Book Title: Agam 08 Ang 08 Antkrutdashang Sutra Sthanakvasi
Author(s): Amarmuni, Shreechand Surana, Rajkumar Jain, Purushottamsingh Sardar
Publisher: Padma Prakashan
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Page #1 -------------------------------------------------------------------------- ________________ पंचम गणधर भगवत् सुधर्मा स्वामि-प्रणीत : अष्टम अंग आगम सोचत्र अन्तकृद्दशा सूत्र [मूल पाठ : हिन्दी-अंग्रेजी भावानुवाद तथा विवेचन सहित] (विशेष परिशिष्ट : अन्तकृद्दशा महिमा) प्रधान सम्पादक उत्तर भारतीय प्रवर्तक भण्डारी श्री पमचन्द्र जी म. के सुशिष्य उपप्रवर्तक श्री अमर मुनि मी सम्पादक श्रीचन्द सुराना 'सरस' प्रकाशक पम प्रकाशन नरेला मंडी, दिल्ली-११००४० Page #2 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगम रत्नाकर आचार्यसम्राट् पूज्य श्री आत्माराम जी म. के दीक्षा शताब्दी वर्ष के उपलक्ष्य पर प्रकाशित सचित्र आगम माला का द्वितीय पुष्प * सचित्र अन्तकृद्दशा सूत्र प्रधान सम्पादक: उपप्रवर्तक श्री अमर मुनि सम्पादक: श्रीचन्द सुराना 'सरस' Ye अंग्रेजी अनुवाद सम्पादन : श्री राजकुमार जैन * चित्रकार सरदार पुरुषोत्तमसिंह * प्रकाशक एवं प्राप्ति-स्थान : 1 श्री महेन्द्रकुमार जैन (अध्यक्ष) पद्म प्रकाशन पद्मधाम, नरेला मण्डी, दिल्ली-११००४० दिवाकर प्रकाशन ए-७, अवागढ़ हाउस, एम. जी. रोड, आगरा-२८२००२ फोन : (०५६२) ३५११६५ प्रथमावृत्ति : वि. सं. २०५० विजयादशमी (आश्विन शुक्ला १0) अक्टूबर १९९३ * द्वितीयावृत्ति : वि. सं. २०५५ माघ, जनवरी १९९९ मूल्य : पाँच सौ रुपया मात्र (रु. ५००.00) ॥ २ ॥ Page #3 -------------------------------------------------------------------------- ________________ The Eighth Agam-By the Fifth Ganadhar Anga-BHAGAWAT SUDHARMĀ SWĀMİ ILLUSTRATED ANTAKRIDDAŠĀ SŪTRA [Original Text with Hindi and English Translations and Elaborations] (Special Appendix : Antakriddasha Mahima) EDITOR-IN-CHIEF Uttar Bhāratīya Up-Pravarttaka Bhandārī Śrī Padmacandra ji Maharaja's disciple Up-Pravarttaka Śri Amar Muni ji EDITOR Śricand Surānā 'Saras' PUBLISHERS PADMA PRAKASHAN Narela Mandi, Delhi-110 040 413 45 Page #4 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Published on the auspicious occasion of Diksha Centenary of Agam Ratnakar Acharya Samrat Pujya Shri Atmarama ji M. The Second Number of the Illustrated Agam Series Illustrated Antakřiddaśā Sutra Editor-in-chief : Up-Pravarttaka Shri Amar Muni ji Editor : Srichand Surana 'Saras' English Translation Editor : Shri Rajkumar Jain Illustrations : Sardar Purusottam Singh Publishers : → Shri Mahendra Kumara Jain (Chief) Padma Prakashan Padma Dham, Narela Mandi, Delhi-110 040 > Diwakar Prakashan A-7, Awagarh House, M.G. Road, Agra-282 002 Phone : (0562) 351165 First Edition : V. Samvat 2050 Vijaya Dashami, October 1993 Second Edition : V. Samvat 2055, January 1999 Price : Rupees Five Hundred Only (Rs. 300.00) $ $ $ Page #5 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकाशकीय : प्रथम संस्करण आगम रत्नाकर आचार्यसम्राट् श्री आत्माराम जी म. ने जैन आगमों के प्रचार प्रसार एवं अध्ययन-अध्यापन की दृष्टि से जो अविस्मरणीय कार्य सम्पादन किया, वह जैन आगम साहित्य के इतिहास में सदा अमर रहेगा । उनकी प्रेरणा से तथा उन्हीं के कृत कार्य को आगे बढ़ाने में उनकी सुविज्ञ शिष्य-परम्पग सदा अग्रणी रही है । उनके आगम रहस्यवेत्ता विद्वान् शिष्यों ने जिनवाणी के अध्यात्म ज्ञान को जनव्यापी बनाने में अपने जीवन का बहुत बड़ा योगदान किया है । इसी पावन परम्परा में आचार्यसम्राट के विद्वान शिष्य पंडितरत्न श्री हेमचन्द्र जी महाराज के सुशिष्य उत्तर भारतीय प्रवर्तक गुरुदेव भण्डारी श्री पद्मचन्द्र जी महाराज का नाम भी सदा स्वर्णाक्षरों में अंकित रहेगा । प्रवर्तक गुरुदेव श्री भण्डारी जी म. की प्रेरणा एवं आपश्री के विद्वान् शिष्य उपप्रवर्तक श्री अमर मुनि जी म. के सम्पादन में सूत्रकृतांग, प्रश्नव्याकरण, भगवतीसूत्र (चार भाग) आदि विशाल आगमों का हिन्दी व्याख्या के साथ जो सुन्दर जनोपयोगी प्रकाशन करवाया है वह सर्वत्र समादृत हुआ है । आगम पाटकों को उससे बहुत लाभ मिला है । आगम प्रकाशन की इसी महान् शृंखला में प्रवर्तक गुरुदेव श्री भण्डारी जी म. की भावना के अनुरूप उपप्रवर्तक श्री अमर मुनि जी म. ने जैन आगमों का चित्रमय प्रकाशन करने की एक अत्यन्त महत्त्वपूर्ण तथा सर्वथा अभिनव योजना का प्रारंभ किया है । चित्र-दर्शन से विषय-वस्तु का बोध शीघ्र हो जाता है । इसलिए ज्ञान-वृद्धि में चित्रों का एक अलग महत्त्व है । आगमों का सचित्र प्रकाशन जहाँ एक बहुत विशाल और व्यय-साध्य कार्य है, वहाँ इसका ऐतिहासिक महत्त्व भी है । आने वाले युगों में तथा जहाँ पर जैन : मण-श्रमणियाँ नहीं पहुँचते हैं, वहाँ पर इन चित्रमय आगमों से जनता जैनधर्म, संस्कृति, परम्पग और तत्त, प्वरूप को बहुत ही आसानी से समझ सकेगी-यह निस्संदेह कहा जा सकता है । इसी दूरदृष्टि को और भविष्य के सुन्दर परिणाम को ध्यान में रखकर गुरुदेवश्री की कृपा से हमने जैन आगम शास्त्रों का चित्रमय प्रकाशन प्रारंभ किया है । कुछ समय पूर्व हमने भगवान महावीर की अन्तिम देशना श्री उत्तराध्ययनसूत्र का चित्रमय भव्य प्रकाशन किया। इस प्रकाशन को सभी ने बहुत पसन्द किया, मुक्त कण्ठ से प्रशंसा भी की है । अब अपेक्षा है कि इस प्रकार का श्रेष्ठ और मूल्यवान साहित्य प्रत्येक पुस्तकालय, स्थानक, उपाश्रय और मन्दिर में पहुँचे, लोग इसे अपनी अलमारी में सजाकर भी रखें और समय-समय पर स्वाध्याय करके लाभान्वित भी हों । आज नहीं तो कल ऐसा समय आयेगा, जब शास्त्र-प्रेमी साधु-साध्वी तथा श्रावक इस प्रकार के भव्य मनोरम साहित्य को पढ़ने के लिए मँगाने की प्रेरणा देंगे और इसके व्यापक प्रचार में सहयोगी बनेंगे । हम इस वर्ष अष्टम अंग श्री अन्तकृद्दशासूत्र का चित्रमय प्रकाशन कर रहे हैं । सामान्य प्रकाशन से चित्रमय प्रकाशन लगभग दस गुना अधिक महँगा पड़ता है । इस कारण प्रकाशन में लागत बहुत अधिक आती है और उसका मूल्य भी अधिक रखना पड़ता है । किन्तु फिर भी हम लागत मूल्य पर ही इसे घर-घर पहुँचाने का प्रयास करते हैं । Page #6 -------------------------------------------------------------------------- ________________ इस आगम सम्पादन में श्रद्धेय उपप्रवर्तक श्री अमर मुनि जी म. ने बहुत ही श्रम किया है । उन्हीं के निर्देशन में प्रसिद्ध विद्वान् तथा जैन चित्रमय साहित्य के मर्मज्ञ श्रीचन्द जी सुराना 'सरस' ने एक वर्ष के सुदीर्घ परिश्रमपूर्वक इस भव्य कृति को परिपूर्ण किया है । द्वितीयावृत्ति श्री अन्तकृद्दशासूत्र का प्रथम संस्करण पाठकों तथा स्वाध्याय-प्रेमियों ने बहुत पसन्द किया। इसके साथ अन्तकृद्दशा महिमा की भी अच्छी माँग थी। अब द्वितीय संस्करण में अन्तकृद्दशा महिमा भी अंग्रेजी अनुवाद के साथ इसी में सम्मिलित कर दी गई है। अन्तकृद्दशासूत्र महिमा के अंग्रेजी अनुवाद में श्री सुरेन्द्र बोथरा का सहयोग प्राप्त हुआ। तदर्थ आपको हार्दिक धन्यवाद । चित्रकार सरदार पुरुषोत्तमसिंह का भी धन्यवाद करते हैं जिनका सहयोग हमें प्राप्त होता रहा है । इस प्रकाशन में तपाचार्या उपप्रवर्तिनी श्री मोहनमाला जी म. तथा श्रमणी सूर्या उपप्रवर्तिनी श्री सरिता जी म. की सत्प्रेरणा से सहयोग प्राप्त हुआ है । बालयोगी श्री तरुण मुनि जी म. का भी इसके संशोधन संपादन में सराहनीय योगदान रहा । पुराने संस्करण की अंग्रेजी भाषा का संपादन संशोधन आदि में श्री राजकुमार जी जैन दिल्ली ने हार्दिक सहयोग प्रदान किया है । आशा है सचित्र आगम प्रकाशन की योजना का समाज में, देश व विदेश में स्वागत होगा और यह आगम अपने आप ही अपनी उपयोगिता से जनग्राह्य बनेगा । -महेन्द्रकुमार जैन (अध्यक्ष) पद्म प्रकाशन नरेला मण्डी, दिल्ली-११0 0४० Page #7 -------------------------------------------------------------------------- ________________ PUBLISHER'S NOTE (from First Edition) The unforgettable work done by Agam Ratnakar Acharya Samrat Shri Atmaram ji M. in the fields of study, teaching, popularizing and spread of Jain Agams occupies an everlasting place in the history of Jain Agamic literature. Driven by his inspiration, the lineage of his scholarly disciples continues to play a leading role in furthering the work he started. His disciples, with in-depth knowledge of Agams, have spent major parts of their lives to accomplish the task of spreading the spiritual knowledge contained within the tenets of the Jina in the masses. In this pious tradition the name of Uttar Bharatiya Pravartak Gurudev Bhandari Shri Padmachandra ji. M., the able disciple of Acharya Samrat's scholarly disciple Pandit-ratna Shri Hem Chandra ji M., will ever remain written in golden letters. The beautiful editions of the voluminous Agams including Sutrakritanga, Prashna Vyakaran and Bhagavati Sutra (in four parts) with Hindi commentary, inspired by Gurudev Shri Bhandari ji M., edited by his scholarly disciple Up-Pravartak Shri Ainar Muni ji M., and published for the benefit of masses, have been widely admired. These have been immensely useful for the readers of Agams. Continuing this great chain of Agam publications and in accordance with the wishes of Pravartak Gurudev Shri Bhandari ji M., Up-Pravartak Shri Amar Muni ji M. has launched a very portant and unique scheme of publishing illustrated Agams. Illustrations are effective means of easily understanding the content of a text; as such, the visual media occupies an important place in the field of knowledge and education. Although it is a cost intensive project, publication of illustrated Agam literature has a historical value. The future generations as well as the masses who do not come in contact with Jain ascetics, will undoubtedly be able to know and understand with ease the essentials. of Jain tenets and the connected rich religious and cultural tradition. With the blessings of our Gurudev and keeping in view these far reaching goals, we have launched this project of publishing illustrated Agam literature. Earlier, we had published the grand illustrated edition of Shri Uttaradhyayan Sutra, the last sermon of Bhagavan Mahavir. It was widely appreciated and profusely acclaimed by all. It is our wish now that such grand and valuable literature reaches every library, sthanak, upashraya and temple; people carefully keep these volumes in their shelves and benefit by studying them from time to time. If not today, tomorrow will come a time when scripture loving shravaks and ascetics will inspire others to acquire these for study and be instrumental in widely popularizing the Agam literature. फ्र७ फ Page #8 -------------------------------------------------------------------------- ________________ This year we are publishing the illustrated edition of the cighth Anga, Shri Antakriddasha Sutra. As compared to a simple edition, an illustrated edition is ten times costly: The basic cost of such publications is very high and therefore the printed price has also to be kept high. But, for a wider distribution, we still try to make it available at cost price. Revered Up-Pravartak Shri Amar Muni ji M. has put in a lot of labour in editing this Agam. Under his direction Srichand ji Surana 'Saras', a renowned scholar and expert of illustrated literature, has completed this grand edition after a continued hard labour of one year. (the Second Edition) The first edition of Shri Antakriddasha Sutra was very much appreciated by readers and devout ruminators. With this there also was a good demand of the book Antakriddasha Mahima. Now in this second edition Antakriddasha Mahima has also been included with its English translation. With the efforts of and inspiration by Tapacharya Up-Pravartini Shri Mohan Mala ji M. and Shramani Surya Shri Sarita ji M., ample assistance has poured in for this publication. Bal-yogi Shri Tarun Muni ji M. also provided commendable assistance in its editing and copy reading. Shri Rajkumar ji Jain extended his wholehearted contribution in re-editing and correcting the English translation from the first edition. The English translation of Antakritdasha Mahima has been done by Shri Surendra Bothara. We express our thanks to them all. Our thanks also to Sardar Purushottam Singh, who has done the illustrations and has been ever co-operative. We hope this project of publishing illustrated Agam literature will be received well in the country as well as abroad and this particular work will become popular on its own merit and for its usefulness. -Mahendra Kumar Jain (President) Padma Prakashan Narela Mandi, Delhi-110 040 4 51 Page #9 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्राक्कथन : प्रथम संस्करण संसार में आज धर्म, आत्मा और परमात्मा विषयक जो भी चिन्तन, मनन एवं प्रवचन उपलब्ध है, उसका सर्वप्रथम प्रादुर्भाव भारत की तपोभूमि पर ही हुआ था। प्रागैतिहासिक काल से ही इस भारत भूमि पर दो प्रकार की विचारधाराएँ, दो संस्कृतियाँ गंगा-यमुना की भाँति प्रवाहशील रही हैं । एक है-श्रमण संस्कृति और दूसरी ब्राह्मण संस्कृति । दोनों ही संस्कृतियों का लक्ष्य है-जीवन का चरम विकास, आत्मा का कल्याण । यद्यपि जीवन के अन्तिम ध्येय-निर्वाण या परम आत्म-सुख के विषय में दोनों संस्कृतियों के चिन्तन में पर्याप्त अन्तर है । इसी अन्तर के कारण तो दोनों संस्कृतियाँ दो धाराओं में प्रवाहित हैं । श्रमण संस्कति निर्वाणवादी संस्कृति रही है, जबकि ब्राह्मण संस्कृति के समस्त क्रियाकांड स्वर्ग के आसपास ही परिक्रमा करते हैं । इसी कारण आचार एवं विचार सम्बन्धी प्रक्रिया में भी अन्तर रहा है । श्रमण संस्कृति त्याग एवं तप-प्रधान रही है । ब्राह्मण संस्कृति कर्म एवं योग-प्रधान रही है । श्रमण संस्कृति के चिन्तन का आधार है-आगम; जिन्हें 'श्रुत' कहा जाता है । ब्राह्मण संस्कृति का आधार है-वेद, जिन्हें 'श्रुति' कहा गया है। ब्राह्मण संस्कृति ईश्वरवादी संस्कृति रही है, वहाँ निर्वाण का अर्थ है-जीव का ईश्वर में विलय और अद्वैतवाद की दृष्टि में ब्रह्म में विलय हो जाना ही निर्वाण है । श्रमण संस्कृति की एक धारा-बौद्ध संस्कृति भी निर्वाण में विश्वास अवश्य करती है, परन्तु उसके निर्वाण की परिभाषा है-बुझ जाना । जो संतति चल रही है उसका समाप्त हो जाना--"दीपो यथा निर्वृति मभ्युपेतः।"-जैसे दीपक जलता-जलता बुझ जाता है, वैसे ही जीव, आत्मा, पुद्गल, वासना आदि के संतान प्रवाह का समाप्त हो जाना निर्वाण है । इस प्रकार एक में मोक्ष का अर्थ है-विलय, तो दूसरी में मोक्ष का अर्थ है-समाप्त हो जाना । श्रमण संस्कृति अर्थात् जैन संस्कृति प्रारंभ से ही निर्वाणवादी या मोक्षवादी रही है । यहाँ माना गया है-"निव्वाणसेट्ठा जह सव्व धम्मा।"-समस्त धर्मों में निर्वाण ही परम श्रेष्ठ धर्म है । भगवान महावीर निर्वाणवादियों में सर्वश्रेष्ठ माने गये हैं “णिव्वाणवादीणिह णायपुत्ते।" जैनधर्म में निर्वाण का अर्थ बड़ा तर्कसंगत और वैज्ञानिक है। भगवान महावीर की दृष्टि से “निव्वाणं ति अबाहं ति, सिद्धी लोगस्समेव य खेमं सिवं अणाबाहं, तं चरंति महेसिणो ॥" (उत्तराध्ययन ३२/८३) निर्वाण का अर्थ है-सर्व बाधाओं से रहित, अव्याबाध सुख, सर्वकर्म आवरणों से रहित-चिन्मय चिदानन्दस्वरूप का प्रकट हो जाना । Page #10 -------------------------------------------------------------------------- ________________ अनन्त ज्ञानमय, अनन्त आनन्दमय आत्म-स्वरूप की उपलब्धि निर्वाण है । ऐसा निर्वाण ही प्रत्येक आत्मा का चरम लक्ष्य है । इसी निर्वाण के लिए आत्मा त्याग, तप, ध्यान आदि का आचरण करता है, साधना करता है । साधना का सफल या कृतार्थ हो जाना ही सिद्धि है । सिद्धि प्राप्त करना ही प्रत्येक आत्मा का उद्देश्य है । निर्वाण या सिद्धि प्राप्त करने के लिए त्याग, तप एवं ध्यान का मार्ग बताया गया है । विहंगम दृष्टि से देखने पर पता चलता है, ब्राह्मण संस्कृति में ब्रह्मज्ञान की प्राप्ति के लिए 'योग' मार्ग का विधान किया गया है, बौद्धदर्शन में 'ध्यान' मार्ग पर बल दिया गया है और श्रमण या जैन संस्कृति में 'तप’ मार्ग का निरूपण है । 'तप' में योग एवं ध्यान दोनों ही समाहित हैं । तप के बारह भेदों में काय-क्लेश तप योगमार्ग की साधना का रूप है तो ध्यान तप ध्यान-मार्ग का स्वरूप बताता है । 'तप' में योग भी है और ध्यान भी है । इसलिए श्रमण संस्कृति तपस्वियों की संस्कृति रही है । तपःसाधना ही श्रमण संस्कृति का सार है । 'तप' श्रमण संस्कृति की पहचान है । जैनधर्म की आत्मा है-तप । अन्तकृद्दशा सूत्र परिचय-तपःसाधना के विशिष्ट रूप और स्वरूप पर प्रकाश डालने वाले जैन आगमों में अन्तकृद्दशा सूत्र का अपना विशेष महत्त्व है । इसका नाम ही ‘तप' की फलश्रुति का सूचक है। 'तप' शरीर को सुखाने के लिए नहीं किया जाता । तप का उद्देश्य है-आत्मा के साथ लगे हुए कर्म आवरणों को तपाकर जलाकर भस्म कर देना । जैसे-सोने के साथ लिपटी हुई मिट्टी आदि अन्य रसायन, अग्नि में तपाने से भस्म हो जाते हैं और सोना ‘कुन्दन' या शुद्ध स्वर्ण बन जाता है, इसी प्रकार तप से संपूर्ण कर्मों की निर्जरा हो जाने पर आत्म-स्वरूप की उपलब्धि हो जाती है । इस प्रकार तपःसाधना से समस्त कर्मों का अन्त-नाश किया जाता है । कर्मों का नाश हो जाने से जन्म-मरण की भव-परम्परा का भी नाश हो जाता है-“कम्म च जाई मरणस्स मूलं।"-जन्म और मरण का मूल कर्म है । कर्म-नाश होने पर जन्म और मृत्यु के बंधन स्वयं टूट जाते हैं । भव-परम्परा का अन्त हो जाता है । 'अन्तकृद्दशा सूत्र' का शब्दार्थ भी यही है कि भव-परम्परा का अन्त करने वाली आत्माओं की दशा, स्थिति, अवस्था तथा उनकी साधना का वर्णन करने वाला आगम है-अन्तकृद्दशा सूत्र । अन्तकृद्दशा सूत्र में भव-परम्परा का उच्छेद करके निर्वाण प्राप्त करने वाले ९० साधकों की कठोर साधना, तपश्चर्या और ध्यान-योग की साधना का रोमांचक वर्णन है । ___अन्तकृद्दशा सूत्र आगमों में आठवाँ अंग है । इस सूत्र के आठ वर्ग हैं और इसमें वर्णित सभी पात्रआठ कर्मों का क्षय करके निर्वाणगामी हुए हैं इसलिए जैन-शासन में पर्युषण के आठ दिनों में इस शास्त्र के वाचन की प्राचीन परम्परा प्रचलित है । ____ भाषा-इस आगम की भाषा अर्ध-मागधी है । शास्त्रों में बताया है-तीर्थंकर देव, गणधरों तथा देवताओं की प्रिय भाषा अर्ध-मागधी है । इसलिए यह सर्वप्रिय भाषा है । सभी जैन सूत्रों की भाषा अर्ध-मागधी है। + १० ॥ Page #11 -------------------------------------------------------------------------- ________________ औली-जैन सूत्रों में जिन सूत्रों में आत्मा कर्म आदि तात्विक विषयों की प्रधानता है, वे द्रव्यानुयोग कि कहे जाते हैं । जिनमें आचार, समाचारी आदि का वर्णन है, वे आगम चरणानुयोग-प्रधान हैं । जिनमें गणित, लोक, भूगोल, खगोल, नदी, पर्वत आदि का वर्णन है, गणितानुयोग में उनका समावेश हो जाता है तथा जिन आगमों में चरित या कथा-शैली की प्रधानता है, वे कथानुयोग-प्रधान आगम माने गये ज्ञाताधर्मकथा, उपासकदशा, अनुत्तरौपपातिकदशा, विपाक, निरयावलिका तथा अन्तकृदशा सूत्र आदि कथा या चरित्र-प्रधान आगम होने से इनकी गणना कथानुयोग में की जाती है । घर्ण्य-विषय-प्रस्तुत आगम में नब्बे (९०) साधक आत्माओं की साधना का रोचक वर्णन है । सामान्य रूप में यह तपःप्रधान आगम माना जाता है, परन्तु सम्पूर्ण आगम के विषय पर चिन्तन करने से तप, ध्यान, ज्ञानार्जन, क्षमा आदि सभी को मोक्ष मार्ग मानते हुए सबका समन्वय है। इसमें • गौतमकुमार आदि १८ मुनियों ने १२ भिक्षु प्रतिमा तथा गुणरत्नसंवत्सर तप करके मुक्ति प्राप्त की। • अनीकसेनकुमार आदि १४ मुनि १४ पूर्व का ज्ञान प्राप्त कर बेले-बेले के सामान्य तप द्वारा ही कर्मक्षय कर मुक्ति के अधिकारी बने हैं । • अर्जुनमाली जैसे साधक सिर्फ छह महीने तक बेले-बेले तप करके, उत्कृष्ट उपशम भाव-क्षमा-सहिष्णुता-तितिक्षा की आराधना द्वारा सिद्धगति प्राप्त करते हैं । अतिमुक्तकुमार जैसे बाल ऋषि ज्ञानार्जन करके गुणरत्नसंवत्सर तप की आराधना करते हुए दीर्घकालीन संयम-पर्याय का पालन कर मोक्ष पधारते हैं । •गजसुकुमाल मुनि बिना शास्त्र पढ़े, सिर्फ एक अहोरात्र की अल्पकालीन संयम-पर्याय में ही परम तितिक्षा भावपूर्वक समता भाव में रमण करते हुए शुक्लध्यान के साथ मोक्ष प्राप्त करते हैं । • नन्दा, काली आदि रानियों ने कठोर तपःसाधना एवं दीर्घकालीन संयम-पर्याय का पालन कर कर्मों का नाश किया है । इस प्रकार तप, संयम, शम, क्षमा, ध्यान आदि मोक्ष के सभी अंगों की सर्वांग साधना का सुन्दर समन्वय इस आगम में प्राप्त होता है । प्रस्तुत सूत्र का आदर्श इस शास्त्र के परिशीलन से पद-पद पर तप, क्षमा एवं शुद्ध ध्यान की विशेष प्रेरणा स्फुरित होती है । इसके साथ ही कुछ विशिष्ट आदर्श चरित्रों की विशेष प्रेरणाएँ भी हमें जीवन्त आदर्शों की ओर संकेत करती हैं; जैसे १. वासुदेव श्रीकृष्ण के समान धर्म में दृढ़ विश्वास और गुणों के आदर की भावना तथा धर्म सहायक बनने की उदात्त वृत्ति । Page #12 -------------------------------------------------------------------------- ________________ २. भोगों से विरक्त होकर त्याग वृत्ति की प्रेरणा देता है-वासुदेव श्रीकृष्ण की आठ पटगनियों का संयम ग्रहण । ३. गजसुकुमाल मुनि का उज्ज्वल चरित्र धैर्य, दृढ़ता, कष्ट-सहिष्णुता और परम तितिक्षा भाव का पाठ पढ़ाता है। ४. सुदर्शन श्रावक का चरित्र, अपने आराध्य देव के प्रति परम समर्पण भाव, आत्म-विश्वास और धर्मतेज का सूचन करता है । ५. अर्जुनमाली का मुनि जीवन-अद्भुत सहन-शक्ति और उपशम भाव की आराधना की ओर इंगित करता है। ६. महाराज श्रेणिक की काली आदि रानियों की तपश्चर्या का वर्णन शरीर-ममत्व से मुक्त होकर "तवसा धुणाइ पाव कम्म" का आदर्श उपस्थित करता है । ७. वाल-मुनि अतिमुक्तकुमार का रोचक वर्णन-जीवन में सरलता, भद्रता और विनयपूर्वक प्रश्नोत्तर शैली का सुन्दर संकेत करता है । इस प्रकार प्रस्तुत आगम अनेक प्रकार के जीवन्त आदर्शों को उपस्थित करके निर्वाण की समुज्ज्वल साधना करने का मार्ग प्रशस्त करता है । इसका पठन-श्रवण जीवन में सभी के लिए कल्याणकारी हैं । प्रस्तुत सम्पादन आज जैन समाज में अन्तकृद्दशा सूत्र का वाचन/पठन भी सबसे अधिक होता है और इस आगम का प्रकाशन भी अनेक संस्थाओं द्वारा अनेक रूपों में हुआ है । इस पर विस्तृत टीकाएँ और व्याख्याएँ भी प्रकाशित हुई हैं तो कहीं-कहीं से मूल पाठ, भावानुवाद और कहीं से सिर्फ मूल पाठ ही । इस प्रकार छोटे-बड़े अनेकों संस्करण प्रकाशित हुए हैं । सभी की अपनी उपयोगिता है । हिन्दी भाषा के अतिरिक्त गुजराती भाषा में अनेक सुन्दर संस्करण प्रकाशित हो चुके हैं । अंग्रेजी में भी श्री मोदी का प्रकाशित संस्करण मेरे देखने में आया है । पाठक पूछेगे फिर इस संस्करण की क्या विशेषता है ? सचित्र आगम प्रकाशन हमने गतवर्ष श्रद्धेय पूज्य गुरुदेव उत्तर भारतीय प्रवर्तक भण्डारी श्री पद्मचन्द्र जी म. के हीरक जयन्ती वर्ष के उपलक्ष्य में सचित्र आगम प्रकाशन का संकल्प किया था । आगमों का सचित्र प्रकाशन अपने आप में एक ऐतिहासिक कार्य है और इसकी अपनी महत्ता भी है । आज प्राचीन हस्तलिखित आगमों में कल्पसूत्र तथा उत्तराध्ययन सूत्र की चित्रमय प्रतियाँ किसी-किसी ज्ञान भण्डार में उपलब्ध हैं, ऐसा सुना जाता है; तथा यह भी सुनने में आता है कि उन चित्रमय आगमों की एक-एक प्रति का मूल्य २०-२५ हजार रुपये से भी अधिक आँका गया है । ऐसे दुर्लभ चित्रित आगम प्राप्त होना तो बड़ी बात है, उनके दर्शन भी अत्यन्त दुर्लभ हैं । फिर भी हर एक आगम जिज्ञासु की भावना होती है कि चित्रमय आगमों के दर्शन हमें भी प्राप्त हों । उनकी उपलब्धि भी हो । - ॥ १२ ॥ - Page #13 -------------------------------------------------------------------------- ________________ यह तो सुनिश्चित है कि चित्र से गंभीर से गंभीर विषय भी बड़ी सहजता के साथ समझ में आ सकता है । चित्र अरूप को स्वरूप प्रदान करता है । दुर्बोध को सुबोध बनाता है । एक चित्र हजारों श्लोकों से भी अधिक प्रभावशाली बन जाता है । कुल मिलाकर आज की शिक्षा पद्धति में चित्रों की उपयोगिता और आवश्यकता बढ़ती ही जा रही है । आगमों का चित्रमय प्रकाशन यद्यपि बहुत महँगा पड़ता है । चित्रों के निर्माण में परम्परा एवं आगम की मर्यादा का भी ध्यान रखा जाता है तथा चित्र निर्माण से लेकर रंगीन मुद्रण तक की समूची विधि बहुत ही खर्चीली होती है । इस कारण आगमों का सचित्र संस्करण साधारण संस्करण से बहुत अधिक महँगा पड़ जाता है । सामान्य पाठक उसे खरीदने में असमर्थता भी अनुभव करता है । इन सभी कठिनाइयों का समाधान भी हो सकता है और इस पर समाज चिन्तन भी कर रहा है । फिर भी सचित्र प्रकाशन और वह भी हिन्दी एवं अंग्रेजी अनुवाद के साथ अन्य प्रकाशनों से अधिक दर्शनीय, पठनीय एवं भव्य होता है, यह निस्सन्देह माना जायेगा । सचित्र आगम प्रकाशन की मेरी भावना को मूर्तरूप दिया है साहित्यकार प्रबुद्ध चिन्तक श्रीचन्द जीं सुराना ने । उनकी पूज्य गुरुदेव के प्रति भक्ति तथा आगमों के प्रति श्रद्धा और चित्रमय साहित्य प्रकाशन के प्रति अनुराग / लगाव तथा अनुभव सब मिलाकर इस कार्य को सुगम और गतिशील बना सका है । कुछ समय पूर्व हमने सचित्र उत्तराध्ययन सूत्र का प्रकाशन किया था, अब श्री अन्तकृद्दशा सूत्र चित्रमय प्रस्तुत है । इस प्रकार सभी के सहयोग से सचित्र आगम प्रकाशन माल का यह द्वितीय ग्रंथरत्न ' सचित्र अन्तकृद्दशा सूत्र' पाठकों के कर-कमलों में समर्पित है । मुझे विश्वास है इस प्रयत्न से देश व विदेश स्थित जैन बन्धुओं में आगम स्वाध्याय के प्रति रुचि बढ़ेगी और वे आत्म-कल्याण के मार्ग पर अग्रसर होंगे, इसी शुभ आशा के साथ तपाचार्या श्री उपप्रवर्तिनी श्री मोहनमाला जी म. तथा श्रमणी सूर्या उपप्रवर्तिनी डॉ. श्री सरिता जी म. के सराहनीय सहयोग के लिए मैं किन शब्दों में धन्यवाद करूँ। मेरी आशा के अनुरूप श्री अन्तकृद्दशासूत्र का यह संस्करण पाठकों एवं स्वाध्यायियों ने बहुत पसन्द किया, कुछ ही समय में इसका प्रथम संस्करण समाप्त हो गया । द्वितीय संस्करण की माँग आ रही थी इसलिए अब यह द्वितीय संस्करण पाठकों के हाथों प्रस्तुत है। श्री सुयश मुनि जी लिखित अन्तकृद्दशा महिमा भी श्री सुरेन्द्र बोथरा के अंग्रेजी अनुवाद के साथ सम्मिलित कर दी गई है। में - अमर मुनि पद्मजयन्ती (दशहरा) जैन स्थानक गांधी मंडी, पानीपत फ्र १३ Page #14 -------------------------------------------------------------------------- ________________ FOREWORD (First Edition) In the world whatever ideas, thoughts and preaching on religion, soul and god are available today originated first of all in India, the land of austerities. Since pre-historic times two streams of thought and culture have been flowing like the rivers Ganges and Yamuna. One of them is Shraman culture and the other Brahmin culture. The ultimate goal of both these cultures is the well being of soul, the ultimate development of life. However, there is a marked difference between the two about the definition of the ultimate goal of life, nirvana or the ultimate bliss of soul. This difference is the cause that divides the cultures into two streams. The Shraman culture is a culture that believes in nirvana or liberation, whereas all the rituals of the Brahmin culture revolve around the heaven. That is why there are differences also in the process of thought and conduct. The Shraman culture has mainly been detachment and austerity intensive. The Brahmin culture has been action and yoga intensive. The basic scriptures of Shraman thought are Agams that are also called Shrut'. The basic scriptures of Brahmin thought are the Vedas that are also called 'Shruti'. Brahmin culture is a theist culture. There the meaning of nirvana is to merge with the God. The Advait (monotheist) sect believes that nirvana is to merge with Brahma. A stream of the Shraman culture, the Buddhist culture, also believes in nirvana but there nirvana means extinction. The termination of the flow of life is nirvana. Like a lamp extinguished, the termination of the continuing flow of being, soul, particle, desire and others is nirvana. Thus in one, nirvana means to merge and in the other, it means-to end. Shraman culture or Jain culture has since its beginning been based on nirvana or liberation. Here it is believed that of all the religions the best is nirvana. Bhagavan Mahavir is believed to be the best among those who believe in nirvana-“Nivvanavadiniha Nayaputte." In Jainism the meaning of nirvana is very scientific and logical. In Bhagavan Mahavir's view-Nirvana means-to acquire unimpeded bliss and to attain the all powerful and ever blissful form that is free of all veils of karma. Nirvana is to attain the ultimately pure form of soul which is endowed with infinite knowledge and infinite bliss. Such nirvana is the ultimate goal of every soul. To attain such nirvana one indulges in spiritual practices including detachment, austerities and meditation. To get success in practices is siddhi. To attain siddhi is the goal of every soul. For attaining nirvana or siddhi is prescribed the path of detachment, austerities and meditation. A cursory glance indicates that according to the Brahmin culture yoga is said 41 88 41 Page #15 -------------------------------------------------------------------------- ________________ the path of enlightenment or the means of acquiring Brahma-jnana; the Buddhist Philosophy lays stress on meditation, and the Shraman or Jain culture prescribes austerities Austerities envelope both yoga and meditation. Among the twelve categories of terities. kaya-klesh (rigorous discipline of the body) is a form of yoga practice and Shop-tap is a form of meditational practice. Within tap there is yoga as well as meditation. why the Shraman culture is a culture of ascetics. To indulge in tap-practices is the essence of Shraman culture. Tap is the recognizing factor of Shraman culture. The scul of Jain religion is tap. Antakriddasha Sutra Introduction-Antakriddasha Sutra occupies a place of special importance among the lain Agams that throw light on the concept and form of tap-practices. Its title itself is suggestive of the fruits of tap (austerities). Tap is not done to emaciate the body. The urpose of tap is to temper and reduce to ashes the veils of karma covering the soul. The sand and other impurities of gold evaporate out when heated in fire and it turns into kundan (pure gold). In the same way when all the karmas are destroyed with the help of tap, the true form of soul (purity of soul) is attained. Thus, with the help of tap-practices all karmas are ended or destroyed. With the destruction of karmas the cycles of rebirth are destroyed. The cause of life and death is karma. When karmas are destroyed the ties of life and death are automatically broken. The cycle of rebirth is terminated. The literal meaning of Antakriddasha Sutra also conforns to this-the Agam that details the conditions, state, status and practices of the souls that have terminated the cycle of rebirth is Antakriddasha Sutra. It contains a sensational description of the rigorous practices, austerities and meditation done by 90 seekers who ended the cycles of rebirth to attain nirvana. Antakriddasha Sutra is the eighth among the Agams. It has eight sections and all the central characters described in this attained nirvana after shedding all the eight karmas. That is the reason that the tradition of its recital during the eight days of Paryushan, the annual religious festival of the Jain order, has been popular since ancient times. Language-The language of this Agam is Ardha-Magadhi. In scriptures it is mentioned that the language liked by Tirthankars, Ganadhars and gods is Ardha-Magadhi. Therefore this is the language liked by all. The language of all Jain Sutras is Ardha-Magadhi. Style - In the Jain Sutra those which contain subjects dealing with fundamentals like soul and karma are classified as those dealing with Dravyanuyoga. Those which contain discussions about conduct, codes of conduct and other related topics are classified as those of Charananuyoga style. The subjects like mathematics, universe, geography, astronomy, rivers and mountains are covered by Ganitanuyoga style. And the Agams that are in biographical and narrative style are said to be mainly of Kathanuyoga style. 44 45 Page #16 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Jnatadharmakatha, Upasak-dasha, Anuttaraupapatik-dasha, Vipak, Niryavalika and Antakriddasha Sutra fall in the Kathanuyoga category because they abound in stories and biographies. Subject-matter-This Agam contains interesting description of spiritual practices of 90 pious souls. Generally it is believed to be a tap-intensive Agam. But when we consider this Agam as a whole it becomes evident that it assimilates all such virtues as austerities, meditation, gaining knowledge and clemency while defining the path of liberation. It informs that • 18 ascetics including Gautam Kumar attained liberation by practicing 12 Bhikshu Pratimas and Gunaratnasamvatsar tap. • 14 ascetics including Aneeksen Kumar have qualified for liberation by acquiring the knowledge of 14 Purvas and practicing the simple tap of a series of two day fasts to shed their karmas. . Seekers like Arjunamali attain liberation just by practicing tap of a series of two day fasts for six months and lofty attitudes of discipline, clemency, tolerance and fortitude. • Child ascetics like Atimukta Kumar get liberated after leading a long ascetic life acquiring knowledge and practicing Gunaratnasamvatsar tap. Ascetic Gajasukumal gets liberated without studying scriptures and attaining the lofty state of shukla dhyana (pure meditation) with extreme endurance and equanimity during his short ascetic life lasting just a day and a night. Nanda, Kali and other queens destroyed their karmas by rigorous practices of tap during their long ascetic lives. Thus an apt assimilation of the combined practices of all branches of spiritual practices, including tap, discipline, self-control, clemency and meditation, leading to liberation can be found in this Agam. The Ideal of this Sutra At every step in the study of this Agam springs an intense inspiration to indulge in tap, clemency and pure meditation. Besides this, unique inspirations from some special and ideal characters show us some ideals worth emulating. For example 1. To have strong faith in religion, attitudes of appreciating virtues and graciously supporting religious activities like Vaasudev Shrikrishna. 2. 'The initiation of eight principle queens of Vaasudev Shrikrishna gives inspiration to reject mundane indulgences and accept renunciation. Page #17 -------------------------------------------------------------------------- ________________ 2 The brilliant character of ascetic Gajasukumal provides lessons in patience, camination, tolerance of pain and extreme endurance. 4 The story of Sudarshan Shravak informs about ultimate submission to one's deity of worship, self confidence and religious aura. 5 The ascetic life of Arjunamali points at astonishing tolerance and practice of attitude of suppression of evil thoughts. 6. The description of the austerities of Kali and other queens of king Shrenik present the ideal of tempering sinful karmas with tap after abandoning fondness for the body. 7. The interesting story of child ascetic Atimukta Kumar eloquently reveals the value of simplicity in life, good behaviour and asking questions with modesty. Thus, this Agam opens up the path of pursuit of the goal of liberation by presenting a variety of inspiring ideals. Its reading and listening is beneficial to all. This Edition Today Antakriddasha Sutra is the most read and recited Agam in Jain society. Numerous institutions have published a variety of editions of this. Detailed commentaries and explanatory works on this have been published as also editions only with original text and translation and some with original text only. Thus many small and large editions have been published. Each has its own utility. Besides Hindi many beautiful editions in Gujarati have also been published. I have also come across the English edition by Shri Modi. Readers will ask-What is new about this edition ? Publication of Illustrated Agams I had decided last year, on the occasion of the diamond jubilee year of the birth of Uttar Bharatiya Pravartak Gurudev Bhandari Shri Padmachandra ji. M., to get illustrated Agams published. Publication of illustrated Agams is a historical work and has its own importance. It is said that a few copies of Kalpa Sutra and Uttaradhyayan Sutra are now the only illustrated works among the ancient manuscripts of Agams available in some Jnana Bhandars. It is also said that these copies of Agams with illustrations are valued at 20 to 25 thousand rupees each. What to say of getting a copy of such rare illustrated Agams when it is difficult even to look at them. Still every curious student of Agams nurtures a desire of seeing illustrated Agams. He also has a desire to possess them. It is certain that illustrations makes even the most serious and complex subjects easy to understand. An illustration gives form to the formless and turns complex to simple. An illustration can be more effective than a thousand verses. All said and done, the usefulness and necessity of visual presentation finds an ever expanding slot in modern education system. 4 319 $ Page #18 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Publication of illustrated Agams is an expensive affair. While making illustrations it is ensured that they conform to the tradition and are commensurate with the standard of Agams. Also, the whole process starting from painting the illustrations to the final multicolored printing is highly cost intensive. That is the reason that an illustrated edition of Agams is highly expensive as compared with an ordinary edition. It is almost out of reach of the ordinary reader. All these problems can be solved and the society is thinking on those lines as well. Still it is beyond any doubt that an illustrated edition, and that too with Hindi and English translations is more attractive, readable and grand as compared with other editions. Srichand ji Şurana, a profound thinker and literateur has given concrete shape to my idea of publication of illustrated Agams. His devotion for revered Gurudev and the Agams, combined with his mission of publishing illustrated literature and long standing experience in the field, has given impetus to this project and made its execution easy. Some time back we published Illustrated Uttaradhyayan Sutra and here now is Illustrated Shri Antakriddasha Sutra. Thus, with co-operation from all sides, this second number of the Illustrated Agam Series-Illustrated Antakriddasha Sutra-is placed in the hands of our readers. I am confident that this effort will inspire Jain brethren in India and abroad to study Agams and they will accept the path of purification of soul; with this hope and wish I fail to find words of thanks for Tapacharya Up-Pravartini Shri Moahn Mala ji M. and Shramani Surya Shri Sarita ji M. for their commendable co-operation. As I had hoped, the illustrated Antakriddasha Sutra was very much liked by readers as well as scholars. In short time the first edition was sold out. To cater to the increasing demand, now this second edition is ready. The book Antakriddasha Mahima by Shri Suyash Muni ji has also been included with its English translation by Shri Surendra Bothara. -Amar Muni Padma Jayanti (Dashahara) Jain Sthanaka Gandhi Mandi, PANIPAT 41 PC 41 Page #19 -------------------------------------------------------------------------- ________________ अनुक्रमणिका (Index) पृष्ठ अन विषय उत्थानिका (Preamble) १. प्रथम वर्ग (First Section) अध्ययन १ (Chapter 1) अध्ययन २-१० (Chapters 2-10) २. द्वितीय वर्ग (Second Section) अध्ययन १-८ (Chapters 1-8) ३. तृतीय वर्ग (Third Section) अध्ययन १ (Chapter 1) अध्ययन २-६ (Chapters 2-6) अध्ययन ७ (Chapter 7) अध्ययन ८ (Chapter 8) अध्ययन ९ (Chapter 9) अध्ययन १०-१३ (Chapters 10-13) ४. चतुर्थ वर्ग (Fourth Section) अध्ययन १-१0 (Chapters 1-10) ५. पंचम वर्ग (Fifth Section) अध्ययन १ (Chapter 1) अध्ययन २-८ (Chapters 2-8) अध्ययन ९ (Chapter 9) अध्ययन १० (Chapter 10) ६. षष्ठम वर्ग (Sixth Section) 3782747 9 (Chapter 1) अध्ययन २ (Chapter 2) अध्ययन ३ (Chapter 3) अध्ययन ४ (Chapter 4) अध्ययन ५ (Chapter 5) १-१६ ३-३८ १६-२९ २९-३८ ३९-४१ ३९-४१ ४२-१२३ ४३-५० ५०-५१ ५१-५३ ५३-११९ ११९-१२२ १२२-१२३ १२४-१२९ १२५-१२९ १३०-१६६ १३१-१६१ १६१-१६३ १६३-१६६ १६६-१६६ १६७-२२९ १६९-१७१ १७१-१७२ १७२-२०६ २०६-२०७ २०७-२०८ ॥ १९॥ Page #20 -------------------------------------------------------------------------- ________________ अध्ययन ६ ( Chapter 6 ) अध्ययन ७ (Chapter 7 ) अध्ययन ८ ( Chapter 8 ) अध्ययन ९ ( Chapter 9) अध्ययन १0 (Chapter 10) अध्ययन ११ (Chapter 11 ) अध्ययन १२ (Chapter 12 ) अध्ययन १३ (Chapter 13) अध्ययन १४ (Chapter 14 ) अध्ययन १५ (Chapter 15) अध्ययन १६ (Chapter 16) ७. सातवाँ वर्ग (Seventh Section) अध्ययन १-१३ (Chapters 1-13) ८. आठवाँ वर्ग (Eighth Section) अध्ययन १ ( Chapter 1 ) अध्ययन २ (Chapter 2 ) अध्ययन ३ ( Chapter 3) अध्ययन ४ (Chapter 4 ) अध्ययन ५ ( Chapter 5) अध्ययन ६ ( Chapter 6 ) अध्ययन ७ (Chapter 7 ) अध्ययन ८ ( Chapter 8 ) अध्ययन ९ ( Chapter 9 ) अध्ययन 90 (Chapter 10 ) उपसंहार (Conclusion) परिशिष्ट (Appendix ) १. तप सम्बन्धी चित्र ( Illustrations related to Austerities ) २. अस्वाध्याय काल (Period of non-study) ३. अन्तकृद्दशा महिमा (Antakriddasha Mahima) फ्र २० फ २०८-२०८ २०८-२०८ २०८-२०१ २१०-२१० २१०-२११ २११-२११ २१२ - २१२ २१२-२१३ २१३-२१३ २१३-२२६ २२७-२२९ २३०-२३३ २३१-२३३ २३४-२८९ २३५-२५० २५० - २५३ २५३-२५७ २५७-२५८ २५९-२६४ २६५-२६९ २७०-२७५ २७५-२७९ २७९-२८३ २८३-२८८ २८८-२८९ २९० २९१-२९४ २९५-४८८ Page #21 -------------------------------------------------------------------------- ________________ अटुमं अंग सिरि अन्तगड दसाओ अष्टम अंग श्री अन्तकृद्दशा Eighth Anga Śrī Antakṛiddaśā Page #22 -------------------------------------------------------------------------- ________________ अष्टम अंग श्री अन्तकृद्दशा सूत्र उत्थानिका फ्र उत्थानिका अष्टम अंग अन्तकृद्दशा सूत्र का प्रारंभ प्रश्नोत्तर के रूप में होता है । चम्पानगरी के पूर्णभद्र चैत्य में आर्य सुधर्मा स्वामी विराजमान हैं । जम्बूस्वामी विनयपूर्वक उनसे प्रश्न करते हैं कि श्रमण भगवान महावीर ने अष्टम अंग अन्तकृद्दशा सूत्र में किस भाव का कथन किया है ? उत्तर में गणधर सुधर्मा स्वामी अष्टम अंग का वर्णन करते हैं । इस अष्टम अंग में आठ वर्ग हैं और उनके नब्बे (९०) अध्ययन हैं । पहले से पांचवें वर्ग तक के इकावन (५१) अध्ययन हैं । जिनमें वासुदेव श्रीकृष्ण के राज परिवार के ४१ राजकुमारों तथा १० रानियों की दीक्षा एवं तपस्या, तप, संयम आराधना आदि का रोमांचक वर्णन है । ये सभी साधक भगवान अरिष्टनेमि के शासनकाल में हुए । छठे, सातवें, आठवें वर्ग में भगवान महावीर के शासनवर्ती १६ पुरुष साधक तथा २३ नारी साधकों की निर्मल चारित्र - तप आराधना का लोमहर्षक वर्णन है । 事 卐 फफफफफफफफफफफफफफफफ इस प्रकार आठ वर्ग के नब्बे (९०) अध्ययनों में सत्तावन पुरुष साधक तथा तेतीस नारी साधकों अर्थात् कुल नब्बे (९०) आत्म-साधकों का वर्णन है जिन्होंने ज्ञान-दर्शन - चारित्र तप की निर्मल साधना करके उसी भव में भव का अन्त करके निर्वाण प्राप्त किया । इसलिए उनको अन्तकृद् (अन्त करने वाले ) कहा गया है । प्रथम अध्ययन द्वारका नगरी के वर्णन से प्रारंभ होता है । For Private 卐 Personal Use Only Page #23 -------------------------------------------------------------------------- ________________ 步步步步步步步步步步步步步步步步步步步步步步步步步步步步步步步步步步步男%%%%%%%%%%%%%%%%%555 Śrī Antakşd-daśā Sūtra-Eighth Anga 出牙步步步男男男男男男男男皆牙牙牙牙牙步步步步男男男牙牙牙牙牙先生牙%步步步步步步步555555岁岁$$$$$$与中 Preamble The Eighth Anga of Dwādaśāngi (twelve parts of Jain holy scriptures and canons) named Antakyddaśūriga sūtra begins in question-answer style. Ārva Sudharmā Swāmi is staying in Pūrnabhadra temple of Campā city. Jambū Swami courteously asks him that Šramaņa Bhagawāna Mahāvīra has described what facts and matter in Eighth Anga-Antakrddaśā Sūtra. In reply Ganadhara Sudharmā Swami describes the contents of Eighth angu. In this Eighth Arga, there are eight sectns or divisions and ninety chapters. From first to fifth sections, there are fiftyone (51) chapters. These chapters contain the description of fortyone (41) princes and ten (10) queens, relating to the royal family of Vasudeva Srikrsna. All this description of consecration, austerities, practising of self-control and restrain is very heart-throbing and titill All these practisers took place during the period of Bhagawūnu Aristanemi. Sixth, seventh and eighth divisions or sections include titillatory description regarding the propiliation of pure conduct and austerities of sixteen (16) male (men) and twentythree (23) female (women) propiliators during the period of Bhagawāna Mahāvira. As thus, in the ninety chapters of eight sections or divisions, there is the description of 57 men and 33 women i.e., all ninety self-practisers who attained salvation, by practising pure propiliation of right knowledge, faith, conduct and austerity; so ending the circle of births and deaths, in that very existencetherefore those are called antakrd (end-doers). The first chapter of first section or division begins with the description of Dwarakā city. अन्तकृद्दशा सूत्र : प्रथम वर्ग Page #24 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रथम वर्ग सूत्र १ तेणं कालेणं तेणं समएणं चम्पा णामं णयरी होत्था, वण्णओ । तत्थ णं चम्पाए नयरीए उत्तर-पुरथिमे दिसिभाए एत्थणं पुण्णभद्दे णामं चेइए होत्था । वणसण्डे वण्णओ । तीसे णं चम्पाए णयरीए कोणिए णामं राया होत्था । महया हिमवंत जाव वण्णओ। उस काल और उस समय में चम्पा नाम की नगरी थी । यह नगरी बहुत ही सुन्दर वर्णन करने योग्य थी । चम्पा नगरी के उत्तर और पूर्व दिशा के मध्य (ईशान कोण) में पूर्णभद्र नाम का एक मनोहर रमणीय उद्यान (वन खंड) था । उस उद्यान के ईशान कोण में पूर्णभद्र नान के यक्ष का प्राचीन मन्दिर (आयतन) था । चम्पानगरी में उस समय कोणिक नाम का राजा राज्य करता था; जो महान हिमवंत पर्वत के समान अजेय और राष्ट्र का रक्षक था । FIRST SECTION Maxim 1: (Sutra) 1-At that time and at that period there was a city, named Campā. That city was very beautiful and so describable. In the middle of north-eastern direction (Iśāna kona) of the Campā city, there was a garden named Pūrnabhadra, which was very beautiful, heart-attracting and pleasure उत्थानिका Page #25 -------------------------------------------------------------------------- ________________ giving; so it was describable. Amidst that garden in the middle of north-eastern direction, there was a sanctuary (temple) of a Yaksa (deity) named Purnabhadra. In the city Campå at that period, a great king named Koņika ruled, who was a very brave and great warrior. He was unconquerable like the great mountain Himavanta and saviour of his nation (the territory of which he was ruler). विवेचन • यहां पर 'तेणं कालेणं तेणं समएणं' इस वाक्य में काल और समय का भिन्न अर्थ में प्रयोग हुआ है । 'काल' से अभिप्राय है-काल चक्र का अवसर्पिणी कालखंड और उसका चतुर्थ आरा, तथा 'समय' से अभिप्राय है-जिस समय का यह वर्णन किया जा रहा है अर्थात् जब भगवान महावीर एवं गणधर सुधर्मा आदि विद्यमान/उपस्थित थे । इस प्रकार यहाँ 'काल'' एवं 'समय'' के अर्थ में भेद किया गया है । .चम्पानगरी भारत की सुन्दरतम नगरियों में एक थी। इसकी सुन्दरता और शोभा का वर्णन औपपातिक सूत्र में विस्तारपूर्वक मिलता है । यह अंग देश की राजधानी थी । पन्तु राजा श्रेणिक की मृत्यु (ईस्वीपूर्व लगभग ५४४) के पश्चात् महाराज कोणिक ने, राजगृह को छोड़कर चम्पानगरी को अपनी राजधानी बना लिया । निरयावलिका सूत्र में इस घटना का वर्णन इस प्रकार है मगधपति राजा श्रेणिक बहुत वृद्ध हो चुके थे । उनके पुत्रों में अशोकचन्द्र कोणिक सबसे बड़ा, प्रखर, तेजस्वी और महत्वाकांक्षी था । इसका जन्म नाम अशोकचन्द्र था, परन्तु एक अंगुली खंडित (कूणी) होने से कोणिक नाम प्रसिद्ध हो गया । बौद्ध साहित्य में इसी का “अजातशत्रु'' नाम प्रसिद्ध राजा श्रेणिक ने अपने दो लघु पुत्रों हल्ल-विहल्ल कुमारों को राज्य की दो अमूल्य श्रेष्ठ वस्तुएं दे दी-देवनामी हार और सिंचानक हाथी । इससे कोणिक का मन जल-भुन गया । फिर राज्य सिंहासन की प्राप्ति की तीव्र अभिलाषा से प्रेरित होकर उसने अपने अन्य दस भाइयों को साथ मिलाकर षड्यंत्र रचा और राजा श्रेणिक को बन्दी बना लिया । स्वयं मगधाधिपति बन गया और दस अन्य भाइयों को राज्य के छोटे-छोटे भाग बाँट दिये । राज्याभिषेक कराकर तथा राज-चिन्हों से अलंकृत होकर कोणिक अपनी पूज्य माता चेलना के • ४ . अन्तकृद्दशा सूत्र : प्रथम वर्ग Page #26 -------------------------------------------------------------------------- ________________ वन्दन करने आया । पुत्र को आता देखकर माता चेलना ने मुँह फेर लिया । कोणिक ने कहामाता ! क्या तुम अपने पुत्र को राजा के रूप में देखकर प्रसन्न नहीं हो ?' रानी चेलना ने रोषपूर्वक उत्तर दिया-“जिस परम वत्सल पिता ने अपने प्राणों की परवाह न करके पत्र-प्रेमवश पुत्र को जीवन दान दिया, वही पुत्र राज्य का लोभी बनकर पिता को बन्दी नाए. पिंजरे में डाल दे और स्वयं राजा बन बैठे तो कौन माँ ऐसे पितृघाती पुत्र का मुँह देखना चाहेगी ?" माता के संतप्त हृदय से निकले वचनों से कोणिक का हृदय बहुत दुःखी हो गया । उसने पूछा"पिताजी ने मुझे किस प्रकार जीवनदान दिया, उनके मन में क्या सचमुच मेरे प्रति प्रेम था ?" चेलना ने कहा-इतना गहरा पुत्र-प्रेम तो किसी विरले पिता के ही हृदय में होता है ? तू सुनना ही चाहता है, तो सुन । जब तू गर्भ में था, तब मुझे पति के हृदय का माँस खाने का एक अत्यन्त घणित दोहद उत्पन्न हुआ । इस दोहद की पूर्ति तो दूर, इसके विचार से ही मैं अत्यन्त लज्जित और दःखी रहने लगी । किसी तरह तुम्हारे पिताजी ने मेरी चिन्ता का कारण पता लगा लिया, और बहुत ही वीरता, साहस एवं चतुराई के साथ मेरा दोहद पूर्ण करवाया । तुम्हारा जन्म होते ही मेरे मन में तेरे प्रति अत्यन्त घृणा और दुर्विचार आये, कि ऐसी पितृघातक सन्तान को जन्म देने से ही क्या लाभ है ? मैंने जन्मते ही तुझे नगर के बाहर कूड़े के ढेर (उकरड़ी) में फिंकवा दिया, जहाँ एक मुर्गे ने माँस पिंड समझकर तुम्हारी यह अंगुली नोंच डाली । किन्तु तुम्हारे पिताजी को पता चलते ही उन्होंने मुझे उपालम्भ दिया, स्वयं दौड़कर गये, तुम्हें उठाकर लाये, ममतापूर्वक तुम्हारा लालन-पालन किया । तुम्हारी अंगुली में रस्सी और मवाद पड़ जाने से रात को तुम रोते थे । तब तुम्हारे पिताजी अपने मुँह में तुम्हारी अँगुली का मवाद, पीव चूसकर बाहर फेंकते और तुम्हारी पीडा दूर करते । यह सुनाते-सुनाते चेलना का हृदय भर आया । उसकी आँखें भीग गईं । माता के मुँह से यह वृत्तांत सुनते ही कोणिक पश्चात्ताप में फूट-फूट कर रो पड़ा । वह पिता के बंधन काटने के लिए कुल्हाड़ी लेकर कारागार की तरफ दौड़ा । कारागार में पड़े श्रेणिक ने कोणिक को हाथ में कुल्हाड़ी लिये आते देखकर सोचा-यह राज्य-लोभी दुष्ट पुत्र, अब मुझे जान से मारने के लिए आ रहा है । इस बुरी मौत मरने से तो अच्छा है, मैं स्वयं ही मर जाऊँ । यह विचार कर अंगूठी में जड़ित हीरे की कणी को चूस कर उसने पहले ही अपना प्राणान्त कर लिया । पिता की मृत्यु से कोणिक शोकमग्न, विह्वल सा हो उठा । पिता की याद कर वह फूट-फूट कर रो पड़ा । अनेक दिनों तक वह शोक में डूबा रहा । उद्यान आदि में बाहर कहीं घूमने पर कुछ शोक उत्थानिका Page #27 -------------------------------------------------------------------------- ________________ शांत होता, परन्तु ज्योंही राज सिंहासन पर आकर बैठता, पिता की याद में वह शोकमग्न हो उठता । ___ -(निरयावलिका सूत्र) इस शोक की निवृत्ति के लिए अन्त में मंत्रिमण्डल की सलाह पर उसने राजगृह को भी छोड़ दिया और चम्पानगरी को अपनी राजधानी बनाया । यद्यपि राजा कोणिक ने राज्यलिप्सु बनकर पिता को कारागार में डालकर बहुत ही निन्दनीय कार्य किया, परन्तु बाद में माता के समझाने पर अपने दुष्कृत्य पर अनुताप/पश्चात्ताप करके वह माता-पिता के प्रति अत्यन्त आदर भाव रखने लगा । इसीलिए जैन आगमों में उसे माता-पिता का विनीत कहा है । भगवान महावीर का वह परम भक्त था । औपपातिक सूत्र में बताया है-राजा कोणिक ने एक प्रवृत्तिवादुक पुरुष रखा था, जो महान आजीविका पाता था । उसके अधीन अनेक कर्मकर रहते थे, जिनसे भगवान महावीर के प्रतिदिन के समाचार उसे मिलते थे । और वह प्रवृत्तिवादुक पुरुष भगवान महावीर के प्रतिदिन के समाचार प्रातःकाल राजा कोणिक को अवगत कराता रहता था । औपपातिक सूत्र के टीकाकार ने राजा के महान व्यक्तित्व का वर्णन करते हुए बताया है-राजा में महाहिमवान पर्वत के समान पाँच विशेषताएँ होनी चाहिए । १. हिमवान पर्वत जिस प्रकार भरतक्षेत्र की मर्यादा करने वाला है, उसी प्रकार राजा राज्य की मर्यादा का रक्षक होता है । २. पर्वत जैसे बाहरी उपद्रवों से क्षेत्र की रक्षा करता है, वैसे ही राजा बाहरी आक्रमणों से राज्य की रक्षा करता है । ३. पर्वत जिस प्रकार अनेक जड़ी-बूटियों एवं औषधियों का भण्डार होता है, उसी प्रकार राजा क्षमा, शौर्य, गांभीर्य, उदारता, दान आदि गुणों का भंडार होता है । ४. पर्वत जिस प्रकार तूफानों और झंझावातों में अचल रहता है, उसी प्रकार राजा अपनी नीति एवं नियमों में अचल रहता है । ५. पर्वत जैसे सभी प्राणियों का आधार होता है, वैसे राजा भी प्रजा का आधार होता है । कोणिक अपनी प्रजा का पिता, रक्षक, शान्तिकारक और सर्वदा सबका हित करने वाला था । • आर्य जम्बू ने भगवान महावीर के निर्वाण के पश्चात् १६ वर्ष की आयु में आर्य सुधर्मा के पास दीक्षा ली थी, वीर निर्वाण के १२ वर्ष पश्चात् आर्य सुधर्मा को केवलज्ञान हुआ । आगमों की वाचना का यह प्रसंग सुधर्मा स्वामी की छद्मस्थ अवस्था का ही है । अतः संभव है यह प्रसंग जम्बू स्वामी की २४-२८ वर्ष की अवस्था के बीच का ही हो । • अन्तेवासी का अर्थ है-प्रिय शिष्य, अथवा सदा निकट रहने वाला । अन्तकृद्दशा सूत्र : प्रथम वर्ग Page #28 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Elucidation Here in the clause iteņam kālenam tenan samayenam' the words kāla and samaya are used in different meanings. The word kāla here denotes-the fourth division (ärā) of present avasarpiņi age; and word samaya is used for the period when the description is taking place. It means when Bhagawāna Mahāvīra and Ganadhara Sudharmā were present or were in existence. Thus the meanings of kala and samaya are different. Campā city was one of the beautiful cities of India at that time. Beauty and enrichment of this city is vividly described in Aupupātika sūtra. It was the capital of Anga deśa. But after the death of king Sreņika, his son king Koņika made this city his capital, leaving the city Rājagrha. Nirayāvalikā Sūtra describes the episode like this The ruler of Magadha country, king Śrenika became very old. Among all his sons, Asokacandra Koņika, was eldest, brave and ambitious. His name was Asokacandra; but his small finger was damaged (Kūni). So his Konika name became familiar. In Bauddha literature his name Ajātaśatru is popular. King Śrenika gave two invaluable things of kingdom to his two younger sons Halla-Vihalla, one was god-given necklace (Devanāmi hāra) and the other was elephant Sincanaka. It angried prince Ronika. Inspired by eager ambition to fetch the throne, he conspired along with nis ten other brothers and imprisoned king Śrenika. He himself became the ruler of entire Magadha country, and gave small territories to his ten brothers. Being coronated and adorned with the signs of kingship Koņika came to his adorable mother Celanā to bow down at her feet; but seeing the son coming, the mother turned her face in other side. Koņika said,"O mother ! are you not happy seeing your son as a king ?" Queen Celanā angrily rebuked—“The most affectionate father, without caring for his own life, gave the life to his son due to hearty affection; the same son, becoming greedy of kingdom, imprisons his own father, encages him and himself becomes king; which mother will like to see the face of such father-torturing son ?'' Listening the agony-hearted words of mother, the heart of Koņika grieved. He asked with curiosity-"How did father give me life ? Did he really love me?” उत्थानिका Page #29 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Celana said-Such a deep affection to a son, can be found in the hearts of some fathers only. If you want to know, then listen. When you were in my womb then a hateful but keen desire engrossed me that I must eat the flesh of the heart of your father. I could not express such a hateful desire; but grief overtook me. Anyhow your father could know the cause of my grief. Then with courage and cleverness he fulfilled my that hateful desire. At the moment of your birth, I was filled with hateful thoughts about you that what's the use to give birth to a father-torturing son like you? I had you thrown in a dustbin by my maid slave. There a cock cut your little finger assuming you as a lump of flesh. But as soon as your father became aware of this episode, he rebuked me, went and brought you from the dustbin, and nurtured you with enrormous love. Your damaged finger became septic. Due to pus you bitterly weep in the night. Then your father sucked the pus of your finger by his own mouth and vomitted (threw) it. In this way, he used to subside your pain. Expressing all this the eyes of Celana became wet. Hearing such an episode from mother, Konika wept bitterly due to repentance. He ran to the prison, taking an axe in his hand, to cut the chains and fetters of his father. Seeing Konika coming, with an axe in his hand, king Śrenika thought-this kingdom-greedy, stupid son is coming to kill me. So it would be better that I myself die than to die such a cruel death. Thinking thus, he gave up his life by sucking and crushing the diamond studded in his ring. Due to the death of the father, Konika was engrossed with great grief. He wept bitterly remembering his father. For many a days he was drowned in sorrow. While walking in park etc., sorrow lessened but as he sat on the throne he became sorrowful in the memory of his late father. (Nirayavalikā sūtra) For relief of this great sorrow, in the end according to the council of his ministers he left Rajagṛha and made Campă city as his capital. Although king Konika, due to his lustfulness for kingdom, had done a most shameful deed-imprisoning his father; but afterwards by the advice and admonishment of his mother, he repented much and was filled with feelings of respect towards his parents. Thereby he is called courteous to his parents in Jain Agamas. He was also a great devotee of Bhagawana Mahāvīra. For Private Personal Use Only अन्तकृद्दशा सूत्र : प्रथम वर्ग Page #30 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Aupapatiku patiku sūtru describes that king Konika had appointed a person, entitled Pram! med Provrtti Vāduka, on an enormous salary. There were many servants under air duty was to collect information about Bhagawana Mahavira: and that Provrtti Vāduka used to give full report about Bhagawāna Mahåvira to king Konika every morning. The commentator of Aupapātika sūtra, discussing the great personality of king, has described that a king must have five special characterstics like the great mountain Himavāna. 1. As mountain Himavāna confines the boundary limit of Bharataksetra, so a ruler saves the boundary of his territory. 2. As the mountain saves the territory from external enemies, so the king saves country from external invasions. 3. As the mountain is the treasure of herbs, roots etc., so the ruler should be full of virtues like-forgiveness, valour, generosity, charity etc. 4. As the mountain remains stable in storms and hurricanes, so the ruler remains steadfast in his policy-rules and regulations. 