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आगम (०५)
[भाग-११]"भगवती"-अंगसूत्र-५ (मूलं+वृत्ति:)
शतक [२५], वर्ग [-], अंतर्-शतक [-], उद्देशक [२], मूलं [७२२] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र- [०५], अंगसूत्र- [०५] "भगवती मूलं एवं अभयदेवसूरि-रचिता वृत्ति:
प्रत सूत्रांक [७२२]
त्ति स्कन्धरूपाः पुद्गलाः पुगलान्तरसम्पर्कादुपचिता भवन्ति 'अवचिजंति'त्ति स्कन्धरूपा एवं प्रदेशविचटनेनापची. भयन्ते । द्रव्याधिकारादेवेदमाह
जीवे णं भंते ! जाई दवाई ओरालियसरीरत्ताए गेहइ ताई किं ठियाई गेण्हइ अठियाई गेण्हह , द्र गोयमा ! ठियाईपि गेण्हइ अठियाईपि गेण्हइ, ताई भंते ! किं दवओ गेण्हा खेत्तओ गेण्हइ कालओ
गेण्हइ भाचओ गेण्हइ ?, गोयमा ! दवओवि गेण्हइ खेत्तओवि गेण्हइ कालओवि गेण्हइ भावओवि
गेण्हइ ताई दवओ अणंतपएसियाई दवाई खेत्तओ असंखेजपएसोगाढाई एवं जहा पन्नवणाए पढमे 18 आहारुद्देसए जाब निवाघाएणं छदिसिं वाघायं पडुब सिय तिदिसि सिय चउदिसिं सिय पंचदिसिं॥ जीवे
णं भंते ! जाई दवाई बेउवियसरीरत्ताए गेण्हइ ताई किं ठियाई गे• अठियाई गे?, एवं चेव नवरं नियम छदिसि एवं आहारगसरीरत्ताएवि ॥ जीवे णं भंते ! जाई दवाई तेषगसरीरसाए गिण्हा पुच्छा, गोयमा ! ठियाई गेण्हइ नो अठियाई गेण्हइ सेसं जहा ओरालियसरीरस्स कम्मगसरीरे एवं चेव एवं जाव है भावओवि गिण्हह, जाई दवाई दवओगे ताई किं एगपएसियाई गेण्हइ दुपएसियाई गेण्हा? एवं जहा |भासापदे जाव अणुपुर्वि गेनो अणाणुपुर्वि गेहइ, ताई भंते ! कतिदिसि गेण्हा?, गोपमा ! निवा-1 घाएणं जहा ओरालियरस ॥ जीवे णं भंते ! जाई दवाई सोइंदियत्ताए गे० जहा वेउबियसरीरं एवं जाय जिभिदियत्ताए फासिंदियत्ताए जहा ओरालियसरीरं मणजोगत्ताए जहा कम्मगसरीरं नवरं नियम है
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दीप अनुक्रम [८६८]
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