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व्यापार।
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तो क्या हुआ, हम अपने बालकोंको ही इस योग्य तैय्यार कर रहे हैं! नहीं, वे भी निरे बछियाके ताऊ ही बनाये जा रहे हैं । भारतकी दशा विचित्र है । स्मरण रहे यदि इतने पर भी हमें होश न आया तो हमारी मृत्यु हमारे सिर पर नाच रहीं है, यह निश्चय कर लेना चाहिए। ये हमारे कंजूस धनी और यहाँ फैली, हुई अविद्या दोनों एक दिन भारतका नाम इस संसारसे मिटा देना चाहते हैं।
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