5. As the mountain is the base or support for all living beings, so is the ruler for his public. Koņiku was like the father of his subject, saviour, peace-giver and always beneficial for all. Āryu Jambū accepted consecration from Sudhurma Swāmī, when he (Tambī) was of 16 years of age and after the salvation of Bhagawāna Mahāvira. Twelve years after the salvation of Bhagawāna Mahāvira, Arya Sudharmā became omniscient. This episode of teaching the Agamas, should be of the time when the age of Jambū Swāmī was between 24-28 years. Antevāsi-a disciple who lives always near to his preacher, or a favourite disciple of a teacher.. चम्पानगरी में सुधर्मा स्वामी : FTP : तेणं कालेणं तेणं समएणं अज्ज सुहम्मे थेरे जाव पंचहि अणगारसएहिं सद्धिं संपरिबुडे पुव्याणुपुष् िचरमाणे गामाणुगामं दूइज्जमाणे सुहंसुहेणं विहरमाणे जेणेव चम्पा नयरी जेणेव पुण्णभद्दे चेइए तेणेव समोसरिए । उत्थानिका Page #31 -------------------------------------------------------------------------- ________________ परिसा णिग्गया...जाव परिसा पडिगया । तेणं कालेणं तेणं समएणं अज्ज सुहम्मस्स अंतेवासी अज्ज जंबू जाव पज्जुवासमाणे एवं वयासीजइ णं भंते ! समणेणं भगवया महावीरेणं आइगरेणं जाव संपत्तेण सत्तमस्स अंगस्स उवासगदसाणं अयमढे पण्णत्ते । अट्ठमस्स णं भंते ! अंगस्स अंतगडदसाणं समणेणं जाव संपत्तेणं के अढे पण्णत्ते ? सूत्र २ उस काल और उस समय में , स्थविर आर्य सुधर्मा स्वामी पाँच सौ अणगार शिष्यों के परिवार सहित श्रमण नियमों के अनुसार विचरते हुए, एक ग्राम से दूसरे ग्राम सुखपूर्वक विहार करते हुए चम्पानगरी के पूर्णभद्र उद्यान में पधारे । गणधर सुधर्मा स्वामी का आगमन सुनकर श्रद्धालु नागरिक दर्शन और प्रवचन सुनने के लिए आये । गणधर सुधर्मा ने उपस्थित परिषद्-जनता को धर्म का उपदेश दिया । धर्मोपदेश सुनकर अनेक लोगों ने त्याग-प्रत्याख्यान, नियम आदि ग्रहण किये और वापस अपने स्थान को लौट गये । उस काल उस समय में, आर्य सुधर्मा स्वामी के अन्तेवासी आर्य जम्बू ने (परिषदा जाने के पश्चात्) विनयपूर्वक वन्दन-नमन करके उनकी पर्युपासना करते हुए इस प्रकार पूछा-हे भगवन् (भन्ते) ! (यदि) धर्म की आदि करने वाले श्रमण भगवान महावीर स्वामी ने सातवें अंग शास्त्र उपासकदशा का यह अर्थ फरमाया है तो, हे भगवन् ! अष्टम अंग अन्तकृद्दशा सूत्र में किस विषय का (भाव या वर्णन) प्रतिपादन किया है ? Sudharmā Swāmīin Campā City : Maxim 2: . At that time and at that period, elder sage (sthavira) Arya Sudharmă Swami with his five hundred mendicant - .१०. अन्तकृद्दशा सूत्र : प्रथम वर्ग - Page #32 -------------------------------------------------------------------------- ________________ YU TO * ** SEUS 92 Lain Education International Page #33 -------------------------------------------------------------------------- ________________ 555555555555 चित्रक्रम १ : चम्पा नगरी में सुधर्मा स्वामी गंगा नदी के तट पर बसी चम्पा नगरी का दृश्य । नगर के बाहर ईशान कोण में पूर्णभद्र चैत्य तथा विविध जाति के वृक्षों से हरा-भरा वनखंड है। एक ओर पूर्णभद्र यक्ष का यक्षायतन है । गणधर सुधर्मा स्वामी इस पूर्णभद्र चैत्य में विराजमान हैं। आर्य जम्बू वन्दना नमस्कार करके पूछते हैं - धर्मतीर्थ की आदि करने वाले श्रमण भगवान महावीर ने अष्टम अंग अन्तकृद्दशा का क्या भाव कहा है ? Illustration No. 1 : Sudharma Swami in Campă city Scene of Câmpă city, which is situated at the bank of Gangā river. In the middle of North-East direction there is a sanctuary of Purṇabhadra Yakṣa (deity) and a garden (wood-park) filled with many kinds of trees and greenery. At one side is seen sanctuary of Purṇabhadra Yakṣa (deity). Gaṇadhara Sudharma Swāmī is sitting in this sanctuary. Ārya Jambu asks bowing down to him-What subject matter of eighth Anga-Antakṛddaśā Sūtra has Bhagawāna Mahāvīra expressed in eighth Anga-Antakṛddaśā Sūtra ? (वर्ग १ / अध्य. १ ) अन्तकृद्दशा सूत्र : चित्र परिचय For Private Personal Use Only ( Sec. 1 / Ch. 1) 55556 卐 卐 卐 卐 Page #34 -------------------------------------------------------------------------- ________________ disciples, according to the sage rules, wandering from village to village happily came to Pūrnabhadra garden of Campā city. Knowing about the arrival of Ganadhara Sudharma Swāmi, the citizens full of faith came to bow down to him and to listen his religious sermon. Ganadhara Sudharmā gave religious sermon to present congregation. Listening that sermon many persons accepted the vows of renunciation and expiation and afterwards went back to their houses. At that time and at that period, the favourite or always living near disciple of Sudharmā Swāmī, after the departure of the congregation, Arya Jambū courteously bowing down asked-O Bhagawan (Bhante) ! The beginner (propagator) of religion Sramana Bhagawāna Mahāvīra Swāmi described this subject matter of seventh Angasūtra, then 0 Bhagawan ! What subject matter he described in the Eighth Angaśāstra- Anta-kriddaśā Sūtra ? विवेचन इन सूत्रों में ‘जाव’ और ‘वण्णओ' इन दो शब्दों का बार-बार प्रयोग हुआ है । आगे भी होगा और अनेक सूत्रों में इनका प्रयोग होता है । दोनों शब्दों का प्रयोजन इस प्रकार है जाव-अर्थात्-‘यावत्'' यानी जब तक, वहाँ तक । इस शब्द से यह संकेत किया जाता है कि इस विषय का विस्तृत पाठ और विस्तृत वर्णन अन्य स्थान पर किया गया है, उसे यहाँ पर भी प्रसंगानुसार समझ लेना चाहिए । वण्णओ-शब्द का प्रयोग उस सम्बन्धित प्रसंग व विषय वस्तु की अनेक विशेषताओं पर प्रकाश डालने के लिए किया जाता है । वर्णनीय वस्तुएँ अनेक हैं, उनके गुण विशेषताएं भी अनेक हैं । जिस प्रकार नगर, पर्वत, उद्यान, राजा आदि का वर्णन जिस-जिस स्थान पर विस्तारपूर्वक किया गया है । उत्थानिका .११ . Page #35 -------------------------------------------------------------------------- ________________ उन पाठों की बार-बार पुनरावृत्ति नहीं हो, इसलिए वहाँ “वण्णओ'' (वर्णक या वर्णनीय) शब्द का संकेत प्रसंगानुसार उस सम्पूर्ण भाव को समझने के लिये किया जाता है | चम्पानगरी, पूर्णभद्र चैत्य आदि का विस्तृत वर्णन औपपातिक सूत्र में है । परिसा णिग्गया जाव यहाँ पर 'जाव'' शब्द से परिषद् के अनेक भेद, उनके आने के विविध प्रयोजन, धर्म देशना सुनकर जीवादि तत्त्वों का ज्ञान, दीक्षा, श्रमण अथवा श्रावक व्रत ग्रहण आदि विविध विषयों का वर्णन औपपातिक सूत्र से समझना चाहिए । सुहम्मे थेरे जाव इस 'जाव' शब्द में सुधर्मा स्वामी का सम्पूर्ण वर्णन समझ लेने की सूचना की गई है । ज्ञाताधर्मकथांग सूत्र अध्ययन १ में आर्य सुधर्मा स्वामी के समग्र व्यक्तित्व का सुन्दर यथार्थ परिचय कराया गया है । वह मूल पाठ भावार्थ सहित अन्तकृहशा महिमा में दिया गया है । पाठक उससे सुधर्मा स्वामी का सम्पूर्ण वर्णन जाने । यहाँ सुधर्मा स्वामी को ‘स्थविर' कहा गया है । सुधर्मा स्वामी ने ५0 वर्ष की अवस्था में दीक्षा ली थी और ३० वर्ष तक भगवान महावीर की सेवा में रहे । यह घटना-प्रसंग भ. महावीर के निर्वाण के बाद का है । अतः इस समय इनकी अवस्था ८0 वर्ष से अधिक की होनी चाहिए। ‘स्थविर' शब्द का अर्थ है-जो स्वयं धर्म एवं आचार-मर्यादा आदि में स्थिर (स्थित) रहकर दूसरों को भी स्थिर करने में समर्थ हो । आगमों में स्थविर तीन प्रकार के वताये हैं । १. वयःस्थविर--कम से कम ६0 वर्ष की आयु का हो । २. दीक्षा स्थविर--कम से कम २० वर्ष की दीक्षा पर्याय वाला । ३. श्रुत स्थविर-जो स्थानांग एवं समवायांग सूत्र के अर्थ का ज्ञाता हो । आर्य सुधर्मा तो तीनों ही दृष्टियों से स्थविर थे । आर्य-प्राचीन समय में आर्य शब्द एक सम्मानजनक सम्बोधन था । शील एवं ज्ञान सम्पन्न व्यक्ति के लिए 'आर्य' शब्द का अधिक प्रयोग होता था । आगमों में गणधर सुधर्मा एवं जम्बूस्वामी तथा इनके उत्तरवर्ती आचार्यों के लिए भी 'आर्य' (अज्ज) शब्द का प्रयोग आगमों व पश्चातवर्ती स्थविरावली में मिलता है । भन्ते-जैन एवं बौद्ध परम्परा में अपने धर्मगुरु, धर्माचार्य तथा परम श्रद्धेय आप्त पुरुषों के लिए भन्ते शब्द का प्रयोग मिलता है । भन्ते के अनेक अर्थ हैं, जैसे-भदन्त । ज्ञान-दर्शन-चारित्र आदि ऐश्वर्यों से युक्त अथवा भवान्त-भव का, संसार परिभ्रमण का अन्त करने वाले । भगवान शब्द से भी यही अर्थ समझना चाहिए । . १२ . अन्तकृद्दशा सूत्र : प्रथम वर्ग Page #36 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Elucidation In these maxims the words 'java' and 'vannao' are used many times and will be used further. These words are used in many sūtras. Meanings of both the words are as follows (1) Jāva means 'yāvat'-until, upto that definite point. By this word it is pointed out that the detailed reading and vivid description of this very subject has been done elsewhere-the other sūtra or sūtras, that should also be conceived here. at this very point, according to reference. (2) The word Vannao' used for throwing light on various specialities of the related reference and subject matter. There are many describable things, their features and qualities are also many. As the descriptions of city, mountain, garden, park, king etc., are vividly made at some particular places in sūtra or sütrus that should not be repeated over and again. For this purpose the word vanno (descriptive or describable) is used. It also points out that the reader should conceive all the subject related and referred at the very point. The detailed description of Campå city and Pūrņabhadra caitya (temple) we get in Aupapātiku sūtra. (3) Parisă niggayā jāva .......Here jāva word indicates many kinds of congregations, many purposes of their coming, the knowledge of soul etc., elements, consecration, accepting house holder's vows etc., and various subjects like this should be known from Aupapātika sūtra. (4) Suhamme there jāva........ Here the word “jāva' indicates to conceive all and all about Sudharmā Swami. In Iñātādharmakathānga Sūtra, chapter 1, the full and vivid description of the personality and personal traits of Sudhurinā Swāmi has been given in a very lucid style. That original reading with its version we have given in Antakrddaśā Mahimă. Readers are advised to understand all about Sudharmă Swāmi from there. (5) Here the word sthavira (elder sage) is used for Sudharmā Swāmi. Sudharmā Swāmī accepted consecration when he was 50 years of age, and remained upto 30 years in the service of Bhagawāna Mahāvīra. This episode is narrated after the salvation of Bhagawāna Mahavira. Therefore at this time the age of Sudharmā Swāmi should be more than eighty years. The word sthavira (elder sage) means the sage who himself remains stable in religion and religious rites and rules and should be capable to make others also stabie in religion and sage activities. उत्थानिका Page #37 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Three types of elder sages are described in Agamas. (i) Vayah sthavira ( Elder by age ) - He must be at least sixty years of age. (ii) Diksā sthavira ( Elder by consecration ) - He must have been consecrated at least twenty years before. (iii) $ruta sthavira ( Elder by knowledge ) - He must know the meaning of Sthānanga and Samavāyānga. Ārya Sudharma was elder sage by all the aforesaid three points of view. Arya-In ancient times the word Arya was an address denoting honourable, superior etc. This address was frequently used for the learned persons and persons opulent with rectitude. We get the word Arya (Präkṛta form Ajja) used for Gaṇadhara Sudharma, Jambu and later preachers in Agamas and later literature. In Jain & Bauddha tradition the word Bhante is frequently used for religious teachers, preachers and authentic persons. The word Bhante has many renderings, like-opulated with the high virtues of right knowledge, faith, conduct etc., or Bhavanta-destructor of the cycle of births and deaths. This meaning should also be conceived by the word Bhagawāna. सूत्र ३ : एवं खलु जंबू ! समणेणं जाव संपत्तेणं अट्ठमस्स अंगस्स अंतगडदसाणं अट्ठ वग्गा पण्णत्ता । जइ णं भंते ! समणेणं जाव संपत्तेणं अट्ठमस्स अंगस्स अंतगडदसाणं अट्ठ वग्गा पण्णत्ता, पढमस्स णं भंते वग्गस्स अंतगडदसाणं समणेणं जाव संपत्तेणं कइ अज्झयणा पण्णत्ता ? एवं खलु जंबू ! समणेणं जाव संपत्तेणं अट्ठमस्स अंगस्स अंतगडदसाणं पढमस्स वग्गस्स दस अज्झयणा पण्णत्ता तं जहा १४ ५ गोयम' समुद्द सागर गंभीरे ४ चेव होइ थिमि " य । ७ अयले ६ कंपिल्ले " खलु, अक्खोभ' पसेणई' विण्हू १० ॥ 9 अन्तकृद्दशा सूत्र : प्रथम वर्ग Page #38 -------------------------------------------------------------------------- ________________ सुधर्मा स्वामी ने उत्तर दिया-(एवं खलु-निश्चित रूप में) हे जम्बू ! श्रमण भगवान महावीर यावत् जो मोक्ष पधार चुके हैं, उन्होंने अन्तकृद्दशा सूत्र के आठ वर्गों का प्रतिपादन किया है । जम्बू-हे भगवन् ! यदि श्रमण भगवान ने अन्तकृद्दशा सूत्र के आठ वर्ग कहे हैं तो भगवन् ! अन्तकृद्दशा सूत्र के प्रथम वर्ग में कितने अध्ययन कहे हैं ? सुधर्मा-हे जम्बू ! श्रमण भगवान महावीर स्वामी ने अन्तकृद्दशा सूत्र के प्रथम वर्ग के दश अध्ययन कहे हैं, जो इस प्रकार हैं । १. गौतम कुमार, २. समुद्र कुमार, ३. सागर कुमार, ४. गंभीर कुमार, ५. स्तिमित कुमार, ६. अचल कुमार, ७. काम्पिल्य कुमार, ८. अक्षोभ कुमार, ९. प्रसेनजित और १0. विष्णुकुमार । Maxim 3 : Answered Sudharmā Swāmi. Definitely Jambū ! Sramaņa Bhagawāna Mahāvīra, (until) who has attained salvation, described eight sections or divisions of Antakyddaśā sūtra. Jambu-O Bhagawan ! If Sramana Bhagawana Mahāvīra has described eight sections or divisions of Antakyddaśā sūtra, then how many chapters he has described in first section. Sudharmā-0 Jambū ! śramana Bhagawāna Mahāvīra Swāmī has told ten chapters of first section of Antakrddaśā sūtra, which are as following(1) Gautama Kumāra, (2) Samudra Kumāra (3) Sāgara Kumāra (4) Gambhira Kumāra, (5) Stimita Kumāra (6) Acala Kumāra (7) Kāmpilya Kumāra, (8) Aksobha Kumāra, (9) Prasenajita and (10) Visnu Kumāra. उत्थानिका . १५ . Page #39 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ( प्रथम अध्ययन द्वारका वर्णन सूत्र ४ : जइ णं भंते ! समणेणं जाव संपत्तेणं अट्ठमस्स अंगस्स अंतगडदसाणं पढमस्स वग्गस्स दस अज्झयणा पण्णत्ता । तं जहा-गोयम जाव विण्हु । पढमस्स णं भंते ! अज्झयणस्स अंतगडदसाणं समणेणं जाव संपत्तेणं के अढे पण्णत्ते ? एवं खलु जंबू ! तेणं कालेणं तेणं समएणं बारवई णाम णयरी होत्था । दुवालस जोयणायामा णव-जोयण वित्थिण्णा धण-वइ-मइ-णिम्मिया चामीगर-पागारा नाणामणि-पंचवण्ण कविसीसग-परिमण्डिया सुरम्मा ! अलकापुरी संकासा पमुइय-पक्कीलिया पच्चक्खं देवलोगभूया पासाइया दरिसणिज्जा अभिरूवा पडिरूवा । सूत्र ४ : आर्य जम्बू-हे भगवन् ! यदि श्रमण भगवान महावीर ने आठवें अंग अन्तकृद्दशा सूत्र के प्रथम वर्ग के दस अध्ययन कहे हैं, जैसे गौतम आदि, तो हे भगवन् ! भगवान महावीर स्वामी ने प्रथम अध्ययन में क्या भाव कहा है ? किस प्रकार का वर्णन किया है ? आर्य सुधर्मा-हे जम्बू ! वह इस प्रकार है । उस काल उस समय में द्वारका नाम की एक नगरी थी । वह नगरी बारह योजन लम्बी, नौ योजन चौड़ी थी । धनपति-कुबेर ने अपनी बुद्धि कल्पना से उसका निर्माण किया था । वह सोने के कोट से युक्त, पांच प्रकार की (इन्द्र, नील, वैडूर्य, पद्म एवं राग आदि) मणियों से जटित कंगूरों से सुशोभित थी । कुबेर की नगरी अलकापुरी के समान बड़ी सुरम्य लगती अन्तकृद्दशा सूत्र : प्रथम वर्ग Page #40 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Hana qaa *** RA 1 - TFF PERSONA cons F ERA Page #41 -------------------------------------------------------------------------- ________________ 卐 ) ) ) ) ) ) ) ) ) ) ) ) ) ) ) ) ) %! TELEPAL % %%%% %%% चित्रक्रम २ : द्वारका नगरी सुधर्मा स्वामी ने द्वारका नगरी के विषय में बताया-“कुबेर की नगरी के समान समृद्धि-सम्पन्न द्वारका नगरी के उत्तर-पूर्व दिशा में रैवतक नामक विशाल पर्वत था, रैवतक पर्वत पर नन्दनवन नामक उद्यान तथा सुरप्रिय यक्ष का यक्षायतन था। वनखंड के मध्य में एक विशाल अशोक वृक्ष तथा उसके नीचे पृथ्वी शिलापट्ट था।" (वर्ग १/अध्य. १) %%%% %% %% % % Illustration No. 2 : Dwarakā city Sudharmā Swami told about Dwarakā city-"Dwārakā was a flourishing city, like the city of Kubera (god of wealth). In the north-east direction of this city there was a great, high and vast mountain named Raivataka. At that mountain, there was a garden-park named Nandanavana and sanctuary of Surapriya Yaksa (deity). In the middle of park-garden, there was a huge Asoka tree and under it a large smooth rock.” (Sec. 1/Ch. 1) %%% % %%% %%%% 行牙牙牙牙牙牙% 55555555555555555555555555555中 अन्तकृदशा सूत्र : चित्र परिचय Page #42 -------------------------------------------------------------------------- ________________ थी । प्रमोद (आमोद-प्रमोद) और क्रीड़ा के अनेक स्थान बने हुए थे, जिनसे साक्षात् देवलोक के समान मन को प्रसन्न करने वाली और दर्शनीय थी । वह अभिरूप-एक बार देखने पर बार-बार देखने की इच्छा उत्पन्न करने वाली और प्रतिरूप-जब भी देखो, तब नई सजी हुई सी प्रतीत होती eft i Chapter 1 Description of Dwārakā City Maxim 4: Ārya Jambū-O Bhagawan ! If śramaņa Bhagawāna Mahāvīra has expressed ten chapters of first section of eighth Aiga Antakrddaśā sūtra, like Gautama etc., then O Bhagawan ! What subject matter has Bhagawāna Mahāvīra told in first chapter ? Which type of description has he made ? Arya Sudharmă-0 Jambū ! Definitely that description is like this. At that time and at that period there was a city named Dwarakā (Bāravai). It was twelve Yojana long and nine Yojana broad. It was built by the imaginative intellect of Vaiśramana (Kubera-the god of wealth). It had ramparts of gold and adorned by turrets studded by five kinds of gems-Indra, Nila, Vaidūrya, Padma, Rāga etc. It was beautiful, as Alakāpurī-the city of god of wealth. There were numerous places of sports and pastime, rejoicings, amusements etc. On account of these, it was heart-pleasing like heaven and worth-seeing. It was abhirūpa-seeing once inspires the desire of seeing over and again; and pratirūpa-whenever visualised seemed newly adorned, that is, it was adorned in such a peculiar style that whenever seen from any corner and any way a new reflection of adornment came into view. प्रथम अध्ययन 969 Page #43 -------------------------------------------------------------------------- ________________ विवेचन जैसा कि पहले बता चुके हैं प्रारंभ के पाँच वर्गों के ५१ अध्ययनों में जिन साधक आत्माओं का वर्णन है उनका सम्बन्ध द्वारका नगरी एवं वासुदेव श्रीकृष्ण के राज परिवार के साथ रहा है । इसलिए सर्वप्रथम द्वारका नगरी आदि का वर्णन किया गया है । द्वारका-भारतीय साहित्य और इतिहास में अत्यन्त प्रसिद्ध यह नगरी भारत की अतीव समृद्धिशाली और सुन्दरतम नगरियों में थी । इसके निर्माण के विषय में यह घटना प्रसिद्ध है मथुरा के अत्याचारी शासक कंस का श्रीकृष्ण के हाथों अन्त हो जाने पर उसकी पत्नी जीवयशा रोती बिलखती अपने पिता प्रतिवासुदेव जरासंध के पास गई । उसका हृदय विदारक विलाप और उत्तेजक वचन सुनकर जरासंध क्रोध में आग बबूला हो उठा । उसने शौरीपुर के राजा समुद्रविजय जी के पास दूत भेजा कि यदि अपना भला चाहते हो तो तुरंत कृष्ण-बलराम को मेरे पास भेज दो, अन्यथा मैं शौरीपुर का सर्वनाश कर डालूँगा। समुद्रविजय जी ने अपने मंत्रियों एवं निमित्तज्ञों से पूछा-हमें क्या करना चाहिए ? प्रधान निमित्तज्ञ ने बताया-यद्यपि आपके वंश में तीन-तीन महापुरुष पैदा हुए हैं । भावी तीर्थंकर कुमार अरिष्टनेमि, वासुदेव श्रीकृष्ण एवं वलदेव वलभद्र । इनके रहते कोई आपका वाल वांका नहीं कर सकता, परन्तु यह भूमि यादवों के लिए अनुकूल नहीं है । आये दिन के संघर्ष एवं अशान्ति से बचने के लिए आप सपरिवार दक्षिण-पश्चिम दिशा में प्रस्थान कर दीजिए । जाते-जाते जहाँ पर सत्यभामा पुत्र रत्न को जन्म दे, वहीं पर अपना झण्डा गाड़ दें । उसी भूमि पर यादव वंश का अभ्युदय होगा । समुद्रविजय जी, वसुदेव, श्रीकृष्ण, वलभद्र आदि पूरा यादव कुल चलता-चलता दक्षिण-पश्चिमी समुद्रतट पर पहुँच गया । वहाँ रैवतक गिरि की वायव्य दिशा में छावनी डाली । वहीं पर सत्यभामा ने भानु और भ्रमर-दो पुत्रों को जन्म दिया । निमित्तज्ञ के कहे अनुसार वहीं पर यादवों ने अपनी राजधानी बनाने का निश्चय किया । वासुदेव श्रीकृष्ण ने अष्टम भक्त तप करके देवता का स्मरण किया । सुस्थित नामक देव उपस्थित हुआ । वासुदेव ने कहा-मेरे लिए एक नई नगरी का निर्माण करो । देवता ने इन्द्र महाराज को श्रीकृष्ण वासुदेव की भावना बताई । इन्द्र महाराज ने वैश्रमण कुबेर को आदेश दिया कि वासुदेव श्रीकृष्ण के लिए एक अतीव रमणीय विशाल नगरी का निर्माण करो । कुबेर ने १२ योजन लम्बी और ९ योजन चौड़ी एक भव्य विशाल नगरी का निर्माण किया । इस नगरी में अनेक द्वार-उपद्वार होने से इसका नाम (द्वारवती) द्वारका रखा गया । आचार्य हेमचन्द्र के वर्णन के अनुसार-यहीं पर पहले वासुदेव की द्वारका नामक नगरी थी जो बाद में समुद्र में डूब गई । कुबेर ने उसी स्थान पर वैसी ही नगरी का निर्माण किया इसलिए उसका भी नाम द्वारका रखा । -(त्रिषष्टि शलाका ८,१५१) . १८. अन्तकृद्दशा सूत्र : प्रथम वर्ग Page #44 -------------------------------------------------------------------------- ________________ कुछ विद्वानों का मत है कि उसमें दश दशार्ह, एक राजा श्रीकृष्ण, एवं बलदेव यों बारह प्रमुख शासक (स्वामी) होने से इसका नाम वारापति पड़ा जो धीरे-धीरे द्वारापति या द्वारका कहलाई । पासादीया आदि ४ विशेषणों का अर्थ इस प्रकार है पासादीया - जिसे देखने से प्रसन्नता अनुभव हो । दरिसणीया - जो देखने योग्य हो । अभिरूवा - जिसे बार-बार देखने का मन होता हो । पडवा - जिसे जब भी देखो, सुन्दर और सुरम्य दीखे । As it is expressed in previous pages that the description of 51 propiliators has been given in former five sections, these all were related to Dwaraka city and the royal family of Vasudeva Śrī Kṛṣṇa. Hence first of all, the description of Dwaraka city has been given. Elucidation Dwaraka-It is the most popular city in History and literature of India. It was most beautiful and wealthy city. How and why it was built, the following popular episode makes it clear to understand easily. When Śrī Kṛṣṇa murdered the cruel and tyrant ruler of Mathurā city, named Kansa, then the wife of Kansa-Jivayasa went to her father Jarasandha, who was anti-Vasudeva and ruler of Rajagṛha (really monarch of southern half of Indian penunsula). Weeping bitterly Jivayasă expressed the whole happenings and murder of her husband Kansa, to her mighty father Jarasandha. Listening all this Jarasandha became red in fury. He sent his ambassador to Soripuraruler-Samudravijaya (Samudravijaya was the great father of Kṛṣṇa and Balarama; because the father of Kṛṣṇa and Balarama-Vasudeva was the youngest brother of Samudravijaya. Kṛṣṇa Balarama both went to Šorīpura after killing Kansa). Ambassador came to the court of Samudravijaya and spoke in harsh words-Samudravijaya! Either you send Kṛṣṇa-Balarama with me at once or my lord Jarasandha will destroy you, your city and all Yadavas exhaustively. The harsh words were intolerable to Kṛṣṇa. He disgraced the ambassador and the ambassador returned back angrily. प्रथम अध्ययन For Private Personal Use Only १९० Page #45 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Samudravijaya called a meeting of his kiths and kins, ministers and royal astrologers and then asked-What should be done in present circumstances? Premier Astrologer told-Though in your family there are three highly great persons-(1) Tirathamkara Aristanemi, (2) Vasudeva Krsna and (3) Baladeva Balarama, so none can harm you, may he be mighty like Yama; but this land (territory) is not favourable for Yadavas. So for avoiding the struggle and peacelessness of everyday, you should leave this place and go to south-west direction with all your families and citizens. You please stop at the place, where Satyabhāmā, wife of Sri Kṛṣṇa, give the birth to a son. That land would be favourable to Yadavas and there you will prosper. According to the counsel of royal astrologer, Samudrovijaya, Vasudeva, Kṛṣṇa, Balarama etc., whole Yadava family and citizens went out from Soripura and approached the south-west coast of ocean (Lavaṇa samudra; present Arabian gulf.) Here all encamped near Raivataka mountain. At that place Satyabhama gave birth to two sons-(1) Bhānu and (2) Bhramara. Yadavas decided to establish their capital at that very place. Observing three days' fast Śr Kṛṣṇa called a deity. Susthita deity came. Vasudeva expressed his desire-Please, construct a new city for me. Deity went to his ruler-Indra and gave words to the desire of Kṛṣṇa. Indra ordered Vaisramaṇa- Kubera (god of wealth) to construct a very beautiful, heart.-pleasing great and vast city for Vasudeva Śrī Krsna. Kubera constructed a vast and grand city which was twelve yojanas in length and nine yojanas in breadth. In this city there were many great and small gates, so it was named as Dwaraka. According to Acarya Hemacandra previously at this place was situated first Vasudeva's Dwaraka city which was drowned in the sea afterwards. Kubera created at same place, the city, which was like old city. Therefore it is also named as Dwarakā, (Triṣasti Salākā, 8-151) Some scholars opine that in this city there were twelve rulers (chief administrators-ten Daśārhas, Śrī Kṛṣṇa and Balarāma, so it is called Bārāpati, which laterly became Dwarapati, Bāravai and finally Dwarakā. Modern Historians and archaelogists say that this city was the centre of seatrade from Arabian contries and middle east Asia in ancient time so it was called as western gateway of India. Hence this city became popular as Dwarakā. ૨૦ अन्तकृद्दशा सूत्र : प्रथम वर्ग For Private Personal Use Only Page #46 -------------------------------------------------------------------------- ________________ The meanings of four adjectives Pāsādiya etc., are as under Pāsādiya-By seeing which the feeling of pleasure arises. Darisaniyd-worth-seeing. Abhirūvá-Desire for seeing which arouses again and again. Padirūvā-Whenever seen it looked new, nice and splendid. तीसे णं बारवईए नयरीए बहिया उत्तर-पुरथिमे दिसिभाए, एत्थ णं रेवयए णामं पव्वए होत्था । वण्णओ । तत्थ णं रेवयए पव्वए णंदणवणे णामं उज्जाणे होत्था । वण्णओ । सुरप्पिए णामं जक्वायतणे होत्था पोराणे से णं एगेणं वणसंडेणं परिक्खित्ते असोगवरपायवे । तत्थ णं बारवईए नयरीए कण्हे णामं वासुदेवे राया परिवसइ महया (हिमवंत) राय-वण्णओ। से णं तत्थ समुद्दविजयपामोक्खाणं दसण्हं दसाराणं । बलदेवपामोक्खाणं पंचण्हं महावीराणं । पज्जुण्ण-पामोक्खाणं अद्भुट्ठाणं कुमारकोडीणं । संबपामोक्खाणं सट्ठीए दुईत साहस्सीणं । महासेणपामोक्खाणं छप्पण्णाए बलवग्ग साहस्सीणं । वीरसेण-पामोक्खाणं एगवीसाए वीरसाहस्सीणं । उग्गसेणपामोक्खाणं सोलसण्हं रायसाहस्सीणं । रुप्पिणीपामोक्खाणं सोलसण्हं देवीसाहस्सीणं । अणंगसेणापामोक्खाणं अणेगाणं गणियासाहस्सीणं । अण्णेसिं च बहूणं ईसर जाव सत्थवाहाणं बारवईए णयरीए अद्धभरहस्स य सीमंतयाय सम्मत्थस्स य आहेवच्चं जाव विहरइ । श्रीकृष्ण का राज-वैभव सूत्र ५ : उस द्वारका नगरी के बाहर ईशान कोण (पूर्व एवं उत्तर दिशा के बीच) में रैवतक नाम का एक पर्वत था । उस रैवतक पर्वत पर नन्दन वन नाम .२१ . प्रथम अध्ययन Page #47 -------------------------------------------------------------------------- ________________ का एक उद्यान था । उस नन्दन वन में सुरप्रिय नाम का एक प्राचीन यक्षायतन (यक्ष मन्दिर ) था । वह उद्यान चारों तरफ से एक विशाल वन खण्ड से घिरा हुआ था, और उस वन खण्ड में एक विशाल अशोक वृक्ष था । उस द्वारका नगरी में श्रीकृष्ण वासुदेव राज्य करते थे । जो कि महा हिमवान पर्वत के समान, मर्यादा पुरुषोत्तम थे । ( राजा एवं नगरी का वर्णन औपपातिक सूत्र के वर्णन के अनुसार जानना चाहिए ।) द्वारका नगरी में समुद्रविजय जी आदि दश दशार्ह ( पूज्य पुरुष ) निवास करते थे । महावीर कहे जाने वाले बलदेव आदि पांच श्रेष्ठ महाबली, प्रद्युम्न आदि साढ़े तीन करोड़ कुमार भी द्वारका में थे । शाम्बकुमार, जिनमें प्रमुख गिने जाते थे ऐसे साठ हजार दुर्दान्त वीर तथा महासेन आदि छप्पन हजार बलवर्ग (सैन्यसमूह ) थे । वीरसेन आदि इक्कीस हजार वीर योद्धा, उग्रसेन प्रमुख सोलह हजार राजा एवं रुक्मिणी प्रमुख सोलह हजार रानियां थीं । अनंगसेना आदि हजारों गणिकाएं भी द्वारका में रहती थीं । इनके अतिरिक्त अन्य बहुत से ईश्वर ( सम्मानित पदधारी नागरिकों) से लेकर अनेक सार्थवाह (व्यापारी) आदि उस नगरी में निवास करते थे । इस प्रकार ( विपुल वैभव एवं शक्तिशाली वीर योद्धाओं, नागरिकों से सम्पन्न) उस द्वारका नगरी तथा समस्त अर्ध भरत क्षेत्र ( जम्बूद्वीप के भरतक्षेत्र के तीन खण्डों ) का अधिपतित्व करते हुए वासुदेव श्रीकृष्ण वहां राज्य करते थे । Magnificence of Śrikṛṣṇa's Empire Maxim 5: Out of Dwarakā city in the middle of East-North directions (Īṣāna Koṇa) there was a mountain named Raivataka. On Raivataka mountain there was a garden, named Nandana vana. In that Nandana Vana there was a temple (sanctuary) of Surapriya Yaksa (deity) which was very old. That garden was surrounded by one vast अन्तकृद्दशा सूत्र : प्रथम वर्ग २२ • Page #48 -------------------------------------------------------------------------- ________________ liાલ્વ થી 35ADI bl Bol વૈભવ it is Rહા + * * રન કર કે Re K. :: પણ કામ આ T/ . છે * . ''ત ક ** :- " હકક ' ક' વડા ના કાકા S Page #49 -------------------------------------------------------------------------- ________________ चित्रक्रम ३ : श्रीकृष्ण वासुदेव का राजवैभव वासुदेव श्रीकृष्ण की राजसभा में एक ओर समुद्रविजय, वसुदेव आदि कुल के पूज्य पुरुष आसीन हैं। दूसरी ओर गदाधर बलदेव, प्रद्युम्नकुमार, शाम्ब आदि वीर तथा महासेन, वीरसेन आदि सेनानायक, एक ओर नगर के प्रमुख सार्थवाह आदि उपस्थित हैं। अनंगसेना गणिका नृत्य-गीत से सभा का मनोरंजन कर रही है। सभा कक्ष में सुदर्शन चक्र पाँचजन्य शंख आदि सज्जित दीख रहे हैं। Illustration No. 3 : View of Vasudeva Śrī Kṛṣṇa's royal assembly In the royal assembly of Vasudeva Śrī Kṛṣṇa, at one side is seated Samudravijay and other adorables. On the other side are sitting mace -bearer Baladeva, Pradyumna, Sāmbu etc., war heroes (braves) Mahāsena, Virasena etc., army chiefs and premier traders of city. Harlot Anangasena is recreating assembly by her music song and dance. Sudarsana (disc weapon ), and Pāñcajanya conch are also seen there. voss 556 अन्तकृद्दशा सूत्र : चित्र परिचय For Private Personal Use Only ( वर्ग १ / अध्य. १ ) फफफफफफ फ़फ़ 卐 ( Sec. 1 / Ch. 1 ) 卐 Page #50 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Vanakhanda, and in that Vanakhanda, there was a huge Asoka tree. ŚrīKrsna ruled over that Dwarakā city, which was great and high like mountain Mahähimavāna. (More description about king and city should be known from Aupapātika sūtra.) In Dwārakā city ten adorables (Dasa Daśārha) reside viz., Samudravijayaji etc. And there dwell Balarāma etc., five great warriors, Pradyumna etc., three and half crores princes, sixty thousand great fighters among them Samba Kumāra was the foremost, over fifty six thousand mighty men (army groups) among them foremost was Mahāsena. Vīrasena etc., twentyone thousand bravemen, Ugrasena etc., sixteen thousand rulers and Rukmini (heing foremost) etc., sixteen thousand queens dwell in Dwarakā city. Anangsenă etc., thousands of prostitutes (harlots)-courtesans also live there. Besides these, other numerous Iswaras (having respectable post and position), citizens, sārthavāhas (traders) etc., also live in this city. In this way with vast fortune, magnificence, mighty warriors, citizens, Dwarakā city was opulent. Sri Krsna Vasudeva ruled over this city and complete half of Bharat Kshetra (three parts of Bharata-K setra of Jambūdwīpa). ET & : तत्थ णं बारवईए णयरीए अंधगवण्ही णामं राया परिवसइ । महया हिमवन्त, वण्णओ। तस्स णं अंधगवण्हिस्स रण्णो धारिणी णामं देवी होत्था, वण्णओ । तए णं सा धारिणी देवी अण्णया कयाइं तंसि तारिसगंसि सयणिज्जंसि एवं जहा महाबले प्रथम अध्ययन • 23. Page #51 -------------------------------------------------------------------------- ________________ सुमिणदंसणं कहणा जम्मं बालत्तणं कलाओ य । जोव्वण-पाणिग्गहणं, कंता पासाय भोगा य ॥ णवरं गोयमो नामेणं । अट्ठण्हं रायवरकन्नाणं एगदिवसेण पाणिं गिण्हावेंति अटुट्ठओ दाओ। उस द्वारका नगरी में अंधकवृष्णि राजा निवास करते थे, जो महान हिमालय पर्वत की भांति मर्यादा पालक और समर्थ थे । धारिणी नाम की उनकी रानी थी। किसी दिन धारिणी रानी अपने शयनागार में (तंसि तारिसगंसि-पुण्यवान जनों के योग्य) सुख शय्या पर सोई हुई थी । (इसका वर्णन महाबल के . प्रकरण के अनुसार समझ लेना चाहिए) जैसा कि धारिणी रानी का सिंह स्वप्न दर्शन, पति को स्वप्न कथन, बालक का जन्म, उसकी बाल-लीलाएं, कला शिक्षण, युवा अवस्था आने पर योग्य कन्याओं के साथ पाणिग्रहण, कान्त रमणीय प्रासाद में रहना और सांसारिक भोग भोगना आदि वर्णन यहां महाबल के समान समझ लेना चाहिए । विशेष यह है कि बालक का नाम गौतम कुमार रखा गया । एक दिन में आठ उत्तम कुलीन राजकन्याओं के साथ पाणिग्रहण हुआ और कन्यापक्ष की ओर से दाय-प्रीतिदान में आठ हिरण्य कोटि (स्वर्णमुद्राएँ) मिलीं । Maxim 6 : In Dwārakā city ruler Andhakavrsni inhabited. He was great like Himawāna mountain. Dhāriņi was his queen. Once Dhāriņi was sleeping on a very comfortable bed, (such a bed can be available to meritorious persons-tansi tārisagamsi) in her bedroom. (Its all description should be understood from the episode of Mahābala. As .२४. अन्तकृदशा सूत्र : प्रथम वर्ग Page #52 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रानी का स्वप्न दर्शन तन कुमार का उत्सव Pos RELAntatus बाल क्रीड़ा । - - - . . .. Page #53 -------------------------------------------------------------------------- ________________ 0495455555555555555555550 चित्रक्रम ४ : गौतमकुमार का जन्म एवं शिक्षण प्रथम दृश्य में रानी धारिणी सुसज्जित शयन-कक्ष में सोयी श्वेत सिंह का स्वप्न देखती है। द्वितीय दृश्य में गौतमकुमार के जन्म की खुशियाँ मनाई जा रही हैं। नृत्य-गान हो रहा है तथा मिष्टान्न बाँटा जा रहा है। तृतीय दृश्य में गौतमकुमार की बाल-क्रीड़ा, गुरु के पास शस्त्र-शिक्षण तथा आठ राजकन्याओं से पाणिग्रहण का दृश्य है। (वर्ग १/अध्य. १) Illustration No. 4: Birth and learning of Gautamakumāra First Scene-Sleeping in her decorated bed-room queen Dhārini dreams a lion of white colour. Second Scene-Birth ceremony of Gautamakumārasinging and dancing, sweets are being distributed. Third Scene-Childish plays of Gautamakumāra, learning of strategy from teacher and his marriage with eight royal princesses. (Sec. 1/Ch. 1) 生乐乐乐乐听听听听听听听听听听听听听听听听听听听听听FFFFFFFFFFFFFFFFFF F5年 6555555555555555555 5 अन्तकृद्दशा सूत्र : चित्र परिचय Page #54 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Queen Dhāriņi's seeing the dream of a lion, expressing her dream to her husband, babybirth. funs of baby. Studies of arts etc., young age, marriage with beautiful and cultured maidens, residing in a comfortable and pleasant palace, and enjoyment of worldly pleasures etc. All the description should be conceived here like Mahābala. Here mentionahle speciality is-that name of baby was kept Guatama Kumāra. Fle married eight princesses in one day and he got eight crore gold-coins from his fathers-in-law as dowry (dāva). सूत्र ७ : तेणं कालेणं तेणं समएणं अरहा अरिट्ठनेमी आइगरे जाव विहरइ । चउव्विहा देवा आगया । कण्हे वि णिग्गए। तए णं से गोयमे कुमारे जहा मेहे तहा णिग्गए । धम्म सोच्चा णिसम्म जं णवरं देवाणुप्पिया ! अम्मापियरो आपुच्छामि । देवाणुप्पियाणं अंतिए पव्ययामि । एवं जहा मेहे तहा गोयमे वि जाव अणगारे जाए, इरियासमिए जाव इणमेव णिग्गंथं पावयणं पुरओ काउं विहरइ । तए णं से गोयमे अणगारे अण्णया कयाइं अरहओ अरिट्टनेमिस्स तहारूवाणं थेराणं अंतिए सामाइयमाइयाइं एक्कारस अंगाई अहिज्जइ अहिज्जित्ता बहूहिं चउत्थ जाव अप्पाणं भावेमाणे विहरइ । तए णं अरहा अरिट्ठणेमि अण्णया कयाई बारवईओ नयरीओ णंदणवणाओ उज्जाणाओ पडिणिक्खमइ । पडिणिक्वमित्ता बहिया जणवयविहारं विहरइ । भगवान अरिष्टनेमि का द्वारका आगमन और गौतमकुमार की दीक्षा सूत्र ७: उस समय अरिहन्त अरिष्टनेमि भगवान ग्रामानुग्राम विहार करते हुए द्वारका नगरी के नन्दनवन उद्यान में पधारे । भगवान का समवसरण • २५ . प्रथम अध्ययन Page #55 -------------------------------------------------------------------------- ________________ लगा । भवनपति, वाणव्यन्तर. ज्योतिषी एवं वैमानिक-चारों जाति के देव दर्शन करने आये । वासुदेव श्रीकृष्ण भी हजारों के जन समूह के साथ प्रभु के दर्शनार्थ आये । तब, वह गौतमकुमार भी मेघकुमार की तरह प्रभु के दर्शन करने के लिए घर से निकला । धर्मोपदेश सुनकर हृदय में धारण करके प्रभु से प्रार्थना की-हे देवानुप्रिय ! मैं अपने माता-पिता को पूछकर, उनकी अनुमति प्राप्त कर आप देवानुप्रिय के पास, प्रव्रजित (श्रमण दीक्षा लेना) होना चाहता इस प्रकार मेधकुमार की भाँति, गौतमकुमार ने भी माता-पिता से आज्ञा मांगी । अन्त में बड़े समारोह पूर्वक गौतमकुमार ने दीक्षा ग्रहण कर ली । ईर्यासमिति आदि पांच समिति एवं तीन गुप्ति से सावधान रहकर निर्ग्रन्थ प्रवचन-अर्थात् भगवान की आज्ञा अनुशासन को शिरोधार्य करक विचरने लगे । उसके पश्चात् गौतम अणगार ने अरिहंत अरिष्टनेमि भगवान के तथारूपगुण सम्पन्न गीतार्थ स्थविरों के पास सामायिक (आवश्यक सूत्र-श्रुत) आदि ग्यारह अंगों का अध्ययन किया । अध्ययन करके गौतम अणगार बहुत से उपवास यावत् (वेला, तेला आदि) तप द्वारा आत्मा को भावित करते हुए आत्मानन्द में लीन रहने लगे । तब, अरिहंत अरिष्टनेमि ने किसी अन्य दिन, द्वारका नगरी के नन्दनवन उद्यान से प्रस्थान किया और अन्य भव्य जीवों को मोक्ष मार्ग का प्रकाश करते हुए विचरने लगे । Coming of Bhagawăna Aristanemi to Dwarakā and Consecration of Gautamakumāra Maxim 7 : At that time and at that period Arihanta Aristanemi wandering village to village came to Nandana garden of Dwárakā city, the religious council (samuvastrana) .२६ . अन्तकृद्दशा सूत्र : प्रथम वर्ग Page #56 -------------------------------------------------------------------------- ________________ held. Bhavanapati, Vāņavyantara, Jyotiska, Vaimnānika- all the four kinds of gods came to see and bow down to Bhagawāna. Väsudeva Srikrsna also came with thousands of people, to see and bow down to him. Then, Gautamakumāra also came out of his palace, for seeing and bowing down to Bhagawāna like Meghakumāra. Hearing and taking to heart the sermon of Bhagawāna, he requested him-0 Reverend sir ! (Derānupriya-heloved of gods) asking permission from my parents. I want to accept consecration near your lotus feet. Thus, like Meghakunāra, Gautamakuunāra also asked permission from his parents. In the end Gautamakunāra accepted consecration with great pomp and show. He accepted five circumspections (Samiti) as circumspection of movement (Irya saniti) etc. and three incognitoes (gupti) and began to wander according to the discipline of Bhagawāna, i.e., Jain religious monk order. Thereafter friar (anagāra) Gautama learnt Sâmāvika (Ārasvaka sūtra) etc., cleven aigas from the cider monks of Bhagawāna Aristanemi. After it observing many types of fast penances, like one day', two days', three days' fast penences etc., and hy other types of austerities purifying his soul Gautama ascetic reserved himself in soul bliss. Then, on an other day Arihanta Aristanemi went out from Nandana garden of Dwarakā city and began to wander village to village telling the path of salvation to other souls-beings. FC: तए णं से गोयमे अणगारे अण्णया कयाइं जेणेव अरहा अरिट्ठणेमी तेणेव उवागच्छइ; उवागच्छित्ता अरहं अरिडणेमिं तिक्खुत्तो आयाहिण-पयाहिणं करेइ । करित्ता, वंदइ णमंसइ । वंदित्ता णमंसित्ता एवं वयासी प्रथम अध्ययन . 26 . Page #57 -------------------------------------------------------------------------- ________________ इच्छामि णं भंते ! तुडभेहिं अब्भणुण्णाए समाणे मासियं भिक्खुपडिमं उवसंपज्जित्ताणं विहरित्तए । एवं जहा खंदओ तहा बारस भिक्खु पडिमाओ फासेइ । फासित्ता गुणरयणं वि तवोकम्मं तहेव फासेइ णिरवसेसं । जहा खंदओ तहा चिंतेइ तहा आपुच्छइ । तहा थेरेहिं सद्धिं सेत्तुंजं दुरूहइ, मासियाए संलेहणाए बारस वरिसाइं परियाए जाव सिद्धे । एवं खलु जंबू ! समणेणं जाव संपत्तेणं अट्ठमस्स अंगस्स अंतगडदसाणं पढमस्स वग्गस्स पढमस्स अज्झयणस्स अयमढे पण्णत्ते । (पढमं अज्झयणं सम्मत्तं) सूत्र ८: उसके पश्चात् अन्य किसी दिन, गौतम अणगार जहाँ अरिहंत अरिष्टनेमि विराजमान थे वहाँ आये । अरिहंत अरिष्टनेमि को विनयपूर्वक तीन वार दाईं ओर से बाईं ओर प्रदक्षिणा की, प्रदक्षिणा करके वन्दन नमस्कार किया । वन्दन नमस्कार करके इस प्रकार निवेदन कियाहे भगवन ! मेरी इच्छा है कि आपकी आज्ञा-अनुमति प्राप्त होने पर मैं मासिकी भिक्षु प्रतिमा अंगीकार करूँ ? (अरिहंत अरिष्टनेमि ने कहा-देवानुप्रिय ! जैसा तुम्हें सुख हो वैसा करो, शुभ कार्य में विलम्ब मत करो ।) इस प्रकार गौतम अणगार ने स्कन्धक मुनि की तरह क्रमशः बारह भिक्षु प्रतिमाओं की आराधना की । फिर गुणरत्न नामक तप की भी उसी प्रकार सम्पूर्ण आराधना की । (देखिए तालिका नं. १) तप आराधना करते हुए गौतम अणगार ने स्कन्धक मुनि की भांति ही विचार किया, और स्थविर मुनियों को साथ लेकर शत्रुजय पर्वत पर चढ़े | वहाँ शुद्ध भूमि की प्रतिलेखना कर एक मास की संलेखना की । इस प्रकार संलेखना पूर्वक वारह वर्ष की निर्दोष दीक्षा पर्याय पूर्ण करके, केवल ज्ञान प्राप्त कर अन्त में सर्व कर्मों का क्षय करके सिद्ध हए । .२८. अन्तकृदशा सूत्र : प्रथम वर्ग Page #58 -------------------------------------------------------------------------- ________________ 10. Cins A HAR 7 a PREM GO GOS - - - www . TAmrapter MAN timranich ha.. EMAITriant S HARE S THA निर्वाण रात्रि ध्यान TAN A आतापना RICA ... . . . . S Page #59 -------------------------------------------------------------------------- ________________ चित्रक्रम ५ : गौतम अणगार का निर्वाण गौतमकुमार ने दीक्षित होकर स्थविरों के पास ग्यारह अंगों का अध्ययन किया। फिर भिक्षु प्रतिमा अंगीकार की तथा गुणरल संवत्सर तप किया। दिन में सूर्य की प्रखर किरणों के सामने वीरासन से बैठकर आतापना के साथ तथा रात्रि में उकडू आसन से ऊर्ध्वबाहु होकर ध्यान करते हैं। अन्त में स्थविरों के साथ शत्रुजय पर्वत पर जाकर एक मास की संलेखनापूर्वक निर्वाण पद प्राप्त किया। देवताओं ने गौतम मुनि का । निर्वाण-महोत्सव मनाया। (वर्ग १/अध्य. १) Illustration No. 5: Salvation of friar Gautama Consecrated Gautamakumāra learnt eleven angas from elder sages, practised sage-firm resolutions and observed Gunaratna samvatsara austerity. In day time, sitting in Vīrāsana posture he grasped the heat of sharp sun-rays and in the night sitting with utkațuka posture and raising hands upwards meditated. At the nearing ending of his life he climbed mount Satrunjaya with elder sages and attained salvation with one month's Samlekhanā and gods celebrated salvationceremony of monk Guatama. (Sec. 1/Ch. 1) 0555555555555555555555555550 अन्तकृद्दशा सूत्र : चित्र परिचय Page #60 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आर्य सुधर्मा-हे जम्बू ! इस प्रकार श्रमण भगवान महावीर ने आठवें अंग अन्तकृद्दशा के प्रथम वर्ग के प्रथम अध्ययन का यह भाव कहा है । (9274 37824 74197) Maxim 8 : Thereafter on an other day ascetic Gautama came to Bhagavāna Aristanemi, circumabulated three times, worshipped and bowed down himself with devotion, then respectfully expressed his wish"0) Bhagawan ! If you allow me, I want to observe one month Bhikṣu Pratimā. (Arihanta Aristanemi said-Beloved as gods (Devāạilpriya) ! Do as you feel happy, but do not delay in meritorious deeds). Thus Gautama ascetic observed twelve Bhiksu Pratimas like Skandhaka monk and practised Gunaratna sarivatsara penance. (See Table 1) Practising penances and austerities, ascetic Gautama also thought like monk Skandhaka and then with elder saints climbed up on Satrunjaya mountain. Ther he searched a place without flora and insects, i.e., pure place. He made it neat and clean. After that with pure heart and steady propiliation, he accepted one month's fast penance (sailekhana-Really it is a penance till death). Thus with sailekhand and fulfilling twelve years' consecration period and obtaining infinite knowledge, consuming all karmas he attained liberation. Ārya Sudharmă-) Jambū ! Thus śramana Bhagawāna Mahāvīra has expressed the subject matter of first chapter of first section of Antakrddaśā sūtra. [First Chapter concluded) प्रथम अध्ययन Page #61 -------------------------------------------------------------------------- ________________ अध्ययन २-१0 सूत्र १: ___ एवं जहा गोयमो तहा सेसा वि वण्ही पिया धारिणी माया । समुद्दे सागरे गंभीरे थिमिये, अयले कंपिल्ले अक्खोभे, पसेणई विण्हू ए-ए एगगमा । पढमो वग्गो दस अज्झयणा पण्णत्ता । सूत्र १ : इस प्रकार जैसा गौतम अणगार का वर्णन किया गया है, उसी प्रकार अन्य नौ का भी वर्णन समझना चाहिए । इन सबके पिता वृष्णि तथा माता धारिणी रानी थी । इन अन्य कुमारों के नाम इस प्रकार हैं२. समुद्रकुमार, ३. सागरकुमार, ४. गंभीरकुमार, ५. स्तिमितकुमार, ६. अचलकुमार, ७. कांपिल्यकुमार, ८. अक्षोभकुमार, ९. प्रसेनजित, १०. विष्णुकुमार । इन सभी अध्ययनों का वर्णन गौतम मुनि की तरह एक समान जानना चाहिए। इस प्रकार प्रथम वर्ग के दस अध्ययन कहे गये हैं । (प्रथम वर्ग समाप्त) Chapterú 2 to 10 Maxim 1 : Thus, as the description of ascetic Gautama has been given, in the same way the description of other 9 chapters should be known and understood. The father of all these was Andhakaroni and mother was queen Dhāriņī ; but the names of Kumāras were .३० . अन्तकृद्दशा सूत्र : प्रथम वर्ग Page #62 -------------------------------------------------------------------------- ________________ (2) Samudra Kumāra, (3) Sāgara Kumāra (4) Gambhira Kumāra (5) Stimita Kumāra, (6) Acala Kumāra, (7) Kampilya Kumāra (8) Aksobha Kumāra (9) Prasenajita, and (10) Visnu Kuināra The subject matter of all these chapters is like monk Gautama. Thus these ten chapters are said. [Chapters 2 to 10 concluded] [First Section completed] विवेचन भिक्षु प्रतिमा गौतम अणगार ने महामुनि स्कन्धक के समान भिक्षु की बारह प्रतिमाएँ धारण की प्रतिमाओं का संक्षिप्त स्वरूप इस प्रकार है पहली प्रतिमा का धारक साधु एक महीने तक एक दत्ति अन्न की और एक दत्ति पानी की (दाता द्वारा दिये जाने वाले अन्न और पानी की अखण्ड धारा एक दत्ति कहलाती है) लेता है । एक से लेकर सात प्रतिमाओं का समय प्रत्येक का एक-एक मास बढ़ता जाता है । पहली एक मासिकी, दूसरी दो मासिकी, तीसरी त्रैमासिकी, चौथी चार मासिकी, पाँचवी पंच मासिकी, छठी षटमासिकी और सातवीं सप्तमासिकी कहलाती है । पहली प्रतिमा में अन्न पानी की एक-एक दत्ति, दूसरी में दो, तीसरी में तीन, यावत् क्रमशः सातवीं में सात दत्ति, अन्न की और सात दत्ति ही पानी की ली जाती हैं । आठवीं प्रतिमा का काल सात अहोरात्रि का है । और नवमी प्रतिमा का भी सात दिन रात है । आठवीं, नवमी, दसवीं प्रतिमा में चौविहार उपवास किया जाता है । ग्यारहवीं प्रतिमा का समय एक दिन रात का है और चौविहार वेला करके आराधना की जाती है । बारहवीं प्रतिमा का समय एक रात का है और चौविहार तेने से इसकी आराधना की जाती है । भिक्षु प्रतिमाओं का विस्तृत वर्णन अन्तकृद्दशा महिमा (परिशिष्ट) में देखिए । • रैवतक पर्वत को उज्जयन्त, ऊर्जयन्त, गिरीणाल और गिरनार भी कहा जाता है । महाभारत आदि में भी इस रैवतक पर्वत का वर्णन आता है । • जिसमें भिन्न-भिन्न जाति के वृक्ष हों वह वन खण्ड कहलाता है । -ज्ञाता १ टीका २-१० अध्ययन Page #63 -------------------------------------------------------------------------- ________________ भगवान अरिष्टनेमि एवं वासुदेव श्रीकृष्ण आदि का जन्म सुप्रसिद्ध हरिवंश में हुआ था । इस वंश में शौर्यपुर के स्वामी शूरसेन नाम के प्रसिद्ध राजा हुए । शूरसेन के पुत्र का नाम शूरवीर था । शूरवीर के दो पुत्र थे-अंधक और वृष्णि । इन दोनों भाइयों के नाम से यह कुल अंधक-वृष्णि कुल नाम से प्रसिद्ध हुआ। (उत्तराध्ययन वृत्ति. २२) • उत्तर पुराण (७0) के अनुसार शूरवीर के दो पुत्र थे अंधकवृष्णि और नम्वृष्णि । अंधकवृष्णि के दस पुत्र थे जो दशार्ह कहलाते थे-१. समुद्रविजय, २. अक्षोभ्य, ३. स्तिमित, ४. सागर, ५. हिमवान, ६. अचल, ७. धरण. ८. पूरण, ९. अभिचन्द्र, १0. वसुदेव । (अभयदेवकृत अन्तकृदशावृत्ति ।) • ईश्वर-सचित्र अर्धमागधी कोष के अनुसार 'ईसर' शब्द का प्रयोग-युवराज, मांडलिक राजा, अमात्य, श्रीमंत, श्रेष्ठी आदि के लिए किया जाता था । (स.अ. को. भाग-२, पृष्ठ १५८) महावल का वर्णन भगवती सूत्र शतक-११, उद्देशक ११ में आया है जिसका संक्षेप में हिन्दी भावार्थ अन्तकृदशामहिमा में दिया गया है । दाय-दात-कन्या के विवाह के पश्चात् दी जाने वाली वस्तु (ज्ञाता-वृत्ति) देवानुप्रिय-प्राचीन काल में यह एक मधुर सम्मानजनक सम्बोधन था । टीका ग्रन्थों में इस शब्द के दो अर्थ मिलते हैं-(१) देवों के समान प्रिय और (२) सरल आत्मन् । यह शब्द मुख्य रूप से जैन ग्रन्थों में ही मिलता है । वैसे यह सम्वोधन एक आम सम्बोधन था । पिता, पुत्र, गुरु, शिष्य, पति, पत्नी आदि सभी के लिए इसका प्रयोग ता था । सामान्य व्यक्ति के लिए भी 'देवानुप्रिय' शब्द का प्रयोग किया जाता था । वौद्ध साहित्य में 'देवानांप्रिय' शब्द मिलता है । मेघकुमार का वर्णन ज्ञातासूत्र अध्ययन १ के अनुसार संक्षेप में अन्तकृद्दशा महिमा में दिया गया है । संलेखना के विषय में विशेष स्पष्टीकरण अन्तकृदशा महिमा में देखें । Elucidation Special Resolution of Monk (Bhikṣu Pratimā) Ascetic Guutama had practised 12 Bhiksu Prutiinās (Special resolution of a monk) like great monk Skandhaka. The conception of Bhiksa Pratimās is as following अन्तकृद्दशा सूत्र : प्रथम वर्ग Page #64 -------------------------------------------------------------------------- ________________ The practiser of first Bhiksu pratimā takes one datti of food and one datti of water till one month. The regular slow of food and water, which is being given by a giver is termed as darti. From first to seven Pratimās, the time-period of every following pratimā increases by one month, As the period of first pratima is one month, second of two months, third of three months, fourth of four months, fifth of five months, sixth of six months and seventh of seven months. Likewise the number of dattīs also increases. As during first Pratimā the sage accepts one dattī of food and one iatti of water, in second two dattīs of food and two dattīs of water, in ilird three dattīs, in fourth four dattīs, in fifth five dattīs, in sixth six dattis and in seventh seven dattis of food and water the sage accepts. The time period of eighth pratima is of seven days and nights and so is the case with 9th and tenth pratimus. All these eighth, nineth and tenth pratimās are practised observing complete fast, not even to take water on alternate days i.e. on first, third, fifth and seventh day. The time period of eleventh Bhikṣu Pratimā is of one day-night only. It is also practised with two days complete fast penance, meaning to eat and drink nothing-to renounce all the four types of food amam, pānam, khādim, swūdim. The time period of twelfth Bhiksu Pratimā is of one night only. It is practised with complete three days' fast penance. -(Daśāśrutaskandha, Daśā 7) Detailed study of Bhiksu Pratimās has been discussed in Antakrddaśä Mahimā. Readers are suggested to see that book. Raivataka mountain also called Ujjayanta, Urjayanta, Giriņāla and Giranāra. The mention of this mountain has also been made in Mahābhārata etc. Vanakhanda denotes a part of wood in which various kinds of trees are found. -(Iñātā 1, Commentary) | Bhagawāna Aristanemi, Vasudeva Srikrina and their kith and kins took birth in famous Harivamśu. In this tradition (Vamsa) the ruler of Sauryapura, Sūrasenu became a famous king. The name of his son was Śūravira. Śūravira had two sons-(1) Andhaka and (2) Vrsni. By the 2-90 3EZEG Page #65 -------------------------------------------------------------------------- ________________ name of these two brothers this tradition became popular as Andhaka-Vrsnikula. -(Uttar dilhyayana Vrti21) According to Uttar Purūna (70)-Sūrurira had two sons-(1) AndhukaVrsni and (3) Nara-Vrsni. Andhaka-Vrsni had ten sons, who were called daśārhus and their names were-(1) Samudravijaya, (2) Aksobhya (3) Stimitla (4) Sagara (5) Himavana (6) Acala (7) Dharana (8) Purana (9) Abhicandra and (10) Vasudeva. -(Abhayadevavrtii-Anakrddaśā Sūtru) Īswara-According to Sacitra Ardha-māgadhi Kosa the word 'Iswara' is used for crown prince, mándalika rāja (territorial ruler) amātya (minister) Samanta (government or gazetted officers), rich and wealthy persons etc., -(S. A. Dictionary, lol. 2. p. 158) The full description of Mahābala is given in Bhagawati Sūtra, Sataku 11, Uddeśaka 11. Its simple and brief llindi version is given in intakrddasā Mahimā. Dāya-Dāta denotes the things which are given wilfully by their fathers at the occasion of the marriage of their daughters -(.Jnala Vetti) Devānupriya (Prākrta form Devūnuppiya)-It is a word used specially in Jain scriptures denoting sweet and honourable address. In Jain world it was a frequent address. Being sweet it was used for father, son, husband, general persons, kings etc., all and even to teacher, disciple, gods. The description of Meghakumāra, we get in Jnata Sutra. Chapter I, the same briefly given in simple Hindi language in Anakrdlaśā Mahinū. For vivid description of Samlekhanā readers are advised to read the book Antakrddaśā Mahimā. गुणरत्न तप गुणरत्न नामक तप सोलह महीनों में सम्पन्न होता है, इसमें तप के ४०७ दिन और पारणा के ७३ दिन होते हैं । पहले मास में एकान्तर उपवास किया जाता है । दूसरे मास में बेले-बेले पारणा और तीसरे मास में तेले-तेले पारणा किया जाता है । इसी प्रकार वढ़ाते हुए सोलहवें महीने में सोलह-सोलह उपवास करके पारणा किया जाता है । इस तप में दिन में उत्कटुक आसन से वैठकर सूर्य की आतापना ली जाती है और रात्रि में वस्त्र रहित वीरासन से बैठकर ध्यान किया जाता है | गौतम कुमार की तप आराधना का चित्र देखिए । .३४ . अन्तकृद्दशा सूत्र : प्रथम वर्ग Page #66 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Gunaratna Samvatsara Tapa (Penance) Gunaratna penance completes in 16 months. Among them 407 days are of fast and 73 days are of Püranā (to take food). During first month one day fast and second day Pārunā this order is followed. In second month two days' fast and third day Paraná, in third month three days' fast and one day pārunā. Increasing in this way in 16th month päraņā is taken after sixteen days' fast. In this penance during day the practiser sits in sunrays with Utkatuka posture an putting off all clothes the practiser meditates with Vīrāsana posture. The adjacent table elucidates the penance-observing of Gautama Kuumūru clearly. 2-90 3TZUG 34 . Page #67 -------------------------------------------------------------------------- ________________ महीना पहला दूसरा तीसरा चौथा पांचवाँ छठा सातवाँ आठवाँ नौवाँ दसवाँ ग्यारहवाँ बारहवाँ तेरहवाँ चौदहवाँ पन्द्रहवाँ सोलहवाँ योग ३६ • गुणरत्न संवत्सर तप - तालिका तप व तप संख्या १५ उपवास १० बेला ८ तेला ६ चोला ५ पचोला ४ छह ३ सात ३ अठाई ३ नौ ३ दस ३ ग्यारह २ वारह २ तेरह २ चौदह २ पन्द्रह २ सोलह तप के दिन १५ २० २४ २४ २५ २४ २१ २४ २७ ३० ३३ २४ २६ २८ ३० ३२ ४०७ पारणे के दिन १५ 90 ८ ६ ४ M pr r 2 २ ७३ योग ३० 30 ३२ ३० ३० २८ २४ २७ ३० ३३ ३६ २६ २८ ३० ३२ ३४ ४८० अन्तकृद्दशा सूत्र : प्रथम वर्ग Page #68 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Table of Gunaratna Samvatsara Tapa (Penance) Month Total Penance (fast) and Penance no. Days of fast Days of Penance Pāraņā 15 First Second Third 32 4 Fourth 30 Fifth 30 24 Sixth Seventh Eighth Nineth 24 15 fast 10 two days' fast 8 three days' fast 6 four days' fast 5 five days' fast 4 six days' fast 3 seven days' fast 21 3 eight days' fast 3 nine days fast 3 ten days' fast 3 eleven days' fast 2 twelve days' fast 2 thirteen days' fast 26. 2 fourteen days' fast 28 2 fifteen days' fast 30 2 sixteen days' fast 32 30 Tenth 30 26 36 Eleventh Twelfth Thirteenth Fourteenth Fifteenth Sixteenth 30 32 34 Total T 407 407 73 480 2-90 3&TTAG . 36 . Page #69 -------------------------------------------------------------------------- ________________ स्कन्धक के समान चिन्तन गौतम अणगार को स्कन्धक मुनि की तरह एकदा-किसी समय, रात्रि के पिछले प्रहर में धर्म जागरणा करते हुए ऐसा विचार आया अनेक प्रकार के उदार तप द्वारा मेरा शरीर शुष्क एवं कृश हो गया है । मेरा शारीरिक बल भी क्षीण हो गया है । केवल आत्मवल से चलता और खड़ा रहता हूँ । चलते हुए, खड़े होते हुए हड्डियों में कड़-कड़ की आवाज होती हैं । अतः जब तक मुझमें उत्थान-कर्म-बल-वीर्य-पुरुषाकार पराक्रम है, तब तक मेरे लिये यह श्रेयस्कर है कि रात्रि व्यतीत होने पर प्रातःकाल भगवान के समीप जाकर, उनको वन्दन-नमन कर, पर्युपासना करूँ, करके स्वयं ही पाँच महाव्रतों का आरोपण करके साधु-साध्वियों को खमाकर, स्थविरों के साथ शत्रुजय पर्वत पर चढ़कर शिलापट्ट की प्रतिलेखना करके, डाभ का संथारा विछाकर, अपनी आत्मा को संलेखना से दोषमुक्त करके, आहार-पानी का त्याग कर पादपोपगमन संथारा करना तथा उसमें स्थिर रहना मेरे लिए श्रेष्ठ है। -(भ. सू. श. २ उद्दे.१) Thinking like Skandhaka Skandhaka was a great sage in Jain Sūtrus. His thinking was very deep and famous. So the simile of Gautamu mendicant is given to Skandhaka sage. Once, on a night during religious awakening monk Gautama hegan to think like this-Due to different types of severe penances my body has become lean and withered and strength of body hase also diminished. Only by self-strength i stand and move. While I stand or move my bones crackle and make sound. Unul I have strength, valour, etc., it would be better for me that I should propiliate the religious rites which are practised at the end of life. So in the morning I will go to Bhagawāna and by bowing down worship him, myself propiliating five great vows, begging pardon of all saints and nuns, climbing on the mount Satrunjaya with elder sages, watch a rock, taking bed of grass, making my own soul faultless by samlekhanā, and renouncing food and water, lying like a broken branch of a tree (Pādapopagamana saithārā) and should remain steadfast in it. This is the best for me. -(Bha, Su, Sa, 2, Udd., I) . ३८ . अन्तकृद्दशा सूत्र : प्रथम वर्ग Page #70 -------------------------------------------------------------------------- ________________ द्वितीय वर्ग अध्ययन १-८ १: जइ णं भंते ! समणेणं जाव संपत्तेणं भगवया महावीरेण पढमस्स वग्गस्स अयमढे पण्णत्ते, दोच्चस्स णं भंते ! वग्गस्स अंतगडदसाणं समणेणं जाव संपत्तेणं कई अज्झयणा पण्णत्ता ? एवं खलु जंबू ! समणेणं जाव संपत्तेणं अट्ठ अज्झयणा पण्णत्ता । तं जहा अक्खोभे सागरे खलु, समुद्द हिमवंत अयल णामे य । धरणे य पूरणे वि य, अभिचन्दे चेव अट्ठमए ॥ सूत्र १ जम्बू स्वामी-हे भगवन् ! श्रमण भगवान महावीर प्रभु ने प्रथम वर्ग का जो वर्णन किया है, वह मैंने सुना । अब दूसरे वर्ग में श्रमण भगवान महावीर ने कितने अध्ययन फरमाये हैं ? आर्य सुधर्मा-हे जम्बू ! श्रमण यावत् मुक्ति प्राप्त भगवान महावीर ने दूसरे वर्ग के आठ अध्ययन फरमाये हैं, जैसे कि-१. अक्षोभकुमार, २. सागर, ३. समुद्र, ४. हिमवान, ५. अचल, ६. धरण, ७. पूरण और ८. अभिचन्द्र । SECOND SECTION Chapters 1 to 8 Maxim 1 : Jambu Shami-() Reverend Sir ! Sramana Bhagawana Mahāvīra described as the first section, so I heard १-८अध्ययन . ३९ . Page #71 -------------------------------------------------------------------------- ________________ attentively. Now please tell me how many chapters have been described by Śramaṇa Bhagawāna Mahāvīra in the second section of Antakṛiddaśā Sūtra. ārya Sudharmā- ( Jambū ! Sramana ( until salvated) Bhagawana Mahāvīra has described eight chapters of second section. As - ( 1 ) Aksobhakumāra (2) Sāgara (3) Samudra, (4) Himavāna, ( 5 ) Acala, (6) Dharana, (7) Pūrana, and (8) Abhicandra. अध्ययन १ से ८ सूत्र २ : तेणं कालेणं तेणं समएणं बारवईए णयरीए वण्ही पिया धारिणी माया । जहा पढमो वग्गो, तहा सव्वे अट्ठ अज्झयणा । गुणरयणं तवोकम्मं सोलसवासाई परियाओ । सेत्तुंजे मासियाए संलेहणाए जाव सिद्धे । एवं खलु जंबू ! समणेणं जाव संपत्तेणं अट्ठमस्स अगस्स दोच्चस्स वग्गस्स अयम पण्णत्ते । सूत्र २ : उस काल उस समय में द्वारका नगरी में इन आठों कुमारों के वृष्णि राजा पिता और धारिणी माता थी । जिस प्रकार प्रथम वर्ग कहा, उसी प्रकार ये सभी आठों अध्ययन समझने चाहिए । इन सभी साधकों ने गुणरत्न संवत्सर तप किया । सोलह वर्ष का निर्मल चारित्र पालन कर शत्रुंजय पर्वत पर एक मास की संलेखना की, यावत् सिद्ध हुए । इस प्रकार हे जम्बू ! श्रमण भगवान महावीर प्रभु ने आठवं अंग अन्तकृद्दशा के दूसरे वर्ग का यह भाव फरमाया है । ( द्वितीय वर्ग के अध्ययन १ से ८ समाप्त ) ४० For Private Personal Use Only अन्तकृदशा सूत्र : द्वितीय वर्ग Page #72 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Chapters 1 to 8 maxim 2 : (At that time and at that period) Father was Vrsni and mother was Dhārini of all these eight princes. As in the first section is said about Gautamakumüra, in the same way all these eight chapters should be known. All the practisers observed Gunaratna saivatsara penance and practised consecration period of sixteen years. These practised pure conduct and with scumlekhanā of one month all these attained liberation from mountain Satrunjava. Thus () Jambū ! Sramana Bhagarina Malárira has told the subject matter of the second section of Eighth Anga Antakrddaśā [Eight chapters consumed] [Second section completed] १- ८अध्ययन • 89 • Page #73 -------------------------------------------------------------------------- ________________ तृतीय वर्ग सूत्र १ जइ णं भंते ! समणेणं जाव संपत्तेणं अट्ठमस्स अंगस्स दोच्चस्स वग्गस्स अयमढे पण्णत्ते, तच्चस्स णं भंते ! वग्गस्स समणेणं जाव संपत्तेणं के अढे पण्णत्ते ? एवं खलु जंबू ! समणेणं जाव संपत्तेणं अट्ठमस्स अंगस्स तच्चस्स वग्गस्स अंतगडदसाणं तेरस अज्झयणा पण्णत्ता । तं जहा१. अणीयसेणे, २. अणंतसेणे, ३. अजियसेणे, ४. अणिहयरिऊ, ५. देवसेणे, ६. सत्तुसेणे, ७. सारणे, ८. गए, ९. सुमुहे, १0. दुम्मुहे , ११ कूवए, १२ दारुए, १३ अणादिट्ठी ।। जइ णं भंते ! समणेणं जाव संपत्तेणं अट्ठमस्स अंगस्स अंतगडदसाणं तच्चस्स वग्गस्स तेरस अज्झयणा पण्णत्ता । तं जहा-अणीयसेणे जाव अणादिट्ठी। पढमस्स णं भंते ! अज्झयणस्स अंतगडदसाणं समणेणं जाव संपत्तेणं के अढे पण्णत्ते ? सूत्र १: आर्य जम्बू-हे भगवन् ! श्रमण भगवान महावीर प्रभु ने आठवें अंग अन्तकद्दशा के दूसरे. वर्ग का जो भाव कहा, वह मैंने सुना । अब हे भगवन ! तीसरे वर्ग का श्रमण भगवान महावीर प्रभु ने क्या भाव कहा है ? सुधर्मा स्वामी-हे जम्बू ! श्रमण भगवान महावीर स्वामी ने आठवें अंग अन्तकृद्दशा सूत्र के तीसरे वर्ग में तेरह अध्ययनों का वर्णन किया है, जो इस प्रकार है-- अन्तकृद्दशा सूत्र : तृतीय वर्ग Page #74 -------------------------------------------------------------------------- ________________ १ अनीकसेन, २. अनन्तसेन, ३. अजितसेन, ४. अनिहतरिपु, ५. देवसेन, ६. शत्रुसेन, ७. सारण, ८. गजसुकुमाल, ९. सुमुख, १0. दुर्मुख, ११. कूपक, १२. दारुक, १३. अनाधृष्टि । आर्य जम्बू-हे भगवन् ! श्रमण प्रभु महावीर ने आठवें अंग अन्तकृद्दशा के तीसरे वर्ग में १३ अध्ययन कहे हैं तो प्रथम अध्ययन का क्या भाव फरमाया है? THIRD SECTION Maxim 1: Arya Jambu-O Reverend sir ! I heard attentively the description given by Sramana Bhagawāna Mahāvīra of the second section of Eighth Anga Antakyddaśā Sūtra. Now please tell me what Šramaņa Bhagawāna Mahāvīra told in third section of this Anga. Sudharmā Swami-O Jambū ! Sramana Bhagawāna Mahāvīra has described thirteen chapters in the third section of Eighth Anga Antakyddaśā Sūtra, which are as follows(1) Anikasena (2) Anantasena (3) Ajitasena (4) Anihataripu, (5) Devasena (6) Satrusena (7) Sarana (8) Gaja Sukumāla (9) Sumukha (10) Durmukha (11) Kupaka (12) Daruka and (13) Anādhrsti. Ārya Jambū-O Reverend sir ! If Śramaņa Bhagawāna Mahāvīra has said thirteen chapters in the third section of Eighth Anga Antakrddaśā Sūtra; then what description he has given of first chapter. प्रथम अध्ययन सूत्र २ : एवं खलु जंबू ! तेणं कालेणं तेणं समएणं भद्दिलपुरे णामं णयरे होत्था । रिद्धिस्थिमिय-समिद्धे, वण्णओ । प्रथम अध्ययन Page #75 -------------------------------------------------------------------------- ________________ तस्स णं भद्दिलपुरस्स नयरस्स बहिया उत्तर-पुरस्थिमे दिसिभाए सिरीवणे णाम उज्जाणे होत्था, वण्णओ । जियसत्तू राया । तत्थ णं भद्दिलपुरे णयरे णागे णामं गाहावई होत्था, अड्ढे जाय अपरिभूए। तस्स णं णागस्स गाहावइस्स सुलसा णामं भारिया होत्था, सुकुमाला जाव सुरूवा । तस्स णं णागस्स गाहावइस्स पुत्ते सुलसाए भारियाए अत्तए अणीयसेणे णामं कुमारे होत्था । सुकुमाले जाव सुरूवे । पंच धाई परिक्खित्ते । तं जहा-खीरधाई, (मज्जणधाई, मंडणधाई, कीलावणधाई, अंकधाई) जहा दढपइण्णे जाव गिरिकंदर-मल्लीणेव चंपकवरपायवे सुहंसुहेणं परिवड्ढई। अनीकसेन कुमार सूत्र २ : श्री सुधर्मा स्वामी-हे जम्बू ! उस काल उस समय में भदिलपुर नाम का नगर था । वह नगर उत्तम नगरों के सभी गुणों से युक्त, धन धान्यादि से परिपूर्ण, भय रहित एवं भवन-उपवन आदि से समृद्ध, वर्णन करने योग्य था । उस भदिदलपुर नगर के बाहर ईशान कोण में श्रीवन नाम का उद्यान था। वहां जितशत्रु नामक राजा थे । उस भदिलपुर नगर में नाग नामक गाथापति रहता था । वह ऋद्धि सम्पन्न एवं अपराभूत-किसी वात से हार मानने वाला नहीं था । उस नाग नामक गाथापति के सुलसा नामक पत्नी थी । वह सुकुमार एवं रूपवती थी । उस नाग गाथापति एवं सुलसा पत्नी के अनीकसेन नामक पुत्र उत्पन्न हुआ । वह भी सुकुमार एवं रूपवान था । पांच धायों के द्वारा उसका पालन-पोषण किया गया । पाँच धायमाताएं इस प्रकार थीं .४४. अन्तकृद्दशा सूत्र : तृतीय वर्ग Page #76 -------------------------------------------------------------------------- ________________ नाग गाथापति एवं सुलसा अनिकसेन स्नान क्षीरपान PARTRAPH Cat गार eg HAN .. Page #77 -------------------------------------------------------------------------- ________________ 听听听听听听听听听听听听听听听听听听听听听听听听听听听听 $$$$$$$$ ॐ चित्रक्रम ६ : अनीकसेनकुमार भहिलपुर निवासी नाग गाथापति अपनी भार्या सुलसा के साथ 4 अनीकसेनकुमार की बाल-लीला देखकर प्रसन्न हो रहा है। विभिन्न देशों की पाँच धायमाताओं द्वारा कुमार का लालन-पालन१. क्षीरधात्री-दूध पिलाती है। २. मज्जनधात्री-स्नान कराती है। ३. मंडनधात्री-केशसज्जा, वस्त्र पहनाना आदि कार्य करती है। ४. अंकधात्री-कुमार को गोदी में लेती है। लोरी सुनाकर सुलाती है। ५. क्रीड़ाधात्री-विविध प्रकार के खिलौनों से खिलाती है। (वर्ग ३/अध्य. १) $$$$$$$$听听听听听听听听听听听听听听听听听$$$$$$$$$$ $ Illustration No. 6 : Anikasenakumăra Resident of Bhaddilapura city. Nāga trader, with his wife Sulasā, becoming glad visualising the childish plays of his son Anikasenakumāra. Nurturing of child (Kumāra) by five mothers (nurses) of different countries1. Foster mother-makes child to drink milk. 2. Bathing mother-bathes the child. 3. Decorating mother-decorates child with clothes, ornaments and design his hairs in various styles. 4. Lap mother-takes child in her lap and makes him to sleep singing lullabies. 5. Amusement mother--makes baby to play with many kinds of toys. (Sec.3/Ch. 1) 0955555555555555555555555556 अन्तकृदशा सूत्र : चित्र परिचय Page #78 -------------------------------------------------------------------------- ________________ १. क्षीरधात्री-दूध पिलाने वाली, २. मज्जनधात्री-स्नान कराने वाली, ३. मंडनधात्री-आभूषण वस्त्रादि पहनाने वाली, ४. क्रीड़ापनधात्री-खेल खिलाने वाली एवं ५. अंकधात्री-गोद में रखने वाली । वह अनीकसेन दृढ़प्रतिज्ञ कुमार के समान एवं पर्वत की गुफा में एकान्त में जिस प्रकार चंपक वृक्ष निर्विघ्न बढ़ता है, उसी प्रकार वह सुखपूर्वक बढ़ रहा था । दृढ़प्रतिज्ञ कुमार का वर्णन औपपातिक सूत्र में आया है । अन्तकृद्दशा महिमा में देखें। Chapter 1 Anikasena Kumāra Maxim 2 : Sudharmă Swami-O Jambut ! At that time and at that period, there was a city named Bhaddilapura. That had many characterstics like great cities, opulated with wealth and agriculture products, gardens and parks, buildings and palaces and free from fear. So it was describable. Out of that city Bhaddilapura, in its north-east direction, there was situated a garden (park) named Srivana. The ruler of Bhaddilapura was king Jitaśatru. In that city lived Näga Gathāpati (trader). He was wealthy and respected. He was not daunted by any task. Sulasā was the wife of Nāga Göthāpati. She was beautiful and tender-bodied. She gave birth to a son named Anikasena. He was also beautiful and tender. He was nurtured by five foster mothers dhātrī mātâ). These were-(1) Foster mother, who make him to drink milk. (2) Majjana dhātri-bathing mother. (3) Mandana dhātrī, the mother who adorns him by clothes and ornaments, (4) Kridá dhātrī, she was supporter to him in play. (5) Lap mother-who fondles him in her lap. प्रथम अध्ययन .४५ Page #79 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Anikasena was growing like Drdhapratijña Kumāra, as the fragrant tree of campaka grows up without any hinderance in a cave of mountain and lonely place. Aupapatika Sūtra vividly explains the description of Drdhapratijña Kumāra. See full description in Antakrddaśā Mahima. सूत्र ३ : तए णं तं अणीयसेणं कुमारं साइरेगं अट्ठवास-जायं अम्मापियरो कलायरियस्स उवणेत्ति जाव भोगसमत्थे जाए यावि होत्था । तए णं तं अणीयसेणं कुमारं उम्मुक्क-बालभायं जाणित्ता अम्मापियरो सरिसयाणं, सरिसवयाणं, सरिसत्तयाणं, सरिसलावण्ण-रूव-जोवण्णगुणोववेयाणं सरिसेहिंतो कुलेहितो आणिल्लियाणं बत्तीसाए इब्भवर · कण्णगाणं एग-दिवसेणं पाणिं गिण्हावेइ । सूत्र ३ : जब अनीकसेन कुमार आठ वर्ष से अधिक वय का हुआ तो माता-पिता ने शिक्षण के लिए कलाचार्य के पास भेजा । कला-कौशल प्राप्त कर वह भोग समर्थ युवावस्था को प्राप्त हुआ । तब उस अनीकसेन कुमार को माता-पिता ने बाल भाव मुक्त अर्थात् युवावस्था को प्राप्त हुआ जानकर, उसके अनुरूप समान वयवाली, समान त्वचा (रंग) और रूपलावण्य तथा तारुण्य गुण वाली, अपने समान कुलों से लाई गई बत्तीस इभ्य श्रेष्ठियों की कन्याओं के साथ उसका एक ही दिन में पाणिग्रहण करवाया । Maxim 3 : When Anikasena Kumāra crossed the age of eight years then his parents sent him to an able teacher for education. He became at home in various arts and crafts and branches ४६ अन्तकृद्दशा सूत्र : तृतीय वर्ग Page #80 -------------------------------------------------------------------------- ________________ . - गुरुकुल में विद्याध्ययन 4. y 4y drenia कलाशि and SARAN . . Cre AMERIO Sat SARAN SUBS । । PENSINGTA 15 Page #81 -------------------------------------------------------------------------- ________________ 05555555555555555550 चित्रक्रम ७ : अनीकसेनकुमार का शिक्षण एवं विवाह दृश्य १-कलाचार्य के पास कुमार शिक्षण ग्रहण करते हैं। दृश्य २-मल्ल-युद्ध, शस्त्र-संचालन-कला, गज-युद्ध, अश्व-युद्ध आदि का प्रशिक्षण लेते हैं। दृश्य ३-एक ही दिन में बत्तीस कन्याओं के साथ विवाह तथा नाग गाथापति द्वारा प्रीतिदान। (वर्ग ३/अध्य. १) Illustration No. 7: Education and marriage of Anikasenakumāra Scene 1. Pupils (Kumāras) take education near teacher. Scene 2. Kumāras learn the technique of wrestling, weapon strategy, elephant fighting, horse fighting etc. Scene 3. Marriage with thirty two maidens in a single day and donation given by Nāga trader as token of love. (Sec. 3/Ch. 1) अन्तकृद्दशा सूत्र : चित्र परिचय Page #82 -------------------------------------------------------------------------- ________________ of learning and along with he became adolescent and capable to enjoy worldly pleasures. Then knowing this state his parents married him with thirty two richmen's daughters in only one day. The maidens (young maidens) were like him, in age, colour, beauty, charm and youth. सूत्र ४ : तए णं से णागे गाहावई अणीयसेणस्स कुमारस्स इमं एयारूवं पीइ-दाणं दलयइ । तं जहा-बत्तीसं हिरण्णकोडीओ, जहा महब्बलस्स जाव उप्पिंपासायवरगए फुट्टमाणेहिं मुइंग-मत्थएहिं भोगभोगाइं भुंजमाणे विहरइ। तेणं कालेणं तेणं समएणं अरहा अरिडणेमी जाव समोसढे । सिरिवणे उज्जाणे अहापडिरूवं उग्गहं जाव विहरइ । परिसा णिग्गया । तए णं तस्स अणीयसेणस्स कुमारस्स तं महया जणसई जहा गोयमे तहा णवरं सामाइयमाइयाइं चोद्दसपुयाई अहिज्जइ । बीसं वासाइं परियाओ सेसं तहेव जाव सेत्तुंजे पव्यए मासियाए संलेहणाए जाव सिद्धे । एवं खलु जंबू ! समणेणं जाव संपत्तेणं अट्ठमस्स अंगस्स अंतगडदसाणं तच्चस्स वग्गस्स पढमस्स अज्झयणस्स अयमढे पण्णत्ते । (पढमं अज्झयणं सम्मत्तं) सूत्र ४ : पाणिग्रहण कराने के पश्चात् उस नाग गाथापति ने अनीकसेन कुमार को इस प्रकार का प्रीतिदान किया, जैसे कि बत्तीस करोड़ चाँदी, सोना आदि । इसका विवरण महाबल के समान समझना चाहिए । यावत् इस प्रकार अनीकसेन कुमार ऊपर प्रासाद में बजती हुई मृदंगों की तालों के साथ गीत-नृत्य आदि सांसारिक सुखों को भोगते हुए रहता था । प्रथम अध्ययन ४७. Page #83 -------------------------------------------------------------------------- ________________ उस समय में अरिहंत अरिष्टनेमि ग्राम-ग्राम विचरते हुए भद्दिलपुर नगर में पधारे । श्रीवन नामक उद्यान में यथाविधि अवग्रह तृण-पाट आदि की आज्ञा लेकर, विराजमान हुए । धर्म श्रवण करने परिषद आई । तदनन्तर उस अनीकसेन कुमार को भी भगवान के आगमन की सूचना मिली, दर्शनार्थ जाते हुए जन समूह को देखा, उसके मन में भी भगवान के दर्शनों की इच्छा जागी । गौतम कुमार के समान अनीकसेन कुमार ने भी समवशरण में जा, प्रभु की धर्म देशना सुनी, तदनन्तर माता-पिता की आज्ञा लेकर प्रभु के चरणों में दीक्षा प्राप्त की । गौतम कुमार से विशेष यह कि सामायिक श्रुत आदि ग्यारह अंग तथा चौदह पूर्वो का ज्ञान भी सीखा । २0 वर्ष की श्रमण पर्याय का पालन किया । शेष उसी प्रकार शत्रुजय पर्वत पर जाकर एक मास की संलेखना करके यावत् सिद्ध हुए । इस प्रकार हे जम्बू ! श्रमण भगवान महावीर प्रभु ने आठवें अन्तकृद्दशा अंग के तीसरे वर्ग के प्रथम अध्ययन का वर्णन किया है । (तीसरे वर्ग का प्रथम अध्ययन समाप्त) Maxim 4: After marriage. Nāga Gáthāpati gave such a present (Pritidāna) to his son Anikasena Kumāra, as thirty two crores silver and gold (coins) etc. Its description should be known like Mahābala (until the time of Anikasena was passing pleasurefully with sweet recitation of songs and orchestra- musical instruments etc. At that time and at that period wandering village to village Arihanta Aristanemi came to Bhaddilapura, stayed at Srivana garden with due consent about every necessary thing. Congregation assembled for hearing his sermon. Anikasena Kumāra also came to know about coming of Bhagawāna. While he saw the people going to how down to Bhagawāna, his desire also aroused. Like Gautama Kumāra, Ankasena Kunāra also approached to the religious assembly, and heard the sermon. Thereafter ४८ . अन्तकृद्दशा सूत्र : तृतीय वर्ग . Page #84 -------------------------------------------------------------------------- ________________ taking the permission of parents, he accepted the consecration at the lotus feet of Bhagawāna. Speciality from Gautama Kumāra is this-that Anikasena Kumāra learned Sāmāyika etc., eleven Angas and fourteen Pūrvas, practised sramaņahood upto 20 years. Remaining account is the same, he climbed upon mountain Satrunjaya and liberated after the samlekhanā of one month. Thus O Jambū ! śramana Bhagawāna Mahāvīra has described the subject matter of first chapter of third section of Eighth Anga Antakyddaśā Sūtra. (First chapter of third section concluded) विवेचन प्रीतिदान-किसी भी हर्ष के प्रसंग पर प्रसन्नता के साथ दिया जाने वाला पुरस्कार या उपहार प्राचीन समय में “प्रीतिदान" के नाम से प्रसिद्ध था । ध्यान देने की बात है कि कन्यापक्ष की ओर से वर पक्ष को दिया जाने वाला धन जिसे आजकल दहेज कहते हैं, प्राचीन समय में “दाय" कहलाता था । गौतम कुमार के प्रकरण में “दाय" शब्द का प्रयोग हुआ है । किन्तु यहां प्रीतिदान शब्द है और यह अपनी बत्तीस पुत्रवधुओं के लिए वर के पिता नाग गाथापति की ओर से दिया गया । जो उन बत्तीस कन्याओं (बहुओं) में बाँट दिया गया । वैसे आगमों में 'दाय' और 'प्रीतिदान' दोनों ही शब्दों का यथाप्रसंग समान अर्थ में भी प्रयोग मिलता है। Elucidation Pritidāna-At any occasion of pleasure, the prize or present given wilfully and with happiness, was famous by the term prītidāna in ancient times. It is to be taken into consideration that the wealth given by relatives of bride to bridegroom which is now called dowry, in the ancient times it was called dāya. In the episode of Gautama Kumāra the word daya is used; but here is the word pritidāna and it is given by Nága Gāthāpati the father of bridegroom to his thirtytwo daughtersin-law, which was distributed among them (brides). प्रथम अध्ययन Page #85 -------------------------------------------------------------------------- ________________ However, prītidāna and dāya, both the words are used in Agama according to occasion, in the same sense. अध्ययन २-६ सूत्र ५ : एवं जहा अणीयसेणे एवं सेसा वि (अणंतसेणे, अजियसेणे, अणिहयरिऊ, देवसेणे, सत्तुसेणे) छ अज्झयणा एगगमा । बत्तीसओ दाओ । बीस वासाइं परियाओ । चोद्दस पुयाइं अहिज्जंति सेत्तुंजे जाव सिद्धा । (छटुं अज्झयणं सम्मत्तं) सूत्र ५ : जिस प्रकार अनीकसेन कुमार का वर्णन किया गया, उसी प्रकार शेष अध्ययन भी, २. अनंतसेन, ३. अजितसेन, ४. अनिहतरिपु, ५. देवसेन और ६. शत्रुसेन-समझना चाहिए । ये छ: ही अध्ययन एक समान हैं । इन सबको भी बत्तीस-बत्तीस करोड़ चांदी सोने का प्रीतिदान मिला । सबका २0-२0 वर्ष का दीक्षा काल रहा । सबने चौदह पूर्व का अध्ययन किया एवं सभी शत्रुजय पर्वत पर संलेखणा की आराधना करके सिद्ध हुए । (तीसरे वर्ग के २ से ६ अध्ययन समाप्त) Chapter 2-6 Maxim 5 : As is the description of Anikasena so is of subsequent chapters. viz., (2) Anantasena (3) Ajitasena (4) Anihataripu (5) Devasena and (6) Satrusena. These six chapters are alike. All these get the wilful pleasure, gift of thirty two crores silver and gold (coins). The consecration period of all these was twenty years. All . ५० . अन्तकृद्दशा सूत्र : तृतीय वर्ग Page #86 -------------------------------------------------------------------------- ________________ these learned fourteen Pūrvas. All these became emancipated by sailekhanā-Sarthārā at mountain Śatrunjaya. (2 to 6 Chapters concluded) सातवां अध्ययन जइ णं भंते ! उक्वेवो सत्तमस्स ! तेणं कालेणं तेणं समएणं बारवईए णयरीए जहा पढमे । णवरं वसुदेवे राया, धारिणी देवी, सीहो सुमिणे, सारणे कुमारे, पण्णासओ दाओ, चोद्दसपुव्वाइं वीसं वासाइं परियाओ; सेसं जहा गोयमस्स जाव सेत्तुंजे सिद्धे । (इति सत्तमज्झयणं) सूत्र ६ : आर्य जम्बू-हे पूज्य ! श्रमण भगवान महावीर ने छठे अध्ययन का जो भाव (उत्क्षेपक-जिसका अर्थ है-वर्णन, अधिकार या भाव है) कहा, वह सुना, अव सातवें अध्ययन का क्या उत्क्षेपक अधिकार है ? कृपा कर फरमाइये । आर्य सुधर्मा-उस काल उस समय में द्वारका नगरी थी । वहां का वर्णन प्रथम अध्ययन के समान समझना चाहिए । विशेष-वहां वसुदेव राजा थे, और धारिणी देवी उनकी रानी थी । देवी ने सिंह का स्वप्न देखा । उनके पुत्र का नाम सारण कुमार रखा गया । उसे विवाह में पचास-पचास स्वर्ण-रजत कोटि का प्रीतिदान मिला । सारण कुमार ने सामायिक आदि ग्यारह अंगों तथा १४ पूर्वो का अध्ययन किया । बीस वर्ष तक दीक्षा पर्याय का पालन किया । शेष गौतम कुमार की तरह शत्रुजय पर्वत पर एक मास की संलेखना सहित सिद्ध हुए । (सातवां अध्ययन समाप्त) २-७अध्ययन . ५१ . Page #87 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Chapter 7 Maxim 6: Arya Jambu-O reverend Sir ! Sramana Bhagawana Mahāvīra as described the sixth chapter, so you have told me and I have heard attentively. Now please tell me-what is the description of seventh chapter. Arya Sudharma-At that time and at that period there was a city named Dwarakā. The description of that city should be known from first chapter of the first section. Speciality was that there was ruler Vasudeva, and Dhāriņi Devi was his queen. Dhārini has seen a lion in dream. Her son was named as Sārana Kumāra. After marriage he got fifty-fifty crores of silver and gold coins as wilful pleasure gift. Sāraṇa Kumāra had studied Sāmāyika etc., eleven Angas and fourteen Pūrvas. His consecration period was of twenty years. Remaining like Gautama Kumāra, with Samlekhanā of one month he attained salvation from Satrunjaya mountain. (Seventh chapter concluded) आठवां अध्ययन सूत्र ७ : जइ णं भंते ! उक्खेवो अट्ठमस्स । एवं खलु जंबू ! तेणं कालेणं तेणं समएणं बारवईये णयरीए जहा पढमे जाव अरहा अरिट्ठणेमी सामी समोसढे । तेणं कालेणं तेणं समएणं अरहओ अरिट्ठणेमिस्स अंतेवासी छ अणगारा भायरो सहोदरा होत्था । सरिसया, सरिसत्तया सरिसव्वया, णीलुप्पल गवल-गुलिय-अयसि-कुसुमप्पगासा सिरिवच्छं-कियवच्छा कुसुम-कुण्डल भद्दलया णलकुब्बर समाणा । • ५२ . अन्तकृद्दशा सूत्र : तृतीय वर्ग Page #88 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आर्य जम्बू-हे भन्ते ! मैंने सातवें अध्ययन का भाव सुना, अब आठवें अध्ययन का प्रभु महावीर ने क्या अधिकार (उत्क्षेपक) कहा है ? कृपा कर फरमाइये । आर्य सुधर्मा-इस प्रकार हे जम्बू ! उस काल, उस समय में द्वारका नगरी में कष्ण वासुदेव आदि प्रथम अध्ययन में किये गये वर्णन के अनुसार वर्णन समझना चाहिए । यावत् अरिहंत अरिष्टनेमि भगवान पधारे । उस काल, उस समय में भगवान अरिष्टनेमि के अंतेवासी शिष्य छः मुनि सहोदर भाई थे । वे समान आकार वाले, समान त्वचा (रंग) और अवस्था में समान दिखने वाले थे । शरीर का रंग नीलकमल, भैंस के सींग की गुली (भीतरी भाग) और अलसी के फूल जैसा नीली आभा (छवि) वाला था । उनके वक्षस्थल पर श्रीवत्स का चिन्ह था और कुसुम के समान कोमल एवं कुण्डल के समान धुंघराले बालों वाले वे सभी मुनि नलकूबर के समान लगते थे । नलकूबर का अर्थ है- वैश्रमण देव का एक बहुत रूपवान पुत्र । वैदिक ग्रंथों में भी नलकूबर को कुबेर का सुन्दर पुत्र बताया है । Chapter 8 Maxim 7: Arya Jambu-O Reverend Sir ! I have heard the subject matter of seventh chapter. Now, please tell me what description of eighth chapter has been given by Sramana Bhagawāna Mahāvīra. Arya Sudharmā-O Jambu ! At that time and at that period, there was a city named Dwārakā. The description of city should be known from first chapter of first section, until, Arihanta Aristanemi Bhagwāna came. At that time and at that period the six uterine brothers were the disciples of Bhagawāna Aristanemi, who lived near अष्टम अध्ययन Page #89 -------------------------------------------------------------------------- ________________ him. All these six were alike in colour, Structure, configuration and age; differentiation was very difficult among them. Their colour was blue, like blue lotus, horn of a buffalo. There was the mark of Srivatsa on the chest of every one. Their hairs were soft, curly and conjusted. These all were as heautiful as Nalakūbara. I Nalakūbara means the very beautiful son of Vaisramana (god of wealth). Vaidic scriptures also mention Nalakūbara as the beautiful son of Kubera. सूत्र ८ : तए णं ते छ अणगारा जं चेव दिवसं मुण्डा भवित्ता अगाराओ अणगारियं पव्वइया तं चेव दिवसं अरहं अरिट्ठणेमि वंदंति णमंसंति, वंदित्ता णमंसित्ता एवं वयासी-इच्छामो णं भंते ! तुब्भेहिं अब्भणुण्णाया समाणा जावज्जीवाए छटुं छटेणं अणिक्खित्तेणं तवोकम्मेणं संजमेणं अप्पाणं भावमाणा विहरित्तए । अहासुहं देवाणुप्पिया ! मा पडिबंधं करेह । तए णं ते छ अणगारा अरहया अरिट्टनेमिणा अन्भणुण्णाया समाणा जावज्जीवाए छटुं छटेणं जाव विहरंति । सूत्र ८ तब (दीक्षित होने के पश्चात्) वे छहों मुनि जिस दिन मुण्डित होकर अगार से अणगार धर्म में प्रव्रजित हुए, उसी दिन अरिहंत अरिष्टनेमि के पास आकर वंदना नमस्कार कर इस प्रकार बोलेहे भगवन् ! हम चाहते हैं कि आपकी आज्ञा पाकर जीवन पर्यन्त निरन्तर बेले-बेले की तपस्या द्वारा अपनी आत्मा को भावित करते हुए विचरण करें । प्रभु ने कहा-हे देवानुप्रियो ! जिससे तुम्हें सुख प्राप्त हो, वही कार्य करो, शुभ कार्य में प्रमाद मत करो । .५४ . अन्तकृद्दशा सूत्र : तृतीय वर्ग Page #90 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रअरिष्टनेमि के अन्तेवासी हः सहोदर अणगार ANN Page #91 -------------------------------------------------------------------------- ________________ 步步步步步步步步步男%%% %% % % % % %% % % %% % % # चित्रक्रम ८: छह सहोदर बन्धु-श्रमण भगवान अरिष्टनेमि के अन्तेवासी छह सहोदर अणगार घुघराले बालों वाले, नीलवर्ण, रूप, वय आदि में एक समान, बेले-बेले तप करते हुए। बेले तप के पारणा की आज्ञा लेते हैं। (वर्ग ३/अध्य. ८) Illustration No. 8 : Six uterine brother-sages Six uterine brother-sages curly haired, alike in form, bodyframe, shape, colour, age etc., they were consecrated by Bhagawana Aristanemi, and regularly observed two days' fast. Now they are asking the permission of Bhagawāna to seek food on the fast-breaking day. (Sec. 3/Ch. 8) 5555555555555555555555555)))))))))))))))))) अन्तकृद्दशा सूत्र : चित्र परिचय Page #92 -------------------------------------------------------------------------- ________________ तब वे छहों मुनि भगवान् अरिष्टनेमि की आज्ञा पाकर जीवन भर के लिये बेले- बेले की तपस्या करते हुए ग्रामानुग्राम विचरण करने लगे । Maxim 8 : As all these accepted consecration, i.e., became houseless mendicants renouncing house-holders' code, the very day all these approached Arihanta Ariṣṭanemi and bowing worshipping him spoke these words O Bhagawan! With your consent we wish that till life we practise two days' fast penance and third day take food. Thus observing austerity and fixing ourselves in soul virtues, we wish to move in your religious order. Bhagawāna said-O beloved as gods! Do, as you feel happy; but do not delay or be not careless in meritorious deeds. Then getting the consent of Bhagawana Ariṣṭanemi, all these six monks began to wander village to village, with the religious congregation observing two days' fast penance and third day to take food (Bele-Bele fast penance) for whole life. सूत्र ९ : तए णं ते छ अणगारा अण्णया कयाइं छट्ठक्खमण पारणगंसि पढमाए पोरिसीए सज्झायं करेंति जहा गोयमसामी जाव। इच्छामो णं भंते । छट्ठक्खमणस्स पारणए तुब्भेहिं अब्भणुष्णाया समाणा तिहिं संघाडएहिं बारवईए णयरीए जाव उच्च नीयं मज्झिमाई कुलाई अत्तिए । अहासु देवाणुप्पिया ! तए णं ते छ अणगारा अरहया अरिट्टणेमिणा अब्भणुष्णाया समाणा अरहं अरिट्टणेमिं वंदति णमंसंति, वंदित्ता गंमंसित्ता अरहओ अरिट्ठणेमिस्स अंतियाओ सहस्संबवणाओ उज्जाणाओ पडिणिक्खमंति पडिणिक्खमित्ता तिहिं संघाडएहिं अतुरियं जाव अडंति । अष्टम अध्ययन For Private Personal Use Only ५५ Page #93 -------------------------------------------------------------------------- ________________ तत्थ णं एगे संघाडए बारवईए णयरीए उच्च-णीय मज्झिमाइं कुलाई घरसमुदाणस्स भिक्खायरियाए अडमाणे वसुदेवस्स रण्णो देवईए देवीए गिहं अणुप्पविठे । तए णं सा देवई देवी ते अणगारे एज्जमाणे पासित्ता हट्ठ-तुट्ठ चित्तमाणंदिया, पीईमणा परमसोमणस्सिया, हरिसवस- विसप्पमाणहियया आसणाओ अब्भुठेइ, अब्भुत्तिा सत्तट्ठपयाइं अणुगच्छइ अणुगच्छित्ता तिक्खुत्तो आयाहिणं पयाहिणं करेइ, करित्ता बंदइ, णमंसइ । वंदित्ता, णमंसित्ता जेणेव भत्तघरए तेणेव उवागच्छइ, उवागच्छित्ता सीहकेसराणं मोयगाणं थालं भरेइ, भरित्ता ते अणगारे पडिलाभेइ पडिलाभित्ता बंदइ, णमंसइ । वंदित्ता णमंसित्ता पडिविसज्जेइ । छह अणगार : देवकी के भवन में सूत्र ९ : उसके पश्चात् उन छहों मुनियों ने अन्यदा किसी समय, बेले की तपस्या के पारणे के दिन प्रथम प्रहर में स्वाध्याय किया और गौतम स्वामी के समान प्रभु के समक्ष उपस्थित होकर बोलेहे भगवन् ! हम बेले की तपस्या के पारणे में आपकी आज्ञा पाकर दो-दो के तीन संघाडों से द्वारका नगरी में यावत् भिक्षा हेतु भ्रमण करना चाहते भगवान ने कहा-देवानुप्रियो ! जैसे सुख हो, वैसा करो । तब उन छहों मुनियों ने अरिहंत अरिष्टनेमि की आज्ञा पाकर प्रभु को वन्दन नमस्कार किया । वन्दन नमस्कार करके वे भगवान अरिष्टनेमि के पास से सहस्राम्रवन उद्यान से प्रस्थान करते हैं । उद्यान से निकल करके वे दो-दो के तीन संघाटकों में सहज मन्द-मन्द गति से, शान्त चित्त से ईर्यासमिति पूर्वक भ्रमण करने लगे । अन्तकृद्दशा सूत्र : तृतीय वर्ग Page #94 -------------------------------------------------------------------------- ________________ चित्रक्रम ९ : रानी देवकी के भवन में छह अनगार छहों सहोदर अणगार दो-दो के सिंघाड़े में द्वारका में भिक्षार्थ भ्रमण 3 करते हुए पहला सिंघाड़ा रानी देवकी के भवन में आ रहा है। दो अणगारों 卐 को आते देखकर रानी देवकी उठकर सामने जाती है। वन्दना नमस्कार । करती है, फिर उन्हें भोजन गृह में ले जाकर सिंहकेशर मोदक बहराती है। कुछ समय बाद दूसरा सिंघाड़ा भवन में प्रवेश करता है। एक समान गंग, रूप, वय होने से देवकी उसी सिंघाड़े को दुबारा आया समझकर आश्चर्यपूर्वक देखती है। कुछ देर बाद तीसरा सिंघाड़ा आता है तब तो देवकी रानी गहरे विचार में डूब जाती है कि क्या वे ही मुनि तीसरी बार आये हैं ? मुनियों पूछने पर मुनियों द्वारा रहस्य का उद्घाटन। (वर्ग ३/अध्य. ८) 55555555555555555555555555555555555555555555 Illustration No. 9 : Six friars in the palace of queen Devaki Six friars divided themselves in three groups of two sages ach. First group of two sages wandering in Dwarakā city, coming to the palace of Devaki. Seeing them Deraki comes forward, praises and bows down to them. Bringing from kitchen she gives them Singha Kesara sweet-balls and let them go. After some time second group of two sages enters. Seeing the sages alike in age, colour etc., Devaki awfully gazes them. After a little time when third group of two sages enters, Devaki drowns deep in thoughts-Whether the same sages have come thrice. She asks sages. Sages reveal the secret. (Sec. 3/Ch. 8) 0555555555555555555555555555550 अन्तकृद्दशा सूत्र : चित्र परिचय Page #95 -------------------------------------------------------------------------- ________________ देवकी रानी के भवन में मुनियों का भिक्षार्थ आगमन जिज्ञासा IL IL आहार ट समाधान 1 Tavsiy Page #96 -------------------------------------------------------------------------- ________________ म संघाटक उन तीनों संघाड़ों में से एक संघाड़ा द्वारिका नगरी के ऊँच नीच - मध्यम कुलों में, एक घर से दूसरे घर, भिक्षाचर्या के हेतु भ्रमण करता हुआ राजा वसुदेव की महारानी देवकी के प्रासाद में प्रविष्ट हुआ । उस समय देवकी रानी उन दो मुनियों के संघाड़े को अपने यहाँ आये देखकर प्रसन्न संतुष्ट एवं चित्त में आनन्दित हुई । प्रीतिवश उसका मन परमाल्हाद को प्राप्त हुआ, हर्षातिरेक से उसका हृदय - कमल विकसित हो उठा । तब देवकी रानी आसन से उठकर सात-आठ कदम मुनियुगल के सम्मुख गई । सामने जाकर तीन बार दायें से बांईं ओर उनकी प्रदक्षिणा की । प्रदक्षिणा कर उन्हें वन्दन नमस्कार किया । वन्दन नमस्कार के पश्चात जहाँ भोजनशाला है, वहाँ आई । भोजनशाला में आकर सिंहकेशर मोदकों (विशेष प्रकार के सुगंधित एवं पौष्टिक लड्डू) से एक थाल भरा और थाल भरकर उन मुनियों को प्रतिलाभ दिया । प्रतिलाभ देने के पश्चात् देवकी ने उन्हें पुनः वन्दन - नमन कर विदा किया | Six Monks In the Palace of Devaki Maxim 9 : Thereafter at any day of pāraṇā (the day of taking food) after two days' fast penance all these six monks studied in the first three hours (first prahara) of the day and after that approached Bhagawāna, like Gautama Swāmī and spoke thus unto him. • O Bhagawan! We all six monks want to wander in Dwaraka city, in three groups (containing two in each group) for seeking food as the pāraṇā of two days' fast penance with your consent. Bhagawāna said - Beloved as gods ! Do, as you feel happy. Then getting the consent all the six monks bowed down and worshipped Arihanta Aristanemi. After it, from there, अष्टम अध्ययन For Private Personal Use Only • ५७ Page #97 -------------------------------------------------------------------------- ________________ these monks went out and reached Sahasrāmi! ? (the wood of mango trees). Going out of that wood they divided themselves in three groups of two monks. Then they began to wander in the city with peaceful mind and observing circumspection of movement. First Group One of those three groups wandering in Dwarakā city seeking alms from high-low-medium standard houses, from one to the other house, approached the palace of Devakī, the queen of king Vasudeva. Queen Devakī became very glad, happy and filled with bliss, seeing the two monks coming to her palace. Due to affection her mind filled with joy, her heart bloomed like a lotus due to the extremity of happiness. Standing up from her seat queen Devaki went towards monk couple, seven or eight steps with pleasureful heart, and circumambulated bowed down and worshipped them. Then she went to kitchen with monk-couple. There he put Singha-Keśara Modaka (a kind of too much fragrant and nourishing-vitalising sweetball) in a big plate and gave to monk-couple. After this queen Devakī once again bowed down, worshipped and gave farewell to monk-couple. विवेचन • जहा गोयम सामी जाव इच्छामो छहों सहोदर मुनियों ने गौतम स्वामी की तरह (गौतम स्वामी की दिनचर्या का वर्णन भगवती सूत्र शतक २ उद्देशक-५ में आया है ।) बेले के पारणे के दिन प्रथम प्रहर में शास्त्र-स्वाध्य, दूसरे प्रहर में ध्यान तथा तीसरे प्रहर में शान्त भाव से मुखवस्त्रिका, वस्त्रों व पात्रों की प्रतिलेखना की । पात्रों को लेकर भगवान के चरणों में विधिवत् वन्दन नमस्कार करके नगरी में भिक्षार्थ जाने की आज्ञा मांगी । आज्ञा मिल जाने पर चंचलता रहित तथा ईर्या शोधन पूर्वक शांति चित्त से भिक्षा हेतु भ्रमण करने लगे । यह वर्णन जानना चाहिए । अन्तकृद्दशा सूत्र : तृतीय वर्ग Page #98 -------------------------------------------------------------------------- ________________ उच्च-नाच मध्यम कुल के विषय में प्राचीन आचार्यों का स्पष्टीकरण इस प्रकार है• राजा आदि के राज भवन-सत्ता एवं संपदा की दृष्टि से उच्च कुल । • श्रेष्ठ, धनी व्यापारी आदि के भवन मध्यम कुल । • एक मंजिले छोटे झोंपड़ी आदि में रहने वालों के भवन नीच कुल कहे जाते थे । साधु इन सभी कुलों में सामुदानिक रूप में समभाव के साथ भिक्षा के लिए जाते थे । (आचारांग-निशीथ सूत्र के अनुसार) Elucidation . Jaha Goyama Sami Java icchāmo........... All these six uterine brother monks wished to move like Gautama Swami. (The method of seeking alms of Gautama Swāmi. we get in Bhagavati Sūtra, Sataka 2, Uddeśaka 5.) Like him, all these six brother monks studied scriptures in the first prahara of the day, in second involved in meditation, in third peacefully watched cloths, mouth-cloth, utensils etc. Taking utensils came to the lotus feet of Bhagawāna and bowing down in due order asked the permission to wander in the city for seeking alms. Obtaining the permission began to wander in the city for seeking alms with peaceful mind and observing movement circumspection. Regarding high-medium-low standard people, the clarification of ancient sages-preachers, is like this (a) High (standard)-The palaces of kings, rulers, powerful persons etc. (b) Medium-Big houses of wealthy traders and rich persons. (c) Low-One storeyed houses, cottages of general public. Sages used to seek alms from all these three types of houses and persons without any differentiation. (According to Ācārüngu and Nišithu Sūtra) सूत्र १0: तयाणंतरं च णं दोच्चे संघाडए बारवईए णयरीए उच्च जाव पडिविसज्जेइ । अष्टम अध्ययन . ५९. Page #99 -------------------------------------------------------------------------- ________________ तयाणंतरं च णं तच्चे संघाडए उच्च-णीय जाव पडिलाभेइ । पडिलाभित्ता एवं वयासीकिण्हं देवाणुप्पिया ! कण्हस्स वासुदेवस्स इमीसे बारवईए णयरीए दुवालसजोयण-आयामाए णवजोयण-वित्थिण्णाए पच्चक्खं देवलोगभूयाए समणा णिग्गंथा उच्च-णीय-मज्झिमाई कुलाई घरसमुदाणस्स भिक्खायरियाए अडमाणा भत्तपाणं णो लभंति ? जण्णं ताई चेव कुलाई भत्तपाणाए, भुज्जो भुज्जो अणुप्पविसंति । दूसरा संघाटक सूत्र १0 : प्रथम संघाटक के लौट जाने के पश्चात् उन छः सहोदर साधुओं के तीन संघाटकों में से दूसरा संघाटक भी द्वारका के उच्च-नीच-मध्यम आदि कुलों में भिक्षार्थ भ्रमण करता हुआ महारानी देवकी के प्रासाद में आया । देवकी ने प्रथम संघाटक की भाँति दूसरे मुनि संघाटक को भी प्रसन्न मन से सिंह केसर मोदकों का प्रतिलाभ देकर विसर्जित किया । तीसरा संघाटक द्वितीय संघाटक के लौट जाने के पश्चात् उन मुनियों का तीसरा संघाड़ा भी द्वारका नगरी के ऊँच-नीच-मध्यम कुलों में भिक्षार्थ भ्रमण करता हुआ महारानी देवकी के प्रासाद में प्रविष्ट हुआ । देवकी ने पहले आये दो संघाटकों के समान उस तीसरे संघाटक को भी प्रसन्न मन से सिंह केसरमोदकों का प्रतिलाभ दिया । प्रतिलाभ देकर आश्चर्य चकित होकर महारानी देवकी इस प्रकार बोलीहे देवानुप्रियो ! क्या कृष्ण वासुदेव की इस बारह-योजन लम्बी, नव योजन चौड़ी, प्रत्यक्ष देवलोक के समान, द्वारका नगरी में श्रमण निर्ग्रन्थों को उच्च-नीच एवं मध्यम कुलों के गृह समुदायों से, भिक्षार्थ भ्रमण करते हुए अन्तकृद्दशा सूत्र : तृतीय वर्ग . Page #100 -------------------------------------------------------------------------- ________________ णिंदू भविस्सई । तए णं सा सुलसा बालप्पभिई चेव हरिणेगमेसि देवभत्तया यावि होत्था । हरिणेगमेसिस्स पडिमं करेइ, करित्ता कल्लाकल्लिं व्हाया जाव पायच्छित्ता उल्लपड-साडया महरिहं पुष्फच्चणं करेइ, करित्ता जाणुपायवडिया पणामं करेइ, तओ पच्छा आहारेइ वा णीहारेइ वा वरइ वा । सूत्र १३: तदनन्तर अर्हन्त अरिष्टनेमि देवकी को सम्बोधित कर इस प्रकार बोलेहे देवकी ! क्या इन छः साधुओं को देखकर वस्तुतः तुम्हारे मन में इस प्रकार का विचार या संशय उत्पन्न हुआ कि पोलासपुर नगर में अतिमुक्तकुमार श्रमण ने तुम्हें आठ अद्वितीय पुत्रों को जन्म देने का जो भविष्यकथन किया था, वह मिथ्या सिद्ध हुआ ऐसा प्रत्यक्ष दिखाई दे रहा है ? अतः उस विषय में पृच्छा करने के लिए तुम जल्दी-जल्दी यहाँ चली आई हो । हे देवकी ! क्या यह बात ठीक है ? देवकी ने कहा-हाँ भगवन् ! ऐसा ही है । प्रभु अरिष्टनेमि ने शंका समाधान करते हुए कहा-हे देवानुप्रिये ! उस काल उस समय में भद्दिलपुर नगर में नाग नाम का गाथापति रहता था, जो आढ्य (महान ऋद्धिशाली) था । उस नाग गाथापति की सुलसा पत्नी थी । उस सुलसा गाथापत्नी को बाल्यावस्था में ही किसी निमित्तज्ञ ने कहायह बालिका निंदू (मृतवत्सा) यानि मृत बालकों को जन्म देने वाली होगी । इस कारण सुलसा बाल्य-काल से ही हरिणगमेषी देव की भक्त बन गई । सुलसा ने हरिणगमेषी देव की मूर्ति बनाई । मूर्ति बनाकर प्रतिदिन प्रातःकाल स्नान करके यावत् दुःस्वप्न निवारणार्थ प्रायश्चित्त (शुद्धि) कर गीली साड़ी पहने हुए उसकी बहुमूल्य सुन्दर पुष्पों से अर्चना करती । पुष्पों द्वारा पूजा के पश्चात् घुटने टिकाकर (पाँचों अंग नमाकर) प्रणाम करती, तदनन्तर आहार नीहार आदि अपने अन्य कार्य करती थी। अष्टम अध्ययन .६९. Page #101 -------------------------------------------------------------------------- ________________ एवं खलु देवाणुप्पिए ! अम्हे भद्दिलपुरे णयरे णागस्स गाहावइस्स पुत्ता सुलसाए भारियाए अत्तया छ भायरो सहोदरा सरिसया जाव णलकुब्बर-समाणा अरहओ अरिगुणेमिस्स अंतिए धम्म सोच्चा णिसम्म संसार भयउव्विग्गा भीया जम्म-मरणाओ मुण्डा जाव पव्वइया । तए णं अम्हे जं चेव दिवसं पव्वइया तं चेव दिवसं अरहं अरिट्ठणेमिं वंदामो णमंसामो; बंदित्ता णमंसित्ता इमं एयारूवं अभिग्गहं अभिगिण्हामोइच्छामो णं भंते ! तुभेहिं अब्भणुण्णाया समाणा । जाव अहासुहं ! देवाणुप्पिए ! तए णं अम्हे अरहया अरिडणेमिणा अब्भणुण्णाया समाणा जावज्जीवाए छटुं छटेणं जाव विहरामो । तं अम्हे अज्ज छट्ठक्खमण पारणगंसि पढमाए पोरिसीए सज्झायं करेत्ता जाव अडमाणा तव गेहं अणुप्पविट्ठा । तं णो खलु देवाणुप्पिए ते चेव णं अम्हे । अम्हे णं अण्णे ! देवइं देविं एवं वय? वइत्ता, जामेव दिसं पाउन्भूए तामेव दिसं पडिगए। सूत्र ११: देवकी द्वारा इस प्रकार का प्रश्न पूछे जाने पर वे मुनि देवकी देवी से इस प्रकार बोले-हे देवानुप्रिये ! ऐसी बात तो नहीं है कि कृष्ण वासुदेव की इस यावत् प्रत्यक्ष देवलोक के समान द्वारका नगरी में श्रमण निर्ग्रन्थों को उच्च-नीच-मध्यम कुलों में भ्रमण करते हुए आहार पानी प्राप्त नहीं होता है । और न मुनिजन आहार-पानी के लिए उन घरों-कुलों में दूसरी-तीसरी बार जाते हैं । हे देवानुप्रिये ! वास्तव में बात इस प्रकार है । भद्दिलपुर नगर में हम नाग गाथापति के पुत्र और उनकी सुलसा भार्या के आत्मज छः सहोदर भाई हैं । पूर्णतः समान आकृति एवं समान रूप वाले नलकूबर के समान हैं । हम छहों भाइयों ने अरिहंत अरिष्टनेमि का उपदेश सुनकर और उसे धारण अन्तकृद्दशा सूत्र : तृतीय वर्ग Page #102 -------------------------------------------------------------------------- ________________ कर संसार के भय से उद्विग्न एवं जन्म-मरण से भयभीत हो मुण्डित होकर श्रमण धर्म की दीक्षा ग्रहण की है । हमने जिस दिन दीक्षा ग्रहण की थी, उसी दिन अरिहंत अरिष्टनेमि को वन्दन नमन किया और वन्दन नमस्कार कर इस प्रकार का अभिग्रह धारण करने की आज्ञा चाही । “हे भगवन् ! आपकी अनुमति प्राप्त होने पर जीवन पर्यन्त बेले-बेले की तपस्यापूर्वक अपनी आत्मा को भावित करते हुए विचरना चाहते हैं ।' तब प्रभु ने कहा-"देवानुप्रियो ! जिससे तुम्हें सुख हो, वैसा करो, प्रमाद मत करो ।' हे देवानुप्रिये ! उसके बाद अरिहंत अरिष्टनेमि की अनुज्ञा प्राप्त होने पर हम जीवन भर के लिए निरंतर बेले-बेले की तपस्या करते हुए विचरने लगे । तो इस प्रकार आज हम छहों भाई बेले की तपस्या के पारणा के दिन प्रथम प्रहर में स्वाध्याय करने तथा द्वितीय प्रहर में ध्यान करने के पश्चात् तृतीय प्रहर में प्रभु अरिष्टनेमि की आज्ञा प्राप्त कर तीन संघाटकों में भिक्षार्थ उच्च-मध्य्यम एवं निम्न कुलों में भ्रमण करते हुए तुम्हारे घर आ पहुँचे तो देवानुप्रिये ! ऐसी बात नहीं है कि जो पहले दो संघाटकों में मुनि तुम्हारे यहाँ आये थे, वे हम ही हैं । वस्तुतः हम दूसरे हैं । उन मुनियों ने देवकी देवी को इस प्रकार कहा, और यह कहकर वे जिस दिशा से आये थे, उसी दिशा की ओर लौट गये । Maxim 11 : This question of Devaki was answered by the sages in these words-O beloved as gods ! The position is not like this, that sages could not get food and water from high-lowmiddle-class houses of this city of Krsna Vāsudeva, which is like heaven abode nor ihe sages go over and again () the same house for their nei:! of food and water. अष्टम अध्ययन Page #103 -------------------------------------------------------------------------- ________________ O beloved as gods ! The fact is like this. We six are uterine brothers, sons of Nāga Gathāpati and his wife Sulasā, inhabitant of city Bhaddilapura. We all six brothers are just alike regarding age, colour, body-formation etc., and looked like-(resembled) Nalakūbara. We all six brothers heard sermon of Arihanta Aristanemi, took it to heart and being frightened from the cycle of births and deaths-the world, we accepted consecration and are practising sagehood. The day we all six brothers accepted consecration, we bowed down and worshipped Arihanta Aristanemi and expressed our utter wish in these words-"O Bhagawan ! by your permission we wish to wander with you observing two days' fast penance (and third day to take food) (BeleBele tapasyā) till life, thus purifying our souls.” Then Bhagawāna permitting us saidą“O beloved as gods ! Do as you feel happy; but do not delay. O beloved as gods (Deváki) ! obtaining the permission of Arihanta Aristanemi, we began to wander practising belebele austerity Thus, today is the day of breaking fast of six meals, of all six brothers. During the first prahara (three hours) of day we studied scriptures and in second prahara meditated and in the third prahara taking the permission of Arihanta Aristanemi, we made three groups of two monks each and wandering for seeking food and water in high-low-middle class houses of the city approached to your palace. O beloved as gods ! It is not a fact that we are the monks who came to you in two former groups, but it is true that we are others. Those monks said such to Devaki and returned back in the direction they had come. 97: तए णं तीसे देवईए देवीए अयमेयारूवे अज्झथिए जाव समुप्पण्णे ! अन्तकृद्दशा सूत्र : तृतीय वर्ग Page #104 -------------------------------------------------------------------------- ________________ एवं खलु अहं पोलासपुरे णयरे अइमुत्तेणं कुमारसमणेणं बालत्तणे बागरिया - तुमं णं देवाणुप्पिए ! अट्ठपुत्ते पयाइस्ससि सरिसए जाव नलकुब्बरसमाणे णो चेव णं भारहेबासे अण्णाओ अम्मयाओ तारिसए पुत्ते पयाइस्संति । तं णं मिच्छा ? इमं णं पच्चक्खमेव दिस्सइ भारहे बासे अण्णाओ वि अम्मयाओ खलु एरिसए जाव पुत्ते पयायाओ । तं गच्छामि णं अरहं अरिट्ठणेमं वंदामि णमंसामि, वंदित्ता णमंसित्ता इमं च णं एयारूवं वागरणं पुच्छिस्सामि त्ति कट्टु एवं संपेइ संपेहित्ता को बियपुरिसे सद्दाas सद्दावित्ता एवं वयासी - लहु करण णप्पवरं जाव धम्मियं जाणप्पवरं उवट्टेवेति जहा देवाणंदा जाव पज्जुवासइ । सूत्र १२ : इस प्रकार की बात सुनकर ( मुनियों के लौट जाने के पश्चात् ) देवकी के मन में इस प्रकार की विचार तरंगें उत्पन्न हुईं । एक बार पोलासपुर नगर में अतिमुक्त कुमार नामक श्रमण ने मेरे समक्ष बचपन में इस प्रकार भविष्यवाणी की थी कि - हे देवानुप्रिये देवकी ! तुम, एक दूसरे के पूर्णतः समान ( सरीखे ) आठ पुत्रों को जन्म दोगी, जो नलकूबर के समान होंगे । भरतक्षेत्र में दूसरी कोई माता वैसे पुत्रों को जन्म नहीं देगी । क्या यह भविष्यवाणी आज मिथ्या सिद्ध हुई ? क्योंकि यह प्रत्यक्ष ही दीख रहा है कि भरतक्षेत्र में अन्य माताओं ने भी सुनिश्चित रूपेण ऐसे एक समान छह सुन्दर पुत्रों को जन्म दिया है । ( मुनि की बात मिथ्या नहीं होनी चाहिए, फिर यह प्रत्यक्ष में उससे विपरीत क्यों ? विचारों की इस उथल-पुथल में देवकी ने निर्णय किया ) " ऐसी स्थिति में मैं अरिहन्त अरिष्टनेमि भगवान की सेवा में जाऊँ, उन्हें वन्दन नमस्कार करूँ, और वन्दन नमस्कार करके अतिमुक्तक मुनि के कथन के विषय में प्रभु से पूछूं” देवकी ने इस प्रकार सोचा, ऐसा सोचकर देवकी ने अपने आज्ञाकारी पुरुषों " अष्टम अध्ययन • ६५ For Private Personal Use Only Page #105 -------------------------------------------------------------------------- ________________ को बुलाया और बुलाकर कहा - " शीघ्र ही लघुकर्ण वाले (शीघ्रगामी) श्रेष्ठ धर्म रथ को तैयार करके लाओ ।" आज्ञाकारी पुरुषों ने रथ उपस्थित किया । देवकी महारानी तैयार होकर उस रथ में बैठीं और प्रभु के समवशरण में उपस्थित हुईं । देवानन्दा द्वारा जिस प्रकार भगवान महावीर की पर्युपासना किये जाने का वर्णन है, उसी प्रकार महारानी देवकी भगवान अरिष्टनेमि के दर्शन कर पर्युपासना करने लगी । Maxim 12 : Hearing this episode and after the departure of the sages, the mind of Devaki was engrossed by these thought currents. Once, in my childhood, in Polāsapura city sage Atimukta foretold about me that Devaki, the beloved as gods! you will give birth to eight sons, they will resemble each other and would be handsome like Nalakūbara. In this Bharatakṣetra, no other mother will give birth to such sons. Has this forecast proved false to-day ? It is clearly evident that other mothers have also given birth to such resembling sons. (But forecast of sage must not be wrong. Why this controversy before my eyes? During the up and down of thoughts) Devaki determined that I should go to Arihanta Aristanemi, bow down and worship him and doing thus, ask about the forecast of sage Atimukta. Devaki thought like this and as such she called the family servants and ordered them-"Bring forth quickly the stately religious chariot (ratha) with all equipments.” Family servants presented the chariot immediately. Queen Devaki sat in that chariot and approached the religious congregation of Aristanemi. As we get the description of worshipping Bhagawana Mahavira, by Devanandă in the same way Devaki began to worhip Arihanta Aristanemi. ६६ • For Private Personal Use Only अन्तकृद्दशा सूत्र : तृतीय वर्ग Page #106 -------------------------------------------------------------------------- ________________ . L Abond Swaroo देवकी चिन्ता मग्न . " HERE धर्म रथ में 40 RAN c का । . . AN THESIDE TOBER PRESEAS HALEE - 11-1 Srik. Page #107 -------------------------------------------------------------------------- ________________ 4N 17 ॥॥ ॥॥ ॥ ॥ ॥ ॥ ॥॥ ॥॥ ॥॥ ) )) ) ) ) )) )) चित्रक्रम १0 : रानी देवकी की शंका तथा भगवान के समक्ष पृच्छा दृश्य १-मुनियों के चले जाने के पश्चात् देवकी चिन्तन-मग्न होकर सोचती है, मुझे बचपन में श्रमण अतिमुक्तक ने कहा था-इस भरतक्षेत्र में तुम नलकूबर के समान सुन्दर एक जैसे आठ पुत्रों की माता बनोगी। ऐसे म पुत्रों को भरतक्षेत्र में अन्य कोई माता जन्म नहीं देगी, तो क्या मुनि की वाणी असत्य सिद्ध हो गई ? ये छह सहोदर बंधु भी नलकूबर के समान एक जैसे हैं और इन मुनियों ने बताया कि इनकी माता, नाग गाथापति की भार्या सुलसा है...वास्तव में क्या यही सत्य है? दृश्य २-संशयशील होकर माता देवकी धर्म रथ पर आरूढ़ होकर भगवान अरिष्टनेमि से छहों सहोदर बंधु अणगारों की चर्चा करके श्रमण अतिमुक्तक की भविष्य वाणी के विषय में शंका करती है। भगवान अरिष्टनेमि द्वारा समाधान। (वर्ग ३/अध्य. ८) 卐555555555555555555555555555555555544))))) Illustration No. 10 : Suspicion of queen Devaki and asking from Bhaganāna Scene !. Alter departing sages, Devaki thinks deeply-When I was merely a lass, monk Atimuktaka said to me-you would be the mother of eight sons, beautiful like Nalakūbara in this Bharataksetru (Bhürata-Indi:). No other woman shall give birth to such sons. Have these words of monk proved false ? These six uterin, brother sages are alike and like Nalakūbaru and these sages told that their mother is Sulasā, wife of Nāga trader. Is it really true ? Scene 2. Being doubtful, mother Devaki riding the religious chariot approaches Bhagawāna and after discussing about six uterine brother Sriges, expresses her suspicion about the words of monk Arimuktaka. Bhagawāna pacifies her curiosity. (Sec. 3/Ch. 8) अन्तकृद्दशा सूत्र : चित्र परिचय Page #108 -------------------------------------------------------------------------- ________________ विवेचन 'अइमुत्तेणं कुमार समणेणं" पाठ से यहाँ अभिप्राय है अतिमुक्त नामक कुमार श्रमण की भविष्यवाणी से । घटना इस प्रकार है । "" अतिमुक्त कुमार श्रमण कर के छोटे भाई थे । जिस समय कंस की पत्नी जीवयशा अपनी छोटी ननद देवकी के साथ क्रीड़ा कर रही थी उस समय अतिमुक्त कुमार जीवयशा के घर में भिक्षा के लिए गये थे । आमोद-प्रमोद में मग्न जीवयशा ने अपने देवर को मुनि के रूप में देखकर उपहास करना प्रारम्भ किया । वह बोली - " देवर जी ! आओ तुम मेरे साथ क्रीड़ा करो, इस आमोद-प्रमोद में तुम भी भाग लो ।” इस पर मुनि अतिमुक्त कुमार जीवयशा से कहने लगे - "जीवयशे ! जिस देवकी के साथ तुम इस समय क्रीड़ा कर अपने भाग्य पर इतरा रही हो, भविष्य में इस देवकी के गर्भ से आठ पुत्र उत्पन्न होंगे । ये पुत्र इतने सुन्दर और पुण्यात्मा होंगे कि भारतवर्ष में किसी स्त्री के ऐसे पुत्र नहीं होंगे । परन्तु इस देवकी का सातवाँ पुत्र तेरे पति को मारकर आधे भारतवर्ष पर राज्य करेगा ।" यह बात देवकी देवी ने बचपन में सुनी थी । अतः इसी के समाधान हेतु उसने भगवान अरिष्टनेमि के पास जाने का निश्चय किया । • जहा देवाणंदा जाव पज्जुवासइ माता देवकी का भगवान की सेवा में जाने का वर्णन भगवती सूत्र शतक ९ उद्देशक ३३ में वर्णित माता देवानन्दा की दर्शन यात्रा के समान बतलाया गया है । अर्थात् देवकी धार्मिक रथ में बैठकर द्वारका के मध्य बजारों में होती हुई नन्दन वन में पहुंची । भगवान के अतिशय को देखकर रथ से नीचे उतरी और पाँच अभिगम करके समवशरण में जाकर भगवान को विधिवत् वन्दना नमस्कार करके सेवा पर्युपासना करने लगी । 1. The clause Aimutteṇam Kumāra Samaṇeṇam here indicates the forecast of Atimukta Kumāra-sage. The tale goes like this : Elucidation Atimukta Kumara-sage was the younger brother of Kamsa. When the wife of Kamsa, Jivayaśā was making amusements with Devaki (the younger sisterin-law) at that time Atimukta Kumāra-sage reached the house of Jivayaśā for ६७ • अष्टम अध्ययन For Private Personal Use Only Page #109 -------------------------------------------------------------------------- ________________ seeking food and water. Envolved in rejoicings Jivayaśā, saw Atimula Kumāra-sage, took in view the past relation of brother-in-law, and began to jol She said-''Brother-in-law ! You also come and participate in amusements at rejoicings." Then Atimukta Kumāra-sage said-Jivayaśā ! Now you are rejoicing wil Devaki thinking yourself much fateful; but in future Devaki will give birth to eig sons. These sons would be such beautiful and fateful that no other woman Bharat-Varsa (India) can produce such sons. But the seventh son of this Deva will murder your husband and rule over half of Bhārata-varsa (India). Deva listened this fact in her childhood. For ascertaining this, queen Devaki decided go to Bhagawāna Arişíanemi. Jahā Devăņandā jāva pajjuvāsaï...... Description of Devaki going to Bhagawāna Aristanemi is told like going te see Bhagawana Mahāvīra by Devanandā, which we get in Bhagavati Sūtra Sataka 9, Uddesaka 33. Meaning-Devaki sitting in religious chariot, going through the main markets of Dwarakā approached Nandana-vana. Seeing the felicitations of Bhagawāna, she practised five Abhigamas and then reaching the religious assembly of Bhagawana bowed down to him in due order and began to praise and worship him. सूत्र १३ : तए णं अरहा अरिटेणेमी देवईं देविं एवं बयासी-से नूणं तव देवई ! इमे छ अणगारे पासित्ता अयमेयारूवे अज्झथिए जाव समुप्पज्जित्था । एवं खलु पोलासपुरे णयरे अइमुत्तेणं तं चेव जाव णिग्गच्छसि, णिग्गच्छित्ता जेणेव मम अंतियं हव्यमागया। से णूणं देवई देवी ! अयमढे समढे ? हंता ! अस्थि । एवं खलु देवाणुप्पिए ! तेणं कालेणं तेणं समएणं भद्दिलपुरे णयरे, णागे णामं गाहावई परिवसइ, अड्ढे । तस्सणं णागस्स गाहावइस्स सुलसा णामं भारिया होत्था । सा सुलसा-गाहावइणी बालत्तणे चेव णिमित्तिएणं वागरिया-एस णं दारिया अन्तकृदशा सूत्र : तृतीय वर्ग Page #110 -------------------------------------------------------------------------- ________________ णिंदू भविस्सई । तए णं सा सुलसा बालप्यभिदं चैव हरिणेगमेसि देवभत्ता यावि होत्था । हरिगमेसिस्स पडिमं करेइ, करित्ता कल्लाकल्लिं पहाया जाय पायच्छित्ता उल्लपड-साडया महरिहं पुप्फच्चणं करेइ, करित्ता जाणुपायवडिया पणामं करेइ, तओ पच्छा आहारेइ वा णीहारेइ वा वरइ वा । १३ : तदनन्तर अर्हन्त अरिष्टनेमि देवकी को सम्बोधित कर इस प्रकार बोलेहे देवकी ! क्या इन छः साधुओं को देखकर वस्तुतः तुम्हारे मन में इस प्रकार का विचार या संशय उत्पन्न हुआ कि पोलासपुर नगर में अतिमुक्तकुमार श्रमण ने तुम्हें आठ अद्वितीय पुत्रों को जन्म देने का जो भविष्यकथन किया था, वह मिथ्या सिद्ध हुआ ऐसा प्रत्यक्ष दिखाई दे रहा है ? अतः उस विषय में पृच्छा करने के लिए तुम जल्दी-जल्दी यहाँ चली आई हो । हे देवकी ! क्या यह बात ठीक है ? देवकी ने कहा- हाँ भगवन् ! ऐसा ही है । प्रभु अरिष्टनेमि ने शंका समाधान करते हुए कहा - हे देवानुप्रिये ! उस काल उस समय में भद्दिलपुर नगर में नाग नाम का गाथापति रहता था, जो आढ्य (महान ऋद्धिशाली ) था । उस नाग गाथापति की सुलसा पत्नी थी । उस सुलसा गाथापत्नी को बाल्यावस्था में ही किसी निमित्तज्ञ ने कहायह बालिका निंदू (मृतवत्सा) यानि मृत बालकों को जन्म देने वाली होगी । इस कारण सुलसा बाल्य काल से ही हरिणगमेषी देव की भक्त बन गई । सुलसा ने हरिणगमेषी देव की मूर्ति बनाई । मूर्ति बनाकर प्रतिदिन प्रातःकाल स्नान करके यावत् दुःस्वप्न निवारणार्थ प्रायश्चित्त (शुद्धि) कर गीली साड़ी पहने हुए उसकी बहुमूल्य सुन्दर पुष्पों से अर्चना करती । पुष्पों द्वारा पूजा के पश्चात् घुटने टिकाकर (पाँचों अंग नमाकर) प्रणाम करती, तदनन्तर आहार नीहार आदि अपने अन्य कार्य करती थी । अष्टम अध्ययन For Private Personal Use Only ६९ • Page #111 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Maxim 13 : Thereafter Arihanta Aristanemi addressing queen Devaki spoke thus unto her-O Devaki ! Did such suspicion and thought arise in your mind, that the forecast about you done by Atimukta Kumāra-sage that you will give birth to eight matchless sons, proved false ? In this regard, for asking and being sure, you have come quickly here. Is it correct ? Devaki accepted-O Bhagawan ! It is correct. Bhagawāna Aristanemi removing the doubt, began to speakO beloved as gods ! At that time and at that period, a gāthāpatī named Nāga lived in Bhaddilapura. He was very rich. Sulasă was his wife. An astrologer told about Sulasā, when she was in childhood that this girl would give birth to deceased children, On account of this, Sulasă became the devotee of Hariņagameșī god. Sulasă made an image of Hariņagameși god. Every morning she bathed, repented for ill-dreams and worshipped god by fragrant, beautiful flowers of great value, wearing all the time drenched robe. After worship she fell on her knees and bowed down; then she used to do the work of household, food etc. सूत्र १४: तए णं तीसे सुलसाए गाहावइणीए भत्ति-बहुमाण सुस्सूसाए हरिणेगमेसी देवे आराहिए यावि होत्था । तए णं से हरिणेगमेसी देवे सुलसाए गाहावइणीए अणुकंपणट्ठाए सुलस गाहावइणिं तुमं च णं दोण्णि वि समउउयाओ करेइ । तए णं तुब्भे दो वि सममेव गब्भे गिण्हह, सममेव गब्भे परिवहह, सममेव दारए पयायह । तए णं सा सुलसा गाहावइणी विणिहायमावण्णे दारए . ७० . अन्तकृद्दशा सूत्र : तृतीय वर्ग Page #112 -------------------------------------------------------------------------- ________________ मऊ:5卐5555555555))))) $$$$$乐5FFF$$$$$ चित्रक्रम ११ : अर्हत् अरिष्टनेमि के द्वारा रहस्योद्घाटन देवकी रानी के पूछने पर अर्हत् अरिष्टनेमि ने बताया कि भहिलपुर निवासी नाग गाथापति की पत्नी सुलसा को किसी ने कहा था कि वह मतवत्सा होगी, अत: वह बाल्यकाल से ही गीली साड़ी पहनकर बहुमूल्य पप्पों आदि से हरिणगमैषी देवता की भक्ति करने लगी। हरिणगमैषी देव मलया की अनुकम्पा के लिए कंस के कारागार में जन्मे तुम्हारे जीवित पुत्रों को उठाकर उसके पास रख देता था और उसकी मृत सन्तान को तुम्हारे पाय लाकर रख देता, जिससे तुम्हें लगता कि तुमने मृत सन्तान को जन्म टिया है। वास्तव में ये छहों सहोदर श्रमण तुम्हारे ही आत्मज हैं। (वर्ग ३/अध्य. ८) $$$$$$$$$$$$$$$ $$$$$$$$ $55 Illustration No. 11 : Hi The secret revealed by Arhat Aristanemi At the curiosity of queen Devaki, Arhat Aristanemi 15 told-Somebody fore-told Sulasā, wife of Nāga trader, resident of Bhaddilapura, that you will give birth to still (dead) sons. Therefore from her childhood she began to offer valuable flowers to god Harinagamaisī with great devotion wearing drenched robe (sari), Harinagamaisi pleased. Having pity on Sulasā, god Harinagamaisī used to put your alive sons you give birth to in the prison of Kansa beside Sulasā and her still sons beside you. So you felt that you have given birth to siul sons. Really these six uterine brother friars are your own sons. (Sec. 3/Ch. 8) 中牙牙牙牙牙牙牙牙牙牙牙乐5555555555555556 अन्तकृद्दशा सूत्र : चित्र परिचय Page #113 -------------------------------------------------------------------------- ________________ PAL देवकीका RIES YYAKAMANA सुलसा द्वारा देव की भक्ति ODISPENSAR F - AM . . an कारागार में पुत्र जन्मः मा SH AMALAK2 R HEETA J Page #114 -------------------------------------------------------------------------- ________________ पयायइ । तए णं से हरिणेगमेसी देवे सुलसाए अणुकंपणट्टाए विणिहायमावण्णए दारए करयल - संपुडेणं गिण्हइ । गिण्हित्ता तव अंतियं साहरइ । साहरइत्ता तं समयं च णं तुम णवण्हं मासाणं सुकुमाल दारए पसवसि । जे वि य णं देवाणुप्पिए ! तव पुत्ता ते वि य जाव अंतियाओ करयलसंपुडेणं गिues, गिण्हित्ता सुलसाए गाहावइणीए अंतिए साहरइ । तं तव चेव णं देवइ ! ए ए पुत्ता । णो चेव णं सुलसाए गाहावइणीए । सूत्र १४ : तब सुलसा गाथापत्नी की उस भक्ति (अनुराग) बहुमान-सन्मान सत्कार पूर्वक की गई सेवा-शुश्रूषा से देवता प्रसन्न हुआ । हरिणगमेषी देव, सुलसा गाथापत्नी पर अनुकम्पा करने हेतु सुलसा गाथापत्नी को तथा तुम्हें दोनों को समकाल में ऋतुमति (रजस्वला) करता । तब तुम दोनों समकाल में गर्भ धारण करतीं और समकाल में ही बालक को जन्म देतीं । तब हरिणगमेषी देव सुलसा पर अनुकम्पा करने के लिए उसके मृत बालक को सावधानी पूर्वक दोनों हाथों में लेता और लेकर तुम्हारे पास ले आता । इधर उस समय तुम भी नवें मास का काल पूर्ण होने पर सुकुमार बालक को जन्म देती थीं । हे देवानुप्रिये ! जो तुम्हारे पुत्र होते उनको भी हरिणगमेषी देव तुम्हारे पास से अपने दोनों हाथों में ग्रहण करता और उन्हें ग्रहण कर सुलसा गाथापत्नी के पास लाकर रख देता था । अतः वास्तव में हे देवकी ! ये तुम्हारे ही आत्मज पुत्र हैं, सुलसा गाथा पत्नी के नहीं हैं । Maxim 14 : The god was pleased with Sulasă by her such devotion, respect and service. On account of compassion for Sulasă अष्टम अध्ययन For Private Personal Use Only ७१ Page #115 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Gāthāpatni god Hariņagameși menstruated both-you and her at the same time. Then at the same time you and she become pregnant and both gave birth to sons at the same (after completing the pregnancy period of nine months) time. Then god Harinagamesi-used to take the still (deceased) child of Sulasā and keep that beside you. O beloved as gods ! Like this the god carefully took your alive son and kept in the lap of Sulasā housewife. Devaki ! Therefore, actually these six monks are your sons and not of Sulasā. सूत्र १५ : तए णं सा देवई देवी अरहओ अरिढणेमिस्स अंतिए एयमटुं सोचा णिसम्म हट्टतुट्ठ जाव हियया, अरहं अरिट्ठणेमिं वंदइ णमंसइ । वंदित्ता णमंसित्ता जेणेव ते छ अणगारा तेणेव उवागच्छइ, उवागच्छित्ता ते छप्पि अणगारे वंदइ णमंसइ । वंदित्ता णमंसित्ता आगयपण्हुया पप्फुल्ललोयणा कंचुय-परिविवत्तिया दरियवलय-बाहाधाराहय-कलंब-पुप्फगविव समूससिय-रोमकूवा ते छप्पि अणगारे अणिमिसाए दिट्ठीए पेहमाणी पेहमाणी सुचिरं णिरिक्खइ । णिरिक्खित्ता वंदइ णमंसइ । वंदित्ता णमंसित्ता जेणेव अरहा अरिट्ठणेमी तेणेव उवागच्छई, उवागच्छित्ता अरहं अरिदृणेमिं तिक्खुत्तो आयाहिणं पयाहिणं करेइ, करित्ता वंदइ णमंसइ, वंदित्ता णमंसित्ता तमेव धम्मियं जाणप्पवरं दुरूहइ, दुरूहित्ता जेणेव बारवई णयरी तेणेव उवागच्छइ, उवागच्छित्ता बारवई णयरिं अणुप्पविसइ । अणुप्पविसित्ता जेणेव सए गिहे, जेणेव बाहिरिया उवट्ठाणसाला तेणेव उवागच्छइ, उवागच्छित्ता धम्मियाओ जाणप्पवराओ पच्चोरुहइ, अन्तकृद्दशा सूत्र : तृतीय वर्ग • ७२ . Page #116 -------------------------------------------------------------------------- ________________ पच्चोरुहित्ता जेणेव सए वासघरे, जेणेव सए सयणिज्जे तेणेव उवागच्छइ उवागच्छित्ता, सयंसि सयणिज्जसि णिसीयइ । १५ : तव उस देवकी देवी ने अरिहंत अरिष्टनेमि के मुखारविन्द से इस प्रकार रहस्य उदघाटित करने वाली बात सुनकर हृदयंगम की । संतुष्ट एवं प्रसन्न चित्त होकर अरिहंत अरिष्टनेमि भगवान को वन्दन नमस्कार किया और वन्दन नमस्कार करके वे छहों मुनि जहाँ विराजमान थे, वहाँ आई । आकर उसने उन छहों मुनियों को वन्दन किया । वन्दन नमस्कार करके देवकी छहों अणगारों को अपलक देखने लगी । उन अणगारों को देखकर उसके हृदय में, पुत्र-प्रेम उमड़ पड़ा । उसके स्तनों से दूध झरने लगा । हर्ष के कारण उसकी आँखें विकसित हो गयीं और खुशी के आँसू भर आये । अत्यन्त हर्ष के कारण शरीर फूलने से उसकी कंचुकी की कसं टूट गईं और भुजाओं के आभूषण तथा हाथ की चड़ियाँ तंग हो गईं । जिस प्रकार वर्षा की धारा पड़ने से कदम्ब पुष्प एक याथ विकसित हो जाते हैं, उसी प्रकार उसके शरीर के सभी रोम-रोम पुलकित हो गये । वह उन छहों मुनियों को निर्निमेष दृष्टि से देखती हुई चिरकाल तक निरखती ही रही । फिर स्वयं को संभालकर उसने छहों मुनियों को वन्दन नमस्कार किया । वन्दन नमस्कार करके वह जहाँ भगवान अरिष्टनेमि विराजमान थे, वहाँ आई और आकर अहँत् अरिष्टनेमि को तीन बार प्रदक्षिणा करके वन्दन नमस्कार किया । वन्दन नमस्कार करके उसी धार्मिक श्रेष्ट रथ पर आरूढ़ हुई । रथारूढ़ हो, जहाँ द्वारका नगरी है, वहाँ आयी और वहाँ आकर द्वारका नगरी में प्रविष्ट हुई। देवकी द्वारका नगरी में प्रवेश कर जहां अपने प्रासाद के बाहर की उपस्थानशाला अर्थात वैठक थी वहाँ आयी, वहाँ आकर धार्मिक रथ से अष्टम अध्ययन Page #117 -------------------------------------------------------------------------- ________________ नीचे उतरी, नीचे उतरकर जहाँ अपना वास गृह (निवास कक्ष) था, जहाँ अपनी शय्या थी, वहाँ आयी, वहाँ आकर अपनी शय्या पर बैठ गयी । Maxim 15 : Then Devaki Devi, listening the secret disclosed by Arihanta Aristaneni, became glad. She bowed down, praised and worshipped him and reached the six monks and bowed down and worshipped them. Devaki gazed at those sages for a long time. Her heart filled with motherly affection. Her breasts began to milch. Due to joy her eyes streamed and filled with tears of happiness. Her body spread out so the binding threads of her brassiere broke up, her bracelets splitted on her arms, the root-cells of her hair swelled like kadamba flowers beaten by rain showers. She observed those six monks with unwinking eyes for a long time. Then Devaki brought herself to her senses and again bowed down to all the six sages. Thereafter she came to Arihanta Aristanemi, circumanbulating thrice she bowed down to him with devotion and went out of the religious assembly. She sat in her religious chariot, reached Dwarakā city and then her palace. Getting down from chariot she entered her bed-room and sat on her bed. सूत्र १६: तए णं तीसे देवईए अयं अज्झथिए चिंतिए पत्थिए मणोगए संकप्पे समुप्पणे-एवं खलु अहं सरिसए जाव णलकुब्बर-समाणे सत्त पुत्ते पयाया णो चेव णं मए एगस्स वि बालत्तणए समणुभूए । एस वि य णं कण्हे वासुदेवे छण्णं मासाणं ममं अंतियं पायवंदए हव्वमागच्छइ । तं धण्णाओ णं ताओ अम्मयाओ जासिं मण्णे णियग-कुच्छिसंभूयाई थणदुद्धल द्धयाइं महर-समुल्लावयाइं मम्मण-जंपियाइं थणमूल-कक्ख - .