Book Title: Gurvavali
Author(s): Munisundarsuri
Publisher: Yashovijay Jain Pathshala
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गुर्वावली । यतश्चतुर्विशतिसूरिशाखं __ यस्यैव नाम्ना विदितं बभूव ॥ ७५ ॥ वेदमुनीशमितेऽब्दे ११७४
देवगुरुर्जगदनुत्तरोभ्युदितः। श्रीमुनिचन्द्रगुरोरिति ___ शिष्या बहवोऽभवन् विदिताः॥७६ ॥ तेष्वादिमाद्विजयसिंहगुरु ४३ भासे विद्यातपोभिरभितः प्रथमोऽथ तस्मात । सोमप्रभो ४४ मुनिपतिर्विदितः शतार्थीत्यासीद्गुणीव मणिरत्नगुरुर्द्वितीयः॥७॥ प्रज्ञापराभूतसुपर्वसूरिःश्रीसर्वदेवात्स किलाष्टमोऽभूत् । मुदं भदन्ता ददतां तदेवं वृहद्गणस्य प्रभवः क्रमेण॥८॥
इति श्रुतः सच्चरणश्रियः पदं
न दीनताभाक् पुरुषोत्तमालयः । अमेयभावद्गुणरत्नसङ्गतो
वृहद्गणो वारिधिवबभूव सः ॥ ७९॥ अभूचदुल्लासनलालसोदयो
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