतक [२४], वर्ग -], अंतर्-शतक [-], उद्देशक [१], मूलं [६९४] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र- [०५], अंगसूत्र- [०५] "भगवती मूलं एवं अभयदेवसूरि-रचिता वृत्ति: प्रत सूत्रांक [६९४] दीप अनुक्रम [८३९] व्याख्या-16 सेणं जहन्नेणं सागरोवमं पुनकोडीए अमहियं उक्कोसेणं चत्तारि सागरोवमाई चाहिं पुचकोडीहिं अभहियाई ६२४ शतके प्रज्ञप्तिः । एवइयं जाव करेजा । एवं एते णव गमका उक्खेवनिक्खेवओ नवसुवि जहेच असन्नीणं (सूत्रं ६९४)॥ अभयदेवी उद्देशः १ या वृत्तिः२ 'जइ सन्नी'त्यादि, 'तिन्नि नाणा तिनि अगाणा भयणाए'त्ति तिरश्चां सशिनां नरकगामिना ज्ञानान्यज्ञानानि ||2|| सन्यु|च त्रीणि भजनया भवन्तीति द्वे वा त्रीणि या स्युरित्यर्थः, 'नवरं पंच समुग्घाया आइल्लग'त्ति असज्ञिनः पश्चेन्द्रिय-18 त्पाद ॥८११॥ तिरश्चस्त्रयः समुद्घाताः सज्ञिनस्तु नरकं यियासोः पञ्चायाः, अन्त्ययो योर्मनुष्याणामेव भावादिति । 'जहन्नेणं दो । सू६९४ भवग्गहणाईति सज्ञिपश्चेन्द्रियतिर्य उत्पद्य पुनर्नरकेषूत्पद्यते ततो मनुष्येषु एवमधिकृतकायसंवेधे भवद्वयं जघन्यतो भवति, एवं भवग्रहणाष्टकमपि भावनीय, अनेन चेदमुक्त-सज्ञिपश्चेन्द्रियतिर्यक् ततो नारकः पुनः सज्ञिपश्चेन्द्रियति। यङ् पुनारकः पुनः सज्ञिपञ्चेन्द्रियतिर्यइ पुनारकस्ततः पुनः सन्ज्ञिपश्चेन्द्रियतिर्यक पुनस्तस्यामेव पृथिव्यां नारक इत्येबमष्टावेव वारानुत्पद्यते नवमे भवे तु मनुष्यः स्यादिति, एवमौधिक औषिकेषु नारकेषूत्पादितः, अयं चेह प्रथमो गमः१ 'पज्जत्ते त्यादिस्तु द्वितीयः २ 'सो चेव उक्कोसकाले'इत्यादिस्तु तृतीयः ३ 'जहन्नकालद्वितीये'त्यादिस्तु चतुर्थः ४, तत्र च 'नवरं इमाई अट्ठ नाणत्ताई ति, तानि चैत्र-तत्र शरीरावगाहनोत्कृष्टा योजनसहस्रमुक्तेह धनुःपृथक्त्वं, तथा । |तन्त्र लेश्याः पर इह त्वाद्यास्तिस्रः, तथा तन्त्र रष्टिविधा इह तु मिथ्यादृष्टिरेव, तथा तत्राज्ञानानि त्रीणि भजनया इह तु || ८११॥ एवाज्ञाने, तथा तत्र आद्याः पञ्च समुद्घाता इह तु चयः, 'आउअज्झवसाणा अणुपंधोय जहेच असन्नीर्ण'ति जघन्यस्थितिकासजिगम इवेत्यर्थः, ततश्चायुरिहान्तर्मुहूर्त, अध्यवसायस्थानान्यप्रशस्तान्येव, अनुबन्धोऽप्यन्तमुत्तेमेवेति, अवसेस - संजी-जीवानाम् उत्पत्ति: ~38~ Page #39 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (०५) [भाग-११]"भगवती"-अंगसूत्र-५ (मूलं+वृत्ति:) शतक [२४], वर्ग [-], अंतर्-शतक [-], उद्देशक [१], मूलं [६९४] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र- [०५], अंगसूत्र- [०५] "भगवती मूलं एवं अभयदेवसूरि-रचिता वृत्ति: - 1684 प्रत 18--- सूत्रांक - [६९४] मित्यादि, अवशेष यथा सन्जिनः प्रथमगमे औधिक इत्यर्थः निगमनवाक्यं चेदं-'अवसेसो चेव गमओ'त्ति अनेनैवै-1 तदर्थस्य गतत्वादिति, 'सो चेव जघन्नकाले'त्यादिस्तु सञ्जिविषये पञ्चमो गमः ५, इह च 'सो चेव'त्ति स एष सज्ञी | जघन्यस्थितिकः, 'सो चेव उक्कोसे'त्यादिस्तु षष्ठः ६, 'उक्कोसकाले'त्यादिस्तु सप्तमः ७, तत्र च 'एएसिं चेव पढमगमो'-18 त्ति एतेषामेव सज्ञिनां प्रथमगमो यत्राधिक औषिकेषुत्पादितः, 'नवर'मित्यादि तत्र जघन्याऽप्यन्तर्मुहर्तरूपा सजिनः स्थितिरुक्ता सेह न वाच्येत्यर्थः, एवमनुवन्धोऽपि तद्रूपत्वात्तस्येति, 'सो चेवे'त्यादिरष्टमः ८, इह च 'सो चेव'त्ति स || द एवोत्कृष्टस्थितिकः सज्ञी ८, 'उकोसे'त्यादिर्नवमः ९, 'उक्खेवनिक्खेवओ'इत्यादि, तत्रोत्क्षेपः-[ग्रन्थानम् १६०००]|| प्रस्तावना स च प्रतिगममौचित्येन स्वयमेव वाच्यः, निक्षेपस्तु-निगमनं सोऽप्येवमेवेति । पर्याप्तकसङ्ख्यातवर्षायुष्कसजि. पञ्चेन्द्रियतिर्यगयोनिकमाश्रित्य रलप्रभावक्तव्यतोका, अथ तमेवाश्रित्य शर्कराप्रभावक्तव्यतोच्यते, तत्रौधिक औधि-12 F केषु तावदुच्यते | पजत्तसंखेजचासाउयसन्निपंचिंदियतिरिक्खजो भंते ! जे भविए सफरप्पभाए पुढवीए परइएमु उयवADI| जित्तए से णं भंते ! केवइकालद्वितीएसु उवव०१, गोयमा ! जह० सागरोवमहितीएसु पको० तिसागरो वमहितीएसु उववज्जे जा, ते णं भंते ! जीवा एगसमएणं एवं जहेव रयणप्पभाए उववजंतगमगस्स लद्धी सचेव निरवसेसा भा० जाब भवादेसोत्ति कालादेसेणं जहन्नेणं सागरोवमं अंतोमुहुत्तं अन्भहियं उक्कोसेणं बारससागरोवमाई चउहि पुषकोडीहिं अन्भहियाई एवतियं जाव करेजा १, एवं रयणप्पभपुढविगमसरिसा दीप अनुक्रम [८३९] ALSASURE * संजी-जीवानाम् उत्पत्ति: ~39~ Page #40 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (०५) [भाग-११]"भगवती"-अंगसूत्र-५ (मूलं+वृत्ति:) शतक [२४], वर्ग [-], अंतर्-शतक [-], उद्देशक [१], मूलं [६९५] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र- [०५], अंगसूत्र- [०५] "भगवती मूलं एवं अभयदेवसूरि-रचिता वृत्ति: प्रत सूत्रांक [६९५] णवधि गमगा भाणियचा नवरं सबगमएसुवि नेरइयहितीसंवेहेसु सागरोवमा भा० एवं जाव छट्ठीपुढवित्ति, व्याख्या-14 शतके णवर नेरइयठिई जा जत्थ पुरवीए जहन्नुकोसिया सा तेणं चेव कमेण चउगुणा कायवा, वालुयप्पभाएउद्देशः १ अभयदेवी-18 पुढवीए अट्ठावीसं सागरोबमाई चउगुणिया भवंति पंकप्प० चत्तालीसं धूमप्पभाए अट्ठसद्धिं तमाए अहा- शर्करप्रभाबावृत्तिः२ सीई संघयणाई वालुयप्पभाए पंचविहसंघयणी तं०-वयरोसहनारायसंघयणी जाव खीलियासंघयणी पंक- दिघूत्पादः प्पभाए चउबिहसंघयणी धूमप्पभाए तिविहसंघयणी तमाए दुविहसंघयणी तं०-वयरोसभनारायसंघयणी य||8|| सू ६९५ ८१२॥ १ जसभनारायसंघयणी २, सेसं तं चेच ॥ पज्जत्तसंखेजवासाउयजाव तिरिक्खजोणिए णं भंते ! जे भविए| अहेसत्तमाए पुढवीए नेरइएसु उववजित्तए से णं भंते ! केवतिकालद्वितीएसु उववजेजा ?, गोयमा ! जहन्नेणं वावीसंसागरोवमाहितीएसु उकोसेणं तेत्तीसंसागरोवमहितीएसु उववजेजा, ते णं भंते! जीचा एवं जहेव र रयणप्पभाए णव गमका लद्धीवि सच्चेव णवरं वयरोसभणारायसंघयणी इस्थिवेयगा न उववनंति सेसं त चेव जाव अणुबंधोत्ति, संवेहो भवादेसेणं जहन्नेणं तिन्नि भवग्गणाई उक्कोसेणं सत्त भवग्गहणाई कालाll देसेणं जहरू बावीसं सागरोवमाई दोहिं अंतोमुहत्तेहिं अन्भहियाई उक्कोसे छावद्धि सागरोवमाई चाहिं। पुषकोडीहिं अन्भहियाई एचतियं जाव करेजा १, सो चेव जहन्नकालद्वितीएसु उवचन्नो सच्चेव वत्तवया जाव स जाव ८१२॥ भवादेसोत्ति, कालादेसेणं जहन्नेणं कालादेसोवि तहेव जाव चउहिं पुछकोडीहिं अभहियाई एवतियं जाप foll करेजा २ सो चेव उकोसकालद्वितीपसु उवव० सच्चेव लडी जाव अणुबंधोत्ति, भवादेसेणं जहन्नेणं तिन्नि || दीप अनुक्रम [८४०] ACESSAMRACASSACROSS ~40 Page #41 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (०५) [भाग-११]"भगवती"-अंगसूत्र-५ (मूलं+वृत्ति:) शतक [२४], वर्ग [-], अंतर्-शतक [-], उद्देशक [१], मूलं [६९५] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र- [०५], अंगसूत्र- [०५] "भगवती मूलं एवं अभयदेवसूरि-रचिता वृत्ति: प्रत सूत्रांक [६९५] भवग्गहणाई उकोसेणं पंच भवग्गहणाई कालादेजह तेत्तीसं सागरोवमाई दोहिं अंतोमुहत्तेहिं अम-I याई को छावढि सागरोवमाई तिहिं पुषकोडीहिं अम्भहियाई एवतियं० सो चेव अप्पणा जहन्नकालटितीओ जाओ सच्चेव रयणप्पभपुढविजहन्नकालहितीयवत्तवया भाणियचा जाव भवादेसोत्ति नवरं पढमसंघयणं णो इस्थिवेयगा भवादेसेणं जहन्नेणं तिन्नि भवग्गहणाई उक्कोसेणं सत्त भवग्गहणाई कालादेसेणं जहन्नेणं | बावीसं सागरोवमाई दोहिं अंतोमुहुत्तेहिं अब्भहियाई उक्कोसेणं छावहिं सागरोवमाई चाहिं अंतोमुहुरोहिं अन्भहियाई एवतियं जाव करेजा ४ । सो चेव जहन्नकालहितीएसु उववन्नो एवं सो चेव चउत्थो गमओ निरवसेसो भाणियबो जाव कालादेसोत्ति ५। सो चेव उकोसकालहितीएमु उववन्नो सचेव लद्वी जाय अणुपंधोत्ति भवादेसेणं जहन्नेणं तिन्नि भवग्गहणाई उक्कोसेणं पंच भवग्गहणाएं कालादेसेणं जहन्नेणं| तेत्तीसं सागरोवमाइंदोहि अंतोमुहुत्तेहिं अभहियाई उक्कोसेणं छावहि सागरोवमाई तिहिं अंतोमुहत्तेहिं ४ अन्भहियाइं एवइयं कालं जाव करेजा ६ । सो चेव अप्पणा उक्कोसकालद्वितीओ जहन्नेणं यावीससागरोवमडिइएसु उकोसेणं तेत्तीससागरोवमहितीएम उववजेजा ते णं भंते ! अवसेसा सचेष सत्तमपुढविपढमगमवाद्यया भाणियद्या जाव भवादेसोत्ति नवरं ठिती अणुवंधो य जहन्नेणं पुत्वकोडी उक्कोसेणवि पुषकोडी सेसं तं 8 चेव कालादेसेणं जहन्नेणं बावीसं सागरोषमाई दोहिं पुचकोडीहिं अन्भहियाई उफोसेणं छावहि सागरोक्माई | चउहिं पुवकोडीहिं अब्भहियाई एवइयं जाव करेजा ७। सो चेव जहन्नकालद्वितीएसु उववन्नो सच्चेव लद्धी FACSCRECASEARCH दीप अनुक्रम [८४०] ~41 Page #42 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (०५) [भाग-११]"भगवती"-अंगसूत्र-५ (मूलं+वृत्ति:) शतक [२४], वर्ग [-], अंतर्-शतक [-], उद्देशक [१], मूलं [६९५] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र- [०५], अंगसूत्र- [०५] "भगवती मूलं एवं अभयदेवसूरि-रचिता वृत्ति: प्रत सूत्रांक [६९५] दीप अनुक्रम [८४०] व्याख्या-5 संवेहोवि तहेव सत्तमगमगसरिसो ८ । सो चेव उक्कोसकाल द्वितीएसु उववन्नो एस चेव लद्धी जाच अणुष-5२४ शतके प्रज्ञप्ति: C II घोत्ति भवादेसेणं जहन्नेणं तिन्नि भयग्गहणाई उक्कोसेणं पंच भवगहणाई कालादेसेणं जहन्नेणं तेत्तीससाग-15 | उद्देशः १ " या वृत्तिः शकरप्रभारोबमाई दोहिं पुबकोडीहिं अभहियाई उक्कोसेण छावहिं सागरोवमाई तिहिं पुषकोडीहिं अन्भहियाई एवतियं कालं सेवेजा जाव करेजा (सूत्रं ६९५)॥ दिघूत्पादः ।।८१३॥ । 'पजत्ते'त्यादि, 'लद्धी सच्चेव निरवसेसा भाणियवा' परिमाणसंहननादीनां प्राप्तियैव रसप्रभायामुत्पित्सोरुक्ता सैव निर-5 दवशेषा शर्करामभायामपि भणितव्येति, 'सागरोवमं अंतोमुहुत्तमभहियंति द्वितीयायां जघन्या स्थितिः सागरोप ममन्तर्मुहूर्त च सम्ज्ञिभवसत्कमिति, 'उकोसेणं वारसे'त्यादि द्वितीयायामुत्कृष्टतः सागरोपमत्रयं स्थितिः तस्याश्चतुर्गुणत्वे द्वादश, एवं पूर्वकोटयोऽपि चतुर्यु सञ्जितिर्यग्भवेषु चतन एवेति । 'नेरइयठिइसंवेहेसु सागरोवमा भाणियवसि रत्नप्रभायामायुारे संवेधद्वारे च दशवर्षसहस्राणि सागरोपमं चोतं द्वितीयादिषु पुनर्जघन्यत उत्कर्षतश्च सागरोपमाण्येव वाच्यानि, यतः-"सागरमेग १तिय २ सत्त ३ दस ४ य सत्तरस ५ तह य बाबीसा ६ । तेत्तीसा ७ जावठिई सत्तसुवि 8 कमेण पुढवीसु ॥१॥" तथा-"जा पढमाए जेट्ठा सा बीयाए कणिट्ठिया भणिया । तरतमजोगो एसो दसवाससहस्स रय-1 णाए ॥२॥” इति [एक सागरं त्रीणि सप्त दश च सप्तदश तथैव द्वाविंशतिः । त्रयस्त्रिंशत् सप्तस्वपि पृथ्वीषु क्रमेण || ८११ यावस्थितिः॥१॥ या प्रथमायां ज्येष्ठा सा द्वितीयायां कनीयसी भणिता । एप तरतमयोगो रत्नायां दशवर्षसहस्राणि ॥२॥] रत्नप्रभागमतुल्या नवापि गमाः, कियडूरं यावत् ? इत्याह-'जाव छठ्ठपुढवित्ति, 'चउगुणा कायद्य'त्ति उत्कृष्टे ~42 Page #43 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (०५) [भाग-११]"भगवती"-अंगसूत्र-५ (मूलं+वृत्ति:) शतक [२४], वर्ग [-], अंतर्-शतक [-], उद्देशक [१], मूलं [६९५] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र- [०५], अंगसूत्र- [०५] "भगवती मूलं एवं अभयदेवसूरि-रचिता वृत्ति: प्रत सूत्रांक [६९५] | कायसंवेधे इति, 'चालुयप्पभाए अट्ठावीसं,'तत्र सप्त सागरोपमाण्युत्कर्षतः स्थितिरुक्ता सा च चतुर्गणा अष्टाविंशतिः। * स्यात्, एवमुत्तरत्रापीति, वालुयप्पभाए पंचविहसंघयणि'त्ति आद्ययोरेव हि पृथिव्योः सेवानोत्पद्यन्ते, एवं चतुर्थी ४ पञ्चमी ३ षष्ठी २ सप्तमीषु १ एकैकं संहननं हीयत इति ॥ अथ सप्तमपृथिवीमाश्रित्याह-पजत्ते'त्यादि, Al'इस्थिवेया न उववजंति'त्ति षष्ठ्यन्तास्वेव पृथिवीपु स्त्रीणामुत्पत्तेः 'जहनेणं तिनि भवग्गहणाई' ति मत्स्यस्य सप्तमपृ-| थिवीनारकत्वेनोत्पद्य पुनर्मत्स्येष्वेवोत्पत्ती 'उक्कोसेणं सत्त भवग्गहणाईति मत्स्यो मृत्वा १ सप्तम्यां गतः २] पुनर्मत्स्यो जातः ३ पुनः सप्तम्यां गतः ४ पुनरपि मत्स्यः ५ पुनरपि तथैव गतः ६ पुनर्मत्स्यः ७ इत्येवमिति । 'कालादेसेण'मित्यादि, इह द्वाविंशतिः सागरोपमाणि जघन्यस्थितिकसप्तमपृथ्वीनारकसम्बन्धीनि अन्तर्मुहर्त्तद्वयं च | प्रथमतृतीयमत्स्यभवसम्बन्धीति, 'छावहिं सागरोवमाईति वारत्रयं सप्तम्यां द्वाविंशतिसागरोपमायुष्कतयोत्पत्तेः चतसश्च पूर्वकोटयश्चतुर्यु नारकभवान्तरितेषु मत्स्यभवेष्विति, अतो वचनाच्चैतदवसीयते-सप्तम्यां जघन्यस्थितिपूत्कर्षतस्त्रीनेव वारानुत्पद्यत इति, कथमन्यथैवंविधं भवग्रहणकालपरिमाणं स्यात् , इह च काल उत्कृष्टो विवक्षितस्तेन जघन्यस्थितिषु त्रीन वारानुस्पादितः, एवं हि चतुर्थी पूर्वकोटिर्लभ्यते, उत्कृष्टस्थितिषु पुनर्वारद्वयोत्पादनेन पट्पष्टिः सागरोपमाणां भवति पूर्वकोव्यः पुनस्तिस्र एवेति १ 'सो चेव जहन्नकालविइएसु' इत्यादिस्तु द्वितीयो गमः२ 'सो चेच उकोस-15 दिकाल ट्ठिइसु उववजेजा इत्यादिस्तु तृतीयः, तत्र च 'उक्कोसेणं पंच भवग्गहणाईति त्रीणि मत्स्यभवग्रहणानि द्वे च। नारकभवग्रहणे, अत एव वचनादुत्कृष्टस्थितिषु सप्तम्यां वारद्वयमेवोत्पद्यत इत्यबसीयते ३ 'सो चेच जहन्नकालट्टि- दीप अनुक्रम [८४०] 25-25%-5-4504250-456 CROSONAGAR ~43~ Page #44 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (०५) [भाग-११]"भगवती"-अंगसूत्र-५ (मूलं+वृत्ति:) शतक [२४], वर्ग [-], अंतर्-शतक [-], उद्देशक [१], मूलं [६९५] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र- [०५], अंगसूत्र- [०५] "भगवती मूलं एवं अभयदेवसूरि-रचिता वृत्ति: २४ शतके प्रत सूत्रांक [६९५] यावृत्तिः दीप अनुक्रम [८४०] 15 ईओ'इत्यादिस्तु चतुर्थः ४ तत्र च 'सच्चेव रयणप्पभपुढविजहन्नकालट्ठिइवत्तवया भाणिय'त्ति सैव रत्नप्रभाचतुर्थप्रज्ञप्तिः गमवक्तव्यता भणितव्या नवरं-केवलमयं विशेषः, तत्र रत्नप्रभायां पद संहननानि त्रयश्च वेदा उक्ताः इह तु सप्तमपृथिवी- उद्देशः१ अभयदेवी- चतुर्थगमे प्रथममेव संहननं खीवेदनिषेधश्च वाच्य इति ४, शेषगमास्तु स्वयमेव ऊह्याः ।। मनुष्याधिकारे मनुष्येभ्य | जइ मणुस्सेहिंतो उववज्जति किं सन्निमणुस्सेहिंतो उचवखंति असन्निमणुस्सहिंतो उववजंति !, गोयमा ! उत्पाद सू ६९६ ॥८१४॥ सन्निमणुस्सेहितो उववजंति णो असन्नीमणुस्सहिंतो उववजंति, जइ सन्निमणुस्सेहिंतो उववजन्ति किं संखेज-14 बासाउयसन्निमणुस्सेहितो उपव. असंखेजवा. जाच उवव०१, गोयमा! संखेज्जवासाउयसनिमणु णो । असंखेजवासाउपजाव उववजन्ति, जइ संखेजवासा जाव उववजन्ति किं पजत्तसंखेजवासाज्य अपज्जत्तसं-121 खेजवासाउय०१, गोपमा ! पजत्तसंखेज्जवासाउयनो अपज्जत्तसंखेजवासाउय जाव उववजति, पजत्तसंखे-XI जवासाउय० सन्निमणुस्से णं भंते ! जे भविए नेरइएसु उववजित्तए से णं भंते । कति पुढवीसु उववज्जेजा, गोयमा ! सत्तमु पुढवीसु उववजेजा तं०-रयणप्पभाए जाव अहेसत्तमाए, पजत्तसंखेजवासाउपसन्निमणुस्से राणं भंते ! जे भविए रयणप्पभाए पुढवीए नेरइएमु उववजित्सए से णं भंते! केवतिकालटिइएसु उववज्जेजा, गोयमा ! जह० दसवाससहस्सद्वितीएसु उक्कोसेणं सागरोचमाहितीएसु उववजेजा, ते णे भंते ! जीवा एगस ८१४॥ मएणं केवइया उववजंति ?, गोयमा ! जहन्नेणं एको वा दो वा तिन्नि चा उकोसेणं संखेजा उववज्जति संघ-| यणा छ सरीरोगाहणा जहन्नेणं अंगुलपुहुत्तं उक्कोसेणं पंचधणुसयाई एवं सेसं जहा सन्निपंचिंदियतिरिक्ख मनुष्याधिकारे उत्पाद-वर्णनं ~44 Page #45 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (०५) [भाग-११]"भगवती"-अंगसूत्र-५ (मूलं+वृत्ति:) शतक [२४], वर्ग [-], अंतर्-शतक [-], उद्देशक [१], मूलं [६९६-६९७] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र- [०५], अंगसूत्र- [०५] "भगवती मूलं एवं अभयदेवसूरि-रचिता वृत्ति: प्रत सूत्रांक [६९६-६९७] जोणियाणं जाव भवादेसोत्ति नवरं चत्तारि णाणा तिन्नि अन्नाणा भयणाए छ समुग्धाया केवलिवजा ठिती छाअणुबंधो य जहन्नेणं मासपुरत्तं उकोसेणं पुनकोडी सेसं तं चेव कालादेसेणं जहन्नेणं दसवाससहस्साई मासपुहुत्तमम्भहियाई उक्कोसेणं चत्तारि सागरोवमाई चाहिं पुषकोडीहि अब्भहियाई एवतियं जाव करेजा १, सोचेव जहन्नकालद्वितीएम उववन्नो सा चेव वत्तवया नवरं कालादेसणं जहन्नेणं दसवाससहस्साई मासपुत्तमम्भहियाई उकोसेणं चत्तारि पुषकोडीओ चत्तालीसाए वाससहस्सेहिं अन्भहियाओ एवतियं २, सो* चेव उक्कोसकालहितीएम उववन्नो एस चेव वत्तबया नवरं कालादेसेणं जहनेणं सागरोवमं मासपुहत्तमम्भ-15 दाहियं उकोसेणं चत्तारि सागरोचमाई चाहिं पुचकोडीहिं अन्भहियाई एबतियं जाव करेजा ३, सो चेव | अप्पणा जहन्नकालद्वितीओ जाओ एस चेव वत्तवया नवरं इमाई पंच नाणत्ताई सरीरोगाहणा जहन्नेणं का अंगुलपुहत्तं उकोसेणवि अंगुलपुहत्तं तिन्नि नाणा तिन्नि अन्नाणाई भयणाए पंच समुग्धाया आविल्ला ठिती अणुपंधो य जहन्नेणं मासपुहुत्तं उक्कोसेणवि मासपुहुरा सेसं तं चेव जाव भवादेसोत्ति, कालादेसेणं जहन्नेणं |8 दसवाससहस्साई मासपुहुत्तमभहियाई उक्कोसेणं चत्तारि सागरोवमाई चाहिं मासपुहत्तेहिं अन्भहियाई एवतियं जाव करेजा । सो चेव जहन्नकाल द्वितीएम उववन्नो एस चेव वत्तवया चउत्थगमगसरिसा या नवरं कालादेसेणं जहन्नेणं दसवाससहस्साई मासपुहुत्तमभहियाई उकोसेणं चत्तालीसं वाससहस्साई चाहिं दीप अनुक्रम [८४१ ८४२] मनुष्याधिकारे उत्पाद-वर्णनं ~45 Page #46 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (०५) [भाग-११]"भगवती"-अंगसूत्र-५ (मूलं+वृत्ति:) शतक [२४], वर्ग [-], अंतर्-शतक [-], उद्देशक [१], मूलं [६९६-६९७] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र- [०५], अंगसूत्र- [०५] "भगवती मूलं एवं अभयदेवसूरि-रचिता वृत्ति: प्रत सूत्रांक [६९६-६९७] व्याख्या- मासपुरत्तेहिं अब्भहियाई एवतियं जाव करेजा ५ सो चेव उक्कोसकालहितीएसु उववन्नो एस चेव गमगोर प्रज्ञप्तिः | नवरं कालादेसेणं जहन्नेणं सागरोवमं मासपुहत्तमम्भहियं उक्कोसेणं चत्तारि सागरोवमाई चाहिं मासपुहु-15 उद्देशः१ अभयदेवी- सेहिं अम्भहियाई एवइयं जाव करेजा। सो चेव अप्पणा उक्कोसकालहितीओ जाओ सो चेव पढमग- मनुष्येभ्य या वृत्तिःशमओ णेयधो नवरं सरीरोगाहणा जहन्नेणं पंचधणुसयाई उक्कोसेणवि पंचधणुसयाई ठिती जहन्नेणं पुषकोडी उत्पादः ॥१५॥15उकोसेणवि पुषकोडी एवं अणुबंधोवि, कालादेसेणं जहन्नेणं पुषकोडी दसहि वाससहस्सेहिं अम्भहिया उक्को- सू ६९६ सेणं चत्तारि सागरोचमाइं चाहिं पुषकोडीहिं अम्भहियाई एवतियं कालं जाव करेजा ७। सो चेव जहन्न-ती कालद्वितीएसु उववन्नो सचेव सत्तमगमगवत्तबया नवरं कालादेसेणं जहन्नेणं पुषकोडी दसहि वाससहस्सेहिं अन्भहिया उकोसेणं चत्तारि पुधकोडीओ चत्तालीसाए वाससहस्सेहिं अमहियाओ एवतियं कालं जाव ह करेजा ८। सो चेव उकोसकालहितीएसु जयवन्नो सा चेव सत्तमगमगवत्तधया नवरं कालादेसेणं जहन्ने] |सागरोचमं पुषकोडीए अभहियं उकोसेणं चत्तारि सागरोवमाई चाहिं पुवकोडीहिं अभहियाई एवतियं | कालं जाव करेजा ९॥ (सूत्रं ६९६) ।। पजत्तसंखेजवासाउथसन्निमणुस्से णं भंते ! जे भविए सकरप्पभाए | पुढवीए नेरइएमु जाव उववजिसए से णं भंते ! केवति जाव उववजेजा, गोयमा ! जहन्नेणं सागरोवम. द्वितीएसु उक्कोसेणं तिसागरोवमद्वितीएसु उववजेजा, ते णं भंते ! सो चेव रयणप्पभपुढविगमओ यबो N८१५॥ जानवरं सरीरोगाहणा जहन्नेणं रपणिपुहुत्तं उक्कोसेणं पंचधणुसयाई ठिती जहन्नेणं वासपुहुर्त उकोसेणं पुचको-18 दीप अनुक्रम [८४१ ८४२] मनुष्याधिकारे उत्पाद-वर्णनं ~46~ Page #47 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (०५) [भाग-११]"भगवती"-अंगसूत्र-५ (मूलं+वृत्ति:) शतक [२४], वर्ग [-], अंतर्-शतक [-], उद्देशक [१], मूलं [६९६-६९७] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र- [०५], अंगसूत्र- [०५] "भगवती मूलं एवं अभयदेवसूरि-रचिता वृत्ति: प्रत सूत्रांक [६९६-६९७] डी एवं अणुबंधोचि, सेसं तं चेव जाव भवादेसोत्ति, कालादेसेणं जहन्नेणं सागरोवर्म वासपुहअन्भहियं उकोसेणं बारस सागरोबमाई चाहिं पुचकोडीहिं अब्भहियाई एवतियं जाव करेजा १, एवं एसा ओहिए । तिसु गमएमु मणूसस्स लगी नाणत्तं नेरइयहिती कालादेसेणं संवेहं च जाणेज्जा ३, से चेव अप्पणा जहन्न-18 कालद्वितीओ जाओ तिसुवि गमएसु एस चेव लडी नवरं सरीरोगाहणा जहन्नेणं रयणिपुहत्तं उकोसेणवि रयणिपुरत्तं ठिती जहन्नेणं वासपुष्टुत्तं उक्कोसेणवि वासपुहुत्तं एवं अणुबंधोवि सेसं जहा ओहियाण संवेहो सबो उब जिऊण भाणियबो ४-५-६, सो चेव अप्पणा उक्कोसकालद्वितीओ तस्सवि तिसुवि गमएस इंम | णाणसं-सरीरोगाहणा जहन्नेणं पंचधणुसयाई उक्कोसेणवि पंचधणुसयाई ठिती जहन्नेणं पुषकोडी उक्कोसेणचि पुष| कोडी एवं अणुबंधोषि सेसं जहा पढमगमए नवरं नेरइयठिई य कायसंवेहं च जाणेजा ९एवं जाव छठ्ठपुढची नवरं || |तचाए आढवेत्ता एफेकं संघयणं परिहायति जहेव तिरिक्खजोणियाणं कालादेसोवि तहेव नवरं मणुस्सद्विती भाणियबा । पजत्तसंखेजवासाउथसन्निमणुस्से णं भंते ! जे भविए अहेससमाए पुरविनेरइएसु उववजित्तए से णं भंते ! केवतिकालद्वितीएसु उववज्ने जा ?, गोयमा ! जहन्नेणं बावीसं सागरोवमठितीएसु उक्कोसेणं ४ तेत्तीसं सागरोवमहितीएसु उववजेजा, ते णं भंते ! जीवा एगसमएणं अवसेसो सो चेव सकरप्पभापुढविसे गमओ यच्चो नवरं पढमं संघयणं त्थिवेयगा न उववजंति सेसं तं चेव जाव अणुपंधोत्ति भवादेसेणं दो दीप अनुक्रम SACROSOMSANI [८४१ ८४२] मनुष्याधिकारे उत्पाद-वर्णनं ~47 Page #48 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (०५) [भाग-११]"भगवती"-अंगसूत्र-५ (मूलं+वृत्ति:) शतक [२४], वर्ग [-], अंतर्-शतक [-], उद्देशक [१], मूलं [६९६-६९७] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र- [०५], अंगसूत्र- [०५] "भगवती मूलं एवं अभयदेवसूरि-रचिता वृत्ति: प्रत सूत्रांक [६९६-६९७] व्याख्या-18 भवग्गणाई कालादेसेणं जहन्नेणं वाचीसं सागरोवमाई वासपुहुत्तमन्भहियाई उकोसेणं तेत्तीसं सागरोवमाई || २४ शतके प्रज्ञप्तिः पुचकोडीए अभहियाई एचतियं जाव करेज्जा १, सो चेव जहन्नकालद्वितीएस उववन्नो एस चेव वत्तवया | उद्देशः१ अभयदेवी| नवरं नेरइयद्वितिसंवहं च जाणेजा २, सो चेव उकोसकालहितीएम उववन्नो एस चेव चत्तवया नवरं संवेहं मनुष्येभ्य या वृत्तिः२ उत्पादः च जाणेज्जा ३, सो चेव अप्पणा जहन्नकालहितीओ जाओ तस्सवि तिमुवि गमएसु एस चेव वत्तच्या नवरं सू६९६ ८१६॥ सरीरोगाणा जहन्नेणं रयणिपुहुत्तं उक्कोसेणवि रयणिपुहुत्तं ठिती जहन्नेणं वासपुहुत्तं उक्कोसेणवि वासपुहत्तं एवं अणुबंधोवि संवेहो उवजुजिऊण भाणियवो ६ । सो चेव अप्पणा उक्कोसकालहितीओ जाओ तस्सवि तिमुवि गमएम एस चेव वत्तवया नवरं सरीरोगाहणा जहन्नेणं पंचधणुसयाई उकोसेणवि पंचधणुसयाई। ठिती जहन्नेणं पुषकोडी उक्कोसेणवि पुचकोडी एवं अणुबंधोवि णवमुवि एतेसु गमएसु नेरइयहिती संवेहं च जाणेजा सवत्थ भवग्गहणाई दोन्नि जाव णवमगमए कालादेसेणं जहन्नेणं तेत्तीसं सागरोवमाई पुवकोडीए अन्भहियाई उकोसेणवि तेत्तीसं सागरोवमाई पुचकोडीए अभहियाई एवतियं कालं सेचेजा एवतियं कालं गतिरागतिं करेजा ९। सेवं भंतेत्ति जाब विहरति ॥ चउचीसतिमसए पढमो (सूत्रं ६९७ ) ॥२४-१॥ ८१६॥ 'उकोसेणं संखेजा उवववति त्ति गर्भजमनुष्याणां सदैव सङ्ख्यातानामेवास्तित्वादिति, 'नवरं चत्तारि नाणाई'ति अवध्यादौ प्रतिपतिते सति केषाञ्चिन्नारकेषत्पत्तेः, आह च चूर्णिकार:-'ओहिनाणमणपजवआहारयसरीराणि लणं परि ASSOSORRECARX दीप अनुक्रम [८४१ ८४२] SARERatinintamatarna मनुष्याधिकारे उत्पाद-वर्णनं ~48~ Page #49 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (०५) [भाग-११]"भगवती"-अंगसूत्र-५ (मूलं+वृत्ति:) शतक [२४], वर्ग [-], अंतर्-शतक [-], उद्देशक [१], मूलं [६९६-६९७] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र- [०५], अंगसूत्र- [०५] "भगवती मूलं एवं अभयदेवसूरि-रचिता वृत्ति: प्रत सूत्रांक [६९६-६९७] साडित्ता उपयजति'त्ति, 'जहनेणं मासपुहुत्त'ति, इदमुक्तं भवति-मासद्वयान्तर्वायुनरो नरकं न याति 'दसवाससह|स्साईति जघन्य नारकायुः 'मासपुहत्तमम्भहियाईति इह मासप्रथक्त्वं जघन्य नरकयायिमनुष्यायुः 'चत्तारि साग-||3| |रोवमाईति उत्कृष्टं रत्नप्रभानारकभवचतुष्कायुः 'चउहि पुषकोडीहिं अम्भहियाईति, इह चतस्रः पूर्वकोटयो नरक| यायिमनुष्यभवचतुष्कोत्कृष्टायुःसम्बन्धिन्यः, अनेन चेदमुक्तं-मनुष्यो भूत्वा चतुर एवं धारानेकस्यां पृथिव्यां नारको जायते || पुनश्च तिर्यगेव भवतीति, जघन्यकालस्थितिक औधिकेष्वित्यत्र चतुर्थे गमे 'इमाई पंच णाणत्ताई इत्यादि शरीरावगाहनेह जघन्येतराभ्यामकुलपृथक्त्वं, प्रथमगमे तु सा जघन्यतोऽङ्कुलपृथक्त्वमुत्कृष्टतस्तु पञ्च धनु शतानीति १ तह त्रीणि ज्ञानानि त्रीण्यज्ञानानि भजनया जघन्यस्थितिकस्यैषामेव भावात् , पूर्व च चत्वारि ज्ञानान्युक्तानीति २ तथेहाद्याः पञ्च | समुद्घाताः जघन्यस्थितिकस्यैषामेव सम्भवात् प्राक् च पहुक्ताः अजघन्यस्थितिकस्याहारकसमुद्घातस्यापि सम्भवात् ३ || दतथेह स्थितिरनुवन्धश्च जघन्यत उत्कृष्टतश्च मासपृथक्त्वं प्राक् च स्थित्यनुवन्धो जघन्यतो मासपृथक्त्वमुस्कृष्टतस्तु पूर्व| कोट्यभिहितेति, शेषगमास्तु स्वयमभ्यूह्याः ।। शर्कराप्रभावक्तव्यतायाम्-'सरीरोगाहणा रयणिपुरत्तं ति अनेनेदभवसीयते-द्विहस्तप्रभाणेभ्यो हीनतरप्रमाणा द्वितीयायां नोत्पद्यन्ते, तथा 'जहण्णणं वासपुरतंति अनेनापि वर्षद्वयायुष्केभ्यो | हीनतरायुष्का द्वितीयायां नोत्पद्यन्त इत्यवसीयते, 'एवं एसा ओहिएसु तिसु गमएसु मणूसस्स लद्धी'ति 'ओहिओ १ यधपि सामान्येन गर्भस्थस्य नरकगतावुत्पाद उभयसाधारणस्तथापि नारकमनुष्यनारकसंवैधेऽन्तर्मुहर्तमानान्तरकालोके जातु | नारकभवचतुष्कसंवेधकारकमनुष्योऽत्रैवं विधः स्यात् इति समाधेयं । SECREEN दीप अनुक्रम [८४१ RSSNEHARS ८४२] For P OW मनुष्याधिकारे उत्पाद-वर्णनं ~49~ Page #50 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (०५) [भाग-११]"भगवती"-अंगसूत्र-५ (मूलं+वृत्ति:) शतक [२४], वर्ग [-], अंतर्-शतक [-], उद्देशक [१], मूलं [६९६-६९७] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र- [०५], अंगसूत्र- [०५] "भगवती मूलं एवं अभयदेवसूरि-रचिता वृत्ति: व्याख्या- प्रज्ञप्तिः अभयदेवीया वृत्तिः२ 95- 9 प्रत सूत्रांक [६९६-६९७]] ॥८१७॥ ओहिएसु १ ओहिओ जहन्नहितीएसु २ ओहिओ उक्कोसडिईएसु ३ति एते औधिकास्त्रयो गमाः ३, एतेषु 'एषा' अन-18 २४ शतके स्तरोक्ता मनुष्यस्य 'लब्धिः' परिमाणसंहननादिप्राप्तिः, नानात्वं त्विदम्-यदुत नारकस्थिति कालादेशेन कायसंवेध चा उद्देशः१ (जानीयाः, तत्र प्रथमगमे स्थित्यादिकं लिखितमेव द्वितीये त्वौधिको जघन्यस्थितिबित्यत्र नारकस्थितिर्जघन्येतराभ्यां सागरो- नारकाणापमं कालतस्तु संवेधो जघन्यतो वर्षपृथक्त्वाधिकं सागरोपममुत्कृष्टतस्तु सागरोपमचतुष्टयं चतुःपूर्वकोट्यधिक, तृतीये-18 मुत्पाद प्येवमेव नंवर सागरोपमस्थाने जघन्यतः सागरोपमत्रयं सागरोपमचतुष्टयस्थाने तूत्कर्षतः सागरोपमद्वादशकं वाच्यमिति, सू.६९७ 'सो चेवेत्यादि चतुर्थादिगमत्रयं, तत्र च 'संवेहो एवजुज्जिऊण भाणियघोत्ति, स चैव-जपन्यस्थितिक औधिकेष्वित्यत्र गमे संवेधः कालादेशेन जघन्यतः सागरोपमं वर्षपृथक्त्वाधिक उत्कृष्टतस्तु द्वादश सागरोपमाणि वर्षपृथक्त्वचतुष्काधिकानि, जघन्यस्थितिको जघन्यस्थितिकेष्वित्यत्र जघन्येन कालतः कायसंवेधः सागरोपमं वर्षपृथक्त्वाधिक उत्कृष्टतस्तु चत्वारि सागरोपमाणि वर्षपृथक्त्वचतुष्काधिकानि, एवं षष्ठगमोऽप्यूह्यः, 'सो चेवेत्यादि सप्तमादिगमत्रयं, तत्र च 'इम नाणस'मित्यादि, शरीराघगाहना पूर्व हस्तपृथक्त्वं धनुःशतपञ्चकं चोक्ता इह तु धनुःशतपशकमेव, एवमन्यदपि नानात्वमम्यूधम् । 'मणुस्सठिई जाणियबत्ति तिर्यकस्थितिर्जघन्याऽन्तर्मुहुर्तमुक्ता मनुष्यगमेषु तु मनुष्यस्थितिर्जातव्या सा च जघन्या द्वितीयादिगामिनां वर्षपृथक्त्वमुत्कृष्टा तु पूर्वकोटीति ॥ सप्तमपृथिवीप्रथमगमे 'तेत्तीसं सागरोवमाई 31 ॥८१७॥ पुचकोडीए अन्भहियाई ति इहोत्कृष्टः कायसंवैध एतावन्तमेव कालं भवति सप्तमपृथिवीनारकस्य तत उदृत्तस्य मनुष्यप्वनुत्पादेन भवद्वयभावेनैतावत एव कालस्य भावादिति ॥ चतुर्विंशतितमशते प्रथमः ॥ २४-१॥ दीप अनुक्रम [८४१ ८४२] redana अत्र चतुर्विंशतितमे शतके प्रथम-उद्देशक: परिसमाप्त: ~50~ Page #51 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (०५) [भाग-११]"भगवती"-अंगसूत्र-५ (मूलं+वृत्ति:) शतक [२४], वर्ग [-], अंतर्-शतक [-], उद्देशक [२], मूलं [६९८] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र- [०५], अंगसूत्र- [०५] "भगवती मूलं एवं अभयदेवसूरि-रचिता वृत्ति: प्रत सूत्रांक [६९८] 4-054%95%455 दीप अनुक्रम [८४३] व्याख्यातः प्रथमोद्देशकः अथ द्वितीयो व्याख्यायते, सम्बन्धस्तु जीवपदे इत्यादिपूर्वोक्तगाथानिदर्शित एव, एवं सर्वोद्देशकेष्वपि, अस्य चेदमादिसूत्रम् रायगिहे जाव एवं वयासी-असुरकुमारा णं भंते ! कओहिंतो उववजंति किं नेरइएहितो उवव० तिरि० मणु० देवेहिंतो उववनंति ?, गोयमा ! णो णेरइएहितो उवव तिरि० मणुस्सेहितो उवव० नो देवेहिंतो उवव० एवं जहेव नेरइपउद्देसए जाव पवत्तअसन्निपंचिंदितिरिक्खजोणिए णं भंते ! जे भविए असुरकुमारेसु उवव|जित्तए से णं भंते ! केवतिकालहितीएसु उववजेज्जा ?, गोयमा ! जहन्नेणं दसवाससहस्सद्वितीएमु उक्कोसेणं | पलिओवमरस असंखेजहभागहितीएम उवव०,ते णं भंते ! जीवा एवं रयणप्पभागमगसरिसा णववि गमा भाणियबा नवरं जाहे अप्पणा जहन्नकालाहितीओ भवति ताहे अज्झवसाणा पसत्था णो अप्पसत्था तिसुवि। गमएसु अवसेसं तं चेव ९॥ जइ सन्निपंचिंदियतिरिक्खजोणिएहिंतो उववज्जति किं संखेजवासाज्यसन्निमापंचिदियजाव उववजति असंखेजवासा. उववनंति ?, गोयमा ! संखेजवासाउय जाव उववर्जति असंखेज | वासा जाब उवव०, असंखेजबासाउ० सन्निपंचि० तिरि० जो भंते ! जे भविए असुरकु० उवव० से णं|g भंते ! केवइकालद्वितीएसु उववलेला, गोयमा ! जहन्नेणं दसवाससहस्सद्वितीएसु उववजिजा उक्कोसेणं | तिपलिओवमहितीएसु उवज्जेजा, ते णं भंते ! जीवा एगसमएणं पुच्छा, गोयमा ! जहन्नेणं एको वा दो वा 8 तिन्नि वा उक्कोसेणं संखेजा उवव० वयरोसभनारायसंघयणी ओगाहणा जह. धणुपुहुत्तं उक्कोसेणं छ गाउ अथ चतुर्विंशतितमे शतके द्वितीय-उद्देशक: आरभ्यते ~51~ Page #52 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (०५) [भाग-११]"भगवती"-अंगसूत्र-५ (मूलं+वृत्ति:) शतक [२४], वर्ग [-], अंतर्-शतक [-], उद्देशक [२], मूलं [६९८] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र- [०५], अंगसूत्र- [०५] "भगवती मूलं एवं अभयदेवसूरि-रचिता वृत्ति: प्रत सूत्रांक या वृत्तिः२७ [६९८] दीप अनुक्रम [८४३] व्याख्या-15 याई समचउरससंठाणसंठिया प०, चत्तारि लेस्साओ आदिल्लाओ, णो सम्मदिवी मिणदिही णो सम्मा-IN २४ शतके प्रज्ञप्तिः मिच्छादिट्ठीणोणाणी अन्नाणी नियमं दुअन्नाणी मतिअन्नाणी सुयअन्नाणी य जोगो तिविहोवि उवओगो दुवि-18 उद्देशा३ अभयदेवी-होवि चत्तारि सन्नाओ चत्तारि कसाया पंच इंदिया तिन्नि समुग्धाया आदिल्लगा समोहयावि मरंति असमो- असुराणा हयावि मरंति वेदणा दुधिहाचि सायावेयगा असायावेयगा वेदो दुविहोवि इस्थिवेयगावि पुरिसवेयगाविणो मुत्पाद: ॥८१८॥ नपुंसगवेदगा ठिती जहन्ने० साइरेगा पुचकोडी उक्कोसेणं तिन्नि पलिओवमाइं अज्झवसाणा पसस्थावि अप्प- सू ९९८ | सत्यावि अणुबंधो जहेव ठिती कायसंवेहो भवादेसेणं दो भवग्गहणाई कालादेसेणं जहनेणं सातिरेगादि | पुचकोडी दसहि वाससहस्सेहिं अमहिया उकोसेणं छप्पलिओवमाई एवतियं जायकरेला १, सो व जह कालद्वितीयएसु उववन्नो एस चेव वत्तवया नवरं असुरकुमारहिती संवेहं च जाणेज्जा २, सो चेव उकोस-| कालद्वितीएमु उवचन्नो जहन्नेणं तिपलिओवमहितीएम उक्कोसेणचि तिपलिओवमहितीएमु उवव० एस चेव वत्तवया नवरं ठिती से जहन्नेणं तिन्नि पलिओवमाई उक्कोसेणवि तिन्नि पलिओवमाई एवं अणुषंघोवि, कालादेजह. छप्पलिओवमाई उक्कोसेणवि छप्पलिओवमाई एवतियं सेसं तं चेव ३, सो चेव अप्पणा जहन्नकालद्वितीओ जाओ जहन्नेणं दसवाससहस्सद्वितीएमु उकोसेणं सातिरेगपुषकोडीआउ० अप्प. उपव०, 11८१८॥ ते णं भंते ! अवसेसं तं चेव जाव भवादेसोत्ति, नवरं ओगाहणा जहन्नेणं घणुहपुरतं उकोसेणं सातिरेगं घणुसहस्सं ठिती जहन्नेणं सातिरेगा पुषकोडी उकोसेणधि सातिरेगा पुचकोडी एवं अणुपंधोचि, कालादेसणं X*** **45456456 ~52 Page #53 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (०५) [भाग-११]"भगवती"-अंगसूत्र-५ (मूलं+वृत्ति:) शतक [२४], वर्ग [-], अंतर्-शतक [-], उद्देशक [२], मूलं [६९८] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र- [०५], अंगसूत्र- [०५] "भगवती मूलं एवं अभयदेवसूरि-रचिता वृत्ति: प्रत सूत्रांक [६९८] 554564588054545454543 दीप अनुक्रम [८४३] जहन्नेणं सातिरेगा पुषकोडी दसहिं वाससहस्सेहिं अभहिया उकोसेणं सातिरेगाओ दो पुषकोडीओ एवतिय ४, सो व अप्पणा जहन्नकालवितीएसु उचवज्जेज्जा एस चेच वत्तवया नवरं असुरकुमारहिई संवेहं च जाणेज्जा ५, सो चेव उकोसकालहितीएसु उवव० जह० सातिरेगपुवकोडिआउएसु उक्कोसेणवि सातिरेगपुचको-४ डीआउएसु उववजेजा सेसं तं चेव नवरं कालादे०जह सातिरेगाओ दो पुषकोडीओ कोसेणवि सातिरेगाओ दो पुषकोडीओ एवलियं कालं सेवेजा ६, सो चेव अप्पणा उक्कोसकालद्वितीओ जाओ सो चेव पढमगमगो भाणियबो नवरं ठिती जहन्नेणं तिन्नि पलिओवमाई उक्कोसेणवि तिन्नि पलिओवमाई एवं अणुपंधोवि कालादे०जह तिन्नि पलिओचमाई दसहि वाससहस्सेहि अमहियाई उकोसेणं छ पलिओचमाई एवतिय ७.|| सो चेव जहन्नकालद्वितीएसु उववन्नो एस चेच वत्तवया नवरं असुरकुमारद्विती संवेहं च जाणिजा ८, सो चेव उक्कोसकालद्वितीएसु उववन्नो जहतिपलिओवमाई उक्कोसे०तिपलिओव० एस चेव वत्तवया नवरं कालादेसेणं जहरू छप्पलिओचमाई एवतियं ९॥ जइ संखेजवासाउयसन्निपंचिंदियजाव उपवजंति किं जलचर एवं जाव पज्जत्तसंखेजवासाउयसन्निपंचिंदियतिरिक्खजोणिए णं भंते ! जे भविए असुरकु० उ०* से णं भंते ! केवड्यकालहितीएम उवव?, गोयमा ! जह दसवासद्वितीएसु उक्कोसे सातिरेगसागरोवमद्वितीएसु उवव०, ते णं भंते ! जीवा एगसमएणं एवं एतेसिं रयणप्पभपुढविगमगसरिसा नव गमगा यचा, नवरं जाहे अप्पणा जहन्नकालहिइओ भवइ ताहे तिसुवि गमएम इमं णाणत्तं चत्तारि लेस्साओ। ~53 Page #54 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (०५) [भाग-११]"भगवती"-अंगसूत्र-५ (मूलं+वृत्ति:) शतक [२४], वर्ग [-], अंतर्-शतक [-], उद्देशक [२], मूलं [६९८] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र- [०५], अंगसूत्र- [०५] "भगवती मूलं एवं अभयदेवसूरि-रचिता वृत्ति: प्रत सूत्रांक [६९८] दीप अनुक्रम [८४३] व्याख्या- || अज्झवसाणा पसत्था नो अप्पसत्था सेसं तं चेव संवेहो सातिरेगेण सागरोवमेण कायचो ९॥ जइ मणुस्से ||२४ शतके प्रज्ञप्तिः हिंतो उववर्जति किं सन्निमणुस्सहिंतो असन्निमणुस्सेहितो?, गोयमा! सन्निमणुस्सेहिंतो नो असन्निमणुस्से- उद्देशः २ अभयदा-हिंतो उपवजंति, जह सन्निमणुस्सहिंतो उववजंति किं संखेजवासाउयसनिमणुस्सेहिंतो उवव० असंखेजवा- असुराणाया वृत्तिः२ साउयसन्निमणुस्सेहिंतो उवव०?, गोयमा! संखेजवासाउयजाव उववजंति असंखेजवासाउयजावउववजंति, मुत्पाद सू६९८ ॥८१९॥ असंखेजवासाउयसन्निमणुस्से गंभंते ! जे भविए असुरकुमारेसु उववजित्तए से णं भंते ! केवतिकालहि- तीएमु उववज्जेज्जा, गोयमा ! जह० दसवाससहस्सद्वितीएसु उक्को तिपलिओवमहितीएसु उव०, एवं असं| खेजबासाउयतिरिक्खजोणियसरिसा आदिल्ला तिन्नि गमगा नेयषा, नवरं सरीरोगाहणा पढमवितिएस गमएमु जहन्नेणं सातिरेगाई पंचधणुसयाई उक्कोसेणं तिन्नि गाउयाई सेसं तं चेव, तईयगमे ओगाहणा जह-18 नेणं तिन्नि गाउयाई उक्कोसेणवि तिन्नि गाउयाई सेसंजहेव तिरिक्खजोणियाणं ३, सो चेव अप्पणा जहन्नका लहितीओ जाओ तस्सवि जहन्नकाल द्वितियतिरिक्खजोणियसरिसा तिन्नि गमगा भाणियचा, नवरं सरीरो-18 दगाहणा तिमुवि गमएसु जह साइरेगाई पंचधणुसयाउकोसेणवि सातिरेगाई पंचधणुसयाई सेसं तं चेव । ६, सो चेव अप्पणा उकोसकालद्वितीओ जाओ तस्सवि ते चैव पच्छिल्लगा तिनि गमगा भाणियचा नवरं ॥८१९॥ सरीरोगाहणा तिमुवि गमएसु जहन्नेणं तिन्नि गाउयाई उक्कोसेणवि तिन्नि गाउयाई अवसेसं तं चेव ९॥जइ संखेजवासाउयसन्निमणुस्सेहितो उपवजह किं पजत्तसंखेजवासाउय अपज्जत्तसंखेजवासाउय०१, गोयमा! पज्ज -58--54-59450-459 ~54~ Page #55 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (०५) [भाग-११]"भगवती"-अंगसूत्र-५ (मूलं+वृत्ति:) शतक [२४], वर्ग [-], अंतर्-शतक [-], उद्देशक [२], मूलं [६९८] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र- [०५], अंगसूत्र- [०५] "भगवती मूलं एवं अभयदेवसूरि-रचिता वृत्ति: प्रत सूत्रांक [६९८] तसंखेजाणो अपज्जत्तसंखेज पजत्तसंखेज्जवासाउयसन्निमणुस्स णं भंते ! जे भविए असुरकुमारेसु उववजि-18 त्तए से णं भंते ! केवतिकालहितीएसु उववज्जेज्जा ?, गोयमा ! जहन्नेणं दसवाससहस्सद्वितीएसु उक्कोसेणं साइरेगसागरोवमहितीएम उववजेजा ते णं भंते ! जीवा एवं जहेच एतेर्सि रयणप्पभाए उवधजमाणाणं णव दगमगा तहेव इहवि णव गमगा भाणियबा णवरं संवेहो सातिरेगेण सागरोवमेण कायचो सेसं तं चेव ९ सेवं भंते!२त्ति ॥ (सूत्रं ६९८) ।। २४-२॥ 'रायगिहे'इत्यादि, 'उक्कोसेणं पलिओवमस्स असंखेजइभागट्टिइएसु उववजेजत्ति, इह पल्योपमासङ्ख्येयभागग्रहणेन || पूर्वकोटी ग्राह्या, यतः संमूछिमस्योत्कर्षतः पूर्वकोटीप्रमाणमायुर्भवति, स चोत्कर्षतः स्वायुष्कतुल्यमेव देवायुर्बभाति नाति-18 रिक्त, अत एवोक्तं चूर्णिकारेण-"जकोसेणं स तुल्लुपुषकोडीआउयत्तं निबत्तेइ, न य समुच्छिमो पुर्वकोडीआउयत्ताओ परो अस्थि"त्ति ॥ असङ्गपातघर्षायुःसज्ञिपञ्चेन्द्रियतिर्यग्गमेषु 'उक्कोसेणं तिपलिओवमट्टिइएसु उववजेजत्ति, इदं देवकुर्वाटू दिमिथुनकतिरश्चोऽधिकृत्योक्तं, ते हि त्रिपल्योपमायुष्कत्वेनासङ्ख्यातवर्षायुषो भवन्ति, ते च स्वायुःसदृशं देवायुर्वनन्तीति । 'संखेजा उववजंति'त्ति असलवातवर्षायुस्तिरश्चामसङ्ख्यातानां कदाचिदण्यभावात् , 'वयरोसहनारायसंघयणीति अस| वातवर्षायुषां यतस्तदेव भवतीति, 'जहन्नेणं धणुहपुहुत्तंति इदं पक्षिणोऽधिकृत्योक्तं, पक्षिणामुत्कृष्टतो धनुःपृथक्त्वप्रमादणशरीरत्वात् , आह च-"धणुयपुहत्तं पक्खिसु"त्ति [पक्षिषु धनुष्पृथक्त्वम् ] असङ्ख्यातवर्षायुषोऽपि ते स्युर्यदाह-पलिय-15 असंखेजपक्खीसुत्ति पल्योपमासययभागः पक्षिणामायुरिति, 'उकोसेणं छ गाउयाई ति, इदं च देवकुर्वादिहस्त्यादी दीप अनुक्रम [८४३] ~55 Page #56 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (०५) [भाग-११]"भगवती"-अंगसूत्र-५ (मूलं+वृत्ति:) शतक [२४], वर्ग [-], अंतर्-शतक [-], उद्देशक [२], मूलं [६९८] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र- [०५], अंगसूत्र- [०५] "भगवती मूलं एवं अभयदेवसूरि-रचिता वृत्ति: प्रत सूत्रांक [६९८] व्याख्या- प्रज्ञप्तिः या वृत्तिः२ 1८२०॥ दीप अनुक्रम [८४३] नधिकृत्योक्तं, 'नो नपुंसगवेयग'त्ति असङ्ख्यातवर्षायुषो हि नपुंसकवेदान संभवन्त्येवेति, 'उक्कोसेणं छप्पलिओचमाईति २४ शतके त्रीण्यसङ्ख्यातवर्षायुस्तिर्यग्भवसम्बन्धीनि त्रीणि चासुरभवसम्बन्धीनीत्येवं पट्, न च देवभवावुद्धृत्तः पुनरष्यसङ्ख्यातवर्षायुष्के उद्देशा२ | पूत्पद्यत इति 'सो चेव अप्पणा जहन्नकालहितीओ'इत्यादिश्चतुथों गमः, इह च जघन्यकालस्थितिकः सातिरेकपूर्वको असुराणाव्यायुः स प पक्षिप्रभृतिक प्रकान्तः 'उकोसेणं सातिरेगपुषकोदिआउए सो'त्ति असङ्ख्यातवर्षायुपा पक्ष्यादीनां सातिरक मुत्पाद सू६९८ पूर्वकोटिरायुः ते च स्वायुस्तुल्यं देवायुः कुर्वन्तीतिकृत्वा सातिरेकेत्याधुक्तमिति, 'उक्कोसेणं सातिरेगं धणुसहस्संति यदुक्तं तत् सप्तमकुलकरपाकालभाविनो हस्त्यादीनपेक्ष्येति संभाव्यते, तथाहि-इहासङ्ग्यातवर्षायुर्जघन्यस्थितिका प्रक्रान्तः || सच सातिरेकपूर्वकोट्यायुर्भवति तथैवागमे व्यवहृतत्वात् , एवंविधश्च हस्त्यादिः सप्तमकुलकरपाकाले लभ्यते, तथा सप्तम कुलकरस्य पञ्चविंशत्यधिकानि पञ्च धनु शतानि उच्चस्त्वं तत्माकालभाविनां च तानि समधिकतराणीति तत्कालीनहस्त्या| दयश्चैतद्विगुणोच्ड़ायाः अतः सप्तमकुलकरपाकालभाविनामसवातवर्षायुषां हस्त्यादीनां यथोक्तमवगाहनाप्रमाणं लभ्यत है | इति, 'सातिरेगाओ दो पुबकोडीओंइति एका सातिरेका तिर्यग्भवसत्काऽन्या तु सातिरेकैवासुरभवसरकेति ४ । 'असु-10 रकुमारढिई संवेहं च जाणिज्जत्ति तत्र जघन्याऽसुरकुमारस्थितिर्दशवर्षसहस्राणि संवेधस्तु सातिरेका पूर्वकोटी दशवर्ष-18 IM॥८२०॥ | सहस्राणि चेति ५, शेषगमास्तु स्वयमेवाभ्यूह्याः ९ ॥ एवमुत्पादितोऽसङ्ग्यातवर्षायुःसज्ञिपञ्चेन्द्रियतिर्यगसुरे, अथ है | ससातवर्षायुरसावुत्पाद्यते-'जह संखेने'त्यादि, 'उक्कोसेणं सातिरेगसागरोवमहितीएसुत्ति यदुक्तं तद्वलिनिकायमाश्रित्येति 'तिमुवि गमएसुत्ति जघन्यकालस्थितिकसम्बन्धिषु औधिकादिषु 'चत्तारि लेसाओ'त्ति रत्नप्रभापृथिवी ~56 Page #57 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (०५) प्रत सूत्रांक [६९८] दीप अनुक्रम [८४३] [भाग-११]“भगवती”– अंगसूत्र -५ (मूलं + वृत्ति:) शतक [२४], वर्ग [-], अंतर् शतक [-], उद्देशक [२], मूलं [६९८ ] पूज्य आगमोद्धारकश्री संशोधितः मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित.. आगमसूत्र - [०५] अंगसूत्र- [ ०५] "भगवती" मूलं एवं अभयदेवसूरि-रचिता वृत्तिः गामिनां जघन्यस्थितिकानां तिस्रस्ता उक्ताः एषु पुनस्ताश्चतस्रः असुरेषु तेजोलेश्यावानप्युत्पद्यत इति, तथा रलप्रभावृथिवीगामिनां जघन्यस्थितिकानामध्यवसाय स्थानान्यप्रशस्तान्येवोक्तानि इह तु प्रशस्तान्येव, दीर्घस्थितिकत्वे हि द्विविधान्यपि संभवन्ति न त्वितरेषु कालस्याल्पत्वात्, 'संवेहो सातिरेगेण सागरोवमेण काययो'त्ति रजप्रभागमेषु सागरोपमेण संवेध उक्तः असुरकुमारगमेषु तु सातिरेकसागरोपमेणासौ कार्यो वलिपक्षापेक्षया तस्यैव भावादिति ॥ अथ मनुष्येभ्योऽसुरानुत्पादयनाह - 'जइ मणुस्सेहिंतो' इत्यादि, 'उक्कोसेणं तिपलिओ महिइएस'त्ति देवकुर्वादिनरा हि उत्कर्षतः स्वायुः समानस्यैव देवायुषो बन्धकाः अतः 'तिपलिओवमट्टिइएस' इत्युक्तं, 'नवरं सरीरोगाहणेत्यादि तत्र प्रथम औधिक औधिकेषु द्वितीयस्त्वाधिको जघन्यस्थितिष्विति, तत्रौधिकोऽसङ्ख्यातवर्षायुर्नरो जघन्यतः सातिरेकपश्चधनुःशतप्रमाणो भवति यथा | सप्तमकुलकरप्राकालभावी मिथुनकनरः उत्कृष्टतस्तु त्रिगब्यूतमानो यथा देवकुर्वादिमिथुनकनरः, स च प्रथमगमे द्वितीये च द्विविधोऽपि संभवति, तृतीये तु त्रिगव्यूतावगाहून एव यस्मादसावेवोत्कृष्टस्थितिपु-पल्योपमत्रयायुष्केषूत्पद्यते उत्कर्षतः स्वायुः समानायुर्वन्धकत्वात्तस्येति । अथ सङ्ख्यातवर्षायुः सञ्ज्ञिमनुष्यमाश्रित्याह – 'जइ संखेले'त्यादि, एतच समस्तमपि पूर्वोक्तानुसारेणावगन्तव्यमिति ॥ चतुर्विंशतितमशते द्वितीयः ॥ २४-२ ॥ तृतीयस्तु—– रायगिहे जाव एवं वयासी-नागकुमारा णं भंते ! कओहिंतो उववज्जंति किं नेरइएहिंतो उबवजंति तिरि० For Parts Only अत्र चतुर्विंशतितमे शतके द्वितीय उद्देशकः परिसमाप्तः अथ चतुर्विंशतितमे शतके तृतीयात् एकादशा पर्यन्ता: उद्देशका: आरभ्यते ~57~ waryru Page #58 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (०५) प्रत सूत्रांक [६९९ -७००] दीप अनुक्रम [८४४ -८४५] [भाग-११]“भगवती”- अंगसूत्र -५ (मूलं + वृत्तिः) शतक [२४], वर्ग [-], अंतर् शतक [ - ], उद्देशक [ ३-११], मूलं [६९९-७००] पूज्य आगमोद्धारकश्री संशोधितः मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित.. आगमसूत्र- [०५] अंगसूत्र- [ ०५] "भगवती" मूलं एवं अभयदेवसूरि-रचिता वृत्तिः व्याख्याप्रज्ञप्तिः अभयदेवीया वृत्तिः २ ॥८२१॥ | मणु देवेहिंतो उबवजंति ?, गोयमा ! णो णेरइएहिंतो उववनंति तिरिक्खजोणिय० मणुस्सेहिंतो उववअंति नो देवेहिंतो उबवजंति, जर तिरिक्ख एवं जहा असुरकुमाराणं वत्तद्वया तहा एतेसिंपि जाव असन्नीति, जह सन्निपचिदियतिरिक्खजोणिएहिंतो किं संखेजवासाज्य० असंखेजवासाज्य० १, गोयमा । संखेवासाउय० असंखेजवासाज्य० जाव उववज्जंति, असंखिजवासाज्यसन्निपचिदियतिरिक्खजोगिए णं भंते! जे भविए नागकुमारेसु उववजित्तए से णं भंते! केवतिकालद्विती० ?, गोयमा ! जहन्त्रेणं दसवाससहस्सट्टितिएस कोसेणं देणदुपलिओदमद्वितीएस उववज्जेज्जा, ते णं भंते ! जीवा अवसेसो सो चेव असुरकुमारेसु उववजमाणस्स गमगो भाणियो जाव भवादेसोत्ति कालादेसेणं जहनेणं सातिरेगा पुषकोडी दसहिं वाससहस्सेहिं अन्भहिया उक्कोसेणं देसूणाई पंच पलिओ माई एवतियं जाव करेजा १, सो चैव जहनकालतीएस उववन्नो एस चैव वत्तवया नवरं नागकुमार द्वितीं संदेहं च जाणेजा २, सो चेव उक्कोसकालहितीएस उबवनो तरसवि एस चैव वतवया नवरं टिती जहत्रेणं देणारं दो पलिओ माई उकोसेणं तिन्नि पलिओमाई सेसं तं चैव जाव भवादेसोति कालादेसेणं जहनेणं देणारं चत्तारि पलिओ माई उकोसेणं देसूणाई पंच पलिओयमाई एवतियं कालं ३, सो चेव अप्पणा जहनकालद्वितीओ जाओ तस्सवि तिसुवि गमएस जहेब असुरकुमारेसु उववजमाणस्स जहनकालद्वितियस्स तहेव निरवसेसं ६ सो चेव अप्पणा उकोसकालद्वितीओ जातो तस्सवि तहेव तिन्नि गमगा जहा असुरकुमारेसु उववजमाणस्स नवरं नागकुमारहित संवेहं Education International For Parks Use Only ~58~ २४ शतके उद्देशः ३ नागानामु [त्पादः सूर्यर्णादीनामु स्पादः सू ६९९.७०० ॥८२१॥ wor Page #59 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (०५) [भाग-११]"भगवती"-अंगसूत्र-५ (मूलं+वृत्ति:) शतक [२४], वर्ग [-], अंतर्-शतक [-], उद्देशक [३-११], मूलं [६९९-७००] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र- [०५], अंगसूत्र- [०५] "भगवती मूलं एवं अभयदेवसूरि-रचिता वृत्ति: 45 प्रत सूत्रांक [६९९-७००] |च जाणेजा सेसं तं चेव ९॥जइ संखेजवासाउयसन्निपंचिंदियजाय किं पजत्तसंखेजवासाध्य. अपजत्तसंखे०१, गोयमा! पज्जत्तसंखेज्जवासाउयःणो अपजत्तसंखेजवासाउय० पज्जत्तसंखेज़वासाउयजाव जे भविए| णागकुमारेसु उववजित्तए से णं भंते ! केवतिकालद्वितीएमु उपवजेजा, एवं जहेव असुरकुमारेसु उववजमाणस्स वत्तषया तहेव इहघि णवसुवि गमएसु, णवरं णागकुमारहिति संवेहं च जाणेजा, सेसं तं| चेव ९॥ जइ मणुस्सेहिंतो उबवजंति किं सन्निमणु० असन्नीमणु०?, गोयमा ! सन्निमणु णो असन्निमणुस्से. जहा असुरकुमारेसु उववजमाणस्स जाव असंखेजबासाउयसन्निमणुस्से णं भंते ! जे भविए णागकुमारेम उववजित्तए से णं भंते ! केवतिकालहितीएमु उववजह ?, गोयमा ! जहन्नेणं दस वाससहस्सं उक्कोसेणं ६ देसूणाई दो पलिओवमाई एवं जहेव असंखेजचासाउयाणं तिरिक्खजोणियाणं नागकुमारेसु आदिल्ला तिन्नि गमगा तहेव इमस्सवि, नवरं पढमवितिएमु गमएम सरीरोगाहणा जहन्नेणं सातिरेगाई पंचधणुसयाई उक्को तिन्नि गाउयाई तइयगमे ओगाहणा जहन्नेणं देसणाई दो गाउयाई उक्कोसेणं तिन्नि गा० सेसं तं चेय ३, सो चेव अप्पणा जहन्नकालहितीओ जाओ तस्स तिसुवि गमएसु जहा तस्स चेव असुरकुमारेसु उववजमाणस्स |तहेब निरवसेसं ६, सो चेव अप्पणा उकोसकालद्वितीओ जाओ तस्स तिमुवि गमएसु जहा तस्स चेव उकोसकालट्ठितियस्स असुरकुमारेसु उववजमाणस्स नवरं णागकुमारद्वितिं संवेहं च जाणेजा, सेसं तं चेवर ९॥जद संखेजवासाउयसन्निमणु० किं पञ्चत्तसंखेज अपज्जत्तसं०?, गोयमा ! पज्जत्तसंखे० णो अपजत्तसंखे, दीप अनुक्रम [८४४-८४५]] - - ~59~ Page #60 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (०५) [भाग-११]"भगवती"-अंगसूत्र-५ (मूलं+वृत्ति:) शतक [२४], वर्ग [-], अंतर्-शतक [-], उद्देशक [३-११], मूलं [६९९-७००] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र- [०५], अंगसूत्र- [०५] "भगवती मूलं एवं अभयदेवसूरि-रचिता वृत्ति: नागानामु प्रत सूत्रांक [६९९-७००] व्याख्या- पज्जत्तसंखेजवासाउयसन्निमणुस्से णं भंते!जे भविए णागकुमारेसु उववजित्तए से गं भंते ! केवति.?, गोयमा २४ शतके प्रज्ञप्तिः जहन्नेणं दसवाससहस्सं उकोसेणं देसूणदोपलिओवमद्विती एवं जहेव असुरकुमारेसु उववज्जमाणस्स सच्चेच उद्देशः३ अभयदान | लद्धी निरवसेसा भवसु गमएसु णवरं णागकुमारहिर्ति संवेदं च जाणेज्जा सेवं भंते !२त्ति ॥ (सूत्र ६९९) वृत्तिःचवीसतिमे सए ततिओ समत्तो ॥ २४-३ ॥ अवसेसा सुबन्नकुमाराई जाव धणियकुमारा एए अट्ठवित्पादःसुर्व | उद्देसगा जहेव नागकुमारा तहेव निरवसेसा भाणियचा, सेवं भंते ! सेवं भंतेत्ति ॥ (सूत्रं ७००)। चउवी-द ॥८२२॥ णोदीनामुसतिमे सते एकारसमो उद्देसो समत्तो ॥ २४-११ ॥ त्पादः सू ॥६९९-७०० | 'रायगिहे'इत्यादि, 'उकोसेणं देसूणदुपलिओवमडिईएसु'त्ति यदुक्तं तदौदीच्यनागकुमारनिकायापेक्षया, यतस्तत्र देह || देशोने पल्योपमे उत्कर्षत आयुः स्यात्, आह च-"दाहिण दिवडपलियं दो देसूणुत्तरिलाणं ।" इति [ दाक्षिणात्यानां सार्द्ध || लापल्यम् औत्तराहाणानां द्वे देशोने ॥] उत्कृष्टसंवेधपदे 'देसूणाई पंच पलिओवमाईति [ देशोनानि पश्च पल्योपमानि] पल्योपमत्रयं असङ्ख्यातवर्षायुस्तियक्सम्बन्धि द्वे च देशोने ते नागकुमारसम्बन्धिनी इत्येवं यथोक्तं मानं भवतीति । द्वितीयगमे 'नागकुमारठिइं संवेहं च जाणेजति तत्र जघन्या नागकुमारस्थितिर्दश वर्षसहस्राणि संवेधस्तु कालतो - जघन्या सातिरेकपूर्वकोटी दशवर्षसहस्राधिका उत्कृष्टः पुनः पल्योपमत्रयं तैरेवाधिकमिति । तृतीयगमे 'उकोसकाल द्विइएसुति देशोनद्विपल्योपमायुष्केष्वित्यर्थः, तथा 'ठिई जहन्नेणं दो देसूणाई पलिओवमाईति यदुक्तं तदवस-15/1८२२॥ पिण्यां सुषमाभिधानद्वितीयारकस्य कियत्यपि भागेऽतीतेऽससातवर्षायुषस्तिरश्चोऽधिकृत्योकं, तेषामेवैतत्प्रमाणायुष्कत्वात् **GUACAQ दीप अनुक्रम [८४४-८४५]] ~60~ Page #61 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (०५) [भाग-११]"भगवती"-अंगसूत्र-५ (मूलं+वृत्ति:) शतक [२४], वर्ग [-], अंतर्-शतक [-], उद्देशक [३-११], मूलं [६९९-७००] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र- [०५], अंगसूत्र- [०५] "भगवती मूलं एवं अभयदेवसूरि-रचिता वृत्ति: प्रत सूत्रांक [६९९-७००] भएपामेव च स्वायुःसमानदेवायुर्बन्धकत्वेनोत्कृष्टस्थितिषु नागकुमारेषुत्पादात् , 'तिन्नि पलिओवमाईति, एतच्च देवकर्वाच-15 18 साल्यातजीवितिरश्चोऽधिकृत्योक्त, ते च त्रिपल्योपमायुषोऽपि देशोनद्विपल्योपममानमायुर्वन्ति यतस्ते स्वायुषः समं हीन-IX दातरं वा तान्ति न तु महत्तरमिति ॥ अथ सङ्ग्यातजीविनं सज्ञिपश्चेन्द्रियतिर्यश्चमाश्रित्याह-'जह संखेज्जवासाउए' इत्यादि, एतच पूर्वोक्तानुसारेणावगन्तव्यमिति ॥ चतुर्विंशतितमशते तृतीयः ॥ २४-३ ॥ एवमन्येऽष्टावित्येवमेकादश ॥ २४-११॥ दीप अनुक्रम [८४४-८४५]] अथ पृथिवीकायिकोद्देशको द्वादशःपुढविकाइया णं भंते ! कओहितो उवय० किं नेरइएहिंतो उववनंति तिरिक्व० मणुस्स० देहितो उववर्जति ?, गोयमा ! णो णेरइएहिंतो उवव तिरिक्ख० मणुस्स० देवेहितोवि उववजंति, जइ तिरिक्खजो|णिए किं एगिदियतिरिक्खजोणिए एवं जहा वकंतीए उववाओ जाव जइ बायरपुडविक्काइयएगिदियतिरि खजोणिएहितो उबवजति किं पजत्तबादरजाव उववजंति अपज्जत्तबादरपुढवि, गोयमा ! पज्जत्तबादरपु-४ दवि अपज्जत्तवादरपुढविकाइ० जाव उववजंति, पुढविकाइए णं भंते ! जे भविए पुढचिकाइएसु उषवनित्तए से णं भंते ! केवतिकालहितीएसु उववजेजा, गोयमा ! जहन्नेणं अंतोमुत्तहितीएसु उकोसेणं बावीसवाससहस्सहितीएसु उववज्जेजा, ते णं भंते ! जीवा एगसमएणं पुच्छा, गोयमा ! अणुसमयं अविरहिया अत्र चतुर्विंशतितमे शतके तृतीयात् एकादशा पर्यन्ता: उद्देशका: परिसमाप्त: अथ चतुर्विशतितमे शतके द्वादशं उद्देशक: आरभ्यते ~614 Page #62 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (०५) [भाग-११]"भगवती"-अंगसूत्र-५ (मूलं+वृत्ति:) शतक [२४], वर्ग [-], अंतर्-शतक [-], उद्देशक [१२], मूलं [७०१] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र- [०५], अंगसूत्र- [०५] "भगवती मूलं एवं अभयदेवसूरि-रचिता वृत्ति: प्रत सूत्रांक [७०१] दीप अनुक्रम [८४६] व्याख्या-असंखेजा उववज्जति छेवट्ठसंघयणी सरीरोगाहणा जहन्नेणं अंगुलस्स असंखेजाभार्ग उकोसेणवि अंगुलस्स ||२४ शतके प्रज्ञप्तिः अभयदेवी असंखेजहभागं मसूरचंदसंठिया चत्तारि लेस्साओ णो सम्मदिट्ठी मिच्छादिट्ठी णो सम्मामिच्छादिट्टी णो | उद्देशः १२ या वृत्तिः२ HTणाणी अन्नाणी दो अन्नाणा नियमं णो मणजोगी णो वइजोगी कायजोगी उवओगो दुविहोवि चत्तारि पृथ्व्याउ दसन्नाओ चत्तारि कसाया एगे फासिदिए पन्नत्ते तिन्नि समुग्घाया वेदणा दुविहा णो इत्विवेदगा णो पुरिस- त्पादः 1८२३॥ जावेदगा नपुंसगवेदगा ठितीए जहन्नेणं अंतोमहत्तं उक्कोसेणं बावीसं वाससहस्साई अज्झवसाणा पसत्यावि सू७०१ अपसत्यावि अणुबंधो जहा ठिती १, से णं भंते ! पुढविकाइए पुणरवि पुढविकाइएसि केवतियं कालं सेवेजा, | केवतियं कालं गतिरागति करेजा ?, गोयमा! भवादेसेणं जह० दो भवग्गहणाई उक्कोसे. असंखेज्जाई भवग्गहणाई कालादेसेणं जहन्नेणं दो अंतोमुहुत्ता उकोसेणं असंखेनं कालं एवतियं जाव करेजा १, सो चेव जहनकालद्वितीएसु उववन्नो जहन्नेणं अंतोमुहत्तठितीएमु उकोसेणवि अंतोमुटुत्तहितीएम एवं| |चेव वत्तवया निरवसेसा २, सो चेव उकोसकालहितीएसु उववन्नो जहन्नेणं बावीसवाससहस्सद्वितीएसु | उक्कोसेणवि बावीसवाससहस्सहितीएस सेसं तं चेव जाव अणुबंधोत्ति, णवरं जहन्ने] एको वा दो वाट |तिन्नि वा उकोसेणं संखेजा वा असंखेजा वा उवव० भवादे जह० दो भवग्गहरू उको अह भवग्गह | ८२३॥ कालाद० जह० वावीसं वाससह अंतोमुत्तमम्भहि उकोसेणं छावत्तरि वाससहस्सुत्तरं सयसहस्सं एषतियं कालं जाव करेजा ३, सो चेव अप्पणा जहन्नकालद्वितीओ जाओ सो चेव पढमिल्लओ गमओ| ~62~ Page #63 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (०५) [भाग-११]"भगवती"-अंगसूत्र-५ (मूलं+वृत्ति:) शतक [२४], वर्ग [-], अंतर्-शतक [-], उद्देशक [१२], मूलं [७०१] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र- [०५], अंगसूत्र- [०५] "भगवती मूलं एवं अभयदेवसूरि-रचिता वृत्ति: प्रत सूत्रांक [७०१] भाणियहो नवरं लेस्साओ तिन्नि ठिती जहन्नेणं अंतोमुहुत्तं उक्कोसेणवि अंतोमुहत्तं अप्पसत्था अज्झवसाणा हि अणुबंधो जहा ठिती सेसं तं चेव ४, सो चेव जहन्नकालहितीएम उववन्नो एसो चेव चउत्थगमगवत्तवया । |भाणियबा ५, सो चेव उकोसकालद्वितीएमु उववन्नो एस चेव वत्तवया नवरं जहन्नेणं एको वा दोचा तिन्नि वा उकोसे० संखे० असंखेजा वा जाव भवादेसेणं जहन्नेणं दो भवग्गहणाई उकोसेणं अह भवग्गहणाई कालादेसेणं जहन्नेणं वावीसवाससहस्साई अंतोमुहुत्तमम्भहियाई उक्कोसेणं अट्ठासीई वाससहस्साई चाहिं अंतोमुहुत्तेहिं अब्भहियाइं एवतियं०६, सो चेव अप्पणा उक्कोसकालहितीओ जाओ एवं तइयगमगसरिसो निरवसेसो भाणियहो नवरं अप्पणा से ठिई जहन्नेणं बावीसवाससहस्साई उक्कोसेणवि बावीसं वाससहस्साई ७, सो चेव जहन्नकालद्वितीएसु उववन्नो जहन्नेणं अंतोमुहुत्तं उक्कोसेणवि अंतोमुहुत्तं, एवं जहा सत्तमगसमगो जाव भवादेसो, कालादेसेणं जहन्नेणं बावीसं वाससहस्साई अंतोमुत्तमम्भहियाई उकोसेणं अट्ठा सीहं वाससहस्साई चाहिं अंतोमुहुत्तेहिं अभहियाई एवतियं०८, सो चेव उफोसकालद्वितीएसु उचवन्नो जहन्नेणं बावीसंवाससहस्सट्टितीएसु उक्कोसेणवि बावीसवासहस्सद्वितीएस एस चेव सत्तमगमगवत्तव्वया जाणियचा जाव भवादेसोत्ति कालादेजह. चोयालीसं वाससहस्साई उकोसेणं छावत्तरिवाससहस्सुत्तरं |सयसहस्सं एवतियं ९॥ जइ आउक्काइयएगिदियतिरिक्खजोणिएहिंतो उववजंति किं मुहमआऊ० बादर| आउ० एवं चउकाओ भेदो भाणिययो जहा पुढ विक्काइयाणं, आउक्काइयाणं भंते ! जे भविए पुढविक्काइएम दीप अनुक्रम [८४६] 9-25 ~634 Page #64 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (०५) प्रत सूत्रांक [७०१] दीप अनुक्रम [८४६] [भाग-११]“भगवती”- अंगसूत्र -५ (मूलं + वृत्तिः) शतक [२४], वर्ग [-], अंतर् शतक [ - ], उद्देशक [१२], मूलं [७०१] पूज्य आगमोद्धारकश्री संशोधितः मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित.. आगमसूत्र - [०५] अंगसूत्र- [ ०५] "भगवती" मूलं एवं अभयदेवसूरि-रचिता वृत्तिः उववजित्तए से णं भंते! केवइकाल द्वितीएस उववज्जिज्जा ?, गोयमा ! जहनेणं अंतोमुहुत्तहिती उक्कोसेणं बावीसंवाससहस्सट्टि० उबव०, एवं पुढविकाश्यगमगसरिसा नव गमगा भाणियद्वा ९, नवरं थिबुगबिंदुठिए, ठिती जनेणं अंतोमुहुतं उक्कोसेणं सत्त वाससहस्सा ई, एवं अणुबंधोवि एवं तिसुवि गमएसु, ठिती संवेहो तयछटुसत्तमहमणवमगमेसु भवादेसेणं जह० दो भवग्गहणाई उक्कोसेणं अट्ट भवग्गहणाई, सेसेसु चउसु गमएस जहनेणं दो भवग्गहणाई उकोसेणं असंखेजाई भवग्गहणारं, ततियगमए कालादेसेणं | जहनेणं बावीस वाससहस्साई अंतोमुत्रामन्भहियाई उक्कोसेणं सोलमुत्तरं वाससयसहस्सं एवतियं०, छट्ठे गमए * कालादेसेणं जहनेणं बावीसं वाससहस्साई अंतोमुहुत्तमम्भहियाई उकोसेणं अट्ठासीतिं वाससहस्साई उहिं अंतोमु तेहिं अन्महियाई एवतियं०, सत्तमे गमए काला देसेणं जहनेणं सत्त वाससहस्साई अंतोमुहुत्तमम्भहियाई उक्कोसेणं सोलसुतरवा ससयसहस्सं एवतियं०, अहमे गमए कालादेसेणं जहस्रेणं सन्त बाससहस्साई अंतोमुत्तमम्भहियाएं उको सेणं अट्टावीसं वाससहस्साई उहिं अंतोत्तेहिं अन्भहियाई एवतियं०, णवमे गमए भवादेसेणं जहन्त्रेणं दो भवग्गहणाई उकोसेणं अट्ठ भवग्गहणाई कालादेसेणं जहनेणं एकूणतीसारं वाससह| स्साई उकोसणं सोलमुत्तरं बाससयसहस्सं एवतियं०, एवं णवसुवि गमएस आउकाइयठिई जाणियबा९ ॥ जह | तेङकाइएहिंतो उवव० तेउकाइयाणचि एस वेव वत्ततया नवरं नवसुचि गमएस तिन्नि लेस्साओ तेउकाड्याणं | सुईकलावसंठिया ठिई जाणियता तईयगमए कालादे० जह० बाबीसं वाससह० अंतोमुहुत्तमन्महि० उकोसेणं व्याख्याप्रज्ञप्तिः अभयदेवीया वृत्तिः २७ ॥८२४ ॥ can Internation For Pernal Use On ~64~ २४ शतके उद्देशः १२ पृथ्व्याउस्पादः सू ७०१ ॥ ८२४॥ Page #65 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (०५) [भाग-११]"भगवती"-अंगसूत्र-५ (मूलं+वृत्ति:) शतक [२४], वर्ग [-], अंतर्-शतक [-], उद्देशक [१२], मूलं [७०१] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र- [०५], अंगसूत्र- [०५] "भगवती मूलं एवं अभयदेवसूरि-रचिता वृत्ति: प्रत सूत्रांक [७०१] अट्ठासीति वासहस्साह वारसहिं राइदिएहिं अन्भहियाई एवतियं एवं संवेहो उवजुंजिऊण भाणियचो ९॥ जइ8 वाउक्काइएहितो वाउकाइयाणवि एवं चेव णव गमगा जहेव तेउफाइयाणं णवरं पडागासंठिया प० संवेहो || वाससहस्सेहि कायद्यो सहयगमए कालादे०जह. बावीसं वाससहस्साई अंतोमुहुत्तमम्भहियाई उक्कोसेणं एगं वाससयसहस्सं एवं संबेहो उव जिऊण भाणियो। जइ वणस्सइकाइएहिंतो उवष० वणस्सइकाइ-४॥ द्रयाणं आउकाइयगमगसरिसा णव गमगा भाणियचा नवरंणाणासंठिया सरीरोगाहणा प० पढमएमु पच्छि-दा |ल्लएसु यतिसु गमएसु जह• अंगुलस्स असंखेजइभागं उक्कोसेणं सातिरेगं जोपणसहस्सं मझिल्लएसु तिसु तहेव जहा पुढविकाइयाणं संवेहो ठिती य जाणियवा तझ्यगमे कालादेसेणं जहन्नेणं यावीसं घास-|| ६ सह. अंतोमुटुसमन्भहियाई उकोसेणं अट्ठावीसुसरं वाससयसहस्सं एवतिय एवं संबेहो उवजंजिऊण भाणियबो (सूत्रं ७०१)॥ तत्र च 'जहा वर्फतीए'त्ति इत्यादिना यत्सूचितं तदेवं दृश्य-किं एगिदियतिरिक्खजोणिपहिंतो उववजंति जाव पंचिंदियतिरिक्खजोणिएहिंतो उववजति !, गोयमा! एगिदियतिरिक्खजोणिएहिंतो जाव पंचिंदियतिरिक्खजोणिपहितोवि ववजति'इत्यादि, तृतीये गमे 'नवरं जहन्नेणं एको वेत्यादि प्राक्तनगमयोरुसित्सुबहुत्वेनासश्वेया एवोत्पद्यन्त | इत्युक्तम् इह तूत्कृष्टस्थितय एकादयोऽसोयान्ता उत्पद्यन्ते उत्कृष्टस्थितिपूत्पित्सूनामल्पत्वेनैकादीनामप्युत्पादसम्भ|वात् , 'उकोसेणं अह भवग्गहणाईति, इहेदमवगन्तव्यं यत्र संवेधे पक्षद्वयस्य मध्ये एकत्रापि पक्षे उत्कृष्टा स्थिति दीप अनुक्रम [८४६] 2-964-% SARERatininainarana ~65 Page #66 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (०५) [भाग-११]"भगवती"-अंगसूत्र-५ (मूलं+वृत्ति:) शतक [२४], वर्ग [-], अंतर्-शतक [-], उद्देशक [१२], मूलं [७०१] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र- [०५], अंगसूत्र- [०५] "भगवती मूलं एवं अभयदेवसूरि-रचिता वृत्ति: प्रत सूत्रांक [७०१] दीप अनुक्रम [८४६] व्याख्या. 1|| भवति तत्रोत्कर्षतोऽष्टा भवग्रहणानि तदन्यत्र त्वसङ्ख्येयानि, ततश्चेहोत्पत्तिविषयभूतजीवेषत्कृष्टा स्थितिरित्युत्कर्षतोऽष्टी | ||२४ शतके प्रज्ञप्तिः भिवग्रहणान्युक्तानि, एवमुत्तरत्रापि भावनीयमिति, 'छावत्तरि बाससयसहस्संति द्वाविंशतेवर्षसहस्राणामष्टाभि-1 उद्देशः१२ अभयदेवी-13 भवग्रहणर्गुणने षट्सप्ततिवर्षसहस्राधिक वर्षलक्षं भवतीति १७६०००, चतुर्थे गमे 'लेसाओ तिन्नि'त्ति जघन्यस्थि- पृथ्व्याउया वृतिः२८ | तिकेषु देवो नोत्पद्यते इति तेजोलेश्या तेषु नास्तीति, षष्ठे गमे 'उक्कोसेणं अट्ठासीई वाससहस्साई इत्यादि तत्र त्पादः 1८२५॥ | जपन्यस्थितिकस्योत्कृष्टस्थितिकस्य च चतुष्कृत्व उत्पन्नत्वाद् द्वाविंशतिवर्षसहस्राणि चतुर्गुणितान्यष्टाशीतिर्भवन्ति चत्वारि सू७०१ चान्तर्मुह नीति, नवमे गमे 'जहनेणं चोयालीसं'ति द्वाविंशतेवर्षसहस्राणां भवग्रहणद्वयेन गुणने चतुश्चत्वारिंशत्सहस्राणि भवन्तीति ॥ एवं पृथिवीकायिकः पृधिवीकायिकेभ्य उत्पादितः, अथासावेवाप्कायिकेभ्य उत्पाद्यते'जह आउकाइए'त्यादि, 'चउकाओ भेदो त्ति सूक्ष्मबादरयोः पर्याप्तकापर्याप्तकभेदात् 'संथेहो तइयछट्टे'त्यादि तत्र भवादेशेन जघन्यतः संवेधः सर्वगमेषु भवग्रहणद्वयरूपः प्रतीतः उत्कृष्टे च तस्मिन् विशेषोऽस्तीति दर्श्यते, तत्र च तृतीयादिषु सूत्रोक्तेषु पञ्चसु गमेषूत्कर्षतः संवेधोऽष्टौ भवग्रहणानि, पूर्वप्रदर्शिताया अष्टभवग्रहणनिबन्धनभूतायास्तृतीयपष्टसप्तमाष्टमेष्वेकपक्षे नवमे तु गमे उभयत्राप्युत्कृष्टस्थितेः सद्भावात् , 'सेसेसु चउसु गमएसुत्ति शेपेषु चतुर्ष गमेषुप्रथमद्वितीयचतुर्थपश्चमलक्षणेपूत्कर्षतोऽसङ्ख्ययानि भवग्रहणानि, एकत्रापि पक्षे उत्कृष्टस्थितेरभावात् । 'तइयगमए ८२५॥ कालाएसेणं जहन्नेणं बावीसं वाससहस्साईति पृथिवीकायिकानामुत्पत्तिस्थानभूतानामुत्कृष्टस्थितिकत्वात् , 'अंतो मुहुत्तमभहियाई ति अप्कायिकस्य तत्रोत्पित्सोरोधिकत्वेऽपि जघन्यकालस्य विवक्षितत्वेनान्तर्मुहूर्त्तस्थितिकत्वात् , ~66~ Page #67 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (०५) [भाग-११]"भगवती"-अंगसूत्र-५ (मूलं+वृत्ति:) शतक [२४], वर्ग [-], अंतर्-शतक [-], उद्देशक [१२], मूलं [७०१] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र- [०५], अंगसूत्र- [०५] "भगवती मूलं एवं अभयदेवसूरि-रचिता वृत्ति: प्रत सूत्रांक [७०१] SACREADCASEX 'उकोसेणं सोलमुत्तरं वाससयसहस्सं'ति, इहोत्कृष्टस्थितिकत्वात्पृथिवीकायिकानां तेषां च चतुर्णा भवानां भावात्। तत्रोत्पित्सोश्चाप्कायिकस्यौधिकत्वेऽप्युत्कृष्ट कालस्य विवक्षितत्वादुत्कृष्टस्थितयश्चत्वारस्तद्भवाः, एवं च द्वाविंशतेर्वर्ष६ सहस्राणां सप्तानां च प्रत्येक चतुर्गुणितत्वे ४४०००। २४०० मीलने च पोडशसहस्राधिकं लक्षं भवति ११६०००, |'छट्टे गमए'इत्यादि, षष्ठे गमे हि जघन्यस्थितिक उत्कृष्टस्थितिषूत्पद्यत इत्यन्तर्मुहूर्तस्य वर्षसहस्रद्वाविंशतेश्च प्रत्येक चतुर्भवग्रहणगुणितत्वे यथोक्तमुत्कृष्ट कालमानं स्यात् ८८००० अत एव सप्तमादिगमसंवेधा अप्यूह्याः नवरं नवमे । | गमे जघन्येनकोनत्रिंशद्वर्षसहस्राणि अप्कायिकपृथिवीकायिकोत्कृष्टस्थितेमीलनादिति ॥ अथ तेजस्कायिकेभ्यः पृथि-15 वीकायिकमुत्पादयन्नाह-'जईत्यादि, "तिन्नि लेसाओ'त्ति अप्कायिकेषु देवोत्पत्तेः तेजोलेश्यासद्भावाच्चतम्रस्ता उक्ताः इह तु तदभावात्तिन एवेति, 'ठिई जाणियवति तत्र तेजसो जघन्या स्थितिरन्तर्मुहुर्तमितरा तु त्रीण्यहोरात्राणीति । 'तईयगमे इत्यादि, तृतीयगमे औधिकस्तेजस्कायिक उत्कृष्टस्थितिषु पृथिवीकायिकेपूत्पद्यते इत्यत्रैकस्य पक्षस्योत्कृष्टस्थितिकदत्वमतोऽष्टौ भवग्रहणान्युत्कर्षतः, तत्र च चतुएं पृथिवीकायिकोत्कृष्टभवग्रहणेषु द्वाविंशतेवर्षसहस्राणां चतुर्गुणितत्वेऽष्टा शीतिस्तानि भवन्ति, तथा चतुर्वेव तेजस्कायिकभवेषूत्कर्षतः प्रत्येकमहोरात्रत्रयपरिमाणेषु द्वादशाहोरात्राणीति, एवं संवेहो उवजंजिऊण भाणियोत्ति, स चैवं-षष्ठादिनवान्तेषु गमेष्वष्टौ भवग्रहणानि तेषु च कालमानं यथायोगमभ्यूचं, शेषगमेषु तूत्कृष्टतोऽसोया भवाः कालोऽप्यसयेय एवेति ॥ अथ वायुकायिकेभ्यः पृथिवीकायिकमुत्पादयन्नाह'जई त्यादि, 'संवेहो वाससहस्सेहिं कायवोत्ति तैजस्कायिकाधिकारेऽहोरात्रैः संवेधः कृतः इह तु वर्षसहस्रः स कार्यों SACROSSACROREOGAON दीप अनुक्रम [८४६] ~67~ Page #68 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (०५) [भाग-११]"भगवती"-अंगसूत्र-५ (मूलं+वृत्ति:) शतक [२४], वर्ग [-], अंतर्-शतक [-], उद्देशक [१२], मूलं [७०१] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र- [०५], अंगसूत्र- [०५] "भगवती मूलं एवं अभयदेवसूरि-रचिता वृत्ति: प्रत सूत्रांक [७०१] वायूनामुत्कर्षतो वर्षसहस्रत्रयस्थितिकत्वादिति । 'तइयगमए'इत्यादि, 'उकोसेणं एग वाससयसहस्सं'ति अत्राष्टौ भव- २४ शतके प्रज्ञप्तिःग्रहणानि तेषु च चतुर्वष्टाशीतिवर्षसहस्राणि पुनरन्येषु चतुषु वायुसत्केषु वर्षसहस्रत्रयस्य चतुर्गुणितत्वे द्वादश उभयमी-1 उद्देश:१२ अभयदेवी- लने च वर्षलक्षमिति, 'एवं संवेहो उव जिऊण भाणियों'त्ति स च यत्रोत्कृष्टस्थितिसम्भवस्तत्रोत्कर्षतोऽष्टौ भवग्रह पृथ्व्याउया वृत्तिःणानि इतरत्र वसोयानि, एतदनुसारेण च कालोऽपि वाच्य इति ॥ अथ वनस्पतिभ्यस्तमुत्पादयन्नाह-'जइ वण-1 स्पाद सू७०१ सईत्यादि, 'वणस्सइकाइयाणं आउकाइयगमसरिसा नव गमा भाणियवत्ति, यस्त्वत्र विशेषस्तमाह-'णाणा1८२६॥ 8 संठिए'त्यादि, अकायिकानां स्तिबुकाकारावगाहना एषां तु नानासंस्थिता । तथा 'पढमएस'इत्यादि, प्रथमकेष्वौधिकेषु |गमेषु पाश्चात्येषु चोत्कृष्टस्थितिकगमेष्ववगाहना वनस्पतिकायिकानां द्विधाऽपि मध्यमेषु जघन्यस्थितिकगमेषु त्रिषु यथा प्रधि वीकायिकानां पृथिवीकायिकेषूत्पद्यमानानामुक्ता तथैव वाच्या, अङ्गलासयातभागमात्रैवेत्यर्थः, 'संवेहो ठिई य जाणि-13 || यत्ति तत्र स्थितिरुत्कर्षतो दशवर्षसहस्राणि जघन्या तु प्रतीतैव, एतदनुसारेण संवेधोऽपि शेयः, तमेवैकत्र गमे दर्श-दा यति-तइए'इत्यादि, 'उकोसेणं' अट्ठावीसुत्तरं वाससयसहस्संति, इह गमे उत्कर्षतोऽष्टौ भवग्रहणानि तेषु च चत्वारि पृथिव्याश्चत्वारि च वनस्पतेः तत्र चतुष पृथिवीभवेधूत्कृष्टेषु वर्षसहस्राणामष्टाशीतिः तथा वनस्पतेर्दशवर्षसहस्रायुलकत्वाचतुर्यु भवेषु वर्षसहस्राणां चत्वारिंशत् उभयमीलने च यथोक्तं मानमिति ।। अथ द्वीन्द्रियेभ्यस्तमुत्पादयन्नाह- त ॥२६॥ | जइ बेइंदिएहितो उपवनंति किं पजत्तबेइदिएहितो उपव० अपज्जत्तबेईदिएहितो?, गोयमा ! पजत्तबेईदिएहितो उपव० अपज्जत्तबेईदिएहितोवि उबव०, बेइंदिए णं भंते ! जे भविए पुषिकाइएसु उपवन्नित्तए। ARSAGACRACT दीप अनुक्रम [८४६] ~68~ Page #69 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (०५) प्रत सूत्रांक [ ७०२] दीप अनुक्रम [८४७] [भाग-११]“भगवती”- अंगसूत्र -५ (मूलं + वृत्तिः) शतक [२४], वर्ग [-], अंतर् शतक [ - ], उद्देशक [१२], मूलं [७०२] पूज्य आगमोद्धारकश्री संशोधितः मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित.. आगमसूत्र - [०५] अंगसूत्र- [ ०५] "भगवती" मूलं एवं अभयदेवसूरि-रचिता वृत्तिः से णं भंते ! केवतिकालं ?, गोयमा ! जह० अंतोमुहुत्तद्वितीएस उक्कोसेणं बावीसंवाससहस्सट्ठितीए, ते णं भंते । जीवा एगसमरणं० १, गोयमा । जहनेणं एक्को वा दो वा तिन्नि वा उक्कोसे० संखेजा वा असं० उवच० छेवट्टसंघयणी ओगाहणा जहनेणं अंगुलस्स असंखेज्जइ० उकोसेणं वारस जोयणाई इंडसंठिया तिन्नि लेसाओ सम्मदिट्ठीवि मिच्छादिद्वीषि नो सम्मामिच्छादिट्ठी दो णाणा दो अन्नाणा नियमं णो मणजोगी वथजोगीवि काथजोगीवि उबओगो दुविहोचि चत्तारि सन्नाओ चत्तारि कसाया दो इंदिया प० सं०-जिन्भिदिए य फार्सिदिए य, तिनि समुग्धाया सेसं जहा पुढविकाइयाणं णवरं दिती जहन्त्रेणं अंतोमुत्तं उकोसेणं वारस संवच्छराई एवं अणुबंधोऽवि, सेसं तं चेव, भयादे० जह० दो भ० उक्को० | संखेज्जाई भवरगहणाई कालादे० जहने दो अंतोमु० कोसे० संखेनं कालं एवतियं० १, सो चेव जहलका| लट्ठितीएस डववन्त्रो एस वेव वत्तवया सङ्घा २, सो चेव उक्कोसकालद्वितिएस उबुवन्नो एसा चैव वेदियस्स | लद्धी नवरं भवादे० जह० दो भवग्ग० उक्कोसेणं अह भवग्गहणाई कालादे० जह० बाबीसं वाससहस्साई | अंतोमुत्तमम्भ० उद्यो० अट्ठासीति वाससहस्साई अडयालीसाए संबच्छरेहिं अमहियाई एवतियं० ३, सो चैव अप्पणा जहन्नकालद्वितीओ जाओ तस्सवि एस चैव वक्तइया तिस्रुवि गमएस नवरं इमाई सत्त णाणताई सरीरोगाहणा जहा पुढविकाइयाणं णो सम्मदिट्ठी मिच्छदिट्टी णो सम्मामिच्छादिट्ठी दो अन्नाणा णियमं णो मणजोगी णो वयजोगी कायजोगी ठिती जहनेणं अंतोमुद्दत्तं उक्कोसेणवि अंतोमुहुतं अज्झक्साणा अप Eucation International For Par at Use Only ~69~ Page #70 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (०५) [भाग-११]"भगवती"-अंगसूत्र-५ (मूलं+वृत्ति:) शतक [२४], वर्ग [-], अंतर्-शतक [-], उद्देशक [१२], मूलं [७०२] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र- [०५], अंगसूत्र- [०५] "भगवती मूलं एवं अभयदेवसूरि-रचिता वृत्ति: प्रत सूत्रांक [७०२] दीप अनुक्रम [८४७] व्याख्या- सस्था अणुबंधो जहा ठिती संवेहो तहेव आदिल्लेसु दोसु गमएसु तइयगमए भवादेसो तहेव अट्ठ भवग्ग-४२४ शतके प्रज्ञप्तिःहणाई कालादेसेणं जहन्नेणं बावीसं वाससहस्साई अंतोमुत्तमम्भहियाई उकोसेणं अट्ठासीति वाससह-उद्देशः१२ अभयदेवी-स्साई चउहिं अंतोमुहुत्तेहिं अन्भहियाई ६, सो चेव अप्पणा उकोसकालद्वितीओ जाओ एयस्सवि ओहि- द्वीन्द्रिया यगमगसरिसा तिन्नि गमगा भाणियबा नवरं तिसुधि गमएसु ठिती जहन्नेणं वारस संबच्छराई उकोसेणवि. दिभ्यः पृ. || चारस संवच्छराई, एवं अणुबंधोवि, भवादे जह. दो भवग्गहणाई उकोसेणं अह भवग्गहणाई, कालादे व्युत्पादः ॥८२७॥ सू७०२ द उवजुजिऊण भाणिय जाव णधमे गमए जहन्नेणं बावीसं वाससहस्साई बारसहि संवच्छरेहिं अम्भहि || उक्कोसे० अट्ठासीती वाससहस्साई अडयालीसाए संबच्छरेहिं अभहियाई एवतियं ९॥ जइ तेइंदिरहितो उववजह एवं चेच नव गमगा भाणियचा नवरं आदिल्लेसु तिसुवि गमएम सरीरोगाहणा जहन्नेणं अंगुलस्स | असंखेजहभागं उक्कोसेणं तिन्नि गाउपाई तिन्नि इंदियाई ठिती जहनेणं अंतोमुहत्तं उकोसेणं एगूणपन्नं राई-12 M|| दियाई, तइयगमए कालादेसेणं जहनेणं बाबीसं वाससहस्साई अंतोमुत्तमभहियाई उक्कोसेर्ण अट्ठासीति वाससहस्साई उन्नउई राईदियसयमन्भहियाई एवतियं०, मज्झिमा तिन्नि गमगा तहेव पच्छिमावि तिन्नि || |गमगा तहेव नवरं ठिती जहनेणं एकूणपन्न राइंदियाई उक्कोसेणवि एगणपतं राइंदियाई संवेहो उबर्जुजि-||8| ऊण भाणियपो ९॥ जइ चउरिदिएहिंतो उववजह एवं चेव चारिदियाणवि नव गमगा भाणियदा नवरं ॥२७॥ एतेसु चेव ठाणेसु नाणत्ता भाणियबा सरीरोगाहणा जहन्नेणं अंगुलस्स असंखेजहभागं उक्कोसे० चत्तारि CASSROCRACHCCCCC ~70 Page #71 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (०५) [भाग-११]"भगवती"-अंगसूत्र-५ (मूलं+वृत्ति:) शतक [२४], वर्ग [-], अंतर्-शतक [-], उद्देशक [१२], मूलं [७०२] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र- [०५], अंगसूत्र- [०५] "भगवती मूलं एवं अभयदेवसूरि-रचिता वृत्ति: प्रत सूत्रांक [७०२] दीप अनुक्रम [८४७] || गाउयाई ठिती जहन्नेणं अंतोमुहसं उकोसेण य छम्मासा एवं अणुबंधोवि चत्तारि इंदियाई सेसं तहेब जाव नवमगमए कालादेसेणं जह० बावीसं वाससहस्साई छहिं मासेहिं अब्भहियाई उक्कोसेणं अट्ठासीति वास सहस्साई चवीसाए मासेहिं अन्भहियाई एवतियं ९॥ जद पंचिंदियतिरिक्खजोणिएहितो उवव किं ४ सन्निपंचिंदियतिरिक्खजोणिएहितो उववज्जति असन्निपंचिंदियतिरिक्खजोणिए०१, गोयमा ! सन्निपंचि-13 दिय०, जइ असन्निपंचिंदिय० किं जलयरेहिंतो उ० जाय किं पज्जत्तएहिंतो उववजंति अपजत्तएहिंतो उव०१, गोयमा ! पजत्तएहितोवि उवव० अपज्जत्तएहितोवि उवव०, असन्निपंचिंदियतिरिक्खजोणिए णं भंते !जे भविए । पुढविकाइएसु उववजित्तए से णं भंते ! केवति', गो ! जहनेणं अंतोमुहत्तं उक्कोसेणं बावीसं वाससह, ते दणं भंते ! जीवा एवं जहेव चेहंदियस्स ओहियगमए लद्धी तहेव नवरं सरीरोगाहणा जह• अंगुलस्स असंखे० भाउको जोयणसह पंचिंदिया ठिती अणुबं० जह० अंतोमु० उको पुषको० सेसं तं व भवादे०जह दो || काभवग्गहणाई उको अट्ठ भवग्गहणाई, कालादेसेणं जहदो अंतोमु० उको चत्तारि पुषकोडीओ अट्ठासीतीए 51 दवाससहस्सेहिं अम्भहियाओ एवतियं णवसुवि गमएसु कायसंवेहो भवादे जहन्ने] दो भवग्गणाई उको-/x से अट्ट भवग्गणाई कालादे० उवजुज्जिऊण भाणियो, नवरं मज्झिमएसु तिसु गमएसु जहेव बेइंदियस्स || पछिल्लएसु तिसु गमएसु जहा एतस्स चेव पतमगमएसु, नवरं ठिती अणुबंधो जहन्नेणं पुषकोडी कोसेणवि पुवकोडी, सेसं तं चेव जाव नवमगमएसु जह० पुषकोडी वावीसाए बाससहस्सेहिं अन्भहिया उक्कोसेणं CARRC ~71 Page #72 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (०५) [भाग-११]"भगवती"-अंगसूत्र-५ (मूलं+वृत्ति:) शतक [२४], वर्ग [-], अंतर्-शतक [-], उद्देशक [१२], मूलं [७०२] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र- [०५], अंगसूत्र- [०५] "भगवती मूलं एवं अभयदेवसूरि-रचिता वृत्ति: प्रत सूत्रांक [७०२] व्याख्या- चत्तारि पुवकोडीओ अट्ठासीतीए वाससहस्सेहिं अम्भहियाओ एवतियं काल सेविजा९॥जह सन्निपंचिंदिय- २४ शतके प्रज्ञप्तिः तिरिक्खजोणिए कि संखेजवासाउय. असंखेजवासाउय०१, गोयमा ! संखेनवासाउय. णो असंखेजवा- उद्देशः १२ साउय०१, जइ संखेजवासाउय० किं जलयरेहिंतो सेसं जहा असन्नीणं जाव ते णं भंते ! जीवा एगसमएणं द्वीन्द्रियाया वृत्तिः२/ | केवतिया उचवज्जति एवं जहा रयणप्पभाए उववजमाणस्स सन्निस्स तहेव इहपि, नवरं ओगाहणा जहनेणं || दिभ्यः पृ. धन्युत्पाद अंगुलस्स असंखेजहभागं उकोसेणं जोयणसहस्सं सेसं तहेव जाव कालादेसेणं जहन्नेणं दो अंतोमुहुत्ता उक्को11८२८| सू७०२ | सेणं चत्तारि पुचको अट्ठासीतीए वाससहस्सेहिं अमहियाओ एवतियं०, एवं संवेहो णवसुवि गमएमु । जहा असन्नीणं तहेब निरवसेसं लव्ही से आदिल्लएसु तिमुवि गमएम एस चेव मजिलल्लएसु तिमुवि गम-1|3|| एम एस चेव नवरं इमाई नव णाणताहं ओगाहणा जहन्नेणं अंगुलस्स असंखेजति० उको अंगु० असंखे०तिथि। लेस्साओ मिच्छादिही दो अन्नाणा कायजोगी तिन्नि समुग्घाया ठिती जहन्नेणं अंतोमुत्तं उक्को अंतोमु० अप्पसत्था अज्झवसाणा अणुबंधो जहा ठिती सेसं तं चेव पच्छिल्लएसु तिमुवि गमएमु जहेब पढमगमए |णवरं ठिती अणुबंधो जहन्नेणं पुषकोडी उक्कोसेणवि पुवकोडी सेसं तं चेव ९ (सूत्रं ७०२)॥ 'जह बेइंदिए'त्यादि, 'वारस जोयणाई'ति यदुक्तं तच्छसमाश्रित्य, यदाह-"संखो पुण बारस जोयणाई"ति | १८२८॥ oilr शङ्ख पुनर्वादश योजनानि । ] 'सम्मदिट्ठीवित्ति एतच्चोच्यते सास्वादनसम्यक्त्वापेक्षयेति, इयं च वक्तव्यतीधिकद्वीन्द्रियस्याधिकपृथिवीकायिकेषु, एवमेतस्य जघन्यस्थितिष्वपि तस्यैवोत्कृष्टस्थितिषत्पनी संवेधे विशेषोऽत एवाह -CHCNASA दीप अनुक्रम [८४७] ~72 Page #73 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (०५) [भाग-११]"भगवती"-अंगसूत्र-५ (मूलं+वृत्ति:) शतक [२४], वर्ग [-], अंतर्-शतक [-], उद्देशक [१२], मूलं [७०२] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र- [०५], अंगसूत्र- [०५] "भगवती मूलं एवं अभयदेवसूरि-रचिता वृत्ति: प्रत सूत्रांक [७०२] 545456459-96456-56-4-36-25645% 'नवर'मित्यादि, 'अट्ठ भवग्गहणाईति एकपक्षस्योत्कृष्टस्थितिकत्वात् 'अडयालीसाए संवच्छरेहिं अम्भहियाई'ति चतुषु द्वीन्द्रियभवेषु द्वादशाब्दमानेष्वष्टचत्वारिंशत्संवत्सरा भवन्ति तैरभ्यधिकान्यष्टाशीतिवर्षसहस्राणीति, द्वितीयस्यापि गमत्रयस्यैषैव वक्तव्यता विशेषं त्वाह-नवर'मित्यादि, इह सप्तनानात्वानि शरीरावगाहना यथा पृथिवीकायिकानाममुलासङ्ख्येयभागमानमित्यर्थः, प्राक्तनगमत्रये तु द्वादशयोजनमानाऽप्युक्तेति ?, तथा 'नो सम्मदिट्टी' जघन्यस्थितिकतया | सासादनसम्यग्दृष्टीनामनुत्पादात्, प्राक्तनगमेषु तु सम्यग्दृष्टिरप्युक्तोऽजघन्यस्थितिकस्यापि तेषु भावात् २, तथा द्वे | अज्ञाने प्राक् च ज्ञाने अप्युक्ते २, तथा योगद्वारे जघन्यस्थितिकत्वेनापर्याप्तकत्वान्न वाग्योगः प्राक् चासावप्युक्तः ४, तथा | स्थितिरिहान्तमुहूत्तमेव प्राक् च संवत्सरद्वादशकमपि ५, तथाऽध्यवसानानीहाप्रशस्ताम्येव प्राक् चोभयरूपाणि ६, सप्तम | नानात्वमनुबन्ध इति, संवेधस्तु द्वितीयत्रयस्याद्ययोर्द्वयोर्गमयोरुत्कर्पतो भवादेशेन सजवेयभवलक्षणः कालादेशेन च सवे| यकाललक्षणः ७, तृतीये तु विशेषमाह-तहए गमए'इत्यादि, अन्त्यगमवये 'कालादेसेणं उबजुजिऊण भाणियपति | यत्तदेवं प्रथमे गमे कालत उत्कर्षतोऽष्टाशीतिवर्षसहस्राण्यष्टचत्वारिंशता वरधिकानि द्वितीये त्वष्टचत्वारिंशद् वर्षाण्यन्त हर्त्तचतुष्टयाधिकानि तृतीये तु संवेधो लिखित एवास्ते ॥ अथ श्रीन्द्रियेभ्यस्तमुत्पादयन्नाह-'जइ तेइंदी'त्यादि, 'छन्नउपराईदियसपअन्भहियाईति इह तृतीयगमेऽष्टौ भवास्तत्र च चतुर्पु त्रीन्द्रियभवेषूत्कर्षत एकोनपश्चाशद्रात्रिन्दिवप्रमाणेषु यथोक्तं कालमानं भवतीति, 'मजिझमा तिन्नि गमा तहेव'त्ति यथा मध्यमा द्वीन्द्रियगमाः, 'संवेहो उवउज्जिकण भाणियबो'त्ति स च पश्चिमगमत्रये भवादेशेनोत्कर्षतः प्रत्येकमष्टी भवग्रहणानि, कालादेशेन तु पश्चिमगमत्रयस्य दीप अनुक्रम [८४७] For P OW ~73 Page #74 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (०५) प्रत सूत्रांक [७०२] दीप अनुक्रम [८४७] [भाग-११]“भगवती”- अंगसूत्र -५ (मूलं + वृत्तिः) शतक [२४], वर्ग [-], अंतर् शतक [ - ], उद्देशक [१२], मूलं [७०२] पूज्य आगमोद्धारकश्री संशोधितः मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित.. आगमसूत्र - [०५] अंगसूत्र- [ ०५] "भगवती" मूलं एवं अभयदेवसूरि-रचिता वृत्तिः व्याख्याप्रज्ञप्तिः अभयदेवी या वृत्तिः २ ||८२९ ॥ प्रथमगमे तृतीयगमे चोत्कर्षतोऽष्टाशीतिर्वर्षसहस्राणि षण्णवत्यधिकरात्रिन्दिवशताधिकानि द्वितीये तु पण्णवत्युत्तरं दिनश| तमन्तर्मुहूर्त्तचतुष्टयाभ्यधिकमिति । अथ चतुरिन्द्रियेभ्यस्तमुत्पादयन्नाह – 'जई'त्यादि, नवरं 'एएस चेव ठाणेसु'त्ति वक्ष्य| माणेष्ववगाहनादिषु नानात्वानि - द्वीन्द्रियत्रीन्द्रियप्रकरणापेक्षया चतुरिन्द्रियप्रकरणे विशेषभणितव्यानि भवन्ति तान्येव दर्शयति- 'सरीरे 'त्यादि, 'सेसं तहेव'त्ति 'शेषम्' उपपातादिद्वारजातं तथैव - यथा त्रीन्द्रियस्य, यस्तु संवेधे विशेषो न दर्शितः स स्वयमभ्यूह्य इति ॥ अथ पञ्चेन्द्रियतिर्यग्भ्यस्तमुत्पादयन्नाह - 'जई'त्यादि, 'उकोसेणं अट्ठ भवग्गहणाई'ति अनेनेदमवगम्यते यथोत्कर्षतः पचेन्द्रियतिरचो निरन्तरमष्टौ भवा भवन्ति एवं समानभवान्तरिता अपि भवान्तरैः सहाचैव भवन्तीति, 'कालादेसेणं वउजिऊण भाणियति तत्र प्रथमे गमे कालतः संवेधः सूत्रे दर्शित एव द्वितीये तूत्कृष्टोऽसौ चतस्रः पूर्वको व्यश्चतुर्भिरन्तर्मुहूत्तैरधिकाः, तृतीये तु ता एवाष्टाशीत्या वर्षसहस्रैरधिकाः, उत्तरगमेषु त्यति| देशद्वारेण सूत्रोक्त एवासाववसेय इति ॥ अथ सञ्ज्ञिपश्चेन्द्रियेभ्यस्तमुत्पादयन्नाह - 'जइ सन्नी'त्यादि, 'एवं संवेहो नवसु गमएसु' इत्यादि, 'एवम्' उक्ताभिलापेन संवेधो नवस्वपि गमेषु यथाऽसञ्ज्ञिनां तथैव निरवशेष इह वाच्यः, असशिनां सञ्ज्ञिनां च पृथिवीकायिकेपूत्पित्सूनां जघन्यतोऽन्तर्मुहूर्त्तायुष्कत्वात् उत्कर्षतश्च पूर्वकोव्यायुष्कत्वादिति । 'लद्धी | से' इत्यादि, 'लब्धि:' परिमाणसंहननादिप्राप्तिः 'से' तस्य पृथिवीकायिकेषूत्पित्सोः सम्झिन आये गमत्रये 'एस चेव' ति या रत्नप्रभायामुत्पित्सोस्तस्यैव मध्यमेऽपि गमत्रये एषैव लब्धिः, विशेषस्त्वयं-- 'नवर' मित्यादि, नव च नानात्वानि Education internationa For Penal Use Only ~74~ २४ शतके उद्देशः १२ पञ्चेन्द्रियतिर्यगन्ते भ्यः पृथ्व्या उत्पाद: सू ७०२ ॥८२९॥ Page #75 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (०५) प्रत सूत्रांक [ ७०२] दीप अनुक्रम [८४७] [भाग-११]“भगवती”- अंगसूत्र -५ (मूलं + वृत्तिः) शतक [२४], वर्ग [-], अंतर् शतक [ - ], उद्देशक [१२], मूलं [७०२] पूज्य आगमोद्धारकश्री संशोधितः मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित.. आगमसूत्र - [०५] अंगसूत्र- [ ०५] "भगवती" मूलं एवं अभयदेवसूरि-रचिता वृत्तिः जघन्यस्थितिकत्वाद्भवन्ति तानि चावगाहना १ लेश्या २ दृष्टि ३ अज्ञान ४ योग ५ समुद्घात ६ स्थित्य ७ ध्यवसाना८ नुबन्धा ९ ख्यानि ॥ अथ मनुष्येभ्यस्तमुत्पादयन्नाह - जह मणुस्सेहिंतो उच० किं सन्नीमनुस्सेहिंतो उवव० असनीमणुस्से० १, गोयमा ! सन्नीमणुस्सेहिंतो असन्नीमणुस्सेहितोवि उवव०, असन्निमणुस्से णं भंते ! जे भविए पुढविकाइएस० से णं भंते ! केवतिकालं | एवं जहा असन्नीपंचिंदियतिरिक्खस्स जहन्नकालद्वितीयस्स तिन्नि गमगा तहा एयस्सवि ओहिया तिन्नि गमगा भाणि० तहेव निरवसे० सेसा छ न भण्णंति १ ॥ जइ सन्निमणुस्सेहिंतो उबव० किं संखेज्जवासाउथ० असंखेज्जवासाउय० १, गोयमा । संखेजवासाज्य० णो असंखेजवासाउय०, जइ संखेनवासाज्य० किं पञ्जन्त० अपजत० १, गोयमा ! पज्जत्तसंखे० अपनन्तसंखेजवासा०, सन्निमनुस्से णं भंते ! जे भविए पुढ | विकाइएस उबव० से णं भंते ! केवतिकालं० १ गोपमा ! जह० अंतोमु० उको० पावीसं वाससहस्सठितीएसु ते णं भंते! जीवा एवं जहेब रयणप्पभाए उवयमाणस्स तहेव तिसुवि गमएस लद्धी नवरं ओगाहणा जह० अंगुलस्स असंखेज्जइभागं उक्को० पंचधणुसयाई ठिती जह० अंतोमुहतं उको० पुढकोटी एवं अणुबंधो संवेहो नवसु गमएस जहेव सन्निपंचिंदियस्स मल्लिएसु तिस्रु गमएस लढी जहेब सन्निपंचिदियस्स सेसं तं चैव निरवसेसं पच्छिल्ला तिनि गमगा जहा एयरस चेव ओहिया गमगा नवरं ओगाहणा जह० पंचधणुस० उकोसे० पंच धणुसयाई द्विती अणुबंधो जह० पुलकोडी उक्कोसेणवि पुत्रको० सेसं तहेव नवरं Education internationa For Pale Only ~75~ Page #76 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (०५) [भाग-११]"भगवती"-अंगसूत्र-५ (मूलं+वृत्ति:) शतक [२४], वर्ग [-], अंतर्-शतक [-], उद्देशक [१२], मूलं [७०३] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र- [०५], अंगसूत्र- [०५] "भगवती मूलं एवं अभयदेवसूरि-रचिता वृत्ति: प्रत सूत्रांक [७०३] व्याख्या- प्रज्ञप्तिः अभयदेवी- या वृत्तिः२ ॥८३०॥ दीप अनुक्रम [८४८] LCCCCCAKAR पच्छिल्लएसु गमएस संखेजा उववजंति नो असंखेजा उबब० ॥ जइ देवेहितो स्वयज्जति किं भवणवासि-IN २४ शतके देवेहिंतो उबवजंति वाणमंतर० जोइसियदेवेहितो उवव० बेमाणियदेवहितो उववर्जति ?, गोयमा ! भवण-2 उद्देशः१२ वासिदेवेहिंतोवि उव. जाव वेमाणियदेवेहिंतोचि उबव०, जइ भवणवासिदेवेर्हितो उवव०किं असुरकुमा- मनुष्येभ्यः रभवणवासिदेवेहिंतो उववनंति जाव थणियकुमारभवणवासिदेवेहिंतो?, गोयमा ! असुरकुमारभवणवा-| पृथ्व्याउ| सिदेवेहिंतो उवव जाव धणियकुमारभवणवासिदेवेहितो उपवनंति, असुरकुमारे णं भंते ! जे भविए पुढवि- त्पादः काइएमु उववजित्तए से णं भंते ! केवति०, गोयमा ! जहन्नेणं अंतोमुत्तं उकोसेणं घावीसं वाससहस्साई सू७०३ ठिती,ते भंते ! जीवा पुच्छा, गोयमा ! जह० एको वा दो वा तिन्नि वा उक्को० संखेजा वा असंखेजा वा उवय, तेसि णं भंते ! जीवाणं सरीरगा किंसंघयणी प०१, गो! छपहं संघयणाणं असंघपणी जाव। परिणमंति, तेसिणं भंते ! जीवाणं केमहालिया सरीरोगाहणा?, गो! दुविहा पं०,०-भवधारणिज्जा य|| उत्तरवेबिया य, तत्थ णं जा सा भवधारणिज्जा सा जहनेणं अंगुलस्स असंखेजइभागं उक्कोसेणं सस रयणीओ, तत्थ णं जा सा उत्तरवेउविया सा जहनेणं अंगुलस्स असंखेजइभागं उक्कोसेणं जोयणसयसहस्सं, तेसि णं भंते ! जीवाणं सरीरगा किंसंठिया प०१, गोयमा! दुविहा पं०, तं०-भवधारणिज्जा य उत्तरवे-IM८३०॥ उविया य, तस्थ णं जे ते भवधारणिज्जा ते समचउरंससंठिया प०, तत्थ गंजे से उत्तरवेउबिया ते णाणासंठाणसंठिया प०, लेस्साओ चत्तारि, दिही तिबिहावि तिन्नि णाणा नियम तिनि अन्नाणा भयणाए जोगो ~76 Page #77 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (०५) [भाग-११]"भगवती"-अंगसूत्र-५ (मूलं+वृत्ति:) शतक [२४], वर्ग [-], अंतर्-शतक [-], उद्देशक [१२], मूलं [७०३] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र- [०५], अंगसूत्र- [०५] "भगवती मूलं एवं अभयदेवसूरि-रचिता वृत्ति: प्रत सूत्रांक [७०३]] तिविहोवि उवओगो दुविहोवि चत्तारि सन्नाओ चत्तारि कसाया पंच समुग्घाया वेयणा दुविहावि इस्थि-15 वेदगावि पुरिसचेयगावि णो णपुंसगवेयगा ठिती जहन्नेणं दसवाससहस्साई उक्कोसेणं सातिरेगं सागरोवर्म अज्झवसाणा असंखेजा पसस्थावि अप्पसत्वावि अणुबंधो जहा ठिती भवादेसेणं दो भवग्गहणाई कालादेसेणं जह० दसवाससह अंतोमुत्तमम्भहियाई उक्कोसेणं सातिरेगं सागरोवर्म बावीसाए वाससहस्सेहिं अन्भहियं एवतियं०, एवं णवधि गमा णेयचा नवरं मझिल्लएसु पच्छिल्लएसु तिमु गमएसु असुरकुमाराण। ठिइविसेसो जाणियबो सेसा ओहिया चेव लद्धी कायसंवेहं च जाणेज्जा सव्वस्थ दो भवग्गहणाई जाव णव-13 मगमए कालादेसेणं जह० सातिरेगं सागरोवमं बावीसाए वाससहस्सेहिमभहियं उक्कोसेणवि सातिरेगं सागरोवमं बावीसाए वाससहस्सेहिं अन्भहियं एवतियं ९। णाग कुमारा णं भंते ! जे भविए पुढविका|इए एस चेव वसषया जाव भवादेसोत्ति, णवरं ठिती जह० दसवाससहस्साई एकोसेणं देसूणाई दो पलि| ओवमाई, एवं अणुबंधोचि, कालादे०जह दसवाससह. अंतोमुहुत्तमम्महि उक्को देसूणाई दो पलिओ| बमाई बावीसाए वाससस्सेहिं अन्भहियाई एवं णववि गमगा असुरकुमारगमगसरिसा नवरं ठिती कालादेसं जाणेज्जा, एवं जाव धणियकुमाराणं । जइ वाणमंतरेहिंतो उववजंति किं पिसायवाणमंतरजावगंधववाणमंतर०१, गोयमा ! पिसायवाणमंतरजावगंधववाणमंतर०, वाणमतरदेवे णं भंते ! जे भविए पुढविका-टू इए एतेसिपि असुरकुमारगमगसरिसा नव गमगा भाणि०, नवरं ठिती कालादेसं च जाणेज्जा, ठिती जहन्ने० दीप अनुक्रम [८४८] ~77 Page #78 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (०५) [भाग-११]"भगवती"-अंगसूत्र-५ (मूलं+वृत्ति:) शतक [२४], वर्ग [-], अंतर्-शतक [-], उद्देशक [१२], मूलं [७०३] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र- [०५], अंगसूत्र- [०५] "भगवती मूलं एवं अभयदेवसूरि-रचिता वृत्ति: प्रत सूत्रांक [७०३] दीप अनुक्रम [८४८] व्याख्या दसवाससह उकोसेणं पलिओवर्म सेसं तहेव ।। जइ जोइसियदेवहितो उवव० किं चंदविमाणजोतिसिय-|| प्रज्ञप्तिः। 8 देवेहिंतो उवव० जाव ताराविमाणजोहसिय?, गोयमा! चंदविमाणजाव ताराविमाण, जोइसियदेवे णं | उद्देशः१२ अभयदेवी- | भंते ! जे भविए पुढविकाइए लही जहा असुरकुमाराणं णवरं एगा तेउलेस्सा प० तिन्नि णाणा तिन्नि शाणा ताला मनुष्येभ्यः या वृत्तिः२ अन्नाणा णियमं ठिती जहन्नेणं अट्ठभागपलिओवमं उकोसेण पलिओवमं वाससहस्सअन्भहियं एवं अणुवं- पृथ्व्याउ. घोवि कालादे जहा अट्ठभागपलिओवमं अंतोमुत्तमम्भहियं उक्कोसेणं पलिओचमं वाससयसहस्सेण पादः ॥८३१॥ बावीसाए वाससहस्सेहिं अम्भहियं एवतियं० एवं सेसावि अह गमगा भाणियचा नवरं ठिती कालादे० सू७०३ जाणेजा ॥ जइ वेमाणियदेवेहितो उउव० किं कप्पोवगवेमाणिय कप्पातीयवेमाणिय०१, गो! कप्पो-i बगवेमाणिय० णो कप्पातीतवेमाणिय, जइ कप्पोवगवेमाणिय०किं सोहम्मकप्पोवगवेमाणिय जाव अचुयकप्पोबगवेमा०, गोयमा ! सोहम्मकप्पोवगवेमाणिय० ईसाणकप्पोवगवेमाणिय णो सर्णकुमारजाव णो अञ्जयकप्पोवगवेमाणिय०, सोहम्मदेवे णं भंते ! जे भविए पुढविकाइएसु उवव० ते णं भंते ! केवतिया एवं जहा जोइसियस्स गमगो णवरं ठिती अणुबंधो य जहन्नेणं पलिओवम उक्कोसे० दो सागरोवमाई कालादे. जह पलिओवमं अंतोमुत्तमम्भहियं उकोसेणं दो सागरोवमाई बावीसाए चाससहस्सेहिं अभहियाई एवतियं कालं, एवं सेसावि अट्ठ गमगा भाणियबा, णवरं ठिति कालादेसं च जाणेजा । इंसाणदेवे णं भंते || ८९१।। जे भविए एवं इंसाणदेवेणविणव गमगा भाणि नवरं ठिती अणुबंधो जहनेणं सातिरेगं पलिओवमं ||४|| ~78~ Page #79 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (०५) [भाग-११]"भगवती"-अंगसूत्र-५ (मूलं+वृत्ति:) शतक [२४], वर्ग [-], अंतर्-शतक [-], उद्देशक [१२], मूलं [७०३] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र- [०५], अंगसूत्र- [०५] "भगवती मूलं एवं अभयदेवसूरि-रचिता वृत्ति: प्रत सूत्रांक [७०३]] दीप अनुक्रम [८४८] उकोसेणं सातिरेगाई दो सागरोवमाई सेसं तं चेव । सेवं भंते २ जाय विहरति (सूत्र ७०३)॥२४-१२॥ 'जईत्यादि, तन्त्र च एवं जहे'त्यादि, यथा हि असज्ञिपश्चेन्द्रियतिरश्चो जघन्यस्थितिकस्य त्रयो गमासधैव तस्यापि त्रय औधिका गमा भवन्ति, अजघन्योत्कृष्टस्थितिकत्वात् , समूच्छिममनुष्याणां न शेषगमषट्वसम्भव इति । अथ सजिमनुष्यमधिकृत्याह-'जह सन्नीत्यादि, 'जहेच रयणप्पभाए उववजमाणस्स'त्ति सज्ञिमनुष्यस्यैवेति प्रक्रमः, 'नवर'मित्यादि, रत्नप्रभायामुत्पिरसोहि मनुष्यस्यावगाहना जघन्येनाङ्गुलपृथक्त्वमुक्तमिह त्वङ्गलासययभागः, स्थितिश्च जघन्येन मासपृथक्त्वं प्रागुक्तमिह त्वन्तर्मुहूर्त्तमिति, संवेधस्तु नवस्वपि गमेषु यथैव पृथिवीकायिकेपूत्पद्यमानस्य सज्ञिपश्चेन्द्रियतिरश्च उक्तस्तथैवेह वाच्यः, सम्झिनो मनुष्यस्य तिरश्चश्च पृथिवीकायिकेषु समुत्पित्सोर्जघन्यायाः स्थितेरन्तर्मुहर्तप्रमाणस्वादुत्कृष्टायास्तु पूर्वकोटीप्रमाणत्वादिति, 'मज्झिल्ले'त्यादि जघन्यस्थितिकसम्बन्धिनि गमत्रये लब्धिस्तथेह वाच्या यथा तत्रैव गमत्रये सज्ञिपञ्चेन्द्रियतिरश्च उक्ता सा च तत्सूत्रादेवेहावसेया, 'पच्छिल्लेत्यादि, औधिकगमेषु हि अङ्गुलासङ्ख्येयभागरूपाऽप्यवगाहनाऽन्तर्मुहर्तरूपाऽपि स्थितिरुक्ता सा चेह न वाच्या अत एवाह-'नवरं ओगाहणे'त्यादि ॥ अथ - | देवेभ्यस्तमुत्पादयन्नाह-'जईत्यादि, 'छहं संघयणाणं असंघयणित्ति, इह यावत्करणादिदं दृश्यं-'णेवट्ठी जेव|3| छिरा नेव ण्हारू नेव संघयणमथि जे पोग्गला इट्ठा कता पिया मणुना मणामा ते तेसिं सरीरसंघायत्ताए'त्ति, 'तत्व णं जा सा भवधारणिज्जा सा जहन्नेणं अंगुलस्स असंखेज्जइभागं ति उत्पादकालेऽनाभोगतः कर्मपारतळ्यावङ्गुलासोयभाग % % ~79 Page #80 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (०५) [भाग-११]"भगवती"-अंगसूत्र-५ (मूलं+वृत्ति:) शतक [२४], वर्ग [-], अंतर्-शतक [-], उद्देशक [१२], मूलं [७०३] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र- [०५], अंगसूत्र- [०५] "भगवती मूलं एवं अभयदेवसूरि-रचिता वृत्ति: प्रत सूत्रांक [७०३] व्याख्या प्रज्ञप्तिः अभयदेवीया वृत्तिः 1८३२॥ दीप अनुक्रम [८४८] |मात्रावगाहना भवति, उत्तरवैक्रिया तु जघन्याङ्गलस्य सोयभागमाना भवति आभोगजनितत्वात्तस्या न तथाविधा २४ शतके सूक्ष्मता भवति यादृशी भवधारणीयाया इति, 'तत्थ ण जे ते उत्तरवेउधिया ते णाणासंठिय'त्ति इच्छावशेन संस्थाननि-||२|| उदशा१२ प्पादनादिति, 'तिन्नि अन्नाणा भयणाए'त्ति येऽसुरकुमारा असज्ञिभ्य आगत्योत्पद्यन्ते तेषामपर्याप्तकावस्थायां विभ-ट | मनुष्यभ्य: गस्याभावात् शेषाणां तु तद्भाबादज्ञानेषु भजनोक्ता, 'जहन्नेणं दसवाससहस्साहं अंतोमुत्तमम्भहियाईति तत्र |पृथ्व्याउ त्पाद दशवर्षसहस्राण्यसुरेषु अन्तर्मुहूर्त पृथिवीकायिकेष्यिति, इत्थमेव 'उक्कोसेणं साइरेगं सागरोवर्म' इत्याद्यपि भावनी सू७०३ यम्, एतावानेव चोत्कर्षतोऽप्यत्र संवेधकालः, पृथिवीत उद्वृत्तस्यासुरकुमारेषूत्पादाभावादिति, 'मजिझल्लएमु पच्छिल्ल-1& एमइत्यादि, अयं चेह स्थितिविशेषो मध्यमगमेषु जघन्यासुरकुमाराणां दशवर्षसहस्राणि स्थितिः अन्त्यगमेषु च साधिक सागरोपममिति ।। ज्योतिष्कदण्डके 'तिन्नि नाणा तिन्नि अन्नाणा नियमति इहासम्झी नोत्पद्यते सज्ञिनस्तूत्पत्तिसमय एवं सम्यग्दृष्टेस्त्रीणि ज्ञानानि मत्यादीनि इतरस्य त्वज्ञानानि मत्यज्ञानादीनि भवन्तीति, 'अट्ठभागपलिओवर्म'ति अष्टमो भागोऽष्टभागः स एवावयवे समुदायोपचारादष्टभागपल्योपर्म, इदं च तारकदेवदेवीराश्रित्योक्तम्, 'उकोसेणं पलिओषमं वाससयसहस्समम्भहिय'ति इदं च चन्द्रविमानदेवानानियोक्तमिति ॥ अथ वैमानिकेभ्यस्तमुत्पादय| नाह-'जई'त्यादि, एतच्च समस्तमपि पूर्वोक्तानुसारेणावसेयमिति ॥ चतुर्विशतमशते द्वादशः ।। २४-१२॥ ॥८३२॥ आउकाइया णं भंते ! कओहिंतो उवव एवं जहेव पुढविकाइयउसए जाच पुढविक्काइया णं भंते ! जे || अत्र चतुर्विंशतितमे शतके द्वादश-उद्देशक: परिसमाप्त: अथ चतुर्विशतितमे शतके त्रयोदशात् षोडश: पर्यन्ता: उद्देशका: आरभ्यते ~80 Page #81 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (०५) [भाग-११]"भगवती"-अंगसूत्र-५ (मूलं+वृत्ति:) शतक [२४], वर्ग [-], अंतर्-शतक -1, उद्देशक [१३-१६], मूलं [७०४-७०७] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र- [०५], अंगसूत्र- [०५] "भगवती मूलं एवं अभयदेवसूरि-रचिता वृत्ति: प्रत सूत्रांक [७०४ -७०७] दीप TAX भविए आउकाइएसु उववजित्तए से णं भंते ! केवति०१. गोयमा! जहमेणं अंतोमु. उकोसे सत्तवाससहस्सहिइएसु उववज्जेजा एवं पुढविकाइयउद्देसगसरिसो भाणिययो णवरं ठिती संवेहं च जाणेज्जा, सेसं तहेव | सेवं भंते २ त्ति (सूत्रं ७०४)॥२४-१३॥ - तेउकाइया णं भंते ! कओहिंतो उबवनंति एवं जहेव पुढविक्काइयउहेसगसरिसो उद्देसो भाणियवो नवरं *ठिति संवेहं च जाणेजा देवेहिंतो ण उवध०, सेसं तं चेव । सेवं भंते !२जाव विहरति (सूत्रं ७०५)॥२४-१४॥17 वाउकाइया णं भंते ! कओहिंतो उवय एवं जहेव तेउक्काइयउद्देसओ तहेव नवरं ठिति संवेहं च जाणेजा। सेवं भंते २ त्ति (सूत्रं ७०६)॥२४-१५॥ वणस्सइकाइया णं भंते ! कओहिंतो उवचजंति एवं पुढविकाइयसरिसो उद्देसोनवरं जाहे वणस्सइकाइओवणस्सइकाइएसु उववज्जति ताहे पढमबितियचउत्धपंचमेसु गमएसु |परिमाणं अणुसमयं अविरहियं अर्णता उवव. भवादे०जह दो भवग्गह. उको अर्णताई भवग्गहणाई। कालादे०जह दो अंतोमु० उकोसेणं अणतं कालं एवतियं०, सेसा पंच गमा अट्ठभवग्गहणिया तहेव नवरं है ठिती संवेहं च जाणेजा । सेचं भंते २ति (सूत्रं ७०७)॥ २४-१६॥ | त्रयोदशे नास्ति लेख्य, चतुर्दशे तु लिख्यते-'देवेमु न उववजंति'त्ति देवेभ्य उद्त्तास्तेजस्कायिकेषु नोत्पद्यन्त इत्यर्थः। एवं पशदशेऽपि । पोडशे लिख्यते-'जाहे' वणस्सइकाइए'इत्यादि, अनेन वनस्पतेरेवानन्तानामुदत्तिरस्ति नान्यत इत्या-1 वेदित, शेषाणां हि समस्तानामप्यसङ्ग्यातत्वात् , तथाऽनन्तानामुत्पादो बनस्पतिष्वेव कायान्तरस्यानन्तानामभाजनत्वादि अनुक्रम [८४९-८५२] SAREauratoninternational ~81~ Page #82 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (०५) [भाग-११]"भगवती"-अंगसूत्र-५ (मूलं+वृत्ति:) शतक [२४], वर्ग -], अंतर्-शतक [-1, उद्देशक [१३-१६], मूलं [७०४-७०७] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र- [०५], अंगसूत्र- [०५] "भगवती मूलं एवं अभयदेवसूरि-रचिता वृत्ति: प्रत सूत्रांक [७०४ -७०७] व्याख्या- त्यप्यावेदित, इह च प्रथमद्वितीयचतुर्थपञ्चमगमेष्वनुत्कृष्टस्थितिभावादनन्ता उत्पश्चन्त इत्यभिधीयते, शेषेषु तु पनसु गमे || २४ शतके प्रज्ञप्तिः पूत्कृष्टस्थितिभावादेको वा द्वौ वेत्याद्यभिधीयत इति, तथा तेष्वेव प्रथमद्वितीयचतुर्थपञ्चमेष्वनुत्कृष्टस्थितित्वादेवोत्कर्षतो उद्देशः १३ AG१४-१५. अभयदेवी- भवादेशेनानन्तानि भवग्रहणानि वाच्यानि कालादेशेन चानन्तः कालः, शेषेषु तु पञ्चसु तृतीयषष्ठसप्तमादिषु गमेष्वष्टौ । यावृत्तिः भवग्रहणानि उत्कृष्टस्थितिभावात् , 'ठिति संवेहं च जाणेज'त्ति तत्र स्थितिजघन्योत्कृष्टा च सर्वेष्वपि गमेषु प्रतीतैव, ||१६ अप्लेजो ॥८३३॥ | संवेधस्तु तृतीयसप्तमयोर्जघन्येन दशवर्षसहस्राण्यन्तर्मुहूर्त्ताधिकानि उत्कर्षतस्त्वष्टासु भवग्रहणेषु दशसाहस्याः प्रत्येक भावा-शवायु दशीतिवर्षसहस्राणि, पष्ठाष्टमयोस्तु जघन्येन दशवर्षसहस्राण्यन्तर्मुहाधिकानि, उत्कृष्टतस्तु चत्वारिंशद्वर्षसहस्राण्यन्तर्मु-18|| मुत्पादः सू ७०४-७०७ हूर्तचतुष्टयाभ्यधिकानि,नवमे तु जघन्यतो विंशतिवर्षसहस्राणि उत्कर्षतस्त्वशीतिरिति ॥ चतुर्थिशतितमशते पोडशः॥२४-१६॥ अथ सप्तदशे लिख्यतेबेंदिया णं भंते ! ओहिंतो उववचति जाव पुढविकाइए णं भंते ! जे भविए बॅदिएम उववजित्तए से णं भंते ! केवतिक सचेव पुतविकाइयस्स लद्धी जाव कालादेसेणं जहन्नेणं दो अंतोमुहत्ताई उकोसेणं संखे-12 ६ जाई भवग्गहणाई एवतियं, एवं तेसु चेय चउसु गमएसु संवेहो सेसेसु पंचसु तहेव अट्ट भवा । एवंद्र * जाव चउरिदिए णं समं चउसु संखेज्जा भवा पंचसु अट्ट भवा, पंचिंदियतिरिक्वजोणियमणुस्सेसु समं ॥८३३|| तहेव अट्ट भवा, देवेन चेव उववज्जंति, ठितीं संवेहं च जाणेजा । सेवं भंते ! २(सूत्रं ७०८) ॥ २४-१७॥ SASARAHEIRRA दीप अनुक्रम [८४९-८५२] अत्र चतुर्विंशतितमे शतके त्रयोदशात् षोडश: पर्यन्ता: उद्देशका: परिसमाप्त: अथ चतुर्विशतितमे शतके सप्तदशात् एकोनविंशति: पर्यन्ता: उद्देशका: आरभ्यते ~82 Page #83 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (०५) [भाग-११]"भगवती"-अगसूत्र-५ (मूल+वृत्ति:) शतक [२४], वर्ग [-], अंतर्-शतक -1, उद्देशक [१७-१९], मूलं [७०८-७१०] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र- [०५], अंगसूत्र- [०५] "भगवती मूलं एवं अभयदेवसूरि-रचिता वृत्ति: % प्रत सूत्रांक [७०८-७१० दीप तेइंदिया णं भंते ! कओहिंतो उबव० १, एवं तेइंदियाणं जहेब बेइंदिउसो नवरं ठिति संवेहं च जाणेजा, || तेउकाइएमु समं ततियगमो उक्को अदत्तराई वेराइंदियसयाई चेहं दिएहि सम ततियगमे उकोसेणं अत्या-है। लीसं संबच्छराई छन्नउयराइंदियसतमन्भहियाई तेइंदिएहिं समं ततियगमे उको बाणउयाई तिन्नि राईदियसयाई एवं सवत्थ जाणेजा जाव सन्निमणुस्सत्ति। सेवं भंते ! २ त्ति (सूत्र ७०९) ॥ २४-१८॥ चउरि| दिया णं भंते ! कओहिंतो ववव जहा तेइंदियाणं उद्देसओ तहेव चारिदियाणवि नवरं ठिति संवेहं च जाणज्जा । सेवं भंते ! सेवं भंतेत्ति (सूत्रं ७१०)॥२४-१९॥ 'सच्चेव पुढविक्काइयस्स लम्ही ति या पृथिवीकायिकस्य पृथिवीकायिकेत्पित्सोलब्धिः प्रागुक्ता द्वीन्द्रियेष्वपि सैवे-13 | त्यर्थः, 'तेसु चेव चउसु गमएसुत्ति तेष्वेव चतुर्यु गमेषु प्रथमद्वितीयचतुर्थपञ्चमलक्षणेषु 'सेसेसु पंचस'त्ति शेषेषु । पञ्चसु गमेषु-तृतीयपष्ठसप्तमाष्टमनवमलक्षणेषु 'एवं ति यथा पृथिवीकायिकेन सह दीन्द्रियस्य संवेध उक्तः एवमप्तेजोवायुवनस्पतिद्वित्रिचतुरिन्द्रियैः सह संवेधो वाच्यः, तदेवाह-चतुएं पूर्वोक्तेषु गमेषूत्कर्षतो भवादेशेन सोया भवाः पञ्चसुतृतीयादिष्वष्टौ भवाः कालादेशेन च या यस्य स्थितिस्तत्संयोजनेन संवेधो वाच्यः, पञ्चेन्द्रियतियग्भिर्मनुष्यैश्च सह द्वी|न्द्रियस्य तथैव सर्वगमेष्वष्टावष्टौ च भवा वाच्या इति ॥ चतुर्विंशतितमशते सप्तदशः ॥ २४-१७॥ अथाष्टादशे लिख्यते-'ठिई संवेहं च जाणेजति 'स्थिति त्रीन्द्रियेत्पित्सूनां पृथिव्यादीनामायुः 'संवेधं च त्रीन्द्रियोत्पित्सुपृथिव्यादीनां त्रीन्द्रियाणां च स्थितेः संयोग जानीयात्, तदेव कचिद्दर्शयति-तेउकाइएमइत्यादि, तेजस्कायिकैः अनुक्रम [८५३ -८५५]] ~83~ Page #84 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (०५) [भाग-११]"भगवती"-अंगसूत्र-५ (मूलं+वृत्ति:) शतक [२४], वर्ग [-], अंतर्-शतक -1, उद्देशक [१७-१९], मूलं [७०८-७१०] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र- [०५], अंगसूत्र- [०५] "भगवती मूलं एवं अभयदेवसूरि-रचिता वृत्ति: प्रत सूत्रांक [७०८-७१० दीप व्याख्या- सार्द्ध त्रीन्द्रियाणां स्थितिसंवेधस्तृतीयगमे प्रतीते उत्कर्षेणाष्टोत्तरे द्वे रात्रिन्दिवशते, कथम् ?, औधिकस्य तेजस्कायिकस्य २४ शतके प्रज्ञप्तिः चतुर्यु भवेपूत्कर्षेण व्यहोरात्रमानत्वाद्भवस्य द्वादशाहोरात्राणि उत्कृष्टस्थितेश्च वीन्द्रियस्योत्कर्षतचतुर्यु भवेष्वेकोनपञ्चाश-टू | उद्देशः १७ अभयदेवी- मानत्वेन भवस्य शतं पण्णवत्यधिकं भवति राशिद्वयमीलने चाष्टोत्तरे द्वे रात्रिन्दिवशते स्यातामिति । 'बेईदिएही'- १८-१९ या वृत्तिः२४ त्यादि, 'अडयालीसं संवच्छराईति द्वीन्द्रियस्योत्कर्षतो द्वादशवर्षप्रमाणेषु चतुषु भवेष्वष्टचत्वारिंशत्संवत्सराश्चतुर्वेव। विकलोत्पा दासू ॥८३४॥ त्रीन्द्रियभवग्रहणेषूत्कणकोनपश्चाशदहोरात्रमानेषु पण्णवत्यधिकं दिनशतं भवतीति । 'तेइंदिएहीं'त्यादि, 'बाणउयाई ७०८-७१० सातिन्नि राइंदियसयाईति अष्टासु त्रीन्द्रियभवेपत्कर्षणकोनपञ्चाशदहोरात्रमानेषु त्रीणि शतानि द्विनवत्यधिकानि भव-II न्तीति, 'एवं सवत्थ जाणेजत्ति अनेन चतुरिन्द्रियसझ्यसज्ञितिर्यग्मनुष्यैः सह त्रीन्द्रियाणां तृतीयगमसंवेधः कार्य इति सूचितं, अनेन च तृतीयगमसंवेधदशनेन पष्ठादिगमसंवेधा अपि सूचिता द्रष्टव्याः, तेषामप्यष्टभविकत्वात् , प्रथमादिगमचतुष्कसंवेधस्तु भवादेशेनोत्कर्षतः सङ्ख्यातभवग्रहणरूपः कालादेशेन तु सायातकालरूप इति ॥ चतुर्विंश|तितमझतेऽष्टादश ॥२४-१८ ॥ एकोनविंशे न लेख्यमस्ति । विंशतितमे तु लिख्यते| पंचिंदियतिरिक्खजोणिया णं भंते ! कओहिंतो उववज्जति ? किं नेरइय० तिरिक्ख० मणुस्स० देवेहितो उवव०, गो! नेरइएहिंतो उवव०तिरिक्ख० मणुस्सेहिंतोवि देवेहितोवि उव०, जइ नेरइएहिंतो उव० 1८३४॥ किं रयणप्पभपुढधिनेरहएहिंतो उव० जाव अहेसत्तमपुढविनेरइएहिंतो उवव०१, गो०1रयणप्पभपुढविनेर-15 |इएहितो उवव० जाव अहेसत्समपुढविनेरइएहितो, रयणप्पभपुढविनेरइए णं भंते ! जे भविए पंचिंदियति अनुक्रम [८५३ -८५५]] CACASS weredturary.com अत्र चतुर्विंशतितमे शतके सप्तदशात् एकोनविंशति: पर्यन्ता: उद्देशका: परिसमाप्त: अथ चतुर्विंशतितमे शतके विशति: पर्यन्ता: उद्देशका: आरभ्यते ~84~ Page #85 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (०५) प्रत सूत्रांक [७११] दीप अनुक्रम [८५६] [भाग-११]“भगवती”- अंगसूत्र -५ (मूलं + वृत्तिः) शतक [२४], वर्ग [-], अंतर् शतक [ - ], उद्देशक [२०], मूलं [७११] पूज्य आगमोद्धारकश्री संशोधितः मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित.. आगमसूत्र - [०५] अंगसूत्र- [ ०५] "भगवती" मूलं एवं अभयदेवसूरि-रचिता वृत्तिः रिक्खजोणिएस उवव० से णं भंते ! केवइकालट्ठितिएस उबव० १, गोयमा ! जहनेणं अंतोमुहुत्तद्वितीएस उकोसेणं पुचकोडिआरएस उबव०, ते णं भंते! जीवा एगसमएणं केवइया उबव० ?, एवं जहा असुरकुमाराणं चन्तवया नवरं संघयणे पोग्गला अणिट्ठा अकंता जाय परिणमंति, ओगाहणा दुबिहा प०, तं० भवधारणिजा उत्तरवेडचिया, तस्थ णं जा सा भवधारणिन्ना सा जह० अंगुलस्स असंखेज्जहभागं उक्कोसेणं | सत्त धगृहं तिन्नि रयणीओ छचंगुलाई, तत्थ णं जा सा उत्तरवेउडिया सा जहन्नेणं अंगुलस्स संखेज्जइभागं उको पन्नरस घणू अहाइखाओ रथणीओ, तेसिणं भंते ! जीवाणं सरीरगा किंसंटिया प० १, गोयमा ! दुविहा पं०, तं०- भवधारणि० उत्तरचेउदिया य तस्थ णं जे ते भव० ते हुंडसंठिया प९, तत्थ णं जे ते उत्तरवे-उडिया तेवि इंडसंठिता प०, एगा काउले० प०, समुग्धाया चत्तारि णो इत्थि० णो पुरिसवेदगा पुंसगवेदगा, ठिती जहलेणं दसवाससहस्साई उक्कोसेणं सागरोपमं एवं अणुबंधोवि, सेसं तहेव, भवादेसेणं जह० दो भवग्गहणाई उक्कोसेणं अह भवग्गहणाई कालादे० जहनेणं दसवाससहस्साई अंतोमुहुत्तमन्नहियाई उक्कोसेणं चत्तारि सागरोवमाई चउहिं पुचकोडीहिं अमहियाई एवतियं, सो चेव जहन्नकालहितीएस उबवन्नो जनेणं अंतोमुहृत्तद्वितीएस उवबन्नो उक्कोसेणवि अंतोमुहुत्तहितीएस अवसेसं तहेव, नवरं कालादेसेणं जहनेणं तहेव उक्कोसेणं चत्तारि सागरोवमाई चाहिं अंतोमुहुत्तेहिं अमहियाई एवतियं काल २, एवं सेसावि सन्त गमगा भाणियचा जहेव नेरहय उद्देसए सन्निपंचिदिएहिं समं रहयाणं मज्झिमएस य For Parks Use One ~ 85~ wor Page #86 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (०५) [भाग-११]"भगवती"-अंगसूत्र-५ (मूलं+वृत्ति:) शतक [२४], वर्ग [-], अंतर्-शतक [-], उद्देशक [२०], मूलं [७११] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र- [०५], अंगसूत्र- [०५] "भगवती मूलं एवं अभयदेवसूरि-रचिता वृत्ति: प्रत सूत्रांक [७११] दीप अनुक्रम [८५६] व्याख्या-तिसुवि गमएसु पच्छिमएसु तिमुवि गमएसु ठितिणाणत्तं भवति, सेसं तं चेव सबस्थ ठिति संवेहं च २४ शतके प्रज्ञप्तिः जाणेजा ९॥ सकरप्पभापुढविनेरइए णं भंते ! जे भविए एवं जहा रयणप्पभाए णव गमका तहेव सकरप्प- उद्देशः १७ अभयदेवी भाएचि, नवरं सरीरोगाहणा जहा ओगाहणासंठाणे तिन्नि णाणा तिन्नि अन्नाणा नियम ठिती अणुबंधा १८-१९ या वृत्तिः पुषभणिया, एवं णववि गमगा उव जिऊण भाणियबा, एवं जाव छठ्ठपुढवी, नवरं ओगाहणा लेस्सा ठिति विकलोत्पा॥८३५॥ अणुबंधो संवेहो य जाणियबा, अहेसत्तमपुढचीनेरइए णं भंते ! जे भविए एवं चेव णव गमगा णवरं ओगा हणा लेस्सा ठितिअणुबंधा जाणियबा, संवेहो भवादेसेणं दो भवग्गहणाई उकोसेणं छन्भवग्गहणाई कालाद्र देसेणं जह० बावीसं सागरोचमाई अंतोमुत्तमम्भहियाई उक्कोसेणं छावडिं सागरोवमाई तिहिं पुषकोडीहिंद्र अभहियाई एवतिय, आदिल्लएसु छमुवि गमएसु जहन्नेणं दो भवग्गहणाई उकोसेणं छ भवग्गहणाई। पच्छिल्लएमु तिसु गमएसु जहनेणं दो भवग्गहणाई उक्कोसेणं चत्तारि भवग्गहणाई, लद्धी नवसुवि गमएम जहा पढमगमए नवरं ठितीविसेसो कालादेसो य बितियगमएसु जहन्नेणं बाबीसं सागरोवमाई अंतोमुहुत्तमन्भहियाई उकोसेणं छावढि सागरोवमाहं तिहिं अंतोमुलुत्तेहिमभहियाई एवतियं कालं तइयगमए जहन्नेणं ॥८३५॥ बावीसं सागरोवमाई पुचकोडीए अन्भहियाई उक्कोसेणं छावहि सागरोवमाई तिहिं पुवकोडीहि, अम्भहिदियाई चउत्थगमे जहनेणं बावीसं सागरोवमाई अंतोमुष्टत्तमभहियाई उकोसेणं छावर्द्धि सागरोवमाई तिहिं| | पुषकोडीहिं अम्भहियाई पंचमगमए जहन्नेणं बाचीसं सागरोवमाई अंतोमुहुत्तमम्भहियाई उकोसेणं छाव अत्र मूल संपादने सूत्र-क्रमांकने एका स्खलना दृश्यते - उद्देश: २० स्थाने उद्देश: 16-१८-१९ मुद्रितं ~86 Page #87 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (०५) [भाग-११]"भगवती"-अंगसूत्र-५ (मूलं+वृत्ति:) शतक [२४], वर्ग [-], अंतर्-शतक [-], उद्देशक [२०], मूलं [७११] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र- [०५] अंगसूत्र- [०५] "भगवती" मूलं एवं अभयदेवसूरि-रचिता वृत्ति: प्रत सूत्रांक [७११] काहिं सागरोवमाई तिहिं अंतोमुहत्तेहिं अन्भहियाई छगमए जहन्नेणं बावीसं सागरोवमाई पुच्चकोडीहिं। अम्भहियाई उकोसेणं छादि सागरोवमाई तिहिं पुषकोडीहिं अन्भहियाई सत्तमगमए जहन्ने तेत्तीस |सागरोवमाई अंतोमुत्तमम्भहियाई उकोसेणं छावहि सागरोचमाई दोहिं पुषकोडीहिं अमहियाई अहम गमए जह• तेत्तीसं सागरोवमाइं अंतोमुहुत्तमम्भहियाई उक्कोसेणं छावडिं सागरोवमाई दोहिं अंतोमुहुत्तेहिं 3 अम्भहियाई णवमगमए जहन्नेणं तेत्तीसं सागरोवमाई पुषकोडीहिं अन्भहियाई उक्कोसेणं छावहि सागरो-18 |चमाई दोहिं पुषकोडीहिं अन्भहियाई एवतियं ९॥ जइ तिरिक्खजोणिएहिंतो उवव० फि एगिदियतिरि-| क्खजोणिएहितो एवं उववाओ जहा पुढविकाइयउद्देसए जाब पुढविकाइए ण भंते ! जे भविए पचिंदिय3|तिरिक्खजो० उवव से णं भंते ! केवति?, गोयमा ! जहन्नेणं अतोमुत्तहितिएसु उफोसेणं पुषकोडीआउ-3 द एसु उवव०, ते णं भंते ! जीवा एवं परिमाणादीया अणुबंधपज्जवसाणा जच्चेव अप्पणो सहाणे बत्तवया सचेव पंचिंदियतिरिक्ख जोणिएसुवि उचवजमाणस्स भाणियबा णवरं णवसुवि गमएमु परिमाणे जहन्नेणं ४ एको वा दो वा तिन्नि वा उक्कोसेणं संखे० असंखे० वा उबवजंति भवादेसेणवि वसुधि गमएसु जहन्नेणं दो भवग्गहणाई उकोसेणं अट्ठ भवग्गहणाई, सेसं तं चेव कालादेसेणं उभओ ठितीए करेजा । जइ आउक्काइएहिंतो उबवजा एवं आउकाइयाणवि एवं जाव चरिंदिया उववाएयचा, नवरं सबस्थ अप्पणो लद्धी भाणियघा, णवसुवि गमएसु भवादेसेणं जहनेणं दो भवग्गहणाई उकोसेणं अट्ठ भवग्गहणाई कालादेसेणं उभओ SC-%EXCARE दीप अनुक्रम [८५६] ~87 Page #88 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (०५) प्रत सूत्रांक [७११] दीप अनुक्रम [८५६] [भाग-११]“भगवती”- अंगसूत्र -५ (मूलं + वृत्तिः) शतक [२४], वर्ग [-], अंतर् शतक [ - ], उद्देशक [२०], मूलं [७११] पूज्य आगमोद्धारकश्री संशोधितः मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित.. आगमसूत्र - [०५] अंगसूत्र- [ ०५] "भगवती" मूलं एवं अभयदेवसूरि-रचिता वृत्तिः व्याख्याप्रज्ञप्तिः अभयदेवीया वृत्तिः २ ||८३६ ॥ ठित करेजा सबेसिं सगमएस, जहेव पुढविकाइएस उववजमाणाणं लद्धी तहेव सहस्थ ठिति संदेह च जाणेज्जा ॥ जइ पंचिंदियतिरिक्खजोणिएहिंतो उववज्जंति किं सन्निपंचिंदियतिरिक्खजोणि० उबव० असन्नि पंचिदियतिरिक्खजोणि० उबव० १, गोयमा ! सन्निपंचिंदिय असन्निपचिदियमेओ जहेब पुढविकाइएस | उववज्रमाणस्स जाव असन्निपंचिंदियतिरिक्खजोणिए णं भंते । जे भबिए पंचिंदियतिरिक्खजोणिएस उवव० से णं भंते! केवतिकाल० १, गोयमा ! जहनेणं अंतोमुद्दत्तं उक्कोसेणं पलिओषमस्स असंखेज्जइभागट्टितीएस उववजमाण०, ते णं भंते । अथसेसं जहेब पुढविकाइएस उबवज्रमाणस्स असन्निस तहेब निरवसेसं जाव भवादेसोप्ति, कालादेसेणं जहन्त्रेणं दो अंतोमुहुसाई उकोसेणं पलिओवमस्स असंखेज भागं पुत्रको eyeतमम्भहियं एवतियं० १, वितियगमए एस चैव लद्वी नवरं कालादेसेणं जहझेणं दो अंतोमुहुत्ता उक्कोसेणं चत्तारि पुचकोडीओ चउहिं अंतोमुहतेहिं अम्महियाओ एवतियं० २, सो चैव उक्कोसकालद्वितीएस उबवनो | जहनेणं पलिओवमस्स असंखेज्जतिभागइिएस उक्को० पलिओवमस्स असंखेज्जइभागद्वितिएस उबव० ते णं भंते! जीवा एवं जहा रयणप्पभाए उववजमाणस्स असन्निस्स तहेव निरवसेसं जाव कालादेसोत्ति, नवरं परिमाणे अहलेणं एको वा दो वा तिनि वा उक्को० संखे० उबव०, सेसं तं चेव ३, सो चेव अप्पणो जहनकालद्वितिओ जलेणं अंतोमुहतहितीएस उक्कोसेणं पुत्रकोडिआउपसु उबव०, ते णं भंते । अवसेसं जहा | एयस्स पुढविकाइएस उववज्यमाणस्स मज्झिमेसु तिसु गमएस तहा इहवि मज्झिमेसु तिसु गमएसु जाव For Penal Use On अत्र मूल संपादने सूत्र क्रमांकने एका स्खलना दृश्यते उद्देश: २० स्थाने उद्देश: १७-१८-१९ मुद्रितं ~88~ २४ शतके उद्देशः १७ १८-१९ चिकलोत्पा दः सू ७०८-७१० ॥ ८३६॥ www.r Page #89 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (०५) [भाग-११]"भगवती"-अंगसूत्र-५ (मूलं+वृत्ति:) शतक [२४], वर्ग [-], अंतर्-शतक [-], उद्देशक [२०], मूलं [७११] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र- [०५], अंगसूत्र- [०५] "भगवती मूलं एवं अभयदेवसूरि-रचिता वृत्ति: प्रत सूत्रांक [७११] दीप अनुक्रम [८५६] अणुपं०, भवादे जहनेणं दो भवग्गह० उको अट्ठ भवग्गहणाई, कालादेसेणं जह० दो अंतोमुह कोसेणं चित्तारि पुषकोडीओ चउहिं अंतोमुत्तेहिं अमहियाओ४, सो चेव जहनकालहितिएसु उववमो एस येव वत्तबया नवरं कालादेसेणं जहदो अंतोमुहत्ता उकोसे. अह अंतोमु० एवतियं ५, सो चेव उक्कोसकाल. ४४ा द्वितिएसु उबवजह पुषकोडीआउएसु उकोसेणवि पुवकोडीआउएसु उपय० एस चेव वत्तवया नवरं कालादे जाणेजा ६, सो चेव अप्पणा नकोसकालट्ठितिओ जाओ सचेव पढमगमगवत्तबया नवरं ठिती जह परकोडी उकोसे० पुषकोडी सेसं तं चेव कालादेसेणं जह. पुषकोडी अंतोमुत्तमम्भहिया उकोसेणं पलिओव-12 मस्स असंखेजहभागं पुचकोडिपुत्तमम्भहियं एवतियं ७, सो चेव जहन्नकालट्टितीएसु उपवनो एस चेव द वत्तवया जहा सत्तमगमे नवरं कालादेसेणं जहन्नेणं पुषकोडी अंतोमुहुत्तमम्भहिया उको चत्तारि पुषकोडीओ चाहिं अंतोमुहुत्तेहिं अम्भहियाओ एवतियं०८, सो चेव उकोसकालहिइएसु उपवनो जहनेणं पलिओवमस्स असंखेजहभागं उक्कोसेणवि पलिओवमस्स असंखजइभार्ग एवं जहा रयणप्पभाए उववजमाणस्स असन्निस्स नवमगमए तहेव निरवसेसं जाच कालादेसोत्ति, नवरं परिमाणं जहा एयरसेव ततियगमे है सेसं तं चेव ९॥ जइ सन्निपंचिंदियतिरिक्खजोणिएहिंतो उवव० किं संखेजवासा० असं०१, गोयमा ! संखेज णो असंखेज, जइ संखेजजाय किं पज्जत्तसंखेज अपज्जत्तासंखेज, दोसुवि, संखेजवासाज्यसनिपंचिंद्रियतिरिक्खजो जे भविए पंचिंदियतिरिक्खजोणिएसु उवव० से णं भंते ! केवति?, गोयमा ! ~89~ Page #90 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (०५) प्रत सूत्रांक [७११] दीप अनुक्रम [८५६] [भाग-११]“भगवती”- अंगसूत्र -५ (मूलं + वृत्तिः) शतक [२४], वर्ग [-], अंतर् शतक [ - ], उद्देशक [२०], मूलं [७११] पूज्य आगमोद्धारकश्री संशोधितः मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित.. आगमसूत्र- [०५] अंगसूत्र- [ ०५] "भगवती" मूलं एवं अभयदेवसूरि-रचिता वृत्तिः व्याख्याप्रज्ञप्तिः अभय देवीया वृत्तिः २ ॥८२७॥ जहनेणं अंतोमुद्दत्तं उद्योसेणं तिपलिओ मट्टितीएस उवव०, ते णं भंते! अवसेसं जहा एयरस चैव सन्निस्स रयणप्पभाए उवबजमाणस्स पढमगमए नवरं ओगाहणा जहन्नेणं अंगुलस्स असंखेजड़भागं उक्कोसेणं जोयणसहस्सं, सेसं तं चैव जाव भवादेसोत्ति, कालादेसेणं जहनेणं दो अंतोमुहत्ता उक्कोसेणं तिन्नि पलिओवमाई पुचकोडी पुहुत्तमम्भहियाई एवतियं० १, सो चैव जहन्नकालद्वितीएस उबवन्नो एस चेव वत्तवया नवरं कालादेसेणं जहणं दो अंतोमु० उको० चत्तारि पुषकोडीओ चउहि अंतोमुत्तेहिं अमहियाओ २, सो चेव उकोसकालहितीएस जह० तिपलिओयमद्वितीएस उचवन्नो उक्कोसेणवि तिपलिओ महितीएस उबव०, एस चैव वत्तवया नवरं परिमाणं जहनेणं एको वा दो वा तिनि वा उक्कोसेणं संखेजा उवव०, ओगाहणा जहन्नेणं अंगुलस्स असंखेजड़भागं उक्कोसेणं जोयणसहस्सं सेसं तं चैव जाव अणुबंधोत्ति, भवादेसेणं दो भवग्गहगाई कालादेसेणं जहनेणं तिनि पलिओ माई अंतोमुत्तमन्महियाई उक्कोसेणं तिन्नि पलिओ माई पुछकोडीए अमहियाई ३, सो चैव अप्पणा जहन्नकालद्वितीओ जातो जह० अंतोमुहु० उकोसेणं पुषकोडीआउएसु उवव० लडी से जहा एयस्स चैव सन्निपंचिंद्रियस्स पुढविक्काइएस उववज्रमाणस्स मज्झिलपसु तिसुं गमएस सच्चैव इहवि मज्झिमेसु तिसु गमएस कायद्या, संवेहो जहेव एत्थ चैव असन्निस्स मज्झिमेसु तिसु गमएसु सो चैव अप्पणा उक्कोसकालद्वितीओ जाओ जहा पढमगमओ णवरं ठिती अणुबंधो जहनेणं पुत्र| कोडी उक्कोसेणवि पुइकोडी कालादेसेणं जहन्नेणं पुत्रको० अंतोमुहुत्तमम्भहिया उक्कोसेणं तिन्नि पलिओव For Parts Only अत्र मूल संपादने सूत्र क्रमांकने एका स्खलना दृश्यते उद्देश: २० स्थाने उद्देश: १७-१८-१९ मुद्रितं ~90~ | २४ शतके उद्देशः १७ १८-१९ विकलोत्पादः सू १७०८-७१० ॥८३७॥ wor Page #91 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (०५) [भाग-११]"भगवती"-अंगसूत्र-५ (मूलं+वृत्ति:) शतक [२४], वर्ग [-], अंतर्-शतक [-], उद्देशक [२०], मूलं [७११] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र- [०५], अंगसूत्र- [०५] "भगवती मूलं एवं अभयदेवसूरि-रचिता वृत्ति: प्रत सूत्रांक [७११] दीप अनुक्रम [८५६] . माई पुषकोडीपुहुत्तमभहियाई ७, सो चेव जहन्नकालहितिएसु उवव० एस चेव वत्तवया नवरं कालादेसेणं || जहन्नेणं पुषकोडी अंतोमुहसमन्महिया उकोसेणं चत्तारि पुषकोडीओ चाहिं अंतोमहत्तेहिं अम्भहियाओ ८. सो चेव उक्कोसकालट्ठितिएम उववन्नो जहन्नेणं तिपलिओचमट्टिती उकोसे तिपलिओवमहि अवसेसं तं। दि चेव नवरं परिमाणं ओगाहणा य जहा एयरसेव तइयगमए, भवादेसेणं दो भवग्गहणाई कालादे० जहर |तिन्नि पलिओवमाइं पुवकोडीए अभहियाई उक्कोसे० तिन्नि पलिओवमाई पुषकोडीए अम्भहियाई एवतियं ९॥ | जइ मणुस्सहिंतो उववजंति किं सन्निमणु० असन्निमणु.१, गोयमा! सन्निमणु असन्निमणु०, असन्निम|णुस्से णं भंते ! जे भविए पचिंदियतिरिक्व० उवव० से णं भंते ! केवतिकाल., गोयमा ! जह• अंतोमु० उको पुचको आउएमु उबवजंति लद्धी से तिसुवि गमएमु जहा पुढचिकाइएसु उववजमाणस्स संवेहो जहा | एत्य चेव असन्निपंचिंदियस्स मज्झिमेसु तिमु गमएस तहेव निरवसेसो भाणियचो, जइ सन्निमणुस्स.किं | संखेजवासाउयसन्निमणुस्स० असंखेजवासाउय?, गोयमा ! संखेजवासा० नो असंखे०, जइ संखेजा कि | पजत्त० अपजत्त०१, गोयमा ! पजत्त० अपज्जत्तसंखेजबासाउथ०, सन्निमणुस्से णं भंते ! जे भविए पंचिंदि० |तिरिक्ख० उवव० से णं भंते ! केवति०१, गोयमा ! जह• अंतोमु० उक्कोतिपलिओवमद्वितिएसु उव०, ते णं भंते ! लद्धी से जहा एयरसेव सन्निमणुस्सस्स पुढ विकाइएसु उववजमाणस्स पढमगमए जाव भवादेसोत्ति कालादे०जह दोअंतोमु० उको तिन्नि पलि० पुवकोडिपुत्तमम्भहियाई १, सो चेव जहन्नकाल द्वितीएसु उबवन्नो || ~91 Page #92 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (०५) [भाग-११]"भगवती"-अंगसूत्र-५ (मूलं+वृत्ति:) शतक [२४], वर्ग [-], अंतर्-शतक [-], उद्देशक [२०], मूलं [७११] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र- [०५], अंगसूत्र- [०५] "भगवती मूलं एवं अभयदेवसूरि-रचिता वृत्ति: प्रत सूत्रांक लादःसू [७११] व्याख्या-1 एस चेव वत्तवया णवरं कालादेजह दो अंतोमु० उक्कोसेणं चत्तारि पुचकोडीओ चउहि अंतोमुहुरोहिं अन्भ-||२४ शतक प्रज्ञप्तिः । हियाओ २, सो चेव उकोसकालहितीएसु उवव० जहन्नेणं तिपलिओवमहिइएसु उकोसेणवि तिपलिओचमहि- उद्देश:१७ अभयदेवी इएसु सच्चेव वत्तवया नवरं ओगाहणा जहन्नेणं अंगुलपुहत्तं उक्कोसेणं पंच धणुसयाई, ठिती जहनेणं मासपुहुप्स या वृत्तिः२ १८-१९ उक्कोसेणं पुच्चकोडी एवं अणुबंधोवि, भवादेसेणं दो भवग्गहणाई कालादे० जह तिन्नि पलिओयमाईमासपुहु विकलोत्पा॥८३८॥ त्तमम्भहि उकोसेणं तिनि पलिओवमाई पुरकोडीए अमहियाई एषतियं०३, सो चेव अप्पणा जहन्नकालहि- ७०८-१० इओ जाओ जहा सन्निपंचिंदियतिरिक्व जोणियस्स पंचिंदियतिरिक्खजोणिएसु उववजमाणस्स मज्झिमेसु तिम गमएम वत्तवया भणिया एस चेव एयस्सवि मज्झिमेसु तिसु गमएसु निरवसेसा भाणियचा, नवरं परिमाणं |उको संखेना उवव० सेसं तं चेव ६, सो चेव अप्पणा उक्कोसकालद्वितीओ जातो सचेव पढमगमगवतयार नवरं ओगाहणा जह० पंच धणुसयाई उक्को पंच धणुसयाई, ठिती अणुवंधो जह• पुषको उक्को पुचकोडी सेसं 8| तहेव जाव भवादेसोत्ति, कालादे जह. पुछको० अंतोमुहुत्तमम्भ० उको तिन्नि पलिओवमाई पुचकोटि पुहृत्समभहियाई एवतियं ७, सो चेव जहन्नकाल द्वितीएसु उववन्नो एस चेव वत्तवया नवरं कालादे जह | पुचकोडी अंतोमुहुत्तमन्भहिया उक्कोसेणं चत्तारि पुवकोडीओ चाहिं अंतोमुहत्तमभहियाओ८, सो चेव ॥३८॥ उकोसकालहितिएसु उचवन्नो जह. तिनि पलिओवमाई उक्कोसेणवि तिमि पलिओवमाई एस चेबलद्वी CONTACT दीप अनुक्रम [८५६] अत्र मूल संपादने सूत्र-क्रमांकने एका स्खलना दृश्यते - उद्देश: २० स्थाने उद्देश: 16-१८-१९ मुद्रितं ~92 Page #93 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (०५) [भाग-११]"भगवती"-अंगसूत्र-५ (मूलं+वृत्ति:) शतक [२४], वर्ग [-], अंतर्-शतक [-], उद्देशक [२०], मूलं [७११] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र- [०५], अंगसूत्र- [०५] "भगवती मूलं एवं अभयदेवसूरि-रचिता वृत्ति: प्रत सूत्रांक [७११] RSACREASEAS+ जहेव सत्तमगमे भवादे दो भवग्गहणाई कालादेसेणं जहन्ने तिन्निपलिओवमाई पुवकोडीए अभहियाई उक्कोसेणवि तिन्नि पलि. पुषकोडीए अन्भहियाई एवतियं ९ ॥ जइ देवेहिंतो उवव० किं भवण-12 वासिदेवेहिंतो उवव० वाणर्मतर. जोइसिय० वेमाणियदेवे०१, गोयमा! भवणवासिदेवे जाव बेमाणिय देवे०, जइ भवणवासि० किं असुरकुमारभवणजावणियकुमारभव० १, गोयमा ! असुरकुमारजाव थणिजयकुमारभवण, असुरकुमारे णं भंते ! जे भविए पंचिंदियतिरिक्खजोणिएसु उववजित्तए से णं भंते ! केवति०१, गोयमा ! जहन्नेणं अंतोमुहत्तहितीएसु उक्कोसेणं पुवकोडिआउएसु उवव०, असुरकुमारा पं.लद्धी |णवसुवि गमएसु जहा पुढविकाइएसु उववजमाणस्स एवं जाव इसाणदेवस्स तहेव लद्धी भवादेसेणं सबस्थ अट्ट भवग्गहणाई उक्को जहदोन्नि भवद्वितीं संवेहं च सत्य जाणेज्जा९॥नागकुमारा णं भंते ! जे भविएर एस चेव वत्सबया नवरं ठिति संवेधं च जाणेजा एवं जाव धणियकुमारे ९। जइ वाणमंतरे किं पिसाय तहेव | काजाव वाणमंतरेणं ते जे भविए पंचिंदियतिरिक्ख० एवं चेव नवरं ठिति संवेहं च जाणेजा ९ जइ जोति सिय उववाओ तहेव जाच जोतिसिए णं भंते ! जे भविए पंचिंदियतिरिक्ख. एस चेव वत्तवया जहा sil पुढविकाइयउद्देसए भवग्गहणाई णवसुवि गमएसु अट्ठ जाव कालादे जहन्ने० अट्ठभागपलिओवमं अंतो-3 मुहूत्तमभहियं उक्कोसेणं चत्तारि पलिओवमाई चडहिं पुचकोडीहिं चउहि य वाससयसहस्सेहि अन्भहियाई एवतियं०, एवं नवसुवि गमएसु नवरं ठिति संवेहं च जाणेजा ९॥ जइ वेमाणियदेवे० किं. कप्पोवग० ASSASSAGARAA दीप अनुक्रम [८५६] Mana weredturary.com ~93~ Page #94 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (०५) [भाग-११]"भगवती"-अंगसूत्र-५ (मूलं+वृत्ति:) शतक [२४], वर्ग [-], अंतर्-शतक [-], उद्देशक [२०], मूलं [७११] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र- [०५], अंगसूत्र- [०५] "भगवती मूलं एवं अभयदेवसूरि-रचिता वृत्ति: प्रत सूत्रांक [७११] व्याख्या कप्पातीतवेमाणिय ?, गोयमा ! कप्पोवगवेमाणिय नो कप्पातीतवेमा० जइ कप्पोवग जाच सहस्सारकप्रज्ञप्तिः15||प्पोवगवेमाणिपदेवेहितोवि उपवनो आणय जाव [ग्रन्थानम् १३०००] णो अशुयकप्पोषगवेमा०, सोह-का उद्देशः१७ अभयदेवी- म्मदेवे णं भंते ! जे भविए पंचिंदियतिरिक्खजोणिएसु उववज्जित्तए से णं भंते ! केवति०१, गोयमा ! १८-१९ या वृत्तिः जह० अंतोमु० उक्को पुचकोडीआउएसु सेसं जहेव पुढविक्काइयउद्देसए नवसुवि गमएसु नवरं नवसुवि गम-विकलोत्सा11८३९॥ एसु जहन्नेणं दो भवग्गहणाई उक्कोसे. अट्ट भवग्गहणाई ठिति कालादेसं च जाणिज्जा, एवं इसाणदेवेवि, दः सू दिएवं एएणं कमेणं अबसेसावि जाव सहस्सारदेवेसु उववाएयचा नवरं ओगाहणा जहा ओगाहणासंठाणे, ७०८-७११ लेस्सा सणकुमारमाहिंदवंभलोएम एगा पम्हलेस्सा सेसाणं एगा सुकलेस्सा, वेदे नो इत्विवेदगा पुरिसवेदगा णो नपुंसगवेदगा, आउअणुबंधा जहा ठितिपदे सेसं जहेव ईसाणगाणं कायसंवेहं च जाणेज्जा । सेव भंते ! सेवं भंतेत्ति ।। (सूत्रं ७११) ॥ २४ शते वीसतिमो २० ॥ RI 'उक्कोसेणं पुषकोडिआउएसुत्ति नारकाणामसङ्ग्यातवर्षायुकेष्वनुत्पादादिति, 'असुरकुमाराणं वत्तवर्य'ति पृथि वीकायिकेपूत्पद्यमानानामसुरकुमाराणां या वक्तव्यता परिमाणादिका प्रागुक्ता सेह नारकाणां पञ्चेन्द्रियतिर्यसूत्पद्यमानानां वाच्या, विशेषस्त्वयं-'नवर'मित्यादि, 'जहन्नेणं अंगुलस्स असंखेजहभाग'ति उत्पत्तिसमयापेक्षमिदम् , 'उक्कोसेणं सत्तधणूई इत्यादि, इदं च त्रयोदशप्रस्तटापेक्षं, प्रथमप्रस्तटादिषु पुनरेवम्-"रयणाइ पढमपयरे हत्थतिय देहउस्सयं भणियं । छप्पनंगुलसहा पयरे पयरे य वुडीओ ॥१॥ [रलायाः प्रथमप्रस्तटे हस्तत्रयं देहोच्छ्यो भणितः । सार्द्धषट्पश्चाशदङ्गुलवृद्धिः दीप अनुक्रम [८५६] RAKAALARAM SATAREXX अत्र मूल संपादने सूत्र-क्रमांकने एका स्खलना दृश्यते - उद्देश: २० स्थाने उद्देश: 16-१८-१९ मुद्रितं ~94 Page #95 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (०५) [भाग-११]"भगवती"-अंगसूत्र-५ (मूलं+वृत्ति:) शतक [२४], वर्ग [-], अंतर्-शतक [-], उद्देशक [२०], मूलं [७११] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र- [०५], अंगसूत्र- [०५] "भगवती मूलं एवं अभयदेवसूरि-रचिता वृत्ति: प्रत सूत्रांक [७११] प्रस्तटे प्रस्तटे॥शा] 'उक्कोसेणं पन्नरसे'त्यादि, इयं च भवधारणीयाऽवगाहनाया द्विगुणेति, समुग्घाया चत्सारित्ति वैक्रियान्ताः, 'सेसं तहेव'त्ति शेष-दृष्ट्यादिकं तथैव यथाऽसुरकुमाराणां, 'सो चेवेत्यादिर्द्वितीयो गमः, अवसेसं तहेव'त्ति यधौ|धिकगमे प्रथमे 'एवं सेसावि सत्त गमगा भाणिय'त्ति एवं-इत्यनन्तरोक्तगमद्वयक्रमण शेषा अपि सप्त गमा भणि-| तव्याः, नन्वत्रैवंकरणाद् यादृशी स्थितिजघन्योत्कृष्टभेदादाद्ययोर्गमयो रकाणामुक्ता तादृश्येव मध्यमेऽन्तिमे च गमत्रये प्राप्नोति ! इति, अत्रोच्यते-'जहेव नेरइयउद्देसए इत्यादि, यथैव नैरयिकोद्देशकेऽधिकृतशतस्य प्रथमे सक्षिपञ्चेन्द्रियतिर्यग्भिः सह नारकाणां मध्यमेषु त्रिषु गमेषु पश्चिमेषु च त्रिषु गमेषु स्थितिनानात्वं भवति तथैवेहापीतिवाक्यशेषः॥ 'सरीरोगाणा जहा ओगाहणसंठाणे'त्ति शरीरावगाहना यथा प्रज्ञापनाया एकविंशतितमे पदे, सा च सामान्यत एवं-"सत्त धणु तिन्नि रयणी छञ्चेव य अंगुलाई उच्चत्तं । पढमाए पुढवीए विउणा बिउणं च सेसासु ॥१॥” इति त्रिरक्ष्यधिकसप्तधनूंषि षट् चाङ्गलानि प्रथमायां पृथ्व्यामुच्चत्वं शेषासु द्विगुणं द्विगुणम् ॥१॥] 'तिन्नि णाणा तिन्नि, अन्नाणा नियमति द्वितीयादिषु सज्ञिभ्य एवोत्पद्यन्ते ते च त्रिज्ञानारूयज्ञाना वा नियमाद्भवन्ति, 'उक्कोसेणं छावहिं में सागरोवमाई' इत्यादि, इह भवानां कालस्य च बहुत्वं विवक्षितं, तच्च जघन्यस्थितिकत्वे नारकस्य लभ्यत इति, द्वाविं| शतिसागरोपमायुर्नारको भूत्वा पञ्चेन्द्रियतिर्यक्षु पूर्वकोट्यायुर्जातः एवं वारत्रये पट्षष्टिः सागरोपमाणि पूर्वकोटीत्रयं च | स्यात्, यदि चोत्कृष्टस्थितिखयखिंशरसागरोपमायुर्नारको भूत्वा पूर्वकोव्यायुः पञ्चेन्द्रियतिर्यक्षत्पद्यते तदा वारद्वयमेवैव-11 मुत्पत्तिः स्यात् ततश्च षट्षष्टिः सागरोपमाणि पूर्वकोटीद्वयं च स्यात् तृतीया तिर्यग्भवसम्बन्धिपूर्वकोटी न लभ्यत इति दीप अनुक्रम [८५६] CROSS-44-5 XXXF7000 ~95 Page #96 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (०५) [भाग-११]"भगवती"-अंगसूत्र-५ (मूलं+वृत्ति:) शतक [२४], वर्ग [-], अंतर्-शतक [-], उद्देशक [२०], मूलं [७११] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र- [०५], अंगसूत्र- [०५] "भगवती मूलं एवं अभयदेवसूरि-रचिता वृत्ति: प्रत सूत्रांक 592-59-१% [७११] - 9 - दीप अनुक्रम [८५६] व्याख्या-18|| नोत्कृष्टता भवानां कालस्य च स्यादिति ॥ उत्पादितो नारकेभ्यः पञ्चेन्द्रियतिर्यग्योनिका, अथ तिर्यायोनिकेभ्यस्तमुत्पाद- २४ शतके प्रज्ञप्तिः | यन्नाह-'जइ तिरिक्खेत्यादि, 'जच्चेव अप्पणो सट्ठाणे वत्तवय'त्ति यैवात्मनः-पृथिवीकायिकस्य स्वस्थाने-पृथिवीका-|| उद्देशः १७ अभयदेवी- विकलक्षणे उत्पाद्यमानस्य वक्तव्यता भणिता सैवात्रापि वाच्या, केवलं तत्र परिमाणद्वारे प्रतिसमयमसझचेया उत्पधन्त १८:१९ या वृत्तिः२/ | इत्युक्तं इह त्वेकादिरिति, एतदेवाह-'नवर'मित्यादि । तथा पृथिवीकायिकेभ्यः पृथिवीकायिकस्योत्पद्यमानस्य संवेधद्वारे || विकलोत्पा॥८४०॥ प्रथमद्वितीयचतुर्थपञ्चमगमेधूत्कर्षतोऽसङ्ख्यातानि भवग्रहणान्युक्तानि शेषेषु त्वष्टौ भवग्रहणानि इह पुनरष्टावेव नवस्व-|| |पीति । तथा 'कालादेसेणं उभयओ ठिईए करेजत्ति कालादेशेन संवेधं पृथिवीकायिकस्व सज्ञिपश्चेन्द्रियतिरश्चश्च | स्थित्या कुर्यात्, तथाहि-प्रथमे गमे 'कालादेसेणं जहन्नेणं दो अंतोमुहुत्ताई'ति पृथिवीसत्कं पञ्चेन्द्रियसत्कं चेति, उत्कर्षतोऽष्टाशीतिवर्षसहस्राणि पृथिवीसत्कानि चतस्रश्च पूर्वकोव्यः पञ्चेन्द्रियतिर्यक्सत्काः, एवं शेषगमेष्वप्यूयः संवेध टू इति, 'सवत्थ अप्पणो लद्धी भाणिय'त्ति सर्वत्राप्कायिकादिभ्यश्चतुरिन्द्रियान्तेभ्य उत्तानां पश्चेन्द्रियतिर्यक्षुत्पादे 'अप्पणो'त्ति अकायादेः सत्का लब्धिः परिमाणादिका भणितव्या, सा च प्राक्तनसूत्रेभ्योऽवगन्तव्या, अधानन्तरोक्तमेवार्थ स्फुटतरमाह-'जहेव पुढधिकाइएमु उववजमाणाण'मित्यादि, यथा पृथिवीकायिकेभ्यः पश्शेन्द्रियतिर्यक्षुत्पद्यमानानां जीवानां लम्धिरुक्ता तथैवाप्कायादिभ्यश्चतुरिन्द्रियान्तेभ्य उत्पद्यमानानां सा वाच्येति ॥ असज्ञिभ्यः पठेन्द्रियतिर्यगुत्पा ॥८४०॥ दाधिकारे-'उकोसेणं पलिओवमस्स असंखेजइभागठिईए'त्ति, अनेनासज्ञिपञ्चेन्द्रियाणामसङ्ग्यातवर्षायुष्केषु पञ्चेन्द्रियतिर्यस्त्पत्तिरुक्ता, 'अवसेसं जहेवेत्यादि, अवशेष-परिमाणादिद्वारमातं यथा पृथिवीकायिकेपूत्पद्यमानस्यासजिनः 7-2 8-0-570 अत्र मूल संपादने सूत्र-क्रमांकने एका स्खलना दृश्यते - उद्देश: २० स्थाने उद्देश: १७-१८-१९ मुद्रितं ~96~ Page #97 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (०५) [भाग-११]"भगवती"-अंगसूत्र-५ (मूलं+वृत्ति:) शतक [२४], वर्ग [-], अंतर्-शतक [-], उद्देशक [२०], मूलं [७११] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र- [०५], अंगसूत्र- [०५] "भगवती मूलं एवं अभयदेवसूरि-रचिता वृत्ति: प्रत सूत्रांक [७११] पृथिवीकायिकोदेशकेऽभिहितं तथैवासन्जिनः पञ्चेन्द्रियतिर्यक्षुत्सद्यमानस्य वाच्यमिति । 'उकोसेणं पलिओचमस्स असंकाखेजाभार्ग पुखकोडिपुहुत्तमम्भहियंति, कथम् १, असम्झी-पूर्वकोव्यायुष्कः पूर्वकोव्यायुष्केष्वेव पञ्चेन्द्रियतिर्यक्षुत्पन्न इत्येवं सप्तसु भवग्रहणेषु सप्त पूर्वकोव्यः अष्टमभवग्रहणे तु मिथुनकतिर्यक्षु पल्योपमासयेयभागप्रमाणायुष्केषूत्पन्न इति, तृतीयगमे 'उकोसेणं संखेजा उववज्जति'ति असनातवर्षायुषां पञ्चेन्द्रियतिरश्चामसजातानामभावादिति, चतुर्थगमे उकोसेणं पुवकोडिआउएसु उववज्जेजत्ति जघन्यायुरसम्झी सयातायुष्केष्वेव पञ्चेन्द्रियतिर्यसूत्पद्यत इतिकृत्वा पूर्व18 कोव्यायुष्केष्वित्युक्तम्, 'अवसेसं जहा एपस्सेत्यादि, इहावशेष-परिमाणादि एतस्य-असजितिर्यक्रपश्चेन्द्रियस्य, 'मजिझमेसु'त्ति जघन्यस्थितिकगमेषु 'एवं जहा रयणप्पभाए पुढवीएं' इत्यादि तच्च संहननोच्चत्वादि अनुबन्धसंवेधान्त, 'नवरं परिमाण मित्यादि, तबेदम्-'उकोसेणं असंखेज्जा उववज्जति'त्ति ॥ अथ सज्ञिपश्चेन्द्रियेभ्यः सम्झिपञ्चेन्द्रियतिर्यचमुत्पादयन्नाह-जह सन्नी'त्यादि, 'अवसेसं जहा चेव सन्निस्स'त्ति अवशेष-परिमाणादि यतस्यैव-सज्ञिपञ्चेन्द्रियतिरश्च इत्यर्थः, केवलं तत्रावगाहना सप्तधनुरित्यादिकोक्का इह तूत्कर्षतो योजनसहस्रमाना, सा च मत्स्यादीना. श्रियावसेयेति, एतदेवाह-'नवर'मित्यादि, 'उकोसेणं तिन्नि पलिओवमाई पुषकोडीपुत्तमभहियाईति, अस्य च भावना प्रागिवेति, 'लद्धी से जहा एयस्स चेवे'त्यादि, एतच्चैतत्सूत्रानुसारेणावगन्तव्यं 'संवेहो जहेवे'त्यादि 'एस्थ | चेव'त्ति अत्रैव पञ्चेन्द्रियतिर्यगुदेशके, स चैव-भवादेशेन जघन्यतो द्वौ भवौ उत्कृष्टतस्त्वष्ट भवाः, कालादेशेन जघन्येन द्वे अन्तर्मुहर्ते उत्कर्षतश्चतस्रः पूर्वकोव्योऽन्तर्मुहर्त्तचतुष्काधिकाः, एप जघन्यस्थितिक औधिकेष्वित्यत्र संवेधः, जघन्य RECE5CEOR दीप अनुक्रम [८५६] ~97 Page #98 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (०५) [भाग-११]"भगवती"-अंगसूत्र-५ (मूलं+वृत्ति:) शतक [२४], वर्ग [-], अंतर्-शतक [-], उद्देशक [२०], मूलं [७११] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र- [०५], अंगसूत्र- [०५] "भगवती मूलं एवं अभयदेवसूरि-रचिता वृत्ति: प्रत सूत्रांक [७११] दीप अनुक्रम [८५६] व्याख्या- स्थितिको जघन्यस्थितिकेष्वित्यत्र चान्तर्मुहत्तैः संवैधः, जघन्यस्थितिक उत्कृष्टस्थितिकेष्वित्यत्र पुनरन्तर्मुहूतः पूर्वकोटीभिश्च २४ शतके प्रज्ञप्तिः संवेध इति, नवमगमे 'नवरं परिमाण मित्यादि, तत्र परिमाणमुत्कर्षतः सङ्ग्याता उत्पद्यन्ते, अवगाहना चोत्कर्षतो | उद्देश:१७ अभयदेवीया वृत्तिः२/ 18| योजनसहस्रमिति । अथ मनुष्येभ्यस्तमुत्पादयन्नाह-'जइमणुस्सेहिंतो'इत्यादि, 'लद्धीसे तिसुवि गमएसुत्ति लब्धिः | १८-१९ परिमाणादिका 'सें तस्यासम्झिमनुष्यस्य विष्वपि गमेष्वाद्येषु यतो नवानां गंमानां मध्ये आद्या एवेह त्रयो गमाः संभवन्ति,8 दिविकलोत्पा1८४२॥ दः सू जघन्यतोऽप्युत्कर्पतोऽपि चान्तर्मुहूर्त्तस्थितिकत्वेनैकस्थितिकत्वात्तस्येति, एत्थ चेवसि अत्रैव पञ्चेन्द्रियतिर्यगुद्देशकेऽसज्ञि-18|१०८-७११ | पञ्चेन्द्रियतिर्यग्भ्यः पञ्चेन्द्रियतिर्यगुत्पादाधिकारे, 'नो असंखेलवासाउएहिंतोत्ति असङ्ख्यातवर्षायुषो मनुष्या देवेष्वेवोत्पद्यन्ते न तिर्यविति । 'लद्धी से इत्यादि, लब्धिः-परिमाणादिप्राप्तिः 'से' तस्य सजिमनुष्यस्य यथैतस्यैव-सज्ञिमनुष्यस्य पृथिवीकायिकेषुत्पद्यमानस्य प्रथमगमेऽभिहिता, सा चैवं-परिमाणतो जघन्येनको द्वौ वा उत्कर्षेण तु सङ्ख्याता एवोत्पद्यन्ते स्वभावतोऽपि सङ्गयातत्वात् सज्ञिमनुष्याणां, तथा पड्विधसंहननिन उत्कर्षतः पञ्चधनुःशतावगाहनाः पविघसंस्थानिनः पडलेश्याखिविधदृष्टयो भजनया चतुर्ज्ञानाख्यज्ञानाश्च त्रियोगा द्विविधोपयोगाश्चतु:सज्ञाश्चतुष्कषायाः। पञ्चेन्द्रियाः षट्समुद्घाताः सातासातवेदनास्त्रिविधवेदा जघन्येनान्तर्महर्चस्थितय उत्कर्षेण तु पूर्वकोव्यायुषः प्रशस्तेतरा ॥८४१॥ ध्यवसानाः स्थितिसमानानुबन्धाः, कायसंवेधस्तु भवादेशेन जघन्यतो द्वौ भवी उत्कर्षतोऽष्टी भवाः कालादेशेन तु लिखित एवास्ते १ । द्वितीयगमे 'सच्चेव वत्तवय'त्ति प्रथमगमोक्ता केवलमिह संवेधः कालादेशेन तु जघन्यतो द्वे अन्तर्मुहर्ते उत्कर्पतश्चतस्रः पूर्वकोटयश्चतुरन्तर्मुहर्ताधिकाः, तृतीयेऽप्येवं-'नवरं ओगाहणा जहन्नेणं अंगुलपुहुत्त'त्ति, अनेनेदमय-|| अत्र मूल संपादने सूत्र-क्रमांकने एका स्खलना दृश्यते - उद्देश: २० स्थाने उद्देश: १७-१८-१९ मुद्रितं ~98~ Page #99 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (०५) प्रत सूत्रांक [७११] दीप अनुक्रम [८५६] [भाग-११]“भगवती”- अंगसूत्र -५ (मूलं + वृत्तिः) शतक [२४], वर्ग [-], अंतर् शतक [ - ], उद्देशक [२०], मूलं [७११] पूज्य आगमोद्धारकश्री संशोधितः मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित.. आगमसूत्र - [०५] अंगसूत्र- [०५] "भगवती" मूलं एवं अभयदेवसूरि-रचिता वृत्तिः | सितम् - अङ्गुलपृथक्त्वाद्धीनतरशरीरो मनुष्यो नोत्कृष्टायुष्केषु तिर्यक्षूत्पद्यते, तथा 'मासपुहुत्तं'ति अनेनापि मासपृथक्त्वाद्धीनतरायुष्को मनुष्यो नोत्कृष्टस्थितिषु तिर्यक्षुत्पद्यत इत्युक्तं, 'जहा सन्निपंचिदियतिरिक्खजोणियस्स पंचिदिय- | तिरिक्खजोणिएसु उववज्रमाणस्से त्यादि, सर्वथेह समतापरिहारार्थमाह-'नवरं परिमाणमित्यादि तत्र परिमाणद्वारे | उत्कर्षतोऽसोयास्ते उत्पद्यन्ते इत्युक्तं इह तु सञ्ज्ञिमनुष्याणां सङ्ख्यत्वेन सङ्ख्या उत्पद्यन्त इति वाच्यं, संहननादिद्वाराणि तु यथा तत्रोक्तानि तथेहावगन्तव्यानि तानि चैवं तेषां पटू संहननानि जघन्योत्कर्षाभ्यामगुलासवेय भागमात्राऽवगाहना पटू संस्थानानि तिस्रो लेश्या मिथ्या दृष्टिः द्वे अज्ञाने कायरूपो योगो द्वौ उपयोगौ चतस्रः सञ्ज्ञाश्चत्वारः कषायाः पञ्चेन्द्रि याणि त्रयः समुद्धाता द्वे वेदने त्रयो वेदा जघन्योत्कर्षाभ्यामन्तर्मुहूर्त्त प्रमाणमायुरप्रशस्तान्यध्यवसायस्थानानि आयुःसमानोऽनुबन्धः, कायसंवेधस्तु भवादेशेन जघन्येन द्वे भवग्रहणे उत्कर्षतस्त्वष्टौ भवग्रहणानि कालादेशेन तु सञ्ज्ञिमनुष्य| पञ्चेन्द्रियतिर्यस्थित्यनुसारतोऽवसेय इति ॥ अथ देवेभ्यः पञ्चेन्द्रियतिर्यञ्चमुत्पादयन्नाह - 'जइ देवेही 'त्यादि, 'असुरकुमाराणं लद्धीति असुरकुमाराणां 'लब्धिः' परिमाणादिका 'एवं जाव ईसाणदेवस्स त्ति यथा पृथिवीकायिकेषु देवस्योत्पत्तिरुक्ता असुरकुमारमादावीशानकदेवं चान्ते कृत्वा एवं तस्य पश्वेन्द्रियतिर्यक्षु सा वाच्या, ईशानकान्त एव च देवः पृथिवीकायिकेषूत्पद्यत इतिकृत्वा यावदीशानकदेवस्येत्युक्तं, असुरकुमाराणां चैवं लब्धिः- एकाद्यसङ्ख्येयान्तानां तेषां पखेन्द्रियतिर्यक्षु समयेनोत्पादः, तथा संहननाभावः जघन्यतोऽङ्गलासङ्ख्येयभागमाना उत्कर्षतः सप्तहस्तमाना भवधारणीयावगाहना इतरा तु जघन्यतोऽङ्गुलसङ्ख्येयभागमाना उत्कर्षतस्तु योजनलक्षमाना संस्थानं समचतुरसं उत्तरवेक्रियापेक्षया तु Education interational For Parts Only ~99~ Page #100 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (०५) [भाग-११]"भगवती"-अंगसूत्र-५ (मूलं+वृत्ति:) शतक [२४], वर्ग [-], अंतर्-शतक [-], उद्देशक [२०], मूलं [७११] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र- [०५], अंगसूत्र- [०५] "भगवती मूलं एवं अभयदेवसूरि-रचिता वृत्ति: प्रत सूत्रांक व्याख्या-नान / नानाविधं चतस्रो लेश्यास्त्रिविधा दृष्टिः त्रीणि ज्ञानान्यवश्य अज्ञानानि च भजनया योगादीनि पञ्च पदानि प्रतीतानि समुद्प्रज्ञप्तिाद घाता आद्याः पञ्च वेदना द्विविधा वेदो नपुंसकवर्जः स्थितिर्दश वर्षसहस्राणि जघन्या इतरा तु सातिरेक सागरोपमं शेषद्वारद्वयं २४ शतक उद्देशः१७ अभयदेवी- तु प्रतीतं संवेध तु सामान्यत आह-"भवादेसेणं सवत्थेत्यादि । नागकुमारादिवक्तव्यता तु सूत्रानुसारेणोपपुग्य वाच्या, 151१८-१९ या वृत्तिः२/8 ओगाहणा जहा ओगाहणासंठाणे'त्ति अवगाहना यथाऽवगाहनासंस्थाने प्रज्ञापनाया एकविंशतितमे पदे, तत्र चैव ॥८४२॥ देवानामवगाहना-"भवणवणजोइसोहम्मीसाणे सत्त हुंति रयणीओ।एकेकहाणि सेसे दुदुगे य दुगे चउके य॥१॥" इत्यादि SITE भवनपतिवानमन्तरज्योतिष्कसौधर्मेशानेषु सप्त भवन्ति रलयः। एकैकरनिहानिः शेषेषु योर्द्वयोश्च द्वयोश्चतुष्के च ॥१॥]||१०८-७११ | 'जहा ठितिपए'त्ति प्रज्ञापनायाश्चतुर्थपदे स्थितिश्च प्रतीतैवेति ॥ चतुर्विंशतितमशते विंशतितमः ॥२४-२०॥ [७११] दीप अनुक्रम [८५६] अथैकविंशतितमे किश्चिल्लिख्यते8 मणुस्सा ण भंते ! कओहितो उवव. किनेरइएहिंतो उवव.जाव देवेहिंतो उवव., गोयमाणेरह एहितोवि उवव० जाव देवेहितोवि उव०, एवं उबबाओ जहा पंचिंदियतिरिक्खजोणिउद्देसए जाव तमापुटविनेरइएहितोषि उववज्जति णो अहेसत्तमपुढविनेरहएहितो उवय, रयणप्पभपुढविनेरहए णं भंते । जे भविए मणुस्सेसु उवव से गंभंते ! केवतिकाल.,गोयमा ! जह० मासपुहत्तहितीएम उकोसेणं पुषकोडी ६ आउएसु अवसेसा बत्तवया जहा पंचिंदियतिरिक्खजो उपवजंतस्स तहेव नवरं परिमाणे जहएको वा दोवा ८४२॥ का अत्र मूल संपादने सूत्र-क्रमांकने एका स्खलना दृश्यते - उद्देश: २० स्थाने उद्देश: १७-१८-१९ मुद्रितं अत्र चतुर्विंशतितमे शतके विंशतितमः उद्देशकः परिसमाप्त: अथ चतुर्विंशतितमे शतके एकविंशति: उद्देशक: आरभ्यते ~100 Page #101 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (०५) [भाग-११]"भगवती"-अंगसूत्र-५ (मूलं+वृत्ति:) शतक [२४], वर्ग [-], अंतर्-शतक [-], उद्देशक [२१], मूलं [७१२] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र- [०५], अंगसूत्र- [०५] "भगवती मूलं एवं अभयदेवसूरि-रचिता वृत्ति: प्रत सूत्रांक [७१२] ROSAREERSARASANSACT दीप अनुक्रम [८५७] तिन्नि वा उक्कोसेणं संखेजा उववज्जंति, जहा तहिं अंतोमुत्तेहिं तहा इहं मासपुहुत्तेहिं संवेहं करेजा सेसं येव ९॥ जहा रपणप्पभाए पसबया तहा सकरप्पभाएवि वसवया नवरं जहनेणं पासपुहसहिइएसु उद्यो सेणं पुवकोडि, ओगाहणा लेस्साणाणहितिअणुबंधसंवेहं णाणत्तं च जाणेजा जहेव तिरिक्खजोणियउद्देसए ठा एवं जाव समापुढपिनेरइए ९॥जइ तिरिक्खजोणिएहितो उपवजंति किं एगिदियतिरिक्खजोणिपहिंतो |उवव० जाव पंचिंदियतिरिक्खजोणिएहिं उबव०१, गोयमा ! एगिदियतिरिक्खजोणिए भेदो जहा पंचिंदियतिरिक्खजोणिउद्देसए नवरं तेउवाऊ पडिसेहेयबा, सेसं तं चेव जाब पुढधिकाइए णं भंते ! जे भविए मणुस्सेसु उववजित्तए से णं भंते ! केवति. ?, गोयमा ! जहन्नेणं अंतोमुहुत्तहितिएसु उक्कोसेणं पुषकोडीआउ-18 एसु उवव०, ते णं भंते ! जीचा एवं जच्चेव पंचिंदियतिरिक्वजोणिएसु उववजमाणस्स पुदविकाइयस्स बत्तखया सा चेव इहवि उवबजमाणस्स भाणियचा णवसुवि गमएसु, नवरं ततियण्डणवमेसु गमएसु परिमाणं | जहनेणं एको वा दो वा तिन्नि वा उकोसेणं संखेजा उवव०, जाहे अप्पणा जहन्नकालहितिओ भवति ताहे पढमगमए अजवसाणा पसत्याधि अप्पसस्थावि वितियगमए अप्पसत्था ततियगमए पसत्था भवंति सेसं तं चेव निरवसेसं९॥जइ आउकाइए एवं आउक्काइयाणचि, एवं वणस्सइकाइयाणवि, एवं जाव चउरिदिया-| णवि, असन्निपंचिंदियतिरिक्खजोणियसन्निपंचिंदियतिरिक्खजोणियअसन्निमणुस्ससन्निमणुस्साण य एते सवेवि जहा पंचिंदियतिरिक्खजोणियउसए तहेब भाणियबा, नवरं एयाणि चेव परिमाणअज्झवसाणणा RASRACHAR ~101 Page #102 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (०५) [भाग-११]"भगवती"-अंगसूत्र-५ (मूलं+वृत्ति:) शतक [२४], वर्ग [-], अंतर्-शतक [-], उद्देशक [२१], मूलं [७१२] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र- [०५], अंगसूत्र- [०५] "भगवती मूलं एवं अभयदेवसूरि-रचिता वृत्ति: प्रत सूत्रांक [७१२] दीप व्याख्या-18||णत्ताणि जाणिज्जा पुढविकाइयस्स एस्थ चेच उद्देसए भणियाणि सेसं तहेव निरवसेसं ॥ जइ देवेहिंतो||2|| २४ शतके प्रज्ञप्तिः उपव०किं भवणवासिदेवेहिंतो उवव० वाणमंतर जोइसिय० बेमाणियदेवहितो उपच०१, गोयमा।||उद्देशः२१ अभयदेवी भवणवासी जाव घेमाणिय०, जइ भवण किं असुरजाव धणिय, गोयमा ! असुर जाव थणिय०, असुरया वृत्तिः | कुमारे णं भंते ! जे भविए मणुस्सेसु उवव० से गं भंते ! केवति?, गोयमा ! जह० मासपुहत्तद्वितिएम दःसू७१२ दाउकोसेणं पुवकोडिआउएसु उवव०, एवं जच्चेव पंचिंदियतिरिक्खजोणिउद्देसए बत्तवया सञ्चेव एत्थवि भाणि यवा, नवरं जहा तहिं जहन्नगं अंतोमुत्तहितीएसु तहा इहं मासपुहुत्तहिईएसु, परिमाणं जहन्नेणं एको वा दो वा तिन्नि वा उक्कोसेणं संखेजा उववजंति, सेसं तं चेच, एवं जाव ईसाणदेवोत्ति, एयाणि चेव णाणत्ताणि | सर्णकुमारादीया जाव सहस्सारोत्ति जहेव पंचिंदियतिरिक्खजोणिउद्देसए, नवरं परिमाणं जह. एको वा दो वा तिन्नि वा उफोसेणं संखेजा उववज्जंति, उववाओ जहन्नेणं पासपुहत्तहितिएमु उन्कोसेणं पुचकोडीआउएम उवव०, सेसं तं व संवेहं वासपहसं पुषकोडीसु करेज्जा ।। सर्णकुमारे ठिती चउगुणिया अट्ठावीसं सागरो-| विचमा भवंति, माहिंदे ताणि चेव सातिरेगाणि, घम्हलोए चत्तालीसं लंतए छप्पन महामुके अट्ठसहि सहस्सारे || INथावत्तरि सागरोवमाई एसा उफोसा ठिती भणियबा जहन्नट्ठितिपि चउ गुणेजा ९॥ आणयदेवे गं भंते ! ॥८४३॥ जे भविए मणुस्सेसु उववजित्तए से णं भंते ! केवति०१, गोयमा ! जहन्नेणं वासपुहुत्तहितिएसु उवव० को-12 | सेणं पुषकोडीठितीएसु, ते णं भंते । एवं जहेच सहस्सारदेवाणं वत्तषया नवरं ओगाहणा ठिई अणुषंधी RECENTER अनुक्रम [८५७] weredturary.com ~1024 Page #103 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (०५) [भाग-११]"भगवती"-अंगसूत्र-५ (मूलं+वृत्ति:) शतक [२४], वर्ग [-], अंतर्-शतक [-], उद्देशक [२१], मूलं [७१२] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र- [०५], अंगसूत्र- [०५] "भगवती मूलं एवं अभयदेवसूरि-रचिता वृत्ति: प्रत सूत्रांक [७१२] दीप अनुक्रम [८५७] य जाणेजा, सेसं तं चेव, भवादेसेणं जहन्नेणं दो भवग्गहणाई उक्कोसेणं छ भवग्गहणाई, कालादेसेणं जहनेणं अट्ठारस सागरोवमाई वासपुहुत्तमम्भहियाई उक्को० सत्तावन्नं सागरोवमाईतिहिं पुचकोडीहिं अभहियाइं एवतियं कालं, एवं णववि गमा, नवरं ठिति अणुबंधं संवेहं च जाणेजा,- एवं जाव अक्षुयदेवो, नवर ठिति अणुबंधं संवेहं च जाणेजा, पाणयदेवस्स ठिती तिगुणिया सढि सागरोवमाई, आरणगस्स तेवहि सागरोवमाई, अनुपदेवस्स छावढि सागरोवमाइं । जइ कप्पातीतवेमाणियदेवेहिंतो उवव०किंगेवेजकप्पातीत. अणुत्तरोचवातियकप्पातीत०, गोयमा ! गेवेज अणुत्तरोववा०, जइ गेवेज.किं हिटिमरगेविजगकप्पातीतजाव उवरिमरगेवेज, गोयमा ! हिडिमरगेवेजजाब उवरिम २, गेवेजदेवे भंते ! जे भविए |मणुस्सेसु उववज्जित्तए से णं भंते ! केवतिका०१, गोयमा ! जह• वासपुहुत्तठितीएसु उकोसेणं पुचकोडी अवसेसं जहा आणयदेवस्सं वत्तवया नवरं ओगाहणा. गो! एगे भवधारणिज्जे सरीरए से जहन्नेणं अंगुलस्स असंखेजइभार्ग उकोसेणं दो रयणीओ, संठाणं, गो! एगे भवधारणिज्जे सरीरे समचउरंससंठिए प०, |पंच समुग्घाया पं०-वेदणासमु० जाव लेयगसमु०, णो चेव णं वेउधियतेयगसमुग्घाएहिंतो समोहणिसु चा समोहणंति वा समोहणिस्संति वा, ठिती अणुबंधो जहनेणं बावीसं सागरोवमाई उको एकतीसं सागरोवमाई, सेसं २०, कालादे० जद्द याबीसं सा. वासपुहत्तमभ० उक्को तेणउर्ति सागरोवमाई तिहिं | पुबकोडीहिं अम्भहियाई एवतियं, एवं सेसेसुवि अहगमएसु नवरं ठिती संवेहं च जाणे० ९॥जह अणुत्त ~103 Page #104 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (०५) [भाग-११]"भगवती"-अंगसूत्र-५ (मूलं+वृत्ति:) शतक [२४], वर्ग [-], अंतर्-शतक [-], उद्देशक [२१], मूलं [७१२] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र- [०५], अंगसूत्र- [०५] "भगवती मूलं एवं अभयदेवसूरि-रचिता वृत्ति: प्रत सूत्रांक [७१२] दीप अनुक्रम [८५७] व्याख्या-राववाच्या रोवाइयकप्पातीत'माणिक किं विजयअणुसरोववाइय० वेजयंतअणुसरोववातिय. जाव सबसिद्ध०, २४ शतके प्रज्ञप्तिः गोयमा! विजयअणुसरोववातियजाव सबढसिद्धअणुत्सरोववातिय, विजयवेजयंतजयंतअपराजियदेचे उद्देशा अभयदेवी- भंते ! जे भविए मणुस्सेसु उवव० सेणं भंते ! केवति एवं जहेव गेबेजदेवाणं नवरं ओगाहणा जह० अंगु- मनुष्योत्पाया वृत्तिः२ लस्स असंभाग कोसेणं एगा रपणी. सम्मदिट्ठी णो मिच्छदिट्ठी णो सम्मामिच्छदिट्टी, णाणीणो अन्नाणी दासू७१२ ॥८४४॥ नियम तिन्नाणी तं-आभिणियोहिय० सुय० ओहिणाणी, ठिती जहन्नेणं एकतीसं सागरोवमाई उक्को तेसीसं सागरोवमाई, सेसं तहेव, भवादे जहदो भवग्गहणाई उक्को चत्तारि भवग्गहणाई, कालादे जह. एकतीसं सागरोवमाई पासपुहुत्तमभहियाई उकोसेणं छावद्धि सागरोवमाइं दोहिं पुषकोडीहिं अम्भ-|| रहियाई एवतियं, एवं सेसावि अट्ट गमगा भाणियबा नवरं ठिति अणुबंध संवेधं च जाणेज्जा सेसं एवं चेव ॥ सबसिद्धगदेवे णं भंते ! जे भविए मणुस्सेसु उववजित्तए सा चेच विजयादिदेववत्सषया भाणियवा णवरं & ठिती अजहरमणुक्कोसेणं तेत्तीसं सागरोवमाई एवं अणुबंधोवि, सेसं तं चेव, भवादेसेणं दो भवग्गहणाई कालादेसेणं जहनेणं तेत्तीस सागरोचमाई बासपुहत्तमभहियाई उकोसेणं तेत्तीसं सागरोवमाई पुषकोडीए| अभहियाई एवतियं०१सो चेव जहनकालहितीएसु उववन्नो एस चेव वत्तबया नवरं कालादेसेणं जहनेणं है है तेत्तीसं सागरोवमाई चासपुहुत्समन्महियाइं उक्कोसेणवितेत्तीसं सागरोवमाई वासपुहुत्तमन्भहियाई एवतियं. ६४४॥ सो चेव उकोसकालहितीएसु उपवनो एस चेव वत्सहया, नवरं कालादेसेणं जहनेणं तेत्तीसं सागरोष ~104 Page #105 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (०५) [भाग-११]"भगवती"-अंगसूत्र-५ (मूलं+वृत्ति:) शतक [२४], वर्ग [-], अंतर्-शतक [-], उद्देशक [२१], मूलं [७१२] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र- [०५], अंगसूत्र- [०५] "भगवती मूलं एवं अभयदेवसूरि-रचिता वृत्ति: प्रत सूत्रांक RABAR [७१२] माई पुषकोडीए अमहियाई, उनोसेणवि तेतीसं सागरोवमाई पुचकोडीए अब्भहियाई, एकतिपं०३, एते येव लिनि गमगा सेसा न भण्ांति । सेवं भंते ! २त्ति ॥ (सूत्रं ७१२)॥२४-२१॥ 'जहन्नेणं मासपुहुत्तलिइएसुत्ति अनेनेदमुक्तं-रत्नप्रभानारका जघन्यं मनुष्यायुर्वनन्तो मासपृथक्त्वाधीनतरं न पति तथाविधपरिणामाभावादिति, एवमन्यत्रापि कारणं वाच्यं, तथा परिमाणद्वारे 'उकोसेणं संखेज्जा उबवजंतित्ति || नारकाणां समूर्षिकमेषु मनुष्येपूत्पादाभावाद् गर्भजानां च समातत्वात्सङ्ख्याता एव ते उत्पद्यन्त इति, 'जहा तहिं अंतो मुहत्तेहिं सहा इहं मासपुहुत्तेहिं संवेहं करेजत्ति यथा तत्र-पञ्चेन्द्रियतिर्यगुद्देशके रलप्रभानारकेभ्य उत्पद्यमानानां पञ्चेन्द्रियतिरश्चां जघन्यतोऽन्तर्मुहुर्तस्थितिकत्वादन्तर्मुहूतैः संवेधः कृतस्तथेह मनुष्योद्देशके मनुष्याणां जघन्यस्थितिमाश्रित्य मासपृथक्त्वैः संवेधः कार्य इति भावः, तथाहि-कालादेसेणं जहन्नेणं दस वाससहस्साई मासपुहुत्तमम्भहियाई" इत्यादि । शर्कराप्रभादिवतव्यता तु पञ्चेन्द्रियतिर्यगुदेशकानुसारेणावसेयेति ॥ अथ तिर्यग्भ्यो मनुष्यमुत्पादयन्नाह 'जइ तिरिक्खे त्वादि, इह पृधिषीकायादुत्पद्यमानस्य पञ्चेन्द्रियतिरश्चो या वक्तव्यतोक्ता सैव तत उत्पद्यमानस्य मनुष्यहैवापि, एतदेवाह-एवं जवे'त्यादि, विशेष पुनराह-'नवरं तईए'इत्यादि तत्र तृतीये औषिकेभ्यः पृधियीकायिकेभ्य उत्कृष्टस्थितिषु मनुष्येषु ये उत्पद्यन्ते ते उत्कृष्टतः सयाता एव भवन्ति, यद्यपि मनुष्याः संमूछिमसङ्ग्रहावसङ्ग्याता दि भवन्ति तथाऽप्युत्कृष्टस्थितयः पूर्वकोव्यायुषः सहयाता एक पश्चेन्द्रियतिवश्वस्त्वसवाता अपि भवन्तीति, एवं पठे नवमे चेति । 'माहे अप्पणेत्यादि, अधमर्थ-मध्यमपमानां प्रथमगमे भीषिकेत्त्पद्यमानतावामित्यर्थः अभ्यषसानानि प्रश दीप अनुक्रम [८५७] ~105 Page #106 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (०५) [भाग-११]"भगवती"-अंगसूत्र-५ (मूलं+वृत्ति:) शतक [२४], वर्ग [-], अंतर्-शतक [-], उद्देशक [२१], मूलं [७१२] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र- [०५], अंगसूत्र- [०५] "भगवती मूलं एवं अभयदेवसूरि-रचिता वृत्ति: प्रत सूत्रांक [७१२] दीप अनुक्रम [८५७] व्याख्या । स्तानि उत्कृष्टस्थितिकत्वेनोत्पत्तौ अप्रशस्तानि च जघन्यस्थितिकत्वेनोत्पत्ती, 'बीयगमए'त्ति जघन्यस्थितिकस्य जघन्यस्थि- २४ शतके प्रज्ञप्तिः तित्पत्तावप्रशस्तानि, प्रशस्ताध्यवसानेभ्यो जघन्यस्थितिकत्वेनानुत्पत्तेरिति, एवं तृतीयोऽपि वाच्यः । अप्कायादिभ्यच उद्देशः २१ अभयदेवी- तदुत्पादमतिदेशेनाह-एवं आउक्काइयाणवी'त्यादि ॥ देवाधिकारे–'एवं जाव ईसाणो देवोति यथाऽसुरकुमारा या वृत्तिः२/2 मनुष्येषु पञ्चेन्द्रियतिर्यग्योनिकोद्देशकवक्तव्यताऽतिदेशेनोत्पादिता एवं नागकुमारादय ईशानान्ता उत्पादनीयाः, समान दःसू७१२ ॥८४५॥ वक्तव्यत्वात् , यथा च तत्र जघन्यस्थितेः परिमाणस्य च नानात्वमुक्तं तथैतेष्वप्यत एवाह-एयाणि चेव नाणत्ताणि' त्ति सनत्कुमारादीनां तु वक्तव्यतायां विशेषोऽस्तीति तान् भेदेन दर्शयति-'सर्णकुमारे त्यादि, एसा उक्कोसा ठिई| भणियञ्चति यदा औषिकेभ्य उत्कृष्टस्थितिकेभ्यश्च देवेभ्य औधिकादिमनुष्येषूत्पद्यते तदोत्कष्टा स्थितिर्भवति सा चोत्कृटसंवेधविवक्षायां चतुर्भिर्मनुष्यभवैः क्रमेणान्तरिता क्रियते, ततश्च सनत्कुमारदेवानामष्टाविंशत्यादिसागरोपममाना भवति । सप्तादिसागरोपमप्रमाणत्वात्तस्या इति, यदा पुनर्जघन्यस्थितिकदेवेभ्य औधिकादिमनुष्येषूत्पद्यते तदा जघन्यस्थितिर्भवति, सा च तथैव चतुर्गुणिता सनत्कुमारादिसागरोपममाना भवति व्यादिसागरोपमभानत्वात्तस्या इति ॥ 'आणयदेवे - |मित्यादि, 'उक्कोसेणं छम्भवग्गहणाईति त्रीणि दैविकानि त्रीण्येव क्रमेण मनुष्यसत्कानीत्येवं षट्, 'कालादेसेणं | जहन्नेणं अट्ठारस सागरोचमाईति आनतदेवलोके जघन्यस्थितेरेवंभूतत्वात् , 'उकोसेणं सत्तावन्नं सागरोवमाईति || *आनते उत्कृष्टस्थितेरेकोनविंशतिसागरोपमप्रमाणाया भवत्रयगणनेन सप्तपश्चाशत्सागरोपमाणि भवन्तीति ।। प्रैवेयकाधि कारे 'एगे भवधारणिजे सरीरे'त्ति कल्पातीतदेवानामुत्तरवैक्रियं नास्तीत्यर्थः, 'नो चेव णं वेउविए'त्यादि, गैवेयक weredturary.com ~106~ Page #107 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (०५) प्रत सूत्रांक [७१२] दीप अनुक्रम [८५७ ] [भाग-११]“भगवती”- अंगसूत्र -५ (मूलं + वृत्तिः) शतक [२४], वर्ग [-], अंतर् शतक [ - ], उद्देशक [२१], मूलं [७१२] पूज्य आगमोद्धारकश्री संशोधितः मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित.. आगमसूत्र - [०५] अंगसूत्र- [०५] "भगवती" मूलं एवं अभयदेवसूरि-रचिता वृत्तिः | देवानामाद्याः पञ्च समुद्घाताः लब्ध्यपेक्षया संभवन्ति, केवलं वैक्रियतैजसाभ्यां न ते समुद्घातं कृतवन्तः कुर्वन्ति करिव्यन्ति वा, प्रयोजनाभावादित्यर्थः, 'जहनेणं बावीसं सागरोवमाई'ति प्रथमत्रैवेयके जघन्येन द्वाविंशतिस्तेषां भवति 'उक्कोसेणं एकतीसं 'ति नवमत्रैवेयके उत्कर्षत एकत्रिंशत्तानीति, 'उक्कोसेणं तेणउई सागरोवमाहं तिहिं पुचकोडीहिं | अन्भहियाई ति इहोत्कर्षतः षड् भवग्रहणानि ततश्च त्रिषु देवभवग्रहणेषूत्कृष्टस्थितिषु तिसृभिः सागरोपमाणामेकत्रिंशद्भिस्त्रिनवतिस्तेषां स्यात् त्रिभिश्चोत्कृष्टमनुष्यजन्मभिस्तिस्रः पूर्वकोव्यो भवन्तीति ॥ सर्वार्थसिद्धिकदेवाधिकारे आद्या एव त्रयो गमा भवन्ति सर्वार्थसिद्धिकदेवानां जघन्यस्थितेरभावान्मध्यमं गमत्रयं न भवति उत्कृष्टस्थितेरभावाच्चान्तिममिति ॥ चतुर्विंशतितमशते एकविंशतितमः ॥ २४-२१ ॥ वाणमन्तराणं कओहिंतो उबव० किं नेरइएहिंतो उवब० तिरिक्ख० एवं जहेब नागकुमारउद्देसए असन्नी निरवसेसं । जइ सन्निपचिदियजाव असंखेज्जवासाज्यसन्निपंचिंदिय० जे भविए वाणमंतर० से णं भंते! केवति० १, गोयमा ! जहन्नेणं दसवाससहस्सठितीएस उक्कोसेणं पलिओवमटितिएस सेसं तं चैव जहा नाग| कुमारउद्देसए जाब कालादेसेणं जह० सातिरेगा पुचकोडी दसहिं वाससहस्सेहिं अम्भहिया उक्कोसेणं चत्तारि पलिओ माई एवतियं १, सो चैव जहन्नका लट्ठितिएस उचवन्नो जहेब नागकुमाराणं वितियगमे वत्तवया २, सो चेव उक्कोसकालट्ठितिएसु उबव० जह० पलिओयमद्वितीएस उक्कोसेणवि पलिओषमट्टितिएस एस चैव वत्त Education International अत्र चतुर्विंशतितमे शतके एकविंशतितमः उद्देशकः परिसमाप्तः अथ चतुर्विंशतितमे शतके द्वाविंशतितमं उद्देशक: आरभ्यते For Parts Only ~ 107~ Page #108 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (०५) [भाग-११]"भगवती"-अंगसूत्र-५ (मूलं+वृत्ति:) शतक [२४], वर्ग [-], अंतर्-शतक [-], उद्देशक [२२], मूलं [७१३] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र- [०५], अंगसूत्र- [०५] "भगवती मूलं एवं अभयदेवसूरि-रचिता वृत्ति: ** * प्रत सूत्रांक [७१३] व्याख्या- बया नवरं ठिती से जह. पलिओवम उकोसे तिन्नि पलिओचमाई संवेहो जह० दो पलिओवमाई उको०-२४ शतके प्रज्ञप्तिः चत्तारि पलिओवमाई एवतियं ३, मज्झिमगमगा तिन्निवि जहेव नागकुमारेसु पच्छिमेसु तिसु गमएसुतं चेव उद्देशः २२ अभयदेवी जहा नागकुमारुहेसए नवरं ठिति संवेहं च जाणेज्जा, संखेजवासाउय तहेव नवरं ठिती अणुपंधो संवेहं च व्यन्तरोत्पायावृत्तिः२४ | उभो ठितीएसु जाणेजा, जइ मणुस्स० असंखेजवासाउयाणं जहेब नागकुमाराणं उद्देसे तहेब बत्तबमा दासू७१३ ॥८४६॥ नवरं तइयममए ठिती जहन्नेणं पलिओवमं अकोसेणं तिनि पलिओवमाई ओगाहणा जहनेणं गाउयं उकोसेणं | तिमि गाउयाई सेसं तहेव संवेहो से जहा एस्थ चेच उद्देसए असंखेनवासाउचससिपंचिद्रियाण, संखेजवासाउयसन्निमणुस्से जहेव नागकुमारुहेसए नवरं नाणमंतरे ठिति संवेहं च जाणेजा । सेवं भंते ।२ ति||81 (सूत्रं ७१३)॥ २४-२२ द्वाविंशतिसमे किबिलियते-सत्रासमालबायुसग्निपञ्चेन्द्रियाधिकारे- 'उकोसेणं पसारि पलिलोषमाति विपल्योपमायु:सज्ञिपचेन्द्रियतिर्यक् पस्योपमायुर्वन्तरी जात इत्येवं चत्वारि पल्योपमानि, द्वितीयगमे । 'अहेच नागकुमाराचं बीयगमे बत्तसिसा च प्रथमगमसमानैव नवरं जपन्यत उत्कर्षतच स्थितिर्दशवर्षसहस्राणि, संवेधस्तु 'कालादेसेणं जहणं सासिरेगा पुषकोडी दसवाससहस्सेहिं भन्भहिया उकोसेणं तिमि पलिओ We८४६॥ जाबमाई दसहिं बासहस्सेहिं सम्मशियाई'ति, सूतीये गमे 'ठिई से जहणं पलिभोवमति वपि सातिरेका पूर्वकोटी 31 बघन्यतोत्रापासवर्षायुष तिरबामापुरति तथाऽपीह पस्योपममुकं पस्योषमाधुकण्वन्तरेषत्पादयिष्यमाणत्वाद दीप अनुक्रम [८५८] ***** ~108~ Page #109 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (०५) [भाग-११]"भगवती"-अंगसूत्र-५ (मूलं+वृत्ति:) शतक [२४], वर्ग [-], अंतर्-शतक [-], उद्देशक [२२], मूलं [७१३] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र- [०५], अंगसूत्र- [०५] "भगवती मूलं एवं अभयदेवसूरि-रचिता वृत्ति: प्रत सूत्रांक [७१३] दीप अनुक्रम [८५८] यतोऽसङ्ख्यातवर्षायुः स्वायुषो वृहत्तरायुष्केषु देवेषु नोत्पद्यते एतच्च प्रागुक्तमेवेति । 'ओगाहणा जहन्नेणं गाउय'ति येषां 2 पल्योपममानायुस्तेषामवगाहना गव्यूतं ते च सुषमदुष्षमायामिति ॥ चतुर्विंशतितमशते द्वाविंशतितमः ॥ २४-२२ ॥ त्रयोविंशतितमोद्देशके किञ्चिल्लिख्यतेजोइसिया णं भंतेकओहिंतो उववज्जति किनेरइएभेदो जाव सन्निपंचिंदियतिरिक्खजोणिएहितो उवव.नो असन्निपंचिंदियतिरिक्त, जह सन्नि० किं संखेज. असंखेन?, गोयमा! संखेजवासाउय० | असंखेन्जवासाउय०, सन्निपंचिंदियतिरिक्खजोणिए णं भंते ! जे भविए जोतिसिएसु उवव० से णं भंते ।। साकेवति०, गोयमा । जहन्नेणं अट्ठभागपलिओवमट्ठितिएसु उकोसेणं पलिओवमवाससयसहस्सहितिएमु॥४॥ | उवव०, अवसेसं जहा असुरकुमारुद्देसए नवरं ठिती जहन्नेणं अट्ठभागपलिओवमाइंउको तिन्नि पलिओवमाई, एवं अणुबंधोवि सेसं तहेव, नवरं कालादे०जह दो अट्ठभागपलि ओवमाई उको चत्तारि पलिओवमाई वाससयसहस्समन्भहियाइं एवतियं १, सो चेव जहन्नकालहितीएसु उववन्नो जहरू अट्ठभागपलिओवमहिति|| एमु उक्को अट्ठभागपलिओवमहितिएस एस चेव वत्तवया नवरं कालादेसं जाणे०२, सो चेव उक्कोसकालठिहएसु उवव० एस चेव वत्तवया णवरं ठिती जहरू पलिओवमं वाससयसहस्समभहियं उको तिन्नि पलिओवमाई, एवं अणुबंधोवि, कालादे०जह दो पलिओयमाई दोहिं वाससयसहस्से हिमभहि. उक्को - -- अत्र चतुर्विंशतितमे शतके द्वाविंशतितम: उद्देशक: परिसमाप्त: अथ चतुर्विंशतितमे शतके त्रयोविंशतितमं उद्देशक: आरभ्यते ~109. Page #110 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (०५) प्रत सूत्रांक [७१४] दीप अनुक्रम [८५९] [भाग-११]“भगवती”- अंगसूत्र -५ (मूलं + वृत्तिः) शतक [२४], वर्ग [-], अंतर् शतक [ - ], उद्देशक [२३], मूलं [ ७१४] पूज्य आगमोद्धारकश्री संशोधितः मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित.. आगमसूत्र- [०५] अंगसूत्र- [ ०५] "भगवती" मूलं एवं अभयदेवसूरि-रचिता वृत्तिः व्याख्या - प्रज्ञः 8 अभयदेवीया वृत्तिः २ ॥८४७॥ चन्ता० पलि० वाससयस हस्तम० ३ सो चेव अप्पणा जहन्नकालद्वितीओ जाओ जहन्नेणं अट्टभागपलिओमहितीस उववन्नो उक्कोसेणवि अहभागपलिओ मट्टितीएसु उबवन्नो, ते णं भंते ! जीवा एस थेव वन्तइया नवरं ओगाहणा जहस्रेणं धणुहपुहुतं उक्को० सातिरेगाई अट्ठारसधणुसयाई ठिती जहन्ने० अहभागपलिओवमं उक्को० अट्टभागपलिओवमं, एवं अणुबंधोऽवि सेसं तहेब, कालादे० जह० दो अट्ठभागपलिओ माई उक्को० दो अनुभाग पलिओ माई एवतियं जहन्नकालद्वितियस्स एस चैव एक्को गमो ६, सो चेव अप्पणा उक्को| सकालट्ठितिओ जाओ सा चैव ओहिया वत्तवया नवरं ठिती जहन्नेणं तिन्नि पलि० उक्को० तिन्नि पलिओव माई एवं अणुबंधोवि, सेसं तं चेथ, एवं पच्छिमा तिनि गमगा णेयवा नवरं ठिति संवेहं च जाणेज्जा, एते सन्त गमगा । जइ संखेज्जवासाज्यसन्निपंचिंदिय० संखेज्जवासाख्याणं जहेव असुरकुमारेसु उवबजमाणाणं तहेव नववि गमा भाणिया नवरं जोतिसिपठिति संवेहं च जाणेज्जा सेसं तहेब निरवसेसं भाणियबं, ज‍ मणुस्सेहिंतो उथव० भेदो तहेब जाव असंखेज्जवासाज्यसन्निमणुस्से णं भंते ! जे भविए जोइसिएस उचवजित्तए से णं भंते । एवं जहा असंखेज्जवासाज्यसन्निपंचिंदियस्स जोइसिएस चेव उववजमाणस्स सत्त गमगा तहेव मणुस्साणवि नवरं ओगाहणाविसेसो पढमेसु तिसु गमएसु ओगाहणा जहन्नेणं सातिरेगाई नव धणुसयाई उक्को० तिनि गाउयाएं मज्झिमगमए जह० सातिरेगाई नव धणुसयाई उक्कोसेणवि सातिरेगाई नव धणुसयाई, पच्छिमेसु तिसु गमएस जह० तिन्नि गाउयाई उकोसे० तिन्नि गाउयाई सेसं तहेब निरवसेसं Educatin internation For Park sta Use Only ~ 110~ २४ शतके उद्देशः २३ ज्योतिष्कोत्पादः सू ७१४ ॥८४७॥ wor Page #111 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (०५) [भाग-११]"भगवती"-अंगसूत्र-५ (मूलं+वृत्ति:) शतक [२४], वर्ग [-], अंतर्-शतक [-], उद्देशक [२३], मूलं [७१४] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र- [०५], अंगसूत्र- [०५] "भगवती मूलं एवं अभयदेवसूरि-रचिता वृत्ति: प्रत सूत्रांक [७१४] जाव संवेहोत्ति, जइ संखेजवासाउयसन्निमणुस्से० संखेजवासाउयाणं जहेय असुरकुमारेसु उववजमाणाणं तहेच नव गमगा भाणियबा, नवरं जोतिसियठिति संवेहं च जाणेजा, सेसं तं चेव निरवसेसं । सेवं ४ भंते !२त्ति ॥ (सूत्रं ७१४) ॥२४-२३ ॥ 'जहन्नेणं दो अट्ठभागपलिओवमाईति द्वौ पल्योपमाष्टभागावित्यर्थः तत्रैकोऽसङ्ग्यातायुष्कसम्बन्धी द्वितीयस्तु तितारकज्योतिष्कसम्बन्धीति, 'उक्कोसेणं चत्तारि पलिओवमाई वाससयसहस्समभहियाइति त्रीण्यससातायु: सत्कानि एकं च सातिरेकं चन्द्रविमानज्योतिष्कसत्कमिति, तृतीयगमे 'ठिई जहन्नेणं पलिओवमं वाससयसहस्समभहियंति यद्यप्यसलातवर्षायुषां सातिरेका पूर्वकोटी जघन्यतः स्थितिर्भवति तथाऽपीह पल्योपमं वर्षलक्षाभ्यधिकमुक्तं, एतत्प्रमाणायुष्केषु ज्योतिष्केपूरपरस्यमानत्वाद्, यतोऽसक्यातवर्षायुः स्वायुषो बृहत्तरायुष्केषु देवेषु नोत्पद्यते, एतच्च प्रागुपदर्शितमेव, चतुर्थे गमे जघन्यकालस्थितिकोऽसङ्ख्यातवर्षायुरौषिकेषु ज्योतिष्केषूत्पन्नः, तत्र चासझवातायुषो यद्यपि पल्योपमा टभागाद्धीनतरमपि जघन्यत आयुष्कं भवति तथाऽपि ज्योतिषां ततो हीनतरं नास्ति, स्वायुस्तुल्यायुर्वन्धकाश्चोत्कर्षतोड-12 ६ सयातवर्षायुष इतीह जघन्यस्थितिकास्ते पल्योपमाष्टभागायुपो भवन्ति, ते च विमलवाहनादिकुलकरकालात्पूर्वतरकाल। भुवो हस्त्यादयः औषिकज्योतिष्का अप्येवंविधा एव तदुत्पत्तिस्थानं भवन्तीति 'जहनेणं अट्ठभागपलिओवमट्टिईएस' | इत्याद्युक्तम् , ओगाहणा जहनेणं धणुहपुहुत्तति यदुक्तं तत्पल्योपमाष्टभागमानायुषो विमलवाहनादिकुलकरकालात्पूर्व| तरकालभाविनो हस्त्यादिव्यतिरिक्तक्षुद्रकायचतुष्पदानपेक्ष्यावगन्तव्यं, 'उकोसेणं सातिरेगाई अट्ठारसघणुसयाईति RECASHBACOCCASS BARABARSA दीप अनुक्रम [८५९] ~111 Page #112 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (०५) [भाग-११]"भगवती"-अंगसूत्र-५ (मूलं+वृत्ति:) शतक [२४], वर्ग [-], अंतर्-शतक [-], उद्देशक [२३], मूलं [७१४] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र- [०५], अंगसूत्र- [०५] "भगवती मूलं एवं अभयदेवसूरि-रचिता वृत्ति: प्रत सूत्रांक [७१४] 18| एतच्च विमलवाहनकुलकरपूर्वतरकालभाविहस्त्यादीनपेक्ष्यो, यतो विमलवाहनो नवधनुःशतमानावगाहनः तत्कालह-1||२४ शतके व्याख्या-1 प्रज्ञप्तिः टस्त्यादयश्च तद्विगुणाः, तत्पूर्वतरकालभाविनश्च ते सातिरेकतत्प्रमाणा भवन्तीति, 'जहन्नकालहिइयस्स एस चेव एको । उद्देशः २३ अभयदेवी गमोत्ति पञ्चमषष्ठगमयोरत्रैवान्तर्भावाद , यतः पल्योपमाष्टभागमानायुषो मिथुनकतिरश्चः पञ्चमगमे षष्ठगमे च पल्योपमाट-18|ज्योतिष्को. यावृत्तिः२४ |भागमानमेवायुभवतीति, प्राय भावितं चैतदिति, सप्तमादिगमेषत्कृष्टैव त्रिपल्योपमलक्षणा तिरश्चः स्थितिः, ज्योतिष्कस्य तु | त्पाद | सप्तमे द्विविधा प्रतीतैव, अष्टमे पल्योपमाष्टभागरूपा, नवमे सातिरेकपल्योपमरूपा, संवेधश्चैतदनुसारेण कार्यः 'एते सत्ता सू ७१४ ॥८४८॥ गम'त्ति प्रथमात्रयः मध्यमत्रयस्थाने एकः पश्चिमास्तु त्रय एवेत्येवं सप्त । असङ्ख्यातवर्पायुष्कमनुष्याधिकारे-'ओगाहणा सातिरेगाई नवधणुसयाईति विमलवाहनकुलकरपूर्वकालीनमनुष्यापेक्षया, 'तिनि गाउयाईति एतच्चैकान्तसुषमादिभाविमनुष्यापेक्षया, 'मज्झिमगमए'त्ति पूर्वोक्कनीतेत्रिभिरप्येक एवायमिति ॥ चतुर्विशतितमशते वयो-12 विंशतितमः ॥ २४-२३॥ दीप अनुक्रम [८५९] अथ चतुर्विंशतितमोद्देशके किञ्चिलिख्यतेसोहम्मदेवा णं भंते ! कओहितो उवव० किं नेरइएहिंतो उवव० १ भेदो जहा जोइसियउद्देसए, असंखे-151८४८॥ जवासाउयसन्निपंचिंदियतिरिक्खजोणिए णं भंते । जे भविए सोहम्मगदेवेसु उवव० से णं भंते ! केवतिकाल०,गोयमा ! जहा पलिओवमहितीएम उक्कोसे तिपलिओवमद्वितीएम उवव०, ते णं भंते ! अवसेसं अत्र चतुर्विंशतितमे शतके त्रयोविंशतितम: उद्देशक: परिसमाप्त: अथ चतुर्विंशतितमे शतके चतुर्विंशतितमं उद्देशकः आरभ्यते ~112~ Page #113 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (०५) [भाग-११]"भगवती"-अंगसूत्र-५ (मूलं+वृत्ति:) शतक [२४], वर्ग [-], अंतर्-शतक [-], उद्देशक [२४], मूलं [७१५] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र- [०५], अंगसूत्र- [०५] "भगवती मूलं एवं अभयदेवसूरि-रचिता वृत्ति: प्रत सूत्रांक [७१५] जहा जोहसिएम ज्ववजमाणस्स नवरं सम्मदिट्ठीवि मिच्छादि० णो सम्मामिच्छाविट्ठी णाणीवि अन्नाणीवि टू दोणाणा दो अन्नाणा नियम ठिती जह० दो पलिओवमाई उक्कोसेणं छप्पलिओवमाई एवतियं १, सो घेव जहन्नकालाडितिएम उववन्नो एस चेव वत्तबया नवरं कालादेसेणं जहन्नेणं दो पलिओवमा उक्कोसेणं चत्तारि पलिओवमाई एवतियं २, सो चेव उक्कोसकालहितिएसु उववन्नो जहन्नेणं तिपलिओवम उकोसेणवि तिपलिओचम एस व वत्तवया नवरं ठिती जहन्नेणं तिन्नि पलिओचमाई उक्कोसेणवि तिन्नि पलिओवमाई सेस तहेव कालादे० जह० छप्पलिओवमाई उक्कोसेणवि छप्पलिओवमाइंति एचतियं ३, सो चेव अप्पणा जहन्न कालद्वितिओ जाओ जह० पलिओवमद्वितिएसु उकोसे० पलिओवमद्वितिएम एस चेव वत्तवया नवरं ओगादहणा जह० धणुहपुहुत्तं उकोसेणं दो गाउयाई, ठिती जहन्नेणं पलिओवम उफोसेणवि पलिओवर्म सेसं तहेव, है कालादे०जह दो पलिओचमाई उफोसेणंपि दो पलिओवमाई एवतियं ६, सो चेव अप्पणा उक्कोसकालट्ठि-12 तीओ जाओ आदिल्लगमगसरिसा तिन्नि गमगा या नवरं ठिर्ति कालादेसं च जाणेजा ९॥ जइ संखे जवासाउयसन्निपंचिंदिय संखेजवासाउयस्स जहेव असुरकुमारेसु उववजमाणस्स तहेव नववि गमा, नवरं है ठिति संवेहं च जाणे, जाहे य अप्पणा जहन्नकालाहितिओ भवति ताहे तिमुवि गमएसु सम्मदिट्ठीवि मिच्छादि० णो सम्मामिच्छादिही दो नाणा दो अन्नाणा नियम सेसं तं चेव ॥ जद मणुस्सहिंतो उववजंति | भेदो जहेव जोतिसिएसु उवबजमाणस्स जाव असंखेज्जवासाउयसन्निमणुस्से णं भंते !जे भविए सोहम्मे कप्पे दीप अनुक्रम [८६०] ~113 Page #114 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (०५) [भाग-११]"भगवती"-अंगसूत्र-५ (मूलं+वृत्ति:) शतक [२४], वर्ग [-], अंतर्-शतक [-], उद्देशक [२४], मूलं [७१५] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र- [०५], अंगसूत्र- [०५] "भगवती मूलं एवं अभयदेवसूरि-रचिता वृत्ति: प्रत सूत्रांक [७१५] दीप अनुक्रम [८६०] व्याख्या- || देवत्ताए उववजिसए एवं जहेव असंखेजवासाउपरस सग्निपंचिंदियतिरिक्खजोणिस्स सोहम्मे कप्पे उपवल- २१ शतके प्रज्ञप्तिमाणस्स तहेव सत्त गमगा नवरं आदिल्लएसु दोसु गमएसु ओगाहणा जहन्ने गाउयं उक्कोसेणं तिन्नि गाउ- उद्देशः२४ T-1|| याई, ततियगमे जहने तिन्नि गाउयाई उकोसेणवि तिन्नि गाउयाई, चउत्थगमए जहन्नेणं गाउयं उकोसेणविवैमानिको। या वृत्तिः२ द गाज्यं, पच्छिमएमु गमएमु जह० तिन्नि गाउयाई उको तिन्नि गाउयाई सेसं तहेव निरवसे० ९॥जइ संखे-18 स्पादः ॥८४९॥ वासाउयसन्निमणुस्सेहितो एवं संखे० सन्निमणु० जहेव असुरकुमारेसु उववजमाणाणं तहेव पव गमगा सू ७१५ भा० नवरं सोहम्मदेवहितिं संवेहं च जाणे०, सेसं तं चेव ९॥ ईसाणदेवा गं भंते ! कओहिंतो ज्यव०१ ईसाणदेवाणं एस चेव सोहम्मगदेवसरिसा बत्तबया नवरं असंखेजवासाउयसन्निपंचिंदियतिरिक्खजोणि-18 यस्स जेसु ठाणेसु सोहम्मे उबवजमाणस्स पलिओवमठितीसु ठाणेसु इहं सातिरेगं पलिओवमं काय, |चवस्थगमे ओगाहणा जहनेणं घणुहपुहुत्तं उक्कोसेणं सातिरेगाई दो गाउयाई सेसं तहेव ९ । असंखेजवासाउपसन्निमणुसस्सवि तहेव ठिती जहा पचिंदियतिरिक्खजोणियस्स असंखेज्जवासाउयस्स ओगाहणावि जेसुई ठाणेसु गाउयं तेसु ठाणेसु इहं सातिरेगं गाउयं सेसं तहेव ९। संखेज्जवासाउयाणं तिरिक्खजोणियाणं मणुस्साण यजहेब सोहम्मेसु उववजमाणाणं तहेव निरवसेसंणववि गमगा नवरं ईसाणठिति संवेहं च जाणेजा ९॥ सर्णकुमारदेवा णं भंते ! कमोहितो उपव० उपचाओ जहा सकरप्पमापुढविनेरइयाणं जाव पज्जत्तसंखे-18|| ॥८४९॥ जवासाउयसन्निपंचिंदियतिरिक्खजोणिए णं भंते ! जे भविए सर्णकुमारदेवेसु उपय अवसेसा परिमाणा द ~114~ Page #115 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (०५) [भाग-११]"भगवती"-अंगसूत्र-५ (मूलं+वृत्ति:) शतक [२४], वर्ग [-], अंतर्-शतक [-], उद्देशक [२४], मूलं [७१५] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र- [०५], अंगसूत्र- [०५] "भगवती मूलं एवं अभयदेवसूरि-रचिता वृत्ति: प्रत सूत्रांक [७१५] दीप अनुक्रम [८६०] दीया भवादेसपञ्जवसाणा सच्चेव वत्तधया भाणियधा जहा सोहम्मे उवबजमाणस्स नवरं सर्णकुमारहिति संवेहं 18|च जाणेज्जा, जाहे य अप्पणा जहनकालद्वितीओ भवति ताहे तिमुवि गमएसु पंच लेस्साओ आदिल्लाओ 5 टाकायबाओ सेसं तंव ९॥ जइ मणुस्सेहिंतो उवव० मणुस्साणं जहेव सफरप्पभाए उववजमाणाणं तहेव णववि गमा भाणियबा नवरं सर्णकुमारद्विति संवेहं च जाणेजा ९॥ माहिंदगदेवा णं भंते ! कओहितो उवव० जहा सणकुमारगदेवाणं वत्तवया तहा माहिंदगदे. भाणि नवरं माहिंदगदेवाणं ठिती सातिरेगा जाणियचा सा चेव, एवं पंभलोगदेवाणवि वत्तबया नवरं बंभलोगट्टिति संवेहं च जाणेजा एवं जाव सह-16 *स्सारो, णवरं ठितिं संघेहं च जाणेजा, लंतगादीणं जहन्नकालट्टितियस्स तिरिक्खजोणियस्स तिसुवि गमएसु । ४. छप्पि लेस्साओ कायवाओ, संधयणाई बंभलोगलंसएसु पंच आदिल्लगाणि महामुक्कसहस्सारेसु चत्सारि, दतिरिक्खजोणियाणवि मणुस्साणवि, सेसं तं चेव ९॥ आणयदेवा णं भंते ! कओहिंतो उववज्जति ? उब वाओ जहा सहस्सारे देवाणं णवरं तिरिक्खजोणिया खोडेयचा जाच पज्जत्तसंखेजवासाउयसन्निमणुस्से णं भंते! जे भविए आणयदेवेसु उववजित्तए मणुस्साण य वत्तदया जहेव सहस्सारेसु उववजमाणाणं णवरं र तिन्नि संघयणाणि सेसं तहेव जाव अणुबंधो भवादेसेणं जहन्नेणं तिन्नि भवग्गहणाई उक्कोसेणं सत्त भवग्ग-18 हणाई, कालादेसेणं जहन्नेणं अट्ठारस सागरोवमाई दोहिं वासपुहुत्तेहिं अब्भहियाई उक्कोसेणं सत्तावन्नं साग-2 रोवमाई चाहिं पुचकोडीहिं अभहियाई एवतियं०, एवं सेसावि अट्ठ गमगा भाणियचा नवरं ठिति संवेहं 1561644% ~115 Page #116 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (०५) [भाग-११]"भगवती"-अगसूत्र-५ (मूल+वृत्ति:) शतक [२४], वर्ग [-], अंतर्-शतक [-], उद्देशक [२४], मूलं [७१५] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र- [०५], अंगसूत्र- [०५] "भगवती मूलं एवं अभयदेवसूरि-रचिता वृत्ति: प्रत सूत्रांक [७१५] दीप अनुक्रम [८६०] |च जाणेज्जा, सेसं तंव ९। एवं जाव अञ्चयदेवा, नवरं ठिति संवेहं च जाणेज्जा ९ चउमवि संघयणा २४ शतके प्रज्ञप्तिः तिन्नि आणयादीसु । गेवेजगदेवा णं भंते ! कओ उववजंति ? एस चेव वत्तचया नवरं संघयणा दोवि, ठिति उद्देशः २४ अभयदेवी |संवेहं च जाणेजा । विजयवेजपंतजयंतअपराजितदेवाणं भंते ! कतोहिंतो उववज्जति !, एस चेय बत्तबयाबाबमानिकोया वृत्तिः२ | निरवसेसा जाव अणुबंधोत्ति, नवरं पढम संघयणं, सेसं तहेव, भवादेसेणं जहन्नेणं तिन्नि भवग्गहणाई उको त्पादः सू७१५ ॥८५०॥ सेणं पंच भवग्गहणाई, कालादेसेणं जहन्नेणं एकतीसं सागरोवमाई दोहिं वासपुडुत्तेहिं अम्भहियाई उको-8 IX|| सेणं छावर्द्धि सागरोवमाई तिहिं पुषकोडीहिं अब्भहियाइं एवतियं, एवं सेसाषि अट्ठ गमगा भाणियचा. नवरं ठिति संवेहं च जाणेजा, मणूसे लद्धी णवमुवि गमएसु जहा गेवेजेसु उववज्जमाणस्स नवरं पदमसंघयणं । सबद्दगसिद्धगदेवा णं भंते ! कओहिंतो उवव०१, उववाओ जहेच विजयादीणं जाव से णं भंते ! केवतिकालहितिएम पववजेज्जा, गोयमा ! जहन्नेणं तेत्तीसं सागरोवमहिति० उकोसेणवि तेत्तीससागरोवमहितीएसु उवचनो, अवसेसा जहा विजयाइसु उववजंताणं नवरं भवादेसेणं तिन्नि भवग्गहणाईकालादे०॥ जहन्नेणं तेत्तीस सागरोवमाई दोहिं वासपुहुत्तेहिं अम्भहियाई उक्कोसेणवि तेत्तीसं सागरोवमाई दोहिं पुचको-18 डीहिं अन्भहियाई एचतियं ९ । सो चेव अप्पणा जहन्नकालहितीओ जाओ एस चेव वत्तवया नवरं ओगारहणाठितिओ रयणिपुहुत्सवासपुहुत्ताणि सेसं तहेब संवेहं च जाणेना ९। सो चेव अप्पणा उबोसकालट्ठि ८५०॥ तीओ जाओ एस चेव वत्तवया नवरं ओगाहणा जह. पंच धणुसयाई उक्को. पंचधणु सयाई, ठिती जह. RABAR ~116 Page #117 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (०५) [भाग-११]"भगवती"-अंगसूत्र-५ (मूलं+वृत्ति:) शतक [२४], वर्ग [-], अंतर्-शतक [-], उद्देशक [२४], मूलं [७१५] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र- [०५], अंगसूत्र- [०५] "भगवती मूलं एवं अभयदेवसूरि-रचिता वृत्ति: R प्रत सूत्रांक [७१५]] पुचकोडी उको पुचकोडी, सेसं तहेव जाव भवादेसोत्ति, कालादे जह० तेत्तीसं सागरोवमाई दोहिं पुषकोटीहिं अम्भहियाई उको तेसीसं साग० दोहिवि पुचकोडीहिं अन्भहियाई एवतियं कालं सेवेजा एवतियं|| कालं गतिरागति करेजा, एते तिनि गमगा सवसिद्धगदेवाणं । सेवं भंते ! २त्ति भगवं गोयमे जावर |विहरह।। (सूत्रं ७१५)॥२४-२४॥ समतं च चवीसतिम सयं ॥ २४ ॥ 'जहनेणं पलिओवमहिइएसुत्ति सौधर्मे जघन्येनान्यस्यायुषोऽसत्त्वात् , 'उक्कोसेणं तिपलिओवमठिहएसुत्ति यद्यपि सौधर्मे बहुतरमायुष्कमस्ति तथाऽप्युत्कर्षतस्निपल्योपमायुष एव तिर्यश्चो भवन्ति तदनतिरिक्तं च देवायुर्वन्तीति, |'दो पलिओवभाईति एक तिर्यग्भवसत्कमपरं च देवभवसत्कं, 'छ पलिओवमाईति त्रीणि पल्योपमानि तिर्यग्भवस कानि श्रीण्येव देवभवसत्कानीति, 'सो चेव अप्पणा जहन्नकालठिईओ जाओ'इत्यादिगमत्रयेऽप्येको गमः, भावना |तु प्रदर्शितव, 'जहन्नेणं धणुहपुहुतं'त्ति क्षुद्रकायचतुष्पदापेक्षं 'उक्कोसेणं दो गाउयाई ति यत्र क्षेत्रे काले वा गन्यूतमाना मनुष्या भवन्ति तत्सम्बन्धिनो हस्त्यादीनपेक्ष्योक्तमिति ॥ सङ्ख्यातायुःपञ्चेन्द्रियतिर्यगधिकारे-'जाहे व अप्पणा जहन्नकालहिइओ भवई'त्यादौ 'नो सम्मामिच्छादिट्ठी'त्ति मिश्रदृष्टिनिषेध्यो जघन्यस्थितिकस्य तदसम्भवादजघन्यस्थितिकेषु दृष्टित्रयस्थापि भावादिति, तथा ज्ञानादिद्वारेऽपि द्वे ज्ञाने वा अज्ञाने वा स्याता, जघन्यस्थितेरन्ययोरभावा-॥४ दिति ॥ अथ मनुष्याधिकारे-नवरं आदिल्लएसु दोसु गमएसु'इत्यादि, आद्यगमयोहिं सर्वत्र धनुष्पृथक्त्वं जपन्यावगाहना उत्कृष्टा तु गब्यूतपङ्कमुक्ता इह तु 'जहन्नेणं गाउयमित्यादि, तृतीयगमे तु जघन्यत उत्कर्षतश्च पड़ गन्यूता दीप अनुक्रम [८६०] LASSOCHANDRA ~117~ Page #118 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (०५) [भाग-११]"भगवती"-अंगसूत्र-५ (मूलं+वृत्ति:) शतक [२४], वर्ग [-], अंतर्-शतक [-], उद्देशक [२४], मूलं [७१५] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र- [०५], अंगसूत्र- [०५] "भगवती मूलं एवं अभयदेवसूरि-रचिता वृत्ति: प्रज्ञप्ति काउद्देशः २४ प्रत सूत्रांक [७१५] दीप अनुक्रम [८६०] व्याख्या- न्युक्तानि इह तु त्रीणि, चतुर्थे गमे तु प्राग जपन्यतो धनुष्पृथक्त्वमुत्कर्षतस्तु द्वे गन्यूते उक्त इह तु जपन्यत सत्कर्षतश्च गम्यू-15 तम्, एवमम्यदप्यूयम् ॥ ईशानकदेवाधिकारे-'सातिरेगं पलिओवमं कायर्षति ईशाने सातिरेकपल्योपमस्य जपन्य-1|| अभयदेवी-स्थितिकत्वात् , तथा 'चउत्थगमए ओगाहणा जहन्नेणं धणुहपुरतं ति ये सातिरेकपल्योपमायुषस्तिय॑श्चः सुक्मांशोमवाः वैमानिको. या वृत्तिः२ क्षुद्रतरकायास्तानपेक्ष्योक्तम् , 'उकोसेणं साइरेगाई दो गाउयाई ति एतच यत्र काले सातिरेकगन्यूतमाना मनुष्या साद: पप भवन्ति तत्कालभवान् हस्त्यादीनपेक्ष्योक्तं, तथा 'जेसु ठाणेसु गाउयंति सौधर्मदेवाधिकारे येषु स्थानेष्वसमवातवर्षा-1|2|| सू ७१५ युर्मनुष्याणां गव्यूतमुक्तं 'तेसु ठाणेसु इहं साइरेगं गाउयंति जघन्यतः सातिरेकपल्योपमस्थितिकत्वादीशानकदेवस्य प्राप्तव्यदेवस्थित्यनुसारेण चासङ्गयातवर्षायुर्मनुष्याणां स्थितिसद्भावात् तदनुसारेणैव च तेषामवगाहनाभावादिति ॥ सनत्कु|रदेवाधिकारे-'जाहे य अप्पणा जहन्ने'त्यादी 'पंच लेस्साओ आदिल्लाओ कायदाओ'त्ति जपन्यस्थितिकस्तिर्यक् । * सनत्कुमारे समुत्पित्सुर्जघन्यस्थितिसामोत्कृष्णादीनां चतसृणां लेश्यानामन्यतरस्यां परिणतो भूत्वा मरणकाले पाले| श्यामासाद्य म्रियते ततस्तत्रोत्पद्यते, यतोऽग्रेतनभवलेश्यापरिणामे सति जीवः परभवं गच्छतीत्यागमः, तदेवमस्य पन्च लेश्या | भवन्ति । 'लंतगाईणं जहपणे'त्यादि, एतद्भावना चानन्तरोक्तन्यायेन कार्या, 'संघयणाई बंभलोए लंतएम पंचद्र | आइल्लगाणि'त्ति छेदवतिसंहननस्य चतुर्णामेव देवलोकानां गमने निवन्धनत्वात् , यदाह-"छेवद्वेण र गम्मइ चत्वारि । उजाव आइमा कप्पा। वहज कप्पजुयल संघयणे कीलियाईए॥क्षा" इति सेवार्तेन तु गल्छति चतुर आधान् कस्पान् यावत् ८५१२॥ कीलिकादिषु संहननेषु कल्पयुग्मं वर्धयेत् ॥१॥] इति ॥ “जहनेणं तिन्नि भवग्गणाईति आनतादिदेवो मनुष्येम्य ~118~ Page #119 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (०५) प्रत सूत्रांक [७१५] दीप अनुक्रम [८६०] [भाग-११]“भगवती”- अंगसूत्र -५ (मूलं + वृत्तिः) शतक [२४], वर्ग [-], अंतर् शतक [ - ], उद्देशक [२४], मूलं [७१५] पूज्य आगमोद्धारकश्री संशोधितः मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित.. आगमसूत्र - [०५] अंगसूत्र- [ ०५] "भगवती" मूलं एवं अभयदेवसूरि-रचिता वृत्तिः एवोत्पद्यते तेष्वेव च प्रत्यागच्छतीति जघन्यतो भवत्रयं भवतीति, एवं भवसप्तकमप्युत्कर्षतो भावनीयमिति, 'उकोसेणं सत्तावन्न' मित्यादि, आनतदेवानामुत्कर्षत एकोनविंशतिसागरोपमाण्यायुः, तस्य च भवत्रयभावेन सप्तपञ्चाशत्सागरोपमाणि मनुष्यभवचतुष्टयसम्बन्धिपूर्वकोटिचतुष्काभ्यधिकानि भवन्तीति ॥ चतुर्विंशतितमशते चतुर्विंशतितमः ॥ २४ ॥ ॥ समाप्तं च विवरणतश्चतुर्विंशतितमं शतम् ॥ २४ ॥ 461864 'वरमजिनवरेन्द्रमोदितार्थे परार्थ, निपुणगणधरेण स्थापितानिन्द्यसूत्रे । विवृतिमिह शते नो कर्तुमिष्टे बुधोऽपि प्रचुरगमगभीरे किं पुनर्माडशोऽज्ञः १ ॥ १ ॥ व्याख्यातं चतुर्निशतितमशतम्, अथ पञ्चविंशतितममारभ्यते, तस्य चैवमभिसम्बन्धः - प्राक्तनशते जीवा उत्पादादिद्वारश्चिन्तिता इह तु तेषामेव लेश्यादयो भावाश्चिन्त्यन्ते इत्येयसम्बन्धस्यास्योद्देशकसङ्ग्रहगाथेयम्- लेसा य १ व २ संठाण ३ जुम्म ४ पञ्जव ५ नियंठ ६ समणा य ७ । आहे ८ भविया ९ भविए १० सम्मा ११ मिच्छे य १२ उद्देसा ॥ १ ॥ तेणं कालेणं २ रायगिहे जाव एवं क्यासी-कति णं भंते! लेस्साओ प० १, गोपमा ! छल्लेसाओ प० तं कण्हलेसा जहा पदमसए वितिए उद्देसए तहेव लेस्साविभागो अप्पा बहुगं च जाव चउविहाणं देवाणं मीसगं अप्पा बहुगंति ॥ (सूत्रं ७१६ ) ॥ 'लेसे' त्यादि, तत्र 'लेसा यत्ति प्रथमोद्देशके लेश्यादयोऽर्धा याच्या इति लेश्योद्देशक एवायमुच्यते इत्येवं सर्वत्र १ Education International अत्र चतुर्विंशतितमे शतके चतुर्विंशतितमः उद्देशकः परिसमाप्तः अथ पञ्चविंशतितमे शतके प्रथम उद्देशक: आरभ्यते For Parts Only ~ 119 ~ Page #120 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (०५) [भाग-११]"भगवती"-अंगसूत्र-५ (मूलं+वृत्ति:) शतक [२५], वर्ग [-], अंतर्-शतक [-1, उद्देशक [१], मूलं [७१६] + गाथा पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र- [०५], अंगसूत्र- [०५] "भगवती मूलं एवं अभयदेवसूरि-रचिता वृत्ति: प्रत सूत्रांक [७१६] व्याख्या- प्रज्ञप्तिः अभयदेवीयावृत्तिः ८५२॥ गाथा दवति दितीये द्रव्याणि वाच्यानि २'संठाण'त्ति तृतीये संस्थानादयोऽर्थाः ३ 'जुम्मत्ति चतुर्थे कृतयुग्मादयोऽर्थाः | ॐ २५ शतके ४ 'पज्जवत्ति पञ्चमे पर्यवाः ५ 'नियंठ'त्ति षष्ठे पुलाकादिका निर्ग्रन्थाः ६ 'समणा य'त्ति सप्तमे सामायिकादि-18 उद्देशः१ संयतादयोऽर्थाः ७ 'ओहे'त्ति अष्टमे नारकादयो यथोत्पद्यन्ते तथा वाच्यं, कथम् , ओघे-सामान्ये वर्तमाना भव्या- लेश्याविभव्यादिविशेषणैरविशेषिता इत्यर्थः८ 'भविए'त्ति नवमे भव्यविशेषणा नारकादयो यथोत्पद्यन्ते तथा वाच्यम् ९ भागः सू ७१६ |'अभविए'त्ति दशमेऽभव्यत्वे वर्तमाना अभव्यविशेषणा इत्यर्थः १० 'सम्मत्ति एकादशे सम्यग्दृष्टिविशेषणाः ११ 'मिच्छे यत्ति द्वादशे मिथ्यात्वे वर्तमाना मिथ्यादृष्टिविशेषणा इत्यर्थः १२ 'उद्देस'ति एवमिह शते द्वादशोदेशका भवन्तीति । तत्र प्रथमोद्देशको व्याख्यायते, तस्य चेदमादिसूत्रम्-'तेणं कालेण'मित्यादि, 'जहा पढमसए वितिए उसए तहेव लेसाविभागो'त्ति सच-'नेरझ्याणं भंते ! कति लेस्साओ पन्नत्ताओ इत्यादि, 'अप्पाययं चत्ति तश्चैवम्-एएसि णं भंते ! जीवाणं सलेस्साणं कण्हलेस्साण'मित्यादि, अथ कियडूरं तद्वाच्यमित्याह-'जाव बउबिहाणं देवाण'मित्यादि, तचैवम्-'एएसि णं भंते ! भवणवासीणं वाणमंतरार्ण जोइसियाणं वेमाणियाणं देवाण य देवीण य कण्हलेसाणे जाव सुकलेसाण य कयरेशहितो? इत्यादि । अथ प्रथमशते उक्कमप्यासां स्वरूपं कस्मारपुनरप्युच्यते', उच्यते, प्रस्तावान्तरायातत्वात् , तथाहि-वह संसारसमापन्नजीवानां योगाल्पबहुत्वं वक्तव्यमिति तत्प्रस्तावालेश्याल्पबहुत्वप्रकरणमुक्तं, तत एव लेश्याऽल्पबहुत्वप्रकरणानन्तरं संसारसमापन्नजीवांस्तद्योगाल्पबहुत्वं च प्रज्ञापयन्नाह कतिविहा णं भंते ! संसारसमावनगा जीवा पन्नत्ता, गोयमा! चोरसविहा संसारसमावन्नगा जीवा | KARREARSHA दीप अनुक्रम [८६१८६२] ~120 Page #121 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (०५) [भाग-११]"भगवती"-अंगसूत्र-५ (मूलं+वृत्ति:) शतक [२५], वर्ग [-], अंतर-शतक [-], उद्देशक [१], मूलं [७१७] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र- [०५], अंगसूत्र- [०५] "भगवती मूलं एवं अभयदेवसूरि-रचिता वृत्ति: प्रत सूत्रांक [७१७]] RECORE य, तं०- सुहमअप्पाजत्तगा १ सुहमपज्जत्तगा २ बादअपनत्तगा ३ बादरपज्जत्तगा ४ वेइंदिया अप्पजत्ता बेइंदिया पजत्ता ६ एवं तेइंदिया ८ एवं चरिंदिया १० असन्निपंचिंदिया अप्पाजतगा ११ असन्निपंचिंद दिया पजत्रागा १२ सन्निपंचिंदिया अपजत्तगा १३ सन्निपंचिंदिया पजसगा १४ । एतेसि णं भंते चोदस-1 विहाणं संसारसमावनगाणं जीवाणं जहन्नुकोसगस्स जोगस्स कयरे २ जाव विसेसाहिया ?, गोयमा! | सचत्योवे सुहमस्स अपजसगस्स जहन्नए जोए १ वादरस्स अपजत्तगस्स जहन्नए जोए असंखेजगुणे २ दि-16। यस्स अपजसगस्स जहन्नए जोए असंग्वेजगुणे ३ एवं तेइंदियस्स ४ एवं बरिदियरस ५ असन्निस्स पंपिंदियस्स अपज्जत्तगस्स जहन्नए जोए असंखेजगुणे ६ सन्निस्स पंचिंदियस्स अपजत्तगस्स जहन्नए जोए असंखेजगुणे ७ सुहुमस्स पजत्तगस्स जहन्नए जोए असंखेजगुणे ८ बादरस्स पनत्तगस्स जहन्नए जोए असंखेजगुणे ९ सुहमस्स अपज्जत्तगस्स उक्कोसए जोए असंखेजगुणे १० बादरस्स अपज्जत्तगस्स उकोसए जोए असंखेजI| गुणे ११ सुहुमस्स पञ्जत्तगस्स उक्कोसए जोए असंखेज गुणे १२ चादरस्स पज्जत्तगस्स उक्कोसए जोए असं हा खेजगुणे १३ दियस्स पजत्तगस्स जहन्नए जोए असंखेनगुणे १४ एवं तेंदिय एवं जाव सन्निपंचिंदियस्स पिज्जत्तगस्स जहन्नए जोए असंखेनगुणे १८ वेंदियस्स अपजत्तगस्स उकोसए जोए असंखेजगुणे १९ एवं तेंदियस्सवि २० एवं चरिंदियस्सवि २१ एवं जाव सन्निपंचिंदिपस्स अपजत्तगस्स उक्कोसए जोए असंखे०२३ दियस्स पजत्तगस्स उकोसए जोए असंखे०२४ एवं तेइंदियस्सवि पजत्तगस्स उक्कोसए जोए असंखेनगुणे दीप अनुक्रम [८६३] --kN-H चतुर्दशविध: जीवा:, तेषाम् अल्प-बहुत्व ~121 Page #122 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (०५) [भाग-११]"भगवती"-अंगसूत्र-५ (मूलं+वृत्ति:) शतक [२५], वर्ग [-], अंतर्-शतक [-], उद्देशक [१], मूलं [७१७] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र- [०५], अंगसूत्र- [०५] "भगवती मूलं एवं अभयदेवसूरि-रचिता वृत्ति: व्याख्या- अभयदेवीयावृत्ति प्रत सूत्रांक [७१७] दीप अनुक्रम [८६३] २५ परिदियस्स पज्जत्तगरस उक्कोसए असंख०२६ असन्निपंचिंदियपजत उक्कोसए जोए असंखेजगुणे २७ एवं | २५ शतके सन्निपंचिंदियस्स पजत्तगस्स उक्कोसए जोए असंखेजगुणे २८ (सूत्रं ७१७)॥ उद्देशः१ योगाल्प'कइविहे'त्यादि, 'सुहम'त्ति सूक्ष्मनामकर्मोदयात् 'अपजत्तग'त्ति अपर्याप्तका अपर्याप्तकनामकर्मोदयात् , एवमितरे । बहुरवं || तद्विपरीतत्वात् , 'वायर'त्ति बादरनामकर्मोदयात् , एते च चत्वारोऽपि जीवभेदाः पृथिव्यायेकेन्द्रियाणां, 'जधचको-|| सू७१७ सगस्स जोगस्स'त्ति जघन्यो-निकृष्टः काश्चिव्यक्तिमाश्रित्य स एव च व्यत्यन्तरापेक्षयोत्कर्षः-उत्कृष्टो जघन्योत्कर्षः | तस्य योगस्य-वीर्यान्तरायक्षयोपशमादिसमुत्थकायादिपरिस्पन्दस्य एतस्य च योगस्य चतुर्दशजीवस्थानसम्बन्धाजघन्यो| स्कर्षभेदाचाष्टाविंशतिविधस्याल्पबहुत्वादि जीवस्थानकविशेषाद्भवति, तत्र 'सवत्थोघे' इत्यादि सूक्ष्मस्य पृथिव्यादेः सूक्ष्म| त्वात् शरीरस्य तस्याप्यपर्याप्तकत्वेनासम्पूर्णत्वात् तत्रापि जघन्यस्य विवक्षितत्वात् सर्वेभ्यो वक्ष्यमाणेभ्यो योगेभ्यः | | सकाशात्स्तोकः-सर्वस्तोको भवति जघन्यो योगः, स पुनर्वैग्रहिककार्मणऔदारिकपुद्गलग्रहणप्रथमसमयवत्ती, तदनन्तरं 2 |च समयवृद्ध्याऽजघन्योत्कृष्टो यावत्सर्वोत्कृष्टो न भवति, 'बायरस्से'त्यादि बादरजीवस्य पृथिव्यादेरपर्याप्तकजीवस्य | जघन्यो योगः पूर्वोक्तापेक्षयाऽसङ्ख्यातगुण:-असङ्ख्यातगुणवृद्धोवादरत्वादेवेति, एवमुत्तरत्राप्यसइख्यातगुणत्वं दश्यम्,|||५|| इह च यद्यपि पर्याप्तकत्रीन्द्रियोस्कृष्टकायापेक्षया पर्याप्तकानां द्वीन्द्रियाणां सम्झिनामसज्ञिनां च पञ्चेन्द्रियाणामुत्कृष्टः कायः सङ्ख्यातगुणो भवति सण्यातयोजनप्रमाणत्वात् तथाऽपीह योगस्य परिस्पन्दस्य विवक्षितत्वात् तस्य च क्षयो चतुर्दशविध: जीवाः, तेषाम् अल्प-बहुत्वम् ~122 Page #123 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (०५) [भाग-११]"भगवती"-अंगसूत्र-५ (मूलं+वृत्ति:) शतक [२५], वर्ग [-], अंतर-शतक [-], उद्देशक [१], मूलं [७१७] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र- [०५], अंगसूत्र- [०५] "भगवती मूलं एवं अभयदेवसूरि-रचिता वृत्ति: पशमविशेषसामर्थ्याद् यथोक्कमसङ्ख्यातगुणत्वं न विरुध्यते, न ह्यल्पकायस्याल्प एव स्पन्दो भवति महाकायस्य वा महानेव, व्यत्ययेनापि तस्य दर्शनादिति, इह चेयं स्थापना प्रत सूत्रांक [७१७]] मुहुम । सहुम । बादर । बादर । बेनी रिद्री । तेरिंदी तेरिद्री । चरिद्री चरितीभिसनी । असनी। सभी | समीप । अपजशपजत अपजत पजत अपज्जत्त पजत अप. | पजत । अपजत पजत अपजत पजत अपवत्त जघन्य । जघन्य जपन्य जपन्य उपन्य जघन्य जघन्य अपन्य जपन्य जघन्य जघन्य जघन्य जघन्य | जधन्य असं.२ १४४ १५ उत्कृष्ट | उत्कृष्ट उत्कृष्ट उत्कृष्ट उत्कृष्ट । राष्ट्र उत्कृष्ट | उत्कृष्ट उस्कृष्ट | उत्कृष्ट उत्कृष्ट उस्कृष्ट उस्कृष्ट । उरकृष्ट | १० | १२ | ११ १३ । १९ २४ १. २५ । २१ ।२६ २३ २७ २८ 6*2ACKAGGC दीप अनुक्रम [८६३] योगाधिकारादेवेदमाह दो भंते । नेरतिया पढमसमयोववन्नगा कि समजोगी कि विसमजोगी?, गोयमा ! सिय समजोगी सिय * विसमजोगी, से केणतुणं भंते ! एवं वुच्चति सिय समजोगी सिय विसमजोगी, गोयमा! आहारयाओ वा से अणाहारए अणाहारयाओ वा से आहारए सिय हीणे सिय तुल्ले सिय अन्भहिए जइ हीणे असंखेजइभागहीणे वा संखेज्जइभागहीणे वा संखेजगुणहीणे वा असंखेजगुणहीणे चा अह अम्भहिए असंखेजइभा-| गमन्भहिए वा संखेजहभागमभहिए वा संखेजगुणमन्भहिए वा असंखेजगुणमभहिए वा से तेणद्वेणं जाब सिय विसमजोगी एवं जाव बेमाणियाणं (सूत्र ७१८)॥ । चतुर्दशविध: जीवा:, तेषाम् अल्प-बहुत्व ~123 Page #124 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (०५) प्रत सूत्रांक [७१८] दीप अनुक्रम [८६४] [भाग-११]“भगवती”– अंगसूत्र -५ (मूलं + वृत्ति:) शतक [२५], वर्ग [-], अंतर् शतक [-] उद्देशक [१], मूलं [ ७१८] पूज्य आगमोद्धारकश्री संशोधितः मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित.. आगमसूत्र - [०५] अंगसूत्र- [ ०५] "भगवती" मूलं एवं अभयदेवसूरि-रचिता वृत्तिः व्याख्याप्रज्ञप्तिः अभयदेवी या वृत्तिः २ ॥८५४॥ 'दो भंते' इत्यादि, प्रथमः समय उपपन्नयोर्ययोस्ती प्रथमसमयोपपन्नौ, उपपत्तिश्चेह नरकक्षेत्रप्राप्तिः सा च द्वयोरपि विग्रहेण ऋजुगत्या वा एकस्य वा विग्रहेणान्यस्य ऋजुगत्येति, 'समजोगि 'त्ति समो योगो विद्यते ययोस्तौ समयोगिनी एवं विषमयोगिनी, 'आहारयाओ वा' इत्यादि, आहारकाद्वा-आहारकं नारकमाश्रित्य 'से'ति स नारकोऽनाहारकः अनाहारकाद्वा-अनाहारकं नारकमाश्रित्याहारकः, किम् ? इत्याह-'सिय हीणेत्ति यो नारको विग्रहाभावेनागत्याहारक एवोत्पन्नोऽसौ निरन्तराहारकत्वादुपचित एय, तदपेक्षया च यो विग्रहगत्यानाहारको भूत्वोत्पन्नोऽसौ हीनः पूर्वमनाहारकत्वेनानुपचितत्वाद्धीनयोगत्वेन च विषमयोगी स्यादिति भावः, 'सिय तुल्ले'ति यो समानसमयया विग्रहगत्यानाहारको भूत्वोत्पन्नी ऋजुगत्या वाऽऽगत्योत्पन्नी तयोरेक इतरापेक्षया तुल्यः समयोगी भवतीति भावः, 'अन्महिए'ति यो विग्रहाभावेनाहारक एवागतोऽसौ विग्रहगत्यनाहारकापेक्षयोपचिततरत्वेनाभ्यधिको विषमयोगीति भावः, इह च 'आहारयाओ वा से अणाहारए' इत्यनेन हीनतायाः 'अणाहारयाओ वा आहारए' इत्यनेन चाभ्यधिकताया निबन्धनमुक्तं, तुल्यतानिबन्धनं तु समानधर्मतालक्षणं प्रसिद्धत्वान्नोक्तमिति ॥ योगाधिकारांदेवेदमपरमाह कतिविहे णं भंते! जोए प० १, गोपमा । पन्नरसविहे जोए पं० तं०-सबमणजोए मोसमणजोए सचामोसमणजोए असचामो समणजोए सचवइजोए मोसवइजोए सवामोसवइजोए असथामोसवइजोए ओरालियसरीरकायजोए ओरालियमीसासरीरकायजोए उदियसरीरकायजोए वेउचियमीसासरीरकायजोगे आहा| रगसरीरकायजोगे आहारगमीसास० का० कम्मास०का० १५ ॥ एयस्स णं भंते ! पारसविहस्स जन्नुको Education International योग:, तस्य भेदाः एवं अल्प- बहुत्वं For Par at Use Only ~ 124~ २५ शतके उद्देशः १ समविषम योगिता प चदशयोग जघन्यादि सू ७१८७१९ ॥८५४॥ nar Page #125 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (०५) [भाग-११]"भगवती"-अंगसूत्र-५ (मूलं+वृत्ति:) शतक [२५], वर्ग [-], अंतर-शतक [-], उद्देशक [१], मूलं [७१९] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र- [०५], अंगसूत्र- [०५] "भगवती मूलं एवं अभयदेवसूरि-रचिता वृत्ति: प्रत सूत्रांक [७१९] सगस्स कयरे २ जाव विसेसा ?, गोयमा ! सवयोवे कम्मगसरीरजहन्न जोए १ ओरालियमीसगस्स जहदानजोए असंखे०२ वेउवियमीसगस्स जहन्नए असं०३ ओरालियसरीरस्स जहन्नए जोए असं०४ उधि-IC यसरीरस्स जहन्नए जोए असं०५ कम्मगसरीरस्स उक्कोसए जोए असंखे०६ आहारगमीसगस्स जहन्नएर जोए असं०७ तस्स चेव उकोसए जोए असं०८ ओरालियमीसगस्स ९ घेउवियमीसगस्स १०, एएसि|४ दणं उक्कोसए जोए दोण्हवि तुल्ले असंखे, असच्चामोसमणजोगस्स जहन्नए जोए असं० ११ आहारसरीरस्सा में जहन्नए जोए असंखे० १२ तिविहस्स मणजोगस्स १५ चउविहस्स वयजोगस्स १९ एएसिणं सत्ताह वि तुल्ले जहन्नए जोए असं०, आहारगसरीरस्स उक्कोसए जोए असं०२० ओरालियसरीरस्स वेबियस्स चवि-४ हस्स य मणजोगस्स चउचिहस्स य वइजोगस्स एएसि णं दसपहवि तुल्ले उक्कोसए जोए असंखेजगुणे ३० सेवं भंते ! २त्ति (सून ७१९)॥ पणवीसइमे सए पढ़मो उद्देसो २५-१॥ 'कइविहे ण' मित्यादि, व्याख्या चास्य प्राम्वत् ॥ योगस्यैवाल्पबहुत्वं प्रकारान्तरेणाह-एयरस ण' मित्यादि, इहापि योगः परिस्पन्द एव, इह चेयं स्थापना १TY सख्यमनो असत्यमान, मिश्रमन असल्याम सत्यवान'भसखवाक विषयाक् असत्या. औदारिक औदारिक मेध पैकिय बैकिप आहारक आहारकमिया कामग अपभ्य १२ जघन्य १२ जघन्य १२ जघन्य १० जघन्य जयन्य १२ जपन्य १२ जघन्य १२ जघन्य अपन्य २ जघन्य ५ जघन्य अपन्य ११ जघन्य ७ जघन्य १ उरक४१४ उरकृ१४ वट४'उY1४ उत्कृष्ट १४/ उकृष्ट१४ उत्कृष्ट १४ उत्कृष्ट१४ उत्कृष्ट कृष्ट उरकTv/उत्कृष्ट उकए १३ उकृष्ट का दीप अनुक्रम [८६५] For P OW Hirwaitaram.org योगः, तस्य भेदा: एवं अल्प-बहुत्वं ~125 Page #126 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (०५) प्रत सूत्रांक [७२०] दीप अनुक्रम [८६६] [भाग-११]“भगवती”– अंगसूत्र -५ (मूलं + वृत्ति:) शतक [२५], वर्ग [-] अंतर् शतक [-] उद्देशक [२], मूलं [ ७२०] पूज्य आगमोद्धारकश्री संशोधितः मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित.. आगमसूत्र - [०५] अंगसूत्र- [ ०५] "भगवती" मूलं एवं अभयदेवसूरि-रचिता वृत्तिः व्याख्या प्रज्ञप्तिः अभयदेवीया वृत्तिः २ ॥८५५॥ ॥ पञ्चविंशतितमशते प्रथमः ॥ २५९ ॥ प्रथमोद्देशके जीवद्रव्याणां लेश्यादीनां परिमाणमुक्तं, द्वितीये तु द्रव्यप्रकाराणां तदुच्यते इत्येवंसम्बद्धस्यास्येदमादिसूत्रम् — कतिविहाणं भंते! दद्दा पत्नत्ता १, गोयमा ! दुविहा दवा पं० सं०- जीवदवा य अजीवदवा य, अजीवदवाणं भंते ! कतिविहा प० १, गोयमा ! दुविहा प०, तंजहा - रूविभजीवद्द्वा य अरूविअजीवदवा य एवं | एएणं अभिलावेणं जहा अजीवपजवा जाव से तेणद्वेणं गोयमा ! एवं बुचइ ते णं नो संखेना नो असंखेजा अनंता। जीवदवा णं भंते । किं संखेज्जा असंखेजा अनंता ?, गोयमा ! नो संखेज्जा नो असंखेजा अनंता, से केणट्टेणं भंते ! एवं बुच्चइ जीवदवा णं नो संखेजा नो असंखेजा अनंता ?, गोयमा ! असंखेज्जा नेरहया | जाव असंखेजा वाउक्काइया वणरसइकाइया अनंता असंखिज्जा बेंदिया एवं जाव वैमाणिया अनंता सिद्धा से तेणद्वेणं जाव अनंता (सूत्रं ७२० ) । 'कविहाण' मित्यादि, 'जहा अजीवपज्जव'त्ति यथा प्रज्ञापनाया विशेषाभिधाने पञ्चमे पदे जीवपर्यवाः पठिता|स्तथेहाजीवद्रव्यसूत्राण्यध्येयानि तानि चैवम्--'अरूविअजीवदवा णं भंते ! कतिविहा पन्नता ? गोयमा ! | दसविहा प०, सं०-धम्मत्थिकाए' इत्यादि, तथा 'रूविअजीवद्द्वा णं भंते ! कतिविहा पन्नता ?, गोयमा ! Educatin internation अत्र पञ्चविंशतितमे शतके प्रथम उद्देशकः परिसमाप्तः अथ पञ्चविंशतितमे शतके द्वितीय- उद्देशक: आरभ्यते जीव- अजीव द्रव्यस्य भेदाः एवं तेषां संख्या-वर्णनं For Para Lise Only ~126~ २५ शतके उद्देशः २ जीवानन्त्यं सू ७२० ॥ ८५५॥ www.landbrary or Page #127 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (०५) [भाग-११]"भगवती"-अंगसूत्र-५ (मूलं+वृत्ति:) शतक [२५], वर्ग [-], अंतर्-शतक [-], उद्देशक [२], मूलं [७२०] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र- [०५], अंगसूत्र- [०५] "भगवती मूलं एवं अभयदेवसूरि-रचिता वृत्ति: प्रत सूत्रांक [७२०] हादसविहा प०,०-खंधा इत्यादि, तथा ते णं भंते ! किं संखेजा असंखेजा अर्णता ?, गोयमा ! नो संखेजा नो असंखेजा अर्णता, से केण?णं भंते ! एवं बुच्चइ ?, गोयमा! अर्णता परमाणू अर्णता दुपएसिया खंधा अर्णता तिपएसिया खंधा जाव अर्णता अणंतपएसिया खंधत्ति ॥ द्रव्याधिकारादेवेदमाह जीवदवाणं भंते ! अजीबदद्या परिभोगत्ताए हवमागच्छंति अजीवदवाणं जीवदया परिभोगत्ताए | हबमागच्छंति ?, गोयमा ! जीवदवाणं अजीवदवा परिभोगत्ताए हवमागच्छति नो अजीवदवाणं जीवदवा परिभोगत्ताए हवमागच्छंति, से केणटेणं भंते ! एवं वुचइ जाव हत्वमागच्छंति ?, गोयमा ! जीवदवाणं अजीवदचे परियादियंति अजीव० २ ओरालियं वेउब्वियं आहारगं तेयगं कम्मर्ग सोइंदियं जाब फासिंदियं । मणजोगं वइजोगं कायजोगं आणापाणत्तं च निवत्तियंति से तेणडेणं जाव हदमागच्छंति, नेरतिया || भंते ! अजीवदचा परिभोगत्ताए हवमागच्छंति अजीवदवाणं नेरतिया परिभोगत्ताए ?, गोयमा ! नेरतियाणं अजीवदया जाव हवमागच्छति नो अजीवदवाणं नेरतिया हवमागच्छति, से केण?णं ?, गोयमा ! नेरतिया अजीवदवे परियादियंति अ०२ वेवियतेयगकम्मगसोइंदियजाव फासिदियं आणापाणुत्तं चतु निवत्तियंति, से तेणडेणं गोयमा ! एवं बुच्चइ जाव वेमाणिया नवरं सरीरइंदियजोगा भाणियवा जस्स जे अस्थि (सूत्रं ७२१)। दीप अनुक्रम [८६६] ~127~ Page #128 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (०५) प्रत सूत्रांक [७२२] दीप अनुक्रम [८६८] [भाग-११]“भगवती”– अंगसूत्र -५ (मूलं + वृत्ति:) शतक [२५], वर्ग [-], अंतर् शतक [-] उद्देशक [२], मूलं [ ७२२] पूज्य आगमोद्धारकश्री संशोधितः मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित.. आगमसूत्र - [०५] अंगसूत्र- [ ०५] "भगवती" मूलं एवं अभयदेवसूरि-रचिता वृत्तिः व्याख्याप्रज्ञप्तिः अभयदेवीया वृत्तिः २ ॥८५६॥ 'जीवदवाणं भंते! अजीवदद्दे' त्यादि, इह जीवद्रव्याणि परिभोजकानि सचेतनत्वेन ग्राहकत्वात् इतराणि तु परिभोग्यान्यचेतनतया ग्राह्यत्वादिति ॥ द्रव्याधिकारादेवेदमाह ii ! असंखे लोए अनंताई दबाई आगासे भइयवाई ?, हंता गोयमा ! असंखेज्जे लोए जाव भवियवाई | लोगस्स णं भंते ! एगंमि आगासपपसे कतिदिसिं पोग्गला चिनंति ?, गोयमा ! निवाघाएणं हेग्यतानछद्दिसिं वाघायें पहुंच सिय तिदिसिं सिय चउदिसिं सिय पंचदिसिं लोगस्स णं भंते ! एगंमि आगासपरसे कतिदिसिं पोग्गला हिज्जेति एवं चेच, एवं उवचिनंति एवं अवचिति (सूत्रं ७२२ ) ॥ न्तपुङ्गलावगाहः सू ७२१-७२२ 'से नूण' मित्यादि, 'असंखेल'ति असङ्ख्यातप्रदेशात्मके इत्यर्थः 'अनंताई दबाई'ति जीवपरमाण्वादीनि 'आगासे भइयवाई'ति काक्काऽस्य पाठः सप्तम्याश्च पष्ठयर्थत्वादाकाशस्य 'भक्तव्यानि भर्त्तव्यानि धारणीयानीत्यर्थः, | पृच्छतोऽयमभिप्रायः कथमसङ्ख्यातप्रदेशात्मके लोकाकाशेऽनन्तानां द्रव्याणामवस्थानं ?, 'हंता' इत्यादिना तत्र तेषामनन्तानामप्यवस्थानमावेदितम्, आवेदयतश्चायमभिप्रायः यथा प्रतिनियतेऽपवरकाकाशे प्रदीपप्रभापुद्गलपरिपूर्णेऽप्यरापरप्रदीपप्रभागला जवतिष्ठन्ते तथाविधपुद्गलपरिणामसामर्थ्यात् एवमसङ्ख्यातेऽपि लोके तेष्वेव २ प्रदेशेषु | द्रव्याणां तथाविधपरिणामवशेनावस्थानादनन्तानामपि तेषामवस्थानमविरुद्धमिति । असङ्ख्यात लोकेऽनन्तद्रव्याणामवस्थानमुक्तं तचैकैकस्मिन् प्रदेशे तेषां चयापचयादिमन्द्भवतीत्यत आह- 'लोगस्से' त्यादि ॥ 'कतिदिसिं पोग्गला | चिनंति'त्ति कतिभ्यो दिग्भ्य आगत्यैकत्राकाशप्रदेशे 'चीयन्ते' लीयन्ते 'छिज्जंति'त्ति व्यतिरिक्ता भवन्ति 'उव चिज्जंति' Educatin internation For Pasta Lise Only २५ शतके उद्देशः २ अजीवभो ~ 128~ ॥८५६॥ Page #129 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (०५) [भाग-११]"भगवती"-अंगसूत्र-५ (मूलं+वृत्ति:) शतक [२५], वर्ग [-], अंतर्-शतक [-], उद्देशक [२], मूलं [७२२] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र- [०५], अंगसूत्र- [०५] "भगवती मूलं एवं अभयदेवसूरि-रचिता वृत्ति: प्रत सूत्रांक [७२२] त्ति स्कन्धरूपाः पुद्गलाः पुगलान्तरसम्पर्कादुपचिता भवन्ति 'अवचिजंति'त्ति स्कन्धरूपा एवं प्रदेशविचटनेनापची. भयन्ते । द्रव्याधिकारादेवेदमाह जीवे णं भंते ! जाई दवाई ओरालियसरीरत्ताए गेहइ ताई किं ठियाई गेण्हइ अठियाई गेण्हह , द्र गोयमा ! ठियाईपि गेण्हइ अठियाईपि गेण्हइ, ताई भंते ! किं दवओ गेण्हा खेत्तओ गेण्हइ कालओ गेण्हइ भाचओ गेण्हइ ?, गोयमा ! दवओवि गेण्हइ खेत्तओवि गेण्हइ कालओवि गेण्हइ भावओवि गेण्हइ ताई दवओ अणंतपएसियाई दवाई खेत्तओ असंखेजपएसोगाढाई एवं जहा पन्नवणाए पढमे 18 आहारुद्देसए जाब निवाघाएणं छदिसिं वाघायं पडुब सिय तिदिसि सिय चउदिसिं सिय पंचदिसिं॥ जीवे णं भंते ! जाई दवाई बेउवियसरीरत्ताए गेण्हइ ताई किं ठियाई गे• अठियाई गे?, एवं चेव नवरं नियम छदिसि एवं आहारगसरीरत्ताएवि ॥ जीवे णं भंते ! जाई दवाई तेषगसरीरसाए गिण्हा पुच्छा, गोयमा ! ठियाई गेण्हइ नो अठियाई गेण्हइ सेसं जहा ओरालियसरीरस्स कम्मगसरीरे एवं चेव एवं जाव है भावओवि गिण्हह, जाई दवाई दवओगे ताई किं एगपएसियाई गेण्हइ दुपएसियाई गेण्हा? एवं जहा |भासापदे जाव अणुपुर्वि गेनो अणाणुपुर्वि गेहइ, ताई भंते ! कतिदिसि गेण्हा?, गोपमा ! निवा-1 घाएणं जहा ओरालियरस ॥ जीवे णं भंते ! जाई दवाई सोइंदियत्ताए गे० जहा वेउबियसरीरं एवं जाय जिभिदियत्ताए फासिंदियत्ताए जहा ओरालियसरीरं मणजोगत्ताए जहा कम्मगसरीरं नवरं नियम है F दीप अनुक्रम [८६८] ACES ~129~ Page #130 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (०५) [भाग-११]"भगवती"-अंगसूत्र-५ (मूलं+वृत्ति:) शतक [२५], वर्ग -], अंतर्-शतक [-], उद्देशक [२], मूलं [७२३] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र- [०५], अंगसूत्र- [०५] "भगवती मूलं एवं अभयदेवसूरि-रचिता वृत्ति: प्रत सूत्रांक [७२३] दीप अनुक्रम [८६९] व्याख्या- छदिसिं एवं वइजोगत्ताएवि कायजोगत्ताएवि जहा ओरालियसरीरस्स । जीवे णं भंते ! जाई दवाइं आणा- २५ शतके प्रज्ञप्तिः पाणत्ताए गे० जहेच ओरालियसरीरत्ताए जाव सिय पंचदिसि । सेवं भंते २त्ति । केह चउवीसदंडएणं एयाणि उद्देशः२ अभयदेवीपदाणि भन्नति जस्स जं अस्थि ( सूत्र ७२३) ॥२५-२॥ द्रव्यग्रहे या वृत्तिः२ 'जीवे णमित्यादि, 'ठियाईति स्थितानि-किं जीवप्रदेशावगाढक्षेत्रस्याभ्यन्तरवतींनि अस्थितानि च-तदनन्तर स्थितादि सू ७२३ ॥८५७॥ वतीनि, तानि पुनरीदारिकशरीरपरिणामविशेषादाकृष्य गृह्णाति, अन्ये स्वाहुः-स्थितानि तानि यानि नैजन्ते तद्विपरी तानि त्वस्थितानि, 'किं दचओ गेण्हंति' किं द्रव्यमाश्रित्य गृह्णाति द्रव्यतः किंस्वरूपाणि गृहाती त्यर्थः, एवं क्षेत्रतः क्षेत्रमाश्रित्य कतिप्रदेशावगाढानीत्यर्थः ॥ वैक्रियशरीराधिकारे-'नियम छदिसिति यदुक्तं तत्रायमभिप्रायः क्रियशजारीरी पञ्चेन्द्रिय एव प्रायो भवति स च त्रसनाड्या मध्ये एव तत्र च षण्णामपि दिशामनावृतत्वमलोकेन विवक्षितलोक-13 ४ देशस्येत्यत पुच्यते-'नियम छद्दिसिं'ति, यच्च वायुकायिकानां त्रसनाच्या बहिरपि वैक्रियशरीरं भवति तदिह न विव-8 क्षितं अप्रधानत्वात्तस्य, तथाविधलोकान्तनिष्कुटे वा वैक्रियशरीरी वायुर्न संभवतीति ॥ तैजससूत्रे-'ठियाई गेण्हई त्ति जीवावगाहक्षेत्राभ्यन्तरीभूतान्येव गृह्णाति 'नो अठियाई गिण्हइति न तदनन्तरवर्तीनि गृह्णाति, तस्याकर्षपरिणामा६ भावात्, अथवा स्थितानि-स्थिराणि गृह्णाति नो अस्थितानि-अस्थिराणि तथाविधस्वभावत्वात् 'जहा भासापदे'त्ति यथा * प्रज्ञापनाया एकादशे पदे तथा वाच्यं, तच 'तिपएसियाई गिण्हाति जाव अणंतपएसियाई गिण्हई' इत्यादि, ८५ श्रोत्रेन्द्रियसूत्रे-'जहा वेउवियसरीरं'ति यथा वैक्रियशरीरद्रव्यग्रहणं स्थितास्थितद्रव्यविषयं षड्दिकं च एवमिदमपि, ~130 Page #131 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (०५) [भाग-११]"भगवती"-अंगसूत्र-५ (मूलं+वृत्ति:) शतक [२५], वर्ग -], अंतर्-शतक [-], उद्देशक [२], मूलं [७२३] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र- [०५], अंगसूत्र- [०५] "भगवती मूलं एवं अभयदेवसूरि-रचिता वृत्ति: CC प्रत सूत्रांक श्रोत्रेन्द्रियद्रव्यग्रहणं हि नाडीमध्य एव तत्र च 'सिय तिदिसिमित्यादि नास्ति व्याघाताभावादिति । 'फासिंदियत्ताए जहा ओरालियसरीरं'ति, अयमर्थः-स्पर्शनेन्द्रियतया तथा द्रव्याणि गृह्णाति यथौदारिकशरीरं स्थितास्थितानि पइदिगागतप्रभृतीनि चेति भावः, 'मणजोगत्ताए जहा कम्मगसरीरं नवरं नियम छदिसिंति मनोयोगतया | तथा द्रव्याणि गृह्णाति यथा कार्मण, स्थितान्येव गृहातीति भावः, केवलं तत्र व्याघातेनेत्यायुक्तं इह तु नियमात् पदिशीत्येवं वाच्यं, नाडीमध्य एव मनोद्रव्यग्रहणभावात् , अत्रसानां हि तन्नास्तीति, 'एवं वइजोगत्ताएवि'त्ति मनोद्रव्यवद्वा गद्रव्याणि गृह्णातीत्यर्थः, 'कायजोगत्ताए जहा ओरालियसरीरस्सत्ति काययोगद्रव्याणि स्थितास्थितानि षदिगाग18|| तमभृतीनि चेत्यर्थः । केई' इत्यादि तत्र पश्च शरीराणि पश्चेन्द्रियाणि त्रयो मनोयोगादयः आनमाणं चेति सर्वाणि चतु-|| |देश पदानि तत एतदाश्रिताश्चतुर्दशैव दण्डका भवन्तीति ॥ पञ्चविंशतितमशते द्वितीयः ॥ २५॥२॥ [७२३] दीप अनुक्रम [८६९] CRECR-61-%% द्वितीयोद्देशके द्रव्याण्युक्तानि, तेषु च पुद्गला उक्तास्ते च प्रायः संस्थानवन्तो भवन्तीत्यतस्तृतीये संस्थानान्युच्यन्ते, 15 इत्येवंसम्बद्धस्यास्येदमादिसूत्रम् कति णभंते ! संठाणा प०१, गोयमा! छ संठाणा प०, तं०-परिमंडले बहे तसे चउरंसे आयते अणित्थंथे, परिमंडला णं भंते ! संठाणा दट्टयाए कि संखेजा असंखेजा अर्णता, गोयमा! नो संखे० नो असंखे० अर्णता, वहा णं भंते ! संठाणा एवं चेव एवं जाव अणित्वंथा एवं पएसट्टयाएवि, एएसि णं भंते ।। अत्र पञ्चविंशतितमे शतके दवितीय उद्देशक: परिसमाप्त: अथ पञ्चविंशतितमे शतके तृतीय-उद्देशक: आरभ्यते संस्थानं, तस्य भेदा:, ~131 Page #132 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (०५) [भाग-११]"भगवती"-अंगसूत्र-५ (मूलं+वृत्ति:) शतक [२५], वर्ग [-], अंतर्-शतक [-], उद्देशक [३], मूलं [७२४] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र- [०५], अंगसूत्र- [०५] "भगवती मूलं एवं अभयदेवसूरि-रचिता वृत्ति: प्रत सूत्रांक [७२४] व्याख्या- परिमंडलवतंसचउरंसआयतअंणिधंधाणं संठाणाणं दबट्टयाए पएसट्टयाए दबट्टपएसट्टयाए कयरेशहि- २५ शतके प्रज्ञप्ति | तो जाव विसेसाहिया वा?, गोयमा! सबथोषा परिमंडलसंठाणा दबयाए बट्टा संठाणा दषट्टयाए उद्देशः३ अभयदेवी- संखेजगुणा चउरंसा संठाणा दबट्टयाए संखेज्जगुणा तंसा संठाणा दबट्टयाए संखेजगुणा आयतसंठाणा संस्थानानि या वृत्तिः२४ | सू७२४ दवट्टयाए संखेज्जगुणा अणित्थंथा संठाणा दबट्टयाए असंखेजगुणा, पएसट्टयाए सवत्थोवा परिमंडला संठाणा ८५८॥ पएसट्टयाए बट्टा संठाणा संखेजगुणा जहा वट्टयाए तहा पएसट्टयाएवि जाव अणित्या संठाणा पएसयाए असंखेजगुणा, दबट्ठपएसट्टयाए सबथोवा परिमंडला संठाणा दबट्टयाए सो चेव गमओ भाणियषो जाव अणित्थंथा संठाणा दव० असंखे० अणित्थंधेहिंतो संठाणेहितो दबट्टयाए परिमंडला संठाणा पएसटु. असंखे० वट्टा संठाणा पएसट संखे सो चेव पएसट्टयाए गमओ भाणि जाव अणिस्थंथा संठाणा पएसदृयाए असंखेनगुणा (सूत्रं ७२४)। 'कहणं भंते ! इत्यादि, संस्थानानि-स्कन्धाकाराः 'अणित्थंयत्ति इस्थम्-अनेन प्रकारेण परिमण्डलादिना तिष्ठतीति द इत्थंस्थं न इत्थंस्थमनित्धंस्थं परिमण्डलादिव्यतिरिक्तमित्यर्थः, 'परिमंडला णं भंते ! संठाण'त्ति परिमण्डलसंस्थानवन्ति | भदन्त द्रव्याणीत्यर्थः 'दबट्टयाए'त्ति द्रव्यरूपमर्थमाश्रित्येत्यर्थः 'पएसट्टयाए'त्ति प्रदेशरूपमर्थमाश्रित्येत्यर्थः 'दषट्ठपए ॥८५८॥ सट्टयाए'त्ति तदुभयमाश्रित्येत्यर्थः 'सबस्थोवा परिमंडलसंठाणे'ति इह यानि संस्थानानि यत्संस्थानापेक्षया बहुतर-15 || प्रदेशावगाहीनि तानि तेदपक्षया स्तोकानि तथाविधस्वभावत्वात, तत्र च परिमण्डलसंस्थानं जघन्यतोऽपि विंशतिप्रदेशा दीप अनुक्रम [८७०] SAREnafinintimational संस्थानं, तस्य भेदा:, ~132 Page #133 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (०५) [भाग-११]"भगवती"-अंगसूत्र-५ (मूलं+वृत्ति:) शतक [२५], वर्ग [-], अंतर्-शतक [-], उद्देशक [३], मूलं [७२४] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र- [०५], अंगसूत्र- [०५] "भगवती मूलं एवं अभयदेवसूरि-रचिता वृत्ति: - प्रत सूत्रांक - 59-2-945440-45645%456 [७२४] - - वगाहादहुतरप्रदेशावगाहि वृत्तचतुरस्रत्यनायतानि तु क्रमेण जघन्यतः पञ्चचतुखिद्विप्रदेशावगाहित्वादल्पप्रदेशावगाहीन्यतः सर्वेभ्यो बहुतरप्रदेशावगाहित्वात्परिमण्डलस्य परिमण्डलसंस्थानानि सर्वेभ्यः सकाशास्तोकानि, तेभ्यश्च क्रमेणा-15 न्येषामपाल्पतरप्रदेशावगाहित्वात्क्रमेण बहुतरत्वमिति सख्येयगुणानि तान्युक्तानि, 'अणिधंथा संठाणा दट्टयाए असंखेज्जगुण'त्ति अनित्वंस्थसंस्थानवन्ति हि परिमण्डलादीनां व्यादिसंयोगनिष्पन्नस्वेन तेभ्योऽतिवहूनीतिकृत्वाऽसह. ख्यातगुणानि पूर्वेभ्य उक्तानि, प्रदेशार्थचिन्तायां तु द्रव्यानुसारित्वात्तदेशानां पूर्ववदल्यवहुत्वे याच्ये, एवं द्रव्यार्थप्रदेशार्थचिन्तायामपि, विशेषस्त्वयं-द्रव्यतोऽनित्थंस्थेभ्यः परिमण्डलानि प्रदेशतोऽसङ्ख्येयगुणानीत्यादि वाच्यमिति ॥ कृता |सामान्यतः संस्थानप्ररूपणा, अथ रलप्रभाद्यपेक्षया तां चिकीर्षुः पूर्वोक्तमेवार्थ प्रस्तावनार्थमाह कति णं भंते ! संठाणा पन्नता, गोषमा ! पंच संठाणा पं०-परिमंडले जाव आयते। परिमंडला | |भंते ! संठाणा किं संखेजा असंखेजा अर्णता ?, गोषमा ! नो संखे० नो असं० अर्णता, बट्टा णं भंते ! संठाणा किं संखेजा, एवं चेव एवं जाव आयता । इमीसे णं भंते ! रयणप्पभाए पुढवीए परिमंडला संठाणा किं संखेजा असंखे० अणता ?, गोयमा 1 नो संखे० नो असंखे० अर्णता, बट्टा णं भंते ! संठाणा किं| संखे० असं एवं चेव, एवं जाव आयया । सकरप्पभाए गंभंते ! पुढवीए परिमंडला संठाणां एवं चेव एवं जाव आयया एवं जाव अहेसत्तमाए । सोहम्मे णं भंते ! कप्पे परिमंडला संठाणा एवं चेव एवं जाव अचुए, गेविजविमाणा णं भंते ! परिमंडलसंठाणा एवं चेव, एवं अणुत्तरविमाणेसुवि, एवं ईसिपब्भाराएवि ॥5 - दीप अनुक्रम [८७०] - - - संस्थानं, तस्य भेदा:, ~133 Page #134 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (०५) [भाग-११]"भगवती"-अंगसूत्र-५ (मूलं+वृत्ति:) शतक [२५], वर्ग [-], अंतर्-शतक [-], उद्देशक [३], मूलं [७२५] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र- [०५], अंगसूत्र- [०५] "भगवती मूलं एवं अभयदेवसूरि-रचिता वृत्ति: प्रत सूत्रांक [७२५] दीप व्याख्या- जत्थ णं भंते ! एगे परिमंडले संठाणे जवमझे तत्थ परिमंडला संठाणा किं संखेज्जा असंखेजा अणंता, || || २५ शतके प्रज्ञप्तिः अभयदेवी गोयमा! नो संखे० नो असं० अर्णता । वहा णं भंते ! संठाणा किं संखेजा असं० चेव एवं जाव आयता उद्देशा३ या तिजस्थ णं भंते ! एगे पट्टे संठाणे जवमझे तत्थ परिमंडला संठाणा एवं चेव चट्टा संठाणा एवं चेव एवं जाव | रत्नप्रभादि आयता, एवं एकेकेणं संठाणेणं पंचवि चारेयवा, जत्थ णं भंते ! इमीसे रयणप्पभाए पुढवीए एगे परिमंडले || संस्थाना निसू७२५ संठाणे जवमझे तत्थ णं परिमंडलासंठाणा किं संखेजा पुच्छा, गोयमा! नो संखेजा नो असंखेजा अणंता, वहा णं भंते ! संठाणा किं संखे० पुच्छा, गोयमा! नो संखे० नो असंखेज्जा अर्णता एवं चेव जाव आयता, जत्थ णं भंते ! इमीसे रयण पुढचीए एगे वट्टे संठाणे जवमझे तत्थ णं परिमंडला संठाणा किं संखेना? पुच्छा, गोयमा ! नो संखे० नो असं० अर्णता, बट्टा संठाणा एवं चेव जाव आयता, एवं पुणरवि एकेकेणं है संठाणेणं पंचवि चारेयधा जहेव हेडिल्ला जाव आयताणं एवं जाच अहेसत्तमाए एवं कप्पेमुवि जाव ईसी-| फभाराए पुढवीए (सूत्रं ७२५)॥ * 'करण' मित्यादि, इह षष्ठसंस्थानस्य तदन्यसंयोगनिष्पन्नत्वेनाविवक्षणात् पश्चेत्युक्तम् ॥अथ प्रकारान्तरेण तान्याह'जस्थ ण' मित्यादि, किल सर्वोऽप्ययं लोकः परिमण्डलसंस्थानद्रव्यै निरन्तरं व्याप्तस्तत्र च कल्पनया यानि २ तुल्यप्रदे-11 1८५९|| शावगाहीनि तुल्यप्रदेशानि तुल्यवर्णादिपर्यवाणि च परिमण्डलसंस्थानवन्ति द्रव्याणि तानि तान्येकपतयां स्थाप्यन्ते,8 एकमेकैकजातीयेष्वेकैकपङ्क्त्यामौत्तराधर्येण निक्षिप्यमाणेष्वल्पबहुत्वभावाद् यवाकारः परिमण्डलसंस्थानसमुदायो भवति, अनुक्रम [८७१] संस्थानं, तस्य भेदा:, ~134 Page #135 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (०५) [भाग-११]"भगवती"-अंगसूत्र-५ (मूलं+वृत्ति:) शतक [२५], वर्ग - अंतर-शतक -1, उद्देशक [३], मलं ७२५] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र- [०५, अंगसूत्र- [०५] "भगवती मूलं एवं अभयदेवसूरि-रचिता वृत्ति: प्रत सूत्रांक [७२५]] तत्र किल जघन्यप्रदेशिकद्रव्याणां वस्तुस्वभावेन स्तोकत्वादाद्या पतिर्हस्वा ततः शेषाणां क्रमेण बहुबहुतरत्वाद्दीर्घदीर्घ-1 तरा ततः परेषां क्रमेणाल्पतरत्वात् हस्वहस्वतरैव यावदुत्कृष्टप्रदेशानामल्पतमत्वेन ह्रस्वतमेत्येवं तुल्यैस्तदन्यैश्च परिमण्डलदि द्रव्यैर्यवाकार क्षेत्रं निष्पाद्यत इति, इदमेवानित्योच्यते-'जस्थति यत्र देशे 'एगे'सि एक 'परिमंडले'त्ति परिमण्डलं संस्थानं वर्तत इति गम्यते, 'जवमझे ति यवस्येव मध्य-मध्यभागो यस विपुलत्वसाधात्तदू यबमध्य यवाकारमित्यर्थः, तत्र यवमध्ये परिमण्डलसंस्थानानि-यवाकारनिर्वर्तकपरिमण्डलसंस्थानव्यतिरिक्तानि कि सङ्ख्यातानि ? इत्यादिप्रश्नः, उत्तरं स्वनन्तानि यवाकारनिर्वर्तकेभ्यस्तेषामनन्तगुणत्वात् तदपेक्षया च यवाकारनिष्पादकानामनन्तगुणहीनत्वा-| दिति ॥ पूर्वोक्तामेव संस्थानमरूपणां रसप्रभादिभेदेनाह-जत्थेत्यादि सूत्रसिद्धम् ॥ अथ संस्थानान्येव प्रदेशतोऽव-|| गाहतश्च निरूपयन्नाह वट्टेणं भंते ! संठाणे कतिपदेसिए कतिपदेसोगाढे १०१, गोयमा! बहे संठाणे दुविहे प०-घणवहे य | पयरवट्टे य, तत्थ णं जे से पयरव से दुविहे प००-ओयपएसे य जुम्मपएसे य, तत्थ णं जे से ओयपएसिए से जहन्नेणं पंचपएसिए पंचपएसोगाढे उक्कोसेणं अणंतपएसिए असंखेजपएसोगाडे, तत्थ णं जे से जुम्मपए|सिए से जहन्नेणं यारसपएसिए वारसपएसोगाढे उकोसेणं अणंतपएसिए असंखेजपएसोगाढे, तत्थ णं जे से घणवढे से दुविहे प०,०-ओयपएसिए य जुम्मपएसिए य, तत्थ णं जे से ओयपएसिए से जहा । सत्तपएसिए सत्तपएसोगाढे प.उकोसेणं अणंतपएसिए असंखेजपएसोगादे प०, तत्थ णं जे से जुम्मपएसिए दीप ESSAGARASINICAGAR अनुक्रम [८७१] WHICTIELDram.org ~135 Page #136 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (०५) प्रत सूत्रांक [७२६] दीप अनुक्रम [८७२] [भाग-११]“भगवती”– अंगसूत्र -५ (मूलं + वृत्ति:) शतक [२५], वर्ग [-], अंतर् शतक [-] उद्देशक [३], मूलं [ ७२६] पूज्य आगमोद्धारकश्री संशोधितः मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित.. आगमसूत्र - [०५] अंगसूत्र- [ ०५] "भगवती" मूलं एवं अभयदेवसूरि-रचिता वृत्तिः व्याख्याप्रज्ञप्तिः अभयदेवीया वृत्तिः २ ॥८६०॥ से जहनेणं बत्तीसपएसिए बत्तीसपएसोगाढे ५०, उक्कोसेणं अनंतपएसिए असंखेजपएसोगादे || तंसे णं भंते! संठाणे कतिपदेसिए कतिपदेसोगाढे प० १, गोषमा ! तंसे णं संठाणे दुविहे पं० तं० घणतंसे प पपरतंसे य, तत्थ णं जे से पपरतंसे से दुविहे पं० तं०-ओयपएसिए य जुम्मपएसिए य, तत्थ णं जे से ओयपएसिए से जह० तिपएसिए तिपएसोगाढे ५० उकोसेणं अनंतपएसिए असंखेजपरसोगाढे, तत्थ णं जे से जुम्मपएसिए से जहनेणं छप्पएसिए छप्पएसोगाडे ५० उकोसेणं अनंतपएसिए असंखेज्जपएसोगा प०, तत्थ णं जे से घणतंसे से दुविहे प०, तं०-ओपएसिए जुम्मपएसिए य, तत्थ णं जे से ओपए सिए से जहनेणं पणतीसपएसिए पणतीसपएसोगाढे उक्कोसेणं अनंतपएसिए तं चैव तत्थ णं जे से जुम्मपएसिए से जलेणं ४ चप्पएसिए चउप्पएसोगाढे १० उक्को० अनंतपएसिए तं चैव ॥ चउरंसे णं भंते संठाणे कतिपदेसिए ? पुच्छा, गोयमा ! चउरंसे ठाणे दुबिहे प० भेदो जहेब बट्टस्स जाव तत्थ णं जे से ओपएसिए से जहनेणं नवपएसिए नवपएसो गाढे प०, उक्कोसेणं अनंतपएसिए असंखेचप एसोगाढे ५०, तत्थ णं जे से जुम्मपदेसिए से जहनेणं चउपएसिए चउपरसोगाढे प० उक्कोसेणं अनंतपएसिए तं चैव तत्थ णं जे से घणचउरंसे से दुविहे प०, तंजा-ओपपएसिए जुम्भपएसिए, तत्थ णं जे से ओपपरसिए से जहनेणं सत्तावीसइपए| सिए सत्तावीसतिपए सोगाढे उक्को० अणतपएसिए तहेब तत्थ जे से जुम्मपएसिए से जहनेणं अट्ठपएसिए अपएसोगाडे प० उक्को० अनंतपएसिए तहेब || आयए णं भंते ! संठाणे कतिपदेसिए कतिपए सोगाढे प० १ Eucation International For Penal Use Only ~ 136~ २५ शतके उद्देशः ३ वृत्तादीनां प्रदेशावगा ही सू. ७२६ १८६०॥ Page #137 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (०५) [भाग-११]"भगवती"-अंगसूत्र-५ (मूलं+वृत्ति:) शतक [२५], वर्ग [-], अंतर्-शतक [-], उद्देशक [३], मूलं [७२६] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र- [०५], अंगसूत्र- [०५] "भगवती मूलं एवं अभयदेवसूरि-रचिता वृत्ति: प्रत सूत्रांक [७२६] गोयमा ! आयए णं संठाणे तिविहे प० तं-सेढिआयते पयरायते धणायते, तत्थ णं जे से सेडिआयते से बिहे ०,०-ओयपएसिए य जुम्मपएसिए य, तत्थ णं जे ओयप० से जह तिपएसिए तिपएसोगाढे उको अणं-12 तपए तं चेव, तस्थ गंजे से जुम्मपएसे जह दुपएसिए दुपएसोगाढे उकोसेणं अणता तहेव तत्थ णं जे से पयरायते से दुविहे पं०, तं०-ओयपएसिए य जुम्मपएसिए य, तत्थ णं जे से ओयपएसिए से जहन्नेणं पत्नरसपएसिए पन्नरसपएसोगाढे उकोसेणं अणंत तहेव, तस्थ णं जे से जुम्मपएसिए से जहन्नेणं छप्पएसिए छपएसोगाढे उकोसेणं अणंत तहेच, तत्थ णं जे से घणायते से दुविहे पं०२०-ओयपएसिए जुम्मपएसिए, तस्थ णं जे से ओयपएसिए से जहनेणं पणयालीसपएसिए पणयालीसपएसोगाढे उकोसेगं अगंत. तहेव, तत्ध णं जे से जुम्मपएसिए से जहा बारसपएसिए बारसपएसोगाढे उकोसेणं अगंत. तहेव । परिमंडले गंभंते ! संठाणे। कतिपदेसिए ? पुच्छा, गोयमा! परिमंडले णं संठाणे दुविहे पं०, तं-घणपरिमंडले य पयरपरिमंडले य, तत्थ णं जे से पयरपरिमंडले से जहन्नेणं वीसतिपदेसिए वीसइपएसोगाढे उक्कोसेणं अर्णतपदे० तहेव, तत्थ दाणं जे से घणपरिमंडले से जहन्नेणं चत्तालीसतिपदेसिए चत्तालीसपएसोगाढे प०, उकोसेणं अणंतपएसिएर असंखेजपएसोगाढे पन्नत्ता (सूत्रं ७२६)॥ | 'बट्टे ण' मित्यादि, अथ परिमण्डल पूर्वमादावुक्तं इह तु कस्मात्तत्यागेन वृत्तादिना क्रमेण तानि निरूप्यन्ते ?, उच्यते, 18 वृत्तादीनि चत्वार्यपि प्रत्येकं समसजयविषमसलयप्रदेशान्यतस्तत्साधर्मात्तेषां पूर्वमुपन्यासः परिमण्डलस्य पुनरेतदभावात्प दीप अनुक्रम [८७२] BACKAGRAT ~137 Page #138 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (०५) प्रत सूत्रांक [७२६] दीप अनुक्रम [८७२] [भाग-११]“भगवती”- अंगसूत्र - ५ (मूलं + वृत्ति:) शतक [२५], वर्ग [-], अंतर् शतक [-] उद्देशक [३], मूलं [ ७२६] पूज्य आगमोद्धारकश्री संशोधितः मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित.. आगमसूत्र - [०५] अंगसूत्र- [ ०५] "भगवती" मूलं एवं अभयदेवसूरि-रचिता वृत्तिः व्याख्या. प्रज्ञष्ठिः अभयदेवीया वृत्तिः २ ॥८६॥ चाद् विचित्रत्वाद्वा सूत्रगतेरिति, 'घणवट्टे' त्ति सर्वतः समं घनवृत्तं मोदकवत् 'पयरवट्टे' त्ति बाल्यतो हीनं तदेव प्रतरवृत्तं मण्डकवत्, 'ओयप एसिए' ति विषमसत्यप्रदेश निष्पन्नं 'जुम्मपएसिए' ति समसज्ञयप्रदेशनिष्पन्नं, 'तत्थ पां जे से ओयपरसिए परबट्टे से जहनेणं पंचपएसिए' इत्यादि, इत्थं पञ्चप्रदेशावगाढं पश्चाणुकात्मकमित्यर्थः, उत्कर्षेणानन्तप्रदेशिकमसयेयप्रदेशावगाढं लोकस्याप्यसत्येयप्रदेशात्मकत्वात्, 'जे से जुम्मपएसिए से जहनेणं वारसपएसिए' इति, एतस्य स्थापना- 'जे से ओयपएसिए घणवट्टे से जहनेणं सत्तपएसिए सत्तपएसोगादे त्ति, एतस्य स्थापनाअस्य मध्यपरमाणोरुपर्येकः स्थापितोऽधश्चैक इत्येवं सप्तप्रदेशिकं धनवृत्तं भवतीति, 'जे से जुम्मपएसिए से जहनेणं बत्तीसइएसिए' इत्यादि, एतस्य स्थापना- ॐ अस्य चोपरीदृश एव प्रतरः स्थाप्यस्ततः सर्वे चतुर्विंशतिस्ततः प्रतरद्वयस्य मध्याणूनां चतुर्णामुपर्यन्ये चत्वारोऽपश्येत्येवं द्वात्रिंशदिति ॥ व्यस्नसूत्रे - 'जे से ओपएसिए से जहनेणं तिपएसिए'ति, अस्य स्थापना-2 'जे से जुम्मपएसिए से जहनेणं छप्पएसिए'ति अस्य स्थापना- 'जे से ओयपएसिए से जहनेणं पणतीसपएसिए'त्ति, अस्य स्थापना- अस्य पञ्चदशप्रदेशिकस्य प्रतरस्योपरि दशप्र-देशिकः एतस्याप्युपरि षट्प्रदेशिकः एतस्याप्युपरि त्रिप्रदेशिकः प्रतरः एतस्याप्युपर्येकः प्रदेशो दीयते इत्येवं पञ्चत्रिंशत्प्रदेशा इति । 'जे से जुम्मपएसिए से जहनेणं चउप्पएसिए' इति, अस्य स्थापना- 8. अत्रैकस्योपरि प्रदेशो दीयत इत्येवं चत्वार इति ॥ चतुरस्रसूत्रे - 'जे से ओपएसिए से जहनेणं नवपएसिए त्ति एवं 'जे से जुम्मपएसिए से जहनेणं चप्पएसिएत्ति, एवं 'जे से ओपएसिए से जहनेणं सत्तावीसपएसिए' ति एवमेतस्य नवप्रदेशिक any Internation For Peralata Use Only ~138~ २५ शतके उद्देशः ३ वृत्तादीनां प्रदशावगा ही सू ७२६ ॥८६॥ war Page #139 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (०५) [भाग-११]"भगवती"-अंगसूत्र-५ (मूलं+वृत्ति:) शतक [२५], वर्ग [-], अंतर्-शतक [-], उद्देशक [३], मूलं [७२६] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र- [०५], अंगसूत्र- [०५] "भगवती मूलं एवं अभयदेवसूरि-रचिता वृत्ति: प्रत सूत्रांक [७२६] दीप अनुक्रम [८७२] प्रतरस्योपर्यन्यदपि प्रतरद्वयं स्थाप्यत इत्येवं सप्तविंशतिप्रदेशिकं चतुरस्रं भवतीति, 'जे से जुम्मपएसिए से जहणं | अट्टपएसिए' त्येवं ॐ अस्योपर्यन्यश्चतुष्पदेशिकमतरो दीयत इत्येवमष्टप्रदेशिकं स्यादिति ।। आयतसूत्रे-सेहिआयए' ति श्रेण्यायत-प्रदेशश्रेणीरूपं 'प्रतरायतं कृतविष्कम्भश्रेणीद्वयादिरूपं 'घनायतं' बाहल्यविष्कम्भोपेतमनेकवेणीरूपं,15 तन श्रेण्यायतमोजाप्रदेशिक जघन्यं त्रिप्रदेशिक, तञ्चैवं- १ तदेव युग्मप्रदेशिकं द्विपदेशिकं तच्चै- 'जे से ओयपएसिए से जहन्नेणं पन्नरसपएसिए'त्ति एवं- तदेव युग्मप्रदेशिक जघन्यं षट्प्रदेशिकं तच्चैव-एवं घनायतमोजःप्रदेशिकं जघन्य पञ्चचत्वारिंशत्प्रदेशिकं तच्चैवम्- अस्योपर्यन्यत् प्रतरद्वयं स्थाप्यत इत्येवं पश्चचत्वा-2 रिंशत्प्रदेशिकं जघन्यमोजःप्रदेशिकं धनायतं भवति, तदेव युग्मप्रदेशिकं द्वादशप्रदेशिक, तच्चैवम्- 888. पतस्य षड्प्रदेशिकस्योपरि षट्प्रदेशिक एवान्यः प्रतरः स्थाप्यते ततो द्वादशप्रदेशिकं भवतीति ।। 'परिमंडले ण' मित्यादि, इह ओजो| युग्मभेदी न स्तः, युग्मरूपत्वेनैकरूपत्वात्परिमण्डलस्येति, तत्र प्रतरपरिमण्डलं जघन्यतो विंशतिप्रदेशिकं भवति, तदेवं | स्थापना- एतस्यैवोपरि विंशतिप्रदेशिकेऽन्यस्मिन् प्रतरे दत्ते चत्वारिंशत्प्रदेशिकं धनपरिमण्डलं भवतीति ।। अनन्तरं परिमण्डलं . प्ररूपितम्, अथ परिमण्डलमेवादी कृत्वा संस्थानानि प्रकारान्तरेण प्ररूपयन्नाह परिमंडले णं भंते ! संठाणे दचढ्याए किं कडजुम्मे तेओए दावरजुम्मे कलियोए ?, गोयमा ! नो कडजुम्मे णो तेयोए णो दावरजुम्मे कलियोए, बट्टे णं भंते ! संठाणे दबयाए एवं चेव एवं जाव आयते ॥ परिमंडला ण भंते ! संठाणा बट्टयाए किं कडजुम्मा तेयोया दावरजुम्मा कलियोगा पुच्छा, गोयमा ! ओघादेसेणं ~139~ Page #140 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (०५) प्रत सूत्रांक [७२७] दीप अनुक्रम [८७३] [भाग-११]“भगवती”– अंगसूत्र -५ (मूलं + वृत्ति:) शतक [२५], वर्ग [-], अंतर् शतक [-] उद्देशक [३], मूलं [ ७२७] पूज्य आगमोद्धारकश्री संशोधितः मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित.. आगमसूत्र- [०५] अंगसूत्र- [ ०५] "भगवती" मूलं एवं अभयदेवसूरि-रचिता वृत्तिः व्याख्या सिय कडजुम्मा सिय तेओगा सिय दावरजुम्मा सिय कलियोगा, विहाणादेसेणं नो कडजुम्मा नो तेओगा प्रज्ञप्तिः नो दावरजुम्मा कलिओगा एवं जाव आयता ॥ परिमंडले णं भंते । संठाणे पएसइयाए किं कटजुम्मे ? पुच्छा, अभयदेवी- ४ गोयमा ! सिय कडजुम्मे सिय तेयोगे सिय दावरजुम्मे सिय कलियोए एवं जाब आयते, परिमंडला णं भंते! या वृत्तिः २ | संठाणा परसट्टयाए किं कडजुम्मा ? पुच्छा, गोयमा ! ओघादेसेणं सिय कडजुम्मा जाव सिय कलियोगा ||८६२|| विहाणादेसेणं कडजुम्भावि तेओगावि दावरजुम्भावि कलियोगावि ४ एवं जाव आपता ॥ परिमंडले णं भंते! संठाणे किं कडजुम्मपरसोगाढे जाव कलियोगपरसोगाढे ?, गोवमा ! कडजुम्मपरसोगादे णो तेयोगपएसोगाढे नो दावरजुम्म परसोगाढे नो कलियोगपएसोगादे || बहे णं भंते ! संठाणे किं कहजुम्मे ? पुच्छा, गोयमा ! सिय कडजुम्मपदेसोगाढे सिय तेयोगपरसोगाढे नो दावरजुम्मपरसोगाढे सिघ कलियोगपएसोगाढे ॥ तसे णं भंते! संठाणे पुच्छा, गोयमा ! सिय कडजुम्मपए सोगाढे सिय तेयोगपएसोगाढे सिय दावरजुम्मपदेसोगाढे नो कलिओगपएसोगाढे । चउरंसे णं भंते! संठाणे जहा वट्टे तहा चउरंसेवि । आयए णं भंते ! पुच्छा, गोयमा ! सिय कडजुम्मपएसोगाढे जाव सिय कलिओगपएसोगाढे । परिमंडला णं भंते । संठाणा किं कडजुम्म परसोगाढा तेयोगपएसोगाढा ? पुच्छा, गोयमा ! ओघादेसेणवि विहाणादेसेणवि कडजुम्मपप| सोगाढा णो तेयोगपएसोगाढा नो दावरजुम्म परसोगाढा नो कलियोगपएसो गाढा । वहा णं भंते! संठाणा किं कडजुम्मपएसोगाढा पुच्छा, गोयमा ! ओघादेसेणं कडजुम्नपए सोगाढा नो तेयोगपएसोगाढा नो दावर For Parts Only ~ 140 ~ २५ शतके उद्देशः ३ संस्थानप्रदेशादिकृत युग्मादि सू ७२७ ॥८६२॥ Page #141 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (०५) [भाग-११]"भगवती"-अंगसूत्र-५ (मूलं+वृत्ति:) शतक [२५], वर्ग [-], अंतर्-शतक [-], उद्देशक [३], मूलं [७२७] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र- [०५], अंगसूत्र- [०५] "भगवती मूलं एवं अभयदेवसूरि-रचिता वृत्ति: प्रत सूत्रांक [७२७] जुम्मपएसोगाढा नो कलियोगपएसोगाढावि, तसा णं भंते ! संठाणा किं कडजुम्मा पुच्छा, गोयमा! ओघादे० करजुम्मपएसोगाढा नो तेयोगपएसोगाढा नो दावरजुम्मनो कलियोगपएसोगाढाथि विहाणादे० कजुम्मपएसोगा० तेयोगप० नो दावरजुम्मपएसोगानो कलियोगपएसोगाढा । चउरंसा जहा वहा । आयया णं भंते ! संठाणा पुच्छा, गोयमा! ओघादेसेणं कडजुम्मपएसोगाढा नो तेयोगपएसोगाढा नो पदावरजुम्मपएसोगाढा नो कलिओगपएसोगाढा विहाणादेसेणं कडजुम्मपएसोगाढावि जाव कलिओगपएसो गाढावि ॥ परिमंडले णं भंते ! संठाणे किं कडजुम्मसमयठितीए तेयोगसमयठितीए दावरजुम्मसमयट्टिनातीए कलिओगसमयठितीए ?, गोयमा । सिय कडजुम्मसमयठितीए जाव सिप कलिओगसमयठितीए एवं जाव आयते । परिमंडला णं भंते ! संठाणा किं कडजुम्मसमयठितीया पुच्छा, गोयमा ! ओघादेसेणं सिय कडजुम्मसमयद्वितीया जाव सिय कलियोगसमयहितीया, विहाणादेसेणं कडजुम्मसमयठितीयावि जाव कलियोगसमयठितीयावि, एवं जाव आयता । परिमंडले णं भंते! संठाणे कालवन्नपजवेर्हि किं कडजुम्मे जाव सिय कलियोगे?, गोयमा ! सिय कडजुम्मे एवं एएणं अभिलावेणं जहेव ठितीए एवं नीलवनपज्जवहिं। एवं पंचहिं चन्नेहिं दोहिं गंधेहिं पंचहिं रसेहिं अट्ठहिं फासेहिं जाव लुक्खफासपज्जवेहिं ।। (सूत्र ७२७) 'परिमंडले' त्यादि, परिमण्डलं द्रव्यार्थतयैकमेव द्रव्यं, न हि परिमण्डलस्यैकस्य चतुष्कापहारोऽस्तीत्येकत्वचिन्तायां न कृतयुग्मादिव्यपदेशः किन्तु कल्योजव्यपदेश एव, यदा तु पृथक्त्वचिन्ता तदा कदाचिदेतावन्ति तानि परिमण्डलानि दीप अनुक्रम [८७३] ~141 Page #142 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (०५) [भाग-११]"भगवती"-अंगसूत्र-५ (मूलं+वृत्ति:) शतक [२५], वर्ग -], अंतर्-शतक [-], उद्देशक [३], मूलं [७२७] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र- [०५], अंगसूत्र- [०५] "भगवती मूलं एवं अभयदेवसूरि-रचिता वृत्ति: व्याख्या- प्रज्ञप्तिः यावृत्तिः२ प्रत सूत्रांक [७२७]] ॥८६॥ भवन्ति यावतां चतुष्कापहारेण निच्छेदता भवति कदाचित्पुनखीण्यधिकानि भवन्ति कदाचिढे कदाचिदेकमधिकमित्यत २५ शतके एवाह-'परिमंडला णं भंते' इत्यादि, 'ओघादेसेणं ति सामान्यतः 'विहाणादेसेणं'ति विधानादेशो यत्समुदिताना- उद्देशः३ मप्येककस्थादेशनं तेन च कल्योजतैवेति ॥ अथ प्रदेशार्थचिन्तां कुर्वन्नाह-'परिमंडले ग'मित्यादि, तत्र परिमण्डल संस्थानप्रदेसंस्थानं प्रदेशार्थतया विंशत्यादिषु क्षेत्रप्रदेशेषु ये प्रदेशाः परिमण्डलसंस्थाननिष्पादका व्यवस्थितास्तदपेक्षयेत्यर्थः, 'सिय शादिकृत बुग्मादि कडजुम्मे त्ति तत्प्रदेशानां चतुष्कापहारेणापहियमाणानां चतुष्पर्यवसितत्वे कृतयुग्मं तत्स्यात् , यदा त्रिपर्यवसानं तत्तदा व्योजा, एवं द्वापरं कल्योजश्चेति, यस्मादेकत्रापि प्रदेशे बहयोऽणवोऽवगाहन्त इति ॥ अधावगाहप्रदेशनिरूपणायाह'परिमंडले'त्यादि, 'कडजुम्मपएसोगाढे 'त्ति यस्मात्परिमण्डलं जघन्यतो विंशतिप्रदेशाबगाढमुक्तं विंशतेश्च चतुष्कापहारे चतुष्पर्यवसितत्यं भवति एवं परिमण्डलान्तरेऽपीति ॥ 'बहे ण' मित्यादि, 'सिय कडजुम्मपएसोगाडे'त्ति यत्पतरवृत्तं | द्वादशप्रदेशिकं यच्च घनवृत्तं द्वात्रिंशत्पदेशिकमुक्तं तच्चतुष्कापहारे चतुरनत्वात्कृतयुग्मप्रदेशावगाढं 'सिय तेओषपएसो गाढे'त्ति यच्च पनवृत्तं सप्तप्रदेशिकमुक्तं तत्व्यग्रत्वाल्योजःप्रदेशावगाढं 'सिय कलिओयपएसोगादे'त्ति यत्पतरवृत्त । | पञ्चप्रदेशिकमुक्तं तदेकाग्रत्वात्कल्योजप्रदेशावगाढमिति ॥ तंसे ण' मित्यादि, 'सिय कडजुम्मपएसोगाढे'त्ति यद् धनन्यत्रं चतुष्पदेशिकं तत्कृतयुग्मप्रदेशावगाढं 'सिय तेओगपएसोगाढे'त्ति यत् प्रतरत्र्यनं त्रिप्रदेशावगाद पनयनं च || पञ्चत्रिंशत्प्रदेशावगाढं तत्यग्रवारयोजःप्रदेशावगाडं, 'सिय दावरजुम्मपएसोगाढे'त्ति यत्प्रतरत्र्यनं षट्मदेशिकमुक्त ||1८६३॥ तद् पनत्वाद् द्वापरप्रदेशावगाढमिति ॥'चउरंसे 'मित्यादि, 'जहा वट्टे'त्ति 'सिय कडजुम्मपएसोगाने सिय RS दीप अनुक्रम [८७३] AS ~142 Page #143 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (०५) [भाग-११]"भगवती"-अंगसूत्र-५ (मूलं+वृत्ति:) शतक [२५], वर्ग [-], अंतर्-शतक [-], उद्देशक [३], मूलं [७२७] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र- [०५], अंगसूत्र- [०५] "भगवती मूलं एवं अभयदेवसूरि-रचिता वृत्ति: COM प्रत सूत्रांक C [७२७] दीप अनुक्रम [८७३] RUCACANCIENCE ओयपएसोगाढे सिय कलिओयपएसोगाढे' इत्यर्थः तत्र यत् प्रतरचतुरस्रं चतुष्प्रदेशिकं धनचतुरस्रं चाप्टप्रदेशिकमुक्तं तच्चतुरग्रत्वात्कृतयुग्मपदेशावगाडं, तथा यद् धनचतुरस्र सप्तविंशतिप्रेदशिकमुकं तत्र्यग्रत्वाल्योजःप्रदेशावगाद, तथा यत्प्रतरचतुरस्र नवप्रदेशिकमुक्तं तदेकाग्रत्वात् कल्योजःप्रदेशावगाढमिति॥'आयए ण' मित्यादि 'सिय कडजुम्म| पएसोगाढे'त्ति यद् घनायतं द्वादशप्रदेशिकमुक्तं तत्कृतयुग्मप्रदेशावगाढं यावत्करणात् 'सिय तेओयपएसोगाढे | सिय दावरजुम्मपएसोगाढ़े'त्ति दृश्य, तत्र च यत् श्रेण्यायतं त्रिप्रदेशावगादं यच्च प्रतरायतं पञ्चदशप्रदेशिकमुक्त वठ्यग्रवाल्योजःप्रदेशायगाद, यत्पुनः श्रेण्यायतं द्विप्रदेशिकं यच्च प्रतरायतं षट्पदेशिकं तद् मा प्रत्वाद् द्वापरयुग्मप्रदेशावगाढं, 'सिय कलिओयपएसोगाढे'त्ति यद् घनायतं पञ्चचत्वारिंशत्प्रदेशिकं तदेकाग्रत्वात्कल्योजःप्रदेशावगाढमिति ॥ एवमेकत्वेन प्रदेशावगाढमाश्रित्य संस्थानानि चिन्तितानि अथ पृथक्त्वेन तानि तथैव चिन्तयन्नाह-'परिमंडला - मित्यादि, 'ओघादेसेणवित्ति सामान्यतः समस्तान्यपि परिमण्डलानीत्यर्थः 'विहाणादेसेणवित्ति भेदतः एकैकं परिमण्डॐालमित्यर्थः कृतयुगपदेशावगाढान्येव विंशतिचत्वारिंशत्मभृतिप्रदेशावगाहित्वेनोकत्वात्तेषामिति ॥ 'वहा णमित्यादि, दा'ओघादेसेणं कहजुम्मपएसोगाढ़े'त्ति वृत्तसंस्थानाः स्कन्धाः सामान्येन चिन्त्यमानाः कृतयुग्मप्रदेशावगाढाः सर्वेषां तत्प्रदेशानां मीलने चतुष्कापहारे तत्स्वभावत्वेन चतुष्पर्यवसितत्वात् , विधानादेशेन पुनर्वापरप्रदेशावगाढवर्जाः शेपाव|| गाढा भवन्ति, यथा पूर्वोकेषु पञ्चसप्तादिषु जघन्यवृत्तभेदेषु चतुष्कापहारे द्वयावशिष्टता नास्ति एवं सर्वेष्यपि तेषु वस्तु-18 स्वभावत्वादू, अत एवाह-'विहाणादेसेण'मित्यादि । एवं त्र्यम्रादिसंस्थानसूत्राण्यपि भावनीयानि ॥ एवं तावत्क्षेत्रत एक R EKARNE-%ER ~143 Page #144 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (०५) प्रत सूत्रांक [७२७] दीप अनुक्रम [८७३] [भाग-११]“भगवती”– अंगसूत्र -५ (मूलं + वृत्ति:) शतक [२५], वर्ग [-], अंतर् शतक [-] उद्देशक [३], मूलं [ ७२७] पूज्य आगमोद्धारकश्री संशोधितः मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित.. आगमसूत्र - [०५] अंगसूत्र- [ ०५] "भगवती" मूलं एवं अभयदेवसूरि-रचिता वृत्तिः व्याख्या प्रज्ञप्तिः अभयदेवीया वृत्तिः २ ५ ॥८६४॥ त्वपृथक्त्वाभ्यां संस्थानानि चिन्तितानि, अथ ताभ्यामेव कालतो भावतश्च तानि चिन्तयन्नाह - 'परिमंडले णमित्यादि, अयमर्थः --- परिमंडलेन संस्थानेन परिणताः स्कन्धाः कियन्तं कालं तिष्ठन्ति । किं चतुष्कापहारेण तत्कालस्य समयाश्चतुरम्रा भवन्ति त्रिद्वयेकाग्रा वा ?, उच्यते, सर्वे संभवन्तीति इह चैता वृद्धोक्ताः सङ्ग्रहगाथाः - " परिमंडले य १ व २ तंसे ३ चउरंस ४ आयए ५ चेव । घणपयरपदमवज्रं ओपसे य जुम्मे य ॥ १ ॥ पंच प बारसूर्य खलु से सत्त य बत्तीसयं च वईमि । तियकयपणतीसा चउरो य हवंति तंसंमि ॥ २ ॥ नव चैव तहा चउरो सत्तावीसा य अ चउरंसे । तिगदुगपन्नरसे चैव छच्चैव य आयए होंति ॥ ३ ॥ पणयालीसा बारस छन्भेया आययम्मि संठाणे । परिमंडलम्मि वीसा चत्ता य भवे पएसग्गं ॥ ४ ॥ सवेवि आययम्मि गेण्हसु परिमं डलंमि कडजुम्मं । वज्जेज्ज कलिं तंसे दावरजुम्मं च सेसेसु ॥ ५ ॥” इति । [ परिमण्डलं च वृत्तं त्र्यसं चतुरस्रमायतं चैव प्रथमवर्ज्यानि धनप्रतरभेदानि ओजः प्रदेशानि युग्मानि च ॥ १ ॥ पञ्च च द्वादश खलु सप्त च द्वात्रिंशच वृत्ते त्रयः षट् पञ्चत्रिंशचत्वारश्च भवन्ति व्यस्त्रे ॥ २ ॥ नव चैव तथा चत्वारः सप्तविंशतिश्चाष्टौ चतुरस्त्रे त्रयो द्वौ पञ्चदश चैव पटू चैव चायते भवन्ति ॥ ३ ॥ पञ्चचत्वारिंशद्वादशपट्प्रदेशा आयते भवन्ति संस्थाने परिमण्डले विंशतिश्चत्वारश्च | भवेत् प्रदेशपरिमाणम् ॥ ४ ॥ आयते सर्वे राशय इति गृहाण परिमण्डले कृतयुग्मं व्यस्त्रे कलिं वर्जयेत् शेषेषु द्वापरयुग्मं च ॥ ५ ॥ ] द्रव्याद्यपेक्षया संस्थानपरिमाणस्याधिकृतत्वात्संस्थानविशेषितस्य लोकस्य तथैव परिमाणनिरूपणायाहसेदीओ णं भंते! दट्टयाए किं संखेजाओ असंखेनाओ अनंताओ ?, गोयमा ! नो संखेनाओ For Parts Only ~ 144~ २५ शतके उद्देशः १ संस्थानप्रदेयुग्मादि शादिकृत सू ७२७ १८६४॥ Page #145 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (०५) [भाग-११]"भगवती"-अंगसूत्र-५ (मूलं+वृत्ति:) शतक [२५], वर्ग [-], अंतर-शतक [-], उद्देशक [३], मूलं [७२८] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र- [०५], अंगसूत्र- [०५] "भगवती मूलं एवं अभयदेवसूरि-रचिता वृत्ति: RECHAK प्रत सूत्रांक [७२८] दीप अनुक्रम [८७४] नो असंखे० अणंताओ, पाईणपडीणायताओणं भंते ! सेढीओ दबट्टयाए कि संखेजाओ एवं चेव ३, एवं दाहिणुत्तरायताओचि एवं उड्डमहायताओवि । लोगागाससेढीओ णं भंते ! दवढ्याए कि संखेजाओ असंखेजाओ अणंताओ?, गोयमा ! नो संखेजाओ असंखेजाओ नो अणंताओ, पाईणपड़ीणायताओ णं भंते ! |लोगागाससेडीओ दबट्टयाए किं संखेजाओ एवं चेव, एवं दाहिणुसराययाओवि, एवं उड्डमहायताओवि । | अलोयागाससेढीओ णं भंते ! दवयाए किं संखेलाओ असंखेजाओ अर्णताओ?,गोयमानो संखेजाओनो | असंखेजाओ अणंताओ, एवं पाईणपडीणाययाओवि एवं दाहिणुत्तराययाओवि एवं उडमहायताओवि। सेढीओ णं भंते ! पएसट्टयाए कि संखेज्जाओ जहा दबट्टयाए तहा पएसट्टयाएवि जाव उहुमहाययाओवि सवाओ अर्णतः । लोयागाससेदीओ णं भंते ! पएस० किं संखेजाओ पुच्छा, गोयमा ! सिप संखे०सिय| असं० नो अणंताओ एवं पाईणपडीणायताओ दाहिणुत्तरायताओवि एवं चेव उहुमहायताओवि नो। संखेजाओ असंखे० नो अणंताओ॥ अलोगागाससेढीओ णं भंते ! पएसट्टयाए पुच्छा, गोयमा! सिय संखे० सिय असं० सिय अर्णताओ पाईणपडीणाययाओ भंते ! अलोया पुच्छा, गोयमा! नो संखेजा ओ नो असंखेजाओ अणंताओ, एवं दाहिणुत्तरायताओवि, उहुमहायताओ पुच्छा, गोयमा! सिय संखेजाओ सिय असं० सिय अर्णताओ (सूत्रं ७२८)॥ 'सेढी'त्यादि, श्रेणीशब्देन च यद्यपि पतिमात्रमुच्यते तथाऽपीहाकाशप्रदेशपतयः श्रेणयो ग्राद्याः, तत्र श्रेणयोऽ-| | विवक्षितलोकालोकभेदखेन सामान्याः १ तथा ता एवं पूर्वापरायताः२ दक्षिणोत्तरायताः ३ अधिआयताः ४, एवं लो AL -2 -% ~145 Page #146 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (०५) [भाग-११]"भगवती"-अगसूत्र-५ (मूल+वृत्ति:) शतक [२५], वर्ग [-], अंतर-शतक [-], उद्देशक [३], मूलं [७२८] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र- [०५], अंगसूत्र- [०५] "भगवती मूलं एवं अभयदेवसूरि-रचिता वृत्ति: प्रत सूत्रांक [७२८] दीप अनुक्रम [८७४] व्याख्या-8 कसम्बन्धिग्योऽलोकसम्बन्धिन्यश्चेति, तत्र सामान्य श्रेणीप्रश्ने 'अणंताओ'त्ति सामान्याकाशास्तिकायस्य श्रेणीनां विवक्षि-२५ शतक प्रज्ञप्तिः द तत्वादनन्तास्ताः, लोकाकाशश्रेणीप्रश्ने त्वसङ्ख्याता एवं ताः, असङ्ख्यातप्रदेशात्मकत्वालोकाकाशस्य, अलोकाकाशश्रेणीप्रश्ने इशार अभयदेवी- पुनरनन्तास्ताः, अनन्तप्रदेशात्मकत्वादलोकाकाशस्य । तथा 'लोगागाससेढीओणं भंते ! पएसट्टयाए' इत्यादौ 'सिय संस्थानप्रदे या वृत्तिः संखेजाओ सिय असंखेजाओ'त्ति अस्तेयं चूर्णिकारव्याख्या-लोकवृत्तानिष्क्रान्तस्यालोके प्रविष्टस्य दन्तकस्य याः दशादिकृत श्रेणयस्ता द्वित्रादिप्रदेशा अपि संभवन्ति तेन ताः सङ्ख्यातप्रदेशा लभ्यन्ते शेषा असङ्ख्यातप्रदेशा लभ्यन्त इति, टीका । युग्पादि ॥८६५॥ सू७२८ कारस्तु साक्षेपपरिहारं चेह प्राह-"परिमंडलं जहनं भणियं कडजुम्मवट्टियं लोए। तिरियाययसेढीण संखेजपएसिया किह। Cणु?॥१॥ दो दो दिसासु एकेकओ य विदिसासु एस कडजुम्मे । पढमपरिमंडलाओ वुट्टी किर जाव लोगंतो ॥२॥ ॥ इत्याशेपः, परिहारस्तु-"अटुंसया पसज्जड़ एवं लोगस्स न परिमंडलया । बट्टालेहेण तभो बुट्ठी कडजुम्निया जुत्ता ॥३॥ [लोके कृतयुग्मवर्तितं जघन्य परिमण्डलं भणितं तिर्यगायतश्रेणीनां सङ्ख्येयप्रदेशता कथं नु? ॥१॥ द्वौ द्वौ दिक्षु एकैकश्च | 3 विदिक्षु एष कृतयुग्मः प्रथमपरिमण्डलाद वृद्धिस्तस्य यावलोकान्तः ॥२॥ एवं लोकस्याष्टांशता प्रसज्यते न परिमण्डलता ततो वृत्तालेखेन कृतयुग्मिका वृद्धि युक्ता ॥३॥] ... एवं च लोकवृत्तपर्यन्तश्रेणयः सयातादेशिका भवन्तीति 'नो अणंताओ'त्ति लोकप्रदेशानामनन्तत्वा- भावात् , 'उडमहाययाओ' 'नो संखेजाओ असंख-8 जाओ'त्ति यतस्तासामुच्छ्रितानामूलोकान्ता'. THIS दधोलोकान्तेऽधोलोकान्तादू लोकान्ते प्रतिधातोऽतस्ता ।८६५|| ४ असवातप्रदेशा एवेति, या अप्यधोलोककोण तो ब्रहालोकतिर्यग्मध्यप्रान्ताद्वोत्तिष्ठन्ते ता अपि न सहयातIN प्रदेशा लभ्यन्ते, अत एव सूत्रवधनादिति ।। IXI ~146~ Page #147 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (०५) [भाग-११]"भगवती"-अंगसूत्र-५ (मूलं+वृत्ति:) शतक [२५], वर्ग [-], अंतर्-शतक [-], उद्देशक [३], मूलं [७२८] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र- [०५], अंगसूत्र- [०५] "भगवती मूलं एवं अभयदेवसूरि-रचिता वृत्ति: प्रत सूत्रांक [७२८] 'अलोगागाससेढीओ णं भंते ! पएसट्टयाए' इत्यादि, 'सिय संखेजाओ सिय असंखेजाओ'त्ति यदुक्तं तत्सर्व धु-18 लकप्रतरप्रत्यासन्ना ऊर्ध्वाधआयता अधोलोकश्रेणीराश्रित्येत्यवसेयं, ता हि आदिमाः सङ्ग्यातप्रदेशास्ततोऽसपातप्रदेशा-1 | स्ततः परं त्वनन्तप्रदेशाः, तिर्यगायतास्त्वलोकश्रेणयः प्रदेशतोऽनन्ता एवेति ॥ सेढीओणं भंते । किसाइयाओ सपज्जवसियाओ १ साईयाओ अपज्जवसि०२ अणादीयाओ सपनव-13 सियाओ ३ अणादीयाओ अप०४?, गोयमा! नो सादीयाओ सप० नो सादीयाओ अपणो अणादीयाओसप० अणादीयाओ अप० एवं जाव उवमहायताओ, लोयागाससेढीओ णं भंते! किं सादीयाओ सप० पुच्छा, गोसादीयाओ सपजवसियाओ नो सादीयाओ अपज्जवसियाओ नो अणादीयाओ सपज्जय० नो अणादीयाओ अपज एवं जाव उड्डमहायताओ। अलोयागाससेढीओ णं भंते ! किं सादीयाओ सप० पुच्छा, गोयमा ! सिय साइयाओ सपज्जवसियाओ १ सिय साईयाओ अपज्जवसियाओ २ सिय अणादीयाओ सपज्जवसियाओ ३ सिय अणाइयाओ अपज्जवसियाओ४, पाईणपडीणाययाओ दाहिणुत्तरायताओ य एवं चेव, नवरं नो सादीयाओ सपजवसियाओ सिय साईयाओ अपज्जवसियाओ सेसं तं चेव, उड्डमहायताओ जाव ओहियाओ तहेव चउभंगो । सेढीओ णं भंते ! दवड्याए किं कडजुम्माओ तेओयाओ? पुच्छा, गोयमा! कडजुम्माओ नो तेओयाओ नो दावरजुम्माओ नो कलियोगाओ एवं जाव उड्डमहायताओ, 3 लोगागाससेढीओ एवं चेष, एवं अलोगागासेढीओवि । सेढीओ णं भंते ! पएसट्टयाए कि कहजुम्माओ दीप अनुक्रम [८७४] weredturary.com ~147 Page #148 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (०५) [भाग-११]"भगवती"-अंगसूत्र-५ (मूलं+वृत्ति:) शतक [२५], वर्ग [-], अंतर्-शतक [-1, उद्देशक [३], मूलं [७२९-९३३] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र- [०५], अंगसूत्र- [०५] "भगवती मूलं एवं अभयदेवसूरि-रचिता वृत्ति: प्रत सूत्रांक [७२८] पुच्छा, एवं चेव एवं जाय उहमहायताओ। लोयागाससेदीओ गं भंते ! पएसट्टयाए पुच्छा, गोयमा ! सिय व्याख्या- 3 , २५ शतके प्रज्ञप्तिःकडजुम्माओ नो तेओयाओ सिय दावरजुम्माओ नो कलिओगाओ, एवं पाईणपडीणायताओवि दाहिणुत्ता उद्देशः३ अभयदेवी- रायताओवि, उट्टमहाययाओ णं पुच्छा, गोयमा ! कडजुम्माओ मो तेओगाओ नो दावरजुम्माओनो कलि-IRI आकाशया वृत्तिः योगाओ। अलोगागाससेढीओ णं भंते ! पएसट्टयाए पुच्छा, गोयमा ! सिय कडजुम्माओ जाव सिय कलि-IAL: श्रेणिगतिओगाओ, एवं पाईणपडीणायताओवि एवं दाहिणुसरायताओवि, उद्गुमहायताओवि एवं चेच, नवरं नो कलि-15 ॥८६६॥ 8 ओगाओ सेसं तं चेव (सूत्रं ७२९) ।।कति गंभंते ! सेढीओ प०?, गोयमा सत्त सेढीओ पन्नत्ताओ, तंजहा- यानि उजुआयता एगओवंका दुहओवंका एगओखहा दुह ओखहा चक्कवाला अद्धचकवाला ॥ परमाणुपोग्गलाणं रसू ७२९भंते! किं अणुसेढी गती पवत्तति विसेडिंगती पवत्तति ?, गोयमा ! अणुसेंढी गति पवत्ततिनो विसेढी| गती पवत्तति । दुपएसियाणं भंते ! खंधाणं अणुसेढी गती पवत्तति विसेढी गती पवत्तति एवं चेव, एवं जाव अणंतपएसियाणं खंधाणं। नेरइयाण भंते! किं अणुसेढींगतीपवत्तति विसेढींगती पवत्तति एवं चेव, एवं जाव |माणियाण ॥ (सर्व ७३०) इमीसे गंभंते ! रयणप्पभाए पुढवि. केवतिया निरयावाससयसहस्सा पन्नत्ता?, 8 गोषमा! तीसं निरयावाससयसहस्सा प०, एवं जहा परमसते पंचमुद्देसगे जाव अणुतरविमाणत्ति ॥(सूत्रं 1८६६॥ ७३१) काविहे गं भंते! गणिपिडए प०१, गोयमा दुवालसंगे गणिपिडए पं०२०-आयारो जाव दिविवाओ, से किं तं आयारो?, आयारे णं समणाणं निग्गंथाणं आयारगो एवं अंगपरूवणा भाणियवा जहा नंदीए, जाव | दीप अनुक्रम [८७४] ७३३ -564 R ~148~ Page #149 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (०५) [भाग-११]"भगवती"-अंगसूत्र-५ (मूलं+वृत्ति:) शतक [२५], वर्ग [-], अंतर्-शतक [-1, उद्देशक [३], मूलं [७२९-९३३] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र- [०५], अंगसूत्र- [०५] "भगवती मूलं एवं अभयदेवसूरि-रचिता वृत्ति: प्रत सूत्रांक [७२९-७३३] सुत्तस्थो खस्लु पढमो वीओ मिजुत्तिमीसिओ भणिओ। तइओ य निरवसेसो एस विही होइ अणुओगे ॥१॥ (सूत्रं७३२) ।।एएसि णं भंते! नेरतियाणं जाव देवाणं सिद्धाण यपंचगतिसमासेणं कयरे २? पुच्छा, गोयमा! | अप्पाचहुयं जहा बहुवत्तवपाए अट्ठगइसमासअप्पाबहुगं च । एएसि णं भंते ! सईदियाणं एगिदियार्ण जाव अणिदियाण य कयरे २१, एयंपि जहा बहुवत्तवयाए तहेव ओहियं पयं भाणियचं, सकाइयअप्पाबहुगं तहेव ओहियं भाणियचं ॥ एएसिणं भंते ! जीवाणं पोग्गलाणं जाव सवपजवाण य कपरे २ जाव बहुवसषयाए, एएसि गं भंते ! जीवाणं आउयस्स कम्मरस बंधगाणं अबंधगाणं जहा बहुवत्तषयाए जाव आउयस्स कम्मरस अबंधगा विसेसाहिया । सेवं भंते ! सेवं भंतेत्ति ॥ (सूत्रं ७३३ ) ॥ २५-३॥ | 'सेढीओ गंभंते ! कि साईयाओं इत्यादिप्रश्नः, इह च श्रेण्योऽविशेषितत्वाद्या लोके चालोके च तासां सर्यासा | ग्रहणं, सर्वमहणाच्च ता अनादिका अपर्यवसिताश्चेत्येक एव भङ्गाकोऽनुमन्यते शेषभङ्गकत्रयस्य तु प्रतिषेधः। 'लोगागाससेढीओ ण' मित्यादौ तु 'साइयाओ सपज्जवसियाओं इत्येको भङ्गका सर्वश्रेणीभेदेष्वनुमन्यते, शेषाणां तु निषेधः, लोकाकाशस्य परिमितत्वादिति । 'अलोगागाससेढी त्यादौ 'सिय साईयाओ सपजवसियाओ'त्ति प्रथमो भङ्गका क्षुल्लकमतरप्रत्यासत्ती ऊर्ध्वायतश्रेणीराश्रित्यावसेयः, 'सिय साइयाओ अपज्जवसियाओ'त्ति द्वितीयः, स च लोकान्ताद्र दवघेरारभ्य सर्वतोऽबसेयः, 'सिय अणाईयाओ सपजवसियाओ'त्ति तृतीया, स च लोकान्तसनिधी श्रेणीनामन्तस्य विवक्षणात् , 'सिय अणाईयाओ अपज्जवसियाओ'त्ति चतुर्थः, स च लोकं परिहत्य याः श्रेणयस्तदपेक्षयेति । 'पाईणप दीप अनुक्रम [८७५-८८०] SARERatun international ~149~ Page #150 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (०५) [भाग-११]"भगवती"-अंगसूत्र-५ (मूलं+वृत्ति:) शतक [२५], वर्ग [-], अंतर्-शतक [-1, उद्देशक [३], मूलं [७२९-९३३] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र- [०५], अंगसूत्र- [०५] "भगवती मूलं एवं अभयदेवसूरि-रचिता वृत्ति: प्रत सूत्रांक [७२९-७३३] व्याख्या- टीणाययाओं' इत्यादौ 'नो साईयाओ सपज्जवसियाओ'त्ति अलोके तिर्यश्रेणीनां सादित्वेऽपि सपर्यवसितत्वस्थाभावान्न २५ शतके प्रज्ञप्तिः प्रथमो भङ्गः, शेषास्तु त्रयः संभवन्त्यत एवाह-'सिय साइयाओं' इत्यादि । 'सेडीओ णं भंते ! दबट्टयाए किं कहजु- उद्देशः ३ अभयदेवीम्माओ ?' इत्यादि प्रश्नः, उत्तरं तु 'कजुम्माओ'त्ति, कथं ?, वस्तुस्वभावात् , एवं सर्वा अपि, यः पुनर्लोकालोकश्रेणीषु आकाशया वृत्तिः२५ श्रेणिगतिप्रदेशार्थतया विशेषोऽसावुच्यते-तत्र 'लोगागाससेढीओ भंते ! पएसट्टयाए' इत्यादी स्यात् कृतयुग्मा अपि स्यात् श्रेणिगणि॥८६॥18॥ द्वापरयुग्मा इत्येतदेवं भावनीयं-रुचकार्वादारभ्य यत्पूर्व दक्षिणं वा लोकाई तदितरेण तुण्यमतः पूर्वापरश्रेणयो दक्षिणोत्तर पिटकाल्पश्रेणयश्च समसजयप्रदेशाः, ताश्च काश्चित् कृतयुग्माः काश्चिद् द्वापरयुग्माश्च भवन्ति न पुनरूयोजप्रदेशाः कल्योजप्रदेशा वहुत्वानि वा, तथाहि-असद्भावस्थापनया दक्षिणपूर्वाद् रुचकप्रदेशात्पूर्वतो यल्लोकश्रेपयर्द्ध तत्पदेशशतमानं भवति, यश्चापरदक्षिणा- सू ७२९दुचकप्रदेशादपरतो लोकश्रेण्यर्द्धं तदपि प्रदेशशतमानं, ततश्च शतद्वयस्य चतुष्कापहारे पूर्वापरायतलोकश्रेण्याः कृतयुग्मता 81 ७३३ भवति, तथा दक्षिणपूर्वादुचकप्रदेशाद्दक्षिणो योऽन्त्यः प्रदेशस्तत आरभ्य पूर्वतो यल्लोकश्रेण्यद्धै तन्नवनवतिप्रदेशमानं, यच्चापरदक्षिणायतादुचकप्रदेशाद्दक्षिणो योऽन्त्यः प्रदेशस्तत आरभ्यापरतो लोकश्रेण्यर्द्ध तदपि च नवनवतिप्रदेशमानं, ततब द्वयोनवनवत्योमीलने चतुष्कापहारे च पूर्वापरायतलोकश्रेण्या द्वापरयुग्मता भवति, एवमन्याम्वपि लोकश्रेणीषु भावना Mकार्यो, इह चेयं सनगाथा-"तिरियाययाउ कडबायराओ लोगस संखसंखा वा । सेढीओ कहजुम्मा उहमहेआयय ||८६७॥ मसंखा ॥१॥" इति [ तिर्यगायताः कृतयुग्माः लोकस्य संख्याता असंख्याता वा । श्रेणयः कृतयुग्माः ऊवार्धआयताः ४ असंख्याताः ॥१] तथा 'अलोगागाससेदीओ णं भंते! पएसे'त्यादी 'सिय कडजुम्माओ'त्ति याः क्षुल्लकमतर दीप अनुक्रम [८७५-८८०] ~150 Page #151 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (०५) प्रत सूत्रांक [७२९ -७३३] दीप अनुक्रम [८७५-८८०] [भाग-११]“भगवती”- अंगसूत्र -५ (मूलं + वृत्ति:) शतक [२५], वर्ग [-], अंतर् शतक [-], उद्देशक [३], मूलं [७२९-९३३] पूज्य आगमोद्धारकश्री संशोधितः मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित.. आगमसूत्र- [०५] अंगसूत्र- [ ०५] "भगवती" मूलं एवं अभयदेवसूरि- रचिता वृत्तिः द्वयसामीप्यात्तिरश्चीन तयोत्थिता याश्च लोकमरपृशन्त्यः स्थितास्ता वस्तुस्वभावात्कृतयुग्माः यावत्करणात् 'सिय तेओयाओ सिय दावरजुग्माओ त्ति दृश्यं तत्र च याः क्षुल्लकप्रतरद्वयस्याधस्तनादुपरितनाद्वा प्रतरादुत्थितास्ता रूयोजाः, यतः | क्षुल्लकप्रतरद्वयस्याध उपरि च प्रदेशतो लोकस्य वृद्धिभावेनालोकस्य प्रदेशत एवं हानिभावादेकैकस्य प्रदेशस्या लोकश्रेणीभ्यो| ऽपगमो भवतीति, एवं तदनन्तराभ्यामुत्थिता द्वापरयुग्माः, 'सिय कलिओगाओ ति तदनन्तराभ्यामेवोत्थिताः कल्योजाः, एवं पुनः पुनस्ता एव यथासम्भवं वाच्या इति । 'उद्घाययाण' मित्यादि, इह क्षुल्लकप्रतरद्वयमानेन या उत्थिता ऊद्धीयतास्ता द्वापरयुग्माः तत ऊर्द्धमधश्चैकैकप्रदेशवृद्ध्या कृतयुग्माः कचिचैक प्रदेश वृद्ध्याऽन्यत्र वृद्ध्यभावेन ज्योजाः, कल्योजास्त्विहन संभवन्ति वस्तुस्वभावात्, एतच्च भूमौ लोकमालिख्य केदाराकारप्रदेशवृद्धिमन्तं ततः सर्व भावनीयमिति ॥ अथ | प्रकारान्तरेण श्रेणीप्ररूपणायाह - 'कह ण' मित्यादि, 'श्रेणयः 'प्रदेशपङ्कयो जीवपुद्गलसञ्चरणविशेषिताः तत्र' उपायत त्ति ऋजुश्चासावायता चेति ऋज्यायता यया जीवादय ऊर्द्धलोकादेरधोलोकादौ ऋजुतया यान्तीति, 'एगओ बंक'सि 'एकत' एकस्यां दिशि 'वङ्का' वक्रा यया जीवपुद्गला ऋजु गत्वा वक्रं कुर्वन्ति श्रेण्यन्तरेण यान्तीति, स्थापना चेवम्- 'दुहओकति यस्यां वारद्वयं वक्रं कुर्वन्ति सा द्विधावत्रा, इयं चोर्ध्वक्षेत्रादाग्नेय दिशोऽधःक्षेत्रे वायव्यदिशि गत्वा उत्पद्यते तस्य भवति, तथाहि--प्रथमसमये आग्नेय्यास्तिर्यग नैर्ऋत्यां याति ततस्तिर्यगेव वायव्यां ततोऽधो वायव्यामेवेति, त्रिसमयेयं त्रसनाड्या मध्ये बहिर्वा भवतीति, 'एगओखह त्ति यया जीवः पुद्गलो वा नाड्या वामपार्श्वदेस्तां प्रविष्टस्तथैव गत्वा पुनस्तद्वामपार्श्वदावुत्पद्यते सा एकतःखा, एकस्यां दिशि वामादिपार्श्वलक्षणायां खस्य - आकाशस्य लोकनाडी For PanalPrata Use Only ~151~ wor Page #152 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (०५) प्रत सूत्रांक [७२९ -७३३] दीप अनुक्रम [८७५ -८८०] [भाग-११]“भगवती”– अंगसूत्र - ५ ( मूलं + वृत्ति:) शतक [२५], वर्ग [-], अंतर्-शतक [-], उद्देशक [३], मूलं [७२९-९३३] पूज्य आगमोद्धारकश्री संशोधितः मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित.. आगमसूत्र- [०५] अंगसूत्र- [ ०५] "भगवती" मूलं एवं अभयदेवसूरि-रचिता वृत्तिः व्याख्याप्रज्ञप्तिः अभयदेवीया वृत्तिः २ ॥८६८॥ व्यतिरिक्तलक्षणस्य भावादिति, इयं च द्वित्रिचतुर्वक्रोपेताऽपि क्षेत्रविशेषाश्रितेति भेदेनोक्ता, स्थापना चेयम् 'दृहओखह 'त्ति नाड्या वामपार्श्वदेर्नाडीं प्रविश्य तयैव गत्वाऽस्या एव दक्षिणपार्श्वादी ययोत्पद्यते सा द्विधाखा, | नाडीबहिर्भूतयोर्वामदक्षिणपार्श्वलक्षणयोर्द्वयोराकाशयोस्तया स्पृष्टत्वादिति, स्थापना चेयम् || 'चकवाल'त्ति चक्रवालं- मण्डलं, ततश्च यया मण्डलेन परिभ्रम्य परमाण्वादिरुत्पद्यते सा चक्रवाला, सा चैवम्-० 'अद्धचकवाल'त्ति चक्रवालार्द्धरूपा, सा चैवम् ॥ अनन्तरं श्रेणय उक्ताः अथ ता एवाधिकृत्य परमाण्वादिगतिप्रज्ञापनायाह'परमाणुपोग्गलाणं भंते! इत्यादि, 'अणुसेहि'न्ति अनुकूला- पूर्वादिदिगभिमुखा श्रेणियंत्र तदनुश्रेणि, तद्यथा 2 भवत्येवं गतिः प्रवर्तते, 'विसेदिं' ति विरुद्धा विदिगाश्रिता श्रेणी यत्र तद्विश्रेणि, इदमपि क्रियाविशेषणम् ॥ अनुश्रेणिविश्रेणिगमनं नारकादिजीवानां प्रागुक्तं तच्च नरकावासादिषु स्थानेषु भवतीतिसम्बन्धात्पूर्वोक्तमपि नरकावासादिकं | प्ररूपयन्नाह - 'इमीसे ण'मित्यादि, इदं च नरकावासादिकं छद्मस्थैरपि द्वादशाङ्गप्रभावादवसीयत इति तत्प्ररूपणायाह'कविहे ण' मित्यादि, 'से किं तं आयारो'त्ति प्राकृतत्वात्, अथ कोऽसावाचारः ?, अथवा किं तद्वस्तु यदाचार इत्येवं व्याख्येयम्, 'आयारेणं'ति आचारेण शास्त्रेण करणभूतेन अथवा आचारे अधिकरणभूते णमित्यलङ्कारे 'आयारगो' इत्यनेनेदं सूचितम् - 'आयारगोयरविणयवेणइयसिक्खाभासा अभासाचरणकरणजायामाया वित्तीओ आघवेजंति'त्ति, तत्राचारो - ज्ञानाद्यनेकभेदभिन्नः गोचरो - भिक्षाग्रहणविधिलक्षणः विनयो-ज्ञानादिविनयः वैनयिकं विनयफलं कर्मक्षयादि शिक्षा ग्रहणासेवनाभेदभिन्ना अथवा 'वेणइय'त्ति वैनयिको विनयो वा शिष्यस्तस्य शिक्षा वैनयिकशिक्षा विने Educatin internation For Parts Only ~152~ २५ शतके उद्देशः ३ आकाश श्रेणिगति श्रेणिगणि पिटकाल्पबहुत्वानि सू ७२९ ७३३ ગાઢ૬૮ના Page #153 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (०५) प्रत सूत्रांक [७२९ -७३३] दीप अनुक्रम [८७५ -८८०] [भाग-११]“भगवती” - अंगसूत्र -५ (मूलं + वृत्ति:) शतक [२५], वर्ग [-], अंतर्-शतक [-], उद्देशक [३], मूलं [७२९-९३३] पूज्य आगमोद्धारकश्री संशोधितः मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित.. आगमसूत्र - [०५] अंगसूत्र- [ ०५] "भगवती" मूलं एवं अभयदेवसूरि-रचिता वृत्तिः यशिक्षा वा भाषा-सत्यासत्यामृषा च अभाषा- मृषा सत्यामृपा च चरणं व्रतादि करणं-पिण्डविशुद्धयादि यात्रा - संयमयात्रा मात्रा - तदर्थमाहारमात्रा वृत्तिः विविधैरभिग्रहविशेषैर्वर्त्तनं आचारश्च गोचरश्चेत्यादिर्द्वन्द्वस्ततश्च ता आख्यायन्ते-अभिघीयन्ते, इह च यत्र क्वचिदन्यतरोपादानेऽन्यतरगतार्थाभिधानं तत्सर्वं तत्प्राधान्यख्यापनार्थमेवावसेयमिति । 'एवं अंगपरूवणा भाणिया जहा नंदीए 'त्ति एवमिति पूर्वप्रदर्शित प्रकारवता सूत्रेणाचाराद्यङ्गप्ररूपणा भणितव्या यथा नन्यां सा च तत एवावधार्या, अथ कियद्दूरमियमप्ररूपणा नन्युक्ता वक्तव्या इत्याह- 'जाब सुत्तत्थो गाहा, सूत्रार्थमात्रप्रतिपादनपरः सूत्रार्थोऽनुयोग इति गम्यते, खलुशब्दस्त्वेवकारार्थः स चावधारणे इति, एतदुक्तं भवति गुरुणा सूत्रार्थमात्राभिधान लक्षण | एव प्रथमोऽनुयोगः कार्यों, मा भूत् प्राथमिकविनेयानां मतिमोह इति, द्वितीयोऽनुयोगः सूत्रस्पर्शक निर्युक्तिमिश्रः कार्य इत्ये| वंभूतो भणितो जिनादिभिः, 'तृतीयश्च'तृतीयः पुनरनुयोगो निरवशेषो निरवशेषस्य प्रसक्तानुप्रसक्तस्यार्थस्य कथनात्, 'एषः ' अनन्तरोक्तः प्रकारत्रयलक्षणो 'भवति' स्यात् 'विधिः' विधानम् 'अनुयोगे' सूत्रस्यार्थेनानुरूपतया योजन लक्षणे विषयभूते इति गाथार्थः ॥ १ ॥ अनन्तरमङ्गप्ररूपणोक्ता, अङ्गेषु च नारकादयः प्ररूप्यन्त इति तेषामेवाल्पबहुत्वप्रतिपादनायाह'एएसि ण' मित्यादि, 'पंचगइसमासेणं'ति पञ्चगत्यन्तर्भावेन, एषां चाल्पबहुत्वं तथा वाच्यं यथा बहुवक्तव्यतायांप्रज्ञापनायास्तृतीयपदे इत्यर्थः तच्चैवमर्थतः - "नरनेरइया देवा सिद्धा तिरिया कमेण इह होंति । थोवमसंखअसंखा अणं"तगुणिया अनंतगुणा ||१||" [नरा नैरयिका देवाः सिद्धास्तिर्यञ्चः क्रमेणेह भवन्ति । स्तोका असङ्ख्या अमङ्ख्याः अनन्तगुणिता अनन्तगुणाः ||२||] 'अट्ठगइसमासप्पाबहुयं चत्ति अष्टगतिसमासेन यदस्पबहुत्वं तदपि यथा बहुवक्तव्यतायां तथा वाच्यम्, Eucation International For Parts Only ~153~ wor Page #154 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (०५) [भाग-११]"भगवती"-अंगसूत्र-५ (मूलं+वृत्ति:) शतक [२५], वर्ग [-], अंतर्-शतक [-], उद्देशक [३], मूलं [७२९-९३३] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र- [०५], अंगसूत्र- [०५] "भगवती मूलं एवं अभयदेवसूरि-रचिता वृत्ति: प्रत सूत्रांक [७२९-७३३] व्याख्या- अष्टगतयश्चैव-नरकगतिस्तथा तिर्यग्नरामरगतयः स्त्रीपुरुषभेदावधा सिद्धिगतिश्चेत्यष्टी, अल्पबहुत्वं चैवमर्थतः-"नारी १ २५ शतक प्रज्ञप्तिः नर२ नेरझ्या ३ तिरित्थि ४सुर ५ देवि ६ सिद्ध ७ तिरिया य दाधोव असंखगुणा चउ संखगुणा पंतगुण दोनि ॥१॥"| 8 उद्देशः३ अभयवाद[नार्यो नरा नैरयिकास्तियखिया सुरा देव्यः सिद्धास्तियश्चश्व स्तोका असह्मगुणाश्चत्वारः सङ्ग्यगुणा अनन्तगुणी द्वः ॥१॥]] *आकाशया वृत्तिः | श्रेणिगति. से 'सइंदियाणं एगेंदियाण'मित्यादौ यावत्करणाद् द्वीन्द्रियादीनि चत्वारि पदानि वाच्यानि 'एयंपि जहा बहुवत्तवयाए तहे- श्रेणिगणि॥८६९॥ वत्ति एतदप्यल्पबहुत्वं यथा बहुवक्तव्यतायामुक्तं तथा वाच्यं, तच्च पर्याप्तकापर्याप्तकभेदेनापि तत्रोक्तं इह तु यत्सामान्यत- |पिटकाल्प स्तदेव वाच्यमिति दर्शयितुमाह-'ओहियं पदं भाणिय'ति तच्चैवमर्थतः-"पण १ चउ २ ति ३ दुय ४ अणिदिय ५४ बहुत्वानि एगिदि ६ सईदिया ७ कमा हुति । थोवा १ तिन्नि य अहिया ४ दोणतगुणा ६ विसेसहिया ७॥ [ पश्चचतुस्सिद्वी-||सू ७२९|न्द्रिया अनिन्द्रियाः एकेन्द्रियाः सेन्द्रियाः क्रमाद् भवन्ति स्तोकास्त्रयोऽधिका द्वौ अनन्तगुणी विशेषाधिकाच ॥१॥] 'सका-ISil ७३३ इयअप्पाबहुगं तहेव ओहियं भाणियति सकायिकपृधिव्यप्तेजोवायुवनस्पतित्रसकायिकाकायिकनां यथाऽल्पबहुत्वं सामान्यतस्तत्रोक्तं तथैवेहापि भणितव्यं, तच्चैवमर्धतः-"तस १ तेउ २ पुढवि ३ जल ४ बाउकाय ५ अकाय ६ वणस्सइ७ सकाया ८। थोष १ असंखगुणा २ हिय तिन्नि उ ५ दोणतगुण ७ अहिया ८॥"[प्रसास्तैजसाः पृथ्वी जलं वायुकाया अकाया वनस्पतयः सकायाः स्तोका असमातगुणास्त्रयोऽधिका द्वावनन्तगुणावधिकाश्च ॥१॥] अल्पबहुत्वाधिकारादेवेदमाह'एएसि ण'मित्यादि, 'जीवाणं पोग्गलाणं' इह यावत्करणादिदं दृश्य-समयाणं दवाणं पएसाणं'ति 'जहा बहु-IN८६९॥ वत्तबयाए'ति, तदेवमर्थत:-"जीवा १ पोग्गल २ समया ३ दब ४ पएसा य ५ पजवा ६ चेव । थोया १ गंता २ णता Ni SHOROSCOCKROAD दीप अनुक्रम [८७५-८८०] ~154 Page #155 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (०५) [भाग-११]"भगवती"-अंगसूत्र-५ (मूलं+वृत्ति:) शतक [२५], वर्ग [-], अंतर्-शतक [-1, उद्देशक [३], मूलं [७२९-९३३] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र- [०५], अंगसूत्र- [०५] "भगवती मूलं एवं अभयदेवसूरि-रचिता वृत्ति: प्रत सूत्रांक [७२९-७३३] ४३ विसेसअहिया ४ दुवेऽणता ६॥१॥"[जीवाः पुद्गलाः समया द्रव्याणि प्रदेशाः पर्यवाश्चैव स्तोका अनम्ता अनन्ता है विशेषाधिका द्वायनन्ती ॥१॥] इह भावना-यतो जीवाः प्रत्येकमनन्तानन्तैः पुद्गलबद्धाः प्रायो भवन्ति, पुद्गलास्तु जीवैः संबद्धा असंबद्धाश्च भवन्तीत्यतः स्तोकाः पुद्गलेभ्यो जीवाः, यदाह-"जं पोग्गलावबद्धा जीवा पाएण होति तो ४ थोवा । जीवेहिं विरहिया अविरहिया व पुण पोग्गला संति ॥२॥"[ यत्पुद्गलावबद्धाः प्रायेण जीवास्ततः स्तोका भ-18 है वन्ति जीवैविरहिता अविरहिताश्च पुनः पुद्गलाः सन्ति ॥१॥] जीवेभ्योऽनन्तगुणाः पुद्गलाः, कथं १, यत्तैजसादिशरीरं येन जीवेन परिगृहीतं तत्ततो जीवात्पुद्गलपरिमाणमानित्यानन्तगुणं भवति, तथा तैजसशरीरात्प्रदेशतोऽनन्तगुणं कार्मणं, एवं चैते जीवप्रतिबद्धे अनन्तगुणे, जीवविमुक्ते च ते ताभ्यामनन्तगुणे भवतः, शेषशरीरचिन्ता विह न कृता, यस्मात्तानि मुक्तान्यपि खस्वस्थाने तयोरनन्तभागे वर्तन्ते, तदेवमिह तैजसशरीरपुद्गला अपि जीवेभ्योऽनन्तगुणाः किं पुनः कार्मणादिपुद्गलराशिसहिताः, तथा पञ्चदशविधप्रयोगपरिणताः पुद्गलाः स्तोकास्तेभ्यो मिश्रपरिणताः अनन्तगुणास्तेभ्योऽ15.पि विनसापरिणता अनन्तगुणासिंविधा एव च पुद्गलाः सर्व एव भवन्ति, जीवाश्च सर्वेऽपि प्रयोगपरिणतपुद्गलानां दिप्रतनुकेऽनन्तभागे वर्तन्ते, यस्मादेवं तस्माज्जीवेभ्यः सकाशात्पुद्गला बहुभिरनन्तानन्तकैर्गुणिता सिद्धा इति, आह च "जं जेण परिगहियं तेयादि जिएण देहमेकेकं । तत्तो तमणतगुणं पोग्गलपरिणामओ होइ ॥१॥ तेयाओ पुण कम्मगमणतगुणियं जओ विणिद्दिढ । एवं ता अवबद्धाई तेयगकम्माई जीवहिं॥२॥ इत्तोऽनंतगुणाई तेसिं चिय जाणि होति मुकाई । इह पुण थोवत्ताओ अगहणं सेसदेहाणं ॥३॥जं तेसिं मुक्काइपि हो।त सहाणणंतभागंमि । तेणं तदग्गहणमिहं दीप अनुक्रम [८७५-८८०] 41-5 ~155 Page #156 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (०५) [भाग-११]"भगवती"-अंगसूत्र-५ (मूलं+वृत्ति:) शतक [२५], वर्ग [-], अंतर्-शतक [-1, उद्देशक [३], मूलं [७२९-९३३] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र- [०५], अंगसूत्र- [०५] "भगवती मूलं एवं अभयदेवसूरि-रचिता वृत्ति: व्याख्याप्रज्ञप्तिः अभयदेवी प्रत सूत्रांक [७२९-७३३] या वृत्तिः२ ॥८७011 बद्धाबद्धाण दोहपि ॥४॥ इह पुण तेयसरीरगषद्धचिय पोग्गला अणंतगुणा । जीवहितो किं पुण सहिता अवसेसरासीहिं! २५ शतके ॥५॥थोवा भणिया सुत्ते पन्नरसबिहप्पओगपाओग्गा । तत्तो मीसपरिणया पंतगुणा पोग्गला भणिया ॥ ६ ॥ तो बी- उद्देशः३ | ससापरिणया तत्तो भणिया अणंतसंगुणिया । एवं तिविहपरिणया सबेवि य पोग्गला लोए ॥ ७॥ जीवा सवेवि या आकाशएकंमि पओगपरिणयाणंपि। वटृति पोग्गलाणं अणंतभागंमि तणुयम्मि ॥८॥ बहुएहिं अणन्ताणतपहिं तेण गुणिया जिएहितो। सिद्धा हवंति सबेवि पोग्गला सबलोगमि॥९॥ [जीवेन येन यत्तै जसादिशरीरमकैकं परिगृहीतं तदनन्तगुणं ततो भवति पुद्गलपरिणामात् ॥१॥ तैजसात्पुनः कार्मणमनन्तगुणितं यतो विनिर्दिष्टम् । एवं तावज्जीवैद्धानि तैजसकार्मणानि ॥२॥ बढ़त्वानि इतोऽनन्तगुणानि तेभ्यश्चैव यानि मुक्तानि भवन्ति । शेषदेहानां पुनरिहाग्रहणं स्तोकत्वात् ॥३॥ यत्तानि मुक्तान्यपि स्व- सू ७२९स्थानानन्तभागे भवन्ति । तेन तदग्रहणमिह द्वयोरपि बद्धाबद्धयोः॥४॥ इह पुनस्तैजसशरीरबद्धा एव पुद्गला अनन्तगुणाः। ७३३ जीवेभ्योऽवशेषराशिभिः सहिताः किं पुनः॥ ५॥ सूत्रे पञ्चदश विधप्रयोगमायोग्याः स्तोका भणिताः। ततो मिश्रपरिणताः पुद्गला अनन्तगुणा भणिताः॥६॥ ततो विश्रस परिणतास्ततोऽनन्तगुणिता भणिताः । एवं त्रिविधपरिणताः सर्वेऽपि च | | लोके पुद्गलाः॥७॥ सर्वेऽपि न जीवाः प्रयोगपरिणतानां पुद्गलानामेकस्मिन् यत् तनुकेऽनन्तभागे वर्तन्ते ॥८॥ ततः तेन | जीवभ्यो बहुभिर्यदनन्तानन्तैर्गुणिताः पुद्गलाः सर्वलोके सिद्धा भवन्ति सर्वेऽपि ॥९॥] ननु पुद्गलेभ्योऽनन्तगुणाः समया ॥ इति यदुक्तं तन्न संगतं, तेभ्यस्तेषां लोकत्वात् , स्तोकत्वं च मनुष्यक्षेत्रमात्रवर्तित्वात् समयानां पुद्गलानां च सकललोकवर्तित्वादिति, अत्रोच्यते, समयक्षेत्रे ये केचन द्रव्यपर्यायाः सन्ति तेषामेकैकस्मिन् साम्प्रतसमयो वत्तेते, एवं च साम्प्रतः | % दीप अनुक्रम [८७५-८८०] % ~156~ Page #157 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (०५) [भाग-११]"भगवती"-अंगसूत्र-५ (मूलं+वृत्ति:) शतक [२५], वर्ग [-], अंतर्-शतक [-1, उद्देशक [३], मूलं [७२९-९३३] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र- [०५], अंगसूत्र- [०५] "भगवती मूलं एवं अभयदेवसूरि-रचिता वृत्ति: -R प्रत सूत्रांक [७२९-७३३] समयो यस्मात्समयक्षेत्रद्रव्यपर्यवगुणो भवति तस्मादनन्ताः समया एकैकस्मिन् समये भवन्तीति, आह च-"होति य || अर्णतगुणिया अद्धासमया उ पोग्गलेहितो । नणु थोवा ते नरखेत्तमेत्ततश्चत्तणाओत्ति ॥१॥ भाइ समयक्खेत्तमि सन्ति जे केइ दवपज्जाया । वट्टइ संपयसमओ तेसिं पत्तेयमेकेके ॥२॥ एवं संपयसमओ जं समयक्खेत्तपज्जवन्भत्थो । तेणाणता समया भवंति एफेक्कसमयमि ॥ ३॥" [ पुद्गलेभ्योऽनन्तगुणा अद्धासमया भवन्ति । ननु ते स्तोकाः स्युनरक्षेत्रमात्रे वर्तमानत्वात् ॥१॥ भण्यते समयक्षेत्रे ये केचिद् द्रव्यपर्यायाः सन्ति तेषां प्रत्येकमेकैकस्मिन् साम्प्रतसमयो वर्त्तते ॥२॥ एवं साम्प्रतसमयो यत्समयक्षेत्रपर्यवाभ्यस्तस्तेनानन्ताः समया एककस्मिन् समये भवन्ति ॥३॥] एवं च वर्तमानोऽपि समयः पुद्गलेभ्योऽनन्तगुणो भवति, एकद्रव्यस्यापि पर्यवाणामनन्तानन्तत्वात् , किश्च-न केवलमित्थं पुद्गलेभ्योऽनन्तगुणा समयाः सर्वलोकद्रव्यप्रदेशपर्यायेभ्योऽप्यनन्तगुणास्ते संभवन्ति, तथाहि-यत् समस्तलोकद्रव्यप्रदेशपर्यवराशेः समयक्षेत्रद्रव्यप्रदेशपर्यवराशिना भत्कालभ्यते तावत्सु समयेषु तात्त्विकेषु गतेषु लोकद्रव्यप्रदेशपर्यवसङ्ख्यासमाना औपचारिकसमयसङ्ख्या लभ्यते, एतद्भावना चैव-किलासद्भावकल्पनया लक्ष लोकद्रव्यप्रदेशपर्यवाणां तस्य समयक्षेत्रद्रव्यप्रदेशपर्यवराशिना कल्पनया सहस्रमानेन भागे हते शतं लब्धं, ततश्च किल तात्त्विकसमयशते गते लोकद्रव्यप्रदेशपर्यवसङ्ख्यातुल्या समयक्षेत्रद्रव्यप्रदेशपर्यवरूपसमयसङ्ख्या लभ्यते, समयक्षेत्रापेक्षयाऽसङ्ख्यातगुणलोकस्य कल्पनया शतगुणत्वात् , तथाऽन्येप्वपि तावत्सु तात्त्विकसमयेषु गतेषु तावन्त एवौपचारिकसमया भवन्तीति, एवमसङ्ख्यातेषु कल्पनया शतमानेषु तात्त्विकसमयेषु पौनःपुन्येन गतेष्वनन्ततमायां कल्पनया सहस्रतमायां वेलायां गता भवन्ति तात्त्विकसमयालोकद्रव्यप्रदेशपर्यव RB--- दीप अनुक्रम [८७५-८८०] -16 ~157. Page #158 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (०५) [भाग-११]"भगवती"-अंगसूत्र-५ (मूलं+वृत्ति:) शतक [२५], वर्ग [-], अंतर्-शतक [-1, उद्देशक [३], मूलं [७२९-९३३] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र- [०५], अंगसूत्र- [०५] "भगवती मूलं एवं अभयदेवसूरि-रचिता वृत्ति: II . प्रत सूत्रांक [७२९-७३३] व्याख्या मात्राः कल्पनया लक्षप्रमाणाः, एवं चैकैकस्मिंस्तात्त्विकसमयेऽनन्तानामौपचारिकसमयानां भावात्सर्वलोकद्रव्यप्रदेशवयवरा २५ शतके • मज्ञप्ति शेरपि समया अनन्तगुणाः प्रामुवन्ति किं पुनः पुद्गलेभ्य इति, यदाह-"ज' सबलोगदवप्पएसपजवगणस्स भइयस्स । उद्देशः३ अभयदेवी-18 लब्भइ समयक्खेत्तप्पएसपज्जायपिंडेण ॥१॥ एवइसमएहिं गएहिं लोगपज्जवसमा समयसंखा । लन्भइ अन्नेहिपि य तत्ति-16 या वृत्तिः यमंत्तेहिं तावइया ॥२॥ एवमसखेजेहिं समएहिं गएहिं तो गया होति । समयाओ लोगदवप्पएसपज्जायमेत्ताओ॥३॥ |श्रेणिगति ॥८७॥ | श्रेणिगणिइय सबलोगपजवरासीओवि समया अणंतगुणा । पावंति गणेहता किं पुण ता पोग्गलेहिंतो?॥४॥यत्समयक्षेत्रप्रदेश पिटकाल्पपर्यायपिण्डेन भक्तस्य सर्वलोकद्रव्यप्रदेशपर्यवगणस्य लभ्यते॥शाएतावत्सु समयेषु गतेषु लोकपर्यायसमा समयसङ्ख्या लभ्यते बहुत्वानि अन्यैरपि तावन्मात्रैस्तावती ॥२॥ एवमसङ्ग्येयेषु समयेषु गतेषु ते लोकद्रव्यप्रदेशपर्यायप्रमाणाः समया गता भवंति ॥ ३॥ सू७२९एवं सर्वलोकपर्यवराशेरपि समया अनन्तगुणा गण्यमाना भवन्ति किं पुनस्ते पुरलेभ्यः ॥ ४॥] अन्यस्तु प्रेरयति- ७३३ उत्कृष्टतोऽपि पण्मासमानमेव सिद्धिगतेरन्तर भवति तेन च सेत्स्यद्भधः सिद्धेभ्योऽपि च जीवेभ्योऽसयातगुणा एव समया | द भवन्ति कथं पुनः सर्वजीवेभ्योऽनन्तगुणा भविष्यन्तीति, इहाप्यौपचारिकसमयापेक्षया समयानामनन्तगुणत्वं वाच्यमिति, अथ समयेभ्यो द्रव्याणि विशेषाधिकानीति, कथम् ?, अत्रोच्यते, यस्मात्सर्वे समयाः प्रत्येकं द्रव्याणि शेषाणि च जीवपुहलधर्मास्तिकायादीनि तेष्वेव क्षिप्तानीत्यतः केवलेभ्यः समयेभ्यः सकाशात् समस्तद्रव्याणि विशेषाधिकानि भवन्ति न ८७१॥ सङ्ख्यातगुणादीनि, समयद्रव्यापेक्षया जीवादिद्रव्याणामल्पतरत्वादिति, उक्तञ्च-"एत्तो समएहितो होति विसेसाहियाई| | दवाई। जं भेया सञ्चिय समया दवाई पत्तेयं ॥१॥ सेसाई जीवपोग्गलधम्माधम्मंचराई छुहाई। दबढाए समएस L दीप अनुक्रम [८७५-८८०] + ~158~ Page #159 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (०५) [भाग-११]"भगवती"-अगसूत्र-५ (मूलवृत्ति :) शतक [२५], वर्ग [-], अंतर्-शतक [-1, उद्देशक [३], मूलं [७२९-९३३] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र- [०५], अंगसूत्र- [०५] "भगवती मूलं एवं अभयदेवसूरि-रचिता वृत्ति: A6 % प्रत सूत्रांक [७२९-७३३] जातेण दवा विसेसहिया ॥२॥"[भेदा यत्सर्वेऽपि समयाः प्रत्येक द्रव्याणीतः समयेभ्यो द्रव्याणि विशेषाधिकानि भवन्ति ॥१॥ | शेषाणि जीवपुङ्गलधर्माधर्माकाशानि प्रक्षिप्तानि द्रव्यार्थतया समयेषु तेन द्रव्याणि विशेषाधिकानि ॥२॥] नन्वद्धासमयानां कस्माद्रव्यत्वमेवेष्यते ? समयस्कन्धापेक्षया प्रदेशार्थत्वस्यापि तेषां युज्यमानत्वात्, तथाहि-यथा स्कन्धो द्रव्यं सिद्ध स्कन्धावयवा अपि यथा प्रदेशाः सिद्धाः एवं समयस्कन्धवर्तिनः समया भवन्ति प्रदेशाश्च द्रव्यं चेति, अत्रोच्यते, परमाणू४ नामन्योऽन्यसव्यपेक्षत्वेन स्कन्धत्वं युक्तं, अद्धासमयानां पुनरन्योऽन्यापेक्षिता नास्ति, यतः कालसमयाः प्रत्येकत्वे च का-1 स्पनिकस्कन्धाभावे च वर्तमानाः प्रत्येकवृत्तय एव तत्स्वभावत्वात् तस्मात्तेऽन्योऽन्यनिरपेक्षाः अन्योऽन्यनिरपेक्षत्वाच न ते वास्तवस्कन्धनिष्पादकास्ततश्च नैषां प्रदेशार्थतेति, उक्तश्चात्र-“आहऽद्धासमयाणं किं पुण दवछए व नियमेण । तेसि पएसट्ठाबिहु जुज्जइ खंध समासज्ज ॥१॥ [ग्रन्थानम् १७०००] सिद्धं खंधो दषं तदधयवाविय जहा पएसत्ति । इय तबत्ती समया होंति पएसा य दवं च ॥२॥ भन्नइ परमाणूणं अन्नोन्नमवेक्ख खंधया सिद्धा। अद्धासमयाणं पुण अन्नो-| नावेक्खया नस्थि ।। ३ ॥ अद्धासमया जम्हा पत्तेयत्ते य खंधभावे य । पत्तेयवत्तिणो च्चिय ते तेणऽन्नोन्ननिरवेक्खा था। [आहाद्धासमयानां किं पुनर्नियमेन द्रव्यार्थतैव तेषां स्कन्धं समाश्रित्य प्रदेशार्थताऽपि युज्यते ॥शा स्कन्धो द्रव्यं सिद्धं तद | वयवा अपि च यथा प्रदेशा इति । एवं तद्वर्तिनः समयाः प्रदेशा भवन्ति द्रव्यं च ॥२॥ भण्यते परमाणूनामन्योऽन्या-] पेक्षया स्कन्धता सिद्धा । अद्धासमयानां पुनरन्योऽन्यापेक्षता नास्ति ॥३॥ अद्धासमया यस्मात्प्रत्येकत्वे स्कन्धभावे 8 च । प्रत्येकवर्त्तिनश्चैव ते तेनान्योऽन्यनिरपेक्षाः ॥४॥] अथ द्रव्येभ्यः प्रदेशा अनन्तगुणा इत्येतत्कथम् ?, उच्यते । दीप अनुक्रम [८७५-८८०] 15944%84% %25A4% ~159 Page #160 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (०५) [भाग-११]"भगवती"-अंगसूत्र-५ (मूलं+वृत्ति:) शतक [२५], वर्ग [-], अंतर्-शतक [-1, उद्देशक [३], मूलं [७२९-९३३] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र- [०५], अंगसूत्र- [०५] "भगवती मूलं एवं अभयदेवसूरि-रचिता वृत्ति: प्रत सूत्रांक [७२९-७३३] व्याख्या-5 अद्धासमयद्रव्य अद्धासमयद्रव्येभ्य आकाशप्रदेशानामनन्तगुणत्वात् , ननु क्षेत्रप्रदेशानां कालसमयानां च समानेऽप्यनन्तत्वे किं कारण-4|२५ शतके प्रज्ञप्तिः |माश्रित्याकाशप्रदेशा अनन्तगुणाः कालसमयाश्च तदनन्तभागवर्तिनः इति, उच्यते, एकस्यामनाथपर्यवसितायामाकाश-III उद्देशः३ अभयदेवी- प्रदेशश्रेण्यामेकैकप्रदेशानुसारतस्तिर्यगायतश्रेणीनां कल्पनेन ताभ्योऽपि चैकैकप्रदेशानुसारेणैवो धआयतश्रेणीविरचने-15) या वृत्तिः२६ त्ति नाकाशप्रदेशघनो निष्पाद्यते, कालसमयश्रेण्यां तु सैव श्रेणी भवति न पुनर्धनस्ततः कालसमयाः स्तोका भवन्तीति, इह श्रेणिगति श्रेणिगणि॥८७२॥ ६ गाथाः-"एत्तो सबपएसाणंतगुणा खप्पएसणंतत्ता । सबागासमणतं जेण जिणिदेहिं पन्नत्तं ॥१॥" आह समेऽणतमि |पिटकाल्पदिखेत्तकालाण किं पुण निमित्तं । भणियं खमणतगुणं कालो य सिमणंतभागंमि ॥२॥ भन्नइ नभसेढीए अणाइयाए अप- बहुत्वानि PIजवसियाए। निष्फजइ खंमि घणो न उ कालो तेण सो थोवो ॥३॥" [इतः सर्वप्रदेशाः खप्रदेशानन्तत्वादनन्त-| | सू ७२९3 गुणाः सर्वाकाशमनन्तं येन जिनेन्द्रैः प्रज्ञप्तम् ॥१॥ आहानन्तत्वे समे क्षेत्रकालयोः किं पुनः कारणं खमनन्तगुणं भणित कालश्चानन्तभागे तस्य ॥२॥ भण्यते नभःश्रेणी अनाद्यपर्यवसितायां निष्पद्यते खे घनो न तु काले तेन स स्तोकः ॥३॥]| प्रदेशेभ्योऽनन्तगुणाः पर्याया इति, एतद्भावनार्थ गाधा-"एत्तो य अर्णतगुणा पज्जाया जेण नहपएसम्मि । एकेकमि अर्णता अगुरुलहू पजवा भणिया ॥१॥" [ इतश्चानन्तगुणाः पर्याया येन नभम्प्रदेशे एककस्मिन्मनन्ता अगुरुलघुपवा भणिताः॥१॥] ॥ इति पञ्चविंशतितमशते तृतीयः ।। २५-३॥ दीप अनुक्रम [८७५ RECESSAGACA5% ॥७२॥ -८८०] अत्र पञ्चविंशतितमे शतके तृतीय उद्देशक: परिसमाप्त: ~160 Page #161 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (०५) [भाग-११]"भगवती"-अंगसूत्र-५ (मूलं+वृत्ति:) शतक [२५], वर्ग [-], अंतर्-शतक [-], उद्देशक [४], मूलं [७३४] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र- [०५], अंगसूत्र- [०५] "भगवती मूलं एवं अभयदेवसूरि-रचिता वृत्ति: क प्रत सूत्रांक [७३४] तृतीयोदेशके संस्थानादीनां परिमाणमुक्तं, चतुर्थे तु परिमाणस्यैव भेदा उच्यन्ते, इत्येवंसम्बन्धस्यास्पदमादिसूत्रम् कति णं भंते ! जुम्मा पन्नत्ता, गोयमा । चत्तारि जुम्मा पं०, तं०-कडजुम्मे जाव कलिओगे, से केण|| दएवं चु०चत्तारि जुम्मा ५० कडजुम्मे जहा अट्ठारसमसते चउत्थे उद्देसए तहेव जाव से तेण गोयमा ! एवं बुनेरइयाणं भंते ! कति जुम्मा ५०१, गोयमा! चत्तारि जुम्मा ५०, तंजहा-कडजुम्मे जाव कलियोए, से 8 केण एवं बु. नेरइयाणं चत्तारि जुम्मा १०,२०-कडजुम्मे अट्ठो तहेव एवं जाव वाउकाइयाणं, वणस्सइका इयाणं भंते ! पुच्छा, गोयमा ! वणस्सइकाइया सिय कडजुम्मा सिय तेयोया सिय दावरजुम्मा सिय कलिPा योगा, से केणडे एवं बुचा वणस्सइकाइया जाव कलियोगा?, गोयमा ! उववायं पहुच, से तेणगुणं तं चेष, दियाणं जहा नेरइयाणं एवं जाव वेमाणि०, सिद्धाणं जहा वणस्सइकाइयाणं ॥ कतिविहा णं भंते ! सबदघा प०१, गोयमा ! छविहा सबदबा प० तंजहा-धम्मत्थिकाए अधम्मस्थिकाए जाव अद्धासमए । धम्मस्थि-| काए णं भंते ! दबट्टयाए किं कडझुम्मे जाव कलिओगे, गोयमा! नो कडजुम्मे नो तेयोए नो दावरजुम्मे कलिओए, एवं अहम्मत्तिकाएवि, एवं आगासस्थिकाएवि, जीवधिकाए णं भंते ! पुच्छा, गोयमा कडजुम्मे नो तेयोये नो दावरजुम्मे नो कलियोये, पोग्गलस्थिकाए णं भंते ! पुच्छा, गोयमा! सिय कडजुम्मे जाव सिय कलियोगे, अद्धासमये जहा जीवस्थिकाए ॥ धम्मस्थिकाए णं भंते ! पएसट्टयाए किं कडजुम्मे ? पुच्छा, [ गोयमा ! कडजुम्मे नो तेयोए नो दायरजुम्मे नो कलियोगे एवं जाव अद्धासमए ॥ एएसि णं भंते । धम्म-ल दीप अनुक्रम [८८१] अथ पञ्चविंशतितमे शतके चर्थ-उद्देशक: आरभ्यते ~161 Page #162 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (०५) [भाग-११]"भगवती"-अंगसूत्र-५ (मूलं+वृत्ति:) शतक [२५], वर्ग [-], अंतर्-शतक [-], उद्देशक [४], मूलं [७३४] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र- [०५], अंगसूत्र- [०५] "भगवती मूलं एवं अभयदेवसूरि-रचिता वृत्ति: प्रत सूत्रांक [७३४] व्याख्या-3 स्थिकायअधम्मत्थिकाय जाव अद्धासमयाणं दट्टयाए० एएसिणं अप्पाबहुगं जहा बहुवसबयाए तहेव निर- २५ शतके प्रज्ञप्तिः दबसेसं । धम्मत्थिकाए णं भंते ! किं ओगाढे अणोगाढे ?, गोयमा! ओगाढे नो अणोगाढे, जइ ओगावे किं| उद्देशः ४ अभयदेवी- संखेजपएसोगाढे असंखेजपएसोगाढे अणंतपएसोगाढे ?, गोयमा ! नो संखेज्जपएसोगाढे असंखेजपएसोगाहे या वृत्तिः२९ |४| नो अणंतपएसोगाढे, जइ असंखेज्जपएसोगाढे किं कडजुम्मपएसोगावे ? पुच्छा, गोयमा ! कडजुम्मपएसोगा-13 ॥ ७ ढे नो तेओगे नो दावरजुम्मे नो कलियोगपएसोगाडे, एवं अधम्मत्थिकायेवि, एवं आगासत्यिकायेवि, जीव स्थिकाये पुग्गलस्थिकाये अद्धासमए एवं चेव ॥ इमा णं भंते ! रयणप्पभा पुढची किं ओगाढा अणोगाढा जहेब धम्मस्थिकाए एवं जाव अहेसत्तमा, सोहम्मे एवं चेव, एवं जाव इंसिपन्भारा पुढवी ।। (सूत्रं ७३४) 'कति ण'मित्यादि, 'जुम्म'त्ति सज्ञाशब्दत्वादाशिविशेषाः । 'नेरइयाणं भंते ! कइ जुम्मा ? इत्यादी 'अहो तहेत्ति स चार्थः-'जेणं नेरड्या घउक्कएणं अवहारेणं २ अवहीरमाणा २ चउपजवसिया ते ण नेरइया कडजुम्मे'त्यादि इति । वनस्पतिकायिकसूत्रे 'उववायं पडुच'त्ति, यद्यपि वनस्पतिकायिका अनन्तत्वेन स्वभावात् कृतयुग्मा एव मान-2 वन्ति तथाऽपि गत्यन्तरेभ्य एकादिजीवानां तत्रोत्पादमङ्गीकृत्य तेषां चतूरूपत्वमयोगपद्येन भवतीत्युच्यते, उद्वर्तनामप्य ङ्गीकृत्य सादेतत् केवलं सेह न विवक्षितेति ॥ अथ कृतयुग्मादिभिरेव राशिभिर्द्रव्याणां प्ररूपणायेदमाह-'कतिबिहा णं ॥८७३॥ || भंते ! सपदया' इत्यादि, तत्र 'कतिविधानि' कतिस्वभावानि कतीत्यर्थः, 'धम्मस्थिकाए णमित्यादि 'कलियोगे'त्ति एक-11 दत्वासास्तिकायस्य चतुष्कापहाराभावेनैकस्यैवावस्थानाकल्योज एवासाविति, 'जीवत्थी'त्यादि, जीवद्रव्याणामवस्थिता-14 दीप अनुक्रम [८८१] ~162~ Page #163 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (०५) प्रत सूत्रांक [७३४] दीप अनुक्रम [८८१] [भाग-११]“भगवती”– अंगसूत्र -५ (मूलं + वृत्ति:) शतक [२५], वर्ग [-], अंतर् शतक [-], उद्देशक [४], मूलं [७३४] पूज्य आगमोद्धारकश्री संशोधितः मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित.. आगमसूत्र- [०५] अंगसूत्र- [ ०५] "भगवती" मूलं एवं अभयदेवसूरि- रचिता वृत्तिः नन्तत्वात्कृतयुग्मतैव, 'पोग्गलस्थिकाए' इत्यादि, पुद्गलास्तिकायस्यानन्तभेदत्वेऽपि सङ्घातभेदभाजनत्वाच्चातुर्विध्यमध्येयं, अद्धासमयानां त्वतीतानागतानामवस्थितानन्तत्वात्कृत युग्मत्वमत एवाह - 'अद्धासमए जहा जीवथिकाए'ति ॥ | उक्ता द्रव्यार्थता, अथ प्रदेशार्थता तेषामेवोच्यते- 'धम्मस्थी' त्यादि, सर्वाण्यपि द्रव्याणि कृतयुग्मानि प्रदेशार्थतया । अच| स्थितासङ्ख्यातप्रदेशत्वादवस्थितानन्तप्रदेशत्वाच्चेति ॥ अथैतेषामेवाल्पबहुत्वमुच्यते- 'एएसि ण' मित्यादि, 'जहा बहुवतवयाए त्ति यथा प्रज्ञापनायास्तृतीयपदे, तचैवमर्थतः - धर्मास्तिकायादयस्त्रयो द्रव्यार्थतया तुल्या एकैकद्रव्यरूपत्वात्, तदन्यापेक्षया धाल्पे, जीवास्तिकायस्ततोऽनन्तगुणो जीवद्रव्याणामनन्तत्वात् एवं पुद्गलास्तिकायाद्धा समयाः, प्रदेशार्थचि |न्तायां त्वाद्यौ प्रत्येकमसत्येयप्रदेशत्वेन तुल्यौ तदन्येभ्यः स्तोकौ च जीवपुङ्गलाद्धासमचाकाशास्तिकायास्तु क्रमेणानन्तगुणा इत्यादि ॥ अथ द्रव्याण्येव क्षेत्रापेक्षया कृतयुग्मादिभिः प्ररूपयन्नाह 'धम्मस्थिकाए' इत्यादि, 'असंखजपएसोगाढे-' चि असा लोकाकाशप्रदेशेष्ववगाढोऽसौ ढोकाकाशप्रमाणत्वात्तस्येति, 'कडजुम्मपएसोगाढे'ति लोकस्यावस्थितासङ्ख्येयप्रदेशत्वेन कृतयुग्मप्रदेशता, लोकप्रमाणत्वेन च धर्मास्तिकायस्थापि कृतयुग्मतैव, एवं सर्वास्तिकायानां लोकावगाहित्वा तेषां नवरमाकाशास्तिकायस्यावस्थितानन्त प्रदेशत्वादात्मावगाहित्याच्च कृतयुग्मप्रदेशावगाढताऽद्धासमयस्य चाव| स्थिता सङ्ख्येयप्रदेशात्मकमनुष्यक्षेत्रावगाहित्वादिति । अथावगाहप्रस्तावादिदमाह- 'इमा ण' मित्यादि ॥ अथ कृतयुग्मादि| भिरेव जीवादीनि षड्विंशतिपदान्येकत्व पृथक्त्वाभ्यां निरूपयन्नाह जीवे णं भंते! दवाए किं कडजुम्मे पुच्छा, गोयमा ! नो कडजुम्मे नो तेयोगे नो दावरजुम्मे कलिओए, Educatin internation For Parts Only ~ 163~ Page #164 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (०५) [भाग-११]"भगवती"-अंगसूत्र-५ (मूलं+वृत्ति:) शतक [२५], वर्ग [-], अंतर्-शतक [-], उद्देशक [४], मूलं [७३५] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र- [०५], अंगसूत्र- [०५] "भगवती मूलं एवं अभयदेवसूरि-रचिता वृत्ति: प्रत सूत्रांक [७३५] दीप अनुक्रम [८८२] व्याख्या-1 एवं नेरइएचि एवं जाव सिद्धे । जीवा णं भंते! दबट्टयाए किं कडजुम्मा ? पुच्छा, गोयमा ओघादेसणं २५ शतके प्रज्ञप्तिः | oil कडजुम्मा नो तेयोगा नो दावर नो कलिओगा, बिहाणादेसेणं नो कडजुम्मा नो तेयोगा नो दावरजुम्मा माशा अभयदेवी- कलियोगा, नेरइया णं भंते ! दबट्टयाए पुच्छा, गोयमा ! ओघादेसेणं सिय कडजुम्मा जाब सिय कलियोगा, द्रव्यप्रदेया वृत्तिः २ विहाणादेसेणं णो कडजुम्मा णो तेयोगा णो दावरजुम्मा कलिओगा एवं जाव सिहा ।। जीवे णं भंते! पए- शार्थ तया ॥८७४॥ सट्टयाए किं कड० पुच्छा, गोयमा ! जीवपएसे पडुच कडजुम्मे नो तेयोगे नो दावर नो कलियोगे, सरीर-5 कृतयुग्मापएसे पहुंच. सिय कडजुम्मे जाच सिय कलियोगे, एवं जाब वेमाणिए । सिद्धे णं भंते ! पएस. किं कडजु- दिसू७३५ म्मे ? पुच्छा, गोयमा ! कहजुम्मे नो तेयोगे नो दावरजुम्मे नो कलिओए । जीवा णं भंते ! पएसट्टयाए किं जाकडजुम्मे ? पुच्छा, गोयमा! जीवपएसे पडच्च ओघादेसेणवि चिहाणादेसेणवि कडजुम्मा नो तेयोगा नो दावर नो कलिओगा, सरीरपएसे पडुच्च ओघादेसेणं सिय कडजुम्मा जाब सिय कलियोगा, विहाणादेसेणं कडजुम्मावि जाव कलियोगावि, एवं नेरइयावि, एवं जाव वेमाणिया। सिद्धा णं भंते । पुच्छा, गोयमा। का ओघादेसेणवि विहाणादेसेणवि कडजुम्मा नो तेयोगा नो दावरजुम्मा नो कलिओगा ॥ (सूत्रं ७३५) & 'जीवे 'मित्यादि, द्रव्यार्थतयैको जीवः एकमेव द्रव्यं तस्मात्कल्योजो न शेषाः । 'जीवा णमित्यादि, जीवा अवद स्थितानन्तत्वादोघादेशेन-सामान्यतः कृतयुग्माः, विहाणादेसेणं'ति भेदप्रकारेणैकैकश इत्यर्थः कस्योजा एकत्वात्तत्स्वरू ८७४॥ कापस्य । 'नेरइया णमित्यादौ 'ओघादेसेणं ति सर्व एव परिगण्यमानाः 'सिय कडजुम्म'त्ति कदाचिच्चतुष्कापहारेण ~164 Page #165 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (०५) [भाग-११]"भगवती"-अंगसूत्र-५ (मूलं+वृत्ति:) शतक [२५], वर्ग -], अंतर्-शतक [-], उद्देशक [४], मूलं [७३५] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र- [०५], अंगसूत्र- [०५] "भगवती मूलं एवं अभयदेवसूरि-रचिता वृत्ति: प्रत सूत्रांक 5494% [७३५] दीप अनुक्रम [८८२] चतुरमा भवन्ति, एवं 'सिय तेओयाओं' इत्याद्यप्यवगन्तव्यमिति ॥ उक्ता द्रव्यार्थतया जीवादयः, अथ तथैव प्रदेशार्थतयोच्यन्ते-'जीवे 'मित्यादि, 'जीवपएसे पहुच कडजुम्म'त्ति असङ्ग्यातत्वादवस्थितत्वाच्च जीवप्रदेशानां चतु रम एव जीवः प्रदेशतः, 'सरीरपएसे पडुचेत्यादि, औदारिकादिशरीरप्रदेशानामनन्तत्वेऽपि संयोगवियोगधर्मत्वादयुदिगपञ्चतुर्विधता स्यात् । 'जीवा 'मित्यादि, 'ओघादेसेणवि विहाणादेसेणवि कडजुम्मति समस्तजीवानां प्रदेशा अनन्तत्वादवस्थितत्वाच एफैकस्य जीवस्य प्रदेशा असङ्ख्यातत्वादवस्थितत्वाच चतुरमा एव, शरीरप्रदेशापेक्षया त्वोषादेशेन सर्वजीवशरीरप्रदेशानामयुगपञ्चातुर्विध्यमनन्तत्वेऽपि तेषां सहातभेदभावेनानवस्थितत्वात् , 'विहाणादेसणं कड-8 जुम्मावी'त्यादि, विधानादेशेनैकैकजीवशरीरस्य प्रदेशगणनायां युगपञ्चातुर्विध्यं भवति, यतः कस्यापि जीवशरीरस्य || भाकृतयुग्मप्रदेशता कस्यापि योजप्रदेशतेत्येवमादीति ॥ अथ क्षेत्रतो जीवादि तथैवाह जीवे णं भंते ! किं कडजुम्मपएसोगाढे पुच्छा, गोयमा ! सिय कडजुम्मपएसोगाढे जाव सिय कलिओग-| पएसोगाढे, एवं जाव सिद्धे । जीवा णं भंते। किं कडजुम्मपएसोगाढा पुच्छा, गोयमा । ओघादेसेणं कडहै| जुम्मपएसोगाढा नो तेयोग० नोदावर० नो कलियोग०, विहाणादेसेणं कडजुम्मपएसोगाढावि जाव कलियोग पएसोगाढावि, नेरइयाणं पुच्छा, गोयमा! ओघादेसेणं सिय कडजुम्मपएसोगाढा जाव सिय कलियोगपएसोगाढा, विहाणादसेणं कडजुम्मपएसोगादावि जाव कलियोगपएसोगाढावि, एवं एगिदियसिद्धवजा सवेवि, सिद्धा एगिदियाय जहा जीवा।जीवे णं भंते ! किं कडजुम्मसमयहितीए जाव सियक० पुच्छा, गोयमा! कड ACCECTOR ~165 Page #166 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (०५) [भाग-११]"भगवती"-अंगसूत्र-५ (मूलं+वृत्ति:) शतक [२५], वर्ग [-], अंतर्-शतक [-], उद्देशक [४], मूलं [७३६] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र- [०५], अंगसूत्र- [०५] "भगवती मूलं एवं अभयदेवसूरि-रचिता वृत्ति: प्रत सूत्रांक [७३६] *4-30-% दीप व्याख्या- जुम्मसमयहिनीए नो तेयोग नो दावर नो कलियोगसमयहितीए । नेरइएणं भंते पुच्छा, गोयमा २५ शतके प्रज्ञप्तिः 8| सिय कडजुम्मसमयहितीए जाव सिय कलियोगसमयट्टितीए, एवं जाव बेमाणिए, सिद्धे जहा जीवे । जीवा उद्देशः४ अभयदेवी- दणं भंते ! पुच्छा, गोयमा ! ओघादेसेणवि विहाणादेसेणवि कडजुम्मसमयद्वितीया नो तेओग नो दावर अवगाहया वृत्तिः२ स्थितिनो कलिओग० । नेरइया णं० पुच्छा, गोयमा ! ओघादेसेणं सिय कडजुम्मसमयहितीया जाव सिय कलियो कृतसू ॥८७५॥ गसमयहितीयावि, विहाणादेसेणं करजुम्मसमयद्वितीयावि जाव कलियोगसमयहितीयाचि, एवं जाव वेमा-10 दणिया, सिद्धा जहा जीवा ।। (सूत्रं ७३६) 'जीवे ण'मित्यादि, औदारिकादिशरीराणां विचित्रावगाहनवाच्चतुरमादित्वमस्तीत्यत एवाह-'सिय कडजुम्मे त्यादि। जीवा णं भंते ! इत्यादि, समस्तजीवैरवगाढानां प्रदेशानामसङ्ख्यातस्त्रादवस्थितत्त्वाच्चतुरग्रता एवेत्योघादेशेन कृतयुग्मप्रदेशावगाढाः, विधानादेशतस्तु विचित्रत्वादवगाहनाया युगपञ्चतुर्विधास्ते, नारकाः पुनरोघतो विचित्रपरिणामत्वेन विचित्रशरीरप्रमाण त्वेन विचित्रावगाहप्रदेशप्रमाणत्वादयोगपद्येन चतुर्विधा अपि, विधानतस्तु विचित्रावगाहनत्वादेक3 दाऽपि चतुर्विधास्ते भवन्ति, 'एवं एगिदियसिद्धवजा सवेवित्ति असुरादयो नारकवद्वक्तव्या इत्यर्थः, तत्रीघतस्ते कृत युग्मादयोऽयोगपद्येन विधानतस्तु युगपदेवेति, 'सिद्धा एगिदिया य जहा जीव'त्ति सिद्धा एकेन्द्रियाश्च यथा जीवास्तथा बाच्या इत्यर्थः, ते चौषतः कृतयुग्मा एवं विधानतस्तु युगपञ्चतुर्विधा अपि, युक्तिस्तूभयत्रापि प्राग्वत् ॥ अथ स्थि-IA८७५॥ तिमाश्रित्य जीवादि तथैव प्ररूप्यते-'जीवे ण'मित्यादि, तत्रातीतानागतवर्तमानकालेषु जीवोऽस्तीति सर्वाद्धाया अनन्त-| 4%4%4 अनुक्रम [८८३] CHOCOG ~166~ Page #167 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (०५) [भाग-११]"भगवती"-अंगसूत्र-५ (मूलं+वृत्ति:) शतक [२५], वर्ग [-], अंतर-शतक [-], उद्देशक [४], मूलं [७३६] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र- [०५], अंगसूत्र- [०५] "भगवती मूलं एवं अभयदेवसूरि-रचिता वृत्ति: प्रत सूत्रांक [७३६] समयात्मकत्वादवस्थितत्वाचासौ कृतयुग्मसमयस्थितिक एव, नारकादिस्तु विचित्रसमयस्थितिकत्वात्कदाचिच्चतुरमः कदाचिदन्यत्रितयवतीति । 