SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 279
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ आगम (०५) प्रत सूत्रांक [८१२ -८१३] दीप अनुक्रम [९७८ -९७९] [भाग-११]“भगवती”- अंगसूत्र -५ (मूलं + वृत्ति:) शतक [२६], वर्ग [-], अंतर् शतक [-], उद्देशक [१], मूलं [८१२-८१३] पूज्य आगमोद्धारकश्री संशोधितः मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित.. आगमसूत्र - [०५] अंगसूत्र- [०५] "भगवती" मूलं एवं अभयदेवसूरि-रचिता वृत्तिः त्वस्याभावादाद्यावेध, शुकुलेश्ये जीवे सलेश्यभाविता भङ्गा वाच्याः, एतदेवाह - 'सुक्कले से' त्यादि, अलेश्य:- शैलेशीगतः सिद्धश्च तस्य च बद्धवान्न वन्नाति न भन्त्स्यतीत्येक एवेति एतदेवाह - 'अलेस्से 'चरमो'ति । 'कण्हपक्लिए पढम| बीय'त्ति कृष्णपाक्षिकस्यायोगित्वाभावात्, 'सुकपक्खिए तईयविहूणत्ति शुक्लपाक्षिको यस्मादयोग्यपि स्यादतस्तृतीय| विहीनाः शेषास्तस्य स्युरिति । एवं सम्मदिट्टिस्सवि'ति तस्याप्ययोगित्वसम्भवेन बन्धासम्भवान्मिथ्यादृष्टिमिश्रदृष्ट्यो| श्वायोगित्वाभावेन वेदनीयाबन्धकत्वं नास्तीत्याद्यावेव स्यातामत एवाह - 'मिच्छविट्टी'त्यादि, ज्ञानिनः केवलिनश्चा| योगित्वेऽन्तिमोऽस्ति, आभिनिबोधिकादिष्वयोगित्वाभावान्नान्तिम इत्यत आह- 'नाणस्से त्यादि, एवं सर्वत्र यत्रायो| गित्वं संभवति तत्र चरमो यत्र तु तन्नास्ति तत्राद्यौ द्वावेवेति भावनीयाविति ॥ आयुष्कर्म्मदण्डके जीवे णं भंते ! आउयं कम्मं किं बंधी बंध ? पुच्छा, गोयमा । अत्थेगतिए बंधी चउभंगो सलेस्से जाव सुकलेस्से चत्तारि भंगा अलेस्से चरिमो भंगो। कण्हपक्खिए णं पुच्छा, गोयमा ! अत्थेगतिए बंधी बंधइ बंधि| स्सइ अत्थेगतिए बंधी न बंधड़ बंधिस्सह, सुक्षपक्खिए सम्मदिट्ठी मिच्छादिट्ठी चत्तारि भंगा, सम्मामिच्छादिट्ठीपुच्छा, गोयमा ! अत्थंगतिए बंधी न बंघइ बंधिस्तर अत्थेगतिए बंधी न बंधह न बंधिस्सर, नाणी जाब ओहिनाणी चत्तारि भंगा, मणपञ्जवनाणीपुच्छा, गोयमा ! अत्थेगतिए बंधी बंधइ बंधिस्सह, अत्थेगतिए बंधी न बंध बंधिस्सर, अस्थेगतिए बंधी न बंधइ न बंधिस्सह, केवलनाणे चरमो भंगो, एवं एएणं कमेणं नोसन्नोयउत्ते ucatin intonationd नारक- आदिनाम् पाप-कर्मन: आदि बन्धः For Parts Only ~279~ waryru
SR No.035011
Book TitleSavruttik Aagam Sootraani 1 Part 11 Bhagavati Mool evam Vrutti Part 4
Original Sutra AuthorN/A
AuthorAnandsagarsuri, Dipratnasagar, Deepratnasagar
PublisherVardhaman Jain Agam Mandir Samstha Palitana
Publication Year2017
Total Pages384
LanguagePrakrit, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari & agam_bhagwati
File Size83 MB
JainGPT.orgInstagram
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy