Book Title: Sumitra Charitram
Author(s): Harshkunjar Upadhyay
Publisher: Shravak Hiralal Hansraj

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Page 15
________________ मुमित्र चरित्रम् 14 // कोपायमान थयो. // 63 // - महाजनं विसृज्याथ / क्रोधाध्मातवपुनृपः // सुमित्रं तं समाकार्य / भृकुटीभीषणोऽवदत् // 64 // अर्थ-पछी महाजनने रजा आपीने क्रोधवडे धमधमेला शरीरवाळा राजाए सुमित्रने बोलावी भयंकर भृकुटीवाळा थइने कड्यु के, रे मन्महाजनस्यास्या-निष्टकृद् दुष्टधीनिधे // मद्भूमौ न त्वया स्थेयं / क्षणमात्रमपि क्वचित् // 65 // - अर्थ-हे दुष्टबुद्धिना भंडार! मारा महाजनोर्नु अनिष्ट करनार! तारे क्षणमात्र पण मारी भूमिमां कोई स्थळे रहेंबु मही.।६५। - गृहीत्वा पितुरादेशं / जनन्यै स न्यवेदयत् // श्रुत्वा तद् दुःखिता सापि / बभूवाश्रुमुखी तदा // 66 // ___अर्थ-आ प्रमाणेनो पितानो आदेश मेळवीने कुमार माता पासे आव्यो अने ते हकीकत माताने निवेदन करी, एटले मातापण ते. सांभळीने जेना नेत्रोमां अश्रु आवेल छे तेवी अत्यंत दुःखी थइ. // 66 // समित्रो दुःखितामंबां। ज्ञात्वावादित्किमंबिके // खेदमेवं करोषि त्वं / देह्यादेशं व्रजाम्यहं // 67 // ___ अर्थ-माताने आ प्रमाणे दुःखी थयेली जोइने सुमित्रे कलु के-' हे माता ! तमे शा माटे दुःखी थाओ छो अने खेद करो छो? | मने आज्ञा आपो एटले हुँ देशांतर जाउं. // 67 // माता प्रोवाच हे वत्स / यद्येवं तत्त्वया समं // अहमप्यागमिष्यामि / त्वां विना स्थातुमक्षमा // 68 // अर्थ-माता कहे छे के-'हे वत्स ! जो तुं देशांतर जइश तो हु पण तारी साथे आवीश, केमके हुँ तारा विना अहीं रहेवाने | असमर्थ छु.॥ 68 // HDMORE DHIROGINE // 14 // PP.AC.Gunratnasuri M.S. Jun Gun Aaradhak Trust

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