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________________ आगम (०५) [भाग-११]"भगवती"-अंगसूत्र-५ (मूलं+वृत्ति:) शतक [२४], वर्ग [-], अंतर्-शतक [-], उद्देशक [१२], मूलं [७०३] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र- [०५], अंगसूत्र- [०५] "भगवती मूलं एवं अभयदेवसूरि-रचिता वृत्ति: प्रत सूत्रांक [७०३] दीप अनुक्रम [८४८] व्याख्या दसवाससह उकोसेणं पलिओवर्म सेसं तहेव ।। जइ जोइसियदेवहितो उवव० किं चंदविमाणजोतिसिय-|| प्रज्ञप्तिः। 8 देवेहिंतो उवव० जाव ताराविमाणजोहसिय?, गोयमा! चंदविमाणजाव ताराविमाण, जोइसियदेवे णं | उद्देशः१२ अभयदेवी- | भंते ! जे भविए पुढविकाइए लही जहा असुरकुमाराणं णवरं एगा तेउलेस्सा प० तिन्नि णाणा तिन्नि शाणा ताला मनुष्येभ्यः या वृत्तिः२ अन्नाणा णियमं ठिती जहन्नेणं अट्ठभागपलिओवमं उकोसेण पलिओवमं वाससहस्सअन्भहियं एवं अणुवं- पृथ्व्याउ. घोवि कालादे जहा अट्ठभागपलिओवमं अंतोमुत्तमम्भहियं उक्कोसेणं पलिओचमं वाससयसहस्सेण पादः ॥८३१॥ बावीसाए वाससहस्सेहिं अम्भहियं एवतियं० एवं सेसावि अह गमगा भाणियचा नवरं ठिती कालादे० सू७०३ जाणेजा ॥ जइ वेमाणियदेवेहितो उउव० किं कप्पोवगवेमाणिय कप्पातीयवेमाणिय०१, गो! कप्पो-i बगवेमाणिय० णो कप्पातीतवेमाणिय, जइ कप्पोवगवेमाणिय०किं सोहम्मकप्पोवगवेमाणिय जाव अचुयकप्पोबगवेमा०, गोयमा ! सोहम्मकप्पोवगवेमाणिय० ईसाणकप्पोवगवेमाणिय णो सर्णकुमारजाव णो अञ्जयकप्पोवगवेमाणिय०, सोहम्मदेवे णं भंते ! जे भविए पुढविकाइएसु उवव० ते णं भंते ! केवतिया एवं जहा जोइसियस्स गमगो णवरं ठिती अणुबंधो य जहन्नेणं पलिओवम उक्कोसे० दो सागरोवमाई कालादे. जह पलिओवमं अंतोमुत्तमम्भहियं उकोसेणं दो सागरोवमाई बावीसाए चाससहस्सेहिं अभहियाई एवतियं कालं, एवं सेसावि अट्ठ गमगा भाणियबा, णवरं ठिति कालादेसं च जाणेजा । इंसाणदेवे णं भंते || ८९१।। जे भविए एवं इंसाणदेवेणविणव गमगा भाणि नवरं ठिती अणुबंधो जहनेणं सातिरेगं पलिओवमं ||४|| ~78~
SR No.035011
Book TitleSavruttik Aagam Sootraani 1 Part 11 Bhagavati Mool evam Vrutti Part 4
Original Sutra AuthorN/A
AuthorAnandsagarsuri, Dipratnasagar, Deepratnasagar
PublisherVardhaman Jain Agam Mandir Samstha Palitana
Publication Year2017
Total Pages384
LanguagePrakrit, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari & agam_bhagwati
File Size83 MB
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