७४ अन्तकृद्दशा सूत्र : तृतीय वर्ग Page #118 -------------------------------------------------------------------------- ________________ देसभागं अभिसरमाणाई, मुद्धयाई पुणो य कोमल-कमलोवमेहिं हत्थेहिं गिहिऊण उच्छंगे णिवेसियाई देंति; समुल्लावए सुमहुरे पुणो-पुणो मंजुलप्पभणिए । अहं णं अधण्णा अपुण्णा एत्तो एगयरमवि ण पत्ता (एवं) ओहयमण संकप्पा जाय झियायइ। की को पुत्र अभिलाषा उस समय देवकी को इस प्रकार का विचार, चिन्तन और अभिलाषापूर्ण मानसिक संकल्प उत्पन्न हुआ कि-अहो ! मैंने पूर्णतः समान आकृति वाले यावत् नलकूबर के समान सात पुत्रों को जन्म दिया, पर मैंने एक पुत्र की भी वाल्यक्रीड़ा के आनन्द का अनुभव नहीं किया । फिर यह कृष्ण वासुदेव भी छ: महीनों के पश्चात् मेरे पास चरण-वन्दना के लिए भागता दौड़ता आता है । इस संसार में वास्तव में वे माताएं धन्य हैं, जिनकी अपनी कुक्षि से उत्पन्न हुए, स्तनपान के लोभी बालक, मधुर-आलाप करते हुए, तुतलाती बोली से मन्मन बोलते हुए, स्तनमूल कक्षा भाग में इधर से उधर अभिसरण करते घूमते रहते हैं, एवं फिर उन मुग्ध भोले बालकों को जो माताएँ कमल के समान अपने कोमल हाथों द्वारा पकड़ कर गोद में बिठाती हैं, और अपने बालकों से मंजुल-मधुर शब्दों में बार-बार बातें करती हैं । मैं तो निश्चित रूप से अधन्य, अकृतार्थ (असफल) और पुण्यहीन हूँ क्योंकि मैंने इनमें से किसी एक पुत्र की भी बाल-क्रीड़ा नहीं देखी । इस प्रकार देवकी खिन्न मन से हथेली पर मुख रखे उदास होकर आर्तध्यान करने लगी । Son-desire of Devaki Maxim 16 : Then there arose such thinking, thought and mental current in the mind of Devaki-Oh truly I gave birth to seven sons exactly alike (until) resembling Nalakūbara in beauty but अष्टम अध्ययन . ७५ . Page #119 -------------------------------------------------------------------------- ________________ I could not enjoy the childhood plays of even one of them. Even this Krsna comes to me after six months for reverence, but in hurry In this world, really happy and fateful are those mothers, the sons (child) born from their own wombs, greedy for sucking the milk of their breasts, lisping sirectly. babbling and pattling, moving to their armpits from where the breasts arose up, give a sisting in their laps having them by lotus-like hands, give sweet talks and pleasing words. Definitely, I am hapless, meritless and successless; because I have not even visualized the childhood plays of any one of my seven sons. Thus Devaki, putting her check on her palm, drowned in sorrowful thoughts with frustrated mind and hopes. सूत्र १७: इमं च णं कण्हे वासुदेवे ण्हाए जाब विभूसिए देवईए देवीए पायवंदए हव्यमागच्छइ ! तए णं से कण्हे वासुदेवे देवइं देविं पासइ पासित्ता देवईए देवीए पायग्गहणं करेइ करित्ता देवइं देवि एवं वयासीअण्णया णं अम्मो ! तुब्भे ममं पासित्ता हट्ठ जाव भवह, किण्णं अम्मो ! अज्ज तुब्भे ओहय मण संकप्पा जाव झियायह । तए णं सा देवई देवी कण्हं वासुदेवं एवं वयासी-एवं खलु अहं पुत्ता ! सरिसए जाव नलकुब्बर समाणे सत्त पुत्ते पयाया । णो चेव णं मए एगस्स वि बालत्तणे अणुभूए । तुम पि य णं पुत्ता ! ममं छह-छह मासाणं अंतियं हव्यमागच्छसि, तं धण्णाओ णं ताओ, अम्मयाओ जाव झियामि । सूत्र १७: देवकी इस प्रकार उदास होकर बैठी थी कि उसी समय वहाँ श्रीकृष्ण वासदेव स्नान कर यावत् वस्त्र अलंकारों से विभूषित होकर देवकी माता ___ अन्तकृद्दशा सूत्र : तृतीय वर्ग .७६ . Page #120 -------------------------------------------------------------------------- ________________ . at E T ERS.. M.IN SWAN . । ANE • TRENOPinted चिन्ता मग्न मातासे| णका प्रश्न RECEIHARI SIC । Semand Page #121 -------------------------------------------------------------------------- ________________ 055555555555555555555555555550 ॐ चित्रक्रम १२ : देवकी का शिशु लालन के लिए आर्तध्यान अर्हत् अरिष्टनेमि से सत्य जानकर देवकी घर आई और उदास होकर सोचने लगी-वे माताएँ धन्य हैं, भाग्यशालिनी हैं, जो अपने शिशु को अपने हाथ से खिलाती हैं, अँगुली पकड़कर चलाती हैं और गोद में लेकर उसका दुलार करती हैं, उसे दूध पिलाती हैं और बार-बार अपने शिशुओं के साथ तोतली बोली बोलती हैं। मैंने सात पुत्रों को जन्म दिया, परन्तु एक की भी वाल-लीला नहीं देखी। यह श्रीकृष्ण वासुदेव भी तो छह-छह महीने से कुछ। क्षण के लिए ही सूरत दिखाने आता है। देवकी इन विचारों में खोई है, तभी श्रीकृष्ण वासुदेव उनकी चरण-वन्दना करने आते हैं। देवकी माता को उदास और अन्यमनस्क देखकर श्रीकृष्णा कारण पूछते हैं। (वर्ग ३/अध्य. ८) 在听听听听听听听听听$55 $ $$$$$$$$$$$$$$$$$$ $$ $$$$听听听听听听F5年 Illustration No. 12 : Painy feelings of Devaki for a baby knowing real fact from Arhar Aristanemi, Devakï returned to her palace and began to think sadly-Fateful are those mothers, who make their babies play with their own hands, make walk them taking their fingers, love them getting them in their laps, feed them by their own breasts, embrace them, speak Tisking and pleasing words with their babies over and over again. I have given birth to seven sons but could not see the childish plays of any one of them. Even this Vasudeva Krsna comes to bow me after six months and that is also for a few minutes. Devaki is deep in such sadful thoughts; at the same time Sri Krsna Vāsudeva comes to rever and bow down at her feet. Seeing mother Devaki sad he asks the reason. (Sec.3/Ch.8) 6 555555555555555556 अन्तकृद्दशा सूत्र : चित्र परिचय Page #122 -------------------------------------------------------------------------- ________________ के चरण वन्दन के लिए शीघ्रतापूर्वक आये । तव कृष्ण वासुदेव देवकी माता के दर्शन करते हैं । दर्शन कर देवकी के चरणों में वन्दन करते हैं । उन्होंने अपनी माता को उदास और चिन्तित देखा तो चरण वन्दन कर देवकी देवी से इस प्रकार पूछने लगेहे माता ! इससे पहले तो मैं जब-जव आपके चरण वन्दन के लिए आता था, तब-तब आप मुझे देखते ही हर्ष से पुलकित एवं आनन्दित हो जाती थीं, पर माँ आप आज उदास, चिन्तित तथा आर्तध्यान में निमग्न सी क्यों दिखाई दे रही हो ? हे माता ! इसका क्या कारण है ? कृपा करके वताइये । कष्ण द्वारा इस प्रकार का प्रश्न पूछे जाने पर देवकी देवी कृष्ण वासुदेव से इस प्रकार कहने लगी हे पुत्र ! वस्तुतः बात यह है कि मैंने एक समान आकार, एक समान रंग-रूप वाले सात पुत्रों को जन्म दिया, परन्तु मैंने उनमें से किसी एक का भी बाल्यकाल अथवा वाल-लीला का अनुभव नहीं किया । पुत्र ! तुम भी छ: छ: महीनों के अन्तर से मेरे पास चरण वन्दन के लिए आते हो । इसीलिए में ऐसा सोच रही हूँ कि वे माताएँ धन्य हैं, पुण्यशालिनी हैं, जो अपनी संतान को स्तनपान कराती हैं, यावत् उनके साथ मधुर आलाप करती हैं, और उनकी वाल-क्रीड़ा के आनन्द का अनुभव करती हैं । मैं अधन्य हूँ, अकृत-पुण्य हूँ । यही सब सोचती हुई मैं उदासीन होकर इस प्रकार का आर्तध्यान कर रही हूँ । Maxim 17 : Thus Devaki was sitting sad-minded. At the same time Krsna Väsudeva, bathed (until) decorated his body with clothes and ornaments, came quickly to mother Devaki for reverence of her feet. Then Vasudeva Krisna saw and howed down at the feet of Devaki. When he saw his mother sad and worried he enquiredO mother! Formerly whenever I came to touch your feet, you always became glad on seeing me; but O mother ! अष्टम अध्ययन .७७ . Page #123 -------------------------------------------------------------------------- ________________ today why are you sad, worried and brooding ? What is its reason ? Please tell me. On this question Devaki began to say unto Krsna Vasudeva-O Son ! really the fact is this that I have given birth to seven sons exactly same in colour, form and body formation, but could not enjoy the childhood days and plays of any single son. You also come to me after six months for touching my feet. Hence I am thinking that those mothers are fateful, who feed their sons by their breasts talk sweetly to them. I am hapless, meritless. Pondering over all this, I am sad, worried and brooding. सूत्र १८: तए णं से कण्हे वासुदेवे देवइं देवि एवं वयासी-मा णं तुडभे अम्मो ! ओहयमण संकप्पा जाव झियायह । अहं णं तहा जवत्तिस्सामि जहा णं ममं सहोदरे कणीयसे भाउए भविस्सइ । त्ति कटु देवइं देविं ताहिं इट्ठाहिं कंताहिं जाव वग्गूहि समासासेइ । समासासित्ता तओ पडिणिक्खमइ पडिणिक्खमित्ता जेणेव पोसहसाला तेणेव उवागच्छइ उवागच्छित्ता जहा अभओ णवरं हरिणेगमेसिस्स अट्ठम भत्तं पगिण्हइ । जाव अंजलिं कटु एवं वसायी-इच्छामि णं देवाणुप्पिया ! मम सहोदरं कणीयसं भाउयं विदिण्णं । श्रीकृष्ण द्वारा चिन्ता निवारण का उपाय सूत्र १८: माता की यह बात सुनकर श्रीकृष्ण वासुदेव ने देवकी देवी से इस प्रकार कहा-हे माताजी ! आप उदास अथवा चिन्तित होकर अब आर्तध्यान मत करो । मैं ऐसा प्रयत्न करूँगा कि जिससे मेरे एक सहोदर छोटा भाई होगा । . ७८ . अन्तकृद्दशा सूत्र : तृतीय वर्ग Page #124 -------------------------------------------------------------------------- ________________ 55 फफफफफफफ चित्रक्रम १३ : श्रीकृष्ण द्वारा हरिणगमैषी देव की आराधना श्रीकृष्ण वासुदेव ने पौषधशाला में जाकर तेला करके हरिणगमैषी देवता का आह्वान किया। हरिणगमैषी देव आकाश में प्रकट हुआ। श्रीकृष्ण वासुदेव ने कहा- हे देवानुप्रिय ! मेरी माता की इच्छा है कि मुझे एक छोटा भाई प्राप्त हो । (वर्ग ३ / अध्य. ८) Illustration No. 13 : Propiliation of god Harinagamaiși by Śrī Kṛṣṇa Śrī Kṛṣṇa Vasudeva went to oratory (Pausadhaśālā), observed three days' fast penance and called god Harinagamaisi. Harinagamaisi came and remained still in sky. Śrī Kṛṣṇa Vasudeva expressed his desire-Beloved as gods! My mother wishes that I should have one uterine younger brother. 噩 55555555******************** अन्तकृदशा सूत्र : चित्र परिचय ( Sec. 3 / Ch. 8 ) For Private Personal Use Only 卐 卐 卐 5 555555 Page #125 -------------------------------------------------------------------------- ________________ माता की इच्छा की अभिलाषा . P 40... HEARTIME N mpress M Bah RE Lagar : . ae - - CHEMENTIANE - १३ Z Page #126 -------------------------------------------------------------------------- ________________ इस प्रकार कहकर श्रीकृष्ण ने देवकी माता को प्रिय, अभिलषित, मधुर एवं इष्ट कान्त वचनों से धैर्य बंधाया, आश्वस्त किया । इस प्रकार अपनी माता को आश्वस्त कर श्रीकृष्ण माता के आवास से निकले । निकलकर जहां पौषधशाला थी वहां आये। पौषधशाला में आकर जिस प्रकार अभयकुमार ने अष्टम भक्त तप (तेला) स्वीकार करके अपने देवता की आराधना की थी, उसी प्रकार श्री कृष्ण वासुदेव भी तेला करके हरिणैगमेषी देव की आराधना करने लगे । आराधना से आकर्षित होकर वह दिव्य रूप एवं विशिष्ट कान्तिवाला हरिणैगमेषी देव अन्तरिक्ष में कृष्ण वासुदेव के सम्मुख उपस्थित हुआ और श्रीकृष्ण वासुदेव से बोला-हे देवानुप्रिय ! मैं हरिणगमेषी देव हूं। अष्टम भक्त तप करके आपने मुझे क्यों याद किया? आपकी आराधना से आकृष्ट हुआ मैं उपस्थित हूँ। कहिये, क्या इच्छा है ? आपका क्या मनोरथ है ? मैं आपके किस शुभ कार्य में सहायता कर सकता हूँ ? । तब श्रीकृष्ण वासुदेव ने दोनों हाथ जोड़कर उस देव से कहा-हे देवानुप्रिय ! मेरे एक सहोदर लघुभ्राता का जन्म हो, यह मेरी इच्छा है । Worry-Preventive device by Srikrsna Maxim 18 : Hearing this expression and knowing the desire of mother, Srikrsna Vasudeva said-O mother ! Do not be sad, worried and brood, I shall so strive that my uterine brother will take birth. Thus saying Srikrsna assured his mother Devaki with sweet, pleasing and agreeable words. Thus assuring his mother, Śrīkrsna came out of the palace and reached oratory (Pausadhaśālā). As Abhaya Kumāra propiliated his god accepting three days' fast penance, in the same way Śrīkysna Väsudeva, accepting three days' fast penance began to propiliate god Harinagamesi. अष्टम अध्ययन . ७९ . Page #127 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Having divine form and unique lustre god Harinagameși, attracted by propiliation came and staying in sky became present before Kṛṣṇa Vasudeva and spoke thus-O beloved as gods! I am god Harinagameși. Why you have called me by eight meals fast austesity. Attracted by your penance I am present before you. Tell me your desire, in which good deed of yours can I help you? What is your wish? Then Śrīkṛṣṇa Vasudeva spoke to god with folded hands-O beloved as gods! My one uterine brother should take birth, it is my wish. विवेचन अभयकुमार की भांति श्रीकृष्ण वासुदेव ने हरिणगमेषी देवता की आराधना की और एक छोटा भाई प्राप्त करने की इच्छा जताई। अभयकुमार का वर्णन ज्ञातासूत्र अ. १ में मेघकुमार के प्रसंग में आता है । माता धारिणी देवी को अ-समय में वर्षा ऋतु जैसी क्रीड़ा करने का दोहद उत्पन्न हुआ । उसकी पूर्ति के लिए अभयकुमार ने अपने पूर्वभव के मित्र सौधर्मकल्प वासी देवता की आराधना की । आराधना की विधि इस प्रकार है - पौषधशाला मे जाकर तेले का तप किया । पूर्ण ब्रह्मचर्यपूर्वक पौषध किया । सब प्रकार के आभूषण आदि उतार कर घास का संथारा विछाया । अष्टम भक्तपूर्वक मन से हरिणैगमेषी देवता का ध्यान कर आह्वान किया । तेले की पूर्ति के दिन देवता का आसन चलायमान हुआ । उसने अवधिज्ञान के उपयोग से जाना तो उत्तर वैक्रिय समुद्घात करके शीघ्र गति से अन्तरिक्ष में स्वयं आकर उपस्थित हुआ । Jaha Abhao......... Like Abhaya Kumāra, Śrīkṛṣṇa Vasudeva propiliated god Haringameși and expressed his desire for a younger uterine brother. Elucidation Description of Abhaya Kumara, we get in Jñātāsutra, Chapter 1, regarding the episode of Megha kumara. An intense desire arose in the head and heart of mother (really step mother of Abhaya Kumāra) Dhāriņī. While she was अन्तकृद्दशा सूत्र : तृतीय वर्ग ८० For Private Personal Use Only Page #128 -------------------------------------------------------------------------- ________________ pregnant, that I may enjoy rainy season but it was not according to time, because at that time summer was prevailing. For fulfilling the intense desire of pregnant Dhāriņi, Abhaya Kumāra propiliated a god who was residing in Saudharma heaven, but was friend of his (Abhaya Kumāra's) former life. Method of propiliation is thus-Going to oratory (paușadhaśālā) accepted three days' fast penance, practising full celibacy done pausadha (a special vow), putting off all kinds of ornaments, spread a pallet-bed of grass. With eight meals fast putting mind in Hariņagameși god called him by heart. At the last day of three days' fast, the seat of god moved. By clairvoyance he became aware of the fact, then he came with fast speed and presented himself staying in sky, i.e., not touching the ground or remaining four fingers above from the surface of earth. सूत्र १९: तए णं से हरिणेगमेसी देवे कण्हं वासुदेवं एवं वयासी-होहिइ णं देवाणुप्पिया ! तव देवलोयचुए सहोदरे कणीयसे भाउए ! से णं उम्मुक्कबालभावे जाव जोव्वणगमणुप्पत्ते अरहओ अरिट्ठणेमिस्स अंतियं मुण्डे जाव पव्वइस्सइ। कण्हं वासुदेवं दोच्चंपि तच्चंपि एवं वयइ, वइत्ता जामेव दिसं पाउन्भूए तामेव दिसं पडिगए। सूत्र १९: तदनन्तर वह हरिणैगमेषी देव श्रीकृष्ण वासुदेव से इस प्रकार बोला-हे देवानुप्रिय ! देवलोक का एक देव वहां की आयुष्य पूर्ण होने पर देवलोक से च्युत होकर आपके सहोदर छोटे भाई के रूप में जन्म लेगा और इस प्रकार आपका मनोरथ अवश्य पूर्ण जायेगा। परन्तु वह बाल्यकाल बीतने पर युवावस्था प्राप्त होने पर भगवान श्री अरिष्टनेमि के पास मुण्डित होकर श्रमण दीक्षा ग्रहण कर लेगा । उस देव ने श्रीकृष्ण वासुदेव को दूसरी बार, तीसरी बार भी यही बात कही और कहने के पश्चात् जिस दिशा की ओर से आया था उसी दिशा की ओर लौट गया। अष्टम अध्ययन .८१. Page #129 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Maxim 19: Thereafter Hariņagameși god spoke such unto Srikrsna Vasudeva-O beloved as gods ! one god, completing his duration of celestial abode, will take birth as your uterine younger brother, so your desire will be surely fulfilled. But passing boyhood and attaining young age being tonsured he will accept sagehood near Bhagawāna Sri Aristancini. The god said thus twice and thrice to Śrīkrsna Vasudeva and then he went back to the same direction from which he had come. सूत्र २०: तए णं से कण्हे वासुदेवे पोसहसालाओ पडिणिक्खमइ । पडिणिक्खमित्ता जेणेव देवई देवी तेणेव उवागच्छइ । उवागच्छित्ता देवईए देवीए पायग्गहणं करेइ, करित्ता एवं वयासी-होहिइ णं अम्मो ! ममं सहोदरे कणीयसे भाउ त्ति कटु देवइं देविं ताहिं इटाहिं जाव आसासेइ, आसासित्ता जामेव दिसं पाउन्भूए तामेव दिसं पडिगए । तए णं सा देवई देवी अण्णया कयाई तंसि तारिसगंसि सयण्णीजंसि जाव सुत्तजागराए जाव सीहं सुमिणे पासित्ता पडिबुद्धा, जाव हट्ठ-तुट्ट हियया तं गन्भं सुहं सुहेणं परिवहइ । सूत्र २0 : इसके पश्चात् श्रीकृष्ण वासुदेव पौषधशाला से निकले, निकलकर देवकी माता के पास आये और आकर माता का चरण बन्दन किया । चरण वन्दन करके माता से इस प्रकार बोले-“माताजी ! मेरे एक सहोदर छोटा भाई अवश्य होगा । आपकी इच्छा पूरी होगी। अब आप चिन्ता न करें ।' इस प्रकार उन्होंने देवकी माता को मधुर एवं इष्ट वचनों से आश्वस्त किया और आश्वस्त करके जिधर से आये थे, उधर ही वापस स्वस्थान को चले गये। - अन्तकृद्दशा सूत्र : तृतीय वर्ग । Page #130 -------------------------------------------------------------------------- ________________ कालान्तर में एकदा देवकी माता जब पुण्यशाली जन के योग्य सुखशय्या पर सोई हुई थी, तब एक सिंह का स्वप्न देखा । स्वप्न देखकर वह जागृत हई । उठकर राजा वसुदेव जी के पास आई और स्वप्न का वृत्तान्त कहा । इस प्रकार अपने मनोरथ की पूर्णता को निश्चित समझकर देवकी हर्षित एवं प्रसन्न होती हुई सुखपूर्वक अपने गर्भ का परिवहन (पालन-पोषण) करने लगी। laxim 20 : After that Srikrsna Vasudeva came out of oratory and reached mother Devaki. Touching her feet, he said-O mother ! my one uterine brother will surely be born. Your desire will be fulfilled. So you should not worry. Thus he assured mother Devaki by sweet and agreeable words and then went back to the direction from which he had come. Then at any other time mother Devaki was sleeping on a luxurious (worth sleeping meritorious persons) bed, she saw a lion in dream. She woke up, came to king Vasudeva and told him her dream. Thus understanding the fulfilment of desire definitely, she became glad a . happily began to nurture the child in her womb with du can सूत्र २१ : तए णं सा देवई देवी नवहं मासाणं जासुमणा-रत्तबन्धुजीवयंलक्खारस-सरसपारिजातक-तरुणदिवायर-समप्पभं सव्व-नयणकंतं सुकुमालं जाव सुरूवं गयतालुयसमाणं दारयं पयाया । जम्मणं जहा मेहकुमारे जाव । जम्हा णं अम्हे इमे दारए गयतालुसमाणे तं होउ णं अम्हं एयस्स दारयस्स नामधेज्जे गयसुकुमाले । तएणं तस्स दारगस्स अम्मा पियरे नाम करेंति गयसुकुमाले त्ति । सेसं जहा मेहे जाव अलं भोगसमत्थे जाए यावि होत्था। सूत्र २१: तत्पश्चात् नव मास का गर्भकाल पूर्ण होने पर देवकी देवी ने जपा कुसुम, लाल बंधु जीवक पुष्प के समान, लाक्षारस, श्रेष्ठ पारिजात एवं उदीयमान अष्टम अध्ययन Page #131 -------------------------------------------------------------------------- ________________ सूर्य के समान (लाल) रक्त कान्ति वाले सर्वजन-नयनाभिराम, सुकुमाल परिपूर्ण इन्द्रियों वाले, सौम्य आकार वाले गजतालु के समान लाल एवं कोमल रूपवान पुत्र को जन्म दिया । गजस्कमाल के जन्म का वर्णन मेघकुमार के समान समझना चाहिए। (यावत) नामकरण के समय माता-पिता ने सोचा-"क्योंकि हमारा यह बालक गजतालु के समान सुकोमल एवं सुन्दर है । इसलिए हमारे इस बालक का नाम 'गजसुकुमाल" हो ।" इस प्रकार विचार कर बालक के माता-पिता ने उसका नाम “गजसुकुमाल" रखा । शेष वर्णन मेघकुमार के समान समझना चाहिए । इस प्रकार क्रमश: गजसुकुमाल युवावस्था को प्राप्त कर भोग-समर्थ हो गया । Maxim 21 : ..Thereafter, on completion of nine month's pregnancy period, Devaki Devī gave birth to a son, having the beauty of a jasumina-flower, red Bandhujīvaka flower, of lacpigment, best Parijataka flower, red like rising sun, eyesoothing to all persons, tender, with all developed senses, good shapeliness and tendu like an elephant's palate. The description of Gaja Sukumāla (name of newly born son of Devaki) should be known as of Megha Kumāra. (until) At the time of giving name, parents thought that our this child is tender and beautiful like an elephant's palate, so its name should be Gaja Sukumāla. Thinking thus the parents of the child gave him the name Gaja Sukumāla. Remaining description should be known like Megha Kumāra. In this way gradually Gaja Sukumāla became young and capable to enjoy worldly entertainments and rejoicings, pleasures. विवेचन •जा सुमणा-(जपा-सुमण) लाल वर्ण के फूल, अडहुल का फूल । • रत्त बंधुजीवक-दुपहरिया का पौधा । बरसात में इस पर लाल रंग के फूल खिलते हैं । लोक भाषा में इसे वीर बहूटी या इन्द्रगोप भी कहते हैं । .८४ . अन्तकृद्दशा सूत्र : तृतीय वर्ग Page #132 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ASA - स्वपपाले पृच्दा - : NA HOM । SNus RADHEResesame 98THERS BES MOSIMARA Page #133 -------------------------------------------------------------------------- ________________ 生听听听听听听听听听听听听听听听听听听听听听听听听听听听听 # चित्रक्रम १४ : + माता देवकी का स्वप्न-दर्शन, स्वप्न-फल पृच्छा दृश्य १ ---सुख-शय्या में सोई हुई माता देवकी स्वप्न देखती है-एक श्वेत 卐 सिंह उसके उदर में प्रवेश कर रहा है। दृश्य २-जागृत होकर देवकी रानी राजा वसुदेव के शयन-कक्ष में आती है और अपना विचित्र स्वप्न सुनाती है। वसुदेव जी बताते हैं-तुम एक ॐ भाग्यशाली पुत्र की माता बनोगी। दृश्य ३–प्रातःकाल राजसभा में स्वप्न-पाठक को बुलाकर स्वप्न-फल पूछते हैं। स्वप्न-पाठक बताता है-एक सुन्दर पराक्रमी पुत्र का जन्म होगा। राजा स्वप्न-पाठक को पुरस्कार देकर प्रसन्न करते हैं! (वर्ग ३/अध्य. ८) Illustration No. 14 : Dream of mother Devaki and enquiry about its consequences Scene 1. Sleeping at comfortable bed Devaki dreams that a white lion is entering in her abdomen through her mouth. Scene 2. Being awakened Devaki reaches the bed-room of king Vasudeva, tells her astonishing dream to him. Vasudeva tells-You would be mother of a fateful son. Scene 3. In the morning Vasudeva calls a oneirocritic (swapnapäthaka) and asks the result of that dream. He tells that a brave and beautiful son will be born. Ring honours him hy giving reward (Sec. 3/Ch. 8) 生听听听听FFFFFFFFFFFFFFFFFFF5555555 FF 55听听听听听听听F FF5年 4i Boor अन्तकृद्दशा सूत्र : चित्र परिचय Page #134 -------------------------------------------------------------------------- ________________ पास लक्खारस-महावर, तरुण दिवायर-आचार्य अभयदेव के अनुसार यहां तरुण दिवाकर से उदीयमान लाल सूर्य सा लाल रंग अभिप्रेत है । जम्मणं जहा जम्म मेहकुमारे-मेघकुमार के जन्म का वर्णन इस प्रकार हैधारिणी के समान देवकी महारानी के दोहद की पूर्ति होने पर वह सुख-पूर्वक अपने गर्भ का न करने लगी और नौ मास साढ़े सात दिन व्यतीत होने पर उसने एक सुन्दर पुत्र रत्न को जन्म दिया । जिसका जन्म महोत्सव मेघकुमार के समान समझना चाहिए। जन्म की खुशी में१. सूचना देने वाली दासियों को दासता से मुक्त किया और उनको उपहार में विपुल धनराशि प्रदान की। २. नगर को सुगन्धित जल से पवित्र कराया । कैदियों को बन्धन मुक्त किया और तोल माप की वृद्धि की। ३. दस दिन के लिये सभी व्यापार कर मुक्त कर दिया और गरीबों और अनाथों को राजा ने मुक्त हाथ से दान दिया । दस दिन तक राज्य में आनन्द महोत्सव हुआ । ४. बारहवें दिन राजा ने विपुल भोजन बनवाकर मित्र, ज्ञाति, राज्य सेवक आदि के साथ खाते-खिलाते हुए आनन्द प्रमोद का उत्सव मनाया । फिर उनका वस्त्राभूषणादि से सत्कार-सम्मान कर माता-पिता बोले कि हमारा यह बालक गज के तालु के समान कोमल व लाल है, इसलिए इसका नाम गजसुकुमाल होना चाहिये, ऐसा कहकर पुत्र का नाम गजसुकुमाल रखा । (ज्ञाता सूत्र के पाठ के अनुसार) Elucidation Ja Sumana-(Japākusum) flowers of red colour, Adahula-flowers. Rakta Bandhu Jivaka-Plant of noon, on it red colour flowers bloom in rainy season. Generally it is also called Virabahuti or Indragopa. Lakkhā rasa-Mahāvara-red colour. Taruna Diwayara-According to Ācārya Abhayadeva, here this word denotes red colour as of rising sun. Jammanan jahā Meha Kumāre....... Description of birth of Megha Kumāra is as follows अष्टम अध्ययन ८५ Page #135 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Like Dharini while intense desire of Devaki fulfilled then she began to nurture womb-child carefully. When nine months and seven and a half days of her pregnancy period passed, she gave birth to a beautiful son, whose birth ceremony should be known like Megha Kumāra. In the happiness of birth 1. Slave-women, who gave the information of baby-birth, were freed from slavery and huge wealth was given to them as gift etc. 2. City was purified with fragrant water, prisoners were set free and weights and measures were increased. 3. For ten days all the trades were announced tax-free. King lavishly gave charity the poor and orphans. Celebration were held for ten days in the kingdom. 4. On the twelfth day king got food etc., prepared in huge quantity and celebrated the joyful ceremony eating with his friends, caste persons and state-servants. Then he honoured them by clothes and ornaments. Afterwards the parents spoke that our this child is tender and red like an elephant's palate, so its name should be Gaja Sukumāla. Thus saying they gave the name Gaja Sukumāla to their son. -(according the wordings of Jñātā Sūtra)' सूत्र २२ : तत्थ णं बारवईए णयरीए सोमिले नामं माहणे परिवसइ, अड्ढे, रिउव्वेय जाव सुपरिणिहिए यावि होत्था । तस्स सोमिलस्स माहणस्स सोमसिरी णामं माहणी होत्था, सुकुमाला । तस्स णं सोमिलस्स माहणस्स धूया सोमसिरीए माहणीए अत्तया सोमा णामं दारिया होत्था, सुकुमाला जाव सुरूवा । रूवेणं जाव लावण्णे उक्किट्ठा, उक्किट्ठ सरीरा यावि होत्था । तए णं सा सोमा दारिया अण्णया कयाइं बहाया जाव विभूसिया बहूहिं खुज्जाहिं जाव परिक्खित्ता सयाओ गिहाओ पडिणिक्खमइ पडिणिक्खमित्ता जेणेव रायमग्गे तेणेव उवागच्छइ, उवागच्छित्ता रायमग्गंसि कणग-तिंदूसएणं कीलमाणी कीलमाणी चिट्ठइ । अन्तकृद्दशा सूत्र : तृतीय वर्ग Page #136 -------------------------------------------------------------------------- ________________ : )) ))) )))) )) ) )) चित्रक्रम १५ : के सोमिल विप्र से कन्या की याचना दृश्य १-द्वारका निवासी सोमिल ब्राह्मण की एक अत्यन्त सुकुमार कन्या __ है सोमा। स्नान एवं शृंगार करके वह अपनी दासियों के साथ राजमार्ग पर स्वर्ण-कन्दुक से क्रीड़ा कर रही है। दृश्य २-वासुदेव श्रीकृष्ण हाथी पर बैठे गजसुकुमाल को साथ लिये अर्हत् अरिष्टनेमि के दर्शन करने जा रहे हैं। स्वर्ण-कन्दुक से खेलती रूप-लावण्यवती सोमा को देखकर उसके विषय में पूछते हैं तथा गजसुकुमाल के लिए वधू के रूप में उसकी विप्र सोमिल रो याचना करते (वर्ग ३/अध्य. ८) Illustration No. 15 : Asking the daughter of Somila Vipra (Brāhmana) Scene 1. Most beautiful, tender and young girl Somā is the daughter of Somila Brāhmaṇa, the resident of Dwūrukả city. Bathing and decorating herself she is playing with a golden ball, with her girl-friends and slave maidens. Scene 2. Vasudeva Sri Krsnu riding on an elephant, with his younger uterine brother Gajasukumāla, while going to praise and bow down to Arhat Aristanemi, enquires about Soma the beautiful, who is playing with goiden hall and asks her from Somila for Gajasukumāla. (Sec. 3/Ch. 8) 655555555555555556 अन्तकृद्दशा सूत्र : चित्र परिचय Page #137 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ऋग्वेद FREE सामवेद ALLAH । PRARTHI VR A 1. : " WINNAR स्वर्ण दक क्रीडा कुमार - - .. . . - - Reshana Page #138 -------------------------------------------------------------------------- ________________ २२ : उस द्वारका नगरी में सोमिल नामक एक ब्राह्मण रहता था, जो समृद्ध था और ऋग्वेद, यजुर्वेद, अथर्ववेद, सामवेद इन चारों वेदों का सांगोपांग ज्ञाता था तथा यज्ञ-याग आदि कर्मकांडों का रहस्यवेत्ता भी था । उस सोमिल ब्राह्मण के सोमश्री नाम की ब्राह्मणी (पत्नी) थी । सोमश्री सुकुमार एवं रूप लावण्यवती थी। उस सोमिल ब्राह्मण की पुत्री और सोमश्री की आत्मजा सोमा नाम की कन्या थी जो सुकुमाल यावत् बड़ी रूपवती थी । उसका रूप, लावण्य श्रेष्ठ था तथा देहयष्टि (शरीर) का गठन भी उत्कृष्ट था । वह सोमा कन्या अन्यदा किसी दिन स्नान कर यावत् वस्त्रालंकारों से . विभूषित हो, कुब्जा चिलात आदि बहुत सी दासियों से घिरी हुई अपने घर से बाहर निकली । घर के बाहर जहां राजमार्ग है, वहां आई और राजमार्ग में सुवर्ण की (सुवर्ण तारों से गठित) गेंद से खेलने लग गई । Somila Brāhmaṇa Maxim 22 : At that time in Dwārakā city a brāhmana dwelt, whose name was Somila. He was rich and well-versed in all the four Vedas, viz., Rgveda, Yajurveda, Atharvaveda and Sāmaveda; and also knew the secrets of Yajña-Yāga and other rituals, sacrifices etc. His wife was Somasri. She was tender and beautiful. Somā was the daughter of Somila and Somasri. She was tender and extremely beautiful. She was very shapely and superbly beautiful. One day maiden Somā bathed (until) adorned by clothes and ornaments, surrounded by Kubjā, Cilāta etc., slavemaidens came out of house. Having set out she came to the अष्टम अध्ययन .८७ . Page #139 -------------------------------------------------------------------------- ________________ highway. On the highway she began to play with a golden (binded by golden threads) ball. सूत्र २३ : तेणं कालेणं तेणं समएणं अरहा अरिट्ठणेमी समोसढे परिसा णिग्गया । तए णं से कण्हे वासुदेवे इमीसे कहाए लट्ठे समाणे पहाए जाव विभूसिए । गयसुकुमालेणं कुमारेणं सद्धिं हत्थिखंधवरगए सकोरंट मल्लदामेणं छत्तेणं धरिज्जमाणेणं सेयबरचामराहिं उद्धवमाणीहिं उद्धवाणीहिं बारवईए णयरीए मज्झं मज्झेणं अरहओ अरिट्ठणेमिस्स पायवंदए णिगच्छमाणे सोमं दारियं पासइ । पासित्ता सोमाए दारियाए रूवेण य जोव्वणेण य जायविम्हिए । सोमा का गजसुकुमाल के लिए ग्रहण सूत्र २३ : उस काल उस समय में अरिहंत अरिष्टनेमि द्वारका नगरी में पधारे । परिषद धर्म देशना सुनने को आई । उस समय कृष्ण वासुदेव भी भगवान के शुभागमन के समाचार सुनकर स्नान आदि करके वस्त्रालंकारों से विभूषित हुए । गजसुकुमाल कुमार के साथ हाथी के हौदे पर आरूढ़ हुए । उनके गले में कोरंट पुष्पों की माला थी और मस्तक पर छत्र धारण किये हुए थे, दोनों ओर श्वेत एवं श्रेष्ठ चामर ढुल रहे थे । द्वारका नगरी के मध्य भागों से होकर अर्हत् अरिष्टनेमि के चरण-वन्दन के लिये जा रहे थे, तब राजमार्ग पर खेलती हुई उस सोमा कन्या को देखते हैं । सोमा कन्या के रूप, लावण्य और कान्ति-युक्त यौवन को देखकर कृष्ण वासुदेव अत्यन्त आश्चर्यचकित हुए । Preservation of Soma for Gaja Sukumāla Maxim 23 : At that time and at that period Arihanta Aristanemi came to Dwarakā. Congregation went out for listening his sermon. ८८ • अन्तकृद्दशा सूत्र : तृतीय वर्ग Page #140 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Heaving heard auspicious news of the coming of Bhagawāna, Srikrsna Vāsudeva bathed and decked and rode an elephant with Gaja Sukumäla Kumāra. Srikrsna was wearing garland of Kornta flowers and an umbrella on his head, white and best camaras were fanned on both his sides. Thus he was going through the centre of Dwārakā to bow down to Arishtnami. Then he saw Somā playing on highway. He was wonder-struck seeing the shape, youth, beauty etc., of maiden Somā. सूत्र २४ : तए णं से कण्हे वासुदेवे कोडुंबियपुरिसे सद्दावेइ सदायित्ता एवं वयासीगच्छह णं तुब्भे देवाणुप्पिया ! सोमिलं माहणं जायित्ता सोमं दारियं गिण्हह-गिण्हित्ता कण्णंऽतेउरंसि पक्खिवह । तए णं एसा गयसुकुमालस्स भारिया भविस्सइ । तए णं ते कोडुबिय-पुरिसा जाव पक्खिवंति । तए णं ते कोडुंबिय-पुरिसा जाव पच्चप्पिणंति । तए णं से कण्हे वासुदेवे बारवईए णयरीए मझं मझेणं णिगच्छइ । णिगच्छित्ता जेणेव सहस्संबवणे उज्जाणे जाव पज्जुवासइ । तए णं अरहा अरिट्ठणेमी कण्हस्स वासुदेवस्स गयसुकुमालस्स कुमारस्स तीसे य धम्म कहाए । कण्हे पडिगए । सूत्र २४ : तब कृष्ण वासुदेव ने साथ में चलने वाले आज्ञाकारी पुरुषों को बुलाया, वुलाकर इस प्रकार कहा-हे देवानुप्रियो ! तुम सोमिल ब्राह्मण के पास जाओ और उससे इस सोमा कन्या की याचना करो । उसे प्राप्त करो और फिर उसे लेकर कन्याओं के अन्तःपुर में पहुँचा दो । समय आने पर यह सोमा कन्या, मेरे छोटे भाई गजसुकुमाल की भार्या होगी । तब श्रीकृष्ण की आज्ञा शिरोधार्य कर वे आज्ञाकारी पुरुष सोमिल ब्राह्मण के पास गये और उससे कन्या की याचना की । उससे सोमिल ब्राह्मण अष्टम अध्ययन Page #141 -------------------------------------------------------------------------- ________________ बहुत-बहुत प्रसन्न हुआ और अपनी कन्या को ले जाने की स्वीकृति दे दी। उन कौटुम्बिक पुरुषों ने सोमा को उसके पिता सोमिल से प्राप्त कर कन्याओं के अन्तःपुर में पहुंचा दिया । और उन्होंने श्रीकृष्ण को निवेदन किया कि आपकी आज्ञा का पूर्णतः पालन हो गया । तत्पश्चात् कृष्ण वासुदेव द्वारका नगरी के मध्य भाग से होते हुए निकले और निकलकर जहाँ सहस्राम्रवन उद्यान था वहां पहुँचे । पाँच अभिगमपूर्वक प्रभु को वन्दन नमस्कार करके उचित स्थान पर बैठकर उनकी सेवा करने लगे। उस समय भगवान् अरिष्टनेमि ने कृष्ण वासुदेव और गजसुकुमाल कुमार प्रमुख उस सभा को धर्मोपदेश दिया । प्रभु की देशना सुनकर श्रीकृष्ण अपने आवास को लौट गये । Maxim 24 : Then Vasudeva Krsna called the chamberlains going with him and ordered them-O beloved as gods ! Go to Somila brāhmana and beg this maiden Somā from him, take hold of her and put her in the harem of maidens. At proper time, this maiden Somā, would be the wife of my younger brother Gaja Sukumāla. Then chamberlains obeying the order of Śrīkrsna went to Somila brāhmaṇa and asked for his daughter. Somila became very much glad and agreed to give away his daughter. Chamberlains took Somā from his father Somila and put her in harem. And then they said to Srikrsna that your order has been fulfilled. Thereafter Krşņa Vāsudeva went through the middle of Dwārakā and reached Sahasrāmra garden (wood), practised five abhigamas and bowed down to Bhagawāna and then sat at a proper place. Bhagawāna Aristanemi preached sermon to the congregation, the premier were Gaja Sukumāla and Srikrsna. अन्तकृद्दशा सूत्र : तृतीय वर्ग .९०. Page #142 -------------------------------------------------------------------------- ________________ संसार ज्वाला मुंडन प्रव्रज्य R चराय निवेदन । । Mad Page #143 -------------------------------------------------------------------------- ________________ 05555555555555555555555555 चित्रक्रम १६ : गजसुकुमाल को वैराग्य जागरण __अर्हत् अरिष्टनेमि का उपदेश सुनकर गजसुकुमाल का मन संसार से विरक्त हो उठता है। वे कहते हैं-प्रभो ! जैसे किसी के घर में आग लगने पर वह अपनी सबसे मूल्यवान वस्तु को निकाल लाना चाहता है। वैसे ही मैं भी जन्म-जरा-मृत्यु की अग्नि से अपनी आत्म-मंजूषा को निकालकर आपके चरणों में मुंडित होकर संयम ग्रहण कर आत्म-कल्याण करना चाहता हूँ। वासुदेव श्रीकृष्ण आदि चकित होकर गजसुकुमाल की बातें सुन रहे हैं। (वर्ग ३/अध्य. ८) Illustration No. 16 : Apathy of Gajasukumāla Hearing the religious sermon of Arhat Aristanemi, the heart of Gajasukunāla was filled with ascetic feelings. He utters-Reverend Sir ! If any house catches fire then its owner tries to take out his most valuable thing. In the same way, I also want to save my own soul from this world, burning by the fires of birth, old age death; and wish to purify my soul, after being tonsured on head at your lotus feet. Vāsudeva Sri Krsna etc., are listening to the words of Gajasukumāla astonishingly. (Sec. 3/Ch. 8) 55555555555555555555555555145555555555541950 055555555555555555556 अन्तकृद्दशा सूत्र : चित्र परिचय Page #144 -------------------------------------------------------------------------- ________________ After hearing the sermon of Bhagawāna, Srikrsna returned back. २५: तए णं से गयसुकुमाले कुमारे अरहओ अरिट्ठणेमिस्स अंतियं धम्म सोच्चा जं णवरं अम्मापियरं आपुच्छामि । जहा मेहो जं णवरं (महिलियावज्जं जाव वढियकुले) । तए णं से कण्हे वासुदेवे इमीसे कहाए लद्धढे समाणे जेणेव गयसुकुमाले कुमारे तेणेव उवागच्छइ, उवागच्छित्ता गयसुकुमालं कुमारं आलिंगइ, आलिंगित्ता उच्छंगे निवेसेई निवेसित्ता एवं वयासीतुमं ममं सहोदरे कणीयसे भाया, तं मा णं देवाणुप्पिया ! इयाणिं अरहओ अरिट्ठणेमिस्स अंतिए मुण्डे जाव पव्ययाहि। अहं णं बारवईए णयरीए महया रायाभिसेएणं अभिसिंचिस्सामि । तए णं से गयसुकुमाले कुमारे कण्हेणं वासुदेवेणं एवं वुत्ते समाणे तुसिणीए संचिट्ठइ। सूत्र २५ : उस समय प्रभु का धर्मोपदेश सुनकर गजसुकुमाल कुमार संसार से विरक्त हो गया । वैराग्य जागृत होने पर प्रभु अरिष्टनेमि को वन्दना करके इस प्रकार बोले-हे भगवन् ! मुझे यह धर्म रुचिकर लगा है और मुझे इस पर प्रीति उत्पन्न हुई है । अतः मैं इसे स्वीकार करना चाहता हूँ और माता-पिता की आज्ञा लेकर मैं आपके पास श्रमण-धर्म ग्रहण करूँगा । इस प्रकार मेघकुमार के समान भगवान् को निवेदन करके गजसुकुमाल अपने घर आये और माता-पिता के सामने अपने विचार प्रकट किये । दीक्षा की बात सुनकर देवकी बहुत दुखी हुई । एक बार मूर्छित होकर गिर पड़ी । फिर आँसू बहाते हुए उसने कहा-हे पुत्र ! तुम हमें बहुत प्रिय हो। हम तुम्हारा वियोग सहन नहीं कर सकेंगे । अभी तुम्हारा विवाह भी अष्टम अध्ययन • ९१ . Page #145 -------------------------------------------------------------------------- ________________ नहीं हुआ है, इसलिये तुम पहले विवाह करो । विवाह करके कुल की वृद्धि कर संतान को अपना दायित्व सौंप कर फिर दीक्षा ग्रहण करना । कृष्ण वासुदेव ने गजसुकुमाल के विरक्त होने की बात सुनी, तो वे गजसुकुमाल के पास आये और आकर गजसुकुमाल का स्नेह से आलिंगन किया, आलिंगन करके गोद में बैठाया, गोद में बिठाकर अत्यन्त स्नेह भरे शब्दों से बोलेहे देवानुप्रिय ! तुम मेरे सहोदर छोटे भाई हो, इसलिये मेरा तुमसे कहना है कि इस समय भगवान् अरिष्टनेमि के पास मुण्डित होकर दीक्षा ग्रहण मत करो । मैं तुमको द्वारका नगरी में बहुत बड़े समारोह के साथ राज्याभिषेक से अभिषिक्त करूँगा । Maxim 25 : Hearing the sermon of Bhagawāna, Gaja Sukumāla Kumāra became adverse from world and worldly joys. Being engrossed by apathetic feelings, bowing down to Aristanemi Bhagawāna spoke-O Bhagawan ! I feel this doctrine very interesting, I love it, so I want to accept it. Taking permission from parents, I will accept Sramana hood from you. Like Megha Kumāra, Gaja Sukumāla saying thus to Bhagawāna returned to his residence and expressed his own thoughts before his parents. Hearing about consecration Devaki was filled with grief, firstly she swooned, afterwards came into senses and began to say, shedding her tears-O son ! You are too dear to us. We shall not be able to tolerate your separation. Still you are unmarried, so first of all you wed, increase family-line and transfering your responsibilities to your sons, then you accept consecration. Vasudeva Krsna, after he became aware about apathy of Gaja Sukuināla he came to him, embraced him, put him in his lap and said in very affectionate words .९२ . अन्तकृद्दशा सूत्र : तृतीय वर्ग Page #146 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Marathi जलतरंगा areerA4 - - राजसुकुमाल की दीक्षाभिलाषा NAR K 17 Lain Education International Page #147 -------------------------------------------------------------------------- ________________ चित्रक्रम १७ : गजसुकुमाल का वैराग्य गजसुकुमाल ने पिता-माता से कहा-यह जीवन घास पर गिरी ओस विन्दु तथा जल तरंगों के समान चंचल है, अतः मैं शीघ्र ही संसार त्याग कर दीक्षा ग्रहण करना चाहता हूँ। यह सुनकर वसुदेव जी चिन्तित हो उठे और माता देवकी तो मूर्छित होकर भूमि पर गिर पड़ीं। शीतल उपचार से स्वस्थ होने पर माता ने आँसू बहाते हुए कहा-पुत्र ! संयम ग्रहण करना भुजाओं से महासागर को तैरना और नंगी तलवार पर चलने जैसा अत्यन्त दुष्कर है, तुम बहुत सुकुमार हो (वर्ग ३/अध्य. ८) Illustration No. 17 : Apathy of Gajasukumāla Gajasukumāla said to his parents. This life is transitory like a drop on the tip of grass; and waves of water; so I want quickly to accept consecration, leaving this world. Ilearing these words Vasudeva was worried and mother Devaki swooned and fell down on floor. After coming to senses by fanning etc., shedding tears the mother said-O Son ! To accept restrain is as difficult as to swim the ocean by arms and to walk on the edge of a sword. You are too tender..... (Sec. 3/Ch. 8) %%%%%%%%%%%%%%%%%%%攻牙牙牙牙牙牙牙牙牙%%%%%%%%%%%%%%%$ SAN $555555555555步步步步步步步步步步步步步步步为中 अन्तकृद्दशा सूत्र : चित्र परिचय Page #148 -------------------------------------------------------------------------- ________________ o beloved as gods ! you are my younger uterine brother. Hence I say that you should not accept consecration after tonsuring your head near Bhagawāna Aristanemi at this time. I shall anoint you with royal coronation in this city Dwārakā in a grand ceremony. तए णं से गयसुकुमाले कुमारे कण्हं वासुदेवं अम्मापियरो य दोच्चंपि तच्चंपि एवं वयासी-एवं खलु देवाणुप्पिया ! माणुस्सया कामा खेलासवा असुइ, असासया, वंतासवा जाव विप्पजहियव्या भविस्संति । तं इच्छामि णं देवाणुप्पिया ! तुभेहिं अब्भणुण्णाए समाणे अरहओ अरिडणेमिस्स अंतिए जाव पव्वइत्तए । तए णं तं गयकुसुमालं कुमारं कण्हे वासुदेवे अम्मापियरो य जाहे णो संचाएइ बहुयाहिं अणुलोमाहिं जाव आघवित्तए, ताहे अकामा चेव एवं वयासीतं इच्छामो णं ते जाया ! एगदिवसमवि रज्जसिरिं पासित्तए । णिक्खमणं जहा महब्बलस्स जाव तमाणाए तहा जाव संजमित्तए । तए णं से गयसुकुमाले अणगारे जाए इरियासमिए जाव गुत्तबंभयारी। सूत्र २६ : कृष्ण वासुदेव द्वारा ऐसा कहे जाने पर गजसुकुमाल कुमार मौन रहे । कुछ समय मौन रहने के पश्चात् गजसुकुमाल अपने बड़े भाई कृष्ण वासुदेव एवं माता-पिता से दूसरी-तीसरी बार भी इस प्रकार बोलेहे देवानुप्रियो ! वस्तुतः मनुष्य के काम-भोग एवं देह अपवित्र, अशाश्वत, क्षणविनाशी और मल-मूत्र-कफ-वमन-पित्त-शुक्र एवं शोणित आदि अशुद्धि के भण्डार हैं । यह मनुष्य शरीर और ये उससे सम्बन्धित काम-भोग अस्थिर हैं, अनित्य हैं, एवं सड़न-गलन तथा नाशमान होने के कारण आगे-पीछे कभी न कभी अवश्य नष्ट होने वाले हैं। अष्टम अध्ययन Page #149 -------------------------------------------------------------------------- ________________ इसलिये हे देवानुप्रिय ! मैं चाहता हूँ कि आपकी आज्ञा मिलने पर भगवान अरिष्टनेमि के पास प्रव्रज्या (श्रमण-दीक्षा) ग्रहण कर लूँ । तब उस गजसुकुमाल कुमार को कृष्ण वासुदेव और माता-पिता जब बहुत सी अनुकूल और स्नेह भरी युक्तियों से भी समझाने में समर्थ नहीं हुए तब निराश होकर अनचाहे ही श्रीकृष्ण एवं माता-पिता इस प्रकार बोलेयदि ऐसा ही है तो हे पुत्र ! हम एक दिन की तुम्हारी राज्यश्री (राज की शोभा) देखना चाहते हैं । इसलिये तुम कम से कम एक दिन के लिये तो राजलक्ष्मी को स्वीकार करो । माता-पिता एवं बड़े भाई के इस प्रकार अनुरोध करने पर गजसुकुमाल मौन रहे । 'मौनं सम्मति लक्षणं' मानकर बड़े समारोह के साथ १०८ स्वर्ण रजत आदि के कलशों से उनका राज्याभिषेक किया गया । गजसुकुमाल के राजगद्दी पर बैठने पर माता-पिता ने उससे पूछा-हे पुत्र ! अब तुम क्या चाहते हो? बोलो, तुम्हारी क्या इच्छा है ? गजसुकुमाल ने उत्तर दिया-मैं दीक्षित होना चाहता हूँ । तब गजसुकुमाल की इच्छानुसार दीक्षा की सभी सामग्री मंगाई गई । गजसुकुमाल सहस्र पुरुष वाहिनी शिविका में बैठ कर विशाल शोभा यात्रा पूर्वक भगवान अरिष्टनेमि के समवसरण में पहुँचे । माता-पिता ने भगवान को शिष्य भिक्षा दी । गजसुकुमाल ने स्वयं सभी आभरण उतारे, पंचमुष्टि लोच किया, फिर भगवान से प्रार्थना की-हे भन्ते ! अब आप ही स्वयं मुझे मुंडित करें, मुनि-वेष प्रदान करें और आचार धर्म का बोध देवें । प्रभु ने चरणसत्तरी, करणसत्तरी आदि का उपदेश दिया । अब वह गजसुकुमाल अणगार हो गये । ईर्यासमिति वाले यावत् गुप्त ब्रह्मचारी बन गये । Maxim 26 : Gaja Sukumāla remained silent hearing these words of Krsna Vāsudeva. After some times Gaja Sukumāla अन्तकृदशा सूत्र : तृतीय वर्ग । .९४ . Page #150 -------------------------------------------------------------------------- ________________ SO 0 HAM . . V OG ARTES Cric VOL 1 Page #151 -------------------------------------------------------------------------- ________________ $5555555555555555555555555 % ) ) ) ) ) ) ) चित्रक्रम १८ : गजसुकुमाल की दीक्षा . __ दृश्य १-गजसुकुमाल दीक्षा के लिए तैयार हो, भगवान अरिष्टनेमि के चरणों में उपस्थित होकर बोले-प्रभु ! जल में स्थित कमल की भाँति मैं विषयों से निर्लिप्त जीवन जीना चाहता हूँ। मुझे अपना शिष्य बनाइए। माता देवकी एवं पिता वसुदेव जी ने प्रभु से प्रार्थना की हे भन्ते ! हमारे चक्षु के समान प्रिय पुत्र को आप शिष्य-भिक्षा के रूप में स्वीकार कीजिए। दृश्य २-मुनि वेष धारण किये गजमुकुमाल भगवान के श्रीमुख से संयम दीक्षा का पाठ ग्रहण करते हैं। (वर्ग ३/अध्य. ८) ) ) ) ) ) ) ) ) ) ) ) ) )) ) Illustration No. 18 : Consecration of Gajasukumāla Scene 1. Being ready for consecration and standing near the lotus feet of Bhagan'ana Aristanemi, thus spoke Gajusukumāla unto him-Prubiu (Reverend Sir)! wish to lead my life disinclined to worldly passions, as the lotus remaining in water, does not wet. Please accept me as your pupil. Mother Devaki and father Vasudeva also requested-Bhante ! Please accept, our son-who is so dear as our eyes, as your disciple. Scene 2. Wearing the robe of a monk, Gujusukumälu accepts the consecration schedule from the mouth of Bhagawana. (Sec. 3/Cl1.8) ॥ ॥ ॥ ॥ फ ऊ $55555555555555555555555555 अन्तकृद्दशा सूत्र : चित्र परिचय Page #152 -------------------------------------------------------------------------- ________________ spoke twice and thrice to his elder brother Krsna Vasudeva and parentsO beloveds as gods ! Really amusements and rejoicings of man and his body are impure, perishable and momentary. This body is filled with stool, urine, phlegm, vomit, semen, blood etc. the dirty things. This human body and the sensual pleasures related to it are unstable, with an end, and being perishable,, these are to be exhausted either now or later. Therefore O beloveds as gods ! I wish that permitted by you, I shall accept consecration (śramanahood) before Bhagawāna Aristanemi. When Krsna Vasudeva and his parents could not become capable of moulding Gaja Sukumāla towards worldly enjoyments even by loving and agreeable expressions, then being disappointed unwillingly Krsna Vāsudeva and his parents spoke thus unto him“O son ! If it is so, then we want to visualise you as a king (adorned with coronation) only for one day. So you accept kingship at least for a single day. At such insistence of parents and elder brother Gaja Sukumāla remained silent. Assuming silence as acceptance with a great ceremony he was coronated by 108 pitchers of gold and silver etc. After enthronement of Gaja Sukumāla parents askedson ! Now what do you want ? Tell, what is your wish ? Gaja Sukumāla answered, I want to be consecrated. Then according to the wish of Gaja Sukumāla all the paraphernalia was provided. Sitting in the palanquin which is carried by one thousand persons Gaja Sukumāla reached the religious assembly of Bhagawāna Aristanemi in great procession. Parents gave their son as pupil to Bhagawāna. Gaja Sukumnāla put off all ornaments himself, tonsured his head by five fists and then requested अष्टम अध्ययन • 84 Page #153 -------------------------------------------------------------------------- ________________ to Bhagawana that O Bhante (Bhagawan) ! Now, you yourself cosecrate me, give me the robe of a sage and knowledge of conduct. Bhagawāna preached him (Gaja Sukumāla) seventy rules of conduct (Carana sattari) and seventy rules of activity (Karna sattari) and consecrated him. Now Gaja Sukumāla became a housless mendicant. Practising movement incognito (until) he became deep celebate or guarded in celibacy. विवेचन (१) राज्याभिषेक विधि का विस्तृत वर्णन-रायपसेणिय सूत्र में तथा दीक्षा का वर्णन महा के प्रकरण भगवती सूत्र ११/११ में विस्तार के साथ मिलता है । (२) अभिषेक विधि में सर्व प्रकार की औषधियों से युक्त पवित्र जल मंत्रोपचार के साथ मस पर छिड़का जाता है । इसमें १०८ सुवर्ण कलश, १०८ रजत कलश तथा १०८ मिट्टी के कल में औषधियों से युक्त समुद्र एवं नदियों आदि का जल भरा जाता है । राज्याभिषेक के पश्चात् माता-पिता पूछते हैं -अब तुम्हारी क्या इच्छा है ? हमें बताओ ।। गजसुकुमाल कहते हैं-कुत्रिकापण-(एक ऐसी देवाधिष्ठित दुकान जिसमें सब प्रकार का सामान मिल हो । संसार की दुर्लभ से दुर्लभ वस्तु यहां मिलती है । आज की भाषा में संसार का यह सबसे बा डिपार्टमेंटल स्टोर कहा जा सकता है) से मेरे लिए दीक्षा के उपकरण, रजोहरण, पात्र आदि मंगाअं और नाई को बुलाओ । तब दो लाख स्वर्णमुद्राओं का सामान तथा एक लाख स्वर्ण मुद्रा देकर ना को बुलाया गया । नाई ने गजसुकुमाल के चार अंगुल अग्रकेश छोड़कर बाकी शेष केश का उस्त से मुंडन किया । माता देवकी ने श्वेत उज्ज्वल वस्त्र में उन केशों को ग्रहण किया, फिर एक रत करंडिये (रल मंजूषा) में उन्हें संभालकर रखा और कहा-मेरे प्रिय पुत्र के केश हमारे लिये बहुत-सं तिथियों, पर्वो, महोत्सवों आदि में अन्तिम दर्शन के लिए उपयोग में आयेंगे । दीक्षा की शोभा-यात्रा आदि का विस्तृत वर्णन अन्तकृद्दशा महिमा में देखे । Elucidation (1) Detailed description of coronation we get in Rayapuseniya Sūtra and that of consecration in Bhagawati Sūtra (11/11) in the episode of Mahābala. अन्तकृद्दशा सूत्र : तृतीय वर्ग Page #154 -------------------------------------------------------------------------- ________________ (2) In the method of installing (abhiseka vidhi) the purified water mixed with all kinds of herbs is sprinkled on the head of a person with chanting mantras. In this the herb-mixed pure water is filled from seas, rivers etc. in 108 pitchers of gold, 108 pitchers of silver and 108 pitchers of clay. After the royal function or function of coronation, parents ask-Now what is your wish, tell us. Then Gaja Sukumāla says-For me, ask for parapharnelia of consecration-duster (rajoharana) utensils (patra) from the shop Kutrikāpana (a shop blessed by a god or deity, where every kind of goods are available. All the things of the world which are most difficult to get are also available in that shop. In modern days, it can be told as the biggest departmental store of the world.) and also call a barber. Then paraphernalia costing two lakhs golden coins and a barber for one lakh gold coin was asked. Then barber shaved the head of Gaja Sukumāla by razor leaving only four angula fore-hairs. Mother Devaki took those shaven hairs in a white and neat cloth and then kept them in a box studded with gems with due care and said-These hair of my dear son would be useful for last visualization on the auspicious occasions days, festivals and celebrations. (3) Vivid description of diksā grand procession etc., readers are suggested to study Antakrddśā Mahima. सूत्र २७ : तए णं से गयसुकुमाले अणगारे जं चेव दिवसं पव्वइए तस्सेव दिवसस्स पुव्वावरण्ह-कालसमयंसि जेणेव अरहा अरिट्ठणेमी तेणेव उवागच्छइ, उवागच्छित्ता अरहं अरिट्ठणेमिं तिक्खुत्तो आयाहिणं पयाहिणं करेइ, करित्ता बंदइ जाव एवं वयासीइच्छामि णं भंते ! तुब्भेहिं अब्भणुण्णाए समाणे महाकालंसि सुसाणंसि एगराइयं महापडिमं उवसंपज्जित्ता णं विहरित्तए । अहासुहं देवाणुप्पिया ! मा पडिबंधं करेह ! तए णं से गयसुकुमाले अणगारे अरहया अरिदुनेमिणा अब्भणुण्णाए समाणे अरहं अरिटुनेमिं बंदइ णमंसइ । वंदित्ता णमंसित्ता अरहओ अरिट्ठनेमिस्स अंतियाओ सहस्संबवणाओ उज्जाणाओ पडिणिक्खमइ । पडिणिक्खमित्ता जेणेव महाकाले सुसाणे तेणेव उवागए । अष्टम अध्ययन . ९७. Page #155 -------------------------------------------------------------------------- ________________ उवागच्छित्ता थंडिलं पडिलेहेइ, पडिलेहित्ता उच्चार-पासवण भूमिं पडिलेहेइ पडिलेहित्ता ईसिं पब्भारगएणं काएणं जाव दो वि पाए साहट्ट एगराइयं महापडिमं उवसंपज्जित्ताणं विहरइ । महाप्रतिमा-धारण सूत्र २७ : दीक्षित होने के पश्चात् गजसुकुमाल मुनि जिस दिन दीक्षित हुए, उसी दिन के पिछले भाग (तृतीय प्रहर) में जहां अरिहंत अरिष्टनेमि विराजमान थे, वहां आये। वहां आकर उन्होंने भगवान अरिष्टनेमि को तीन बार प्रदक्षिणा की। प्रदक्षिणा करके इस प्रकार निवेदन कियाहे भगवन् ! आपकी अनुमति प्राप्त होने पर मैं महाकाल श्मशान में एक रात्रि की महाप्रतिमा धारण कर विचरना चाहता हूँ। प्रभु ने कहा-हे देवानुप्रिय ! जिससे तुम्हें सुख प्राप्त हो वही करो । गजसुकुमाल मुनि ने अरिहंत अरिष्टनेमि की आज्ञा मिलने पर भगवान अरिष्टनेमि को वंदन नमस्कार किया। वंदन नमस्कार कर अर्हत् अरिष्टनेमि के पास से चलकर सहस्राम्रवन उद्यान से निकले, और जहां महाकाल श्मशान था, वहां आये । महाकाल श्मशान में आकर प्रासुक स्थण्डिल भूमि (जीव-जन्तु रहित निर्दोष स्थान) की प्रतिलेखना-देखभाल करते हैं । इसके पश्चात् उच्चार- प्रस्रवण (मल-मूत्र त्याग) के योग्य भूमि का प्रतिलेखन करते हैं । इसके पश्चात् एक स्थान पर खड़े हो, अपनी देह यष्टि को किंचित् झुकाये हुए (दोनों हाथों को घुटनों तक लम्बा करके) एक पुद्गल केन्द्र पर दृष्टि जमाकर दोनों पैरों को (चार अंगुल के अन्तर से) सिकोड़ कर एक रात्रि की महाप्रतिमा अंगीकार कर ध्यान में लीन हो गये । Acceptance of Special Vow of Mahāpratimā Maxim 27 : After consecration, Gaja Sukumāla sage, in the first part of afternoon (third prahara of the day), the same day on अन्तकृद्दशा सूत्र : तृतीय वर्ग . ९८ . Page #156 -------------------------------------------------------------------------- ________________ which came into sage order, went to the place where Arihanta Aristanemi was, thrice circumambulated and then spoke in polite wordsO Bhagawan ! On being permitted by you I want to abide observing the great vow-resolution (mahāpratimā) of one night in the cemetry (funeral place) Mahäkāla. Bhagawana said-O beloved as gods ! Do as you feel happy. Thus being permitted by Arihanta Aristanemi sage Gaja Sukumāla bowed down and worshipped him and starting from there walked out of Sahasrāmravana and reached cemetry Mahākāla. There he looked for clean spot free from flora and insects. After that he looked for clean spot for discharging stool and urine. Thereafter standing at a place, slightly bending forward his body (hanging both the hands upto knees), fixing eyes on a lump of matter (pudgala), contracting both legs (with the distance of four fingers between the heels and toes of both legs), accepting great firm resolution (Mahāpratimā) of one night went deep into meditaion. सूत्र २८ : इमं च णं सोमिले माहणे सामिधेयस्स अट्ठाए बारवईओ नयरीओ बहिया, पुवनिग्गए । समिहाओ य दब्भे य कुसे य पत्तामोडयं च गिण्हइ । गिण्हित्ता तओ पडिनियत्तइ, पडिनियत्तित्ता महाकालस्स सुसाणस्स अदूरसामंतेणं वीईवयमाणे संझाकालसमयंसि पविरल-मणुस्संसि गयसुकुमालं अणगारं पासइ । पासित्ता तं वेरं सरइ, सरित्ता आसुरुत्ते एवं बयासी-एस णं भो ! से गयसुकुमाले कुमारे अपत्थिय जाव परिवज्जिए जेणं मम धूयं सोमसिरीए भारियाए अत्तयं सोमं दारियं अदिट्ठदोसपइयं कालवत्तिणीं विप्पजहित्ता मुण्डे जाव पव्वइए। अष्टम अध्ययन .