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________________ आगम (०५) प्रत सूत्रांक [ ७०२] दीप अनुक्रम [८४७] [भाग-११]“भगवती”- अंगसूत्र -५ (मूलं + वृत्तिः) शतक [२४], वर्ग [-], अंतर् शतक [ - ], उद्देशक [१२], मूलं [७०२] पूज्य आगमोद्धारकश्री संशोधितः मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित.. आगमसूत्र - [०५] अंगसूत्र- [ ०५] "भगवती" मूलं एवं अभयदेवसूरि-रचिता वृत्तिः जघन्यस्थितिकत्वाद्भवन्ति तानि चावगाहना १ लेश्या २ दृष्टि ३ अज्ञान ४ योग ५ समुद्घात ६ स्थित्य ७ ध्यवसाना८ नुबन्धा ९ ख्यानि ॥ अथ मनुष्येभ्यस्तमुत्पादयन्नाह - जह मणुस्सेहिंतो उच० किं सन्नीमनुस्सेहिंतो उवव० असनीमणुस्से० १, गोयमा ! सन्नीमणुस्सेहिंतो असन्नीमणुस्सेहितोवि उवव०, असन्निमणुस्से णं भंते ! जे भविए पुढविकाइएस० से णं भंते ! केवतिकालं | एवं जहा असन्नीपंचिंदियतिरिक्खस्स जहन्नकालद्वितीयस्स तिन्नि गमगा तहा एयस्सवि ओहिया तिन्नि गमगा भाणि० तहेव निरवसे० सेसा छ न भण्णंति १ ॥ जइ सन्निमणुस्सेहिंतो उबव० किं संखेज्जवासाउथ० असंखेज्जवासाउय० १, गोयमा । संखेजवासाज्य० णो असंखेजवासाउय०, जइ संखेनवासाज्य० किं पञ्जन्त० अपजत० १, गोयमा ! पज्जत्तसंखे० अपनन्तसंखेजवासा०, सन्निमनुस्से णं भंते ! जे भविए पुढ | विकाइएस उबव० से णं भंते ! केवतिकालं० १ गोपमा ! जह० अंतोमु० उको० पावीसं वाससहस्सठितीएसु ते णं भंते! जीवा एवं जहेब रयणप्पभाए उवयमाणस्स तहेव तिसुवि गमएस लद्धी नवरं ओगाहणा जह० अंगुलस्स असंखेज्जइभागं उक्को० पंचधणुसयाई ठिती जह० अंतोमुहतं उको० पुढकोटी एवं अणुबंधो संवेहो नवसु गमएस जहेव सन्निपंचिंदियस्स मल्लिएसु तिस्रु गमएस लढी जहेब सन्निपंचिदियस्स सेसं तं चैव निरवसेसं पच्छिल्ला तिनि गमगा जहा एयरस चेव ओहिया गमगा नवरं ओगाहणा जह० पंचधणुस० उकोसे० पंच धणुसयाई द्विती अणुबंधो जह० पुलकोडी उक्कोसेणवि पुत्रको० सेसं तहेव नवरं Education internationa For Pale Only ~75~
SR No.035011
Book TitleSavruttik Aagam Sootraani 1 Part 11 Bhagavati Mool evam Vrutti Part 4
Original Sutra AuthorN/A
AuthorAnandsagarsuri, Dipratnasagar, Deepratnasagar
PublisherVardhaman Jain Agam Mandir Samstha Palitana
Publication Year2017
Total Pages384
LanguagePrakrit, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari & agam_bhagwati
File Size83 MB
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