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________________ आगम (०५) [भाग-११]"भगवती"-अंगसूत्र-५ (मूलं+वृत्ति:) शतक [२६], वर्ग [-], अंतर्-शतक [-], उद्देशक [१], मूलं [८१०-८११] + गाथा पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र- [०५, अंगसूत्र- [०५] "भगवती" मूलं एवं अभयदेवसूरि-रचिता वृत्ति: प्रत सूत्रांक | उद्देशः १ [८१० -८११] 11९३०॥ दीप व्याख्या-5 तृतीय उपशमकसूक्ष्मसम्परायस्य चतुर्थः क्षपकसूक्ष्मसम्परावस्य, एवं लोभकपायिणामपि वाच्यं, 'कोहकसाईणं पढमः२६ शतके प्रज्ञप्ति बीय'त्ति इहाभव्यस्य प्रथमो द्वितीयो भव्यविशेषस्य तृतीयचतुधौं त्विह न स्तो वर्तमानेऽबन्धकत्वस्थाभावात् 'अक-15 अभयदेवी साईण'मित्यादि, तत्र 'बंधी न बंधइ बंधिस्सइत्ति उपशमकमाश्रित्य, 'बंधी न बंधइ न बंधिस्सइ'त्ति क्षपकमाश्रित्येति, नारदीनां या वृत्तिा२१ योगद्वारे-'सजोगिस्स चउभंगों'त्ति अभव्यभव्यविशेषोपशमकक्षपकाणां क्रमेण चत्वारोऽप्यवसेवाः, 'अजोगिस्स चरमो'त्ति | पापज्ञाना बबन्धिबध्यमानभन्त्स्यमानत्वयोस्तस्याभावादिति ॥ | त्वादि सू . नेरइए णं भंते! पावं कम्मं किं बंधी बंधा बंधिस्सइ ?, गोयमा! अत्धेगतिए बंधी परमवितिया १, सलेस्से ८१२-८१३ of भंते! नेरतिए पावं कम्मं चेव, एवं कण्हलेस्सेवि नीललेस्सेवि काउलेसेवि, एवं कण्हपक्खिए मुफपक्खिए, ६|| सम्मदिही मिच्छादिट्ठी सम्मामिच्छादिही, पाणी आभिणियोहियनाणी सुयनाणी ओहिणाणी अन्नाणी म-18 इअन्नाणी सुयअनाणी विभंगनाणी आहारसन्नोवउत्ते जाव परिग्गहसनोवउत्ते, सवेदए नपुंसकवेदए, सकसाथी जाव लोभकसायी, सजोगी मणजोगी वयजोगी कायजोगी, सागारोवउत्ते अणागारोवउत्ते, एएसु सवेसु पदेसु पढमवितिया भंगा भाणियबा, एवं असुरकुमारस्सवि वत्तच्या भाणियबा नवरं तेउलेस्सा इस्थि-12 | वेयगपुरिसवेयगा य अम्भहिया नपुंसगवेदगा न भन्नति सेसं तं चेव सबस्य पढमबितिया भंगा, एवं जाव* धणियकुमारस्स, एवं पुढविकाइयस्सवि आउकाइयस्सवि जाव पंचिंदियतिरिक्खजोणियस्सवि सवत्वयि प-15| ढमबितिया भंगा नवरं जस्स जा लेस्सा, दिहीणाणं अन्नाणं वेदो जोगो यजं जस्स अस्थि तं तस्स भाणि-| अनुक्रम [९७५-९७७] AAAAAAAAG ॥९३०॥ नारक-आदिनाम् पाप-कर्मन: आदि बन्ध: ~276
SR No.035011
Book TitleSavruttik Aagam Sootraani 1 Part 11 Bhagavati Mool evam Vrutti Part 4
Original Sutra AuthorN/A
AuthorAnandsagarsuri, Dipratnasagar, Deepratnasagar
PublisherVardhaman Jain Agam Mandir Samstha Palitana
Publication Year2017
Total Pages384
LanguagePrakrit, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari & agam_bhagwati
File Size83 MB
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