९९ . Page #157 -------------------------------------------------------------------------- ________________ सोमिल द्वारा उपसर्ग सूत्र २८ : इधर सोमिल ब्राह्मण समिधा (यज्ञ की लकड़ी) लेने के लिये द्वारका नगरी के बाहर गजसुकुमाल अणगार के श्मशान भूमि में जाने से पूर्व ही निकला था, वह उधर जंगल से समिधा, दर्भ, कुश, डाभ एवं अग्रभाग से मुड़े पत्तों को लेता है । उन्हें लेकर वहां से अपने घर की तरफ लौटता है । लौटते समय महाकाल श्मशान के निकट से जाते हुए संध्या काल की बेला में, जबकि मनुष्यों का आवागमन बहुत कम हो गया था, वह गजसुकुमाल मुनि को वहां ध्यानस्थ खड़े देखता है । उन्हें देखते ही सोमिल के हृदय में पूर्वभवों के वैर का संस्कार जाग्रत हुआ । पूर्वजन्म के वैर का स्मरण हुआ । पूर्व जन्म के वैर की स्मृति होने पर वह क्रोध से तमतमा उठा और इस प्रकार बुदबुदाया (बड़बड़ाया)अरे यह तो वही अप्रार्थनीय का प्रार्थी (मृत्यु की इच्छा करने वाला) निर्लज्ज एवं श्री-कान्ति आदि से हीन गजसुकुमाल कुमार है, जो मेरी सोमश्री भार्या की कुक्षि से उत्पन्न, यौवनावस्था को प्राप्त, मेरी निर्दोष पुत्री सोमा कन्या को अकारण ही छोड़कर मुण्डित होकर साधु बन गया है । Trouble (Upasarga) by Somila Maxim 28 : Brāhmana Somila for taking sacrificial wood went out of Dwārakā to the forest, before Gaja Sukumāla reached the Mahākāla funeral place. The way to forest passed near to the same funeral place. In the forest he collected sacrificial wood, grass, plucked up fore-part bent leaves and returned to the city-to his home. On returning passing by Mahākāla cemetry at the time of evening twilight when the coming and going of men becomes rare, he saw monk Gaja Sukumäla there standing in meditation. Seeing the monk, the enmity of former births awakened in the heart of Somila. He recollected the enmity of former . १०० अन्तकृदशा सूत्र : तृतीय वर्ग Page #158 -------------------------------------------------------------------------- ________________ । कुन्द सोमिल ela U R RA RSS ..... Of SE •eso ... HERE . R NRNER - VANA TOS STAASAHTASATH Page #159 -------------------------------------------------------------------------- ________________ 55 中岁岁历历万岁万岁万岁万步步步步牙牙牙牙牙牙牙牙牙牙牙牙乐中 चित्रक्रम १९ : महाकाल श्मशान में ध्यान तथा महाउपसर्ग __ दृश्य १-दीक्षा लेकर दिन के तृतीय प्रहर में मुनि गजसुकुमाल महाकाल श्मशान में जाकर एक रात्रि की महाप्रतिमा धारण कर ध्यानस्थ हो गए। श्मशान में कहीं चिताएँ जल रही हैं। कहीं नरमुंड पड़े हैं। इधर-उधर हिंसक माँसाहारी जानवर घूम रहे हैं। सोमिल विप्र यज्ञ की सामग्री साथ लिये, उधर से गुजरा तो उसने गजसुकुमाल को मुनि रूप में देखा। वह क्रोध में पागल हो उठा-“इसी राजकुमार ने मेरी प्यारी पुत्री सोमा को बिना विवाह किये मझधार में छोड़ दिया है तो मैं भी अब इसका वदला लूँगा।" दृश्य २-बदले की भावना से प्रेरित होकर सोमिल ने ध्यानस्थ मुनि के सिर पर गीली चिकनी मिट्टी की पाल बाँधी, फिर पास में ही जलती चिता से धधकते अंगारे लिये और मुनि के सिर पर धर दिये। मुनि का मस्तक और शरीर जलने लगा। मुनि फिर भी शांत, अचल खड़े रहे। सोमिल है भयभीत हुआ-'कहीं यह दुष्कृत्य करते मुझे किसी ने देख लिया और वासुदेव श्रीकृष्ण को पता लग जायेगा तो. " वह उलटे पाँव नगर की ओर भागा। (वर्ग ३/अध्य. ८) Illustration No. 19 : Meditation and great trouble in Mahākāla cemetry Scene 1. Accepting consecration in the third praharu (3 p.m.) of day, monk Gajasukumala, accepting the great monk resolution approached the Muhäkāla funeral place and went deep into meditation. Somewhere in cemetry, pyres are burning, somewhere are half burnt and unburnt corpses, flesh eater and violent animals are wandering hither and thither. Brāhmuna Somilu passed by that cemetry. Then he saw Gajasukumāla as a sage. He became mad in fury-“This prince has bereaved my dear daughter, without marrying her. I shall also take revenge.'' Scene 2. Instigated by the feelings of revenge Somila put wet clay on the head of monk and then taking burning coals from a pyre, kept them on the head of the monk. The head and body of monk hegan to burn, still he stood erect and calm. Somila was frightened--Lest any man may see him doing this evil deed; and that Vasudeva Sri Krsnu might become aware i of this, then....'' He ran away towards the city. (Sec. 3/Ch. 8) कककककककककककककककककक0 अन्तकृदशा सूत्र : चित्र परिचय Page #160 -------------------------------------------------------------------------- ________________ births. By this remembrance he raged up in fury and murmured-Oh this is the same Gaja Sukumāla desirous of undesirable-wisher of death, shameless and devoid of fortunes; who abandoning my matured, faultless daughter Somā (horn from the womb of my wife Somasri) without any cause became an ascetic. विवेचन गजसुकुमाल मुनि को ध्यानस्थ देखकर सोमिल के मन में अचानक इतना प्रचण्ड भीषण क्रोध क्यों उपज आया ? इसके पीछे प्रत्यक्ष एवं परोक्ष कई कारण हो सकते हैं । प्रत्यक्ष कारण तो यहां स्पष्ट बताया गया है कि-पुत्री सोमा के साथ गजसुकुमाल का पाणिग्रहण होने वाला था । वासुदेव श्रीकृष्ण ने उसकी याचना करके उसे कन्याओं के अन्तःपुर में रखवाया, अब गजसुकुमाल उस कन्या को मंझधार में छोड़कर मुनि बन गये । इस कारण सोमिल को क्रोध आ गया । दूसरा परोक्ष कारण भी है जिसका संकेत आगम में दो वाक्यों में किया गया है-तं घेरं सरइ ..... वैर का स्मरण करके तथा “अणेग भव-सय सहस्स संचियं कम्मं उदीरेमाणेणं-लाखों भवों के संचित कर्मों की उदीरणा करते हुए। इस स्थान पर गजसुकुमाल एवं सोमिल के अतीत जन्मों की वैर परम्परा की एक कथा प्रसिद्ध है जो इस प्रकार है गजसुकुमाल का जीव अनेकानेक भवों के पूर्व भव में एक राजा की रानी के रूप में था । उसकी सौतेली रानी के पुत्र होने से सौतेली रानी राजा को बहुत प्रिय हो गई । इस कारण, उसे सौतेली रानी से द्वेष हो गया और चाहने लगी कि किसी भी तरह से उसका पुत्र मर जाए । संयोग की बात है कि पुत्र के सिर में फोड़ा-गुमड़ी हो गई और वह पीड़ा से छटपटाने लगा । विमाता ने कहा-मैं इस रोग का उपचार जानती हूँ । अभी ठीक कर देती हूँ । इस पर रानी ने अपने पुत्र को विमाता को दे दिया । उसने उड़द की जाड़ी रोटी गर्म करके बच्चे के सिर पर बांध दी। वालक को भयंकर असह्य वेदना हुई । वह छटपटाने लगा और कुछ ही क्षणों में मर गया । कालान्तर में बालक का जीव सोमिल और विमाता का जीव गजसुकुमाल के रूप में उत्पन्न हुए । वेराणुबंधीणि महब्भयाणि-वैर के अनुबंध भयंकर होते हैं । अतः इस पूर्व वैर का स्मरण होने पर सोमिल को तीव्र क्रोध उत्पन्न हुआ और बदला चुकाने के लिये ध्यानस्थ मुनि के सिर पर मिट्टी की पाल बांधकर खैर के धधकते अंगारे रख देने की भावना जागी । और पूर्व वैर वश इतना क्रूर पैशाचिक कृत्य कर डाला । (अन्तकृद्दशा सूत्र-आचार्य आत्मारामजी म. कृत हिन्दी टीका पृष्ठ १८ से) अष्टम अध्ययन . १०१ . Page #161 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Elucidation Seeing monk Gaja Sukumāla in meditation why the mind of Somila filled with such a ferocious anger ? There may be many present and past causes of it! Present cause here clearly stated that his daughter Somā was to be wedded with him (Gaja Sukumāla). Väsudeva Śrīkrsna asked and preserved her (Soma) in harem of maidens. When Gaja Sukumāla accepted monkhood leaving that maiden then Somila raged in fury. The other past cause also pointed in Agama by words-tam veram saraïremembering the enmity' and 'anega bhava-saya sahassa sanciyam kammam udiremaņeņam- performing udiraņā of accumulated karmas of million former births'. In this context a story is popular about the former birth of Somila and Gaja Sukumäla. The episode is this The soul of Gaja Sukumäla was a queen of a king in his innumerous former birth. That king had another queen also. That queen had given birth to a son so she became more beloved of that king. So the queen (soul of Gaja Sukumāla) began to have feelings of detachment towards that other queen and have keen desire that her son may die somehow. Per chance a boil took place in the son's head. Child began to flounder due to agony. Step mother (soul of Gaja Sukumāla) said to the mother of that child that I know the treatment of this disease. The mother of child gave her son to step mother. Step mother binded a hot horse-bean bread on the head of the child. Due to serious agony child floundered much and died. After a long-long period the soul of that child took birth as Somila and that of step mother as Gaja Sukumäla. Verāņubandhini mahabbhayāṇi-The bondages of enmity are most ferocious. So by the remembrance of this former enmity Somila raged in fury, and for taking the revenge, his ill feelings aroused to take wet clay to make the raised up sides on the head of monk and to fill it with the burning coals of khair fuel. He had done such cruel deed due to former enmity. [Antakrd-daśā Sūtra Hindi Commentary by Atmārāmaji Mahārāja p.18] सूत्र २९ : तं सेयं खलु मम गयसुकुमालस्स वेरनिज्जायणं करित्तए । एवं संपेहेइ, संपेहित्ता दिसापडिलेहणं करेइ, करित्ता सरसं मट्टियं गिण्हइ । गिण्हित्ता • 902. अन्तकृदशा सूत्र : तृतीय वर्ग Page #162 -------------------------------------------------------------------------- ________________ जेणेव गयसुकुमाले अणगारे तेणेव उवागच्छइ, उवागच्छित्ता गयसुकुमालस्स अणगारस्स मत्थए मट्टियाए पालिं बंधइ । बंधित्ता जलंतीओ चिययाओ फुल्लिय-किंसुयसमाणे खयरंगारे कहल्लेणं गिण्हइ । गिण्हित्ता गयसुकुमालस्स अणगारस्स मत्थए पक्खिवइ । पक्खिवित्ता भीए तओ खिप्पामेव अवक्कमइ । अवक्कमित्ता जामेव दिसं पाउन्भूए तामेव दिसं पडिगए। २९ इसलिये मुझे निश्चय ही गजसुकुमाल से इस वैर का बदला लेना चाहिये, सोमिल के मन में इस प्रकार का दुर्विचार उठा, उसने सोचा, सोचकर सब दिशाओं की ओर दूर-दूर तक देखा कि कहीं कोई उसे देख तो नहीं रहा है। चारों तरफ देखता हुआ पास के ही तालाब से थोड़ी गीली मिट्टी ली, गीली मिट्टी लेकर वहां आया, वहां आकर गजसुकुमाल मुनि के सिर पर उस मिट्टी से चारों तरफ पाल बांध देता है । पाल बांधकर पास में ही कहीं जलती हुई चिता में से फूले हुए केसू (पलाश) के समान लाल-लाल खेर के अंगारों को किसी मिट्टी के खप्पर में लेकर वह उन दहकते हुए अंगारो को गजसुकुमाल मुनि के सिर पर रख देता है । रखने के बाद (इस भय से कि कहीं कोई देख न ले) भयभीत होकर त्रस्त होकर शीघ्रता से पीछे की ओर हटा और (वहां से भागता हुआ) वह (सोमिल) जिस ओर से आया था उसी ओर चला जाता है । Maxim 29 : Therefore I should definitely take revenge from Gaja Sukumāla-such ill-feelings occupied the mind of Somila. He thought and after thinking he gazed at all directions upto far distance that whether any body was seeing him or not. Gazing all around he took moist clay from a nearby pond, came to the place where monk Gaja Sukumāla was, putting that clay on the head of monk, raised it on all sides. अष्टम अध्ययन • १०३. Page #163 -------------------------------------------------------------------------- ________________ After that he took burning coals from a pyre in a piece of claypitcher and put up those burning coals on the head of monk Gaja Sukumāla. Then being frightened (fear lest anyone may see him) sharply he stepped backward and (running from there) he (Somila) went to the direction from which he had come. सूत्र ३0: तए णं तस्स गयसुकुमालस्स अणगारस्स सरीरयंसि वेयणा पाउन्भूया, उज्जला जाव दुरहियासा । तए णं से गयसुकुमाले अणगारे सोमिलस्स माहणस्स मणसा वि अप्पदुस्समाणे तं उज्जलं वेयणं जाव अहियासेइ । तए णं तस्स गयसुकुमालस्स अणगारस्स तं उज्जलं जाव अहियासेमाणस्स सुभेणं परिणामेणं पसत्थ-ज्झवसाणेणं तयावरणिज्जाणं कम्माणं खएणं कम्मरय-विकिरणकरं अपुवकरणं अणुप्पविट्ठस्स अणंते, अणुत्तरे जाव केवलवरनाण-दंसणे समुप्पण्णे । तओ पच्छा सिद्धे जावप्पहीणे । तत्थ णं अहासंनिहिएहिं देवेहिं सम्मं आराहियं ति कट्ठ दिव्ये सुरभिगंधोदए वुढे, दसद्धवण्णे कुसुमे णिवाडिए; चेलुक्खेवे कए, दिव्वे य गीय-गंधव्वनिनाए कए यावि होत्था । सूत्र ३0 : तब, सिर पर जाज्वल्यमान अंगारों के रखे जाने से गजसुकुमाल मुनि के शरीर में महा भयंकर वेदना उत्पन्न हुई, जो अत्यन्त दाहक, कर्कश, तीव्र और दुस्सह थी । इतना होने पर भी वे गजसुकमाल मुनि सोमिल ब्राह्मण पर मन से लेश मात्र भी द्वेष नहीं करते हुए उस एकान्त दुःखरूप वेदना को समभाव पूर्वक सहन करने लगे। उस समय उस एकान्त दुःखपूर्ण दुस्सह दाहक वेदना को समभाव पूर्वक सहन करते हुए शुभ परिणामों तथा प्रशस्त शुभ अध्यवसायों (भावनाओं) के फलस्वरूप आत्मगुणों को आच्छादित करने वाले कर्मों के क्षय से, समस्त .१०४ . अन्तकृदशा सूत्र : तृतीय वर्ग Page #164 -------------------------------------------------------------------------- ________________ कर्म-रज को झाड़कर साफ कर देने वाले कर्म विनाशक अपूर्वकरण में प्रविष्ट हुए, जिससे उन गजसुकुमाल अणगार को अनंत - अन्तरहित, अनुत्तर- सर्वश्रेष्ठ, निर्व्याघात, निरावरण एवं परिपूर्ण केवलज्ञान एवं केवलदर्शन की उपलब्धि हुई । तत्पश्चात आयुष्य पूर्ण हो जाने पर वे उसी समय सिद्ध, बुद्ध, यावत् सभी दुःखों से मुक्त हो गये । इस प्रकार सकल कर्मों के क्षय हो जाने से वे गजसुकुमाल अणगार कृतकृत्य बनकर सिद्ध पद को प्राप्त हुए । लोकालोक के सभी पदार्थों का ज्ञान होने से बुद्ध हुए। सभी कर्मों के छूट जाने से परिनिर्वृत्त परमशान्त हुए, शारीरिक और मानसिक सभी दुःखों से रहित होने से " सर्वदुःख - प्रहीण" हुए । उस समय वहां समीपवर्ती देवों ने अहो ! इन गजसुकुमाल मुनि ने श्रमण चारित्र धर्म की अत्यन्त उत्कृष्ट आराधना की है, यह जानकर अपनी वैक्रिय शक्ति के द्वारा दिव्य सुगन्धित अचित्त जल की तथा पाँच वर्णों के दिव्य अचित्त फूलों एवं वस्त्रों की वर्षा की, और दिव्य मधुर गीतों तथा गन्धर्व वाद्ययन्त्रों की ध्वनि से आकाश को गुंजा दिया । Maxim 30 : Due to the burning embers kept on the head, most ferocious agony took place in the body of monk Gaja Sukumāla, that was much fiery, acute and untolerable. Even so, monk Gaja Sukumāla bore it with even mind, not becoming wrathful towards brāhmaṇa Somila, even a bit. At that time, bearing such an acute painful, fiery, untolerable agony with calm and equanimous mind friar Gaja Sukumala entered the eighth stage of spiritual develop-ment stage-Apurwakaraṇa by his auspicious thoughts and feelings, destroying the karmas which envelop soul-virtues. By it monk Gaja Sukumāla attained infinite knowledge and perception. Thereafter his duration completed and he became perfected (until) and free of all miseries and pains. अष्टम अध्ययन For Private Personal Use Only • १०५ Page #165 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Thus by exhaustion (destruction) of all karmas houseless mendicant Gaja Sukumāla became emancipated (who has nothing to do) omniscient-knower of every thing in Loka and Aloka, supreme calm (parinivritta)-being free from all karmas, and becoming free from all mental and bodily pains he became free from all miseries (sarvaduhkha prahina). At that time the nearby gods knowing that-monk Gaja Sukumāla has propiliated sage-order with supremity' they rained the divine fragrant non-sensient water, showered divine non-sensient flowers of five colours and clothes and echoed the sky by celestial song and melody. विवेचन अपुव्यकरणं-अपूर्वकरणम्-अपूर्वकरण शब्द का अर्थ है-जिसकी पहले प्राप्ति नहीं हुई-ऐसा भाव या उत्कृष्ट स्थिति का अनुभव । यह आठवें "निवृत्तिबादर गुणस्थान' का भी परिचायक माना गया है । इस गुणस्थान से दो श्रेणियां आरम्भ होती हैं-(१) उपशम श्रेणी और (२) क्षपक श्रेणी । उपशम श्रेणी वाला जीव मोहनीय कर्म की प्रकृतियों का उपशमन करता हुआ ग्यारहवें गुणस्थान तक जाकर रुक जाता है और नीचे गिर जाता है । क्षपक श्रेणी वाला जीव दशवें गुणस्थान से सीधा बारहवें गुणस्थान पर जाकर अप्रतिपाती हो जाता है । आठवें गुणस्थान में आरूढ़ हुआ जीव क्षपक श्रेणी से उत्तरोत्तर बढ़ता हुआ जब बारहवें गुणस्थान में पहुँच जाता है तब समस्त घातीकर्मों का क्षय करता हुआ कैवल्य ज्ञान प्राप्त कर लेता है । तत्पश्चात तेरहवें गुणस्थान में स्थिर होता है । आयु पूर्ण होने पर चौदहवाँ गुणस्थान प्राप्त करके परम कल्याण रूप मोक्षपद को प्राप्त कर लेता है । प्रस्तुत में सूत्रकार ने “अपुव्वकरण" पद देकर गजसुकुमाल के साथ अपूर्वकरण अवस्था का सम्बन्ध सूचित किया है । भाव यह है कि गजसुकुमाल मुनि ने आठवें गुणस्थान में प्रविष्ट होकर उत्तम क्षपक श्रेणी को अपना लिया था । Elucidation Apuvvakarana-Apūrvakarana-This word means-which is never attained before--realisation of the sublime feeling of this stage. It is also taken as the eighth १०६ अन्तकृद्दशा सूत्र : तृतीय वर्ग Page #166 -------------------------------------------------------------------------- ________________ sipirtual development stage named as nivṛtti badara gunasthana. Two steps begin from this stage- (1) Subduative step (upasama śreni) and (2) exhaustive step (kṣapaka śreņi). The mendicant who takes subduative step he stops reaching the eleventh stage of spiritual development and falls down from that stage. The mendicant who takes exhaustive step he does not touch eleventh stage and reaches twelfth from tenth stage in a jumping way and becomes unfallible. Really the mendicant taking exhaustive step raises up one after another development stage, but not touching eleventh reaches twelfth directly. Then exhausting all ghātī (soulbinding) karmas attains infinite knowledge and perception. Then crossing twelfth stage he stays himself in thirteenth stage of spiritual development and remains there till whole life but a little span of period. During this period he enters in fourteenth stage of spiritual development and within a few seconds becomes emancipated and reaching on the top of loka enjoys soul-bliss upto infinite time. In the present maxim scripturist giving the word apuvvkaraṇa pointed out the relativeness of apurvakaraṇa with monk Gaja Sukumāla. Its inherent idea is this, that monk Gaja Sukumāla entering the eighth stage of spiritual development had taken the exhaustive step. सूत्र ३१ : तए णं से कण्हे वासुदेवे कल्लं पाउप्पभायाए जाव जलते पहाए जाव विभूसिए, हत्थिक्खंधवरगए सकोरंटमल्लदामेणं छत्तेणं धरिज्जमाणेणं सेयवरचामराहिं उद्धव्यमाणीहिं महया भड - चडगर - पहकरवंद - परिक्खित्ते बारव णयरिं मज्झं मज्झेणं जेणेव अरहा अरिट्ठणेमी तेणेव पहारेत्थ गमणाए । , तए णं से कण्हे वासुदेवे बारवईए णयरीए मज्झं मज्झेणं णिगच्छमाण एकं पुरिसं पासइ । जुष्णं जरा-जज्जरियं देहं जाव किलंतं महइमहालयाओ इट्टगरासिओ एगमेगं इट्टगं गहाय बहिया रत्थापहाओ अंतोहिं अणुष्पविसमाणं पासइ । तणं से कहे वासुदेवे तस्स पुरिसस्स अणुकंपणट्ठाए हत्थिक्खंधवरगए चेव एगं इट्टगं गिues, गिण्हित्ता बहिया रत्थापहाओ अंतोगिहं अणुप्पवेसिए । अष्टम अध्ययन १०७ Page #167 -------------------------------------------------------------------------- ________________ तए णं कण्हेणं वासुदेवेणं एगाए इट्टगाए गहियाए समाणीए अणेगेहिं पुरिससएहिं से महालए इट्टगस्स रासी बहिया रत्थापहाओ अंतोघरंसि अणुप्पवेसिए। वृद्ध की सहायता सूत्र ३१ उस रात्रि के व्यतीत होने पर दूसरे दिन सूर्योदय की वेला में कृष्ण वासुदेव स्नान कर वस्त्रालंकारों से विभूषित हो, हाथी पर आरूढ़ हुए । वे कोरंट पुष्पों की माला एवं छत्र धारण किये हुए थे । श्वेत एवं उज्ज्वल चामर उनके दायें बायें ढोरे जा रहे थे । अनेक बड़े-बड़े योद्धाओं के समूह से घिरे हुए द्वारका नगरी के राजमार्ग से होते हुए जहां भगवान् अरिष्टनेमि विराजमान थे, वहां के लिये प्रस्थान किया । तब कृष्ण वासुदेव ने द्वारका नगरी के मध्य भाग से जाते समय एक पुरुष को देखा, जो अति वृद्ध, जरा से जर्जरित देह, दुर्बल, अति क्लान्तकुम्हलाया हुआ एवं थका हुआ सा था । उसके घर के बाहर राजमार्ग पर ईंटों का एक विशाल ढेर लगा हुआ था, वह वृद्ध पुरुष उस ढेर में से एक-एक ईंट उठाकर अपने घर में भीतर रख रहा था । उस दुःखी वृद्ध पुरुष को इस तरह एक-एक ईंट उठाते देखकर कृष्ण वासुदेव ने उस पुरुष के प्रति करुणार्द्र होकर उस पर अनुकम्पा करते हुए हाथी पर बैठे-बैठे ही उस ढेर में से एक ईंट उठाई और उसे ले जाकर उसके घर के भीतर रख दी । कृष्ण वासुदेव को इस तरह ईंट उठाते देखकर उनके साथ के अनेकों सैंकड़ों अनुगामी पुरुषों ने भी एक-एक करके ईंटों के उस सम्पूर्ण ढेर को तुरन्त बाहर से उठाकर उसके घर के भीतर पहुँचा दिया । इस प्रकार श्रीकृष्ण के एक ईंट उठाने मात्र से उस वृद्ध जर्जर दुःखी पुरुष का वार-बार चक्कर काटने का कष्ट दूर हो गया । अन्तकृद्दशा सूत्र : तृतीय वर्ग . १०८ . Page #168 -------------------------------------------------------------------------- ________________ वासुदेव श्री कृष्ण द्वारा वृध्द की सहायता R S HELAM 14 - Home... - " १०. Bae . .. . Here N ISHAL. Com Pages: State... -IIPES SOURC 20 Page #169 -------------------------------------------------------------------------- ________________ + 55e चित्रक्रम २० : 6 वृद्ध पुरुष की सहायता दृश्य १ - श्रीकृष्ण वासुदेव प्रातःकाल भगवान अरिष्टनेमि के दर्शन करने राजमार्ग से निकले। राजपथ पर एक अत्यन्त दुर्बल वृद्ध पुरुष को ईंटों के 卐 विशाल ढेर में से एक-एक ईंट उठाकर ले जाते देखा, तो अनुकम्पा भाव से 5 वासुदेव ने स्वयं एक ईंट उठाकर उसके घर के भीतर रख दी। 卐 दृश्य २ - श्रीकृष्ण का अनुसरण करके सभी अनुगामी व्यक्तियों ने एक-एक ईंट उठाकर उसके घर में पहुँचा दी । वृद्ध का कार्य शीघ्र पूर्ण हो गया। Illustration No. 20 : Help of an old man Scene 1. Vasudeva Śri Krsna went out in the morning for paying his respects to Bhagawana Ariṣṭanemi, with his chamberlains and followers. In the way he saw an aged, ican, weak bodied, old man, who was taking one brick from the huge accumulation (heap) of bricks, which was lying on royal-road, and was putting it down inside his home. Then due to compassion Vasudeva picked up one brick from the heap and kept it inside his house. Scene 2. Following this activity of Śrī Kṛṣṇa his followers also took up bricks from the heap and kept inside the house of that old man. फ्र 事 (वर्ग ३ / अध्य. ८) अन्तकृद्दशा सूत्र : चित्र परिचय ( Sec. 3 / Ch. 8 ) 5555555555555 Page #170 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Help of an Oldman Maxim 31: Passing that night and at the dawn of second day Kṛṣṇa Vasudeva bathed and adorned by clothes and ornaments rode on an elephant. He was wearing the garland of Koranta flowers and canopy was on his head, white and best camaras were fanned on his both sides. Surrounded by numerous strong warriors, moving on the royal road started from Dwarakā to go where Bhagawāna Aristanemi was. While going through the middle part of Dwarakā Kṛṣṇa Vasudeva saw a man, who ws too old, with body bathered by old age, weak, wearied and tired. Out of his house, on the royal road a huge heap of bricks was accumulated. That oldman was carrying bricks from that heap one by one and keeping in the inner part of his house. Kṛṣṇa Vasudeva seeing that grieved old man, filled with compassion. Sitting on elephant he took up one brick from that heap and put in the inner part of his house. When the numerous followers saw Śrīkṛṣṇa Vāsudeva putting a brick from that heap then all of them put one brick in the house of that old man. Consequently heap was finished. In this way only taking one brick by Śrīkṛṣṇa, the turmoil of carrying brick of that old bathered bodied man came to an end. सूत्र ३२ : तए णं से कहे वासुदेवे बारवईए णयरीए मज्झं मज्झेणं निग्गच्छइ, निग्गच्छित्ता जेणेव अरहा अरिट्ठणेमी तेणेव उवागए, उवागच्छित्ता जाव वंदइ णमंसइ । वंदित्ता णमंसित्ता गयसुकुमालं अणगारं अपासमाणे अरहं अरिट्टणेमिं वंदइ णमंसइ, वंदित्ता णमंसित्ता एवं वयासी - कहि णं भंते ! से मम अष्टम अध्ययन For Private Personal Use Only 908 Page #171 -------------------------------------------------------------------------- ________________ सहोदरे कणीयसे भाया गयसुकुमाले अणगारे जण्णं अहं वंदामि नम॑सामि । तणं अरहा अरिनेमी कण्हं वासुदेवं एवं वयासी - साहिए णं कण्हा ! गयसुकुमालेणं अणगारेणं अप्पणो अट्टे । तए णं से कण्हे वासुदेवे अरहं अरिट्ठणेमिं एवं वयासी - कहण्णं भंते! गयसुकुमालेणं अणगारेणं साहिए अप्पणो अट्ठे ? सूत्र ३२ : तत्पश्चात वह कृष्ण वासुदेव द्वारका नगरी के मध्य भाग से निकलते हुए जहां सहस्राम्रवन में भगवान् अरिष्टनेमि विराजमान थे, वहां आये। वहां आकर भगवान को वन्दन नमस्कार किया । इसके पश्चात अपने सहोदर लघु भ्राता नवदीक्षित गजसुकुमाल मुनि को " ( वन्दन नमस्कार करने के लिये) इधर-उधर देखा । जब उन्हें मुनि वहां नहीं दिखाई दिये तो भगवान् अरिष्टनेमि को पुनः वन्दन नमस्कार किया और वन्दन - नमस्कार करके भगवान से पूछाप्रभो ! वे मेरे सहोदर लघुभ्राता नवदीक्षित गजसुकुमाल मुनि कहां हैं ? मैं उनको वन्दन नमस्कार करना चाहता हूँ । तब अर्हन्त अरिष्टनेमि ने कृष्ण वासुदेव के प्रश्न का उत्तर देते हुए कहाहे कृष्ण ! गजसुकुमाल मुनि ने जिस प्रयोजन के लिये संयम स्वीकार किया था, वह प्रयोजन, वह आत्मार्थ उन्होंने सिद्ध कर लिया है । यह सुनकर चकित होते हुए कृष्ण वासुदेव ने अर्हन्त प्रभु से प्रश्न कियाभगवन ! गजसुकुमाल मुनि ने अपना प्रयोजन ( अपना आत्मार्थ ) कैसे सिद्ध कर लिया है ? Maxim 32 : After that passing through the middle of Dwārakā city Kṛṣṇa Vasudeva reached Sahasrāmravana, where Bhagawana Aristanemi was present. He bowed down and worshipped Bhagawāna. 990 For Private Personal Use Only अन्तकृद्दशा सूत्र : तृतीय वर्ग Page #172 -------------------------------------------------------------------------- ________________ After that he moved his eyes to see his younger brother newly consecrated monk Gaja Sukuināla to bow down to him; but could not find him there. Then he bowing down to Bhagawāna Aristanemi asked-Bhagawan ! Where is my younger uterine brother the newly consecrated monk ? I want to bow down to him. Then Arihanta Aristanemi replying to the question of Krsna Vasudeva said-Krsna ! The purpose for which Gaja Sukumāla accepted consecration he has attained that. Hearing this worried Krsna Vasudeva asked Arihanta Aristanemi, Bhagawan ! How has Gaja Sukumāla attained his goal (salvation of soul) ? सूत्र ३३ : तए णं अरहा अरिडणेमी कण्हं वासुदेवं एवं वयासी-एवं खलु कण्हा ! गयसुकुमालेणं अणगारेणं ममं कल्लं पुवावरण्ह कालसमयंसि वंदइ णमंसइ । वंदित्ता णमंसित्ता एवं वयासी-इच्छामि णं जाव उवसंप्पज्जित्ताणं विहरइ । तए णं तं गयसुकुमालं अणगारं एगे पुरिसे पासइ । पासित्ता आसुरत्ते जाव सिद्धे । तं एवं खलु कण्हा ! गयसुकुमालेणं अणगारेणं साहिए अप्पणो अढे । तए णं से कण्हे वासुदेवे अरहं अरिट्ठणेमिं एवं वयासीसे के णं भंते ! से पुरिसे अपत्थियपत्थिए जाव परिवज्जिए, जेणं ममं सहोदरं कणीयसं भायरं गयसुकुमालं अणगारं अकाले चेव जीवियाओ ववरोविए ? तए णं अरहा अरिट्ठणेमी कण्हं वासुदेवं एव वयासी-मा णं कण्हा ! तुमं तस्स पुरिसस्स पओसमावज्जहि । एवं खलु कण्हा ! तेणं पुरिसेणं गयसुकुमालस्स अणगारस्स साहिज्जे दिण्णे । अष्टम अध्ययन .१११ . Page #173 -------------------------------------------------------------------------- ________________ सूत्र ३३ : तब अर्हत् अरिष्टनेमि ने कृष्ण वासुदेव को उत्तर दिया- हे कृष्ण ! वस्तुतः कल के दिन अपराह्न काल के पूर्व भाग में गजसुकुमाल मुनि ने मुझे वन्दन - नमस्कार किया । वन्दन नमस्कार करके इस प्रकार निवेदन कियाहे प्रभु ! आपकी आज्ञा हो तो मैं महाकाल श्मशान में एक रात्रि की महाभिक्षु प्रतिमा धारण करके विचरना चाहता हूँ । मेरी अनुज्ञा प्राप्त होने पर वह गजसुकुमाल मुनि महाकाल श्मशान में जाकर भिक्षु की महा - प्रतिमा धारण करके ध्यानस्थ खड़े हो गये । इसके बाद उन गजसुकुमाल मुनि को एक पुरुष ने देखा और देखकर वह उन पर बहुत क्रुद्ध हुआ ।" इत्यादि समस्त घटनाक्रम सुनाकर भगवान कहा- हे कृष्ण ! उन गजसुकुमाल मुनि ने अपना प्रयोजन सिद्ध कर लिया, अपना आत्मकार्य सिद्ध कर लिया । यह सुनकर कृष्ण वासुदेव भगवान अरिष्टनेमि से इस प्रकार पूछने लगेहे पूज्य ! वह अप्रार्थनीय का प्रार्थी अर्थात् मृत्यु को चाहने वाला निर्लज्ज पुरुष कौन है जिसने मेरे सहोदर लघु भ्राता गजसुकुमाल मुनि का असमय में ही प्राणहरण कर लिया ? तब अर्हत् अरिष्टनेमि कृष्ण वासुदेव से इस प्रकार बोले- हे कृष्ण ! तुम उस पुरुष पर द्वेष मत करो, क्योंकि उस पुरुष ने सुनिश्चित रूप से गजसुकुमाल मुनि को अपना आत्महित एवं अपना प्रयोजन सिद्ध करने में सहायता प्रदान की है । Maxim 33 : Then Arhat Ariṣṭanemi replied to Kṛṣṇa Vasudeva-O Krsna Verily Gaja Sukumāla bowed down to me yesterday in the first part of afternoon and then said-O Lord if you permit me I intend to accept and observe monk's twelfth special resolution (Bhiksu-Mahāpratimā) of one night in Mahākāla cemetry. Getting my permission Gaja Sukumala went to Mahākāla cemetry, accepted ११२ ● अन्तकृदशासूत्र : तृतीय वर्ग For Private Personal Use Only Page #174 -------------------------------------------------------------------------- ________________ the great resolution, stood up and went deep into meditation. Thereafter a man saw monk Gaja Sukumāla and became red in fury. Thus telling full description Bhagawana said-O Kṛṣṇa! thus monk Gaja Sukumāla obtained his goal-the salvation of his soul. Hearing all this Kṛṣṇa began to inquire from Bhagawāna Aristanemi-O Reverend sir! Who is that shameless person, desirous of undesirable-desirous of death. who has untimely made my younger uterine brother monk Gaja Sukumala lifeless. Then Arhat Aristanemi spoke thus to Krsna Vasudeva-O Kṛṣṇa! Do not be invidious towards that person. because really he became helpful to monk Gaja Sukumala for attaining his goal-purification of soul. सूत्र ३४ : कण्णं भंते ! तेणं पुरिसेणं गयसुकुमालस्स णं साहिज्जे दिन्ने ? तए णं अरहा अरिट्ठनेमी कण्हं वासुदेवं एवं वयासी से नूणं कण्हा ! तुमं मम पायवंदए, हव्वमागच्छमाणे बारवईए जयरीए एगं पुरिसं पाससि जाव अणुप्पवेसिए । जहा णं कण्हा तुमं तस्स पुरिसस्स साहिज्जे दिणे । एवमेव कण्हा ! तेणं पुरिसेणं गयसुकुमालस्स अणगारस्स अगभव-सय- सहस्स- संचियं कम्म उदीरेमाणेणं बहुकम्मणिज्जर साहिज्जे दिण्णे । तए णं से कण्हे वासुदेवे अरहं अरिट्टणेमिं एवं वयासी - से णं भंते ! पुरिसे मए कहं जाणियव्वे ? तए णं अरहा अरिट्ठणेमी कण्हं वासुदेवं एवं बयासी - जेणं कण्हा ! तुमं बारवईए यरी अणुष्पविसमाणं पासित्ता टियए चेव टिइभेएणं कालं करिस्सइ तए णं तुमं जाणिज्जासि, एस णं से पुरिसे । प्रथम अध्ययन For Private Personal Use Only ११३ Page #175 -------------------------------------------------------------------------- ________________ सूत्र ३४ : यह सुनकर कृष्ण वासुदेव ने पुनः आश्चर्यपूर्वक प्रश्न किया-हे भगवन् ! उस पुरुष ने गजसुकुमाल मुनि को सहायता दी, यह कैसे ? अर्हत अरिष्टनेमि ने कृष्ण वासुदेव को इस प्रकार स्पष्ट उत्तर दिया-हाँ कृष्ण ! निश्चय ही उसने सहायता की । यथा-मेरे चरण वन्दन हेतु शीघ्रता पूर्वक आते समय तुमने द्वारका नगरी में एक वृद्ध पुरुष को देखा और उसके घर के बाहर राजमार्ग पर पड़ी ईंटों की विशाल राशि में से तुमने एक ईंट उस वृद्ध के घर में ले जाकर रख दी। तुम्हें एक ईंट रखते देखकर तुम्हारे साथ के सब पुरुषों ने भी उन ईंटों को उठा-उठाकर उस वृद्ध पुरुष के घर में पहुंचा दिया और ईंटों की वह विशाल राशि इस तरह तत्काल राज-मार्ग से उठकर उस वृद्ध के घर में चली गई । इस तरह तुम्हारे इस सहकार से उस वृद्ध पुरुष का उस ढेर की एक-एक ईंट उठाकर ढोने का कष्ट दूर हो गया । हे कृष्ण ! वास्तव में जिस तरह तुमने उस पुरुष का कष्ट दूर करने में सहायता की, उसी तरह उस पुरुष ने भी अनेकानेक लाखों (शत-सहस्र) भवों के संचित कर्म की राशि की उदीरणा करने में संलग्न गजसुकुमाल मुनि को उन कर्मों की सम्पूर्ण निर्जरा करने में सहायता प्रदान की है। यह सुनकर कृष्ण वासुदेव ने अर्हत अरिष्टनेमि से इस प्रकार पूछा-हे भगवन् ! मैं उस पुरुष को किस प्रकार पहचान सकूँगा ? भगवान् अरिष्टनेमि कृष्ण वासुदेव से इस प्रकार बोले-हे कृष्ण ! यहाँ से लौटते समय जब तुम द्वारका नगरी में प्रवेश करोगे, उस समय तुम्हें देखकर जो पुरुष भयभीत हो उठेगा और वहीं खड़े-खड़े ही आयूष्य पूर्ण हो जाने से मृत्यु को प्राप्त हो जायेगा। तुम समझ लेना कि निश्चयरूपेण यही वह पुरुष है । Maxim 34 : Hearing this Srikrsna Vāsudeva was non-plussed again and asked-O Bhagawan ! That person became helpful to monk Gaja Sukuāla (attaining his end). How is it so ? . ११४ अन्तकृद्दशा सूत्र : तृतीय वर्ग Page #176 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Then Arhat Aristanemi clearly replied to Vasudeva Srikrisna in this way--Yes Kasna ! Definitely he helped. When you were coming to bow down to me then you saw an old man carrying one brick from the heap of bricks which was accumulated before his house on the main road. You had picked up one brick and carrying that placed it in his house. Seeing you putting one brick all of your followers, picking up those bricks put down in the house of that old man. Thus hy your this help the turmoil of putting down those bricks one by one inside his house finished. O Krsna ! Just as you lent aid to finish that oldman's turmoil, in the same way O Krsna ! that person also aided Gaja Sukumāla monk to completely annihilate the accumulated karmas of numerous previous births. Hearing this Srikrsna Vasudeva asked Arhat Aristanemi - Bhagawan ! How can I recognise that person ? Bhagawāna Aristanemi spoke thus unto Vāsudeva Sriks?na-OKrsna ! Returning from here when you will enter Dwārakā city, at that time seeing you the person who will be frightened and standing there due to completion of life span will die. You should consider that definitely he is the person concemed. सूत्र ३५ : तए णं से कण्हे वासुदेवे अरहं अरिट्ठणेमिं बंदइ णमंसइ । वंदित्ता णमंसित्ता जेणेव आभिसेयं हत्थिरयणं तेणेव उवागच्छइ; उवागच्छित्ता हत्थिं दुरूहइ; दुरूहित्ता जेणेव बारवई णयरी, जेणेव सए गिहे तेणे पहारेत्थ गमणाए। तए णं तस्स सोमिलस्स माहणस्स कल्लं जाव जलंते अयमेयारूवे अज्झथिए चिंतिए पत्थिए मणोगए संकप्पे जाव समुप्पण्णे । अष्टम अध्ययन .११५. Page #177 -------------------------------------------------------------------------- ________________ एवं खलु कण्हे वासुदेवे अरहं अरिट्ठणेमिं पायवंदए निग्गए तं नायमेयं अरहया, विण्णायमेयं अरहया, सुयमेयं अरहया, सिट्ठमेयं अरहया भविस्सइ कण्हस्स वासुदेवस्स । तं न णज्जइ णं कण्हे वासुदेवे ममं केण वि कु-मारेणं मारिस्सइ त्ति कटु भीए सयाओ गिहाओ पडिणिक्खमइ । पडिणिक्खमित्ता कण्हस्स वासुदेवस्स बारवई णयरिं अणुप्पविसमाणस्स पुरओ सपक्खि सपडिदिसं हव्यमागए । सूत्र ३५ : अपन प्रश्न का समाधान पाकर कृष्ण वासुदव अरिष्टनमि का वन्दन नमस्कार कर जहां अपना प्रधान हस्तिरत्न खड़ा था, वहाँ पहुँचकर उस हाथी पर आरूढ़ हा और अपन गजप्रासाद की आर चल पड़ । उधर उय सामिल ब्राह्मण के मन में दूसरे दिन सूर्योदय होते ही इस प्रकार का विचार उत्पन्न हुआ(आज) निश्चय ही कृष्ण वासुदेव अरिहंत अरिष्टनेमि के निकट वन्दन करने के लिए गय हांगे । व ता सर्वज्ञ हैं. उनस काई वात छिपी नहीं है । उन्हांन गजमुकुमाल की मृत्यू और मर ककत्य सम्वन्धी सव वृत्तान्त जान लिया होगा, आद्योपान्त पूर्णतः विदित कर लिया हांगा । अर्हन्त अरिष्टनमि ने अवश्यमंव कृष्ण वासुदेव को यह सव कुछ बता दिया होगा । तो ऐसी स्थिति में कृष्ण वासुदव क्रोधित होकर मुझे न मालूम किय प्रकार की मौत से मारेंगे। एया विचार कर वह इग, भयाक्रान्त हुआ. और घर से निकला, नगर में कहीं दूर भागने का निश्चय किया । उसनं सांचा कि श्रीकृष्ण तो राजमार्ग से लौटेंगे। इसलिए मैं किसी छोटी गली के रास्ते से निकल भागें और उनके लौटने से पूर्व ही निकल जाऊँ। ऐसा सोचकर वह अपने घर से निकला आर गली के रास्त से भागा । इधर कृष्ण वासुदेव भी अपने लघु-सहोदर भाई गजसुकुमाल मुनि की अकाल मृत्यु के शोक ये विह्वल होने के कारण राजमार्ग छोड़कर उसी गली के रास्ते स लौट रहे थे । . ११६. अन्तकृदशा सूत्र : तृतीय वर्ग Page #178 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Satisfied with reply of his question Krsna Väsudeva bowed down and did reverence to Arhat Aristanemi, went to the place where his excellent elephant was standing, rode on it and started towards his royal palace. On the other side, as the sun shone with lustre, such thoughts arose in the mind of Somila Brāhmana Today, Krsna Vásudera must have definitely gone to how down to Arhat Aristanemi. He is omniscient. Nothing is hidden from him. He must have known all details about death of Gaja Sukunāla and my ill-deed. Arihanta Aristanemi must have told everything to Krsna Vasudera. In these conditions, becoming agitated Krsna Vasudeva will kill me in a cruel manner that I do not know. Thinking thus he was frightened, came out of home and decided to run far away out of the city. Ile thought-K!$na will return via royal road. Therefore I should run away through any small street and get out of the city before he returns. Thinking thus, he came out his home and ran through a small street. Krsna Väsudeva was full of sorrow due to the cruel death of his younger brother monk Gaja Sukumāla. So he was returning through the same street. सूत्र ३६ : तए णं से सोमिले माहणे कण्हं वासुदेवं सहसा पासित्ता भीए, ठिए चेव ठिइभेएणं कालं करेइ । करित्ता धरणितलंसि सव्वंगेहिं धस त्ति सण्णिवडिए । तए णं से कण्हे वासुदेवे सोमिलं माहणं पासइ, पासित्ता एवं वयासीएस णं भो देवाणुप्पिया ! से सोमिले माहणे अपत्थियपत्थए जाव परिवज्जिए । जेण ममं सहोयरे कणीयसे भायरे गयसुकुमाले अणगारे अकाले चेव जीवियाओ ववरोविए, त्ति कटु । अष्टम अध्ययन . ११७ Page #179 -------------------------------------------------------------------------- ________________ सोमिलं माहणं पाणेहिं कडूढावेइ, कडूढावित्ता, तं भूमिं पाणिएणं अन्भुक्खावेइ, अन्भुक्खावित्ता जेणेव सए गिहे तेणेव उबागए। सयं हिं अणुवि । एवं खलु जंबू ! समणेणं भगवया जाव संपत्तेणं अट्टमस्स अंगस्स अंतगडदसाणं तच्चस्स वग्गस्स अट्ठमस्स अज्झयणस्स अयम पण्णत्ते । ( अट्ठमं अज्झयणं समत्तं ) सूत्र ३६ : कृष्ण वासुदेव के द्वारका नगरी में प्रवेश करते समय वह संयोगवश एकदम उनके सामने ही आ जाता है. तब उस समय वह सोमिल ब्राह्मण कृष्ण वासुदेव को अचानक सम्मुख देखकर भयभीत हुआ और जहाँ का तहाँ स्तंभित खड़ा रह गया और वहीं खड़े-खड़े ही स्थिति-भेद से अपना आयुष्य पूर्ण हो जाने से उसका अंग अंग ढीला पड़ गया वह सोमिल “धस" शब्द करता हुआ वहीं भूमि तल पर धड़ाम से गिर पड़ा। उसके प्राण निकल गये । उस समय कृष्ण वासुदेव ने सोमिल ब्राह्मण को (मरकर) गिरता हुआ देखा और देखकर इस प्रकार बोले अरे ओ देवानुप्रियो ! यही वह मृत्यु की इच्छा करने वाला तथा निर्लज्ज एवं शोभाहीन सोमिल ब्राह्मण है, जिसने मेरे सहोदर छोटे भाई गजसुकुमाल मुनि को असमय में ही मृत्यु के मुँह में धकेल दिया है । ऐसा कहकर श्रीकृष्ण वासुदेव ने सोमिल ब्राह्मण के उस शव को चाण्डाली द्वारा घसीटवाकर नगर के बाहर फिंकवा दिया और उस शव से स्पर्श की गई भूमि को पानी से धुलवाया। उस भूमि को पानी से धुलवाकर कृष्ण वासुदेव अपने राजप्रासाद में प्रविष्ट हुए । आर्य सुधर्मा - इस प्रकार हे जम्बू ! मोक्ष को प्राप्त श्रमण भगवान महावीर ने आठवें अंग के तीसरे वर्ग के आठवें अध्ययन का यह भाव प्रतिपादित किया है । (आठवां अध्ययन समाप्त) अन्तकृद्दशासूत्र : तृतीय वर्ग ११८• For Private Personal Use Only Page #180 -------------------------------------------------------------------------- ________________ As Krsna Vāsudeva entered Dwārakā city, perchance, all of a sudden he (Somila) came in front of him. Then that Somila Brāhmaṇa seeing Krsa Vāsudeva was frightened, stunned, remained standing as he was and due to completion of life span the limbs of his body loosened and he (Somila) fell down on the ground with a great sound dhadāma. He became lifeless. Krsna Väsudeva saw Soinila falling down dead, so he spokeO beloved as gods ! This is the person desirous of death, shameless Somila Brāhmana who has untimely killed my younger uterine brother monk Gaja Sukumāla. Saying thus Krsna Vāsudeva caused to be pulled and thrown the corpse of Somila by Candālas He then got washed the land touched by the dead body of Somila. And then he entered his palace. Ārya Sudharmā- Thus () Jambī ! Liberated Sramana Bhgawāna Mahāvīra expressed such subject matter of eighth chapter of third section of eighth anga. [Eighth Chapter Councluded] नवम अध्ययन सूत्र ३७ : णवमस्स उक्वेवओ। एवं खलु जंबू ! तेणं कालेणं तेणं समएणं बारवईए णयरीए जहा पढमए जाव विहरइ। तत्थ णं बारवईए बलदेवे णामं राया होत्था । वण्णओ । तस्स णं बलदेवस्स रण्णो धारिणी णामं देवी होत्था । वण्णओ । नवाँ अध्ययन .११९ . Page #181 -------------------------------------------------------------------------- ________________ तए णं सा धारिणी । सीहं सुमिणे, जहा गोयमे णवरं सुमुहे णामं कुमारे, पण्णासं कण्णाओ । पण्णासंओ दाओ, चोद्दसपुव्वाइं अहिज्जइ । वीसं वासाइं परियाओ । सेसं तं चेव जाव सेत्तुंजे सिद्धे । निक्वेवओ। (नवमं अज्झयणं समत्तं) सूत्र ३७ : आर्य सुधर्मा से पुनः जम्बू स्वामी पूछते हैं कि हे भगवन् ! श्रमण भगवान महावीर स्वामी ने अंतकद्दशांग सूत्र के तीसरे वर्ग के आठवें अध्ययन के जो भाव कहे वे मैंने आपसे सुने। हे भगवन ! अव आगे नवमें अध्ययन में उन्होंने क्या भाव फरमाये हैं ? सो कृपा कर वतावें । आर्य सुधर्मा स्वामी ने कहा-हे जम्बू ! उस काल, उस समय में द्वारका नाम की नगरी थी जिसका वर्णन पूर्व में किया जा चुका है । एक दिन भगवान् अरिष्टनेमि विहार करते हुए उस नगरी में पधारे । द्वारका नगरी में वलदेव नाम के राजा थे । उनकी धारिणी नाम की रानी थी । वह अत्यन्त सुकोमल, सुन्दर एवं गुण सम्पन्न थी । एक समय सुकोमल शय्या पर सोई हुई धारिणी देवी ने रात को सिंह का स्वप्न देखा (स्वप्न देखकर वह जाग गई । उसी समय अपने पति के पाय जाकर स्वप्न का वृत्तान्त उन्हें सुनाया । यावत् स्वप्न पाटकों से स्वप्न फल पूछकर गर्भ की देखभाल करती रही। गर्भ समय पूर्ण होने पर स्वप्न क अनुसार उनके यहां एक पुण्यशाली पुत्र का जन्म हुआ) उसके जन्म, वाल्यकाल आदि का वर्णन गौतम कुमार के समान समझना चाहिए । विशेष में, उस बालक का नाम सुमुख रखा गया। युवा होने पर पचास कन्याओं से साथ उसका पाणिग्रहण संस्कार हुआ । विवाह में पचास-पचास करोड़ सोनैया आदि का प्रीतिदान उसे मिला । भगवान अरिष्टनेमि के किसी समय वहां पधारने से उनका धर्मोपदेश सुनकर सुमुख कुमार उनके पास दीक्षित हो गया । दीक्षित होकर चौदह अन्तकृद्दशा सूत्र : तृतीय वर्ग Page #182 -------------------------------------------------------------------------- ________________ : पूर्व का ज्ञान पढ़ा । बीस वर्ष तक श्रमण दीक्षा पाली । अन्त में गौतम की तरह संलेखणा यावत् संथारा करके शत्रुंजय पर्वत पर सिद्ध कुमार हुए हे जम्बू ! श्रमण भगवान् महावीर ने अन्तकृद्दशा के तीसरे वर्ग के नवमें अध्ययन में उपरोक्त भाव कहे हैं । ( नवम अध्ययन समाप्त) Chapter 9 Maxim 37: Jambū Swāmi further requests Ārya Sudharmā O Bhagawan! I have heard from you the subject matter as expressed by Śramaṇa Bhagawāna Mahāvīra of eighth chapter of third section of Antakṛddaśānga Sutra, O Bhagawan! What is the subject matter he expressed in the ninth chapter? Please tell me now. Ārya Sudharma said-O Jambū ! At that time and at that period there was a city named Dwārakā. Its description has been given in previous pages. One day Bhagwāna Aristanemi reached there. There was a ruler named Baladeva in Dwarakā city. His queen was Dhāriņī. She was very tender, beautiful and virtuous. Some time, Dhāriņi was sleeping on her comfortable bed. She saw a lion in dream. She woke up seeing this dream. Then, she went to her husband and told about her dream. She enquired the consequences of dream from dreamtellers and nurtured her foetus carefully. On completion of pregnancy period, according to the dream queen gave birth to a fateful son. The description of birth, childhood etc., should be known as of Gautama Kumara. Excepting; the name of this son was Sumukha. Becoming young he was married to fifty maidens. At the time of marriage he got gift of fifty-fifty Karoda (five hundred millions) gold coins etc. Once Bhagawāna नवाँ अध्ययन For Private Personal Use Only 929 Page #183 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Aristanemi came there. Listening his sermon Sumukha Kumārú accepted consecration. Then he studied fourteen Purras. For twenty years he practised consecration. In the end, like Gautama Kumāra, he practised samlekhana santhara and became emancipated from mountain Satrunjava. ( Jambū ! śramana Bhagawāna Mahāvīra expressed such subject matter in ninth chapter of third section of Antakrddaśā Sūtra. [Nineth Chapter Concluded) अध्ययन १०-१३ सूत्र ३८ : एवं दुम्मुहे वि । कूवदारए वि । दोण्हं वि बलदेवे पिया धारिणी माया । दारुए वि एवं चेव, णवरं वसुदेवे पिया, धारिणी माया । एवं अणादिट्ठी वि, वसुदेवे पिया धारिणी माया । एवं खलु जंबू ! समणेणं जाव संपत्तेणं अट्ठमस्स अंगस्स अंतगडदसाणं तच्चस्स वगस्स तेरसमस्स अज्झयणस्स अयमढे पण्णत्ते त्ति बेमि । (तृतीय वर्ग समाप्त) सूत्र ३८ : जिस प्रकार प्रभु ने नवमें अध्ययन का भाव फरमाया है, उसी प्रकार दसवें “दुर्मुख'' और ग्यारहवें 'कूवदारक' का भी वर्णन जान लेना चाहिए। अन्तर इतना है कि दोनों के पिता बलदेव महाराज और माता धारिणी थी, वाकी इनका सारा वर्णन "सुमुख'' के समान ही समझना चाहिए । इसी तरह बारहवें में 'दारुक" और तेरहवें में 'अनाधृष्टि कुमार' का वर्णन समझना। इसमें अन्तर केवल इतना ही है कि इनके पिता वसुदेव और धारिणी माता थी। . १२२ . अन्तकृद्दशा सूत्र : तृतीय वर्ग Page #184 -------------------------------------------------------------------------- ________________ श्री सुधर्मा स्वामी ने कहा-इस तरह हे जम्बू! श्रमण यावत् मोक्ष को प्राप्त भगवान महावीर ने आठवें अंग अंतगडदशा सूत्र के तीसरे वर्ग के एक से लेकर तेरह अध्ययनों का यह भाव फरमाया है । (तृतीय वर्ग समाप्त) Chapter 10-13 Maxim 38 : As th Lord (Bhagawāna) expressed the subject matter of ninth chapter so should be known the subject matter of tenth chapter Durmukha and eleventh chapter Kūvadāruka. Excepting; father of both of them was ruler Baladera and mother was Dhāriņī. All the remaining description is like that of Sumukha Kumāra. In the same way the description of twelfth chapter Dāruka and thirteenth chapter Anādrsti Kumāra should be known. Excepting; father of these both was Vasudeva and mother was Dhārini. Śrī Sudharma Swami said-0 Jambū ! Liberated Bramaņa Bhagawāna Mahāvīra thus, expressed the subject matter of third section of Antakrddaśā Sūtra in chapters one to thirteen. [Third section finished] १०-१३अध्ययन • 9R3 Page #185 -------------------------------------------------------------------------- ________________ चतुर्थ वर्ग अध्ययन १ से १० सूत्र १: जइ णं भंते ! समणेणं भगवया महावीरेणं जाव संपत्तेणं अट्ठमस्स अंगस्स अंतगडदसाणं तच्चस्स वग्गस्स अयमढे पण्णत्ते । चमत्थस्स णं भंते ! वग्गस्स अंतगडदसाणं समणेणं जाव संपत्तेणं के अढे पण्णत्ते ? एवं खलु जंबू ! समणेणं जाव संपत्तेणं चउत्थस्स वग्गस्स अंतगडदसाणं दस अज्झयणा पण्णत्ता । तं जहा जालि' मयालि२ उवयालि३ पुरिससेणे य वारिसेणे य । पज्जुण्ण६ संब' अणिरुद्धे, सच्चणेमी य दढणेमी१० ॥ १ ॥ सूत्र १ : श्री जम्बू स्वामी ने प्रश्न किया- हे भगवन् ! श्रमण भगवान महावीर ने आठवें अंग अंतकृद्दशा के तीसरे वर्ग का जो वर्णन किया वह मैंने आपसे सुना है । अव अंतकद्दशा सूत्र के चौथे वर्ग के श्रमण भगवान महावीर ने क्या भाव बताये हैं, यह भी मुझे बताने की कृपा करें । श्री सुधर्मा स्वामी ने कहा-हे जम्बू ! श्रमण भगवान महावीर ने अंतकृद्दशा के चौथे वर्ग के दस अध्ययन कहे हैं, जो इस प्रकार हैं१. जालिकुमार, २. मयालिकुमार, ३. उवयालिकुमार, ४. पुरुषसेन कुमार, ५. वारिसेन कुमार, ६. प्रद्युम्न कुमार, ७. शाम्ब कुमार, ८. अनिरुद्ध कुमार, ९. सत्यनेमि कुमार, १०, दृढ़नेमि कुमार ।। . १२४ . अन्तकृद्दशा सूत्र : चतुर्थ वर्ग Page #186 -------------------------------------------------------------------------- ________________ FOURTH SECTION Chapters 1 to 10 axim 1: Śri Jambū Swāmī asked-I have heard from you, the subject matter expressed by Sramana Bhagawāna Mahāvīra of third section of Eighth Anga Antakrddasā Sūtra. Now please tell me the subject matter of fourth section of this Sūtra as described by Sramana Bhagawāna. Mahāvīra. Sri Sudharmā Swāmī told-O Jambū ! Sramana Bhagawāna Mahāvīra has narrated ten chapters of fourth section of Antakyddaśā Sūtra. These are1. Jāli Kumāra 2. Mayāli Kumāra. 3. Uvayāli Kumāra 4. Purusasena Kumāra. 5. Vārisena Kumāra 6. Pradyumna Kumāra. 7. Šāmba Kumāra 8. Aniruddha Kumāra 9. Satvanenii Kumāra and 10. Drdhanemi Kunara. सूत्र २ : जइ णं भंते ! समणेणं जाव संपत्तेणं चउत्थस्स बग्गस्स दस अज्झयणा पण्णत्ता । पढमस्स णं भंते ! अज्झयणस्स समणेणं जाव संपत्तेण के अटे पण्णत्ते ? एवं खलु जंबू ! तेणं कालेणं तेणं समएणं बारवई णयरी होत्था, जहा पढमे । कण्हे वासुदेवे आहेवच्चं जाव विहरइ । तत्थ णं बारवईए णयरीए वसुदेवे राया, धारिणी देवी, वण्णओ । सूत्र २ श्री जम्बू स्वामी ने पूछा-हे भगवन् ! श्रमण भगवान महावीर ने चौथे वर्ग के दस अध्ययन कहे हैं । तो उनमें से प्रथम अध्ययन का क्या अर्थ बतलाया १-१० अध्ययन . १२५ . Page #187 -------------------------------------------------------------------------- ________________ श्री सुधर्मा स्वामी ने कहा-हे जम्बू ! उस काल, उस समय में द्वारका नाम की नगरी थी, जिसका वर्णन प्रथम वर्ग के प्रथम अध्ययन में किया जा चुका है । श्री कृष्ण वासुदेव वहां राज्य कर रहे थे । उस द्वारका नगरी में महाराज वसुदेव और रानी धारिणी निवास करते थे । रानी धारिणी अत्यन्त सुकुमार सुन्दर और सुशीला थी । एक समय कोमल शय्या पर सोती हुई धारिणी रानी ने सिंह का स्वप्न देखा। उस स्वप्न का वृत्तान्त उसने अपने पतिदेव को सुनाया। यावत् स्वप्न फल आदि का वर्णन पूर्ववत् समझना चाहिए । Maxim 2 : Sri Jambu Svāmi asked-() Bhagavan ! Sramana Bhagawāna Mahāvīra has told ten chapters of fourth section. What subject matter has he expressed in first chapter ? Sri Sudharmā Swāmi said-O Jambū ! At that time and at that period there was a city named Dwarakā. Its description has been given in the first chapter of first section. Sri Krsna Väsudeva was ruling over it. In that Dwārakā city there lived king Vasudeva and his queen Dhárini. Queen Dharini was most tender, beautiful and chaste woman. Once she was sleeping on a comfortable bed when she saw a lion in dream. She told her dream to her husband. The description of dream etc. should be known as described before (in previous pages). जहा गोयमो, णवरं जालिकुमारे पण्णासओ दाओ । बारसंगी सोलस वासा-परियाओ । सेसं जहा गोयमस्स जाव सेत्तुंजे सिद्धे । एवं (२) मयालि (३) उवयालि, (४) पुरिससेणे, (५) वारिसेणे, य । एवं (६) पज्जुण्णे वि, णवरं कण्हे पिया, रुप्पिणी माया । एवं (७) संबे वि, नवरं जंबवई माया । एवं (८) अनिरुद्धे वि, णवरं पज्जुण्णे पिया, १२६ . अन्तकृद्दशा सूत्र : चतुर्थ वर्ग . Page #188 -------------------------------------------------------------------------- ________________ वेदन्भी माया । एवं (९) सच्चणेमी णवरं समुद्दविजये पिया, सिवा माया । एवं (90) दढणेमी वि । सव्ये एगगमा । चउत्थस्स वग्गस्स णिक्खेवओ । (चतुर्थ वर्ग समाप्त ) इसके बाद पूर्व में वर्णित गौतम कुमार की तरह उनके एक तेजस्वी पुत्र का जन्म हुआ, जिसका नाम “जालिकुमार'' रखा गया । जब वह युवावस्था को प्राप्त हुआ तव उरका विवाह पचास कन्याओं के साथ किया गया और उन्हें पचास-पचास करोड़ सोनैया आदि का प्रीतिदान मिला। संक्षेप में वर्णन इस प्रकार समझना चाहिएएक समय भगवान् अरिष्टनेमि वहाँ पधारे । उनका धर्मोपदेश सुनकर जालिकुमार को संसार से विरक्ति हो गई । माता-पिता की आज्ञा लेकर उन्होंने अर्हन्त अरिष्टनेमि के पास दीक्षा अंगीकार की । बारह अंगों का अध्ययन किया और १६ वर्ष पर्यन्त श्रमण दीक्षा पर्याय पाली। फिर गौतम कुमार की तरह इन्होंने भी संलेखना आदि करके शत्रुजय पर्वत पर एक मास का संथारा किया और सब कर्मों से मुक्त होकर सिद्ध हुए । जालिकुमार की तरह २. मयालिकुमार, ३. उवयालिकुमार , ४. पुरुषसेन कुमार, और ५. वारिसेन कुमार के वर्णन भी समझने चाहिये । ये सभी वसुदेव जी के पुत्र एवं धारिणी रानी के आत्मज थे । इसी तरह छठे प्रद्युम्न कुमार का जीवन चरित्र भी जानना चाहिए । केवल अन्तर इतना जानना चाहिए कि इनके पिता “श्रीकृष्ण'' और माता रुक्मिणी थी। ऐसे ही सातवें शाम्बकुमार का जीवन वर्णन समझना। केवल अन्तर इतना कि इनके पिता श्रीकृष्ण एवं माता जाम्बवती थी । इसी प्रकार आठवें अध्ययन में अनिरुद्ध कुमार का जीवन वर्णन समझना चाहिये, इनके पिता प्रद्युम्न कुमार और माता वैदर्भी थी । १-१० अध्ययन १२७. Page #189 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ऐसे ही नवमें अध्ययन में सत्यनेमि कुमार और दशवें अध्ययन में दृढ़नेमि कुमार का वर्णन समझना चाहिये । इनमें विशेष यह है कि समुद्रविजय जी इनके पिता थे और शिवादेवी इनकी माता थीं (ये दोनों अर्हत अरिष्टनेमि के छोटे भाई थे) । ये सब अध्ययन एक समान वर्णन वाले हैं । यह चौथे वर्ग का उत्क्षेपक सारांश है। श्री सुधर्मा स्वामी ने कहा-इस प्रकार जम्व ! दस अध्ययनों वाले इस चौथे वर्ग का श्रमण भगवान महावीर ने जो भाव प्रतिपादित किया है, वह मैंने तुम्हें सुनाया है । (चौथा वर्ग समाप्त) Maxim 3 : After it, as described before, like Gautama Kumāra, a brilliant son took birth. He was named Jāli Kumāra. When he attained youth he was wedded to fifty young girls and he got fifty-fifty karoda (five hundred millions) gold coins each etc., as wedding-gift. Further description should be known thus in briefOnce Bhagawāna Aristanemi came there. Listening his sermon Jāli Kunára became apathetic to the world. With permission of his parents, he accepted consecration, before Arihanta. Aristanemi. He studied twelve argas (holy scriptures) and practised sage-consecration upto sixteen years. Then like Gautama kumāra, he accepted sailekhanā and practised samthārā for one month on mount Satrunjaya and exhausting all karmas heatified. Like Jāli Kumāra the descriptions of 2. Mayāli Kumāra 3. Uvayāli Kumara 4. Purusasena Kumāra and 5. Vārisena Kumāra should be known. All these were the sons of king Vasudeva and queen Dhāriņi. In the same way the life-character of sixth Pradyumna Kumāra should be known. Excepting; his father was Sri Krsna and mother was Rukmini. . १२८ . अन्तकृद्दशा सूत्र : चतुर्थ वर्ग Page #190 -------------------------------------------------------------------------- ________________ The same is the life description of seventh śāmba Kumāra. Excepting; his father was Šri Krsna and mother was Jāmbavati. Similar is the life-description of Aniruddha kumāra in eighth chapter. Excepting; his father was Pradyumna Kumāra and mother was Vaidarbhi. Similar is the description of Satyanemi in ninth chapter and Drdhanemi in tenth chapter. Excepting; father of these both was Samudravijaya and mother was Sivādevī. As such, these both were the younger brothers of Bhagawāna Aristanemi. All these chapters are alike in description. This is the substance of fourth section. Śri Sudharmā Swāmi said-Thus 0 Jambū ! śramana Bhagawāna Mahāvīra has expressed the subject matter of fourth section containing ten chapters, which I have told you. [Fourth section concluded] 7-90 semea १-१० अध्ययन • 929 Page #191 -------------------------------------------------------------------------- ________________ - पंचम वर्ग सूत्र १: जइ णं भंते ! समणेणं जाव संपत्तेण चउत्थस्स बग्गस्स अयमद्वे पण्णत्ते । पंचमस्स णं भंते ! वग्गस्स अंतगडदसाणं समणेणं जाव संपत्तेणं के अढे पण्णत्ते ? एवं खलु जंबू ! समणेणं जाव संपत्तेणं पंचमस्स वग्गस्स दस अज्झयणा पण्णत्ता । तं जहापउमावई' य गोरी,२ गंधारी लक्खणा सुसीमा य । जंबबई सच्चभामा सप्पिणी- मूलसिरी मूलदत्ताय ॥ जइ णं भंते ! समणेणं जाव संपत्तेणं पंचमस्स वग्गस्स दस अज्झयणा पण्णत्ता । पढमस्स णं भंते ! अज्झयणस्स समणेणं जाव संपत्तेणं के अद्वे पण्णत्ते ? सूत्र १ : आर्य जम्बू-हे भगवन् ! श्रमण यावत् मुक्ति को प्राप्त प्रभु ने चौथे वर्ग का यह अर्थ वर्णन किया है, तो अन्तकदशा के पंचम वर्ग का क्या भाव प्रतिपादन किया है ? आर्य सुधर्मा--हे जम्बू ! इस प्रकार निश्चय ही श्रमण भगवान ने पंचम वर्ग के दस अध्ययन बताये हैं, जिनके नाम इस प्रकार हैं- १. पद्मावती, २. गौरी, ३. गांधारी, ४. लक्ष्मणा, ५, सुसीमा देवी, ६, जाम्बवती, ७, सत्यभामा, ८. रुक्मिणी, ९. मूलश्री, १0. मूलदत्ता । आर्य जम्बू- हे भगवन् मोक्ष प्राप्त श्रमण भगवान महावीर ने पंचम वर्ग के दस अध्ययन कहे हैं, तो प्रथम अध्ययन का क्या अर्थ कहा है ? • १३० . अन्तकृद्दशा सूत्र : पंचम वर्ग Page #192 -------------------------------------------------------------------------- ________________ FIFTH SECTION axim 1: Ārva Jambu asked-( Bhagawan ! If later salvated Bhagawāna thus described subject matter of fourth section then what subject matter did he preach in Antakrddaśa's fifth section ? Ārva Sudharmā told-() Janbū ! Definitely. Sramanca Bhagawana preached ten chapters of fifth section, the names of these chapters are1. Padmāvarī 2. Gauri 3. Gandhari 4. Laksamana 5. Susunā Devī 6. Jāmbavati 7. Satyabhāmā 8. Rukmini 9. Miilasri and 10 Miladatta. Arya Jambit asked-() Bhagathan ! If salvated Sramana Bhaganána Mahavīra had narrated ten chapters of fifth section, then what subject matter did he describe in first chapter ? प्रथम अध्ययन पद्मावती सूत्र २ : एवं खलु जंबू ! तेणं कालेणं तेणं समएणं बारवई णामं णयरी होत्था, जहा पढमे, जाव कण्हे वासुदेवे आहेवच्चं जाव विहरइ । तस्स णं कण्हस्स वासुदेवस्स पउमावई णामं देवी होत्था, वण्णओ । तेणं कालेणं तेणं समएणं अरहा अरिट्ठनेमी समोसढे जाव विहरइ । कण्हे निग्गए जाव पज्जुवासइ । तएणं सा पउमावई देवी इमीसे कहाए लट्ठा समाणी हट्ठ-तुट्ठा-हि जहा, देवई जाव पज्जुवासइ । प्रथम अध्ययन • १३१ . Page #193 -------------------------------------------------------------------------- ________________ तए णं अरहा अरिदुनेमी कण्हस्स वासुदेवस्स पउमावईए य जाव धम्मकहा । परिसा पडिगया । सूत्र २ श्री सुधर्मा स्वामी ने कहा-हे जम्बू ! उस काल उस समय में द्वारका नाम की नगरी थी, जिसका वर्णन प्रथम वर्ग के प्रथम अध्ययन में किया जा चुका है । यावत् श्रीकृष्ण वासुदेव वहां राज्य कर रहे थे । श्रीकृष्ण की पद्मावती नाम की महारानी थी, जो अत्यन्त सुकुमार, सुरूपा और वर्णन करने योग्य थी । उस काल उस समय में अरिहंत अरिष्टनेमि संयम और तप से आत्मा को भावित करते हुए द्वारका नगरी में पधारे । श्री कृष्ण वंदन नमस्कार करने हेतु अपने राजप्रासाद से निकलकर प्रभु के पास पहुँचे यावत् प्रभु अरिष्टनेमि की पर्युपासना करने लगे । उस समय पद्मावती ने भगवान् के आने की खबर सुनी तो वह अत्यन्त प्रसन्न हुई । वह भी देवकी महारानी के समान धर्मरथ पर आरूढ़ होकर भगवान को वंदना करने गई । अर्हत् अरिष्टनेमि की पर्युपासना करने लगी । अरिहंत अरिष्टनेमि ने कृष्ण वासुदेव, पद्मावती देवी और जन परिषद् को धर्मोपदेश दिया, धर्मकथा कही। धर्मोपदेश एवं धर्मकथा सुनकर परिषदा अपने-अपने घर लौट गई । Chapter 1 Padmăvati Maxim 2: Sudharmā Swami uttered-O Jambū ! At that time and at that period, there was a city named Dwarakä. Its description has been given in the first chapter of first section, until that Sri Krsna Väsudeva ruled over it. . १३२ अन्तकृदशा सूत्र : पंचम वर्ग Page #194 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Padıāvati was his queen. She was very tender and beautiful. So she was describable. At that time and at that period, Arihanta Aristanemi enshining his soul by penance and restraint came to Duárakā. For bowing down and worshipping him Sri Krsna started from his royal palace and reaching near Bhagawāna began to worship him. At that time when queen Padmavati heard the auspicious news of arrival of Bhagawāna, she became very glad. She too, like queen Devaki, riding on religious chariot, went to how down to Bhagawāna. She worshiped Arhat Aristanemi. Arihanta Aristanemi preached religious sermon to Krsna Vasudeva, Padmavati Devi and entire congregation. He also told religious tales. Hearing religious sermon, tales and doctrines people went back to their home. सूत्र ३ : तए णं कण्हे वासुदेवे अरहं अरिट्टनेमिं वंदइ णमंसइ । वंदित्ता नमंसित्ता एवं बयासीइमीसे णं भंते ! बारवईए णयरीए दुवालसजोयणआयामाए, णवजोयण-वित्थिण्णाए जाव पच्चक्खं देवलोगभूयाए किं मूलाए विणासे भविस्सइ ? 