Book Title: Suktimuktavali
Author(s): Somprabhacharya, Ajitsagarsuri
Publisher: Shanti Vir Digambar Jain Sansthan

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Page 36
________________ सूक्तिमुक्तावली मनीयादिभिः समं सदृशं मन्यते गणयति स मूर्खः पीयूषं अमृतं विषवत् विषेण तुल्यं मनुते गणयत्ति । पुनर्जलं परमशीतलं पानीयं चलनवत् अग्नितुल्यं गणयति । पुनः तेजः उधोतं समास्तोमवत् अन्धकारपुर जवत् मनुते पुनर्मित्रं सखार्य शात्रववत् अस्मिदृशं मनुते जानाति । पुन: लज पुष्पमाला भुजंगवत्सर्पतुल्यं गणयति । पुनः स चिंतामणिरत्नं लोश्वत् पाषाणसदृशं गणयति । पुनः स ज्योत्स्नां कौमुदी चन्द्रकांति ग्रीष्मनधर्मवत उष्णकाल आलपवत् मनुते । अत्र पीयूषादिसमं जिनदर्शनं विषादिसदृशान्यन्यदर्शनानोत्युपनयः। किं भूतं जैनेन्द्र मतं कारुण्यपण्यापणं दयारूपक्रयाणकस्यह। एवं मस्खा श्रीजिनमतमेवानीकर्तव्यं । कुर्वतां च सतां यत्पुण्यमुत्पद्यते तत्पुण्यप्रसादादुत्तरोत्तरमांगलिमयमाला विस्तरन्तु ॥ १६ ॥ अर्थ-जो दुबुद्धि जैनेन्द्र दर्शन (मत) को अन्य मिध्या दर्शनों के समान समझता है वह अमृत को विष तुल्य, जल को अग्नि-समान, प्रकाश को अन्धकार के समूह तुल्य, मित्र को शत्रु समान, पुष्पमाला को सर्प समान चिन्तामणि रत्न को पत्थर तुल्य चन्द्रमा की ठंडी चांदनी को प्रीष्म ऋतु की गर्म धूप-समान गर्म समझता है। शादूलविक्रीडितछन्दः धर्म जागरयत्ययं विषटयत्युत्थापयत्युत्पथं भित्तेमत्सरमुच्छिनति कुनयं मथ्नाति मिथ्यामति । वैराग्यं वितनोति पुष्यति कृपा सृष्णाति तृष्णां च यत् तज्जैन मतमर्चति प्रथयति ध्यायत्यधीते कृती ॥२०॥

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