'जीवा ण'मित्यादि, बहुत्वे जीवा ओघतो विधानतश्च चतुरग्रसमयस्थितिका एव अनाद्यनन्तस्वे| नानन्तसमयस्थितिकत्वात्तेषां, नारकादयः पुनर्विचित्रसमयस्थितिकाः, तेषां च सर्वेषां स्थितिसमयमीलने चतुष्कापहारे चौघादेशेन स्यात् कृतयुग्मसमयस्थितिका इत्यादि, विधानतस्तु युगपञ्चतुर्विधा अपि ॥ अथ भावतो जीवादि। तथैव प्ररूप्यते जीवे णं भंते ! कालवन्नपज्जवेहिं किं कडजुम्मे ? पुच्छा, गोयमा ! जीवपएसे पहुंच णो कडजुम्मे जाव णो। कलियोगे सरीरपएसे पडच सिय कडजुम्मे जाव सिय कलियोगे, एवं जाव वेमाणिए, सिद्धो ण चेव पुच्छिजति । जीवा णं भंते ! कालवन्नपज्जवेहिं पुच्छा, गोयमा ! जीवपएसे पड्डुच ओघादेसेणवि विहाणादेसेणवि णो कडजुम्मा जाव णो कलिओगा, सरीरपएसे पडुच्च ओघादेसेणं सिय कडजुम्मा जाव सिय कलियोगा, विहाणादेसेणं कडजुम्मावि जाव कलि०, एवं जाव बेमा०, एवं नीलवन्नपज्जवेहिं दंडओ भा० एगत्तपुहत्तेणं एवं जाव लुबखफासपजहिं ॥ जीवे णं भंते ! आभिणिवोहियणाणपजवेहिं किं करजुम्मे पुछा, गोयमा।| सिय कडजुम्मे जाथ सिय कलियोगे, एवं एगिदियवज जाच वेमाणिए । जीवा गं भंते ! आभिणियोहियणा-] णपज्जवेहिं पुछा, गोयमा ! ओघादेसेणं सिय कडजुम्मा जाव सिय कलि योगा, विहाणादेसेणं कडजम्माधि जाव कलियोगावि, एवं एगिदियवज्ज जाव वेमाणिया, एवं सुयणाणपज्जवेहिवि, ओहिणाणपज्जवेहिचि एवं दीप अनुक्रम [८८३] ~167~ Page #168 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (०५) [भाग-११]"भगवती"-अंगसूत्र-५ (मूलं+वृत्ति:) शतक [२५], वर्ग [-], अंतर-शतक [-], उद्देशक [४], मूलं [७३७] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र- [०५], अंगसूत्र- [०५] "भगवती मूलं एवं अभयदेवसूरि-रचिता वृत्ति: प्रत सूत्रांक [७३७]] दीप अनुक्रम [८८४] व्याख्या- चेव, नवरं विकलिं दियाणं नस्थि ओहिनाणं, मणपजवनाणंपि एवं चेव, नवरं जीवाणं मणुस्साण य, सेसाणं २५ शतके प्रज्ञप्तिानस्थि, जीवे णं भंते ! केवलनाणप.किं कडजुम्मा पुच्छा, गोयमा ! कडजुम्मे णो तेयोगे णो दावरजुम्मे उद्देशः ४ अभयदेवी- णो कलियोगे, एवं मणुस्सेवि, एवं सिद्धेवि, जीवा णं भंते ! केवलनाणपुच्छा, गोयमा ! ओघादेसेणवि विहा-1 यावृत्तिा बाणादे०कडजम्मा नो तेओनोदाचरणो कलियो, एवं मणुस्सावि, एवं सिद्धावि । जीवे णं भंते! महअ-ISM दिसू७३७ ॥७ नाणपजवेहिं कि कडजुम्मे०१, जहा आभिणियोहियणाणपज्जवेहिं तहेव दो दंडगा, एवं सुपनाणपज्जवेहिवि, एवं विभंगनाणपज्जवेहिवि । चक्खुदंसणअचक्खुदसणओहिदसणपज्जवेहिवि एवं चेव, नवरं जस्स जं अस्थि || भाणिपर्व, केवलदसणपज्जवेहिं जहा केवलनाणपज्जवेहिं । (सूत्रं ७३७) RI 'जीवे ण'मित्यादि, 'जीवपएसे पडुच्च णो कडजुम्म'त्ति अमूर्त्तत्वाज्जीवपदेशानां न कालादिवर्णपर्यवानाश्रित्य कृत- है। युग्मादिव्यपदेशोऽस्ति, शरीरवर्णापेक्षया तु क्रमेण चतुर्विधोऽपि स्याद् अत एवाह-'सरीरे'त्यादि, 'सिद्धो न चेव पुच्छि जह'त्ति अमूर्तत्वेन तस्य वर्णायभावात् । 'आभिणियोहियनाणपज्जवेहिंति आभिनियोधिक ज्ञानस्यावरणक्षयोपशम भेदेन ये विशेषास्तस्यैव च ये निर्विभागपलिच्छेदास्ते आभिनिबोधिकज्ञानपर्यवास्तैः, तेषां चानन्तत्वेऽपि क्षयोपशमस्य I|| विचित्रत्वेनानवस्थितपरिणामत्वादयोगपद्येन जीवश्चतरग्रादिः स्यात्, 'एवं एगिदियवज्जति एकेन्द्रियाणां सम्यक्त्वाभाका वान्नास्ति आभिनिबोधिकमिति न तदपेक्षया तेषां कृतयुग्मादिव्यपदेश इति । 'जीवा 'मित्यादि, बहुत्वे समस्तानामाभि-15 | निबोधिकज्ञानपर्यवाणां मीलने चतुष्कापहारे चायुगपच्चतुरमादित्वमोघतः स्याद्विचित्रत्वेन क्षयोपशमस्य तत्पर्यायाणामनव ~168 Page #169 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (०५) [भाग-११]"भगवती"-अंगसूत्र-५ (मूलं+वृत्ति:) शतक [२५], वर्ग [-], अंतर-शतक [-], उद्देशक [४], मूलं [७३७] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र- [०५], अंगसूत्र- [०५] "भगवती मूलं एवं अभयदेवसूरि-रचिता वृत्ति: S C प्रत सूत्रांक [७३७] - स्थितत्वात् , विधानतस्त्वेकदैव चत्वारोऽपि तद्भेदाः स्युरिति, केवलज्ञानपर्यवपक्षे च सर्वत्र चतुरमत्वमेव वाच्यं, तस्थानशान्तपर्यायवादवस्थितत्वाच्च, एतस्य च पर्याया अविभागपलिच्छेदरूपा एवावसेया न तु तद्विशेषा एकविधत्वात्तस्येति । |'दो दंडग'त्ति एकत्वबहुत्वकृती द्वौ दण्डकाविति ॥ पूर्व 'सरीरपएसे पडुच्चे'त्युक्तमिति शरीरप्रस्तावाच्छरीराणि प्ररूपयन्नाह| कति णं भंते ! सरीरगा पन्नत्ता ?, गोयमा ! पंच सरीरगा प०, तं०-ओरालिए जाच कम्मए, एत्थ सरीर|| गपदं निरवसेसं भाणियवं जहा पन्नवणाए ॥ (सूत्रं ७३८) जीवा णं भंते! कि सेया णिरेया ?. गोयमा ।। जीवा सेयावि निरेयापि,से केणढणं भंते ! एवं चुदति जीवा सेयावि निरेयाचि?, गोयमा! जीवा दुविहा पन्नत्ता, तंजहा-संसारसमावनगा य असंसारसमावनगा य, तत्थ णं जे ते असंसारसमावन्नगा ते ण सिद्धा.सिहा णं दुविहा पन्नता, तंजहा-अणंतरसिद्धा य परंपरसिद्धा य, तत्व णं जे ते परंपरसिद्धा ते णं निरेया, तस्थ णं जे ते अणंतरसिद्धा ते ण सेया, ते णं भंते! किं देसेया सबेया?, गोयमा ! णो देसेया सया, तत्थ जे ते संसारसमावन्नगा ते दुविहा पं०, तंजहा-सेलेसिपडिवनगा य असेलेसिपडिवनगा य, तत्थ णं जे ते सेलेसीपडियन्नगा ते णं निरेया, तत्थ णं जे ते असेलेसीपडिवन्नगा ते णं सेया, ते णं भंते । किं देसेया सच्चेया ?, गोयमा ! देसेयावि सवेयावि, से तेणटेणं जाव निरेयावि । नेरइया णं भंते ! किं देसेया सधेया ?, गोयमा ! देसेयावि सवेयावि, से केणट्टेणं जाव सबेयाधि, गोयमा ! नेरइया दुविहा पं०, तं०-विग्गहगतिस - दीप अनुक्रम [८८४] - 26TR५-2 - - + 4 For P OW ~169~ Page #170 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (०५) [भाग-११]"भगवती"-अंगसूत्र-५ (मूलं+वृत्ति:) शतक [२५], वर्ग [-], अंतर्-शतक [-], उद्देशक [४], मूलं [७३८-७३९] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र- [०५], अंगसूत्र- [०५] "भगवती मूलं एवं अभयदेवसूरि-रचिता वृत्ति: उद्देशा४ शरीराणि प्रत सूत्रांक [७३८-७३९] व्याख्या-16 मावनगा य अविग्गहगइसमावनगा य, तस्थ णं जे ते विग्गहगतिसमावनगा ते णं सोया, तत्थ णं जे ते|| प्रज्ञप्तिः अविग्गहगतिसमावन्नगा ते णं देसेया, से तेणटेणं जाव सधेयावि, एवं जाव वेमाणिया ॥ (सूत्रं ७३९) अभयदेवीया वृत्तिः 'कइ ण'मित्यादि, 'एस्थ सरीरगपय'मित्यादि, शरीरपदं च प्रज्ञापनायां द्वादशं पदं, तश्चैव-'मेरइयाणं भंते ! मैजनिरे| कति सरीरा पन्नत्ता, गोतओ सरीरा पन्नत्ता, तं०-घेउबिए सेयए कम्मए य' इत्यादि । शरीरवन्तश्च जीवाश्चलस्व-18 जत्वादि | भावा भवन्तीति सामान्येन जीवानां चलत्वादि पृच्छन्नाह-'जीवा 'मित्यादि, 'सेय'त्ति सहेजेन-चलनेन सैजाः 'नि सू ७३८ ७३९ रेय'त्ति निश्चलनाः 'अणंतरसिद्धा यत्ति न विद्यते अन्तरं-व्यवधानं सिद्धत्वस्य येषां तेऽनन्तरास्ते च ते सिद्धाश्चेत्यनन्तरसिद्धाः ये सिद्धत्वस्य प्रथमसमये वर्तन्ते, ते च सैजाः, सिद्धिगमनसमयस्य सिद्धत्वप्राप्तिसमयस्य चकत्वादिति, परम्पर| सिद्धास्तु सिद्धत्वस्य धादिसमयवृत्तयः, 'देसेय'त्ति देशैजाः-देशतश्चलाः 'सवेय'ति सर्वेजाः-सर्वतश्चलाः 'नो देसेया सवेय'त्ति सिद्धानां सर्वात्मना सिद्धौ गमनात्सर्वेजत्वमेव, 'तत्थ णं जे ते सेलेसीपडिवनगा तेणं निरेय'त्ति निरुद्धयोगत्वेन स्वभावतोऽचलस्वात्तेषां 'देसेयावि सबेयावि'त्ति इलिकागत्या उत्पत्तिस्थानं गच्छंतो देशैजाः प्राक्तनशरीरस्थस्य देशस्य विवक्षया निश्चलत्वात् , गेन्दुकगत्या तु गच्छन्तः सजाः, सर्वात्मना तेषां गमनप्रवृत्तत्वादिति । 'विग्गहगइसमावन्नग'त्ति विग्रहगतिसमापनका ये मृत्वा विग्रहगत्योत्पत्तिस्थानं गच्छन्ति 'अविग्गहगइसमावन्नग'त्ति अविग्रहगति-P८७७॥ | समापन्नका:-विग्रहगतिनिषेधाहजगतिका अवस्थिताश्च, तत्र विग्रहगतिसमापना गेन्दुकगत्या गच्छन्तीतिकृत्वा सर्वेजा। अविग्रहगतिसमापनकास्ववस्थिता एवेह विवक्षिता इति संभाव्यते, ते च देहस्था एवं मारणान्तिकसमुद्घातात् देशेने STA5% दीप अनुक्रम [८८५-८८६] SARERatinintenmarana ~170 Page #171 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (०५) [भाग-११]"भगवती"-अंगसूत्र-५ (मूलं+वृत्ति:) शतक [२५], वर्ग [-], अंतर्-शतक [-], उद्देशक [४], मूलं [७३८-७३९] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र- [०५], अंगसूत्र- [०५] "भगवती मूलं एवं अभयदेवसूरि-रचिता वृत्ति: प्रत सूत्रांक [७३८-७३९] लिकागत्योत्पत्तिक्षेत्रं स्पृशन्तीति देशैजाः स्वक्षेत्रावस्थिता वा हस्तादिदेशानामेजनादिति ॥ उक्ता जीववक्तव्यता अथाजीववक्तव्यतामाहहै परमाणुपोग्गला गंभंते ! किं संखेजा असंखेजा अणंता!, गोयमा ! नो संखेजा नो असंखेज्जा अर्णता, एवं जाव अर्णतपएसिया खंधा । एगपएसोगाढा णं भंते! पोग्गला किं संखेजा असंखेजा अर्णता, एवं चेव, एवं जाव असंखेजपएसोगाढा। एगसमयठितीया णं भंते ! पोग्गला किं संखेज्जा , एवं चेव, एवं जाव असंखेजसमयद्वितीया । एगगुणकालगा गं भंते ! पोग्गला किं संखेजा, एवं चेव, एवं जाव अणंतगुणकालगा, एवं अवसेसावि वणगंधरसफासा यक्षा जाव अर्णतगुणलुक्खत्ति । एएसि णं भंते ! परमाणुपोग्गलाणं दुपएसियाण य खंधाणं यट्ठयाए कयरे रहितो अप्पा वा बहुया वा तुल्ला वा वि०१, गोयमा ! दुपएसिएहिंतो खंधेहिंतो परमाणुपोग्गला दबट्टयाए पहुगा, एएसिणं भंते! दुपए| सियाणं तिप्पएसाण य खंधाणं दबयाए कयरेशहितो बहुया०१, गोयमा! तिपएसियखंधेहितो दुपएसिया खंधा दवट्टयाए बहुया, एवं एएणं गमएणं जाव दसपएसिएहिंतो खंधेहितो नवपएसिया खंधा दषट्ट याए बहुया । एएसि णं भंते दिसपएसिए पुच्छा, गोथमा ! दसपएसिएहिंतो स्वधेहितो संखेजपएसिया खंधा दिवढ्याए बहुया, एएसिणं भंते संखेन्ज पुच्छा, गोयमा! संखजपएसिएहिंतो खंधेहितो असंखेजपएसिया खंधा दवट्ठयाए बहुया, एएसि णं भंते ! असंखेज. पुच्छा, गो०1,अणंतपएसिएहितो खंधेहितो असंखेजप दीप RECK अनुक्रम [८८५-८८६] ~171 Page #172 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (०५) [भाग-११]"भगवती"-अंगसूत्र-५ (मूलं+वृत्ति:) शतक [२५], वर्ग -1, अंतर्-शतक [-], उद्देशक [४], मूलं [७४०] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र- [०५], अंगसूत्र- [०५] "भगवती मूलं एवं अभयदेवसूरि-रचिता वृत्ति: प्रत सूत्रांक [७४०] 4-CACA ७४० दीप व्याख्या-18 एसिया खंधा दषट्टयाए पहुया, एएसिणं भंते ! परमाणुपोग्गलाणं दुपएसियाण य खंधाणं पएसट्टयाए कयरे-द २५ शतके प्रज्ञप्तिः हिंतो बहुया ?, गोयमा! परमाणुपोग्गलेहिंतो दुपएसिया खंधा पएसट्टयाए बहुया, एवं एएणं गमएणं | उद्देशः४ अभयदेवी- जाव नवपएसिएहितो खंधेहितो दसपएसिया खंधा पएसट्टयाए बहुया, एवं सवत्थ पुच्छियर्ष, दसपएसिएहि-18 रमावा तो खंधेहिंतो संखेजपएसिया खंधा पएस० पहुया, संखेजपएसिएहितो असंखेज्जपएसिया खंधा पएसद्वयाए दीनामल्प॥८७८॥ बहुया, एएसि णं भंते ! असंखेजपएसियाणं पुच्छा, गोयमा! अणंतपएसिएहितो खंधेहितो असंखेजपए-IN बहुता सू सिया खंधा पएसट्टयाए बहुया ॥ एएसिणं भंते ! एगपएसोगाढार्ण दुपएसोगादाण य पोग्गलाणं दचट्ठयाए। कयरेशहिंतो जाव विसेसाहिया वा?, गोयमा! दुपएसोगाढेहितो पोग्गलहितो एगपएसोगाढा पोग्गला | दवढ्याए विसेसाहिया, एवं एएणं गमएणं तिपएसोगाढेहितो पोग्गलहितो दुपएसोगाढा पोग्गला दबट्टयाए| विसेसा. जाव दसपएसोगादेहितोपोग्गले हितो नवपएसोगाढा पोग्गला दचट्टयाए विसेसाहिया, दसपएसो-18 13|| गादेहितो पोग्गलेहितो संखिजपएसोगाढा पोग्गला दबट्टयाए बहुया, संखेजपएसोगादेहितो पोग्गलेहितो दि असंखेजपएसोगाढा पोग्गला दबढपाए बहुया, पुच्छा सबस्थ भाणि। एसि णं भंते! एगपएसोगाढाणं | दुपएसोगाढाण य पोग्गलाणं पएसट्ठयाए कपरेरहिंतो विसेसा, गोयमा ! एगपएसोगादेहिंतो पोग्गले-15 | हिंतो दुपएसोगाढा पोग्गला पएसट्टयाए विसेसा०, एवं जाव नवपएसोगादेहितो पोग्गलेहिंतोदसपएसोगाढा पोग्गला पएस. विसेसाहिया, दसपएसोगादेहिंतो पोग्गलहितो संखेजपएसोगाढा पोग्गला पएसट्टयाए। II अनुक्रम [८८७]] K ACAESAKALIKA | ||८७८॥ ~172 Page #173 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (०५) प्रत सूत्रांक [७४०] दीप अनुक्रम [८८७] [भाग-११]“भगवती”– अंगसूत्र -५ (मूलं + वृत्ति:) शतक [२५], वर्ग [-], अंतर् शतक [-] उद्देशक [४] मूलं [ ७४०] पूज्य आगमोद्धारकश्री संशोधितः मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित.. आगमसूत्र - [०५] अंगसूत्र- [ ०५] "भगवती" मूलं एवं अभयदेवसूरि-रचिता वृत्तिः बहुया संखेज्जपए सोगाढेहिंतो पोग्गलेहिंतो असंखेजपरसोगादा पोग्गला परसट्टयाए बहुया । एएसि णं भंते । एगसमय द्वितीयाणं दुसमयद्वितीयाण य पोग्गलाणं दबट्टयाए जहा ओगाहणाए बत्तवया एवं ठिती एचि। एएसि णं भंते ! एगगुणकालयाणं दुगुणकालयाण य पोग्गलाणं दबट्टयाए एएसि णं जहा परमाणुपोग्गलादीणं तहेब बत्तवया निरवसेसा, एवं सधेसि बन्नगंधरसाणं, एएसि णं भंते! एगगुणकक्खडाणं दुगुणकक्खडाण य पोग्गलाणं वट्टयाए कयरे२हिंतो. विसेसाहिया ?, गोयमा ! एगगुणकक्खडेहिंतो पोग्गलेहिंतो दुगुणकक्खडा पोग्गला दबट्ट्याए विसेसाहिया, एवं जाव नवगुणकक्खडेहिंतो पोग्गलेहिंतो दसगुणकक्खडा पोग्गला दवट्टयाए बिसे०, दसगुणकक्खडेर्हितो पोग्गलेहिंतो संखिजगुणकक्खडा पोग्गला दबट्टयाए बहुया, संखेज्जगुणकक्खडेहिंतो पोग्गलेहिंतो असंखेज्जगुणकक्खडा पोग्गला दबडपाए बहुया, असंखेज्जगुणकक्खडेहिंतो पोग्गलेहिंतो अनंतगुणकक्खडा पोग्गला दबट्टयाए बहुया, एवं पएसहपाए सवत्थ पुच्छा भाणियचा, जहा कक्खडा एवं मउयगरुयलहुयावि, सीयउसिणनिद्धलक्खा जहा बन्ना ॥ (सूत्रं ७४० ) 'परमाणु पोरगलाण' मित्यादि, तत्र बहुवक्तव्यतायां द्व्यणुकेभ्यः परमाणवो बहवः सूक्ष्मत्वादेकत्वाच्च द्विप्रदेशकास्त्व| णुभ्यः स्तोकाः स्थूलत्वादिति वृद्धाः वस्तुस्वभावादिति चान्ये, एवमुत्तरत्रापि पूर्वे २ बहवस्तदुच्चरे तु स्तोकाः, दशप्रदेशिकेभ्यः पुनः सङ्ख्यातप्रदेशिका बहवः, सङ्ख्यातस्थानानां बहुत्वात्, स्थानबहुत्वादेव च सङ्ख्यातप्रदेशिकेभ्योऽसातप्रदेशिका बहवः, अनन्तप्रदेशिकेभ्यस्तु असङ्ख्यातप्रदेशिका एव बहवस्तथाविधसूक्ष्मपरिणामात् । प्रदेशार्थचिन्तायां परमाणुभ्यो For Parts Only ~ 173 ~ Page #174 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (०५) [भाग-११]"भगवती"-अंगसूत्र-५ (मूलं+वृत्ति:) शतक [२५], वर्ग -1, अंतर्-शतक [-], उद्देशक [४], मूलं [७४०] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र- [०५], अंगसूत्र- [०५] "भगवती मूलं एवं अभयदेवसूरि-रचिता वृत्ति: व्याख्याप्रज्ञप्तिः या वृत्तिः२ प्रत सूत्रांक [७४०] ॥८७९|| ७४१ | द्विप्रदेशिका बहवो, यथा किल द्रव्यत्वेन परिमाणतः शतं परमाणवः द्विप्रदेशास्तु पष्टिः, प्रदेशार्थतायां परमाणवः शतमा-1 २५ शतके त्रा एव वणुकास्तु विंशत्युत्तरं शतमित्येवं ते बहव इति, एवं भावना उत्तरत्रापि कार्या ॥ अथ क्षेत्रापेक्षया पुद्गलाल्पत्वादि उद्देशः४ चिन्त्यते-'एएसि 'मित्यादि, एगपएसोगाढाणं दुपएसोगाढाणं ति तत्रैकप्रदेशावगाढाः परमाण्वादयोऽनन्तप्रदेशिक द्रव्याद्यर्थ| स्कन्धान्ता भवन्ति, द्विप्रदेशावगाढास्तु व्यणुकादयोऽनन्ताणुकान्ता', 'विसेसाहिय'त्ति समधिकाः न तु द्विगुणादय तयाऽल्पइति । वर्णादिभावविशेषितपुद्गलचिन्तायां तु कर्कशादिस्पर्शचतुष्टयविशेषितपुद्गलेषु पूर्वेभ्यः २ उत्तरोत्तरास्तथाविधस्वभाव वहुत्वं सू त्वाद्रव्यार्थतया बहवो वाच्याः, शीतोष्णस्निग्धरूक्षलक्षणस्पर्शविशेषितेषु पुनः कालादिवर्णविशेषिता इबोत्तरेभ्यः पूर्वे दशगुणान् यावद्बहवो वाच्याः, ततो दशगुणेभ्यः सङ्ग्येयगुणास्तेभ्योऽनन्तगुणा अनन्तगुणेभ्यश्चासधेयगुणा बहब इति, एतदेवाह-एगगुणकक्खडेहिंतो' इत्यादि । अथ प्रकारान्तरेण पुन्नलांश्चिन्तयन्नाह एएसिणं भंते! परमाणुपोग्गलाणं संखेजपएसियाणं असंखेज.अणंतपएसियाण य खंघाणं दवट्ठयाए पएस० दषपएसट्टयाए कयरे २जाव विसेसाहिया चा?, गोयमा सबथोवा अणंतपएसिया खंधा दवट्ठयाए परमाणुपो| गला दबट्ठयाए अणंतगुणा संखेजपएसिया खंधा दवयाए संखेजगुणा असंखेजपएसिया खंधा दबट्टयाए असं-18| | खेजगुणा, पएसट्टयाए सवयोवा अर्णतपएसिया खंधा पएसट्टयाए परमाणुपोग्गला अपएसट्टयाए अर्णतगुणा |संखेजपएसिया खंधा पएसट्ठयाए संखेजगुणा असंखेजपएसिया खंधा पएसट्टयाए असंखेजगुणा, दपढपएसट्ट-1 याए सबथोवा अणंतपएसिया खंधा दषयाए ते चेव पएसट्टयाए अणंतगुणा परमाणुपोग्गला दबट्टपएस दीप अनुक्रम [८८७]] RAMSANSARSUCCES ~174. Page #175 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (०५) [भाग-११]"भगवती"-अंगसूत्र-५ (मूलं+वृत्ति:) शतक [२५], वर्ग [-], अंतर्-शतक [-], उद्देशक [४], मूलं [७४१] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र- [०५], अंगसूत्र- [०५] "भगवती मूलं एवं अभयदेवसूरि-रचिता वृत्ति: प्रत सूत्रांक [७४१] OCTOCTOR याए अणतगुणा संखेजपएसिया खंधा दचट्टयाए संखेजगुणा ते चेव पएसट्ठयाए संखेनगुणा असंखेजपएसिया | खंघा दबद्दयाए असंखेनगुणा ते चेव पएसट्टयाए असंखेजगुणा । एएसिणं भंते ! एगपएसोगाढाणं संखेलपएसोगाढाणं असंखेजपएसोगाढाण य पोग्गलाणं दबट्टयाए पएसट्टयाए दबद्दपएसट्टयाए कयरे २ जाच विसेसाहिया वा?, गोयमा सवत्थोवा एगपएसोगाढा पोग्गला दवयाए संखेजपएसोगाढा पोग्गला दबयाए संखेजगुणा असंखेजपएसोगाढा पोग्गला दबट्टयाए असंखेजगुणा,पएसट्टयाए सवत्थोचा एगपएसोगाढापोग्गला अपएसट्टयाए संखेजपएसोगाढा पोग्गला पएसट्टयाए संखेनगुणा असंखेजपएसोगाढा पोग्गला पएसट्टयाए असंखेजगुणा दवट्टपएसट्टयाए सवत्थोवा एगपएसोगाढा पोग्गला दबद्दअपदेसट्टयाए असंखेजपएसोगाढा पोग्गला दबट्टयाए संखेजगुणा ते चेव पएसट्टयाए संखेनगुणा असंखेजपएसोगाढा पोग्गला दबट्टयाए असंखेजगुणा ते चेव पएसट्टयाए असंखेजगुणा। एएसिणं भंते! एगसमयहितीयाणं संखिजसमयद्वितीयाणं असंखेजसमयहितीयाण य पोग्गलाणं जहा ओगाहणाए तहा ठितीएवि भाणियवं अप्पाबहुगं । एएसिणं भंते ! एगगुणकालगाणं संखेजगुणकालगाणं असंखेजगुणकालगाणं अणंतगुणकालगाण य पोग्गलाणं दवट्टयाए पएस-4 हयाए दवट्ठपएसट्टयाए एएसिणं जहा परमाणुपोग्गलाणं अप्पाबहुगं तहा एएसिपि अप्पाबहुगं, एवं सेसागवि वन्नगंधरसाणं। एएसिणं भंते ! एगगुणकक्खडाणं संखेजगुणकक्खडाणं असंखेज. अणंतगुणकक्खडाण |य पोग्गलाणं दबट्टयाए पएसट्टयाए दवट्ठपएसट्टयाए कयरे २ जाव वि०१, गोयमा! सबथोवा एगगुणक दीप अनुक्रम [८८८] ~175 Page #176 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (०५) [भाग-११]"भगवती"-अंगसूत्र-५ (मूलं+वृत्ति:) शतक [२५], वर्ग [-], अंतर्-शतक [-], उद्देशक [४], मूलं [७४१] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र- [०५], अंगसूत्र- [०५] "भगवती मूलं एवं अभयदेवसूरि-रचिता वृत्ति: प्रत सूत्रांक [७४१] व्याख्या-क्खा क्खडा पोग्गला दबट्टयाए संखेनगुणकक्खडा पोग्गला दवड्याए संखेजगुणा असंखेजगुणकक्खडा पोग्गला ||२५ शतके प्रज्ञप्तिः दवट्टयाए असंखेनगुणा अर्णतगुणकक्वडा दबयाए अणंतगुणा, पएसट्टयाए एवं चेव नवरं संखेजगुणकक्खडा | उद्देशः४ अभयदेवी- पोग्गला पएसट्टयाए असं० सेसं तं चेव, दबट्टपएसट्टयाए सबत्योवा एगगुणकक्खडा पोग्गला दबट्ठपएसट्टयाए द्रव्याद्यर्थयावृत्तिः२ संखेजगुणकक्खडा पोग्गला दबट्टयाए संखेजगु० ते चेव पएसट्टयाए संखेजगुणा असंखेजगुणकक्खडा दबट्टयाए| तयाऽल्प८८011 असंखेजगुणा ते चेव पएसट्टयाए असंखेज्जगुणा अणंतगुणकक्खडा दवट्टयाए अणंतगुणा ते चेव पएसट्टयाए बहुत्वं सू अणंतगुणा एवं मउयगरुयलयाणवि अप्पाबहुयं, सीयउसिणनिडलुक्खाणं जहा वन्नाणं तहेव ॥ (सूत्रं ७४१) ७४१ 'एएसि णमित्यादि, 'परमाणुपोग्गला अपएसट्टयाए'त्ति इह प्रदेशार्थताऽधिकारेऽपि यदप्रदेशार्थतयेत्युक्तं तत्परमाणूनामप्रदेशत्वात् , 'परमाणुपोग्गला दवट्ठअपएसट्टयाए'त्ति परमाणवो द्रव्यविवक्षायां द्रव्यरूपाः अर्थाः प्रदेशवि४ वक्षायां चाविद्यमानप्रदेशार्थी इतिकृत्वा द्रव्यार्थाप्रदेशार्थास्ते उच्यन्ते तद्भावस्तत्ता तया, 'सबथोवा एगपएसोगाढा पोग्गला दबट्टयाए'त्ति इह क्षेत्राधिकारारक्षेत्रस्यैव प्राधान्यात्परमाणुव्यणुकाद्यनन्ताणुकस्कन्धा अपि विशिष्टैकक्षेत्रप्रदेशावगाढा आधाराधेययोरभेदोपचारादेकत्वेन ब्यपदिश्यन्ते ततश्च 'सबत्थोवा एगपएसोगाढा पोग्गला दवट्ठयाए'त्ति, लोकाका| शप्रदेशपरिमाणा एवेत्यर्थः, तथाहि-न स कश्चिदेवभूत आकाशप्रदेशोऽस्ति य एकप्रदेशावगाहपरिणामपरिणतानां परमाण्वा | ॥८८०॥ दीनामवकाशदानपरिणामेन न परिणत इति, तथा 'संखेजपएसोगाढा पोग्गला दबट्टयाए संखेजगुण त्ति अत्रापि. क्षेत्रस्यैव प्राधान्यात्तथाविधस्कन्धाधारक्षेत्रप्रदेशापेक्षयैव भावना कार्या, नवरमसंमोहेन सुखप्रतिपत्त्यर्थमुदाहरणं दश्यते दीप अनुक्रम [८८८] स्व ~176~ Page #177 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (०५) [भाग-११]"भगवती"-अंगसूत्र-५ (मूलं+वृत्ति:) शतक [२५], वर्ग [-], अंतर्-शतक [-], उद्देशक [४], मूलं [७४१] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र- [०५], अंगसूत्र- [०५] "भगवती मूलं एवं अभयदेवसूरि-रचिता वृत्ति: प्रत सूत्रांक [७४१] दीप अनुक्रम [८८८] LOCACAKACANCERDCREASE जहा किल पंच ते सबलोगपएसा, एते य पत्तेयचिंताए पंचेव, संजोगओ पुण एतेसु चेव अणेगे संजोगा लम्भंति' इमा एएसिं ठवणा- एतेषां च सम्पूर्णासम्पूर्णान्यग्रहणान्यमोक्षणद्वारेणाऽऽधेयवशादनेके संयोगभेदा भावनीयाः, तथा 'असंखेजपए- सोगाढा पोग्गला दवट्टयाए असंखेजगुण'त्ति भावनैवमेव असायप्रदेशात्मकत्वादवगाहक्षेटू त्रस्यासोयगुणा इत्ययमस्य भावार्थ इति ।। पुद्गलानेव कृतयुग्मादिभिर्निरूपयन्नाह| परमाणुपोग्गलेणं भंते ! दवयाए किं कडजुम्मे तेयोए दावर कलियोगे?, गोयमा! नो कडजुम्मे नो तेयोएनो दावर कलियोगे एवं जाव अणंतपएसिए खंघे । परमाणुपोग्गला णं भंते ! दबयाए किं कडजुम्मा | पुच्छा, गोयमा ! ओघादेसेणं सिय कडजुम्मा जाब सिय कलियोगा, विहाणादेसेणं नो कडजुम्मा नो तेयो| गा नो दावर कलियोगा एवं जाव अणंतपएसिया खंधा। परमाणुपोग्गले णं भंते ! पएसट्टयाए कि कडजुम्मे | पुरुछा, गोपमा !नो कडजुम्मा नो तेयोगा नो दावर० कलियोगे दुपएसिए पुच्छा गोपमा! नो कल० नो तेयो य० दावर नो कलियोगे, तिपए. पुच्छा गोयमा! नो कडजुम्मे तेयोए नो दावर० नो कलियोए चउप्पएसिए Zil पुच्छा गोयमा ! कडजुम्मे नो तेओए नो दावर नो कलियोगे पंचपएसिए जहा परमाणुपोग्गले छप्पएसिए जहा दुप्पएसिए सत्तपएसिए जहा तिपएसिए अपएसिए जहा चउपएसिए नवपएसिए जहा परमाणुपोग्गले दसपएसिए जहा दुप्पएसिए, संखेजपएसिए णं भंते ! पोग्गले पुच्छा, गोयमा! सिय कहजुम्मे ~177 Page #178 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (०५) प्रत सूत्रांक [७४२ -७४३] दीप अनुक्रम [८८९ -८९०] [भाग-११]“भगवती”- अंगसूत्र -५ (मूलं + वृत्ति:) शतक [२५], वर्ग [-], अंतर्-शतक [-], उद्देशक [४], मूलं [७४२-७४३] पूज्य आगमोद्धारकश्री संशोधितः मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित.. आगमसूत्र- [०५] अंगसूत्र- [ ०५] "भगवती" मूलं एवं अभयदेवसूरि-रचिता वृत्तिः व्याख्या जाव सिय कलियोए एवं असंखेजपएसिएवि अनंतपएसिएवि । परमाणुपोग्गला णं भंते! पएसइयाए किं प्रज्ञप्तिः ४ कड० पुच्छा, गोयमा ! ओघादेसेणं सिय कडजुम्मा जाव सिय कलियोगा, विहाणादेसेणं नो कड० नो तेअभयदेवी योया नो दावर० कलियोगा, दुप्पएसियाणं पुच्छा, गोयमा ! ओघादेसेणं सिय कडजुम्मा नो तेयोया या वृत्तिः २ * सिय दावरजुम्मा नो कलियोगा, विहाणादेसेणं नो कडजुम्मा नो तेयोया दावरजुम्मा नो कलियोगा, तिप॥८८१ । ४ एसिया णं पुच्छा, गोयमा ! ओघादेसेणं सिय कटजुम्मा जाव सिय कलियोगा विहाणादेसेणं नो कडजुम्मा | तेयोगा नो दावर० नो कलियोगा, चउप्पएसियाणं पुच्छा, गोयमा ! ओघादेसेणवि विहाणादेसेण वि | कडजुम्मा नो तेयोगा नो दावर० नो कलियोगा, पंचपएसिया जहा परमाणुपोग्गला, छप्पएसिया जहा दुष्पएसिया, सत्तपएसिया जहा तिपएसिया, अट्ठपएसिया जहा चउपएसिया, नवपएसिया जहा पर | माणुपोग्गला, दसपएसिया जहा दुपएसिया संखेजपएसिया णं पुच्छा, गोयमा ! ओघादेसेणं सिय कडजुम्मा जाव सिप कलियोगा विहाणादेसेणं कडजुम्मावि जाय कलियोगावि एवं असंखेजपएसियावि अणंनपएसियादि ॥ परमाणुपोग्गले णं भंते । किं कडजुम्मपएसोगाढे ? पुच्छा, गोयमा ! कडजुम्मपरसोगादे नो तेयोग० नो दावरजुम्म० कलियोगपएसोगाडे । दुपएसिएणं पुच्छा, गोयमा ! नो कडजुम्मपएसोगाढे णो तेयोग० सिय दावरजुम्मपएसोगाडे सिय कलियोगपएसोगाढे। तिपएसिए णं पुच्छा, गोधमा ! णो कडजुम्मपए- ॥८८॥ सोगाढे सिय तेयोगपएसोगाडे सिय दावरजुम्मपएसोगाडे सिय कलियोगपए सोगाढे ३ । चउप्पएसिए णं Education Internation For Parata Use Only ~ 178 ~ २५ शतके उद्देशः ४ परमाण्व दिः कृतयु मत्यादि सार्धादि सू ७४२७४३ Page #179 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (०५) प्रत सूत्रांक [ ७४२ -७४३] दीप अनुक्रम [८८९ -८९०] [भाग-११]“भगवती”- अंगसूत्र -५ (मूलं + वृत्ति:) शतक [२५], वर्ग [-], अंतर्-शतक [-], उद्देशक [४], मूलं [७४२-७४३] पूज्य आगमोद्धारकश्री संशोधितः मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित.. आगमसूत्र - [०५] अंगसूत्र- [ ०५] "भगवती" मूलं एवं अभयदेवसूरि-रचिता वृत्तिः पुच्छा, गोयमा ! सिय कडजुम्मपएसोगाढे जाव सिय कलियोगपएसोगाढे ४, एवं जाव अनंतपएसिए || परमाणुपोग्गला णं भंते ! किं कड० पुच्छा, गोयमा ! ओघादेसेणं कडजुम्मपएसोगाढा णो तेयोग० नो दावर० नो कलियोग०, विहाणादेसेणं नो कडजुम्मपएसोगाढा णो तेयोग० नो दावर० कलिओगपएसोगाढा । दुष्पएसिया णं पुच्छा, गोयमा ! ओघादेसेणं कडजुम्मपएसोगाढा नो तेयोग० नो दावर० नो कलिओग०, विहाणादेसेणं नो कडजुम्मपएसोगाढा नो तेयोगपए सोगाढा दावरजुम्मपएसोगाढावि कलियोगपएसोगाढावि । तिप्पएसियाणं पुच्छा, गोयमा ! ओघादेसेणं कडजुम्मपएसोगाढा नो तेयोग० नो दावर० नो कलि० विहादेसेणं नो कडजुम्मपरसोगाढा तेओगपएसोगादावि दावरजुम्मपरसोगाढावि कलिओगपएसोगाढावि ३ । चडप्पएसियाणं पुच्छा, गोयमा ! ओघादेसेणं कडजुम्मपएसोगादा नो तेयोग० नो दावर० नो कलिओग० | विहाणादेसेणं कडजुम्मपए सोगाढावि जान कलिओगपएसोगाढावि ४ एवं जाव अनंतपएसिया ॥ परमाणुपोग्गले णं भंते । किं कडजुम्मसमयद्वितीए ? पुच्छा, गोयमा ! सिय कडजुम्मसमयद्वितीए जाब सिय कलिओगसमयद्वितीए, एवं जाव अनंतपएसिए । परमाणुपोग्गला णं भंते । किं कडजुम्म० १, पुच्छा, गोयमा ! | ओघादेसेणं सिय कडजुम्मसमपठितीया जाव सिय कलियोगसमयद्वितीया ४, विहाणादेसेणं कडजुम्मसम| पद्वितीयावि जाव कलियोगसमयद्वितीयावि ४, एवं जाव अणतपएसिया । परमाणुयोगले णं भंते ! कालवन्नपज्जवेहिं किं कडजुम्मे तेओगे जहा ठितीए वत्तपा एवं वन्नेसुवि सत्रेसु गंधेसुवि एवं चेव रसेसुवि Internationa For PanalPrata Use Only ~ 179~ waryra Page #180 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (०५) [भाग-११]"भगवती"-अंगसूत्र-५ (मूलं+वृत्ति:) शतक [२५], वर्ग [-], अंतर्-शतक [-1, उद्देशक [४], मूलं [७४२-७४३] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र- [०५], अंगसूत्र- [०५] "भगवती मूलं एवं अभयदेवसूरि-रचिता वृत्ति: प्रत सूत्रांक [७४२-७४३] व्याख्या- जाव महुरो रसोत्ति, अणंतपएसिए णं भंते! खंधे कक्खडफासपजवेहि किं कडजुम्मे पुच्छा, गोयमा! सिय २५शतके प्रज्ञप्तिः कडजुम्मे जाव सिय कलिओगे । अणंतपएसिया णं भंते ! खंधा कक्खडफासपनवेहिं किं कडजुम्मा पुच्छा, उद्दशः४ अभयदेवीगोयमा ! ओघादेसेणं सिय कडजुम्मा जाव सिय कलियोगा ४, विहाणादेसेणं कडजुम्मावि जाव कलियो परमाण्वया वृत्तिः२४ दिःकृतयुगावि ४, एवं मउयगरुयलहुयावि भाणियचा, सीयउसिणनिहलुक्खा जहा वना ॥ (सूत्रं ७४२) परमाणु| पोग्गले णं भंते ! किं सह अणहे ?, गोयमा! नो सहे अणहे। दुपएसिए णं पुच्छा गो०! सहे नो अणडे, ग्मत्वादि ૧૮૮૨ાા सार्धादि | तिपएसिए जहा परमाणुपोग्गले, चउपएसिए जहा दुपएसिए, पंचपएसिए जहा तिपएसिए छप्पएसिए जहा सू७४२दुपएसिए सत्तपएसिए जहा तिपएसिए अपएसिए जहा दुपएसिए नवपएसिए जहा तिपएसिए दसपए- D७४३ सिए जहा दुपएसिए, संखेजपएसिए णं भंते ! खंधे पुच्छा, गोयमा ! सिय सहे सिय अणहे, एवं असंखेजपएसिएवि, एवं अर्णतपएसिएवि । परमाणुपोग्गलाणं भंते! किं सडा अणहा, गोयमा ! सहा वा अणड्डा वा एवं जाव अर्णतपएसिया।। (सूत्रं ७४३) .. 'परमाणु'इत्यादि, परमाणुपुद्गला ओघादेशतः कृतयुग्मादयो भजनया भवन्ति अनन्तत्वेऽपि तेषां सङ्घातभेदतोऽनवस्थितस्वरूपत्वात्, विधानतस्त्वेकैकशः कल्योजा एवेति । 'पंचपएसिए जहा परमाणुपोग्गल'त्ति एकाग्रत्वात्कल्योज इत्यर्थः 'छप्पएसिए जहा दुप्पएसिए'त्ति व्यग्रत्वाद्वापरयुग्म इत्यर्थः, एवमन्यदपि ॥ 'संखेजपएसिए णमित्यादि, सञ्जयातप्रदेशि ४८८२॥ कस्य विचित्रसङ्घयत्वाइजनया चातुर्विध्यमिति । 'दुप्पएसिया णमित्यादि, द्विपदेशिका यदा समसङ्ख्या भवन्ति तदा BACACAAAAA%CER दीप अनुक्रम [८८९-८९०] SAMSTAG* ~180 Page #181 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (०५) [भाग-११]"भगवती"-अंगसूत्र-५ (मूलं+वृत्ति:) शतक [२५], वर्ग [-], अंतर्-शतक [-], उद्देशक [४], मूलं [७४२-७४३] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र- [०५], अंगसूत्र- [०५] "भगवती मूलं एवं अभयदेवसूरि-रचिता वृत्ति: प्रत सूत्रांक [७४२-७४३] प्रदेशतः कृतयुग्माः, यदा तु विषमसवास्तदा द्वापरयुग्माः, 'विहाणादेसेण'मित्यादि, ये द्विप्रदेशिकास्ते प्रदेशार्थतया || K. एकैकशश्चिन्त्यमाना द्विप्रदेशत्वादेव द्वापरयुग्मा भवन्ति । तिप्पएसिया ण मित्यादि, समस्त त्रिप्रदेशिकमीलने तत्प्रदेशानां च चतुष्कापहारे चतुरग्रादित्वं भजनया स्यादनवस्थितसङ्ख्यत्वात्तेषां, यथा चतुर्णा तेषां मीलने द्वादश प्रदेशास्ते च चतुरमाः पक्षानां योजाः षण्णां द्वापरयुग्माः सप्तानां कल्योजा इति, विधानादेशेन च व्योजा एवं त्र्यणुकत्वात्स्कन्धानामिति। 'चउप्पएसिया ण'मित्यादि, चतुष्पदेशिकानामोघतो विधानतश्च प्रदेशाश्चतुरमा एव । 'पंचपएसिया जहा परमाणुपोग्गल'त्ति सामान्यतः स्यात्कृतयुग्मादयः प्रत्येक चैकाग्रा एवेत्यर्थः । 'छप्पएसिया जहा दुप्पएसिय'त्ति ओघतः स्यात्कृतयुग्मद्वापरयुग्माः, विधानतस्तु द्वापरयुग्मा इत्यर्थः, एवमुत्तरत्रापि ॥ अथ क्षेत्रतः पुनलांश्चिन्तयन्नाह-'परमाणु' | इत्यादि, परमाणुः कल्योजःप्रदेशावगाढ एव एकत्वात् द्विप्रदेशिकस्तु द्वापरयुग्मप्रदेशावगाढो वा कल्योजःप्रदेशावगाढो || | वा स्यात् परिणामविशेषात् , एवमन्यदपि सूत्र नेयम् ॥ 'परमाणुपोग्गला 'मित्यादि, तत्रीयता परमाणवः कृतयुग्मप्र देशावगाढा एव भवन्ति सकललोकव्यापकत्वात्तेपा, सकललोकप्रदेशानां चासङ्ख्यातत्वादवस्थितत्वाच्च चतुरग्रतेति, विधा४/नतस्तु कल्योज-प्रदेशावगाढाः सर्वेषामेकैकप्रदेशावगाढत्वादिति, द्विप्रदेशावगाढास्तु सामान्यतश्चतुरमा एवोक्तयुक्तितः, में विधानतस्तु द्विप्रदेशिकाः ये द्विप्रदेशावगाढास्ते द्वापरयुग्माः ये त्वेकप्रदेशावगाढास्ते कल्योजाः, एवमन्यदप्यूह्यम् । 'अगंतपएसिए णं भंते ! खंधे'त्ति, इह कर्कशादिस्पशाधिकारे यदनन्तप्रदेशिकस्यैव स्कन्धस्य ग्रहणं तत्तस्यैव वादरस्य कर्कशादिस्पर्शचतुष्टयं भवति न तु परमाण्वादेरित्यभिप्रायेणेति, अत पवाह-सीओसिणनिहलुक्खा जहा चन्नत्ति एत-8 दीप अनुक्रम [८८९-८९०] ~181 Page #182 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (०५) [भाग-११]"भगवती"-अंगसूत्र-५ (मूलं+वृत्ति:) शतक [२५], वर्ग [-], अंतर्-शतक [-], उद्देशक [४], मूलं [७४२-७४३] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र- [०५], अंगसूत्र- [०५] "भगवती मूलं एवं अभयदेवसूरि-रचिता वृत्ति: प्रत सूत्रांक [७४२-७४३] व्याख्या- है पर्यवाधिकारे परमाण्वादयोऽपि वाच्या इति भावः ॥ पुद्गलाधिकारादिदमाह-'परमाणु इत्यादि, 'सिय सहे सिय प्रज्ञप्तिः अणहे'त्ति यः समसङ्ख्यप्रदेशात्मकः स्कन्धः स सार्द्धः इतरस्त्वनर्द्ध इति । 'परमाणुपोग्गले'त्यादि, यदा बहवोऽणवः | उद्देशा४ अभयदेवी परमाण्वा| समसया भवन्ति तदा सार्दाः यदा तु विषमसज्ञवास्तदाऽन ः, सङ्घातभेदाभ्यामनवस्थितरूपत्वात्तेषामिति ॥ पुद्गला-मदीनां सैजया वृत्तिः२] धिकारादेवेदमुच्यते-- खादिधneer परमाणुपोग्गले णभंते ! किसेए निरेए ?, गोयमा ! सिय सेए सिय निरेए, एवं जाव अणंतपएसिए मोदिमध्य ठा परमाणुपोग्गला गंभते । किंसेया निरेया ?, गोयमा ! सेयावि निरेयावि, एवं जाव अणंतपएसिया ॥ पर- प्रदशा माणुपुग्गले णं भंते ! सेए कालओ केवचिरं होइ ?, गोयमा! जहरू एक समयं उक्कोसे आवलियाए असं|| खेज्वहभाग, परमाणुपोग्गले णं भंते ! निरेए कालओ केवचिरं होइ?, गोयमा ! जह एक समयं पकोसेणं || असंखेज कालं, एवं जाव अणंतपएसिए, परमाणुपोग्गला णं भंते! सेया कालओ केवचिरं होन्ति ?,गोयमा! त सबद्धं, परमाणुपोग्गला गं भंते ! निरेया कालओ केवचिर होइ ?, गोयमा ! सबद्धं, एवं जाव अणंतपएसिमाया । परमाणुपोग्गलस्स णं भंते ! सेपस्स केवतियं कालं अंतरं होइ?, गोयमा। सहाणंतरं पडुच जहन्ने] ॥८८३॥ ४ एकं समयं उक्कोसेणं असंखेज कालं परहाणंतरं पडुच जहन्नेणं एक समयं उक्कोसेणं असंखेनं कालं । निरेयस्स द केवतियं कालं अंतर होइ?, गोयमा ! सवाणंतरं पडुच्च जहन्नेणं एक समयं उक्कोसेणं आवलियाए असंखेजइ भागं, परधर्णतरं पडुच जहन्नेणं एवं समयं उक्कोसेणं असंखेनं कालं । दुपएसियस्स णं भंते ! खंधस्स सेयस्स दीप अनुक्रम [८८९-८९०] ~182 Page #183 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (०५) [भाग-११]"भगवती"-अंगसूत्र-५ (मूलं+वृत्ति:) शतक [२५], वर्ग [-], अंतर्-शतक [-], उद्देशक [४], मूलं [७४४-७४५] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र- [०५], अंगसूत्र- [०५] "भगवती मूलं एवं अभयदेवसूरि-रचिता वृत्ति: प्रत सूत्रांक [७४४-७४५] पुच्छा, गोयमा ! सहाणतरं पडुच जहन्नेणं एवं समयं उक्कोसेणं असंखेनं कालं, परहाणंतरं पहुंच जहन्नेणं है। एकं समयं उकोसेणं अणंतं कालं । निरेयस्स केवतियं कालं अंतरं होइ , गोयमा ! सहाणतरं पहुच जहन्नेणं | 2 | एकं समयं उक्कोसेणं आवलियाए असंखेजहभागं, परवाणंतरं पडुच्च जहन्नेणं एक समयं उक्कोसेणं अर्थतं कालं, एवं जाव अणंतपएसियस्स । परमाणुपोग्गला णं भंते ! सेयाणं केवतियं कालं अंतरं होइ?, गोयमा! नत्थि || अंतरं, एवं जाव अणंतपएसियाणं खंधाणं ॥ एएसिणं भंते ! परमाणुपोग्गलाणं सेयाणं निरेयाण य कयरे-12 दि||२ हितो जाब विसेसाहिया चा?, गोयमा! सबथोवा परमाणुपोग्गला सेया निरेया असंखेजगुणा एवं |जाव असंखिजपएसियाण खंधाणं। एएसिणं भंते! अणंतपएसियाणं खंधाणं सेयाणं निरेयाण य कयरे २ 18| जाव विसेसाहिया वा ?, गोयमा ! सबथोवा अणंतपएसिया खंधा निरेया सेया अर्णतगुणा ॥ एएसिणं || भंते ! परमाणुपोग्गलाणं संखेजपएसियाणं असंखेजपएसियाणं अणंतपएसियाण य खंधाणं सेयाणं निरेयाण य दवट्टयाए पएसट्टयाए दबट्टपएसद्वयाए कयरे २ जाव विसेसाहिया वा?, गोयमा! सबथोवा अणंतपए| सिया खंधा निरेया दबट्टयाए १ अणंतपएसिया खंधा सेया दछट्टयाए अणंतगुणा २ परमाणुपोग्गला सेया |दचट्ठयाए अर्णतगुणा ३ संखेजपएसिया खंधा सेया दवट्ठयाए असंखेजगुणा ४ असंखेजपएसिया खंधा सेया| दबट्टयाए असंखेवगुणा ५ परमाणुपोग्गला निरेया दबट्टयाए असंखेजगुणा ६ संखेजपएसिया खंधा निरेया 18|| दबट्टयाए संखेजगुणा ७ असंखेजपएसिया खंधा निरेया दबट्टयाए असंखेजगुणा ८ पएसट्टयाए एवं चेव नवरं || 2 KA5%ERS दीप अनुक्रम [८९१-८९२]] ~183 Page #184 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (०५) प्रत सूत्रांक [७४४ -७४५] दीप अनुक्रम [८९१ -८९२] [भाग-११]“भगवती”– अंगसूत्र - ५ ( मूलं + वृत्ति:) शतक [२५], वर्ग [-], अंतर् शतक [-] उद्देशक [४] मूलं [ ७४४-७४५] पूज्य आगमोद्धारकश्री संशोधितः मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित.. आगमसूत्र - [०५] अंगसूत्र- [ ०५] "भगवती" मूलं एवं अभयदेवसूरि-रचिता वृत्तिः व्याख्याप्रज्ञप्तिः अभयदेवीया वृत्तिः २ ||८८४॥ परमाणुपोग्गला अपएसङ्ख्याए भाणियचा, संखेज्जपएसिया संधा निरेया परसहयाए असंखेज्जगुणा सेसं तं चेव, दबट्टपएसइयाए सहस्थोवा अणतपएसिया खंधा निरेया दबट्टयाए १ ते चैव परसट्टयाए अनंतगुणा २ अणतपरसिया खंधा सेया दबट्टयाए अनंतगुणा ३ ते चैव परसट्टयाए अनंतगुणा ४ परमाणुपोग्गला सेया दबट्टयाए अपरसट्टयाए अनंतगुणा ५ संखेजपएसिया खंभा सेया दवट्टयाए असंखेज्जगुणा व ते चैव पएसयाए असंखेजगुणा ७ असंखेजपएसिया खंधा सेया दबट्टयाए असंखेजगुणा ८ ते चैव परसट्टयाए असंखेजगुणा ९ परमाणुपोग्गला निरेया दबट्टअपएसझ्याए असंखिजगुणा १० संखिजपएसिया संघा निरेया दवइयाए असंखेजगुणा ११ ते चैव परसट्टयाए संखिगुणा १२ असंखिजपएसिया खंधा निरेया दुपट्टयाए | असंखेज्जगुणा १३ ते चैव परसवाए असंखिलगुणा १४ । परमाणुयोगले णं भंते! किं देसेए सवेए निरेए ?, गोयमा ! तो देसेए सिय सवेए सिय निरेए, दुपएसिए णं भंते! खंधे पुच्छा, गोयमा । सिय देखेए सिय निरेए एवं जाव अनंतपएसिए । परमाणुपोग्गला णं भंते । किं देखेया सवेया निरेया ?, गोयमा नो देसेया सवेधावि निरेपावि, दुपएसिया णं भंते! खंधा पुच्छा, गोयमा ! देतेयावि सज्ञेयावि निरेयावि, एवं | जाव अनंतपएसिया । परमाणुपोग्गले णं भंते! सबेए कालओ केवचिरं होइ ?, गोयमा ! जहनेणं एवं समयं उक्कोसेणं आवलियाए असंखेजइभागं, निरेये कालओ केवचिरं होइ ?, गोयमा ! जहनेणं एवं समयं उफोसेणं असंखितं कालं । दुपएसिए णं भंते! खंधे देसेए कालओ केवचिरं होइ ?, गोयमा । जहनेणं एवं समयं Education International For Parts Only ~ 184 ~ २५ शतके उद्देशः ४ परमाण्या दीनां सैज 4 ५ त्वादि ध मदिमध्यप्रदेशाः सू ७४४-७३५ ॥८८४|| Page #185 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (०५) प्रत सूत्रांक [७४४ -७४५] दीप अनुक्रम [८९१ -८९२] [भाग-११]“भगवती”- अंगसूत्र -५ (मूलं + वृत्ति:) शतक [२५], वर्ग [-], अंतर् शतक [ - ], उद्देशक [४], मूलं [ ७४४-७४५] पूज्य आगमोद्धारकश्री संशोधितः मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित.. आगमसूत्र - [०५] अंगसूत्र- [ ०५] "भगवती" मूलं एवं अभयदेवसूरि-रचिता वृत्तिः उक्कोसेणं आवलियाए असंखेजइभागं, सोए कालओ केवचिरं होइ ?, गोयमा ! जहनेणं एवं समयं उक्कोसेणं आवलियाए असंखेज्जइभागं, निरेए कालओ केवचिरं होइ ?, गोयमा ! जहशेणं. एवं समयं उक्कोसेणं असंखितं कालं, एवं जाव अनंतपएसिए । परमाणुपोग्गला णं भंते! सवेया कालओ केचचिरं होंति ?, गोयमा सङ्घ, निरेया कालओ केवचिरं होइ ?, सङ्घद्धं । दुप्पएसिया णं भंते ! खंधा देखेया कालओ केवचि२०१, सङ्घद्धं, सबेया कालओ केवचिरं ?, सबर्द्ध, निरेया कालओ केवचिरं० १, सङ्घद्धं, एवं जाव अनंतपएसिया । परमाणुषोग्गलस्स णं भंते ! सवेयस्स केवतियं कालं अंतर होह १, गोपमा ! सहाणंतरं पहुच जह| नेणं एवं समयं उफोसेणं असंखिज्जं कालं, परद्वाणंतरं पहुच जहन्नेणं एवं समयं उकोसेणं असंखितं कालं । निरेयस्स केवतियं अंतरं होइ ?, सहाणंतरं पच जह० एवं समयं उकोसेणं आवलियाए असंखेज ह भागं, परद्वाणंतरं पहुच जहनेणं एवं समयं उक्कोसेणं असंखिर्ज कालं । दुपएसियस्स णं भंते! खंधस्स देसेयरस केयतियं कालं अंतरं होइ ?, सहाणंतरं पडुच जहनेणं एवं समयं उक्कोसेणं असंखिजे कालं, परद्वाणंतरं पहुंच जहनेणं एवं समयं उकोसेणं अनंतं कालं, सधेयस्स केवतियं कालं ? एवं चैव जहा देसेपस्स, निरेयस्स केवतियं ?, सहाणंतरं पहुच जहनेणं एवं समयं उक्कोसेणं आवलियाए असंखेजइभागं, परद्वाणंतरं पहुच जह नेणं एवं समयं उकोसेणं अनंतं कालं, एवं जाव अनंतपएसियस्स ॥ परमाणुपोग्गलाणं भंते ! सधेयाणं केव तियं कालं अंतरं होइ ?, नत्थि अंतरं, निरेयाणं केवतियं ?, नत्थि अंतरं, दुपएसियाणं भंते! खंधाणं देसे - For Paren ~ 185 ~ waryra Page #186 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (०५) [भाग-११]"भगवती"-अंगसूत्र-५ (मूलं+वृत्ति:) शतक [२५], वर्ग [-], अंतर्-शतक [-], उद्देशक [४], मूलं [७४४-७४५] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र- [०५], अंगसूत्र- [०५] "भगवती मूलं एवं अभयदेवसूरि-रचिता वृत्ति: पाया . . . . . . . . . . ...... प्रत सूत्रांक [७४४-७४५] व्याख्या- याणं केवतियं कालं?, नथि अंतरं, सोयाणं केवतियं कालं?, नथि अंतरं, निरेयाणं केवतियं कालं?, 18||२५ शतके नत्थि अंतरं, एवं जाच अर्णतपएसियाणं । एएसि णं भंते ! परमाणुपोग्गलाणं सोयाणं निरेयाण य कयरे २ उद्देशः४ अभयदेवी परमाण्याजाव विसेसाहिया चा?, गोयमा! सबथोवा परमाणुपोग्गला सचेया निरेया असंखेजगुणा । एएसिणं भंते । या वृत्तिः२ दीनां सैजदुपएसियाणं खंधाणं देसेयाणं सधेयाणं निरेयाण य कयरे २ जाव विसेसाहिया चा?, गोयमा! सवत्थोवा | त्वादि ध. 1८८५॥ दुपएसिया खंधा सचेया देसेया असंखेजगुणा निरेघा असंखिजगुणा, एवं जाव असंखेजपएसियाणं खंधाणं । दिमध्य एएसिणं भंते ! अणंतपएसियाणं खंधाणं देसेयाणं सोयाणं निरेयाण य कयरे २ जाव विसेसाहिया वा प्रदेशाः सू गोयमा ! सबथोवा अणंतपएसिया खंधा सबेया निरेया अर्णतगुणा देसेया अणंतगुणा । एएसिणं भंते ७४' परमाणुपोग्गलाणं संखेजपएसियाणं असंखेजपएसियाणं अणंतपएसियाण य खंधाणं देसेयाणं सबेयाणं नि-18|| रेयाणं दबट्टयाए पएसट्टयाए दबहुपएसट्ठयाए कयरे २ जाव विसेसाहिया वा, गोयमा। सबथोवा अणंतप-ट एसिया खंधा सबेया दबट्टयाए १ अर्णतपएसिया खंधा निरेया दवट्ठयाए अर्णतगुणा २अणंतपएसिया खंधा द देसेया दवट्टयाए अर्णतगुणा ३ असंखेजपएसिया खंधा सचेया दबट्टयाए असंखेजगुणा ४ संखेजपएसिया खंधा सया दषट्वयाए असंखेजगुणा ५ परमाणुपोग्गला सचेया दबयाए असंखेजगुणा ६ संखेज्जपएसिया ||८८५॥ खंधा देसेया दवट्ठयाए असंखेजगुणा ७ असंखेजपएसिया खंधा देसेया दट्टयाए असंखेजगुणा ८ परमाणु-10 दापोग्गला निरेया दवट्ठयाए असंखेजगुणा ९संखेजपएसिया खंधा निरेया दपट्टयाए संखेनगुणा १० असंखे-18| दीप अनुक्रम [८९१-८९२]] KXxx ~186 Page #187 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (०५) [भाग-११]"भगवती"-अंगसूत्र-५ (मूलं+वृत्ति:) शतक [२५], वर्ग [-], अंतर्-शतक [-], उद्देशक [४], मूलं [७४४-७४५] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र- [०५], अंगसूत्र- [०५] "भगवती मूलं एवं अभयदेवसूरि-रचिता वृत्ति: -592 प्रत सूत्रांक [७४४-७४५] 4 जपएसिया खंधा निरेया दवढयाए असंखिजगुणा ११, एवं पएसट्टयाएवि नवरं परमाणुपोग्गला अपएसवयाए भाणियवा संखिजपएसिया खंधा निरेया पएसट्टयाए असंखिजगुणा सेसं तं चेव, दवडपएसट्टयाए सपत्थोवा अणंतपएसिया खंधा सबेया दबट्टयाए १ ते चेव पएसट्टयाए अर्णतगुणा २ अणंतपएसिया खंधा नि-11 रेया दबट्ठयाए अणंतगुणा ३ ते चेव पएसट्टयाए अनंतगुणा ४ अणंतपएसिया खंधा देसेया दबट्टयाए अणंत-टू गुणा ५ ते चेव पएसट्टयाए अर्णतगुणा ६ असंखिजपएसिया खंधा सधेया दबयाए अणंतगुणा७ ते चेव पएसयाए असंखेजगुणा ८ संखिजपएसिया खंधा सत्वेया दबट्टयाए असंखेनगुणा ९ ते चेच पएसट्टयाए असंखेजगुणा १० परमाणुपोग्गला सचेया दबट्ठअपएसट्टयाए असंखेजगुणा ११ संखेजपएसिया खंधा देसेया दवट्ठयाए असंखेजगुणा १२ ते चेव पएसट्टयाए असंखेजगुणा १३ असंखेजपएसिया खंधा देसेया घट्टयाए असं| खेजगुणा १४ ते चेव पएस. असंखे०१५ परमाणुपोग्गला निरेया दवट्टअपदेसट्टयाए असंखेजगुणा १६ सं-| | खेजपएसिया खंधा निरेया दवट्ठयाए संखेजगुणा १७ ते चेव पएसट्टयाए संखेजगुणा १८ असंखेजपएसिया |निरेया दबढ० असंखेनगुणा १९ ते चेव पएसट्टयाए असंखेनगुणा २०(सूत्रं ७४४) कति णं भंते ! धम्म-| स्थिकायस्स मज्झपएसा पन्नत्ता ?, गोयमा! अट्ठ धम्मत्थिकायस्स मज्झपएसा पन्नत्ता । कति णं भंते!|| अधम्मत्थिकायस्स मज्झपएसा प०, एवं चेव, कति णं भंते ! आगासत्थिकायस्स मज्झपएसा प०, एवं चेव ।। कति णं भंते । जीवस्थिकायस्स मज्झपएसा प०, गोयमा! अट्ठ जीवस्थिकायस्स मज्झपएसा प०, एए थे। - 59 दीप अनुक्रम [८९१-८९२]] ~187 Page #188 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (०५) [भाग-११]"भगवती"-अंगसूत्र-५ (मूलं+वृत्ति:) शतक [२५], वर्ग [-], अंतर्-शतक [-], उद्देशक [४], मूलं [७४४-७४५] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र- [०५], अंगसूत्र- [०५] "भगवती मूलं एवं अभयदेवसूरि-रचिता वृत्ति: उद्देशः४ प्रत सूत्रांक [७४४-७४५] व्याख्या- प्रज्ञप्तिः अभयदेवीया वृत्तिः ॥८८६॥ भंते ! अट्ठ जीवत्धिकायस्स मज्झपएसा कतिसु आगासपएसेसु ओगाहंति ?, गोयमा ! जहन्नेणं एकसि वा २५ शतके दोहिं वा तीहिं चा चउहि वा पंचहि वा छहिं वा उक्कोसेणं अट्ठसु नो चेव णं सत्तसु । सेवं भंते २ त्ति ॥ परमाण्या(सूत्रं ७४५) ॥२५ शते ४ उद्देशकः ॥ दीनां सैज'परमाणु'इत्यादि, 'सेए'त्ति चलः, सैजत्वं चोत्कर्षतोऽप्यावलिकाअसङ्ख्येयभागमात्रमेव, निरेजताया औत्सर्गिक-1d त्व दिधत्वात् , अत एव निरेजत्वमुत्कर्षतोऽसक्लषेयं कालमुक्तमिति, 'निरेए'त्ति निश्चलः । बहुत्वसूत्रे 'सबद्धं ति सर्वाद्धां-सर्वकालादिमध्य|परमाणवः सैजाः सन्ति, नहि कश्चित् स समयोऽस्ति कालत्रयेऽपि यत्र परमाणवः सर्व एव न चलन्तीत्यर्थः, एवं निरेजा अपि प्रदेशाः सू | सर्बाद्धामिति ॥ अथ परमाण्वादीनां सैजत्वाद्यन्तरमाह-परमाणु इत्यादि, 'सहाणंतरं पडुच्च'त्ति स्वस्थानं-परमाणोः ७४४-७४५ | परमाणुभाव एव तत्र वर्तमानस्य यदन्तरं-चलनस्य व्यवधानं निश्चलत्वभवनलक्षणं तत्स्वस्थानान्तरं तत्प्रतीत्य 'जहन्नेणं एक समय'ति निश्चलताजघन्यकाललक्षणं 'उकोसेणं असंखेज कालं'ति निश्चलताया एवोत्कृष्टकाललक्षणं, तत्र जघन्यतोऽन्तरं परमाणुरेक समयं चलनादुपरम्य पुनश्चलतीत्येवं, उत्कर्षतश्च स एवासकोयं कालं कचित्स्थिरो भूत्वा पुनश्चल| तीत्येवं दृश्यमिति, 'परहाणंतरं पहुचत्ति परमाणोर्यत्परस्थाने-यणुकादावन्तर्भूतस्यान्तरं-चलनव्यवधानं तत्परस्थानान्तरं तत्प्रतीत्येति 'जहन्नेणं एक समयं उकोसेणं असंखेज कालं'ति, परमाणुपुद्गलो हि भ्रमन् द्विप्रदेशादिकं स्कन्धमनुप्रविश्य टू ८८६॥ जघन्यतस्तेन सहकं समयं स्थित्वा पुनाम्यति उत्कर्षतस्त्वसवेयं कालं द्विप्रदेशादितया स्थित्वा पुनरेकतया भ्राम्यती-1 [ति । 'निरेयस्से'त्यादि, निश्चलः सन् जघन्यतः समयमेकं परिभ्रम्य पुनर्निश्चलस्तिष्ठति, उत्कर्षतस्तु निश्चलः सज्ञावलि दीप अनुक्रम [८९१-८९२]] ~188 Page #189 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (०५) [भाग-११]"भगवती"-अंगसूत्र-५ (मूलं+वृत्ति:) शतक [२५], वर्ग [-], अंतर्-शतक [-1, उद्देशक [४], मूलं [७४४-७४५] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र- [०५], अंगसूत्र- [०५] "भगवती मूलं एवं अभयदेवसूरि-रचिता वृत्ति: प्रत सूत्रांक [७४४-७४५] द काया असपेयं भागं चलनोत्कृष्टकालरूपं परिभ्रम्य पुनर्निश्चल एव भवतीति स्वस्थानान्तरमुक्तं, परस्थानान्तरं तु निश्चल सन् ततः स्वस्थानाचलितो जघन्यतो द्विप्रदेशादी स्कन्धे एक समयं स्थित्वा पुनर्निश्चल एवं तिष्ठति, उत्कर्षतरत्वसञ्जयेयं से | कालं तेन सह स्थित्वा पृथग भूत्वा पुनस्तिष्ठति । 'दुपएसियस्से'त्यादि, 'उक्कोसेणं अणंतं कालं'ति, कथम् , द्विप्रदेशिकः संश्चलितस्ततोऽनन्तैः पुद्गलैः सह कालभेदेन सम्बन्धं कुर्वननन्तन कालेन पुनस्तेनैव परमाणुना सह सम्बन्ध प्रतिपद्य पुनश्चलतीत्येवमिति ॥ सैजादीनामेवाल्पबहुत्वमाह-'एएसि णमित्यादि, 'निरेया असंखेनगुण'त्ति स्थिति-14 ४ क्रियाया औत्सर्गिकत्यादहुत्वमिति, अनन्तप्रदेशिकेषु सजा अनन्तगुणाः वस्तुस्वभावात् ।। एतदेव द्रव्यार्थप्रदेशार्थोभया निरूपयन्नाह-एएसि ण'मित्यादि, तत्र द्रव्यार्थतायां सैजस्वनिरेजस्वाभ्यामष्टी पदानि, एवं प्रदेशार्थतायामपि, उभयार्थतायां तु चतुर्दश सैजपक्षे निरेजपक्षे च परमाणुषु द्रव्यार्थप्रदेशार्थपदयोर्द्रव्यार्थाप्रदेशार्थतेत्येवमेकीकरणेनाभिलापात् , अथ 'पएसट्टयाए एवं चेव' इत्यत्रातिदेशे यो विशेषीऽसावुच्यते-'नवरं परमाणु' इत्यादि, परमाणुपदे प्रदेशार्थतायाः | स्थानेऽप्रदेशार्थतयेति वाच्यं, अप्रदेशार्थस्वात्परमाणूना, तथा द्रव्यार्थतासूत्रे सङ्ख्यातप्रदेशिका निरेजा निरेजपरमाणुभ्यः सायातगुणा उक्ताः प्रदेशार्थतासूत्रे तु ते तेभ्योऽसलोयगुणा याच्याः, यतो निरेजपरमाणुभ्यो द्रव्यार्थतया निरेजसङ्ख्यातप्रदेशिकाः सत्यातगुणा भवन्ति, तेषु च मध्ये बहूनामुत्कृष्टसवातकप्रमाणप्रदेशत्वान्निरेजपरमाणुभ्यस्ते प्रदेशतोऽसत्येयर गुणा भवन्ति उस्कृष्टसक्यातकस्योपर्येकप्रदेशप्रक्षेपेऽप्यसङ्ख्यातकस्य भावादिति ॥ अथ परमाण्यादीनेव सैजत्यादिना निरूप यन्नाह-'परमाणु' इत्यादि, इह सर्वेषामल्पबहुत्वाधिकारे द्रव्यार्थचिन्तायां परमाणुपदस्य सर्वैजत्वनिरेजस्यविशेषणात् दीप अनुक्रम [८९१-८९२]] ~189 Page #190 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (०५) प्रत सूत्रांक [७४४ -७४५] दीप अनुक्रम [८९१ -८९२] [भाग-११]“भगवती”– अंगसूत्र - ५ ( मूलं + वृत्ति:) शतक [२५], वर्ग [-], अंतर् शतक [-] उद्देशक [४] मूलं [ ७४४-७४५] पूज्य आगमोद्धारकश्री संशोधितः मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित.. आगमसूत्र - [०५] अंगसूत्र- [ ०५] "भगवती" मूलं एवं अभयदेवसूरि-रचिता वृत्तिः व्याख्या प्रज्ञप्तिः अभयदेवीया वृत्तिः २ ॥८८७॥ सङ्ख्येयादीनां तु त्रयाणां प्रत्येकं देशैजसर्वजनिरेजत्वैर्विशेषणादेकादश पदानि भवन्ति, एवं प्रदेशार्थतायामपि, उभयार्थतायां चैतान्येव विंशतिः, सर्वैजपक्षे निरेजपक्षे च परमाणुषु द्रव्यार्थप्रदेशार्थपदयोर्द्रव्यार्थाप्रदेशार्थतेत्येवमेकी करणेनाभिलापादिति ॥ अनन्तरं पुनलास्तिकायः प्रदेशतश्चिन्तितः, अथान्यानप्यस्तिकायान् प्रदेशत एव चिन्तयन्नाह - 'कइ णं भंते !' इत्यादि, 'अड धम्मस्थिकायस्स मज्झपएस'त्ति, एते च रुचकप्रदेशाष्टकावगाहिनोऽवसेया इति चूर्णिकारः, इह च यद्यपि लोकप्रमाणत्वेन धर्मास्तिकायादेर्मध्यं रत्नप्रभावकाशान्तर एव भवति न रुचके तथाऽपि दिशामनुदिशां च तत्प्रभवत्वाद्धम्र्मास्तिकायादि मध्यं तत्र विवक्षितमिति संभाव्यते, 'जीवत्थिकायस्स' त्ति प्रत्येकं जीवानामित्यर्थः, ते च सर्वस्यामवगाहनायां मध्यभाग एवं भवन्तीति मध्यप्रदेशा उच्यन्ते, 'जहन्त्रेणं एकसि वे'त्यादि सङ्कोचविकाशधर्मत्वात्तेषाम् 'उकोसेणं असुति एकैकस्मिंस्तेषामवगाहनात्, 'नो चेव णं सन्तसुवित्ति वस्तुस्वभावादिति ॥ ॥ पञ्चविंशतितमशते चतुर्थः ॥ २५ ॥ ४ ॥ चतुर्थोदेशके पुद्गलास्तिकायादयो निरूपितास्ते च प्रत्येकमनन्तपर्यवा इति पञ्चमे पर्यवाः प्ररूप्यन्त इत्येवं सम्ब'स्वास्येदमादि सूत्रम् - कतिविहाणं भंते! पजवा पन्नत्ता ?, गोयमा ! दुबिहा पजवा पं०, तं०-जीवपज़वा य अजीवपलवा य, पज्जवपदं निरवसेसं भाणियां जहा पनवणाए । (सूत्रं ७४६ ) आवलियाणं भंते ! किं संखेला समया असं Eucation International अत्र पञ्चविंशतितमे शतके चतुर्थ उद्देशकः परिसमाप्तः अथ पञ्चविंशतितमे शतके पञ्चम उद्देशक: आरभ्यते समय- संख्या: गणितं For Pale Only ~ 190 ~ २५ शतके उद्देशः ४ परमाण्यादीनां सेजत्यादि ध मदिमध्यप्रदेशाः सू ७४४-७४५ ॥८८७॥ wor Page #191 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (०५) [भाग-११]"भगवती"-अंगसूत्र-५ (मूलं+वृत्ति:) शतक [२५], वर्ग [-], अंतर्-शतक [-], उद्देशक [५], मूलं [७४६-७४८] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र- [०५], अंगसूत्र- [०५] "भगवती मूलं एवं अभयदेवसूरि-रचिता वृत्ति: प्रत सूत्रांक [७४६-७४८] || खेजा समया अर्णता समया ?, गोयमानो संखेज्या समया असंखेज्जा समया नो अणंता समया, आणापाणूणं भंते ! किं संखेवा एवं चेव, थोवे णं भंते ! किं संखेजा ?, एवं चेच, एवं लवेवि मुहुत्तेवि एवं अहो रत्तेवि, एवं पक्खे मासे उडू अयणे संवकछरे जुगे वाससये वाससहस्से वाससयसहस्से पुवंगे पुत्वे तुडियंगे ॥8|| तुडिए अडडंगे अडडे अववंगे अववे हूहुयंगे हुहुए उप्पलंगे उप्पले पउमंगे पउमे नलिणंगे नलिणे अच्छिणिउ पूरंगे अच्छणिजपूरे अउयंगे अउये नउयंगे नउए पउयंगे पउए चूलियंगे चूलिए सीसपहेलियंगे सीसपहेलिPाया पलिओवमे सागरोवमे ओसप्पिणी एवं उस्सप्पिणीवि, पोग्गलपरियणं भंते ! किं संखेजा समया असं || खेजा समया अणंता समया? पुच्छा, गोयमा ! नो संखेजा समया नो असंखेज्जा समया अर्णता समया,॥ द एवं तीयद्धाअणागयद्धसबद्धा ॥ आवलियाओ णं भंते । किं संखेजा समया ? पुच्छा, गोयमा! नो संखे जा समया सिय असंखिजा समया सिय अणंता समया, आणापाणूणं भंते। किं संखेजा समया ३१, एवं चेव, थोवाणं भंते ! किं संखेज्जा समया ३, एवं जाव ओसप्पिणीओत्ति, पोग्गलपरियाणं भंते ! किं संस्खेज्जा| दि समया ? पुच्छा, गोयमा! णो संखेजा समया णो असंखेज्जा समया अणंता समया, आणापाणूणं भंते! किं। संखजाओ आवलियाओ पुच्छा, गोयमा! संखेजाओ आवलियाओ णो असंखिजाओ आवलियाओ नो अणंताओ आवलियाओ, एवं थोवेवि एवं जाव सीसपहेलियत्ति। पलिओवमे णं भंते !किं संखेज्ञा ३१ पुच्छा, गोयमा! णो संखेज्जाओ आवलियाओ असंखिजाओ आवलियाओ नो अणंताओ आवलियाओ, ALLERKAKA *OGSACRECER-54-% दीप अनुक्रम [८९३-८९५] A समय-संख्या: गणितं ~191~ Page #192 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (०५) [भाग-११]"भगवती"-अंगसूत्र-५ (मूलं+वृत्ति:) शतक [२५], वर्ग [-], अंतर्-शतक [-], उद्देशक [५], मूलं [७४६-७४८] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र- [०५], अंगसूत्र- [०५] "भगवती मूलं एवं अभयदेवसूरि-रचिता वृत्ति: प्रत सूत्रांक [७४६ -७४८] व्याख्या एवं सागरोवमेवि एवं ओसप्पिणीवि उस्सप्पिणीवि, पोग्गलपरियहे पुच्छा, गोपमा! नो संखेवाओ आव-||२५ शतके प्रज्ञप्ति दलियाओ णो असंखेजाओ आवलियाओ अणंताओ आवलियाओ, एवं जाव सबद्धा। आणापाणूणं भंते अभयदेवी उद्देशः ५ याति किं संखेचाओ आवलियाओ ? पुच्छा, गोयमा ! सिय संखेजाओ आवलियाओ सिय असंखेज्जाओ सिय पर्यवाः आ. | अणंताओ, एवं जाच सीसपहेलियाओ, पलिओवमाणं पुच्छा, गोयमा ! णो संखेजाओ आवलियाओ सिया ॥८८८॥ असंखेजाओ आवलियाओ सिय अणंताओ आवलियाओ एवं जाव उस्सप्पिणीओ, पोग्गलपरियट्टाणं पुच्छा, नां समया दिसू गोयमा ! णो संखेजाओ आवलियाओ णो असंखेजाओ आवलियाओ अर्णताओ आवलियाओ। थोवे XEY भंते ! किं संखेजाओ आणापाणूओ असंखेजाओ जहा आवलियाए वत्तवया एवं आणापाणूवि निरवसेसा, ह एवं एतेणं गमएणं जाव सीसपहेलिया भाणियवा । सागरोवमे णं भंते ! किं संखेजा पलिओवमा ? पुच्छा, गोयमा! संखेजा पलिओवमा णो असंखेजा पलिओवमा णो अणंता पलिओवमा, एवं ओसप्पिणीएवि उस्सप्पिणीएवि, पोग्गलपरियहे णं पुच्छा, गोयमा! णो संखेजा पलिओवमा णो असंखेचा पलिओवमा | अणंता पलिओवमा एवं जाव सबद्धा । सागरोवमाणं भंते ! किं संखेजा पलिओवमा? पुच्छा, गोयमा! | सिय संखेजा पलिओवमा सिय असंखिज्जा पलिओवमा सिय अर्णता पलिओषमा, एवं जाव ओसप्पिणीवि | 11८८८॥ 18| उस्सप्पिणीवि । पोग्गलपरियहाणं पुच्छा, गोयमा! णो संखेजा पलिओवमा णो असंखेजा पलिओवमा अर्णता पलिओवमा । ओसप्पिणी णं भंते ! किं संखेज्जा सागरोवमा जहा पलिओवमस्स चत्तबया तहा | दीप अनुक्रम [८९३-८९५] समय-संख्या: गणितं ~192 Page #193 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (०५) [भाग-११]"भगवती"-अंगसूत्र-५ (मूलं+वृत्ति:) शतक [२५], वर्ग [-], अंतर्-शतक [-], उद्देशक [५], मूलं [७४६-७४८] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र- [०५], अंगसूत्र- [०५] "भगवती मूलं एवं अभयदेवसूरि-रचिता वृत्ति: %AC प्रत सूत्रांक [७४६-७४८] है सागरोषमस्सवि, पोग्गलपरियहे णं भंते ! किं संखेज्जाओ ओसप्पिणीओ पुच्छा, गोयमा। णो संखे-13 जाओ ओसप्पिणीओ णो असंखिजा अर्णताओ ओसप्पिणिउस्सप्पिणीओ एवं जाव सबद्धा, पोग्गलपरियट्टा णं भंते । किं संखेजाओ ओसप्पिणिउस्सप्पिणीओ पुच्छा, गोयमा ! णो संखेनाओ ओसप्पिणिजस्सप्पिणीओ णो असंखे. अणंताओ ओसप्पिणिउस्सप्पिणीओ। तीतद्धा णं भंते ! किं संखेज़ा पोग्गलपरिया पुच्छा, गोयमा ! नो संखेजा पोग्गलपरियट्टा नो असंखेज्जा अर्णता पोग्गलप०, एवं अणागयापि, एवं सबद्धावि। (सूत्रं ७४७) अणागयद्धा णं भंते ! किं संखेज्जाओ तीतजाओ असंखे० अर्णताओ?.| गोयमा ! णो संखेज्जाओ तीतद्धाओ णो असंखेजाओ तीतद्धाओ णो अणंताओ तीतद्धाओ, अणागयद्धा तीतद्धाओ समयाहिया, तीतद्धा णं अणागयद्धाओ समयूणा। सबडा णं भंते ! किं संखेजाओ तीतद्धाओ? ४ पुच्छा, गोयमा ! णो संखेजाओ तीतद्धाओ णो असंखे णो अर्णताओ तीयद्धाओ, सबद्धा णं तीयद्धाओ सातिरेगदुगुणा तीतद्धाणं सबद्धाओ थोवूणए अद्धे, सबद्धा थे भन्ते! किं संखेजाओ अणागयद्धाओ पुच्छा, गोयमा! णो संखेजाओ अणागयद्धाओ णो असंखेजाओ अणागयद्धाओ णो अणंताओ अणागयद्धाओ ६ सबद्धा णं अणागयद्धाओ थोपूणगदुगुणा अणागयद्धा णं सबद्धाओ सातिरेगे अद्धे (७४८)॥ है 'काविहे'त्यादि, 'पज्जच'त्ति पर्यवा गुणा धर्मा विशेषा इति पर्यायाः, 'जीवपज्जवा यत्ति जीवधर्मा एवमजीवपर्यवा अपि, 'पज्जवपर्य निरवसेसं भाणिय'ति 'जहा पन्नवणाए'त्ति पर्यवपदं च-विशेषपदं प्रज्ञापनायां पञ्चम, तच्चैवं CAROSCORECASSESSOCIRCReactte दीप अनुक्रम [८९३-८९५] -%-343 समय-संख्या: गणित ~193 Page #194 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (०५) प्रत सूत्रांक [७४६ -७४८] दीप अनुक्रम [८९३ -८९५] [भाग-११]“भगवती”– अंगसूत्र - ५ ( मूलं + वृत्ति:) शतक [२५], वर्ग [-], अंतर् शतक [-], उद्देशक [५], मूलं [७४६-७४८] पूज्य आगमोद्धारकश्री संशोधितः मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र - [०५], अंगसूत्र- [०५] “भगवती" मूलं एवं अभयदेवसूरि-रचिता वृत्तिः ॥८८९ ॥ व्याख्या- ४ 'जीवपावा णं भंते! किं संखेजा असंखेज्जा अनंता १, गोयमा ! नो संखेज्जा णो असंलेजा अनंता' इत्यादीति ॥ प्रज्ञप्तिः | विशेषाधिकारात्कालविशेषसूत्रम्- 'आवलिया णमित्यादि, बहुत्वाधिकारे 'आवलियाओ ण'मित्यादौ 'नो संखेखा अभयदेवीया वृत्तिः २ समय सि एकस्यामपि तस्यामसङ्ख्याताः समयाः बहुषु पुनरसङ्ख्याता अनन्ता वा स्युर्न तु सवेया इति । 'अणागयद्वा णं तीतद्धाओ समग्राहिय'त्ति अनागतकालोऽतीतकालात्समयाधिकः, कथं १, यतोऽतीतानागती कालावनादित्वानन्तत्वाभ्यां समानौ, तयोश्च मध्ये भगवतः प्रश्नसमयो वर्त्तते स चाविनष्टत्वेनातीते न प्रविशति अविनष्टत्वसाधर्म्यादनागते क्षिप्तस्ततः समयातिरिक्ता अनागताद्धा भवति, अत एवाह-अनागतकालातीतः कालः समयोनो भवतीति एतदेवाह - 'तीतद्धा ण'मित्यादि, 'सबद्धा णं तीतद्धाओ सातिरेगद्गुण' त्ति सर्वाद्धा - अतीतानागताद्धाद्वयं सा चासीताद्धातः | सकाशात् सातिरेकद्विगुणा भवति, सातिरेकत्वं च वर्त्तमानसमयेनात एवातीताद्धा सर्वाद्धायाः स्तोकोनमर्द्ध, ऊनत्वं च वर्त्तमानसमयेनैव, एतदेवाह - 'सीता णं सबढाए थोवूणए अद्धेत्ति, इह कश्चिदाह- अतीताद्धातोऽनागताद्धानन्तगुणा, यतो यदि ते वर्त्तमानसमये समे स्यातां ततस्तदतिक्रमे अनागताद्धा समयेनोना स्यात्ततो द्व्यादिभिः एवं च समत्वं नास्ति ततोऽनन्तगुणा, सा चातीताद्धायाः सकाशाद्, अत एवानन्तेनापि कालेन गतेन नासौ क्षीयत इति, अत्रोच्यते, इह | समत्वमुभयोरप्याद्यन्ताभावमात्रेण विवक्षितमिति चादावेव निवेदितमिति । पर्यवा उद्देशकादायुक्तास्ते च भेदा अपि भवन्तीति निगोदभेदान् दर्शयन्नाह- कतिविहा णं भंते! णिओदा पन्नत्ता ?, गोयमा ! दुविहा णिओदा प०, स० - णिओगा य णिओयजीवा य' Education Internationa निगोद, तस्य भेदाः, For Parts Only ~ 194~ | २५ शतके उद्देशः ५ अतीतानागताखे सु ७४८ ॥८८९॥ Page #195 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (०५) [भाग-११]"भगवती"-अंगसूत्र-५ (मूलं+वृत्ति:) शतक [२५], वर्ग [-], अंतर्-शतक [-], उद्देशक [9], मूलं [७४९-७५०] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र- [०५], अंगसूत्र- [०५] "भगवती मूलं एवं अभयदेवसूरि-रचिता वृत्ति: ॐॐॐ प्रत सूत्रांक [७४९-७५०] SACCAकल है णिओदा णं भंते ! कतिविहा पन्नत्ता ?, गोयमा! दुविहा पन्नत्ता, तंजहा-मुडमनिगोदा य बायरनिओगा य, एवं निओगा भाणियबा जहा जीवाभिगमे तहेव निरवसेसं (सूत्रं ७४९)॥ कतिविहे णं भंते। णामे |पन्नत्ते, गोयमा छबिहे णामे पन्नत्ते, तंजहा-ओदइए जाव सन्निवाइए। से किं तं खदाए णामे ?, उदइए णामे दुविहे प०,०-उदए य उदयनिष्फन्ने य, एवं जहा सत्तरसमसए पढमे उहेसए भाचो तहेव इहवि, नवरं इम नामणाणत्तं, सेसं तहेव जाच सन्निवाइए । सेवं भंते ! २ (सूत्रं ७५०) ॥ २५॥५॥ _ 'कतिविहे'त्यादि, 'निगोदा यत्ति अनन्तकायिकजीवशरीराणि 'निगोयजीवा यति साधारणनामकर्मोदयवतिनो जीवाः, 'जहा जीवाभिगमे'त्ति, अनेनेदं सूचित-'सुहुमनिगोदा णं भंते ! कतिविहा पन्नत्ता ?, गोयमा ! दुविहा | पन्नत्ता, तंजहा-पजत्तगा य अपज्जत्तगा य' इत्यादि । अनन्तरं निगोदा उक्तास्ते च जीवपुद्गलानां परिणामभेदाद् भव न्तीति परिणामभेदान् दर्शयन्नाह–'कतिविहे गं भंते! नामे इत्यादि, नमनं नामः परिणामो भाव इत्यनान्तरं, |'नवरं इमं नाणसं'ति सप्तदशशते भावमाश्रित्येदं सूत्रमधीतं इह तु नामशब्दमाश्रित्येत्येतावान् विशेष इत्यर्थः ।। on पञ्चविंशतितमशते पञ्चमः ॥ २५॥५॥ दीप अनुक्रम [८९६-८९७] पश्चमोद्देशकान्ते नामभेद उक्तो, नामभेदाच्च निम्रन्थभेदा भवन्तीत्यतस्ते षष्ठेऽभिधीयन्ते इत्यनेन सम्बन्धेनायातस्यास्यैतास्तिस्रो द्वारगाथा: +CREEN अत्र पञ्चविंशतितमे शतके पंचम-उद्देशक: परिसमाप्त: अथ पञ्चविंशतितमे शतके षष्ठं-उद्देशकः आरभ्यते निगोद, तस्य भेदा:, ~195 Page #196 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (०५) [भाग-११]"भगवती"-अंगसूत्र-५ (मूलं+वृत्ति:) शतक [२५], वर्ग [-], अंतर्-शतक [-1, उद्देशक [६], मूलं [७५१] + गाथा: पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र- [०५], अंगसूत्र- [०५] "भगवती मूलं एवं अभयदेवसूरि-रचिता वृत्ति: 18/२५ शतके प्रत सूत्रांक [७५१] गाथा: व्याख्या-15 पनवण १ वेद २ रागे ३ कप्प ४ चरित्त ५ पडिसेवणा ६ णाणे ७॥ तित्थे ८ लिंग ९ सरीरे १० खेत्ते ११ प्रज्ञप्तिः काल १२ गइ १३ संजम १४ निगासे १५॥१॥ जोगु १६ वओग १७ कसाए १८ लेसा १९ परिणाम २०उद्देशः५ अभयदेवी- बंध २१ वेदे य २२ । कम्मोदीरण २३ उपसंपजहन २४ सन्ना य २५ आहारे २६ ॥२॥ भव २७ आगरिसे ||४|| निगोदा या वृत्तिः२ २८ कालं २९तरे य ३० समुग्धाय ३१ खेत ३२ फुसणा य ३३ । भाचे ३४ परिणामे ३५ विष अप्पाबहुपं ३६ नामच सू ॥८९०॥ नियंठाणं ३७ ॥३॥ रायगिहे जाव एवं वयासी-कति णं भंते!णियंठा पन्नत्ता?, गोयमा! पंचणियंठा पन्नत्ता. ७४९-७५० उद्देशः६ तंजहा-पुलाए बउसे कुसीले णियंठे सिणाए ॥ पुलाए णं भंते ! कतिविहे पन्नते, गोयमा! पंचविहे प०,तं-8 निर्ग्रन्थेषु नाणपुलाए दंसणपुलाए चरितपुलाए लिंगपुलाए अहासुहुमपुलाए णामं पंचमे। बउसे णं भंते! कतिविहे प०१. भेदवेदो दिगोयमा ! पंचविहे प०, तं०-आभोगवउसे अणाभोगवउसे संवुडब उसे असंवुडबउसे अहामुहुमबउसे णाम सू ७५१ पंचमे । कुसीले णं भंते ! कतिविहे प०१, गोयमा ! दुविहे प० तं०-पडिसेवणाकुसीले य कसायकुसीले य, पडिसेवणाकुसीले णं भंते ! कतिविहे पन्नत्ते ?, गोयमा! पंचविहे प०, तंजहा-नाणपडिसेवणाकुसीले दसणपिडिसेवणाकुसीले चरित्तपडिसेवणासीले लिंगपडिसेवणाकुसीले अहासुहमपडिसेवणाकुसीले णाम पंच मे, कसायकुसीले णं भंते ! कतिविहे पन्नते?, गोयमा! पंचविहे पं००-नाणकसायकुसीले दसणकसाय कुसीले चरित्तकसायकुसीले लिंगकसायकसीले अहासूहमकसायकुसीले णाम पंचमे । नियंठे णं भंते ! दिकतिविहे प०१, गोयमा । पंचविहे पं०, तंजहा-पढमसमयनियंठे अपढमसमपनियंठे चरमसमयनियंठे अच XXSHIGA दीप अनुक्रम [८९८-- -९०१] । SAREastatinintennational | निर्ग्रन्थः, तस्य स्वरुपम, भेदा: इत्यादि विविध-विषय-वक्तव्यता ~196~ Page #197 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (०५) [भाग-११]"भगवती"-अंगसूत्र-५ (मूलं+वृत्ति:) शतक [२५], वर्ग -], अंतर्-शतक [-], उद्देशक [६], मूलं [७५१] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र- [०५], अंगसूत्र- [०५] "भगवती मूलं एवं अभयदेवसूरि-रचिता वृत्ति: प्रत सूत्रांक [७५१] गाथा: मसमयनियंठे अहासुष्मनियंठे णामं पंचमे। सिणाए णं भंते ! कतिविहे प०१, गो. पंचविहे प० तं०दि अच्छवी १ असवले २ अकम्मसे ३ संसुद्धनाणदंसणधरे अरहा जिणे केवली ४ अपरिस्साची ५३१पुलाए णं भंते। किं सवेयए होजा अवेदए होज्जा ?, गोयमा! सवेयए होला णो अवेयए होजा, जइ सवेपए होजा किं इस्थिवेदए होजा पुरिसवेयए पुरिसनपुंसगवेदए होजा, गोयमा! नो इस्थिवेदए होजा पुरिसवेयए होज्जा पुरिसनपुंसगवेयए वा होजा। बउसे गंभंते !किं सवेदए होजा अवेदए होजा, गोयमा! सवेदए होजा णो अवेदए होजा, जइ सवेदए होजा किं इधिवेयए होजा पुरिसवेयए होना पुरिसनपुंसगवेदए होजा, 3|गोयमा ! इस्थिवेयए वा होज्जा पुरिसवेयए वा होजा पुरिसनपुंसगवेयए वा होजा, एवं पडिसेवणाकुसीलेवि, दकसायकुसीले णं भंते ! किं सवेदए ? पुच्छा, गोयमा ! सवेदए वा हो. अवेदए वा हो, जह अवेवए किं *उवसंतवेदए खीणवेदए हो०१, गोयमा ! उवसंतवेदए वा खीणवेदए वा हो, जइ सवेयए होजा किं इस्थिॐ वेदए पुच्छा, गोयमा ! तिमुवि जहा घउसो।णियंठे णं भंते किं सवेदए पुच्छा, गोषमा! णो सवेयए होजा द अवेयए हो, जइ अवेयए होकि उवसंत पुच्छा, गोयमा ! उवसंतवेयए वा होइ खीणवेयए वा होज्जा | सिणाए णं भंते । किं सवेयए होजा ?, जहा नियंठे तहा सिणाएवि, नवरं णो उपसंतवेयए होजा खीणवेयए । होजा २॥ (सूत्रं ७५१) 'पण्णवणे'त्यादि, एताः पुनरुद्देशकार्थावगमगम्या इति, तत्र 'पनवण'त्ति द्वाराभिधानायाह-रायगिहे 'त्यादि, 'कति करवाकर दीप अनुक्रम [८९८-- -९०१] airmanasurary.orm | निर्यन्थः, तस्य स्वरुपम, भेदा: इत्यादि विविध-विषय-वक्तव्यता ~197 Page #198 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (०५) [भाग-११]"भगवती"-अंगसूत्र-५ (मूलं+वृत्ति:) शतक [२५], वर्ग [-], अंतर्-शतक [-], उद्देशक [६], मूलं [७५१] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र- [०५], अंगसूत्र- [०५] "भगवती मूलं एवं अभयदेवसूरि-रचिता वृत्ति: प्रत सूत्रांक [७५१] गाथा: व्याख्या- 'मित्यादि नियंठ'त्ति निर्गताः सबाह्याभ्यन्तराष्ट्रन्थादिति निर्मन्या-साधवः, एतेषां च प्रतिपन्नसर्वविरतीनामपि विचि- २५ शतके प्रज्ञधिः प्रचारित्रमोहनीयकर्मक्षयोपशमादिकृतो भेदोऽवसेयः, तत्र 'पुलाय'त्ति पुलाको-निस्सारो धान्यकणः पुलाकवरपुलाकः ||४|| उद्देशः ५ अभयदेवीद संयमसारापेक्षया, स च संयमवानपि मनाक् तमसारं कुर्वन् पुलाक इत्युच्यते, बउसे'त्ति बकुशं-शवलं कर्बुरमित्यनर्थान्तरं, निगोदा या वृत्तिः२/8 ततश्च बकुशसंयमयोगाद्वकुशः 'कुसीले'त्ति कुत्सितं शीलं-चरणमस्येति कुशीलः 'नियंठे'त्ति निर्गतो ग्रन्थात्-मोहनी-|| 8 नामच सू *७४९.७५० ।।८९२॥ यकर्माख्यादिति निर्ग्रन्थः 'सिणाए'सि स्मात इव स्नातो घातिकर्मलक्षणमलपटलक्षालनादिति । तत्र पुलाको द्विविधो | उद्देशः६ लब्धिप्रतिसेवाभेदात् , तत्र लन्धिपुलाको लब्धिविशेषयान् , यदाह--"संघाइयाण कजे चुन्निज्जा चकवट्टिमवि जीए निर्ग्रन्थेषु तीए लद्धी' जुओ लद्धिपुलाओ मुणेयधो ॥१॥"[सङ्घादिकानां कार्ये यया चक्रवर्तिनमपि चूरयेत्तया लब्ध्या युतो भेदवेदी लब्धिपुलाको ज्ञातव्यः ॥१॥] अन्ये त्याहुः-आसेवनतो यो ज्ञानपुलाकस्तस्येयमीहशी लब्धिः स एव लम्धिपुसाको न सू७५१ तयतिरिक्तः कश्चिदपर इति । आसेवनापुलाकं पुनराश्रित्याह-'पुलाए णं भंते !'इत्यादि, 'नाणपुलाए'त्ति ज्ञानमा|श्रित्य पुलाकस्तस्यासारताकारीविराधको ज्ञानपुलाका, एवं दर्शनादिपुलाकोऽपि, आह च-"खलियाइदूसणेहिं नाणं | संकाइएहिं सम्मत्तं । मूलुत्तरगुणपडिसेवणाइ चरणं विराहे ॥१॥लिंगपुलाओ असं निकारणओ करेइ जो सिंग। दमणसा अकपियाणं निसेवओहोद अहसुहमो ॥२॥ [स्खलितादिदपणानं शङ्करदिभिः सम्यक्त्वं मूलोत्तर-16 MIगुणप्रतिसेवनया चारित्रं विराधयति ॥१॥ लिङ्गपुलाकोऽन्यत निष्कारणतः करोति यो लिङ्गम् । मनसाऽकल्पिताना ८९॥ | निपेवको भवति यथासूक्ष्मः ॥२॥] बकुशो द्विविधो भवत्युपकरणशरीरभेदात्, तत्र वस्त्रपात्राथुपकरणषिभूषानुवत्तेन दीप अनुक्रम [८९८-- -९०१] | निर्यन्थः, तस्य स्वरुपम, भेदा: इत्यादि विविध-विषय-वक्तव्यता ~198~ Page #199 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (०५) [भाग-११]"भगवती"-अगसूत्र-५ (मूल+वृत्ति:) शतक [२५], वर्ग [-], अंतर्-शतक [-], उद्देशक [६], मूलं [७५१] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र- [०५], अंगसूत्र- [०५] "भगवती मूलं एवं अभयदेवसूरि-रचिता वृत्ति: S प्रत सूत्रांक [७५१] गाथा: द्र शील उपकरणयकुशः करचरणनखमुखादिदेहावयवविभूषाऽनुयत्ती शरीरबकुशा, स चायं द्विविधोऽपि पश्चविधा, तथा| XI चाह-'बउसे ण'मित्यादि, 'आभोगवउसे त्ति आभोगः-साधूनामकृत्यमेतच्छरीरोपकरणविभूषणमित्येवं ज्ञानं तत्प्रधानो बकुश आभोगबकुशः एवमन्येऽपि, इहाप्युक्तम्-"आभोगे जाणतो करेइ दोसं अजाणमणभोगे । मूलुत्तरेहिं संवुड विवरीअ असंवुडो होइ ॥१॥ अच्छिमुह मज्जमाणो होइ अहासुहुमओ तहा बउसो । अहवा जाणिज्जतो असंवुडो संवुडो इयरो॥२॥"[जानानो दोष करोत्याभोगः अजानानोऽनाभोगो मूलोत्तरयोः संवृतोऽसंवृतो भवतीतरः॥१॥XI अक्षिमुखं मार्जयन् भवति यथासूक्ष्मस्तथा बकुशः । अथवा ज्ञायमानोऽसंवृतः इतरः संवृतः॥२॥1 'पडिसेवणाकु४ सीले यत्ति तत्र सेवना-सम्यगाराधना तत्प्रतिपक्षस्तु प्रतिषेवणा तया कुशीला प्रतिसेवनाकुशील: 'कसायकुसीले'त्ति | कषायैः कुशील कपायकुशीलः 'नाणपडिसेवणाकुसीले'त्ति ज्ञानस्य प्रतिषेषणया कुशीलो ज्ञानप्रतिषेवणाकुशील: एवमन्येऽपि, उक्तञ्च-"इह नाणाइकुसीलो उवजीवं होइ नाणपभिईए। अहसुहुमो पुण तुस्से एस तवस्सित्तिसंसाए॥१॥" ४|[ ज्ञानप्रभृतिकानुपजीवन्निह ज्ञानादिकुशीलो भवति यथासूक्ष्मः पुनरेष तपस्वीति प्रशंसया तुष्यति ॥१॥"] 'नाण-| | कसायकुसीले'त्ति ज्ञानमाश्रित्य कषायकुशीलो ज्ञानकषायकुशीला, एवमन्येऽपि, इह गाथा:-"णाणंदसणलिंगे जो जुंजइ कोहमाणमाईहिं । सो नाणाइकुसीलो कसायओ होइ विन्नेओ ॥१॥चारित्तमि कुसीलो कसायओ जो पयच्छई ४ सावं । मणसा कोहाईप निसेवयं होइ अहसुहमो ॥२॥अहवावि कसाएहिं नाणाईणं विराहओ जोउ।सो नाणाइकुसीलो ओ वक्खाणभेएणं ॥३॥"[ज्ञानदर्शनलिङ्गानि यः क्रोधमानादिभिर्युनक्ति स ज्ञानादिकुशीलः कषायतो भवति CACAKCARRCAR दीप अनुक्रम [८९८-- -९०१] SARERatininemarana | निर्यन्थः, तस्य स्वरुपम, भेदा: इत्यादि विविध-विषय-वक्तव्यता ~199~ Page #200 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (०५) [भाग-११]"भगवती"-अंगसूत्र-५ (मूलं+वृत्ति:) शतक [२५], वर्ग [-], अंतर्-शतक [-], उद्देशक [६], मूलं [७५१] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र- [०५], अंगसूत्र- [०५] "भगवती मूलं एवं अभयदेवसूरि-रचिता वृत्ति: IX प्रत सूत्रांक [७५१] निग्रन्थेषु गाथा: विज्ञेयः॥१॥ यः कषायांच्छापं प्रयच्छति स चारित्रे कुशीलो मनसा क्रोधादीनिषेवमाणो भवति यथासूक्ष्मः ॥२॥ व्याख्या-16 || २५ शतके प्रज्ञप्तिः अथवाऽपि यस्तु कषायैानादीनां विराधकः स ज्ञानादिकुशीलो ज्ञेयो व्याख्यानभेदेन ॥३॥] 'पढमसमयनियंठे उद्देशः५ अभयदेवी- इत्यादि, उपशान्तमोहाद्धायाः क्षीणमोहच्छमस्थाद्धायाश्चान्तर्मुहर्सप्रमाणायाः प्रथमसमये वर्तमानः प्रथमसमयनिर्मन्थः निगोदा या वृत्तिः२ शेषेवप्रथमसमयनिर्ग्रन्थः, एवं निम्रन्थाडायाश्चरमसमये चरमसमयनिर्मन्धः शेषेवितरः, सामान्येन तु यथासूक्ष्मेति| नामच सू पारिभाषिकी सज्ञा, उक्तं चेह-"अंतमुहत्तपमाणयनिग्गंधद्धाइ पढमसमयंमि । पढमसमयंनियंठो अन्नेसु अपढमसमओ | ॥८९२|| सो॥१॥ एमेव तयद्धाए चरिमे समयंमि चरमसमओ सो। सेसेसु पुण अचरमो सामनेणं तु अहसुहमो ॥२॥ उद्देशः६ [अन्तर्मुहुर्तप्रमाणनिम्रन्थाद्धायाः प्रथमसमये प्रथमसमयनिर्ग्रन्थः अन्येष्वप्रथमसमयः सः॥१॥ एवमेव तदद्धायाश्चर सू७५१ मसमये चरमसमयः यः शेषेषु स पुनरचरमः सामान्येन तु यथासूक्ष्मः ॥२॥]"अच्छवी'त्यादि, 'अच्छवी'त्ति अव्यथक इत्येके, छवियोगाच्छवि:-शरीरं तद्योगनिरोधेन यस्य नास्त्यसावच्छविक इत्यन्ये, क्षपा-सखेदो व्यापारस्तस्या अस्ति| त्वात्क्षपी तनिषेधादक्षपीत्यन्ये, धातिचतुष्टयक्षपणानन्तरं वा तत्क्षपणाभावादक्षपीत्युच्यते १ 'अशबलः' एकान्तविशु-II चरणोऽतिचारपङ्काभावात् २ 'अकाशः' विगतघातिका ३ 'संशद्धज्ञानदर्शनधर' केवलज्ञानदर्शनधारीति चतुर्थः अर्हन जिनः केवलीत्येकार्थ शब्दत्रयं चतुर्थस्नातकभेदार्थाभिधायकम् ४ 'अपरिश्रावी' परिश्रवति-आश्रवति ८९२॥ कर्म बनातीत्येवंशीलः परिश्रावी तन्निषेधादपरिश्रावी-अवन्धको निरुद्धयोग इत्यर्थः, अयं च पञ्चमः स्नातकभेदा, उत्तराध्ययनेषु स्वईन जिनः केवलीत्ययं पञ्चमो भेद उक्का, अपरिश्रावीति तु नाधीतमेव, इह चावस्थाभेदेन भेदो न दीप अनुक्रम [८९८-- -९०१] weredturary.com | निर्यन्थः, तस्य स्वरुपम, भेदा: इत्यादि विविध-विषय-वक्तव्यता ~200 Page #201 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (०५) [भाग-११]"भगवती"-अंगसूत्र-५ (मूलं+वृत्ति:) शतक [२५], वर्ग [-], अंतर्-शतक [-], उद्देशक [६], मूलं [७५१] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र- [०५], अंगसूत्र- [०५] "भगवती मूलं एवं अभयदेवसूरि-रचिता वृत्ति: प्रत सूत्रांक [७५१] गाथा: दि केनचिद्धत्तिकृतेहान्यत्र च ग्रन्थे व्याख्यातस्तत्र चैवं संभावयामः-शब्दनयापेक्षयैतेषां भेदो भावनीयः शक्रपुरन्दरादिवदिति, प्रज्ञापनेति गतम् ॥ अथ वेदद्वारे-'नो अवेयए होज्जत्ति पुलाकबकुशप्रतिसेवाकुशीलानामुपशमक्षपकश्रेण्योरभावात् || 8 'नो इस्थिवेयए'त्ति स्त्रियाः पुलाकलब्धेरभावात् 'पुरिसनपुंसगवेयए'त्ति पुरुषः सन् यो नपुंसकवेदको वर्द्धितकत्वादिभावेन भवत्यसौ पुरुषनपुंसकवेदकः न स्वरूपेण नपुंसकवेदक इतियावत् । 'कसायकुसीले ण'मित्यादि, 'उवसंतवेदए वा होजा खीणवेयए वा होज'त्ति सूक्ष्मसम्परायगुणस्थानकं यावत् कषायकुशीलो भवति, सच प्रमत्ताप्रमत्तापूर्व18 करणेषु सवेदः अनिवृत्तिबादरे तूपशान्तेषु क्षीणेषु वा वेदेष्ववेदः स्यात् सूक्ष्मसम्पराये चेति, 'नियंठे ण' मित्यादी दिउवसंतवेयए वा होजा खीणवेयए वा होज'त्ति श्रेणिद्वये निर्ग्रन्थत्वभावादिति । 'सिणाए ण' मित्यादौ 'नो उवसंतवेयए होजा खीणवेयए होज'त्ति क्षपकनेण्यामेव स्नातकत्वभावादिति ॥ रागद्वारे पुलाए णं भंते । किं सरागे होजा वीयरागे होला ?, गोयमा! सरागे होजा णो वीयरागे होवा, एवं| हजाच कसायकुसीले । णियंठे णं भंते । किं सरागे होजा? पुच्छा, गोयमा ! णो सरागे होजा वीपरागे l होजा, जह वीपरागे होजा किं उवसंतकसायवीयरागे होजा खीणकसायवीयरागे वा होजा, गोयमा! उवसंतकसायवीयरागेवा होजाखीणकसायवीयरागे वाहोजा, सिणाए एवं चेव, नवरंणो अवसंतकसायवीय-31 रागे होजा खीणकसायवीयरागे होज्जा ३ ॥ (सूत्रं ७५२) पुलाए णं भंते। किं ठियकप्पे होजा अद्वियकप्पे होना ? गोयमा ! ठियकप्पे वा होज्जा अडियकप्पे वा होजा, एवं जाव सिणाए। पुलाए गंभंते किं जिणकप्पे | दीप अनुक्रम [८९८-- -९०१] CARSA wirectorarycom | निर्ग्रन्थः, तस्य स्वरुपम, भेदा: इत्यादि विविध-विषय-वक्तव्यता ~ 2014 Page #202 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (०५) [भाग-११]"भगवती"-अंगसूत्र-५ (मूलं+वृत्ति:) शतक [२५], वर्ग [-], अंतर्-शतक [-1, उद्देशक [६], मूलं [७५२-७५५] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र- [०५], अंगसूत्र- [०५] "भगवती मूलं एवं अभयदेवसूरि-रचिता वृत्ति: प्रत सूत्रांक [७५२-७५५] ॥८९३॥ व्याख्या- होजा धेरकप्पे होजा कप्पातीते होजा?, गोयमा! नो जिणकप्पे होजा थेरकप्पे होजा णो कप्पातीते || २५ शतके प्रज्ञप्तिःहोजा । बउसे णं पुच्छा, गोयमा! जिणकप्पे वा होजा धेरकप्पे वा होज्जा नो कप्पातीते होजा, एवं पहि- उद्देशः अभयदेवी-8 सेवणाकुसीलेवि । कसायकुसीले गं पुच्छा, गोयमा ! जिणकप्पे वा होज्जा घेरकप्पे होजा कप्पातीते वा रागादिकया वृत्तिा होजा । नियंठे णं पुच्छा, गोयमानो जिणकप्पे होजा नो घेरकप्पे होजा कप्पातीते होज्जा, एवं सिणाएवि ल्पा:सयंमाः प्रतिसेवासू [४॥ (सूत्रं ७५३) पुलाए णं भंते ! किं सामाइयसंजमे होजा छेओवट्ठावणियसंजमे होजा परिहारविसुद्धि ७५२-७५५ यसंजमे होज्जा सुहमसंपरागसंजमे होज्जा अहक्खायसंजमे होजा?, गोयमा ! सामाइयसंजमे वा होजा छेओवट्ठावणियसंजमे वा होजा णो परिहारविसुद्धियसंजमे होला णो सुहुमसंपरागे होजा णो अहक्खाय|संजमे होजा, एवं बउसेवि, एवं पडिसेवणाकुसीले वि, कसायकुसीले णं पुच्छा, गोपमा ! सामाइयसंजमे वा होजा जाव सुहुमसंपरागसंजमे वा होजा णो अहक्खायसंजमे होजा। नियंठे णं पुच्छा, गोयमा ! णो सामाइयसंजमे होजा जाव णो मुहमसंपरागसंजमे हो. अहक्खायसं० होजा, एवं सिणाएचि ५॥(सर्व ७५४) पुलाए णं भंते ! किं पडिसेवए होजा अपडिसेवए होजा, गोयमा! पडिसेवए होजा णो अपडिसेवए हो ज्जा, जइ पडिसेवए होना किं मूलगुणपडिसेवए होज्जा उत्तरगुणपडिसेवए होजा!, गोयमा ! मूलगुणपडिहा संवए वा होजा उत्तरगुणपडिसेवए वा होजा, मूलगुण पडिसेवमाणे पंचण्हं आसवाणं अन्नपरं पडिसेवेजा, उत्त-I||८९३॥ रगुण पडिसेवमाणे दसविहस्स पच्चक्खाणस्स अन्नयरं पडिसेवेजा। बउसे णं पुच्च्छा , गोयमा! पडिसेवए हो दीप अनुक्रम [९०२ SCORE -९०५] | निर्ग्रन्थः, तस्य स्वरुपम, भेदा: इत्यादि विविध-विषय-वक्तव्यता ~202 Page #203 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (०५) [भाग-११]"भगवती"-अंगसूत्र-५ (मूलं+वृत्ति:) शतक [२५], वर्ग [-], अंतर्-शतक [-1, उद्देशक [६], मूलं [७५२-७५५] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र- [०५], अंगसूत्र- [०५] "भगवती मूलं एवं अभयदेवसूरि-रचिता वृत्ति: S प्रत सूत्रांक [७५२-७५५] TOGGLOGSPCLCOCKos जा णो अपडिसेवए होजा, जइ पडिसेवए होज्जा किं मूलगुणपडिसेवए होज्जा उत्तरगुणपडिसेवए वा होजा?, गोयमा ! णो मूलगुणपडिसेवए होजा उत्तरगुणपडिसेवए होज्जा, उत्तरगुण पडिसेवमाणे दसविहस्स पञ्चक्खाणस्स अन्नयरं पडिसेचेजा, पडिसेवणाकुसीले जहा पुलाए । कसायकुसीले णं पुच्छा, गोयमा! णो |पडिसेवए होजा अपडिसेवए होज्जा, एवं निग्गंथेवि, एवं सिणाएवि ६॥ (सूत्रं ७५५) 'पुलाए णं भंते ! सिरागे'त्ति सरागः-सकषायः॥ कल्पद्वारे-'पुलाए णमित्यादि 'पुलाए णं भंते ! किं ठिय-/४ कप्पे'त्यादि, आचेलक्यादिषु दशसु पर्दषु प्रथमपश्चिमतीर्थङ्करसाधवः स्थिता एव अवश्यं तत्पालनादिति तेषां स्थितिकपस्तत्र वा पुलाको भवेत् , मध्यमतीर्थहरसाधवस्तु तेषु स्थिताश्चास्थिताश्चेत्यस्थितकल्पस्तेषां तत्र या पुलाको भवेत् । एवं सर्वेऽपि, अथवा कल्पो जिनकल्पः स्थविरकल्पश्चेति द्विधेति तमाश्रित्याह-'पुलाए णं भंते ! किं जिणकप्पे द इत्यादि, 'कप्पातीते'त्ति जिनकल्पस्थविरकल्पाभ्यामन्यत्र । 'कसायकुसीले णमित्यादी 'कप्पातीते था होज'ति कल्पातीते या कपायकुशीलो भवेत, कल्पातीतस्य छद्मस्थस्य तीर्थकरस्य सकपायित्वादिति । 'नियंठे ण'मित्यादौ || 2 | 'कप्पातीते होज्जत्ति निर्ग्रन्थः कल्पातीत एव भवेद् , यतस्तस्य जिनकल्पस्थविरकल्पधा न सन्तीति । चारित्रद्वारं व्यक्तमेष ॥ प्रतिसेवनाद्वारे च-'पुलाए ण' मित्यादि, 'पडिसेवए'त्ति संयमप्रतिकूलार्धस्य सम्बलनकपायोदयासेवकः प्रतिसेवकः संयमविराधक इत्यर्थः 'मलगुणपडिसेवए'त्ति मूलगुणाः-प्राणातिपातविरमणादयस्तेषां प्रातिकूल्येन | सेवको मूलगुणप्रतिसेवका, एवमुत्तरगुणप्रतिसेवकोऽपि नवरमुत्तरगुणा-दशविधप्रत्याख्यानरूपाः, 'दसविहस्स पञ्चक्खा MARANA-%82-%2 दीप अनुक्रम [९०२ -९०५] निर्ग्रन्थः, तस्य स्वरुपम, भेदा: इत्यादि विविध-विषय-वक्तव्यता ~203 Page #204 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (०५) [भाग-११]"भगवती"-अंगसूत्र-५ (मूलं+वृत्ति:) शतक [२५], वर्ग [-], अंतर्-शतक [-1, उद्देशक [६], मूलं [७५२-७५५] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र- [०५], अंगसूत्र- [०५] "भगवती मूलं एवं अभयदेवसूरि-रचिता वृत्ति: प्रत सूत्रांक [७५२-७५५] SAR व्याख्या- णस्स'त्ति तत्र दशविधं प्रत्याख्यानं 'अनागतमइकत कोडीसहिय'मित्यादि प्राग्व्याख्यातस्वरूपम् , अधवा 'नवकारपोरि-1 २५ शतके प्रज्ञप्तिः सीए' इत्याद्यावश्यकप्रसिद्धम् 'अन्नयरं पडिसेवेज'त्ति एकतरं प्रत्याख्यानं विराधयेत् , उपलक्षणत्वाचास्य पिण्डवि- उद्देशः ६ अभयदेवी| शुद्धयादिविराधकत्वमपि संभाव्यत इति ६॥ ज्ञानद्वारे ज्ञानश्रुतेसू या वृत्तिः२ G७५६-७५७ पुलाए णं भंते ! कतिसु नाणेसु होजा?, गोयमा ! दोसु वा तिसुवा होजा, दोसु होजमाणे दोसु ॥८९४॥ आभिणियोहियनाणे सुअनाणे होजा तिसु होमाणे तिसु आभिणियोहियनाणे सुयनाणे ओहिनाणे होजा, एवं बउसेवि, एवं पडिसेवणाकुसीलेवि, कसायकुसीले णं पुच्छा, गोयमा! दोसु वा तिसु वा चउसु वा होजा, दोसु होमाणे दोसु आभिणियोहियनाणे सुयनाणे होजा, तिसु होमाणे तिसु आभिणियोहियनाण४ सुयनाणओहिनाणेसु होजा अहवा तिसु होमाणे आभिणिबोहियनाणसुयनाणमणपज्जवनाणेसु होजा, चउ-15 सु होजमाणे चउसु आभिणियोहियनाणसुयनाणओहिनाणमणपनवनाणेसु होजा, एवं नियंठेवि । सिणाएणं पुच्छा, गोपमा! एगंमि केवलनाणे होजा ॥ (सूत्रं ७५६) पुलाए थभंते ! केवतियं सुयं अहिजेजा. ४ गोयमा ! जहन्नेणं नवमस्स पुवस्स ततियं आयारवत्थु, उक्कोसेणं नव पुवाई अहिज्जेज्जा । पउसे पुच्छा, गोयमा। जहनेणं अट्ठ पवयणमायाओ उकोसेणं दस पुवाई अहिज्जेज्जा । एवं पडिसेवणाकुसीलेवि । कसायकु G८९४॥ सीले पुच्छा, गोयमा ! जहन्नेणं अट्ठ पवयणमापाओ उक्कोसेणं चोइस पुबाई अहिजेजा, एवं नियंठेवि। सि-12 दणाए पुच्छा, गोयमा! सुयवतिरित्ते होजा ७॥ (सूत्रं ७५७) दीप अनुक्रम F4545453 [९०२ -९०५] SARERatininemarana | निर्यन्थः, तस्य स्वरुपम, भेदा: इत्यादि विविध-विषय-वक्तव्यता ~204 Page #205 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (०५) [भाग-११]"भगवती"-अंगसूत्र-५ (मूलं+वृत्ति:) शतक [२५], वर्ग [-], अंतर्-शतक [-], उद्देशक [६], मूलं [७५६-७५७] मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित.........आगमसूत्र - [०५], अंग सूत्र - [०५] "भगवती" मूलं एवं • अभयदेवसूरि-रचित वृत्ति: प्रत सूत्रांक R [७५६-७५७] IPL भाभिनिचोधिकादिज्ञानप्रस्तावात् ज्ञानविशेषभूतं श्रुतं विशेषेण चिन्तयन्नाह-'पुलाए णं भंते ! केवइयं सुय' मित्यादि, 'जहन्नेणं अट्ठपवयणमायाओ'त्ति अष्टप्रवचनमातृपालनरूपत्वाचारित्रस्य तद्वतोऽष्टप्रवचनमातृपरिज्ञानेनावश्य दभाव्य, ज्ञानपूर्वकत्वाचारित्रस्य, तत्परिज्ञानं च श्रुतादतोऽष्टप्रवचनमातृप्रतिपादनपरं श्रुतं बकुशस्य जपन्यतोऽपि भवतीति, तच्च 'अट्ठण्हं पवयणमाईणं' इत्यस्य यद् विवरणसूत्र तत्संभाव्यते, यत्पुनरुत्तराध्ययनेषु प्रवचनमातृनामकमध्ययनं तद्गुरुत्वाद्विशिष्टतर श्रुतत्वाचन जघन्यतः संभवतीति, बाहुल्याश्रयं चेदं श्रुतप्रमाणं तेन न माषतुपादिना व्यभिचार इति ॥ तीर्थद्वारे पुलाए णं भंते । किं तित्थे होजा अतित्थे होजा, गोयमा ! तित्थे होजा णो अतित्थे होजा, एवं बउसेवि, एवं पडिसेवणाकुसीलेवि । कसायकुसीले पुच्छा, गोयमा! तित्थे वा होज्जा अतित्थे वा होजा, जइ अतित्थे होजा किं तित्थयरे होजा पसेयबुद्धे होला ?, गोयमा ! तित्थगरे वा होजा पत्तेयबुद्धे वा होजा, एवं नियंठेवि, एवं सिणाएवि ८॥(सूत्र ७५८) पुलाए णं भंते ! किं सलिंगे होजा अन्नलिंगे होजा गिहिलिंगे होजा ?, गोयमा ! दवलिंगं पडुच सलिंगे वा होज्जा अन्नलिंगे चा होजा गिहिलिंगे चा होजा, भावलिंग पडुश्च नियमा सलिंगे होज्जा एवं जाव सिणाए ९॥ (सूत्रं ७५९) पुलाए णं भंते ! कइसु सरीरेसु होजा?, गोयमा ! तिसु ओरालियतेयाकम्मएम होजा, बउसे णं भंते ! पुच्छा, गोयमा ! तिमु वा चउस वा होज्जा, तिसु होमाणे तिसु ओरालियतेयाकम्मएम होजा, चउसु होमाणे चउसु ओरालियवेउधियतेया %AASANA - 5 दीप अनुक्रम [९०६-९०७] 2- | निर्ग्रन्थः, तस्य स्वरुपम, भेदा: इत्यादि विविध-विषय-वक्तव्यता ~205 Page #206 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (०५) [भाग-११]"भगवती"-अंगसूत्र-५ (मूलं+वृत्ति:) शतक [२५], वर्ग [-], अंतर्-शतक [-], उद्देशक [६], मूलं [७५८-७६१] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र- [०५], अंगसूत्र- [०५] "भगवती मूलं एवं अभयदेवसूरि-रचिता वृत्ति: 5 | २५ शतक प्रत उद्देशः६ %- सूत्रांक - [७५८-७६१] व्याख्या कम्मएसु होजा, एवं पडिसेवणाकुसीलेवि । कसायकुसीले पुच्छा, गोयमा ! तिमु वा चउसु वा पंचसु वा प्रज्ञप्तिः अभयदेवी-द होजा, तिसु होजमाणे तिसु ओरालियतयाकम्मएस होज्जा, चउसु होमाणे चउसु ओरालियचेउवियतेयाकम्मएसु होज्या पंचसु होमाणे पंचसु ओरालियवेउवियआहारगतेयाकम्मएसु होजा, णियंठे सिणाओय पुलाकादेया वृत्तिः स्तीर्थलिंगजहा पुलाओ॥१०॥ (सूत्रं ७६०) पुलाए णं भंते ! किं कम्मभूमीए होना अकम्मभूमीए होजा, शरीरभूम॥८९५॥ गोयमा ! जम्मणसंतिभावं पडुच कम्मभूमीए होला जो अकम्मभूमीए होजा, बउसे णं पुच्छा, गोयमा ! यः सू जम्मणसंतिभावं पड्डुच्च कम्मभूमीए होजा जो अकम्भूमीए होजा, साहरणं पहुच्च कम्मभूमीए वा होजा ||७५८-७६१ [अकम्मभूमीए वा होजा, एवं जाव सिणाए ॥११ ।। (सूत्रं ७६१) 'तित्थेति सङ्के सति, 'कसायकुसीले 'त्यादि कषायकुशीलश्छद्मस्थावस्थायां तीर्थकरोऽपि स्यादतस्तदपेक्षया तीर्थअवच्छेदे च तदन्योऽप्यसौ स्यादिति तदन्यापेक्षया च "अतित्थे वा होज्ने'त्युच्यते, अत एवाह-जइ अतित्थे होवा किं तित्थयरे होज्जेत्यादि । लिङ्गद्वारे लिहं द्विधा-द्रव्यभावभेदात् , तत्र च भावलिङ्ग-ज्ञानादि, एतच्च वलि-131 | अमेव, ज्ञानादिभावस्याहतानामेव भावात् , द्रव्यलिङ्गंतु देधा-स्वलिङ्गपरलिङ्गभेदात्, तत्र स्वलित-रजोहरणादि, पर-14। लिङ्गं च द्विधा कुतीर्थिकलिन गृहस्थरिङ्गं चेत्यत आह-'पुलाए णं भंते । किं सलिंगे'त्यादि । त्रिविधलिङ्गेऽपि भवेदू, द्रव्यलिझानपेक्षत्वाचरणपरिणामस्येति ॥ शरीरद्वार व्यका क्षेत्रद्वारे-'पुलाए णं भंते ! किं कम्मभूमीए'18|| इत्यादि, 'जम्मणसंतिभावं पञ्चति जन्म-स्वादः सझावच-विवक्षितक्षेत्रादन्यत्र तत्र वा जातस्य तत्र चरणभावेना MAGACASNA दीप अनुक्रम [९०८-९११] RELIGunintentATHREE निर्ग्रन्थः, तस्य स्वरुपम, भेदा: इत्यादि विविध-विषय-वक्तव्यता ~206~ Page #207 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (०५) [भाग-११]"भगवती"-अंगसूत्र-५ (मूलं+वृत्ति:) शतक [२५], वर्ग [-], अंतर्-शतक [-], उद्देशक [६], मूलं [७५८-७६१] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र- [०५], अंगसूत्र- [०५] "भगवती मूलं एवं अभयदेवसूरि-रचिता वृत्ति: JAN प्रत सूत्रांक [७५८-७६१] सित्यमेव तपोश्च समाहारद्वन्द्वोऽतस्तस्पतीत्य पुलाकः कर्मभूमौ भवेत् , तब जायते विहरति च तत्रैवेत्यर्थः, अकर्मभूमौ पुमरसौ न जायते तजातस्य चारित्राभावात्, न च तत्र वर्तते, पुलाकलब्धौ वर्तमानस्य देवादिभिः संह मशक्यत्वात् ।। बकुशसूत्रे 'नो अकम्मभूमीए होजत्ति अकर्मभूमौ बकुझो न जन्मतो भवति स्वकृतविहारतश्च, परकृतविहारतस्तु| Pil कर्मभूम्यामकर्मभूम्यां च संभवतीत्येतदेवाह साहरणं पडुचे'त्यादि, इह च संहरण-क्षेत्रान्तरात् क्षेत्रान्तरे देवादिभिर्मयनम् ॥ कालद्वारे पुलाए णं भंते । किं ओसप्पिणिकाले होजा उस्सपिणिकाले हो० णोओसप्पिणिणोउस्सप्पिणिकाले वा होजा?, गोयमा ! ओसप्पिणिकाले वा होज्जा उस्सप्पिणिकाले वा होजा नोउस्सप्पिणिनोओसप्पिणिकाले वा होजा, जह ओसप्पिणिकाले होजा किं सुसमसुसमाकाले होज्जा १ सुसमाकाले होजा २ सुसमद्समाकाले होला ३ दूसमसुसमाकाले होला ४ दूसमाकाले होजा ५ दूसमदूसमाकाले होजा ६१, गो० जमणं पहुच णो सुसमसुसमाकाले होला १णो सुसमाकाले होजा २ सुसमदूसमाकाले होजा ३ दूसमसुस माकाले वा होजा ४ णो दूसमाकाले होजाणो दूसमदूसमाकाले होजा ६, संतिभावं पडुच णो सुसमसुस पदमाकाले होजा णो सुसमाकाले होजा मुसमदूसमाकाले वाहोजा दूसमसुसमाकाले वा होजा इसमाकाले था|3|| होजा णो दूसमदूसमाकाले होजा, जह उस्सपिणिकाले होजा किं दूसमदूसमाकाले होला दूसमाकाले होजा दूसमसुसमाकाले होजा सुसमसमाकाले होजा सुसमाकाले होला सुसमसुसमाकाले होला, दीप अनुक्रम [९०८-९११] | निर्ग्रन्थः, तस्य स्वरुपम, भेदा: इत्यादि विविध-विषय-वक्तव्यता ~207~ Page #208 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (०५) [भाग-११]"भगवती"-अंगसूत्र-५ (मूलं+वृत्ति:) शतक [२५], वर्ग -], अंतर्-शतक [-], उद्देशक [६], मूलं [७६२] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र- [०५], अंगसूत्र- [०५] "भगवती मूलं एवं अभयदेवसूरि-रचिता वृत्ति: व्याख्या-3 प्रत सूत्रांक [७६२] || गोजमणं पडच णो दूसमसमाकाले होजा १ दसमाकाले वा होजा २ दसमसुसमाकाले वा होजासुस-टि२५ शतक प्रज्ञप्तिः मदूसमाकाले चा होजा ४ णो सुसमाकाले होज्जा ५ णो सुसमसुसमाकाले होजा ६, संतिभावं पडच णो- उद्देशः६ अभयदेवी- दूसमदूसमाकाले होज्जा १ दूसमाकाले होज्जा २दूसमसुसमाकाले वा होज्जा ३ सुसमदूसमाकाले या होज्जा ४४ पुलाकादे या वृत्तिःणो सुसमाकाले होज्जा ५ णो सुसमसुसमाकाले होजा ६ । जइ णोउस्सप्पिणिनोअवसप्पिणिकाले होजाल कालः सू ७६२ ॥८९६॥ किं सुसमसुसमापलिभागे हो सुसमपलिभागे सुसमदूसमापलिभागे हो दूसमसुसमापलिभागे?, गोयमा! जमणं संतिभावं च पडच णो सुसमसुसमापलिभागे होजा णो सुसमपलिभागेकणो दूसमसमापलिभागे होजा दूसमसुसमापलिभागे हो। बउसे णं पुच्छा, गोयमा ! ओसप्पिणिकाले वा होजा उस्सप्पिणिकाले वा हो० नोओसप्पिणिनोउस्सप्पिणिकाले वा होजा, जइ ओसप्पिणिकाले हो. किं सुसमसुसमाकाले पुच्छण, गोयमा! जमणं संतिभावं च पहुच णो सुसममुसमाकाले होजा णो सुसमाकाले होजा सुसमदूसमाकाले वा होजा दूसमसुसमाकाले वा होजा दूसमाकाले वा हो. णो दूसमसमाकाले हो, साहरणं पलुच अन्नयरे समाकाले होना । जइ उस्सप्पिणिकाले होजा किं दूसमदूसमाकाले हो०६१ पुच्छा, गोयमा ! जम्मणं पडचणो दसमदसमाकाले होजा जहेव पुलाए, संतिभावं पहुच णो दूसमदूसमाकाले | होजा णो दूसमाकाले होजा एवं संतिभावेणवि जहा पुलाए जाव णो सुसमसुसमाकाले हो०, साहरणं ट्र! ॥८९६॥ पडच अन्नपरे समाकाले हो । जइ नोओसप्पिणिनोउस्सप्पिणिकाले हो ? पुच्छा, गोपमा ! जम्मणसं SACADEMOCRACCAN दीप अनुक्रम [९१२] निर्ग्रन्थः, तस्य स्वरुपम, भेदा: इत्यादि विविध-विषय-वक्तव्यता ~208~ Page #209 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (०५) [भाग-११]"भगवती"-अंगसूत्र-५ (मूलं+वृत्ति:) शतक [२५], वर्ग [-], अंतर्-शतक [-], उद्देशक [६], मूलं [७६२] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र- [०५], अंगसूत्र- [०५] "भगवती मूलं एवं अभयदेवसूरि-रचिता वृत्ति: A * प्रत सूत्रांक [७६२] REER ला ४|तिभावं पट्टच णो सुसमसुसमापलिभागे होजा जहेब पुलाए जाव दूसमसुसमापलिभागे हो, साहरणं दोपडुच अन्नयरे पलिभागे होजा, जहा बउसे एवं पडिसेवणाकुसीलेवि, एवं कसायकुसीलेवि, नियंठो सिणा*ओ य जहा पुलाओ, नवरं एतेसिं अभहियं साहरणं भाणियचं, सेसं तं चेव १२॥ (सूत्र ७६२) त्रिविधः कालोऽवसर्पिण्यादिः, तत्राद्यद्वयं भरतैरावतयोस्तृतीयस्तु महाविदेहहेमवतादिषु, 'सुसमदूसमाकाले वा होजति आदिदेवकाले इत्यर्थः, 'दुस्समसुसमकाले वत्ति चतुर्थेऽरके इत्यर्थः, उक्कात्समाद्वयानान्यत्रासी जायते, 'संतिMभावं पडुचेत्यादि, अवसर्पिण्यां सभा प्रतीत्य तृतीयचतुर्थपञ्चमारकेषु भवेत् , तत्र चतुर्थारके जातः सन् पयमेऽपि वर्तते, तृतीयचतुर्थारके सद्भावस्तु तजन्मपूर्वक इति, 'जइ उस्सप्पिणी'त्यादि, उत्सर्पिण्यां द्वितीयतृतीयचतुर्थेष्वरकेए । जन्मतो भवति, तन्त्र द्वितीयस्थान्ते जायते तृतीये तु चरणं प्रतिपद्यते, तृतीयचतुर्थयोस्तु जायते चरणं च प्रतिपचत इति, सद्भावं पुनः प्रतीत्य तृतीयचतुर्थयोरेव तस्य सत्ता, तयोरेव चरणप्रतिपत्तेरिति, 'जइ णोओसप्पिणी'त्यादि, 'सुसमपलिभागे'त्ति सुषमसुपमाया: प्रतिभागः-सादृश्यं यत्र काले स तथा, स च देवकुरूत्तरकुरुषु, एवं सुषमाप्रतिभागो हरिवर्षरम्यकवर्षेषु, सुषमदुष्षमाप्रतिभागो हैमवतैरण्यवतेषु, दुष्षमसुषमाप्रतिभागो महाविदेहेषु । 'नियंठो सिणाओ य Iजहा पुलाओ'त्ति एतौ पुलाकवद्वक्तव्यो, विशेष पुनराह-'नवरं एएसिं अन्भहियं साहरणं भाणिय'ति पुलाकस्य हि पूर्वोक्तयुक्त्या संहरणं नास्ति एतयोश्च तत्संभवतीति कृत्वा तद्वाच्यं, संहरणद्वारेण च यस्तयोः सर्वकालेषु सम्भवोऽसौ ६ पूर्वसंहतयोनिम्रन्थस्नातकत्वमाची द्रष्टव्यो, यतो नापगतवेदानां संहरणमस्तीति, यदाह-"समणीमवगयवेयं परिहारपुलाय दीप अनुक्रम [९१२] AAA | निर्ग्रन्थः, तस्य स्वरुपम, भेदा: इत्यादि विविध-विषय-वक्तव्यता ~209 Page #210 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (०५) [भाग-११]"भगवती"-अंगसूत्र-५ (मूलं+वृत्ति:) शतक [२५], वर्ग -], अंतर्-शतक [-], उद्देशक [६], मूलं [७६२] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र- [०५], अंगसूत्र- [०५] "भगवती मूलं एवं अभयदेवसूरि-रचिता वृत्ति: प्रत सूत्रांक [७६२] रासू७६३ दीप अनुक्रम [९१२] व्याख्या-18 मप्पमतं च घोसपुषि आहारवं च णब कोई संहरह॥१॥" [श्रममीमपमतवेदं परिहारं पुलाकमप्रम चाचतु- २५ शतके प्रज्ञप्तिः दशपूर्विगमाहारकंचन कोऽपि संहरति ॥१॥] इति ॥ गतिद्वारे सौधर्मादिका देवगतिरिन्द्रादयस्त दास्तायुचा उद्देशः६ अभयदेवीपुलाकादीनां निरूप्यते पुलाकादेया वृत्तिः३ द्र गतिः पुलाए णं भंते ! कालगए समाणे किं मतिं गच्छति ?, मोयमा ! देवगतिं गच्छति, देवगतिं गच्छमाणे किं ॥