'कण्हाइ' ! अरहा अरिट्ठणेमी कण्हं वासुदेवं एवं वयासीएवं खलु कण्हा ! इमीसे बारवईए णयरीए दुवालसजोयणआयामाए णवजोयण-वित्थिण्णाए जाव पच्चक्वं देवलोगभूयाए सुर-ग्गि-दीवायण मूलाए विणासे भविस्सइ । द्वारका-विनाश का कारण सूत्र ३ : तब कृष्ण वासुदेव ने भगवान् अरिष्टनेमि को वंदन नमस्कार करके उनसे इस प्रकार प्रश्न किया प्रथम अध्ययन १३३ Page #195 -------------------------------------------------------------------------- ________________ हे भगवन् ! बारह योजन लम्बी और नव योजन चौड़ी यावत् साक्षात् दवलोक के समान इस द्वारका नगरी का विनाश किस कारण से होगा ? -श्रीकृष्ण आदि को सम्बोधित करते हुए अरिहंत अरिष्टनेमि ने इस प्रकार उत्तर दियाहे कृष्ण ! निश्चय ही वारह योजन लम्बी और नव योजन चौड़ी यावत् प्रत्यक्ष देवलोक के समान इस द्वारका नगरी का विनाश मदिरा (सुरा), अग्नि और द्वैपायन ऋषि के कोप के कारण से होगा । Causes of Dwārakı-destruction Maxim 3 : Then bowing down to and worshipping Bhagavana Aristanemi, Vasudera K!?a asked him a question0 Bhagavan ! How twelve yojana long and nine vojanu wide this Dwaraka city that is like heaven, will be destroyed ? Arihanta Aristaneni thus replied unto Krsna VāsudevaOK!sha ! Definitely, twelve yojana long and nine yojana wide this Dwaraka city that is like heaven will be destroyed by wine, fire and anger of Dvaipāvana rişi (penancer); i.e. these three would be the causes of Dilaraka's destruction. सूत्र ४ : तए णं कण्हस्स वासुदेवस्स अरहओ अरिट्ठणेमिस्स अंतिए एयमढे सोच्चा अयमेयारूवे अज्झथिए मणोगए संकप्पे समुप्पण्णेधण्णा णं ते जालि-मयालि-उवयालि-पुरिससेण-वारिसेण-पज्जुण्ण-संबअणिरुद्ध-दढणेमि-सच्चणेमिप्पभिइओ कुमारा जे णं चिच्चा हिरणं जाव परिभाइत्ता अरहओ अरिट्ठणेमिस्स अंतियं मुण्डा जाव पव्वइया । अहण्णं अधण्णे अकयपुण्णे रज्जे य जाव अंतेउरे य माणुस्सएसु य कामभोगेसु मुच्छिए । णो संचाएमि अरहओ अरिट्टनेमिस्स अंतिए जाव पव्वइत्तए। . १३४ अन्तकृद्दशा सूत्र : पंचम वर्ग Page #196 -------------------------------------------------------------------------- ________________ कण्हाइ ! अरहा अरिट्ठणेमी कण्हं वासुदेवं एवं वयासीसे नणं कण्हा ! तव अयं अज्झथिए समुप्पण्णे-'धण्णा णं ते जालि जाव पव्वइत्तए।' से नूणं कण्हा ! अयमढे समढे ? हंता अत्थि । सत्र ४ : अर्हन्त अरिष्टनेमि के श्रीमुख से द्वारका नगरी के विनाश का कारण जानकर श्रीकृष्ण वासुदेव के मन में ऐसा विचार उत्पन्न हुआ कि "व जालि, मयालि, उवयालि, पुरुषसेन, वारिसेन, प्रद्युम्न, शाम्ब, अनिरुद्ध. दृढ़नेमि और सत्यनेमि प्रभृति कुमार धन्य हैं, जो हिरण्यादि (स्वर्ण-रजतरत्नादि) संपदा और परिजनों को छोड़कर यावत् प्रभु अरिष्टनेमि के पास मुण्डित हुए यावत् प्रव्रजित हो गये। मैं अधन्य हूँ, अकृत-पुण्य हूँ, इसलिए कि राज्य, अन्तःपुर और मनुष्य सम्बन्धी काम-भोगों में मूर्छित हूँ, इन्हें त्यागकर भगवान् अरिष्टनेमि के पास प्रव्रज्या लेने में समर्थ नहीं हूँ, ले नहीं पा रहा हूँ।" भगवान अरिष्टनेमि ने कृष्ण वासुदेव के मन में आयं इन विचारों को जानकर आर्तध्यान में डूबे हुए कृष्ण वासुदेव से इस प्रकार कहा“निश्चय ही हे कृष्ण ! तुम्हारे मन में ऐसा विचार उत्पन्न हुआ-वे जालि मयालि आदि कुमार धन्य हैं, जिन्होंने धन, वैभव एवं स्वजनों को त्यागकर मुनिव्रत ग्रहण किया और मैं अधन्य हूँ, अकृतपुण्य हूँ जो राज्य, अन्तःपुर और मनुष्य सम्बन्धी काम-भोगों में ही गृद्ध हूँ । मैं प्रभु के पास प्रव्रज्या नहीं ले सकता ।" हे कृष्ण ! क्या यह बात सही है ? श्रीकृष्ण-हाँ भगवन् ! आपने जो कहा वह सभी यथार्थ है । सत्य है । Maxim 4 : Hearing the impending causes of Divārakā city's destruction from Arihanta Aristaneini, such thoughts प्रथम अध्ययन . १३५ . Page #197 -------------------------------------------------------------------------- ________________ aroused in the mind of Krsna Vasudeva-"Blessed are Jāli, Mayāli, Uvayāli, Purusasena, Vārisena, Pradyumna, Samba, Aniruddha, Drdhnemi, Satyanemi and other princes, who giving up gold, silver, jewels etc. wealth and family members consecrated near Bhagawāna Aristanemi, with shaven heads. I am unblessed and without meritorious deeds, because I am deep drowned in kingdom, harem, and passionate pleasures of man. I am not capable to give up those pleasures and to accept consecration near Bhagawāna Aristanemi and so I can not enter the sage-order. Bhagawana Aristanemi being aware of the mental thoughts of Krsna Vasudera and knowing him deep in inauspicious feelings said thus to Krsna VāsudevaDefinitely o Krsna ! Such thoughts aroused in your mind that blessed are Jāli, Mayāli and other princes, who entered the sage order renouncing welath. fortune and family members. I am unblessed, without meritorious deeds as I am deeply drowned in kingdom, harem, passionate pleasures relating to man. I cannot accept consecration near Bhagawana. () Krsna ! Is it not true ? Sri Krsna replied-Yes Bhagawan ! What you have told, is a fact and true. सूत्र ५ : तं णो खलु कण्हा ! एवं भूयं वा भव्यं वा भविस्सइ वा जण्णं वासुदेवा चइत्ता हिरण्णं जाव पव्वइस्संति । से केणटेणं भंते ! एवं वुच्चइ ‘ण एवं भूयं वा जाव पव्वइस्संति' ? कण्हाइ ! अरहा अरिट्ठनेमी कण्हं वासुदेवं एवं वयासी-एवं खलु कण्हा ! सव्वे वि य णं वासुदेवा पुव्यभवे नियाणकडा से एएणद्वेणं कण्हा ! एवं बुच्चइ ण एवं भूयं जाव पव्वइस्संति ।। अन्तकृद्दशा सूत्र : पंचम वर्ग . १३६. Page #198 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रभु ने कहा-तो हे कृष्ण ! ऐसा कभी हुआ नहीं, होता नहीं, और होगा भी नहीं कि वासुदेव (अपने इसी भव में) धन-धान्य, स्वर्ण, राज्य आदि सम्पत्ति को त्यागकर मुनिव्रत ले लें । वासुदेव दीक्षा लेते नहीं, ली नहीं, एवं भविष्य में कभी लेंगे भी नहीं । श्रीकृष्ण ने पूछा-भगवन् ! ऐसा क्यों, किसलिए कहा जाता है कि ऐसा कभी हुआ नहीं, होता नहीं, और होगा नहीं । तब अर्हत् अरिष्टनेमि ने कृष्ण-वासुदेव को इस प्रकार उत्तर दिया-हे कृष्ण ! निश्चय ही सभी वासुदेव पूर्वभव में निदान-कृत (नियाणा करने वाले) होते हैं, इसलिये मैं ऐसा कहता हूँ कि ऐसा कभी हुआ नहीं, होता नहीं और होगा भी नहीं कि वासुदेव कभी अपनी सम्पत्ति को छोड़कर प्रव्रज्या अंगीकार करें । Maxim 5 : Bhagavāna said-Then OKrsna ! It has never happened. nor is and never will be that any Väsudeva (ruler of three regions of India) in his present birth, giving up cattle and agriculture, gold, kingdom and wealth. may accept sagehood. Vasudeva never accepted consecration in past, cannot accept in present and will not accept in future. Sri Krsna asked-Bhagawan ! Why and what for it is said that it never happened in past, nor can happen in present and never will happen in future ? Then Arhat Aristanemi replied to Sri Krsna Vāsudeva in these words-) Krsna ! all the Vasudevas in their previous births have made a sinful strong volition. Therefore I say that it never happened in past, can not happen in present and never will happen in future that any Vāsudeva may accept consecration giving up all his wealth etc. प्रथम अध्ययन . १३७ . Page #199 -------------------------------------------------------------------------- ________________ विवेचन जैन साहित्य में श्रीकृष्ण को कृष्ण वासुदेव कहा जाता है । वासुदेव शब्द का व्याकरण के आधार पर अर्थ होता है - " वसुदेवस्य अपत्यं पुमान् वासुदेवः ।" वसुदेव के पुत्र को वासुदेव कहते हैं । कृष्ण के पिता का नाम वसुदेव था, अतः इनको वासुदेव कहते हैं । वासुदेव शब्द सामान्य रूप से कृष्ण का वाचक है - कृष्ण का दूसरा नाम है । परन्तु वासुदेव का उक्त अर्थ प्रचलित होने पर भी यह शब्द जैन-दर्शन का पारिभाषिक शब्द बन गया है । अतएव सभी अर्धचक्रवर्तियों के लिए वासुदेव शब्द का प्रयोग किया जाता है । जैन परम्परा के अनुसार इस अवसर्पिणी में वासुदेव नौ हुए हैं - १. त्रिपृष्ठ, २ . द्विपृष्ठ, ३. स्वयंभू, ४. पुरुषोत्तम, ५. पुरुषसिंह, ६. पुरुषपुण्डरीक, ७. दत्त, ८. नारायण (लक्ष्मण), ९. कृष्ण । इनमें कृष्ण अंतिम वासुदेव हैं । वासुदेव का पारिभाषिक अर्थ है- जो सात रत्नों, छह खण्डों में से तीन खण्डों का अधिपति हो तथा जो अनेकविध ऋद्धियों से सम्पन्न हो । जैन- दृष्टि से वासुदेव प्रतिवासुदेव को जीतकर एवं मारकर तीन खण्ड पर एकछत्र राज्य करते हैं । इसके अतिरिक्त २८ लब्धियों में से वासुदेव लब्धि भी एक लब्धि मानी गई है । इस पद का प्राप्त होना वासुदेव - लब्धि का फल है । वासुदेव में महान बल होता है । इस बल का उपमा द्वारा वर्णन करते हुए जैनाचार्यों ने कहा है - कुँए के किनारे बैठे हुए और भोजन करते हुए वासुदेव को जंजीरों से बाँध कर यदि चतुरंगिणी सेना सहित सोलह हजार राजा मिलकर खींचने लगें तो भी वे उन्हें खींच नहीं सकते, किन्तु उसी जंजीर को बाएँ हाथ से पकड़कर वासुदेव अपनी ओर उन्हें आसानी से खींच सकते हैं। जैन आगमों में जिन श्री कृष्ण का उल्लेख है वे ऐसे ही वासुदेव हैं, वासुदेव-लब्धि से सम्पन्न हैं । नियाणकडा - (निदानकृत) निदान जैन परम्परा का एक विशेष पारिभाषिक शब्द है । मोहनीय कर्म के उदय से कामभोगों की इच्छा होने पर साधु, साध्वी, श्रावक और श्राविका आदि का अपने चित्त में संकल्प कर लेना कि मेरी तपस्या से मुझे अमुक फल की प्राप्ति हो, उसे निदान कहते हैं । जन भाषा में इसे नियाणा कहते हैं । निदान कल्याण साधक नहीं । जो व्यक्ति निदान करके मरता है, उसका फल प्राप्त करने पर भी उसे निर्वाण की प्राप्ति नहीं हो सकती । वासुदेव की पदवी पूर्वभव में किये गये निदान का फल होता है, अतः वासुदेव के भव में कोई जीव संसार त्यागकर साधु नहीं बन सकता । (निदान के विषय में विस्तृत वर्णन अन्तकृदशा महिमा में देखें) १३८ • For Private Personal Use Only अन्तकृद्दशा सूत्र : पंचम वर्ग Page #200 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Elucidation In Jain literature Sri Krsna is called Krsna Väsudeva. According to grammatical basis the meaning of word Vasudevu is-the son of Vasudeva (Vasudevasya apatyam pumān Vāsudevaḥ). The name of Krsna's father was Vasudeva. So he is called Väsudeva word Väsudeva generally denotes Krsĩa. Really it is Krsnu's other name. Though this meaning of word Vāsudeva is generally in vogue, yet this word became technical in Jainology. Hence Vāsudeva word is used for all monarchs or sovereings of half the land (rulers of three regions of India). According to Jain tradition, there became nine Vasudevas in this Avasarpiņi kāla (time era). The names of these are-1. Triprstha, 2. Dwiprstha, 3. Swayambhū, 4. Purusoitama, 5. Purușasingha, 6. Puruşupundarika 7. Datta, 8. Nārāyana (Luxmaņa) and 9. Krsna. Among all these Krsna is the last Vāsudeva. According to Jain tradition Vasudeva is an appellation. As such, this technical term indicates the person who has seven gems, the ruler of three regions out of six regions (of India) and has many occult powers. According to Jain-view, Vasudeva, conquering and killing Prati-Vāsudeva, rules over three regions as the only monarch. Besides this, among twenty eight high occult powers, Vasudeva speciality is also considered as special occult power. To obtain this dignity is the fruition of Vasudeva occult power. Väsudeva has enormous strength and power. Juinācāryas have described this strength and power by a simile-Sitting on the bank of a well and eating food there, the Vasudeva, if binded by iron chains if pulled by sixteen thousand rulers with their fourfold army using their full power cannot pull him; but if Vasudeva wishes he can pull all of them towards himself easily by his only left hand, with the medium of the same iron chain. The description of Sri Krsna that we find in Jain holy scripture (ägumas) is opulent with the same Vāsudeva occult power. Niyāna kada-Nidānakrta-Nidāna is a special technical word in Jain tradition. Due to the rise of infatuation relating karma when the sage, nun, laymen or lay women make a sinful strong volition in heart that as the fruition of the austerity I must obtain such and such thing, it is called sinful resolution (Nidāna). Generally people term it in folk language as niyānā. Volition never brings bliss. प्रथम अध्ययन • 938 • Page #201 -------------------------------------------------------------------------- ________________ The person, who dies making a sinful resolution, even after getting the fruit according to that resolution, he cannot attain salvation. The appellation of Vasudeva is the fruit of sinful strong volition made in previous birth. Hence, in the life span of Vāsudeva no person can enter monk-order, giving up worldly pleasures. For detailed study of sinful strong volition (nidanu) readers are suggested to see the book Antakrddaśā Mahimā. तए णं से कण्हे वासुदेवे अरहं अरिट्ठणेमि एवं वयासी-अहं णं भंते ! इओ कालमासे कालं किच्चा कहिं गमिस्सामि ? कहिं उववज्जिस्सामि ? तए णं अरहा अरिट्ठणेमी कण्हं वासुदेवं एवं वयासी-एवं खलु कण्हा ! तुमं बारवईए णयरीए सुर-ग्गि-दीवायण-कोवणिदड्ढाए अम्मा-पिइणियग-विप्पहूणे रामेण बलदेवेण सद्धिं दाहिणवेयालिं अभिमुहे जोहिडिल्लपामोक्खाणं पंचण्हं पंडवाणं पंडुरायपुत्ताणं पासं पंडुमहुरं संपत्थिए कोसंबवणकाणणे णग्गोहवर-पायवस्स अहे पुढविसिलापट्टए पीयवत्थपच्छाइयसरीरे जराकुमारेणं तिक्वेणं कोदण्ड-विप्पमुक्केणं इसुणा वामे पाये विद्धे समाणे कालमासे कालं किच्चा तच्चाए वालुयप्पभाए पुढवीए जाव उववज्जिहिसि । सूत्र ६ : तब कृष्ण वासुदेव अरिहन्त अरिष्टनेमि से इस प्रकार बोले-हे भगवन् ! यहाँ से काल के समय काल करके मैं कहां जाऊँगा, कहां उत्पन्न होऊँगा ? इस पर अर्हन्त अरिष्टनेमि ने कृष्ण वासुदेव से इस प्रकार कहा-हे कृष्ण ! सुरा, अग्नि और द्वैपायन के कोप के कारण इस द्वारका नगरी के जलकर नष्ट हो जाने पर और अपने माता-पिता एवं स्वजनों का वियोग हो जाने पर तुम राम-बलदेव के साथ दक्षिणी समुद्र तट की ओर पाण्डुराजा के पुत्र युधिष्ठिर प्रमुख (भीम, अर्जुन, नकुल और सहदेव) इन पांचों पाण्डवों . १४०. अन्तकृद्दशा सूत्र : पंचम सूत्र Page #202 -------------------------------------------------------------------------- ________________ के समीप पाण्डु मथुरा की ओर जाओगे । रास्ते में विश्राम लेने के लिये कौशाम्ब वन उद्यान में अत्यन्त विशाल वटवृक्ष के नीचे, पृथ्वी शिलापट्ट पर, पीताम्बर ओढ़कर तुम सो जाओगे । उस समय (मृग के भ्रम में) जराकुमार द्वारा चलाया गया तीक्ष्ण तीर तुम्हारे बायें पैर में विद्ध होने से तुम पार्थिव शरीर का त्याग करोगे । Maxim 6: Then Krsna Vasudeva spoke thus to Arihanta Aristanemi-O Bhagawan ! Leaving this body at the time of death, where shall I go ? Where shall I take birth ? । Arihanta Aristanemi said thus to Krsna Väsudeva-O Krsna ! Dwārakā city will be burnt and destroyed due to the causes-wine, fire and wrath of Dwaipāyana and at the loss of your parents and family members you will also he bereaved. Then you with Rāma-Baladeva will start along southern coast of sea towards the city of Pandumathurā, to go to Yudhisthira (elder) (Bhima, Arjuna, Nakula, Sahadeva). the five sons of king Pandu-five Pāndavas. In between you will reach Kośāmbi forest. For taking rest you will sleep under a huge banyan tree, and on a stone-rock covering your body with a yellow robe. At that time, you will be pierced in the left foot by a sharp arrow released from the bow (in the delusion of a deer) of Jarā Kumāra. Thus you will leave this body. विवेचन द्वारका विनाश एवं श्रीकृष्ण के देहत्याग का वृत्तान्त प्रचलित कथा के अनुसार कहा जाता है कि मदिरा को द्वारका विनाश का कारण जान कर कृष्ण वासुदेव ने सम्पूर्ण द्वारका में मद्य-निषेध कर दिया तथा बची-खुची मदिरा नगर के बाहर फिंकवा दी। प्रथम अध्ययन .१४१ . Page #203 -------------------------------------------------------------------------- ________________ एक बार कुछ यादव कुमार घोड़े लेकर घूमने गये । प्यास लगी तो उन्होंने गड्ढे में पड़ी हुई शराब पी ली। वहीं द्वैपायन ऋषि तप युक्त ध्यान कर रहे थे । मदिरा के नशे में उन्मत्त यादव कुमार उनके ऊपर घोड़े कुदाने लगे, तथा कहीं एक मरा सर्प पड़ा था, उन्होंने उसे फेंककर ऋषि के गले में डाल दिया और ऋषि को प्रताड़ित किया । इस अभद्रतापूर्ण दुर्व्यवहार से द्वैपायन ऋषि क्रोधित हो गये । उन्होंने क्रोधावेश में निदान कर लिया कि “यदि मेरी तपस्या का कोई फल हो तो मैं द्वारका नगरी को जलाकर भस्म कर दूंगा और सभी यादवों का विनाश कर डालूँगा ।" श्रीकृष्ण वासुदेव को ज्ञात हुआ तो उन्होंने ऋषि से क्षमा मांगी और निदान त्यागने की प्रार्थना की, परन्तु ऋषि ने निदान नहीं त्यागा, केवल इतना ही कहा कि "तुम दोनों भाई वच जाओगे ।' श्रीकृष्ण वासुदेव ने इस विनाश से बचने का उपाय पूछा तो एक ज्ञानी मुनि ने बताया-जव तक द्वारका में आयम्विन तप होता रहेगा, कोई भी देव-दानव इसका विनाश नहीं कर सकेगा । श्रीकृष्ण वासुदेव ने पूरे नगर में ऐसी समुचित व्यवस्था कर दी कि प्रतिदिन आयम्बिल तप चलता ही रहे । निदानानुसार द्वैपायन ऋषि अग्निकुमार जाति के देव बना । वह पूर्व वैर का स्मरण करके द्वारका-दाह का अवसर देखने लगा, परन्तु प्रतिदिन की आयंबिल तपस्या के प्रभाव के सामने उसका कोई जोर नहीं चलता था । वह द्वारका नगरी को जलाने में असफल रहा, तथापि उसने प्रयत्न नहीं छोड़ा, लगातार वारह वर्षों तक उसका यह प्रयत्न चलता रहा । बारह वर्षों के वाद द्वारका के कुछ लोग सोचने लगे-तपस्या करते-करते वर्षों व्यतीत हो गए, अब द्वैपायन (अग्निकुमार) हमारा क्या विगाड़ सकता है ? इसके अतिरिक्त कुछ लोग यह भी सोच रहे थे कि द्वारका के सभी लोग तो आयंविल कर ही रहे हैं, यदि हम लोग न भी करें तो इससे क्या अन्तर पड़ता है ? समय की बात ही समझिए कि द्वारका में एक दिन ऐसा आ गया जब किसी ने भी आयम्बिन तप नहीं किया । व्यक्तिगत स्वार्थ एवं प्रमाद के कारण संकट-मोचक आयम्विल तप से सभी विमुख हो गये । अग्निकुमार द्वैपायन देव के लिये इससे बढ़कर और कौन-सा अवसर हो सकता था । उसने द्वारका में अग्नि-वर्षा प्रारम्भ कर दी । चारों ओर भयंकर शब्द होने लगे, जोर की आंधी चलने लगी, भूचाल से मकान धराशायी होने लगे, अग्नि की धधकती ज्वालाओं ने सारी द्वारका को अपनी लपेट में ले लिया । श्रीकृष्ण वासुदेव ने अग्नि शान्त करने के अनेकों प्रयत्न किए, परन्तु कर्मों का ऐसा प्रकोप चल रहा था कि आग पर डाला जाने वाला पानी तेल का काम कर रहा था । पानी डालने से आग शान्त होती है, पर उस समय ज्यों-ज्यों पानी डाला जाता था, त्यों-त्यों अग्नि और अधिक भड़कती थी । अग्नि की भीषण ज्वालाएं मानों गगन को भी भस्म करने का प्रयास कर रही थीं। कृष्ण वासुदेव, बलराम सब निराश थे । उनके देखते-देखते द्वारका जल गई, वे उसे बचा नहीं सके । . १४२ . अन्तकृद्दशा सूत्र : पंचम वर्ग । . १४२ . Page #204 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प )) )) ) )) )) )) )) )) ) )) ) )) )) ) चित्रक्रम २१ : अग्निकुमार (द्वैपायन) द्वारा द्वारका विनाश भगवान अरिष्टनेमि द्वारा कथित भविष्य का दृश्य) अग्निकुमार (द्वैपायन) ने द्वारका में अग्निवर्षा की। राजमहल व अन्य भवन आदि धू-धू कर जल उठे। वासुदेव श्रीकृष्ण व बलराम ने माता-पिता को जलते महलों से निकालकर रथ में बैठाया। अश्वशाला जल जाने से घोड़े भी नहीं मिले तो दोनों भाई स्वयं ही रथ में जुत गए। रथ लेकर नगर के सिंहद्वार से जैसे ही बाहर निकले कि जलता हुआ द्वार टूटकर गिर पड़ा। तत्काल वसुदेव-देवकी की मृत्यु हो गई। यह अत्यन्त कारुणिक दृश्य देखकर दोनों भाई व्यथित हो गये। (अन्य ग्रन्थों के अनुसार) (वर्ग ३/अध्य. ८) Illustration No. 21 : Destruction of Dwarakā by fiery god (Dwaipayanā) (The scene which was foretold by Bhagawāna Aristanemi) ___Fiery god (Dwaipāyana) rained the flames of fire on Dwārakā city. Royal palace and other buildings began to burn. Vasudeva Sri Krsna and Balarama taking out parents from burning palace, made them to sit down in chariot. They could not get horses then both the brothers themselves began to draw chariot like horses. As soon as this stepped out from the main gate of the city, the burning main gate fell down. The same moment Vasudevu and Devaki died. Seeing this pitiable scene both the brothers fclt much worried. (According to other scriptures) (Sec. 3/Ch. 8) अन्तकृदशा सूत्र : चित्र परिचय Page #205 -------------------------------------------------------------------------- ________________ KAPEGOU B GA 5 PEN ABS nh WA o Wor २१ Page #206 -------------------------------------------------------------------------- ________________ द्वारका के दग्ध हो जाने पर कृष्ण वासुदेव और बलराम वहां से जाने की तैयारी करने लगे । इसी बात को “सुर-दीवायण-कोवनिदढाए'' इस पद से अभिव्यक्त किया है । आगम का दूसरा वाक्य है-"अम्मा-पिइनियग-विष्पहूणे"-अम्बापितृ-निजकविप्रहीण :-अर्थात् माता-पिता और अपने सम्बन्धियों से रहित । कथाकारों का कहना है कि जव द्वारका नगरी जल रही थी तब कृष्ण वासुदेव और उनके बड़े भाई बलराम दोनों आग बुझाने की चेष्टा कर रहे थे, पर जव वे सफल नहीं हुए तव अपने महलों में पहुँचे और अपने माता-पिता को बचाने का प्रयत्न करने लगे । बड़ी कठिनाई से माता-पिता को महल से निकालने में सफल हुए । इनका विचार था कि माता-पिता को रथ में विठा कर किसी सुरक्षित स्थान पर पहुंचा दिया जाए । अपने विचार की पूर्ति के लिए श्रीकृष्ण जब अश्वशाला में पहुंचे तो देखते हैं, अश्वशाला नष्ट हो चुकी है । वे वहां से चले, रथशाला में आए। रथशाला में आग लगी हुई थी, किंतु एक रथ उन्हें सुरक्षित मिल गया । वे तत्काल उसी को बाहर ले आये, उस पर माता-पिता को बैठाया । घोड़ों के स्थान पर दोनों भाई स्वयं जुत गये पर जैसे ही सिंहद्वार को पार करने लगे और रथ का जुआ और दोनों भाई द्वार से बाहर निकले ही थे कि तत्काल द्वार का ऊपरी भाग टूट पड़ा और माता-पिता उसी के नीचे दब गए । उनका देहान्त हो गया । वासुदेव कृष्ण तथा बलराम से यह मार्मिक भयंकर दृश्य देखा नहीं गया । वे माता-पिता के वियोग से अधीर हो उठे । जैसे-तैसे उन्होंने अपने मन को संभाला, माता-पिता तथा अन्य सम्वन्धियों के वियोग से उत्पन्न महान् संताप को धैर्यपूर्वक सहन किया । द्वारका नगरी के दग्ध हो जाने पर कृष्ण बड़े चिन्तित थे । उन्होंने बलराम से कहा-औरों को शरण देने वाला कृष्ण आज किस की शरण में जाये ? इसके उत्तर में बलराम कहने लगे-पाण्डवों की आपने सदा सहायता की है, उन्हीं के पास चलना ठीक है । उस समय पाण्डव हस्तिनापुर से निर्वासित होकर पाण्डुमथुरा में रह रहे थे । उनके निर्वासन की कथा ज्ञाताधर्मकथा से जान लेनी चाहिए । बलराम की बात सुनकर कृष्ण बोले-जिनको सहारा दिया हो, उनसे सहारा लेना लज्जास्पद है, फिर सुभद्रा (अर्जुन की पत्नी) अपनी बहन है । वहन के घर रहना भी शोभास्पद नहीं है । कृष्ण की तर्कसंगत बात सुनकर बलराम कहने लगे-भाई ! कुन्ती तो अपनी बुआ है, बुआ के घर जाने में अपमान की कोई बात नहीं । अन्त में कृष्ण की अनिच्छा होने पर भी बलराम कृष्ण को साथ लेकर दक्षिण समुद्र तट पर बसी पांडवों की राजधानी पाण्डुमथुरा की ओर चल दिए । सूत्रकार ने प्रस्तुत सूत्र में जो "दाहिणवेयालिं अभिमुहे पंडुमहुरं संपत्थिए" ये पद दिये हैं ये उक्त कथानक की ओर ही संकेत कर रहे हैं ।। प्रथम अध्ययन . १४३. Page #207 -------------------------------------------------------------------------- ________________ "जराकुमारेणं" का अर्थ है जराकुमार ने । जराकुमार यादववंशीय एक राजकुमार था, जो वासुदेव श्रीकृष्ण का भाई था । भगवान् अरिष्टनेमि ने भविष्यवाणी करते हुए कहा था कि जराकुमार के बाण से वासुदेव की मृत्यु होगी। यह जानकर जराकुमार को बड़ा दुःख हुआ। उसने निश्चय किया कि मैं द्वारका छोड़कर दूर कोशाम्रवन में चला जाता हूँ, वहीं जीवन के शेष क्षण व्यतीत कर दूंगा । इससे श्रीकृष्ण की मृत्यु का कारण बनने से बच जाऊँगा । अपने निश्चय के अनुसार वह कोशाम्रवन में रहने लगा था । पर भवितव्यता को कौन टाल सकता था ? द्वारका के जल जाने पर श्रीकृष्ण अपने बड़े भाई बलराम के साथ पाण्डुमथुरा जा रहे थे। रास्ते में कोशाम्रवन आया । श्रीकृष्ण को प्यास लगी, वलराम पानी लेने चले गये । तत्पश्चात् श्रीकृष्ण एक वृक्ष के नीचे पीत पस्त्र ओढ़कर विश्राम करने लगे । उनका एक पांव दूसरे पांव पर रखा हुआ था । वासुदेव के पांव में पद्म-मणि होती है । दूर से जैसे मृग की आँख चमकती है ठीक उसी प्रकार श्रीकृष्ण के पांव में पद्म-मणि चमक रही थी । उधर जराकुमार उसी वन में भ्रमण कर रहा था । उसे किसी शिकार की खोज थी । जब वह वट वृक्ष के निकट आया तो उसे दूर से ऐसा लगा जैसे कोई मृग बैठा है । उसने तत्काल धनुष पर बाण चढ़ाया, और छोड़ दिया । बाण लगते ही श्रीकृष्ण छटपटा उठे । उनके मुख से एक चीत्कार निकली । उन्हें ध्यान आया कि बाण कहीं जराकुमार का तो नहीं ? उधर चीत्कार सुनते ही जराकुमार भी दौड़कर आया, देखा, फूट-फूटकर रोने लगा । जराकुमार को सामने देखकर श्रीकृष्ण ने कहा “जराकुमार ! तुम्हारा इसमें क्या दोष है ? भवितव्यता ही ऐसी थी। भगवान् अरिष्टनेमि की भविष्यवाणी अन्यथा कैसे हो सकती थी ? बलराम के आने का समय हो चुका है, अतः तुम यहां से भाग जाओ, अन्यथा बलराम के हाथों से तुम बच नहीं सकोगे ।' जिस अधम कार्य से जराकुमार बचना चाहता था, जिस पाप से बचने के लिए उसने द्वारका नगरी को छोड़कर कोशाम्रवन का वास अंगीकार किया था, उसी पाप को अपने हाथों से होते देखकर उसका हृदय रो पड़ा । पर क्या कर सकता था ? वलराम के आने तक श्रीकृष्ण देह त्याग कर चुके थे । Elucidation Description of Dwārakā-Destruction and Body-releasement by Sri Krsna According to prevailing narrative, it is said that knowing wine as the cause of Dwarakā-destruction Sri Krsna announced wine-prohibition in whole . १४४. अन्तकृददशा सत्र : पंचम वर्ग - Page #208 -------------------------------------------------------------------------- ________________ M कोशामवन में श्रीकृष्ण जराकमार RE . बाण E ATAX. म AMR .. .. M YA 1 ANNA Read Teache . ARSA Page #209 -------------------------------------------------------------------------- ________________ 0555555555555555555550 चित्रक्रम २२ : है कोशाम्र वन में श्रीकृष्ण म (श्रीकृष्ण अवसान का दृश्य) दृश्य १-द्वारका दग्ध हो जाने पर अत्यन्त खिन्न हुए वलराम-श्रीकृष्ण ॐ दक्षिण समुद्रतट पर वसी पाँडु-मथुरा की ओर जाते हुए मार्ग में कोशाम्र वन 卐 में पहुँचे। विशाल वट वृक्ष के नीचे विश्राम करने लगे। तीव्र प्यास से गला के सूखने पर श्रीकृष्ण ने वलराम को हाथ का संकेत कर पानी के लिए कहा। वलराम ने कहा-मैं अभी कहीं से जल लेकर आता हूँ। श्रीकृष्ण एक पाँव पर दूसरा पाँव रखे लेटे हुए हैं। उनके पाँव में पद्म-मणि चमक रही है। दृश्य २-जगकुमार वन में शिकार की खोज करता हुआ उसी वन में आता है। श्रीकृष्ण के पाँव में चमकती पद्म-मणि देखकर उसे मृग की चमकती आँख की भ्रान्ति हो गई, उसने धनुप पर वाण चढाकर निशाना लगाया। तीक्ष्ण वाण वासुदेव श्रीकृष्ण के पैर में लगते ही वे एक तीखी चीत्कार के साथ भूमि पर गिर पड़े। (वर्ग 3/अध्य. ८) Illustration No. 22 : Śrī Krsna in Kośamra Forest $i (Scene of body bereavement by śri Krsna) Scene 1. After burning of Duuraka, Sri Krslu and Bularūma, became more disappointed and going touards the ciiN Pandu-maturā, situated at the stonern coast of sea reached Kośūmra forest. For taking rest Sri Krsna lay down on a rock under a huge banyan tree covering his body with yellow cloth. By the indication of hand he told Balarama that he was thirsty, Balarama went out to take water, Sri Krsna is lying down keeping his one leg over the knee of the other les a m is 卐 shining in his foot. Scene 2. Jarūkumāra searching prey comes to the same forest. Looking at the shining Padma in the foot of Sri Kru. 45 he took it as the eye of a deer, thus delusioned, he shot an arrou taking the aim. Pierced by sharp arrow a cry came out of the mouth of Sri Krsna and he fell down on the ground. ___ (Sec. 3/Ch. 8) म 655555555 ++5556 अन्तकृदशा सूत्र : चित्र परिचय Page #210 -------------------------------------------------------------------------- ________________ wäraká city and remaining quantity of wine was ordered to he thrown away out the city. So the wine had been thrown away in hills surrounding Dwărakā city. That wine accu nulated in ditches of mountain. Once some princes riding on horses went out of city for a walk. Being thirsty princes drank up that wine. Nearby Dwaipāyana Rishi was sitting in deep meditation. Yädava princes became fanatic due to intoxication of wine. As they saw (penancer) Dwaipāyana, they filled with anger bearing in mind that this penancer will destroy our beautiful city so he should be murdered just now. They caused their horses to jump over penancer. Corpse of a snake was lying down there, the princes put it round the neck of penancer and began to beat him cruelly and when penancer became half-dead, those princes returned to the city, thinking that now the penancer will die. Due to cruel beating, and even without any cause the anger of Dwaipāyana penancer raised to highest degree. He made a firm sinful volition-If there is any consequence of my penance, then I must kill all the Yādavas and burn this Dwarakā city to ashes. As soon as, Sri Krsna became aware of this painful event, he quickly reached to penancer, with his elder brother Balarama. Sri Krsna begged pardon for the offence of princes and requested that he should withdraw his volition. Being satisfied by the courtesy of Sri Krsna, penancer Dwaipāyana assured him that you and your elder brother-both will go sefely out of city; but I (Dwaipāyana) will not withdraw my volition. Thus saying penancer Dwaipāyana died and took birth in the class of fiery gods (Agnikumāru god). Both the brothers, being disappointed returned from there. Sri Krsna asked a wise sage, the device to save Dwárak, then the sage said-Until Ayambila penance will be regularly practised in Dwarakā city by its inhabitants, no god or demon can destroy it. Accordingly Sri Krsna made an announcement in the city that Ayambila penance should continue. Citizens followed the announcement of ruler. Dwaipāyana penancer becoming fiery god, remembering his previous birth's enmity came to Dwaraka to burn it, but he cannot fulfil his evil desire due to the mighty force of Āyambila penance. Although Dwaipāyana fiery god could not burn Dwārakā at that time but he did not stop his efforts. He continually waited for twelve years to avail any opportunity to fulfil his desire. प्रथम अध्ययन • 986 . Page #211 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Time of twelve years was very long. Citizens of Dwārakā began to think otherwise-A long period of twelve years has been passed practising Ayambila penance continually. Now how that fiery god Dwaipāyana can hazard us? He must have been disappointed and gone elsewhere. Thinking of some other citizens was like this-All the other citizens are practising Ayambila penance. If we persons do not practise the penance what difference will it make ? Lo, such a day arrived that all the citizens of Dwarakū became disinclined to obstacle remover Ayambila penance. This was the best opportunity for fiery god Dwaipāyana. He availed this fully. Fire began to pour from sky, frightful voices echoed all directions, stormy winds blew up, houses began to fall due to earth quake, very soon the tremendous flames of fire galloped the whole city Dwarakā. Vasudeva Krsna did many efforts to extinguish fire; but the agitation of karmas was so forceful and hazardous that water thrown on fire was proving as oil. Though water quenches fire, but at that time as much as water was poured the fire went on increasing. It seemed that high raising flames of fire trying to burn the sky. Krsnu Vasudeva and Balarama-both brothers were disappointed. Dwārakā burnt to ashes before their eyes, but they could not save it. After burning Dwărakā to ashes Krsna and Balarāma made preparations to go from there. This has been elaborated by these words (Sura Dīwāyaṇa kova nidaddhāye) Ammā - pi *ï' - niyaga- Vippahūne- (Ambāpitsa- Nijaka- Viprahīṇaḥ)meaning bereaved from mother-father and relatives. Folklorists assert-When Dwarakā city was burning, then Krsna Vāsudeva and his elder brother Balarāma-both were trying to stop fire, but they could not succeed in then they reached to their palace and began to save their parents. With great difficulty they could take out their parents from palace. Their idea was that riding on a chariot the parents may be taken to a safe place, For fulfilling this purpose Sri Krsna reached his stable (aswaśālā). There he saw stable has been burnt up. Sooner he started from there and reached chariot-shelter. It was also burning; but one chariot was safe. Quickly he took out that chariot. Making parents sit in it both brothers began to draw it like horses. As soon as they were to cross the main gate, the upper part of the gate fell down. Parents died under it. Both brothers could not • 98€ . अन्तकृद्दशा सूत्र : पंचम वर्ग Page #212 -------------------------------------------------------------------------- ________________ free such a painful scene. They became very much restless due to bereavement of torents. Anyhow they held up themselves and tolerated the great distress caused by the death of parents and relations. Sri Krsna was too much worried by burning Dwārakā city. He said to Balarama-Patron (shelter-giver) of others, whose shelter shall we take today? Balarāma suggested-You have always helped Pandavas. It would be proper to go there. At that time Pāndavas, exiled from Hastināpura, were residing at Pandumathura. The episode of Pandavas' exilement from Hastināpura should be known from Iñātādharmakathā Sūtra. Hearing the suggestion of Balarāma, Śri Krsņa spoke thus unto him-It is shameful to seek shelter from those, to whom I have given shelter, Subhadrā (wife of Arjuna) is our sister. To live in sister's house is not praiseworthy. Hearing the proper clue of Sri Krsna, Balarāma said-Dear brother! Kunti is our father's sister (aunt-Bhuvā-Phūphi). There is nothing disgraceful to go and live in aunt's home. Though Śri Krsna was unwilling but Balarama proceeded towards the capital city of Pandavas, Pāndumathurā, which was situated at the deccan coast of the sea, taking Śri Krsṇa with him. The scripturist has given the words- dāhinaveyālie abhimuhe pandumahuram sampatthiye. These words are indicating towards this very episode. The word Jarākumārenam means Jarā Kumāra himself or by Jarākumāra. Jarākumāras was a prince in Yādava tradition or lineage, who was brother of Sri Krsna. Bhaguwāna Aristanemi, told in his forecast that the death of Sri Krsna will happen by the arrow of Jurākumăru. Knowing this Jarākumāra grieved much. He decided-I will go to Kośāmravana (forest) leaving Dwarakā and there I will reside till death and thus I will not be the cause of death of Sri Krsna. According to his decision Jarākumāra began to live in Kośāmra forest. But who can challenge the destined destiny ? After burning Dwārakā, Sri Krsna was going to Pāndumathura. On the way there was Kośāmba forest. Krsna felt eager in thirst. Balarama went to bring प्रथम अध्ययन • 986 Page #213 -------------------------------------------------------------------------- ________________ water. Krsna began to take rest under a huge hanyan tree lying down on a slab of stone and covering his body by a yellow robe. He had put his one leg on the other leg. Every Vāsudeva has padma-mani in his foot. From a distance as eye of deer shines such was the shining of the padma-mani in the foot of Sri Krsna. Jarākumāra was wandering in the same forest. He was in the search of prey. When he came near that huge banyan tree, then from a distance, it seemed to him that a deer is sitting under the tree. At once he put a sharp arrow on the low and released it with his full strength. As the arrow pierced the foot of Sri Riya he tossed and trembled about. A painful cry came out of his mouth. He thought lest this arrow may be of Jarākumāru. Hearing that painful human cry Jarākumāra also came there almost running and began to weep bitterly. Seeing Jarūkumāra in front, Sri Krsna said to him Jarākumára ! What is your fault in it? It was such destined. How could be otherwise the forecast of Bhagawāna Aristanemi. Balarama is about to reach here. You quickly run away from here, otherwise you cannot remain alive. Balarāma will definitely kill you. Jarākumāra wanted to escape from the meanest deed and for this he left Dwārakā and accepted to live in Kośāmra forest, but the same sin occurred by his own hands. He began to weep bitterly. But what can be done now? What has been done cannot be undone. Śri Krsna had died, before Baluräma returned. सूत्र ७ : तए णं कण्हे वासुदेवे अरहओ अरिट्ठणेमिस्स अंतिए एयमटुं सोच्चा णिसम्म ओहय जाव झियाइ । कण्हाए ! अरहा अरिट्ठनेमी कण्हं वासुदेवं एवं वयासी-मा णं तुम देवाणुप्पिया ! ओहय जाव झियाहि । एवं खलु तुमं देवाणुप्पिया ! तच्चाओ पुढवीओ उज्जलियाओ अणंतरं उव्यट्टित्ता इहेव जंबुद्दीवे-दीवे भारहे वासे आगमिस्साए उस्सप्पिणीए पुण्डेसु जणवएसु सयदुवारे बारसमे अममे णामं अरहा भविस्ससि । तत्थ तुमं बहूई वासाइं केवलपरियायं पाउणित्ता सिज्झिहिसि । . १४८. अन्तकृद्दशा सूत्र : पंचम वर्ग Page #214 -------------------------------------------------------------------------- ________________ सूत्र ७ : अर्हत् अरिष्टनेमि के श्रीमुख से यह वृत्तान्त सुनकर कृष्ण वासुदेव खिन्न मन होकर आर्तध्यान करने लगे। तव अरिष्टनेमि ने पुनः इस प्रकार कहा-हे देवानुप्रिय ! तुम (खिन्न मन होकर) आर्तध्यान मत करो । निश्चय ही हे देवानुप्रिय ! कालान्तर में तुम इसी जंबूद्वीप के भरत क्षेत्र में आने वाले उत्सर्पिणी काल में पुण्ड्र जनपद के शतद्वार नाम के नगर में “अमम' नाम के वारहवें तीर्थंकर बनोगे। वहां बहुत वर्षों तक केवली पर्याय का पालन कर तुम सिद्ध-बुद्ध-मुक्त हो जाओगे । Maxim 7: Then Krsna Väsudeva having heard and listened to this whole matter from Arhat Aristanemi, with his all hopes laid low, drowned deep in passive-thoughts. Then Arhat Aristaneni said-O beloved as gods ! Do not brood with all hopes laid low. Definitely ( beloved as gods ! after a definite period of time in this Bharataksetra, of Jambūdvipa in forthcoming Utsarpiņi time era, in Satadwāra city of Pundra area you would be twelfth tirthankara, named Amama. There you will wander as omniscient (kevalin) and then will and attain salvation. सूत्र ८ः तए णं से कण्हे वासुदेवे अरहओ अरिट्ठणेमिस्स अंतिए एयमढे सोच्चा णिसम्म हट्टतुट्ट अप्फोडेइ; अप्फोडित्ता वग्गइ; वग्गित्ता तिवई छिंदइ; छिंदित्ता सीहणायं करेइ; करित्ता अरहं अरिट्ठणेमिं वंदइ नमसइ; वंदित्ता नमंसित्ता तमेव अभिसेक्कं हत्थिरयणं दुरूहइ; दुरूहित्ता जेणेव बारवई णयरी जेणेव सए गिहे तेणेव उवागए । प्रथम अध्ययन . १४९ . Page #215 -------------------------------------------------------------------------- ________________ अभिसेयहत्थिरयणाओ पच्चोरुहइ । पच्चोरुहित्ता जेणेव बाहिरिया उवट्ठाणसाला जेणेव सए सीहासणे तेणेव उवागच्छइ उवागच्छित्ता सीहासणवरंसि पुरत्थाभिमुहे णिसीयइ; णिसीइत्ता कोडुंबियपुरिसे सद्दावेई; सद्दावित्ता एवं वयासी-गच्छह णं तुब्भे देवाणुप्पिया ! बारवईए णयरीए सिंघाडग जाव उग्घोसेमाणा एवं वयहएवं खलु देवाणुप्पिया ! बारवईए णयरीए दुवालसजोयणआयामाए जाव पच्चक्खं देवलोग-भूयाए सुरग्गि-दीवायणमूले विणासे भविस्सइ; तं जो णं देवाणुप्पिया इच्छइ बारवईए णयरीए राया वा, जुवराया वा, ईसरे, तलवरे, माडंबिए, कोडुबिए, इब्भे, सेट्ठी वा, देवी वा, कुमारो वा, कुमारी वा, अरहओ अरिटणेमिस्स अंतिए मुण्डे जाव पव्वइत्तए, तं णं कण्हे वासुदेवे विसज्जेइ । पच्छाउरस्स वि य से अहापवित्तं वित्तिं अणुजाणइ । महया इड्ढीसक्कार-समुदएण य से णिक्खमणं करेइ । दोच्चं पि तच्चं पि घोसणयं घोसेह, घोसित्ता मम एवं आणत्तियं पच्चप्पिणह । तए णं ते कोडुंबिय पुरिसा जाव पच्चप्पिणंति । सूत्र ८ : अर्हन्त प्रभु के मुख से अपने उज्ज्वल भविष्य का यह वृत्तान्त सुनकर कृष्ण वासुदेव आनन्द विभोर हो उठे और हर्षावेश में अपनी भुजा पर ताल ठोकने लगे । फिर जयनाद किया । उसके बाद त्रिपदी का छेदन अर्थात् तीन कदम पीछे हटकर सिंहनाद किया । फिर भगवान अरिष्टनेमि को वंदन नमस्कार करके अपने अभिषेक योग्य (उत्सव के समय जिसका अभिषेक-तिलक किया जाय) प्रधान हस्तिरत्न पर बैठे तथा द्वारका नगरी के मध्य होते हुए अपने राजप्रासाद में आ गये । हाथी से नीचे उत, और फिर जहां बाहर की उपस्थानशाला (राजसभा) थी, जहां अपना सिंहासन था, वहां आये । वे सिंहासन पर पूर्वाभिमुख • १५० . अन्तकृद्दशा सूत्र : पंचम वर्ग Page #216 -------------------------------------------------------------------------- ________________ विराजमान हुए, फिर अपने आज्ञाकारी पुरुषों, राजसेवकों को बुलाकर इस प्रकार बोले हे देवानुप्रियो ! तुम द्वारका नगरी में श्रृंगाटक यावत् चौराहों आदि सभी राजमार्गों पर जाकर मेरी इस आज्ञा की घोषणा (प्रचारित) करो कि - “(हे द्वारकावासी नगरजनो ) इस बारह योजन लम्बी यावत् प्रत्यक्ष देवलोक के समान द्वारका नगरी का सुरा, अग्नि एवं द्वैपायन के कारण एक दिन विनाश होगा, इसलिये हे देवानुप्रियो ! द्वारका नगरी में जिसकी भी इच्छा हो, राजा हो, युवराज हो, ईश्वर (स्वामी या मंत्री) हो, तलवर (राजा का प्रिय अथवा राजा के समान) हो, माडम्बिक (छोटे गांव का स्वामी) हो, कौटुम्बिक ( दो या तीन कुटुम्बों का स्वामी) हो, इभ्य सेठ हो, रानी हो, कुमार हो, या कुमारी हो, राजरानी हो या राजपुत्री हो, इनमें से जो भी भगवान अरिष्टनेमि के पास मुण्डित होकर यावत् दीक्षा लेना चाहता हो, उसको कृष्ण वासुदेव ऐसा करने की सहर्ष आज्ञा देते हैं । दीक्षार्थी के पीछे उनके आश्रित सभी कुटुम्बीजनों की भी श्रीकृष्ण वासुदेव यथायोग्य व्यवस्था करेंगे और ऋद्धि सत्कार के साथ उसका दीक्षा महोत्सव भी वे ही सम्पन्न करेंगे ।" इस प्रकार दो-तीन बार घोषणा कर मुझे वापिस सूचित करो । कृष्ण वासुदेव का आदेश पाकर उन आज्ञाकारी राजपुरुषों ने वैसी ही घोषणा दो तीन बार करके लौट कर इसकी सूचना कृष्ण को दी । Maxim 8 : Having heard and listened to this description of his own most brilliant future Kṛṣṇa Vasudeva became very much glad. In the emotion of happiness he clapped his arms, moved three step backwards and roared like a lion, and then bowing down and praising-woshipping Arhat Aristanemi, rode on his own excellent elephant worthy for royal emblem and moving through the middle of Dwaraka came to his own palace. प्रथम अध्ययन For Private Personal Use Only १५१ ● Page #217 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Then he got down from his excellent elephant, went to the outer audience chamber, came to and sat on his throne with face in eastern direction and then calling his chamberlains and state-servants spoke thusO beloved as gods ! you go and declare my proclamation at the open places, fourway, three way crossings etc; of Dwarakā city, thatO the citizens of Dwārakā ! This twelve yojana long and nine yojana broad, heaven like Dwarakā city will be destroyed any day due to wine, fire and Dwaipāyana penancer. Therefore, o beloved as gods ! if any person whether he may be a king, heir apparant, minister or lord (1śwara), dear to king or like a king (talawara) baron (lord of a small village), head of two or three families (Kotumbika), banker-too much wealthy person, queen, prince, maiden, princess, queen of a king, daughter of a king intends to enter the sage order of Bhagawāna Aristaneini after being shaven-headed and consecrated, Sri Krsna gladly allows such persons to do so. Sri Krsna Vasudeva will himself celebrate his consecration with great splendour in a gathering. Sri Krsna Vāsudeva also holds responsibility of the family members of the consecrated persons dependent on them. He will provide all necessities and comforts to those family members. O beloved as gods (chamberlains) ! Proclaim this proclamation twice and thrice at all the places and report to me. Hearing the order of Krsna Väsudeva the chamberlains twice and thrice proclaimed this proclamation and reported to him. TE 9 : तए णं सा पउमावई देवी अरहओ अरिडणेमिस्स अंतिए धम्म सोच्चा णिसम्म हट्टतुटु जाव हियया अरहं अरिटणेमि वंदइ णमंसइ; वंदित्ता णमंसित्ता एवं वयासी • 942 . अन्तकृद्दशा सूत्र : पंचम वर्ग Page #218 -------------------------------------------------------------------------- ________________ 'सद्दहामि णं भंते ! णिग्गंथं पावयणं से जहेयं तुब्भे वयह, जं णवरं देवाणुप्पिया ! कण्हं वासुदेवं आपुच्छामि, तए णं अहं देवाणुप्पियाणं अंतिए मुण्डा जाव पव्ययामि ।' 'अहासुहं देवाणुप्पिया ! मा पडिबंधं करेह ।' सूत्र ९ : इसके बाद उधर पद्मावती महारानी भगवान् अरिष्टनेमि का धर्मोपदेश सुनकर एवं उस धारण करक बड़ी प्रसन्न हुई, उसका हृदय प्रफुल्लित हो उठा यावत् वह अर्हन्त अरिष्टनेमि को वंदना नमस्कार कर इस प्रकार वोलीहे भगवन् ! निर्ग्रन्थ प्रवचन पर मैं श्रद्धा करती हूँ। आप जैसा कहते हैं वह तत्व वैसा ही है । (आपका धर्मोपदेश यथार्थ है) हे भगवन् ! में कृष्णा वासुदेव की आज्ञा लेकर देवानुप्रिय के पास मुण्डित होकर दीक्षा ग्रहण करना चाहती हूँ। भगवान ने कहा-हे देवानुप्रिये ! धर्म-कार्य में विलम्ब मत करो । जैसा तुम्हारी आत्मा को मुख हो वैसा करो । Maxim 9 : Thereafter, queen Padmavati became much more glad and satisfied and took to her heart the sermon of Bhagawana Aristaneni. Her heart filled with happiness, Bowng down and worshipping Arihanta Aristancini, she spoke thus, o Bhagawan ! I have faith ir the Nirgrantha pralacana (doctrine). The fact is as you have said. Your sermon is true to the last. I intend to accept consecration with my shaven head in presence of you, with the permission of Krsna Vasudera. Bhagawāna said-O-beloved as gods ! Do, as your mind feels. But do not delay in religious deti. प्रथम अध्ययन ८९३ Page #219 -------------------------------------------------------------------------- ________________ सूत्र १0 : . तए णं सा पउमावई देवी धम्मियं जाणप्पवरं दुरूहइ । दुरूहित्ता जेणेव सए गिहे तेणेव उवागच्छइ । उवागंच्छित्ता धम्मियाओ जाणप्पवराओ : पच्चोरुहइ; पच्चोरुहित्ता जेणेव कण्हे वासुदेवे तेणेव उवागच्छइ, उवागच्छित्ता करयल जाव अंजलिं कटु कण्हं वासुदेवं एवं वयासीइच्छामि णं देवाणुप्पिया ! तुन्भेहिं अब्भनुण्णाया समाणी अरहओ अरिट्ठणेमिस्स अंतिए मुंडा जाव पव्वयामि । (कण्हे-) अहासुहं देवाणुप्पिया ! तए णं से कण्हे वासुदेवे कोडुबिए पुरिसे सद्दावेइ; सद्दावित्ता एवं वयासीखिप्पामेव भो देवाणुप्पिया ! पउमावईए देवीए महत्थं णिक्खमणाभिसेयं उवट्ठवेह; उवट्ठवित्ता एवं आणत्तियं पच्चप्पिणह । तए णं ते कोडुंबिया जाव पच्चप्पिणंति । सूत्र १0: उसके बाद पद्मावती देवी धार्मिक श्रोष्ट रथ पर आरूढ़ होकर द्वारका नगरी में अपने भवन पर आई, धार्मिक रथ से नीचे उतरी और जहां कृष्ण वासुदेव थे वहां आकर दोनों हाथ जोड़कर कृष्ण वासुदेव से इस प्रकार निवेदन कियाहे देवानुप्रिय ! अर्हत् अरिष्टनेमि का उपदेश सुनकर मेरा मन संसार से विरक्त हो गया है, अतः आपकी आज्ञा हो तो मैं अर्हत् अरिष्टनेमि के पास मुण्डित होकर दीक्षा ग्रहण करना चाहती हूँ। कृष्ण ने कहा हे देवानुप्रिये ! जैसा तुम्हें सुख हो वैसा करो । तब कृष्ण वासुदेव ने अपने आज्ञाकारी पुरुषों को बुलाकर इस प्रकार आदेश दिया . १५४ अन्तकृद्दशा सूत्र : पंचम वर्ग Page #220 -------------------------------------------------------------------------- ________________ हे देवानुप्रियो ! शीघ्र ही महारानी पद्मावती के लिये दीक्षा महोत्सव की विशाल तैयारी करो, और तैयारी हो जाने की मुझे वापस सूचना दो । तब आज्ञाकारी पुरुषों ने वैसा ही किया और दीक्षा महोत्सव की तैयारी की सूचना उनको दी । Maxim 10: After that riding on an excellent religious chariot Padmavati Devi came in Dwārakā city and to her palace. Riding off from chariot she came before Sri Krsna Väsudeva and folding her both hands spoke thus unto himO beloved as gods! Having heard and listened to the sermon (religious discourse) of Arhat Aristanemi my mind became disinclined from world and worldly pleasures. Hence, if you permit me, I intend to tonsure my head and accept consecration in presence of Arhat Aristanemi. Krsna said-Do, as you feel happy. Then Vasudeva Kṛṣṇa called his chamberlains and ordered them O beloved as gods! Quickly make the enormous preparations of consecration queen Padmavati and report to me. ceremony of Chamberlains obeyed the order of Vasudeva, made preparations according to his wishes and reported him. सूत्र ११ : तणं से कहे वासुदेवे पउमावई देविं पट्टयं दुरूहइ, दुरूहित्ता असणं सोवण्णकलसेणं जाव णिक्खमणाभिसेणं अभिसिंचाइ, अभिसिंचित्ता, सव्वालंकारविभूसियं करेइ; करित्ता पुरिससहस्सवाहिणीं सिवियं दुरूहावेइ; दुरूहावित्ता बारवईए णयरीए मज्झं मज्झेणं णिगच्छइ, णिगच्छित्ता जेणेव रेवयए पव्ययए जेणेव सहस्संबवणे उज्जाणे तेणेव प्रथम अध्ययन For Private Personal Use Only १५५ Page #221 -------------------------------------------------------------------------- ________________ उवागच्छइ, उवागच्छित्ता सिवियं ठवेइ। ठवेत्ता, पउमावई देवी सिवियाओ पच्चोरुहइ । तए णं से कण्हे वासुदेवे पउमावई देविं पुरओ कटु जेणेव अरहा अरिट्ठणेमी तेणेव उवागच्छइ, उवागच्छित्ता, अरहं अरिठ्ठणेमिं आयाहिणपयाहिणं करेइ । करित्ता, वंदइ णमंसइ, बंदित्ता णमंसित्ता एवं बयासीएस णं भंते ! मम अग्गमहिसी पउमावई णामं देवी इट्टा, कंता, पिया, मणुण्णा, मणामा, अभिरामा, जीवियऊसासा, हिययाणंदजणिया उंबरपुफविव दुल्लहा, सवणयाए किमंग ! पुण पासणयाए । तए णं अहं देवाणुप्पिया ! सिस्सिणीभिक्वं दलयामि, पडिच्छंतु णं देवाणुप्पिया ! सिस्सिणीभिक्खं । अहासुहं ! तए णं सा पउमावई देवी उत्तर-पुरच्छिमदिसिभागं अवक्कमइ । अवक्कमित्ता सयमेव आभरणालंकारं ओमुयइ । ओमुइत्ता सयमेव पंचमुट्टियं लोयं करेइ, करित्ता जेणेव अरहा अरिट्टणेमि तेणेव उवागच्छइ, उवागच्छित्ता अरहं अरिट्ठणेमिं वंदइ णमंसइ वंदित्ता णमंसित्ता एवं प्रयासी आलित्ते णं भंते ! पलित्ते णं भन्ते ! लोए । जाव धम्ममाइपिउं । दीक्षा महोत्सव सूत्र ११: इसके बाद कृष्ण वासुदेव ने पद्मावती को एक विशेष पट्ट पर बिठाया और एक सौ आठ सुवर्ण आदि कलशों से स्नान कराया यावत् दीक्षा सम्बन्धी अभिषेक किया । फिर सभी प्रकार के अलंकारों से उसे विभूषित करक हजार पुरुषों द्वारा उठायी जाने वाली शिविका (पालकी) में विटाकर द्वारका नगरी के मध्य होते हुए निकले और जहां रैवतक पर्वत और सहस्राम्र उद्यान था वहां आकर पालकी नीचे रखी। पद्मावती देवी पालकी से नीचे उतरी। . १५६ . अन्तकृद्दशा सूत्र : पंचम वर्ग Page #222 -------------------------------------------------------------------------- ________________ चित्रक्रम २३ : पद्मावती रानी का वैराग्य __भगवान अरिष्टनेमि की वाणी से प्रवुद्ध होकर श्रीकृष्ण की पटरानी पद्मावती ने संयम लेने का निश्चय किया। आभग्ण अलंकार त्याग कर स्वयं मस्तक का लोच करके श्रमणी वेश धारण किया और प्रभु चरणों में उपस्थित हो वोली-भन्ते ! जैसे कोई गृहस्थ अग्नि-ज्वाला में जलते हुए घर के में से अपना बहुमूल्य रत्नकरण्ड सुक्षित निकालना चाहता है। उसी प्रकार मैं भी इस जन्म-मरण की ज्वाला से जलने संसार से अपनी आत्मा को निकालना चाहती हूँ। आप मुझे दीक्षा प्रदान करें। श्रीकृष्ण वासुदेव दीक्षा की आज्ञा प्रदान कर रहे हैं। (वर्ग ५/अध्य. १) Illustration No. 23 : Apathy of queen Padmavati Enlightened, hearing the sermon of Bhaganāna Aristanemi, Padmăruti, queen of Sri Krsna, decided to uccept consecration. Putting off ornaments etc., she tonsured her head by her own hands, dressed in the nun-cloth and coming to the lotus feet of Prabhu (The Lord) she spoke thus unto him-Bhagawāna ! As any householder desires to take out his gem-box safely from the burning house, so I wish to take out my own soul safely from the world which is burning in flames of birth and death. Please consecrate me. Sri Krsna is consenting for consecration. • (Sec. 5/Ch. 1) अन्तकृद्दशा सूत्र : चित्र परिचय Page #223 -------------------------------------------------------------------------- ________________ - - HA ALAM JAIP भव दाट आत्म करंडका A । marwarenegalas ment । पद्मावती रानी की प्रव्रज्या २३ Page #224 -------------------------------------------------------------------------- ________________ फिर कृष्ण वासुदेव पद्मावती महारानी को आगे करके भगवान अरिष्टनेमि के पास आये और तीन बार प्रदक्षिणा करके वंदन नमस्कार किया । वंदन नमस्कार करके इस प्रकार बोलेहे भगवन् ! यह पद्मावती देवी मेरी पटरानी है, यह मेरे लिए इष्ट, कान्त, प्रिय एवं मनोज्ञ है, और मन के अनुकूल चलने वाली है, अभिराम (सुन्दर) है । हे भगवन् ! यह मेरे जीवन में श्वासोच्छ्वास के समान मुझे प्रिय है, मर हृदय का आनन्द देने वाली है । इस प्रकार की स्त्री-रत्न उदुम्वर (गूलर) के पुष्प के समान सुनने के लिये भी दुर्लभ है, तब देखने की तो बात ही क्या है ! हे देवानुप्रिय ! मैं एसी अपनी प्रिय पत्नी की भिक्षा शिष्यणी के रूप में आपको देता हूँ । आप इसे स्वीकार करें । कृष्ण वासुदेव की प्रार्थना सुनकर भगवान अरिष्टनेमि बोले- 'देवानुप्रिय ! तुम्हें जिस प्रकार सुख हो वैसा करो ।” तव उस पद्मावती देवी ने ईशान कोण में जाकर स्वयं अपने हाथों से अपने शरीर पर धारण किये हुए सभी आभूषण एवं अलंकार उतारे और स्वयं ने ही अपने केशों का पंचमुष्टिक लोच किया । फिर भगवान अरिष्टनेमि के पास आकर वंदना की । वंटन नमस्कार करके इस प्रकार वाली-हे भगवन् ! यह संसार जन्म, जरा, मरण आदि दुःख रूपी आग में जल रहा है, प्रदीप्त हो रहा है, अतः इन दुःखों की आग से छुटकारा पाने और जलती हुई आग से अपनी आत्मा को बचाने के लिए आप से संयम धर्म की दीक्षा अंगीकार करना चाहती हूँ । अतः कृपा करके मुझे प्रव्रजित कीजिये यावत् चारित्र धर्म की शिक्षा प्रदान कीजिए । Consecration Ceremony Maxim 11: Then Krsna Vāsudeva got seated Padıāvati Deri on a special seat and she was bathed with water from one hundred eight pitchers of gold and conronated for consecration. Then, she was decorated with al: kinds of ornaments, and was seated in the palanquin, which was प्रथम अध्ययन १५७ Page #225 -------------------------------------------------------------------------- ________________ carried by one thousand men, moving through the central part of Dwārakā city. They reached Sahasrāmravana, which was situated on mount Raivataka. There Padmăvati Devī got down from the palanquin. Keeping queen Padıāvati ahead of him, Sri Krsna came to Bhagawāna Aristanemi circumambulated him three times, bowed down and worshipped, then said thusO Bhagawan ! This Padmăvati Devi is my chief queen. She is pleasing, charming, beloved, beautiful and enchanting to me. She is dear to me like life force, and is pleasing to my heart. This excellent woman is like a flower of wild fig tree (gūlara) which is such a rare object that it is very difficult to hear about, not to speak of seeing. O beloved as gods ! I offer unto you my such beloved wife, as a gift of woman disciple. Please, accept it. Having heard the request of Krsna Vasudeva spoke thus Bhagawāna Aristancini- belved as gods ! Do, as you feel happy. Then Padmavati Devi went to North-East direction, removed with her own hands her ornaments and also with her own hands tonsured her hairs in five attempts, then came to Bhagawăna Aristanemi, Bowing down and worshipping him she spoke( Bhagawan ! This world is burning in the fire of birth, death, oldage etc. Hence for liberation from the fire of all these miseries and for saving my soul from burning world, I intend to accept consecration. Therefore kindly take me into monk order and teach me the rules of right conduct-sagehood. विवेचन गूलर का फूल-गूलर बरगद की जाति का एक वृक्ष है इसका फूल अनेक वर्षों में किसी चांदनी रात में कभी-कभार वृक्ष पर खिलता है। इसलिए इसे दुर्लभ माना गया है। • 940 • अन्तकृदशा सूत्र : पंचम वर्ग । Page #226 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Elucidation Flower of wild fig tree-Really wild fig tree is a tree of banyan tree class. After many years, flower blooms on it in any full moon night. So it is considered very difficult to see and obtain such flower. सूत्र १२ : तए णं अरहा अरिडणेमी पउमावइं देविं सयमेव पयावेइ सयमेव जक्खिणीए अज्जाए सिस्सिणी दलयइ । तत्थ णं सा जक्खिणी अज्जा पउमावई देविं सयं पव्वावेइ, जाव संजमियव्वं, तए णं सा पउमावई जाव संजमइ । तए णं सा पउमावई अज्जा जाया ईरियासमिया जाव गुत्तबंभयारिणी । सूत्र १२: पद्मावती देवी द्वारा ऐसी प्रार्थना करने पर भगवान् अरिष्टनेमि ने स्वयमेव पद्मावती को प्रव्रजित करके, यक्षिणी आर्या को शिष्या के रूप में सौंप दिया । तब यक्षिणी आर्या ने पद्मावती देवी को स्वयं प्रव्रजित किया, और संयम में यत्न करने की शिक्षा दी । श्रमणी-धर्म की दीक्षा दी और संयम क्रिया में सावधानीपूर्वक यत्न करते रहने की हित शिक्षा देते हुए कहा-हे पद्मावती ! तुम संयम में सदा सावधान रहना।। पद्मावती भी यक्षिणी गुरुणी की शिक्षा को स्वीकार करते हुए सावधानीपूर्वक संयम पथ पर चलने का यत्न करने लगी । एवं ईर्या समिति आदि पांचों समिति से युक्त होकर यावत् गुप्त ब्रह्मचारिणी आर्या बन गई। Maxim 12 : Considering such request of Padmāvati Devi, Bhagawāna Aristanemi himself took her into sage order, made her a nun and gave her to chief nun (āryā) Yakșini as a woman disciple. प्रथम अध्ययन . १५९ . Page #227 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Then chief nun Yakṣiņi herself took Padmavati Devi in nun-order, and taught her to practise restrain, consecrated her as a nun and inspir her to ever remain always careful in restrain activities, she said - O Padmāvati ! You should always remain careful in practising restrain. Padmavati nun also accepting the instructions of her teacher Yaksiņi began to go ahead on restrain path. She became circumspect with five circumspections like circumspection of movement etc., and became a guarded celibate. सूत्र १३ : तणं सा पउमावई अज्जा जक्खिणीए अज्जाए अंतिए सामाइयमाइयाई एक्कारस अंगाई अहिज्जइ । बहूहिं चउत्थ छट्ठ-ट्टम - दसम - दुवालसेहिं मासद्ध-मासखमणेहिं तवोकम्मेहिं अप्पाणं भावेमाणा विहरइ | तए णं सा पउमावई अज्जा बहुपडिपुण्णाई वीसं वासाई सामण्णपरियायं पाउणित्ता मासियाए संलेहणाए अप्पाणं झोसेइ । झोसित्ता सङ्घिभत्ताई अणसणाई छेदेइ, छेदित्ता जस्सट्ठाए कीरइ नग्गभावे जाव तम आराहेइ । चरिमुस्सासेहिं सिद्धा । ( पढमं अज्झयणं समत्तं ) सूत्र १३ : तत्पश्चात् उस पद्मावती आर्या ने अपनी यक्षिणी गुरुणी के पास सामायिक आदि ग्यारह अंगों का अध्ययन किया । साथ ही उपवास - वेले-तेले-चौलेपचोले- पन्द्रह दिन और महीने तक की विविध प्रकार की तपस्या से वह अपनी आत्मा को भावित करती हुई विचरने लगी । इस तरह पद्मावती आर्या ने पूरे वीस वर्ष तक चारित्र धर्म का पालन किया । अन्त में एक मास की संलेखना की और साठ भक्त का अनशन पूर्ण करके जिस कार्य (मोक्ष प्राप्ति) के लिए संयम स्वीकार किया था, उसकी आराधना करते हुए अन्तिम श्वासोच्छ्वास के बाद ( देह त्यागकर ) सिद्ध-बुद्ध और मुक्त हो गई । ( प्रथम अध्ययन समाप्त) अन्तकृद्दशा सूत्र : पंचम वर्ग १६० For Private Personal Use Only Page #228 -------------------------------------------------------------------------- ________________ २४ FARSHAN SH आधा ध्यान निर्वाण ना 2 संलेषना 24 Page #229 -------------------------------------------------------------------------- ________________ 卐 5556 चित्रक्रम २४ : पद्मावती की चारित्र आराधना आर्या पद्मावती ने दीक्षा लेकर गुरुणी यक्षा आर्या के पास सामायिक आदि ग्यारह अंगों का अध्ययन किया। वृद्ध-ग्लान तपस्विनी श्रर्माणियों की अग्लान भाव से सेवा-शुश्रूपा की। अनेक प्रकार की कठोर तपस्या एवं ध्यान आदि करके अन्त में मासिक संलेखना संथारापूर्वक शरीर छोड़कर निर्वाण प्राप्त किया। 55556 Illustration No. 24 : Conduct propiliation of Padmavati Becoming consecrated Arya Padmavati learnt eleven holy scripture from teacher and chief nun Arya Yakṣā, and served old and penancer-nuns cordially. Practising several types of penances and meditation, in the end she accepted one month's Samlekhana Samthārā, left the body and became beatified. ( Sec. 5 / Ch. 1) 5555555555 अन्तकृद्दशा सूत्र : चित्र परिचय (वर्ग ५ / अध्य. १ ) For Private Personal Use Only 56 Page #230 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Tan Thereafter that Padmavati nun (śramanī) studied Sāmäyika etc., eleven scriptures (anga) from her teacher chief nun Yaksinī. Along with she practised fast penance of one, two, three, four, five days', fifteen days', one month's, and various types of austerities. Thus nun Padıăvatī practised conduct of nun upto twenty years. In the end she observed samlekhanā of one month i.e., fast of sixty diets and (obtained salvation) the aim for which she had accepted restrain, with her last exhale-inhale relinquishing body, she became beatified and salvated. [First chapter concluded) अध्ययन २-८ गौरी आदि की दीक्षा सूत्र १४: उक्वेवओ य अज्झयणस्स । तेणं कालेणं तेणं समएणं बारवई णयरी । रेवयए पव्वए, णंदणवणे उज्जाणे । तत्थ णं बारवईए णयरीए कण्हे वासुदेवे राया होत्था, तस्स णं कण्हस्स वासुदेवस्स गोरी देवी, वण्णओ । अरहा अरिट्ठणेमी समोसढे । कण्हे णिग्गए । गोरी जहा पउमावई तहा णिग्गया, धम्मकहा, परिसा पडिगया, कण्हे वि पडिगए । तए णं सा गोरी जहा पउमावई तहा णिक्खंता जाव सिद्धा । एवं गन्धारी, लक्खणा, सुसीमा, जम्बबई,६ सच्चभामा, रुप्पिणी, अट्ठ वि पउमावई सरिसयाओ अट्ठ अज्झयणा । (इति २-८ अध्ययनानि) सूत्र १४ : आर्य जम्बू ने पूछा-हे भगवन् ! श्रमण भगवान महावीर स्वामी ने प्रथम अध्ययन के जो भाव कहे वे आपके श्रीमुख से मैंने सुने । अब दूसरे एवं २-८ अध्ययन .१६१ Page #231 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगे के अध्ययनों में क्या भाव कहे हैं ? कृपा करके इस अध्ययन का उत्क्षेपक - भाव बताइये । श्री सुधर्मा स्वामी ने कहा- हे जम्बू ! उस काल उस समय में द्वारका नगरी थी, उसके समीप एक रैवतक नाम का पर्वत था । उस पर्वत पर नन्दनवन नाम एक मनोहारी एवं विशाल उद्यान था । इस द्वारका नगरी में श्रीकृष्ण वासुदेव राज्य करते थे । उन कृष्ण वासुदेव की "गौरी” नाम की महारानी थी, जो वर्णन करने योग्य थी । एक समय उस नन्दनवन उद्यान में भगवान् अरिष्टनेमि पधारे । कृष्ण वासुदेव भगवान के दर्शन करने के लिए गये । जन परिषद भी धर्म सुनने के लिए गई । गौरी रानी भी पद्मावती रानी के समान प्रभुदर्शन के लिये गई । भगवान ने धर्मोपदेश दिया । धर्मोपदेश सुनकर जन परिषद् अपने-अपने घर गई । कृष्ण वासुदेव भी अपने राजभवन में लौट गये । ‘तत्पश्चात् “गौरी” देवी पद्मावती रानी की भांति विरक्त होकर दीक्षित हुई यावत् सिद्ध हो गई । इसी तरह अन्य ३. गांधारी, ४. लक्ष्मणा, ५. सुसीमा, ६. जाम्बवती, ७. सत्यभामा, एवं ८. रुक्मिणी के भी छ: अध्ययन पद्मावती के समान समझना चाहिए । ये सभी एक समान प्रव्रजित होकर सिद्ध-बुद्ध और मुक्त हुईं । ये सभी श्रीकृष्ण वासुदेव की पटरानियाँ थीं । ( २ - ८ अध्ययन समाप्त) Maxim 14 : ārya Jambu asked Sudharmā Swami - Bhagawan ! 1 have heard attentively from you, the subject matter expressed by Bhagawāna Mahāvīra of the first chapter of fifth section. Now please tell me the subject matter of second and further chapters as described by Bhagawāna Mahāvāra. १६२ • Chapters 2-8 For Private Personal Use Only अन्तकृद्दशा सूत्र : पंचम वर्ग Page #232 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Śri Sudharmā Swāmī told-O Jambū ! At that time and at that period, there was a city named Dwarakā. Near it was mountain Raivataka. At that mountain there was a vast garden named Nandanavana. Krsna Vāsudeva was ruling over Dwarakā city. That Krsna Vasudeva had a queen named Gauri. She was describable. Once Bhagawāna Aristanemi came to that Nandanavana gurden. Krsna Vasudeva went to bow down and worship him. General public also went to listen to religious discourse. Queen Gauri also went to see and worship like queen Padmavati. Bhagawāna delivered sermon. General congregation returned after hearing sermon. Krsna Vasudeva also went back to his palace. Thereafter, like queen Padınăvatī, Gauri Devī also accepted consecration being disinclined to worldly enjoyments and was beatified-emancipated. In the same way further six chapters-3. Gandhāri, 4. Laksmanā 5. Susimā, 6. Jambavati 7. Satyabhama and 8. Rukmini should be known as that of Padmavati. The description of all these eight chapters should be known like that of Padmavati. All these were consecrated and salvated alike, these were the chief queens of Kršņa Väsudera. [2-8 chapters concluded] नवम अध्ययन मूलश्री ET 94: उक्वेवओ य णवमस्स । तेणं कालेणं तेणं समएणं बारवईए णयरीए रेवयए पचए, णंदणवणे उज्जाणे, कण्हे राया । तत्थ णं बारवईए णयरीए कण्हस्स नवम अध्ययन • 983 Page #233 -------------------------------------------------------------------------- ________________ वासुदेवस्स पुत्ते जंबवईए देवीए अत्तए संबे णामं कुमारे होत्था । अहीण पडिपुण्ण-पंचिंदियसरीरे । तस्स णं संबस्स कुमारस्स मूलसिरी णामं भारिया होत्था, वण्णओ। अरहा अरिट्ठणेमी समोसढे । कण्हे णिग्गए । मूलसिरी वि णिग्गया । जहा पउमावई । ज णवरं देवाणुप्पिया ! कण्हं वासुदेवं आपुच्छइ जाव सिद्धा । सूत्र १५ : श्री जम्बू स्वामी ने कहा-हे भगवन् ! श्रमण भगवान महावीर ने आठवें अध्ययन के जो भाव कहे, वे मैंने आपके श्रीमुख से सुने । आगे श्रमण भगवान महावीर ने नवमें अध्ययन का क्या अर्थ कहा है ? यह कृपाकर बतलाइये । श्री सुधर्मा स्वामी ने कहा-हे जम्बू ! उस काल उस समय में द्वारका नगरी के पास रैवतक नाम का पर्वत था । जहां एक नन्दनवन उद्यान था । वहां कृष्ण वासुदेव राज्य करते थे । उन कृष्ण वासुदेव के पुत्र और रानी जाम्बवती देवी के आत्मज शाम्ब नाम के कुमार थे, जो पांचों इन्द्रियों से परिपूर्ण सर्वांग सुन्दर शरीर वाले थे । उन शाम्ब कुमार के मूलश्री नाम की भार्या थी, जो वर्णन करने योग्य थी (अत्यन्त सुन्दर एवं कोमलांगी थी)। एक समय अर्हत् अरिष्टनेमि वहां पधारे । कृष्ण वासुदेव उनके दर्शनार्थ गये । मूलश्री देवी भी “पद्मावती' के पूर्व वर्णन के समान प्रभु के दर्शनार्थ गई । भगवान ने धर्मोपदेश दिया, धर्मकथा कही । जिसे सुनकर जन-परिषद एवं श्रीकृष्ण तो अपने-अपने घर लौट गये । मूलश्री ने वहीं रुककर भगवान से प्रार्थना की, हे भगवन् ! मैं कृष्ण वासुदेव की आज्ञा लेकर आपके पास श्रमण धर्म में दीक्षित होना चाहती हूँ । भगवान ने कहा-हे देवानुप्रिये ! जैसा तुम्हें सुख हो वैसा करों । . १६४ अन्तकृद्दशा सूत्र : पंचम वर्ग Page #234 -------------------------------------------------------------------------- ________________ इसके बाद “मूलश्री'' अपने भवन को लौटी । मूलश्री के पति श्री शाम्बकुमार पहले ही प्रभुचरणों में दीक्षित हो चुके थे, अतः मूलश्री अपने श्वसुर श्री कृष्ण वासुदेव की आज्ञा लेकर पद्मावती के समान दीक्षित हुई । एवं उन्हीं के समान तप-संयम की आराधना करके सिद्ध पद को प्राप्त हुई। (7214 378447 4419) Chapter 9 Mūlasri Maxim 15 : Jambú Swāmi asked with reverence-Reverend Sir! I have heard from you what Bhagawāna Mahāvīra described as subject matter of eighth chapter. Now please tell me the subject matter of ninth chapter as expressed by Bhagawāna Mahāvīra. Sri Sudharmā Swāmi uttered-0 Jambū ! At that time and at that period, there was a city named Dwārakā, near Raivataka mountain and at that mountain was Nandanavana garden. Krsna Vasudeva was the ruler of that zone. Sambakumāra was the son of Krsna Vāsudeva and his queen Jāmbavati. That prince Sāinbakumära had all the five senses, and his body was beautiful. That Samba Kumāra had a wife named Mülasrī. She was tender and beautiful so was describable. Once Arhat Aristanemi came there. Krsna Vāsudeva went to bow down and worship him. Mülasri also went to Bhagawāna like Padmāvati. Bhagawana bestowed sermon and religious discourse. Hearing that Krsia Vásudva and general people went back to their places. Mūlasri stayed their and requested-0) Bhagawan ! Getting permission from Krsna Vasudeva, I intend to enter sage (nun) order in presence of you. नवम अध्ययन • 989 . Page #235 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Bhagawana said-o bcloved as gods ! Do as you feel happy. After that Milasri returned to her house. Samba Kiunāra, husband of Mulasri, had been consecrated in presence of Bhagawāna, so she asked permission from her father-in-law, Sri Krsna l'úsudera and getting his permission accepted consecration like Padmāvati. Like Padmavati she was also beatified by propiliating restrain and austerity. [Chapter nine concluded] • अध्ययन १0 एवं मूलदत्ता वि। (दस अज्झयणा) (इति पंचम वर्ग समाप्त) 'मूलथी' के ही समान “मूलदत्ता'' का भी सारा वृतान्त जानना चाहिये । (दस अध्ययन समाप्त) (पंचम वर्ग समाप्त) Chapter 10 The whole description of Miladaudi-should he knowu like that of Mülasri. [Chapter ten concluded] (Section five completed] . १६६ . अन्तकृद्दशा सूत्र : पंचम वर्ग Page #236 -------------------------------------------------------------------------- ________________ षष्ठम वर्ग सूत्र १ : जइ णं भंते समणेणं भगवया महावीरेणं अट्ठमस्स अंतगडदसाणं पंचमस्स वग्गस्स अयमढे पणत्ते, छट्ठस्स णं भंते ! वग्गस्स के अटे पणत्ते ? एवं खलु जंबू' समणेणं भगवया महावीरेणं अट्ठमस्स अंगस्स छट्ठस्स वग्गस्स सोलस अज्झयणा पण्णत्ता । तं जहामंकाई किंकमे चेव मोग्गरपाणी य कासवे । खेमए धितिधरे चेव केलासे हरिचन्दणे ॥१॥ वारत्त सुदंसण पुण्णभद्दे सुमणभद्दे सुपइटे मेहे । अइमुत्ते य अलक्खे अज्झयणाणं तु सोलसयं ॥२॥ सूत्र १: आर्य जम्बू-हे भगवन् ! मैंने अष्टम अंग अंतकृद्दशा के पांचवें वर्ग का भाव सुना, अब कृपया बताएँ कि छठे वर्ग में श्रमण भगवान् महावीर ने क्या भाव कहे हैं ? श्री सुधर्मा स्वामी हे जम्बू ! श्रमण भगवान् महावीर स्वामी ने छठे वर्ग के सोलह अध्ययन कहे हैं, जो इस प्रकार हैं१. मंकाई, २. किंकम, ३. मुद्गरपाणि, ४. काश्यप, ५. क्षेमक, ६. धृतिधर, ७. कैलाश, ८. हरिचन्दन, ९. वारत्त, १०. सुदर्शन, ११. पूर्णभद्र, १२. सुमनभद्र, १३. सुप्रतिष्ठ, १४. मेघ गाथापति, १५. अतिमुक्त कुमार एवं १६. अलक्ष्य कुमार । आर्य जम्बू-हे भगवन् ! श्रमण भगवान महावीर ने छठे वर्ग के १६ अध्ययन कहे हैं तो प्रथम अध्ययन का क्या अर्थ बताया है ? प्रथम अध्ययन १६७. Page #237 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Maxim 1 : SIXTH SECTION Ārya Jambu humbly said to Śrī Sudharmā Swāmī-O Bhagawan! I have heard the subject matter of fifth section. Now please tell me what subject matter of sixth section was preached by Śramana Bhagawāna Mahāvīra ? Śri Sudharma Swami-O Jambu ! Sramana Bhagawana Mahāvīra has expressed sixteen chapters of sixth section. The names of these sixteen chapters are as follows 1. Mankai, 2. Kinkama, 3. Mudgarapāni, 4. Kāsyapa, 5. Ksemaka, 6. Dhrtidhara, 7. Kailāśa, 8. Haricandana, 9. Wāratta, 10. Sudarsana. 11. Pūrnabhadra, 12. Sumanabhadra, 13. Supratistha, 14. Megha trader 15. Atimuktakumāra and, 16. Alaksyakumāra. प्रथम अध्ययन : मंकाई सूत्र २ : जणं भंते ! सोलस अज्झयणा पण्णत्ता, पढमस्स अज्झयणस्स के अट्ठे पण्णत्ते ? एवं खलु जंबू ! तेणं कालेणं तेणं समएणं रायगिहे णयरे, गुणसिलए चेइए, सेणिए राया । तत्थ णं मंकाई णामं गाहाबई परिवसइ; अड्ढे जाव अपरिभूए । तेणं कालेणं तेणं समएणं समणे भगवं महावीरे आइगरे गुणसिलए जाव विहरइ । परिसा णिग्गया । तए णं से मंकाई गाहावई इमीसे कहाए लद्धट्टे जहा पण्णत्तीए गंगदत्ते, तव इमो वि जेट्ठपुत्तं कुडुंबे ठवित्ता पुरिससहस्स - वाहिणीए सीयाए णिक्खते । १६८ • For Private Personal Use Only अन्तकृद्दशा सूत्र : षष्ठम वर्ग Page #238 -------------------------------------------------------------------------- ________________ जाव अणगारे जाए ईरियासमिए जाव गुत्तबंभयारी । तए णं से मंकाई अणगारे समणस्स भगवओ महावीरस्स तहारूवाणं थेराणं अंतिए सामाइयमाइयाई एक्कारस अंगाई अहिज्जइ ।। सेसं जहा खंदयस्स । गुणरयणं तयोकम्मं सोलसवासाइं परियाओ तहेव विपुले सिद्धे । (पढमं अज्झयणं) सूत्र २ : आर्य सुधर्मा स्वामी हे जम्बू ! उस काल उस समय में राजगृह नामक नगर था। वहां गुणशीलक नाम का चैत्य (उद्यान) था । उस नगर में श्रेणिक राजा राज्य करते थे । वहां मंकाई नाम का एक गाथापति रहता था। जो अत्यन्त समृद्ध और सबको आधारभूत यावत् अपरिभूत अर्थात् समाज में, जाति में जिसका कोई अपमान या तिरस्कार नहीं कर सके, ऐसा था । उस काल उस समय में धर्म की आदि करने वाले श्रमण भगवान महावीर गुणशीलक नामक उद्यान में पधारे । प्रभु का आगमन सुनकर जन परिषद् दर्शनार्थ एवं धर्मोपदेश श्रवणार्थ आई। मंकाई गाथापति ने भगवान के आगमन का वृत्तान्त सुना तो उनके दर्शन करने एवं धर्मोपदेश सुनने के लिये अपने घर से निकला । भगवान ने धर्मोपदेश दिया, जिसे सुनकर मंकाई गाथापति को संसार से वैराग्य हो गया। इसका सभी वर्णन भगवती सूत्र में वर्णित गंगदत्त श्रावक की तरह जानना चाहिए । अर्थात्-उसने अपने घर आकर अपने ज्येष्ठ पुत्र को घर का भार सौंपा और शिविका (पालकी) में बैठकर श्रमण दीक्षा अंगीकार करने हेतु भगवान की सेवा में आया । यावत् वह अणगार हो गया। ईर्या समिति आदि पांच समितियों से युक्त एवं गुप्तियों से गुप्त ब्रह्मचारी बन गया । प्रथम अध्ययन .१६९ . Page #239 -------------------------------------------------------------------------- ________________ इसके बाद मंकाई मुनि ने श्रमण भगवान महावीर के गुणसम्पन्न तथारूप स्थविरों के पास सामायिक आदि ग्यारह अंगों का अध्ययन किया और स्कंदक के समान गुणरत्न संवत्सर तप का आराधन किया । (गुणरत्न संवत्सर तप का वर्णन गौतम अणगार के प्रकरण प्रथम वर्ग के प्रथम अध्ययन में देखें ।) सोलह वर्ष की दीक्षा पर्याय पाली और अन्त में विपुल गिरि पर स्कन्दक जी के समान ही संथारादि करके यावत् सिद्ध हो गये । (प्रथम अध्ययन समाप्त) Chapter 1 : Mankai Maxim 2: Ārya Jambū asked Śrī Sudharma Swami-O Bhagawan ! If Sramana Bhagawāna Mahāvīra has preached sixteen chapters of sixth section then what subject matter he told of first chapter ? Arya Sudharma Swami began to narrate-O Jambu ! At that time and at that period, there was a city named Rajag! ha. In that city was Gunaśīlaka garden. King Srenika was ruling over that city. In that city Maikās trader (gāthāpati) inhabited. He was too rich, like a support to all and was such that in society and clan none could disregard and dishonour him. At that time and at that period, founder (promoter) of religion, Sramana Bhagawāna Mahāvīra came and stayed in Gunaśīlaka garden. Having heard of coming of Prabhu public congregation came and gathered for seeing and hearing his sermon. When Maikās trader heard about coming of Bhagawāna then he came out of his house to see and hear the sermon of Prabhu. Bhagawāna preached religious doctrines, hearing which Mankai became disinclined to world and worldy pleasures. Its full description should be known like . १७०. अन्तकृद्दशा सूत्र : षष्ठम वर्ग Page #240 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Gargadatta śrāvaka (householder) which has been described in Bhagawati Sūtra (16 - 5)-meaning-coming home he bestowed the full responsibility of home (family, trade etc.) to his eldest son and riding on a palanquin came in service (presence) of Bhagawāna for accepting consecration until he became houseless mendicant, circumspect by five circumspections viz., circumspection of movement etc., and practising three incognitoes of mind, speech and body, he became guarded celibate. After that Mankāi monk studied Sāmāyika etc., eleven holy scriptures (angas) from the elder sages of Bhagawana Mahāvīra and practised Gunaratna samvatsara penance. The description of this austerity should be known from first chapter of first section in the episode of Gautama houseless mendicant. He practised consecration upto sixteen years, in the end of life accepted sarithārā and attained salvation at Vipula mountain, like Skandakajī. [First chapter concluded] द्वितीय अध्ययन दोच्चस्स उक्खेवओ, किंकमे वि एवं चेव जाव विपुले सिद्धे । HET 3 : दूसरे अध्ययन में 'किंकम" गाथापति का वर्णन है । वे भी मंकाई गाथापति के समान ही प्रभु महावीर के पास प्रव्रजित होकर विपुल गिरि पर सिद्ध, बुद्ध और सर्व दुःखों से मुक्त हो गये । Chapter 2 Maxim 3 : In the second chapter there is the description of Kinkama trader. He also accepted consectration near (in presence of) द्वितीय अध्ययन • 969 . Page #241 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Bhagawāna Mahāvīra, like trader Mańkāi and salvated at mountain Vipula until became free from all miseries. [Second chapter concluded) तृतीय अध्ययन अर्जुन मालाकार (मुद्गरपाणि) सूत्र ४ : तच्चस्स उक्खेवओ । एवं खलु जंबू ! तेणं कालेणं तेणं समएणं रायगिहे णयरे गुणसिलए चेइए, सेणिए राया । चेल्लणा देवी । तत्थ णं रायगिहे णयरे अज्जुणए णामं मालागारे परिवसइ । अड्ढे जाव अपरिभूए । तस्स णं अज्जुणयस्स बंधुमई णामं भारिया होत्था । सुकुमाल पाणि-पाया । तस्स णं अज्जुणयस्स मालागारस्स रायगिहस्स णयरस्स बहिया एत्थ णं महं एगे पुष्फारामे होत्था । कण्हे जाव णिकुरंबभूए दसद्धवण्णकुसुमकुसुमिए, पासाइए। तस्स णं पुप्फारामस्स अदूरसामंते तत्थ णं अज्जुणयस्स मालागारस्स अज्जय-पज्जय-पिइपज्जयागए अणेगकुलपुरिस-परंपरागए मोग्गरपाणिस्स जक्खस्स जक्खाययणे होत्था । पोराणे दिव्ये, सच्चे जहा पुण्णभद्दे । तत्थ णं मोग्गरपाणिस्स पडिमा एगं महं पलसहस्स-णिप्फण्णं अयोमयं मोग्गरं गहाय चिट्ठइ। सूत्र ४ : आर्य जम्बू-हे भगवन ! श्रमण भगवान महावीर ने छठे वर्ग के दूसरे अध्ययन का जो भाव कहा है वह मैंने सुना । अब तीसरे अध्ययन का प्रभु ने क्या अर्थ कहा है ? कृपाकर वह भी बताइये । . १७२ . अन्तकृद्दशा सूत्र : षष्ठम वर्ग Page #242 -------------------------------------------------------------------------- ________________ श्री सुधर्मा स्वामी - हे जम्बू ! उस काल में राजगृह नाम का नगर था, वहां गुणशीलक नामक उद्यान था. उस नगर में राजा श्रेणिक राज्य करते थे, उनकी रानी का नाम चेलना था । उस राजगृह नगर में अर्जुन नाम का एक माली था । वह धनी ( आढ्य ) तथा अपराभूत था । उसकी पत्नी का नाम बन्धुमती था, जो अत्यन्त सुन्दर और कोमल थी । उस अर्जुनमाली का राजगृह नगर के बाहर एक बड़ा पुष्पाराम (फूलों का बगीचा ) था । वह बगीचा नीले एवं सघन पत्तों से आच्छादित होने के कारण आकाश में चढ़ी घनघोर घटाओ के समान श्यामकान्ति से युक्त प्रतीत होता था । उसमें पाँचों वर्णों के फूल खिले हुए थे । वह बगीचा हृदय को प्रसन्न एवं प्रफुल्लित करने वाला एवं बड़ा दर्शनीय था । उस पुष्पाराम यानी फुलवाड़ी के समीप ही मुद्गरपाणि नामक यक्ष का यक्षायतन (मन्दिर) था, जो उस अर्जुनमाली के पिता, पितामह आदि पूर्वजों से चली आई कुल परम्परा से सम्बन्धित था । वह पूर्णभद्र चैत्य के समान पुराना, दिव्य एवं सत्य प्रभाव वाला था । उसमें “मुद्गरपाणि” नामक यक्ष की एक प्रतिमा थी, जिसके हाथ में एक हजार पल-परिमाण (वर्तमान तोल के अनुसार लगभग ६२.५० सेर तदनुसार लगभग ५७ किलो) भार वाला लोहे का एक मुद्गर था । Maxim 4 : Ārya Jambu said politely to Arya Sudharmă Swāmī–O Bhagawaa! I have heard the subject matter of second chapter from you, as described by Sramana Bhagawāna Mahavira. Now please tell me the subject matter of third chapter-what has he said? तृतीय अध्ययन Chapter 3 ARJUNA Mudgarapāņi For Private Personal Use Only • १७३ ● Page #243 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Sri Sudharmā Swāmī began to narrate - O Jambū ! At that time and at that period there was a city named Rajagṛha. In that city was Guṇasilaka garden. King Śrenêka was ruler of that city. Name of his chief queen was Celanā. A gardener or garland maker, named Arjuna was the resident of that city. He was rich and unsurpasable. The name of his wife was Bandhumati. She was tender and much beautiful. That Arjuna garland-maker had a big flower-garden outside the city Rajagṛha. That garden was covered by dense blue leaves. So it seemed as the dense clouds in the sky. Flowers of five colours bloomed in it. So that garden was heart-pleasing eye-capturing and worth seeing. Near that garden was a sanctuary of deity (god) Yakṣa Mudgarapāņi. That deity had devolved upon him from a line of many ancestors of the family from father, grand father etc. Ancient, divine and true influensive, like the sanctuary of Pūrṇabhadra deity. In that sanctuary there was an idol of deity (Yakṣa) Mudgarapāņi having held the iron mace weighing one thousand palas (according to modern weights about 57 kilogram heavy ) in his hand. सूत्र ५ : तणं से अज्जुण मालागारे बालप्पभिई चेव मोग्गरपाणि - जक्खस्स भत्ते या होत्था | कल्ला कल्लिं पच्छिपिडगाई गिण्हइ, गिहित्ता रायगिहाओ णयराओ पडिणिक्खमइ; पडिणिक्खमित्ता जेणेव पुप्फारामे तेणेव उवागच्छइ; उवागच्छित्ता पुप्फुच्चयं करेइ, करित्ता; अग्गाई बराई पुष्फाई गहाय जेणेव मोग्गरपाणिस्स जक्खाययणे तेणेव उवागच्छइ, उवागच्छित्ता मोग्गरपाणिस्स जक्खस्स महरिहं अन्तकृद्दशा सूत्र : षष्ठम वर्ग १७४ For Private Personal Use Only Page #244 -------------------------------------------------------------------------- ________________ पुष्फच्चयणं करेइ; करित्ता जाणुपायपडिए पणामं करेइ, करित्ता तओ पच्छा रायमगंसि वित्तिं कप्पेमाणे विहरइ । सूत्र ५ : अर्जुनमाली बचपन से ही उस मुद्गरपाणि यक्ष का पक्का भक्त (अनन्य उपासक) था । प्रतिदिन बांस की छबड़ी (डलिया) लेकर वह राजगृह नगर से बाहर स्थित अपनी उस फुलवाड़ी में जाता और फूलों को चुन-चुनकर एकत्रित करता था। फिर उन चुने हुए फूलों में से उत्तम-उत्तम फूलों से उस मुद्गरपाणि यक्ष की भक्ति भावपूर्वक अर्चना करता था और भूमि पर दोनों घुटने टेककर उसे प्रणाम करता था । इसके बाद राजमार्ग के किनारे बाजार में बैठकर उन फूलों को बेचकर अपनी आजीविका उपार्जन करता हुआ सुखपूर्वक वह अपना जीवन बिता रहा था । Maxim 5: Arjuna garland-maker from his childhood was fervent devotee of that deity. Every morning, he took bamboo basket, went out of the city Rājagrha, arrived at his flower-garden, plucked and made collection of flowers. Then he took the foremost and best flowers approached the sanctuary of deity Mudgarapāņi, devotedly worshipped him, made the flower-offering of best quality, bowed falling over his knees and afterwards would go on highway and sitting there on a side, he would sell his flowers. Thus he was passing his life happily. सूत्र ६ : तत्थ णं रायगिहे णयरे ललिया णामं गोट्ठी परिवसइ, अड्ढा जाव अपरिभूया, जं कय-सुकया यावि होत्था । तए णं रायगिहे णयरे अण्णया कयाइं पमोए घुढे यावि होत्था । तए णं से अज्जुणए मालागारे 'कल्लं पभूयतरएहिं पुप्फेहिं कज्ज' इति कटु तृतीय अध्ययन . १७५. Page #245 -------------------------------------------------------------------------- ________________ पच्चूसकालसमयंसि बंधुमईए भारियाए सद्धिं पच्छिपिडगाई गिण्हइ गिण्हित्ता, सयाओ गिहाओ पडिणिक्समइ, पडिणिक्वमित्ता रायगिहं णयरं मज्झं मझेणं णिगच्छइ, णिगच्छिता जेषेव पुष्फारामे तेणेव उवागच्छइ, उवागच्छित्ता बंधुमईए भारियाए सद्धिं पुष्फुच्चयं करेइ । गोष्ठिक पुरुषों का अनाचरण उस राजगृह नगर में “ललिता'' नाम की एक गोष्ठी (मित्र मण्डली) रहती थी जो अत्यन्त समृद्ध तथा अपराभूत-किसी से हार मानने वाली नहीं थी और जो वह कर दे वो ही ठीक है ऐसी आज्ञा भी उसे प्राप्त थी । (किसी समय नगर के राजा का कोई हित कार्य सम्पादन करने के कारण राजा ने उस मित्र मण्डली पर प्रसन्न होकर अभयदान दे दिया कि वे अपनी इच्छानुसार कोई भी कार्य करने में स्वतंत्र हैं । राज्य की ओर से उन्हें संरक्षण था, इस कारण यह गोष्ठी बहुत उच्छृखल और स्वच्छन्द बन गई थी ।) एक दिन राजगृह में एक प्रमोद हर्ष उत्सव मनाने की घोषणा हुई । इस पर अर्जुनमाली ने अनुमान लगाया कि ‘कल इस उत्सव के अवसर पर फूलों की बहुत भारी मांग होगी' इसलिये उस दिन वह प्रातःकाल जल्दी उठा और बांस की डलिया लेकर अपनी पत्नी बंधुमती के साथ जल्दी घर से निकलकर नगर में होता हुआ फुलवाड़ी में पहुँचा और अपनी पत्नी के साथ फूलों को चुन-चुनकर एकत्रित करने लगा । Maxim 6 : Here in Rājagrha city dwelt a bunch of friends, named Lalitā, which was very rich and unsurpassed i.e., none can defeat that gang. That gang also possessed the royal mandate that 'what ever the members of this gang do is quite correct.' . १७६ अन्तकृदशा सूत्र : षष्ठम वर्ग Page #246 -------------------------------------------------------------------------- ________________ (Perhaps this gang had done some good to the ruler of the city. Pleased he had passed such mandate that these gangsters are free to do as they like. They had the patronage of the ruler. So this gang (members of gang) became quite free, mischievous and wicked.) One day, in the city an announcement was made to celebrate a pleasure festival-ceremony. Then that garlandmaker-gardener Arjuna thought that tomorrow the demand of flowers would be very much. Having this idea he awoke early in the morning that day and taking his bamboobaskets, went out from house early with his wife Bandhumati, moving through the city reached his flowergarden. There, with his wife, he began to collect flowers, plucking from plants. सूत्र ७: तए णं तीसे ललियाए गोट्ठीए छ गोठिल्ला पुरिसा जेणेव मोग्गरपाणिस्स जक्खस्स जक्वाययणे तेणेव उवागया अभिरममाणा चिट्ठति । तए णं से अज्जुणए मालागारे बंधुमईए भारियाए सद्धिं पुप्प्फुच्चयं करेइ; करित्ता अग्गाइं वराइं पुप्फाई गहाय जेणेव मोग्गरपाणिस्स जक्खस्स जक्खाययणे तेणेव उवागच्छइ । तए णं ते छ गोहिल्ला पुरिसा अज्जुणयं मालागारं बंधुमईए भारियाए सद्धिं एज्जमाणं पासइ, पासित्ता अण्णमण्णं एवं वयासी-एवं खलु देवाणुप्पिया ! अज्जुणए मालागारे बंधुमईए भारियाए सद्धिं इहं हव्यमागच्छइ; तं सेयं खलु देवाणुप्पिया ! अज्जुणयं मालागारं अवओडयबंधणयं करित्ता बंधुमईए भारियाए सद्धिं विउलाई भोगभोगाइं भुंजमाणाणं विहरित्तए। त्ति कटु एयमटुं अण्णमण्णस्स पडिसुणेति, पडिसुणित्ता कवाडंतरेसु णिलुक्कंति, णिच्चला, णिप्फंदा, तुसिणीया पच्छण्णा चिटुंति । तृतीय अध्ययन १७७ Page #247 -------------------------------------------------------------------------- ________________ सूत्र : उस समय पूर्वोक्त “ललिता'' गोष्ठी के छः पुरुष मुद्गरपाणि यक्ष के यक्षायतन में आकर आमोद-प्रमोद एवं परस्पर खेल-कूद, हंसी-मजाक करने लगे । उधर अर्जुनमाली अपनी पत्नी वन्धुमती के साथ फूल संग्रह करके उनमें से उत्तम फूलों को लेकर मुद्गरपाणि यक्ष की पूजा करने के लिये यक्षायतन की ओर बढ़ा । उन छ: गोष्टिक पुरुषों ने अर्जुनमाली को बंधुमती भार्या के साथ यक्षायतन की ओर आते हुए देखा, देखकर परस्पर विचार विमर्श करके निश्चय किया-हे मित्रो ! यह अर्जुनमाली अपनी बंधुमती भार्या के साथ इधर ही आ रहा है। हम लोगों के लिए यह अच्छा अवसर है, कि ऐसे मौके पर इस अर्जुनमाली को तो औंधी मश्कियों (दोनों हाथों को पीठ पीछे) से बलपूर्वक बांधकर एक ओर पटक दें, और फिर इसकी इस सुन्दर स्त्री बंधुमती के साथ खूब मन इच्छित काम-क्रीड़ा करें । इस प्रकार परस्पर यह निश्चय करके वे छहों उस यक्षायतन के किवाड़ों के पीछे छिपकर खड़े हो गये और उन दोनों के यक्षायतन के भीतर प्रविष्ट होने की श्वास रोककर चुपचाप प्रतीक्षा करने लगे। Maxim 7 : At that time the six members of Lalitā gang came to the shrine (sanctuary) of Mudgarapāni deity and began to enjoy rejoicings and merriments. On other side, garland-maker Arjuna gathered flowers, taking best flowers moved towards the shrine with his wife Bandhumatī. Six gangsters saw Arjuna coming to the shrine with his wife Bandhumati. Seeing them, gangsters discussed with one-another and decided-Friends ! this garland-maker Arjuna is coming here with his wife Bandhumati. It is a . १७८ अन्तकृद्दशा सूत्र : षष्ठम वर्ग Page #248 -------------------------------------------------------------------------- ________________ 2928 a * . A M M 2 : . @ . . 374 ter 3 8. 24 ASH Page #249 -------------------------------------------------------------------------- ________________ म चित्रक्रम २५ : अर्जुन मालाकार उद्यान में राजगृह के बाहर उद्यान में अर्जुन मालाकार अपनी पत्नी बन्धुमती के के साथ सुबह-सुबह ही फूल चुनता है। तब वहाँ बैठे छह बदमाशों (गोष्ठिक पुरुषों) की नजर उसकी सुन्दर पत्नी पर पड़ी। वे वृक्षों की ओट में छिप गये और अपनी मनोकामना पूरी करने का मौका देखने लगे। (वर्ग ६/अध्य. ३) 卐 4 Illustration No. 25 :. Arjuna, the garland maker in his garden Arjuna, the garland maker plucks flowers with his wife Bandhumatī, from his garden situated outside the city Rajagraha, early in the morning. Then six rascals (gosthika persons) saw his beautiful wife. They hid themselves behind trees and wished to seek chance to accomplish their evil desire. (Sec. 6/Ch. 3) · अन्तकृदशा सूत्र : चित्र परिचय Page #250 -------------------------------------------------------------------------- ________________ good opportunity for us, we must bind Arjuna fast-by twisting the arms and head and tying them to the back, fell him and then enjoy sexual pleasures according to our desire with his beautiful and tender wife Bandhumati. Thus deciding, all the six gangsters hid behind the doors of shrine, stood hidden and waited silently for them to come. सूत्र ८ : तए णं से अज्जुणए मालागारे बंधुमईए भारियाए सद्धिं जेणेव मोग्गरपाणिस्स जक्खाययणे तेणेव उवागच्छइ, उवागच्छित्ता आलोए पणामं करेइ, करित्ता महरिहं पुष्प्फुच्चयणं करेइ; करित्ता, जाणुपायपडिए पणामं करेइ। तए णं ते छ गोहिल्ला पुरिसा दवदवस्स कवाडंतरेहितो णिग्गच्छंति, णिग्गच्छित्ता, अज्जुणयं मालागारं गेण्हंति; गिण्हित्ता अवओडय-बंधणं करेंति, करित्ता बंधुमईए मालागारीए सद्धि विउलाई भोगभोगाई भुंजमाणा विहरंति । तए णं तस्स अज्जुणयस्स मालागारस्स अयमज्झथिए समुप्पण्णे-एवं खलु अहं बालप्पभिई चेव मोग्गरपाणिस्स भगवओ कल्लाकल्लिं जाव वित्तिं कप्पेमाणे विहरामि । तं जइ णं मोग्गरपाणि जक्खे इह सण्णिहिए होंते से णं किं ममं एयारूवं आवत्तिं पावेज्जमाणं पासते ? तं णत्थि णं मोग्गरपाणि जक्खे इह सण्णिहिए सुव्यत्तंणं एस कटे । सूत्र ८ : इधर अर्जुनमाली अपनी बंधुमती भार्या के साथ यक्षायतन में प्रविष्ट हुआ और भक्तिपूर्वक प्रफुल्लित नेत्रों से मुद्गरपाणि यक्ष की ओर देखा प्रणाम किया । फिर चुने हुए उत्तमोत्तम फूल उस पर चढ़ाकर दोनों घुटने भूमि पर टेककर साष्टांग प्रणाम करने लगा । तृतीय अध्ययन . १७९ . Page #251 -------------------------------------------------------------------------- ________________ उसी समय मौका देखकर शीघ्रता से उन छह गोष्ठिक पुरुषों ने किवाड़ों के पीछे से निकलकर अर्जुनमाली को पकड़ लिया और उसकी औंधी मुश्कें बांधकर उसे एक ओर पटक दिया। फिर उसकी पत्नी बंधुमती मालिन के साथ विविध प्रकार से काम-क्रीड़ा करने लगे । अपनी आँखों के सामने यह घोर दुराचार देखकर अर्जुनमाली के मन में यह विचार आया- देखो, मैं अपने बचपन से ही इस मुद्गरपाणि को अपना इष्टदेव मानकर इसकी प्रतिदिन भक्तिपूर्वक पूजा करता आ रहा हूँ । इसकी पूजा करने के बाद ही इन फूलों को वेचकर अपना जीवन-निर्वाह करता आ रहा हूँ । तो यदि मुद्गरपाणि यक्ष देव यहां वास्तव में ही होता तो क्या मुझे इस प्रकार विपत्ति में पड़ा देखकर चुप रहता ? इसलिए निश्चय ही मुद्गरपाणि यक्ष यहां नहीं है । यह तो मात्र काष्ठ का पुतला है । Maxim 8 : Arjuna garland-maker entered the shrine of Mudgarapāni deity with his wife Bandhumati, reverred and bowed down on seeing it, made flower-offerings and bowed down falling upon his knees. In the meanwhile seeing best opportunity, all of a sudden, those six fellows came out from behind the doors, caught Arjuna garland-maker. bound him fast and made him fall aside. Then began to enjoy sexual pleasures to the fullest and by various postures and methods with Bandhumati, the wife of Arjuna garland-maker. Seeing such a mean misdeed (license) before his own eyes, such thoughts aroused in the mind of garland-maker Arjuna-Thus indeed, from my childhood, I go on reverring Mudgarapāņi deity, considering as my favourite god. After its reverence. I carry on my business. Had there been deity Mudgarapāņi really present, would he remain silent seeing me in such a tyranny? Therefore अन्तकृद्दशा सूत्र : षष्ठम वर्ग १८० For Private Personal Use Only Page #252 -------------------------------------------------------------------------- ________________ गुणशीलक उद्यान में अर्जुन मालाकार FAS. USA । 1. M .. m a कोयन्धनमें novernmentary . AAR MAYA AASHRAM Lain Education International Page #253 -------------------------------------------------------------------------- ________________ 05555555555555555555 चित्रक्रम २६ : गोष्ठिक पुरुषों द्वारा उपद्रव दृश्य १-अर्जुन और उसकी पत्नी अपने कुल-देवता मुद्गगरपाणि यक्ष की फूलों से अर्चना पूजा करने लगे तब वे छहों बदमाश किवाड़ों की ओट में छिप गये। मौका देखने लगे। दृश्य २-मौका पाकर बदमाशों ने अर्जुन को पकड़ लिया, उसकी उल्टी मुश्के बाँध दी और लगे पत्नी के साथ दुराचार करने । (वर्ग ६/अध्य. ३) Illustration No. 26 : *Misdeed by six rascals Scene 1. When Arjuna and his wife began to worship their tutelary deity-Mudgarapani Yaksa (deity) offering him flowers, then all the six rascals hid themselves behind the doorleafs. ___Scene 2. Getting chance rascals bound Arjuna and began to have sexual enjoyment with Bandhumati. (Sec. 6/Ch. 3) 055555555555555555555555555555555555555555550 अन्तकृद्दशा सूत्र : चित्र परिचय Page #254 -------------------------------------------------------------------------- ________________ deity Mudgarapāņi is not present here. It is only a puppet of wood. सूत्र ९ : तए णं से मोग्गरपाणिजक्खे अज्जुणयस्स मालागारस्स अयमेयारूवं अज्झस्थियं जाव वियाणित्ता, अज्जुणयस्स मालागारस्स सरीरयं अणुप्पविसइ, अणुप्पविसित्ता तडतडस्स बंधाई छिदइ, छिंदित्ता तं पलसहस्सणिप्फण्णं अयोमयं मोग्गरं गिण्हइ, गिण्हित्ता ते इत्थिसत्तमे छ पुरिसे घाएइ । तए णं से अज्जुणए मालागारे मोग्गरपाणिणा जक्वेणं अणाइडे समाणे रायगिहस्स णयरस्स परिपेरंतेणं कल्लाकल्लि इत्थिसत्तमे छ पुरिसे घाएमाणे विहरइ। सूत्र ९ : तब मुद्गरपाणि यक्ष ने अर्जुनमाली के इस प्रकार के मनोभावों को जानकर उसके शरीर में प्रवेश किया और उसके बन्धनों को तड़ातड़ तोड़ डाला । अब उस मुद्गरपाणि यक्ष से आविष्ट उस अर्जुनमाली ने उस हजार पल भार वाले लोहमय मुद्गर को हाथ में लेकर घुमाया और अपनी बंधुमती भार्या सहित उन छहों गोष्ठिक पुरुषों को उस मुद्गर प्रहार से मार डाला । इस प्रकार इन सातों प्राणियों को मारकर मुदगरपाणि यक्ष से आविष्ट (वशीभूत) वह अर्जुनमाली राजगृह नगर की बाहरी सीमा के पास चारों ओर ६ पुरुष और १ स्त्री-कुल मिलाकर ७ प्राणियों की प्रतिदिन हत्या करते हुए घूमने लगा। Maxim 9: Knowing such types of mental thoughts of Arjuna garlandmaker deity Mudgarapāni entered in his body and shattered off his bonds. - तृतीय अध्ययन . १८१ . Page #255 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Then Arjuna garland-maker, possessed by deity Mudgarapāņi took hold of that iron mace weighing one thousand palas (about 57 kilogram heavy) holding in his hand moved round and killed those six gangsters, along with his wife Bandhumatī, by its strokes. Thus killing those seven persons, that Arjuna garlandmaker possessed by deity Mudgarapāņi, began to move round about external boundary of Rājag! ha city killing six men and one woman everyday. सूत्र १0 : तए णं रायगिहे णयरे सिंघाडग जाव महापहेसु बहुजणो अण्णमण्णस्स एवमाइक्खइ-एवं खलु देवाणुप्पिया ! अज्जुणए मालागारे मोग्गरपाणिणा जक्खेणं अणाइडे समाणे रायगिहे बहिया इत्थिसत्तमे छ पुरिसे घाएमाणे विहरइ । तए णं से सेणिए राया इमीसे कहाए लद्धढे समाणे कोडुंबियपुरिसं सद्दावेइ, सहावित्ता एवं बयासीएवं खलु देवाणुप्पिया ! अज्जुणए मालागारे जाव घाएमाणे विहरइ । तं मा णं तब्भे केइ तणस्स वा कट्ठस्स वा पाणियस्स वा, पुप्फफलाणं वा अट्ठाए सइरं णिगच्छउ । मा णं तस्स सरीरस्स वावत्ती भविस्सइ । त्ति कटु दोच्चं पि तच्चं पि घोसणं घोसेह; घोसित्ता खिप्पामेव ममेयं पच्चप्पिणह । तए णं ते कोडुंबियपुरिसा जाव पच्चप्पिणंति । अर्जुन का आतंक सूत्र १०: उस समय राजगृह नगर के शृंगाटकों में, राजमार्गों आदि सभी स्थानों में, बहुत से लोग परस्पर इस प्रकार बोलने लगे हे देवानुप्रियो ! अर्जुनमाली . १८२ . अन्तकृद्दशा सूत्र : षष्टम वर्ग Page #256 -------------------------------------------------------------------------- ________________ मुद्गरपाणि यक्ष के वशीभूत होकर राजगृह नगर के बाहर एक स्त्री और छह पुरुष, इस प्रकार सात व्यक्तियों को प्रतिदिन मारता हुआ घूम रहा है । जव श्रेणिक राजा ने यह बात सुनी तो उन्होंने अपने सेवक पुरुषों को बुलाया और उनसे इस प्रकार कहाहे देवानुप्रियो ! राजगृह नगर के बाहर अर्जुनमाली यावत् छह पुरुषों और एक स्त्री इस प्रकार सात व्यक्तियों को प्रतिदिन मारता हुआ घूम रहा है । इसलिये तुम सारे नगर में मेरी आज्ञा को इस प्रकार प्रसारित करो कि कोई घास के लिये, काष्ठ, लकड़ी, पानी अथवा फल-फूल के लिये राजगृह नगर से बाहर न निकले। (यदि वे कहीं वाहर निकले तो ऐसा न हो कि) उनके शरीर का विनाश हो जाए । हे देवानुप्रियो ! इस प्रकार दो-तीन बार घोषणा करके मुझे सूचित करो । इस प्रकार राजाज्ञा पाकर राज्याधिकारियों ने राजगृह नगर में घूम-घूम कर उपर्युक्त राजाज्ञा की घोषणा की और घोषणा करके राजा को पुनः सूचित कर दिया । Horror of Arjuna Maxim 10 : At that time, at the triangular paths, highways and all other open places of Rājagrha city many people used to say to one another-O beloved as gods ! garland-maker Arjuna, being possessed by deity Midgarapani, is murdering six men and one woman-thus seven persons daily, moving outside the city Rajagrha. When king Srenika came to know about this, then he called his chamberlains and ordered themO beloved as gods ! Arjuna garland-maker, wandering outside Rājag! ha city is murdering 7 persons-six men and one woman everyday. Therefore you announce my order by these words-that no one should go out of city for taking प्रथम अध्ययन .१८३. Page #257 -------------------------------------------------------------------------- ________________ grass, wood, fuel, water and flowers, fruits etc. If any body goes out of the city, it is possible that his body may be destroyed i.l., le may be murdered. ( beloved as gods ! Thus announce this declaration twice and thrice in whole city and report to me soon. Then those chamberlains announced the royal mandate twice and thrice wandering in the whole city and reported to the king that his order had been carried out. सूत्र ११: तत्थ णं रायगिहे णयरे सुदंसणे णामं सेट्ठी परिवसइ; अड्ढे जाव अपरिभूए । तए णं से सुदंसणे समणोवासए यावि होत्था । अभिगयजीवाजीवे जाव विहरइ । तेणं कालेणं तेणं समएणं समणे भगवं महावीरे समोसढे जाव विहरइ । तए णं रायगिहे णयरे सिंघाडग जाव महापहेसु बहुजणो अण्णमण्णस्स एवमाइक्खइ-जाव एगस्स वि आयरियस्स धम्मियस्स सुवयणस्स सवणयाए किमंग पुण विउलस्स अट्ठस्स गहणयाए ? सूत्र ११: उस राजगृह नगर में सुदर्शन नाम के एक सेठ रहते थे जो बहुत धनाढ्य यावत् अपराभूत थे । वे श्रमणोपासक थे और जीव-अजीव आदि नव तत्वों के ज्ञाता, यावत् श्रमणों को निर्दोष आहार आदि का प्रतिलाभ देने वाले थे । उस काल उस समय में श्रमण भगवान महावीर स्वामी विहार करते हुए राजगृह नगर में पधारे और बाहर उद्यान में ठहरे । । भगवान के आगमन का समाचार सुनकर राजगृह नगर के शृंगाटक, राजमार्ग आदि स्थानों में बहुत से नागरिक लोग परस्पर इस प्रकार वार्तालाप करने लगे-(हे देवानुप्रियो) श्रमण भगवान महावीर स्वामी यहां पधारे हैं, जिनके नाम गोत्र के सुनने मात्र से भी महान पुण्य फल होता . १८४ . अन्तकृद्दशा सूत्र : षष्ठम वर्ग Page #258 -------------------------------------------------------------------------- ________________ है, तो उनके दर्शन करने, वाणी सुनने तथा उनके द्वारा प्ररूपित धर्म का विपुल अर्थ ग्रहण करने से जो फल होता है, उसका तो कहना ही क्या ? ( वह तो अवर्णनीय है ) । Maxim 11 : In that city Rajagṛha lived a richman named Sudarśana. He was too much wealthy and could not be surpassed by any one. He was worshipper of sages and well-versed in elements like soul and non-soul etc., giver of pure foodwater etc., to monks. At that time and at that period Bhagawāna Mahāvīra, wandering village to village, arrived in the city Rājagṛha and stayed in the garden situated outside of the city. Having heard of the information about arrival of Bhagawāna, the numerous citizens of Rajagṛha city gathering at triangular ways and highways said thus to one another-(O beloveds as gods) Śramaṇa Bhagawāna Mahāvīra has arrived here. By hearing his name only one gets the fruits of great merit. then by seeing him, hearing his discourse and accepting the doctrines preached by him the fruit one gets, what to say about that ? ( that cannot be described). विवेचन सुदर्शन सेठ के परिचय में - अभिगय जीवाजीवे जाव विहरइ-पाठ से, भगवती सूत्र २ / ५ में वर्णित श्रावकों के वर्णन अनुसार समझना चाहिए, यह सूचना दी गई है। उक्त स्थान पर श्रावक की धार्मिक विशेषताएं मनन करने योग्य हैं, जो इस प्रकार हैं "वे श्रमणोपासक - श्रावक थे और जीव-अजीव के अतिरिक्त पुण्य और पाप के स्वरूप को भी जानते थे । इसी प्रकार आनव, संबर, निर्जरा, क्रिया ( कर्मबंध की कारणभूत पच्चीस प्रकार की क्रियाओं), अधिकरण ( कर्मबंध का साधन - शस्त्र) तथा बंध और मोक्ष के स्वरूप के भी ज्ञाता थे । किसी भी कार्य में वे दूसरों की सहायता की अपेक्षा नहीं रखते थे । निर्ग्रन्थ प्रवचन में इतने दृढ़ थे तृतीय अध्ययन १८५ • For Private Personal Use Only Page #259 -------------------------------------------------------------------------- ________________ कि देव, असुर, यक्ष, राक्षस अदि भी उन्हें निर्ग्रन्थ प्रवचन से विचलित नहीं कर सकते थे। उन्हें । निर्ग्रन्थ प्रवचन में शंका, कांक्षा, विचिकित्सा (फल में सन्देह) नहीं थी । उन्होंने शास्त्र के परमार्थ को समझ लिया था । वे शास्त्र का अर्थ-रहस्य निश्चित रूप से धारण किए हुए थे। उन्होंने शास्त्र के सन्देहजनक स्थलों को ज्ञानियों से पूछकर उनका विशेष रूप से निर्णय कर लिया था । उनकी हड्डियाँ और मज्जा सर्वज्ञ देव के धर्म-अनुराग से अनुरक्त हो रही थीं । निर्ग्रन्थ प्रवचन पर उनका अटूट प्रेम। था । उनकी ऐसी श्रद्धा थी कि-आयुष्मन् ! यह निर्ग्रन्थ प्रवचन ही सत्य है, परमार्थ है, परम सत्य है, अन्य सब अनर्थ (असत्यरूप) हैं। उनकी उदारता के कारण उनके भवन के दरवाजे की अर्गला! ऊँची रहती थी, अर्थात् द्वार सबके लिये खुला रहता था । वे जिसके घर में या अन्तःपुर में जाते उसमें प्रीति एवं विश्वास उत्पन्न किया करते थे । वे शीलव्रत (पाँचों अणुव्रत), गुणव्रत, विरमण (रागादि से निवृत्ति), प्रत्याख्यान, पौषध, उपवास आदि का पालन करते तथा चतुर्दशी, अष्टमी, अमावस्या और पूर्णिमा के दिन परिपूर्ण पौषधव्रत किया करते थे । श्रमणों निर्ग्रन्थों को निर्दोष अशन, पान, खादिम और स्वादिम आहार, वस्त्र, पात्र, कम्बल, रजोहरण, पीठ, फलक, शय्या, संस्तारक, औषध और भेषज आदि का दान करते हुए महान् लाभ प्राप्त करते थे, तथा स्वीकार किये तप-कर्म के द्वारा अपनी आत्मा को भावित-वासित करते हुए विचरण कर रहे थे । Elucidation In the introduction of Sudarsana words are given in original text abhigaye ji vājīve java viharai. By these words should be understood the life and conduct of house-holders as described in Bhagawati Sūtra (2/5). The special religious faculties are to be considered deeply. These are as follows and Sudarśana Sresthi was opulent with all these qualities. He was worshipper of sages and religious, virtuous house-holder. Beside the knower of soul and non-soul he was also well versed in conception of merits and demerits. In the same way, he was conversant about influx of karmas, checking of karmas, shedding off karmas, activities (causes of bondage of nas-twentyfive types of activities), supports (means of karma-bondage) and the concept of bondage of karmas and salvation. He did not seek assistance of any other in any work. He was so firmly steady in Jain doctrines (Nirgrantha cana-preachings of tirthamkaras) that even gods, semigods, deities. demons etc., could not distract him. He had neither doubt nor desire and no suspense about the fruits of religion and religious activities. He had grasped the ultimte meaning of holy scriptures. He had retained the secret meanings of scriptures in a definite way. He had specially decided the suspicious points of . १८६ . अन्तकृद्दशा सूत्र : षष्ठम वर्ग Page #260 -------------------------------------------------------------------------- ________________ scriptures, enquiring from wise persons. His veins and bones were engrossed with the religious affection of omniscient's preachings. He had unbreakable love toward preachings of tirthamkara. He had such faith that the preachings of Arihanta are true, ultimate truth, out-topping and all others are without base (untrue). On account of his generosity the door-bolt of his house remained always high meaning his door always remained open for all. Whenever he entered any body's house and even in his seraglio, he generated love and trust in him. He observed householder's five small vows, virtuous vows and disinclination to attachment, refutation (pratyākhyāna), pausadha, fast penance etc., and full pausadha on the eighth, fourteenth, and fifteenth days of the lunar month. He earned advantage by giving faultless food, water, eatables, tasty things, cloths, utensils, blanket, duster (rujoharana), pitha, phalaka, bed, sain sataraka, medicine etc., to sages. He used to purify his soul by practising the accepted penanaces etc. Life of Sudarsan was opulent with these ideal virtues of a religious householder. सूत्र १२ : तए णं तस्स सुदंसणस्स बहुजणस्स अंतिए एयमटुं सोच्चा णिसम्म अयं अज्झत्थिए जाव समुप्पण्णे । एवं खलु समणे भगवं महावीरे जाव विहरइ । तं गच्छामि णं समणं भगवं महावीरं वंदामि, णमंसामि । एवं संपेहेइ संपेहित्ता जेणेव अम्मापियरो तेणेव उवागच्छइ, उवागच्छित्ता करयलपरिग्गहियं जाव एवं वयासी-एवं खलु अम्मयाओ ! समणे भगवं महावीरे जाव विहरइ । तं गच्छामि णं समणं भगवं महावीरं वदामि णमंसामि जाव पज्जुवासामि । तए णं तं सुदंसणं सेटिं अम्मापियरो एवं वयासी-एवं खलु पुत्ता ! अज्जुणए मालागारे जाव घाएमाणे विहरइ, तं मा णं तुमं पुत्ता ! समणं भगवं महावीरं वंदए णिगच्छाहि, माणं तव सरीरयस्स वायत्ती भविस्सइ। तुमं णं इहगए चेव समणं भगवं महावीरं वंदाहि णमसाहि । तृतीय अध्ययन . १८७ . Page #261 -------------------------------------------------------------------------- ________________ तए णं सुदंसणे सेट्ठी अम्मापियरं एवं वयासी किणं अहं अम्मयाओ ! समणं भगवं महावीरं इहमागयं इह पत्तं इह समोसढं इह गए चेव बंदिस्सामि णमंसिस्सामि ? तं गच्छामि णं अहं अम्मयाओ ! तुम्भेहिं अब्भणुण्णाए समाणे समणं भगवं महावीरं वंदामि जाव पज्जुवासामि । सूत्र १२ : उस दिन बहुत से नागरिकों के मुख से राजगृह में भगवान् के पधारने का समाचार सुनकर उस सुदर्शन सेठ के मन में इस प्रकार का विचार उत्पन्न हुआ निश्चय ही, श्रमण भगवान महावीर नगर में पधारे हैं, और बाहर गुणशीलक उद्यान में विराजमान हैं, इसलिये मैं जाऊँ और उन श्रमण भगवान महावीर को वन्दन नमस्कार करूँ । ऐसा सोचकर सुदर्शन अपने माता-पिता के पास आये और हाथ जोड़कर इस प्रकार बोले- हे माता-पिता ! श्रमण भगवान महावीर स्वामी नगर के बाहर उद्यान में विराज रहे हैं, अतः मैं चाहता हूँ कि उनकी सेवा में जाऊँ और उन्हें वन्दन नमस्कार करूँ । सुदर्शन के मुख से यह बात सुनकर माता - पिता ने इस प्रकार कहा - हे पुत्र ! इस नगर के बाहर अर्जुनमाली छह पुरुष और एक स्त्री इस तरह सात व्यक्तियों को नित्य प्रति मारता हुआ घूम रहा है । इसलिए है पुत्र ! तुम श्रमण भगवान महावीर को वंदन करने के लिए नगर के बाहर मत निकलो । नगर के बाहर निकलने से संभव है, तुम्हारे शरीर को कोई हानि हो जाये इसलिये यही अच्छा है कि तुम यहीं से श्रमण भगवान महावीर को वन्दन नमस्कार कर लो । तब सुदर्शन सेठ अपने माता-पिता से इस प्रकार बोले • १८८ • For Private Personal Use Only अन्तकृद्दशा सूत्र : षष्ठम वर्ग 1 Page #262 -------------------------------------------------------------------------- ________________ हे माता-पिता ! जब श्रमण भगवान महावीर यहां नगर में पधारे हैं। बाहर उद्यान में विराजे हैं, धर्म सभा में समवसत हए हैं तो मैं उनको यहीं से वंदना नमस्कार करूँ, यह कैसे हो सकता है ? इसलिये माता-पिता ! आप मुझे आज्ञा दीजिए कि मैं वहीं जाकर श्रमण भगवान महावीर को वन्दना करूँ, नमस्कार करूँ, यावत् उनकी पर्युपासना Gẻ | Maxim 12 : Thus having heard the news of arrival of Bhagawāna outside Rājag! ha city, from many persons, such thoughts aroused in the mind of Sudarśana Sresthi. Definitely, śramana Bhagawāna Mahāvīra has come to Rājagrha and is staying in Guņaśīlaka garden, which is situated out of city. Therefore I should go and bow down and worship him. Thinking such, Sudarśana came to his parents and with folded hands spoke thus unto them- parents ! Sramana Bhagawāna Mahāvīra has been staying in the garden, outside of city. Hence I intend to go in his service and should bow down and worship him. Hearing this, parents said to Sudarśana-0 beloved son! out of the city Arjuna garland-maker murdering seven persons-six men and one woman everyday, is wandering. So our beloved son! You must not go out of city for bowing down and worshipping Sramana Bhagawāna Mahāvīra. If you go out of city, it is possible that your body may be injured. Therefore it is better that you how down and worship Bhagawāna from here. Then Sudarsana said to his parents-When Sramana Bhagawāna Mahāvīra has come here and staying in the garden outside of city, then how it is possible that I bow down and worship him from here ? So, O parents ! Please allow me that I go there and bow down, worship and serve him. तृतीय अध्ययन • 909 . Page #263 -------------------------------------------------------------------------- ________________ सूत्र १३: तए णं तं सुदंसणं सेटिं अम्मापियरो जाहे णो संचायंति, बहूहिं आघवणाहिं जाव परूवेत्तए ।। तए णं से अम्मापियरो ताहे अकामया चेव सुदंसणं सेट्टि एवं वयासीअहासुहं देवाणुप्पिया ! तए णं से सुदंसणे सेट्ठी अम्मापिईहिं अब्भणुण्णाए समाणे ण्हाए सुद्धप्पावेसाइं जाव सरीरे, सयाओ गिहाओ पडिणिक्खमइ पडिणिक्खमित्ता, पायविहारचारेणं रायगिहं णयरं मझं मज्झेणं णिगच्छइ, णिगच्छित्ता मोग्गरपाणिस्स जक्खस्स जक्खाययणस्स अदूरसामंतेणं जेणेव गुणसिलए चेइए जेणेव समणे भगवं महावीरे तेणेव पहारेत्थ गमणाए । तए णं से मोग्गरपाणिजखे सुदंसणं समणोवासयं अदूरसामंतेणं वीईवयमाणं पासइ, पासित्ता आसुरत्ते तं पलसहस्सणिप्फण्णं अयोमयं मोग्गरं उल्लालेमाणे उल्लालेमाणे जेणेव सुदंसणे समणोवासए तेणेव पहारेत्थ गमणाए। सूत्र १३: उस सुदर्शन सेठ को माता-पिता जब अनेक प्रकार की युक्तियों से भी नहीं समझा सके, तब माता-पिता ने अनिच्छापूर्वक इस प्रकार कहाहे पुत्र ! फिर जिस प्रकार तुम्हें सुख उपजे वैसा करो ! इस प्रकार सुदर्शन सेठ ने माता-पिता से आज्ञा प्राप्त करके स्नान किया और धर्मसभा में जाने योग्य शुद्ध वस्त्र धारण किये । फिर अपने घर से निकला और पैदल ही राजगृह नगर से चलकर मुद्गरपाणि यक्ष के यक्षायतन से न अति दूर और न अति निकट से होते हुए गुणशीलक उद्यान की ओर, जहां श्रमण भगवान महावीर विराजते थे, उधर बढ़ने लगे । सुदर्शन सेट को अपने यक्षायतन के पास से निकलते देखकर वह मुद्गरपाणि यक्ष (यक्षाविष्ट अर्जुन मालाकार) बड़ा क्रुद्ध हुआ । वह अपने . १९०. अन्तकृद्दशा सूत्र : षष्ठम वर्ग Page #264 -------------------------------------------------------------------------- ________________ हजार पल के वजन वाले लोह मुद्गर को घुमाते हुए उसकी ओर आने लगा । Maxim 13 : When parents could not prevail upon and could not stop Sudarsana, by many devices and declarations then unwillingly they said-O son! Do, as you feel happy. Thus getting permission of parents, Sudarsana Sreșthi bathed and put on clean clothes fit for religious assembly. Then he went out from his house. Walking on-foot he went out of Rajagṛha city. Passing not too far nor too near from sanctuary of Mudgarapani deity he began to go to Guṇasilaka garden, where Śramaṇa Bhagawana Mahāvira was staying. Visualising Sudarsana Śreṣṭhi passing nearby his sanctuary that Mudgarapani deity (garland-maker Arjuna possessed by deity) became very much angry. Brandishing his iron mace weighing one thousand palas (57 kilogram), he walked forward towards him. सूत्र १४ : तए णं से सुदंसणे समणोवासए मोग्गरपाणिं जक्खं एज्जमाणं पासइ, पासित्ता अभीए, अतत्थे, अणुव्विग्गे, अक्खुभिए, अचलिए, असंभंते, वत्थंणं भूमिं पमज्जइ, पमज्जित्ता करयल परिग्गहियं सिरसावत्तं दसनहं अंजलिं मत्थए कट्टु एवं वयासी - णमोत्थु णं अरिहंताणं भगवंताणं जाव संपत्ताणं । मोत्थुणं समणस्स जाव संपाविउकामस्स । पुव्विं च णं मए भगवओ महावीरस्स अंतिए थूलए पाणाइबाए पच्चक्खाए जावज्जीवाए - थूलए मुसावाए, थूलए अदिण्णादाणे, सदारसंतोसे कए जावज्जीवाए, इच्छापरिमाणे कए जावज्जीवाए तं इयाणिं पि णं तस्सेव अंतियं सव्वं पाणाइयायं पच्चक्खामि जावज्जीवाए, सव्वं मुसावायं सव्वं तृतीय अध्ययन , १९१ For Private Personal Use Only Page #265 -------------------------------------------------------------------------- ________________ अदिण्णादाणं, सव्वं मेहुणं, सव्वं परिग्गहं पच्चक्खामि जावज्जीवाए । सव्वं कोहं जाव मिच्छादसणसल्लं पच्चक्खामि जावज्जीवाए । सव्वं असणं, पाणं, खाइमं, साइमं चउविहं पि आहारं पच्चक्खामि जावज्जीवाए । जइ णं एत्तो उवसग्गाओ मुच्चिस्सामि तो मे कप्पइ पारेत्तए । अह णं एत्तो उवसग्गाओ न मुच्चिस्सामि तओ मे तहा पच्चक्खाए चेव त्ति कटु सागारं पडिमं पडिवज्जइ । सुदर्शन का सागारी प्रतिमा ग्रहण सूत्र १४: उस समय उस क्रुद्ध मुद्गरपाणि यक्ष को अपनी ओर आता देखकर सुदर्शन श्रमणोपासक वहीं ठहर गये । मृत्यु की संभावना को जानकर भी किंचित् भी-भय, त्रास, उद्वेग अथवा क्षोभ को प्राप्त नहीं हुए । उनका हृदय तनिक भी विचलित अथवा भयाक्रान्त नहीं हुआ । उन्होंने निर्भय होकर अपने वस्त्र के अंचल से भूमि का प्रमार्जन किया । फिर पूर्व दिशा की ओर मुँह करके बैठे । बैठकर बाएं घुटने को ऊँचा किया और दोनों हाथ जोड़कर मस्तक पर अंजलि पुट रखा । इसके बाद इस प्रकार बोले-नमस्कार हो अरिहन्त भगवान यावत् मोक्ष प्राप्त सिद्धों को । नमस्कार हो श्रमण यावत् भविष्य में मुक्ति पाने वाले प्रभु महावीर को । मैंने पहले श्रमण भगवान महावीर के पास स्थूल प्राणातिपात का आजीवन त्याग (प्रत्याख्यान) किया, स्थूल मृषावाद का त्याग किया, स्थूल अदत्तादान का त्याग किया, स्वदार-सन्तोष और इच्छा-परिमाण रूप स्थूल परिग्रह विरमण व्रत जीवन-भर के लिये ग्रहण किया, अब उन्हीं भगवान महावीर स्वामी की साक्षी से संपूर्ण प्राणातिपात, मृषावाद, अदत्तादान, मैथुन और सम्पूर्ण परिग्रह का सर्वथा आजीवन त्याग करता हूँ । क्रोध, मान, माया, लोभ यावत् मिथ्यादर्शन शल्य तक १८ पापस्थानों का भी सर्वथा आजीवन त्याग करता हूँ । सब प्रकार का अशन, पान, खादिम और स्वादिम इन चारों प्रकार के आहार का त्याग करता हूँ ! . १९२. अन्तकृददशा सूत्र : षष्टम वर्ग Page #266 -------------------------------------------------------------------------- ________________ TV RE AN . 24 W . . 22 * *** Page #267 -------------------------------------------------------------------------- ________________ चित्रक्रम २७ : सुदर्शन पर आक्रमण दृश्य १-सुनसान वीरान मार्ग पर सुदर्शन को अकेला आता देखकर मुद्गरपाणि यक्षावेष्ठित अर्जुन मुद्गर घुमाता हुआ उसे मारने के लिए दौड़ा। दृश्य २-उस मुद्गरपाणि का उपसर्ग देखकर सुदर्शन ने भूमि साफ करके, एक घुटना टेककर भगवान महावीर का स्मरण किया, वन्दना की और सागारी संथारा ग्रहण कर लिया। सुदर्शन के तेज प्रभाव के समक्ष अर्जुन स्तंभित-सा रह गया। मुद्गर ऊपर उठा रह गया। (वर्ग ६/अध्य. ३) 4 Illustration No. 27 : Aggression against Sudarśana Scene 1. Finding Sudarśana coming on lonely path, murderer Arjuna, possessed by deity Mudagarapāņi embellishing his mace ran to kill him. Scene 2. Finding Arjuna coming towards him, Sudarsana, sitting down on ground remembered Bhagawana Mahāvīra, bowed down to him and accepted Sāgāri Samthārā. Due to the influence of Sudarśana, Arjuna was stunned. Upward mace remained upward. (Sec. 6/Ch. 3) अन्तकृद्दशा सूत्र : चित्र परिचय Page #268 -------------------------------------------------------------------------- ________________ यदि मैं इस घोर उपसर्ग से बच गया तो मुझे इस त्याग का पारणा करना कल्पता है । पर यदि इस उपसर्ग से न बच सकूँ तो मुझे इस प्रकार का सम्पूर्ण त्याग यावज्जीवन के लिए है । ऐसा निश्चय करके उन सुदर्शन सेठ ने उपर्युक्त प्रकार से सागारी - पडिमा अनशन व्रत धारण कर लिया । Acceptance of Sāgāri Pratima by Sudarśana Maxim 14: As Sudarsana householder saw that angry Mudgarapāņi deity coming to him, he stopped at the place, he was. Though death was in front of him but he felt no fear neither sorrow. His heart was not frightened a bit but remained unafraid, unterrified, unalarmed, undisturbed, unmoved and unperturbed. He fearlessly cleansed the ground by the flap of his garment and sat down facing east direction, made his left knee upward, folding both the hands put on his forehead, After that spoke thus Homage to Arihanta Bhagawāna and all emancipated. Homage to Śramana and all to be emancipated in future Lord Mahavira. Even before, in presence of Śramana Bhagwāna Mahavira I have accepted the vows of gross nonviolence, truth, non-stealing, satisfaction in my own wife and limiting the desire of possessions-for my whole life. Now even, considering the presence of the same Bhagawana Mahāvīra, I accept the full (great) vows of non-violence, truth, non-stealing, celibacy and nonpossession. I also completely renounce anger, pride, deceit, greed, until false belief-eighteen types of sins for whole life. I also renounce all the four kinds of meals-food, water, eatables and nutrients (dainties)-for whole life. तृतीय अध्ययन For Private Personal Use Only १९३ • Page #269 -------------------------------------------------------------------------- ________________ If I be delivered from this calamity, it behoves me to follow it up; if I be not delivered from this calamity, I have already renounced all these. Decided such, Sudarśana Śresthi, accepted Sāgārī Padimā, fast penance in aforesaid manner. सूत्र १५: तए णं से मोग्गरपाणि जक्खे तं पलसहस्स-णिप्फण्णं अयोमयं मोग्गरं उल्लालेमाणे उल्लालेमाणे जेणेव सुदंसणे समणोवासए तेणेव उवागच्छइ, उवागच्छित्ता नो चेव णं संचाएइ सुदंसणं समणोवासयं तेयसा समभिपडित्तए। तए णं से मोग्गरपाणिजक्खे सुदंसणं समणोवासयं सबओ समंताओ परिघोलेमाणे परिघोलेमाणे जाहे नो चेव णं संचाएइ सुदंसणं समणोवासयं तेयसा समभिपडित्तए। ताहे सुदंसणस्स समणोवासयस्स पुरओ सपक्खि सपडिदिसिं ठिच्चा सुदंसणस्स समणोवासयं अणिमिसाए दिट्ठीए सुचिरं णिरिक्खइ । णिरिक्खित्ता अज्जुणयस्स मालागारस्स सरीरं विप्पजहाइ; विप्पज्जहित्ता तं पलसहस्सणिप्फण्णं अयोमयं मोग्गरं गहाय जामेव दिसं पाउन्भूए तामेव दिसं पडिगए। उपसर्ग निवारण सूत्र १५: इधर वह मुद्गरपाणि यक्ष उस हजार पल के लोहमय मुद्गर को घुमाताउछालता हुआ जहां सुदर्शन श्रमणोपासक था, वहां आया । परन्तु सुदर्शन श्रमणोपासक को अपने तेज से अभिभूत नहीं कर सका अर्थात् उसे किसी प्रकार से कष्ट नहीं पहुँचा सका । मुद्गरपाणि यक्ष सुदर्शन श्रावक के चारों ओर घूमता रहा और जब उसको अपने तेज से पराजित नहीं कर सका, उस पर मुद्गर नहीं उठा सका, अन्तकृद्दशा सूत्र : षष्ठम वर्ग . १९४ Page #270 -------------------------------------------------------------------------- ________________ तब सुदर्शन श्रमणोपासक के बिल्कुल सामने खड़ा हो गया और अनिमेष दृष्टि से बहुत देर तक उन्हें देखता रहा । इसके बाद उस मुद्गरपाणि यक्ष ने सुदर्शन के तेज से पराजित होकर अर्जुनमाली के शरीर को छोड़ दिया और उस हजार पल वाले लौहमय मुद्गर को लेकर जिस दिशा से आया था, , उसी दिशा की ओर चला गया । End of Trouble Maxim 15 : That Mudgarapāņi deity came to the sage-worshipper Sudarsana brandishing his iron mace weighing one thousand palas. But he could not overpower him, meaning could not hurt him. Mudgarapani deity moved oft and on round about Sudarsana sage-worshipper and when could not overpower him by his strength, could not even raise his mace upon him, then he stood in front of Sudarsana sageworshipper and began to gaze him with unwinking eyes for a long time. Thereafter overpowered by the spiritual strength of Sudarsana, that Mudgarapāņi deity, left the body of Arjuna garland-maker and taking his iron mace weighing one thousand palas returned to the direction from which he had come. सूत्र १६ : तए णं से अज्जुणए मालागारे मोग्गरपाणिणा जक्खेणं विप्पमुक्के समाणे सति धरणियलंसि सव्वंगेहिं णिवडिए । तए णं से सुदंसणे समणोवासए णिरुवसग्गमिति कट्टु पडिमं पारे । तए णं से अज्जुणए मालागारे तओ मुहुत्तंतरेणं आसत्थे समाणे उट्ठेइ; उत्ता सुदंसणं समणोवासयं एवं वयासी तृतीय अध्ययन For Private Personal Use Only १९५ Page #271 -------------------------------------------------------------------------- ________________ "तुब्भे णं देवाणुप्पिया ! के ? कहिं वा संपत्थिया ?" तए णं से सुदंसणे समणोवासए अज्जुणयं मालागारं एवं वयासीएवं खलु देवाणुप्पिया ! अहं सुदंसणे णामं समणोबासए, अभिगयजीवाजीवे गुणसिलए चेइए समणं भगवं महावीरं वंदिउं संपत्थिए । सूत्र १६ : मुद्गरपाणि यक्ष से मुक्त होते ही वह अर्जुन मालाकार “धस" इस प्रकार के शब्द के साथ धड़ाम से भूमि पर गिर पड़ा | तब सुदर्शन श्रमणोपासक ने स्वयं को उपसर्ग मुक्त हुआ जानकर सागारी त्याग-प्रत्याख्यान रूपी अपनी प्रतिज्ञा को पाला ( और अपना ध्यान खोला) । इधर वह अर्जुन मालाकार मुहूर्त भर ( कुछ समय ) के पश्चात् आश्वस्त एवं स्वस्थ होकर उठा और सुदर्शन श्रमणोपासक को सामने देखकर इस प्रकार बोला- हे देवानुप्रिय ! आप कौन हो, तथा कहां जा रहे हो ? यह सुनकर सुदर्शन श्रमणोपासक अर्जुनमाली से इस प्रकार बोला - हे देवानुप्रिय ! मैं जीवादि नौ तत्वों का ज्ञाता सुदर्शन नाम का श्रमणोपासक हूँ और गुणशीलक उद्यान में श्रमण भगवान महावीर को वंदन नमस्कर करने जा रहा हूँ । Maxim 16 : Abandoned by Mudgarapāņi deity the garland-maker Arjuna fell on the ground with the sound of 'dhus' with all his limbs. Then Sudarsana sage-worshipper, finding himself free from calamity, completed his resolve of Sāgārī renouncements and refutals. He also completed his meditation. Then that Arjuna garland-maker, on coming back to senses after awhile got up and seeing Sudarsana in front he spoke thus to him-O beloved as gods! Who are you and where are you going? १९६ • For Private Personal Use Only अन्तकृद्दशा सूत्र : षष्ठम वर्ग Page #272 -------------------------------------------------------------------------- ________________ NEE HORAct . 