८९७॥1G भवणवासीसु उववज्जेजा वाणमंतरेसु उबवजेता जोइसवेमाणिएसु उववजेजा, गोयमा ! पो भवणा-13 सीसु णो वाणणो जोइस०वेमाणिएसु उवव०, बेमाणिएसु उववजमाणे जह सोहम्मे कप्पे उकोसेणं सह-16 स्सारे कप्पे उववजेजा, पउसे णं एवं चेच नवरं उक्कोसेणं अच्छुए कप्पे, पडिसेषणाकुसीले जहा बउसे, कसा-म यकुसीले जहा पुलाए, नवरं उक्कोसेणं अनुत्तरविमाणेसु उचवजेजा, णियंठे भंते ! एवं चेष, पर्व जाच वेमाणिएसु उववजमाणे अजहन्नमणुक्कोसेणं अणुत्तरविमाणेसु उक्वजेजा, सिणाए णं भंते ! काठगए समाये किं गर्ति गच्छा, गोपमा ! सिद्धिगतिं गच्छह । पुलाए भंते ! देवेसु उबवजमाणे किं इंदत्तपत समयोजा सामाणियत्साए उववजेता सायप्तीसाए वा उववजेजा लोगपालसाए वा उवधजेला महमिंदत्ताए वा एक I| बज्जेजा, गोयमा ! अविराहणं पहुच इंदत्साए स्वच० सामाणियत्साए प्रयवजेजा लोणपालत्ताए या उववाद ॥८९७॥ जातायत्तीसाए वा षषजेसा नो अहमिंदसाए अवजेचा, विराहणं पडुब अन्नपरेसु उपवज्जेजा, एवं परसेवि,121 एवं पडिसेषणाकुसीलेवि, कसायकुसीले पुच्छा, गोपमा ! अधिराहणं पहुच इंदशाए वा ज्वचनेज्या जाव181 | निर्ग्रन्थः, तस्य स्वरुपम, भेदा: इत्यादि विविध-विषय-वक्तव्यता ~210~ Page #211 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (०५) [भाग-११]"भगवती"-अंगसूत्र-५ (मूलं+वृत्ति:) शतक [२५], वर्ग [-], अंतर्-शतक [-], उद्देशक [६], मूलं [७६३] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र- [०५], अंगसूत्र- [०५] "भगवती मूलं एवं अभयदेवसूरि-रचिता वृत्ति: -% प्रत सूत्रांक [७६३] दीप अनुक्रम [९१३] अहमिंदत्साए सपथ घिराहणं पहुच जलयरेसु उपच०, नियंठे पुच्छा, गोयमा अधिराहणं पहुच णो इंदसार उचय आव जो लोगपालत्ताए अथव० अहमिंदत्साए उपव०, चिराहणं पडुच अन्नयरेसु उवव०॥ पुलायरस णं भंते ! देवलोगेसु जववजमाणस्स केवतियं कालं ठिती प.१, गोयमा जहनेणं पलिओधमपुरतं अक्कोसे. अट्ठारस सागरोषमाई, बउसस्स पुच्छा, गोयमा ! जहनेणं पलिओवमपुहुतं उक्कोसेणं बावीसं सागरोवमाई, एवं पडिसेवणाकुसीलेवि, कसायकुसीलस्स पुच्छा, गोयमा! जहन्नेणं पलिओवमपुरतं उकोसेणं तेसीसं है। सागरोवमाई, णियंठस्स पुच्छा, गोयमा ! अजहन्नमणुक्कोसेणं तेत्तीसं सागरोचमाई १३ ॥ (सूत्र ७६३) तत्र च 'अविराहणं पहुंच'त्ति अविराधना ज्ञानादीनां अथवा लग्धेरनुपजीपनाऽतस्तां प्रतीत्य अविराधकाः सन्त इत्यर्थः, 'अन्नयरेसु उपवजेज'त्ति भवनपत्यादीनामन्यतरेषु देवेषूत्पद्यन्ते, विराधितसंयमानां भवमपत्याधुत्पादस्योक्त | खात्, यच्च प्रागुतं 'वेमाणिएसु उववजेज'त्ति तत्संयमाविराधकत्वमाश्रित्याषसेयम् ॥ संयमद्वारे संबमस्थानामि तेषां रिचाल्पत्वादि चिन्त्यते, तत्र पुलागस्स णं भंते ! केवतिया संयमद्वाणा प०१, गो! असंखेजा संयमट्ठाणा प०, एवं जाव कसायकुसीलस्स । नियंठस्स णं भंते ! केवड्या संजमठ्ठाणा प०, गोयमा! एगे अजहन्नमणुकोसए संजमट्ठाणे, |एवं सिणायस्सवि, एतेसि णं भंते ! पुलागवउसपडिसेवणाकसायकुसीलनियंठसिणायाणं संजमट्ठाणाणं | कयरे २ जाब विसेसाहिया चा?, गोयमा ! सबथोवे नियंठस्स सिणायस्स [अन्थानम् १४०००]य एगे अज CERCESSARS SAREaratunintamanna | निर्यन्थः, तस्य स्वरुपम, भेदा: इत्यादि विविध-विषय-वक्तव्यता ~211 Page #212 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (०५) [भाग-११]"भगवती"-अंगसूत्र-५ (मूलं+वृत्ति:) शतक [२५], वर्ग [-], अंतर्-शतक [-], उद्देशक [६], मूलं [७६४] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र- [०५], अंगसूत्र- [०५] "भगवती मूलं एवं अभयदेवसूरि-रचिता वृत्ति: प्रत सूत्रांक [७६४] दीप अनुक्रम [९१४] व्याख्याहनमणुकोसए संजमट्ठाणे पुलागस्स णं संजमहाणा असंखेजगुणा बउसस्स संजमट्ठाणा असंखेजगुणा पडि २५ शतके प्रज्ञप्तिः सेवणाकुसीलस्स संजमट्टाणा असंखेजगुणा कसायकुसीलस्स संजमहाणा असंखेज्जगुणा १४॥ (सूत्रं ७६४) उद्देशः६ अभयदेवी- पलागस्से त्यादि, संयमा-चारित्रं तस्य स्थानानि-शुद्धिप्रकर्षाप्रकर्षकृता भेदाः संयमस्थानानि, तानि च प्रत्येक सर्वा-||४|| पुलाकादेः या वृत्तिःकाशप्रदेशाग्रगुणितसर्वाकाशप्रदेशपरिमाणपर्यवोपेतानि भवन्ति, तानि च पुलाकस्यासोयानि भवन्ति, विचित्रत्वाचारि- संयमस्था नानि सू ॥८९८॥ त्रमोहनीयक्षयोपशमस्य, एवं यावत्कषायकुशीलस्थ, 'एगे अजहन्नमणुकोसए संजमठाणे'त्ति निर्ग्रन्थस्यैकं संयमस्थान ७६४ भवति, कपायाणामुपशमस्य क्षयस्य चाविचित्रत्वेन शुद्धेरेकविधत्वात्, एकत्यादेव तदजघन्योत्कृष्ट, बहुम्वेव जघन्योस्कृष्टभावसद्भावादिति ॥ अथ पुलाकादीनां परस्परतः संयमस्थानाल्पबहुत्वमाह-एएसि णमित्यादि, सर्वेभ्यः स्तोक सर्वस्तोक निर्ग्रन्थस्य स्नातकस्य च संयमस्थानं, कुतः, यस्मादेकं, किंभूतं तत् इत्याह-'अजहन्नेत्यादि, पत्तश्चैवं शुद्धेरेकविधत्वात्, पुलाकादीनां तूतक्रमेणासङ्ख्येयगुणानि तानि क्षयोपशमवैचित्र्यादिति ॥ अथ निकपद्धारं, तत्र निकर्षःसंनिकर्षः, पुलाकादीनां परस्परेण संयोजन, तस्य च प्रस्तावनार्थमाहपुलागस्स णं भंते ! केवतिया चरित्तपजचा प०१, गो! अणंता चरिसपज्जवा प०, एवं जाव सिणायस्स। ॥८९८॥ पुलाए णं भंते ! पुलागस्स सट्ठाणसन्निगासेणं चरित्तपज्जवेहिं किं हीणे तुल्ले अन्भहिए ?, गोयमा ! सिय हीणे १ सिय तुल्ले २ सिय अम्भहिए ३, जह हीणे अणंतभागहीणे वा असंखेजभागहीणे वा संखेजाइभागहीणे वा संखेजगुणहीणे वा असंखेजगुणहीणे वा अनंतगुणहीणे वा, अह अम्भहिए अर्णतभागमभहिए वा +5ASHANGA SAREaratunintimanand For P OW | निर्यन्थः, तस्य स्वरुपम, भेदा: इत्यादि विविध-विषय-वक्तव्यता ~212~ Page #213 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (०५) [भाग-११]"भगवती"-अंगसूत्र-५ (मूलं+वृत्ति:) शतक [२५], वर्ग [-], अंतर्-शतक [-1, उद्देशक [६], मूलं [७६५-७६८] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र- [०५], अंगसूत्र- [०५] "भगवती मूलं एवं अभयदेवसूरि-रचिता वृत्ति: प्रत सूत्रांक [७६५-७६८] भसंखेजहभागमभहिए वा संखेनभागमभहिए वा संखेजगुणमम्भहिए वा असंखेनगुणमम्महिए था। अर्णतगुणमन्भहिए वा ॥ पुलाए णं भंते। बउसस्स परहाणसन्निगासेणं चरितपज्जवेहि किंहीणेतुल्ले अभहिए?, MP || गोयमा! हीणे नो तुल्ले नो अन्भहिए, अणंतगुणहीणे, एवं पडिसेवणाकुसीलस्सवि, कसायकृसीलेणं सम है छट्ठाणवडिए जहेच सहाणे, नियंठस्स जहा बउसस्स, एवं सिणायस्सवि ।। बउसे भंते ! पुलागस्स परहा-द। णसन्निगासेणं चरित्तपज्जवेहि किं हीणे तुल्ले अन्भहिए ?, गोयमा । णो हीणे णो तुल्ले अन्भहिए अणंतगुणम महिए । पउसे णं भंते । बउसस्स सट्ठाणसन्निगासेणं चरित्तपज्जवेहिं पुच्छा, गोयमा ! सिय हीणे सिय तुल्ले दासिप अन्महिए, जइहीणे ण्डाणवडिए । षउसे णं भंते ! पडिसेवणाकुसीलस्स परढाणसन्निगासेणं चरित-SI पनवेहिं किं हीणे०१, छट्ठाणवडिए, एवं कसायकुसीलस्सवि ॥ बउसे णं भंते ! नियंठस्स परहाणसन्निगासेणं चरित्तपज्जवेहिं पुच्छा, गोयमाहीणे णो तल्ले णो अभहिए अणंतगुणहीणे, एवं सिणापस्सवि, पहिसेवणा-HI कुसीलस्स एवं चेव बउसवत्तवया भाणियबा, कसायकुसीलस्स एस चेव बउसवत्तवया नवरं पुलाएणवि समं छट्ठाणवडिए । णियंठे णं भंते ! पुलागस्स परहाणसन्निगासेणं चरित्तपनवेहिं पुच्छा, गोयमा! णो हीणे 1णोतुल्ले अन्भहिए अणंतगुणमम्भहिए, एवं जाव कसायकुसीलस्स।णियंठे गं भंते !णियंठस्स सट्ठाणसन्निगा-13 ह सेणं पुच्छा, गोयमा ! नो हीणे तुल्ले णो अन्भहिए, एवं सिणायस्सवि। सिणाए णं भंते ! पुलागस्स परहामाणसनिक एवं जहा नियंठस्स बत्तघया तहा सिणायस्सवि भाणियबा जाव सिणाए णं भंते! सिणायस्स HTRGAONGS+ दीप अनुक्रम [९१५ -९१८] For P OW weredturary.com | निर्यन्थः, तस्य स्वरुपम, भेदा: इत्यादि विविध-विषय-वक्तव्यता ~2134 Page #214 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (०५) [भाग-११]"भगवती"-अंगसूत्र-५ (मूलं+वृत्ति:) शतक [२५], वर्ग [-], अंतर्-शतक [-1, उद्देशक [६], मूलं [७६५-७६८] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र- [०५], अंगसूत्र- [०५] "भगवती मूलं एवं अभयदेवसूरि-रचिता वृत्ति: प्रत सूत्रांक [७६५-७६८] २५ शतके उद्देशः ६ पुलाकादेः पर्यवयोगकषायाःसू ७६५-७६७ व्याख्या सहाणसन्निगासेणं पुच्छा, गोयमा! णो हीणे तुल्ले णो अम्भहिए ॥ एएसिणं भंते ! पुलागवकुसपडिसेवणा- प्रज्ञप्तिः कुसीलकसायकुसीलनियंठसिणायाणं जहन्नुकोसगाणं धरित्तपत्रवाणं कयरे १ जाब विसेसाहिया था, गोयमा ! पुलागस्स कसायकुसीलस्स य एएसि णं जहन्नगा चरित्तपज्जया दोण्हषि तुल्ला सवत्थोषा, पुलागल्स | या वृत्तिः२ उक्कोसगा चरित्तपज्जचा अनंतगुणा, बउसस्स पडिसेवणाकुसीलस्स य एएसिणं जहन्नगा चरित्सवजया ॥८९९॥ दोण्हवि तुल्ला अर्णतगुणा, बउसस्स उफोसगा चरित्तपञ्जचा अर्णतगुणा, पडिसेवणाकुसीलस्स कोसगा| चरितपचवा अणंतगुणा, कसायकुसीलस्स उन्कोसगा चरित्तपनवा अणंतगुणा, णियंठस्स सिणायस्स य एतेसि णं अजहन्नमणुकोसगा चरित्तपजवा दोण्हवि तुल्ला अणंतगुणा १५॥(सूत्रं ७६५) पुलाए गंभंते! |किं सयोगी होना अजोगी या होला ?, गोयमा सयोगी होजा नो अयोगी होजा, जइ सयोगी होजा किं मणजोगी होजा वहजोगी होजा काययोगी होला?, गोयमा! मणजोगी वा होना वयजोगी चा होजा कायजोगी वा होजा, एवं जाब नियंठे। सिणाए णं पुच्छा, गोपमा! सयोगी वा होजा अयोगी वा होजा, जइ सयोगी होजा किं मणजोगी होजा सेसं जहा पुलागस्स १६॥ (सूत्रं ७६६) पुलाए णं मंते । किं ६ सागारोवपत्ते होजा अणागारोवउसे होजा?,गोयमा! सागारोषउत्ते वा होजा अणागारोवउसे वा होजा एवं I#जाच सिणाए १७॥ (सूत्रं ७६७) पुलाए णं भंते। सकसाथी होजा अकसायी होजा, गोयमा ! सकासाची | होजा णो अफसायी होजा, जह सकसाई से णे भंते ! कतिसु कसाएमु होजा, गोयमा बसु दीप अनुक्रम [९१५-९१८] ॥८९९॥ SAREastatinintennational | निर्ग्रन्थः, तस्य स्वरुपम, भेदा: इत्यादि विविध-विषय-वक्तव्यता ~2144 Page #215 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (०५) [भाग-११]"भगवती"-अंगसूत्र-५ (मूलं+वृत्ति:) शतक [२५], वर्ग [-], अंतर-शतक -1, उद्देशक [६], मूलं [७६५-७६८] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र- [०५] अंगसूत्र- [०५] "भगवती" मूलं एवं अभयदेवमूरि-रचिता वृत्ति: प्रत सूत्रांक [७६५-७६८] कोहमाणमाघालोमेसु होजा, एवं पउसेवि, एवं पडिसेवणाकुसीलेवि, कसापकुसीले में पुरुण, गोपमा सकसाथी होजा णो अकसायी होखा, जइसकसायी होजा सेणं भंते ! कतिसुकसाए होला ?,गीयमा चउसुवा तिसु था दोसु वा एगंमिथा होजा, चउसु होमाणे चवसु संजलणकोहमाणमायालीमेमु होला तिसु होमाणे तिसु संजलणमाणमायालोमेसु होलादोसु होमाणे संजलणमायालोमेसु होगा एगमिहोमाणे संजलणलोभे होला,नियंठे गं पुछा गोयमा! णी सकसायी होला अकसायीहोजा, जइअकसायी होबा किं वसंतकसायी होबा खीणकसायी होना,गोयमा ! उपसंतकसायी बाहोजातीणकसायीचा होना, सिणाए एवं चेच, मघरं णो उपसंतकसायी होना, खीणकसायी होजा १८॥(सूर्य ७६८) "पुलागरसे त्यादि, चरित्सपज्जवति चारित्रस्य-सविरतिरूपर्परिणामस्य पर्थवा-भेदाचारित्रपर्चवाते च बुद्धिकृप्ता अविभागपलिच्छेदा विषयकृता चा 'सहाणसंनिगासणं ति स्व-आत्मीयं सजातीयं स्थान-पर्धधाणामाश्रयः स्वस्थानपुलाकादेः पुलाकादिरेष तस्य संनिकर्षः-संयोजन स्वस्थानसंनिकर्षस्तेम, किं 1-'हीणे त्ति विशुद्धसंयमस्थानसम्बन्धित्वेन | विशुद्धतरपर्थवापेक्षया अविशुद्धतरसंयमस्थानसम्बन्धित्वेनाविशुद्धतराः पर्यवाहीनास्तद्योगात्साधुरपि हीनः 'तुलेत्ति Pil तुल्यशुद्धिकपर्यवयोगात्तुल्यः 'अमहिय'त्ति विशुद्धप्तरपर्यवयोगादभ्यधिकः, 'सिय हीणे'त्ति अशुद्धसंथमस्थानष-12 र्तित्वात् 'सिय तुल्ले त्ति एकसंयमस्थानधर्तित्वात् 'सिय अन्भहिए'त्ति विशुद्धतरसंयमस्थानवर्तित्वात् , 'अणंतभागहीणे'त्ति किलासद्भावस्थापनया पुलाकस्योत्कृष्टसंयमस्थानपर्यवानं दश सहस्राणि १००००, तस्य सर्वजीवानन्तकेन शतप दीप अनुक्रम [९१५-९१८] निर्ग्रन्थः, तस्य स्वरुपम्, भेदा: इत्यादि विविध-विषय-वक्तव्यता ~215 Page #216 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (०५) [भाग-११]"भगवती"-अंगसूत्र-५ (मूलं+वृत्ति:) शतक [२५], वर्ग [-], अंतर-शतक -1, उद्देशक [६], मूलं [७६५-७६८] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र- [०५] अंगसूत्र- [०५] "भगवती" मूलं एवं अभयदेवमूरि-रचिता वृत्ति: प्रत पुलाकादेः सूत्रांक [७६५-७६८] व्याख्या- 1 रिमाणतया कल्पितेन भागे हते शतं लब्धं १००, द्वितीयप्रतियोगिपुलाकचरणपर्यवाग्रं नव सहस्राणि नवशताधिकानि || २५ शतके प्रज्ञप्तिःला |९९००, पूर्वभागलब्धं शतं तत्र प्रक्षिप्तं जातानि दश सहस्राणि, ततोऽसौ सर्वजीवानन्तकभागहारलब्धेन शतेन हीनमि-|| उद्देशः ६ अभयदेवी त्यनन्तभागहीनः, 'असंखेनभागहीणे वत्ति पूर्वोक्तकल्पितपर्यायराशेर्दशसहस्रस्य १०००० लोकाकाशप्रदेशपरिमाणेयावृत्तिा पर्यवयोगनासधेयकेन कल्पनया पञ्चाशत्प्रमाणेन भागे हते लब्धं द्विशती, द्वितीयप्रतियोगिपुलाकचरणपर्यवाग्रं नव सहस्राण्यष्टौ च कषायाः ॥९००॥ शतानि ९८००, पूर्वभागलन्धा प द्विशती तत्र प्रक्षिप्ता, जातानि दश सहस्राणि, ततोऽसौ लोकाकाशप्रदेशपरिमाणासो सू ७६८ यकभागहारलब्धेन शतद्वयेन हीन इत्यसवेयभागहीनः, 'संखेनभागहीणे वत्ति पूर्वोककल्पितपर्यायराशेर्दशसहस्रस्य 18/१०००० उत्कृष्टसोयकेन कल्पनया दशकपरिमाणेन भागे हते लब्धं सहस्र, द्वितीयप्रतियोगिपुलाकचरणपर्यवानं नव सहस्राणि ९००० पूर्वभागलब्धं च सहनं तत्र प्रक्षिप्तं जातानि दश सहस्राणि, ततोऽसाबुत्कृष्टसधेयकभागहारलन्धेन टू सहस्रण हीनः, 'संखेवगुणहीणे वति किलैकस्य पुलाकस्य चरणपर्यवानं कल्पनया सहस्रदशकं द्वितीयप्रतियोगिपुला कचरणपर्यवानं च सहस्र, ततश्चोत्कृष्टसोयकेन कल्पनया दशकपरिमाणेन गुणकारेण गुणितः साहस्रो राशिर्जायते दशक पद सहस्राणि, स च तेनोत्कृष्टसधेयकेन कल्पनया दशकपरिमाणेन गुणकारेण हीनः-अनभ्यस्त इति सञ्जयगुणहीन, 'असंखेजगुणहीणे वति किलैकस्य पुलाकस्य चरणपर्यवानं कल्पनया सहस्रदशकं द्वितीयप्रतियोगिपुलाकचरणपर्यवान पाच द्विशती, ततश्च लोकाकाशप्रदेशपरिमाणेनासङ्ख्यकेन कल्पनया पञ्चाशत्परिमाणेन गुणकारेण गुणितो द्विशतिको || 20९.०॥ राशिजोयते दश सहवाणि, स च तेन लोकाकाशप्रदेशपरिमाणासबेयकेन कल्पनया पञ्चाशत्प्रमाणेन गुणकारेण हीन COMAA दीप अनुक्रम [९१५-९१८] निर्ग्रन्थः, तस्य स्वरुपम्, भेदा: इत्यादि विविध-विषय-वक्तव्यता ~216 Page #217 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (०५) [भाग-११]"भगवती"-अंगसूत्र-५ (मूलं+वृत्ति:) शतक [२५], वर्ग [-], अंतर्-शतक [-1, उद्देशक [६], मूलं [७६५-७६८] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र- [०५], अंगसूत्र- [०५] "भगवती मूलं एवं अभयदेवसूरि-रचिता वृत्ति: प्रत सूत्रांक [७६५ -७६८] ॥8॥ इत्यसोयगुणहीन इति, 'अनंतगुणहीणे वत्ति किलैकस्य पुलाकस्य चरणपर्यवाय कल्पनया सहस्रदशक दितीय तियोगिपुलाकचरणपर्यवायं च शतं, ततश्च सर्वजीवानन्तकेन कल्पनया शतपरिमाणेन गुणकारेण गुणितः शतिको राशिर्जायते दश सहस्राणि, स च तेन सर्वजीवानन्तकेन कल्पनया शतपरिमाणेन गुणकारेण हीन इत्यनन्तगुणहीनः, एवमभ्यधिकषट्स्थानकशब्दार्थोऽप्येभिरेव भागापहारगुणकाराख्येयः, तथाहि-एकस्य पुलाकस्य कल्पनया दश सहस्राणि चरणपर्यवमानं सदन्यस्य नवशताधिकानि नव सहस्राणि, ततो द्वितीयापेक्षया प्रथमोऽनन्तभागाभ्यधिकः, तथा यस्य नव सहस्राण्यष्टौ च शतानि पर्यवानं तस्मात्प्रथमोऽसपेयभागाधिकः, तथा यस्य नव सहस्राणि चरणपर्यवाग्रं तस्माप्रथमः समवेयभागाधिका, तथा यस्य चरणपर्यवाग्रं सहस्रमानं तदपेक्षया प्रथमः सोयगुणाधिका, तथा यस्य चरणपर्यवानं द्विशती तदपेक्षयाऽऽद्योऽसबेयगुणाधिका, तथा यस्य चरणपर्यवाग्रं शतमानं तदपेक्षयाऽऽद्योऽनन्तगुणाधिक इति॥ है 'पुलाए णं भंते ! बउसस्से'त्यादि, 'परट्ठाणसन्निगासेणं ति विजातीययोगमाश्रित्येत्यर्थः, विजातीयश्च पुलाकस्य बकुशा दिः, तत्र पुलाको बकुशाद्धीनस्तथाविधविशुद्धयभावात् , 'कसाथकुसीलेणं समं छहाणवडिए जहेव सट्ठाणे त्ति पुलाका पुलाकापेक्षया यथाऽभिहितस्तथा कपायकुशीलापेक्षयाऽपि वाच्य इत्यर्थः, तत्र पुलाकः कषायकुशीलाद्धीनो वा स्यात् | अविशुद्धसंयमस्थानवृत्तित्वात् तुल्यो वा स्यात् समानसंयमस्थानवृत्तित्वाद् अधिको वा स्यात् शुद्धतरसंयमस्थानवृत्तित्वात् , | यतः पुलाकस्य कपायकुशीलस्य च सर्वजघन्यानि संयमस्थानान्यधः, ततस्तौ युगपदसलेयानि गच्छतस्तुल्याध्यवसानत्वात् , | ततः पुलाको व्यवच्छिद्यते हीनपरिणामत्वात् , व्यवपिछने च पुलाके कपायकुशील एकक एवासश्वेयानि संयमस्थानानि KALARASOSORLS दीप अनुक्रम [९१५-९१८] व्या.११ RELIGunintentATHREE For P OW निर्ग्रन्थः, तस्य स्वरुपम, भेदा: इत्यादि विविध-विषय-वक्तव्यता ~217 Page #218 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (०५) प्रत सूत्रांक [७६५ -७६८] दीप अनुक्रम [९१५ -९१८] [भाग-११]“भगवती”– अंगसूत्र - ५ ( मूलं + वृत्ति:) शतक [२५], वर्ग [-], अंतर् शतक [-] उद्देशक [६], मूलं [ ७६५-७६८ ] पूज्य आगमोद्धारकश्री संशोधितः मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित.. आगमसूत्र - [०५] अंगसूत्र- [ ०५] "भगवती" मूलं एवं अभयदेवसूरि-रचिता वृत्तिः ॥ ९०१ ॥ व्याख्या- १ गच्छति शुभतरपरिणामत्वात्, ततः कषायकुशीलप्रतिसेवनाकुशीलवकुशा युगपदक्षेयानि संयमस्थानानि गच्छन्ति, ततश्च प्रज्ञषिः वकुश व्यवच्छिद्यते, प्रतिसेवनाकुशीलकपाय कुशीला वसत्येयानि संयमस्थानानि गच्छतस्ततश्च प्रतिसेवनाकुशीलो व्यवअभयदेवीच्छिद्यते, कपायकुशीलस्त्वसङ्ख्येयानि संयमस्थानानि गच्छति, ततः सोऽपि व्यवच्छिद्यते, ततो निर्ग्रन्थस्नातकावेकं संयमया वृत्तिः २ स्थानं प्राप्त इति । 'नियंठस्स जहा बउसस्स'त्ति पुलको निर्मन्थादनन्तगुणहीन इत्यर्थः ॥ चिन्तितः पुलाकोऽवशेषैः सह, अथ वकुशश्चिन्त्यते-- 'बउसे ण' मित्यादि, बकुशः पुलाकादनन्तगुणाभ्यधिक एव विशुद्ध तर परिणामत्त्वात्, बकुशान्तु हीनादिर्विचित्र परिणामत्वात्, प्रतिसेवाकपायकुशीलाभ्यामपि हीनादिरेव, निर्मन्थस्नातकाभ्यां तु हीन एवेति, 'बसवत्तवया भाणिय'त्ति प्रतिसेवाकुशीलस्तथा वाच्यो यथा वकुश इत्यर्थः कषाय कुशीलोऽपि नकुशवद्वाच्यः, | केवलं पुलाका द्वकुशोऽभ्यधिक एवोक्तः सकपायस्तु षट्स्थानपतितो वाच्यो हीनादिरित्यर्थः, तत्परिणामस्य पुलाकापेक्षया हीन समाधिकस्वभावत्वादिति ॥ अथ पर्यवाधिकारात्तेषामेव जघन्यादिभेदानां पुलाकादिसम्बन्धिनामल्पत्वादि प्ररूपयनाह- 'एएसि णमित्यादि ॥ योगद्वारे 'अयोगी वा होज्जत्ति इहायोगी शैलेशीकरणे । उपयोगद्वारं तु सुगमत्वान्न | लिखितम् । कषायद्वारे - 'सकसाई होज 'त्ति पुलाकस्य कपायाणां क्षयस्योपशमस्य चाभावात् । 'तिसु होमाणे इत्यादि, उपश्रमश्रेण्यां क्षपकश्रेण्यां वा सवलनक्रोधे उपशान्ते क्षीणे वा शेषेषु त्रिषु, एवं माने विगते द्वयोर्मायायां तु विगतायां सूक्ष्मसम्परायगुणस्थानके एकत्र लोभे भवेदिति ॥ लेश्याद्वारे पुलाए णं भंते! किंसलेस्से होज्जा अलेस्से होज्या ?, गोयमा ! सलेस्से होना णो अलेस्से होना, जह निर्ग्रन्थः, तस्य स्वरुपम्, भेदाः इत्यादि विविध विषय वक्तव्यता For Penal Use On ~218~ २५ शतके उद्देशः ६ पुलाकादेः पर्यवयोग कषायाः सू ७६८ | ॥ ९०१ ॥ wor Page #219 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (०५) प्रत सूत्रांक [७६९ -७७०] दीप अनुक्रम [९१९ -९२०] [भाग-११]“भगवती”- अंगसूत्र -५ (मूलं + वृत्ति:) शतक [२५], वर्ग [-], अंतर्-शतक [-], उद्देशक [६], मूलं [७६९-७७०] पूज्य आगमोद्धारकश्री संशोधितः मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित.. आगमसूत्र - [०५] अंगसूत्र- [ ०५] "भगवती" मूलं एवं अभयदेवसूरि-रचिता वृत्तिः सलेस्से होज्जा से णं भंते ! कतिसु लेस्सासु होज्जा ?, गोयमा ! तिसु विसुद्धलेस्सासु होना, तं० तेउलेस्साए पहलेस्साए सुक्कलेस्साए, एवं बउसस्सवि, एवं पडिसेवणाकुसीलेवि, कसायकुसीले पुच्छा, गोयमा 1 सलेस्से होला णो अलेस्से होज्जा, जइ सलेस्से होला से णं भंते ! कतिसु लेसासु होज्जा ? गोयमा ! छसु लेसासु होज्जा, नं० - कण्हलेस्साए जाव सुक्कलेस्साए, नियंठे णं भंते ! पुच्छा, गोयमा ! सलेस्से होज्या णो अलेस्से होज्जा, जइ सलेसे हो० से णं भंते ! कति लेस्सासु होज्जा १, गोयमा ! एकाए सुक्कलेस्साए होजा, सिणाए पुच्छा, गोपमा । सलेस्से वा अलेस्से वा होज्जा, जइ सलेस्से हो० से णं भंते । कतिसु लेस्सासु होज्जा ? गोयमा ! |एगाए परमसुकलेस्साए होजा १९ ॥ (सूत्रं ७६९) पुलाए णं भंते । किं बहुमाणपरिणामे होजा हीयमाणपरिणामे होज्जा अवट्टियपरि० ?, गोयमा ! वहुमाणपरि० वा होजा हीयमाणपरिणामे वा होजा अवट्टियपरिणामे वा होजा, एवं जाव कसायकुसीले । नियंडे णं पुच्छा, गोयमा ! वहुमाणपरिणामे हो० णो हीयमाणप० हो०, अवद्वियपरिणामे वा होज्जा, एवं सिणाएवि । पुलाए णं भंते ! केवइयं कालं वमाणपरिणामे होज्जा ?, गोधमा ! जहनेणं एवं समयं उक्को० अंतोमु०, केवतियं कालं हीयमाणपरिणामे होला ?, गोयमा ! जह० एवं समयं उक्को० अंतोमु०, केवइयं कालं अवट्टियपरिणामे होला ?, गोयमा ! जहन्ने० एकं समयं उक्कोसेणं सत समया, एवं जाव कसायकुसीले । नियंठे णं भंते! केवतियं कालं बहुमाणपरिणामे होज्जा ?, गोपमा ! जहन्ने० अतोमुद्दत्तं उकोसेणवि अंतोमुहुत्तं, केवतियं कालं अवट्टियपरिणामे होज्जा ?, Education Internation निर्ग्रन्थः, तस्य स्वरुपम्, भेदाः इत्यादि विविध विषय वक्तव्यता For Pasta Use Only ~219~ Page #220 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (०५) [भाग-११]"भगवती"-अंगसूत्र-५ (मूलं+वृत्ति:) शतक [२५], वर्ग [-], अंतर्-शतक [-1, उद्देशक [६], मूलं [७६९-७७०] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र- [०५], अंगसूत्र- [०५] "भगवती मूलं एवं अभयदेवसूरि-रचिता वृत्ति: पुलाकादे प्रत सूत्रांक [७६९-७७०] ॥९RINKI व्याख्या-गोयमा जहन्नेणं एक समयं जाकोसेणं अंतोमुहुत्तं। सिणाए णं भंते ! केवइयं कालं बहमाणपरिणामे होज्जा ?, २५ शतके प्रज्ञप्तिः | गोयमा ! जहन्नेणं अंतोमुहुत्तं उकोसेणवि अंतोमुहुत्तं, केवइयं कालं अवडियपरिणामे होजा?, गोयमा || उद्देशः६ अभयदेवी | जह० अंतोमु० उक्कोसे० देसूणा पुष्चकोडी २० ॥ (सूत्रं ७७०) या वृत्तिः २ | लेश्यापरि| 'तिसु विसुद्धलेसासु'त्ति भावलेश्यापेक्षया प्रशस्तासु तिसृषु पुलाकादयस्त्रयो भवन्ति, कषायकुशीलस्तु षट्स्वपि, णामाः सू सकषायमेव आनित्य 'पुषपडिवन्नओ पुण अन्नयरीए उ लेसाए [पूर्वप्रतिपन्नः पुनरन्यतरस्यां लेश्यायां] इत्येतदुक्तमिति ७६९-७७० संभाव्यते, 'एक्काए परमसुकाए'त्ति शुक्लध्यानतृतीयभेदावसरे या लेश्या सा परमशुक्लाऽन्यदा तु शुक्लैव, साऽपीतरजीवशुक्ललेश्यापेक्षया स्नातकस्य परमशुक्लेति ॥ परिणामद्वारे-वट्ठमाणपरिणामे इत्यादि, तत्र च वर्षमान:-शुद्धेरुरकर्ष ट्रा गच्छन् हीयमानस्त्वपकर्ष गच्छन् अवस्थितस्तु स्थिर इति, तत्र निम्रन्थो हीयमानपरिणामो न भवति, तस्य परिणामहानी || कषायकुशीलव्यपदेशात् , स्नातकस्तु हानिकारणाभावान हीयमानपरिणामः स्यादिति ॥ परिणामाधिकारादेवेदमाह'पुलाए ण'मित्यादि, तत्र पुलाको वर्द्धमानपरिणामकाले कषायविशेषेण बाधिते तस्मिंस्तस्यैकादिकं समयमनुभवतीत्यतन उच्यते जघन्येनैकं समयमिति 'उक्कोसेणं अंतोमुहत्तंति एतत्स्वभावत्वाद्बर्द्धमानपरिणामस्येति । एवं बकुशप्रतिसेवाकुशीलकपायकुशीलेप्यपि, नवरं बकुशादीनां जघन्यत एकसमयता मरणादपीटा, न पुनः पुलाकस्य, पुलाकत्वे मरणाभावात्, स हि मरणकाल कपायकुशीलत्वादिना परिणमति, यच प्राक् पुलाकस्य कालगमनं ततभावापेक्षयेति, निग्रेन्थोला ॥९०२॥ जघन्यनत्किषण चान्तहर्स वर्द्धमानपरिणामः स्यात. केवलज्ञानोत्पत्ती परिणामान्तरभावात् , अवस्थितपरिणामः पुन दीप अनुक्रम [९१९-९२०] | निर्ग्रन्थः, तस्य स्वरुपम, भेदा: इत्यादि विविध-विषय-वक्तव्यता ~220 Page #221 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (०५) [भाग-११]"भगवती"-अंगसूत्र-५ (मूलं+वृत्ति:) शतक [२५], वर्ग [-], अंतर्-शतक [-1, उद्देशक [६], मूलं [७६९-७७०] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र- [०५], अंगसूत्र- [०५] "भगवती मूलं एवं अभयदेवसूरि-रचिता वृत्ति: प्रत सूत्रांक [७६९-७७०] निर्घन्धस्य जघन्यत एक समयं मरणात्स्यादिति । 'सिणाए णं भंते !' इत्यादि, स्नातको जघन्येतराभ्यामन्तर्मुहूर्त वर्द्धमानपरिणामः, शैलेश्यां तस्यास्तत्प्रमाणत्वात् , अवस्थितपरिणामकालोऽपि जघन्यतस्तस्यान्तर्मुहूर्त, कथम् , उच्यते, यः स केवलज्ञानोत्पादानन्तरमन्तर्महर्तमवस्थितपरिणामो भूत्वा शैलेशी प्रतिपद्यते तदपेक्षयेति, 'कोसेणं देसूणा पुषको डी'त्ति पूर्वकोट्यायुषः पुरुषस्य जन्मतो जघन्येन नवसु वर्षेप्यतिगतेषु केवल ज्ञानमुत्पद्यते ततोऽसौ तदूनां पूर्वकोटीमवहै स्थितपरिणामः शैलेशी यावद्विहरति, शैलेश्यां च वर्द्धमानपरिणामः स्यादित्येवं देशोनामिति ॥ बन्धद्वारे | पुलाए णं भंते ! कति कम्मपगडीओ बंधति ?, गोयमा ! आउयवज्जाओ सत्त कम्मप्पगडीओ बंधति । 18|| बउसे पुछा, गोयमा ! सत्तविहवंधए वा अट्ठविहबंधए वा, सत्त बंधमाणे आउयवजाओ सत्त कम्मप्पगतडीओ बंधति, अट्ठ बंधमाणे पडिपुन्नाओ अट्ठ कम्मप्पगडीओ बंधइ, एवं पडिसेवणाकुसीलेवि, कसायकुसीले पुच्छा, गोयमा ! सत्तविहबंधए वा अट्टविहबंधए वा छविहर्षधए वा, सत्त बंधमाणे आज्यवज्जाओ सत्त कम्मप्पगडीओ बंधइ, अट्ठ बंधमाणे पडिपुन्नाओ अट्ठ कम्मप्पगडीओ बंधइ, छ बंधमाणे आउयमोह|णिज्ज वजाओ छकम्मप्पगडीओ बंधइ । नियंठे णं पुच्छा, गोयमा ! एगं वेयणिज कम्मं बंधइ । सिणाए पुच्छा, |गोयमा ! एगविहबंधए वा अबंधए वा, एगं बंधमाणे एगं वेयणिज्ज कम्मं बंधइ २१ ॥ (सूत्रं ७७१) पुलाए भंते ! कति कम्मप्पगडीओ चेदेह?, गोयमा नियम अट्ट कम्मप्पगडीओ वेदेव, एवं जाव कसायकुसीले, ४ नियंठे णं पुच्छा, गोयमा! मोहणिज्जवजाओ सत्त कम्मप्पगडीओ वेदेह । सिणाए पुच्छा, गोयमा ! वेय RECENTERACTARA PAC% दीप अनुक्रम [९१९-९२०] | निर्यन्थः, तस्य स्वरुपम, भेदा: इत्यादि विविध-विषय-वक्तव्यता ~221 Page #222 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (०५) [भाग-११]"भगवती"-अंगसूत्र-५ (मूलं+वृत्ति:) शतक [२५], वर्ग [-], अंतर्-शतक [-], उद्देशक [६], मूलं [७७१-७७३] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र- [०५], अंगसूत्र- [०५] "भगवती मूलं एवं अभयदेवसूरि-रचिता वृत्ति: A प्रत सूत्रांक [७७१-७७३] SAAS पुलाकादे या वृत्तिः२/४ व्याख्या- णिज्जआउयनामगोयाओ चत्तारि कम्मप्पगडीओ वेदेइ २२॥ (सूत्र ७७२) पुलाए णं भंते ! कति कम्मप्प- २५ शतके प्रज्ञप्तिः अभयदेवी गडीओ उदीरेति !, गोयमा ! आउयबेयणिज्जवजाओ छ कम्मप्पगडीओ उदीरेइ । बाउसे पुच्छा, गोयमा उद्देशः ६ सत्तविहउदीरए वा अविहउदीरए वा छविहउदीरए वा, सत्त उदीरमाणे आउयवजाओ सत्त कम्मप्पग डीओ उदीरेति, अट्ठ उदीरमाणे पडिपुन्नाओ अट्ठ कम्मप्पगडीओ उदीरेति, छ उदीरमाणे आउयवेयणिजव- वन्धवेदो॥९०३॥ ज्जाओ छ कम्मपगडीओ उदीरे ति, पडिसेवणाकुसीले एवं चेव, कसायकुसीले णं पुच्छा, गो०! सत्तविहउदी दीरणाःसू ७७१-७७१ रिए वा अट्ठविहउदीरए वा छविहउदीरए वा पंचविहउदीरए वा, सत्त उदीरमाणे आउयवजाओ सत्त कम्म-| प्पगडीओ उदीरेति, अट्ट उदीरमाणे पडिपुनाओ अट्ठ कम्मप्पगडीओ उदीरेति, छ उदीरमाणे आउयवेयणिज्जवजाओ छ कम्मप्पगडीओ उदीरेति, पंच उदीरमाणे आउयवेयणिजमोहणिज्जववाओ पंच कम्मप्पगडीओ | उदीरेति । नियंठे णं पुच्छा, गोयमा ! पंचविहाउदीरए वा दुविहउदीरए वा, पंच उदीरेमाणे आउयवेयणिज्ज मोहणिज्जवज्जाओ पंच कम्मप्पगडीओ उदीरेति, दो उदीरमाणे णामं च गोयं च उदीरेति । सिणाए पुच्छा, Pl 18|| गोयमा ! दुषिहउदीरए वा अणुदीरए वा, दो उदीरमाणे णामं च गोयं च उदीरेति २३॥ (सन्नं ७७३) __ 'आउयवज्जाओ'त्ति पुलाकस्यायुर्वन्धो नास्ति, तद्वन्धाध्यवसायस्थानानां तस्याभावादिति । 'घउसे इत्यादि, विभा. गाद्यवशेषायुषो हि जीवा आयुर्वधन्तीति त्रिभागद्वयादी तन्न बनन्तीतिकृत्वा बकुशादयः सप्तानामष्टानां वा कम्र्मणां | बन्धका भवन्तीति, 'छविहं बंधेमाणा' इत्यादि, कषायकुशीलो हि सूक्ष्मसम्परायत्वे आयुने बझाति, अप्रमत्तान्तत्त्वात दीप अनुक्रम [९२१ MU९० -९२३] | निर्ग्रन्थः, तस्य स्वरुपम, भेदा: इत्यादि विविध-विषय-वक्तव्यता ~222 Page #223 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (०५) [भाग-११]"भगवती"-अगसूत्र-५ (मूल+वृत्ति:) शतक [२५], वर्ग [-], अंतर्-शतक [-1, उद्देशक [६], मूलं [७७१-७७३] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र- [०५], अंगसूत्र- [०५] "भगवती मूलं एवं अभयदेवसूरि-रचिता वृत्ति: प्रत सूत्रांक [७७१ -७७३] द्वन्धस्य, मोहनीयं च बादरकषायोदयाभावान बनातीति शेषाः षडेवेति । 'एग वेयणिज्जति निर्मन्थो वेदनीयमेव वनाति, बन्धहेतुषु योगानामेव सझावात, 'अबंधए बत्ति अयोगी बन्धहेतूनां सर्वेषामभावादवन्धक एवेति ॥ वेदनद्वारे-मो हणिज्जवज्जाओंति निर्ग्रन्धो हि मोहनीयं न वेदयति, तस्योपशान्तत्वात् क्षीणत्वाद्वा, स्नातकस्य तु घातिकर्मणां क्षीण-II ||| त्वावदनीयादीनामेव वेदनमत उच्यते-'वेयणिज्जेत्यादि ॥ उदीरणाद्वारे-'आउयवेयणिज्जवजाओ'त्ति, अयमर्थः-15 पुलाक आयुर्वेदनीयप्रकृतीनोंदीरयति तथाविधाध्यवसायस्थानाभावात्, किन्तु पूर्व ते उदीर्य पुलाकतां गच्छति,एवमुक्त्तरत्रापि यो याः प्रकृतीर्नोदीरयति स ताः पूर्वमुदीर्य बकुशादितां प्राप्नोति, स्नातकः सयोग्यवस्थायां तु नामगोत्रयोरेवोदी| रकः, आयुर्वेदनीये तु पूर्वोदीर्णे एव, अयोग्यवस्थायां त्वनुदीरक एवेति ॥ 'उपसंपजहन्न'त्तिद्वारं, तत्रोपसम्पत् उपसम्पत्तिः-प्राप्तिः 'जहन्न'त्ति हानं-त्यागः उपसम्पच हानं चोपसम्पद्धानं-किं पुलाकत्वादि त्यक्त्वा किं सकपायत्वादिकमुप| सम्पद्यते इत्यर्थः, तत्र पुलाए णं भंते ! पुलायत्तं जहमाणे किं जहति किं उचसंपज्जति ?, गोयमा ! पुलायत्तं जहति कसायकु-15 सीलं वा अस्संजमं वा पवसंपजति, बउसे णं भंते ! बउसत्तं जहमाणे किं जहति किं उपसंपज्जति?, गोपमा पद बजसत्तं जहति पडिसेवणाकुसीलं वा कसायकुसील वा असंजमं चा संजमासंजम चा उपसंपज्जति, || पडिसेवणाकुसीले णं भंते ! पडि पुच्छा, गोयमा ! पडिसेवणाकुसीलत्तं जहति बउसंवा कसायकुसीलं वा. अस्संजमं वा संयमासंयम वा उपसंपज्जति, कसायकुसीले पुच्छा, गोयमा ! कसायकुसीलतं जहति पुलायं| BARABAR दीप अनुक्रम [९२१ -९२३] | निर्ग्रन्थः, तस्य स्वरुपम, भेदा: इत्यादि विविध-विषय-वक्तव्यता ~223 Page #224 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (०५) प्रत सूत्रांक [७७४ -७७६] दीप अनुक्रम [९२४ -९२६] [भाग-११]“भगवती” - अंगसूत्र -५ (मूलं + वृत्ति:) शतक [२५], वर्ग [-], अंतर् शतक [-], उद्देशक [६], मूलं [७७४-७७६] पूज्य आगमोद्धारकश्री संशोधितः मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र- [०५] अंगसूत्र- [ ०५] "भगवती" मूलं एवं अभयदेवसूरि-रचिता वृत्तिः व्याख्याप्रज्ञष्ठिः अभयदेवीया वृत्तिः २ ॥ ९०४ ॥ वा वउस वा पडि सेवणाकुसीलं वा नियंठं वा अस्संजम वा संयमासंयमं वा उवसंपजति, णियंठे पुच्छा, गोयमा ! नियंठत्तं जहति कसायकुसीलं वा सिणायं वा अस्संजमं वा उवसंपजति । सिणाए पुच्छा, गोयमा ! सिणापत्तं जहति सिद्धिगतिं उवसंपजति २४ ॥ (सूत्रं ७७४) पुलाए णं भंते! किं सनोवउत्ते होजा नोसनोवडते होज्जा ?, गोयमा ! णोसन्नोवउत्ते वा होना सन्नोवउत्ते वा होला । बउसे णं भंते । पुच्छा, गोयमा ! सन्नोवउत्ते वा होला नोसनोवन्ते वा होना, एवं पडिसेबणाकुसीलेवि, एवं कसायकुसीलेवि, नियंटे सिणाए य जहा पुलाए २५ ॥ (सूत्रं ७७५) पुलाए णं भंते ! किं आहारए होजा अणाहारए होला ?, गोयमा ! आहारए होजा णो अणाहारए होना, एवं जाव नियंठे। सिणाए पुच्छा, गोयमा ! आहारए वा होज्जा अणाहारए वा होजा २६ ।। सूत्रं ७७६) 'पुलाए 'मित्यादि, पुलाकः पुलाकत्वं त्यक्त्वा संयतः कषायकुशील एव भवति, तत्सदृशसंयमस्थानसद्भावात् एवं यस्य यत्सदृशानि संयमस्थानानि सन्ति स तद्भावमुपसम्पद्यते मुक्त्वा कषायकुशीलादीन्, कषायकुशीलो हि विद्यमान| स्वसदृशसंयमस्थानकान् पुलाकादिभावानुपसम्पद्यते, अविद्यमानसमानसंयमस्थानकं च निर्मन्थभावं, निर्मम्धस्तु कषायित्वं वा स्नातकत्वं वा याति, स्नातकस्तु सिद्धयत्येवेति । निर्ग्रन्थसूत्रे 'कसायकुसीलं वा सिणायं वा' इह भावप्रत्ययलोपात् कषायकुशीलत्वमित्यादि दृश्यं, एवं पूर्वसूत्रेष्वपि तत्रोपशमनिर्ग्रन्थः श्रेणीतः प्रच्यवमानः सकषायो भवति, श्रेणीमस्तके तु मृतोऽसौ देवत्वेनोत्पन्नोऽसंयतो भवति नो संयतासंयतो, देवत्वे तदभावात्, यद्यपि च श्रेणीपतितोऽसौ संयतासंयतोऽपि Internationa निर्ग्रन्थः, तस्य स्वरुपम्, भेदाः इत्यादि विविध विषय वक्तव्यता For Parts Only ~ 224~ २५ शतके उद्देशः ६ पुलाकादेग्रहसंज्ञा हारेतराः सू ७७४७७६ ॥ ९०४ ॥ Page #225 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (०५) [भाग-११]"भगवती"-अंगसूत्र-५ (मूलं+वृत्ति:) शतक [२५], वर्ग [-], अंतर्-शतक [-1, उद्देशक [६], मूलं [७७४-७७६] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र- [०५], अंगसूत्र- [०५] "भगवती मूलं एवं अभयदेवसूरि-रचिता वृत्ति: CE%. प्रत सूत्रांक [७७४-७७६] भवति तथाऽपि नासाविहोक्तः, अनन्तरं तदभावादिति ॥ सज्ञाद्वारे-'सन्नोवउत्तेत्ति, इह सञ्जा-आहारादिसम्ज्ञा| तत्रोपयुक्तः-कथञ्चिदाहाराद्यभिष्वङ्गवान् सज्ञोपयुक्तः, नोसज्ञोपयुक्तस्त्वाहारायुपभोगेऽपि तत्रानभिष्वकः, तत्र पुलाक६ निग्रन्थस्नातका नोसज्ञोपयुक्ता भवन्ति, आहारादिप्वनभिष्वङ्गात्, ननु निर्घन्धस्नातकावेवं युक्तौ वीतरागत्वात्, न तु : पुलाकः सरागत्वात् , नैवं, न हि सरागत्वे निरभिष्वङ्गता सर्वथा नास्तीति वक्तुं शक्यते, बकुशादीनां सरागत्वेऽपि निःसजताया अपि प्रतिपादितत्वात् , चूर्णिकारस्त्वाह-नोसन्ना नाणसन्न'त्ति, तत्र च पुलाकनिम्रन्थस्नातकाः नोसज्ञोपयुकाः, ज्ञानप्रधानोपयोगवन्तो न पुनराहारादिसञोपयुक्ताः, बकुशादयस्तूभयथाऽपि, तथाविधसंयमस्थानसभावादिति ॥ आहारकद्वारे-'आहारए होज'त्ति पुलाकादेर्निर्ग्रन्थान्तस्य विग्रहगत्यादीनामनाहारकत्वकारणानामभावादाहारकत्वमेव । 'सिणाए' इत्यादि, स्नातकः केवलिसमुद्घाते तृतीयचतुर्थपञ्चमसमयेषु अयोग्यवस्थायां चानाहारकः स्यात्, ततोऽन्यत्र पुनराहारक इति ।। भवद्वारे|| पुलाए णं भंते ! कति भवग्गहणाई होजा?, गोयमा ! जहन्नेणं एवं उक्कोसेणं तिन्नि । घउसे पुच्छा, गोयमा ! जहा एक उक्कोसेणं अह, एवं पडिसेवणाकुसीलेवि, एवं कसायकुसीलेवि, नियंठे जहा पुलाए। सिणाए पुच्छा, गोयमा! एकं २७॥(मूत्रं ७७७) पुलागस्स णं भंते ! एगभवग्गहणीया केवतिया आगरिसा प०, गोयमा ! जहन्नेणं एको उक्कोसेणं तिन्नि । बउसस्स णं पुच्छा, गोयमा । जहन्नेणं एको उकोसेणं सतग्गसो, एवं पडिसेवणाकुसीलेवि, कसायकुसीलेवि। णियंठस्स णं पुच्छा, गोयमा ! जहन्नेणं एको उक्कोसेणं ACADGAOCALC दीप अनुक्रम [९२४-९२६] | निर्यन्थः, तस्य स्वरुपम, भेदा: इत्यादि विविध-विषय-वक्तव्यता ~225 Page #226 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (०५) [भाग-११]"भगवती"-अंगसूत्र-५ (मूलं+वृत्ति:) शतक [२५], वर्ग [-], अंतर्-शतक [-1, उद्देशक [६], मूलं [७७७-७७८] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र- [०५], अंगसूत्र- [०५] "भगवती मूलं एवं अभयदेवसूरि-रचिता वृत्ति: पूलाकादे प्रत सूत्रांक [७७७-७७८] व्याख्या- दोन्नि । सिणायस्स णं पुच्छा, गोपमा! एको। पुलागस्स णं भंते ! नाणाभवग्गहणिया केवतिया आगरिसा २५ शतके प्रज्ञप्तिः पन्नत्ता ?, गोयमा ! जहन्नेणं दोन्नि उक्कोसे. सत्त । बउसस्स पुच्छा, गोयमा ! जहन्नेणं दोन्नि उक्कोसेणं । | उद्देशा अभयदेवी सहस्सग्गसो, एवं जाच कसायकुसीलस्स । नियंठस्स णं पुच्छा, गोयमा । जहन्नेणं दोन्नि उक्कोसेणं पंच। या वृत्तिः२ पदसिणायस्स पुच्छा, गोयमा ! नत्थि एकोवि २८ ॥ (मूत्रं ७७८) भवाकर्षों सू७७७'पुलाए ण'मित्यादि, पुलाको जघन्यत एकस्मिन् भवग्रहणे भूत्वा कपायकुशीलत्वादिकं संयतत्वान्तरमेकशोऽनेकशो वा तत्रैव भवे भवान्तरे वाऽवाप्य सिद्ध्यति, उत्कृष्टतस्तु देवादिभवान्तरितान् त्रीन् भवान् पुलाकत्वमवाप्नोति । 'बउसे'त्यादि, इह कश्चिदेकन भवे बकुशत्वमवाप्य कषायकुशीलत्वादि च सिद्ध्यति, कश्चित्त्वेकय पकुवालमवाप्य भवान्तरे। तदनवाप्येव सिद्धयतीत्यत उच्यते-'जहन्नेणं एकं भवग्गहणं'ति, 'उकोसेणं अह'त्ति किलाष्टी भवग्रहणानि | उत्कृष्टतया चरणमात्रमवाप्यते, तत्र कश्चित्तान्यष्टौ बकुशतया पर्यन्तिमभवे सकषायत्वादियुक्कया, कश्चित्तु प्रतिभवं || प्रतिसेवाकुशीलत्वादियुक्तया पूरयतीत्यत उच्यते-'उक्कोसेणं अत्ति ॥ अथाकर्षद्वार, तत्राकर्षणमाकर्षः चारित्रस्य | प्राप्तिरिति । 'एगभवग्गहणिपत्ति एकभवग्रहणे ये भवन्ति 'सयग्गसो'त्ति शतपरिमाणेनेत्यर्थः, शतपृथक्त्वमिति भावना, उक्तश-"तिण्ह सहस्सपुहुत्तं सयपुहुत्तं च होति विरईए।"त्ति [त्रयाणां सहस्रपृथक्त्वं विरतेः पुनः शतपृथक्त्वं भवति ॥] 'उकोसेणं दोन्नि'त्ति एकत्र भवे वारद्धयमुपश्रेणिकरणादुपशमनिन्धत्वस्य द्वावाकर्षाविति ॥ 'पुलागस्से- R ॥९०५॥ है त्यादी 'नाणाभवरगहणिय'त्ति नानाप्रकारेषु भवग्रहणेषु ये भवन्तीत्यर्थः, 'जहन्नेणं दोन्नित्ति एक आकर्ष एकत्र भवे XSUS SASGASSEX दीप अनुक्रम [९२७ -९२८] | निर्ग्रन्थः, तस्य स्वरुपम, भेदा: इत्यादि विविध-विषय-वक्तव्यता ~226 Page #227 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (०५) [भाग-११]"भगवती"-अंगसूत्र-५ (मूलं+वृत्ति:) शतक [२५], वर्ग [-], अंतर्-शतक [-1, उद्देशक [६], मूलं [७७७-७७८] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र- [०५], अंगसूत्र- [०५] "भगवती मूलं एवं अभयदेवसूरि-रचिता वृत्ति: प्रत सूत्रांक [७७७-७७८] SCRECEDERARMACY द्वितीयोऽन्यत्रेत्येवमनेकत्र भवे आकर्षों स्याता, 'उकोसेणं सत्त'त्ति पुलाकत्वमुत्कर्षतस्त्रिषु भवेषु स्यादेकत्र च तदुत्कर्षतो | वारत्रयं भवति ततश्च प्रथमभवे एक आकर्षोऽन्यत्र च भवद्वये त्रयस्त्रय इत्यादिभिर्विकल्पैः सप्त ते भवन्तीति । 'यउसे'त्यादि, 'उक्कोसेणं सहस्सग्गसो'त्ति बकुशस्याष्टौ भवग्रहणानि उत्कर्षत उक्कानि, एकत्र च भवग्रहणे उत्कर्षत आक र्षाणां शतपृथक्त्वमुक्त, तत्र च यदाऽष्टास्वपि भवग्रहणेषत्कर्षतो नव प्रत्येकमाकर्षशतानि तदा नवानां शतानामष्टाभि|र्गुणनात्सप्त सहस्राणि शतद्वयाधिकानि भवन्तीति । 'नियंठस्से'त्यादी 'उफोसेणं पंच'त्ति निम्रन्थस्योत्कषर्तस्त्रीणि | भवग्रहणान्युक्तानि, एकत्र च भवे द्वावाकर्षावित्येवमेकत्र द्वावन्यत्र च द्वावपरत्र चैकं क्षपकनिम्रन्थत्वाकर्षे कृत्वा सिद्ध्यतीति कृत्वोच्यते पञ्चेति ॥ कालद्वारे| पुलाए णं भंते ! कालओ केवचिरं होइ ?, गोयमा ! जहन्नेणं अंतोमुहुसं उक्कोसेणधि अंतोमुहुत्तं । बउस पुच्छा, गोयमा ! जह० एक समयं उकोसेणं देसूणा पुषकोडी, एवं पढिसेवणाकुसीलेवि कसायकुसीलेबि । से निपंठे पुच्छा, गोयमा । जह० एक समयं उक्कोसेणं अंतोमुहुर्स। सिणाए पुच्छा, गोयमा !जहन्नेणं अंतोमुहुन उकोसेणं देसूणा पुचकोडी ॥ पुलाया भंते ! कालओ केवचिरं होइ ?, गोयमा ! जहन्नेणं एकं समय |उकोसेणं अंतोमुहत्तं । पउने णं पुच्छा, गोयमा सबद्धं, एवं जाप कसायकुसीला, नियंठा जहा पुलागा, सिणाया जहा बउसा २९॥ (सूत्र ७७९) पुलागस्स णं भंते । केवतियं कालं अंतर होइ, गोयमा! जह अंतोमु० को अणतं कालं अणंताओ ओसप्पिणिउस्सप्पिणीओ कालओ खेत्तो अवठ्ठपोग्गलपरियई | दीप अनुक्रम [९२७ -९२८] निर्ग्रन्थः, तस्य स्वरुपम, भेदा: इत्यादि विविध-विषय-वक्तव्यता ~227 Page #228 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (०५) [भाग-११]"भगवती"-अंगसूत्र-५ (मूलं+वृत्ति:) शतक [२५], वर्ग [-], अंतर्-शतक [-], उद्देशक [६], मूलं [७७९-७८०] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र- [०५], अंगसूत्र- [०५] "भगवती मूलं एवं अभयदेवसूरि-रचिता वृत्ति: प्रत सूत्रांक [७७९ -७८०] व्याख्या- देसूर्ण, एवं जाव नियंठस्स । सिणायस्स पुच्छा, गोयमा! नत्थि अंतरं ॥ पुलायाणं भंते ! केवतियं कालं २५ शतके प्रज्ञप्तिः अंतरं होइ ?, गोयमा ! जह. एक समयं उक्को संखजाई वासाई। यउसाणं भंते ! पुच्छा, गोयमा ! नत्थि । | उद्देशः६ अभयदेवी-12 अंतर, एवं जाव कसायकुसीलाणं । नियंठाणं पुच्छा, गोयमा ! जहा एक स० उकोसेणं छम्मासा, सिणा पुलाकादियावृत्तिःला याणं जहा बउसाणं ३०॥ (सूत्रं ७८०) कालान्तरे सू ७७९॥९०६॥ 'पुलाए ण'मित्यादौ, 'जहन्नेणं अंतोमुहुत्तंति पुलाकत्वं प्रतिपन्नोऽन्तर्मुहूर्तापरिपूर्ती पुलाको न म्रियते नापि प्रतिपततीतिकृत्वा जघन्यतोऽन्तर्मुहूर्त्तमित्युच्यते, उत्कर्षतोऽप्यन्तर्मुहर्त्तमेतत्रमाणत्वादेतत्स्वभावस्येति । 'वउसे इत्यादि, "जहन्नेणमेकं समय'ति बकुशस्य चरणप्रतिपत्त्यनन्तरसमय एव मरणसम्भवादिति, 'उकोसेणं देसूणा पुचकोडि'त्ति || दिपूर्वकोव्यायुषोऽष्टवान्ते चरणप्रतिपत्ताविति । 'नियंठे ण'मित्यादौ 'जहन्नेणं एक समय'ति उपशान्तमोहस्य प्रथमसमय-द्र समनन्तरमेव मरणसम्भवात् , 'उकोसेणं अंतोमुहुत्तंति निर्घन्धाद्धाया एतत्प्रमाणत्वादिति । 'सिणाये'त्यादौ 'जहन्नेणं अंतोमुहुत्तंति आयुष्कान्तिमेऽन्तर्मुहर्ने केवलोत्पत्तावन्तर्मुहर्स जघन्यतः स्नातककालः स्यादिति ।। पुलाकादीनामेकत्वेन । | कालभानमुक्तं अथ पृथक्त्वेनाह–'पुलाया णमित्यादि, 'जहन्नेणं एक समय'ति, कथम् , एकस्य पुलाकस्य योऽन्तमुहसेकालस्तस्यान्त्यसमयेऽन्यः पुलाकत्वं प्रतिपन्न इत्येवं जघन्यत्वविवक्षायां द्वयोः पुलाकयोरेकन समये सद्भावो द्वित्वे च जघन्यं पृथक्त्वं भवतीति । 'पक्कोसेणं अंतोमुलुत्तं ति यद्यपि पुलाका उत्कर्षत एकदा सहस्रपृथक्त्वपरिमाणाः प्राप्यन्ते | तथाऽप्यन्तर्मुहर्त्तत्वात्तदद्धाया बहुत्वेऽपि तेषामन्तर्मुहूर्तमेव तत्कालः, केवलं बहूनां स्थितौ यदन्तर्मुहूर्त तदेकपुलाकस्थि KUSAINICANSAXX दीप अनुक्रम [९२९-९३०] ॥९० | निर्ग्रन्थः, तस्य स्वरुपम, भेदा: इत्यादि विविध-विषय-वक्तव्यता ~228 Page #229 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (०५) प्रत सूत्रांक [७७९ -७८०] दीप अनुक्रम [९२९ -९३०] [भाग-११]“भगवती”- अंगसूत्र -५ (मूलं + वृत्ति:) शतक [२५], वर्ग [-], अंतर् शतक [-], उद्देशक [६], मूलं [७७९-७८०] पूज्य आगमोद्धारकश्री संशोधितः मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित.. आगमसूत्र - [०५] अंगसूत्र- [ ०५] "भगवती" मूलं एवं अभयदेवसूरि-रचिता वृत्तिः त्यन्तर्मुहूर्तान्महत्तरमित्यवसेयं वकुशादीनां तु स्थितिकालः सर्वाद्धा, प्रत्येकं तेषां बहुस्थितिकत्वादिति । 'नियंठा जहा पुलाय'त्ति ते चैवं जघन्यत एक समयमुत्कर्षतोऽन्तर्मुहूर्त्तमिति ॥ अन्तरद्वारे - 'पुलागस्स णमित्यादि, तत्र पुलाकः | पुलाको भूत्वा कियता कालेन पुलाकत्वमापद्यते ?, उच्यते, जघन्यतोऽन्तर्मुहूर्त्त स्थित्वा पुनः पुलाक एव भवति, उत्कर्षतः पुनरनन्तेन कालेन पुलाकत्वमाप्नोति, काठानन्त्यमेव काढतो नियमयन्नाह - 'अनंताओ' इत्यादि, इदमेव क्षेत्रतोऽपि नियमयन्नाह - 'खेत्तओ' इति, स चानन्तः कालः क्षेत्रतो मीयमानः किंमानः ? इत्याह- 'अव मित्यादि, तत्र पुद्गलपरावर्त्त एवं श्रूयते - किल केनापि प्राणिना प्रतिप्रदेशं त्रियमाणेन मरणैर्यावता कालेन लोकः समस्तोऽपि व्याप्यते तावता क्षेत्रतः पुलपरावर्त्तो भवति, स च परिपूर्णोऽपि स्यादत आह-'अपार्द्धम्' अपगतार्द्धमर्द्धमात्रमित्यर्थः, अपार्थोऽप्यर्द्धतः | पूर्णः स्यादत आह-'देणं' ति देशेन-भागेन न्यूनमिति । 'सिणायस्स नत्थि अंतरं'ति प्रतिपाताभावात् ॥ एकत्वापेक्षया ||पुलाकत्वादीनामन्तरमुक्तमथ पृथक्त्वापेक्षया तदेवाह - 'पुलापाणमित्यादि, व्यक्तम् ॥ समुद्रघातद्वारे पुलागस्स णं भंते! कति समुग्धाया पन्नत्ता ?, गोपमा ! तिन्नि समुग्धाया प०, तं वेषणासमुग्धाए कसा|यसमुग्धाए मारणंतिय समुग्धाए, बसस्स णं भंते! पुच्छा, गोयमा पंच समुग्धाया प०, सं०- बेयणासमुग्धाए जाव तेयासमुग्धाए, एवं पडिसेवणाकुसीलेवि, कसायकुसीलस्स पुच्छा, गोयमा ! छ समुग्धाया प०, तं०-वेयणासमुग्धाए जाव आहारसमुग्धाए, नियंठस्स णं पुच्छा, गोयमा नत्थि एकोवि, सिणायस्स पुच्छा, गोयमा ! एगे केवलिसमुग्धाए प० ३१ ॥ सूत्रं ७८१ ) पुलाए णं भंते! लोगस्स किं संखेजइभागे होना १ Eucation internation निर्ग्रन्थः, तस्य स्वरुपम्, भेदाः इत्यादि विविध विषय वक्तव्यता For Parts Only ~229~ Page #230 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (०५) प्रत सूत्रांक [७८१ -७८४] दीप अनुक्रम [९३१ -९३४] [भाग-११]“भगवती”- अंगसूत्र -५ (मूलं + वृत्ति:) शतक [२५], वर्ग [-], अंतर् शतक [-] उद्देशक [६], मूलं [ ७८१-७८४] पूज्य आगमोद्धारकश्री संशोधितः मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र - [०५], अंगसूत्र- [०५] “भगवती" मूलं एवं अभयदेवसूरि-रचिता वृत्तिः व्याख्या प्रज्ञप्तिः अभयदेवी या वृत्तिः २ ९०७ ॥ असंखेजइभागे होजा २ संखेज्जेसु भागेसु होजा ३ असंखेजेसु भागेसु होला ४ सहलोए होजा ५१, गोयमा णो संखेज्जहभागे होजा असंखेजहभागे होजा णो संखेजोसु भागेसु होजा णो असंखेजेसु भागेसु होजा णो सङ्घलोए होजा, एवं जाब नियंडे । सिणाए णं पुच्छा, गोयमा ! णो संखेजइभागे होजा असंखेजइभागे होता। णो संखेोसु भागेसु होजा असंखेज्जेसु भागेस होजा सबलोए वा होजा ३२ ॥ ( सूत्र ७८२ ) पुलाए गं भंते! लोगस्स किं संखेजइभागं फुसह असंखेज्जइभागं फुसर ?, एवं जहा ओगाहणा भणिया तहा फुस हभावाः सू णावि भाणिया जाव सिणाए ३३ ॥ (सूत्रं ७८३) पुलाए णं भंते! कतरंभि भावे होजा?, गो० ! खओवसमिए भावे होजा, एवं जाव कसायकुसीले नियंते पुच्छा, गोयमा ! उवसमिए वा भावे होजा खइए वा भावे | होज्जा । सिणाए पुच्छा, गो० ! खाइए भावे होज्जा '३४ ॥ सूत्रं ७८४ ) समुद्घात क्षेत्रावगा ७८१-७८४ 'कसायसमुग्धा 'त्ति चारित्रवतां संज्वलनकषायोदयसम्भवेन कपायसमुद्घातो भवतीति, 'मारणंतिय समुग्धाए'त्ति, इह पुलाकस्य मरणाभावेऽपि मारणान्तिकसमुद्घातो न विरुद्धः समुद्घातान्निवृत्तस्य कपायकुशीलत्वादिपरिणामे सति मरणभावात्, 'नियंठस्स नत्थि एक्कोचि'त्ति तथास्वभावत्वादिति ॥ अथ क्षेत्रद्वारं, तत्र क्षेत्र - अवगाहनाक्षेत्रं, तत्र 'असंखेज्जभागे होज 'त्ति पुलाकशरीरस्य लोका सङ्ख्येय भागमात्रावगाहित्वात् । 'सिणाए ण' मित्यादि, 'असंखेज्जइ भागे होज 'त्ति | शरीरस्थो दण्डकपाटकरणकाले च लोकासोयभागवृत्तिः केवलिशरीरादीनां तावन्मात्रात्यात्, 'असंखेज्जेसु भागेसु १ पुलाकत्वादिनिबन्धनानां चारित्रमोक्षयोपशमादीनामेव विवक्षणात् नात्रौदयिकपारिणामिकायनुक्तौ क्षतिः । • निर्ग्रन्थः, तस्य स्वरुपम्, भेदाः इत्यादि विविध विषय वक्तव्यता For Para Use Only ~ 230~ ४२५ शतक उद्देशः ६ पुलाकादेः ॥ ९०७ ॥ Page #231 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (०५) [भाग-११]"भगवती"-अंगसूत्र-५ (मूलं+वृत्ति:) शतक [२५], वर्ग [-], अंतर्-शतक [-], उद्देशक [६], मूलं [७८१-७८४] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र- [०५], अंगसूत्र- [०५] "भगवती मूलं एवं अभयदेवसूरि-रचिता वृत्ति: प्रत सूत्रांक [७८१-७८४] होज्न'त्ति मथिकरणकाले बहोर्लोकस्य व्याप्तत्वेन स्तोकस्य चाव्याप्ततयोक्तत्वाल्लोकस्यासङ्ख्येयेषु भागेषु स्नातको वर्तते, || लोकापूरणे च सर्वलोके वर्तत इति ॥ स्पर्शनाद्वारे स्पर्शना क्षेत्रवन्नवरं क्षेत्रं अवगाढमात्र स्पर्शना खवगाढव तत्पार्थव-13 तिनश्चेति विशेषः ॥ भावद्वारं च व्यक्तमेव ।। परिमाणद्वारे च पुलाया णं भंते एगसमएणं केवतिया होजा ? गोयमा ! पडिबजमाणए पडुच सिय अस्थि सिय नत्थि, |जह अस्थि जहन्नेणं एक्को वा दो वा तिन्नि वा उक्कोसेणं सयपुहत्तं, पुवपडिचन्नए पडुच सिय अस्थि सिय नथि, जइ अत्थि जहन्नेणं एक्को वा दो वा तिन्नि वा उक्कोसेणं सहस्सपुहत्तं । बउसा णं भंते ! एगसमएणं पुच्छा, गोयमा! पडिवजमाणए पडुच सिय अस्थि सिय नत्थि, जइ अस्थि जहझेणं एक्को वा दो वा तिन्नि वा उक्को सेणं सयपुहत्तं, पुवपडिवन्नए पडुच्च जहन्नेणं कोडिसंयपुहुत्तं उक्कोसेणवि कोडिसयपुहुत्तं, एवं पडिसेवणाकुसीहै लेवि । कसायकुसीलाणं पुच्छा, गोयमा! पडिवजमाणए पटुब सिय अस्थि सिय नस्थि, जइ अस्थि जहन्नेणं भएको वा दो बा तिन्नि वा उकोसेणं सहस्सपुहत्तं, पुखपडिवन्नए पडुच जहन्नेणं कोडिसहस्सपुरत्तं उफोसेणवि | १ यद्यपि भाषापुद्गलोकव्याप्तिर्भाषाभागैः संख्येयैः संख्येयेषु लोकभागेषु अस्ति ततः अत्रापि समुद्धाते सातकस्य संख्येयानां भागानां | पूरणं स्यात् परं तत्र दासकत्वात् पूर्णत्वाब बास्सद्व्यैलोकस्य युक्तं लोकपूरणादर्वाग् लोकसंख्येयभागानां पूरणं न चैवमत्र वासकरवं वास्थद्रव्यपूर्णत्वं वा तेनासंख्येयेषु सर्वलोके चेति भङ्गद्वयमेव, न चात्र मथिषट्, मथिकाले चासंख्येया एवं भागा व्याप्यन्ते ततः, अत एव | जैनसमुद्घातवत् भाषाद्रव्येण लोकापूर्तिनेष्टा । दीप अनुक्रम [९३१-९३४] ****KE | निर्यन्थः, तस्य स्वरुपम, भेदा: इत्यादि विविध-विषय-वक्तव्यता ~231 Page #232 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (०५) [भाग-११]"भगवती"-अंगसूत्र-५ (मूलं+वृत्ति:) शतक [२५], वर्ग [-], अंतर-शतक [-], उद्देशक [६], मूलं [७८५] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र- [०५], अंगसूत्र- [०५] "भगवती मूलं एवं अभयदेवसूरि-रचिता वृत्ति: **** प्रत सूत्रांक [७८५]] प कोडिसहस्सपुहुतं । नियंठाणं पुच्छा, गोयमा! पडिवज्जमाणए पडुच्च सिय अस्थि सिय नस्थि, जइ अस्थि स्था जइआत्या २५ शतके प्रज्ञप्तिः जहनेणं एको वा दो वा तिन्नि वा उक्कोसेणं बावट्ठ सतं, अट्ठसय खबगाणं चउप्पन्नं उवसामगाणं, पुषपडिवनए देशा अभयदेवी-18 पडुब सिय अस्थि सिय नस्थि, जइ अस्थि जहन्नेणं एक्को वा दो वा तिन्नि वा उक्कोसेणं सयपुष्टुत्तं । पुलाकादेः या वृत्तिः २ सिणायाणं पुच्छा, गोयमा! पडिबजमाणए पहुंच सिय अस्थि सिय नस्थि, जइ अस्थि जहन्नेणं एको वाट संख्या दो चा तिन्नि वा उकोसणं अट्ठसतं, पुवपडिवन्नए पहुंच जहन्नेणं कोडिपुहुत्तं उकोसेणवि कोडिपुरतं । एएसिसू७८५ दणं भंते ! पुलागवकुसपडिसेवणाकुसीलकसायकुसीलनियंठसिणायाणं कयरे २ जाव विसेसाहिया वा, है गोयमा! सबथोवा नियंठा पुलागा संखेजगुणा सिणाया संखेजगुणा बउसा संखेज्वगुणा पडिसेवणाकुसीलाले संखेनगुणा कसापकुसीला संखेजगुणा । सेवं भंते ! सेवं भंतेति जाव विहरति ॥ (सूत्रं ७८५)॥ पंचवीसमसयरस छटो उद्देसओ सम्मत्तो ॥ २५॥ ६॥ 'पुलाया ण' मित्यादि, ननु सर्वसंयतानां कोटीसहस्रपृथक्त्वं श्रूयते, इह तु केवलानामेव कपाथकुशीलानां तदुक्तं | ततः पुलाकादिमानानि ततोऽतिरिच्यन्त इति कथं न विरोधः १, उच्यते, कषायकुशीलानां यत् कोटीसहस्रपृथक्त्वं तद्वित्रादिकोटीसहस्ररूपं कल्पयित्वा पुलाकबकुशादिसङ्ख्या तत्र प्रवेश्यते ततः समस्तसंयतमानं यदु तन्नातिरिच्यत इति ॥ अल्पबहुत्वद्वारे-'सबथोवा नियंठ'त्ति तेषामुत्कर्षतोऽपि शतपृथक्त्वसङ्ख्यत्वात् , 'पुलागा संखेजगुण'त्ति तेषामुत्कर्षतः सहस्रपृथक्त्वसङ्ख्यत्वात् , 'सिणाया संखेजगुण'त्ति तेषामुत्कर्षतः कोटीपृथक्त्वमानत्वात्, 'बउसा संखेजगुण'त्ति तेषा-1 CROCOCCCCC दीप अनुक्रम [९३५] ************ निम्रन्थः, तस्य स्वरुपम्, भेदा: इत्यादि विविध-विषय-वक्तव्यता ~232 Page #233 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (०५) [भाग-११]"भगवती"-अंगसूत्र-५ (मूलं+वृत्ति:) शतक [२५], वर्ग -], अंतर्-शतक [-1, उद्देशक [६], मूलं [७८५] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र- [०५], अंगसूत्र- [०५] "भगवती मूलं एवं अभयदेवसूरि-रचिता वृत्ति: A CL प्रत सूत्रांक [७८५] मुत्कर्षतः कोटीशतपृथक्त्वमानस्वात् , 'पडिसेवणाकुसीला संखेनगुण'ति, कथमेतत् तेषामप्युत्कर्षतः कोटीशतपृथक्त्वमानतयोकत्वात् , सत्यं, किन्तु बकुशानां यत्कोटीशतपृथक्त्वं तवित्रादिकोटीशतमानं प्रतिसेविनां तु कोटीशतपृथक्त्वं चतुःषट्कोटीशतमानमिति न विरोधः, कषायिणां तु सङ्ख्यातगुणत्वं व्यकमेवोत्कर्षतः कोटीसहनपृथक्त्वमानतया तेषामुक्तत्वादिति ॥ ॥पञ्चविंशतितमशते षष्ठः ॥ २५-६ ॥ दीप अनुक्रम [९३५] पष्ठोद्देशके संयतानां स्वरूपमुक्त, सप्तमेऽपि तदेवोच्यते इत्येवंसम्बन्धस्यास्पेदमादिसूत्रम्-'कइ णं भंते !' इत्यादि, |इहापि प्रज्ञापनादीनि द्वाराणि वाच्यानि, तत्र प्रज्ञापनाद्वारमधिकृत्योकम् कति णं भंते ! संजया पत्नत्ता?, गोयमा ! पंच संजया पं०.२०-सामाइयसंजए छेदोवद्यावणियसंजए परि-12 हारविमुद्धियसंजए सुहमसंपरायसंजए अहक्खायसंजए, सामाइयसंजए णं भंते ! कतिविहे पन्नत्ते, गोय-15 मा! दुविहे पन्नत्ते, तंजहा-इत्तरिए य आवकहिए य, छेओवट्ठावणियसंजए णं पुच्छा, गोयमा! दुविहे प०, तं.-सातियारे य निरतियारे य, परिहारविसुद्वियसंजए पुच्छा, गोयमा दुविहे पं०,०-णिविसमाणए जय निविट्टकाइए य, सुहमसंपरागपुच्छा, गोयमा ! दुबिहे पं०, तं०-संकिलिस्समाणए य विसुद्धमाणए य, ६ अहक्खायसंजए पुच्छा, गोयमा ! दुविहे पं०,०-छउमत्थे य केवली य॥ सामाइयंमि उ कए चाउजाम अणुत्तरं धम्म । तिविहेणं फासयंतो सामाइयसंजओ स खलु ॥१॥ छेत्तूण उ परियागं पोराणं जो ठवेह । 1626464584453 CAKESHABROAD अत्र पञ्चविंशतितमे शतके षष्ठं-उद्देशक: परिसमाप्त: अथ पञ्चविंशतितमे शतके सप्तम-उद्देशक: आरभ्यते संयत, तस्य स्वरुपम्, सामायिकसंयत आदि पञ्च-भेदा:, संयतस्य विविध-वक्तव्यता ~233 Page #234 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (०५) [भाग-११]"भगवती"-अगसूत्र-५ (मूल+वृत्ति:) शतक [२५], वर्ग [-], अंतर्-शतक [-1, उद्देशक [७], मूलं [७८६] + गाथा: पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र- [०५], अंगसूत्र- [०५] "भगवती मूलं एवं अभयदेवसूरि-रचिता वृत्ति: प्रत सूत्रांक [७८६] गाथा: व्याख्या- अप्पाणं । धम्ममि पंचजामे छेदोवट्ठावणो स खलु ॥ २॥ परिहरइ जो विसुद्धं तु पंचयामं अणुत्तरं धम्मं । २५ शतके मज्ञप्तिः तिविहेणं फासयंतो परिहारियसंजओ स खलु ॥३॥ लोभाणु वेययंतो जो खलु उवसामओ व खवओवा। अभयदेवीसो सुहमसंपराओ अहखाया जणओ किंचि ॥ ४॥ अवसंते खीणमि व जो खलु कम्ममि मोहणिज्नंमि । छउ-1 | सामायि. या वृत्तिः२५ मस्थो व जिणो वा अहखाओ संजओ स खलु ॥५॥ (सूत्रं ७८६) कादिस्वरू -दसू७८६ ॥९०९॥ | कति णं भंते । इत्यादि, 'सामाइयसंजए'त्ति सामायिक नाम चारित्रविशेषस्तत्प्रधानतेन वा संयतः सामायिकर्स- 12 | यतः, एवमन्येऽपि, 'इत्तरिए यत्ति इत्वरस्य-भाविव्यपदेशान्तरत्वेनाल्पकालिकस्य सामायिकस्यास्तित्वादित्वरिका, स चारोपयिष्यमाणमहाव्रतः प्रथमपश्चिमतीर्थकरसाधुः, 'आक्कहिए यत्ति यावत्कधिकस्य-भाविन्यपदेशान्तराभावाद् यावजीविकस्य सामायिकस्यास्तित्वाधावत्कथिका, स च मध्यमजिनमहाविदेहजिनसम्बन्धी साधुः,'साइयारे यत्ति साति-5 & चारस्य यदारोप्यते तत्सातिचारमेव छेदोपस्थापनीयं, तद्योगात्साधुरपि सातिचार एव, एवं निरतिचारच्छेदोपस्थापनीययो-टू गानिरतिचारः स च शैक्षकस्य पार्श्वनाथतीर्थान्महावीरतीर्थसक्रान्ती वा, छेदोपस्थापनीयसाधुश्च प्रथमपश्चिमतीधयोरेव है | भवतीति, 'णिधिसमाणए यत्ति परिहारिकतपस्तपस्यन् 'निविट्टकाइए य'ति निर्विशमानकानुचरक इत्यर्थः, 'संकिलि-|| स्समाणए'त्ति उपशमश्रेणीतः प्रच्यवमानः 'विसुद्धमाणए यत्ति उपशमश्रेणी क्षपकश्रेणी वा समारोहन्, 'एउमत्थे || |य केवली यति व्यक्तम् ॥ अथ सामायिकसंयतादीनां स्वरूपं गाथाभिराह-सामाइयंमि उगाहा, सामायिक एव ॥९०९॥ प्रतिपन्ने न तु छेपस्थापनीयादौ 'चतुर्याम' चतुर्महाव्रतम् 'अनुत्तरं धर्म' श्रमणधर्ममित्यर्थः 'त्रिषिधेन मनःप्रभृतिना दीप % अनुक्रम [९३६-९४१] -१ 4-१४ | संयत, तस्य स्वरुपम, सामायिकसंयत आदि पञ्च-भेदा:, संयतस्य विविध-वक्तव्यता ~2344 Page #235 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (०५) [भाग-११]"भगवती"-अंगसूत्र-५ (मूलं+वृत्ति:) शतक [२५], वर्ग [-], अंतर्-शतक [-1, उद्देशक [७], मूलं [७८६] + गाथा: पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र- [०५], अंगसूत्र- [०५] "भगवती मूलं एवं अभयदेवसूरि-रचिता वृत्ति: प्रत सूत्रांक [७८६] गाथा: है 'फासयंतोति स्पृशन-पालयन् यो वर्तते इति शेषः सामायिकसंयतः सः 'खलु निश्चितमित्यर्थः, अनया च गाथया यावत्कथिकसामायिकसंयतः उक्तः, इत्वरसामायिकसंयतस्तु स्वयं वाच्यः॥१॥'छेत्तण गाहा, कण्ठ्या, नवरं 'छेदोव-IN हावणे'त्ति छेदेन-पूर्वपर्यायच्छेदेन उपस्थापनं व्रतेषु यत्र तच्छेदोपस्थानं तद्योगाचछेदोपस्थापना, अनया च गाथया सातिचार इतरश्च द्वितीयसंयत उक्तः ॥२॥ 'परिहरई गाहा, परिहरति-निर्विशमानकादिभेदं तप आसेवते यः साधुः, किं कुर्वन् । इत्याह-विशुद्धमेव 'पश्चयाम' अनुत्तरं धर्म त्रिविधेन स्पृशन, परिहारिकसंयतः स खल्विति, पञ्चयाममित्य नेन च प्रथमचरमतीर्थयोरेव तत्सत्तामाह ॥३॥'लोभाणुगाहा, 'लोभाणन लोभलक्षणकषायसूक्ष्मकिट्टिकाः वेदयन द यो वर्तत इति, शेषं कण्ठ्यम् ॥ ४॥ 'उवसंते' गाहा, अयमर्थः-उपशान्ते मोहनीये कर्मणि क्षीणे वा यश्छद्मस्थो जिनो वा वर्तते स यथाख्यातसंयतः खल्विति ॥ ५॥ वेदद्वारे सामाइयसंजए णं भंते! किं सवेदए होजा अवेदए होजा?, गोयमा! सवेदए वा होजा अवेदए वा | होज्जा, जइ सवेदए एवं जहा कसायकुसीले तहेव निरवसेस, एवं छेदोवट्ठावणियसंजएवि, परिहारविसुद्धियसंजओ जहा पुलाओ, मुहुमसंपरायसंजओ अहक्खायसंजओ य जहा नियंठोशसामाइयसंजए णं भंते । किं सरागे होजा वीयरागे होजा, गोयमा सरागे होज्जा नो वीयरागे होजा, एवं सुहमसंपरायसंजए, अहक्खायसंजए जहा नियंठे ३॥ सामाइयसंजमेणं भंते! किं ठियकप्पे होजा अट्ठियकप्पे होजा, गोयमा! ठियकप्पे वा होज्जा अट्ठियकप्पे वा होजा, छेदोचठ्ठावणियसंजए पुच्छा, गोयमा ! ठियकप्पे होजा नो अहि दीप अनुक्रम [९३६-९४१] RELIGunintentATHREE For P OW | संयत, तस्य स्वरुपम, सामायिकसंयत आदि पञ्च-भेदा:, संयतस्य विविध-वक्तव्यता ~235 Page #236 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (०५) [भाग-११]"भगवती"-अंगसूत्र-५ (मूलं+वृत्ति:) शतक [२५], वर्ग [-], अंतर्-शतक [-], उद्देशक [७], मूलं [७८७-७८८] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र- [०५], अंगसूत्र- [०५] "भगवती मूलं एवं अभयदेवसूरि-रचिता वृत्ति: प्रत सूत्रांक [७८७-७८८] दीप व्याख्या यकप्पे होजा, एवं परिहारविमुहियसंजएवि, सेसा जहा सामाइयसंजए। सामाइयसंजए णं भंते! किं||२५ शतके प्रज्ञप्तिः || जिणकप्पे होज्जा थेरकप्पे वा होज्जा कप्पातीते वा होजा?, गोयमा! जिणकप्पे वा हो जहा कसायकुसीले उद्देश अभयदेवी- तहेव निरवसेसं, छेदोवद्यावणिओ परिहारविसुद्धिओ य जहा बउसो, सेसा जहा नियंठे ४॥ (सूत्रं ७८७) सामायिया वृत्तिः२] सामाझ्यसंजए णं भंते ! किं पुलाए होला बउसे जाव सिणाए होज्जा ?, गोयमा ! पुलाए वा होजा बउसे कादेम्वेदा. ॥९१०॥ जाव कसायकुसीले वा होजा नो नियंठे होजा नो सिणाए होला, एवं छेदोवद्यावणिएवि, परिहारविसुद्धिय-8 दि पुलासंजए ण भंते ! पुच्छा, गोयमा ! नो पुलाए नो बउसे नो पडिसेवणाकुसीले होजा कसायकुसीले होजा Movie CP कादि सू Mनो नियंठे होजा नो सिणाए होवा, एवं सुहमसंपराएवि, अहक्वायसंजए पुच्छा, गोयमा नो पुलाए होजा जाव नो कसायकुसीले होना नियंठे वा होजा सिणाए वा हो०५॥ सामाइयसंजए णं भंते ! किं पडिसेवए। हो. अपडिसेवए होजा?, गोयमा! पडिसेवए वा होज्जा अपडिसेवए वा होना, जइ पडिसेवए होजा * किं मूलगुणपडिसेवए होज्जा सेसं जहा पुलागस्स, जहा सामाइयसंजए एवं छेदोवट्ठावणिएवि, परिहारविसु द्विपसंजए पुच्छा, गोयमा! नो पडिसेवए होजा अपडिसेवए होजा एवं जाव अहक्खापसंजए ६॥ सामा|इयसंजए ण भंते ! कतिसु नाणेसु होजा, गोयमा ! दोसु वा तिसु वा चउसु वा नाणेसु होजा, एवं जहा X ॥९१०॥ *कसायकुसीलस्स तदेव चत्तारि नाणाई भयणाए, एवं जाव सुहमसंपराए, अहक्खायसंजयस्स पंच नाणाई। भयणाए जहा नाणुझसए । सामाइयसंजए णं भंते ! केवतियं सुयं अहिजेजा, गोयमा ! जहन्नेणं अट्ठ पव-181 अनुक्रम [९४२-९४३] | संयत, तस्य स्वरुपम, सामायिकसंयत आदि पञ्च-भेदा:, संयतस्य विविध-वक्तव्यता ~236~ Page #237 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (०५) [भाग-११]"भगवती"-अंगसूत्र-५ (मूलं+वृत्ति:) शतक [२५], वर्ग [-], अंतर्-शतक [-], उद्देशक [७], मूलं [७८७-७८८] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र- [०५], अंगसूत्र- [०५] "भगवती मूलं एवं अभयदेवसूरि-रचिता वृत्ति: प्रत सूत्रांक [७८७-७८८] दीप यणमायाओ जहा कसायकुसीले, एवं छेदोबहावणिएवि, परिहारविसुद्धियसंजए पुच्छा, गोपमा ! जहन्नेणं | नवमस्स पुचस्स ततियं आयारवत्थु उक्कोसेणं असंपुनाई दस पुवाई अहिज्जेजा, मुहमसंपरायसंजए जहा !X सामाइयसंजए, अहक्खायसंजए पुच्छा, गोयमा ! जहन्नेणं अट्ट पवयणमायाओ उकोसेणं चोदस पुवाई अहिजेज्जा सुयवतिरित्ते वा होजा । सामाझ्यसंजए णं भंते! किं तित्थे हो. अतित्थे होजा?, गोयमा! ४ तित्थेवा होज्जा अतित्थे वा होज्जा जहा कसायकुसीले, छेदोवद्यावणिए परिहारविसुद्धिए य जहा पुलाए, सेसा जहा सामाझ्यसंजए ८ । सामाइयसंजए णं भंते ! किं सलिंगे होजा अन्नलिंगे होला गिहिलिंगे होज्जा जहा पुलाए, एवं छेदोवडायणिएवि, परिहारिविमुद्वियसंजए णं भंते! किं पुच्छा, गोयमा! दवलिंगपि भावलिंगपि 18|| पडुच सलिंगे होजा नो अनलिंगे होजा नो गिहिलिंगे होजा, सेसा जहा सामाइयसंजए ९। सामाइयसंजए भंते ! कतिसु सरीरेसु होजा?, गोयमा! तिसु वा चउसु वा पंचसु वा जहा कसायकुसीले, एवं छेदोवट्ठा-14 घणिएवि, सेसा जहा पुलाए १० सामाइयसंजए णं भंते ! किं कम्मभूमीए होजा अकम्मभूमीए होजा, गोयमा ! जम्मणं संतिभावं च पडुच्च कम्मभूमीए नो अकम्मभूमीए जहा बउसे, एवं छेदोवहावणिएवि, दीपरिहारविसुद्धिए य जहा पुलाए, सेसा जहा सामाइयसंजए ११॥ (सूत्रं ७८८) *|| सामायिकसंयतोऽवेदकोऽपि भवेत, नवमगुणस्थानके हि वेदस्योपशमः क्षयो वा भवति, नवमगुणस्थानकं च याव| सामायिकसयतोऽपि व्यपदिश्यते, 'जहा कसायकुसीले'त्ति सामायिकसंयतः सवेदस्त्रिवेदोऽपि स्यात्, अवेदस्तु क्षीणो KARATAX अनुक्रम [९४२-९४३] For P OW | संयत, तस्य स्वरुपम, सामायिकसंयत आदि पञ्च-भेदा:, संयतस्य विविध-वक्तव्यता ~237 Page #238 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (०५) [भाग-११]"भगवती"-अंगसूत्र-५ (मूलं+वृत्ति:) शतक [२५], वर्ग [-], अंतर्-शतक [-], उद्देशक [७], मूलं [७८७-७८८] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र- [०५], अंगसूत्र- [०५] "भगवती मूलं एवं अभयदेवसूरि-रचिता वृत्ति: प्रत सूत्रांक [७८७-७८८] दीप व्याख्या पशान्तवेद इत्यर्थः । 'परिहारविसुद्धियसंजए जहा पुलागो'त्ति पुरुषवेदो वा पुरुषनपुंसकवेदो वा स्यादित्यर्थः, 'मुहु २५ शतके 'प्रज्ञप्ति मसंपराये'त्यादी 'जहा नियंठो'त्ति क्षीणोपशान्तवेदत्वेनावेदक इत्यर्थः । एवमन्यान्यप्यतिदेशसूत्राण्यनन्तरोद्देशकानु- उद्देशः ७ सारेण स्वयमवगन्तव्यानीति ॥ कल्पद्वारे-'णो अट्ठियकप्पे'त्ति अस्थितकल्पो हि मध्यमजिनमहाविदेहजिनतीर्थेषु भवति, कालगतिया वृत्तिः२ तत्र च छेदोपस्थापनीयं नास्तीति ॥ चारित्रद्वारमाश्रित्येदमुक्तम्-'सामाश्यसंजए णं भंते ! किं पुलाए' इत्यादि | संयमस्था पुलाकादिपरिणामस्य चारित्रत्वात् ॥ ज्ञानद्वारे-'अहक्खायसंजयस्स पंच नाणाई भयणाए जहा णाणुदेसए'त्ति, नचरित्र॥९११॥ इह च ज्ञानोद्देशकः-अष्टमशतद्वितीयोद्देशकस्य ज्ञानवक्तव्यतार्थमवान्तरप्रकरणं,भजना पुनः केवलियथाख्यातचारित्रिणः पर्यवाः सू केवलज्ञानं छद्मस्थवीतरागयथाख्यातचारित्रिणो द्वे वा त्रीणि वा चत्वारि वा ज्ञानानि भवन्तीत्येवंरूपा, श्रुताधिकारे । ॥७८९-७९२ यथाख्यातर्सयतो यदि निर्ग्रन्थस्तदाऽष्टप्रवचनमात्रादिचतुर्दशपूर्वान्तं श्रुतं यदि तु स्नातकस्तदा श्रुतातीतोऽत एवाह'जहन्नेणं अट्ठ पवयणमायाओं इत्यादि । कालद्वारे। सामाइयसंजए णं भंते । किं ओसप्पिणीकाले होला उस्सप्पिणिकाले होजा नोओसप्पिणिनोजस्सप्पिणिकाले होजा?, गोयमा ! ओसप्पिणिकाले जहा बउसे, एवं छेदोवट्ठावणिएवि, नवरं जम्मणं संतिभावं(च) पडुच चउसुवि पलिभागेसु नस्थि साहरणं पहुच अन्नयरे पडिभागे होजा, सेसं तं चेव, परिहारविसुद्धिए । All पुच्छा, गोयमा ! ओसप्पिणिकाले वा होजा उस्सप्पिणिकाले वा होजा नोओसप्पिणिनोउस्सप्पिणिकाले | नोहोजा, जइ ओसप्पिणिकाले होजा जहा पुलाओ, उस्सप्पिणिकालेवि जहा पुलाओ, सुहमसंपराइओ जहा ॥९११॥ GANGRECORRC अनुक्रम [९४२-९४३] For P OW aalaanasurary.orm | संयत, तस्य स्वरुपम्, सामायिकसंयत आदि पञ्च-भेदाः, संयतस्य विविध-वक्तव्यता ~238~ Page #239 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (०५) [भाग-११]"भगवती"-अंगसूत्र-५ (मूलं+वृत्ति:) शतक [२५], वर्ग [-], अंतर्-शतक [-1, उद्देशक [७], मूलं [७८९-७९२] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र- [०५], अंगसूत्र- [०५] "भगवती मूलं एवं अभयदेवसूरि-रचिता वृत्ति: प्रत सूत्रांक [७८९-७९२] नियंठो, एवं अहक्खाओवि १२॥(सूत्रं ७८९) सामाइयसंजए णं भंते! कालगए समाणे किं गतिं गच्छति? दिगोयमा ! देवगतिं गच्छति, देवगतिं गच्छमाणे किं भवणवासीसु उबव० वाणमंतर. उववजेजा जोइ-13 सिएसु उववजेज्जा बेमाणिएसु उववज्जेजा ?, गो! णो भवणवासीसु उववज्जेजा जहा कसायकुसीले, एवं छेदोवट्ठावणिएवि, परिहारविसुद्धिए जहा पुलाए, सुहमसंपराए जहा नियंठे, अहक्खाए पुच्छा, गोयमा। एवं अहकखायसंजएवि जाव अजहन्नमणुकोसेणं अणुत्तरविमाणेसु उववज्जेजा, अत्धेगतिए सिझंति जावला ★ अंतं करेंति ॥ सामाइयसंजए णं भंते ! देवलोगेसु उववजमाणे किं इंदत्ताए उववजति पुच्छा, गोयमा! अविराहणं पहुच एवं जहा कसायकुसीले, एवं छेदोवट्ठावणिएवि, परिहारविसुद्धिए जहा पुलाए, सेसा जहा 2 नियंठे । सामाइयसंजयस्स णं भंते ! देवलोगेसुउवबजमाणस्स केवतियं कालं ठिती प०१,गोयमा! जहन्नेणं दो पलिओषमाई कोसेणं तेत्तीसं सागरोवमाई, एवं छेदोवट्ठावणिएचि, परिहारविसुद्धियरस पुच्छा, गोयमा: जहन्नेणं दो पलिओवमाई उक्कोसेणं अट्ठारस सागरोवमाई, सेसाणं जहा नियंठस्स १३ ।। (सूत्रं ७९०)सामा| इयसंजयस्स णं भंते ! केवइया संजमट्ठाणा पन्नत्ता?, गोयमा ! असंखेजा संजमठाणा प०, एवं जाव परि-ट्र हारविसुद्धियस्स, सुहमसंपरायसंजयस्स पुच्छा, गोयमा! असंखेज्जा अंतोमुहुतिया संजमट्ठाणा प०, अह|क्खायसंजयस्स पुच्छा, गोयमा! एगे अजहन्नमणुकोसए संजमट्ठाणे । एएसिणं भंते! सामाइयछेदोवद्या| वणियपरिहारविसुद्धियसुहमसंपरागअहक्खायसंजयाणं संजमट्ठाणाणं कयरे २ जाव विसेसाहिया था ? अनुक्रम [९४४-९४८..] | संयत, तस्य स्वरुपम, सामायिकसंयत आदि पञ्च-भेदा:, संयतस्य विविध-वक्तव्यता ~239~ Page #240 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (०५) [भाग-११]"भगवती"-अंगसूत्र-५ (मूलं+वृत्ति:) शतक [२५], वर्ग [-], अंतर्-शतक [-], उद्देशक [७], मूलं [७८९-७९२] प्रत सूत्रांक [७८९-७९२] व्याख्या-का ६|| गोयमा ! सबस्योवे अहक्खायसंजमस्स एगे अजहन्नमणुकोसए संजमट्ठाणे सुहुमसंपरागसंजयस्स अंतोमुहु | २५ शतके प्रज्ञप्तिः ||त्तिया संजमट्ठाणा असंखेजगुणा परिहारबिसुद्धियसंजयस्स संजमट्ठाणा असंखेजगुणा सामाइयसंजयस्साशा अभयदेवी- छेदोवद्यावणियसंजयस्सय एएसिणं संजमहाणा दोण्हवि तुल्ला असंखेजगुणा १४ ।। (सूत्रं७९१) सामाइय- कालगतियावृत्तिः२|| संजयस्स णं भंते ! केवइया चरित्तपजवा प०१, गोयमा ! अणंता चरित्तपजवा प० एवं जाव अहक्खायसं-18| संया संयमस्था॥९१२॥ जयस्स ॥ सामाइयसंजए णं भंते ! सामाइयसंजयस्स सट्टाणसन्निगासेणं चरित्तपनवेहिं किं हीणे तुल्ले अभ-* नचरित्रहिए ?, गोयमा! सिय हीणे छट्ठाणवडिए, सामाइयसंजए णं भंते ! छेदोवट्ठावणियसंजयस्स परहाणसन्निगा पर्यवाः सू ४ सेणं चरितपजवेहिं पुच्छा, गोपमा ! सिय हीणे छट्ठाणवडिए, एवं परिहारविसुद्धियस्सवि, सामाइयसंजए ७८९-७९२ दणं भंते ! सुहुमसंपरागसंजयस्स परढाणसन्निगासेणं चरित्तपज्जवे पुच्छा, गोयमा !हीणे नो तुल्ले नो अब्भ हिए अणंतगुणहीणे, एवं अहक्खायसंजयस्सवि, एवं छेदोवडावणिएवि, हेडिल्लेसु तिमुवि समं छहाणवहिए 3 उवरिल्लेसु दोसु तहेव हीणे, जहा छेदोवट्ठावणिए तहा परिहारविसुद्धिएवि, मुहुमसंपरागसंजए णं भंते ! दिसामाइयसंजयस्स परहाण पुच्छा, गोयमा!नो ही नोतुल्ले अग्भहिए अर्णतगुणमम्महिए, एवं छेओवट्ठावणि यपरिहारविसुद्धिएमुवि समं सहाणे सिय हीणे नो तुल्ले सिय अन्महिए, जइहीणे अर्णतगुणहीणे अह अन्भहिए|| Dh ४ अर्णतगुणमम्भहिए, सुहमसंपरायसंजयरस अहक्खायसंजयस्स परहाणे पुच्छा, गोयमा ! हीणे नो तुल्ले नो x अन्भहिए अर्णतगुणहीणे, अहक्खाए हेडिल्लाणं चउपहवि नो हीणे नो तुल्ले अन्भहिए अर्णतगुणमन्भहिए, RERAKAR दीप अनुक्रम [९४४-९४८..] wwjanatarary.om संयत, तस्य स्वरुपम, सामायिकसंयत आदि पञ्च-भेदा:, संयतस्य विविध-वक्तव्यता ~240 Page #241 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (०५) [भाग-११]"भगवती"-अंगसूत्र-५ (मूलं+वृत्ति:) शतक [२५], वर्ग [-], अंतर्-शतक [-], उद्देशक [७], मूलं [७८९-७९२] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र- [०५], अंगसूत्र- [०५] "भगवती मूलं एवं अभयदेवसूरि-रचिता वृत्ति: क क प्रत सूत्रांक [७८९-७९२] टीप %45-4600-56455-25645-46-2 || सहाणे नो हीणे तुल्ले नो अम्भहिए। एएसि णं भंते ! सामाइयछेदोवट्ठावणियपरिहारविसुद्धिपसुहमसंपराय अहक्खापसंजयाणं जहन्नकोसगाणं चरितपजवाणं कयरे २ जाव विसेसाहिया वा?, गोयमा! सामाइय| संजयस्स छेओबट्ठावणियसंजयस्स य एएसिणं जहन्नगा चरित्तपजवा दोण्हवि तुला सवत्थोवा परिहारविसुद्धि-100 यसंजयस्स जहन्नगा चरित्तपजवा अणंतगुणा तस्स चेव उकोसगाचरित्तपजवा अणंतगुणा सामाइयसंजयस्स छेओवट्ठावणियसंजयस्स य एएसिणं उकोसगा चरित्तपजवा दोण्हवि तुल्ला अनंतगुणा सुहमसंपरायसंजयस्स जहन्नगा चरित्तपज्जवा अणंतगुणा तस्स चेव उक्कोसगा चरित्तपजवा अणंतगुणा अहक्खायसंजयस्स अजहन्नमणुक्कोसगा चरित्तपज्जवा अर्णतगुणा १५॥ सामाइयसंजए णं भंते! किं सजोगी होज्जा अजोगी होजा?, गोयमा ! सजोगी जहा पुलाए एवं जाच सुहुमसंपरायसंजए अहक्खाए जहा सिणाए १६॥सामाइपसंजए णं भंते ! किं सागारोवउत्ते होजा अणागारोवउ०१, गोयमा! सागारोवउत्ते जहा पुलाए एवं जाव अहक्खाए, | नवरं सुहमसंपराए सागारोवउत्ते होजा नो अणागारोवउत्से होजा १७ ॥ सामाइयसंजए णं भंते ! किं सकसायी होजा अकसायी होजा?, गोयमा! सकसायी होज्जा नो अकसायी होजा, जहा कसायकुसीले, एवं छेदोवट्ठायणिएवि, परिहारविसुद्धिए जहा पुलाए, मुहुमसंपरागसंजए पुच्छा, गोयमा ! सकसायी होजा नो अकसायी होजा, जइ सकसायी होजा से णं भंते ! कतिसु कसायेसु होला ?, गोयमा! एगमि संजलणलोभे होजा, अहक्खायसंजए जहा नियंठे १८॥ सामाइयसंजए णं भंते ! किंसलेस्से होज्जा अलेस्से होजा? - ब- अनुक्रम [९४४-९४८..] . SAREastatinintennational | संयत, तस्य स्वरुपम, सामायिकसंयत आदि पञ्च-भेदा:, संयतस्य विविध-वक्तव्यता ~241 Page #242 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (०५) [भाग-११]"भगवती"-अंगसूत्र-५ (मूलं+वृत्ति:) शतक [२५], वर्ग [-], अंतर्-शतक [-1, उद्देशक [७], मूलं [७८९-७९२] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र- [०५], अंगसूत्र- [०५] "भगवती मूलं एवं अभयदेवसूरि-रचिता वृत्ति: प्रत सूत्रांक [७८९ २५ शतके उद्देशः ७ सामायिकादीनां सद्भावादि सू ७९२ -७९२] ख्या-1 गोयमा! सलेस्से होजा जहा कसायकुसीले, एवं छेदोवट्ठावणिएवि, परिहारविसुद्धिए जहा पुलाए, प्राप्तिः सुहमसंपराए जहा नियंठे, अहक्खाए जहा सिणाए, नवरं जइ सलेस्से होजा एगाए सुफलेस्साए अभयदेवी होजा १९॥ (सूत्रं ७९२) या वृत्तिः / 'एवं छेओबहायणिएवित्ति, अनेन बकुशसमानः कालतश्छेदोपस्थापनीयसंयत उक्तः, तत्र च चकुशस्योत्सप्पिण्यव-| ॥९१३॥ सर्पिणीव्यतिरिक्तकाले जन्मतः सद्भावतश्च सुषमसुषमादिप्रतिभागत्रये निषेधोऽभिहितः दुष्षमसुषमाप्रतिभागे च विधिः छेदोपस्थापनीयसंयतस्य तु तत्रापि निषेधार्थमाह-'नवर मित्यादि । संयमस्थानद्वारे-सहुमसंपराये'त्यादौ 'असंखेज्या अंतोमुहुत्तिया संजमट्ठाण'त्ति अन्तर्मुहुर्ते भवानि आन्तर्मुहर्तिकानि, अन्तर्मुहर्तप्रमाणा हि तदद्धा, तस्थाश्च प्रतिसमय चरणविशुद्भिविशेषभावादसोयानि तानि भवन्ति, यथाख्याते त्वेकमेव, तदद्धायाश्चरणविशुद्धेनिर्विशेषत्वादिति ।। संयमस्थानाल्पबहुत्वचिन्तायां तु किलासद्भावस्थापनया समस्तानि संयमस्थानान्येकविंशतिः, तत्रैकमुपरितनं यथाण्यातस्य, ततोऽधस्तनानि चत्वारि सूक्ष्मसम्परायस्य, तानि च तस्मादसोयगुणानि दृश्यानि, तेभ्योऽधश्चत्वारि परिहत्यान्यान्यष्टौ परिहारिकस्य, तानि च पूर्वेभ्योऽसमवेयगुणानि दृश्यानि, ततः परिहतानि, यानि चत्वार्यष्टौ च पूर्वोक्तानि | तेभ्योऽन्यानि च चत्वारीत्येवं तानि पोडश सामायिकच्छेदोपस्थापनीयसंयतयोः, पूर्वेभ्यश्चैतान्यसङ्ख्यातगुणानीति ॥ सग्नि|कर्षद्वारे-'सामाइयसंजमे थे भंते ! सामाइयसंजयस्से'त्यादौ 'सिय हीणे'त्ति असङ्ख्यातानि तस्य संयमस्थामानि, तत्र च यदैको हीनशुद्धिकेऽन्यस्त्वितरत्र वर्तते तदैको हीनोऽन्यस्त्वभ्यधिकः, यदा तु समाने संयमस्थाने वर्चेते तदा तुल्ये, अनुक्रम [९४४-९४८..] ॥९१३ RELIEatunintentATARTE | संयत, तस्य स्वरुपम्, सामायिकसंयत आदि पञ्च-भेदाः, संयतस्य विविध-वक्तव्यता ~242 Page #243 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (०५) [भाग-११]"भगवती"-अंगसूत्र-५ (मूलं+वृत्ति:) शतक [२५], वर्ग [-], अंतर्-शतक [-1, उद्देशक [७], मूलं [७८९-७९२] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र- [०५], अंगसूत्र- [०५] "भगवती मूलं एवं अभयदेवसूरि-रचिता वृत्ति: प्रत सूत्रांक [७८९-७९२] महीनाधिकत्वे च षट्स्थानपतितत्वं स्थादत एवाह-छट्ठाणवडिएत्ति ॥ उपयोगद्वारे-सामायिकसंयतादीनां पुलाकवदुप योगद्वयं भवति, सूक्ष्मसम्परायसंयतस्य तु विशेषोपदर्शनार्थमाह-'नवरं सुहमसंपराइए'इत्यादि, सूक्ष्मसम्परायः साकारोपयुक्तस्तथास्वभावत्वादिति ॥ लेण्याद्वारे-यथाख्यातसंयतः स्नातकसमान उक्तः, स्नातकश्च सलेश्यो वा स्थादलेश्यो वा, यदि सलेश्यस्तदा परमशुक्ललेश्यः स्यादि त्येवमुक्ता, यथाख्यातसंयतस्य तु निम्रन्थत्वापेक्षया निर्विशेषेणापि शुक्ललेश्या | स्यादतोऽस्य विशेषस्याभिधानार्थमाह-'नवरं जई'त्यादि । परिणामद्वारे सामाझ्यसंजए णं भंते ! किं घहमाणपरिणामे होजा हीयमाणपरिणामे अवडियपरिणामे ?, गोयमा ! बहुमाणपरिणामे जहा पुलाए, एवं जाव परिहारविसुद्धिए, सुहमसंपराय पुच्छा, गोयमा! बहुमाणपरिणामे वा होजा हीयमाणपरिणामे वा होजा नो अवट्ठियपरिणामे होजा, अहक्खाए जहा नियंठे। सामाइयसंजए णं X भंते ! केवतियं कालं बहमाणपरिणामे होजा?, गोयमा !जह एक समयं जहा पुलाए, एवं जाव परिहार-14 | विमुद्धिएचि, सुहमसंपरागसंजए णं भंते ! केवतियं कालं बहुमाणपरिणामे होजा, गोयमा! जहन्नेणं एक समयं उफोसेणं अंतोमुहुरतं, केवतियं कालं हीयमाणपरिणामे एवं चेव, अहक्वायसंजए णं भंते ! केवतियं कालं बङमाणपरिणामे होजा, गोयमा। जहन्नेणं अंतोमुत्तं उफोसेणचि अंतोमुत्तं, केवतियं कालं अवट्ठिय परिणामे होजा, गोयमा ! जहनेणं एक समयं उक्कोसेणं देसूणा पुवकोडी २०॥ (सूत्रं ७९३) 'सुहमसंपराये इत्यादी, 'वहमाणपरिणामे वा होज्जा हीयमाणपरिणामे वा होज्जा नो अवट्ठियपरिणामे होज'त्ति अनुक्रम [९४४-९४८..] For P OW | संयत, तस्य स्वरुपम, सामायिकसंयत आदि पञ्च-भेदा:, संयतस्य विविध-वक्तव्यता ~2434 Page #244 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (०५) प्रत सूत्रांक [७८९ -७९२] दीप अनुक्रम [९४४ -९४८..] [भाग-११]“भगवती”- अंगसूत्र -५ (मूलं + वृत्ति:) शतक [२५], वर्ग [-], अंतर् शतक [-], उद्देशक [७], मूलं [७९३-७९६] पूज्य आगमोद्धारकश्री संशोधितः मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र - [०५], अंगसूत्र- [०५] “भगवती" मूलं एवं अभयदेवसूरि-रचिता वृत्तिः व्याख्याप्रज्ञप्तिः अभयदेवीया वृत्तिः २ ॥ ९९४ ॥ । सूक्ष्म सम्पराय संयतः श्रेणिं समारोहन् वर्द्धमानपरिणामस्ततो भ्रस्यन् हीयमानपरिणामः, अवस्थितपरिणामस्त्वसौ न 4 | भवति, गुणस्थानकस्वभावादिति । तथा 'सुहमसम्परायसंजए णं भंते! केवइयं काल' इत्यादी 'जहनेणं एवं | समयं ति सूक्ष्मसम्परायस्य जघन्यतो वर्द्धमानपरिणाम एकं समयं प्रतिपत्तिसमयानन्तरमेव मरणात्, 'उक्कोसेणं अंतोमुहत्तं'ति तद्गुणस्थानकस्यैतावत्प्रमाणत्वात् एवं तस्य हीयमानपरिणामोऽपि भावनीय इति । तथा 'अहक्वायसंजए णं भंते!' इत्यादी 'जहनेणं अंतोमुहन्तं उक्कोसेणंपि अंतोमुहुतं त्ति यो यथाख्यातसंयतः केवलज्ञानमुत्पादयिष्यति | यश्च शैलेशीप्रतिपन्नस्तस्य वर्द्धमानपरिणामो जघन्यत उत्कर्षतश्चान्तर्मुहूर्त्त तदुत्तरकालं तद्व्यवच्छेदात्, अवस्थितपरिणामस्तु जघन्येनैकं समयं उपशमाद्धायाः प्रथमसमयानन्तरमेव मरणात्, 'उकोसेणं देणा पुबकोडिति एतच प्राग्वभावनीयमिति ॥ बन्धद्वारे सामाइयसंजए णं भंते! कइ कम्मप्पगडीओ बंधइ ?, गोयमा ! सत्तविहबंधए वा अट्ठविहबंधए वा एवं जहा बउसे, एवं जाव परिहारविस्रुद्धिए, सुहुमसंपरागसंजय पुच्छा, गोयमा ! आउयमोहणिज्जवज्जाओ छ कम्मप्पगडीओ बंधति, अहक्खाएसंजए जहां सिणाए २१ ॥ सामाइयसंजए णं भंते! कति कम्मरपगडीओ वेदेति ?, गोयमा ! नियमं अट्ठ कम्मप्पगडीओ वेदेति, एवं जाव मुहमसंपराए, अहक्खाए पुच्छा, गोयमा ! सत्तविहवेयर वा चविवेयए वा, सत्तविह वेदेमाणे मोहणिजबजाओ सत्त कम्मप्पगडीओ वेदेति, चत्तारि | वेदेमाणे वेयणिज्जाउयनामगोयाओ चत्तारि कम्मप्पगडीओ वेदेति २२ ॥ सामाइयसंजए णं भंते! कति कम्म For Penal Use Only संयत, तस्य स्वरुपम्, सामायिकसंयत आदि पञ्च भेदाः, संयतस्य विविध वक्तव्यता ~244~ २५ शतके उद्देशः ७ सामायि कादीनां ५. परिणामः * बन्धादि सू १७९३-७९६ ॥ ९९४ ॥ waryra Page #245 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (०५) [भाग-११]"भगवती"-अंगसूत्र-५ (मूलं+वृत्ति:) शतक [२५], वर्ग [-], अंतर्-शतक [-1, उद्देशक [७], मूलं [७९३-७९६] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र- [०५], अंगसूत्र- [०५] "भगवती मूलं एवं अभयदेवसूरि-रचिता वृत्ति: प्रत सूत्रांक [७९३-७९६] प्पगडीओ उदीरेति ?, गोयमा ! सत्तविह जहा वउसो, एवं जाच परिहारविसुद्धीए, सुहुमसंपराए पुच्छा, गोयमा छविह उदीरए वा पंचविह उदीरए वा, छ उदीरमाणे आउयवेयणिजबजाओ छ कम्मप्पगडीओ ४. उदीरेइ पंच उदीरमाणे आउयवेयणिज्जमोहणिज वजाओ पंच कम्मप्पगडीओ उदीरेइ, अहक्खायसंजए | पुच्छा, गोयमा! पंचविह उदीरए वा दुविह उदीरए वा अणुदीरए वा, पंच उदीरमाणे आउयम्सेसं जहा। नियंठस्स २३ ॥ (सूत्रं ७९४) सामाइयसंजए णं भंते ! सामाइयसंजयत्तं जहमाणे किं जहति किं उवसंप जति ?, गोयमा ! सामाइयसंजय जहति छेदोवठ्ठावणियसंजयं वा सुहमसंपरागसंजयं वा असंजमं वा | संजमासंजमं वा उपसंपवति, छेओवट्ठावणिए पुच्छा, गोयमा ! छेओवट्ठावणियसंजयत्तं जहति सामाइयसंज० परिहारवि० सुहमसं. असंज. संजमासंजमं वा उव०, परिहारविमुद्धिए पुच्छा, गोयमा! परिहार विसुद्धियसंजयत्तं जहति छेदोवद्यावणियसंजय वा असंजमं वा उपसंपवति, सुहुमसंपराए पुच्छा, गोयमा! दि मुहुमसंपरायसंजयत्तं जहति सामाइयसंजयं वा छेओवट्ठावणियसंजयं वा अहक्खायसंजय वा असंजमं वा उवसंपन्नड, अहक्खायसंजए णं पुच्छा, गोयमा! अहक्वायसंजयत्तं जहति सुहमसंपरागसंजयं वा असंजम वा सिडिगति वा उपसंपज्जति २४ ॥ (सूत्रं ७१५) सामाइयसंजए णं भंते । किं सन्नोवउत्ते हो० नोसन्नोवटै उत्ते होजा?, गोयमा ! सन्नोवउत्ते जहा बउसो, एवं जाव परिहारविसुद्धिप, मुहुमसंपराए अहक्खाए य जहा पुलाए २५ ॥ सामाइयसंजए णं भंते ! किं आहारए होजा अणाहारए होजा जहा पुलाए, एवं जाव अनुक्रम [..९४८-९५१] 404CACANCHA | संयत, तस्य स्वरुपम, सामायिकसंयत आदि पञ्च-भेदा:, संयतस्य विविध-वक्तव्यता ~245 Page #246 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (०५) [भाग-११]"भगवती"-अंगसूत्र-५ (मूलं+वृत्ति:) शतक [२५], वर्ग [-], अंतर्-शतक [-1, उद्देशक [७], मूलं [७९३-७९६] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र- [०५], अंगसूत्र- [०५] "भगवती मूलं एवं अभयदेवसूरि-रचिता वृत्ति: प्रत सूत्रांक [७९३-७९६] व्याख्या- मुहमसंपराए, अहक्खायसंजए जहा सिणाए २६ ॥ सामाइयसंजए णं भंते ! कति भवग्गहणाई होजा ?. |२५ शतके प्रज्ञप्तिः गोयमा ! जह० एकं समयं उकोसेणं अट्ठ, एवं छेदोवट्ठावणिएवि, परिहारविमुद्धिए पुच्छा, गोयमा ! जह उद्देशः अभयदेवी-दएकं समयं जक्कोसेणं तिन्नि, एवं जाव अहक्खाए २७॥ (सूत्रं ७९६) सामायिका या वृत्तिः२|| 'सुहमसंपराए' इत्यादी आउयमोहणिजवजाओछ कम्मप्पगडीओ बंधईत्ति सूक्ष्मसम्परायसंयतो ह्यायुर्न बध्नाति दि संयताः ॥९१५॥ अप्रमत्तान्तत्वात्तद्वन्धस्य, मोहनीयं च बादरकषायोदयाभावान बनातीति तर्जाः षटू कर्मप्रकृतीबंधातीति ॥ वेदद्वारे-12 | 'अहक्खाये'त्यादौ 'सत्तविहवेयए वा चउबिहवेयए 'त्ति यथाख्यातसंयतो निर्ग्रन्थावस्थायां 'मोहवज'त्ति मोहव र्जानां सतानां कर्मप्रकृतीनां वेदको, मोहनीयस्योपशान्तत्वात् क्षीणत्वाद्वा, स्नातकावस्थायां तु चतसृणामेव, घातिकर्म| प्रकृतीनां तस्य क्षीणत्वात् ।। उपसम्पद्धानद्वारे-सामाइयसंजए ण'मित्यादि, सामायिकसंयतः सामायिकसंयतत्वं त्यजति || ६ छेदोपस्थापनीयसंयतत्वं प्रतिपद्यते, चतुर्यामधर्मात्पञ्चयामधर्मसङ्क्रमे पार्श्वनाथशिष्यवत् , शिष्यको वा महाप्रतारोपणे, | सूक्ष्मसम्परायसंयतत्वं वा प्रतिपद्यते श्रेणिप्रतिपत्तितः असंयमादिर्वा भवेद्भावप्रतिपातादिति । तथा छेदोपस्थापनीयसंयत| श्छेदोपस्थापनीयसंयतत्वं त्यजन् सामायिकसंयतत्वं प्रतिपद्यते, यथाऽऽदिदेवतीर्थसाधुः अजितस्वामितीर्थ प्रतिपद्यमाना, | परिहारविशुद्धिकसंयतत्वं वा प्रतिपद्यते, छेदोपस्थापनीयवत एव परिहारविशुद्धिसंयमस्य योग्यत्वादिति । तथा परिहारवि-18|| Vi॥९१५॥ शुद्धिकसंयतः परिहारविशुद्धिकसंयतत्वं त्यजन् छेदोपस्थापनीयसंयतत्वं प्रतिपद्यते पुनर्गच्छायाश्रयणात् असंयम वा प्रतिपद्यते देवत्वोत्पत्ताविति । तथा सूक्ष्मसम्परायसंयतः सूक्ष्मसम्परायसंयतत्वं श्रेणीप्रतिपातेन त्यजन् सामायिकसयतरवं Arttutto अनुक्रम [..९४८-९५१] weredturary.com संयत, तस्य स्वरुपम, सामायिकसंयत आदि पञ्च-भेदा:, संयतस्य विविध-वक्तव्यता ~246 Page #247 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (०५) [भाग-११]"भगवती"-अंगसूत्र-५ (मूलं+वृत्ति:) शतक [२५], वर्ग [-], अंतर्-शतक [-1, उद्देशक [७], मूलं [७९३-७९६] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र- [०५], अंगसूत्र- [०५] "भगवती मूलं एवं अभयदेवसूरि-रचिता वृत्ति: प्रत सूत्रांक [७९३-७९६] प्रतिपद्यते यदि पूर्व सामायिकसंयतो भवेत् छेदोपस्थापनीयसंयतत्वं वा प्रप्तिपद्यते यदि पूर्व छेदोपस्थापनीयसंयतो IN|| भवेत् , यथाख्यातसंयतत्वं वा प्रतिपद्यते श्रेणीसमारोहणत इति, तथा यथाख्यातसंयतो यथाख्यातसंयतत्वं त्यजन्द ||श्रेणिपतिपतनात् सूक्ष्मसम्परायसंयतत्वं प्रतिपद्यते असंयम वा प्रतिपद्यते, उपशान्तमोहत्वे मरणात् देवोत्पत्ती, सिद्धि-12 गतिं वोपसम्पद्यते स्नातकत्वे सतीति ॥ आकर्षद्वारे। सामाझ्यसंजयस्स णं भंते ! एगभवग्गहणिया केवतिया आगरिसा प०, गोयमा ! जहन्नेणं जहा बउसस्स, छेदोवट्ठावणियस्स पुरुछा, गोयमा! जहन्नेणं एक उक्कोसेणं वीसपुहत्तं, परिहारविमुद्धियस्स पुच्छा, गोपमा । जहन्नेणं एक उक्कोसेणं तिन्नि, मुहुमसंपरायस्स पुच्छा, गोयमा ! जहनेणं एक कोसेणं चत्तारि, अहक्खायस्स पुच्छा, गोयमा ! जहन्नेणं एवं उक्कोसेणं दोन्नि । सामाइयसंजयस्स णं भंते ! नाणाभवग्गह|णिया केवतिया आगरिसा प०१, गोयमा ! जहा बउसे, छेदोवट्ठावणियस्स पुच्छा, गोयमा ! जहन्नेणं दोन्नि उक्कोसेणं उचरिं नवण्हं सयाणं अंतो सहस्सस्स, परिहारविसुद्धियस्स जहन्नेणं दोन्नि उक्कोसेणं सत्त, सुहुमसंपहै। रागस्स जहन्नेणं दोन्नि उक्कोसेणं नव, अहक्खायस्स जहन्नेणं दोन्नि उक्कोसेणं पंच ।। (सूत्रं ७९७) | छेदोवढ़ावणीयस्से'त्यादौ 'वीसपुहुत्तति छेदोपस्थापनीयस्योत्कर्षतो विंशतिपृथक्त्वं पञ्चषादिविंशतयः आकर्षाणां | भवन्ति 'परिहारविमुद्धियस्से'त्यादी 'उकोसेणं तिन्नित्ति परिहारविसुद्धिकसंयतत्वं त्रीन वारान एकत्र भवे उत्कर्षतः प्रतिपद्यते, 'सुहमसंपरायस्से'त्यादौ "उकोसेणं चत्तारित्ति एकत्र भवे उपशमश्रेणीद्वयसम्भवेन प्रत्येकं सक्लिश्यमान AAAAAAS अनुक्रम [..९४८-९५१] संयत, तस्य स्वरुपम, सामायिकसंयत आदि पञ्च-भेदा:, संयतस्य विविध-वक्तव्यता ~2474 Page #248 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (०५) [भाग-११]"भगवती"-अंगसूत्र-५ (मूलं+वृत्ति:) शतक [२५], वर्ग [-], अंतर्-शतक [-], उद्देशक [७], मूलं [७९७] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र- [०५], अंगसूत्र- [०५] "भगवती मूलं एवं अभयदेवसूरि-रचिता वृत्ति: प्रत सूत्रांक [७९७]] दीप अनुक्रम [९५२] व्याख्या- विशुद्धचमानलक्षणसूक्ष्मसम्परायद्वयभावाच्चतस्रः प्रतिपत्तयः सूक्ष्मसम्परायसंयतत्वे भवन्ति, 'अहक्खाए' इत्यादौ 'उको- २५ शतके प्रज्ञप्तिः 15 सेणं दोन्नित्ति उपशमश्रेणीद्वयसम्भवादिति । नानाभवनणाकर्षाधिकारे 'छेओवट्ठावणीयस्से'त्यादी 'उकोसेणं उवरि । उद्देशः अभयदेवी- नवण्हं सयाणं अंतोसहस्स'त्ति, कथं ?, किलैकत्र भवग्रहणे पइविंशतय आकर्षाणां भवन्ति, ताश्चाष्टाभिर्भवैर्गुणिता आकाः यावृत्तिः२ नव शतानि षष्ट्यधिकानि भवन्ति, इदं च सम्भवमात्रमाश्रित्य सङ्ख्याविशेषप्रदर्शनमतोऽन्यथाऽपि यथा नव शतान्यधि- सू७९७ ॥९१६॥ कानि भवन्ति तथा कार्य, 'परिहारविसुद्धियस्से'त्यादौ 'उक्कोसेणं सत्त'त्ति, कथम् , एकत्र भवे तेषां त्रयाणामुक्तस्वात् भवत्रयस्य च तस्याभिधानादेकत्र भवे त्रयं द्वितीये द्वयं तृतीये द्वयमित्यादिविकल्पतः सप्ताकर्षाः परिहारविशुद्धिकस्येति, 'सुहमसंपरायस्से'त्यादी 'उकोसेणं नव'त्ति, कथं ?, सूक्ष्मसम्परायस्यैकत्र भवे आकर्षचतुष्कस्योक्तत्वाइवत्र-12 यस्य च तस्याभिधानादेकत्र चत्वारो द्वितीयेऽपि चत्वारस्तृतीये चैक इत्येवं नवेति । 'अहक्खाए' इत्यादी 'उक्कोसणं पंच'त्ति, कथं !, यथाख्यातसंयतस्यैकत्र भवे द्वावाको द्वितीये च द्वावेकत्र चैक इत्येवं पञ्चेति ॥ कालद्वारे सामाइयसंजए णं भंते ! कालओ केवच्चिरं होइ?, गोयमा! जहन्नेणं एक समयं उकोसेणं देसूणएहिं । नवर्हि वासेहिं ऊणिया पुचकोडी, एवं छेदोवट्ठावणिएवि, परिहारचिसुद्धिए जहन्नेणं एक समयं उक्कोसेणं देसूणरहि एकूणतीसाए वासेहिं ऊणिया पुषकोडी, मुहमसंपराए जहा नियंठे, अहक्खाए जहा सामाइयसंजए। सामाइयसंजया णं भंते ! कालओ केवचिरं होइ, गोयमा! सबद्धा, छेदोवडावणिएसु पुच्छा, गोयमा ! जहन्नेणं अहाहनाई वाससयाई उक्को. पन्नासं सागरोवमकोडिसयसहस्साइं, परिहारविसुद्धीए पुच्छा, ॥२१६॥ | संयत, तस्य स्वरुपम, सामायिकसंयत आदि पञ्च-भेदा:, संयतस्य विविध-वक्तव्यता ~248 Page #249 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (०५) [भाग-११]"भगवती"-अंगसूत्र-५ (मूलं+वृत्ति:) शतक [२५], वर्ग [-], अंतर्-शतक [-], उद्देशक [७], मूलं [७९८] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र- [०५], अंगसूत्र- [०५] "भगवती मूलं एवं अभयदेवसूरि-रचिता वृत्ति: प्रत सूत्रांक [७९८] गोयमा ! जहन्नेणं देसूणाई दो वाससयाई उको देसूणाओ दो पुषकोडीओ, सुहमसंपरागसंजया णं भंते ! XMपुच्छा, गोयमा ! जह० एक समयं उक्कोसेणं अंतोमुहुत्तं, अहक्खायसंजया जहा सामाइयसंजया २९ ॥ सामाइथसंजयस्सरणं भंते ! केवतियं कालं अंतरं होइ ?, गोयमा ! जहन्नेणं जहा पुलागस्स एवं जाव अहक्खायसंजयस्स, सामाइयसं० भंते ! पुच्छा, गोयमा! नत्थि अंतरं, छेदोवट्ठावणिय पुच्छा, गोयमा! जहनेणं तेवहि वाससहस्साई उक्कोसेणं अट्ठारस सागरोवमकोडाकाडीओ, परिहारविमुद्धियस्स पुच्छा, गोयमा! जहन्नेणं चउरासीई वाससहस्साई उक्कोसेणं अट्ठारस सागरोवमकोडाकोडीओ, सुहमसंपरायाणं जहा नियंठाणं, अहक्खायाणं जहा सामाइयसंजयाणं ३०॥सामाइयसंजयस्स णं भंते ! कति समुग्धाया पन्नत्ता, गोयमा! छ समुग्घाया पन्नत्ता, तं जहाकसायकुसीलस्स, एवं छेदोवट्ठावणियस्सवि, परिहारविमुद्धियस्स जहा पुलागस्स, सुहमसंपरागस्स जहा नियंठस्स, अहक्खायस्स जहा सिणायस्स ३१ ॥ सामाइयसंजए णं भंते ! लोगस्स किं संखेजाभागे होजा असंखेजाभागे पुच्छा, गोयमा! नो संखेजइ जहा पुलाए, एवं जाव मुहुमसंपराए । अहक्खायसंजए जहा सिणाए ३२॥ सामाइयसंजए णं भंते ! लोगस्स किं संखेजहभागं फुसइ जहेव होजा तहेव फुसइ ३३ ॥ सामाइयसंजए णं भंते ! कयरंमि भावे होज्जा, गोयमा! उवसमिए भावे होजा, एवं जाच मुहमसंपराए, अहक्खायसंपराए पुच्छा, गोयमा ! उवसमिए वा खइए वा भावे होजा ३४ । सामाइयसंजयाणं भंते ! एगसमएणं केवतिया होजा?, गोयमा ! पडिवजमाणए य पहुच जहा दीप अनुक्रम [९५३] SAREauratonintamational | संयत, तस्य स्वरुपम, सामायिकसंयत आदि पञ्च-भेदा:, संयतस्य विविध-वक्तव्यता ~249~ Page #250 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (०५) [भाग-११]"भगवती"-अंगसूत्र-५ (मूलं+वृत्ति:) शतक [२५], वर्ग [-], अंतर्-शतक [-], उद्देशक [७], मूलं [७९८] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र- [०५], अंगसूत्र- [०५] "भगवती मूलं एवं अभयदेवसूरि-रचिता वृत्ति: प्रशतिः प्रत सूत्रांक [७९८] दीप अनुक्रम [९५३] कसायकुसीला तहेव निरवसेसं, छेदोवट्ठावणिया पुच्छा, गोयमा ! पडिवजमाणए पडुच सिय अस्थि सिय २५ वातके नस्थि, जइ अस्थि जहन्नेणं एको वा दो वा तिन्नि वा उक्कोसेणं सयपुहुत्तं, पुषपडिवन्नए पडुच सिय अस्थिर उद्देशः ७ अभयदेवी- सिय नत्थि, जइ अस्थि जहन्नेणं कोडिसयपुहुत्तं उक्कोसेणवि कोडिसयपुहुत्तं, परिहारविमुद्धिया जहा सामायिका या वृत्तिः२४ पुलागा, सुहमसंपराया जहा नियंठा, अहक्खायसंजयाणं पुच्छा, गोषमा! पडिवजमाणए पडुन सिय ४ दाना क लान्तरादि अस्थि सिय नत्थि, जब अस्थि जहन्नेणं एको वा दो वा तिन्नि वा उकोसेणं यावट्ठसयं अद्दुत्तरसयं खवगाणं है। ॥९१७॥16 सू७९८ चउप्पन्नं उवसामगाणं, पुवपडिबन्नए पडुच जहन्नेणं कोडिपुहृत्तं उक्कोसेणवि कोडिपुहुत्तं ॥ एएसिणं भंते ! दि सामाइयछेओवट्ठावणियपरिहारविसुद्धियसुहमसंपरायअहक्खायसंजयाणं कपरे २ जाव विसेसाहिया , गोयमा ! सवयोवा मुहुमसंपरायसंजया परिहारविसुद्धियसंजया संखेनगुणा अहक्स्वायसंजया संखे. छेओवद्वावणियसंजया संखे० सामाइयसंजया संखेजगुणा ३६॥ (सूत्रं ७९८) 'सामाइय' इत्यादौ सामायिकप्रतिपत्तिसमयसमनन्तरमेव मरणादेकः समयः, 'उकोसेणं देसूणएहिं नवहिं वासेहि ऊणिया पुचकोडी'त्ति यदुक्तं तद्गर्भसमयादारभ्यावसेयम् , अन्यथा जन्मदिनापेक्षयाऽष्टवर्षोनिकैव सा भवतीति, परिहारविसुंद्धिए जहनेणं एक समय'ति मरणापेक्षमेतत्, 'उकोसेणं देसूणएहि ति, अस्यायमर्थः-देशोननववर्षजन्मपर्या-119 येण केनापि पूर्वकोव्यायुषा प्रव्रज्या प्रतिपन्ना, तस्य च विंशतिवर्षप्रव्रज्यापर्यायस्य दृष्टिवादोऽनुज्ञातस्ततश्चासौ परिहारवि-४॥९१७॥ शुद्धिकं प्रतिपन्नः, तच्चाष्टादशमासमानमप्यविच्छिन्नतस्परिणामेन तेनाजन्म पालितमित्येवमेकोनत्रिंशद्वर्षोनां पूर्वकोटिं| | संयत, तस्य स्वरुपम, सामायिकसंयत आदि पञ्च-भेदा:, संयतस्य विविध-वक्तव्यता ~250 Page #251 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (०५) [भाग-११]"भगवती"-अंगसूत्र-५ (मूलं+वृत्ति:) शतक [२५], वर्ग [-], अंतर्-शतक [-], उद्देशक [७], मूलं [७९८] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र- [०५], अंगसूत्र- [०५] "भगवती मूलं एवं अभयदेवसूरि-रचिता वृत्ति: 5645 प्रत सूत्रांक [७९८] -% CONDSACRO दीप अनुक्रम [९५३] यावत्तत्स्यादिति, 'अहक्खाए जहा सामाइयसंजएत्ति तत्र जघन्यत एकं समयं उपशमावस्थायां मरणात्, उत्कर्षतो। देशोना पूर्वकोटी, स्नातकयथाख्यातापेक्षयेति । पृथक्त्वेन कालचिन्तायां छेओवट्ठावणिए' इत्यादि, तत्रोत्सपिण्यामादितीर्थकरस्य तीर्थ यावच्छेदोपस्थापनीयं भवतीति, तीर्थे च तस्य साढ़े द्वे वर्षशते भवतीत्यत उक्त-'अड्डाइज्जाई' इत्यादि तथाऽवसर्पिण्यामादितीर्थकरस्य तीर्थ यावच्छेदोपस्थापनीयं प्रवर्तते तच्च पश्चाशत्सागरोपमकोटीलक्षा इत्यतः 'उकोसेणं पन्नास'मित्याधुक्तमिति । परिहारविशुद्धिककालो जघन्येन 'देसूणाई दो वाससयाईति, कथम् !, उत्सर्पिण्यामाधस्य | जिनस्य समीपे कश्चिद्वर्षशतायुः परिहारविशुद्धिकं प्रतिपन्नस्तस्यान्तिके तज्जीवितान्तेऽन्यो वर्षशतायुरेव ततः परतो न तस्य प्रतिपत्तिरस्तीत्येवं द्वे वर्षशते, तयोश्च प्रत्येकमेकोनत्रिंशति वर्षेषु गतेषु तत्प्रतिपत्तिरित्येवमष्टपञ्चाशता वन्यूने ते ४ इति देशोने इत्युक्तं, एतच टीकाकारव्याख्यान, चूर्णिकारव्याख्यानमप्येवमेव, किन्त्ववसपिण्यन्तिमजिनापेक्षमिति के विशेषः, 'उकोसेणं देसूणाओ दो पुच्चकोडीओ'त्ति, कथम् !, अवसर्पिण्यामादितीर्थकरस्यान्तिके पूर्वकोव्यायुः कश्चिपरिहारविशुद्धिकं प्रतिपन्नस्तस्यान्तिके तज्जीवितान्तेऽन्यस्तादृश एव तत्प्रतिपन्न इत्येवं पूर्वकोटीद्वयं तथैव देशोनं परिहारविशुद्धिकसंयतत्वं स्यादिति ॥ अन्तरद्वारे-'छेओवट्ठावणिए'त्यादी 'जहन्नेणं तेवहि वाससहस्साई"ति, कथम् ?, अवसर्पिण्या दुष्पमा यावच्छेदोपस्थापनीयं प्रवर्तते ततस्तस्या एवैकविंशतिवर्षसहनमानायामेकान्तदुष्षमायामुत्सपिण्याचैकान्तदुषमायां च तलामाणायामेव तदभावः स्यात् एवं चैकविंशतिवर्षसहस्रमानत्रयेण त्रिषष्टिवर्षसहस्राणामन्तरमिति, 'उकोसेणं अहारस सागरोवमकोडाकोडीओ'त्ति किलोत्सर्पिण्यां चतुर्विंशतितमजिनतीर्थे छेदोपस्थापनीयं प्रवर्तते 87-%--X RELIGunintentATHREE weredturary.com | संयत, तस्य स्वरुपम, सामायिकसंयत आदि पञ्च-भेदा:, संयतस्य विविध-वक्तव्यता ~251 Page #252 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (०५) [भाग-११]"भगवती"-अंगसूत्र-५ (मूलं+वृत्ति:) शतक [२५], वर्ग [-], अंतर्-शतक [-], उद्देशक [७], मूलं [७९८] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र- [०५], अंगसूत्र- [०५] "भगवती मूलं एवं अभयदेवसूरि-रचिता वृत्ति: प्रत सूत्रांक यावृत्तिः२ [७९८] दीप अनुक्रम [९५३] व्याख्या- ततश्च सुषमदुष्षमादिसमात्रये क्रमेण द्वित्रिचतुःसागरोपमकोटीकोटीप्रमाणे अतीते अवसप्पिण्याच कान्तसुषमादित्रये ४२५ शतके प्रज्ञप्तिः क्रमेण चतुरिद्विसागरोपमकोटीरप्रमाणे अतीतप्राये प्रथमजिनतीथें छेदोपस्थापनीयं प्रवर्तत इत्येवं यथोक्तं छेदोपस्थाप- उद्देश: अभयदेवीनीयस्यान्तरं भवति, यच्चेह किञ्चिन्न पूर्यते यच्च पूर्वसूत्रेऽतिरिच्यते तदल्पत्वान्न विवक्षितमि त, 'परिहारविसुद्धियस्से-साम दिसंयताः त्यादि, परिहारविशुद्धिकसंयतस्यान्तरं जघन्यं चतुरशीतिवर्षसहस्राणि, कथम् !, अवसर्पिण्या दुष्षमैकान्तदुष्षमयो॥९१८॥ | रुत्सपिण्याचकान्तदुष्पमादुष्षमयोः प्रत्येकमेकविंशतिवर्षसहस्रप्रमाणत्वेन चतुरशीतिवर्षसहस्राणां भवति तत्र च परि हारविशुद्धिकं न भवतीतिकृत्वा जघन्यमन्तरं तस्य यथोक्तं स्यात्, यश्चेहान्तिमजिनानन्तरो दुष्पमायां परिहारविशु18.द्धिककालो यश्चोत्सर्पिण्यास्तृतीयसमायां परिहारविशुद्धिकपतिपत्तिकालात्पूर्वः कालो नासौ विवक्षितोऽस्पत्वादिति, 'उक्कोसेणं अट्ठारस सागरोवमकोडाकोडीओ'त्ति छेदोपस्थापनीयोत्कृष्टान्तरवदस्य भावना कार्येति ॥ परिणामद्वारे 'छेदोवट्ठावणिये' इत्यादी 'जहन्नेणं कोडिसयपुहुतं उकोसेणवि कोडिसयपुहुतं'त्ति, इहोत्कृष्टं छेदोपस्थापनीयसंयतपरिमाणमादितीर्थकरतीर्थान्याश्चित्य संभवति, जघन्यं तु तत्सम्यग् नावगम्यते, यतो दुषमान्ते भरतादिषु दशसु क्षेत्रेषु प्रत्येकं तद्यस्य भावाद्विंशतिरेव तेषां श्रूयते, केचित्पुनराहुः-इदमष्यादितीर्थकराणां यस्तीर्थकालस्तदपेक्षयैव समवसेयं, कोटीशतपृथक्त्वं च जघन्यमल्पतरमुत्कृष्टं च बहुतरमिति ॥ अल्पबहुत्वदारे-'सबथोवा सुहमसंपरायसं- DI||९१८॥ जय'त्ति स्तोकत्वात्तत्कालस्य निर्वन्धतुल्यस्वेन च शतपृथक्त्वप्रमाणत्वात्तेषां, 'परिहारविसुद्धियसंजया संखेजगुण'त्ति तत्कालस्य बहुत्वात् पुलाकतुल्यत्वेन च सहस्रपथक्त्वमानत्वात्तेषाम् , 'अहक्खायसंजया संखेज्जगुण'त्ति कोटीपृथक्त्व | संयत, तस्य स्वरुपम्, सामायिकसंयत आदि पञ्च-भेदाः, संयतस्य विविध-वक्तव्यता ~252 Page #253 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (०५) [भाग-११]"भगवती"-अंगसूत्र-५ (मूलं+वृत्ति:) शतक [२५], वर्ग [-], अंतर्-शतक [-], उद्देशक [७], मूलं [७९८] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र- [०५], अंगसूत्र- [०५] "भगवती मूलं एवं अभयदेवसूरि-रचिता वृत्ति: - प्रत सूत्रांक [७९८] मानत्वात्तेषां, 'छेदोवट्ठावणियसंजया संखेजगुण'त्ति कोटीशतपृथक्त्वमानतया तेषामुक्तत्वात्, 'सामाइपसंजया| संखेजगुण'त्ति कषायकुशीलतुल्यतया कोटीसहस्रपृथक्त्वमानत्वेनोक्तत्वात्तेषामिति ॥ अनन्तरं संयता उक्तास्तेषां च । केचित्प्रतिसेवावन्तो भवन्तीति प्रतिसेवाभेदान् प्रतिसेवा च निर्दोषमालोचयितव्येति आलोचनादोषान् आलोचनासम्ब-12 न्धादालोचकगुणान् गुरुगुणांश्च दर्शयन्नाह पडिसेवण दोसालोयणा य आलोयणारिहे चेव । तसो सामायारी पायच्छित्ते तवे चेव ॥१॥ काविहा ण भंते ! पडिसेवणा पन्नत्ता?, गोयमा ! दसविहा पडिसेवणा पं०, तं०-दुप्प १ प्पमाद २ऽणाभोगे ३, आउरे ४ आवती ५ ति य । संकिन्ने ६ सहसक्कारे, ७ भय ८ प्पओसा९य वीमंसा १०॥१॥ दस आलोयणादोसा पत्नत्ता, तंजहा-आकंपइत्ता १ अणुमाणइत्ता २ जं दिई ३ थायरं च ४ सुहम चा ५। छन्नं || सहाउलयं ७ बहुजण ८ अवत्त ९ तस्सेवी १०॥२॥ दसहि ठाणेहिं संपन्ने अणगारे अरिहति अत्तदोस आलोइत्तए, तंजहा-जातिसंपन्ने १ कुलसंपन्ने २ विणयसंपन्ने ३ णाणसंपने ४ दसणसंपन्ने ५ चरित्तसंपन्ने ६॥ खंते ७ दंते ८ अमायी ९ अपच्छाणुताची १० । अट्ठहिं ठाणेहिं संपन्ने अणगारे अरिहति आलोयणं पडिच्छित्तए, तंजहा-आयारवं १ आहारवं २ ववहारवं ३ उधीलए ४ पकुपए ५ अपरिस्सायी ६ निजवए ७| अवायदंसी८॥ (सूत्रं ७९९) 'दसविहे'त्यादि, 'दप्पप्पमायणाभोगे'त्ति, इह सप्तमी प्रत्येक दृश्या, तेन द सति प्रतिसेया भवति, दर्पश्च दीप अनुक्रम [९५३] - -- ~253 Page #254 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (०५) [भाग-११]"भगवती"-अंगसूत्र-५ (मूलं+वृत्ति:) शतक [२५], वर्ग [-], अंतर्-शतक [-1, उद्देशक [७], मूलं [७९९] + गाथा: पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र- [०५], अंगसूत्र- [०५] "भगवती मूलं एवं अभयदेवसूरि-रचिता वृत्ति: प्रत सूत्रांक [७९९] व्याख्या- प्रज्ञप्तिः अभयदेवीया वृत्ति गाथा: दीप अनुक्रम [९५४-९५९] वल्गनादिः, तथा प्रमादे सति, प्रमादश्च मद्यविकधादिः, तथाऽनाभोगे सति, अनाभोगश्चाज्ञानम् , 'आतुरे'त्ति आतुरत्वे ४२५ शतके सति, आतुरश्च बुभुक्षापिपासादिवाधितः, 'आवईय'त्ति आपदि सत्यां, आपच्च द्रव्यादिभेदेन चतुर्विधा, तत्र द्रव्यापत्र उद्देशः ७ प्रासुकादिद्रव्यालाभः, क्षेत्रापत् कान्तारक्षेत्रपतितत्वं, कालापत् दुर्भिक्षकालप्राप्तिः, भावापद ग्लानत्वमिति, 'संकिपणे'त्ति प्रतिसेवादि सङ्कीर्णे स्वपक्षपरपक्षन्याकुले क्षेत्रे सति, 'संकिय'त्ति कचित्पाठस्तत्र च शङ्कित्ते-आधाकर्मादित्वेन शद्वितभक्तादिविषये, सू ७९९ निशीधपाठे तु 'तित्तिण' इत्यभिधीयते, तन च तिन्तिणत्वे सति, तन्याहाराद्यलाभे सखेदं वचनं, 'सहसकारे'त्ति सहसाकारे सति-आकस्मिकक्रियायां, तथा च "पुधि अपासिऊणं पाए छुटमि जं पुणो पासे । न तरइ नियत्ते पायं सहसाकरणमेयं ॥१॥" इति, 'भयप्पओसा यत्ति भयात्-सिंहादिभयेन प्रतिसेवा भवति, तथा प्रद्वेषाच्च, अद्वेषश्चक्रोधादिः, 'वीमंस'त्ति विमर्शात्-शिक्षकादिपरीक्षणादिति, एवं कारणभेदेन दश प्रतिसेवाभेदा भवन्ति ।। 'आकंपइत्ता'गाहा, आकम्प्य-आवर्जितः सन्नाचार्यः स्तोकं प्रायश्चित्तं मे दास्यतीतिबुद्ध्याऽऽलोचनाऽऽचार्य वैयावृत्त्यकरणादिनाऽऽवज्यं यदालोचनमसावालोचनादोषः 'अणुमाणइत्त'त्ति अनुमान्य-अनुमानं कृत्वा लघुतरापराधनिवेदनेन मृदुद-६ ण्डादित्वमाचार्यस्याकालय्य यदालोचनमसौ तद्दोषः, एवं 'जं दिसृत्ति यदाचार्यादिना दृष्टमपराधजातं तदेवालोचयति 'वायरं वत्ति बादरमेवातिचारजातमालोचयति न सूक्ष्मं तत्रावज्ञापरत्वात् , 'मुहुमं वत्ति सूक्ष्ममेवातिचारजातमालोच| यति, यः किल सूक्ष्मं तदालोचयति स कथं बादरं तन्मालोचयतीत्येवंरूपभावसम्पादनायाऽऽचार्यस्येति, 'छन्नं ति छन्नं १ पूर्वमदृष्ट्वा पादे त्यक्ते ( प्रसारिते ) यत्पुनः पश्यति न च पादं निवर्तयितुं शक्नोति एतत्सहसाकरणम् ॥ १॥ ९१९ ~254 Page #255 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (०५) [भाग-११]"भगवती"-अंगसूत्र-५ (मूलं+वृत्ति:) शतक [२५], वर्ग [-], अंतर्-शतक [-1, उद्देशक [७], मूलं [७९९] + गाथा: पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र- [०५], अंगसूत्र- [०५] "भगवती मूलं एवं अभयदेवसूरि-रचिता वृत्ति: प्रत सूत्रांक [७९९] गाथा: प्रतिच्छन्नं प्रच्छन्नं-अतिलजालुतयाऽव्यक्तवचनं यथा भवति, एवमालोचयति यथाऽऽत्मनैव शृणोति, 'सद्दाउलयंति शब्दाकुल-बृहच्छब्दं यथा भवत्येवमालोचयति, अगीतार्थान् श्रावयन्नित्यर्थः, 'बहुजण'त्ति बहवो जना-आलोचनागुरवो यत्रालोचने तडुजनं यथा भवत्येवमालोचयति, एकस्याप्यपराधस्य बहुभ्यो निवेदनमित्यर्थः, 'अवत्त'त्ति अव्यक्तःअगीतार्थस्तस्मै आचार्याय यदालोचनं तदप्यव्यक्तमित्युच्यते, 'तस्सेवित्ति यमपराधमालोचयिष्यति तमेवासेवते यो गुरुः स तत्सेवी तस्मै यदालोचनं तदपि तत्सेवीति, यतः समानशीलाय गुरवे सुखेनैव विवक्षितापराधो निवेदयितुं शक्यत इति तत्सेविने निवेदयतीति ॥ 'जाइसंपन्ने' इत्यादि, नन्वेतावान् गुणसमुदाय आलोचकस्य कस्मादन्विष्यते । इति, उच्यते, जातिसम्पन्नः प्रायोऽकृत्यं न करोत्येव कृतं च सम्यगालोचयतीति, कुलसम्पन्नोऽङ्गीकृतप्रायश्चित्तस्य वोढा भवति, विनयसम्पन्नो वन्दनादिकाया आलोचनासामाचार्याः प्रयोक्का भवतीति, ज्ञानसम्पन्नः कृत्याकृत्यविभागं जानाति, दर्शनसम्पन्नः प्रायश्चित्ताच्छुद्धिं श्रद्धत्ते, चारित्रसम्पन्नः प्रायश्चिसमङ्गीकरोति, क्षान्तो-गुरुभिरुपालम्भितो न कुष्यति, दान्तो-दान्तेन्द्रियतया शुद्धिं सम्यग् वहति, अमायी-अगोपयन्नपराधमालोचयति, अपश्चात्तापी आलोचितेऽपराधे 8 पश्चात्तापमकुर्वनिर्जराभागी भवतीति ॥ 'आयारव' मित्यादि, तत्र 'आचारवान्' ज्ञानादिपञ्चप्रकाराचारयुक्तः 'आहा रवंति आलोचित्तापराधानामवधारणावान् ववहारवं'ति आगमश्रुतादिपश्चप्रकारव्यवहाराणामन्यतमयुक्तः 'उचीलए'त्ति अपनीडका-लज्जयाऽतीचारान् गोपायन्तं विचित्रवचनैर्विलजीकृत्य सम्यगालोचना कारयतीत्यर्थः 'पकुवए'त्ति आलोचितेष्वपराधेषु प्रायश्चित्तदानतो विशुद्धिं कारयितुं समर्थः 'अपरिस्साविति आलोचकेनालोचितान् दोषान् योऽन्यस्मै दीप अनुक्रम [९५४-९५९] ~255 Page #256 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (०५) [भाग-११]"भगवती"-अंगसूत्र-५ (मूलं+वृत्ति:) शतक [२५], वर्ग [-], अंतर्-शतक [-1, उद्देशक [७], मूलं [७९९-८०१] + गाथा: पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र- [०५], अंगसूत्र- [०५] "भगवती मूलं एवं अभयदेवसूरि-रचिता वृत्ति: प्रत सूत्रांक [७९९-८०१] EEFER गाथा: न कथयत्यसावपरिश्रावी 'निजवए'त्ति ' निर्यापकः' असमर्थस्य प्रायश्चित्तिनः प्रायश्चित्तस्य खण्डशः करणेन निर्वाहकः 18||२५ शतके प्रज्ञप्तिः 'अवायदंसित्ति आलोचनाया अदाने पारलौकिकापायदर्शनशील इति ॥ अनन्तरमालोचनाचार्य उका, स च सामाअभयदेवी- चार्याः प्रवर्तको भवतीति तां प्रदर्शयन्नाह सामाचार्य या वृत्तिः २ । दसविहा सामायारी पं०२०-इच्छा १ मिच्छा २ तहकारे ३, आवस्सिया य ४ निसीहिया ५। आपु॥९२० ॥ च्छिणा य ६ पडिपुच्छा ७, छंदणा य ८ निमंतणा ९॥१॥ उवसंपया १० य काले, सामाधारी भवे दसहा ॥ (सूत्रं ८००) दसविहे पायच्छित्ते पं०२०-आलोयणारिहे पडिक्कमणारिहे तदुभयारिहे विवेगारिहे विउसग्गारिहे तवारिहे छेदारिहे मूलारिहे अणवढापारिहे पारंचियारिहे । ( सूत्रं ८०१) 'दसविहा सामायारी'त्यादि, प्रतीता चेयं, नवरमापृच्छा-कार्ये प्रश्न इति, प्रतिपृच्छा तु पूर्वनिषिद्धे कार्य एव. तथा छन्दना-पूर्वगृहीतेन भक्तादिना निमन्त्रणा त्वगृहीतेन, उपसम्पच्च-ज्ञानादिनिमित्तमाचार्यान्तराश्रयणमिति ॥ अध सामाचारीविशेषत्वासायश्चित्तस्य तदभिधातुमाह-'दसविहे'त्यादि, इह प्रायश्चित्तशब्दोऽपराधे तच्छुद्धौ च दृश्यते | तदिहापराधे रश्या, तत्र 'आलोयणारिहे'त्ति आलोचना-निवेदना तल्लक्षणां शुद्धिं यदहंत्यतिचारजातं तदालोचनाई, एवमन्यान्यपि, केवल प्रतिक्रमण-मिथ्यादुष्कृतं तदुभयं भालोचनामिथ्यादुष्कृते, विवेक:-अशुद्धभकादित्यागः, ॥९२० | ग्युत्सर्ग:-कायोत्सर्गः तपो-निर्विकृतिकादि, छेदः-प्रवज्यापर्यायहस्वीकरणं मूल-महानतारोपणं अनवस्थाप्यं-कृततपसो| व्रतारोपणं पाराश्चिक-लिङ्गादिभेदमिति ।। प्रायश्चित्तं च तप उक्त, अथ तप एव भेदत आह दीप अनुक्रम [९५४ -९६२ सामाचारी, तस्य अर्थ, भेदा: ~256 Page #257 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (०५) [भाग-११]"भगवती"-अंगसूत्र-५ (मूलं+वृत्ति:) शतक [२५], वर्ग [-], अंतर्-शतक [-1, उद्देशक [७], मूलं [८०२-८०४] + गाथा: पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र- [०५], अंगसूत्र- [०५] "भगवती मूलं एवं अभयदेवसूरि-रचिता वृत्ति: प्रत सूत्रांक [८०२ -८०४] गाथा: दुधिहे तवे पन्नत्ते, तंजहा-पाहिरिए य अभितरए य, से किंतं बाहिरए तये, बाहिर ए तवे विहे पार तं०-अणसण ऊणोयरिया भिक्खायरिया य रसपरिवाओ । कायकिलेसो पडिसंलीणया बज्झो (तबोहोरा 13॥१॥से किं तं अणसणे ?, अ०२ दुविहे पं०, तं०-इत्तरिए य आवकहिए य, से किं तं इत्तरिए,२० द भोगविहे पत्ते, तंजहा-चउत्थे भत्ते ण्डे भत्ते अट्ठमे भत्ते दसमे भसे दुवालसमे भत्ते चोदसमे भत्तेल अद्धमासिए भत्ते मासिए भत्ते दोमासिए भत्ते तेमासिए भत्ते जाव छम्मासिए भत्ते, सेसं इत्तरिए । से कि तं आंवकहिए!, आवक०२ दुविहे पं०, तं०-पाओवगमणे य भत्तपचक्खाणे य, से किंतं पाओवगमणे. पा.२ विहेपं०, तं०-नीहारिमे य अणीहारिमे य नियम अपडिकम्मे, से तं पाओषगमणे, से कि Iभसपथक्लाणे, भत्त०२ दुविहे पं०, तं०-नीहारिमे य अनीहारिमे य नियमं सपरिकमे, सेत्तं मत्तपत्र क्खाणे, सेसं आपकहिए, सेत्तं अणसणे । से किं तं ओमोयरिया ?, ओमोयरिया दुविहा पं०, तं०-खोमोपहरिया य भावोमोपरिया य, से किं तं दधोमोयरिया ,२ दुविहा प०, तं०-उवगरणदरोमोयरिया य भत्त-2 पाणदषोमोयरिया य, से किं तं उवगरणदबोमोयरिया, २ एगे वत्थे एगे पादे चियत्तोवगरणसातिजणया, सेसं उवकरणदधोमोय०, से किं तं भत्तपाणवोमोयरिया , अकुकुडिअंडगप्पमाणमेत्ते कवले आहारं आहारेमाणस्स अप्पाहारे दुवालस जहा सत्तमसए परमोदेसए जाब नो पकामरसभोतीति बत्तई सिया, सेत्तं भत्तपाणदयोमोयरिया, सेत्तं दरोमोयरिया, से किं तं भावोमोयरिया, भावो०२ अणेगविहा पं०, FACROSSESSMSANSAASAMS DOSTS54SSC दीप अनुक्रम [९६३-९६९] तपः, तस्य अर्थ, तस्य भेद-प्रभेदाः, ~257 Page #258 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (०५) [भाग-११]"भगवती"-अंगसूत्र-५ (मूलं+वृत्ति:) शतक [२५], वर्ग [-], अंतर्-शतक [-1, उद्देशक [७], मूलं [८०२-८०४] + गाथा: पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र- [०५], अंगसूत्र- [०५] "भगवती मूलं एवं अभयदेवसूरि-रचिता वृत्ति: प्रत सूत्रांक [८०२ सू८०२ -८०४] ॥९२१॥ गाथा: व्याख्या- ०-अप्पकोहे जाव अप्पलोभे अप्पसद्दे अप्पझण्झे अप्पतुमंतुमे, सेत्तं भाचोमोदरिया, सेसं ओमोयरिया । से२५ शतके प्रज्ञप्तिः किं तं भिक्खा, भि.२ अणेगविहा प०,तं-दवाभिग्गहचरए जहा उववाइए जाव सुद्धेसणिए संखादअभयदेवी त्तिए, सेतं भिक्खायरिया । से किं तं रसपरिचाए ?, र०२ अणेगविहे पं०, तं०-निविगितिए पणीयरसवि- तपोभेदाः या दृत्तिः२/8 वजए जहा उववाइए जाव लूहाहारे, सेत्तं रसपरिचाए । से किं तं कायकिलेसे?, कायकिलेसे अणेगविहे पं० |तं०-ठाणादीए उपुडयासणिए जहा उववाइए जाव सषगायपडिकम्मविष्पमुक्के, सेतं कायकिलेसे । से किं तं पडिसंलीणया ?, पडिसलीणया चविहा पं०, २०-इंदियपडिसलीणया कसायपडिसलीणया जोगपडिसंलीणया विवित्तसपणासणसेवणया । से कितं इंदियपडिसंलीणया, २ पंचविहा पं०, तं०-सोइंदियविसय-12 प्पयारणिरोहो वा सोइंदियविसयप्पत्तेसुवा अत्थेसु रागदोसपिणिग्गहो चक्खिदियविसय एवं जाव फार्सिदियविसयपयारणिरोहो वा फासिंदियविसपप्पत्तेसु वा अत्थेसुरागदोसविणिग्गहो, सेत्तं इंदियपडिसलीणया, से किंतं कसायपदिसलीणया?, कसायपडिसंलीणया चउधिहा पं०, तंजहा-कोहोदयनिरोहो वा उदयप्पत्तस्स 18 वा कोहस्स विफलीकरण एवं जाव लोमोदयनिरोहो वा उदयपत्सस्स वा लोभस्स विफलीकरण, सेत्तं कसायप-||४ | डिसलीणया, से किंतं जोगपडिसंलीणया ?, जोगपडिसलीणया तिविहा पन्नत्ता, तंजहा-अकुसलमणनिरोहो या कुसलमणउदीरणं वा मणस्स वा एगत्तीभावकरणं अकुसलवहनिरोहो वा कुसलवइग्दीरणं वा वइए ||2|| चा एगत्तीभावकरणं, से कितं कायपडिसलीणया ?, २ जन्नं सुसमाहियपसंतसाहरियपाणिपाए कुम्मो इव ||४|| दीप अनुक्रम [९६३-९६९] तपः, तस्य अर्थ, तस्य भेद-प्रभेदाः, ~258~ Page #259 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (०५) प्रत सूत्रांक [८०२ -८०४] + गाथा: दीप अनुक्रम [९६३ -९६९] [भाग-११]“भगवती”– अंगसूत्र - ५ ( मूलं + वृत्ति:) शतक [२५], वर्ग [-], अंतर् शतक [ - ], उद्देशक [७], मूलं [ ८०२-८०४] + गाथा: पूज्य आगमोद्धारकश्री संशोधितः मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र- [०५] अंगसूत्र- [ ०५] "भगवती" मूलं एवं अभयदेवसूरि-रचिता वृत्तिः गुप्सिंदिए अल्लीणे पल्लीणे चिट्ठति, सेतं कायपडिलीणया, सेत्तं जोगपडिसंलीणया, से किं तं विवित्तसयणासणसेवणया ?, विवित्तसय० २ जनं आरामेसु वा उज्जाणेसु वा जहा सोमिलुदेसए जाब सेज्जासंधारगं उवसंपजित्ताणं विहरह, सेन्तं विवित्तसयणासण सेवणया, सेत्तं पडिसंलीणया, सेन्तं बाहिरए तवे १ ॥ से किं तं अभितरए तवे १, २ छविहे पं० तं०- पायच्छितं विणओ वेयाक्वं तहेब सज्झाओ। झाणं विसग्गो । से किं तं पायच्छिते १, पाय २ दसविहे पं० तं०-आलोयणारिहे जाव पारंचियारिहे, सेत्तं पायच्छिते । से किं तं विणए ?, विणए सत्तविहे पन्नत्ते, संजहा-नाणविणए दंसणविणए चरितविणए मणविणए वयविणए | कायविए लोगोवयारविणए, से किं तं नाणविणए १, ना० २ पंचविहे प०, तं०-आभिणियोहियनाणविणए जाव केवलनाणविणए, सेतं नाणविणए, से किं तं दंसणविणए ?, दंसणविणए दुविहे० प०, तं०-मुस्सुसणाविणए य अणवासादणाविणए य, से किं तं सुस्सूसणाविणए ?, सु० २ अणेगविहे पं० तं०- सकारेश् वा सम्माणेह वा जहा चोदसमसए ततिए उद्देसए जाव पडिसंसाहणया, सेत्तं सुरसूरणाचिणए, से किं तं अणचा सापणाविणए ?, अ० २ पणपालीसविहे पं० तं०- अरिहंताणं अणञ्चासाद्णया अरिहंतपन्नत्तस्स धम्मस्स अणचासादणया आयरियाणं अणचासादणया उवज्झायाणं अणश्चासादण्या घेराणं अणञ्चासाद [णया कुलस्स अणचासाद्णया गणस्स अणच्चासादण्या संघरस अणचासादणया किरियाए अणञ्चासादणया | संभोगस्स अणचासायणया आभिणियोहियनाणस्स अणवासायणया जाय केवलनाणस्स अणच्चासादणया Internationa तपः, तस्य अर्थ, तस्य भेद-प्रभेदाः, For Pale On ~259~ Page #260 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (०५) प्रत सूत्रांक [८०२ -८०४] + गाथा: दीप अनुक्रम [९६३ -९६९] [भाग-११]“भगवती”– अंगसूत्र - ५ ( मूलं + वृत्ति:) शतक [२५], वर्ग [-], अंतर् शतक [ - ], उद्देशक [७], मूलं [ ८०२-८०४] + गाथा: पूज्य आगमोद्धारकश्री संशोधितः मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र- [०५] अंगसूत्र- [ ०५] "भगवती" मूलं एवं अभयदेवसूरि-रचिता वृत्तिः व्याख्या ॥ ९२२ ॥ १५, एएसिं चेव भक्तिवहुमाणेणं एएसिं चेव वन्नसंजलणया, सेतं अणचासायणयाविणए, सेन्तं दंसणविणए, प्रज्ञप्तिः ॐ से किं तं चरितविणए १ च २ पंचविहे पं० तं० - सामाइयचरितविणए जाव अहखायचरितविणए, सेतं अभयदेवी- चरितविणए से किं तं मणविणए ?, म० २ दुविहे पं० तं०-पसत्थमणविणए अपसत्थमणविणए य, से किं या वृत्तिः २ * तं पसत्थमणविणए १, पस० २ सत्तविहे प०, तंजहा- अपावए असावजे अकिरिए निरुवकेसे अणण्वकरे ॐ अच्छबिकरे अभूयाभिसंकणे, सेत्तं पसत्थमणविणए, से किं तं अपसत्थमणविणए १, अप्प० २ सत्तविहे पं० तं पावए सावजे सकिरिए सबकेसे अण्ह्वयकरे छविकरे भूयाभिसंकणे, सेन्तं अप्पसत्थमणविणए, सेत्तं मणविणए, से किं तं वइचिणए?, व० २ दुविहे पं० तं०-पसत्यवइचिणए अप्पसत्यवइविणए य, से किं तं पसत्यवइविणए ?, प० २ सत्तविहे पं० तं० - अपावए जाव अभूयाभिसंकणे, सेत्तं पसत्यवइविणए, से किं तं अप्पसत्यवइविणए ?, अ० २ सत्तविहे पं० तं०-पावए सावले जाव भूयाभिसंकणे, सेत्तं अपसत्थवयबिणए, से तं वयविणए, से किं तं कायवि० १, २ दुविहे प०, तं०-पसत्थकायचिणए य अप्पसत्थकायविणए य, से किं तं पसत्थकायवि० १, पस० २ सत्तविहे पं० तंजहा- आउत्तं गमनं आवत्तं ठाणं आउत्तं निसीयणं आउन्तं तुपट्टणं आउतं उल्लंघणं आपलं पल्लंघणं आटतं सबिंदियजोगजुंजणया, सेत्तं पसत्यकायविणए से किं तं अप्पसत्थकायविणए १, अ० २ सत्तविहे पन्नत्ते, तंजहा अणाउत्तं गमणं जाव अणाउन्तं सर्विदियजोगजुंजणया, सेतं अप्पसत्थकायविणए, सेसं कायविणए, से किं तं लोगोवपारविणए १, लोगो० २ सत्तविहे पं० तं० Education Internation तपः, तस्य अर्थ, तस्य भेद-प्रभेदाः, For Parts Use One ~260~ | २५ शतके उद्देशः ७ | तपोभेदाः स्८०२ | ॥ ९२२ ॥ waryra Page #261 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (०५) प्रत सूत्रांक [८०२ -८०४] + गाथा: दीप अनुक्रम [९६३ -९६९] [भाग-११]“भगवती”– अंगसूत्र - ५ ( मूलं + वृत्ति:) शतक [२५], वर्ग [-], अंतर् शतक [ - ], उद्देशक [७], मूलं [ ८०२-८०४] + गाथा: पूज्य आगमोद्धारकश्री संशोधितः मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित.. आगमसूत्र- [०५] अंगसूत्र- [ ०५] "भगवती" मूलं एवं अभयदेवसूरि-रचिता वृत्तिः अन्भासवत्तियं परच्छेदाणुवत्तियं कज्जहे कपपडिकतिया अत्तगवेसणया देसकालण्णया सवत्थेसु अप्पडिलोमया, सेत्तं लोगोवयारविणए, सेन्तं विणए। से किं तं बेयावचे १, वे० २ दसविहे पं० तं०-आयरियवेयाबच्चे उवज्झायवेयावचे थेरवेयावचे तवस्सीवेया० गिलाणवेयाः सेहवेया० कुलवेया० गणवेया० संघवेया० साहम्मियवेयावचे, सेत्तं वेयावच्चे। से किं तं सज्झाए ?, सज्झाए पंचविहे पन्नत्ते, तं०-वायणा पढिपुच्छणा परियहणा अणुप्पेहा धम्मकहा, सेत्तं सज्झाए | ( सूत्र ८०२ ) से किं तं झाणे १, झाणे चउविहे पन्नन्ते, तंजहा-अहे झाणे रोदे झाणे धम्मे झाणे सुके झाणे, अट्टे झाणे- चउचि पनते, तंजा-अमणुन्नसंपयोगसंपडते तस्स विप्पयोगसतिसमन्नागए यावि भवइ १ मणुन्नसंपओगसंपत्ते तस्स अविप्पयोगसतिसमन्नागए यावि भवइ २ आयंकसंपयोगसंपत्ते तस्स विष्पयोगसतिस मन्नागए यावि भवइ ३ परिज्युसियकामभोगसं|पयोगसंपन्ते तस्स अविप्पयोग संति समन्नागए यावि भवइ ४, अहस्स णं झाणस्स चत्तारि लक्खणा पं० तं०कंदणया सोयणया निष्पणया परिदेवणया १। रोज्झाणे चउविहे पं० तं० - हिंसाणुबंधी मोसाणुबंधी तेयाबंधी सारक्खणाणुयंधी, रोदस्स णं झाणस्स चत्तारि लक्खणा पं० तं०- ओस्सन्नदोसे बद्दलदोसे अण्णाणदोसे आमरणांत दोसे २ । घम्मे झाणे चडविहे चउप्पडोयारे पं० तं० – आणाविजए अवायविजए विवागविजए संठाणविजए, धम्मस्स णं झाणस्स चत्तारि लक्खणा पं० तं० आणारुपी निसग्गरुपी सुत्तरुथी ओगा| उरुयी, धम्मस्स णं झाणस्स चत्तारि आलंबणा प० तं वायणा पडिपुच्छणा परियहणा धम्मकहा, धम्मस्स णं ucation internation तपः, तस्य अर्थ, तस्य भेद-प्रभेदाः, For Parts Only ~261~ waryra Page #262 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (०५) [भाग-११]"भगवती"-अंगसूत्र-५ (मूलं+वृत्ति:) शतक [२५], वर्ग [-], अंतर्-शतक [-1, उद्देशक [७], मूलं [८०२-८०४] + गाथा: पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र- [०५], अंगसूत्र- [०५] "भगवती मूलं एवं अभयदेवसूरि-रचिता वृत्ति: प्रत सूत्रांक [८०२-८०४] गाथा: व्याख्या- झाणस्स चत्तारि अणुप्पेहाओ पं०२०-एगत्ताणुप्पेहा अणिचाणुप्पेहा असरणाणुप्पेहा संसाराणुप्पेहा शर्ट |२५ शतके प्रज्ञप्तिः सुक्के झाणे चउधिहे चउप्पडोयारे पं०२०-पुहुत्तवियक्के सवियारी १ एगंतवियके अवियारी २ सुहमकिरिए उद्देशः ७ अभयदेवी-15/ अनियही ३ समोच्छिन्नकिरिए अप्पडिवायी४.समरस णं झाणस्स चत्तारि लक्षणा पं०,०-खंती मुत्सी ध्यानानि या वृत्तिः२ अज्जवे महवे, सुकस्स णं झाणस्स चत्तारि आलंषणा पं०२०-अवहे असंमोहे विवेगे विउसग्गे, सुक्कस्स गं युत्सर्गःसू झाणस्स चत्तारि अणुप्पेहाओ पं० २०-अणंतवत्तियाणुप्पेहा विप्परिणामाणुप्पेहा असुभाणुप्पेहा अवाया॥९२३॥ 15८०३-८०४ |णुप्पेहा ४, सेत्तं झाणे ।। (सूत्रं ८०३) से किं तं विउसग्गे ?, विजसग्गे. दुबिहे पं०, २०-दवविउसग्गे य| दभावविउसग्गे य, से किं तं दवविउसग्गे ?, दबविउसग्गे चउबिहे पं०, तं०-गणविउसग्गे सरीरविउसग्गे| उवहिविउसग्गे भत्तपाणविउसग्गे, सेसं दबविउसग्गे, से किं तं भावविउसग्गे ?, भावविउसग्गे तिविहे पं० तं०-कसायविउसग्गो संसारविउसग्गो कम्मविउसग्गो, से किं तं कसायविउसग्गे ?, कसायविउसग्गे चउबिहे पं०, तंजहा-कोहविउसग्गे माणविउसग्गे मायाविउसग्गे लोभविउसग्गे, सेत्तं कसायविउसग्गे, से किं तं संसारबिउसग्गे ?, संसारविउसग्गे चउबिहे पन्नत्ते, तंजहा-नेरइयसंसारविउसग्गे जाच देवसंसारविउसग्गे, सेसं संसारविउसग्गे, से किं तं कम्मविउसग्गे?, कम्मविउसग्गे अहविहे प०, तंजहा-णाणावर ॥९२३॥ |णिज्जकम्मविउसग्गे जाव अंतराइयकम्मविउसग्गे, सेत्तं कम्मविउसग्गे, सेत्तं भावविउसग्गे, सेत्तं अम्भित-| Piरिए तवे । सेवं भंते २त्ति (सूत्रं ८०४)॥ पंचविसतितमसए सत्तमो उद्देसओ समत्तो ॥ २५-७॥ दीप अनुक्रम [९६३-९६९] CAMESSAGE तपः, तस्य अर्थ, तस्य भेद-प्रभेदाः, ~262 Page #263 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (०५) [भाग-११]"भगवती"-अंगसूत्र-५ (मूलं+वृत्ति:) शतक [२५], वर्ग [-], अंतर्-शतक [-1, उद्देशक [७], मूलं [८०२-८०४] + गाथा: पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र- [०५], अंगसूत्र- [०५] "भगवती मूलं एवं अभयदेवसूरि-रचिता वृत्ति: प्रत सूत्रांक [८०२ -८०४] + C गाथा: SEASES 'दुविहे'त्यादि, 'बाहिरिए यत्ति बाह्य-बाह्यस्यापि शरीरस्य तापनात् मिथ्यादृष्टिभिरपि तपस्तयाऽभ्युपगमाच्च 'अम्भितरिए यत्ति आभ्यन्तरम्-अभ्यन्तरस्यैव कार्मणाभिधानशरीरस्य प्रायस्तापनात्सम्यग्दृष्टिभिरेव प्रायस्तपस्तयाऽभ्युपगमाञ्चेति 'ओमोयरिए'त्ति अवमस्य-ऊनस्योदरस्य करणमवमोदरिका, व्युत्पत्तिमात्रमेतदितिकृत्वोपकरणादेरपि न्यूनताकरणं सोच्यते, 'इसरिए यत्ति अल्पकालीनं 'आवकहिए यत्ति यावरकथिक-थावज्जीविकं, 'पाओवगमणे'त्ति पादपयनिस्पन्दतयाऽवस्थानं, 'नीहारिमेत्ति यदाश्रयस्यैकदेशे विधीयते, तत्र हि कडेवरमाश्रयान्निहरणीयं स्यादिति| कृत्वा निर्दारिम, 'अणीहारिमे य'त्ति अनिहरिमं यद् गिरिकन्दरादौ प्रतिपद्यते, 'चियत्तोवगरणसाइजणय'त्ति 'चियतस्स'त्ति लक्षणोपेततया संयतस्यैय 'साइजणय'त्ति स्वदनता परिभोजनमिति, चूण्या तूक्तं-जं वत्थाइ धारेइ समिवि ममत्तं नथि, जइ कोइ मग्गइ तस्स देई' त्ति, 'अप्पकोहे'त्ति अल्पक्रोधः पुरुषोऽवमोदरिको भवत्यभेदोपचारादिति | अप्पसद्देत्ति अल्पशब्दो राज्यादावसंयतजागरणभयात् 'अप्पझंझे'त्ति इह झझा-विप्रकीर्णा कोपविशेषाद्वचनपद्धतिः, चूया तूक्तं-झंझा भणत्थयबहुप्पलावित्तं' 'अप्पतुमंतुमे'त्ति तुमन्तुमो-हृदयस्थः कोपविशेष एष, 'वद्याभिग्गहचरए'त्ति भिक्षाचर्यायास्तद्वतश्चाभेदविवक्षणाट्रव्याभिग्रहचरको भिक्षाचर्येत्युच्यते, द्रव्याभिग्रहाश्च लेपकृतादिद्रव्यविषयाः 'जहा उववाइए'त्ति, भनेनेदं सूचित-खेत्ताभिग्गहचरए कालाभिग्गहचरए भावाभिग्गहचरए' इत्यादि, 'सुद्धेसणिए'त्ति शुद्धषणा-शङ्कितादिदोषपरिहारतः पिण्डग्रहस्तद्वांश्च शुद्धैषणिकः 'संखादत्तिए'त्ति समाप्रधानाः पश्चषादयो दत्तयोभिक्षाविशेषा यस्य स तथा, 'जहा उबवाइए'त्ति अनेनेदं सूचितम्-'आयंविलिए आयामसित्थभोई अरसाहारे' इत्यादि, E % % दीप अनुक्रम [९६३-९६९] तपः, तस्य अर्थ, तस्य भेद-प्रभेदाः, ~263 Page #264 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (०५) प्रत सूत्रांक [८०२ -८०४] + गाथा: दीप अनुक्रम [९६३ -९६९] [भाग-११]“भगवती”– अंगसूत्र - ५ ( मूलं + वृत्ति:) शतक [२५], वर्ग [-], अंतर् शतक [ - ], उद्देशक [७], मूलं [ ८०२-८०४] + गाथा: पूज्य आगमोद्धारकश्री संशोधितः मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित.. आगमसूत्र- [०५] अंगसूत्र- [ ०५] "भगवती" मूलं एवं अभयदेवसूरि- रचिता वृत्तिः व्याख्या प्रज्ञप्तिः अभयदेवीया वृत्तिः २ ॥ ९२४ ॥ * 'ठाणाइए' ति स्थानं कायोत्सर्गादिकमतिशयेन ददाति गच्छतीति वा स्थानातिदः स्थानातिगो वा, 'अहा उववाहए'त्ति, अनेनेदं सूचितं- 'पडिमडाई वीरासणिए नेसज्जिए' इत्यादि, इह च प्रतिमाः- मासिक्यादयः, वीरासनं च सिंहासननिविष्टस्य भून्यस्तपादस्य सिंहासनेऽपनीते यादृशमवस्थानं, निषया च-पुताभ्यां भूमावुपवेशनं, 'सोइंदियविसयप्पयारनिरोहो | वत्ति श्रोत्रेन्द्रियस्य यो विषयेषु - इष्टानिष्टशब्देषु प्रचारः - श्रवणलक्षणा प्रवृत्तिस्तस्य यो निरोधो-निषेधः स तथा शब्दानां श्रवणवर्जनमित्यर्थः 'सोदियविसए' इत्यादि श्रोत्रेन्द्रियविषयेषु प्राप्तेषु च 'अर्थेषु' इष्टानिष्टशब्देषु रागद्वेषविनि| ग्रहो- रागद्वेषनिरोधः 'मणस्स वा एगत्तीभावकरणं' मनसो वा 'एगत्त'त्ति विशिष्टकाप्रत्वेनैकता तद्रूपस्य भावस्य करणमेकत्ताभावकरणं, आत्मना वा सह यैकता-निरालम्बनत्वं तद्रूपो भावस्तस्य करणं यत्तत्तथा 'वईए वा एमत्तीभावकरणं'ति वाचो वा विशिष्टकाग्रस्वेनै कतारूपभावकरणमिति 'सुसमाहियपसंत साहरियपाणिपाए त्ति सुष्ठु समाहितःसमाधिप्राप्तो बहिर्वृत्या स चासौ प्रशान्तश्चान्तर्वृत्त्या यः स तथा संहृतं अविक्षिप्ततया धृतं पाणिपादं येन स तथा ततः कर्म्मधारयः 'कुम्मो इव गुत्तिदिए'त्ति गुप्तेन्द्रियो गुप्त इत्यर्थः क इव ?- कूर्म्म इव, कस्यामवस्थायामित्यत एवाह 'अल्लीणे पल्लीणेत्ति आलीन:-ईपल्लीन: पूर्व प्रलीनः पश्चात् प्रकर्षेण लीनस्ततः कर्म्मधारयः, 'सोमिलुदेसए'त्ति अष्टादशशतस्य दशमोदेशके, एतेन च यत्सूचितं तत्तत एवावधार्यम् ॥ 'पायच्छिते 'ति इह प्रायश्चित्तशब्देनापराधशुद्धिरुच्यते, | 'वेयावचं 'ति वैयावृत्त्यं - भक्तपानादिभिरुपष्टम्भः 'नाणविणए'त्ति ज्ञानविनयो-मत्यादिज्ञानानां श्रद्धानभक्ति बहुमान| तद्दृष्टार्थभावना विधिग्रहणाभ्यासरूपः 'दंसणविणए'त्ति दर्शनविनयः सम्यग्दर्शनगुणाधिकेषु शुश्रूषादिरूपः 'चरित - Education Internationa For Parts Only •••अत्र मूल संपादने सूत्र क्रमांकन सुचने एका स्खलना दृश्यते, सू. ८०२-८०४ स्थाने ८०३-८०४ मुद्रितं तपः, तस्य अर्थ, तस्य भेद-प्रभेदाः, ~264~ २५ शतके उद्देशः ७ ध्यानानि व्युत्सर्गः सू ८०३-८०४ | ॥ ९२४ ॥ Page #265 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (०५) [भाग-११]"भगवती"-अंगसूत्र-५ (मूलं+वृत्ति:) शतक [२५], वर्ग [-], अंतर्-शतक [-1, उद्देशक [७], मूलं [८०२-८०४] + गाथा: पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र- [०५], अंगसूत्र- [०५] "भगवती मूलं एवं अभयदेवसूरि-रचिता वृत्ति: प्रत सूत्रांक [८०२-८०४] गाथा: विणए'त्ति सामायिकादिचारित्राणां सम्यश्रद्धानकरणप्ररूपणानि 'लोगोषयारविणए'त्ति लोकानामुपचारो-व्यवहारः४ पूजा वा तद्रूपो यो विनयः स तथा 'सुस्सूसणाविणए'त्ति शुश्रूपणा-सेवा सैव विनयः शुश्रूषणाविनयः 'अणचासायणाविणए'त्ति अत्याशातना-आशातना तन्निषेधरूपो विनयोऽनत्याशातनाविनयः 'किरियाए अणचासायणाए'त्ति इह क्रिया-अस्ति परलोकोऽस्त्यात्माऽस्ति च सकलक्लेशाकलङ्कितं मुक्तिपदमित्यादिप्ररूपणात्मिका गृह्यते 'संभोगस्स अणचासायणाए'त्ति सम्भोगस्य-समानधाम्मिकाणां परस्परेण भक्तादिदानग्रहणरूपस्यानत्याशातना-विपर्यासवत्करणपरिवर्जन है 'भत्तिबहुमाणेणं ति इह शंकारो वाक्यालङ्कारे भत्त्या सह वहुमानो भक्तिवहुमान: भक्तिश्च इह बाह्या परिजुष्टिः बहुमानश्च-आन्तरः प्रीतियोगः 'वन्नसंजलणय'त्ति सजूतगुणवर्णनेन यशोदीपनं 'पसस्थमणविणए'त्ति प्रशस्तमन एव प्रवर्तनद्वारेण विनय:-कर्मापनयनोपायः प्रशस्तमनोविनयः, अप्रशस्तमन एवं निवर्त्तनद्वारेण विनयोऽप्रशस्तमनोविनयः है 'अपायए'त्ति सामान्येन पापवर्जितं विशेषतः पुनरसावद्य-क्रोधाद्यवद्यबर्जितं 'अकिरिए'त्ति कायिक्यादिक्रियाऽभिष्वअवर्जितं 'निरुवकसति स्वगतशोकायुपक्लेशवियुक्त 'अणण्हयकरें'त्ति अनाश्रवकरं प्राणातिपाताद्याश्रवकरणरहितमि-४ | त्यर्थः 'अच्छविकरे'त्ति क्षपिः-स्वपरयोरायासो यत् तत्करणशीलं न भवति तदक्षपिकर 'अभूयाभिसंकणे'त्ति यतो भूतान्यभिशङ्कन्ते-बिभ्यति तस्माद्यदन्यत्तदभूताभिशङ्कन, प्रशस्तवाग्विनयसूत्रे 'अपावए'त्ति अपापवाक्प्रवर्तनरूपो वाग्विनयोऽपापक इति, एवमन्येऽपि, 'आउत्त'ति आगुप्तस्य-संयतस्य सम्बन्धि यत्तदागुप्तमेव 'उल्लंघर्ण'ति की लङ्घनं ४ द्वारार्गलावरण्डकादेः 'पल्लंघर्ण ति पलहन-प्रकृष्टं लङ्कन विस्तीर्णभूखातादेः 'सवें दियजोगजुंजण'त्ति सर्वेषामिन्द्रिय दीप अनुक्रम [९६३ -९६९] तपः, तस्य अर्थ, तस्य भेद-प्रभेदाः, ~265 Page #266 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (०५) [भाग-११]"भगवती"-अंगसूत्र-५ (मूलं+वृत्ति:) शतक [२५], वर्ग [-], अंतर्-शतक [-1, उद्देशक [७], मूलं [८०२-८०४] + गाथा: पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र- [०५], अंगसूत्र- [०५] "भगवती मूलं एवं अभयदेवसूरि-रचिता वृत्ति: दा प्रत सूत्रांक [८०२ -८०४] व्याख्या। व्यापाराणां प्रयोग इत्यर्थः 'अम्भासवत्तियति अभ्यासो-गौरब्यस्य समीपं तत्र वर्तितुं शीलमस्येत्यभ्यासवती तद्भावो- प्रज्ञप्तिः २५ शतके अभयदेवी भ्यासवर्तित्वं, अभ्यासे वा प्रीतिक-प्रेम, 'परछंदाणुवत्तियंति परस्य-आराध्यस्य छन्द:-अभिप्रायस्तमनुवर्त्तयतीत्ये-18|| उद्देशः ७ या वृत्तिः वंशीलः परच्छन्दानुवर्ती तद्भावः परच्छन्दानुवर्तित्वं 'कजहे'ति कार्यहेतोः-ज्ञानादिनिमित्तं भक्तादिदानमिति गम्यं । ध्यानानि 'कयपडिकइय'त्ति कृतप्रतिक(ति)ता नाम विनयात्प्रसादिता गुरवः श्रुतं दास्यन्तीत्यभिप्रायेणाशनादिदानप्रयत्नः 'अत्तग-10 ॥९२५॥ वेसणय'त्ति आर्स-ग्लानीभूतं गवेषयति भैषज्यादिना योऽसावार्तगवेषणस्तद्भाव आर्तगवेषणता 'देसकालण्णय'त्ति ८०३-८०४ प्रस्तावज्ञता-अवसरोचितार्थसम्पादनमित्यर्थः 'सपत्थेसु अपडिलोमय'त्ति सर्वप्रयोजनेष्वाराध्यसम्बन्धिष्वानुकूल्यमिति । वैयावृत्त्यस्वाध्यायभेदाः प्रतीता एव, नवरं 'धेरवेयावच्चे'त्ति इह स्थविरो जम्मादिभिः 'तवस्सिवेयाबच्चे'त्ति तपस्वी चाष्टमादिक्षपकः ।। ध्यानसूत्रे-'अमणुनसंपओगसंपउत्तेतस्स विप्पओगसइसमन्नागए यावि भवई'त्ति अमनोज्ञ:है अनिष्टो यः शब्दादिस्तस्य यः सम्प्रयोगो-योगस्तेन सम्पयुक्तो यः स तथा स च तथाविधः सन् तस्यामनोज्ञस्य शब्दादेर्वि प्रयोगस्मृतिसमन्वागतश्चापि भवति-विप्रयोगचिन्तानुगतः स्यात्, चापीत्युत्तरवाक्यापेक्षया समुच्चयार्थः, असावार्तध्यानं स्यादिति शेषः, धर्माधर्मिणोरभेदादिति १'मणुन्नसंपओगसंपत्ते तस्स अविप्पओगसइसमन्नागए यावि भवति | प्राग्वन्नवर मनोज-धनादि 'तस्स'त्ति मनोज्ञस्य धनादेः२ 'आयंकसंपओ' इत्यादि, इहातको-रोगः ३ 'परिझुसिय- ॥९२५ कामभोगसंपओगसंपउत्ते तस्स अविष्पओगसइसमन्नागए यावि भवह'त्ति व्यक्तं नवरं 'परिझुसिय'त्ति 'जुषी प्रीतिसेवनयोः' इतिवचनात् सेवितः प्रीतो वा यः कामभोगः-शब्दादिभोगो मदनसेवा वा 'तस्सति तस्य कामभोग-18 BARBACCUMES गाथा: दीप अनुक्रम [९६३-९६९]] ...अत्र मूल संपादने सूत्र-क्रमांकन-सुचने एका स्खलना दृश्यते, सू. ८०२-८०४ स्थाने ८०३-८०४ मुद्रितं तपः, तस्य अर्थ, तस्य भेद-प्रभेदाः, ~266~ Page #267 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (०५) प्रत सूत्रांक [८०२ -८०४] + गाथा: दीप अनुक्रम [९६३ -९६९] [भाग-११]“भगवती”– अंगसूत्र - ५ ( मूलं + वृत्ति:) शतक [२५], वर्ग [-], अंतर् शतक [ - ], उद्देशक [७], मूलं [८०२-८०४] + गाथा: पूज्य आगमोद्धारकश्री संशोधितः मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित.. आगमसूत्र - [०५] अंगसूत्र- [ ०५] "भगवती" मूलं एवं अभयदेवसूरि-रचिता वृत्तिः स्येति ४ । 'कंद्रणय'त्ति महता शब्देन विरवणं 'सोयणय'ति दीनता 'तिष्पणय'त्ति तेपनता तिपः क्षरणार्थत्वादश्रुविमोचनं 'परिदेवणय'त्ति परिदेवनता - पुनः पुनः क्लिष्टभाषणतेति । 'हिंसाणुबंधि'त्ति हिंसा - सत्त्वानां बधबन्धवन्धना | दिभिः प्रकारैः पीडामनुबध्नाति सततप्रवृत्तां करोतीत्येवंशीलं यत्प्रणिधानं हिंसानुबंधो वा यत्रास्ति तद्धिंसानुबन्धि 'मोसाणुबंधि'त्ति मृषा-असत्यं तदनुवन्नाति पिशुनासत्यासद्भूतादिभिर्वचनभेदैस्तन्मृषानुबन्धि 'तेयानुबंधि'त्ति स्तेनस्यचौरस्य कर्म स्तेयं तीव्रक्रोधाद्याकुलतया तदनुबन्धवत् स्तेयानुबन्धि 'सारक्खणाणुबंधि त्ति संरक्षणे - सर्वोपायैः परित्राणे |विषयसाधनस्य धनस्यानुबन्धो यत्र तत्संरक्षणानुवन्धि, 'ओस्सन्न दोसे 'ति 'ओस्सन्नं'ति बाहुल्येन – अनुपरतत्वेन दोषो| हिंसाऽनृताद सादानसंरक्षणानामन्यतम ओसन्नदोषः 'बहुदोसे'त्ति बहुष्वपि सर्वेष्वपि हिंसादिषु ४ दोषः प्रवृत्तिलक्षणो बहुदोषः 'अन्नाणोसे'त्ति अज्ञानात् कुशाखसंस्कारात् हिंसादिषु अधर्मस्वरूपेषु धर्मबुद्धया या प्रवृत्तिस्तलक्षणो दोषोऽज्ञानदोषः 'आमरणंतदोसे 'त्ति मरणमेवान्तो मरणान्तः आमरणान्ताद्-आमरणान्तमसंजातानुतापस्य कालकशौकरिकादेवि या हिंसादिप्रवृत्तिः सैव दोषः आमरणान्तदोषः 'चउप्पडोयारे'त्ति चतुर्षु भेदलक्षणालम्बनानुप्रेक्षा ४ लक्षणेषु | पदार्थेषु प्रत्यवतारः - समवतारो विचारणीयत्वेन यस्य तच्चतुष्प्रत्यवतारं, चतुर्विधशब्दस्यैव पर्यायो वाऽयम्, 'आणाविजयेत्ति | आज्ञा-जिनप्रवचनं तस्या विचयो निर्णयो यत्र तदाज्ञाविचयं प्राकृतत्वाच्च 'आणाविजए'त्ति, एवं शेषपदान्यपि, नवरम| पाया - रागद्वेषादिजन्या अनर्थाः विपाकः - कर्मफलं संस्थानानि-लोकद्वीपसमुद्राद्याकृतयः 'आणारुइ ति आज्ञा - सूत्रस्य | व्याख्यानं निर्युक्तयादि तत्र तया वा रुचिः-श्रद्धानं साऽऽज्ञारुचिः 'निसग्गरुइ त्ति स्वभावत एव तत्त्वश्रद्धानं 'सुत Education International तपः, तस्य अर्थ, तस्य भेद-प्रभेदाः, For Parts Only ~267~ %%%%%% waryra Page #268 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (०५) प्रत सूत्रांक [८०२ -८०४] + गाथा: दीप अनुक्रम [९६३ -९६९] [भाग-११]“भगवती”– अंगसूत्र - ५ ( मूलं + वृत्ति:) शतक [२५], वर्ग [-], अंतर् शतक [ - ], उद्देशक [७], मूलं [ ८०२-८०४] + गाथा: पूज्य आगमोद्धारकश्री संशोधितः मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र - [०५], अंगसूत्र- [०५] “भगवती" मूलं एवं अभयदेवसूरि-रचिता वृत्तिः व्याख्या ॥ ९२६ ॥ रुत्ति आगमात्तत्त्वश्रद्धानम् 'ओगाढरुइ' त्ति अवगाढनमवगाढं- द्वादशाङ्गावगाहो विस्ताराधिगमस्तेन रुचिः अथवा प्रज्ञप्तिः 'ओगाढ'ति साधुप्रत्यासन्नीभूतस्तस्य साधूपदेशाद् रुचिरवगाढरुचिः, 'आलंयण'त्ति धर्म्मध्यानसौधशिखरारोहणार्थं अभयदेवी - ॐ यान्यालम्व्यन्ते तान्यालम्बनानि - वाचनादीनि, 'अणुप्पेह'त्ति धर्म्मध्यानस्य पश्चात्प्रेक्षणानि - पर्यालोचनान्यनुप्रेक्षाः, या वृत्तिः २ 'पुत्तवियके सवियारे' त्ति पृथक्त्वेन - एकद्रव्याश्रितानामुत्पादादिपर्यायाणां भेदेन वितर्को विकल्पः पूर्वगतश्रुतालम्बनो नानानयानुसरणलक्षणो यत्र तत्पृथक्त्ववितर्क, तथा विचार:- अर्थाद्व्यञ्जने व्यञ्जनादर्थे मनःप्रभृतियोगानां चान्यस्मादन्यस्मिन् विचरणं सह विचारेण यत्तत्सविचारि, सर्वधनादित्वादिन् समासान्तः १ 'एगत्तविय के अवियार'त्ति एकत्वेन| अभेदेनोत्पादादिपर्यायाणामन्यतमैक पर्यायालम्बनतयेत्यर्थः वितर्कः - पूर्वगतश्रुताश्रयो व्यञ्जनरूपोऽर्थरूपो वा यस्य तदेकत्ववितर्क, तथा न विद्यते विचारोऽर्थव्यञ्जनयोरितरस्मादितरत्र तथा मनःप्रभृतीनामन्यस्मादन्यत्र यस्य तदविचारीति २ १) 'सुहुमकिरिए अणियट्टि ेति सूक्ष्मा क्रिया यत्र निरुद्धवाग्मनोयोगत्वे सत्यर्द्धनिरुद्ध काययोगत्वात्तत्सूक्ष्मक्रियं न निवर्त्तत इत्यनिवर्त्ति वर्द्धमान परिणामत्वात्, एतच्च निर्वाणगमनकाले केवलिन एव स्यादिति ३ 'समुच्छिन्नकिरिए अप्पडि| वाइति समुच्छिन्ना क्रिया- कायिकयादिका शैलेशीकरणनिरुद्धयोगत्वेन यस्मिंस्तत्तथा अप्रतिपाति-अनुपरतस्वभावम्, 'अवहेति देवाद्युपसर्गजनितं भयं चलनं वा व्यथा तद्भावोऽव्ययम् 'असंमोहे'त्ति देवादिकृतमायाजनितस्य सूक्ष्मपदार्थविषयस्य च संमोहस्य- मूढताया निषेधोऽसंमोहः 'विवेगे'त्ति देहादात्मनः आत्मनो वा सर्वसंयोगानां विवेचनंबुद्ध्या पृथकरणं विवेकः ४ 'विसग्गे' ति व्युत्सर्गो- निस्सङ्गतया देहोपधित्यागः 'अनंतवन्तियाणुप्पेह'ति भवसन्तान For Parts Only •••अत्र मूल संपादने सूत्र क्रमांकन सुचने एका स्खलना दृश्यते, सू. ८०२-८०४ स्थाने ८०३-८०४ मुद्रितं तपः, तस्य अर्थ, तस्य भेद-प्रभेदाः, ~268~ २५ शतके उद्देशः ७ ध्यानानि व्युत्सर्गः सू ८०३-८०४ ॥ ९२६ ॥ Page #269 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (०५) [भाग-११]"भगवती"-अंगसूत्र-५ (मूलं+वृत्ति:) शतक [२५], वर्ग [-], अंतर्-शतक [-1, उद्देशक [७], मूलं [८०२-८०४] + गाथा: पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र- [०५], अंगसूत्र- [०५] "भगवती मूलं एवं अभयदेवसूरि-रचिता वृत्ति: प्रत सूत्रांक SCHOCA [८०२ -८०४] गाथा: स्थानन्तवृत्तिताऽनुचिन्तनं 'विष्परिणामाणुप्पेह'त्ति वस्तूनां प्रतिक्षणं विविधपरिणामगमनानुचिन्तनम् 'असुभाणुप्पेहत्ति संसाराशुभत्वानुचिन्तनम् 'अवायाणुप्पेह'त्ति अपायाना-प्राणातिपातायाश्रवद्वारजन्यानर्थानामनुप्रेक्षा-अनुचिन्तनमपायानुप्रेक्षा, इह च यत्तपोऽधिकारे प्रशस्ताप्रशस्तध्यानवर्णनं तदप्रशस्तस्य वर्जने प्रशस्तस्य च तस्यासेबने तपो भवतीतिकृत्वेति ॥ व्युत्सर्गसूत्रे-'संसारविउसग्गो'ति नारकायुष्कादिहेतूनां मिथ्यादृष्टित्वादीनां त्यागः 'कम्मविउसग्गो'त्ति ज्ञानावरणादिकर्मवन्धहेतूनां ज्ञानप्रत्यनीकत्वादीनां त्याग इति ॥ पञ्चविंशतितमशते सप्तमः ॥ २५॥७॥ | सप्तमोदेशके संयता भेदत उकास्तद्विपक्षभूताश्चासंयता भवन्ति ते च नारकादयस्तेषां च यथोत्पादो भवति तथाऽष्ट मेऽभिधीयते इत्येवंसम्बन्धस्यास्पेदमादिसूत्रम्टे रायगिहे जाव एवं वयासी-नेरड्या णं भंते ! कह उववज्जति ?, से जहानामए-पवए पवमाणे अज्झव साणनिवत्तिएणं करणोबाएक सेयकाले तं ठाणं विप्पजहित्ता पुरिमं ठाणं उपसंपज्जित्ताणं विहरइ एवामेव एएवि जीवा पवओविव पवमाणा अज्झवसाणनिधत्तिएणं करणोवाएणं सेयकाले तं भवं विप्पजहित्ता पुरिमं भवं उवसंपज्जित्ताणं विहरन्ति । तेसि णं भंते ! जीवाणं कहं सीहा गती कह सीहे गतिविसए प०१, गोयमा ! से जहानामए के पुरिसे तरुणे बलवं एवं जहा चोद्दसमसए पढमुद्देसए जाब तिसमएण वा विग्गणं उववजंति, तेसि णं जीवाणं तहा सीहा गई तहा सीहे गतिविसए प०1 ते णं भंते ! जीवा कहंत परभवियाउयं पकरेंति?, गोपमा! अज्झवसाणजोगनिवत्तिएणं करणोवाएणं एवं खलु ते जीवा परभवि-| 24X4 दीप अनुक्रम [९६३ -९६९] FarPurwanaBNamunoonm अत्र पञ्चविंशतितमे शतके सप्तम-उद्देशक: परिसमाप्त: अथ पञ्चविंशतितमे शतके अष्टमात् दवादशम् पर्यन्ता: उद्देशका: आरभ्यते तपः, तस्य अर्थ, तस्य भेद-प्रभेदाः, ~269 Page #270 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (०५) [भाग-११]"भगवती"-अंगसूत्र-५ (मूलं+वृत्ति:) शतक [२५], वर्ग [-], अंतर्-शतक [-1, उद्देशक [८-१२], मूलं [८०५-८०९] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र- [०५], अंगसूत्र- [०५] "भगवती मूलं एवं अभयदेवसूरि-रचिता वृत्ति: प्रत सूत्रांक [८०५ व्याख्या- याउयं पकरेन्ति, तेसि णं भंते जीवाणं कहं गती पवत्तइ ?, गोयमा ! आउक्खएणं भवक्खएणं ठिइक्खएणं, २५ शतके प्रज्ञप्तिः एवं खलु तेसिं जीवाणं गती पवत्तति,ते णं भंते ! जीवा किं आयड्डीए उववर्जति परिडीए उवव०, गोयमा! | उद्देश:८अभयदेवीआइडीए उवव० नो परिड्डीए उवव० ते णं भंते ! जीवा किं आयकम्मुणा उवव० परकम्मुणा उवव० ?, गोय G९-१०या वृत्तिः२|| ११-१२ मा आयकम्मुणा उवव० नो परकम्मुणा उवव०, ते णं भंते ! जीवा किं आयप्पयोगेणं उचथ० परप्पयोगेणं नारकभ॥९२७॥ उवव०१, गोयमा आयप्पयोगेणं उववजंति नो परप्पयोगेणं उवव० । असुरकुमारा णं भंते! कहं उवव व्यादीनाअंति, जहा नेरतिया तहेव निरवसेसं जाव नो परप्पयोगेणं उववजंति एवं एगिदियवजा जाव वेमाणिया, मुत्पत्तिरीएगिदिया तं चेव नवरं चउसमइओ विग्गहो, सेसं तं चेव, सेवं भंते ! २ त्ति जाव विहरइ ।। (सूत्रं ८०५) | तिः सू |पंचवीसंइमस्स अट्ठमो॥२५॥८॥ भवसिद्धियनेरइया भंते! कहं उवव०१, गोयमा! से जहानामए| l८०५-८०९ पवए पवमाणे अवसेसं तं चेव जाव वेमाणिए, सेवं भंते!२त्ति ॥ (सूत्रं ८०६) ॥२५॥९॥ अभवसिद्धियनेरइया णं भंते! कहं उवव०१, गोयमा! से जहानामए पवए परमाणे अवसेसं तं चेव एवं जाव वेमाणिए, सेवं भंते २त्ति ॥ (८०७) ॥२५॥१०॥ सम्मदिहिनेरइया गंभंते! कहं उवव.?, गोयमा! से जहानामए) पवए पवमाणे अवसेसंतं चेव एवं एगिदियवजं जाव वेमाणिया, सेवं भंते!२त्ति ॥ (सूत्रं ८०८)॥२५॥११॥ |मिच्छदिहिनेरझ्या णं भंते! कहं उचच.?, गोयमा से जहानामए-पवए पवमाणे अवसेसं तं चेव एवं जाव बेमाणिए, सेवं भंते २त्ति ॥ (सूत्रं ८०९)॥२५१२॥ पंचवीसतिम सयं सम्मत्तं ॥२५॥ अनुक्रम [९७०-९७४] ~270 Page #271 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (०५) [भाग-११]"भगवती"-अंगसूत्र-५ (मूलं+वृत्ति:) शतक [२५], वर्ग [-], अंतर्-शतक [-1, उद्देशक [८-१२], मूलं [८०५-८०९] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र- [०५], अंगसूत्र- [०५] "भगवती मूलं एवं अभयदेवसूरि-रचिता वृत्ति: 2194 प्रत सूत्रांक [८०५-८०९] 'रायगिहे'इत्यादि पवए'त्ति प्लवकः-उत्प्लवनकारी 'पवमाणे'त्ति प्लवमानः-उत्प्लुतिं कुर्वन् 'अज्झवसाणनिवत्ति-|| | एणं'ति उत्प्लोतव्यं मयेत्येवंरूपाध्यवसायनिर्वर्तितेन 'करणोपायेणं'ति उत्सवनलक्षणं यत्करण-क्रियाविशेषः स एवोपाय:-स्थानान्तरप्राप्ती हेतुः करणोपायस्तेन 'सेयकाले'त्ति एप्यति काले विहरतीति योगः, किं कृत्वा ? इत्याह-तं ठाणं'ति यत्र स्थाने स्थितस्तरस्थानं 'विप्रजहाय' प्लवनतस्त्यक्त्वा 'पुरिम'ति पुरोवर्तिस्थानम् 'उपसम्पद्य' विहरतीति योगः 'एवामेव ते जीव'त्ति दान्तिकयोजनार्थः, किमुक्तं भवति ? इत्याह-पवओविव पवमाण'सि, 'अज्झवसाणनिवत्तिएण'ति तथाविधाभ्यवसायनिर्वत्र्तितेन 'करणोचाएण'ति क्रियते विविधाऽवस्था जीवस्यानेन क्रियते वा तदिति करणं४ कर्म प्लवनक्रियाविशेषो वा करणं करणमिव करणं-स्थानान्तरप्राप्तिहेतुतासाधात्कमैव तदेवोपायः करणोपायस्तेन त । भवंति मनुष्यादिभवं 'पुरिमं भवति प्राप्तव्यं नारकभवमित्यर्थः 'अज्झवसाणजोगनिवत्तिएणं'ति अध्यवसानं जीवपरिणामो योगश्च-मनःप्रभृतिव्यापारस्ताभ्यां निर्वतितो यः स तथा तेन 'करणोवाएणं'ति करणोपायेन-मिथ्यात्वा18/ दिना कर्मबन्धहेतुनेति ॥ पञ्चविंशतितमशतेऽष्टमः ॥ २५॥८॥ एवं नवमदशमैकादशद्वादशाः ॥ २५।९।१०।१२१२॥3 पञ्चविंशतितमं शतं वृत्तितः परिसमाप्तमिति ॥ २५ ॥ क्वचिट्टीकावाक्यं क्वचिदपि वचश्चौर्णमनघं, क्वचिच्छान्दी वृत्तिं वचिदपि गर्म वाच्यविषयम् । कचिद्विद्वद्वाचं क्वचिदपि महाशास्त्रमपरं, समाश्रित्य व्याख्या शत इह कृता दुर्गमगिराम् ॥१॥ अनुक्रम [९७० -९७४] +96425% +- अथ पञ्चविंशतितमे शतके अष्टमात् दद्वादशम् पर्यन्ता: उद्देशका: परिसमाप्ता: ~271 Page #272 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (०५) प्रत सूत्रांक [८१० -८११] दीप अनुक्रम [९७५-९७७] [भाग-११]“भगवती”– अंगसूत्र - ५ ( मूलं + वृत्ति:) शतक [२६], वर्ग [-], अंतर् शतक [-], उद्देशक [१], मूलं [ ८१०-८११] + गाथा पूज्य आगमोद्धारकश्री संशोधितः मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित.. आगमसूत्र - [०५] अंगसूत्र- [ ०५] "भगवती" मूलं एवं अभयदेवसूरि-रचिता वृत्तिः व्याख्या प्रज्ञप्तिः अभयदेवीया वृत्तिः २ ३ ॥ ९२८ ॥ ॥ अथ पविंशतितमं शतकम् ॥ व्याख्यातं पञ्चविंशतितमं शतम्, अथ पविंशतितममारभ्यते, अस्य चायमभिसबन्धः - अनन्तरशते नारकादिजीबानामुत्पत्तिरभिहिता सा च कर्म्मबन्धपूर्विकेतिपविंशतितमशते मोहकर्मबन्धोऽपि विचार्यते इत्येवंसम्बन्धस्यास्यैकाद- + शोदेशकप्रमाणस्य प्रत्युद्देशकं द्वारनिरूपणाय तावद्गाथामाह नमो सुदेवाए भगवईए । जीवा १ य लेस्स २ पक्खिय ३ दिट्ठी ४ अन्नाण ५ नाण ६ सन्नाओ ७ । बेय ८ कसाए ९ उबओग १० जोग ११ एक्कारवि ठाणा ।। १ ।। तेणं कालेणं तेणं समपूर्ण रायगिहे जाब एवं वयासी जीवे णं भंते! पार्व कम्मं किं बंधी बंध बंधिस्सह १ बंधी बंध ण बंधिस्सइ २ बंधी न बंध बंधिस्सर ३ बंधी न बंधइ न बंधिस्सइ ४१, गोयमा ! अत्थेगतिए बंधी बंध बंधिस्सह १ अत्थेगतिए बंधी बंध ण बंधिस्स २ अत्थेगतिए बंधी ण बंधइ बंधिस्सर ३ अत्थेगतिए बंधीण बंधइ ण बंधिस्सह ४ -९ ॥ सलेस्से णं भंते! जीवे पावं कम्मं किं बंधी बंधइ बंधिस्सर १ बंधी बंध ण बंधिस्सर ? पुच्छा, गोयमा ! अत्थेगतिए बंधी बंधह बंधिस्सर १ अत्थेगतिए एवं भंगो । कण्हलेसे णं भंते! जीवे पावं कम्मं किं बंधी पुच्छा, गोयमा । अस्थेगतिए बंधी बंधइ बंधिस्सइ अत्थेगतिए बंधी बंधइ न बंधिस्सह एवं जाव पहलेसे सस्थ | पढमबितिय भंगा, सुकलेस्से जहा सलेस्से तहेव च भंगो । अलेस्से णं भंते! जीवे पावं कम्मं किं बंधी पुच्छा, अथ षड्विंशतितमे शतके प्रथम उद्देशक: आरभ्यते For Para Lise Only अथ षड्विंशतितमे शतकं आरभ्यते ~272~ २६ शतके उद्देशः १ जीवादी पापबन्धा दिसू |८१०-८११ | ॥ ९२८ ॥ Page #273 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (०५) प्रत सूत्रांक [८१० -८११] दीप अनुक्रम [९७५ -९७७] [भाग-११]“भगवती”– अंगसूत्र - ५ ( मूलं + वृत्ति:) शतक [२६], वर्ग [-], अंतर् शतक [-], उद्देशक [१], मूलं [८१०-८११] + गाथा पूज्य आगमोद्धारकश्री संशोधितः मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित.. आगमसूत्र - [०५] अंगसूत्र- [ ०५] "भगवती" मूलं एवं अभयदेवसूरि-रचिता वृत्तिः गोयमा ! बंधी न बंधइ न बंधिस्स २ ॥ कण्हपक्खिए णं भंते ! जीवे पार्थ कम्मं पुच्छा, गोयमा ! अत्थेगतिए बंधी पढमवितिया भंगा। सुक्कपक्खिए णं भंते! जीवे पुच्छा, गोयमा ! चउभंगो भाणियो || (सूत्रं ८१० | सम्मद्दिद्वीणं चत्तारि भंगा, मिच्छादिट्ठीणं पढमवितिया भंगा, सम्मामिच्छादिट्टीणं एवं चेव । नाणीणंचत्तारि भंगा, आभिणियोहियणाणीणं जाव मणपजवणाणीणं बत्तारि भंगा, केवलनाणीणं चरमो भंगो जहा अलेस्साणं ५, अन्नाणीणं पद्मवितिया, एवं मइअन्नाणीणं सुयअन्नाणीणं विभंगणाणीणवि ६ । आहारसन्नोवउत्ताणं जाव परिग्गहसन्नोवउत्ताणं पदमवितिया नोसन्नोवउत्ताणं चत्तारि ७ । सवेद्गाणं पढमवितिया, एवं इत्थवेदगा पुरिसवेदगा नपुंसगवेदगावि, अवेदगाणं चत्तारि ॥ सकसाईणं चत्तारि, कोहकसायीणं पढमबितिया भंगा, एवं माणकसाथिस्सवि मायाकसाथिस्सवि लोभक साथिस्सवि चत्तारि भंगा, अकसायी णं भंते ! जीवे पावं कम्मं किं बंधी ? पुच्छा, गोयमा ! अत्थेगतिए बंधी न बंधइ बंधिस्सह ३ अत्थेगतिए बंधी ण बंधइ ण बंधिस्सर ४ । सजोगिस्स उभंगो, एवं मणजोगस्सवि व जोगस्सवि कायजोग| स्सवि, अजोगिस्स चरिमो, सागारोवन्ते चन्तारि, अणागारोवउत्तेचि चत्तारि भंगा ११ ॥ (सूत्रं ८११ ) 'जीवा य' इत्यादि, 'जीवा यत्ति जीवाः प्रत्युद्देशकं बन्धवक्तव्यतायाः स्थानं, ततो लेश्याः पाक्षिकाः दृष्टयः अज्ञानं ज्ञानं सज्ञा वेदः कषाया योग उपयोगश्च बन्धवक्तव्यतास्थानं तदेवमेतान्येकादशापि स्थानानीति गाथार्थः ॥ तत्रानन्तरोत्पन्नादिविशेषविरहितं जीवमाश्रित्यैकादशभिरुक्तरूपैर्द्वारबन्धवक्तव्यतां प्रथमोदेश केऽभिधातुमाह- 'तेण' मित्यादि Education Internation For Parts Only ~273~ Page #274 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (०५) प्रत सूत्रांक [८१० -८११] दीप अनुक्रम [९७५ -९७७] [भाग-११]“भगवती”– अंगसूत्र - ५ ( मूलं + वृत्ति:) शतक [२६], वर्ग [-], अंतर् शतक [-], उद्देशक [१], मूलं [ ८१०-८११] + गाथा पूज्य आगमोद्धारकश्री संशोधितः मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र- [ ०५] अंगसूत्र- [०५] “भगवती" मूलं एवं अभयदेवसूरि-रचिता वृत्तिः ॥ ९२९ ॥ व्याख्या'पावं कम्मं 'ति अशुभं कर्म 'बंधी'ति वद्धवान् 'बंध 'त्ति वर्त्तमाने 'बंधिस्सइति अनागते इत्येवं चत्वारो भङ्गा बद्धप्रज्ञप्तिः वानित्येतत्पदलब्धाः, 'न बंधी' त्येतत्पदलभ्यास्त्विह न भवन्ति, अतीतकालेऽबन्धकस्य जीवस्यासम्भवात् तत्र च बद्धअभयदेवी- ४ वान् वनाति भन्त्स्यति चेत्येष प्रथमोऽभव्यमाश्रित्य बद्धवान् बनाति न भन्त्स्यतीति द्वितीयः प्राप्तव्यक्षपकत्वं या वृत्तिः २ भव्य विशेषमाश्रित्य वद्धवान् न बध्नाति भन्त्स्यतीत्येष तृतीयो मोहोपशमे वर्त्तमानं भव्यविशेषमाश्रित्य ततः प्रतिप* तितस्य तस्य पापकर्मणोऽवश्यं बन्धनात् बद्धवान् न बनाति न भन्रस्यतीति चतुर्थः क्षीणमोहमाश्रित्येति ॥ | लेश्याद्वारे सलेश्यजीवस्य चत्वारोऽपि स्युर्यस्माच्छुक्कलेश्यस्य पापकर्म्मणो बन्धकत्वमप्यस्तीति, कृष्णलेश्यादिपञ्चकयुक्तस्य त्वाद्यमेव भङ्गकद्वयं, तस्य हि वर्त्तमानकालिको मोहलक्षणपापकर्मण उपशमः क्षयो वा नास्तीत्येवमन्त्यद्वयाभावः, द्वितीयस्तु तस्य संभवति, कृष्णादिलेश्यायतः कालान्तरे क्षपकत्वप्राप्तौ न भन्त्स्यतीत्येतस्य सम्भवादिति, अलेश्यः- अयोगिकेवली तस्य च चतुर्थ एव, लेश्याभावे बन्धकत्वाभावादिति ॥ पाक्षिकद्वारे कृष्णपाक्षिकस्याद्यमेव भङ्गकद्वयं वर्त्तमाने बन्धाभावस्य तस्याभावात्, शुपाक्षिकस्य तु चत्वारोऽपि स हि बद्धवान् बध्नाति भन्त्स्यति च प्रश्न समयापेक्षयाऽनन्तरे भविष्यति समये १ तथा बद्धवान् बध्नाति न भन्त्स्यति क्षपकत्वप्राप्तौ २ तथा बद्धवान् न | बनाति चोपशमे भन्त्स्यति च तत्प्रतिपाते ३ तथा बद्धवान्न वंभाति न च भन्त्स्यति क्षपकत्व इति ४, अत एव आह| 'चउभंगो भाणियवो'त्ति, ननु यदि कृष्णपाक्षिकस्य न भन्त्स्यतीत्यस्यासम्भवाद्वितीयो भङ्गक इष्टस्तदा शुलपाक्षिकस्याविश्यं सम्भवात्कथं तत्प्रथमभङ्गकः? इति, अत्रोच्यते, पृच्छानन्तरे भविष्यत्कालेऽबन्धकत्वस्याभावात्, उक्तं च वृद्धैरिह Jan Eucatury International For Penal Use Only ~274~ २६ शतके उद्देशः १. जीवादीनां पापवन्धा दिसू |८१०-८११ ॥ ९२९ ॥ wor Page #275 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (०५) [भाग-११]"भगवती"-अंगसूत्र-५ (मूलं+वृत्ति:) शतक [२६], वर्ग [-], अंतर्-शतक [-], उद्देशक [१], मूलं [८१०-८११] + गाथा पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र- [०५], अंगसूत्र- [०५] "भगवती मूलं एवं अभयदेवसूरि-रचिता वृत्ति: प्रत सूत्रांक [८१०-८११] 83%CE % दीप साक्षेपपरिहारं-"बंधिसयबीयभंगो जुजइ जइ कण्हपक्खियाईणं । तो सुक्कपक्खियाणं पढमो भंगो कह गेझो ?॥१॥ द उच्यते-पुच्छाणंतरकालं पर पढमो सुकपक्खियाईणं । इयरेसिं अवसिटुं कालं पइ वीयओ भंगो ॥२॥"त्ति [बन्धिशते | यदि कृष्णपाक्षिकाणां द्वितीयो भङ्गो युज्यते तदा शुक्लपाक्षिकाणां प्रथमो भङ्गः कथं ग्राह्यः ॥ १॥ पृच्छानन्तरकालं प्रतीत्य प्रथमः शुक्लपाक्षिकादीनाम् । इतरेषामवशिष्ट कालं प्रतीत्य द्वितीयो भङ्गः॥२॥] दृष्टिद्वारे-सम्यग्दृष्टेश्चत्वारोऽपि भङ्गाः शुक्लपाक्षिकस्येव भावनीयाः, मिथ्यादृष्टिमिश्रदृष्टीनामाद्यौ द्वावेव, वर्तमानकाले मोहलक्षणपापकर्मणो बन्धभावेनान्त्यद्वयाभावात् , अत एवाह-'मिकछेत्यादि । ज्ञानद्वारे-केवलनाणीणं चरमो भंगो'त्ति वर्तमाने एष्यत्काले च* बन्धाभावात् 'अन्नाणीणं पढमबीय'त्ति, अज्ञाने मोहलक्षणपापकर्मणः क्षपणोपशमनाभावात् । सज्ञाद्वारे-'पढमबीयत्ति आहारादिसज्ञोपयोगकाले क्षपकत्वोपशमकत्वाभावात्, 'नोसन्नोवउत्ताणं चत्तारित्ति नोसझोपयुक्ता-आहारादिषु गृद्धिवर्जितास्तेषां च चत्वारोऽपि क्षपणोपशमसम्भवादिति । वेदद्वारे-सवेयगाणं पढमवीय'त्ति वेदोदये हि क्षपणोपशमी न स्यातामित्याद्यद्वयम् 'अवेदगाणं चत्तारित्ति स्वकीये वेदे उपशान्ते बनाति भन्स्यति च मोहलक्षणं | ॥ पापं कर्म यावत्सूक्ष्मसम्परायो न भवति प्रतिपतितो वा भन्स्यतीत्येवं प्रथमः, तथा वेदे क्षीणे वभाति सूक्ष्मसंपरायाद्य-| वस्थायां च न भन्स्यतीत्येवं द्वितीयः, तथोपशान्तवेदः सूक्ष्मसम्परायादौ न बनाति प्रतिपतितस्तु भन्स्यतीति तृतीयः, तथा क्षीणे वेदे सूक्ष्मसम्परायादिषु न बध्नाति न चोत्तरकालं भन्त्स्यतीत्येवं चतुर्थः, बद्धवानिति च सर्वत्र प्रतीतमेवेतिकृत्वा न प्रदर्शितमिति ।। कषायद्वारे-'सकसाईणं चत्तारित्ति तत्राद्योऽभव्यस्य द्वितीयो भव्यस्य प्राप्तव्यमोहक्षयस्य e0 अनुक्रम [९७५-९७७]] RecAROSRX %AX ~275 Page #276 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (०५) [भाग-११]"भगवती"-अंगसूत्र-५ (मूलं+वृत्ति:) शतक [२६], वर्ग [-], अंतर्-शतक [-], उद्देशक [१], मूलं [८१०-८११] + गाथा पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र- [०५, अंगसूत्र- [०५] "भगवती" मूलं एवं अभयदेवसूरि-रचिता वृत्ति: प्रत सूत्रांक | उद्देशः १ [८१० -८११] 11९३०॥ दीप व्याख्या-5 तृतीय उपशमकसूक्ष्मसम्परायस्य चतुर्थः क्षपकसूक्ष्मसम्परावस्य, एवं लोभकपायिणामपि वाच्यं, 'कोहकसाईणं पढमः२६ शतके प्रज्ञप्ति बीय'त्ति इहाभव्यस्य प्रथमो द्वितीयो भव्यविशेषस्य तृतीयचतुधौं त्विह न स्तो वर्तमानेऽबन्धकत्वस्थाभावात् 'अक-15 अभयदेवी साईण'मित्यादि, तत्र 'बंधी न बंधइ बंधिस्सइत्ति उपशमकमाश्रित्य, 'बंधी न बंधइ न बंधिस्सइ'त्ति क्षपकमाश्रित्येति, नारदीनां या वृत्तिा२१ योगद्वारे-'सजोगिस्स चउभंगों'त्ति अभव्यभव्यविशेषोपशमकक्षपकाणां क्रमेण चत्वारोऽप्यवसेवाः, 'अजोगिस्स चरमो'त्ति | पापज्ञाना बबन्धिबध्यमानभन्त्स्यमानत्वयोस्तस्याभावादिति ॥ | त्वादि सू . नेरइए णं भंते! पावं कम्मं किं बंधी बंधा बंधिस्सइ ?, गोयमा! अत्धेगतिए बंधी परमवितिया १, सलेस्से ८१२-८१३ of भंते! नेरतिए पावं कम्मं चेव, एवं कण्हलेस्सेवि नीललेस्सेवि काउलेसेवि, एवं कण्हपक्खिए मुफपक्खिए, ६|| सम्मदिही मिच्छादिट्ठी सम्मामिच्छादिही, पाणी आभिणियोहियनाणी सुयनाणी ओहिणाणी अन्नाणी म-18 इअन्नाणी सुयअनाणी विभंगनाणी आहारसन्नोवउत्ते जाव परिग्गहसनोवउत्ते, सवेदए नपुंसकवेदए, सकसाथी जाव लोभकसायी, सजोगी मणजोगी वयजोगी कायजोगी, सागारोवउत्ते अणागारोवउत्ते, एएसु सवेसु पदेसु पढमवितिया भंगा भाणियबा, एवं असुरकुमारस्सवि वत्तच्या भाणियबा नवरं तेउलेस्सा इस्थि-12 | वेयगपुरिसवेयगा य अम्भहिया नपुंसगवेदगा न भन्नति सेसं तं चेव सबस्य पढमबितिया भंगा, एवं जाव* धणियकुमारस्स, एवं पुढविकाइयस्सवि आउकाइयस्सवि जाव पंचिंदियतिरिक्खजोणियस्सवि सवत्वयि प-15| ढमबितिया भंगा नवरं जस्स जा लेस्सा, दिहीणाणं अन्नाणं वेदो जोगो यजं जस्स अस्थि तं तस्स भाणि-| अनुक्रम [९७५-९७७] AAAAAAAAG ॥९३०॥ नारक-आदिनाम् पाप-कर्मन: आदि बन्ध: ~276 Page #277 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (०५) [भाग-११]"भगवती"-अंगसूत्र-५ (मूलं+वृत्ति:) शतक [२६], वर्ग [-], अंतर्-शतक [-], उद्देशक [१], मूलं [८१२-८१३] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र- [०५], अंगसूत्र- [०५] "भगवती मूलं एवं अभयदेवसूरि-रचिता वृत्ति: प्रत सूत्रांक [८१२-८१३] 3 यचं सेसं तहेव, मणूसस्स जचेव जीवपदे वत्सषया सचेव निरवसेसा भाणियचा, वाणमंतरस जहा असर-17 द कुमारस्स, जोइसियस्स वेमाणियस्स एवं चेव नवरं लेस्साओ जाणियबाओ, सेसं तहेव भाणियचं (सूत्रं ८१२)जीवे गं भंते ! नाणा० कम्मं किं बंधी बंधइ बंधिस्सइ एवं जहेच पावकम्मरस वत्तवया तहेव नाणावरणिज्जस्सवि भा० नवरं जीवपदे मणुस्सपदे य सकसाई जाव लोभकसाईमि य पढमबितिया भंगा| अवसेसं तंजाव वेमा०, एवं दरिसणावरणिजेणवि दंडगो भाणियको निरवसेसो॥जीवे णं भंते । वेयणिज्नं कम्मं किं बंधी पुच्छा, गोयमा ! अस्थेगतिए बंधी बंधइ बंधिस्सइ १ अत्थेगतिए बंधी बंधइन पंधिस्सइ २ अस्थगतिए बंधी न बंधइन पंधिस्सह ४, सलेस्सेवि एवं चेव ततियविहणा भंगा, कण्हलेस्से |जाव पम्हलेस्से पढमवितिया भंगा, सुकलेस्से ततियविहूणा भंगा, अलेस्से चरिमो भंगो, कण्हपक्खिए पढमवितिया भंगा, सुफपक्खिया ततियविहूणा, एवं सम्मदिहिस्सवि, मिच्छादिहिस्स सम्मामिच्छादिहिस्स य पढमयितिया, णाणस्स ततियविहूणा आभिणियोहियनाणी जाव मणपज्जवणाणी पढम|बितिया केवलनाणी ततियविहूणा, एवं नोसन्नोवउत्ते अवेदए अकसायी सागारोवउत्ते अणागारोव18 उत्ते एएसु ततियविहूणा, अजोगिम्मि य चरिमो, सेसेसु पढमबितिया । नेरइए णं भंते ! वेयणिज्ज कम्मं बंधी बंधह एवं नेरतिया जाच वेमाणिपत्ति जस्स जं अत्थि सवत्धवि पढमथितिया, नवरं मणुस्से PRAYERRORRIER- 5525) अनुक्रम [९७८ -९७९] नारक-आदिनाम् पाप-कर्मन: आदि बन्ध: ~277 Page #278 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (०५) प्रत सूत्रांक [८१२ -८१३] दीप अनुक्रम [९७८-९७९] [भाग-११]“भगवती”- अंगसूत्र -५ (मूलं + वृत्ति:) शतक [२६], वर्ग [-], अंतर् शतक [-] उद्देशक [१], मूलं [ ८१२-८१३] पूज्य आगमोद्धारकश्री संशोधितः मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित.. आगमसूत्र - [०५] अंगसूत्र- [ ०५] "भगवती" मूलं एवं अभयदेवसूरि-रचिता वृत्तिः व्याख्याप्रज्ञष्ठिः अभयदेवी या वृत्तिः २५ ॥ ९३१ ॥ ४ जहा जीवो, जीवे णं भंते ! मोहणिज्जं कम्मं किं बंधह ?, जहेव पावं कम्मं तदेव मोहणिज्यंपि निरवसेसं जाव वैमाणिए (सूत्रं ८१३ ) ॥ | 'नेरइए 'मित्यादि 'पढमवीय'त्ति नारकत्वादौ श्रेणीद्वयाभावात् प्रथमद्वितीयावेव, एवं सलेश्यादि - [ ग्रन्थाग्रम् १८००० ] विशेषितं नारकपदं वाच्यं एवमसुरकुमारादिपदमपि । 'मणूसस्से' त्यादि, या जीवस्य निर्विशेषणस्य सलेश्यादिपद विशेषितस्य च चतुर्भयादिवक्तव्यतोक्ता सा मनुष्यस्य तथैव निरवशेषा वाच्या, जीवमनुष्ययोः समानधर्म्मत्वादिति ॥ तदेवं सर्वेऽपि पञ्चविंशतिर्दण्डकाः पापकर्म्माश्रित्योक्ताः, एवं ज्ञानावरणीयमप्याश्रित्य पञ्चविंशतिदण्डका वाच्याः, एतदेवाह - 'जीवे णं भंते !' इत्यादि, एतच्च समस्तमपि पूर्ववदेव भावनीयं यः पुनरत्र विशेषस्तत्प्रति| पादनार्थमाह- 'नवर' मित्यादि । पापकर्म्मदण्डके जीवपदे मनुष्यपदे च यत्सकषायिपदं लोभकपायिपदं च तत्र सूक्ष्मसम्परायस्य मोहलक्षणपापकर्म्माबन्धकत्वेन चत्वारो भङ्गा उक्ता इह त्वाद्यावेव वाच्यौ, अवीतरागस्य ज्ञानावरणीयत्रन्धकत्वादिति, एवं दर्शनावरणीयदण्डकाः ॥ वेदनीयदण्डके – प्रथमे भने भन्यो द्वितीये भव्यो यो निर्वास्यति तृतीयो न संभवति वेदनीयमध्ध्या पुनस्तद्बन्धनस्यासम्भवात्, चतुर्थे त्वयोगी, 'सलेस्सेचि एवं चैव तइपविणा भंग'त्ति, इह तृतीयस्याभावः पूर्वोक्त युक्तेरवसेयः, चतुर्थः पुनरिहाभ्युपेतोऽपि सम्यग् नावगम्यते, यतः 'बंधी न बंधइ न बंधिस्सइ' इत्येतदयोगिन एव संभवति, स च सलेश्यो न भवतीति केचित्पुनराहु:-अत एव वचनादयोगिताप्रथमसमये घण्टालाला| न्यायेन परमशुक्ललेश्याऽस्तीति सलेश्यस्य चतुर्भङ्गकः संभवति, तवं तु बहुश्रुतगम्यमिति, कृष्णलेश्यादिपञ्चकेऽयोगि Eucation International नारक- आदिनाम् पाप-कर्मन: आदि बन्धः For Penal Praise Only ~278~ २६ शतके उद्देशः १ नारदीनां पापज्ञाना ववन्धि त्वादि सू ८१२-८१३ ॥ ९३१ ॥ Page #279 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (०५) प्रत सूत्रांक [८१२ -८१३] दीप अनुक्रम [९७८ -९७९] [भाग-११]“भगवती”- अंगसूत्र -५ (मूलं + वृत्ति:) शतक [२६], वर्ग [-], अंतर् शतक [-], उद्देशक [१], मूलं [८१२-८१३] पूज्य आगमोद्धारकश्री संशोधितः मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित.. आगमसूत्र - [०५] अंगसूत्र- [०५] "भगवती" मूलं एवं अभयदेवसूरि-रचिता वृत्तिः त्वस्याभावादाद्यावेध, शुकुलेश्ये जीवे सलेश्यभाविता भङ्गा वाच्याः, एतदेवाह - 'सुक्कले से' त्यादि, अलेश्य:- शैलेशीगतः सिद्धश्च तस्य च बद्धवान्न वन्नाति न भन्त्स्यतीत्येक एवेति एतदेवाह - 'अलेस्से 'चरमो'ति । 'कण्हपक्लिए पढम| बीय'त्ति कृष्णपाक्षिकस्यायोगित्वाभावात्, 'सुकपक्खिए तईयविहूणत्ति शुक्लपाक्षिको यस्मादयोग्यपि स्यादतस्तृतीय| विहीनाः शेषास्तस्य स्युरिति । एवं सम्मदिट्टिस्सवि'ति तस्याप्ययोगित्वसम्भवेन बन्धासम्भवान्मिथ्यादृष्टिमिश्रदृष्ट्यो| श्वायोगित्वाभावेन वेदनीयाबन्धकत्वं नास्तीत्याद्यावेव स्यातामत एवाह - 'मिच्छविट्टी'त्यादि, ज्ञानिनः केवलिनश्चा| योगित्वेऽन्तिमोऽस्ति, आभिनिबोधिकादिष्वयोगित्वाभावान्नान्तिम इत्यत आह- 'नाणस्से त्यादि, एवं सर्वत्र यत्रायो| गित्वं संभवति तत्र चरमो यत्र तु तन्नास्ति तत्राद्यौ द्वावेवेति भावनीयाविति ॥ आयुष्कर्म्मदण्डके जीवे णं भंते ! आउयं कम्मं किं बंधी बंध ? पुच्छा, गोयमा । अत्थेगतिए बंधी चउभंगो सलेस्से जाव सुकलेस्से चत्तारि भंगा अलेस्से चरिमो भंगो। कण्हपक्खिए णं पुच्छा, गोयमा ! अत्थेगतिए बंधी बंधइ बंधि| स्सइ अत्थेगतिए बंधी न बंधड़ बंधिस्सह, सुक्षपक्खिए सम्मदिट्ठी मिच्छादिट्ठी चत्तारि भंगा, सम्मामिच्छादिट्ठीपुच्छा, गोयमा ! अत्थंगतिए बंधी न बंघइ बंधिस्तर अत्थेगतिए बंधी न बंधह न बंधिस्सर, नाणी जाब ओहिनाणी चत्तारि भंगा, मणपञ्जवनाणीपुच्छा, गोयमा ! अत्थेगतिए बंधी बंधइ बंधिस्सह, अत्थेगतिए बंधी न बंध बंधिस्सर, अस्थेगतिए बंधी न बंधइ न बंधिस्सह, केवलनाणे चरमो भंगो, एवं एएणं कमेणं नोसन्नोयउत्ते ucatin intonationd नारक- आदिनाम् पाप-कर्मन: आदि बन्धः For Parts Only ~279~ waryru Page #280 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (०५) [भाग-११]"भगवती"-अंगसूत्र-५ (मूलं+वृत्ति:) शतक [२६], वर्ग [-], अंतर्-शतक [-], उद्देशक [१], मूलं [८१४...] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र- [०५], अंगसूत्र- [०५] "भगवती मूलं एवं अभयदेवसूरि-रचिता वृत्ति: * प्रत सूत्रांक [८१४..] दीप अनुक्रम [९८०] ख्या- वितियविहूणा जहेव मणपज्जवनाणे, अवेदए अकसाई य ततियचउत्था जहेव सम्मामिच्छते, अजोगिम्मि २६ शतके प्रज्ञप्तिः चरिमो, सेसेसु पदेसु चत्तारि भंगा जाच अणागारोवउत्ते ॥ उद्देशः१ अभयदेवी-18|| 'चउभंगोत्ति तत्र प्रथमोऽभव्यस्य द्वितीयो यश्चरमशरीरो भविष्यति तस्य, तृतीयः पुनरुपशमकस्य, स द्यायुर्बद्ध-18 दिजीवानाया वृत्तिः२ वान् पूर्व उपशमकाले न बनाति तहमतिपतितस्तु भन्स्यति, चतुर्थस्तु क्षपकस्य, स ह्यायुर्वद्धवान् न वनाति न च । | बन्धित्वाभन्स्यतीति । 'सलेस्से' इह यावत्करणात् कृष्णलेश्यादिग्रहस्तत्र यो न निवास्यति तस्य प्रथमः, यस्तु चरमशरीरतयो-IIPदिसू८१४ स्पत्स्यते तस्य द्वितीयः, अवन्धकाले तृतीयः, चरमशरीरस्य च चतुर्थः, एवमन्यत्रापि । 'अलेस्से चरमो'त्ति अलेश्य:दशैलेशीगतः सिद्धश्च, तस्य च वर्तमानभविष्यत्कालयोरायुपोऽबन्धकत्वाचरमो भङ्गः । कृष्णपाक्षिकस्य प्रथमस्तृतीयश्च संभवति, तत्र च प्रथमः प्रतीत एव, तृतीयस्त्वायुष्काबन्धकाले न बनात्येव उत्तरकालं तु तद् भन्रस्थतीत्येवं स्यात्, || द्वितीयचतुओं तु तत्य नाभ्युपगम्ये ते, कृष्णपाक्षिकत्वे सति सर्वथा तद्भन्स्यमानताया अभाव इति विवक्षणात्, शुक्लपाक्षिकस्य सम्यग्दृष्टेश्चत्वारः, तत्र वद्धवान् पूर्व बन्नाति च बन्धकाले भन्त्स्यति चाबन्धकालस्योपरीत्येकः १ बद्धवान् बनाति न भन्रपति च परमशरीरत्वे इति द्वितीयः २ तथा बद्धवान् न पक्षात्यषन्धकाले उपशमावस्थायां वा | भन्स्यति च पुनर्बन्धकाले प्रतिपतितो वेति तृतीयः३ चतुर्थस्तु क्षपकस्येति ४ । मिथ्याष्टिस्तु द्वितीयभड़के न भन्स्यति चरमशरीरप्राप्ती, तृतीये न बनात्यबन्धकाले चतुर्थे न चनात्यबन्धकाले न भन्स्यति चरमशरीरमाताविति, 'सम्मा-K॥९३२॥ मिच्छे'त्यादि, सम्यग्मिथ्याटिरायुर्न बनाति, चरमशरीरत्वे च कश्चिन्न भन्नस्यत्यपीतिकृत्याऽन्त्यावेवेति, ज्ञानिनां ***** नारक-आदिनाम् पाप-कर्मन: आदि बन्ध: ~280 Page #281 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (०५) प्रत सूत्रांक [८१४..] दीप अनुक्रम [१९८० ] [भाग-११]“भगवती”– अंगसूत्र - ५ ( मूलं + वृत्ति:) शतक [२६], वर्ग [-], अंतर् शतक [ - ], उद्देशक [१], मूलं [ ८१४ ...] पूज्य आगमोद्धारकश्री संशोधितः मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित.. आगमसूत्र - [०५] अंगसूत्र- [ ०५] "भगवती" मूलं एवं अभयदेवसूरि-रचिता वृत्तिः चत्वारः प्राग्वद्भावयितव्याः, मनः पर्यायज्ञानिनो द्वितीयवजस्तत्रासौ पूर्वमायुर्वद्धवान् इदानीं तु देवायुर्बध्नाति ततो मनुष्यायुर्भन्त्स्यतीति प्रथमः, बध्नाति न भन्त्स्यतीति न संभवति, अवश्यं देवत्वे मनुष्यायुषो बन्धनादितिकृत्वा द्वितीयो नास्ति, तृतीय उपशमकस्य, सहि न बध्नाति प्रतिपतितश्च भन्त्स्यति, क्षपकस्य चतुर्थः, एतदेव दर्शयति- 'मणपजवे'त्यादि, 'केवलनाणे चरमो'त्ति केवली ह्यायुर्न बन्नाति न च भन्त्स्यतीति कृत्वा, नोसन्ज्ञोपयुक्तस्य भङ्गकत्रयं द्वितीयवर्जे मनःपर्यायवद्भावनीयं एतदेवाह - 'एएण' मित्यादि, 'अवेदए' इत्यादि, अवेदको कपायी च क्षपक उपशमको वा तयोश्च वर्त्तमानबन्धो नास्त्यायुषः उपशमकश्च प्रतिपतितो भन्त्स्यति क्षपकस्तु नैवं भन्त्स्यतीतिकृत्वा तयोस्तृतीयचतुर्थी, 'सेसेसु'ति शेषपदेषु — उक्तव्यतिरिकेषु अज्ञान १ मत्यज्ञानादि ३ सञ्ज्ञोपयुक्ताहारादिसञ्ज्ञोपयुक्त ४ सवेद १ स्त्रीवेदादि ३ सकषाय १ क्रोधादिकषाय ४ सयोगि १ मनोयोग्यादि २ साकारोपयुक्तानाकारोपयुक्तलक्षणेषु चत्वार एवेति । नेरइए णं भंते ! आउयं कम्मं किं बंधी पुच्छा, गोयमा ! अत्थेगतिए चत्तारि भंगा एवं सवत्थवि नेरइयाणं चत्तारि भंगा नवरं कण्हलेस्से कण्हपक्खिए य पढमततिया भंगा, सम्मामिच्छते ततियचउत्था, असुरकुमारे एवं चैव, नवरं कण्हलेस्सेवि चत्तारि भंगा भाणियता सेसं जहा नेरइयाणं एवं जाब धणियकुमाराणं, पुढविकाइयाणं सवत्थवि चत्तारि भंगा, नवरं कण्हपक्खिए पढमततिया भंगा, तेऊलेस्से पुच्छा, गोयमा ! बंधी न बंधइ बंधिस्सर सेसेसु सवत्थ चत्तारि भंगा, एवं आउक्कायवणस्सइकाइयाणवि निरव Education Internation नारक- आदिनाम् पाप कर्मन: आदि बन्धः For Parts Only ~281~ Page #282 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (०५) [भाग-११]"भगवती"-अंगसूत्र-५ (मूलं+वृत्ति:) शतक [२६], वर्ग [-], अंतर्-शतक [-], उद्देशक [१], मूलं [...८१४] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र- [०५], अंगसूत्र- [०५] "भगवती मूलं एवं अभयदेवसूरि-रचिता वृत्ति: प्रत सूत्रांक [..८१४] व्याख्या- सेसं, तेउकाइयवाउकाइयाणं सबस्थवि पढ़मततिया भंगा, वेइंदियतेइंदियचउरिदियाणंपि सबथवि पढम- २६ शतके प्रज्ञप्तिः ॥४॥ ततिया भंगा, नवरं सम्मत्ते नाणे आभिणियोहियनाणे सुयनाणे ततिओ भंगो। पंचिंदियतिरिक्खजोणि- उद्देशः १ अभयदेवीया वृत्तिः२ याणं काहपक्खिए पढमततिया भंगा, सम्मामिच्छत्ते ततियचउत्थो भंगो, सम्मत्ते नाणे आभिणियोहिय-15 जीवाना है नाणे सुयनाणे ओहिनाणे एएसु पंचसुवि पदेसु वितियविहणा भंगा, सेसेसु चत्तारि भंगा, मणुस्साणं ॥९३३॥ जहा जीवाणं. नवरं सम्मत्ते ओहिए नाणे आभिणियोहियनाणे सुयनाणे ओहिनाणे एएसु वितिषविहुणा टू भंगा, सेसं तं चेव, वाणमंतरजोइसिपवेमाणिया जहा असुरकुमारा, नाम गोयं अंतरायं च एयाणि जहा! नाणावरणिज । सेवं भंते !२त्ति जाव विहरति ॥ (सूत्रं ८१४)॥ बंधिसयस्स पढमो उद्देसओ ॥२६-१॥ नारकदण्डके-'चत्तारि भंग'त्ति, तत्र नारक आयुर्बद्धवान् बध्नाति बन्धकाले भन्त्स्यति भवान्तर इत्येकः १, प्राप्तव्यसिद्धिकस्य द्वितीयः, बन्धकालाभावं भाविवन्धकालं चापेक्ष्य तृतीयः, बद्धपरभविकायुपोऽनन्तरं प्राप्तव्यचरम-18 | भवस्य चतुर्थः, एवं सर्वत्र, विशेषमाह-नवर'मित्यादि, लेझ्यापदे कृष्णलेश्येषु नारकेषु प्रथमतृतीयी, तथाहि-कृष्णलेश्यो नारको बद्धवान् वनाति भन्स्यति चेति प्रथमः प्रतीत एव, द्वितीयस्तु नास्ति, यतः कृष्णलेश्यो नारकस्तियत्प-12 द्यते मनुष्येषु चाचरमशरीरेषु, कृष्णलेश्या हि पश्चमनरकपृथिव्यादिषु भवति न च तत उद्भुत्तः सिद्ध्यतीति, तदेवमसौ नारकस्तिर्यगाद्यायुर्वदा पुनर्भरस्थति अचरमशरीरत्वादिति । तथा कृष्णलेश्यो नारक आयुष्कावन्धकाले तन्न बनाति बन्धकाले तु भन्स्यतीति तृतीयः, चतुर्थस्तु तस्य नास्ति आयुरवन्धकत्वस्याभावादिति । तथा कृष्णपाक्षिकनारकस्य दीप अनुक्रम [९८०] ॥९३३॥ नारक-आदिनाम् पाप-कर्मन: आदि बन्ध: ~282 Page #283 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (०५) [भाग-११]"भगवती"-अंगसूत्र-५ (मूलं+वृत्ति:) शतक [२६], वर्ग [-], अंतर्-शतक [-], उद्देशक [१], मूलं [...८१४] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र- [०५], अंगसूत्र- [०५] "भगवती मूलं एवं अभयदेवसूरि-रचिता वृत्ति: + प्रत सूत्रांक [..८१४] प्रथमः प्रतीत एव, द्वितीयो नास्ति, यतः कृष्णपाक्षिको नारक आयुर्बदा पुनर्न भन्स्यतीत्येतन्नास्ति, तस्य चरमभवाभावात् , तृतीयस्तु स्यात् , चतुर्थोऽपि न उक्तयुक्तरेवेति । 'सम्मामिच्छत्त तइयचउत्थ'त्ति सम्यग्मिथ्यादृष्टेरायुषो बन्धाभावादिति । असुरकुमारदण्डके 'कण्हलेसेवि चत्तारि भंग'त्ति नारकदण्डके कृष्णलेश्यनारकस्य किल प्रथमतृतीया बुतो, असुरकुमारस्य तु कृष्णलेश्यस्यापि चत्वार एव, तस्य हि मनुष्यगत्यवाप्तौ सिद्धिसम्भवेन द्वितीयचतुर्थयोरपि है भावादिति । पृथिवीकायिकदण्डके 'कण्हपक्खिए पढमतइया भंग'त्ति, इह युक्तिः पूर्वोकैवानुसरणीया ॥ तेजोले श्यापदे तृतीयो भङ्गः, कथं , कश्चिद्देवस्तेजोलेश्यः पृथिवीकायिकेषूत्पन्नः स चापर्याप्तकावस्थायां तेजोलेश्यो भवति, तेजोलेश्याद्धायां चापगतायामायुर्वनाति तस्मात्तेजोलेश्यः पृथिवीकायिक आयुर्बद्धवान् देवत्वे न बनाति तेजोलेश्यावहै स्थायां भन्स्यति च तस्यामपगतायामित्येवं तृतीयः, 'एवं आउकाइयवणस्सइकाइयाणवित्ति उक्तभ्यायेन कृष्णपा|क्षिकेषु प्रथमतृतीयौ भङ्गी, तेजोलेश्यायां च तृतीयभङ्गसम्भवस्तेष्वित्यर्थः, अन्यत्र तु चत्वारः, 'तेफकाइए'इत्यादि, तेजस्कायिकवायुकायिकानां सर्वत्र एकादशस्वपि स्थानकेष्वित्यर्थः प्रथमतृतीयभनौ भवतस्तत उत्तानामनन्तरं मनुष्येवनुत्पत्त्या सिद्धिगमनाभावेन द्वितीयचतुर्थासम्भवाद्, मनुष्येषु अनुत्पत्तिश्चैतेषां “सत्तममहिनेरइया तेउवाऊ अणंतरुवट्टा। न य पावे माणुस्सं तहेवड संखाउआ सबे॥१॥"[सप्तममहीनारकास्तेजोवायवोऽनन्तरोद्वत्ताः मानुष्यं न प्रामुवन्ति तथैव सर्वे स्युरसयातायुषः॥१॥] इति वचनादिति । 'बेइंदिए' इत्यादि, विकलेन्द्रियाणां सर्वत्र प्रथमतृतीयभङ्गो, ६ यत्तस्तत उदृत्तानामानन्तर्येण सत्यपि मानुषत्वे निर्वाणाभावस्तस्मादवश्यं पुनस्तेषामायुषो बन्ध इति, यदुक्तं विकलेन्द्रि दीप अनुक्रम [९८०] +++BACRORSCcScrica नारक-आदिनाम् पाप-कर्मन: आदि बन्ध: ~283 Page #284 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (०५) [भाग-११]"भगवती"-अंगसूत्र-५ (मूलं+वृत्ति:) शतक [२६], वर्ग [-], अंतर्-शतक [-], उद्देशक [१], मूलं [...८१४] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र- [०५], अंगसूत्र- [०५] "भगवती मूलं एवं अभयदेवसूरि-रचिता वृत्ति: प्रत सूत्रांक [..८१४] व्याख्या-1Pयाणां सर्वत्र प्रथमतृतीयभङ्गापिति तदपवादमाह-'नवरं सम्मत्ते'इत्यादि, सम्यक्त्वे ज्ञाने आभिनियोधिके श्रुते च PI प्रज्ञप्तिः विकलेन्द्रियाणां तृतीय एव, यतः सम्यक्त्वादीनि तेषां सासादनभावेनापर्याप्तकावस्थायामेव, तेषु चापगतेष्वायुषो बन्ध |२६ शतके उद्देशः। इत्यतः पूर्वभवे बद्धवन्तः सम्यक्त्वाधवस्थायां च न वनन्ति तदनन्तरं च भन्स्यतीति तृतीय इति । 'पंचिंदियतिया वृत्तिः जीवाना रिक्खें'त्यादि, पञ्चेन्द्रियतिरश्चां कृष्णपाक्षिकपदे प्रथमतृतीयौ, कृष्णपाक्षिको ह्यायुर्ववाऽबट्टा वा तदबन्धकोऽनन्तरमेव । मायुःकर्म॥९३४॥ भवति तस्य सिद्धिगमनायोग्यत्वादिति । 'सम्मामिच्छत्ते तईयचउत्थ'त्ति सम्यग्मिथ्यादृष्टेरायुषो बन्धाभावात्तृतीयच-४ बन्धित्वातुर्थावेक, भावितं चैतलागेवेति । 'सम्मत्ते इत्यादि, पञ्चेन्द्रियतिरश्चां सम्यक्त्वादिषु पञ्चसु द्वितीयवो भङ्गा भवन्ति, दिसू IN दिसू८१४ कथं ?, यदा सम्बग्दष्यादिः पञ्चेन्द्रियतिर्यगायुर्भवति तदा देवेष्वेव स च पुनरपि भन्स्यतीति न द्वितीयसम्भवः, प्रथम8 तृतीयौ तु प्रतीतावेव, चतुर्थः पुनरेवं-यथा मनुष्येषु यद्धायुरसी सम्यक्त्वादि प्रतिपद्यते अनन्तरं च प्राप्तस्य परमभषहै स्तदैवेति । 'मणुस्साणं जहा जीवाणं'ति, इह विशेषमाह-'नवर'मित्यादि, सम्यक्त्वसामान्यज्ञानादिषु पञ्चसु पदेषु मनुष्या द्वितीयविहीनाः, भावना चेह पञ्चेन्द्रियतिर्यसूत्रवदवसेयेति ॥ षड्विंशतितमशते प्रथमः ॥ २६-१॥ 113 दीप अनुक्रम [९८०] CONSCAR प्रथमोद्देशके जीवादिद्वारे एकादशकप्रतिवद्धैवभिः पापकर्मादिप्रकरणैजीवादीनि पञ्चविंशतिजीवस्थानानि निरूपितानि द्वितीयेऽपि तथैव तानि चतुर्विंशतिनिरूप्यन्त इत्येवंसम्बद्धस्यास्येदमादिसूत्रम्। अर्णतरोववन्नए णं भंते ! नेरदए पावं कम्मं किं बंधी? पुच्छा तहेव, गोयमा ! अत्थेगतिए बंधी पढम ॥९३४॥ अथ षड्वंशतितमे शतके प्रथम-उद्देशक: परिसमाप्तं अथ षड्विंशतितमे शतके द्वितीय-उद्देशक: आरब्ध: नारक-आदिनाम् पाप-कर्मन: आदि बन्ध: ~2840 Page #285 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (०५) प्रत सूत्रांक [८१५] दीप अनुक्रम [९८१] [भाग-११]“भगवती”- अंगसूत्र -५ (मूलं + वृत्तिः) शतक [२६], वर्ग [-], अंतर् शतक [ - ], उद्देशक [२], मूलं [८१५] पूज्य आगमोद्धारकश्री संशोधितः मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित.. आगमसूत्र- [०५] अंगसूत्र- [ ०५] "भगवती" मूलं एवं अभयदेवसूरि-रचिता वृत्तिः चितिया भंगा। सलेस्से णं भंते ! अणंतरोवबन्नए नेरइए पार्व कम्मं किं बंधी पुच्छा, गोयमा ! पढमविलिया भंगा, एवं खलु सवत्थ पदमवितिया भंगा, नवरं सम्मामिच्छत्तं मणजोगो वइजोगो य न पुच्छिलाइ, एवं जाव थणियकुमाराणं, बेइंदियतेइंदिय चउरिंदियाणं वयजोगो न भन्नइ, पंचिदियतिरिक्खजोणियाणंपि | सम्मामिच्छन्तं ओहिनाणं विभंगनाणं मणजोगो वयजोगो एयाणि पंच पदाणि णभन्नंति । मनुस्साणं अलेस्ससम्मामिच्छत्तमणपञ्जवणाणकेवलनाणविभंगनाणनोसन्नोव उत्तअवेद्गअकसायीमणजोगवयजोग अजोगि| एयाणि एक्कारस पंदाणि ण भन्नंति, वाणमंतरजोइ सियवेमाणियाणं जहा नेरइयाणं तहेब ते तिन्नि न भन्नंति सबेसिं, जाणि सेसाणि ठाणाणि सवत्थ पढमवितिया भंगा, एगिंदियाणं सङ्घत्थ पढमवितिया भंगा, जहा पावे एवं नाणावरणिज्जेणवि दंडओ, एवं आउयवजेसु जाव अंतराइए दंडओ ॥ अनंतरोववन्नए णं भंते ! नेरइए आउयं कम्मं किं बंधी पुच्छा, गोयमा ! बंधी न बंध बंधिस्सइ । सलेस्से णं भंते! अनंतरोववन्नए नेरहए आउयं कम्मं किं बंधी ?, एवं चैव ततिओ भंगो, एवं जाव अणागारोवडत्ते, सवत्थवि ततिओ भंगो, एवं मणुस्सवलं जाव वैमाणियाणं, मणुस्साणं सवत्थ ततिचत्था भंगा, नवरं कण्हपक्खिसु ततिओ भंगो, सबेसि नाणत्ताई ताई चैव । सेवं भंते । २ ति ॥ ( सूत्रं ८१५ ) ॥ बंधिसयस्स बितिओ ।। २६-२ ॥ 'अतरोवचन्नए ण' मित्यादि, इहाद्यावेव भङ्गौ अनन्तरोपपन्ननारकस्य मोहलक्षण पापकर्म्माबन्धकत्वासम्भवात् तद्धि Education Internation नारक- आदिनाम् पाप-कर्मन: आदि बन्धः For Parts Only ~ 285~ Page #286 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (०५) प्रत सूत्रांक [८१५] दीप अनुक्रम [see] [भाग-११]“भगवती”– अंगसूत्र -५ (मूलं + वृत्तिः) शतक [२६], वर्ग [-], अंतर् शतक [ - ], उद्देशक [२], मूलं [८१५] पूज्य आगमोद्धारकश्री संशोधितः मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित.. आगमसूत्र- [०५] अंगसूत्र- [ ०५] "भगवती" मूलं एवं अभयदेवसूरि-रचिता वृत्तिः व्याख्याप्रशतिः सूक्ष्मसम्परायादिषु भवति, तानि च तस्य न संभवन्तीति । 'सवत्थ'त्ति लेश्यादिपदेषु एतेषु च लेश्यादिपदेषु सामान्यतो नारकादीनां संभवन्त्यपि, यानि पदान्यनन्तरोत्पन्ननारकादीनामपर्याप्तकत्वेन न सन्ति तानि तेषां न प्रच्छनीयाअभयदेवी- 5 नीति दर्शयन्नाह - 'नवर 'मित्यादि, तत्र सम्यग्मिथ्यात्वाद्युक्तत्रयं यद्यपि नारकाणामस्ति तथाऽपीहानन्तरोत्पन्नतया तेषां या वृत्तिः २ तन्नास्तीति न पृच्छनीयं एवमुत्तरत्रापि ॥ आयुष्कर्म्मदण्डके - 'मणुस्साणं सवस्थ तईयचस्थति यतोऽनन्तरोत्पन्नो मनुष्यो नायुर्वभाति भन्त्स्यति पुनः चरमशरीरस्त्वसौ न बनाति न च भम्त्स्यतीति । 'कण्हपक्खिसु तइओ ति ४ कृष्णपाक्षिकत्वेन न भन्त्स्यतीत्येतस्य पदस्यासम्भवात्तृतीय एव 'सदेसि नाणसाई ताई चेवति सर्वेषां नारकादिजीवानां यानि पापकर्मदण्डकेऽभिहितानि नानात्वानि तान्येवायुर्दण्डकेऽपीति ॥ पविंशतितमशते द्वितीयः ॥ २६-२ ॥ ॥ ९३५ ॥ द्वितीयो देशकोऽनन्तरोपपनकाशार कादीनाश्रित्योक्तस्तृतीयस्तु परम्परोपपन्नकानाश्रित्योच्यते इत्येवंसम्बद्धस्यास्येदमादिसूत्रम् - परंपरोवबन्नए णं भंते! नेरइए पावं कम्मं किं बंधी पुच्छा, गोयमा ! अस्थेगतिए पढमवितिया, एवं जहेब पढमो उद्देसओ तहेव परंपरोववन्नएहिवि उद्देसओ भाणियवो नेरहयाइओ तहेच नवदंडगसहिओ, अहपहचि कम्मप्पगडीणं जा जस्स कम्मस्स वत्तवया सा तस्स अहीणमतिरित्ता नेयवा जाव बेमाणिया अणागारोवउत्ता । सेवं भंते । २ त्ति ॥ (सूत्रं ८१६ ) ।। २६-३ ।। Education International 116 अथ षड्विंशतितमे शतके द्वितीय उद्देशकः परिसमाप्तं अथ षड्विंशतितमे शतके तृतीय उद्देशक: आरब्धः नारक- आदिनाम् पाप कर्मन: आदि बन्धः For Parts Only ~286~ २६ शतके उद्देशः २ अनन्तरोत्पन्नानां उद्देशः ३ परम्परोस्प ज्ञानां पापबन्धित्वादिसू ८१६ | ॥ ९३५ ॥ Page #287 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (०५) प्रत सूत्रांक [८१६] दीप अनुक्रम [९८२] [भाग-११]“भगवती”– अंगसूत्र -५ (मूलं + वृत्ति:) शतक [२६], वर्ग [-], अंतर् शतक [-] उद्देशक [३], मूलं [ ८१६] पूज्य आगमोद्धारकश्री संशोधितः मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित.. आगमसूत्र - [०५] अंगसूत्र- [ ०५] "भगवती" मूलं एवं अभयदेवसूरि-रचिता वृत्तिः 'परंपरोववन्नए णमित्यादि, 'जहेब पढमो उद्देसओ त्ति जीवनारकादिविषयः, केवलं तत्र जीवनारकादिपञ्चविं| शतिः पदान्यभिहितानि इह तु नारकादीनि चतुर्विंशतिरेवेति एतदेवाह - 'नेरइयाइओ'त्ति नारकादयोऽत्र वाच्या इत्यर्थः, 'तहेब नवदंडगसंगहिओ त्ति पापकर्मज्ञानावरणादिप्रतिबद्धा ये नव दण्डकाः प्रागुक्तास्तैः सङ्गृहीतो- युक्तो य उद्देशकः 'तथा ॥ षडूविंशतितमशते तृतीयः ॥ २६-३ ॥ अणंतरोगाढए णं भंते! नेरइए पावं कम्मं किं बंधी ? पुच्छा, गोयमा ! अत्थेगतिए० एवं जहेब अनंतरोववन्नएहिं नवदंडगसंगहिओ उद्देसो भणिओ तहेव अनंतरोगाढएहिवि अहीणमतिरित्तो भाणियो नेरइयादीए जाव बेमाणिए । सेवं भंते । २ ॥ २६-४ ॥ परंपरोगाढए णं भंते । नेरइए पावं कम्मं किं बंधी जहेब परंपरोवषन्नएहिं उद्देसो सो चैव निरवसेसो भाणियो । सेवं भंते । २ । २६-५ ॥ अनंतराहारए णं भंते! नेरतिए पावं कम्मं किं बंधी ? पुच्छा, एवं जहेव अनंतराव वन्नएहिं उद्देसो तहेव निरवसेसं । सेवं भंते । २ ।। २६-६।। परंपराहारए णं भंते! नेरहए पार्व कम्मं किं बंधी पुच्छा, गोयमा ! एवं जहेब परंपरोववन्नएहिं उसो तहेव निरवसेसो भाणियो। सेवं भंते! सेवं भंते ! ।। २६-७ ॥ अणंतरपज्जत्तए णं भंते । नेरइए पावं कम्म किं बंधी ? पुच्छा, गोयमा ! जहेव अणंतरोववन्नएहिं उद्देसो तहेब निरवसेसं । सेवं भंते २ ॥ २६-८ ॥ परंपरपात्तए णं भंते! नेरइए पावं कम्मं किं बंधी ? पुच्छा, गोयमा। एवं जहेव परंपरोवबन्नएहिं उद्देसो तहेव निर Education International For Parts Only अथ षड्विंशतितमे शतके तृतीय- उद्देशकः परिसमाप्तं अथ षड्विंशतितमे शतके चतुर्थात् एकादशं पर्यन्तः उद्देशका: आरब्धा: नारक- आदिनाम् पाप कर्मन: आदि बन्धः ~ 287 ~ waryru Page #288 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (०५) [भाग-११]"भगवती"-अंगसूत्र-५ (मूलं+वृत्ति:) शतक [२६], वर्ग [-], अंतर्-शतक [-], उद्देशक [४-११], मूलं [८१७] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र- [०५], अंगसूत्र- [०५] "भगवती मूलं एवं अभयदेवसूरि-रचिता वृत्ति: प्रत सूत्रांक [८१७] व्याख्या-1|3|| वसेसो भाणियो । सेवं 1२ जाब विहरद ॥ २६-१॥चरिमेणं भंते ! नेरहए पापं कम्मं किं बंधी? पुच्छा, प्रज्ञप्तिः गोयमा ! एवं जहेव परंपरोववन्नएहिं उद्देसो तहेव चरिमेहिं निरवसेसो । सेवं भंते ! २ जाव विहरति अभयदेषी- २६-१०॥ अचरिमे णं भंते ! नेरइए पावं कम्मं किं बंधी? पुच्छा, गोयमा ! अत्धेगइए एवं जहेब पढ- मोद्देसए पढमपितिया भंगा भाणियचा सवत्थ जाव पंचिंदियतिरिक्खजोणियाणं । अचरिमे णं भंते ! ॥९३६॥ मणुस्से पावं कम्मं किं बंधी? पुच्छा, गोयमा ! अत्धेगतिए बंधी बंध बंधिस्सइ अत्थे० बंधी बंधइ न बंधि स्सइ अस्थगतिए बंधी न बंधइ वंघिस्सह । सलेस्से णं भंते । अचरिमे मणूसे पावं कम्मं किं बंधी!, एवं चेव |तिन्नि भंगा चरमविष्टणा भाणियवा एवं जहेच पढमुद्देसे, नवरं जेसु तत्व वीससु चत्तारि भंगा तेसु इह आदिल्ला तिन्नि भंगा भाणियवा चरिमभंगवजा, अलेस्से केवलनाणी य अजोगीय एए तिन्निविन पुच्छिवंति, | सेसं तहेव, वाणमंतरजोइ बेमा० जहा नेरइए । अचरिमे णं भंते ! नेरइए नाणावरणिजं कम किं बंधी पुच्छा, गोयमा एवं जहेव पावं नवरंमणुस्सेसु सकसाईमु लोभकसाईसु य पढमबितिया भंगा सेसा अट्ठारस दचरमविद्रणा सेसं तहेब जाव वेमाणियाणं, दरिसणावरणिज्जंपि एवं चेव निरवसेसं, वेपणिजे सवत्थवि पढमपितिया भंगा जाव बेमाणियाणं नवरं मणुस्सेसु अलेस्से केवली अजोगी य नत्थि । अचरिमेणं भंते ! Bनेरइए मोहणिज कम्मं किं बंधी? पुच्छा, गोयमा! जहेव पावं तहेव निरचसेसं जाव वेमाणिए । अचरिमेणं | भंते ! नेरइए आउयं कम्मं किंबंधी ! पुच्छा, गोयमा ! पदमधिनिया भंगा, एवं सबपदेसुवि, नेरइयाणं २६ शतके उद्देशः ४५:६-७-८११-१२ अनन्तरावगाढादीनांपापबन्धिस्वादि सू८१७ दीप अनुक्रम [९८२ -९९०] ॥९३६॥ नारक-आदिनाम् पाप-कर्मन: आदि बन्ध: ~288 Page #289 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (०५) [भाग-११]"भगवती"-अंगसूत्र-५ (मूलं+वृत्ति:) शतक [२६], वर्ग [-], अंतर्-शतक [-], उद्देशक [४-११], मूलं [८१७] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र- [०५], अंगसूत्र- [०५] "भगवती मूलं एवं अभयदेवसूरि-रचिता वृत्ति: प्रत सूत्रांक [८१७] पदमततिया भंगा नवरं सम्मामिच्छत्ते ततिओ भंगो, एवं जाव थणियकुमाराणं, पुढ विकाइयभाउकाइय-|| वणस्सइकाइयाणं तेउलेस्साए ततिओ मंगो सेसेसु पदेसु सवत्थ पढमततिया भंगा, तेउकाइयवाउकाइयाणं हूँ सवत्थ पढमततिया भंगा, थेबंदियतेइंदियचउ० एवं चेव नवरं सम्मत्ते ओहिनाणे आभिणियोहियनाणे सुयनाणे एएसु चउमुचि ठाणेसु ततिओ भंगो, पंचिंदियतिरिक्खजोणियाणं सम्मामिच्छत्ते ततिओ भंगो, | सेसेसु पदेसु सवत्थ पढ़मततिया भंगा, मणुस्साणं सम्मामिच्छत्ते अवेदए अकसाइम्मि य ततिओ भंगो.। अलेस्स केवलनाण अजोगी य न पुच्छिज्जति, सेसपदेसु सवत्थ पढमततिया भंगा, चाणमंतरजोहसियवेमा|णिया जहा मेराया । नाम गोयं अंतराइयं च जहेव नानावरणिज्ज तहेव निरवसेसं । सेवं भंते १२ जाव विह४ रद ।। (सूत्रं ८१७)॥२६-११ उद्देसो ।। बंधिसयं सम्मत्तं ॥२६॥ एवं चतुर्थादय एकादशान्ताः, नवरम् 'अणंतरोगाढेत्ति उत्पत्तिसमयापेक्षयाऽत्रानन्तरावगाढत्वमवसेयं, अन्यथाऽनन्तरोत्पन्नानन्तरावगाढयोनिर्विशेषता न स्यात्, उक्ता चासौ 'जहेवाणंतरोववन्नएही त्यादिना, एवं परम्परावगाढोऽपि, 'अनंतराहारए'त्ति आहारकत्वप्रथमसमयवर्ती परम्पराहारकस्वाहारकत्वस्य द्वितीयादिसमयवती, 'अणं. तरपजत्त'त्ति पर्याप्तकत्वप्रथमसमयवर्ती, स च पर्याप्तिसिद्धावपि तत उत्तरकालमेव पापकर्माद्यबन्धलक्षणकार्यकारी | भवतीत्यसावनन्तरोपपन्नवयपदिश्यते, अत एवाह-एवं जहेव अणंतरोववन्नएही'त्यादि । तथा-'चरमेणं भंते ! नेरइए'त्ति, इह चरमो यः पुनस्तं भवं न प्राप्स्यति, "एवं जहेवेत्यादि, इह च यद्यप्यविशेषेणातिदेशः कृतस्तथाऽपि +-CROCAR दीप अनुक्रम [९८२ -९९०] -4-%A5%. नारक-आदिनाम् पाप-कर्मन: आदि बन्ध: ~289~ Page #290 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (०५) प्रत सूत्रांक [८१७] दीप अनुक्रम [९८२-९९०] [भाग-११]“भगवती” - अंगसूत्र - ५ ( मूलं + वृत्ति:) शतक [२६], वर्ग [-], अंतर् शतक [-], उद्देशक [४-११], मूलं [ ८१७] पूज्य आगमोद्धारकश्री संशोधितः मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र - [०५], अंगसूत्र- [०५] “भगवती" मूलं एवं अभयदेवसूरि-रचिता वृत्तिः ॥ ९३७ ॥ विशेषोऽयगन्तव्यः, तथाहि परमोद्देशकः परम्परोदेशकवद्वाच्य इत्युक्तं, परम्परोदेशकश्च प्रथमोदेशकवत्, तत्र च मनुष्यपदे आयुष्कापेक्षया सामान्यतश्चत्वारो भङ्गा उक्ताः तेषु च चरममनुष्यस्यायुष्ककर्मबन्धमाश्रित्य चतुर्थ एव घटते, यतो यश्चरमोऽसावायुर्वद्धवान् न बनाति न च भन्त्स्यतीति, अन्यथा चरमत्वमेव न स्यादिति, एवमन्यत्रापि विशेषोऽवगन्तव्य इत्ति, अधरमो यस्तं भवं पुनः प्राप्स्यति, तत्राचरमोदेशके पश्चेन्द्रियतिर्यगन्तेषु पदेषु पापं कर्म्माश्रित्यायौ भङ्गको, मनु* प्याणां तु चरमभङ्गकवर्जास्त्रयो, यतश्चतुर्थश्चरमस्येति एतदेव दर्शयति-- 'अचरिमे णं भंते! मणूसे' इत्यादि, 'बीससु पएसु'त्ति, तानि चैतानि जीव १ सलेश्य २ शुक्कलेश्य ३ शुक्लपाक्षिक ४ सम्यग्दृष्टि ५ ज्ञानि ६ मतिज्ञानादिचतुष्टय१० नोस झोपयुक्त ११ वेद १२ सकपाय १३ लोभकपाय १४ सयोगि १५ मनोयोग्यादित्रय १८ साकारोपयुक्ता १९नाकारोपयुक्त २० लक्षणानि, एतेषु च सामान्येन भङ्गकचतुष्कसम्भवेऽप्यचरमत्वान्मनुष्यपदे चतुर्थी नास्ति, चरमस्यैव तद्भावादिति । 'अलेस्से' इत्यादि, अलेश्यादयस्त्रयश्चरमा एव भवन्तीति कृत्वेह न प्रष्टव्याः । ज्ञानावरणीयदण्डकोsप्येवं, नवरं विशेषोऽयं पापकर्मदण्डके सकपायलोभकषायादिष्वाद्याखयो भङ्गका उक्ता इह त्वाद्यौ द्वावेव, यत एते ज्ञानावरणीयमबद्धा पुनर्वन्धका न भवन्ति, कषायिणां सदैव ज्ञानावरणबन्धकत्वात्, चतुर्थस्त्वच रमत्वादेव न भवतीति, 'वेयणिले सवस्थ पदमवीय'त्ति, तृतीयचतुर्थयोरसम्भवात् एतयोर्हि प्रथमः प्रागुक्तयुक्तेर्न संभवति द्वितीयस्त्वयोगित्व एव भवतीति ॥ आयुर्दण्डके - 'अचरिमे णं भंते ! नेरइए' इत्यादि, 'पढमततिया भंग'त्ति, तत्र प्रथमः प्रतीत एव द्वितीय स्वचरमत्वान्नास्ति, अचरमस्य हि आयुर्वन्धोऽवश्यं भविष्यत्यन्यथाऽचरमत्वमेव न स्यात्, व्याख्याप्रज्ञप्तिः अभयदेवीया वृत्तिः २ Education Internation नारक- आदिनाम् पाप-कर्मन: आदि बन्धः For Pernal Use On ~290~ २६ शतके उद्दे. ४-११ बन्ध्यादि सू ८१७ ॥ ९३७ ॥ waryra Page #291 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (०५) प्रत सूत्रांक [८१७] दीप अनुक्रम [९८२ -९९०] [भाग-११]“भगवती” - अंगसूत्र - ५ ( मूलं + वृत्ति:) शतक [२६], वर्ग [-], अंतर् शतक [ - ], उद्देशक [४-११], मूलं [८१७] पूज्य आगमोद्धारकश्री संशोधितः मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित.. आगमसूत्र- [०५] अंगसूत्र- [ ०५] "भगवती" मूलं एवं अभयदेवसूरि- रचिता वृत्तिः एवं चतुर्थोऽपि तृतीये तु न बभात्यायुस्तदबन्धकाले पुनर्भन्स्स्यत्यचरमत्यादिति शेषपदानां तु भावना पूर्वी कानुसारेण कर्त्तव्येति ॥ 'बंधिसयं ति प्रत्युद्देशकं बन्धीतिशब्देनोपलक्षितं शतं वन्धिशतम् ॥ विंशं शतं वृत्तितः परिसमाप्तमिति ॥ २६ ॥ येषां गौरव गौः सदर्थपयसां दात्री पवित्रात्मिका, सालङ्कारसुविग्रहा शुभपदक्षेपा सुवर्णान्विता । निर्गत्यास्यगृहाङ्गणाद्वधसभामामाजिरं राजयेद्र, ये चास्यां विवृतौ निमित्तमभवन्नन्दन्तु ते सूरयः ॥ १ ॥ (SURETY INTERES ॥ अथ सप्तविंशतितमं शतकम् ॥ व्याख्यातं पविंशं शतं, अथ सप्तविंशमारभ्यते, अस्य चायमभिसम्बन्धः - अनन्तरशते जीवस्य कर्मबन्धनक्रिया भूतादिकालविशेषेणोक्ता सप्तविंशशते तु जीवस्य तथाविधैव कर्म्मकरणक्रियोच्यत इत्येवंसम्बद्धस्यास्येदमादिसूत्रम् - ते पाक किं करिंतु करेन्ति करिस्संति ११ करिंस करेंति न करिस्संति २१ करिंसु न करेंति करिस्संति ३१ करिंसु न करेंति न करेस्संति ४१, गोयमा ! अस्थेगतिए करिंतु करेंति करिस्संति अस्थे० करि करेंति न करिस्सति २ अत्थे करिंसु न करेंति करेस्संति ३ अस्थेगतिए करिंसु न करेंति न करेस्संति । सलेस्से णं भंते! जीवे पावं कम्मं एवं एएणं अभिलाषेणं जच्चैव बंधिसए वत्तवया सचेष निरवसे Education International For Parts Only | अथ षड्विंशतितमे शतके चतुर्थात् एकादशं पर्यन्ता: उद्देशका: परिसमाप्तं तत् समाप्ते षड्विंशतिः शतकं अपि परिसमाप्तं अथ सप्तविंशतितमं शतकं (उद्देशका: १-११) आरब्धं ~ 291~ Page #292 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (०५) प्रत सूत्रांक [८१८] दीप अनुक्रम [९९१] [भाग-११]“भगवती” - अंगसूत्र - ५ ( मूलं + वृत्ति:) शतक [२७], वर्ग [-], अंतर् शतक [-], उद्देशक [१-११], मूलं [ ८१८ ] पूज्य आगमोद्धारकश्री संशोधितः मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित.. आगमसूत्र - [०५] अंगसूत्र- [ ०५] "भगवती" मूलं एवं अभयदेवसूरि-रचिता वृत्तिः व्याख्याप्रज्ञप्तिः अभयदेवीदेवी ? ॥ ९३८ ॥ सा भाणिया, तहेव नवदंडगसंगहिया एकारस उद्देसगा भाणियचा ॥ कर्रिसुगसयं सम्मत्तं ॥ २७१-११ ॥ सूत्रं८१८) 'जीवे 'मित्यादि, ननु वन्धस्य करणस्य च कः प्रतिविशेषः ?, उच्यते, न कश्चित्, तर्हि किमिति भेदेनोपन्यासः १, येयं जीवस्य कर्म्मबन्धक्रिया सा जीवकर्तृका न त्वीश्वरादिकृतेत्यस्यार्थस्योपदर्शनार्थ, अथवा बन्धः सामान्यतः करणं स्ववइयं विपाकदायित्वेन निष्पादनं निघत्तादिस्वरूपमिति ॥ 'करियस'ति 'करिंसु' इत्यनेन शब्देनोपल|क्षितं शतं प्राकृतभाषया 'करियस'ति ॥ सप्तविंशं शतं वृत्तितः परिसमाप्तमिति ॥ २७ ॥ व्याख्यातशतसमानं शतमिदमित्यस्य नो कृता विवृतिः । दृष्टसमाने मार्गे किं कुरुतादर्शकस्तस्य १ ॥ १ ॥ व्याख्यातं कर्म्मवक्तव्यताऽनुगतं सप्तविंशं शतम्, अथ क्रमायातं तथाविधमेवाष्टाविंशं व्याख्यायते, तत्र चैकादशोदेशका जीवाधेकादशद्वारानुगतपापकर्मादिदण्डकनवकोपेता भवन्ति, तत्र चाद्योद्देशकस्येदमा दिसूत्रम् - जीवाणं भंते! पार्व कम्मं कहिं समज्जिर्णिसु कहिं समायरिंसु ?, गोथमा ! सधेवि ताव तिरिक्खजो| णिएसु होज्जा १ अहवा तिरिक्खजोणिएस व नेरइए य होजा २ अहवा तिरिक्खजोगिएसु य मणुस्सेस य होजा ३ अहवा तिरिक्खजोणिएस य देवेसु य होज्जा ४ अहवा तिरिक्खजोणिएसु य मणुस्सेसु देवेसु य होज्या ५ अहवा तिरिक्खजोणिएस य नेरइएस य देवेसु य होज्जा ६ अहवा तिरिक्खजोगिएसु य मणुस्सेसु | देवेसु य होज्जा ७ अहवा तिरिक्ख० नेरइएस य मणुस्सेसु देवेसु य होज्जा ८ । सलेस्सा णं भंते! जीवा पावं Education International For Penal Use Only अथ सप्तविंशतितमं शतकं (उद्देशका: १-११) परिसमाप्तं अथ अष्टविंशतितमं शतकं आरब्धं तद् अन्तर्गत् प्रथम-उद्देशकः अत्र वर्तते ~292~ २७ शतके उद्दे. १-११ करणाधिका रः सू८१८ ॥ ९३८ ॥ Page #293 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (०५) [भाग-११]"भगवती"-अंगसूत्र-५ (मूलं+वृत्ति:) शतक [२८], वर्ग [-], अंतर्-शतक [-], उद्देशक [१], मूलं [८१९] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र- [०५], अंगसूत्र- [०५] "भगवती मूलं एवं अभयदेवसूरि-रचिता वृत्ति: + प्रत सूत्रांक [८१९] दीप कम्मं कहं समजिणिंसु कहिं समायरिंसु!, एवं चेव, एवं कण्हलेस्सा जाव अलेस्सा, कण्हपक्खिया सुकपहै क्खिया एवं जाव अणागारोवउत्ता । नेरइया णं भंते ! पावं कम्म कहि समजिर्णिसु कहिं समायरिंसु?, गो यमासबेवि ताव तिरिक्खजोणिएसु होजत्ति एवं चेव अट्ट भंगा भाणियचा, एवं सव्वस्थ अट्ठ भंगा, एवं जाव अणागारोवउत्तावि, एवं जाव चेमाणियाणं, एवं नाणावरणिज्जेणवि दंडओ, एवं जाच अंतराइएणं, एवं एए जीवादीया वेमाणियपज्जवसाणा नव दंडगा भवंति । सेवं भंते!२ जाव विहरइ (सूत्रं ८१९)॥२८॥१॥ PI "जीवा णं भंते !' इत्यादि, 'कहिं समजिणेंसुति कस्यां गतौ वर्तमानाः 'समर्जितवन्तः' गृहीतवन्तः 'कहिं| समायरिंसुत्ति कस्यां समाचरितवन्तः? पापकम्महेतुसमाचरणेन, तद्विपाकानुभवनेनेति वृद्धाः, अथवा पर्यायशब्दा-14 वेताविति, 'सधेवि ताव तिरिक्खजोणिएसु होज'त्ति, इह तिर्यग्योनिः सर्वजीवानां मातृस्थानीया बहुत्वात् ततश्च सर्वेऽपि तिर्यग्भ्योऽन्ये नारकादयस्तिर्यग्भ्य आगत्योत्पन्नाः कदाचिद् भवेयुस्ततस्ते सर्वेऽपि तिर्यग्योनिकेष्वभूवनिति । 18 च्यपदिश्यन्ते, अयमभिप्राया-ये विवक्षितसमये नारकादयोऽभूवंस्तेऽल्पत्वेन समस्ता अपि सिद्धिगमनेन तिर्यग्गतिप्रवेशेन |५| च निर्लेपतयोद्वृत्तास्ततश्च तिर्यग्गतेरनन्तत्वेनानिर्लेपनीयत्वात्तत उद्वृत्तास्तिर्यञ्चस्तत्स्थानेषु नारकादित्वेनोत्पन्नास्ततस्ते तिर्यग्गतौ नरकगत्यादिहेतुभूतं पापं कर्म समर्जितवन्त इत्युच्यत इत्येकः, 'अहवा तिरिक्खजोणिएसु नेरइएसु होज'त्ति विवक्षितसमये ये मनुष्यदेवा अभूवंस्ते निलेपतया तथैवोद्धृत्ताः तत्स्थानेषु च तिर्यग्नारकेभ्य आगत्योत्पन्नाः, वे चैवं व्यपदिश्यन्ते-तिर्यग्नैरयिकेष्वभूवनेते, ये च यत्राभूवंस्ते तत्रैव कर्मोपार्जितवन्त इत्यर्थों लभ्यत इति द्वितीयः, 'अहवा +CUCARBAR अनुक्रम [९९२] ~293 Page #294 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (०५) प्रत सूत्रांक [८१९] दीप अनुक्रम [९९२] [भाग-११]“भगवती”- अंगसूत्र - ५ ( मूलं + वृत्ति:) शतक [२८], वर्ग [-], अंतर् शतक [-] उद्देशक [१], मूलं [ ८१९ ] पूज्य आगमोद्धारकश्री संशोधितः मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित.. आगमसूत्र- [०५] अंगसूत्र- [ ०५] "भगवती" मूलं एवं अभयदेवसूरि-रचिता वृत्तिः व्याख्या तिरिक्खजोणिएस व मणुपसु य होज'न्ति विवक्षितसमये ये नैरयिकदेवास्ते तथैव निर्लेपतयोद्वृत्ताः तत्स्थानेषु च प्रज्ञः तिर्यग्मनुष्येभ्य आगत्योत्पन्नाः, ते चैवं व्यपदिश्यन्ते - तिर्यग्मनुष्येष्वभूवनेते, ये च यत्राभूवंस्ते तत्रैव कर्मोपार्जितवन्त अभयदेवी- * इति सामर्थ्यगम्यमिति तृतीयः, तदेवमनया भावनयाऽष्टावेते भङ्गाः, तत्रैकस्तिर्यग्गत्यैव, अन्ये तु तिर्यग्नैरयिकाभ्यां या वृत्तिः २ २ तिर्यग्मनुष्याभ्यां तिर्यग्देवाभ्यामिति त्रयो द्विकसंयोगाः, तथा तिर्यग्नैरयिकमनुष्यैस्तिर्यग्नैरयिकदेवै स्तिर्यग्मनुष्यदेवैरिति ॥ ९३९ ॥ त्रयस्त्रिसंयोगा एकश्चतुष्कसंयोग इति । 'एवं सवत्थ'त्ति सलेश्यादिपदेषु 'नव दंडगा भवंति त्ति पापकर्मादिभेदेन पूर्वोक्तेनेति ॥ ॥ अष्टाविंशतिशते प्रथमः || २८१ ॥ अतरोववगाणं भंते! नेरइया पावं कम्म कहिं समजिणि कहिं समायरिंसु ?, गोयमा सवि ताव तिरिक्खजोणिएस होजा, एवं एत्थवि अट्ठ भंगा, एवं अनंतशेववन्नगाणं नेरइयाईणं जस्स जं अस्थि लेसादीयं अणागारोवओगपज्जवसाणं तं सवं एयाए भगणाए भणिय जाव बेमाणियाणं, नवरं अणंतरेसु | जे परिहरियथा ते जहा बंधिसए तहा इहंपि, एवं नानावरणिजेणवि दंडओ एवं जाव अंतराइएणं निरवसेसं | एसोयि नयदंडगसंगहिओ उद्देसओ भाणियो। सेयं भंते! २ति ॥ (सूत्रं ८२०) ।। २८/२ ॥ एवं एएणं कमेणं | जहेव बंधिसए उद्देसगाणं परिवाडी तहेब इहंपि असु भंगेसु नेयधा नवरं जाणियां जं जस्स अत्थि तं तस्स | भाणियां जाव अचरिमुद्देसो । सवेवि एए एकारस उद्देसगा। सेवं भंते । २ इति जाव विहरइ ॥ ( सूत्रं ८२१) ॥ कम्मसमज्जणणसयं सम्मतं ॥ २८ ॥ Education Internation अत्र अष्टाविंशतितमं शतके प्रथम उद्देशकः परिसमाप्तः अथ अष्टविंशतितमं शतके २ ११ उद्देशका: आरब्धाः For Parts Only ~ 294~ २८ शतके उद्देशः १ पापस्यार्जनाधारी सू ८१९ अनन्तरोत्पन्नादीनां च तौ सू ८२० ॥ ९३९ ॥ waryru Page #295 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (०५) [भाग-११]"भगवती"-अंगसूत्र-५ (मूलं+वृत्ति:) शतक [२८], वर्ग [-], अंतर्-शतक [-], उद्देशक [२-११], मूलं [८२०-८२१] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र- [०५], अंगसूत्र- [०५] "भगवती मूलं एवं अभयदेवसूरि-रचिता वृत्ति: प्रत सूत्रांक [८२०. -८२१] SHASSA%%sER CL 'अणंतरोववनगा णमित्यादिद्वितीयस्तत्र च 'अणंतरेसु जे परिहरियबा ते जहा बंधिसए तहा इहंपि'त्ति, अनन्तरोपपन्ननारकादिषु यानि सम्यग्मिथ्यात्वमनोयोगवाग्योगादीनि पदानि 'परिहरियत्ति असम्भवान्न प्रच्छनीयानि तानि यथा बन्धिशते तथेहापीति । ननु प्रथमभङ्गके सर्वे तिर्यग्भ्य उत्पन्नाः कथं संभवन्ति, आनतादिदेवानां तीर्थङ्करादिमनुष्यविशेषाणां च तेभ्य आगतानामनुत्पत्तेः, एवं द्वितीयादिभङ्गकेष्वपि भावनीयं, सत्यं, किन्तु बाहुमाल्यमाश्रित्यैते भगा ग्राह्याः, इदं च वृद्धवचनेन दर्शयिष्यामः । 'कम्मसमजणणसय'ति कर्मसमर्जनलक्षणार्थप्रतिपादकं शतं कर्मसमर्जनशतम् ॥ अष्टाविंशं शतं वृत्तितः परिसमाप्तमिति ॥२८॥ इति चूर्णिवचनरचनाकुश्चिकयोद्घाटितं मयाऽप्येतत् । अष्टाविंशतितमशतमन्दिरमनघं महाघचयम् ॥१॥ व्याख्यातं पापकर्मादिवक्तव्यताऽनुगतमष्टाविंशं शतम् , अथ क्रमायातं तथाविधमेवैकोनत्रिंशं व्याख्यायते, तत्र च है तथैवैकादशोदेशका भवन्ति, तेषु चाद्योद्देशकस्येदमादिसूत्रम् | जीया णं भंते! पावं कम्मं किं समायं पट्टविंसु समायं निढविंसु ११ समायं पट्टविंसु विसमायं निट्ठविसु 18/२! विसमायं पट्टर्विसु समायं निर्विसु ३१ विसमायं पट्टविंसु विसमायं निर्विसु, गोयमा! अत्धेगड्या द समायं पट्टचिंसु समायं निर्विसु जाव अत्यंगइया विसमायं पट्टविसु विसमायं निर्षिसु, से केणडेणं भंते! एवं बुच्च अत्यगाया समायं पट्टसि समायं निहर्विसु ? तं चेव, गोयमा! जीवा चउपिहा पत्ता, तंजहा-|| दीप अनुक्रम [९९३-९९४] अत्र अष्टाविंशतितमं शतके २-११ उद्देशका: परिसमाप्ताः तत समाप्ते अष्टाविंशतितमं शतकं अपि परिसमाप्तं | अथ एकोनत्रिंशतम् शतकं आरब्धं तद् अन्तर्गत् प्रथम-उद्देशक: अत्र वर्तते ~295 Page #296 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (०५) [भाग-११]"भगवती"-अंगसूत्र-५ (मूलं+वृत्ति:) शतक [२९], वर्ग -], अंतर्-शतक [-], उद्देशक [१], मूलं [८२२] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र- [०५], अंगसूत्र- [०५] "भगवती मूलं एवं अभयदेवसूरि-रचिता वृत्ति: प्रत सूत्रांक व्याख्या- प्रज्ञप्तिः | अभयदेवीया वृत्तिः२ ॥९४०॥ [८२२ सू८२२ दीप अनुक्रम [९९५] अल्धेगइया समाउया समोववनगा १ अत्धेगइया समाउया विसमोववन्नगा २ अस्थेगइया विसमाउया समो २९ शतके ववनगा ३ अस्थेगइया विसमाउया विसमोववन्नगा ४, तत्थ णं जेते समाउया समोववन्नगा ते णं पार्ष कम्म। उद्देशः१ समायं पहर्षिसु समायं निर्विसु, तत्थ णं जे ते समाउया विसमोववन्नगा ते णे पावं कम्म समायं पट्ठविंसु समविषमविसमायं निर्विसु, तत्थ णं जे ते विसमाउया समोववन्नगा ते णं पावं कम्मं विसमायं पट्टविंसु समायं । प्रस्थापननिट्टविंसु, तत्थ णं जे ते विसमाउया विसमोववन्नगा ते णं पावं कम्मं विसमायं पट्टर्विसु विसमायं णि?-8। निष्ठापते विंसु, से तेणटेणं गोयमा! तं चेव । सलेस्सा णं भंते! जीवा पावं कम्मं एवं चेव, एवं सबढाणेसुवि जाव अणागारोबउत्ता, एए सवि पया एयाए वत्तवयाए भाणियबा । नेरड्या भंते ! पावं कम्म कि समायं | पट्टर्विसु समायं निट्ठर्विसु? पुच्छा, गोयमा! अत्धेगइया समायं पट्टचिंसु एवं जहेव जीवाणं तहेव भाणि-18 |य जाब अणागारोवउत्ता, एवं जाव चेमाणियाणं जस्स जे अस्थि तं एएणं चेव कमेणं भाणियवं जहा |पावेण दंडओ, एएणं कमेणं अट्ठसुवि कम्मप्पगडीसु अट्ठ दंडगा भाणियचा जीवादीया बेमाणियपजवसाणा एसो नवदंडगसंगहिओ पढमो उद्देसो भाणियो । सेवं भंते! २ इति ॥ (सूत्रं ८२२) ॥२९॥ १॥ ___ 'जीवा णं भंते ! पाव'मित्यादि, 'समायति समकं बहवो जीवा युगपदित्यर्थः 'पट्ठविंसुत्ति प्रस्थापितवन्त:प्रथमतया वेदयितुमारब्धवन्तः, तथा समकमेव 'निढविंसुत्ति 'निष्ठापितधन्तः' निष्ठां नीतवन्त इत्येकः, तथा समकं ॥९४०॥ प्रस्थापितवन्तः 'विसम'त्ति विषमं यथा भवति विषमतयेत्यर्थः निष्ठापितवन्त इति द्वितीयः, एवमन्यौ द्वौ । 'अत्थेग 18 ~296~ Page #297 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (०५) प्रत सूत्रांक [८२२] दीप अनुक्रम [९९५] [भाग-११]“भगवती”- अंगसूत्र - ५ (मूलं + वृत्ति:) शतक [२९], वर्ग [-], अंतर् शतक [ - ], उद्देशक [१], मूलं [८२२] पूज्य आगमोद्धारकश्री संशोधितः मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित.. आगमसूत्र - [०५] अंगसूत्र- [ ०५] "भगवती" मूलं एवं अभयदेवसूरि-रचिता वृत्तिः इया समाज्या' इत्यादि चतुर्भङ्गी, तत्र 'समाजय'त्ति समायुषः उदयापेक्षया समकाला युष्कोदया इत्यर्थः 'समोववन्नग'ति विवक्षितायुषः क्षये समकमेव भवान्तरे उपपन्नाः समोपपन्नकाः, ये चैवंविधास्ते समकमेव प्रस्थापितवन्तः समकमेव | च निष्ठापितवन्तः, नन्वायुः कर्मेवाश्रित्यैवमुपपन्नं भवति न तु पापं कर्म्म, तद्धि नायुष्कोदयापेक्षं प्रस्थाप्यते निष्ठाप्यते चेति, नैवं यतो भवापेक्षः कर्म्मणामुदयः क्षयश्चेष्यते, उक्तञ्च - "उदयक्खयक्खओवसमेत्यादि, अत एवाह- 'तत्थ णं जे ते समाज्या समोववन्नया ते णं पावं कम्मं समायं पविंसु समायं निद्वविंसुति प्रथमः, तथा 'तत्थ णं जे ते समाजया विसमोववन्नग'त्ति समकाला युष्कोदया विषमतया परभवोत्पन्ना मरणकालवैषम्यात् 'ते समायं पविसु'ति आयुष्कविशेषोदयसम्पाद्यत्वात्पापकर्म्मवेदनविशेषस्य 'विसमायं निर्विसुति मरणवैषम्येण पापकर्मवेदनविशेषस्य विषमतया निष्ठासम्भवादिति द्वितीयः, तथा 'विसमाज्या समोववन्नग'त्ति विषमकालायुष्कोदयाः समकालभवान्तरोत्पत्तयः 'ते णं पायें कम्मं विसमायं पट्टबिंसु समायं निट्टर्विसु' त्ति तृतीयः, चतुर्थः सुज्ञात एवेति इह चैतान् भङ्गकान् प्राक्तनशतभङ्गकांश्चाश्रित्य वृद्धैरुक्तम्- "पढवणसए किणु हु समाउ उववन्नएस चडभंगो। किह व समजणण सए गमणिज्जा अत्मओ गंगा १ ॥ १ ॥ पट्टवणसए भंगा पुच्छाभंगाणुलोमओ वच्चा । यथा पृच्छाभङ्गाः समकप्रस्थापनादयो न बध्यन्ते तथेह | समायुष्कादयः अन्यत्रान्यथाव्याख्याता अपि व्याख्येया इत्यर्थः । “कम्मसमजणणसए बाहुलाओ समाउजा ॥ २ ॥” [ प्रस्थापनशते समायुरुत्पन्नेषु चतुर्भङ्गी कथं नु कथं वा समर्जनशते भङ्गा अर्थतो गम्याः १ ॥ १ ॥ प्रस्थापनशते For Pasta Use Only ~ 297 ~ war Page #298 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (०५) [भाग-११]"भगवती"-अंगसूत्र-५ (मूलं+वृत्ति:) शतक [२९], वर्ग [-], अंतर्-शतक [-], उद्देशक [१], मूलं [८२२] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र- [०५], अंगसूत्र- [०५] "भगवती मूलं एवं अभयदेवसूरि-रचिता वृत्ति: प्रत सूत्रांक [८२२] ॥९४१॥ | सू८२३ दीप अनुक्रम [९९५] व्याख्या- भङ्गानां पृच्छा भङ्गानुलोम्यतो वाच्या । कर्मसमर्जनशते बाहुल्यात्समायोजयेत् ॥१॥] इति ॥ एकोनत्रिंशशते २९ शतके प्रज्ञप्तिःप्रथम उद्देशकः ॥ २९॥ १॥ उद्दे.२-११ अभयदेवी___ अर्णतरोववन्नगा णं भंते! नेरइया पावं कम्मं किं समायं पट्टर्विसु समायं निट्ठचिंसु? पुच्छा, गोयमा! अनन्तरोया वृत्तिः३ | अत्धेगइया समायं पट्टविसु समायं निर्विसु अत्थेगइया समायं पट्टबिसु विसमायं निर्विसु, से केणटेणं सन्नादीनां भंते ! एवं बुच्चइ अत्धेगड्या समायं पट्टविंसु? तं चेब, गोयमा! अणंतरोववन्नगा नेर० दुविहा पं०२० पापसमप्र| अत्धेगइया समाउया समोववन्नगा अस्धेगइया समाउया विसमोववन्नगा०, तस्थ णं जे ते समाउया समोव-1|3|| | वनगा ते ण पावं कर्म समायं पट्टर्विसु समायं निर्विसु, तत्थ णं जे ते समाउया विसमोचवनगा ते गंदा पार्य कम्मं समायं पट्टविंसु विसमायं निर्विसु, से तेणतं चेव । सलेस्सा णं भंते! अणंतरो नेर० पावं एवं चेय, एवं जाव अणागारोव०, एवं असुरकु० एवं जाव वेमा० नवरं जं जस्स अस्थि तं तस्स भाणि०, एवं नाणावरणिजेणवि दंडओ, एवं निरवसेसं जाव अंतराइएणं । सेवं भंते! २त्ति जाव विहरति ॥ २९॥२॥ | एवं एएणं गमएणं जचेच बंधिसए उद्देसगपरिवाडी सच्चेव इहवि भा. जाव अचरिमोत्ति, अणंतरउद्देस| गाणं चउण्हवि एका बत्तवया सेसाणं सत्तण्हं एका (सूत्रं ८२३) ॥ कम्मपट्ठवणसयं सम्मत्तं ॥ २९ ॥ ११॥ dil 'अणंतरोववन्नगा णमित्यादिद्वितीयः,तत्र चानन्तरोपपन्नका द्विविधाः 'समाउया समोववन्नग'त्ति अनन्तरोप- ॥९४१॥ पन्नानां सम एवायुरुदयो भवति तद्वैषम्येऽनन्तरोपपन्नत्वमेव न स्यादायुप्रथमसमयवर्तित्वात्तेषां 'समोववन्नग'त्ति अत्र एकोनविंशतितमे शतके प्रथम-उद्देशक: परिसमाप्त: अथ एकोनत्रिंशतितमे शतके २-११ उद्देशका: आरब्धा: ~298~ Page #299 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (०५) [भाग-११]"भगवती"-अंगसूत्र-५ (मूलं+वृत्ति:) शतक [२९], वर्ग [-], अंतर्-शतक [-], उद्देशक [२-११], मूलं [८२३] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र- [०५], अंगसूत्र- [०५] "भगवती मूलं एवं अभयदेवसूरि-रचिता वृत्ति: प्रत सूत्रांक [८२३] | मरणानन्तरं परभवोत्पत्तिमाश्रित्य, ते च मरणकाले भूतपूर्वगत्याऽनन्तरोपपनका उच्यन्ते, 'समाज्या विसमोववन्नग'त्ति विषमोपपन्नकत्वमिहापि मरणवैषम्यादिति, तृतीयचतुर्थभङ्गावनन्तरोपपन्नेषु न संभवतः, अनन्तरोपपन्नत्वादेवेति द्वितीयः, एवं शेषा अपि, नवरम् 'अणंतरोद्देसगाणं चउण्हवि'त्ति अनन्तरोपपन्नानन्तरावगाढानन्तराहारकानन्तरपर्याप्तकोद्देशकानाम् ॥ 'कम्मपट्टवणसयंति कर्मप्रस्थापनाधर्थप्रतिपादनपरं शतं कर्मप्रस्थापनशतम् ॥ एकोनत्रिंशं शतं वृत्तितः समाप्तम् ॥२९॥ अनुसृत्य मया टीका टीकेयं टिप्पिता प्रपटुनेव । अप्रकटपाटवोऽपि हि पटूयते पटुगमेनाटन् ॥१॥ दीप अनुक्रम [९९६-९९७] GRORSCORRC व्याख्यातमेकोनत्रिंशं शतम् , अथ त्रिंशमारभ्यते, अस्य चायं पूर्वेण सहाभिसम्बन्धः-प्राक्तनशते कर्मप्रस्थापनाद्याश्रित्य जीवा विचारिताः इह तु कर्मबन्धादिहेतुभूतवस्तुवादमाश्रित्य त एव विचार्यन्ते इत्येवंसम्बद्धस्यास्यैकादशोद्देशकात्मकस्येदं प्रथमोद्देशकादिसूत्रम् कई णं भंते! समोसरणा पन्नत्ता?, गोयमा! चत्तारि समोसरणा पन्नत्ता, तंजहा-किरियावादी अकियावादी अन्नाणियवाई वेणइयवाई, जीवाणं भंते ! किं किरियावादी अकिरियावादी अन्नाणियवादी घेणइयवादी, गोयमा! जीवा किरियावादीवि अकिरियावादीवि अन्नाणियवादीवि वेणइयवादीवि, सलेस्साणं भंते जीवा किं किरियावादी ? पुच्छा, गोयमा! किरियावादीवि अकिरियावादीवि अन्नाणियवादीवि वेण-ट्र AREauratoninternational अत्र एकोनविंशतितमे शतके २-११ उद्देशका: परिसमाप्ता: तत् समाप्ते एकोनविंशतितमं शतकं अपि परिसमाप्तं अथ त्रिंशतम् शतकं आरब्धं तद् अन्तर्गत् प्रथम-उद्देशक: अत्र वर्तते समवसरण, तस्य क्रियावादि आदि चत्वारः भेदा: एवं प्रत्येक-भेदस्य वक्तव्यता ~299~ Page #300 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (०५) [भाग-११]"भगवती"-अंगसूत्र-५ (मूलं+वृत्ति:) शतक [३०], वर्ग [-], अंतर्-शतक [-], उद्देशक [१], मूलं [८२४] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र- [०५], अंगसूत्र- [०५] "भगवती मूलं एवं अभयदेवसूरि-रचिता वृत्ति: व्याख्या प्रत सूत्रांक [८२४] दीप अनुक्रम [९९८] इयवादीवि, एवं जाव सुक्कलेस्सा, अलेस्सा णं भंते ! जीवा पुच्छा, गोयमा! किरियावादी नो अकिरिया- ३० शतके प्रज्ञप्तिः वादी नो अन्नाणियवादी नो वेणइयवादी । कण्हपक्खिया णं भंते! जीवा कि किरियावादी! पुच्छा, गोय- उद्देशः १ अभयदेवी-मा! नो किरियावादी अकिरियावादी अन्नाणियवादीवि वेणझ्यवादीवि, सुक्कपक्खिया जहा सलेस्सा, सम्म-क्रियावाद्या यावृत्तिः२४ दिट्ठी जहा अलेस्सा, मिच्छादिट्ठी जहा कण्हपक्खिया, सम्मामिच्छादिट्ठीणं पुच्छा, गोयमा! नो किरिया-51 वादी नो अकिरियावादी अन्नाणियवादीवि वेणइयवादीचि, णाणी जाव केवलनाणी जहा अलेस्से, अन्नाणी सरणानि ॥९४२॥ जाव विभंगनाणी जहा कण्हपक्खिया, आहारसन्नोवउत्ता जाव परिग्गहसन्नोव उत्ता जहा सलेस्सा, नोसन्नो सू८२४ वउत्ता जहा अलेस्सा, सवेदगा जाव नपुंसगवेद्गा जहा सलेस्सा, अवेदगा जहा अलेस्सा, सकसायी जाव लोभकसायी जहा सलेस्सा, अकसायी जहा अलेस्सा, सजोगी जाव काययोगी जहा सलेस्सा, अजोगी | जहा अलेस्सा, सागारोवउत्ता अणागारोबउत्ता जहा सलेस्सा । नेरइया णं भंते ! किं किरियावादी? पुच्छा, गोयमा ! किरियावादीवि जाच वेणइयवादीवि, सलेस्सा णं भंते ! नेरड्या किं किरियावादी ? एवं चेव, एवं जाव काउलेस्सा कण्हपक्खिया किरियाविवजिया, एवं एएणं कमेणं जच्चेव जीवाणं वत्तवया सचेच नेरइयाणंटू वसत्यापि जाव अणागारोवउत्ता नवरं जं अस्थि तंभाणिय सेसं न भण्णति, जहा नेरइया एवं जाव | G ॥९४२॥ थणियकुमारा । पुढविकाइया णं भंते ! कि किरियावादी? पुच्छा, गोयमा! नो किरियावादी अकिरिया|वादीवि अन्नाणियवादीवि नो वेणइयवादी, एवं पुढविकाइयाणं ज अस्थि तत्थ सवत्थवि एयाई दो मज्झि समवसरण, तस्य क्रियावादि आदि चत्वारः भेदा: एवं प्रत्येक-भेदस्य वक्तव्यता ~300 Page #301 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (०५) प्रत सूत्रांक [८२४] दीप अनुक्रम [९९८] [भाग-११]“भगवती”- अंगसूत्र - ५ (मूलं + वृत्ति:) शतक [३०], वर्ग [-], अंतर् शतक [ - ], उद्देशक [१], मूलं [८२४] पूज्य आगमोद्धारकश्री संशोधितः मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित.. आगमसूत्र - [०५] अंगसूत्र- [ ०५] "भगवती" मूलं एवं अभयदेवसूरि-रचिता वृत्तिः व्या. १५० लाई समोसरणाई जाव अणागारोवउत्तावि, एवं जाव चडरिंदियाणं सबट्टाणेषु एयाई चैव मज्झिल्लगाई। दो समोसरणाई, सम्मन्तनाणेहिवि एयाणि चेव मझिलगाई दो समोसरणाई, पंचिंदियतिरिक्खजोणिया जहा जीवा नवरं जं अस्थि तं भाणियचं, मणुस्सा जहा जीवा तहेव निरवसेसं, वाणमंतरजोइसिय वेमाणिया जहा असुरकुमारा ॥ किरियावादी णं भंते! जीवा किं नेरइयाउयं पकरेह तिरिक्खजोणिया उयं पकरेइ मणुस्साजयं पकरेह देवाउयं पकरेइ ?, गोयमा ! नो नेरह्याज्यं पकरेह नो तिरिक्खजोणियाउयं पकरेइ मणुस्सा| जयंपि परे देवाजयंपि पकरेह, जह देवाउयं पकरेह किं भवणवासिदेवाउयं पकरेह जाव वैमाणियदेवाडयं पक० १, गोयमा ! नो भवणवासीदेवाउयं प० नो वाणमंतरदेवाउयं पक० नो जोइसियदेवाजयं पकरेह वेमाणियदेवाउयं पकरे । अकिरियाबादी णं भंते! जीवा किं नेरइयाज्यं पकरेइ ? तिरिक्ख० पुच्छा, गोयमा ! नेरइयाउयंपि पकरेह जाव देवाउयंपि पकरेइ, एवं अन्नाणियवादीवि वेणइयवादीवि । सलेस्सा णं भंते । जीवा किरियावादी किं नेरइयाजयं पकरेइ ? पुच्छा, गोपमा ! नो नेरइयाउयं एवं जहेब जीवा तहेव सलेस्साचि चउहिवि समोसरणेहिं भाणियवा, कण्हलेस्सा णं भंते ! जीवा किरियाबादी किं नेरइयाज्यं पकरेह ? पुच्छा, गोपमा ! नो नेरइयाजयं पकरेह नो तिरिक्खजोणियाज्यं पकरेह मनुस्सायं पकरेइ नो देवाउयं पकरेइ, अकिरिय० अन्नाणियवेणइयवादी य चत्तारिवि आड्याई पकरेह, एवं नीललेस्सावि, तेउलेस्सा णं भंते ! जीवा किरियावादी किं नेरइयाज्यं पकरेह ? पुच्छा, गोयमा 1 नो नेरइयाउयं पकरेह नो तिरिक्ख० Eucation International For Parts Only समवसरण, तस्य क्रियावादि आदि चत्वारः भेदाः एवं प्रत्येक भेदस्य वक्तव्यता ~301~ Page #302 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (०५) [भाग-११]"भगवती"-अंगसूत्र-५ (मूलं+वृत्ति:) शतक [३०], वर्ग [-], अंतर्-शतक [-], उद्देशक [१], मूलं [८२४] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र- [०५], अंगसूत्र- [०५] "भगवती मूलं एवं अभयदेवसूरि-रचिता वृत्ति: प्रज्ञप्तिः अभयदेवी प्रत सूत्रांक [८२४] व्याख्या- मणुस्सायं प० देवाउयंपि पकरेइ, जइ देवाज्यं पकरेइ तहेव, तेउलेस्सा णं भंते ! जीवा अकिरियावादी ३० शतके दकिं नेरइयाउयं पुरुछा, गोयमा ! नो नेरइयाउयं पकरेइ मणुस्साउयपि पकरेइ तिरिक्खजोणियाउयपि ॥ उद्देशः १ या वृत्तिः२८ |पकरेइ देवाज्यपि पकरेइ, एवं अन्नाणियवादीवि वेणइयवादीवि, जहा तेउलेस्सा एवं पम्हलेस्सावि || शादीनि समय सुकलेस्सावि नेयवा ॥ अल्लेस्सा णं भंते ! जाव किरियावादी किं रदयाउयं पुच्छा, गोयमा ! नेरह- मरणानि ॥९४३॥ याउयपि पकरेह एवं चउविहंपि, एवं अन्नाणियवादीवि वेणइयवादीवि, सुकपक्खिया जहा सलेस्सा, सू ८२४ G|सम्मदिही णं भंते! जीवा किरियावादी किं नेरड्याउयं पुच्छा, गोयमा। नो नेरइयाउयं पकरेइ नो तिरि-18 क्ख० मणुस्साउयं पकरेइ देवाउयपि पकरेइ, मिच्छादिही जहा काहपक्खिया, सम्मामिच्छादिही णं भंते ! जीवा अनाणियवादी किनेरहयाज्यं जहा अलेस्सा, एवं वेणइयवादीवि, णाणी आभिणियोहियनाणी य सुपनाणी य ओहिनाणी य जहा सम्मदिट्टी, मणपजवणाणी णं भंते! पुच्छा, गोयमा! नो नेरइयाउयं पकरेइ नो तिरिक्ख० नो मणुस्स० देवाज्यं पकरेइ, जइ देवाउयं पकरेइ किं भवणवासि० पुच्छा, गोयमा! नो भवणवा| सिदेवाज्यं पकरेइ नो वाणमंतर नो जोइसिय० बेमाणियदेवाउयं, केवलनाणी जहा अलेस्सा, अन्नाणी ॥९४३॥ | जाव विभंगनाणी जहा कण्हपक्खिया, सन्नासु चउसुवि जहा सलेस्सा, नोसन्नोवउत्ता जहा मणपज्जवनाणी, सवेदगा जाव नपुंसगवेदगा जहा सलेस्सा, अवेद्गा जहा अलेस्सा, सकसायी जाव लोभकसायी NALCOMSAKC दीप अनुक्रम [९९८] समवसरण, तस्य क्रियावादि आदि चत्वारः भेदा: एवं प्रत्येक-भेदस्य वक्तव्यता ~302 Page #303 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (०५) [भाग-११]"भगवती"-अंगसूत्र-५ (मूलं+वृत्ति:) शतक [३०], वर्ग [-], अंतर्-शतक [-], उद्देशक [१], मूलं [८२४] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र- [०५], अंगसूत्र- [०५] "भगवती मूलं एवं अभयदेवसूरि-रचिता वृत्ति: प्रत सूत्रांक [८२४] जहा सलेस्सा, अकसायी जहा अलेस्सा, सयोगी जाव काययोगी जहा सलेस्सा, अजोगी जहा अलेस्सा, सागारोवउत्ता य अणागारोवउत्ता य जहा सलेस्सा (सूत्रं ८२४)॥ 'कइ णमित्यादि, 'समोसरण'त्ति समवसरन्ति नानापरिणामा जीवाः कथञ्चित्तुल्यतया येषु मतेषु तानि समवसरणानि, समवस्तयो वाऽन्योन्यभिन्नेषु क्रियावादादिमतेषु कथञ्चित्तुल्यत्वेन कचित्केषाबिद्वादिनामवताराः समवसरणानि, 'किरियावाइ'त्ति क्रिया कारं विना न संभवति सा चात्मसमवाायिनीति वदन्ति तच्छीलाच येते क्रियावादिनः, अन्ये त्वाः -क्रियावादिनो ये ब्रुवते क्रिया प्रधानं किं ज्ञानेन', अन्ये तु व्याख्यान्ति-क्रियां जीवादिपदार्थोऽस्ती त्यादिकां वदितुं शीलं येषां ते क्रियावादिनस्ते चास्मादिपदार्थास्तित्वप्रतिपत्तिलक्षणा अशीत्यधिकशतसङ्ख्याः स्थानान्तरादवसेयाः, ततश्च क्रियावादिसम्बन्धात्समवसरणमपि क्रियावादि, समवसरणसमवसरणवतां चाभेदोपचारात् क्रियावादिन एव समवसरणमिति, एवमन्यत्रापि, 'अकिरियावाइ'त्ति अक्रियां-क्रियाया अभावं न हि कस्यचिदप्यनवस्थितस्य पदार्थस्य क्रिया समस्ति तदावे चानवस्थितेरभावादित्येवं ये वदन्ति तेऽक्रियावादिनः, तथा चाहुरेके-"क्षणिकाः ॥ठा सर्वसंस्कारा, अस्थितानां कुतः क्रिया? । भूतियेषां क्रिया सैव, कारक सैव चोच्यते ॥१॥” इत्यादि, अन्ये त्वाहुर-11 अक्रियावादिनो ये मुवते किं क्रियया चित्तशुद्धिरेव कार्या ते च बौद्धा इति, अन्ये तु व्याख्यान्ति-अकियां-जीवादि| पदार्थों नास्तीत्यादिको वदितुं शीलं येषां तेऽक्रियावादिनः, ते चात्मादिपदार्थनास्तित्वप्रतिपत्तिलक्षणाश्चतुरशीतिवि|कल्पाः स्थानान्तरादवसेयाः, 'अन्नाणियवाइ'त्ति कुत्सितं ज्ञानमज्ञानं तधेषामस्ति तेऽज्ञानिकास्ते च ते वादिनश्चेत्य दीप अनुक्रम [९९८] 45%CLAST समवसरण, तस्य क्रियावादि आदि चत्वारः भेदा: एवं प्रत्येक-भेदस्य वक्तव्यता ~303 Page #304 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (०५) प्रत सूत्रांक [८२४] दीप अनुक्रम [९९८] [भाग-११]“भगवती”– अंगसूत्र - ५ ( मूलं + वृत्ति:) शतक [३०], वर्ग [-], अंतर्-शतक [-], उद्देशक [१], मूलं [८२४] पूज्य आगमोद्धारकश्री संशोधितः मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित.. आगमसूत्र- [०५] अंगसूत्र- [ ०५] "भगवती" मूलं एवं अभयदेवसूरि-रचिता वृत्तिः ॥ ९४४ ॥ व्याख्या-ज्ञानिकवादिनः, ते चाज्ञानमेव श्रेयोऽसञ्चिन्त्यकृतकर्मबन्धवैफल्यात्, तथा न ज्ञानं कस्यापि क्वचिदपि वस्तुन्यस्ति प्रमाप्रज्ञप्तिः * णानाम सम्पूर्णवस्तुविपयत्वात् इत्याद्यभ्युपगमवन्तः सप्तषष्टिसङ्ख्याः स्थानान्तरादवसेयाः, 'वेणइबाइ'त्ति विनयेन अभयदेवी- | चरन्ति स वा प्रयोजनमेषामिति वैनयिकास्ते च ते वादिनश्चेति वैनयिकवादिनः विनय एव वा वैनयिकं तदेव ये स्वर्गाया वृत्तिः २ दिहेतुतया वदन्तीत्येवंशीलाश्च ते वैनयिकवादिनः, एते चानवधृतलिङ्गाचारशास्त्रा विनयप्रतिपत्तिलक्षणा द्वात्रिंशद्विधाः स्थानान्तरादवसेयाः, इह चायें गाथा - " अस्थित्ति किरियवाई वयंति नत्थित्तिऽकिरियवाईओ । अन्नाणिय अन्नाणं वेणइया विजयवायति ॥ १ ॥" [ अस्तीति क्रियावादिनो वदन्ति नास्तीत्यक्रियावादिनः । अज्ञानिका अज्ञानं वैनयिका विनयवादमिति ॥ १ ॥ ] एते च सर्वेऽप्यन्यत्र यद्यपि मिथ्यादृष्टयोऽभिहितास्तथापीहाद्याः सम्यग्दृष्टयो ग्राह्याः, | सम्यगस्तित्ववादिनामेव तेषां समाश्रयणादिति ॥ 'जीवा ण'मित्यादि तत्र जीवाश्चतुर्विधा अपि तथास्वभावत्वात् | 'अलेस्सा ण'मित्यादि, 'अलेश्याः' अयोगिनः सिद्धाश्च ते च क्रियावादिन एव क्रियावादहेतुभूतयथाऽवस्थितद्रव्यपर्यायरूपार्थपरिच्छेदयुक्तत्वात्, इह च यानि सम्यग्दृष्टिस्थानानि - अलेश्यत्वसम्यग्दर्शनज्ञानिनोसज्ज्ञोपयुक्तत्वा वेदकत्वादीनि तानि नियमात् क्रियावादे क्षिष्यन्ते, मिथ्यादृष्टिस्थानानि तु मिध्यात्वाज्ञानादीनि शेषसमवसरणत्रये, 'सम्मामिच्छादिट्ठी णमित्यादि, सम्यग्मिथ्यादृष्टयो हि साधारणपरिणामत्वान्नो आस्तिका नापि नास्तिकाः किन्तु अज्ञानविन यवादिन एव स्युरिति ॥ 'पुढविकाइया ण'मित्यादि, 'नो किरियाबाई'ति मिथ्यादृष्टित्वात्तेपाम क्रियावादिनोऽज्ञा| निकवादिनश्च ते भवन्ति, वादाभावेऽपि तद्वादयोग्यजीव परिणाम सद्भावात् वैनयिकवादिनस्तु ते न भवन्ति तथाविध Eucation Internation For Parts Only समवसरण, तस्य क्रियावादि आदि चत्वारः भेदाः एवं प्रत्येक भेदस्य वक्तव्यता ~304~ ३० शतके हजेशः १ क्रियाबाय दीनि समय सरणानि सू ८२४ ॥ ९४४ ॥ Page #305 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (०५) प्रत सूत्रांक [८२४] दीप अनुक्रम [९९८] [भाग-११]“भगवती”- अंगसूत्र - ५ (मूलं + वृत्ति:) शतक [३०], वर्ग [-], अंतर् शतक [-], उद्देशक [१], मूलं [ ८२४] पूज्य आगमोद्धारकश्री संशोधितः मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित.. आगमसूत्र - [०५] अंगसूत्र- [ ०५] "भगवती" मूलं एवं अभयदेवसूरि-रचिता वृत्तिः परिणामादिति, 'पुढविकाइयाणं जं अस्थि इत्यादि, पृथिवीकायिकानां यदस्ति सलेश्य कृष्णनीलका पोततेजोलेश्य कृष्ण| पाक्षिकत्वादि तत्र सर्वत्रापि मध्यमं समवसरणद्वयं वाच्यमिति, 'एवं जाव चउरिंदियाण'मित्यादि, ननु द्वीन्द्रियादीनां | सासादनभावेन सम्यक्त्वं ज्ञानं चेप्यते तत्र क्रियावादित्वं युक्तं तत्स्वभावत्वादित्याशङ्कचाह-'सम्मत्तनाणेहिवी' त्यादि, क्रियावादविनयवादौ हि विशिष्टतरे सम्यक्त्वादिपरिणामे स्यातां न सासादनरूपे इति भावः, 'जं अस्थि तं भाणियांति, पश्चेन्द्रियतिरश्चामलेश्याकपायित्वादि न प्रष्टव्यमसम्भवादिति भावः ॥ जीवादिषु पञ्चविंशती पदेषु यद्यत्र समवसरणमस्ति तत्तत्रोतम्, अथ तेष्वेवायुर्वन्धनिरूपणायाह- 'किरिये त्यादि, 'मथुस्साउयंपि परे देवाउयंपि |पकरेति त्ति, तत्र ये देवा नारका वा क्रियावादिनस्ते मनुष्यायुः प्रकुर्वन्ति ये तु मनुष्याः पञ्चेन्द्रियतिर्यश्वो वा ते देवायुरिति । 'कण्हलेस्सा णं भंते! जीवा' इत्यादी 'मणुस्साज्यं पकरेंति त्ति यदुक्तं तन्नारकासुरकुमारादीनाश्रित्यावसेयं, यतो ये सम्यग्दृष्टयो मनुष्याः पञ्चेन्द्रियतिर्यश्चश्च ते मनुष्यायुर्न वन्त्येव वैमानिकायु बन्धकत्वात्तेषामिति ॥ 'अलेस्सा णं भंते! जीवा किरियाबाई'त्यादि, अलेश्याः सिद्धा अयोगिनश्च ते चतुर्विधमप्यायुर्न वनन्तीति सम्यग्मिथ्याह|ष्टिपदे 'जहा अलेस्स' ति समस्तायूंषि न बनन्तीत्यर्थः ॥ नारकदण्डके किरियाबादी भंते! नेरड्या किं नेरइयाजयं पुच्छा, गोयमा 1 नो नेरहयाजयं नो तिरिक्ख० मणुस्साउयं पकरेह नो देवाउयं पकरे, अकिरियावादी णं भंते! नेरइया पुच्छा, गोयमा ! नो नेरइयाउयं तिरिक्खजोणियाजयं पकरेह मणुस्साजयंपि पकरेह नो देवाउयं पकरेह, एवं अन्नाणियवादी वि वेणइयवादीवि । Eucation Internation For Parts Only समवसरण, तस्य क्रियावादि आदि चत्वारः भेदाः एवं प्रत्येक भेदस्य वक्तव्यता ~305~ Page #306 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (०५) [भाग-११]"भगवती"-अंगसूत्र-५ (मूलं+वृत्ति:) शतक [३०], वर्ग [-], अंतर्-शतक [-], उद्देशक [१], मूलं [८२५] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र- [०५], अंगसूत्र- [०५] "भगवती मूलं एवं अभयदेवसूरि-रचिता वृत्ति: प्रत सूत्रांक [८२५] दीप अनुक्रम [९९९] व्याख्या- सलेस्सा णं भंते! नेरइया किरियावादी किं नेरझ्याउयं, एवं सवेवि नेरच्या जे किरियावादी ते मणुस्साउयं ३० शतके प्रज्ञप्तिः || एग पकरेह, जे अकिरियावादी अन्नाणियवादी वेणइयवादी ते सबढाणेसुवि नो नेरइयाउयं पकरेइ तिरि-II दशा १ अभयदेवी- खजोणियाउयंपि पकरेइ मणुस्साउयंपि पकरेइ नो देवाउयं पकरेइ, नवरं सम्मामिच्छत्ते उवरिल्लेहिंद्र क्रियावाद्या या वृत्तिः२४ युर्वन्धादि | दोहिवि समोसरणेहिं न किंचिवि पकरेह जहेब जीवपदे, एवं जाव थणियकुमारा जहेव नेरइया । अकिरि सू८२५ यावादी णं भंते! पुढविकाइया पुच्छा, गोयमा ! नो नेरदयाउयं पकरेइ तिरिक्खजोणियाउयं मणुस्साउयं० दिनो देवाउयं पकरेइ, एवं अन्नाणियवादीवि । सलेस्सा णं भंते । एवं जं जं पदं अस्थि पुढविकाइयाणं तर्हि २/४। मज्झिमेसु दोसु समोसरणेसु एवं चेच दुविहं आउयं पकरेइ नवरं तेउलेस्साए न किंपि पकरेइ, एवं आउक्का इयाणवि, वणस्सइकाइ०, तेउका वाउका सबहाणेसु मज्झिमेसु दोसु समोसरणेसु नो नेरइयाउयं हैपक तिरिक्खजो पक० नो मणु नो देवाउ० पक०, बेइंदियतेइंदियचउरिदियाणं जहा पुढविकाइयाणं नवरं सम्मत्तनाणेसु न एकंपि आउयं पकरेइ ।। किरियावादी णं भंते । पचिं. तिरि० किं नेरइयाउयं पकरेइ 18|| पुच्छा, गोयमा जहा मणपजवनाणी, अकिरियावादी अन्नाणियवादी वेणइयवादी य चाहिंपि पकरेह, दिजहा ओहिया तहा सलेस्सावि । कण्हलेस्सा णं भंते! किरियावादी पंचिंदियतिरक्ख० किं नेरइयाजयं पुच्छा, ॥९४५॥ गोयमा? नो नेरइयाउयं पकरेइ णो तिरिक्ख० नो मणुस्साउयं नो देवाउयं पकरेइ, अकिरियावादी अन्नाणि४ यवादी वेणइयवाई चउविहंपि पकरेइ, जहा कण्हलेस्सा एवं नीललेस्साथि काउलेस्सावि, तेउलेस्सा जहा weredturary.com समवसरण, तस्य क्रियावादि आदि चत्वारः भेदा: एवं प्रत्येक-भेदस्य वक्तव्यता ~306~ Page #307 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (०५) [भाग-११]"भगवती"-अंगसूत्र-५ (मूलं+वृत्ति:) शतक [३०], वर्ग [-], अंतर्-शतक [-], उद्देशक [१], मूलं [८२५] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र- [०५], अंगसूत्र- [०५] "भगवती मूलं एवं अभयदेवसूरि-रचिता वृत्ति: प्रत सूत्रांक [८२५] दिसलेस्सा, नवरं अकिरियावादी अन्नाणियवादी वेणइयवादी यणो नेरइयाउयं पकरेइ देवाउयंपि पकरेइ तिरि क्खजोणियाउयपि पकरेहु मणुस्साउयंपि पकरेड़, एवं पम्हलेस्सावि०, एवं सुक्कलेस्सावि भाणियबा, कण्हपक्खिया तिहिं समोसरणेहिं चउविहंपि आउयं पकरेइ, सुक्कपक्खिया जहा सलेस्सा, सम्मदिही जहा मणप-5 जवनाणी तहेव वेमाणियाउयं पकरेइ, मिच्छदिट्टी जहा कण्हपक्खिया, सम्मामिच्छादिही ण य एकंपिपकरेइ | जहेच नेरइया, णाणी जाव ओहिनाणी जहा सम्मद्दिडी, अन्नाणी जाव विभंगनाणी जहा कण्हपक्खिया, | सेसा जाव अणागारोवउत्ता सवे जहा सलेस्सा तहा चेव भाणियचा, जहा पंचिंदियतिरिक्खजोणियाणं | वत्तवया भणिया एवं मणुस्साणवि भाणियबा, नवरं मणपज्जवनाणी नोसन्नोवउत्ता य जहा सम्मट्ठिी तिरिक्खजोणिया तहेव भाणियचा, अलेस्सा केवलनाणी अवेद्गा अकसायी अयोगी य एए न एगंपि आउयं । |पकरेइ जहा ओहिया जीवा सेसं तहेव, वाणमंतरजोइसियवेमाणिया जहा असुरकुमारा ॥ किरियावादी णं द भंते! जीवा किं भवसिद्धीया अभवसिद्धीया?, गोयमा! भवसिद्धीया नो अभवसिद्धीया । अकिरियावादी गणं भंते ! जीवा किं भवसिद्धीया पुच्छा, गोयमा भवसिद्धीयावि अभवसिद्धीयावि, एवं अनाणियवादीवि, वेणइयवादीवि | सलेस्सा णं भंते! जीवा किरियावादी किं भव० पुच्छा, गोयमा! भवसिद्धीया नो अभ-19 दिवसिद्धीया। सलेस्सा गंभंते जीवा अकिरियावादी किं भव० पुच्छा,गोयमा ! भवसिद्धीयावि अभवसिद्धी-15 यावि, एवं अन्नाणियवादीवि वेणइयवादीवि जहा सलेस्सा, एवं जाव सुकलेस्सा, अलेस्सा णं भंते जीवा किरि दीप अनुक्रम [९९९] ***964 CHAXSENSES RECE समवसरण, तस्य क्रियावादि आदि चत्वारः भेदा: एवं प्रत्येक-भेदस्य वक्तव्यता ~307~ Page #308 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (०५) [भाग-११]"भगवती"-अंगसूत्र-५ (मूलं+वृत्ति:) शतक [३०], वर्ग -], अंतर्-शतक [-], उद्देशक [१], मूलं [८२५] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र- [०५], अंगसूत्र- [०५] "भगवती मूलं एवं अभयदेवसूरि-रचिता वृत्ति: प्रत सूत्रांक [८२५] सू८२५ व्याख्या- यावादी किं भव० पुच्छा, गोयमा ! भवसिद्धीया नो अभवसिद्धीया, एवं एएणं अभिलायेणं कण्हपक्खिया पण कण्हपाक्खया३० शतके प्रज्ञप्तिः तिसुवि समोसरणेसु भयणाए, सुक्कपक्खिया चउसुचि समोसरणेसु भवसिद्धीया नो अभवसिद्धीया, सम्म उद्देशः१ अभयदेवी-दिट्ठी जहा अलेस्सा, मिच्छादिट्ठी जहा कण्हपक्खिया, सम्मामिच्छादिही दोसुवि समोसरणेसु जहा अले-क्रियावाद्या या वृत्तिः स्सा, नाणी जाव केवलनाणी भवसिद्धीया नो अभवसिद्धीया, अन्नाणी जाव विभंगनाणी जहा कण्हप- युद्घन्धादि ॥९४६॥ क्खिया, सन्नासु चउसुवि जहा सलेस्सा, नोसन्नोवउत्ता जहा सम्मदिट्ठी, सवेदगा जाव नपुंसगवेदगा जहा |सलेस्सा, अवेदगा जहा सम्मदिट्ठी, सकसायी जाव लोभकसायी जहा सलेस्सा, अकसायी जहा सम्मदिट्टी, सयोगी जाव कायजोगी जहा सलेस्सा, अयोगी जहा सम्मदिट्ठी, सागारोवउत्ता अणागारोवउत्ता जहा सलेस्सा, एवं नेरइयावि भाणियचा नवरं नायचं जं अस्थि, एवं असुरकुमारावि जाव धणियकुमारा, ६ पुढविकाइया सबहाणेसुवि मज्झिल्लेसु दोसुवि समवसरणेसु भवसिद्धीयावि अभवसिद्धीयावि एवं जावट |वणस्सइकाइया, बेइंदियतेइंदियचउरिदिया एवं चेव नवरं संमत्ते ओहिनाणे आभिणियोहियनाणे सुयनाणे* एएसु चेच दोसु मज्झिमेसु समोसरणेसु भवसिद्धिया नो अभवसिद्धिया, सेसं तं चेव, पंचिंदियतिरिक्त| जोणिया जहा नेरहया नवरं नायवं जं अस्थि, मणुस्सा जहा ओहिया जीवा, चाणमंतरजोइसियवेमाणिया ॥९४६॥ जहा असुरकुमारा। सेवं भंते! २॥ (सूत्रं ८२५)॥ ३०॥१॥ 'किरियावाई णमित्यादौ यन्नैरयिकायुर्देवायुश्च न प्रकुर्वन्ति क्रियावादिनारकास्तन्नारकभवानुभावादेव, यच्च तिर्यगा दीप अनुक्रम [९९९] weredturary.com समवसरण, तस्य क्रियावादि आदि चत्वारः भेदा: एवं प्रत्येक-भेदस्य वक्तव्यता ~308~ Page #309 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (०५) प्रत सूत्रांक [[२५] दीप अनुक्रम [९९९ ] [भाग-११]“भगवती”- अंगसूत्र - ५ (मूलं + वृत्ति:) शतक [३०], वर्ग [-], अंतर् शतक [ - ], उद्देशक [१], मूलं [ ८२५] पूज्य आगमोद्धारकश्री संशोधितः मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित.. आगमसूत्र - [०५] अंगसूत्र- [ ०५] "भगवती" मूलं एवं अभयदेवसूरि-रचिता वृत्तिः युर्न प्रकुर्वन्ति तत्क्रियावादानुभावादित्यवसेयं, अक्रियावादादिसमवसरणत्रये तु नारकाणां सर्वपदेषु तिर्यग्मनुष्यायुषी एव भवतः, सम्यग्मिथ्यात्वे पुनर्विशेषोऽस्तीति तद्दर्शनायाह- 'नवरं सम्मे' त्यादि, सम्यग्मिथ्यादृष्टिनारकाणां द्वे एवान्तिमे समवसरणे स्तः, तेषां चायुर्बन्धो नास्त्येव गुणस्थानकस्वभावादतस्ते तयोर्न किञ्चिदप्यायुः प्रकुर्वन्तीति । 'पुढविकाइये'त्यादी 'दुविहं आउयं ति मनुष्यायुस्तिर्यगायुश्चेति, 'तेउलेस्साए न किंपि करेंति ति अपर्याप्तकावस्थाया| मेव पृथिवीकायिकानां तद्भावाद्विगम एव चायुषो बन्धादिति, 'सम्मत्तनाणेसु न एक्कंपि आउयं पकरेंति'त्ति, द्वीन्द्रियादीनां सम्यक्त्वज्ञानकालात्यय एवायुर्वन्धो भवत्यल्पत्वात्तत्कालस्येति नैकमप्यायुर्वन्ति तयोस्ते इति ॥ पश्खे - न्द्रियस्तिर्यग्योनिकदण्डके – 'कण्हलेसा पणमित्यादि, यदा पञ्चेन्द्रियतिर्यञ्चः सम्यग्दृष्टयः कृष्णलेश्यादिपरिणता भवन्ति तदाऽऽयुरेकमपि न बनन्ति, सम्यग्दशां वैमानिकायुर्वन्धकत्वेन तेजोलेश्यादित्रयबन्धनादिति । 'तेउलेसा जहा |सलेस'त्ति, अनेन च क्रियावादिनो वैमानिकायुरेव इतरे तु त्रयश्चतुर्विधमप्यायुः प्रकुर्वन्तीति प्राप्तं, सलेश्यानामेवंविधस्वरूपतयोक्तत्वात् इह तु यदनभिमतं तन्निषेधनायाह- 'नवरं अकिरियाबाई'त्यादि, शेषं तु प्रतीतार्थत्वान्न व्या| ख्यातमिति ॥ त्रिंशत्तमशते प्रथमः ॥ ३०१ ॥ अतरोववन्नगाणं भंते! नेरइया किं किरियावादी ? पुच्छा, गोयमा ! किरियावादीवि जाव वेणइयवादीचि, सलेस्सा णं भंते! अनंतशेववन्नगा नेरइया किं किरियाबादी एवं चेव, एवं जहेव पढमुद्दे से नेरहयाणं वत्तवया तहेब इहवि भाणियचा, नवरं जं जस्स अस्थि अनंतशेववन्नगाणं नेरयाणं तं तस्स भाणि Education Internation For Parts Only समवसरण, तस्य क्रियावादि आदि चत्वारः भेदाः एवं प्रत्येक भेदस्य वक्तव्यता ~309~ waryra Page #310 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (०५) [भाग-११]"भगवती"-अंगसूत्र-५ (मूलं+वृत्ति:) शतक [३०], वर्ग [-], अंतर्-शतक -1, उद्देशक [२-११], मूलं [८२६-८२८] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र- [०५], अंगसूत्र- [०५] "भगवती मूलं एवं अभयदेवसूरि-रचिता वृत्ति: प्रत सूत्रांक [८२६-८२८] व्याख्या- यचं, एवं सबजीवाणं जाव वेमाणियाणं, नवरं अणंतरोववनगाणं ज जहिं अस्थि तं तहिं भाणिय । किरि- ३० शतके प्रज्ञप्तिः याबाई भंते! अणंतरोववनगा नेरड्या किं नेरइयाज्यं पकरेइ? पुच्छा, गोयमा ! नो नेरइयाउयं पकरेंति उद्दे.२-११ अभयदेवी- नो तिरि० नो मणु० नो देवाज्यं पकरेइ, एवं अकिरियावादीवि अन्नाणियवादीवि वेणइयवादीवि । सले-|| या वृत्ति |स्सा णं भंते! किरियावादी अणतरोववन्नगा नेरइया किं नेरहयाउयं पुच्छा, गोयमा! नो नेरच्याउयं पकरेइ हाल्प ॥९४७॥ जाव नो देवाउयं पकरेइ एवं जाव वेमाणिया, एवं सबहाणेसुवि अणंतरोववन्नगा नेरइया न किंचिवि आउयं । ८२६-८२८ ॐ पकरेइ जाव अणागारोवउत्तत्ति, एवं जाव बेमाणिया नवरं जं जस्स अत्थितं तस्स भाणियवं । किरियावादी णं भंते ! अणंतरोववन्नगा नेरइया किं भवसिद्धिया अभवसिद्धिया?, गोयमा! भवसिद्धिया नो अभवसिदिया। अकिरियावादी णं पुच्छा, गोयमा! भवसिद्धियावि अभवसिद्धियावि, एवं अन्नाणियवादीवि वेणइयवादीवि । सलेस्सा णं भंते! किरियावादी अर्णतरोववन्नगा नेरइया किं भवसिद्धिया अभवसिद्धिया ?, गोयमा! भवसिद्धिया नो अभवसिद्धिया, एवं एएणं अभिलावणं जहेव ओहिए उद्देसए नेरइयाणं वत्तद्यया भणिया तहेव इहवि भाणियथा जाव अणागारोबउत्तत्ति एवं जाव बेमाणियाणं नवरंजं जस्स अस्थि तं तस्स। भाणियब, इमं से लक्खणं-जे किरियावादी सुक्कपक्खिया सम्मामिच्छदिट्ठीया एए सवे भवसिद्धिया नो अभवसिद्धीया, सेसा सवे भवसिद्धीयावि अभवसिद्धीयावि । सेवं भंते! इति ॥ (सूत्रं ८२६) ॥३०॥२॥ परंपरो-४ ववन्नगा णं भंते ! नेरइया किरियावादी एवं जहेच ओहिओ उद्देसओ तहेव परंपरोववन्नएमुवि नेरइयादीओ दीप अनुक्रम [१०००-१००२] ~310~ Page #311 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (०५) [भाग-११]"भगवती"-अंगसूत्र-५ (मूलं+वृत्ति:) शतक [३०], वर्ग [-], अंतर्-शतक -1, उद्देशक [२-११], मूलं [८२६-८२८] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र- [०५], अंगसूत्र- [०५] "भगवती मूलं एवं अभयदेवसूरि-रचिता वृत्ति: प्रत सूत्रांक [८२६ -८२८] SOCIEOCOCCCCCX तहेव निरवसेसं भाणियई तहेव तियदंडगसंगहिओ। सेवं भंते !२ जाव विहरइ ।। (सूत्रम् ८२७) ॥३०॥३॥ एवं एएणं कमेणं जच्चेव बंधिसए उद्देसगाणं परिवाडी सच्चेव इहंपि जाव अचरिमो उद्देसो, नवरं अणंतरा चत्तारिवि | एकगमगा, परंपरा चत्तारिवि एकगमएणं, एवं चरिमावि, अचरिमावि एवं चेव नवरं अलेस्सो केवली अजोगी। न भन्नइ, सेसं तहेव । सेवं भंते! २ ति। एए एकारसवि उद्देसगा (सूत्रं ८२८) समवसरणसयं सम्मत्तं ॥३०॥ एवं द्वितीयादय एकादशान्ता उद्देशका व्याख्येयाः, नवरं द्वितीयोद्देशके 'इमं से लकखणं' ति 'से' भव्यत्वस्येदं लक्षणं-क्रियावादी शुक्लपाक्षिकः सम्यग्मिथ्यादृष्टिश्च भव्य एव भवति नामव्यः, शेषास्तु भव्या अभव्याश्चेति, अलेश्यसम्यग्दृष्टिज्ञान्यवेदाकपाययोगिनां भव्यत्वं प्रसिद्धमेवेति नोक्कमिति । तृतीयोदेशके तु 'तियदंडगसंगहिओ'त्ति, इह || दण्डकत्रयं नैरयिकादिपदेषु-क्रियावाद्यादिवरूपणादण्डकः १ आयुर्वन्धदण्डको २ भव्याभव्यदण्डक ३श्चेत्येवमिति । एकादशोदेशके तु 'अलेस्सो केवली अजोगी य न भण्णति'त्ति, अचरमाणामलेश्यत्वादीनामसम्भवादिति ॥ त्रिंशत्तमशतं वृत्तितः परिसमाप्तम् ॥ ३०॥ यद्वाइमहामन्दरमन्थनेन, शास्त्रार्णवादुच्छलिताम्यतुच्छम् । भावार्थरलानि ममापि दृष्टी, यातानि ते वृत्तिकृतो जयन्ति ॥१॥ त्रिंशत्तमशते चत्वारि समवसरणान्युक्तानीति चतुष्टयसाधाच्चतुर्युग्मवक्तव्यतानुगतमष्टाविंशत्युदेशकयुक्तमेकत्रिंशं | द शतं व्याख्यायते, तस्य चेदमादिसूत्रम् दीप अनुक्रम [१०००-१००२] AREauratoninternational अत्र त्रिंशत्तमे शतके २-११ उद्देशका: परिसमाप्ता: तत् समाप्ते त्रिंशत्तमं शतकं अपि परिसमाप्त | अथ एकत्रिंशत्तं शतकं आरभ्यते ~311 Page #312 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (०५) [भाग-११]"भगवती"-अंगसूत्र-५ (मूलं+वृत्ति:) शतक [३१], वर्ग [-], अंतर्-शतक [-1, उद्देशक [१-२८], मूलं [८२९-८४१] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र- [०५], अंगसूत्र- [०५] "भगवती मूलं एवं अभयदेवसूरि-रचिता वृत्ति: प्रत सूत्रांक [८२९ -८४१] व्याख्या-10 रायगिहे जाव एवं वयासी-कति णं भंते! खुड्डा जुम्मा पन्नत्ता?, गोयमा! चत्तारि खुड्डा जुम्मा प० त०- ३१ शतके प्रज्ञप्ति कडजुम्मे १ तेयोए २ दावरजुम्मे ३ कलिओए४, से केण?णं भंते । एवं बुच्चइ चत्तारि खुड्डा जुम्मा०प० उद्दे.१-२८ अभयदेवी- तं-कडजुम्मे जाव कलियोगे?, गोयमा! जे णं रासी चक्कएणं अवहारेणं अवहीरमाणे चउपज्जवसिए से क्षुल्लकयुया वृत्तिः२ खुड्डागकडजुम्मे, जेणरासी चउक्कएणं अवहारेणं अवहीरमाणे तिपज्जवसिए सेत्तं खुड्डागतेयोगे,जे णं रासी चउ ग्मादीनाकरणं अवहारेणं अवहीरमाणे दुपज्जवसिए सेत्तं खुड्डागदावरजुम्मे, जेणं रासी चउकएणं अवहारेणं अवहीरमाणे मुत्पादःसू ॥९४८॥ २९-८४१ एगपज्जवसिए से खुडागकलियोगें, से तेणद्वेणं जाव कलियोगे।खुड्डागकडजुम्मनेरइया णं भंते ! कओ उवव ज्नंति? किं नेरइएहिंतो उववज्जति ? तिरिक्ख० पुच्छा, गोयमा! नो नेरइएहिंतो उववनंति एवं नेरइयाणं उबवाओ टू जहा चकतीए तहा भाणियचो । ते णं भंते! जीवा एगसमएणं केवइया उववज्जति ?, गोयमा! चत्तारि वा अट्ठ वा बारस वा सोलस वा संखेजा वा असंखेजा वा उववजंति । ते णं भंते! जीवा कहं उववज्जति ?, गोयमा! से जहानामए पवए पवमाणे अजझवसाण एवं जहा पंचविसतिमे सए अहमुद्देसए नेरइयाणं वत्तबया तहेव इहवि भाणियबा जाव आयप्पओगेणं उववज्जति नो परप्पयोगेणं उववजंति । रयणप्पभापुढवि- खुडागकडजुम्मनेरहया भंते! कओ उधवजंति?, एवं जहा ओहियनेरइयाणं बत्तबया सचेच रपणप्प IC॥९४८॥ भाएवि भाणियबा जाय नो परप्पयोगेणं उववज्जति, एवं सकरप्पभाएवि जाव अहेसत्तमाए, एवं उववाओ || || जहा वर्षातीए, अस्सन्नी खलु पदमं दोचं व सरीसवा तइय पक्खी। गाहाए जववाएयवा, सेसं तहेवाटू SAMASSACRACT दीप अनुक्रम [१००३-१०१५] अत्र एकत्रिंशत्तमे शतके १-२८ उद्देशका: आरब्धा: ~312 Page #313 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (०५) प्रत सूत्रांक [८२९ -८४१] दीप अनुक्रम [१००३ -१०१५] [भाग-११]“भगवती”- अंगसूत्र -५ (मूलं + वृत्तिः) शतक [३१], वर्ग [-], अंतर् शतक [ - ], उद्देशक [१-२८], मूलं [ ८२९-८४१] पूज्य आगमोद्धारकश्री संशोधितः मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित.. आगमसूत्र- [०५] अंगसूत्र- [ ०५] "भगवती" मूलं एवं अभयदेवसूरि-रचिता वृत्तिः ST. 149 खुड्डागतेयोगनेरइया णं भंते! कओ उवंबजंति किं नेरइएहिंतो ? उबबाओ जहा बकंतीए, ते णं भंते ! जीवा एगसमएणं केवहया उववज्जंति?, गोयमा । तिन्नि वा सप्त वा एकारस वा पन्नरस वा संखेज्जा वा असंखेज्जा वा उववजंति सेसं जहा कडजुम्मस्स, एवं जाव असत्तमाए । खुड्डागदावरजुम्मनेरइया णं भंते । कओ उचबजंति ?, एवं जहेब खुडागकडजुम्मे नवरं परिमाणं दो वा छ वा दस वा चोस वा संखेजा वा असंखेजा वा सेसं तं चैव जाव आहे सतमाए । खुड्डागकलि ओगनेरइया णं भंते! कओ उववजंति ?, एवं | जहेब खुड्डागकडजुम्मे नवरं परिमाणं एक्को वा पंच वा नव वा तेरस वा संखेजा वा असंखेजा वा उववजंति | सेसं तं चैव एवं जाव असत्तमाए । सेवं भंते । २ जाव विहरति ॥ ( सूत्रं ८२९ ) ॥ ३१३१ ॥ कण्हलेस्स| खुड्डागकडजुम्मनेरया णं भंते! कओ उबवजंति ?, एवं चेव जहा ओहियगमो जाव नो परप्पयोगेणं उचवजंति, नवरं ववाओ जहा वतीए, धूमप्पभापुढविनेरइया णं सेसं तं चैव धूमप्पभापुढ विकण्हलेस्सखुडागकडजुम्मनेरइया णं भंते! कओ उबवजंति ?, एवं चेव निरवसेसं, एवं तमापवि आहेसत्तमावि, नवरं | उववाओ सवत्थ जहा बकंतीए । कण्हलेस्सखुट्टागते ओगनेरइया णं भंते! कओ उबव० १, एवं चैव नवरं तिन्नि वा सत्त वा एकारस वा पन्नरस वा संखेना वा असंखेजा वा सेसं तं चैव एवं जाव आहेससमाएवि । कण्हलेस्सखुड्डा गदावरजुम्मनेरइया णं भंते! कओ उववज्जंति ?, एवं चैव नवरं दो वा छ वा दस वा चोदस वा सेसं तं चेव, धूमप्पभाएवि जाव असत्तमाए । कण्हलेस्सखुड्डागकलियोगनेरहया णं भंते! कभी उचव Internationa For Parts Only ~313~ Page #314 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (०५) [भाग-११]"भगवती"-अंगसूत्र-५ (मूलं+वृत्ति:) शतक [३१], वर्ग [-], अंतर्-शतक [-1, उद्देशक [१-२८], मूलं [८२९-८४१] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र- [०५], अंगसूत्र- [०५] "भगवती मूलं एवं अभयदेवसूरि-रचिता वृत्ति: प्रत सूत्रांक [८२९ -८४१] व्याख्या|| जति !, एवं चैव नवरं एको वा पंच वा नव वा तेरस वा संखेजा वा असंखेजा वा सेसं तं चेव, एवं धूम-III ४३१ शतके प्रज्ञष्ठिः अभयदेवीदिप्पभाएवि तमाएवि अहे सत्तमाएवि । सेवं भंते !२त्ति ।। (सूत्र ८३०) ॥३१॥ २॥ नीललेस्सखुड्डागकड-18लकयु जुम्मनेरइया णं भंते। कओ उवषजति, एवं जहेव कण्हलेस्सखुड्डागकडजुम्मा नवरं उववाओ जो चालुय- ग्मादीना प्पभाए सेसं तं येव, वालुयप्पभापुढविनीललेस्सखुड्डागकडजुम्मनेरइया एवं चेव, एवं पंकप्पभाएवि, एवं मुत्पादः सू ॥९४९॥ दि धूमप्पभाएवि, एवं चउसुवि जुम्मेसु नवरं परिमाणं जाणियचं, परिमाणं जहा कण्हलेस्सउद्देसए । सेसं ८२९-८४१ तहेव । सेवं भंते ! सेवं भंतेसि ॥ (सूत्रं ८३१)॥ ३१॥३॥ काउलेस्सखुट्टागकडजुम्मनेरड्या णं भंते! कोट उबवनंति !, एवं जहेव कण्हलेस्सखुड्डागकडजुम्म नवरं उववाओ जो रयणप्पभाए सेसं तं चेव । रयणप्प| भापुढविकाउलेस्सखुड्डागकडजुम्मनेरइया णं भंते ! कओ उघव.?, एवं चेव, एवं सक्करप्पभाएवि, एवं वालुय-18 प्पभाएवि, एवं चउसुवि जुम्मेसु, नवरं परिमाणं जाणियचं, परिमाणं जहा कण्हलेस्सउद्देसए सेसं तं चेव सेवंट भंते! २त्ति ।। (सूत्रं ८३२) ।। ३२४॥ भवसिद्धीयखुड्डागकडजुम्मनेरड्या णं भंते! कओ उवव०१, कि नेरइए०१, एवं जहेव ओहिओ गमओ तहेव निरवसेसं जाव नो परप्पयोगेणं उघव । रयणप्पभापुढविभवसिद्धीयखुड्डागकडजुम्मनेरइया णं भंते! एवं चेव निरवसेसं, एवं जाव अहेसत्तमाए, एवं भवसिद्धियखुड्डागतेयोगनेरइयावि एवं जाव कलियोगत्ति, नवरं परिमाणं जाणियवं, परिमाणं पुवभणियं जहा पदमुद्देसए। सेवं भंते! २त्ति ।। (सूत्रं ८३३)॥३११५॥ कण्हलेस्सभवसिद्धियखुड्डागकडजुम्मनेरइया णं भंते ! कओ AROARRAK दीप अनुक्रम [१००३-१०१५] ॥९४९॥ ~3144 Page #315 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (०५) प्रत सूत्रांक [८२९- -८४१] दीप अनुक्रम [१०००-१०१५] [भाग-११]“भगवती”- अंगसूत्र -५ (मूलं + वृत्तिः) शतक [३१], वर्ग [-], अंतर् शतक [ - ], उद्देशक [१-२८], मूलं [ ८२९-८४१] पूज्य आगमोद्धारकश्री संशोधितः मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित.. आगमसूत्र - [०५] अंगसूत्र- [ ०५] "भगवती" मूलं एवं अभयदेवसूरि-रचिता वृत्तिः उचवजंति ?, एवं जहेब ओहिओ कण्हलेस्सउद्देसओ तहेव निरवसेसं चउवि जुम्मेसु भाणियतो जाव आहे सत्तमपुढविकण्हलेस्सखुड्डा गकलियोगनेरइया णं भंते! कओ उबवज्जंति ?, तहेव । सेवं भंते ! २त्ति ॥ सूत्रं | ८३४ ) || ३१।६ ॥ नीललेस्सभवसिद्धिया चउसुवि जुम्मेसु तहेव भाणियबा जहा ओहिए नीललेस्स उद्देसए । सेवं भंते! सेवं भंते! जाव विहरह ॥ (सूत्रं ८३५ ) ॥ ३११७ || काउलेस्साभवसिद्धिया चउसुबि जुम्मेसु तदेव उववायचा जहेब ओहिए काउलेस्स उद्देसए । सेवं भंते । २ जाब बिहरइ ॥ ( सूत्रं ८३६ ) ॥ ३११८ ॥ जहा भवसिद्धिएहिं चत्तारि उद्देसया भणिया एवं अभवसिद्धीएहिवि चत्तारि उद्देसगा भाणियधा जाव | काउलेस्साउद्देसओत्ति । सेवं भंते ! २त्ति ॥ (सूत्रं ८३७ ) ॥ ३११२ ॥ एवं सम्मदिट्ठीहिवि लेस्सासंजु | तेहिं चत्तारि उद्देसगा कायद्या, नवरं सम्मदिट्ठी पढमबितिएसुवि दोसुचि उद्देसएस अहेसत्तमापुढवीए न उववाएयहो, सेसं तं चैव । सेवं भंते सेवं भंतेत्ति ! (सूत्रं ८३८ ) ॥ ३१।१६ ॥ मिच्ादिट्ठीहिवि चत्तारि उद्देसगा कायचा जहा भवसिद्धियाणं । सेवं भंते ! २ति (सूत्रं ८३९ ) ॥ ३१।२० ॥ एवं कण्हपक्खिएहिवि लेस्सा संजुत्ते हिं चत्तारिं उद्देसगा कायदा जहेव भवसिद्धीएहिं । सेवं भंते । सेवं भंते! ति (सूत्रं ८४०) ।। ३११२४ ॥ सुकपक्खिएहिं एवं चैवं चत्तारि उद्देगा भाणियचा जाव वालुयप्पभापुढविकाउलेस्ससुकपक्खियखुडागकलिओगनेरहया णं भंते! कओ उवव०१, तहेब जाव नो परप्ययोगेणं उवब० । सेवं भंते २ ति ॥ ( सूत्रं ८४१ ) ॥ ३१ ॥ २८ ॥ सबेबि एए अट्ठावीस उद्देसगा । उववायसयं सम्मतं ॥ ३१ ॥ 3 For Parks Use Only ~315~ war Page #316 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (०५) प्रत सूत्रांक [८२९- -८४१] दीप अनुक्रम [१००० -१०१५] [भाग-११]“भगवती”- अंगसूत्र -५ (मूलं + वृत्तिः) शतक [३१], वर्ग [-], अंतर् शतक [ - ], उद्देशक [१-२८], मूलं [ ८२९-८४१] पूज्य आगमोद्धारकश्री संशोधितः मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित.. आगमसूत्र- [०५] अंगसूत्र- [ ०५] "भगवती" मूलं एवं अभयदेवसूरि-रचिता वृत्तिः व्याख्याप्रज्ञप्तिः अभयदेवीया वृत्तिः २ ४ ॥ ९५० ॥ 'रायगिहे' इत्यादि, 'खुट्टा जुम्म'त्ति युग्मानि वक्ष्यमाणा राशिविशेषास्ते च महान्तोऽपि सन्त्यतः धुलकशब्देन विशेषिताः, तत्र चत्वारोऽष्टौ द्वादशेत्यादिसङ्ख्यावान् राशिः क्षुल्लकः कृतयुग्मोऽभिधीयते, एवं त्रिसतैकादशादिको क्षुल्लकप्रयोजः, द्विषट्प्रभृतिकः क्षुल्लकद्वापरः, एकपञ्चकप्रभृतिकस्तु क्षुलककल्योज इति । 'जहां वकंती 'ति प्रज्ञापनापष्ठपदे, अर्थतश्चैवं पञ्चेन्द्रियतिर्यग्भ्यो गर्भजमनुष्येभ्यश्च नारका उत्पद्यन्त इति, विशेषस्तु 'अस्सन्नी खलु पढम' मित्यादिगाधाभ्यामवसेयः, 'अज्झवसाण'त्ति अनेन 'अज्झवसाणनिवत्तिएणं करणोयाएणं ति सूचितम् ॥ एकत्रिंशशते प्रथमः ॥ ३१३१ ॥ द्वितीयस्तु कृष्णलेश्याश्रयः, सा च पञ्चमीपष्ठीसप्तमीष्वेव पृथिवीषु भवतीतिकृत्वा सामान्य दण्डकस्तद्दण्डकत्रयं चात्र भवतीति 'उववाओ जहा वर्षातीए धूमप्पभापुढविनेरइयाणंति इह कृष्णलेश्या प्रक्रान्ता सा च धूमप्रभायां भवतीति तत्र ये जीवा उत्पद्यन्ते तेषामेवोत्पादो वाच्यः, ते चाससिरीसृपपक्षिसिंहवज इति ॥ ११२ ॥ तृतीयस्तु नीललेश्याश्रयः, सा च तृतीयाचतुर्थीपशमीष्वेव पृथिवीषु भवतीतिकृत्वा सामान्यदण्डकस्तद्दण्डकत्रयं चात्र |भवतीति 'उबवाओ जो वालुयप्पभाएत्ति, इह नीललेश्या प्रक्रान्ता सा च वालुकाप्रभायां भवतीति तत्र ये जीवा उत्प द्यन्ते तेषामेवोत्पादी वाच्यः, ते चासञ्ज्ञिसरीसृपवर्जा इति । 'परिमाणं जाणिय'ति, चतुरष्टद्वादशप्रभृतिक्षुल्लककृतयुग्मादिस्वरूपं ज्ञातव्यमित्यर्थः ॥ ३११३ ॥ चतुर्थस्तु कापोतलेश्याश्रयः, सा च प्रथमाद्वितीया तृतीयास्वेव पृथिवी - | ष्वितिकृत्वा सामान्यदण्डको रलप्रभादिदण्डकत्रयं चात्र भवतीति 'डबवाओ जो रयणप्पभाए ति सामान्यदण्डके | रत्नप्रभावदुपपातो वाच्यः । शेषं सूत्रसिद्धम् ॥ एकत्रिंशं शतं वृत्तितः समाप्तम् ॥ ३१ ॥ Education International For Pal Use Only ~316~ ३१ शतके उद्दे. १-२८ क्षुल्लकयुग्मादीना मुत्पादः सू २८२९-८४१ ।। ९५० ।। Page #317 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (०५) [भाग-११]"भगवती"-अंगसूत्र-५ (मूलं+वृत्ति:) शतक [३१,३२], वर्ग [-], अंतर्-शतक -1, उद्देशक [१-२८], मूलं [८२९-८४१,८४२-८४३] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र- [०५], अंगसूत्र- [०५] "भगवती मूलं एवं अभयदेवसूरि-रचिता वृत्ति: प्रत सूत्रांक [८२९-८४१, ८४२ -८४३] शतमेतद्भगवत्या भगवत्या भावितं मया वाण्याः । यदनुग्रहेण निरवग्रहेण सदनुग्रहेण तथा ॥१॥ एकत्रिंशे शते नारकाणामुत्पादोऽभिहितो द्वात्रिंशे तु तेषामेवोद्वर्त्तनोच्यते इत्येवंसम्बन्धमष्टाविंशत्युदेशकमानमिदं व्याख्यायते, तस्य चेदमादिसूत्रम् खुडागकजजुम्मनेरच्या णं भंते! अणंतरं उच्चहित्ता कहिं गच्छति ? कहिं उववजति किं नेहएस उपव| जंति तिरिक्खजोणिएसु उवव० उच्चट्टणा जहा वकंतीए। ते णं भंते ! जीवा एगसमएणं केवइया उबद्दति ?. | गोयमा! चत्तारि चा अट्ट चा वारस वा सोलस वा संखेजा वा असंखेजा वा उच्चति, ते णं भंते! जीवा कहं उपहति?, गोयमा से जहा नामए पवए एवं तहेव, एवं सो चेच गमओ जाव आयप्पयोगेणं उबति नो परप्पयोगेणं उधति, रयणप्पभापुढविनेरइए खुट्टागकड० एवं रयणप्पभाएवि एवं जाच अहेसत्तमाए, एवं खूडागतेयोगखुडागदावरजुम्मखुड्डागकलियोगा नवरं परिमाणं जाणियचं, सेसं तं चेव । सेवं भंते ! २ति (सूत्र ८४२)॥३२॥१॥ कण्हलेस्सकडजुम्मनेरइया एवं एएणं कमेणं जहेव उववापसए अट्ठावीसं उद्देसगा भणिया तहेव उवणासएवि अट्ठावीसं उद्देसगा भाणियचा निरबसेसा नवरं उबद्दतित्ति अभिलाओ भाणियबो, सेसं तं चेच । सेवं भंते सेवं भंते सि जाब विहरद ॥ (सूत्र ८४३) उववणासर्य सम्मत्तं ॥३२॥ 'खुड्डागे'त्यादि, 'उवहणा जहा वकंतीए'त्ति, सा चैवमर्थत:-'नरगाओ उबट्टा गम्भे पज्जत्तसंखजीवीसु 'त्ति ॥ द्वात्रिंशं शतं वृत्तितः समाप्तम् ॥३२॥ दीप अनुक्रम [१००० -१०१५, १०१६-१०१७] %ACHANAKAMANG अत्र एकत्रिंशत्तमे शतके १-२८ उद्देशका: परिसमाप्ता: तत् समाप्ते एकत्रिंशत्तमं शतकं अपि परिसमाप्तं | अथ द्वात्रिंशत्तं शतकं आरभ्यते ~317~ Page #318 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (०५) [भाग-११]"भगवती"-अंगसूत्र-५ (मूलं+वृत्ति:) शतक [३२,३३], वर्ग [-], अंतर्-शतक [१-१२], उद्देशक [१-२८], मूलं [८४२-८४३,८४४-८४९] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र- [०५], अंगसूत्र- [०५] "भगवती मूलं एवं अभयदेवसूरि-रचिता वृत्ति: प्रत सूत्रांक [८४२ -८४३, ८४४, व्याख्याप्रज्ञप्तिः अभयदेवीयावृत्तिः ८४९] ॥९५१॥ व्याख्याते प्राक्शते व्याख्या, कृतैवास्य समत्वतः । एकत्र तोयचन्द्रे हि, दृष्टे दृष्टाः परेऽपि ते॥॥१॥ ३२ शतके उद्दे: २८ उदरीना सू द्वात्रिंशे शते नारकोद्वर्तनोक्ता, नारकाचोद्वृत्ता एकेन्द्रियादिषु नोत्पद्यन्ते, के च ते ! इत्यस्यामाशङ्कायां ते प्ररूप- ८४१-८४२ यितव्या भवन्ति, तेषु चैकेन्द्रियास्तावत्प्ररूपणीया इत्येकेन्द्रियप्ररूपणपरं त्रयस्त्रिंशं शतं द्वादशावान्तरशतोपेतं व्याख्या| यते, तस्य चेदमादिसूत्रम् अवान्तर कतिविहाणं भंते! एगिदिया पन्नत्ता?, गोयमा! पंचविहा एगिंदिया प० तं०-पुढविकाइया जाव वण-18|| शत, १२ स्सइकाइया, पुढविक्काइया णं भंते ! कतिविहा प०१, गोयमा! दुविहा प.तं०-सुहुमपुढविकाइया य वायरपुडचिकाइया य, सुहुमपुढविकाइया णं भंते! कतिविहा प०१, गोयमा! दुबिहा पन्नत्ता, तंजहा-पजत्ता || ८४३-८४८ मुहमपुढविकाइया य अपजत्ता सुहमपुढविकाइया य, वायरपुढचिकाइया णं भंते ! कत्तिविहा प०, गो० एवं| चेव, एवं आउकाइयावि चउकएणं भेदेणं भाणियबा एवं जाव वणस्सइकाइपा । अपज्जत्तसुहमपुढधिकाइथा र्ण भंते ! कति कम्मप्पगडीओ प०१, गोयमा! अट्ठ कम्मप्पगडी पं०, तं०-नाणावरणिजं जाव अंतराइयं, ॥९५१॥ |पज्जत्तसुहमपुढविकाइयाणं भंते! कति कम्मप्पगडीओप०१, गोयमा अट्ट कम्मप्पगडीओ प०, तंजहा-जाणा-15 वरणिज्जं जाव अंतराइयं । अपज्जत्तघायरपुढविकाइयाणं भंते ! कति कम्मप्पगडीओ प०१, गोयमा! एवं चेव ८, पजत्तवायरपुढविकाइयाणं भंते! कति कम्मप्पगडीओ एवं चेव८, एवं एएणं कमेणं जाव बायर-13 दीप अनुक्रम [१०१६-१०१७, १०१८-१०३२] भेदादि सू FuPranaamvam umony अत्र द्वात्रिंशत्तमे शतके १-२८ उद्देशका: परिसमाप्ताः तत् समाप्ते द्वात्रिंशत्तमं शतकं अपि परिसमाप्त अथ त्रयोत्रिंशत्तं शतकं आरभ्यते ~318~ Page #319 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (०५) [भाग-११]"भगवती"-अगसूत्र-५ (मूल+वृत्ति :) शतक [३३], वर्ग [-], अंतर्-शतक [१-१२], उद्देशक [-], मूलं [८४४-८४९] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र- [०५], अंगसूत्र- [०५] "भगवती मूलं एवं अभयदेवसूरि-रचिता वृत्ति: प्रत सूत्रांक [८४४, ८४९] दियणस्सइकाइयाणं पजत्तगाणंति । अपज्जत्तमुहमपुढविकाइयाणं भंते! कति कम्मप्पगडीओ बंधति ?, गोयमा! सत्तविहबंधगावि अट्टविहबंधगावि सत्त० बंधमाणा आउयवजाओ सत्त कम्मप्पगडीओ बंधति अह बंधमाणा पडिपुन्नाओ अह कम्मप्पगडीओ बंधंति, पज्जत्तसुष्टुमपुढविकाइया णं भंते ! कति कम्म०, एवं चेव, एवं द्र सबे जाव पज्जत्तवायरवणस्सइकाइया णं भंते! कति कम्मप्पगडीओ बंधति ?, एवं चेव । अपजत्तसुहमपुढ-14 विकाइयाणं भंते ! कति कम्मप्पगडीओ वेदेति ?, गोयमा ! चोइस कम्मप्पगडीओ घेदेति, तं०-नाणा वरणिजं जाव अंतराइयं, सोइंदियवझं चक्विदियवझं घाणिंदियवझं जिभिदियवझं इत्थियेदवझं 18 है पुरिसवेदवझं, एवं चउक्कएणं भेदेणं जाव पजत्तवायरवणस्सइकाइया णं भंते ! कति कम्मप्पगडीओ वेदेति !, गोयमा! एवं चेव चोद्दस कम्मप्पगडीओ वेदेति । सेवं भंते ! २ति ।। (सूत्रं ८४४)। ॥शक्षा कइविहा णं भंते! अणंतरोववन्नगा एगिदिया प०१, गोयमा! पंचविहा अणतरोववन्नगा एगिदिया प००-पुढविकाजाव वणस्सइकाइया, अणंतरोववन्नगाणं भंते ! पुढविकाइया कतिविहा पं०१, गोयमा! दुविहा पन्नत्ता, तंजहा-सुहुमपुढविकाइया यथायरपुडविकाझ्या य, एवं दुपएणं भेदेणं जाव वणस्सइकाइया । अणंतरोववन्नगसुहमपुढविकाइयाणं भंते! कति कम्मप्पगडीओ प०१, गोयमा! अट्ट कम्मप्पगडीओ प० तं०-नाणावरणिर्ज जाव अंतराइयं, अणंतरोववन्नगबादरपुढविकाइयाणं भंते! कति कम्मप्पगडीओ प०?, गोयमा! अट्ट कम्मप्पयडीओ प००-नाणावरणिजं जाव अंतराइयं, एवं जाव अणंतरोववन्नगवादरवण दीप अनुक्रम [१०१८ •१030 ~319~ Page #320 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (०५) [भाग-११]"भगवती"-अंगसूत्र-५ (मूलं+वृत्ति:) शतक [३३], वर्ग [-], अंतर्-शतक [१-१२], उद्देशक [-], मूलं [८४४-८४९] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र- [०५], अंगसूत्र- [०५] "भगवती मूलं एवं अभयदेवसूरि-रचिता वृत्ति: प्रत सूत्रांक [८४४, ८४९] व्याख्याप्रज्ञप्तिः अभयदेवीया वृत्तिः२ ॥९५२॥ स्सइकाइयाणंति, अणंतरोववन्नगसुहमपुढविकाइया णं भंते ! कति कम्मप्पगडीओ बंधति ?, गोपमा! आउ- ३२ शतके यवजाओ सत्त कम्मप्पगडीओ बंधंति, एवं जाव अणंतरोववन्नगवादरवणस्सइकाइयत्ति । अणंतरोववन्नग उद्दे. २८ मुहुमपुढविकाइया णं भंते! कइ कम्मप्पगडीओ वेदेति', गोयमा! चउद्दस कम्मप्पगडीओ घेत, तं०- उद्वर्त्तना सू नाणावरणिज्ज तहेव जाव पुरिसवेदवज्झं, एवं जाव अणंतरोववन्नगपादरवणस्सइकाइयत्ति । सेवं भंते सेवं है। ८४१-८४२ | ३३ शतके भंतेत्ति ॥ (सूत्र ८४५)॥३॥२॥ कतिचिहा णं भंते! परंपरोववनगा एगिदिया प०, गोयमा। पंचविहा M अवान्तर परंपरोववन्नगा एगिदिया पतं०-पुढविकाइया एवं चउकओ भेदो जहा ओहिउद्देसए। परंपरोचवन्नगअप | शत. १२ ज्जत्तसुहमपुढविकाइयाणं भंते ! कद कम्मप्पगडीओ प०१, एवं एएणं अभिलावेणं जहा ओहिउद्देसए तहेव एकेन्द्रियनिरवसेसं भाणियवं जाव चउद्दस बेति । सेवं भंते! २ ति ॥ (सूत्रं ८४६) ३३॥३॥ अणंतरोगाढा जहा भेदादि सू अणंतरोववन्नगा ४॥ परंपरोगाढा जहा परंपरोववनगा ५॥ अणंतराहारगा जहा अणंतरोववन्नगा ६॥ ४८४३-८४८ | परंपराहारगा जहा परंपरोववन्नगा ७॥ अर्णतरपज्जत्तगा जहा अणंतरोवधनगा ८॥ परंपरपज्जत्तगा जहा है परंपरोववन्नगा ९॥ चरिमावि जहा परंपरोववक्षगा तहेव १० ॥ एवं अचरिमावि ११ ॥ एवं एए एफारस उद्देसगा । सेवं भंते! २ जाब विहरद ॥ (सूत्रं ८४७) पढम पगिदियसयं सम्मत्तं ॥ ३३॥१॥ कइविहा णं DI|| ९५२॥ भंते! कण्ह लेस्सा एगिदिया प०१, गोयमा! पंचविहा कण्हलेस्साएगिदिया प०, तं०-पुढयिकाइया जाव वणस्सइकाइया । कण्हलेस्सा णं भंते! पुढविकाइया कइविहा प०१, गोयमा दुविहा पं० सं०-मुहमपुढवि दीप अनुक्रम [१०१८ AAAAMANG Post ~320 Page #321 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (०५) प्रत सूत्रांक [८४४, ८४९] दीप अनुक्रम [१०१८ -१०३२] [भाग-११]“भगवती”- अंगसूत्र - ५ ( मूलं + वृत्ति:) शतक [३३], वर्ग [-], अंतर् - शतक [१-१२], उद्देशक [-], मूलं [८४४-८४९] पूज्य आगमोद्धारकश्री संशोधितः मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित.. आगमसूत्र- [०५] अंगसूत्र- [ ०५] "भगवती" मूलं एवं अभयदेवसूरि- रचिता वृत्तिः | काइया य बादरपुढविकाइया य, कण्हलेस्सा णं भंते! सुहुमपुढविकाइया कहविहा प० १, गोयमा ! एवं एए अभिलावेणं चकभेदो जहेब ओहिउद्देसए जाव वणस्सइकाइयति, कण्हलेस अपजत्तसुहमपुड विकाइयाणं भंते! कइ कम्मप्पगडीओ प०१, एवं चैव एएणं अभिलावेणं जहेव ओहिउदेसए तहेव पन्नत्ताओ तहेव बंर्धति तहेव वेदेति । सेवं भंते! २ ति ॥ कइविहा णं भंते ! अनंतशेवन्नन्नगकण्हलेस्सएगिंदिया पन्नत्ता ?, गोयमा ! पंचविहा अनंतरोवबन्नगा कण्हलेस्सा एगिंदिया एवं एएवं अभिलावेणं तहेव दुयओ भेदो जाव वणस्सइकाइयन्ति, अनंतराव वन्नगकण्हलेस्ससुद्धमपुढविकायाणं भंते ! कइ कम्मप्पगडीओ प० १, एवं एएणं अभिलावेणं जहा ओहिओ अनंतशेववन्नगाणं उद्देसओ तहेव जाव वेदेंति । सेवं भंते! सेवं भंते! न्ति ॥ कहविहाणं भंते! परंपरोववन्नगा कण्हलेस्सा एर्गिदिया ५०१, गोयमा ! पंचविहा परंपरोववन्नगा कण्ह० एगिंदिया पत्ता, तंजहा- पुढविकाइया एवं एएणं अभिलावेणं तहेव चउकओ भेदो जाव वणस्सइकाइयत्ति, परंपरोववन्नगकण्हलेस अपज्जत्तसुमपुढचिकाइयाणं भंते ! कह कम्मप्पगडीओ प० १, एवं एएणं अभिलावेणं जहेब ओहिओ परंपरोववन्नगउद्देसओ तहेब जाव वेदेति, एवं एएणं अभिलावेणं जहेव ओहिएर्गिदियसए | एक्कारस उद्देसगा भणिया तहेव कण्हलेस्ससतेवि भाणिया जाव अचरिमचरिमकण्हलेस्साए गिंदिया || ( सूत्रं ८४८ ) ॥ वितियं एगिंदियस सम्मत्तं ॥ २ ॥ जहा कण्हलेस्सेहिं भणियं एवं नीललेस्सेहिवि सयं भाणियवं । सेवं भंते । २त्ति ॥ ततियं एगिंदियस सम्मत्तं ॥ ३ ॥ एवं काउलेस्सेहिवि सयं भाणियचं नवरं ca Internationa For Parts Use Only ~321~ wor Page #322 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (०५) [भाग-११]"भगवती"-अगसूत्र-५ (मूल+वृत्ति:) शतक [३३], वर्ग [-], अंतर्-शतक [१-१२], उद्देशक [-], मूलं [८४४-८४९] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र- [०५], अंगसूत्र- [०५] "भगवती मूलं एवं अभयदेवसूरि-रचिता वृत्ति: प्रत सूत्रांक उद्दे:२८ [८४४, ८४९] व्याख्या-8 काउलेस्सेति अभिलावो भाणियो। चउत्थं एगिदियसयं सम्मत्तं ॥४॥ कहविहा णं भंते ! भवसिद्धीया ३२ शतके प्रज्ञप्तिः एगिंदिया प०१, गोयमा! पंचविहा भवसिद्धिया एगिदिया प०, तं०-पुडविकाइया जाव वणस्सइकाइया अभयदेवीया वृत्ति भेदो चउकओ जाव चणस्सइकाइपत्ति । भवसिद्धियअपज्जत्तसुहमपुढविकाइयाणं भंते। कति कम्मप्पग- उद्वत्तना सू डीओ प०१, एवं एएणं अभिलावेणं जहेव पढमिल्लगं एगिदियसयं तहेव भवसिद्धियसयंपि भाणियवं, उद्देस-द 18|३३ शतके ॥९५३॥ |गपरिवाडी तहेव जाव अचरिमोत्ति । सेवं भंते!२ ति॥ पंचमं एर्गिदियसयं सम्मत्तं ॥५॥ कइविहा णं टि अवान्तर भंते ! कहलेस्सा भवसिद्धिया एगिदिया प०१, गोयमा पंचविहा कण्हलेस्सा भवसिद्धिया एगिदिया प०, शत. १२ दापुदविकाइया जाव वणस्सहकाइपा, कण्हलेस्सभवसिद्धीय पुढविकाइया भंते ! कतिषिहा प०१, गोयमा!||एकेन्द्रियभादविहा पतं०-मुहमपुतविकाइया य बायरपुढधिकाइया य, कण्हलेस्सभवसिव्हीपसुहमपुटविकाइया णं भेदादि सू. 8 भंते ! काविहा प०१, गोयमा। दुथिहा पं० तंजहा-पजत्तगा य अपज्जत्तगा य, एवं पायराधि, एएणं अभि-||८४३-८४८ दलावणं तहेब चउकओ भेदो भा०, कण्हलेस्सभवसिद्धीयअपज्जत्तमुहुमपुढविकाइयाणं भंते ! कइ कम्मप्पग-|| शादीओ प०, एवं एएणं अभिलावेणं जहेव ओहिउद्देसए तहेव जाव वेदेति । कइविहा गं भंते! अर्णतरोव-IIA द्रविनया कण्हलेस्साभवसिद्धिया एगिदिया प०१, गोयमा! पंचविहा अणंतरोववन्नगा जाव वणस्सइकाइया, - अणंतरोववन्नगकण्हलेस्सभवसिडीयपुढविकाझ्या णं भंते ! कतिविहा प०१, गोयमा! दुविहा प०, तं०-10॥९५३ ॥ सुहुमपुढविका० एवं दुयओ भेदो । अणंतरोववन्नगकण्हलेस्सभवसिद्धीयसुहुमपुडविकाइयाणं भंते ! कह क दीप अनुक्रम [१०१८ Post ~322 Page #323 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (०५) [भाग-११]"भगवती"-अंगसूत्र-५ (मूलं+वृत्ति:) शतक [३३], वर्ग [-], अंतर्-शतक [१-१२], उद्देशक [-], मूलं [८४४-८४९] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र- [०५], अंगसूत्र- [०५] "भगवती मूलं एवं अभयदेवसूरि-रचिता वृत्ति: प्रत सूत्रांक [८४४, ८४९] |म्मपगडीओ प०१, एवं एएणं अभिलावेणं जहेव ओहिओ अर्णतरोववन्नउद्देसओ तहेव जाव वेदेति, एवं || एएणं अभिलावेणं एकारसवि उद्देसगा तहेव भाणियबा जहा ओहियसए जाव अचरिमोत्ति ॥ छ8 एगि दियसयं सम्मत्तं ॥६॥ [ग्रन्धानम् १५०००]जहा कण्हलेस्सभवसिद्धिएहिं सयं भणियं एवं नीललेस्सभवसिद्धिए" 18 हिचि सयं भाणियवं ॥ सत्तमं एगिंदियसयं सम्मत्तं ॥७॥ एवं काउलेस्सभवसिद्धीएहिवि संय॥अट्ठमं एगिदि यसयं सम्मत्तं ॥८॥ कइविहा णं भंते! अभवसिद्धीया एर्गिदिया प०१, गोयमा! पंचविहा अभवसिद्धिया० ५० तं०-पुढविष्काइया जाव वणस्सइकाइया एवं जहेव भवसिद्धीयसयं भणियं नवरं नव उद्देसगा चरमअचरमउद्देसगवजा सेसं तहेव ॥ नवमं एगिदियसयं सम्मत्तं ॥९॥ एवं कण्हलेस्सअभवसिद्धीयएगिदियसयंपि ॥ दसमं एगिदियसयं सम्मत्तं ॥१०॥ नीललेस्सअभवसिद्धीयएगिदिएहिवि सयं ॥ ११॥ काउलेस्सअभव सिद्धीयसयं, एवं चत्तारिवि अभवसिद्धीयसपाणि णव २ उद्देसगा भवति, एवं एयाणि बारस एगिदियस|४|| पाणि भवंति ॥ (सूत्र ८४९)॥ तेत्तीसइमं सर्य सम्मत्तं ॥३३॥ _ 'काविहा णमित्यादि, 'चोइस कम्मपयडीओ'त्ति, तत्राष्टौ ज्ञानावरणादिकास्तदन्याः पटू तद्विशेषभूताः 'सोई दियवझ'ति श्रोत्रेन्द्रियं वध्य-हननीयं यस्य तत्तथा मतिज्ञानावरणविशेष इत्यर्थः, एवमन्यान्यपि, स्पर्शनेन्द्रियवध्यं 8.तु तेषां नास्ति, तझावे एकेन्द्रियत्वहानिप्रसङ्गादिति। 'इस्थिवेयवति यदुदयात्त्रीवेदो न लभ्यते तत्स्त्रीवेदवध्यम् , एवं | धुवेदवध्यमपि, नपुंसकवेदवध्यं तु तेषां नास्ति नपुंसकवेदवर्तित्वादिति । शेष सूत्रसिद्धं, नवरम् ‘एवं दुपएणं भेदे दीप अनुक्रम [१०१८ •१030 ~323 Page #324 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (०५) [भाग-११]"भगवती"-अंगसूत्र-५ (मूलं+वृत्ति:) शतक [३३], वर्ग [-], अंतर्-शतक [१-१२], उद्देशक [-], मूलं [८४४-८४९] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र- [०५], अंगसूत्र- [०५] "भगवती मूलं एवं अभयदेवसूरि-रचिता वृत्ति: प्रत सूत्रांक [८४४, *SCRESCUE 45% ८४९] व्याख्या-15 एणं'ति अनन्तरोपपन्नकानामेकेन्द्रियाणां पर्याप्तकापर्याप्तकभेदयोरभावेन चतुर्विधभेदस्यासम्भवाद् द्विपदेन भेदेनेत्यु-स ३४ शतके प्रज्ञप्तिः|||क्तम् । तथा 'चरमअन्चरमउद्देसगवजंति, अभवसिद्धिकानामचरमत्वेन चरमाचरमविभागो नास्तीतिकृत्वेति ॥ त्रय- १२ अवांअभयदेवी- स्त्रिंशं शतं वृत्तितः समाप्तमिति ॥ ३३ ॥ एकेन्द्रिय या वृत्तिः२४ विग्रहादि च्याख्येयमिह स्तोकं स्तोका व्याख्या तदस्य विहितेयम् । न ह्योदनमात्रायामतिमात्रं व्यञ्जन युक्तम् ॥१॥ सू८५० ॥९५४॥ त्रयस्त्रिंशशते एकेन्द्रियाः प्ररूपिताश्चतुस्विंशच्छतेऽपि भजयन्तरेण त एव प्ररूप्यन्ते इत्येवंसंबन्धेनायातस्य च द्वादशशतोपेतस्यास्येदमादिसूत्रम् कइविहा णं भंते! एगिदिया प०१, गोयमा! पंचविहा एगिदिया पतं०-पुढविकाइया जाव वणस्सइ-18 काइया, एवं एतेणं चेव चउकरणं भेदेणं भाणियबा जाव वणस्सइकाइया, अपजत्तसुहमपुढविकाइए णं भंते! इमीसे रयणप्पभाए पुढवीए पुरच्छिमिल्ले चरिमंते समोहए समोहइत्ता जे भविए इमीसे रयणप्पभाए पुढवीए पञ्चच्छिमिल्ले चरिमंते अपजत्तसुहुमपुढविकाइयत्ताए उपवजित्तए, से णं भंते ! कइसमएणं विग्गहेणं उववजेजा ?, गोयमा! एगसमइएण वा दुसमइएण चा तिसमइएण या विग्गहेणं उववजेजा, से केणढेणं भंते ! ॥९५४॥ | एवं बुच्चइ एगसमहएण चा दुसमइएण चा जाव उववजेजा?, एवं खलु गोयमा! मए सत्त सेढीओ प०, २०उज्जयायता सेढी एगपओका दुहओवंका एगयओखहा दुहओखहा चकवाला अदचकवाला ७, उज्जु दीप अनुक्रम [१०१८-१०३२] SAX GACACANCE अत्र त्रयोत्रिंशत्तमे शतके १-१२ अन्तर्-शतका परिसमाप्ताः तत् समाप्ते त्रयोत्रिंशत्तमं शतकं अपि परिसमाप्तं अथ चतुस्त्रिंशत्तं शतकं आरभ्यते ~324 Page #325 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (०५) [भाग-११]"भगवती"-अगसूत्र-५ (मूल+वृत्ति:) शतक [३४], वर्ग H], अंतर्-शतक [१], उद्देशक [१], मूलं [८५०] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र- [०५], अंगसूत्र- [०५] "भगवती मूलं एवं अभयदेवसूरि-रचिता वृत्ति: आयताए सेटीए उववजमाणे एगसमइएणं विग्गहेणं उववज्जेज्जा, एगओवंकाए सेढीए ववजमाणे दसमहएणं || विग्गहेर्ण उववजेजा, दुहओवकाए सेढीए उववजमाणे तिसमइएणं विग्गहेणं उबवजेजा, से तेणट्टेणं गोय-15 हैमा। जाव उववज्जेजा । अपजत्तसुहुमपुढविकाइए णं भंते! इमीसे रयणप्पभाए पुतवीए पुरच्छिमिल्ले चरि मंते समोहए समो२जे भविए इमीसे रयणप्पभाए पुढवीए पञ्चच्छिमिल्ले चरिमंते पज्जत्समुहुमपुढविकाइ-5 यत्ताए उववज्जित्तए से णं भंते ! कइसमइएणं विग्गहेणं उववज्जेज्जा ?, गोयमा! एगसमइएण वा सेसं तं चेवर जाव से तेणद्वेणं जाब विग्गहेणं उववज्जेज्जा, एवं अपज्जत्तसुहुमपुडविकाइओ पुरच्छिमिल्ले चरिमंते समोहहणावेत्ता पचच्छिमिल्ले चरिमंते बादरपुढविकाइएसु अपजत्तएम उववाएयबो, ताहे तेसु चेच पजत्तएसु ४, एवं आउकाइएसु चत्तारि आलावगा सुहुमेहिं अपजत्तएहिं ताहे पज्जत्तपहिं वायरेहिं अपज्जत्तएहिं ताहे पज्जत-|| एहिं उववाएयचो ४, एवं चेव सुहुमतेउकाएहि वि अपजत्तएहिं १ ताहे पजत्तएहिं उववाएयबो २, अपज्जत्तसुहुमपुढचिकाइए णं भंते! इमीसे रयणपभाए पुढवीए पुरछिमिले चरिमंते समोहए समोहइत्ता जे भविए| मणुस्सखेत्ते अपजत्तवादरतेउकाइयत्ताए उववजिसए से णं भंते ! कइसमइएणं विग्गहेणं उववजेजा, सेसं तं चेव, एवं पजत्तवायरतेउकाइयत्ताए उबवाएयवो ४, वाउकाइए सुहुमवायरेसु जहा आउकाइएसु उववाओ तहा उववाएयबो ४, एवं वणस्सइकाइएसुवि २०, पजत्तसुहुमपुढविकाइए णं भंते! इमीसे रयणप्पभाए पुढबीए एवं पजत्तसुहुमपुढविकाइओवि पुरच्छिमिल्ले चरिमंते समोहणावेत्ता एएणं चेव कमेणं एएसु चेव बीससु ASTROORSACROSACROCUR FACE%AA-II- र ~325 Page #326 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (०५) [भाग-११]"भगवती"-अंगसूत्र-५ (मूलं+वृत्ति:) शतक [३४], वर्ग [-], अंतर्-शतक [१], उद्देशक [१], मूलं [८५०] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र- [०५], अंगसूत्र- [०५] "भगवती मूलं एवं अभयदेवसूरि-रचिता वृत्ति: व्याख्या-1 ठाणेसु उववाएयद्यो जाव चादरवणस्सइकाइएमु पजत्तएसुवि ४०, एवं अपज्जत्तयादरपुढविकाइओवि ६०,४३४ शतके प्रज्ञप्तिः ||एवं पजतवादरपुढचिकाइओबि ८०, एवं आउकाइओवि चउसुवि गमएसु पुरच्छिमिल्ले चरिमंते समोहए। अभयदेवी- एयाए चेव वत्तवयाए एएसु चेव वीसइठाणेसु उववाएयचो १६०, सुहुमतकाइओवि अपजत्तओ पज्जत्तओ पृथ्व्यादीया वृत्तिः२ य एएमु चेव वीसाए ठाणेसु उववाएयचो, अपज्जत्तवायरतेउकाइए णं भंते! मणुस्सखेत्ते समोहए २ जे नामुत्पादः सू८५० ३९५५॥ भविए इमीसे रयणप्पभाए पुडवीए पञ्चच्छिमिल्ले चरिमंते अपजत्तसुहुमपुढविकाइयत्ताए उववजित्तए से णं, भंते ! कसमहएणं विग्गहेणं उचवजेजा सेसं तहेव जाव से तेणट्ठणं एवं पुढचिकाइएसु चउबिहेसुवि उव-11 वाएयचो, एवं आउकाइएसु चविहेसुवि, तेउकाइएसु सुहमेसु अपजत्तएसु पजत्तएसु य एवं चेव उववा-18 एयबो, अपजत्तवायरतउक्काइए णं भंते ! मणुस्सखेत्ते समोहए समो०२ जे भविए मणुस्सखेत्ते अपज्जत्तचाय| रतेउकाइयत्ताए उववज्जित्तए से णं भंते! कतिसम०?, सेसं तं चेच, एवं पज्जत्तवायरतेउकाइयत्ताएवि उव|वाएयचो, वाउकाइयत्साए घ वणस्सइकाइयत्ताए य जहा पुढविकाइएसु तहेव चउक्कएणं भेदेणं उववाएयचो, एवं पजत्तवायरतेउकाइओऽवि समयखेत्ते समोहणावेत्ता एएसु चेच वीसाए ठाणेसु उववाएयवो जहेव अपजत्तओ उववाइओ, एवं सवत्थवि वायरतेउकाइया अपज्जत्तगा य पञ्जत्तगा य समयखेसे उचवाएयवा समो|हणावेयवावि २४०, चाउकाइया वणस्सकाइयाय जहा पुढविकाइया तहेव चउकएणं भेदेणं उववाएयवा जाव पजत्ता ४००॥वायरवणस्सइकाइएणं भंते! इमीसे रयणप्पभाए पुढचीए पुरच्छिमिल्ले चरिमंते समोहए समोहएत्ता ॥९५५॥ ~326 Page #327 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (०५) [भाग-११]"भगवती"-अंगसूत्र-५ (मूलं+वृत्ति:) शतक [३४], वर्ग H], अंतर्-शतक [१], उद्देशक [१], मूलं [८५०] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र- [०५], अंगसूत्र- [०५] "भगवती मूलं एवं अभयदेवसूरि-रचिता वृत्ति: जे भविए इमीसे रयणप्पभाए पुढवीए पञ्चच्छिमिल्ले चरिमंते पजत्तवायरवणस्सइकाइयत्ताए उववजित्तए से णं भंते ! कतिसम० सेसं तहेव जाव से तेणद्वेण०, अपजत्तमुहुमपुढविकाइएसु णं भंते ! इमीसे रयण-15 प्पभाए पुटवीए पचच्छिमिल्ले चरिमंते समोहए समोह०२ जे भविए इमीसे रयणप्पभाए पुढवीए पुरच्छि-15 मिल्ले चरिमते अपज्जत्तसुहुमपुढविकाइयत्ताए उबवज्जित्तए से णं भंते ! कइसमएणं?, सेसं तहेव निरवसेसं, | 8 एवं जहेव पुरछिमिल्ले चरिमंते सवपदेसुवि समोहया पचच्छिमिल्ले चरिमंते समयखेत्ते य खबवाइया जे य समयखेत्ते समोहया पचच्छिमिल्ले चरिमंते समयखेत्ते य उववाइया एवं एएणं चेव कमेणं पञ्चच्छिमिल्ले चरिमंते समयखेत्ते य समोहया पुरच्छिमिल्ले चरिमंते समयखेरो य उववाएयचा तेणेव गमएणं, एवं एएणं गमएणं 8 दाहिणिले चरिमंते समोहयाणं उत्तरिल्ले चरिमंते समयखेत्ते य उपवाओ एवं चेव उत्तरिल्ले चरिमंते सम यखेते य समोहया दाहिणिले चरिमंते समयखेत्ते य उववाएयचा तेणेव गमएण, अपजससुहमपुढविका-|| इएणं भंते! सक्करप्पभाए पुढवीए पुरच्छिमिल्ले चरिमंते समोहए २ जे भविए सकरप्पभाए पुढवीए पञ्चच्छि-4 |मिल्ले चरिमंते अपजत्तसुहमपुढविकाइयत्ताए उववजह एवं जहेच रयणप्पभाए जाच से तेण?णं एवं एएणं कमेणं जाव पजत्तएसु सुहुमतेजकाइएसु, अपजत्तमुहमपुढविकाइए णं भंते ! सकरप्पभाए पुढवीए पुरकिछ-18 मिल्ले चरिमंते समोहए समोहइत्ता जे भविए समयखेत्ते अपजत्तवायरतेउकाइयत्ताए उववज्जित्तए से णं भंते ! कतिसमय० पुच्छा, गोयमा! दुसमइएण वा तिसमइएण वा विग्गहेण उववजिज्बा, से केणटेणं, एवं खलु। For P OW Hiralaunasurary.orm ~327 Page #328 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (०५) [भाग-११]"भगवती"-अंगसूत्र-५ (मूलं+वृत्ति:) शतक [३४], वर्ग H], अंतर्-शतक [१], उद्देशक [१], मूलं [८५०] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र- [०५], अंगसूत्र- [०५] "भगवती मूलं एवं अभयदेवसूरि-रचिता वृत्ति: दाउद्दे.१ व्याख्यागोयमा मए सत्त सेढीओ पं०२०-उजुयायता जाब अद्धचक्कवाला, एगओचंकाए सेढीए उववजमाणे दुस-1 ||३४ शतके प्रज्ञप्तिःमइएणं विग्गहेणं उवयज्जेज्जा दुहओवंकाए सेढीए उववज्जमाणे तिसमइएक विग्गहेणं उववज्जेज्जा से तेण?ण, अभयदेवी- एवं पज्जत्तएसुवि बायरतेडक्काइएसु, सेसं जहारयणप्पभाए, जेऽवि वापरतेउकाइया अपज्जत्तगा प पजत्तगाय या पृथ्व्यादीयावृत्तिः | समयखेत्ते समोहणित्ता दोचाए पुढवीए पञ्चच्छिमिल्ले चरिमंते पुढविकाइएसु चउविहेसु आउक्काइएमु चउद्र नामुत्पादः ॥९५६॥ बिहेसु तेउकाइएसु दुविहेसु वाउकाइएसु चउविहेसु वणस्सइकाइएसु चउबिहेसु उववनंति तेऽवि एवं चेव । सू८५० | दुसमइएण वा तिसमइएण वा विग्गहेण उववाएयबा, बायरतेउकाइया अपजत्तगा य पजत्तगा प जाहे तेसु चेव पववजंति ताहे जहेव रयणप्पभाए तहेव एगसमयदुसमहयतिसमइयविग्गहा भाणियवा सेसं जहेव रयणप्पभाए तहेच निरवसेसं, जहा सकरप्पभाए वत्तवया भणिया एवं जाव अहे सत्तमाएवि भाणियवा ॥ (सूत्रं ८५०)॥ 'काविहे'इत्यादि, इदं च लोकनाडी प्रस्तीर्थ भावनीयं, 'एगसमइएणच'त्ति एक समयो यत्रास्त्यसावेकसामयिकस्तेन || 'विग्गहेणं'ति विग्रहे-चक्रगती च तस्य सम्भवाद्गतिरेव विग्रहः विशिष्टो वा ग्रहो-विशिष्टस्थानप्राप्तिहेतुभूता गतिर्वि-8 ग्रहस्तेन, तत्र 'उज्जुआययाए'त्ति यदा मरणस्थानापेक्षयोत्पत्तिस्थानं समश्रेण्यां भवति तदा ऋग्वायता श्रेणिर्भवति,I PI तया च गच्छत एकसामयिकी गतिः स्यादित्यत उच्यते-'एगसमइएण'मित्यादि, यदा पुनमरणस्थानादुत्पत्तिस्थानमेक IN||९५६॥ प्रतरे विशेण्यां वर्तते तदैकतोवक्रा श्रेणिः स्यात् समयद्वयेन चोत्पत्तिस्थानप्राप्तिः स्यादित्यत उच्यते-'एगओवंकाए ~328~ Page #329 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (०५) [भाग-११]“भगवती”- अंगसूत्र -५ (मूलं + वृत्ति:) शतक [३४], वर्ग [-] अंतर् शतक [१], उद्देशक [१], मूलं [ ८५० ] पूज्य आगमोद्धारकश्री संशोधितः मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित.. आगमसूत्र - [०५] अंगसूत्र- [ ०५] "भगवती" मूलं एवं अभयदेवसूरि-रचिता वृत्तिः सेदीए उबवजमाणे दुसमइएणं विग्गण' मित्यादि, यदा तु मरणस्थानादुत्पत्तिस्थानमधस्तने उपरितने वा प्रतरे विश्रे व्यां स्यात्तदा द्विवकाश्रेणिः स्यात् समयत्रयेण चोत्पत्तिस्थानावाप्तिः स्यादित्यत उच्यते- 'दुइओकाए' इत्यादि, 'एवं आउकाइएसुवि चत्तारि आलावगा' इत्येतस्य विवरणं 'सुडुमेही' त्यादि । वादरस्तेजस्कायिकसूत्रे रत्नप्रभाप्रक्रमेऽपि यदुक्तं 'जे भविए मणुस्सखेत्ते 'ति तद्वादरतेजसामन्य त्रोत्पादासम्भवादिति । 'बीससु ठाणेसु' त्ति, पृथिव्या| दयः पश्च सूक्ष्मवादरभेदाद् द्विधेति दश, ते च प्रत्येकं पर्याप्तकापर्यातक भेदाद्विंशतिरिति । इह चैकैकस्मिन् जीवस्थाने विंशतिर्गमा भवन्ति, तदेवं पूर्वान्तगमानां चत्वारि शतानि एवं पश्चिमान्तादिगमानामपि ततश्चैव रत्नप्रभाप्रकरणे सर्वाणि षोडश शतानि गमानामिति । शर्कराप्रभामकरणे बादरतेजस्कायिकसूत्रे 'दुसमइएण वे'त्यादि, इह शर्कराप्रभापूर्व चरमान्तान्मनुष्यक्षेत्रे उत्पद्यमानस्य समश्रेणिर्नास्तीति 'एग समइएण 'मितीह नोकं, 'दुसमइएण' मित्यादि त्वेकवक्रस्य | द्वयोर्वा सम्भवादुक्तमिति ॥ अथ सामान्येनाधः क्षेत्रमूर्ध्वक्षेत्रं चाश्रित्याह अपजत्तसुमपुढविकाइए णं भंते! अहोलोयखेत्तनालीए बाहिरिल्ले खेत्ते समोहए २ जे भविए उडूलो | यखेत्तनालीफ बाहिरिल्ले खेते अपात्तसुमपुढविकाइयत्ताए उववजित्तए से णं भंते । कइसमइएणं विग्गहेणं उववज्जेज्जा ?, गोपमा ! तिसमइएण वा चउसमइएण वा विग्गहेणं उववज्जेज्जा ?, से केणणं भंते! एवं | बुधइ तिसमइएण वा चउसमइएण वा विग्गहेणं उववज्जेज्जा ?, गोयमा ! अपज्जत्तसुहुम पुढविकाइए णं अहोलोपखेत्तनालीए बाहिरिल्ले खेत्ते समोहए स० २ जे भविए उहलोयखेत्तनालीए बाहिरिल्ले खेत्ते अपजत can Internationa For Parts Only ~329~ Page #330 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (०५) [भाग-११]"भगवती"-अंगसूत्र-५ (मूलं+वृत्ति:) शतक [३४], वर्ग -], अंतर्-शतक [१], उद्देशक [१], मूलं [८५१] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र- [०५], अंगसूत्र- [०५] "भगवती मूलं एवं अभयदेवसूरि-रचिता वृत्ति: व्याख्या-1 सुहमपुढविकाइयत्ताए एगपयरंमि अणुसेडीए उववजित्तए से णं तिसमइएणं विग्गहेणं उपवजेजा जे भविए | ३४ शतक प्रज्ञप्तिः विसेढीए उबवजित्तए से णं चउसमइएणं विग्गहेणं उववज्जेज्जा से तेणटेणं जाव उववज्बेजा, एवं पज्जत्तसुहु- उद्दे.१अधः अभयदेवी- मपुढविकाइयत्ताएऽवि, एवं जाच पजत्तसुहुमतेउकाइयत्ताए, अपजत्तसुहमपुढविकाइए णं भंते ! अहेलोग या वृत्तिः२४ जाव समोहणित्ता जे भविए समयखेत्ते अपजत्तवायरतेउकाइयत्ताए उववजित्सए से णं भंते !, कइसमइएणं नामूर्खा दादावुत्पादः ॥९५७॥ | विग्गहेणं उववज्जेज्जा?, गोयमा! दुसमइएण चा तिसमइएण वा विग्गहेणं उववजेजा, से केणद्वेणं?, एवं || सू.८५१ | खलु गोयमा! मए सत्त सेढीओ प०, तं०-उजुआयता जाव अदचक्कवाला, एगओवंकाए सेढीए उववज-15 माणे दुसमइएणं विग्गहेणं उववजेजा दुहओवंकाए सेटीए उववजमाणे तिसमइएणं विग्गहेणं उबवजेजा से तेणटेणं०, एवं पजत्तएसुवि वायरतेउकाइएमुवि उववाएयचो, वाउकाइयवणस्सइकाइयत्ताए चउक्कएर्ण भेदेणं | 31 जहा आउकाइयत्ताए तहेव उववाएयचो २०, एवं जहा अपज्जत्तसुहमपुढविकाइयस्स गमओ भणिओ एवं पजत्तमुहमपुढविकाइयस्सवि भाणियबो तहेव वीसाए ठाणेसु उववाएयबो ४०, अहोलोपवेत्तनालीए बाहिरिल्ले खेत्ते समोहए समोहएत्ता एवं वायरपुडषिकाइयस्सवि अपजत्तगस्स पजत्तगस्स य भाणियब 1८०, एवं आउक्काइयस्स चउविहस्सवि भाणिय, १६०, सुहमतेउकाइयस्स दुविहस्सवि एवं चेव २००, अप- |जत्तवापरतेउक्काइए णं भंते! समयखेसे समोहए स. २जे भविए उहलोगस्नेतनालीए बाहिरिल्ले खेत्ते ॥ 18 अपजससुहमपुढयिकाइयत्ताए उववजित्तए से गं भंते! कइसमइएणं विग्गहेणं उववजेजा, गोयमा! दुस-13|| फरक ~330 Page #331 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (०५) [भाग-११]“भगवती”- अंगसूत्र - ५ (मूलं + वृत्ति:) शतक [३४], वर्ग [-], अंतर् शतक [१], उद्देशक [१], मूलं [८५१] पूज्य आगमोद्धारकश्री संशोधितः मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित.. आगमसूत्र - [०५] अंगसूत्र- [ ०५] "भगवती" मूलं एवं अभयदेवसूरि-रचिता वृत्तिः महरण वा तिसमइएण वा चउसमइएण वा विग्गणं उववज्जेज्जा, सेकेण्डेणं० अट्ठो जहेब रयणप्पभाए तहेव सत्त सेडीओ एवं जाव अपज्जन्तमायरते काइए णं भंते! समयखेत्ते समोहप समो २ जे भविए उढलोग खे| सनालीए बाहिरिल्ले खेते पज्जत्तनुहुमते उकाइयत्ताए उबवज्जित्तए से णं भंते! सेसं तं चेव, अपान्तवायरतेउक्काइए णं भंते! समयखेत्ते समोहए स० २ जे भविए समयखेत्ते अपजत्तवायरते उक्काइयत्ताए उववजित्तए से णं भंते! कइसमइएणं विग्गणं उबवजेजा ?, गोयमा ! एगसमइएण वा दुसमइएण वा तिसमइएण वा विग्गणं उववज्लेज्जा, से केणट्टेणं? अट्ठो जहेव रयणप्पभाए तहेव सत्त सेढीओ, एवं पज्जत्तवायरते उकाइ| साएवि, वाउयकाइएस वणस्सइकाइएस य जहा पुढविकाइएस उबवाइओ तहेव चउक्कएणं भेदेणं उबवाएयचो, एवं पज्जत्तवायरलेउकाइओवि एएस चैव ठाणेसु उबवायचो, वाउक्काइयवणस्सइकाइयाणं जहेव पुढ४ विकाइयत्ते उबवाओ तहेव भाणियचो । अपज्जतसुमपुढविकाइए णं भंते! उढलोगखेत्तनालीए बाहिरिल्ले | खेत्ते समोहए समोहणित्ता जे भविए अहेलोगखेत्तनालीए बाहिरिल्ले खेत्ते अपजत्तसुहुमपुढविकाइयत्ताए उववज्जित्तए से णं भंते! कइस०१, एवं उडलोग खेतनालीए बाहिरिले खेत्ते समोहयाणं अहेलोग खेत्तनालीए | बाहिरिल्ले खेत्ते उबवजयाणं सो चैव गमओ निरवसेसो भाणियो जाव वायरवणस्सइकाइओ पत्तओ | बायरवणरसइकाइएस पनन्तएस उबवाइओ । अपज्जत्त सुमपुढविकाइए णं भंते! लोगस्स पुरच्छिमिले चरिमंते समोहए समो २ जे भविए लोगस्स पुरच्छिमिल्ले चेव चरिमंते अपजत्तसृहुमपुढविकाइयत्ताए उवव For Parts Only ~ 331~ waryra Page #332 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (०५) [भाग-११]“भगवती”- अंगसूत्र - ५ (मूलं + वृत्ति:) शतक [३४], वर्ग [-], अंतर् शतक [१], उद्देशक [१], मूलं [८५१] पूज्य आगमोद्धारकश्री संशोधितः मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित.. आगमसूत्र - [०५] अंगसूत्र- [ ०५] "भगवती" मूलं एवं अभयदेवसूरि-रचिता वृत्तिः व्याख्या- जित्तए से णं भंते! कसमहरणं विग्गणं उबवजंति ?, गोपमा ! एगसमइएण वा दुसमइएण वा तिसम प्रज्ञष्ठिः अभयदेवीया वृत्तिः २ ॥ ९५८ ॥ इएण वा चउसमहण वा विग्गहेणं उबवजंति, से केणट्टेणं भंते! एवं बुञ्चइ एगसमइएण वा जाव उचवजिज्जा ?, एवं खलु गोयमा ! मए सत्त सेटीओ प०, तंजहा-उज्जुभयता जाव अद्धचक्कवाला, उज्जुआययाए | सेढीए उववज्रमाणे एगसमएणं विग्गणं उववज्जेज्जा एगओवंकाए सेटीए उववज्रमाणे दुसमइएणं विग्गणं | उबवलेजा दुहओवंकाए सेटीए उववजमाणे जे भविए एगपयरंसि अणुसेदी उववज्जित्तए से णं तिसमइएणं विग्गणं उबवलेला जे भविए विसेदिं उबवजित्तए से णं च समइपुणं विग्गहेणं उववज्जेज्जा, से तेणद्वेणं जाव उववज्जेज्जा, एवं अपज्जत्तसुहुमपुढविकाइओ लोगस्स पुरच्छिमिल्ले चरिमंते समोहर २ लोगस्स पुर| च्छिमिले चेष चरिमंते अपनत्तएस पात्तएसु य सुहुमपुढविकाइएस सुहुमभउकाइएस अपजन्तपसु पज्जतरसु सुहमतेडक्काइएस अपजत्तएस पलत्तएस य सुमवाउकाइएस अपलत्तए पत्तए वायरवाउकाइएस अपजतएस पात्तपसु सुहुमवणस्सइकाइएस अपजत्तएस पजत्तएस य बारससुवि ठाणेसु एएणं | चेव कमेणं भाणियो, सुहुमपुढ विकाइओ अपजत्तओ एवं चैव निरवसेसो बारससुवि ठाणेसु उबवायचो २४, एवं एएणं गमएणं जाव मुहुमवणस्सइकाइओ पत्तओ सुमवणस्सइकाइए पज्जत्तएस चैव भाणियो | अपलत्तसुमपुढविकाइए णं भंते! लोगस्स पुरच्छिमिले चरिमंते समो० २ जे भविए लोगस्स दाहिणिले चरिमंते अपजत्तसुहमपुढविकाइएस उववजित्तए से णं भंते!, कसमहरणं विग्गहेणं उववज्लेज्जा ?, Educatin internation For Parts Only ~332~ ३४ शतके उद्दे. १ अधः पृथ्व्यादी नामूर्ध्वा दादुत्पादः सू. ८५१ ।। ९५८ ।। Page #333 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (०५) [भाग-११]"भगवती"-अंगसूत्र-५ (मूलं+वृत्ति:) शतक [३४], वर्ग -], अंतर्-शतक [१], उद्देशक [१], मूलं [८५१] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र- [०५], अंगसूत्र- [०५] "भगवती मूलं एवं अभयदेवसूरि-रचिता वृत्ति: गोयमा! दुसमइएण वा तिसमइएण वा चउसमइएण वा विग्गहेणं उबवलइ, से केणटेणं भंते! एवं वुच्चइ ?, एवं खलु गोयमा! मए सत्त सेढीओ पन्नत्ता, तंजहा-उजुआयता जाव अद्धचकवाला, एगओवंकाए सेढीए | उववजमाणे दुसमइएणं विग्गहेणं उववजइ दुहओवकाए सेढीए उवधज्ञमाणे जे भचिए एगपयरंमि अणुसे-[४] हैदीओ उववजित्तए से णं तिसमइएणं विग्गणं उवचजेजा जे भविए विसेदि उववज्जित्तए से णं चउसम-हैं। इएणं विग्गहेणं उववज्जेज्जा से तेण?णं गोयमा०, एवं एएणं गमएणं पुरच्छिमिल्ले चरिमंते समोहए दाहिणिल्ले चरिमंते उववाएयपो, जाव सुहुमवणस्सइकाइओ पज्जत्तओ सुहमवणस्सइकाइएसु पजत्तएसुचेव, सवेर्सि |दुसमइओ तिसमइओ चउसमइओ विग्गहो भाणियहो। अपजत्तसुहमपुढविकाइए णं भंते ! लोगस्स पुरच्छिमिल्ले चरिमंते समोहए २ जे भविए लोगस्स पचच्छिमिल्ले चरिमंते अपजत्तमुहुमपुढविकाइयत्ताए उववजित्तए से णं भंते ! कइसमहएणं विग्गहेणं उववजेजा, गोयमा ! एगसमइएण वा दुसमइएण वा तिसमइएण वा चउसमइएण वा विग्गहेणं उववजेजा, से केणढणं ?, एवं जहेव पुरच्छिमिल्ले चरिमंते समोहया पुरच्छिमिल्ले चेव चरिमंते उववाइया तहेव पुरच्छिमिल्ले चरिमंते समोहया पच्चच्छिमिल्ले चरिमंते उववाएयत्वा सवे, अपजत्तसुहमपुडविकाइए णं भंते ! लोगस्स पुरच्छिमिल्ले चरिमंते समोहए २ जे भविए लोगस्स उत्तरिल्ले चरिमंते | अपज्जत्तसुहमपुढधिकाइयत्ताए उवव० से णं भंते ! एवं जहा पुरच्छिमिल्ले चरिमंते समोहओ दाहिणिल्ले | चरिमंते उववाइओ तहा पुरच्छिमिल्ले० समोहओ उत्तरिल्ले चरिमंते उववाएयचो, अपज्जत्तमुहमपुढविकाइए| ~333 Page #334 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (०५) [भाग-११]"भगवती"-अंगसूत्र-५ (मूलं+वृत्ति:) शतक [३४], वर्ग [-], अंतर्-शतक [१], उद्देशक [१], मूलं [८५१] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र- [०५], अंगसूत्र- [०५] "भगवती मूलं एवं अभयदेवसूरि-रचिता वृत्ति: व्याख्या- भंते! लोगस्स दाहिणिल्ले परिमंते समोहए समोहणित्ता जे भविए लोगस्स दाहिणिल्ले चेव चरिमंते अप-८ ३४ शतके प्रज्ञप्तिः जत्तसुहुमपुढविकाइयत्ताए उववज्जित्तए एवं जहा पुरच्छिमिल्ले समोहओ पुरच्छिमिल्ले चेव उवबाइओ तहेव उद्दे.१अधः अभयदेवी-18 दाहिणिले समोहए दाहिणिल्ले चेव उववाएयबो, तहेव निरवसेसं जाव सुहुमवणस्सइकाइओ पज्जत्तओ सुहु-|४|| पृथ्व्यादीया वृत्तिः नमवणस्सइकाइएसु चेव पज्जत्तएसु दाहिणिल्ले चरिमंते उववाइओ एवं दाहिणिल्ले समोहओ पचच्छिमिल्ले है। नामूचाevenचरिमंते उववाएययो नवरं दुसमइयतिसमायचउसमइयविग्गहो सेसं तहेव, दाहिणिल्ले समोहओ उत्तरिले|| समश्यावहा ससतहमा दाहालसनामारला सू.८५१ चरिमंते उववाएयचो जहेव सट्टाणि तहेव एगसमझ्यदुसमइयतिसमइयचउसमइयविग्गहो, पुरच्छिमिले जहा पचच्छिमिल्ले तहेव दुसमइयतिसमइयचउसमय०,पञ्चच्छिमिल्ले य चरिमंते समोहयाणं पञ्चच्छिमिल्ले चेव उवचजमाणाणं जहा सहाणे, उत्तरिल्ले उववजमाणाणं एगसमइओ विग्गहो नस्थि, सेसं तहेव, पुरच्छिमिल्ले जहा सहाणे, दाहिणिल्ले एगसमइओ विग्गहो नत्थि, सेसं तं चेव, उत्तरिल्ले समोहयाणं उत्तरिल्ले चेव उवच-18 जमाणाणं जहेव सट्ठाणे, उत्सरिल्ले समोहयाणं पुरच्छिमिल्ले उववजमाणाणं एवं चेव, नवरं एगसमइओ वि ग्गहो नस्थि, उत्तरिल्ले समोहयाणं दाहिणिल्ले उपवजमाणाणं जहा सहाणे, उत्तरिल्ले समोहयाणं पचच्छि-10 18|| मिल्ले खपवजमाणाणं एगसमहओ विग्गहो नत्थि, सेसं तहेव जाव मुहमवणस्सइकाइओ पजत्तओ सुहम-18 दावणस्सइकाइएमु पजत्तएसु चेव ॥ कहिन्नं भंते! वायरपुढविकाइयाणं पजत्तगाणं ठाणा प०१, गोयमा||8| सट्टाणेणं अट्ठसु पुढवीसु जहा ठाणपदे जाव सुहुमवणस्सइकाइया जे य पजत्तगा जे य अपज्जत्तगा ते सके । ~3344 Page #335 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (०५) [भाग-११]"भगवती"-अंगसूत्र-५ (मूलं+वृत्ति:) शतक [३४], वर्ग -], अंतर्-शतक [१], उद्देशक [१], मूलं [८५१] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र- [०५], अंगसूत्र- [०५] "भगवती मूलं एवं अभयदेवसूरि-रचिता वृत्ति: ASEAS** ** एगविहा अविसेसमणाणत्ता सबलोगपरियावन्ना प० समणाउसो! । अपज्जत्तसुहमपुढ विकाइयाणं भंते ! कति कम्मप्पगडीओ पन्नत्ताओ?, गोयमा! अट्ठ कम्मप्पगडीओ प०,०-नाणावरणिजं जाव अंतराइयं, एवं चउक्कएणं भेदेणं जहेव एगिदियसएसु जाव बायरवणस्सइकाइयाणं पजत्तगाणं, अपजत्तमुहमपुढवि काइया णं भंते! कति कम्मप्पगडीओ बंधंति ?, गोयमा! सत्तविहवंधगावि अहविहबंधगावि जहा एगिदियदसएसु जाव पजत्ता बायरवणस्सइकाइया । अपज्जत्तसुहमपुतविकाइया णं भंते ! कति कम्मप्पगडीओ वेदेति ? गोयमा! चोइस कम्मप्पगडीओ वेदेति तंजहा-माणावरणिज्जं जहा एगिदियसएसु जाव पुरिसवेदवजसं एवं है जाव वादरवणस्सइकाइयाणं पज्जत्तगाणं, एगिदिया शंभंते! कओ उववजंति किं नेरदएहिंतो उववजति ? जहा चर्कतीए पुढविकाइयाणं उपचाओ, एगिदियाणं भंते! कह समुग्धाया प०१, गोयमा! चत्तारि समु| ग्घाया पं० तंजहा-वेदणासमुग्घाए जाव वेउबियसमुग्घाए । एगिदिया णं भंते ! किं तुल्लद्वितीया तुल्लवि सेसाहियं कम्मं पकरेंति?, तुहृद्वितीया मायविसेसाहियं कम्मं पकरेंति ? बेमायद्वितीया तुल्लविसेसाहियं कम | पकरेंति? वेमायद्वितीया माय विसेसाहियं कम्मं पकरेंति ?, गोयमा! अत्धेगइया तुल्लद्वितीया तुल्लविसेसाहियं कम्मं पकरेंति अंत्धेगइया तुल्लद्वितीया चेमायविसेसाहियं कम्मं पकरेंति अत्धेगइया वेमायद्वितीया तुल्लविसेसाहियं कम्मं पकरेंति अत्यगइया चेमायद्वितीया वेमायविसेसाहियं कम्म पकरेंति, से केणद्वेणं मंते ! एवं चुचइ अत्थेगइया तुल्लद्वितीया जाव वेमायविसेसाहियं कम्मं पकरेंति?, गोयमा! एमिंदिया चउधिहा ** *** * ~335. Page #336 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (०५) [भाग-११]"भगवती"-अंगसूत्र-५ (मूलं+वृत्ति:) शतक [३४], वर्ग [-], अंतर्-शतक [१], उद्देशक [१], मूलं [८५१] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र- [०५], अंगसूत्र- [०५] "भगवती मूलं एवं अभयदेवसूरि-रचिता वृत्ति: ३४ शतके पृथ्व्यादी. नामूवादावुत्पाद: सू८५१ व्याख्या- पनत्ता, तंजहा-अत्धेगइया समाउया समोववन्नगा १ अत्यंगइया समाउया विसमोववन्नगा २ अत्थेगइया प्रज्ञप्तिः विसमाउया समोववन्नगा ३ अत्थेगइया विसमाउया विसमोववन्नगा४, तत्थ णजे ते समाउया समोववन्नगा अभयदेवी- ते णं तुल्लद्वितीया तुल्लविसेसाहियं कम्मं पकरेंति १ तत्थ णं जे ते समाउया विसमोववन्नगा ते णं तुल्लद्वितीया या वृत्तिः२3 वेमायविसेसाहियं कम्मं पकरेंति २तत्थ णं जे ते विसमाउया समोववन्नगा ते णं वेमायद्वितीया तुल्लविसे-| ॥९६०॥ साहियं कम्मं पकरेंति ३ तत्थ णं जे ते विसमाउया विसमोववन्नगा ते णं वेमायहिइया वेमायविसेसाहियं कम्मं पकरेंति ४, से तेणडेणं गोयमा ! जाव वेमायविसेसाहियं कम पकरेंति ॥ सेवं भंते ! २जाच | विहरति ।। (सूत्रं ८५१) ॥ ३४॥१॥ 'अपज्जत्तमुहुमत्यादि, 'अहोलोयखेत्तनालीए'त्ति अधोलोकलक्षणे क्षेत्रे या नाडी-वसनाडी साऽधोलोकक्षेत्रनाडी तस्याः, एवमूर्ध्वलोकक्षेत्रनाब्यपीति, 'तिसमइएण वत्ति, अधोलोकक्षेत्रे नाड्या बहिः पूर्वादिदिशि मृत्वैकेन नाडीमध्ये प्रविष्टो द्वितीये समये ऊर्दू गतस्तत एकातरे पूर्वस्यां पश्चिमायां वा यदोत्पत्तिर्भवति तदाऽनुश्रेण्यां गत्वा तृतीयसमये उत्पद्यत इति, 'चउसमइएण वत्ति यदा नाड्या बहिर्वायव्यादिविदिशि मृतस्तदैकेन समयेन पश्चिमायामुत्तरस्यां वा गतो द्वितीयेन नाव्यां प्रविष्टस्तृतीये अर्द्र गतश्चतुर्थेऽनुश्रेण्यां गत्वा पूर्वोदिदिश्युत्पद्यत इति, इदं च प्रायोवृत्तिमङ्गीकृत्योर्क, अन्यथा पञ्चसामयिक्यपि गतिः सम्भवति, यदाऽधोलोककोणादू लोककोण एवोत्पत्तव्यं भवतीति, भवन्ति चात्र गाथा:-"सुत्ते चउसमयाओ नस्थि गई उ परा विणिद्दिट्ठा । जुजह य पंचसमया जीवस्स इमा गई ॥९६०॥ ~336~ Page #337 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (०५) [भाग-११]"भगवती"-अंगसूत्र-५ (मूलं+वृत्ति:) शतक [३४], वर्ग [-], अंतर्-शतक [१], उद्देशक [१], मूलं [८५१] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र- [०५], अंगसूत्र- [०५] "भगवती मूलं एवं अभयदेवसूरि-रचिता वृत्ति: लोए ॥१॥ जो तमतमविदिसाए समोहओ बंभलोगविदिसाए। उववजइ गईए सो नियमा पंचसमयाए ॥२॥ उजयाय| तेगवंका दुहओवंका गई विणिदिट्ठा । जुज्जइ य तिचउर्वकावि नाम चउपंचसमयाए॥३॥ उववायाभावाओन पंचसमया|ऽहवा न संतावि । भणिया जह चउसमया महल्लबंधेन संतावि ॥४॥"[सूत्रे समयचतुष्कात्परा गतिर्न विनिर्दिष्टा । युज्यते च जीवस्येयं पश्चसमया लोके गतिः॥१॥ यस्तमस्तमोविदिशि समवहतो ब्रह्मलोकविदिश्युत्पद्यते स नियमात्पञ्चसमयया | गत्या ॥२॥ ऋचायतैकवका द्विधावक्रा च गतिविनिर्दिष्टा । युज्यते च नाम त्रिचतुर्वक्राऽपि चतुष्पश्चसमयतया ॥३॥ उपपाताभावान्न पश्चसमयाऽथवा सत्यपि यथा महद्वन्धे न चतुःसमयोक्ता तथा न भणिताऽल्पत्वादिना ॥४॥] 'अपज्जत्तावा|यरतेजकाहए ण'मित्यादी, 'दुसमइएण वा तिसमइएण वा विग्गहेणं उववजेजत्ति, एतस्पेयं भावना-समयक्षेत्रादे-12 केन समयेनोवं गतौ द्वितीयेन तु नाच्या वहिदिग्व्यवस्थितमुत्पत्तिस्थानमिति, तथा समयक्षेत्रादेकेनोद्धे याति द्वितीयेन तु नाझ्या बहिः पूर्वादिदिशि तृतीयेन तु विदिग्व्यवस्थितमुत्पत्तिस्थानमिति ॥ अथ लोकचरमान्तमाश्रित्याह-'अपज्जसासुहमपुदविकाइए णं भंते! लोगस्से'त्यादि, इह च लोकचरमान्ते बादराः पृथ्वीकायिकाकायिकतेजोवनस्पतयो न सन्ति सूक्ष्मास्तु पश्चापि सन्ति बादरवायुकायिकाश्चेति पर्याप्तापर्याप्तभेदेन द्वादश स्थानान्यनुसतव्यानीति, इह च लोकस्य पूर्वचरमान्तात्पूर्वचरमान्ते उत्पद्यमानस्यैकसमयादिका चतुःसमयान्ता गतिः संभवति, अनुश्रेणिविश्रेणिसम्भवात् , पूर्वचरमान्तात्पुनर्दक्षिणचरमान्ते उत्पद्यमानस्य व्यादिसामयिक्येव गतिरनुश्रेणेरभावात, एवमन्यत्रापि विश्रेणिगमन इति । एवमुत्पादमधिकृत्यैकेन्द्रियारूपणा कृता, अथ तेषामेव स्थानादिप्ररूपणायाह-कहिं ण'मित्यादि, 'सहाणेण'ति - - ~337 Page #338 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (०५) [भाग-११]"भगवती"-अंगसूत्र-५ (मूलं+वृत्ति:) शतक [३४], वर्ग [-], अंतर्-शतक [१], उद्देशक [१], मूलं [८५१] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र- [०५], अंगसूत्र- [०५] "भगवती मूलं एवं अभयदेवसूरि-रचिता वृत्ति: | स्वस्थानं यत्रास्ते बादरपृथिवीकायिकस्तेन स्वस्थानेन स्वस्थानमाश्नित्येत्यर्थः 'जहा ठाणपदे'त्ति स्थानपदं च प्रज्ञापनाया ३४ शतके प्रज्ञप्तिः ||द्वितीयं पदं, तच्च-'तंजहा-रयणप्पभाए सकरप्पभाए वालुयप्पभाए' इत्यादि, 'एगविह'त्ति एकप्रकारा एवं प्रकृत उद्दे.१अधः अभयदेवी-5 स्वस्थानादिविचारमधिकृत्यौषतः'अविसेसमणाणत्त'त्ति अविशेषाः-विशेषरहिता यथा पर्याप्तकास्तथैवेतरेऽपि 'अणाणत्त'त्ति | पृथ्व्यादीया वृत्तिः अनानात्वा:-नानात्ववर्जिताः येष्वेवाधारभूताकाशप्रदेशेष्वेके तेष्वेवेतरेऽपीत्यर्थः 'सबलोयपरियावन्न'त्ति उपपातसमु-18 नामू/॥९६१॥ | घातस्वस्थानः सर्वलोके वर्तन्त इति भावना, तत्रोपपात-उपपाताभिमुख्य समुद्धात इह मारणान्तिकादि स्वस्थान || दावुत्पाद तु यत्र ते आसते । समुद्घातसूत्रे 'वेउबियसमुग्धाए'त्ति यदुक्तं तद्वायुकायिकानाश्रित्येति ॥ एकेन्द्रियानेव भङ्गचन्तरेण सू.८५१ प्रतिपादयन्नाह-एगिदिया ण'मित्यादि, 'तुल्लहिइय'त्ति तुल्यस्थितिकाः परस्परापेक्षया समानायुष्का इत्यर्थः 'तुल्लवि-15 सेसाहियं कम्म पकरेंति'त्ति परस्परापेक्षया तुल्यत्वेन विशेषेण-असधेयभागादिनाऽधिकं-पूर्वकालबद्धकर्मापेक्षयाऽधि-ट्र कतरं तुल्यविशेषाधिकं 'कर्म' ज्ञानावरणादि 'प्रकुर्वन्ति' बन्नन्ति १ तथा तुल्यस्थितयः 'वेमायविसेसाहिय'ति वि-2 मात्रः-अन्योऽन्यापेक्षया विषमपरिमाणः कस्याप्येसपेयभागरूपोऽन्यस्य सङ्ग्येयभागरूपो यो विशेषस्तेनाधिकं पूर्वकाल-15 बद्धकर्मापेक्षया यत्तत्तथा २ तथा 'वेमायट्टिइय'त्ति विमात्रा-विषममात्रा स्थितिः-आयुर्येषां ते विमात्रस्थितयो | विषमायुष्का इत्यर्थः 'तुल्लविसेसाहिय'त्ति तथैव, एवं चतुर्थोऽपि, 'तत्थ णं जे ते'इत्यादि, 'समाज्या समोवव-| नगत्ति समस्थितयः समकमेवोत्पन्ना इत्यर्थः, एते च तुल्यस्थितयः समोत्पन्नत्वेन परस्परेण समानयोगत्वात्समानमेव ॥९६१॥ कर्म कुर्वन्ति, ते च पूर्वकर्मापेक्षया समं वा हीनं वाऽधिकं वा कर्म कुर्वन्ति, यद्यधिकं तदा विशेषाधिकमपि तच्च पर ~338~ Page #339 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (०५) [भाग-११]"भगवती"-अंगसूत्र-५ (मूलं+वृत्ति:) शतक [३४], वर्ग [-], अंतर्-शतक [१], उद्देशक [१], मूलं [८५१] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र- [०५], अंगसूत्र- [०५] "भगवती मूलं एवं अभयदेवसूरि-रचिता वृत्ति: SASHAIRIS*X | स्परतस्तुल्यविशेषाधिक न तु विशेषाधिकमेवेत्यत उच्यते तुल्यविशेषाधिकमिति, तथा ये समायुपो विषमोपपनकास्ते तुल्यस्थितयः विषमोपपन्नत्वेन च योगवैषम्याद्विमात्र विशेषाधिकं कर्म कुर्वन्तीति २, तथा ये विषमायुषः समोपपन्नकास्ते विमात्रस्थितयः समोत्पन्नत्वेन च समानयोगत्वात् तुल्यविशेषाधिकं कर्म कुर्वन्तीति ३, तथा ये विषमायुषो विषमोपपन्नकास्ते विमात्रस्थितयो विषमोत्पन्नत्वाच्च योगवैषम्येण विमात्र विशेषाधिकं कर्म कुर्वन्तीति ।। चतुर्विंशच्छते प्रथमः ॥३४॥१॥ अथ द्वितीयः, तत्र च काविहा णं भंते! अर्णतरोववनगा एगिदिया पन्नत्ता, गोयमा! पंचविहा अणंतरोवपन्नगा एगिदिया पन्नत्ता, तंजहा-पुढविकाइया दुयाभेदो जहा एगिदियसएसु जाव बायरवणस्सइकाइया य, कहिन्नं भंते! ४ अणंतरोववन्नगाणं वायरपुढविकाइयाणं ठाणा पन्नत्ता?, गोयमा! सहाणेणं अट्ठसु पुडवीसु, तं०-रयणप्प भाए जहा ठाणपदे जाव दीवेसु समुदेसु एत्थ णं अणंतरोववन्नगाणं वायरपुडविकाइयाणं ठाणा प०, उववा-2 एणं सबलोए समुग्धाएणं सबलोए सहाणेणं लोगस्स असंखेजइभागे, अणंतरोववन्नगसुहमपुढविकाइया एगविहा अविसेसमणाणत्ता सबलोए परियावन्ना पन्नत्ता समणाउसो', एवं एएणं कमेणं सच्चे एगिदिया भाणियबा, सट्ठाणाई सोर्सि जहा ठाणपदे तेसिं पज्जत्तगाणं वायराणं उबवायसमुग्घायसहाणाणि जहा तेर्सि चेव अपजत्तगाणं, बायराणं मुहमाणं सबेसि जहा पुढविकाइयाणं भणिया तहेव भाणियबा जाव वणस्सइकाइयत्ति । अणंतरोववन्नगासुहमपुढविकाइयाणं भंते! कइ कम्मप्पगडीओ प०१, गोयमा! अट्ट कम्मप्प 4%25ARCARE %-4 4 --8 8-9 अत्र चतुस्त्रिंशत्-शतके प्रथम-उद्देशक: परिसमाप्तं अथ चतुस्त्रिंशत्-शतके २-११ उद्देशका: आरब्धा: ~339~ Page #340 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (०५) [भाग-११]"भगवती"-अंगसूत्र-५ (मूलं+वृत्ति:) शतक [३४], वर्ग [-], अंतर्-शतक [१,२-१२], उद्देशक [२-११], मूलं [८५२-८५४] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र- [०५], अंगसूत्र- [०५] "भगवती मूलं एवं अभयदेवसूरि-रचिता वृत्ति: व्याख्या- गडीओ पन्नत्ताओ एवं जहा एगिदियसएसु अणंतरोबवन्नगउद्देसए तहेव पन्नत्ताओ तहेव बंधंति तहेव ३४ शतके वेदेति जाव अणंतरोचवन्नगा वायरवणस्सइकाइया । अणंतरोववन्नगएगिंदिया णं भंते! को उववजंति ?|| एकेन्द्रिय अभयदेवी- जहेच ओहिए उद्देसओ भणिओ तहेव । अणंतरोववन्नगएगिदियाणं भंते! कति समुग्धाया पन्नत्ता?, गोय- शतानि१२ या वृत्तिः२ दूमा! दोन्नि समुग्धाया प०, तं०-वेदणासमुग्घाए य कसायसमुग्घाए य । अर्णतरोववन्नगएगिदियाणं उद्दे०११सू ॥९६२॥ भंते। किंतुल्लहितीया तुल्लविसेसाहियं कम्मं पकरेंति ? पुच्छा तहेव, गोयमा अत्थेगइया तुल्ल द्वितीया तुल्ल-८५२-८५४ विसेसाहियं कम्मं पकरेंति अत्धेगइया तुल्लद्वितीया वेमायविसेसाहियं कम्मं पकरेंति, से केणटेणं जाव वेमायविसेसाहियं कम्मं पकरेंति', गोयमा! अणंतरोववन्नगा एगिंदिया दुविहा प००-अत्थेगइया समाउया समोववन्नगा अत्थेगइया समाउया विसमोववन्नगा तत्थ णं जे ते समाउया समोववन्नगा ते णं तुल्लद्वितीया तुल्लविसेसाहियं कम्मं पकरेंति तत्व णं जे ते समाउया विसमोववन्नगा ते णं तुल्लद्वितीया वेमायविसेसाहियं कम्म पकरेंति, से तेणद्वेणं जाव वेमायविसेसाहियं० पकरेंति । सेवं भंते! २त्ति ॥ (सूत्रं ८५२) ॥ ३४॥२॥ कहविहा णं भंते ! परंपरोववन्नगा एगिंदिया पन्नत्ता?, गोयमा! पंचविहा परंपरोववन्नगा एगिदिया प०, तं| पुढविकाइया भेदो चउकओ जाव वणस्सइकाइयत्ति । परंपरोवचन्नगअपज्जत्तमुहमपुदविकाइए णं भंते ! इमीसे रयणप्पभाए पुढवीए पुरच्छिमिल्ले चरिमंते समोहए २ जे भविए इमीसे रयणप्पभाए पुढवीए जाय ॥९६२॥ पञ्चच्छिमिल्ले चरिमंते अपजससुहुमपुढविकाइयत्ताए उवव० एवं एएणं अभिलावणं जहेब पढमो उद्देसओ ~340 Page #341 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (०५) [भाग-११]“भगवती”- अंगसूत्र -५ (मूलं + वृत्तिः) शतक [३४], वर्ग [-], अंतर् शतक [१, २- १२], उद्देशक [२-११], मूलं [८५२-८५४] पूज्य आगमोद्धारकश्री संशोधितः मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित.. आगमसूत्र - [०५] अंगसूत्र- [ ०५] "भगवती" मूलं एवं अभयदेवसूरि-रचिता वृत्तिः जाब लोगचरिमंतोति । कहिनं भंते! परंपरोववन्नगथायरपुढविकाइयाणं ठाणा प० १, गोयमा ! सहाणेणं अट्ठसु पुढवीस एवं एएणं अभिलावेणं जहा पढमे उद्देसए जाव तुल्लद्वितीयत्ति । सेवं भंते ! २ति ॥ ३४३ ॥ | एवं सेसावि अट्ठ उदेसगा जाब अचरमोत्ति, नवरं अनंतरा अणंतरसरिसा परंपरा परंपरसरिसा परमा य अचरमा य एवं चेव, एवं एते एकारस उद्देसगा || (सूत्रं ८५३ ) ||३४|४|| पढमं एगिंदियसेदीसयं सम्मतं ॥ कहविहा णं भंते! कण्हलेस्सा एगिंदिया प० १, गोयमा ! पंचविहा कण्हलेस्सा एगिंदिया प० भेदो चडकओ जहा कण्हलेस्सएगिंदिपसए जाव वणरसइकाइयत्ति । कण्ट्लेस्स अपजतासुमपुढविकाइए णं भंते! इमीसे रयणप्पभाए पुढवीए पुरच्छिमिल्ले एवं एएणं अभिलाषेणं जहेब ओहिउद्देसओ जाव लोगचरिमंतेत्ति सवत्थ कण्हलेस्सेसु चैव उववापपयो । कहिनं भंते! कण्हलेस अपजत्तवायरपुढविकाइयाणं ठाणा प० एवं एएणं अभिलावेणं जहा ओहिउद्देसओ जाव तुलट्टिश्यति । सेवं भंते । २ ति । एवं एएणं अभिलाषेणं जहेब पदमं | सेडिसयं तहेव एफारस उद्देसगा भाणियचा ३४-११ ॥ वितियं एगिंदियसेडिसयं सम्मतं ॥ एवं नीललेस्सेहिवि तइयं सयं । काउलेस्सेहिवि सयं, एवं चैव चत्थं सयं । भविसिद्धियएहिवि सयं पंचमं सम्मत्तं ॥ कहविहा णं भंते! अणंतरोववन्ना कण्हलेस्सा भवसिडिया एगिंदिया प० जहेब अनंत रोवबन्न उद्देसओ ओहिओ तहेव ॥ | कविद्दा णं भंते! परंपरोचवना कण्हलेस्सभवसिद्धिया एगिंदिया प०१, गोयमा ! पंचविहा परंपरोववन्ना कण्हले सभवसिद्धियए गिंदिया पं० ओहिओ भेदो चउकओ जाव वणरसइकाइयत्ति । परंपरोवयन्नकण्ट्लेस्स For Parts Only ~341~ Page #342 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (०५) [भाग-११]"भगवती"-अंगसूत्र-५ (मूलं+वृत्ति:) शतक [३४], वर्ग [-], अंतर्-शतक [१,२-१२], उद्देशक [२-११], मूलं [८५२-८५४] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र- [०५], अंगसूत्र- [०५] "भगवती मूलं एवं अभयदेवसूरि-रचिता वृत्ति: प्रज्ञप्तिः व्याख्या- भवसिद्धियअपजत्तमुहुमपुढविकाइए णं भंते! इमीसे रयणप्पभाए पुढवीए एवं एएणं अभिलावणं जहेव ||३४ शतके टू ओहिओ उद्देसओ जाच लोयचरमंतेत्ति, सव्वत्थ कण्हलेस्सेसु भवसिद्धिएम उववाएयद्यो । कहिन्नं भंते ! परंप-४ एकेन्द्रियअभयदेवी है रोववन्नकण्हलेस्स भवसिद्धियपज्जत्तवायरपुढविकाइयाणं ठाणा प० एवं एएणं अभिलावेणं जहेब ओहिओ शतानि१२ यावृत्ति:२| का उद्देसओ जाच तुल्लट्ठियत्ति, एवं एएणं अभिलावेणं कण्हलेस्सभवसिद्धियएगिदिएहिवि तहेव एक्कारस-IPLE ॥९६३॥ उद्देसगसंजुत्तं सतं, छटुं सतं सम्मत्तं ॥ नीललेस्सभवसिद्धियएगिदिएस सयं सत्तम सम्मत्तं । एवं काउले*सभवसिद्धियएगिदियेहिदि सयं अहम सयं । जहा भवसिद्धिएहिं चत्तारि सयाणि एवं अभवसिद्धिएहिविर चत्तारि सयाणि भाणियवाणि, नवरं चरमअचरमवजा नव उद्देसगा भाणियबा, सेसं तं चेच, एवं एयाई वारस एगिदियसेढीसयाई । सेवं भंते !२त्ति जाब विहरइ ।। (सूत्रं ८५४) एगिदियसेढीसयाई सम्मत्ताई। * एगिदियसेढिसयं चउतीसइमं सम्मत्तं ॥ ३४ ॥ 'दुयाभेदो'त्ति, अनन्तरोपपनैकेन्द्रियाधिकारादनन्तरोपपन्नानां च पर्याप्तकत्वाभावादपर्याप्तकानां सतां सूक्ष्मा बादरा ति द्विपदो भेदः, 'उववाएणं सबलोए समुग्घाएणं सवलोएत्ति, कथम्, 'उपपातेन' उपपाताभिमुख्येनापान्त-13 दरालगतिवृत्त्येत्यर्थः समुद्घातेन-मारणान्तिकेनेति, ते हि ताभ्यामतिबहुत्वात्सर्वलोकमपि व्याप्य वर्तन्ते, इह चैर्वभूतया , स्थापनया भावना कार्या- अत्र च प्रथमवर्क यदैवैके संहरन्ति तदैव तद्वक्रदेशमध्ये पूरयन्ति, एवं द्वितीयवक्र-1 "९५६॥ || संहरणेऽपि अवकोत्पत्तावपि प्रवाहतो भावनीयम्, अनन्तरोपपन्नकत्वं चेह भाविभवापेक्षं ग्राह्यमपान्तराले ||४|| ~342 Page #343 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (०५) [भाग-११]"भगवती"-अंगसूत्र-५ (मूलं+वृत्ति:) शतक [३४], वर्ग [-], अंतर्-शतक [१,२-१२], उद्देशक [२-११], मूलं [८५२-८५४] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र- [०५], अंगसूत्र- [०५] "भगवती मूलं एवं अभयदेवसूरि-रचिता वृत्ति: CRORSHIMGAR | तस्य साक्षादभावात् , मारणान्तिकसमुद्घातश्च प्राक्कनभवापेक्षयाऽनन्तरोपपनकावस्थायां तस्यासम्भवादिति । 'सहाणे लोगस्स असंखेनइभागे'त्ति, रत्नप्रभादिपृथिवीना विमानानां च लोकस्यासंख्येयभागवर्तित्वात् , पृथिव्यादीनां च । पृथिवीकायिकानां स्वस्थानत्वादिति, 'सद्वाणाई सोर्सि जहा ठाणपए तेर्सि पजत्तगाणं बापराण'ति, इह तेषा-13 है मिति पृथिवीकायिकादीनां, स्वस्थानानि चैवं बादरपृथिवीकायिकानां 'अट्ठसु पुढवीसु तंजहा-रयणप्पभाए' इत्यादि, बादराकायिकानां तु 'सत्तसु घणोदहीसु' इत्यादि, बादरतेजस्कायिकानां तु 'अंतोमणुस्सखेत्ते इत्यादि, बादरवायुकायि8 कानां पुनः 'सत्तसु घणवायवलएसु'इत्यादि, बादरवनस्पतीनां तु 'सत्तसु घणोदहीसुइत्यादि । 'उबवायसमुग्घायस डाणाणि जहा तेसिं चेव अपज्जत्तगाणं बायराणीति, इह 'तेसिं चेव'त्ति पृथिवीकायिकादीनां, तानि चैवं-'जत्थेव बायरपुढविकाइयाणं पजत्तगाणं ठाणा तत्थेव वायरपुढविकाइयाणं अपज्जत्तगाणं ठाणा पन्नत्ता उववाएणं सबलोए समुग्घा-2 एणं सबलोए सट्ठाणेणं लोगस्स असंखेजइभागे इत्यादि, समुद्घातसूत्रे-'दोन्नि समुग्घाय'त्ति, अनन्तरोपपन्नत्वेन मार-8 है णान्तिकादिसमुद्घातानामसम्भवादिति ॥ 'अणंतरोववन्नगएगिदिया णं भंते! किं तुल्लटिईए इत्यादौ, 'जे ते समाज्या समोववन्नगा ते णं तुल्लट्ठिईया तुल्लविसेसाहियं कम्मं पकरेति'त्ति ये समायुषः अनन्तरोपपन्नकत्वप४|| योयमाश्रित्य समयमात्रस्थितिकास्तत्परतः परम्परोपपन्नकव्यपदेशात् समोपपन्नकाः एकत्रैव समये उत्पत्तिस्थान प्राप्तास्ते || तुल्यस्थितयः समोपपन्नकत्वेन समयोगत्वात् तुल्यविशेषाधिक कर्म प्रकुर्वन्ति तत्थ णं जे ते समाउया विसमोववन्नगा ते जाणं तुलढिइया घेमायविसेसाहियं कम्म पकरेंतित्ति ये तु समायुषस्तथैव विषमोपपन्नका विग्रहगत्या समयादिभेदेनोत्पत्ति SAKESARKARS ~343 Page #344 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (०५) [भाग-११]“भगवती”- अंगसूत्र -५ (मूलं + वृत्तिः) शतक [३४], वर्ग [-], अंतर् शतक [१, २- १२], उद्देशक [२-११], मूलं [८५२-८५४] पूज्य आगमोद्धारकश्री संशोधितः मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित.. आगमसूत्र - [०५] अंगसूत्र- [ ०५] "भगवती" मूलं एवं अभयदेवसूरि-रचिता वृत्तिः व्याख्याप्रज्ञप्तिः अभयदेवीया वृत्तिः २ ॥ ९६४ ॥ स्थानं प्राप्तास्ते तुल्यस्थितयः आयुष्कोदयवैषम्येणोत्पत्तिस्थानप्राप्ति काल वैषम्यात् विग्रहेऽपि च बन्धकत्वाद् विमात्रवि शेषाधिकं कर्म्म प्रकुर्वन्ति, विषमस्थितिकसम्बन्धि त्वन्तिमभङ्गद्वयमनन्तरोपपन्नकानां न संभवत्यनन्तरोपपनकत्वे विषमस्थितेरभावात् एतच्च गमनिकामात्रमेवेति शेषं सूत्रसिद्धं, नवरं 'सेडिसयं'ति ऋश्वायतश्रेणीप्रधानं शतं श्रेणीशतमिति ॥ चतुस्त्रिंशं शतं वृत्तितः समाप्तम् ॥ ३४ ॥ cre यद्गीर्दीपशिखेव खण्डिततमा गम्भीरगेहोपमग्रन्थार्थप्रचय प्रकाशनपरा सदृष्टिमोदावहा । तेषां ज्ञप्तिविनिर्जितामरगुरुप्रज्ञाश्रियां श्रेयसां सूरीणामनुभावतः शतमिदं व्याख्यातमेवं मया ॥ १ ॥ चतुस्त्रिंशशते एकेन्द्रियाः श्रेणीप्रक्रमेण प्रायः प्ररूपिताः, पञ्चत्रिंशे तु त एव राशिप्रक्रमेण प्ररूप्यन्ते इत्येवंसम्बन्ध| स्यास्य द्वादशावान्तरशतस्येदमादिसूत्रम्- कणं भंते! महाजुम्मा पन्नता ? गोयमा ! सोलस महाजुम्मा पं तं०- कडजुम्मकडजुम्मे १ कडजुम्मतेओगे २ कडजुम्मदावरजुम्मे ३ कडजुम्भक लियोगे ४ तेओगकटजुम्मे ५ तेओगतेओगे ६ तेओगदावरजुम्मे ७ तेओगकलिओए ८ दावरजुम्मकडजुम्मे ९ दावरजुम्मतेओए १० दावरजुम्मदावरजुम्मे ११ दावरजुम्मकलियोगे १२ कलि ओगकडजुम्मे १३ कलियोगतेओगे १४ कलियोगदावर जुम्मे १५ कलियोगकलिओगे १६, से केणद्वेणं भंते! एवं बुचइ सोलस महाजुम्मा प० सं०- कडजुम्मकडजुम्मे जाव कलियोगकलियोगे ?, गोयमा । जेणं For Penal Use On अत्र चतुस्त्रिंशत्-शतके १-१२ अन्तर् शतकानि सउद्देशका: परिसमाप्ताः अथ पञ्चत्रिंशक - शतकं आरभ्यते | अथ पञ्चत्रिंशके शतके प्रथम अंतरशतकं आरब्धः, तद् अन्तर्गत् उद्देशका: १ से ११ अपि वर्तते ~ 344~ ३५ शतके महायुग्मा सू० ८५५ ॥ ९६४ ॥ wor Page #345 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (०५) [भाग-११]"भगवती"-अंगसूत्र-५ (मूलं+वृत्ति:) शतक [३५], वर्ग [-], अंतर्-शतक [१], उद्देशक [१], मूलं [८५५] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र- [०५], अंगसूत्र- [०५] "भगवती मूलं एवं अभयदेवसूरि-रचिता वृत्ति: रासी चउक्कएणं अवहारेणं अवहीरमाणे चउपज्जवसिए जे णं तस्स रासिस्स अवहारसमया तेऽवि कडजुम्मा सेत्तं कडजुम्मकडजुम्मे, जेणे रासी चउक्कएणं अवहारेणं अवहीरमाणे तिपज्जवसिए जे णं तस्स रासिस्स अवहारसमया कडजुम्मा सेत्तं कडजुम्मतेयोए २, जे णं रासी चउक्कएणं अवहारेणं अवहीरमाणे दुपज्जवसिए |जे णं तस्स रासिस्स अवहारसमया कडझुम्मा सेत्तं कडजुम्मदावरजुम्मे ३ जे णं रासीचउक्कएणं अवहारेणं अबहीरमाणे एगपज्जवसिए जेणं तस्स रासिस्स अवहारसमया कडजुम्मा सेत्तं कडजुम्मकलियोगे ४ जेणं रासीचउकएणं अवहारेणं अवहीरमाणे चउपजवसिए जेणं तस्स रासिस्स अवहारसमया तेयोगा सेत्तंडू तेओगकहजुम्मे १ जेणं रासी चउक्कएणं अवहारेणं अवहीरमाणे तिपज्जवसिए जे णं तस्स रासिस्स अवहारसमया तेओगा सेत्तं तेओगतेओगे २ जे णं रासी चउक्कएणं अवहारेणं अबहीरमाणे दोपज्जवसिए जेणं तस्स रासिस्स अवहारसमया तेयोया से तेओयदावरजुम्मे ३ जे णं रासी चउकएणं अवहारेणं अवहीर-IX माणे एगपज्जवसिए जे णं तस्स रासिस्स अवहारसमया तेओया सेत्तं तेयोयकलियोगे ४ । जे गं रासी चउकरणं अवहारेणं अवहीरमाणे चउपज्जवसिए जे णं तस्स रासिस्स अवहारसमया दावरजुम्मा सेत्तं दावरजु-12 म्मकडजुम्मे १ जे णं रासी चउक्कएणं अवहारेणं अवहीरमाणे तिपजवसिए जे णं तस्स रासिस्स अवहारस-| *मया दावरजुम्मा सेत्तं दावरजुम्मतयोए २जे णं रासी चउकएणं अवहारेणं अबहीरमाणे दुपज्जवसिए जे थे। तस्स रासिस्स अवहारसमया दावरजुम्मा सेत्तं दाघरजुम्मदावरजुम्मे ३ जे णं रासी चउकएणं अपहारेणं ~345 Page #346 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (०५) [भाग-११]"भगवती"-अंगसूत्र-५ (मूलं+वृत्ति:) शतक [३५], वर्ग [-], अंतर्-शतक [१], उद्देशक [१], मूलं [८५५] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र- [०५], अंगसूत्र- [०५] "भगवती मूलं एवं अभयदेवसूरि-रचिता वृत्ति: व्याख्या- अवहीरमाणे एगपज्जवसिए जे णं तस्स रासिस्स अवहारसमया दावरजुम्मा सेत्तं दावरजुम्मकलियोए ४,८३५ शतके अज्ञप्तिःजे णं रासी चउकएणं अवहारेणं अबहीरमाणे चउपज्जवसिए जेणं तस्स रासिस्स अवहारसमया कलियोगा महायुग्मा अभयदेवी- सेत्तं कलिओगकडजुम्मे १ जेणं रासी चउकएणं अवहारेणं अवहीरमाणे तिपजवसिए जेणं तस्स रासिस्स सू०८५५ या वृत्तिा है अवहारसमया कलियोगा सेत्तं कलियोगतेयोए २ जे णं रासी चक्कएणं अवहारेणं अवहीरमाणे दुपज्जवसिए जे णं तस्स रासिस्स अवहारसमया कलियोगा सेत्तं कलियोगदावरजुम्मे ३ जे णं रासी चउक्कएणं अवहारेणं । ॥९६५॥ अवहीरमाणे एगपज्जवसिए जे णं तस्स रासिस्स अवहारसमया कलियोगा सेत्तं कलियोगकलिओगे ४,8 से तेणटेणं जाव कलिओगकलिओगे ॥ (सूत्रं ८५५)॥ | 'कह गं भंते 'इत्यादि, इह युग्मशब्देन राशिविशेषा उच्यन्ते ते च क्षुल्लका अपि भवन्ति यथा प्राक् प्ररूपिताः अत४ स्तब्यवच्छेदाय विशेषणमुच्यते महान्ति च तानि युग्मानि च महायुग्मानि, 'कडजुम्मकडजुम्मे'त्ति यो राशिः सामयि-5|| द केन चतुष्कापहारेणापहियमाणश्चतुष्पर्यवसितो भवति अपहारसमया अपि चतुष्कापहारेण चतुष्पर्यवसिता एव असी || राशिः कृतयुग्मकृतयुग्म इत्यभिधीयते, अपहियमाणद्रव्यापेक्षया तत्समयापेक्षया चेति द्विधा कृतयुग्मत्वात्, एवमन्यत्रापि, 18|| शब्दार्थो योजनीयः, स च किल जघन्यतः षोडशात्मकः, एषां हि चतुष्कापहारतश्चतुरनत्वात् , समयानां च चतुःसङ्ख्यत्वा दिति १, 'कडजुम्मतेओए'त्ति, यो राशिः प्रतिसमयं चतुष्कापहारेणापहियमाणस्त्रिपर्यवसानो भवति तत्समयाश्चतु-I||॥९६५॥ पर्यवसिता एवासावपहियमाणापेक्षया योजः अपहारसमयापेक्षया तु कृतयुग्म एवेति कृतयुग्मयोज इत्युच्यते, तच्च ASHAGANAGAGES ~346 Page #347 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (०५) [भाग-११]"भगवती"-अंगसूत्र-५ (मूलं+वृत्ति:) शतक [३५], वर्ग [-], अंतर्-शतक [१], उद्देशक [१], मूलं [८५५] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र- [०५], अंगसूत्र- [०५] "भगवती मूलं एवं अभयदेवसूरि-रचिता वृत्ति: C AKACEAESCRECOR जघन्यत एकोनविंशतिः, तत्र हि चतुष्कापहारे त्रयोऽवशिष्यन्ते तत्समयाश्चत्वार एवेति २, एवं राशिभेदसूत्राणि तद्विद वरणसूत्रेभ्योऽवसेयानि, इह च सर्वत्राप्यपहारकसमयापेक्षमाद्यं पदं अपह्रियमाण द्रव्यापेक्षं तु द्वितीयमिति, इह च तृती यादारभ्योदाहरणानि-कृतयुग्मद्वापरे राशावष्टादशादयः, कृतयुग्मकल्योजे सप्तदशादयः योजःकृतयुग्मे द्वादशादयः, ४ एषां हि चतुष्कापहारे चतुरप्रत्वात्तत्समयानां च त्रित्वादिति, व्योजच्योजराशौ तु पञ्चदशादयः योजद्वापरे तु चतुर्दहै शादयः त्र्योजकल्योजे त्रयोदशादयः द्वापरकृतयुग्मेऽष्टादयः द्वापरयोजराशावेकादशादयः द्वापरद्वापरे दशादयः द्वाप रकल्योजे नवादयः कल्योजकृतयुग्मे चतुरादयः कल्योजत्र्योजराशौ सप्तादयः कल्योजद्वापरे षडादयः कल्योजक४ योजे तु पश्चादय इति ।। है करजुम्मकडजुम्मएगिदियाणं भंते! कओ उववज्जति किं नेरहिएहिंतो जहा उप्पलु देसए तहा उवचाओ। ते गं भंते! जीवा एगसमएणं केवइया उववर्जति?, गोयमा! सोलस वा संखेजा वा असंखेज्जा वा अणता वा उववजंति, ते णं भंते! जीवा समए समए पुच्छा, गोयमा! ते णं अणंता समए समए अवहीरमाणा २ अणंताहिं उस्सप्पिणीअवसप्पिणीहिं अवहीरंति णो चेव णं अवहरिया सिया, उच्चत्तं जहा उप्पलुद्देसए ते णं भंते! जीवा नाणावरणिजस्स कम्मरस किं बंधगा अबंधगा?, गोयमा! बंधगा नो अबंधगा एवं सवेसिं* आउयवजाणं, आउयस्स बंधगा वा अबंधगा बा, ते णं भंते! जीवा नाणावरणिजस्स पुच्छा, गोयमा | वेदगा नो अवेदगा, एवं सबेसि, ते णं भंते! जीवा किं सातावेगा असातावेदगा? पुच्छा, गोयमा ~347 Page #348 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (०५) [भाग-११]"भगवती"-अंगसूत्र-५ (मूलं+वृत्ति:) शतक [३५], वर्ग [-], अंतर्-शतक [१], उद्देशक [१], मूलं [८५६] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र- [०५], अंगसूत्र- [०५] "भगवती मूलं एवं अभयदेवसूरि-रचिता वृत्ति: - - - ID उपट्टणा जहा उप्पलुद्देसए, अह भंते! सबपाणा जाव सबसत्ता कडजुम्मरएगिदियत्ताए उवयन्नपचा?. | हंता गोयमा! असई अदुवा अणंतखुत्तो, कडजुम्मतेओयएगिदिया णं भंते! कओ उवचज्जति ?. उचचाओ। | तहेब, तेणं भंते ! जीवा एगसमए पुच्छा,गोयमा! एकूणवीसावा संखेजावा असंखेज्जा वा अणंता वा उववज्जति. सेसं जहा कडजुम्मकडजुम्मार्ण जाव अणंतखुत्तो, कडजुम्मदावरजुम्मएगिदिया णं भंते! कओहिंतो उवच-15 जति?, उववाओ तहेच, ते णं भंते! जीवा एगसमएणं पुच्छा, गोयमा! अट्ठारस वा संखेजा या असंखेजार वा अर्णता वा उवव० सेसं तहेव जाव अर्णतखुत्तो, कडजुम्मकलियोगएगिदिया णं भंते ! को उबव० उववाओ तहेव परिमाणं सत्तरस वा संखेजा वा असंखेजा वा अणंता वा सेसं तहेव जाव अणंतखुत्तो, तेयो-15 मकडजुम्मएगिदिया णं भंते ! को उबव०?, उववाओ तहेव परिमाणं बारस वा संखेवा वा असंखेज्जा वा है अणंता वा उवव० सेसं तहेव जाव अणंतखुत्तो, तेयोयतेयोयएगिदिया णं भंते! कओ उवव०१, उववाओ। तहेव परिमाणं पन्नरस वा संखेजा वा असंखेजा वा अणंता वा सेसं तहेव जाव अणंतखुत्तो, एवं एएमु सोलससु महाजुम्मेसु एको गमओ नवरं परिमाणे नाणतं तेयोपदावरजुम्मेसु परिमाणं चोइस वा संखेज्जा वा असंखेवा वा अणंता चा उववनति तेयोगकलियोगेसुतेरस वा संखेजा वा असंखेजा वा अर्णता वा उवव. दावरजुम्मकडजुम्मेसु अट्ट वा संखेजा वा असंखेज्जा वा अणंता वा उववखंति दावरजुम्मतयोगेसुःएकारस 18वा संखेजा वा असंखेजा था अणंता वा उववनंति दावरजुम्मदावरजुम्मेसु दस वा संखेजा वा असंखेजा वा SACROCOCCASRACKAGALO - - - ~348~ Page #349 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (०५) [भाग-११]"भगवती"-अंगसूत्र-५ (मूलं+वृत्ति:) शतक [३५], वर्ग [-], अंतर्-शतक [१], उद्देशक [१], मूलं [८५६] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र- [०५], अंगसूत्र- [०५] "भगवती मूलं एवं अभयदेवसूरि-रचिता वृत्ति: - - - ID उपट्टणा जहा उप्पलुद्देसए, अह भंते! सबपाणा जाव सबसत्ता कडजुम्मरएगिदियत्ताए उवयन्नपचा?. | हंता गोयमा! असई अदुवा अणंतखुत्तो, कडजुम्मतेओयएगिदिया णं भंते! कओ उवचज्जति ?. उचचाओ। | तहेब, तेणं भंते ! जीवा एगसमए पुच्छा,गोयमा! एकूणवीसावा संखेजावा असंखेज्जा वा अणंता वा उववज्जति. सेसं जहा कडजुम्मकडजुम्मार्ण जाव अणंतखुत्तो, कडजुम्मदावरजुम्मएगिदिया णं भंते! कओहिंतो उवच-15 जति?, उववाओ तहेच, ते णं भंते! जीवा एगसमएणं पुच्छा, गोयमा! अट्ठारस वा संखेजा या असंखेजार वा अर्णता वा उवव० सेसं तहेव जाव अर्णतखुत्तो, कडजुम्मकलियोगएगिदिया णं भंते ! को उबव० उववाओ तहेव परिमाणं सत्तरस वा संखेजा वा असंखेजा वा अणंता वा सेसं तहेव जाव अणंतखुत्तो, तेयो-15 मकडजुम्मएगिदिया णं भंते ! को उबव०?, उववाओ तहेव परिमाणं बारस वा संखेवा वा असंखेज्जा वा है अणंता वा उवव० सेसं तहेव जाव अणंतखुत्तो, तेयोयतेयोयएगिदिया णं भंते! कओ उवव०१, उववाओ। तहेव परिमाणं पन्नरस वा संखेजा वा असंखेजा वा अणंता वा सेसं तहेव जाव अणंतखुत्तो, एवं एएमु सोलससु महाजुम्मेसु एको गमओ नवरं परिमाणे नाणतं तेयोपदावरजुम्मेसु परिमाणं चोइस वा संखेज्जा वा असंखेवा वा अणंता चा उववनति तेयोगकलियोगेसुतेरस वा संखेजा वा असंखेजा वा अर्णता वा उवव. दावरजुम्मकडजुम्मेसु अट्ट वा संखेजा वा असंखेज्जा वा अणंता वा उववखंति दावरजुम्मतयोगेसुःएकारस 18वा संखेजा वा असंखेजा था अणंता वा उववनंति दावरजुम्मदावरजुम्मेसु दस वा संखेजा वा असंखेजा वा SACROCOCCASRACKAGALO - - - ~349 Page #350 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (०५) [भाग-११]"भगवती"-अंगसूत्र-५ (मूलं+वृत्ति:) शतक [३५], वर्ग -], अंतर्-शतक [१], उद्देशक [१], मूलं [८५६] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र- [०५], अंगसूत्र- [०५] "भगवती मूलं एवं अभयदेवसूरि-रचिता वृत्ति: ३५ शतक उद्दे.. एकेन्द्रियाः सू.८५६ व्याख्या-5 अणंता वा दावरजुम्मकलियोगेसु नव वा संखेजा वा असंखेज्जा वा अनंता वा उवव० कलियोगकडजुम्मे प्रज्ञप्तिः चत्तारि वा संखेना वा असंखेजा वा अणंता वा उवव० कलियोगतयोगेसु सत्त वा संखेजा वा असंखेजा अभयदेवी वा अणंता वा उवव० कलियोगदावरजुम्मेसु छ वा संखे० असंखेज्जा वा अणंता वा उवध. कलियोगकलि- या वृत्तिाादायोगएगिदिया णं भंते! कओ उवव०१, उववाओ तहेव परिमाणं पंच वा संखेजा वा असंखेजा वा अर्णता ॥९६७॥ वा उववजंति सेसं तहेव जाच अर्णतखुत्तो । सेवं भंते! सेवं भंते! सि ॥(सूत्रं ८५६) ॥ ३५॥ पण तीसइमे पढ़मो उद्देसो ॥ 'कडजुम्मकडजुम्मएगिदिय'त्ति, ये एकेन्द्रियाश्चतुष्कापहारे चतुष्पर्यवसिता यदपहारसमयाश्चतुष्पर्यवसानास्ते कृतयुग्मकृतयुग्मैकेन्द्रिया इत्येवं सर्वत्रेति । 'जहा उप्पलुद्देसएत्ति उत्पलोद्देशकः-एकादशशते प्रथमः, इह च यत्र कचि| पदे उत्पलोद्देशकातिदेशः क्रियते तत्तत एवावधार्य, 'संवेहो न भन्नईत्ति, उत्पलोद्देशके उत्पलजीवस्योत्पादो विव-| क्षितस्तत्र च पृथिवीकायिकादिकायान्तरापेक्षया संवेधः संभवति इह त्वेकेन्द्रियाणां कृतयुग्मकृतयुग्मविशेषणानामुत्पादोऽधिकृतस्ते च वस्तुतोऽनन्ता एवोत्पद्यन्ते तेषां चोद्वत्तेरसम्भवासंबंधो न संभवति, यश्च षोडशादीनामेकेन्द्रियेपूत्पादोऽभिहितोऽसौ त्रसकायिकेभ्यो ये तेषूत्पद्यन्ते तदपेक्ष एव न पुनः पारमार्थिकः अनन्तानां प्रतिसमयं तेपुत्पादादिति ॥ | पञ्चत्रिंशशते प्रथमः॥३५॥१॥ अथ द्वितीयस्तत्र च 2 ॥९६७॥ -2 अत्र ३५-शतके प्रथम-अन्तरशतके प्रथम-उद्देशक: परिसमाप्तं अथ ३५-शतके प्रथम-अन्तरशतके २-११ उद्देशका: आरब्धा: ~350 Page #351 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (०५) [भाग-११]“भगवती”- अंगसूत्र -५ (मूलं + वृत्तिः) शतक [३५], वर्ग [-], अंतर् शतक [१], उद्देशक [२-११], मूलं [८५७-८५८] पूज्य आगमोद्धारकश्री संशोधितः मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित.. आगमसूत्र - [०५] अंगसूत्र- [ ०५] "भगवती" मूलं एवं अभयदेवसूरि-रचिता वृत्तिः पढमसमयकडजुम्म २एगिंदिया णं भंते! कओ उबवजंति ?, गोयमा ! तहेव एवं जहेव पदमो उद्देसओ तहेव सोलसखुत्तो वितिओषि भाणियहो, तहेब सर्व, नवरं इमाणि य दस नाणत्ताणि ओगाहणा जहणं अंगुलस्स असंखेजइभागं उक्कोसेणवि अंगुलस्स असंखेजह० आउयकम्मस्स नो बंधगा अबंधगा आउयस्स नो उदीरगा अणुदीरगा नो उस्सासगा नो निस्सासगा नो उस्सासनिस्सासगा सत्तविहबंधगा नो अट्ठविहबंधगा, ते णं भंते! पढमसमयकडजुम्म २एगिंदियत्ति कालओ केवचिरं होइ ?, गोयमा ! एकं समयं, एवं ठितीएवि, समुग्धाया आदिला दोन्नि, समोहया न पुच्छिति उवहणा न पुच्छिज्जइ, सेसं तहेब सर्व्वं निरवसेसं, सोलमुवि गमएसु जाव अनंतखुत्तो। सेवं भंते । २त्ति (सूत्रं ८५७) ।। ३५/२ ॥ अपढ़मसमयकडजुम्म २एगिंदियाणं भंते! कओ उववजंति ?, एसो जहा पढमुद्देसो सोलसहिवि जुम्मेसु तहेव नेयवो जाब कलियोगकलियोगत्ताए जाव अनंतखुत्तो । सेवं भंते । २ति ॥ ३५३३ || चरमसमयकडजुम्म २एगिंदिया णं भंते! कओहिंतो उवचजंति ?, एवं जहेव परमसमयउद्देसओ नवरं देवा न उबवजंति तेउलेस्सा न पुच्छिजति, सेसं तहेव । सेवं भंते! सेवं भंतेति ॥ ३५४ ॥ अचरम समयकडजुम्म २एगिंदिया णं भंते! कओ उबवजति जहा अपढमसमयउद्देसो तहेव निरवसेसो भाणियो । सेवं भंते! २ ति ॥ ३५१५ || पढमसमयकडजुम्मकडजुम्मएगिंदिया णं भंते! कओहिंतो उववजंति ?, जहा पढमसमयउद्देसओ तदेव निरवसेसं । सेवं भंते! २त्ति जाव विहरह ॥ ३५६ ॥ पढमअपढमसमयकडजुम्म २ एगिंदिया णं भंते! कओ उडव can Internationa For Parks Use Only ~351~ wor Page #352 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (०५) [भाग-११]"भगवती"-अंगसूत्र-५ (मूलं+वृत्ति:) शतक [३५], वर्ग [-], अंतर्-शतक [१], उद्देशक [२-११], मूलं [८५७-८५८] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र- [०५], अंगसूत्र- [०५] "भगवती मूलं एवं अभयदेवसूरि-रचिता वृत्ति: जहाायाधके व्याख्या- जंति? जहा पढमसमयउद्देसो तहेव भाणियो । सेवं भंते!२त्ति ॥ ३५॥७॥ पढमचरमसमयकडजुम्म २ | ३५ शतके प्रज्ञप्तिः एगिदिया णं भंते! कओ उववज्जति?, जहा चरमुद्देसओ तहेव निरवसेसं । सेवं भंते! २त्ति ॥ ३५॥८॥ उद्दे अभयदेवी-18 पढमअचरमसमयकबजुम्मरएगिदिया णं भंते! कओ उवव., जहा बीओ उद्देसओ तहेव निरवसेसं। प्रथमसमया वृत्तिःRG सेवं भंते!२ति जाव विहरद ॥ ३५॥९॥ चरमरसमयकडजुम्मरएगिदिया णं भंते! कओ उवव०१, जहा चउत्थो उद्देसओ तहेव ? सेवं भंते सेवं भंते ! त्ति ॥३५॥१०॥ चरमअचरमसमयकडजुम्मरएगिदिया णं भंते। न्द्रियाःसू ॥९६८॥ कओ उवव०१, जहा पढमसमयउद्देसओ तहेव निरवसेसं । सेवं भंते ! २ जाब विहरति ॥३५॥११॥ एवं एए १८५७-८५८ एकारस उद्देसगा, पढमो ततिओ पंचमओ य सरिसगमा सेसा अट्ट सरिसगमगा, नवरं चउत्थे छठे अट्ठमे दसमे य देवा न उवचजंति तेउलेस्सा नत्थि॥३५॥ (सूत्र ८५८)। पढम एगिदियमहाजुम्मसर्य सम्मतं ॥१॥ | 'पढमसमयकडजुम्मरएगिदिय'त्ति, एकेन्द्रियत्वेनोत्पत्तौ प्रथमः समयो येषां ते तथा ते च ते कृतयुग्मकृतयुग्माश्चेति प्रथमसमयकृतयुग्मकृतयुग्मास्ते च ते एकेन्द्रियाश्चेति समासोऽतस्ते 'सोलसखुत्तो'त्ति पोडशकृत्वः-पूर्वोतान् पोडश राशिभेदानाश्रित्येत्यर्थः, 'नाणत्ताई'ति पूर्वोक्तस्य विलक्षणत्वस्थानानि, ये पूर्वोक्ता भावास्ते केचित् प्रथमसमयोत्पन्नानां न संभवन्तीतिकृत्वा, तत्रावगाहनाघोद्देशके बादरवनस्पत्यपेक्षया महत्युक्ताऽभूत् इह तु प्रथमसमयोत्पनत्वेन साऽल्पेति नानात्वम् , एवमन्यान्यपि स्वधियोह्यानीति॥ पंचत्रिंशे शते द्वितीयः ॥ ३५॥२ ॥ तृतीयोद्देशके तु ॥९६८॥ 'अपढमसमयकडजुम्मरएगिदिय'त्ति, इहाप्रथमः समयो येषामेकेन्द्रियत्वेनोत्पन्नानां यादयः समयाः, विग्रहश्च । MANACACACAX ~352 Page #353 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (०५) [भाग-११]"भगवती"-अंगसूत्र-५ (मूलं+वृत्ति:) शतक [३५], वर्ग [-], अंतर्-शतक [१], उद्देशक [२-११], मूलं [८५७-८५८] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र- [०५], अंगसूत्र- [०५] "भगवती मूलं एवं अभयदेवसूरि-रचिता वृत्ति: AAAAAAACSC | पूर्ववत्, एते च यथा सामान्येनैकेन्द्रियास्त या भवन्तीत्यत एवो कम्-'एसो जहा पदमुद्देसो'इत्यादीति ॥ चतुर्थे तु'चरमसमयकडजुम्मरएगिदिय'त्ति, इह चरमसमयशब्देनैकेन्द्रियाणां मरणसमयो विवक्षितः स च परभवायुषः प्रथमसमय एव तत्र च वर्तमानाश्चरमसमयाः सङ्ख्यया च कृतयुग्मकृतयुग्मा ये एकेन्द्रियास्ते तथा 'एवं जहा पढमसम| यउद्देसओ'त्ति यथा प्रथमसमय एकेन्द्रियोद्देशकस्तथा चरमसमयएकेन्द्रियोदेशकोऽपि याच्या, तत्र हि औधिकोदे|शकापेक्षया दश नानात्वान्युक्तानि इहापि तानि तथैव समानस्वरूपत्वात्, प्रथमसमयचरमसमयानां यः पुनरिह विशेपस्त दर्शयितुमाह-'नवरं देवा न उववजंती'त्यादि, देवोत्पादेनैवैकेन्द्रियेषु तेजोलेश्या भवति न चेह देवोत्पादः सम्भवतीति तेजोलेश्या एकेन्द्रिया न पृच्छयन्त इति ॥ ३५१४ ॥ पंचमे तु-'अचरमसमयकडजुम्मरएगिदिय'त्ति | न विद्यते चरमसमय उक्तलक्षणो येषां तेऽचरमसमयास्ते च ते कृतयुग्मकृतयुग्मैकेन्द्रियाश्चेति समासः ॥५॥ षष्ठे तु-'पढमपढमसमयकडजुम्मरएगिदिय'त्ति, एकेन्द्रियोत्पादस्य प्रथमसमययोगाचे प्रथमाः प्रथमश्च समय: कृतयुग्मकृतयुग्मत्वानुभूतेर्येषामेकेन्द्रियाणां ते प्रथमप्रथमसमयकृतयुग्मकृतयुग्मकेन्द्रियाः ॥६॥ सप्तमे तु-'पढमअपढमसमयकडजुम्मरएगिदिय'त्ति, प्रथमास्तथैव येऽप्रथमश्च समयः कृतयुग्मकृतयुग्मत्वानुभूतेर्येषामे के न्द्रियाणां ते प्रधमाप्रथमसमयकृतयुग्मकृतयुग्मैकेन्द्रियाः, इह चैकेन्द्रियत्वोसादप्रथमसनयवर्तित्वे तेषां यद्विवक्षितसयानुभूतेरप्रथ8. मसमयवर्तित्वं तत्प्राम्भवसम्बन्धिनी तामाश्रित्येत्यवसेयम्, एवमुत्तरत्रापीति ॥ अहमे तु-पढमचरमसमयकड-15 जुम्मरएगिदिय'त्ति, प्रथमाश्च ते विवक्षितसङ्ख्यानुभूतेः प्रथमसमयवर्तित्वात् चरमसमयाश्च-मरणसमयवर्तिनः परि ~353 Page #354 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (०५) [भाग-११]"भगवती"-अंगसूत्र-५ (मूलं+वृत्ति:) शतक [३५], वर्ग [-], अंतर्-शतक [१], उद्देशक [२-११], मूलं [८५७-८५८] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र- [०५], अंगसूत्र- [०५] "भगवती मूलं एवं अभयदेवसूरि-रचिता वृत्ति: सू८५९ १०॥ एकादशे तु- व्याख्या- शाटस्था इति प्रथमचरमसमयास्ते च ते कृतयुग्मकृतयुग्मैकेन्द्रियाश्चेति विग्रहः ॥ ८॥ नवमे तु-'पढमअचरमसम- ३५ शतके प्रज्ञप्तिः । यकडजुम्मरएर्गिदिय'त्ति, प्रथमास्तथैव अचरमसमयास्त्वेकेन्द्रियोत्पादापेक्षया प्रथमसमयवर्तिन इह विवक्षिताश्चरम-18/उद्दे..-१२ अभयदेवी File त्वनिषेधस्य तेषु विद्यमानत्वात्, अन्यथा हि द्वितीयोद्देशकोक्तानामवगाहनादीनां यदिह समत्वमुक्तं तन्न स्यात् ततः या वृत्तिः२४ कर्मधारयः, शेषं तु तथैव ॥९॥ दशमे तु-'चरमरसमयकडजुम्मरएगिदिय'त्ति, चरमाश्च ते विवक्षितसक्या- केन्द्रियादि ॥९६९॥8 ४नुभूतेश्चरमसमयवर्तित्वात् चरमसमयाश्च प्रागुक्तस्वरूपा इति चरमचरमसमयाः शेपं प्राग्वत् ॥१०॥ एकादशे तु-8 'चरमसमयकडजुम्मरएगिदिय'त्ति, चरमास्तथैव अचरमसमयाश्च प्रागुक्तयुक्तरेकेन्द्रियोत्पादापेक्षया प्रथमसमयवर्तिनो ये ते चरमाचरमसमयास्ते च ते कृतयुग्मकृतयुग्मैकेन्द्रियाश्चेति विग्रहः, उद्देशकानां स्वरूपनिर्धारणायाह-'पढमो तइओ पंचमो य सरिसगमय'त्ति, कथम्?, यतः प्रथमापेक्षया द्वितीये यानि नानात्वान्यवगाहनादीनि दश भवन्ति | न तान्येतेविति, 'सेसा अट्ट सरिसगमग'त्ति, द्वितीयचतुर्थषष्ठादयः परस्परेण सहशगमा:-पूर्वोक्तेभ्यो विलक्षणगमाद्वितीयसमानगमा इत्यर्थः, विशेष त्वाह-'नवरं चउत्थे' इत्यादि ॥ कृष्णलेश्याशते कण्हलेस्सकडजुम्मेरएगिदिया णं भंते ! कओ उववज्जति?, गोपमा! पचवाओ तहेव एवं जहा ओहि-18/ दि उद्देसए नवरं इमं नाणसं ते णं भंते! जीचा कण्हलेस्सा?, हंता कण्हलेस्सा, ते णं भंते ! कण्हलेस्सकड जुम्मरएगिदियेत्ति कालओ केवचिरं होइ ?, गोयमा! जहन्नणं एक समयं उक्कोसेणं अंतोमुहुत्तं, एवं ठिती-|| एवि, सेसं तहेव जाव अणतखुत्तो, एवं सोलसवि जुम्मा भाणियबा । सेवं भंते! २त्ति ॥१॥ पढमसमय अत्र ३५-शतके प्रथम अन्तरशतक (स-उद्देशका:) परिसमाप्तं अथ ३५-शतके २-१२-अन्तरशतकानि (स-उद्देशका:) आरब्धानि ~354 Page #355 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (०५) [भाग-११]"भगवती"-अंगसूत्र-५ (मूलं+वृत्ति:) शतक [३५], वर्ग [-], अंतर्-शतक [२-१२], उद्देशक [१-११], मूलं [८५९] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र- [०५], अंगसूत्र- [०५] "भगवती मूलं एवं अभयदेवसूरि-रचिता वृत्ति: SAKAKADCCCAMACHAR कण्हलेस्सकडजुम्मश्एगिदिया शंभंते ! को उपव०?, जहा पढमसमयउद्देसओ नवरं ते णं भंते! जीवा कण्हलेस्सा, हंता कण्हलेस्सा, सेसं तं चेव । सेवं भंते सेवं भंते! ति ॥२२॥ एवं जहा ओहियसए ४ एकारस उद्देसगा भणिया तहा कण्हलेस्ससएवि एक्कारस उद्देसगा भाणियवा, पदमो तइओ पंचमो य सरि-3 | सगमा सेसा अट्ठवि सरिसगमा नवरं चउत्थछट्टअट्ठमदसमेसु उववाओ नस्थि देवस्स । सेवं भंते ! २त्ति । ॥३५ सए बितियं एगिदियमहाजुम्मसयं सम्मत्तं ॥ एवं नीललेस्सेहिवि सयं कण्हलेस्ससयसरिसं ४ एकारस उद्देसगा तहेव । सेवं भंते! २॥ ततियं एगिदियमहाजुम्मसयं सम्मत्तं ॥ एवं काउलेस्सेहिदि सयं ८ कण्हलेस्ससयसरिसं । सेवं भंते! २त्ति ॥ चउत्थं एगिदियमहाजुम्मसयं ॥ भवसिद्धियकहजुम्मरएगि-टू दिया ण भंते! कओ उवव०१, जहा ओहियसयं तहेब नवरं एकारसमुवि उद्देसएसु, अह भंते ! सबपाणा |जाव सषसत्ता भवसिद्धियकडजुम्मरएगिदियत्ताए उववन्नपुवा?, गोयमा! णो इणढे समढे, सेसं तहेव । सेवं भंते! २त्ति ॥ पंचम एगिदियमहाजुम्मसयं सम्मत्तं ॥५॥ कण्हलेस्सभवसिद्धियकडजुम्मरएगिदिया णं भंते! कओहिंतो उवव०१, एवं कण्हलेस्सभवसिद्धियएगिदिएहिवि सयं वितियसयकण्हलेस्ससरिस भाणियवं । सेवं भंते! सेवं भंते! ति ॥ छ8 एगिदियमहाजुम्मसयं सम्मत्तं ॥६॥ एवं नीललेस्सभवसिद्धियएगिदियएहि वि सयं । सेवं भंते! सेवं भंते त्ति ॥ सत्तमं एगिदियमहाजुम्मसयं सम्मत्तं ॥ ७ ॥ एवं काउलेस्सभवसिद्धियएगिदिएहिवि तहेव एकारसउद्देसगसंजुत्तं सयं, एवं एयाणि चत्तारि भवसिद्धि ~355 Page #356 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (०५) [भाग-११]“भगवती”- अंगसूत्र - ५ ( मूलं + वृत्ति:) शतक [३५], वर्ग [-], अंतर् शतक [२-१२], उद्देशक [१-११], मूलं [ ८५९ ] पूज्य आगमोद्धारकश्री संशोधितः मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र - [०५], अंगसूत्र- [०५] “भगवती" मूलं एवं अभयदेवसूरि-रचिता वृत्तिः व्याख्यायाणि सयाणि, चउसुवि सरसु सवपाणा जाव जवबन्ना ?, नो दगडे समढे । सेवं भंते! सेवं भंते! ति ॥ प्रज्ञप्तिः | अट्टमं एर्गिदियमहाजुम्मसयं सम्मत्तं ||८||जहा भवसिद्धिएहिं चत्तारि सपाईं भणियाई एवं अभवसिद्धिएहिवि अभयदेवी- ४ चत्तारि सयाणि लेस्सासंजुत्ताणि भाणियवाणि, सर्वे पाणा तहेब नो इणहे समहे, एवं एयाई बारस एगिंया वृत्तिः २) | दियमहाजुम्मसयाई भवंति । सेवं भंते! सेवं भंते! त्ति ॥ पंचतीसह सर्व सम्मत्तं ||३५|| (सूत्रं ८५९ ) ॥ 'जत्रेणं एवं समयं त्ति जघन्यत एकसमयानन्तरं सङ्ख्यान्तरं भवतीत्यत एकं समयं कृष्णलेश्य कृतयुग्मकृतयुग्मै॥ ९७० ॥ * केन्द्रिया भवन्तीति । एवं ठिईवि'त्ति कृष्णलेश्यावतां स्थितिः कृष्णलेश्याकालवदवसेवेत्यर्थ इति ॥ पञ्चत्रिंशं शतं वृत्तितः समाप्तम् ॥ ३५ ॥ व्याख्या शतस्यास्य कृता सकष्टं, टीकाऽल्पिका येन न चास्ति चूर्णिः । मन्देकनेत्रो वत पश्यताद्वा, दृश्यान्यकष्टं | कथमुद्यतोऽपि ॥ १ ॥ पञ्चत्रिंशे शते सङ्ख्यापदैरे केन्द्रियाः प्ररूपिताः, पटूत्रिंशे तु तैरेव द्वीन्द्रियाः प्ररूप्यन्त इत्येवं सम्बन्धस्यास्येदमादिसूत्रम् - कडजुम्म २दिया णं भंते! कओ उबवजंति ?, उववाओ जहा वनीए, परिमाणं सोलस वा संखेज्जा वा उवव० असंखेला वा उबव, अवहारो जहा उप्पलुद्देसए, ओगाहणा जहन्नेणं अंगुलस्त असंखेजड़भागं उक्कोसेणं वारस जोयणाई, एवं जहा एर्गिदियमहाजुम्माणं पढमुद्देसए तहेव नवरं तिनि लेस्साओ देवा अत्र ३५ शतके २-११ अन्तरशतकानि (स- उद्देशकाः) परिसमाप्तानि For Parts Only अथ षट्त्रिंशत् शतकं आरभ्यते अथ ३६ शतके १-१२ अन्तरशतकानि (स- उद्देशका १-११) आरब्धा: ~ 356~ ३५ शतके उ.-१२ कृष्णलेश्यैकेन्द्रियादि सू ८५९ ॥ ९७० ॥ Page #357 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (०५) [भाग-११]"भगवती"-अंगसूत्र-५ (मूलं+वृत्ति:) शतक [३६], वर्ग [-], अंतर्-शतक [१-१२], उद्देशक [१-११], मूलं [८६०] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र- [०५], अंगसूत्र- [०५] "भगवती मूलं एवं अभयदेवसूरि-रचिता वृत्ति: न उवव० सम्मदिही वा मिच्छविट्ठी वा नो सम्मामिच्छादिट्ठी नाणी वा अन्नाणी वा नो मणयोगी वययोगी वा कायजोगी वा, ते णं भंते! कडजुम्मश्दिया कालओ केव०१, गोयमा! जहन्नेणं एक समय उकोसेणं संखेनं कालं ठिती जहन्नेणं एक समयं उकोसेणं बारस संवच्छराई, आहारो नियम छरिसि, तिलि समुग्धाया सेसं तहेव जाव अणंतखुत्तो, एवं सोलसमुवि जुम्मेसु । सेवं भंते ! २ त्ति । वैदियमहाजुम्मसए । | पढमो उद्देसओ सम्मतो ॥ ३६॥१॥ पढमसमयकडम्मर दिया णं भंते! कओ उवय.?, एवं जहा एगि-18 | दियमहाजुम्माणं पढमसमयउद्देसए दस नाणत्ताई ताई चेव दस इहवि, एक्कारसम इमं नाण-त्रो मणयोगीWनो वइयोगी काययोगी सेसं जहा दियाणं चेव पढमुद्देसए । सेवं भंते! २त्ति ॥ एवं एएवि जहा एगिदि-| | यमहाजुम्मेसु एकारस उद्देसगा तहेव भाणियबा नवरं चउत्थछटुंअहमदसमेसु सम्मत्तनाणाणि न भवति. जहेव एगिदिएसु पढमो तइओ पंचमो य एकगमा सेसा अट्ट एकगमा । पढमं बेइंदियमहाजुम्मसयं सम्मत्तं *॥१॥ कण्हलेस्सकडजुम्मश्वेइंदिया णं भंते! कओ उवववति', एवं चेव कण्हलेस्सेसुधि एकारसउद्दे सगसंजुत्तं सर्य, नवरं लेस्सा संचिट्ठणा ठिती जहा एगिदियकण्हलेस्साणं ॥ वितियं दियसयं सम्मत्तं ॥२॥ एवं नीललेस्सेहिदि सयं । ततियं सयं सम्मत्तं ॥३॥ एवं काउलेस्सेहिवि, सयं ४ सम्मत्तं ॥ भवसिद्धियकड*जुम्मरपेइंदिया णं भंते!, एवं भवसिद्धियसपावि चत्तारि तेणेव पुर्वगमएणं मेयवा नवरं सवे पाणा० णो तिणडे समढे, सेसं तहेव ओहियसयाणि चत्तारि। सेवं भंते सेवं भंते! त्ति ॥ छत्तीसमसए अहम सवं सम्मत्तं ~357 Page #358 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (०५) [भाग-११]“भगवती”- अंगसूत्र -५ (मूलं + वृत्तिः) शतक [३६,३७-३९], वर्ग [-], अंतर् शतक [१-१२], उद्देशक [१-११], मूलं [ ८६०,८६१-८६३] पूज्य आगमोद्धारकश्री संशोधितः मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित.. आगमसूत्र - [०५] अंगसूत्र- [ ०५] "भगवती" मूलं एवं अभयदेवसूरि-रचिता वृत्तिः व्याख्याप्रज्ञठिः अभयदेवीया वृत्तिः २ ॥ ९७१ ॥ ||८|| जहा भवसिद्धियसयाणि चत्तारि एवं अभवसिद्धियसयाणि चत्तारि भाणियद्वाणि नवरं सम्मत्तनाणाणि नत्थि, सेसं तं बेब, एवं एयाणि वारस बेईदियमहाजुम्मसयाणि भवंति । सेवं भंते! सेवं भंते! न्ति ॥ बंदियमहाजुम्मसया सम्मत्ता ॥ १२ ॥ ( सूत्रं ८६० ) || छत्तीसतिमं सर्व सम्मतं ॥ ३६ ॥ जुम्म तेंद्रिया णं भंते! कओ उबवजंति ?, एवं तेईदिएसुवि वारस सया कायद्दा बेइंदियसयसरिसा नवरं ओगाहणा जहन्त्रेणं अंगुलस्स असंखेजइभागं उक्कोसेणं तिनि गाउयाई, ठिती जहन्नेणं एकं समयं उक्कोण एकूणवनं राइंदियाई सेसं तहेव । सेवं भंते! सेवं भंते । त्ति (सूत्रं ८६१ ) ॥ तेंदियमहाजुम्मसया सम्मत्ता ॥ १२ ॥ सन्ततीसह सर्व सम्मतं ॥ ३७ ॥ चरिदिएहिवि एवं चैव वारस सया कायद्या नवरं ओगाहणा जहन्त्रेणं अंगुलस्स असंखेज्जइभागं उकोसेणं चत्तारि गाउयाई ठिती जहन्त्रेणं एवं समयं उक्कोसेणं छम्मासा सेसं जहा बेंद्रियाणं । सेवं भंते! २ त्ति ॥ सूत्रं ८६२ ) ॥ चरिदियमहाजुम्मसया सम्मत्ता ॥ १२ ॥ अतीसइमं सयं सम्मतं ॥ ३८ ॥ कडजुम्म २असन्निपबिंदिया णं भंते! कभी उबव० जहा वेन्द्रियाणं तहेब असन्निसुवि बारस सया | कायदा नवरं ओगाहणा जहन्त्रेणं अंगुलस्स असंखेज्जभागं उक्कोसेणं जोयणसहस्सं संचिणा जहनेणं एवं समयं उकोसेणं पुचकोडी पुहुत्तं किती जहनेणं एवं समयं उक्कोसेणं पुचकोडी सेसं जहा बेंद्रियाणं । सेवं भंते । | २ति । असन्नीपंचिंदियमहाजुम्मसया सम्मत्ता || १२ || एगूणयालीसइमं सयं सम्मत्तं (सूत्रं ८६३ ) ।। ३९ ।। Education Internation For Penal Use On अत्र ३६- शतके १-१२ अन्तरशतकानि (स- उद्देशका: १-११ ) परिसमाप्ताः अथ ३७-३९ शतके १-१२ - अन्तरशतकानि (स- उद्देशका: १-११) आरब्धाः एवं परिसमाप्ताः ~358~ ३६-३९ शतानि सू. ८६०-८६३ ॥ ९७१ ॥ Page #359 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (०५) [भाग-११]"भगवती"-अंगसूत्र-५ (मूलं+वृत्ति:) शतक [४०], वर्ग [-], अंतर्-शतक [१], उद्देशक [१-११], मूलं [८६४] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र- [०५], अंगसूत्र- [०५] "भगवती मूलं एवं अभयदेवसूरि-रचिता वृत्ति: D % 'कडजुम्मरबेन्दिया णमित्यादि, 'जहन्नेणं एक समयंति समयानन्तरं सयान्तरभावात् , एवं स्थितिरपि ।। इतः सर्व सूत्रसिद्धमाशास्त्रपरिसमाप्तेः, नवरं चत्वारिंशे शते___ कडजुम्मरसन्निपंचिंदिया णं भंते ! कओ उवघजन्ति ?, उववाओ चउसुवि गईसु, संखेजवासाउयअसंखेजवासाउयपजत्तअपजत्तएसु य न कओवि पडिसेहो जाव अणुत्तरविमाणत्ति, परिमाणं अवहारो ओगाहणा य जहा असन्निपंचिंदियाणं वेयणिजवजाणं सत्तहं पगडीणं बंधगा वा अबंधगा वा वेयणिज्जस्स बंधगा नो अबंधगा मोहणिज्जस्स वेदगा वा अवेदगा वा सेसाणं सत्तण्हवि वेदगा नो अवेयगा सायावेयगा वा असायावेयगा वा मोहणिजस्स उदई वा अणुदई वा सेसाणं सत्तण्हवि उदयी नो अणुदई नामस्स गोयस्स य उदीरगा नो अणुदीरगा सेसाणं छपहवि उदीरगा वा अणुदीरगा वा कण्हलेस्सा वा जाव सुकलेस्सा वा सम्मदिही वा मिच्छादिही वा सम्मामिच्छादिट्ठी वा णाणी वा अन्नाणी वा मणजो० वइजो० कायजो० उवओगो वन्नमादी उस्सासगा वा नीसासगा वा आहारगा य जहा एगिदियाणं | विरया य अविरया य विरयाविरयारसकिरिया नो अकिरिया । ते णं भंते! जीवा किं सत्तविहवंधगा अट्ठबिहबंधगा वा छविहवंधगा चा एगविहबंधगावा?, गोयमा!सत्तविहबंधगावा जाव एगविहवंधगा वा,ते णं भंते ! जीवा किं आहारसनोवउत्सा जाव परिंग्गहसनोवउत्ता वा नोसन्नोवउत्ता वा?, गोयमा! आहारसन्नोवउत्ता दि जाव नोसरोवत्ता वा सपत्थ पुच्छा भाणियषा कोहकसायी वा जाच लोभकसायी वा अकसायी वा COCCASISAMANS. -%75 अथ ४०-शतके प्रथम-अन्तरशतक (स-उद्देशका: १-११) आरब्धं ~359 Page #360 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (०५) [भाग-११]"भगवती"-अंगसूत्र-५ (मूलं+वृत्ति:) शतक [४०], वर्ग [-], अंतर्-शतक [१], उद्देशक [१-११], मूलं [८६४] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र- [०५], अंगसूत्र- [०५] "भगवती मूलं एवं अभयदेवसूरि-रचिता वृत्ति: व्याख्या-रड्या ४ इत्थीवेदगा वा पुरिसवेदगा वा नपुंसगवेदगा वा अवेदगा वा इस्थिवेदबंधगा वा पुरिसवेदबंधगा वा नपुंस- ४० शतके प्रज्ञप्तिः गवेदबंधगा या अपंधगा चा, सन्नी नो असन्नी सइंदिया नो अणिदिया संचिट्ठणा जहनेणं एक समयं उको-IX| संज्ञिपञ्चेअभयदेवी- || सेणं सागरोपमसयपुद्धत्तं सातिरेगं आहारो तहेव जाब नियम छद्दिसिं ठिती जहन्नेणं एक समयं कोसेणं | न्द्रियाः या वृत्तिा/ तेत्तीसं सागरोवमाई छ समुग्धाया आदिल्लगा मारणंतियसमुग्घाएणं समोहयाचि मरति असमोहयावि | ॥९७२ ॥ मरति, उवट्टणा जहेव उववाओ न कत्थइ पडिसेहो जाव अणुत्तरविमाणत्ति, अह भंते! सबपाणा जाव अणंतखुत्तो, एवं सोलसुवि जुम्मेसु भाणिय, जाव अर्णतखुत्तो, नवरं परिमाणं जहा बेइंदियार्ण सेसं तहेव । सेवं भंते ! २त्ति ॥४०॥१॥ पढमसमयकडजुम्मरसन्निपंचिंदिया णं भंते! कओ उववजन्ति ?, उववाओ परिमाणं आहारो जहा एएसिं चेव पढमोदेसए ओगाहणा बंधो वेदो वेदणा उदयी पदीरगा य जहा बेन्दियाणं पढमसमयाणं तहेव कण्हलेस्सा वा जाव सुकलेस्सा बा, सेसं जहा वेन्दियाणं पढमसमइयाणं जाव अणं-टू तखुत्तो नवरं इत्धिवेदगा वा पुरिसवेदगा वा नपुंसगवेदगा वा सन्निको असन्नीणो सेसं तहेव एवं सोलसुषि जुम्मेसु परिमाणं तहेव सबं । सेवं भंते!२ त्ति ॥ ४०॥२॥ एवं एथवि एकारस उद्देसगा तहेव, ॥९७२॥ पढमो तइओ पंचमो य सरिसगमा सेसा अट्टविसरिसगमा, चउत्थअट्ठमदसमेसु नस्थि विसेसो कायद||बो। सेवं भंते।२सि ॥ (सूत्र ८६४)॥४० सो पढमसन्निपंचिंदियमहाजुम्मसर्व सम्मत्तं ।। For P OW ~360 Page #361 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (०५) [भाग-११]“भगवती”- अंगसूत्र -५ (मूलं + वृत्तिः) शतक [४०], वर्ग [-], अंतर् शतक [१], उद्देशक [१-११], मूलं [८६४] पूज्य आगमोद्धारकश्री संशोधितः मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित.. आगमसूत्र - [०५] अंगसूत्र- [ ०५] "भगवती" मूलं एवं अभयदेवसूरि-रचिता वृत्तिः 'वेयणिज्जवजाणं सत्तण्हं पगडीर्ण बन्धगा वा अबन्धमा वत्ति, इह वेदनीयस्य बन्धविधिं विशेषेण वक्ष्यतीतिकृत्वा वेदनीयवर्णानामित्युक्तं, तत्र चोपशान्तमोहादयः सप्तानामवन्धका एव शेषास्तु यथासम्भवं वन्धका भवन्तीति 'वेवणिज्जस्स बन्धगा नो अवन्धग'त्ति, केवलित्वादारात्सर्वेऽपि सङ्क्षिपञ्चेन्द्रियास्ते च वेदनीयस्य बन्धका एव नाबन्धकाः 'मोहणिजस्स वेयगा वा अवेयगा वत्ति मोहनीयस्य वेदकाः सूक्ष्मसम्परायान्ताः, अवेदकास्तूपशान्तमोहादयः, 'सेसाणं सत्तण्हवि बेयगा नो अवेयगत्ति ये किलोपशान्तमोहादयः सङ्क्षिपञ्चेन्द्रियास्ते सप्तानामपि वेदका नो अवेदकाः, केवलिन एव चतसृणां वेदका भवन्ति ते चेन्द्रियव्यापारातीतत्वेन न पंचेन्द्रिया इति । 'सायाचेयगा वा असायावेपणा वत्ति, सञ्ज्ञिपञ्चेन्द्रियाणामेवस्वरूपत्वात्, 'मोहणिजस्स उदई वा अणुदई वत्ति, तत्र सूक्ष्मस|म्परायान्ता मोहनीयस्योदयिनः उपशान्तमोहादयस्त्वनुदयिनः 'सेसाणं सत्तण्हवी' त्यादि, प्राग्वत्, नवरं वेदकत्वमनु| क्रमेणोदीरणाकरणेन चोदयागतानामनुभवनम् उदयस्त्वनुक्रमागतानामिति । 'नामगोयस्स उदीरगा नो अणुदीरंगत्ति, नामगोत्रयोरकषायान्ताः सन्जिपञ्चेन्द्रियाः सर्वेऽप्युदीरकाः, 'सेसाणं छवि उदीरगा वा अणुदीरगा व'ति शेषाणां षण्णामपि यथासम्भवमुदीरकाञ्चानुदीरकाश्च यतोऽयमुदीरणाविधिः प्रमत्तानां सामान्येनाष्टानां, आवलिकावशेषायुष्कास्तु त एवायुर्वर्जसप्तानामुदीरकाः, अप्रमत्तादयस्तु चत्वारो वेदनीयायुर्वर्जानां षण्णां तथा सूक्ष्मसम्पराया आवलिकायां स्वाद्धायाः शेषायां मोहनीयवेदनीयायुर्वर्जानां पञ्चानामपि, उपशान्तमोहास्तूतरूपाणां | पञ्चानामेव क्षीणकषायाः पुनः स्वाद्धाया आवलिकायां शेषायां नामगोत्रयोरेव सयोगिनोऽप्येतयोरेव अयोगिनस्त्वनु Educatuny Internationa For Penal Use Only ~361~ Page #362 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (०५) [भाग-११]“भगवती”- अंगसूत्र -५ (मूलं + वृत्तिः) शतक [४०], वर्ग [-], अंतर् शतक [१], उद्देशक [१-११], मूलं [८६४] पूज्य आगमोद्धारकश्री संशोधितः मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित.. आगमसूत्र- [०५] अंगसूत्र- [ ०५] "भगवती" मूलं एवं अभयदेवसूरि- रचिता वृत्तिः व्याख्याप्रज्ञष्ठिः अभयदेवीया वृत्तिः २ ॥ ९७३ ॥ दीरका एवेति । 'संचिणा जहन्त्रेणं एवं समयं ति, कृतयुग्मकृतयुग्मसशिपञ्चेन्द्रियाणां जघन्येनावस्थितिरेकं समयं समयानन्तरं सङ्ख्यान्तरसद्भावात्, 'उकोसेणं सागरोबमसयहुतं साइरेगं ति यत इतः परं सब्ज्ञिपशेन्द्रिया न भवन्त्येवेति, 'छ समुग्धाया आइलग ति सङ्क्षिपथेन्द्रियाणामाद्याः षडेव समुद्घाता भवन्ति सप्तमस्तु केवलिनामेव ते चानिन्द्रिया इति ॥ कृष्णलेश्याशते कण्हले एसकडजुम्म २ सन्निपंचिंदिया णं भंते! कओ उचब०१, तहेब जहा पढमुद्देसओ सनीणं, नवरं बन्धो वेओ उदयी उदीरणा लेस्सा बन्धगसन्ना कसायवेदबंधगा य एयाणि जहा बेंदियाणं, कण्हलेस्साणं वेदो तिविहो अवेद्गा नस्थि संचिट्टणा जहनेणं एवं समयं उक्कोसेणं तेतीसं सागरोवमाई अंतोमुष्टुत्तमन्महियाई एवं द्वितीएवि नवरं ठितीए अंतमुत्तमम्भहियाई न भन्नंति सेसं जहा एएसिं चैव पढमे उद्देसए जाव अणंतखुत्तो । एवं सोलससुवि जुम्मेसु । सेवं भंते! सेवं भंते! त्ति ॥ पढमसमयकण्हलेस्सकउजुम्म २ सन्निपंचिंदिया णं भंते! कओ उववज्जन्ति ?, जहा सन्निपंचिंदियपढमसमयउद्देसए तहेब निरवसेसं नवरं ते णं भंते! जीवा कण्हलेस्सा?, हंता कण्हलेस्सा सेसं तं चैव, एवं सोलससुबि जुम्मेसु । सेवं भंते! सेवं भंते! न्ति ॥ एवं एएवि एक्कारसवि उद्देसगा कण्हलेस्ससए, पढमततियपंचमा सरिसगमा सेसा अट्ठवि एकगमा । सेवं भंते! सेवं भंते! ति ॥ वितियं सयं सम्मतं ॥ २ ॥ एवं नीललेस्सेसुवि सयं, नवरं संचिह्नणा जहस्रेणं एकं समयं उक्कोसेणं दस सागरोचमाई पलिओवमस्स असंखेज्जइ भागमम्भहियाई, एवं ठितीए, एवं तिसु अथ ४० शतके प्रथम अन्तरशतकं (स- उद्देशका: १-११) परिसमाप्तं अथ ४० शतके २-२१ अन्तरशतकानि (स- उद्देशका: १-११) आरब्धानि For Parts Only ~ 362~ ४० शतके सू. ८६५ ॥ ९७३ ॥ Page #363 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (०५) [भाग-११]"भगवती"-अंगसूत्र-५ (मूलं+वृत्ति:) शतक [४०], वर्ग [-], अंतर्-शतक [२-२१], उद्देशक [१-११], मूलं [८६५] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र- [०५], अंगसूत्र- [०५] "भगवती मूलं एवं अभयदेवसूरि-रचिता वृत्ति: ACCESS ॥ उद्देसएसु, सेस तं चेव । सेवं भंते! सेवं भंते ! ति॥ तइयं सयं सम्मत्तं ॥ ३॥ एवं काउलेस्ससपंपि नवरं संचिट्ठणा जह. एक समयं उक्कोसेणं तिन्नि सागरोवमाई पलिओवमस्स असंखेजहभागमभहियाई एवं ठितीएवि, एवं तिसुवि उद्देसएसु, सेसं तं चेव । सेवं भंते ! २ त्ति ४॥ चउत्थं सयं ।। एवं तेउलेस्सेसुवि सयं, नवरं संचिट्ठणा जह० एकं समयं उक्कोसेणं दो सागरोवमाई पलिओवमस्स असंखेजइभागमभहियाई एवं ठितीएवि नवरं नोसन्नोवउत्ता वा, एवं तिमुवि उद्देसएसु सेसं तं चेव।सेवं भंते !२ ति ॥पंचमं सयं ॥५॥ जहा तेउलेस्सासतं तहा पम्हलेस्सासयंपि नवरं संचिट्ठणा जहन्नेणं एवं समयं उकोसेणं दस सागरोवमाई ४ अंतोमुत्तमम्भहियाई, एवं ठितीएवि, नवरं अंतोमुटुत्तं न भन्नति सेसं तं चेव, एवं एएसु पंचसु सएसुर जहा कण्हलेस्सासए गमओ तहा नेयबो जाव अर्णतखुत्तो । सेवं भंते ! २त्ति ॥४०-उर्दु सयं सम्मत्तंडू ॥ ६॥ सुकलेस्ससयं जहा ओहियसयं नवरं संचिट्ठणा ठिती य जहा कण्हलेस्ससए सेसं तहेव जाब अणं-18 तखुत्तो । सेवं भंते! २ त्ति ॥ सत्तम सयं सम्मत्तं । भवसिद्धियकडजुम्मरसन्निपंचिंदिया णं भंते! कओ द उववजन्ति ?, जहा पढमं सन्निसतं तहा यवं भवसिद्धियाभिलावेणं नवरं सबपाणा?, णो तिणडे समझे, सेसं तहेब, सेवं भंते !२त्ति ॥ अट्ठमं सयं । कण्हलेस्सभवसिद्धीयकडम्मरसन्निपंचिंदिया णं भंते! को उबव४ नन्ति ?, एवं एएणं अभिलावेणं जहा ओहियकण्हलेस्ससयं । सेवं भंते। २त्ति ॥ नवमं सयं ॥ एवं नीललेस्सभवसिद्धीएवि सयं । सेवं भंते!२॥ दसम सयं ॥ एवं जहा ओहियाणि संनिपचिंदियाणं सत्त सयाणि ~363 Page #364 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (०५) [भाग-११]"भगवती"-अंगसूत्र-५ (मूलं+वृत्ति:) शतक [४०], वर्ग [-], अंतर्-शतक [२-२१], उद्देशक [१-११], मूलं [८६५] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र- [०५] अंगसूत्र- [०५] "भगवती" मूलं एवं अभयदेवसूरि-रचिता वृत्ति: ॥९७४॥18 भणियाणि एवं भवसिद्धीपहिवि सत्त सयाणि कायवाणि, नवरं सत्समुचि सएसु सवाणा जाव णो तिण? |||| प्रज्ञप्तिः समझे, सेसं तं चेच । सेवं भंते !२॥ भवसिद्धियसया सम्मत्ता ।। चोदसमं सयं सम्मत्तं ॥१४॥ अभव- सू. ८६५ अभयदेवी- सिद्धियकडजुम्मरसन्निपंचिंदिया णं भंते ! कओ उववजन्ति ?, उववाओ तहेव अणुत्तरविमाणवज्जो परिमाणं या वृत्तिः२) अवहारो उच्चसं घंधो वेदो वेदणं उदओ उदीरणाय जहा कण्हलेस्ससए कण्हलेस्सा वा जाव सुकलेस्सा वा नो सम्मदिट्टी मिच्छादिट्ठी नो सम्मामिच्छादिहीनो नाणी अन्नाणी एवं जहा कण्हलेस्ससए नवरं नो चिरया अविरया नो विरपार संचिट्ठणा ठिती य जहा ओहिउद्देसए समुग्घाया आदिल्लगा पंच उषहणा तहेच अणुत्तरविमाणवजं सबपाणा णो तिणढे समढे सेसं जहा कण्हलेस्ससए जाव अर्णतखुत्तो, एवं सोलससुवि|| ||जुम्मसु । सेवं भंते!२सि ॥ पढमसमयअभवसिद्धियकडजुम्मरसन्निपंचिंदिया शंभंते ! को उववजन्ति ?, | जहा सन्नीणं पढमसमयउद्देसए तहेव नवरं सम्मत्तं सम्मामिच्छत्तं नाणं च सवत्थ नत्थि सेसं तहेव । सेवं भंते!२त्ति ॥ एवं एत्थवि एकारस उद्देसगा कायदा पढमतइयपंचमा एक्कगमा सेसा अट्ठचि एकगमा । सेवं भंते! २त्ति ॥ पढमं अभवसिद्धियमहाजुम्मसयं सम्मत्तं ॥ चत्तालीसमसए पन्नरस सयं सम्मत। ॥४०॥१५॥ कण्हलेस्सअभवसिद्धियकडजुम्मरसन्निपंचिंदिया णं भंते! कओ उववजन्ति, जहा एएसिं* चेच ओहियसयं तहा कण्हलेस्ससयंपि नवरं ते णं भंते! जीवा कण्हलेस्सा?, हंता कण्हलेस्सा, ठिती| ॥९७४॥ संचिट्ठणा य जहा कण्हलेस्सासए सेसं तं चेव । सेवं भंते! २त्ति । वितियं अभवसिद्धियमहाजुम्मसयं ॥ ~364 Page #365 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (०५) [भाग-११]"भगवती"-अंगसूत्र-५ (मूलं+वृत्ति:) शतक [४०], वर्ग [-], अंतर्-शतक [२-२१], उद्देशक [१-११], मूलं [८६५] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र- [०५], अंगसूत्र- [०५] "भगवती मूलं एवं अभयदेवसूरि-रचिता वृत्ति: 8॥४-सते सोलसमं संमत्तं ॥ १६ ॥ एवं छहिवि लेस्साहि छ सया कायवा जहा कण्हलेस्ससयं नवरं || &|| संचिट्ठणा ठिती य जहेव ओहियसए तहेव भाणियवा, नवरं सुकलेस्साए उक्कोसेणं एकतीसं सागरोवमाई॥5 IN|अंतोमुहत्तमभहियाई, ठिती एवं चेच नवरं अंतोमुहुत्तं नस्थि जहन्नगं तहेच सवत्थ सम्मत्तनाणाणि नस्थि || विरई विरयाविरई अणुसरविमाणोवपत्ति एयाणि नस्थि, सबपाणाणो तिणढे समढे । सेवं भंते ! सेब ||8 भंतेति॥ एवं एयाणि सत्त अभवसिद्धियमहाजुम्मसया भवन्ति । सेवं भंते ! सेवं भंतेति ॥ एवं एयाणि ||G | एकवीसं सन्निमहाजुम्मसयाणि। सवाणिवि एक्कासीतिमहाजुम्मसया सम्मत्ता ॥ (सूत्रं ८६५)॥ चत्ताली४ सतिम सयं सम्मत्तं ॥४०॥ 'उक्कोसेणं तेत्तीसं सागरोवमाई अंतोमुहुत्तमम्भहियाई ति, इदं कृष्णलेश्याऽवस्थानं सप्तमपृथिव्युत्कृष्टस्थिति पूर्वभवपर्यन्तवर्त्तिनं च कृष्णलेश्यापरिणाममाश्रित्येति । नीललेश्याशते-'उकोसेणं दस सागरोवमाई पलिओवमस्स असंखेजइभागमभहियाईति, पञ्चमपृथिव्या उपरितनप्रस्तटे दश सागरोपमाणि पल्योपमासङ्ख्येयभागाधिकान्यायुः संभवन्ति, नीललेल्या च तत्र स्यादत उक्तम्-'उकोसेण मित्यादि, यह प्राक्तनभवान्तिमान्तर्मुहूर्त्त तत्पल्योपमासबेयभागे प्रविष्टमिति न भेदेनोक्तं, एवमन्यत्रापि, 'तिसु उद्देसएसुति प्रथमतृतीयपञ्चमेविति । कापोतले-IN श्याशते-'उक्कोसेणं तिन्नि सागरोयमाई पलिओवमस्स असंखेजहभागमभहियाईति यदुक्तं तत्ततीयपृ-1 थिव्या उपरितनप्रस्तटस्थितिमाश्रित्येति । तेजोलेश्याशते-दो सागरोवमाई'इत्यादि यदुकं तदीशानदेवपरमायुरा ~365 Page #366 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (०५) [भाग-११]"भगवती"-अंगसूत्र-५ (मूलं+वृत्ति:) शतक [४०], वर्ग [-], अंतर्-शतक [२-२१], उद्देशक [१-११], मूलं [८६५] मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित.........आगमसूत्र - [०५], अंग सूत्र - [०५] "भगवती" मूलं एवं अभयदेवसूरि-रचित वृत्ति: ४१ शतके सू ८६७ श्रित्येत्यवसेयं, पद्मलेइयाशते-'उक्कोसेणं दस सागरोवमाई' इत्यादि तु यदुक्तं तद्ब्रह्मलोकदेवायुराश्रित्येति मन्तव्यं, प्रज्ञप्तिः तत्र हि पद्मलेश्यैतावच्चायुर्भवति, अन्तर्मुहूर्त च प्राक्तनभवावसानवत्तींति, शुक्लेश्याशते-'संचिणा ठिई य जहा कण्ह- अभयदेवी- लेस्ससए'ति यखिंशत्सागरोपमाणि सान्तमुहर्तानि शुक्ललेश्याऽवस्थानमित्यर्थः, एतच्च पूर्वभवान्त्यान्तर्मुहर्तमनुत्तया वृत्तिः२/रायुश्चाश्रित्येत्ययसेयं, स्थितिस्तु त्रयस्त्रिंशत्सागरोपमाणीति, 'नवरं सुकलेस्साए उक्कोसेणं एकतीसं सागरोवमाई अंतो॥९७५॥ मुत्तमभहिया महत्तमम्भहियाई ति यदुकं तदुपरितनवेयकमाश्रित्येति मन्तव्यं, तत्र हि देवानामेतावदेवायुः शकलेश्या च भवति, अभव्याचोत्कर्षतस्तत्रैव देवतयोत्पद्यन्ते न तु परतोऽपि, अन्तर्मुहूर्ते च पूर्वभवावसानसम्बन्धीति ॥ एकचत्वारिंशे शते कह णं भंते ! रासीजुम्मा पन्नत्ता, गोयमा! चत्तारि रासीजुम्मा पन्नत्ता, तंजहा-कडजुम्मे जाव कलिदायोमेसेकेणटेणं भंते । एवं बुच्चइ चत्तारि रासीजुम्मा पन्नत्ता, तंजहा-जाव कलियोगे?, गोयमा! जे णं रासी चउकएणं अवहारेणं अबहीरमाणे चउपज्जवसिए सेत्तं रासीजुम्मकडजुम्मे, एवं जाव जे णं रासी चउ- करणं अवहारेणं एगपजवसिए सेत्तं रासीजुम्मकलियोगे, से तेणतुणं जाव कलियोगे । रासीजुम्मकडजुम्म-13 | नेरहया णं भंते! कओ उपवजन्ति', उववाओ जहा वकंतीए, ते णं भंते। जीवा एगसमएणं केवइया उव-15 वजन्ति , गोयमा। चत्सारि वा अट्ट वा वारस वा सोलस वा संखेज्जा वा असंखेजा वा उवव०, ते णं भंते! जीवा किं संतरं उववजन्ति निरंतरं उववजन्ति?, गोयमा! संतरंपि उववजन्ति निरंतरंपि उवनजंति, संतरं उववजमाणा जहन्नेणं एक समयं उक्कोसेणं असंखेजा समया अंतरं कट्ठ उववजन्ति, निरंतरं उववज-15 ... अत्र मूल-संपादने सूत्रक्रम-सूचने एका स्खलना दृश्यते- सू. ८६६ स्थाने ८६७ मुद्रितं (यहां सूत्रक्रम ८६६ लिखना भूल गये है, सिधा ८६७ लिखा है अत्र ४०-शतके २-२१ अन्तरशतकानि (स-उद्देशका: १-११) परिसमाप्तानि, तत्समाप्ते चत्वारिंशम् शतकं अपि समाप्तं अथ एकचत्वारिंशम् शतकं आरभ्यते ~366~ Page #367 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (०५) [भाग-११]"भगवती"-अंगसूत्र-५ (मूलं+वृत्ति:) शतक [४१], वर्ग B, अंतर्-शतक [-], उद्देशक [१-१९६], मूलं [८६७-८६८] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र- [०५], अंगसूत्र- [०५] "भगवती मूलं एवं अभयदेवसूरि-रचिता वृत्ति: GROCESSAGROR माणा जहन्नेणं दो समया उक्कोसेणं असंखेजा समया अणुसमयं अविरहियं निरंतरं उववजन्ति, ते ण भंते! जीवा जंसमयं कडजुम्मा समयं तेयोगा समयं तेयोगा तंसमयं कडजुम्मा ?, णो तिणद्वे समढे, समयं कडजुम्मा समयं दावरजुम्मा जंसमयं दावरजुम्मा तंसमयं कडजुम्मा, नो तिण | समढे, जंसमयं कडजुम्मा तंसमयं कलियोगा जंसमयं कलियोगा तं समयं कडजुम्मा?, णो तिणद्वे समट्टे । ते णं भंते! जीवा कहिं उययजन्ति ?, गोयमा! से जहा नामए पवए पवमाणे एवं जहा उववायसए जाव नो परप्पयोगेणं उबवजन्ति । तेणं भंते! जीवा किं आयजसेणं उबवजन्ति आयअजसेणं उववजन्ति ?, गोयमा! नो आयजसेणं उवव० आयअजसेणं उववजन्ति, जइ आयअजसेणं उववजन्ति किं आयजसं उबजीवंति आयअजसं उवजीवंति?, गोयमा! नो आयजसं उवजीवंति आयअजसं उवजीवंति, जइ आयअजसं उबजीवंति किं सलेस्सा अलेस्सा?, गोयमा! सलेस्सा नो अलेस्सा, जइ सलेस्सा किं सकिरिया अकिरिया ?, गोयमा! सकिरिया नो अकिरिया, जह सकिरिया तेणेव भवग्गहणेणं सिशंति जाव अंतं करेंति ?, णो तिणड्ढे समढे । रासीजुम्मकडजुम्मअसुरकुमारा णं भंते! कओ उववजन्ति ?, जहेव नेरतिया तहेव निरवसेसं एवं जाव पंचिंदियतिरिक्खजोणिया नवरं वणस्सइकाइया जाय असंखेज्जा वा अणंता वा उव० सेसं एवं चेव, मणुस्सावि एवं चेव जाव नो आयजसेणं उववजन्ति आयअजसेणं उवव०, जइ आयअजसेणं उववजन्ति किं आयजसं उवजीवंति आयअजसं उबजीवंति?, गोयमा! आयजसंपि CANAAAAAAAA एकचत्वारिंशम् शतके १ से १९६ उदेशका: वर्तते तद् अन्तर्गत अत्र उद्देशक: १ आरब्ध: ~367~ Page #368 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (०५) [भाग-११]"भगवती"-अंगसूत्र-५ (मूलं+वृत्ति:) शतक [४१], वर्ग [-], अंतर्-शतक [-], उद्देशक [१-१९६], मूलं [८६७-८६८] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र- [०५], अंगसूत्र- [०५] "भगवती मूलं एवं अभयदेवसूरि-रचिता वृत्ति: |४|४१ शतके व्याख्या- उवजीवंति आयअजसंपि उवजीवंति, जइ आयजसं उवजीवंति किं सलेस्सा अलेस्सा ?, गोयमा प्रज्ञप्तिःसलेस्साथि अलेस्सावि, जई अलेस्सा किं सकिरिया अकिरिया, गोयमा! नो सकिरिया अकि-12 INसू८६७ अभयदेवी-||४|रिया, जइ अकिरिया तेणेव भवग्गहणेणं सिझंति जाच अंतं करेंति?, हंता सिझंति जाव अंतं करेन्ति.॥ या वृत्तिः २ जइ सलेस्सा किं सकिरिया अकिरिया?, गोयमा! सकिरिया नो अकिरिया, जइ सकिरिया तेणेव भवग्ग॥९७६ हणणं सिझंति जाव अंतं करेन्ति?, गोयमा! अत्यगइया तेणेव भवग्रहणणं सिझंति जाच अंतं करेन्ति अत्यगइया नो तेणेव भवग्गहणेणं सिज्झति जाच अंतं करेन्ति, जइ आपअजसं उवजीवंति किं सलेस्सा ४ है अलेस्सा?, गोयमा! सलेस्सा नो अलेस्सा, जइ सलेस्सा कि सकिरिया अकिरिया?, गोयमा! सकिरियाद नो अकिरिया, जह सकिरिया तेणेव भवग्गहणेवं सिझंति जाव अंतं करेंति?, नो इणढे समहे । वाणमं तरजोइसियथेमाणिया जहा नेरइया । सेवं भंते! सेवं भंते! त्ति ।। रासीजुम्मसए पढमो उद्देसओ॥४११॥8. तरासीजुम्मतेओयनेरइया णं भंते! को उववज्जति?, एवं चेव उद्देसओ भाणियहो नवरं परिमाणं तिन्नि वा सत्त वा एकारस वा पन्नरस वा संखेजा वा असंखेजा वा उवव. संतरं तहेव, ते णं भंते! जीवा समय तेयोगा समयं कडजुम्मा अंसमयं कडजुम्मा समयं तेयोगा?, णो इणहे समझे, जंसमयं तेयोया तंसमयं | दादावरजुम्मा समयं दावरजुम्मा समयं तेयोया?, णो इणढे समढे, एवं कलियोगेणवि समं, सेसं तं घेथ | जाव वेमाणिया नवरं उववाओ सबेर्सि जहा वकंतीए । सेवं भंते! सेवं भंते! ति ॥४२॥रासीजुम्म ACCCCCAS .. अत्र मूल-संपादने सूत्रक्रम-सूचने एका स्खलना दृश्यते- सू. ८६६ स्थाने ८६७ मुद्रितं (यहां सूत्रक्रम ८६६ लिखना भूल गये है, सिधा ८६७ लिखा है ४१ शतके १ से १९६ उदेशका: वर्तते तद् अन्तर्गत अत्र उद्देशक: १ समाप्त:, उद्देशक: २ आरब्ध: एवं समाप्त:, उद्देशक: ३ आरब्ध: ~368 Page #369 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (०५) [भाग-११]“भगवती”– अंगसूत्र -५ (मूलं + वृत्ति:) शतक [४१], वर्ग [-], अंतर- शतक [-], उद्देशक [१-१९६], मूलं [ ८६७-८६८ ] पूज्य आगमोद्धारकश्री संशोधितः मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित.. आगमसूत्र - [०५] अंगसूत्र- [ ०५] "भगवती" मूलं एवं अभयदेवसूरि-रचिता वृत्तिः | दावरजुम्मनेरइया णं भंते! कओ उबवजन्ति ?, एवं चेव उद्देसओ नवरं परिमाणं दो वा छ वा दस वा | संखेज्जा वा असंखेना वा उववज्जंति संवेहो, ते णं भंते! जीवा जंसमयं दावरजुम्मा तंसमयं कडजुम्मा जंसमयं कडजुम्मा तंसमयं दावरजुम्मा ?, णो इणट्ठे समट्ठे, एवं तेपोएणवि समं, एवं कलियोगेणवि समं, सेसं जहा पढमुद्देस जाव वैमाणिया । सेवं भंते! २ त्ति ॥ ४११३ ॥ रासीजुम्मकलिओगनेरइया णं भंते! कओ उववज्रंति ?, एवं चैव नवरं परिमाणं एको वा पंच वा नव वा तेरस वा संखेला वा असंखेला उबबज्जन्ति संवेहो, ते णं भंते! जीवा जंसमयं कलियोगा तंसमयं कडजुम्मा समयं कडजुम्मा तंसमयं कलियोगा ?, नो इणट्टे समट्ठे, एवं तेयोएणवि समं, एवं दावरजुम्मेणवि समं, सेसं जहा पढमुद्देसए जाव बेमाणिया । सेवं भंते! २न्ति ॥ ४१४ ॥ कण्हलेस्सरासीजुम्मकडजुम्मनेरइया णं भंते! कओ उववज्जन्ति ?, उधवाओ जहा घुमप्पभाए सेसं जहा पढमुद्देसए, असुरकुमाराणं तहेव एवं जाव वाणमंतराणं मणुस्साणवि जहेब नेरइयाणं आय अजसं उचजीवंति अलेस्सा अकिरिया तेणेव भवग्गणेणं सिज्झति एवं न भाणियां सेसं जहा पढमुद्देसए। सेवं भंते! सेवं भंतेति ॥ ४१।५ ॥ कण्हलेस्सतेयोपहिवि एवं चेव उद्देसओ, सेवं भंते ! २ति ॥ ४११६ ॥ कण्हलेस्सदावरजुम्मेहिं एवं चेव उद्देसओ । सेवं भंते! २त्ति ॥ ४११७ ॥ कण्हलेस्सकलिओएहिवि एवं चेव उद्देसओ परिमाणं संवेहो य जहा ओहिएस उद्देसएस सेवं भंते । २त्ति ॥४१॥ ८ ॥ जहा कण्हलेस्सेहिं एवं नीललेस्सेहिवि चत्तारि उद्देगा भाणियचा निरवसेसा, नवरं नेरइयाणं उबवाओ For Parts Only wor ४९ शतके १ से १९६ उदेशका: वर्तते तद् अन्तर्गत अत्र उद्देशकः ३ समाप्तः, उद्देशक: ४७ आरब्धः एवं समाप्त, उद्देशकः ८ आरब्धः ~369~ Page #370 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (०५) [भाग-११]"भगवती"-अंगसूत्र-५ (मूलं+वृत्ति:) शतक [४१], वर्ग -1, अंतर्-शतक [-], उद्देशक [१-१९६], मूलं [८६७-८६८] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र- [०५], अंगसूत्र- [०५] "भगवती मूलं एवं अभयदेवसूरि-रचिता वृत्ति: जहा वालुयप्पभाए सेसं तं चेव । सेवं भंते! सेवं भंते! त्ति ॥४१॥१२॥ काउलेस्सेहिषि एवं व पत्तारि४१ शतके प्रज्ञप्तिः उद्देसगा कायवा नवरं नेरइयाण उववाओजहारयणप्पभाए, सेसं तं चेव । सेवं भंते ! सेवं भंते। ति ॥४१॥१६॥ सू ८६७ अभयदेवी- तेउलेस्सरासीजुम्मकडजुम्मअसुरकुमारा णं भंते! कओ उबवजन्ति, एवं चेव नवरं जेसु तेउलेस्सा अस्थि या वृत्तिः तेसुभाणिय, एवं एएवि कण्हलेस्सासरिसा चत्तारि उद्देसगा कायबा । सेवं भंते!२ ॥४१२०॥ एवं ॥९७७॥ पम्हलेस्साएवि चत्तारि उद्देसगा कायदा पंचिंदियतिरिक्खजोणियाणं मणुस्साणं वेमाणियाण य एएसिं पम्हलेस्सा सेसाणं नत्थि । सेवं भंते ! २त्ति ॥४१२२४ ॥ जहा पम्हलेस्साए एवं सुकलेस्साएवि चत्तारि उद्देसगा कायचा नवरं मणुस्साणं गमओ जहा ओहिउद्देसएसु सेसं तं चेव, एवं एए छसु लेस्सासु चउवीस उसगा ओहिया चत्तारि, सधे ते अठ्ठावीसं उद्देसगा भवंति । सेवं भंते! २त्ति ॥ ४१२२८॥ भवसिद्धिय रासीजुम्मकडजुम्मनेरइया णं भंते! कओ उबव०? जहा ओहिया पहमगा चत्तारि उद्देसगा तहेव निरष-18 है सेसं एए चत्तारि उद्देसगा।सेवं भंते!२त्ति ॥४१॥३२॥ कण्हलेस्सभवसिद्धियरासीजुम्मकडजुम्मनेरइयाणं भंते। कओ उवव०१, जहा कण्हलेस्साए चत्तारि उद्देसगा भवंति तहा इमेवि भवसिद्धिपकण्हलेस्सेहिवि चत्तारि ४ उद्देसगा कायवा ॥४१॥३६॥ एवं नीललेस्सभवसिद्धिएहिवि चत्तारि उद्देसगा कायद्या ॥४१॥४०॥ एवं है। काउलेस्सेहिवि चत्तारि उसगा ॥४१४४ ॥ तेउलेस्सेहिदि चत्तारि उद्देसगा ओहियसरिसा ॥४१॥४८॥ ॥९७७॥ पम्हलेस्सेहिवि चत्तारि उद्देसगा ॥ ४१३५२॥ सुक्कलेस्सेहिवि चत्तारि उद्देसगा ओहियसरिसा, एवं एएवि| SMSOHARSAMSUCCESS ... अत्र मूल-संपादने सूत्रक्रम-सूचने एका स्खलना दृश्यते- सू. ८६६ स्थाने ८६७ मुद्रितं (यहां सूत्रक्रम ८६६ लिखना भूल गये है, सिधा ८६७ लिखा है ४१ शतके १ से १९६ उदेशका: वर्तते तद् अन्तर्गत अत्र उद्देशक: ८ समाप्त:, उद्देशका: ९ - ५२ आरब्धा: एवं समाप्ता:, उद्देशक: ५३ आरब्धा: ~370 Page #371 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (०५) [भाग-११]"भगवती"-अंगसूत्र-५ (मूलं+वृत्ति:) शतक [४१], वर्ग -], अंतर्-शतक [-], उद्देशक [१-१९६], मूलं [८६७-८६८] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र- [०५], अंगसूत्र- [०५] "भगवती मूलं एवं अभयदेवसूरि-रचिता वृत्ति: CASCCUCCESS भवसिद्धिएहिवि अट्ठावीसं उद्देसगा भवंति । सेवं भंते! सेवं भंते । ति॥४१३५६ ॥ अभवसिद्धियरासीजुम्म| कडजुम्मनेरइया णं को उबवजन्ति जहा पढमो उद्देसगो नवरं मणुस्सा नेरइया य सरिसा भाणियबा, सेसंटी तहेव । सेवं भंते!२। एवं चउसुषि जुम्मेसु चत्तारि उद्देसगा । कण्हलेस्सअभय सिद्धियरासीजुम्मकडजुम्मनेरड्या णं भंते ! कओ उववजंति, एवं चेव चत्तारि उद्देसगा, एवं नीललेस्सअभव. चत्तारि उद्देसगा काउलेस्सेहिवि चत्तारि उद्देसगा तेउलेस्सेहिवि चत्तारि उसगा पम्हलेस्सेहिवि चत्तारि उद्देसगा मुफलेस्सअभवसिद्धिएवि चत्तारि उद्देसगा, एवं एएसु अट्ठावीसाएवि अभवसिद्धियजसएम मणुस्सा नेरदयगमेणं नेयवा । सेवं भंते! २त्ति । एवं एएवि अट्ठावीस उद्देसगा ॥ ४१२८४ ॥ सम्मदिहीरासीजुम्मकडजुम्मनेरइया णं भंते! कओ उववर्जति ?, एवं जहा पढमो उद्देसओ एवं चउसुवि जुम्मेसु चत्तारि उद्देसगा भवसिद्धियसरिसा कायवा । सेवं भंते! २त्ति ॥ कण्हलेस्ससम्मदिट्ठीरासीजुम्म कडजुम्मनेरइया णं भंते! कओ उववजंति, एएवि कण्हलेस्ससरिसा चत्तारिवि उद्देसगा कायबा, एवं ६ सम्मदिट्ठीमुचि भवसिद्धियसरिसा अट्ठाधीसं उद्देसगा कायद्या । सेवं भंते ! सेवं भंतेत्ति जाव विहरइ ॥४१॥ ११२ ॥ मिच्छादिट्ठीरासीजुम्मकडजुम्मनेरहया णं भंते! कओ ववजति , एवं एथवि मिच्छादिद्विअभिलावेणं अभवसिद्धियसरिसा अट्ठावीसं उद्देसगा कायबा । सेवं भंते ! सेवं भंतेत्ति ॥ ४१३१४०॥ कण्हपक्खियरासीजुम्मकडजुम्मनेरइया णं भंते! कओ उववजंति ?, एवं एत्थवि अभवसिद्धियसरिसा अट्ठावीसं ४१ शतके १ से १९६ उदेशका: वर्तते तद् अन्तर्गत अत्र उद्देशक: ५३ समाप्त:, उद्देशका: ५४ - १४० आरब्धा: एवं समाप्ता:, उद्देशक: १४१.. आरब्धा: ~371 Page #372 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (०५) [भाग-११]“भगवती”– अंगसूत्र -५ (मूलं + वृत्ति:) शतक [४१], वर्ग [-], अंतर् शतक [-] उद्देशक [१-१९६], मूलं [ ८६७-८६८ ] पूज्य आगमोद्धारकश्री संशोधितः मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र- [०५] अंगसूत्र- [ ०५] "भगवती" मूलं एवं अभयदेवसूरि-रचिता वृत्तिः व्याख्याप्रज्ञप्तिः अभयदेवीबा वृत्तिः २ ४ ॥ ९७८ ॥ उद्देसगा काया । सेवं भंते । २ति ॥ ४१।१६८ ॥ सुकपविस्वरासीजुम्मकडजुम्मनेरहया णं भंते! कओ उववजंति ?, एवं एत्थचि भवसिद्धियसरिसा अट्ठावीसं उद्देसमा भवंति एवं एए सधेवि छन्नजयं उद्देसगसयं भवन्ति रासीजुम्मसमं ॥ ४१११९६ ।। जाप सुकलेस्सा सुकपक्खिपरासीजुम्मक लियोगवेमाणिया जाव जइ सकिरिया तेणेव भवग्गणेणं सिज्झति जाव अंत करेंति, गो इणट्ठे समट्ठे, सेवं भंते ! २त्ति । (सूत्रं ८६७ ) भगवं गोयमे समणं भगवं महावीरं तिक्खुत्तो आवाहिणपयाहिणं करेह २ त्ता वंदति नम॑सति वंदिता नमसित्ता एवं वयासी- एवमेयं भंते! तहमेयं भंते! अवितहमेयं भंते! असंदिद्धमेयं भंते । इच्छियमेयं भंते! पडिच्छियमेयं भंते! इच्छियपडिच्छियमेयं भंते! सबै णं एसमट्ठे जे णं तुज्झे वदहत्तिकट्टु, अपूतिवयणा खलु अरिहंता भंगवंतो, समणं भगवं महावीरं वंदति नम॑सति वंदित्ता नमसित्ता संजमेणं तवसा अप्पाणं भावेमाणे विहरह || ( सूत्रं ८६८ ) रासीजुम्मसमं सम्मतं ॥ ४१ सतं । सवाए भगवईए अडतीसं सतं स्याणं १३८ उद्देसगाणं १९२५ ॥ ॥ इति श्रीमती भगवती समाप्ता ॥ 'रासम्म त युग्मशब्दो युगलवाचकोऽप्यस्त्यतोऽसाविह राशिशब्देन विशेष्यते ततो राशिरूपाणि युग्मानि न तु द्वितयरूपाणीति राशियुग्मानि, 'रासीजुम्मकडजुम्मनेरइय'त्ति राशियुग्मानां भेदभूतेन कृतयुग्मेन ये प्रमितास्ते राशियुग्मकृतयुग्मास्ते च ते नैरविकाश्चेति समासोऽतस्ते । 'अणुसमय मित्यादि, पदत्रयमेकार्थम् । 'आयजसेणं'ति | आत्मनः सम्बन्धि यशो यशोहेतुत्वाद्यशः- संयमः आत्मयशस्तेन, 'आयजसं उबजीवंति 'त्ति 'आत्मयशः' आत्मसंय Education Internation For Parts Only ४१ शतके १ से १९६ उदेशकाः वर्तते तद् अन्तर्गत अत्र उद्देशक: १४१.. समाप्तः, उद्देशका: १४२ १९६ आरब्धाः एवं समाप्ताः, शतकं एकचत्वारिंशतं परिसमाप्तं ~372~ ४१ शतके सू० ८६७ समाप्तिः सू. ८६८ ॥ ९७८ ॥ Page #373 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (०५) [भाग-११]"भगवती"-अंगसूत्र-५ (मूलं+वृत्ति:) शतक [४१], वर्ग -], अंतर्-शतक [-], उद्देशक [१-१९६], मूलं [८६७-८६८] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र- [०५], अंगसूत्र- [०५] "भगवती मूलं एवं अभयदेवसूरि-रचिता वृत्ति: मम् 'उपजीवन्ति आश्रयन्ति विदधतीत्यर्थः, इह च सर्वेषामेवात्मायशसैवोत्पत्तिः उत्पत्ती सर्वेपामध्यविरतत्वादिति । &इह च शतपरिमाणमिदम्-आद्यानि द्वात्रिंशच्छतान्यविद्यमानावान्तरशतानि ३२ त्रयस्त्रिंशादिषु तु सप्तसु प्रत्येकमवा न्तरशतानि द्वादश ८४ चत्वारिंशे त्वेकविंशतिः २१ एकचत्वारिंशे तु नास्त्यवान्तरशतम् १, एतेषां च सर्वेषां मील|| नेऽष्टत्रिंशदधिकं शतानां शतं भवति, । एवमुद्देदाकपरिमाणमपि सर्व शाखमवलोक्यावसेयं, तच्चैकोनविंशतिशतानि पश्च-d विंशत्यधिकानि ॥ इह शतेषु कियत्स्वपि वृत्तिका, विहितवानहमस्मि सुशङ्कितः। विवृतिचूर्णिगिरां विरहाद्विहक, कथम| शमियय॑थवा पथि? ॥१॥ एकचत्वारिंशं शतं वृत्तितः परिसमाप्तम् ॥४१॥ अथ भगवत्या व्याख्याप्रज्ञप्त्याः परिमाणाभिधित्सया गाथामाहचुलसीयसयसहस्सा पदाण पवरवरणाणदंसीहि । भावाभावमणता पन्नत्ता एत्थमंगंमि ॥१॥ 'चुलसी'त्यादि, चतुरशीतिः शतसहस्राणि पदानामत्राने इति सम्बन्धः, पदानि च विशिष्टसम्प्रदायगम्यानि, प्रव-18) राणां वरं यज्ज्ञानं तेन पश्यन्तीत्येवंशीला ये ते प्रवरज्ञानदर्शिनस्तैः केवलिभिरित्यर्थः प्रज्ञप्तानीति योगः, इदमस्या सूत्रस्य स्वरूपमुक्तमधार्थस्वरूपमाह-'भावाभावमणंत'त्ति 'भावा-जीवादयः पदार्थाः अभावाश्च-त पवान्यापेक्षया भावाभावाः, अथवा भावा-विधयोऽभावा-निषेधाः प्राकृतत्वाञ्चेत्धंनिर्देशः 'अनन्ताः' अपरिमाणाः अथवा भावाभावै १ यद्यपि संग्रहणीगाथानुसारियन्त्रकानुसारेण प्रयोविंशवधिकमेकोनविर्श शतमुद्देशकानां भवति पर बादाम्तराभिप्रायेण विंशतिसमें शतके द्वादशोदेशकाः | यतस्तत्र न प्रस्तुत्वाचनायामिव परः पृष्ध्युद्देशकः पृथ्यवायुखरूपानिधायों किंतु शकत्रयमेव मिझ, अब तु प्रयाभिधाम्यपि पृथ्व्युपलक्षणत्वात् पृथ्व्युदेशकन्नयाभिधाग्यप्येक एवेति । सूत्रकार रचित उपसंहार-गाथा: एवं तस्या अभयदेवसूरि-रचिता वृत्तयः ~3730 Page #374 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (०५) [भाग-११]"भगवती"-अंगसूत्र-५ (मूलं+वृत्ति:) शतक [-], वर्ग [-], अंतर्-शतक [-], उद्देशक [-], मूलं ] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र- [०५], अंगसूत्र- [०५] "भगवती मूलं एवं अभयदेवसूरि-रचिता वृत्ति: व्याख्याप्रज्ञप्तिः अभयदेवीया वृत्तिः ॥९७९॥ विषयभूतैरनन्तानि भावाभावानन्तानि चतुरशीतिः शतसहस्राणि प्रज्ञप्तानि 'अत्र' प्रत्यक्षे पश्चमे इत्यर्थः 'अङ्गे प्रवचन- अन्त्यमंगपरमपुरुषावयव इति गाथार्थः ॥१॥ लादि सू. अथान्त्यमङ्गलार्थ संघं समुद्ररूपकेण स्तुवन्नाह ८६२ तवनियमविणयवेलो जयति सदा नाणविमलविपुलजलो । हेतुसतविपुलवेगो संघसमुद्दो गुणविसालो ॥२॥ 'तवे'त्यादि गाथा, तपोनियमविनया एवं बेला-जलवृत्तिरवसरवृद्धिसाधाद्यस्य स तथा 'जयति' जेतव्यजयेन विजयते 'सदा सर्वदा ज्ञानमेव विमलं निर्मलं-विपुलं-विस्तीर्ण जलं यस्य स तथा अस्ति (अस्ताप) स्वसाधारस तथा, हेतुशतानि-इष्टानिष्टार्थसाधननिराकरणयोर्लिङ्गशतानि तान्येव विपुलो-महान् वेग:-कलोलाव दिरयो यस्य विवक्षितार्थक्षेपसाधनसाधर्म्यात्स तथा 'संघसमुद्रः' जिनप्रवचनोदधिर्गाम्भीर्यसाधात् , अथवा साधर्म्य साक्षादेवाह-गुणैः-गाम्भीर्यादिभिर्विशालो विस्तीर्णस्तद्बहुत्वाद्यः स तथेति गाथार्थः ॥२॥ णमो गोयमाईणं गणहराणं, णमो भगवईए विवाहपन्नत्तीए, णमो दुवालसंगस्स गणिपिडगस्स ॥ [कुसुम] कुम्मसुसंठियचलणा, अमलियकोरंटबॅटसंकासा । सुयदेवया भगवई मम मतितिमिरं पणासेउ ॥१॥ । पन्नत्तीए आइमाणं अट्ठपहं सयाणं दो दो उद्देसगा उद्दिसिजन्ति णवरं चउत्थे सए पढमदिवसे अट्ट बितियदिवसे दो उद्देसगा उद्दिसिजंति, नवरं नवमाओ सताओ आरद्धं जावइयं जावइयं एति तावतियं २ एगदिवसेर्ण उद्दिसिजति उकोसेणं सतंपि एगदिवसेणं मज्झिमेणं दोहिं दिवसेहिं सतं जहन्नेणं तिहिं दिव-13 सूत्रकार रचित उपसंहार-गाथा: एवं तस्या अभयदेवसूरि-रचिता वृत्तयः ~374 Page #375 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (०५) [भाग-११]“भगवती”- अंगसूत्र -५ (मूलं + वृत्ति:) शतक [-], वर्ग [-], अंतर्-शतक [-], उद्देशक [-], मूलं [-] पूज्य आगमोद्धारकश्री संशोधितः मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित.. आगमसूत्र - [०५] अंगसूत्र- [ ०५] "भगवती" मूलं एवं अभयदेवसूरि-रचिता वृत्तिः सेहिं सतं एवं जाव वीसतिमं सतं, णवरं गोसालो एगदिवसेणं उद्दिसिजति जदि दियो एगेण चेव आर्यबिलेणं अणुन्नजिहीति अह ण ठितो आयंबिलेणं छट्टेणं अणुण्णवति, एकवीसबावीस तेवीसतिमाई सताई एकेक दिवसेणं उद्दिसिज्जन्ति, चञ्वीसतिमं सयं दोहिं दिवसेहिं छ छ उद्देसगा, पंचवीसतिमं दोहिं दिवसेहिं छछ उद्देसगा, बंधिसयाइ अट्टसयाई एगेणं दिवसेणं सेढिसयाई बारस एगेणं एर्गिदियमहाजुम्मसयाई बारस एगेणं एवं बंदियाणं वारस तेइंदियाणं बारस चंडरिंदियाणं वारस एगेण असन्निपंचिदियाणं वारस सन्निपंचिंद्रियमहाजुम्मसपाई एकवीसं एगदिवसेणं उद्दिसिज्जन्ति रासीजुम्मसतं एगदिवसेणं उद्दिसिजति ॥ विसिय अरविंदकरा नासियतिमिरा सुथाहिया देवी । मज्झपि देव मेहं वुहविवहणमंसिया णिचं ॥ १ ॥ | सुयदेवयाऍ पणमिमो जीए पसाएण सिक्खियं नाणं । अण्णं पवयणदेवी संतिकारी तं नम॑सामि ॥ १ ॥ ॥ इति श्रीभगवती सूत्रं सम्पूर्णम् ॥ सुदेवया य जक्खो कुंभारो बंभसंति वेरोहा । विज्ञाय अंतहुंडी देउ अविग्धं लिहंतस्स ॥ १ ॥ (सू० ८६९) इति श्रीविवाहपन्नत्ती पंचमं अंगं सम्मन्तं ॥ श्रेयोऽस्तु लेखकपाठकयोः ॥ ग्रं० १५७५१ ॥ श्रीरस्तु ॥ 'मो गोयमाणं गणहराण' मित्यादयः पुस्तक लेखककृता नमस्काराः प्रदार्थाश्चेति न व्याख्याताः ॥ इति श्रीमदभयदेवसूरिविरचिता श्रीपञ्चमाङ्गविशेषवृत्तिः परिसमाप्ता ॥ Education International 1441 For Park Lise Only सूत्रकार रचित उपसंहार-गाथा: एवं तस्या अभयदेवसूरि-रचिता वृत्तयः ~375~ Page #376 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (०५) [भाग-११]“भगवती”- अंगसूत्र -५ (मूलं + वृत्ति:) शतक [-], वर्ग [-], अंतर् शतक [-], उद्देशक [-], मूलं [-] पूज्य आगमोद्धारकश्री संशोधितः मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित.. आगमसूत्र - [०५] अंगसूत्र- [ ०५] "भगवती" मूलं एवं अभयदेवसूरि-रचिता वृत्तिः व्याख्या प्रज्ञप्तिः अभयदेवीया वृत्तिः २ ॥ ९८० ॥ Education International यदुक्तमादाविह साधुयोधैः, श्रीपञ्चमाङ्गोन्नतकुञ्जरोऽयम् । सुखाधिगम्योऽस्त्विति पूर्वगुवीं, प्रारभ्यते वृत्तिवरत्रिकेयम् ॥ १ ॥ समर्थितं तत्पटुबुद्धिसाधुसाहायकात्केवलमत्र सन्तः । सद्धिदात्र्याऽपगुणांनन्तु, सुखग्रहा येन भवत्यथैषा ॥ २ ॥ वांद्रे कुठे सनकक्षकल्पे, महाद्रुमो धर्म्मफलप्रदानात् । छायान्वितः शस्तविशालशाखः, श्रीवर्द्धमानो मुनिनायकोऽभूत् ॥ ३ ॥ तत्पुष्पकल्पी विलसद्विहारसगन्धसम्पूर्णदिशौ समन्तात् । बभूवतुः शिष्यवरावनीचवृत्ती श्रुतज्ञानपरागवन्तौ ॥ ४ ॥ एकस्तयोः सूरिवरो जिनेश्वरः ख्यातस्तथाऽन्यो भुवि वुद्धिसागरः । तयोर्विनेयेन विबुद्धिनाऽप्यलं, वृत्तिः कृतैषाऽभयदेवसूरिणा ॥ ५ ॥ तयोरेव विनेयानां तत्पदं चानुकुर्वताम् । श्रीमतां जिनचन्द्राख्यसत्प्रभूणां नियोगतः ॥ ६ ॥ श्रीमज्जिनेश्वराचार्यशिष्याणां गुणशालिनाम् । जिनभद्रमुनीन्द्राणामस्माकं चांहिसेविनः ॥ ७ ॥ यशश्चन्द्रगणेर्गादसाहाय्यात्सिद्धिमागता । परित्यक्तान्यकृत्यस्य युक्तायुक्तविवेकिनः ॥ ८ ॥ युग्मम् । For Penal Use On वृत्तिकार - रचिता प्रशस्ति-गाथा: ~376~ टीकाकारप्रशस्तिः ॥ ९८० ॥ Page #377 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम (०५) भाग 11 [भाग-११]“भगवती” - अंगसूत्र - ५ ( मूलं + वृत्ति:) शतक [-], वर्ग [-], अंतर् शतक [-], उद्देशक [-], मूलं [-] पूज्य आगमोद्धारकश्री संशोधितः मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित.. आगमसूत्र - [०५] अंगसूत्र- [०५] "भगवती" मूलं एवं अभयदेवसूरि-रचिता वृत्तिः Jam Educat शास्त्रार्थनिर्णयसुसौरभ लम्पटस्य, विद्वन्मधुत्रतगणस्य सदैव सेव्यः । श्री निर्वृताख्य कुलसन्नदपद्मकल्पः, श्रीद्रोणसूरिरनवद्ययशःपरागः ॥ ९ ॥ शोधितवान् वृत्तिमिमां युक्तो विदुषां महासमूहेन । शास्त्रार्थनिष्कनिकपणकपपट्टक कल्पबुद्धीनाम् ॥ १० ॥ विशोधिता तावदयं सुधीभिस्तथाऽपि दोषाः किल संभवन्ति । मन्महतस्तांश्च विहाय सद्भिस्तद्ब्राह्ममाप्ताभिमतं यदस्याम् ॥ ११ ॥ यदवातं मया पुण्यं वृत्ताविह शुभाशयात् । मोहाद्वृत्तिजमन्यच्च तेनागो मे विशुद्ध्यतात् ॥ १२ ॥ प्रथमादर्शे लिखिता विमलगणिप्रभृतिभिर्निजविनेयैः । कुर्वद्भिः श्रुतभक्तिं दक्षैरधिकं विनीतैश्च ॥ १३ ॥ अस्याः करणव्याख्या श्रुतिलेखनपूजनादिषु यथार्हम्। दाधिकसुतमाणिक्यः प्रेरितवानस्मदादिजनान् ॥ १४ ॥ अष्टाविंशतियुक्ते वर्षसहस्रे शतेन चाभ्यधिके । अणहिलपाटकनगरे कृतेयमच्छुतधनिवसती ॥ १५ ॥ अष्टादश सहस्राणि षट्शतान्यथ षोडश । इत्येवमानमेतस्याः, श्लोक मानेन निश्चितम् ॥ १६॥ अङ्कतोऽपि १८६१६ ॥ इति श्रीमदभयदेवसूरिविरचिता श्रीपञ्चमाङ्गविशेषवृत्तिः परिसमाप्ता ॥ ** इति वृत्तिकार - रचिता प्रशस्ति-गाथा: पञ्चम-अङ्गसूत्रं ‘भगवती' मूलं एवम् अभयदेवसूरि-रचिता वृत्तिः परिसमाप्ता भगवती-अंगसूत्र- [५/४] मूलं एवं अभयदेवसूरिजी रचिता टीका परिसमाप्ताः मूल संशोधकः सम्पादकश्च पूज्य आनंदसागरसूरीश्वरजी महाराज साहेब किंचित् वैशिष्ट्य समर्पितेन सह पुनः संकलनकर्ता मुनि दीपरत्नसागरजी [M.Com., M.Ed., Ph.D., श्रुतमहर्षि] ~377~ Page #378 -------------------------------------------------------------------------- ________________ भाग कुलपृष्ठ ३१४ ५८६ ४९८ ३९२ ५९४ ४९४ ३३८ ५९२ ५५२ सवत्तिक-आगम-सत्ताणि भाग १ से ४० में कहां क्या मिलेगा? इस भागमे समाविष्ट आगम के नाम और आगम-क्रम 01 | आगम ०१ आचार मूलं एवं वृत्ति भाग-१ श्रुतस्क्न्ध -१, अध्ययन- १,२ 02 | आगम ०१ आचार मूलं एवं वृत्ति, भाग-२ श्रुतस्कन्ध-१, अध्ययन-३ से ९, श्रुतस्कन्ध- २ 03 | आगम ०२ सूत्रकृत मूलं एवं वृत्ति, भाग-१ श्रुतस्कन्ध-१, अध्ययन-१ से १३ 04 | आगम ०२ सूत्रकृत मूलं एवं वृत्ति, भाग-२ श्रुतस्क्न्ध -१, अध्ययन १४ से १६, श्रुतस्कन्ध-२ 05 आगम ०३ स्थान मूलं एवं वृत्ति, भाग-१ स्थान- १ से ४ 06 आगम ०३ स्थान मूलं एवं वृत्ति, भाग-२ स्थान- ५ से १० संपूर्ण 07 | आगम ०४ समवाय मूलं एवं वृत्ति. 08 आगम ०५ भगवती मूलं एवं वृत्ति, भाग-१ शतक-१ से ६ 09 | आगम ०५ भगवती मूलं एवं वृत्ति, भाग-२ शतक-0 से ११ 10 | आगम ०५ भगवती मूलं एवं वृत्ति, भाग-३ शतक- १२ से २० 11 | आगम ०५ भगवती मूलं एवं वृत्ति, भाग-४ शतक- २१ से ४१ संपूर्ण 12 आगम ०६ ज्ञाताधर्मकथा मूलं एवं वृत्ति. 13 आगम-७,८,९,१०उपासकदशा, अंतकृतदशा, अनुत्तरोपपातिकदशा, प्रश्नव्याकरण मूलं एवं वृत्ति. 14 | आगम-११,१२, विपाक, उववाई मूलं एवं वृत्ति. 15 आगम १३ राजप्रश्नीय मूलं एवं वृत्ति. 16 | आगम१४ जीवाजीवाभिगम भाग-१ मूलं एवं वृत्ति. [प्रतिपत्ति-३-अतर्गत सूत्र-१ से १३८ 17 | आगम१४ जीवाजीवाभिगम भाग-२ मूलं एवं वृत्ति. [प्रतिपत्ति-३-अतर्गत] सूत्र- १३९ से प्रतिपत्ती-१० संपूर्ण 18 | आगम १५ प्रज्ञापना भाग-१ मूलं एवं वृत्ति. पद-१ से ५ 19 | आगम १५ प्रज्ञापना भाग-२ मूलं एवं वृत्ति. पद-६ से २२ 20 आगम १५ प्रज्ञापना भाग-३ मूलं एवं वृत्ति. पद- २३ से ३६ संपूर्ण 21 | आगम १६ सूर्यप्रज्ञप्ति मूलं एवं वृत्ति. ५१४ ३८४ ५२२ ५३८ ३८४ ३१४ ४८० ४८८ ४२६ ५१४ ३३६ ६१० ~378~ Page #379 -------------------------------------------------------------------------- ________________ कुलपृष्ठ ६१४ ३७६ ४२६ ३४४ ३१२ ३३० ४६६ ४४२ सवत्तिक-आगम-सत्ताणि भाग १ से ४० में कहां क्या मिलेगा? इस भागमे समाविष्ट आगम के नाम और आगम-क्रम । आगम १७ चन्द्रप्रज्ञप्ति मूलं एवं वृत्ति. आगम१८ जंबूद्विपप्रज्ञप्ति भाग-१ मूलं एवं वृत्ति. वक्षस्कार- १ एवं २. आगम१८ जंबूद्विपप्रज्ञप्ति भाग-२ मूलं एवं वृत्ति. वक्षस्कार- ३ एवं ४. 25 | आगम१८ जंबूद्विपप्रज्ञप्ति भाग-३ मूलं एवं वृत्ति. वक्षस्कार- ५ से ७. आगम १९ थी ३२ निरयावलिका, कल्पवतंसिका, पुष्पिका, पुष्पचूलिका, वृष्णिदशा, चतुःशरण, आतुरपरत्याख्यान, महाप्रत्याख्यान, भक्तपरिज्ञा, तंदुलवैचारिक, संस्तारक, गच्छाचार, गणिविद्या, देवेन्द्रस्तव मूलं एवं छाया 27 | आगम ३३ थी ३९ मरणसमाधि मूलं एवं छाया, निशीथ, बुहत्कल्प, व्यवहार, दशाश्रुतस्कंध, जीतकल्प/पंचकल्प, महानिशीथ मूलं एव | आगम ४० आवश्यक मूल एवं वृत्ति, भाग-१, नियुक्ति-१ से ५२१ 29 | आगम ४० आवश्यक मूलं एवं वृत्ति, भाग-२, नियुक्ति- ५२२ से ९५१ आगम ४० आवश्यक मूलं एवं वृत्ति, भाग-३ नियुक्ति- ९५२ से १२७३ अपूर्ण, [अध्ययन- १ से ४ अपूर्ण) | आगम ४० आवश्यक मूलं एवं वृत्ति, भाग-४ नियुक्ति- १२७३ अपूर्ण से १६२३, [अध्ययन- ४ अपूर्ण से ६ संपूर्ण] आगम ४१/१ ओघनियुक्ति मूलं एवं वृत्ति. आगम ४१/२ पिंडनियुक्ति मूलं एवं वृत्ति. आगम ४२ दशवैकालिक मूलं एवं वृत्ति. आगम ४३ उत्तराध्यन मूलं एवं वृत्ति, भाग-१, अध्ययन- १ से ५ आगम ४३ उत्तराध्यन मूलं एवं वृत्ति, भाग-२, अध्ययन- ६ से २१ आगम ४३ उत्तराध्यन मूलं एवं वृत्ति, भाग-३, अध्ययन- २२ से ३६ आगम ४४ नन्दिसूत्र मूलं एवं वृत्ति. 39 आगम ४५ अनुयोगद्वार मूलं एवं वृत्ति. 40 कल्पाबारसा]सूत्र... चतुःशरण, तन्दुलवैचारिक, गच्छाचार मूलं एवं वृत्ति. 30 ४६४ 31 ४२६ કર ३७६ ५९० ५२२ ४८२ ४६६ ५२८ ५६० ३९४ ~379 Page #380 -------------------------------------------------------------------------- ________________ नमो नमो निम्मलदंसणस्स पूज्य आनंद-क्षमा-ललित-सुशील-सुधर्मसागर गुरुभ्यो नम: 5/4 पूज्य आगमोध्धारक आचार्य श्री सागरानंदसूरीश्वरेण संशोधित: संपादितश्च “भगवती सूत्र"शतक- २१ से ४१ [मूलं एवं अभयदेवसूरि-रचित वृत्तिः] म (किंचित् वैशिष्ठ्यं समर्पितेन सह) मुनि दीपरत्नसागरेण पुन: संकलित: "भगवती” मूलं एवं वृत्तिः” नामेण परिसमाप्त: "सवृत्तिक-आगम-सुत्ताणि' श्रेणि, भाग- 11 ~380 Page #381 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ਮਹਾਸ ਨੂੰ ਵੀ ਤਰਸ ਕਹੀ ਜਾਸ ਕਰ ਚਾਰ ਗਗਸ ਰਿਭਾਸ ਨੂੰ ਸਾਕਾਰ ਕੀਤਾ ਗਿਲ ਨੂੰ ਵੀ ਆਸ ਕਰ ਸਕਦਾ ਸਰਬਰ ਵੀ ਸੰਗਸ ਹਾਲ ਕਲਪਾਕ ਹਰਬੰਸ वाचना शताब्दी वर्ष ਦੀ ਗਲ ਕਰਨ ਲਈ ਸੈਕਸ ਦਾਲ ਰਾ ਰਸ ਗਲ ਗਮਾ ਮਾਸ ਸਨ ਕਰਨ - 381 ~ Page #382 -------------------------------------------------------------------------- ________________ नमो नमो निम्मलदसणस्स सवृत्तिक-आगम-सुत्ताणि मूल संशोधक अभिनव-संकलनकर्ता SHIKSHAMASANAVARA Beedonia पूज्यपाद आगमोद्धारक आचार्य श्री आनंदसागरसूरीश्वरजी महायज । आगम दिवाकर मुनिश्री दीपरत्नसागरजी __[M.Com., M.Ed., Ph.D., श्रुतमहर्षि] प्रत प्राप्ति और पेज सेटिंग कर्ता : के चेरमन श्री प्रवीणभाई शाह, अमेरिका मुद्रक : नवप्रभात प्रिन्टींग प्रेस अमदाबाद Mo 982559885579825306275 -382 Page #383 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ईस प्रोजेक्ट के संपूर्ण-अनुदान-दाता श्री आगम मंदिर पालिताणा MAHARASHARHAAHNIRAHENRAIGAR DA TEN SAHASRANIESARSHIVSHA EOELES N ~383 Page #384 -------------------------------------------------------------------------- ________________ मल संशोधक भाजामा आ आगाम साजमा मूल सशाधक पूज्यपाद आगमोद्धारक आचार्य - उस श्री आनंदसागरसूरीश्वरजी महाराजसाहेब मा आगमआजम आगम आगम् आजम आगम आगम आगम -5 'भगवती' मूलं एवं वृत्ति: [4] को आगम दिवाकर मुलिली दीपछलसालारजी आजमा आज अभिनव-संकलनकर्ता आजम आगम दिवाकर मुनिश्री दीपरत्नसागरजी आगम [M.Com., M.Ed., Ph.D., श्रुतमहर्षि] आजम आजम आगम आणम् आगम आजम आजम ~3844