1 मुदगर पाणेि यक्षका पलायन IPLA 28 Page #273 -------------------------------------------------------------------------- ________________ 09 चित्रक्रम २८ : यक्ष पराभूत और अर्जुन को उद्बोधन दृश्य १-सुदर्शन के तेज प्रभाव से परास्त हुआ मुद्गरपाणि यक्ष अर्जुन है की देह से निकलकर भाग गया। अर्जुन भूमि पर धड़ाम से गिर पड़ा। तब है - सुदर्शन ने मधुर वचनों से पुकारते हुए उसे उठाया और सान्त्वना दी। दृश्य २-अर्जुन के पूछने पर सुदर्शन ने बताया-मैं अपने धर्मगुरु भगवान महावीर की वन्दना करने जा रहा हूँ। अर्जुन ने कहा-मैं भी इन महापुरुष की वन्दना करके अपने घोर पापों का प्रायश्चित्त करना चाहता हूँ (वर्ग ६/अध्य. ३) 5555555555555555555555555555 Illustration No. 28 : Deity defeated and awakening of Arjuna Scene 1. Defeated by the spiritual influence of Sudarśana, deity Mudgarapāņi left the body of Arjuna and went away. Arjuna fell down on earth all of a sudden. Then Sudarśana picked him up and with sweet words consoled him. Scene 2. When Arjuna asked Sudarsana, he told-I am going to bow down to my religious preacher Bhagawāna Mahāvīra. Arjuna also expressed his wish that he also wanted to bow down to Bhagawāna and repent for his severe sins. (Sec. 6/Ch. 3) पत 0555 0555555555555555555555550 अन्तकृद्दशा सूत्र : चित्र परिचय Page #274 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Hearing these words Sudarsana spoke thus to Arjuna garland-maker-O beloved as gods ! I am, knower of nine elements, Sudarśana sage-worshipper. I am going to garden Gunaśīlaka, to offer my respects to Sramana Bhagawāna Mahāvīra. सूत्र १७: तए णं से अज्जुणए मालागारे सुदंसणं समणोवासयं एवं वयासी-तं इच्छामि णं देवाणुप्पिया ! अहमवि तुमए सद्धिं समणं भगवं महावीरं वंदित्तए जाव पज्जुवासित्तए । अहासुहं देवाणुप्पिया ! मा पडिबंधं करेह ! तए णं से सुदंसणे समणोवासए अज्जुणएणं मालागारेणं सद्धिं जेणेव गुणसिलए चेइए जेणेव समणे भगवं महावीरे तेणेव उवागच्छइ; उवागच्छित्ता अज्जुणए णं मालागारेणं सद्धिं समणं भगवं महावीरं तिक्खुत्तो जाव पज्जुवासइ । तए णं समणे भगवं महावीरे सुदंसणस्स समणोवासयस्स अज्जुणयस्स मालागारस्स तीसे य महइमहालियाए परिसाए मझगए विचित्तं धम्ममाइक्खइ । सुदंसणे पडिगए । अर्जुन भगवद् शरण में सूत्र १७: यह सुनकर अर्जुनमाली सुदर्शन श्रमणोपासक से इस प्रकार बोला-हे देवानुप्रिय ! मैं भी तुम्हारे साथ श्रमण भगवान महावीर की वन्दना नमस्कार करना यावत् सेवा करना चाहता हूँ । श्रेष्ठी सुदर्शन ने कहा-हे देवानुप्रिय ! जैसा तुम्हें सुख हो वैसा करो । विलम्ब मत करो ! इसके बाद वह सुदर्शन श्रमणोपासक अर्जुनमाली के साथ जहां गुणशीलक उद्यान में श्रमण भगवान् महावीर विराजमान थे, वहां आया और अर्जुनमाली के साथ श्रमण भगवान महावीर को तीन बार प्रदक्षिणा पूर्वक वन्दन-नमस्कार कर उनकी सेवा करने लगा। तृतीय अध्ययन .१९७ . Page #275 -------------------------------------------------------------------------- ________________ उस समय श्रमण भगवान् महावीर स्वामी ने सुदर्शन श्रमणोपासक, अर्जुनमाली (और उस विशाल सभा के सम्मुख) धर्म देशना दी। सुदर्शन धर्म देशना सुनकर अपने घर लौट गया । Arjuna under the refuge of Bhagawāna Maxim 17 : Hearing this Arjuna garland-maker said to Sudarśana sage-worshipper-() beloved as gods ! I too want to accompany you and bow down and worship Śramana Bhagawāna Mahāvīra. Sudarśana accorded-Do as you feel happy. But do not delay. Thereafter Arjuna with Sudarśana reached Guņaśīlaka garden. There he thrice bowed down and worshipped Sramana Bhagawāna Mahāvīra. Then Bhagawāna Mahāvīra bestowed sermon to Arjuna, Sudarsana and huge public congregation. Listening sermon, Sudarśana returned to his home. सूत्र १८: तए णं से अज्जुणए मालागारे समणस्स भगवओ महावीरस्स अंतिए धम्म सोच्चा णिसम्म हट्ठतुट्ठ एवं वयासी-सद्दहामि णं भंते ! णिग्गंथं पावयणं जाव अब्भुट्टेमि । अहासुहं देवाणुप्पिया ! मा पडिबंधं करेह ! तए णं से अज्जुणए मालागारे उत्तर पुरच्छिमे दिसिभाए अवक्कमइ; अवक्कमित्ता सयमेव पंचमुट्ठियं लोयं करेइ करित्ता जाव अणगारे जाए जाव विहरइ। तए णं से अज्जुणए अणगारे जं चेव दिवसं मुण्डे जाव पव्वइए । तं चेव दिवसं समणं भगवं महावीरं वंदइ णमंसइ; वंदित्ता णमंसित्ता इमं एयारूवं अभिग्गहं उग्गिण्हइ • १९८ . अन्तकृद्दशा सूत्र : षष्ठम वर्ग । Page #276 -------------------------------------------------------------------------- ________________ [ चित्रक्रम २९ : भगवान महावीर की शरण में अर्जुन दृश्य १-सुदर्शन के साथ अर्जुन मालाकार भी भगवान महावीर के समवसरण में आया। धर्म उपदेश सुना। अपने दुष्कर्मों पर पश्चात्ताप करते हुए उसने भगवान से प्रार्थना की-“भन्ते ! मेरे उद्धार और कल्याण का मार्ग बताइए।'' दृश्य २-भगवान महावीर द्वारा बताये हुए क्षमा एवं तप मार्ग को स्वीकार कर हत्यारा अर्जुन अब अणगार अर्जुन बन गया। भगवान के समक्ष हाथ जोड़कर उसने जीवनभर बेले-बेले (दो-दो दिन का उपवास) तप का संकल्प लिया और अपने कृत पापों का प्रक्षालन करने में जुट गया। (वर्ग ६/अध्य. ३) Illustration No. 29 : Arjuna in the patronage of Bhagawāna Mahāvira Scene 1. Arjuna also went to the religious congregation of Bhagawāna Mahāvīra with Sudarsana. He listened religious discourse. Repenting for his sins Arjuna prayed to Bhagawāna-“Bhante ! Tell me the path of my reformation and deliverance.” Scene 2. Accepting the path of forgiveness and peace, as told by Bhagawāna Mahāvīra, murderer Arjuna became a houseless mendicant. Folding his hands to Bhagawāna, he accepted the Bele-Bele (two days' fast, only on third day to take food) penance for whole life, and began to shed off fruit of all his misdeeds. (Sec. 6/Ch. 3) $55555555555555555555555555555 अन्तकृद्दशा सूत्र : चित्र परिचय Page #277 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Me मार में अर्जुन KA भुत HTA " अर्जुन ने दीक्षा ग्रहण । कर बैंले बळ धी ANTASTES . LFRSATANA २६ Page #278 -------------------------------------------------------------------------- ________________ कप्पइ मे जावज्जीवाए छटुं छटेणं अणिक्खित्तेणं तवोकम्मेणं अप्पाणं भावमाणस्स विहरित्तए । त्ति कटु अयमेयारूवं अभिग्गहं उग्गिण्हइ; उग्गिण्हित्ता जावज्जीवाए जाव विहरइ । सूत्र १८: तब अर्जुनमाली श्रमण भगवान महावीर के पास धर्मोपदेश सुनकर एवं हृदय में धारण कर बड़ा प्रसन्न हुआ, संतुष्ट हुआ। प्रभु महावीर से इस प्रकार निवेदन करने लगा-हे भगवन् ! मैं आप द्वारा कहे हुए निर्ग्रन्थ प्रवचन पर श्रद्धा करता हूँ, रुचि करता हूँ, यावत् आपके चरणों में दीक्षा धारण कर अपने कृत पापों से मुक्त होना चाहता हूँ। प्रभु महावीर ने कहा-हे देवानुप्रिय ! जैसा तुम्हें सुख हो, वैसा करो । विलम्ब मत करो ! तब उस अर्जनमाली ने ईशान कोण में जाकर स्वयं ही पंचमौष्टिक लुंचन किया, लुंचन करके वे अनगार हो गये, और संयम व तप पूर्वक विचरने लगे। अर्जुनमाली अब अर्जुन मुनि हो गये । इसके पश्चात् अर्जुन मुनि ने जिस दिन मुण्डित होकर प्रव्रज्या ग्रहण की, उसी दिन श्रमण भगवान महावीर के चरणों में उपस्थित होकर वंदना नमस्कार करके, इस प्रकार का अभिग्रह-दृढ़ संकल्प धारण किया-"आज से मैं निरन्तर बेले-बेले की तपस्या से जीवन पर्यन्त आत्मा को भावित करते हुए विचरूँगा ।" ऐसा अभिग्रह जीवन भर के लिये स्वीकार कर अर्जुन अणगार राजगृह नगर में विचरने लगे । Maxim 18 : Then Arjuna garland-maker, hearing and taking to heart the sermon of Sramana Bhagawāna Mahāvīra became very much glad and satisfied, and politely said to Bhagawāna-O Bhagawan ! I have faith, interest and belief in Nirgrantha Pravacana, the doctrines as तृतीय अध्ययन . १९९. Page #279 -------------------------------------------------------------------------- ________________ preached by you. I intend to accept consecration at your lotus feet so that I can be free from the sins done by me. Prabhu said-Do, as you feel happy. Do not delay. Then Arjuna garland-maker went to north-east direction, tonsured his hairs by his own five fists and became homeless mendicant. Now garland-maker Arjuna became Arjuna monk. He began to practise restrain and austerity. Thereafter the day on which Arjuna monk accepted consecration with shaven head, he went to Sramana Bhagawāna Mahāvīra, bowed down and worshipped him and then accepted firm resolution of the sort-I will practise two days' fast penance (and third day to take meal) constantly till life. Accepting such firm resolution Arjuna monk began to 'wander in Rajagrha city. सूत्र १९: तए णं से अज्जुणए अणगारे छट्ठक्खमणपारणयंसि पढमपोरिसीए सज्झायं करेइ, जहा गोयमसामी जाव अडइ । तए णं तं अज्जुणयं अणगारं रायगिहे णयरे उच्च-णीय जाव अडमाणं बहवे इत्थियाओ य पुरिसा य डहरा य महल्ला य जुवाणा य एवं वयासी"इमेणं मे पिया मारिए, इमेणं मे माया मारिया, भाया, भगिणी, भज्जा, पुत्ते, धूया, सुण्हा मारिया, इमेणं मे अण्णयरे सयण-संबंधि-परियण मारिए" त्ति कटु अप्पेगइया अक्कोसंति अप्पेगइया हीलंति, जिंदंति, खिंसंति, गरिहंति, तज्जेंति, तालेंति । परीषह सहन : मोक्ष गमन सूत्र १९: इसके पश्चात् अर्जुन अणगार बेले की तपस्या के पारणे के दिन प्रथम प्रहर में स्वाध्याय करते हुए यावत् (इनकी चर्या गौतम स्वामी की तरह .२००. अन्तकृद्दशा सूत्र : षष्ठम वर्ग Page #280 -------------------------------------------------------------------------- ________________ 05555555555555555555555550 चित्रक्रम ३0 : महामुनि अर्जुन का अपूर्व तितिक्षा भाव दृश्य १-अर्जुन अणगार पारणे के लिए जब राजगृह नगर में भिक्षा के लिए निकलते तो कोई कहता-इसने मेरे पिता की हत्या की है, कोई भाई, वहन, पत्नी, पुत्र आदि का हत्यारा बताकर उन पर पत्थर फेंकते, लाठी और बेंतों से पीटते, गालियाँ देते, दुर्वचन कहते। परन्तु अर्जुन अणगार सोचते-यह मेरे कृत कर्मों का ही फल है, क्षमा करना परम धर्म है। और वे शान्त रहते। दृश्य २-छह मास तक कठोर तप करते हुए अपने पापकर्मों का नाश करके अर्जुन अणगार ने विपुलाचल पर्वत पर मासिक संथारापूर्वक मोक्ष प्राप्त किया। (वर्ग ६/अध्य. ३) Illustration No. 30 : Matchless tolerance of sage Arjuna Scene 1. When Arjuna monk went to Rajag! ha city for seeking food and water then some persons say-He has killed my father, some others say-He has killed my brother, sister, wife, son etc., they throw stones on him, beat him by canes and sticks, rebuke him. But monk Arjuna thinks-This is the fruition of my ill-deeds. Forgiveness is the highest virtue. And he remained calm. Scene 2. By the penance of six months he exhausted all his karmas, and emancipated at Vipulācala mount with the Samthārā of one month. (Sec. 6/Ch. 3) 595555555555555555555555555555555))))))))))) 0555555555555 5 55556 अन्तकृद्दशा सूत्र : चित्र परिचय Page #281 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ada ! DET BYTE 192 ANTEN BER 38 ASPEN . . We . 30 30 Page #282 -------------------------------------------------------------------------- ________________ जानना चाहिए) अर्थात् दूसरे प्रहर में ध्यान करके तीसरे प्रहर में राजगृह नगर में भिक्षार्थ भ्रमण करने लगे । उस समय उस अर्जुन मुनि को राजगृह नगर में उच्च-नीच - मध्यम कुलों में भिक्षार्थ घूमते हुए देखकर नगर के अनेक नागरिक स्त्री-पुरुष, बाल-वृद्ध इस प्रकार कहते थे " इसने मेरे पिता को मारा है, इसने मेरी माता को मारा है, भाई को मारा है, बहन को मारा है, भार्या को मारा है, पुत्र को मारा है, कन्या को मारा है, पुत्रवधु को मारा है एवं इसने मेरे अमुक स्वजन सम्बन्धी परिजन को मारा है ।" ऐसा कहकर कोई उन्हें गाली देता, कोई हीलना करता, अनादर करता, निन्दा करता, कोई जाति आदि का दोष बताकर झुंझला उठता, गर्हा करता, कोई भय बताकर तर्जना करता, और कोई थप्पड़, ईंट, पत्थर, लाठी आदि से भी मारता था । Troubles Conquered Salvation Attained Maxim 19 : Thereafter Arjuna monk on the fast breaking day in the first prahara studied the scriptures, in the second did meditation and in the third prahara sallied forth for seeking meals from Rājagṛha city. (His conduct should be considered similar to that of Gautama Swami) At that time seeing Arjuna mendicant wandering for seeking meals in the high-low and middle class families, many citizens-men-women, boys-oldmen used to sayHe has murdered my father, my mother, my brother, my sister, my wife, my son, my daughter, my daughter-in-law and other kith and kin etc. Saying thus some abused him, some caviled at him, chided, censured, rebuked, reviled, look down upon him in contempt, some struck him by hand, brick, stone and stick etc. तृतीय अध्ययन २०१ For Private Personal Use Only Page #283 -------------------------------------------------------------------------- ________________ सूत्र २७ तए णं से अज्जुणए अणगारे तेहिं बहूहिं इत्थीहिं य पुरिसेहिं य डहरेहिं य मल्लेहिं य जुवाणएहिं य आओसेज्जमाणे जाव तालेज्जमाणे तेसिं मणसा वि अपउस्समाणे सम्मं सहइ, सम्मं खमइ, सम्मं तितिक्खइ, सम्म अहियासेइ, सम्म सहमाणे, खममाणे, तितिक्खमाणे, सम्म अहियासमाणे रायगिहे णयरे उच्च-णीय-मज्झिमकुलाइं अडमाणे जइ भत्तं लभइ तो पाणं ण लभइ, जइ पाणं लभइ तो भत्तं ण लभइ । तए णं से अज्जुणए अणगारे अदीणे, अविमणे, अकलुसे, अणाइले, अविसाई, अपरितंतजोगी, अडइ । अडित्ता रायगिहाओ णयराओ पडिणिक्खमइ । पडिणिक्खमित्ता जेणेव गुणसिलए चेइए जेणेव समणे भगवं महावीरे जहा गोयमसामी जाव पडिदंसेइ; पडिदंसित्ता समणेणं भगवया महावीरेणं अब्भणुण्णाए समाणे अमुच्छिए अगिद्धे बिलमिव पण्णगभूएणं अप्पाणेणं तमाहारं आहारेइ । सूत्र २0 : इस प्रकार बहुत से स्त्री-पुरुषों, बच्चों, बूढ़ों और जवानों से आक्रोश, गाली एवं विविध प्रकार की ताड़ना-तर्जना आदि पाकर भी वे अर्जुन अणगार उन पर मन से भी द्वेष नहीं करते हुए उनके द्वारा दिये गये सभी परीषहों को समभावपूर्वक सहन करते (सम्म सहमाणे) प्रतीकार कर सकने की स्थिति में होते हुए भी क्षमा भाव धारण करते (खममाणे) उन कष्टों को प्रसन्नतापूर्वक झेल लेते (तितिक्खमाणे) एवं निर्जरा का लाभ समझकर (अहियासेमाणे) हर्षानुभव करते। सम्यग् ज्ञान पूर्वक उन सभी संकटों को सहन करते, क्षमा करते, तितिक्षा रखते, और उन कष्टों को भी आत्म-लाभ का हेतु मानते हुए राजगृह नगर के छोटे-बड़े-मध्यम कुलों में भिक्षा हेतु भ्रमण करते। तब उन अर्जुन अणगार को कहीं कभी भोजन मिलता तो पानी नहीं मिलता, और पानी मिलता तो भोजन नहीं मिलता था । . २०२. अन्तकृद्दशा सूत्र : षष्ठम वर्ग Page #284 -------------------------------------------------------------------------- ________________ वैसी स्थिति में जो भी और जैसा भी अल्प स्वल्प मात्रा में प्रासुक भोजन उन्हें मिलता, उसे वे सर्वथा अदीन, अविमन, (शान्तचित्त) अकलुष, (मलिनता रहित), अविषाद-आकुलता-व्याकुलता रहित, समाधि भाव के साथ ग्रहण करते थे, अर्थात् दैन्य भाव नहीं लाते हुए, मन को मैला नहीं करते हुए, अशुभ भावों का वर्जन करते हुए, विषाद-खेद नहीं करते हुए, तनतनाट से रहित अर्जुन अणगार ने निर्मल भावों से भिक्षाचरी तप की आराधना की। इस प्रकार वे भिक्षार्थ भ्रमण करते । भ्रमण करके वे (वापस) राजगृह से निकलते और गुणशीलक उद्यान में, जहां श्रमण भगवान महावीर विराजमान थे, वहां आते और वहाँ आकर गौतम स्वामी की तरह भिक्षा में जो प्राप्त हुआ उस आहार-पानी प्रभू महावीर को दिखाते और दिखाकर उनकी आज्ञा पाकर मूर्छा रहित, जिस प्रकार बिल में सर्प सीधा ही प्रवेश करता है, उस प्रकार राग-द्वेष एवं आसक्ति रहित होकर उस आहार-पानी का सेवन करते थे । Maxim 20: Even after getting abuse, chide, rebuke, revile, contempt, struck etc., from many men, women, children, youths, aged persons, youngsters, Arjuna mendicant did not become wrathful towards them even in thought and bore all the calamities given by them with even mind. Although he was in a position to take revenge he adopted forgiveness, bore those troubles gladly and understanding the benefit of shedding off karmas felt happiness, he bore all those hardships engrossed with right knowledge, pardoned them and considering all those troubles as good for soul-uplift, wandered in high-lowmiddle class families of Rājagrha city seeking meals. In these circumstances, smiling he got food, but did not get water and sometimes he got water but did not get food. In this position whatever a little but faultless he got, he accepted without becoming sorrowful, despirited turbid, perturned, grieved, and remained in self-discipline, i.e., he ध्ययन .२०३ . Page #285 -------------------------------------------------------------------------- ________________ was never filled with despiritedness making mind fifthy, he was always avoiding inauspicious thoughts, was never becoming sorrowful, and remained contemplated by all the three activities (Yoga) of mind, speech and body, Arjuna mendicant practised seeking of alms for penance. Thus he wandered for seeking alms. Wandering he came out of city, reached Gunaśīlaka garden and came to Sramaņa Bhagawāna Mahavira. Like Gautama Swāmī, he showed that food and water to Bhagawāna and then getting his permission took meals without the feeling of myness, like-dislike and attachment, like a serpent entering in the hole. सूत्र २१: तए णं समणे भगवं महावीरे अण्णया कयाइं रायगिहाओ णयराओ पडिणिक्खमइ; पडिणिक्वमित्ता बहिं जणवयविहारं विहरइ । तए णं से अज्जुणए अणगारे तेणं ओरालेणं विउलेणं पयत्तेणं पग्गहिएणं महाणुभागेणं तवोकम्मेणं अप्पाणं भावमाणे बहुपडिपुण्णे छम्मासे सामण्ण-परियागं पाउणइ, अद्धमासियाए संलेहणाए अप्पाणं झूसेइ, तीसं भत्ताइं अणसणाइं छेदेइ; छेदित्ता जस्सट्ठाए कीरइ नग्गभावे जाव सिद्धे । (तइयं अज्झयणं समत्तं) सूत्र २१ : फिर श्रमण भगवान महावीर किसी दिन राजगृह नगर के उस गुणशीलक उद्यान से निकलकर बाहर जनपदों में विहार करने लगे । उस महाभाग अर्जुन मुनि ने उस उदार, श्रेष्ठ, पवित्र, भाव से ग्रहण किये गये महालाभकारी (महाणुभागेणं-विशिष्ट प्रभावशाली) विपुल तप से अपनी आत्मा को भावित करते हुए पूरे छः महीने मुनिधर्म का पालन किया । इसके बाद आधे मास (पन्द्रह दिन) की संलेखना से अपनी आत्मा को भावित कर तीस भक्त के अनशन को पूर्ण कर जिस कार्य के लिये मुनिधर्म . २०४. अन्तकृदशा सूत्र : षष्ठम वर्ग Page #286 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ग्रहण किया, उसको पूर्ण कर वे अर्जुन अणगार यावत् सिद्ध, बुद्ध और मुक्त हो गये । Maxim 21 : Then Sramana Bhagawāna Mahāvīra went out of Gunaśīlaka garden and began to wander in other areas. Then that extremely fateful Arjuna mendicant completed his six months' period of sagehood exercising himself the noble abundant zealous, specially beneficial penances fully well; and then adopted a fast penance of half-month i.e., a fortnight, avoided thirty meals, accepted samlekhanā and attained the purpose for which he had accepted consecration, i.e, became beatified and salvated. विवेचन श्रेणिक चरित्र आदि ग्रंथों में लिखा है कि अर्जुनमाली के शरीर में मुद्गरपाणि यक्ष का पाँच मास १३ दिनों तक प्रवेश रहा । उससे उसने ११४१ व्यक्तियों का प्राणान्त किया । इसमें ९७८ पुरुष और १६३ स्त्रियाँ थीं । इससे स्पष्ट प्रमाणित होता है कि वह प्रतिदिन सात व्यक्तियों की हत्या करता रहा ।. यहाँ एक आशंका होती है कि जिस व्यक्ति ने इतना बड़ा प्राणिवध किया और पाप कर्म से आत्मा का महान् पतन किया, उस व्यक्ति को केवल छह मास की साधना से कैसे मुक्ति प्राप्त हो गई ? उत्तर यह है कि तप में अचिन्त्य, अतयं एवं अद्भुत शक्ति है। आगम कहता है "भवकोडिसंचियं कम्मं तवसा निजरिज्जई ।" अर्थात् करोड़ों भवों से संचित किये-बांधे कर्म भी तपश्चर्या द्वारा नष्ट किए जा सकते हैं । जब तीव्रतर तप की अग्नि प्रज्वलित होती है तो कर्मों के दल के दल सूखे घास-फूस की तरह भस्मसात् हो जाते हैं । इसके अतिरिक्त प्रस्तुत प्रसंग में यह भी कहा जा सकता है कि अर्जुनमालाकार द्वारा जो वध किया गया, वह वस्तुतः यक्ष द्वारा किया गया वध था। अतएव मनुष्यवध योग्य कषाय परिणामों की तीव्रता उसमें संभव नहीं है । अर्जुन का हृदय सरल, मंदकषायी प्रतीत होता है, किन्तु यक्षावेश के कारण वह क्रोध में हत्यारा बन बैठा । (तृतीय अध्ययन समाप्त) तृतीय अध्ययन .२०५. Page #287 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Elucidation It is mentioned in Srenika caritra etc. (religious compositions) that the body of Arjuna garland-maker was possessed by deity Mudgarapāni upto five months and thirteen days. In this period he murdered 1141 persons. Among them were 978 men and 163 women. This clearly proves that every day he used to kill 7 persons. Here one doubt arises that the person who had done such huge violence and degraded his soul to the lowest degree by this sinful deed, how could that man attain salvation by only six months' propiliation ? This doubt can be rectified thus-that penance had unimaginable, unarguable and wonderful strength. As Agama asserts-The ill-deeds (karmas) accumulated even in millions of births can be exhausted by penance. When the fire of most excessive penance burns then the army of karmas is reduced to ashes like dry grass and straw. Besides this, it can also be said in this context that the murder done by Arjuna garland-maker, was really done by the deity. Therefore, the extremity of passions, responsible for killing persons, was not possible in Arjuna garland-maker. The heart of Arjuna garland-maker was simple and less-affected, but due to the possession of deity (Yaksa) he turned to a murderer or assassin. [Third chapter concluded चतुर्थ अध्ययन सूत्र २२: उक्वेवओ चउत्थस्स अज्झयणस्स । एवं खलु जंबू ! तेणं कालेणं तेणं समएणं रायगिहे णयरे गुणसिलए चेइए। तत्थ णं सेणिए राया । कासवे णामं गाहावई परिवसइ । जहा मंकाई सोलसवासा परियाओ, विपुले सिद्धे । • २०६८ अन्तकृद्दशा सूत्र : षष्ठम वर्ग Page #288 -------------------------------------------------------------------------- ________________ सूत्र २२ : जम्बू स्वामी ने पूछा-हे भगवन् ! छठे वर्ग के तीसरे अध्ययन में प्रभु महावीर ने जो भाव कहे, वे मैंने सुने । अब चौथे अध्ययन में प्रभु ने क्या भाव परमाये हैं ? वह कृपाकर मुझे बताइये । सुधर्मा स्वामी कहते हैं-हे जम्बू ! उस काल उस समय राजगृह नगर में गुणशीलक नामक उद्यान था । वहां श्रेणिक राजा राज्य करता था । वहां कश्यप नाम का एक गाथापति रहता था । उसने मंकाई की तरह सोलह वर्ष तक दीक्षा पर्याय का पालन किया और अन्त समय में विपुलगिरि पर जाकर संथारा आदि करके वह सिद्ध, बुद्ध और मुक्त हो गया । (चतुर्थ अध्ययन समास्त) Chapter 4 Maxim 22: Jambu Swāmī asked politely-O Bhagawan ! I have heard the subject matter of third chapter of sixth section from you as preached by Lord Mahavira. Now please tell me, what subject matter was expressed by Bhagawāna Mahāvīra in the fourth chapter. Sudharma Swami narrated-OJambu ! At that time and at that period there was a city named Rājagrha. There was a garden named Gunaśīlaka. King Srenika ruled there. There dwelt a trader (gāthāpati) named Kaśyapa. Like Maikāi, he became monk and practised consecration for 16 years and in the fag end of his life, he went to Vipulagiri, accepting samthārā was beatified and attained salvation. [Fourth chapter concluded] पंचम अध्ययन सूत्र २३ : एवं खेमए वि गाहावई । णवरं, काकंदी णयरी । सोलसवासा परियाओ विपुले पव्वए सिद्धे । ४-५ अध्ययन • २०७ . Page #289 -------------------------------------------------------------------------- ________________ सूत्र २३ : इसी प्रकार क्षेमक गाथापति का वर्णन समझें । विशेष इतना है कि वे काकन्दी नगरी के निवासी थे और सोलह वर्ष का उनका दीक्षा काल रहा । यावत् वे भी विपुलगिरि पर सिद्ध हुए । (पांचवां अध्ययन समाप्त) Chapter 5 Maxim 23 : Similar is the description of Ksemaka trader. Excepting; he was the inhabitant of Kākandi city. His consecration period was of sixteen years until, he attained salvation at Vipulagiri. [Fifth chapter concluded] छठा अध्ययन सूत्र २४ : एवं धितिहरे वि गाहावई । काकंदी णयरी । सोलसवासा परियाओ जाव विपुले सिद्धे । सूत्र २४ : ऐसे ही धृतिधर गाथापति का वर्णन समझना चाहिए । वे काकन्दी नगरी के निवासी थे, सोलह वर्ष तक निर्मल चारित्र पालकर वे भी विपुलगिरि पर सिद्ध हुए। __ (छठवां अध्ययन समाप्त) Chapter 6 Maxim 24 : In the same way should be known, the description of Dhrtidhara trader. He was inhabitant of Kākandi city. Practising sixteen years, consecration period, he was liberated on Vipulagiri. ( Sixth Chapter concluded) .२०८. अन्तकृद्दशा सूत्र : षष्ठम वर्ग -- Page #290 -------------------------------------------------------------------------- ________________ सातवां अध्ययन सूत्र २५ : एवं केलासे वि गाहावई । णवरं, सागेए णयरे, वारस वासाइं परियाओ, विपुले सिद्धे । सूत्र २५ : ऐसे ही कैलाश गाथापति भी थे । विशेष यह था कि ये साकेत नगर के . रहने वाले थे, इन्होंने वारह वर्ष की दीक्षा पर्याय पाली और विपुलगिरि पर सिद्ध हुए। (सातवां अध्ययन समाप्त) Chapter 7 Maxim 25 : Like this was Kailāśa trader. Excepting : he was inhabitant of Sāketa city, ! le practised consecration period of twelve years and want therated on Vipulagiri. [Seventh chapter concluded] आठवां अध्ययन सूत्र २६ : एवं हरिचंदणे वि गाहावई । सागेए णयरे । वारस वासा परियाओ, विपुले सिद्धे । सूत्र २६ : एसे ही आठवें हरिचन्दन गाथापति भी थे । वे भी साकेत नगर के निवासी थे, उन्होंने भी बारह वर्ष तक श्रमण धर्म का पालन किया और अन्त में विपुलगिरि पर सिद्ध हुए। (आठवां अध्ययन समाप्त) ६-७-८ अध्ययन २०९ . Page #291 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Chapter 8 Description of Haricandana trader was also as aforesaid. He was inhabitant of Saketa city. His consecration period was of twelve years and was liberated at Vipulagiri. [Eighth chapter concluded] नवमां अध्ययन Maxim 26 : सूत्र २७ : एवं वात विगाहावई । णवरं रायगिहे णयरे । बारस वासा परियाओ, विपुले सिद्धे । सूत्र २७ : इसी तरह नवमें वारत्त गाथापति का वर्णन भी जानना चाहिए । विशेष यह था कि ये राजगृह नगर के रहने वाले थे पालन कर विपुलगिरि पर सिद्ध हुए । । बारह वर्ष का चारित्र ( नवमां अध्ययन समाप्त) Chapter 9 Maxim 27 : Similar is the description of ninth trader whose name is Vāratta. Excepting; he was inhabitant of Rājagrha city. His consecration period was of twelve years. He was liberated at Vipulagiri. [Ninth Chapter concluded] दसवां अध्ययन सूत्र २८ : एवं सुदंसणे विगाहावई । णवरं वाणियगामे णयरे । दूइपलासए चेइए, पंच वासा परियाओ, विपुले सिद्धे । २१०. • For Private Personal Use Only अन्तकृद्दशा सूत्र : षष्ठम वर्ग Page #292 -------------------------------------------------------------------------- ________________ सूत्र २८ दसवें सुदर्शन गाथापति का वर्णन भी इसी प्रकार समझ लेवें। विशेष यह था कि वाणिज्यग्राम नगर के बाहर द्युतिपलाश नाम का उद्यान था, वहां दीक्षित हुए । पांच वर्ष का निर्मल चारित्र पालकर विपूलगिरि पर सिद्ध हुए । (दसवां अध्ययन समाप्त) Chapter 10 Maxim 28 : Similar is the description of Sudarśana trader. Excepting; he accepted consecration in Dyutipalāśa garden which was situated outside the city Vānijyagrāma. He was consecrated there and after Practising pure conduct upto five years, he was liberated at Vipulagiri. [Tenth chapter concluded] ग्यारहवां अध्ययन सूत्र २९ : एवं पुण्णभद्दे वि गाहावई । वाणियगामे णयरे । पंच वासा परियाओ, विपुले सिद्धे । सूत्र २९ : पूर्णभद्र गाथापति का वर्णन भी ऐसे ही समझना चाहिए । विशेष यह था कि वे वाणिज्यग्राम नगर के रहने वाले थे । पाँच वर्ष का चारित्र पालन कर वे भी विपुलाचल पर सिद्ध हुए। (ग्यारहवां अध्ययन समाप्त) Chapter 11 Maxim 29 : Similar is the description of trader Pūrnabhadra. Excepting; he was inhabitant of city named Vānijyagrāma. After Practising faultless sage-conduct upto five years he was liberated at Vipulagiri. [Eleventh chapter concluded] १०-११ अध्ययन .२११ Page #293 -------------------------------------------------------------------------- ________________ बारहवां अध्ययन सूत्र ३0 : एवं सुमणभद्दे वि गाहावई । सावत्थी णयरी । बहुवासाइं परियाओ, विपुले सिद्धे । सूत्र ३0: सुमनभद्र गाथापति का वर्णन भी इसी प्रकार समझना चाहिए । ये श्रावस्ती नगरी के निवासी थे । बहुत वर्षों तक मुनि धर्म का पालन कर विपुलगिरि पर सिद्ध हुए। (बारहवाँ अध्ययन समाप्त) Chapter 12 Maxim 30 : Similar is the description of trader Sunanabhadra. Excepting; he was inhabitant of city Srārasti. He practised sage order for many years and was liberated at Vipulagiri. [Twelfth chapter concluded] तेरहवां अध्ययन सूत्र ३१ एवं सुपईडे वि गाहावई । सावत्थी णयरी । सत्तावीसं वासा परियाओ, विपुले सिद्धे । सूत्र ३१ : ऐसे ही सुप्रतिष्ट गाथापति का वर्णन समझ लेना चाहिए । ये भी श्रावस्ती नगरी के रहने वाले थे, और सत्ताईस वर्ष तक श्रमण चारित्र-पालन कर विपुलगिरि पर सिद्ध हुए। (तेरहवां अध्ययन समाप्त) . २१२. अन्तकृद्दशा सूत्र : षष्ठम वर्ग Page #294 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Chapter 13 Maxim 31 : Similar is the case of trader Supratisthu. He was inhabitant of Srāvasti city. After practising sagehood upto twenty seven years, he was liberated at Vipulagiri. [Thirteenth chapter concluded] चौदहवाँ अध्ययन सूत्र ३२ : एवं मेहे वि गाहावई । रायगिहे णयरे । बहूहिँ वासाइं परियाओ, विपुले सिद्धे । सूत्र ३२ : मेघ गाथापति का वर्णन भी ऐसे ही समझना चाहिये। ये राजगृह नगर के निवासी थे और बहुत वर्षों तक चारित्र धर्म का पालनकर विपुलगिरि पर सिद्ध हुए। (चौदहवां अध्ययन समाप्त) Chapter 14 Maxim 32 : The same is the description of Megha trader. Excepting; he was inhabitant of Rājag! ha city. He practised sage conduct for many years and attained salvation at Vipulagiri. [Fourteenth chapter concluded] पन्द्रहवां अध्ययन : अतिमुक्तकुमार सूत्र ३३ : उक्खेवओ पण्णरसमस्स अज्झयणस्स । १३-१४ अध्ययन Page #295 -------------------------------------------------------------------------- ________________ एवं वयासी-एवं खलु जंबू ! तेणं कालेणं तेणं समएणं पोलासपुरे णयरे, सिरीवणे उज्जाणे । तत्थ णं पोलासपुरे णयरे विजए णामं राया होत्था । तस्स णं विजयस्स रण्णो सिरी णामं देवी होत्था, वण्णओ । तस्स णं विजयस्स रण्णो पुत्ते सिरीए देवीए अत्तए अइमुत्ते णामं कुमारे होत्था सुकुमाले । तेणं कालेणं तेणं समएणं समणे भगवं महावीरे जाय सिरीवणे विहरइ। तेणं कालेणं तेणं समएणं समणस्स भगवओ महावीरस्स जेट्टे अंतेवासी इंदभूई, जहा पण्णत्तीए जाव पोलासपुरे णयरे उच्च-णीय जाव अडइ । अतिमुक्तकुमार सूत्र ३३ : श्री जम्बू स्वामी ने पूछा- हे भगवन् ! चौदह अध्ययनों का भाव मैंने सुना । अब पन्द्रहवें अध्ययन में प्रभु ने क्या भाव कहा है, कृपा कर बतलाइये । आर्य सुधर्मा स्वामी कहते हैं-हे जम्बू ! उस काल, उस समय में पोलासपुर नामक नगर था । वहां श्रीवन नामक उद्यान था । इस नगर में विजय नाम का राजा था, उनकी श्रीदेवी महारानी थी जो वर्णनीय थी । महाराजा विजय का पुत्र और श्रीदेवी का आत्मज “अतिमुक्त' नाम का एक कुमार था, जो बड़ा सुकुमार, सुन्दर और दर्शनीय था । उस काल, उस समय, श्रमण महावीर के ज्येष्ठ शिष्य इन्द्रभूति, (उनका भगवती सूत्र में जैसे षष्ठ भक्त के पारणे के लिए भगवान से पूछकर भिक्षार्थ जाने का वर्णन किया गया है वैसे ही यहां भी समझना चाहिए यावत्) उस पोलासपुर नगर में छोटे-बड़े कुलों में सामूहिक भिक्षा हेतु भ्रमण करने लगे । . २१४. अन्तकृद्दशा सूत्र : षष्ठम वर्ग Page #296 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Maxim 33 : Chapter 15 Atimuktakumāra Śrī Jambu Swāmī asked in polite words-O Bhagawan! I have heard the subject matter of fourteen chapters. In fifteenth chapter what Bhagawana had described, please tell me. Ārya Sudharma Swāmī began to narrate-O Jambū ! At that time and at that period, there was a city named Polāsapura. There was a garden, named Śrīvana. King Vijaya ruled there. His queen was Sridevi. She was describable. Atimukta was their son, who was tender, beautiful and worthy to be seen. At that time and at that period Śramaṇa Bhagawāna Mahāvīra wandering village to village arrived there and stayed in Śrīvana garden. At that time and at that period, the eldest disciple of Śramana Bhagawana Mahāvīra, Indrabhuti (as described in Bhagavati Sūtra, on the day of breaking of two days' fast he used to go for seeking alms with the permission of Bhagawană, such should be known here) began to wander in high-low-middle class houses of Polasapura city for seeking alms. सूत्र ३४ : इमं च णं अइमुत्ते कुमारे पहाए जाव विभूसिए बहूहिं दारएहिं य दारियाहिं य, डिंभएहिं य डिंभियाहिं य कुमारएहिं य कुमारियाहिं य सद्धिं संपरिवुडे सयाओ गिहाओ पडिणिक्खमइ पडिणिक्खमित्ता जेणेव इंदट्ठाणे तेणेव उवागए । तेहिं बहूहिं दारएहिं य दारियाहिं य डिंभएहिं य डिंभियाहिं य कुमारएहिं य कुमारियाहिं य सद्धिं संपरिवुडे अभिरममाणे अभिरममाणे बिहरइ । १५वाँ अध्ययन For Private Personal Use Only २१५ ● Page #297 -------------------------------------------------------------------------- ________________ अतिमुक्तकुमार की जिज्ञासा सूत्र ३४ : इधर अतिमुक्त कुमार स्नान करके यावत्, शरीर की विभूषा करके बहुत से दारक-सामान्य लड़के-लड़कियों, डिंभक-छोटी आयु वाले वालक वालिकाओं और कुमार समान वय वाले कुमार कुमारियों के साथ अपने घर से निकले और निकलकर जहाँ इन्द्र स्थान यानी क्रीडास्थल था, वहां आये, वहां उन वालक-वालिकाओं के साथ वे वाल सुलभ खेल खेलने लगे । Curiosity of Atimuktakumāra Maxim 34 : Al the same time prince Atimuktakionāra ter taking hath until anointing his body, surrounded by many little hoys, girls. lads. lasses. youths-maidens came out of his house, reached Indrasthana-play ground and began to play various types of games. सूत्र ३५ : तए णं भगवं गोयमे पोलासपुरे णयरे उच्च-णीय जाव अडमाणे इंदट्ठाणस्स अदूरसामंतेणं वीईवयइ । तए णं से अइमुत्ते कुमारे भगवं गोयमं अदूरसामंतेणं वीईवयमाणं पासइ, पासित्ता जेणेव भगवं गोयमे तेणेव उवागए । भगवं गोयमं एवं वयासीके णं भंते ! तुब्भे, किं वा अडह ? तए णं भगवं गोयमे अइमुत्तं कुमारं एवं वयासी-“अम्हे णं देवाणुप्पिया ! समणा णिग्गंथा इरियासमिया जाव बंभयारी उच्च-णीय जाव अडामो ।” तए णं अइमुत्ते कुमारे भगवं गोयमं एवं वयासी“एह णं भंते ! तुब्भे, जण्णं अहं तुब्भं भिक्खं दवावेमि" त्ति कटु भगवं गोयमं अंगुलीए गिण्हइ ; गिण्हित्ता, जेणेव सए गिहे तेणेव उवागए । अन्तकृद्दशा सूत्र : षष्ठम वर्ग Page #298 -------------------------------------------------------------------------- ________________ चित्रक्रम ३१ : क गौतम स्वामी एवं अतिमुक्तकुमार दृश्य १-बच्चों के साथ क्रीड़ा करते हुए अतिमुक्तकुमार ने राजमार्ग पर गौतम स्वामी को आते देखा तो उनसे पूछा-आप कौन हैं ? किसलिए इधर भ्रमण कर रहे हैं ? 卐 गौतम स्वामी ने अपना परिचय देकर कहा-मैं शुद्ध भिक्षा के लिए इधर आया हूँ। के दृश्य २-अतिमुक्तकुमार ने कहा-आप भिक्षा के लिए मेरे भवन पर पधारिए। मेरी माता आपको भिक्षा देगी। और उसने गौतम स्वामी की अँगुली पकड़ ली। राजमाता श्रीदेवी यह दृश्य देखकर मुग्ध हो उठती है। उसने सामने आकर गौतम स्वामी का स्वागत किया। (वर्ग ६/अध्य. १५) Illustration No. 31 : Gautama Swāmi and Atimuktakumāra Scene 1. Atimuktakumāra, playing with his playmates, saw Gautama Swāmi going on royal road, then asks him-Who are ___you? Why are you wandering? Gautama Swami after giving his identity said-1 am wandering for seeking faultless alms. Scene 2. Atimuktakumāra said-For alms, please come to my palace. My mother will give you alms. And he held up the finger of Gautama Swami. Queen Sridevi becomes very much glad at this sight. She comes forward and honoured Gautama Swami. (Sec. 6/Ch. 15) अन्तकृद्दशा सूत्र : चित्र परिचय Page #299 -------------------------------------------------------------------------- ________________ गौतम स्वामी अतितक . . . AL - AM IRCL.. . .. . " Pensatta । ले LA Rames .. RRSASSMAN 31 Page #300 -------------------------------------------------------------------------- ________________ तए णं सिरीदेवी भगवं गोयमं एज्जमाणं पासइ, पासित्ता हट्ठ-तुट्ठ जाव आसणाओ अब्भुट्टेइ, अब्भुट्टित्ता, जेणेव भगवं गोयमे तेणेव उवागया । भगवं गोयमं तिक्युत्तो आयाहिण-पयाहिणं करेइ, करित्ता वंदइ, णमंसइ, बंदित्ता, णमंसित्ता विउलेणं असण-पाण-खाइम-साइमेणं पडिलाभेइ, जाव पडिविसज्जेइ । सूत्र ३५ : उस समय भगवान गौतम पोलासपुर नगर के छोटे-बड़े कुलों में यावत् भ्रमण करते हुए उस क्रीडा-स्थल के पास से जा रहे थे, तब अतिमुक्तकुमार उनको पास से जाते हुए देखकर शीघ्र ही भगवान गौतम के पास आये और उनसे इस प्रकार वोलहे पूज्य ! आप कौन हैं. और इस तरह किसलिए घूम रहे हैं ? तब भगवान गौतम ने अतिमुक्त कुमार को इस प्रकार उत्तर दिया''देवानप्रिय ! हम श्रमण निर्ग्रन्थ, ईर्यासमिति के धारक, गुप्त ब्रह्मचारी हैं, और छोटे बड़े कुलों में भिक्षार्थ भ्रमण करते हैं।' यह सुनकर अतिमुक्त कुमार भगवान् गौतम से इस प्रकार बोले- 'हे भगवन् ! आप आओ । मैं आपको भिक्षा दिलाता हूँ।" ऐसा कहकर अतिमुक्त कुमार ने भगवान गौतम की अंगुली पकड़ी और उनको जहां अपना घर था, वहां ले आये । महारानी श्रीदेवी भगवान गौतम को आते दखकर बहुत ही प्रसन्न हुई यावत् आसन से उठकर जिधर से भगवान गौतम आ रहे थे, उनके सम्मुख आई, और भगवान गौतम को तीन बार प्रदक्षिणा करके वंदना की, नमस्कार किया । फिर विपुल (श्रेष्ठ-उत्तम) अशन-पान-खादिम और स्वादिम से प्रतिलाभ दिया, यावत् विधिपूर्वक विसर्जित किया । Maxim 35 : At that time Reverend Gautama seeking alms from highlow-middle class families of Polāsapura city was passing near that play-ground. Then watching him, passing nearby १५वाँ अध्ययन .२१७. Page #301 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Atimuktakumāra quickly came to Gautama Swami and said-O reverend sir ! who are you and why are you wandering like this? Then Reverend Gautama replied to Atinuktakumāra in these sweet words-O beloved as gods ! We are sages. nonattached monks, heedful in walking and fully celebate. I am wandering in high-low-middle class families for alms. Hearing this Atimuktakumāra spoke to Reverend Gautama thus-o reverend ! you please come with me so that I may get you alms. So saying he held Reverend Gautama by finger and took him to his own house. As soon as queen Sridevī saw Reverend Gautama coming to her house, she became very glad, got up from her seat, came to the Reverend Gautama circumambulated him thrice, howed down and worshipped him and then gave him best meals-food, water, eatables and dainties in plenty and respectfully saw him off. सूत्र ३६ : तए णं से अइमुत्ते कुमारे गोयमं एवं वयासी-“कहि णं भंते ! तुडभे परिवसह ?" तए णं भगवं गोयमे अइमुत्तं कुमारं एवं वयासी“एवं खलु देवाणुप्पिया ! मम धम्मायरिए धम्मोवएसए भगवं महावीरे आइगरे जाव संपाविउकामे, इहेव पोलासपुरस्स णयरस्स बहिया सिरिवणे उज्जाणे अहापडिरूवं उग्गहं उग्गिण्हित्ता संजमेणं तवसा अप्पाणं भावेमाणे विहरइ, तत्थ णं अम्हे परिवसामो ।" तए णं से अइमुत्ते कुमारे भगवं गोयमं एवं वयासी-गच्छामि णं भंते ! अहं तुन्भेहिं सद्धिं समणं भगवं महावीरं पायवंदए ? अहासुहं देवाणुप्पिया ! • २१८ . अन्तकृदशा सूत्र : षष्ठम वर्ग Page #302 -------------------------------------------------------------------------- ________________ सूत्र ३६ : इसके बाद भगवान गौतम से अतिमुक्तकुमार यों बोले-हे देवानुप्रिय ! आप कहां रहते हैं ?' भगवान गौतम ने अतिमुक्त कुमार को उत्तर दिया- 'हे देवानप्रिय ! मेरे धर्माचार्य और धर्मोपदेशक भगवान महावीर धर्म की आदि करने वाले यावत् मोक्ष के कामी इसी पोलासपुर नगर के बाहर श्रीवन उद्यान में मर्यादानुसार अवग्रह (आज्ञा आदि) लेकर संयम एवं तप से आत्मा को भावित कर विचरते हैं, हम वहीं रहते हैं ।" तब अतिमुक्त कुमार भगवान गौतम से इस प्रकार बोले-हे पूज्य ! क्या मैं आपके साथ भगवान महावीर को वंदन करने चलूँ ? श्री गौतम स्वामी ने कहा-हे देवानुप्रिय! जैसा तुम्हें सुख हो । Maxim 36 : Thereafter prince Atimuktakumāra asked Reverend Gautama-O beloved as gods ! Where do you live ? Reverend Gautama answered-O beloved as gods ! My religious precepter and religious preacher Bhagawāna Mahāvīra, promoter (beginner) of religion and desirous of attaining salvation, is staying abiding himself with restrain and austerity. He is staying here in Srivana garden. outside the city of Polāsapura, after taking proper permission, we all stay there. Then Atimuktakumāra said to Reverend GautamaReverend Sir ! Can I come with you to bow down to Bhagawāna Mahāvīra ? Gautama Swāmi said- beloved as gods ! Do as it pleases you. सूत्र ३७ : तए णं से अइमुत्ते कुमारे गोयमेणं सद्धिं जेणेव समणे भगवं महावीरे तेणेव उवागच्छइ ; उवागच्छित्ता समणं भगवं महावीरं तिक्खुत्तो, आयाहिण-पयाहिणं करेइ, करित्ता वंदइ जाव पज्जुवासइ । १५वाँ अध्ययन .२१९ . Page #303 -------------------------------------------------------------------------- ________________ न तए णं भगवं गोयमे जेणेव समणे भगवं महावीरे तेणेव उवागए । जाव पडिदंसेइ, पडिदंसित्ता, संजमेणं तवसा अप्पाणं भावमाणे विहरइ । तए णं समणे भगवं महावीरे अइमुत्तस्स कुमारस्स धम्मकहा । तए णं से अइमुत्तेकुमारे समणस्स भगवओ महावीरस्स अंतिए धम्म सोच्चा णिसम्म हद्वतुट्ठ जं णवरंदेवाणुप्पिया ! अम्मापियरो आपुच्छामि । तए णं अहं देवाणुप्पियाणं अंतिए जाव पव्वयामि । अहासुहं देवाणुप्पिया ! मा पडिबंधं करेह । सूत्र ३७ : तब अतिमुक्त कुमार गौतम स्वामी के साथ श्रमण भगवान महावीर स्वामी के. पास आये, आकर श्रमण भगवान महावीर को तीन बार प्रदक्षिणा की और वंदना करके पर्युपासना करने लगे । इधर गौतम भगवान महावीर के समीप आये और उन्हें लाया हुआ आहार पानी दिखा कर पारणा किया यावत् संयम तथा तप से अपनी आत्मा को भावित करते हुए विचरने लगे । तब श्रमण भगवान महावीर ने अतिमुक्त कुमार को धर्म कथा सुनाई । धर्म कथा सुनकर और उसे धारण कर अतिमुक्त कुमार बड़े प्रसन्न हुए और बोलेहे देवानुप्रिय ! मुझे आपकी धर्मदेशना बहुत ही प्रिय और रुचिकर लगी, मैं अपने माता-पिता से पूछकर फिर आपकी सेवा में श्रमण दीक्षा ग्रहण चाहता हूँ। भगवान बोले-हे देवानुप्रिय! जैसे तुम्हें सुख हो वैसे करो । पर धर्म कार्य में प्रमाद मत करो । Maxim 37 : Then Atimuktakumăra came to Bhagawāna Mahāvīra with Gautama Swāmī, and thrice circumabulating अन्तकृद्दशा सूत्र : षष्टम वर्ग .२२०. Page #304 -------------------------------------------------------------------------- ________________ EVAR Pार S. ESH RSE:9. कदिनका राज्यामिक तीन आदेश TOO MATA । 32 Page #305 -------------------------------------------------------------------------- ________________ 中牙牙牙牙牙牙牙牙牙牙牙牙牙牙牙牙牙牙牙牙牙牙牙牙牙牙牙牙乐中 चित्रक्रम ३२ : अतिमुक्तकुमार : प्रभु-दर्शन और वैराग्य दृश्य १-गौतम स्वामी के साथ आये हुए राजकुमार अतिमुक्तकुमार ने भगवान महावीर की वन्दना की। धर्म उपदेश सुना तो उसका हृदय - आत्म-कल्याण के लिए जागृत हो गया। दृश्य २-अतिमुक्तकुमार का एक दिवसीय राज्याभिषेक, पीछे माता-पिता खड़े हैं। आदेश पूछने पर अतिमुक्तकुमार ने कहा-मेरे दीक्षा से अभिषेक के लिए, राजकोष से तीन लाख स्वर्ण-मुद्राएँ निकालो। एक लाख के रजोहरण, एक लाख के पात्र तथा एक लाख स्वर्ण-मुद्रा देकर नाई को बुलाओ, मैं दीक्षा के लिए केश-मुण्डन करवाऊँगा। (वर्ग ६/अध्य. १५) 555555555555555555555555555555555555555550 Illustration No. 32 : Atimuktakumāra : Seeing Bhagawana and apathy Scene 1. Coming along with Gautama Swami, prince Atimuktakumāra bowed down to Bhagawāna Mahāvīra and heard religious discourse. His heart awakened for self-welfare. Scene 2. Coronation of Atimuktakumāra. Standing behind are his parents. On asking for orders Atimuktakumāra said-Take out three lakh gold coins from royal treasure. Buy the holy broom (rajoharana) for one lakh, monk's utensils for one lakh and pay one lakh gold coins to barber. After being tonsured I will accept consecration. (Sec. 6/Ch. 15) 05555555555555555555556 अन्तकृद्दशा सूत्र : चित्र परिचय Page #306 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Bhagawana bowed down and worshipped and sat near the Loard. Now Gautama came to Bhagawāna Mahāvīra, showed him the meals he had brought and then took it. He later absorbed his soul in penance and constraint. In the mean time Śramaṇa Bhagawāna Mahāvīra told religious discourse to Atimuktakumāra. Hearing and taking to heart that discourse he became very glad and uttered O beloved as gods! Your discourse is very interesting and dear to me. It touched my heart. Taking permission of my parents I intend to enter the sage order accepting consecration at your feet. Bhagawana said-Do, as you feel happy, O beloved as gods ! but do not delay in auspicious deed. सूत्र ३८ : तए णं से अइमुत्ते कुमारे जेणेव अम्मापियरो तेणेव उवागए; जाव पव्वइत्तए । अइमुत्तं कुमारं अम्मापियरो एवं क्यासी "बाले सिताब तुमं पुत्ता ! असंबुद्धे सि तुमं पुत्ता ! किण्णं तुमं जाणासि धम्मं ?" तए णं से अइमुत्ते कुमारे अम्मापियरो एवं बयासी - एवं खलु अहं अम्मयाओ, जं चेव जाणामि, तं चेव ण जाणामि; जं चेव ण जाणामि, तं चैव जाणामि । तए णं तं अइमुत्तं कुमारं अम्मापियरो एवं वयासी "कहं णं तुमं पुत्ता ! जं चैव जाणासि तं चेव ण जाणासि, जं चेवण जाणासि तं चैव जाणासि ?" १५वाँ अध्ययन • २२१ • Page #307 -------------------------------------------------------------------------- ________________ अतिमुक्तकुमार के प्रश्नोत्तर सूत्र ३८ : इसके पश्चात् अतिमुक्त कुमार अपने माता-पिता के पास आकर, उन्हें नमस्कार करके बोले - हे माता-पिता ! मैंने भगवान के श्रीमुख से धर्म सुना है, वह मुझे अत्यन्त प्रिय लगा है अतः आपकी आज्ञा पाकर मैं दीक्षा लेना चाहता हूँ । इस पर माता-पिता बहुत ही उदास होकर अतिमुक्त कुमार से इस प्रकार बोले - हे पुत्र ! अभी तुम बालक हो, असंबुद्ध ( तुम्हारी ज्ञान शक्ति विकसित नहीं हुई है) हो । अभी धर्म को तुम क्या जानो ? अतिमुक्त कुमार ने कहा--" हे माता - पिता ! मैं जिसको जानता हूँ, उसको नहीं जानता और जिसको नहीं जानता हूँ, उसको जानता हूँ ।" माता-पिता आश्चर्यपूर्वक बोले- पुत्र ! तुम जिसको जानते हो, उसको नहीं जानते और जिसको नहीं जानते, उसको जानते हो, यह कैसे ? इसका क्या अर्थ है ? Question-answers between Atimuktakumāra and his parents Maxim 38 : Thereafter, Atimuktakumāra came to his parents, bowed down and said-I have heard the religious discourse from Bhagawāna. It was very interesting to me. By your permission I intend to accept consecration. Then parents became very sad and said to Atimuktakumāra- O son ! Still you are a child. Your intelligence is undeveloped. What do you know about religion ? Atimuktakumāra replied-Parents! What I know, I do not know and what I do not know, I know. ૨૨૨ अन्तकृद्दशा सूत्र : षष्ठम वर्ग Page #308 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Parents said with astonishment - Son ! What you know, you do not know and what you do not know, you know. How is it ? What is its meaning ? सूत्र ३९ : तए णं से अइमुत्ते कुमारे अम्मापियरो एवं वयासी - " जाणामि अहं अम्मयाओ ! जहा जाएणं अवस्सं मरियव्वं, ण जाणामि अहं अम्मयाओ ! का वा कहिं वा कहं वा केवच्चिरेण वा ? ण जाणामि अहं अम्मयाओ ! केहिं कम्माययणेहिं जीवा णेरइय-तिरिक्ख जोणिय - मणुस्स - देवेसु उववज्जंति, जाणामि णं अम्मयाओ ! जहा सएहिं कम्माययणेहिं जीवा णेरइय जाव उववज्जंति । एवं खलु अहं अम्मयाओ ! जं चेव जाणामि तं चेव ण जाणामि, जं चेव ण जाणामि तं चैव जाणामि । तं इच्छामि णं अम्मयाओ ! तुन्भेहिं अब्भणुष्णाए जाव पव्वइत्तए । तए णं अइमुत्तं कुमारं अम्मापियरो जाहे णो संचाएंति बहूहिं आघावणाहिं जाय तं इच्छामो ते जाया ! एगदिवसमवि रज्जसिरिं पासेत्तए । तणं से अइमुत्ते कुमारे अम्मा-पिउ-वयणमणुवत्तमाणे तुसिणीए संचिट्ठइ । अभिसेओ जहा महाब्बलस्स णिक्खमणं । जाव सामाइयमाइयाई एक्कारसअंगाई अहिज्जइ; बहुवासाई सामण्णपरियाओ गुणरयणं जाव विपुले सिद्धे । ( पण्णरसं अज्झयणं समत्तं ) सूत्र ३९ : तब अतिमुक्त कुमार इस प्रकार बोले - हे माता-पिता ! मैं जानता हूँ कि जो जन्मा है, उसको अवश्य मरना होगा, पर यह नहीं जानता कि कब, कहाँ किस प्रकार और कितने दिनों के बाद मरना होगा । १५वाँ अध्ययन For Private Personal Use Only २२३ Page #309 -------------------------------------------------------------------------- ________________ फिर मैं यह भी नहीं जानता कि जीव किन कर्मों के कारण नरक, तिर्यंच, मनुष्य और देवयोनि में उत्पन्न होते हैं, पर इतना जानता हूं कि जीव अपने ही कृत-कर्मों के कारण नरक यावत् देवयोनि में उत्पन्न होते हैं । इस प्रकार निश्चय ही माता-पिता ! मैं जिसको जानता हूँ, उसी को नहीं जानता और जिसको नहीं जानता उसी को जानता हूँ । अतः हे मातापिता ! मैं आपकी आज्ञा होने पर प्रव्रज्या लेना चाहता हूँ । अतिमुक्तकुमार को माता-पिता जब बहुत-सी युक्ति प्रयक्तियों से समझाने में समर्थ नहीं हुए, तो वोले-हे पुत्र ! हम एक दिन के लिये तुम्हारी राज्य लक्ष्मी की शोभा देखना चाहते हैं । अर्थात् तुम्हारा राज्याभिषेक करना चाहते हैं । अब अतिमुक्त कुमार माता-पिता के वचन का अनुवर्तन (अनुसरण) करके मौन रहे । फिर महाबल के समान उनका राज्याभिषेक हुआ । फिर भगवान के पास दीक्षा लेकर सामायिक आदि ग्यारह अंगों का अध्ययन किया । बहुत वर्षों तक श्रमण चारित्र का पालन किया । गुणरत्न तप का आराधन किया । यावत् विपुलाचल पर सिद्ध हुए । (पन्द्रहवां अध्ययन समाप्त) Maxim 39 : Atimuktakumāra replied-Parents ! I know that one who is born, has to die; but I do not know when, where, in what manner and after what length of time he will die. Again I do not know after what types of deeds (karmas) souls take birth in hellish, animal, human and god state; but I definitely know that souls take birth in hellish, animal, human and god state due to their own deeds (karinas). Hence it is definite; parents ! that what I know, the same l do not know and what I do not know, the same [ know. Therefore, parents ! I intend to accept consecration with your perniission. ૨૨૪ ( अन्तकृद्दशा सूत्र : षष्ठम वर्ग Page #310 -------------------------------------------------------------------------- ________________ HALMA . १ . Manyaskewed ---SPS:.. भगवान के पास दीक्षा ग्रहण NWAR KIDIO MAHARAS INGANA ५. Lac. RESEAR ANPATINATTAMANG F 33 Page #311 -------------------------------------------------------------------------- ________________ भ कभक) 5555555555550 चित्रक्रम ३३ : के अतिमुक्तकुमार की दीक्षा-शोभायात्रा दृश्य १-मस्तक पर चोटी रखकर बाकी केश मुंडन कर । अतिमुक्तकुमार ने राजमुकुट धारण किया। एक सहस्र पुरुष वाहिनी के विशाल शिविका में एक ऊँचे आसन पर दीक्षार्थी राजकुमार बैठा है। उनकी दाहिनी ओर राजमाता श्रीदेवी हंस चिन्हांकित पट शाटक लेकर के भद्रासन पर बैठी है। बाईं तरफ पात्र-रजोहरण आदि लेकर धायमाता बैठी 55555555555555555555555555555))))))))))) दृश्य २-भगवान महावीर के समवसरण में पहुँचकर कुमार ने आभरण अलंकारों का त्याग कर मुनिवेश पहना और प्रभु-चरणों में उपस्थित होकर संयम दीक्षा प्रदान करने की प्रार्थना की। माता-पिता ने प्रभु से प्रार्थना करते हुए कहा-हमारा यह अत्यन्त प्रिय पुत्र संसार भय से उद्विग्न हो गया है। इसे शिष्य रूप में स्वीकार करने की कृपा कीजिए। (वर्ग ६/अध्य. १५) Illustration No. 33 : Consecration procession of Atimuktakumăra Scene 1. Keeping only top-knot on head, tonsured Atimuktakumāra wore crown. Prepared for consecration Atimuktakumāra is sitting on a high seat in the palanquin, which is to be carried by one thousand men. In his right side queen Sridevī is sitting on a leisure seat, with a goose marked cloth in her hands. On left side nurture-mother is sitting taking holy broom, utensils etc., the sage-symptoms. Scene 2. Reaching the religious assembly of Bhagawāna Mahāvīra, Atimuktakumāra put off all the ornaments, royal dress etc., and put on sage-robe, approached Bhagawāna and prayed for consecration. Parents said praying to Bhagawana-Our this dear son became distressed by the fear of world. Please accept him as your disciple and oblige us. (Sec. 6/Ch. 15) 45$$$$$$$$$听听听听听听听听听听听听听听听听$$$$ $$$$$$$ $$ $55556 646 अन्तकृद्दशा सूत्र : चित्र परिचय Page #312 -------------------------------------------------------------------------- ________________ फ्र चित्रक्रम ३४ : अतिमुक्त मुनि : जल में पात्ररूपी नाव एक बार महावर्षा होने पर बाल-मुनि अतिमुक्त स्थविरों के साथ स्थण्डिल भूमि को गये। वहाँ बरसाती पानी के एक छोटे नाले को देखकर, नाले पर मिट्टी की पाल बाँधी और अपना पात्र जल में छोड़कर हर्षित होकर कहने लगे - यह मेरी नाव तैर रही है। बाल मुनि की यह क्रीड़ा देखकर स्थविर श्रमण अप्रसन्न हुए और उन्हें बिना कहे ही भगवान महावीर के पास चले आये। ( भगवती सूत्र ५ / ४ के अनुसार ) Illustration No. 34 : Atimukta sage: Patra (utensil) as boat in water Once it rained cats and dogs. Boy sage Atimukta went for discharging urine and stool in open ground with elder sages. In the way, seeing a rainy drain he stoppd there, checked the flow of water by clay and leaving his own utensil in water, gladfully began to say-My boat is swimming. Seeing such play of boy-sage, the elder sages became displeased and saying nothing to the boy-sage came to Bhagawāna Mahāvīra. (According to Bhagawati Sūtra 5/4) अन्तकृद्दशा सूत्र : चित्र परिचय फ्र For Private Personal Use Only �55 5 5 5 5 595555555955555555595555555595555555 卐 5556 Page #313 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ~ ~ बाल अलि अतिमुक्ताव ITE PRA MES EPALI ARA सीxn. __ RA Hin RANDA Makistani MAMpmuicemangwara - --... Chane MAHARAMPites AXC AmAS H PAR R Jan SIMP POES ATMASAN 34 Page #314 -------------------------------------------------------------------------- ________________ When parents could not prevail upon Atimuktakumăra by various reasons and arguments, they spoke-Son ! We desire to see your royal splendour may be for even one day i.e., we want to coronate you. Then Atimuktakumāra remained silent at the words of his parents. Then his anointment ceremony was celebrated like Mahābala. Then he accepted consecration in presence of Bhagawāna Mahāvīra, studied Sāmāyika etc., eleven holy scriptures (angas), practised sage conduct for many years and observed Gunaratna Samvatsara austerity until he was beatified on Vipulagiri. विवेचन अतिमुक्त कुमार के जीवन संबंधी अंतगडसूत्र के इस वर्णन के अतिरिक्त भगवती सूत्र के पांचवें शतक, चतुर्थ उद्देशक में मुनि अतिमुक्त के जीवन की एक घटना का बड़ा सुन्दर विवेचन मिलता है । यहां आवश्यक होने से मूल पाठ का भावानुवाद दिया जा रहा है-- श्रमण भगवान महावीर स्वामी के शिष्य अतिमुक्त कुमार नाम के श्रमण थे । वे प्रकृति से भद्र और विनीत थे । वे अतिमुक्त कुमार श्रमण किसी दिन महावर्षा बरसने पर अपना रजोहरण तथा पात्र लेकर बाहर स्थंडिल हेतु (शौच निवृत्ति के लिए) गये । जाते हुए अतिमुक्त कुमार श्रमण ने मार्ग में बहते हुए पानी के एक छोटे नाले को देखा । देखकर उन्होंने उस नाले की मिट्टी की पाल बांधी । इसके बाद जिस प्रकार नाविक अपनी नाव को पानी में छोड़ता है, उसी तरह उन्होंने भी अपने पात्र को उस पानी में छोड़ा और “यह मेरी नाव है, यह मेरी नाव है"-ऐसा कहकर पात्र को पानी में तिराते हुए क्रीडा करने लगे । अतिमुक्त कुमार श्रमण को ऐसा करते हुए देखकर स्थविर मुनि उन्हें कहे बिना ही चले आए और श्रमण भगवान महावीर स्वामी से उन्होंने पूछा भगवन् ! आपका शिष्य अतिमुक्त कुमार श्रमण कितने भव करने के बाद सिद्ध होगा ? यावत् सब दुःखों का अन्त करेगा ? श्रमण भगवान महावीर स्वामी उन स्थविर मुनियों को सम्बोधित करके कहने लगे-हे आर्यो ! प्रकृति से भद्र यावत् प्रकृति से विनीत मेरा अंतेवासी अतिमुक्त कुमार, इसी भव में सिद्ध होगा यावत् सभी दु:खों का अन्त करेगा । अतः हे आर्यो ! तुम अतिमुक्त श्रमण की हीलना, निन्दा, खिंसना, गर्दा और अपमान मत करो । किन्तु तुम अग्लान भाव से अतिमुक्त कुमार श्रमण को ग्रहण करो, उसकी सहायता करो और आहार पानी के द्वारा विनयपूर्वक वैयावृत्य करो । अतिमुक्त कुमार श्रमण चरमशरीरी है और इसी भव में सब कर्मों का क्षय करने वाला है । १५याँ अध्ययन • २२५. Page #315 -------------------------------------------------------------------------- ________________ श्रमण भगवान महावीर स्वामी द्वारा यह वृत्तान्त सुनकर उन स्थविर मुनियों ने श्रमण भगवान महावीर स्वामी को वन्दना नमस्कार किया । फिर वे स्थविर मुनि अतिमुक्त कुमार श्रमण को अग्लान भाव से स्वीकार कर यावत् उनकी वैयावृत्य करने लगे । Elucidation Besides this life sketch of Atimuktakumāra as related in Antakṛddasā Sutra, we also find one event in Bhagavati Sutra (5/4). Being interesting, necessary and important we are giving here the transliteration of original text of that episode. Disciple of Śramana Bhagawāna Mahāvīra, was sage Atimuktakumāra. He was gentle and humble by nature. Once it rained cats and dogs. As rain stopped. Atimuktakumāra went for discharging stool and urine in an open land taking his holy broom and utensil with him. ( भगवती सूत्र ५ / ४ ) पन्द्रहवां अध्ययन समाप्त In the way he saw a small rivulet full of water. First of all he made the fence of clay to stop the flow of water. After that as the sailor moves his boat in water of a river, in the same way he placed his utensil on the water of that small rivulet and began to float that utensil, uttering-this is my boat, this is my boat.” Thus sage Atimuktakumāra began to play. Seeing sage Atimuktakumāra thus playing, the aged sages, speaking nothing to him, directly approached Śramana Bhagawana Mahavira and bowing down and worshipping him, asked Bhagawan! After how many births will your disciple sage Atimuktakumāra attain salvation? Bhagawana told-My disciple sage Atimuktakumara will attain liberation in this very life span and end all miseries. It is his last physical body. Therefore you must not regret, abuse and disgrace him, but serve him with decorum, help him and give assistance in food etc., Atimuktakumára is going to exhaust his all karmas and attain salvation in this very life span. Hearing all this, those aged sages bowed down and worshipped Bhagawāna and then began to look after sage Atimuktakumāra. २२६ • (-Bhagavati Sūtra 5/4) [Fifteenth Chapter concluded] अन्तकृदशा सूत्र : षष्ठम वर्ग For Private Personal Use Only Page #316 -------------------------------------------------------------------------- ________________ सोलहवां अध्ययन सूत्र ४0 : उक्खेवओ सोलसमस्स अज्झयणस्स । एवं खलु जंबू ! तेणं कालेणं तेणं समएणं वाणारसीए णयरीए काममहावणे चेइए । तत्थ णं वाणारसीए अलक्खे णाम राया होत्था । तेणं कालेणं तेणं समएणं समणे भगवं महावीरे जाव विहरइ । परिसा णिग्गया। तए णं अलक्खे राया इमीसे कहाए लट्टे समाणे हट्टतुटु जहा कूणिए जाव पज्जुवासइ, धम्मकहा । तए णं से अलक्खे राया समणस्स भगवओ महावीरस्स अंतिए जहा उदायणे तहा णिक्खंते, णवरं जेटुं पुत्तं रज्जे अहिसिंचइ, एक्कारस अंगाई ; बहुवासा परियाओ ; जाव विपुले सिद्धे ।। एवं खलु जंबू ! समणेणं जाव छ?मस्स बग्गस्स अयमढे पण्णत्ते । (इति छट्ठो वग्गो) सूत्र ४0 : आर्य जम्बू ने कहा-हे भगवन ! पन्द्रहवें अध्ययन का भाव मैंने सुना । अव सोलहवें अध्ययन में प्रभु ने क्या अर्थ कहा है ? कृपा कर वताइये । श्री सुधर्मा स्वामी कहते हैं-हे जम्बू ! उस काल, उस समय में वाराणसी नगरी में काम महावन नामक उद्यान था । उस वाराणसी नगरी में अलक्ष नाम का राजा था । उस काल उस समय में श्रमण भगवान महावीर प्रभु उस उद्यान में पधारे । जन परिषद प्रभु-वन्दन को निकली । राजा अलक्ष भी प्रभु महावीर के पधारने की बात सुनकर बहुत प्रसन्न हुआ, और कोणिक राजा के समान वह भी प्रभु महावीर की सेवा में उपासना करने लगा। प्रभु ने धर्म कथा कही । १६वाँ अध्ययन . २२७. Page #317 -------------------------------------------------------------------------- ________________ तब अलक्ष राजा ने श्रमण भगवान महावीर के पास उदायन की तरह श्रमण दीक्षा ग्रहण की । विशेष बात यह रही कि उन्होंने अपने ज्येष्ठ पुत्र को राज्य सिंहासन पर बिठाया । ग्यारह अंगों का अध्ययन किया, बहुत वर्षों तक श्रमण चारित्र का पालन किया, अन्त में विपुलगिरि पर जाकर सिद्ध हुए। (छठ्ठा वर्ग समाप्त) Chapter 16 Maxim 40 : Arya Jambu said-Bhagawan ! I have heard the subject matter of fifteenth chapter. What has Bhagawāna described in sixteenth chapter ? Kindly tell me. Sudharmā Swāmi began to narrate-At that time and at that period, there was a Kāma Mahāvana garden in Varanasi city. Alaksa was the king of Varanasi. At that time and at that period, śramaņa Bhagawāna Mahāvīra arrived at that garden. Public congregation went out for bowing down to Bhagawāna. King Alaksa also became glad as he heard that Bhagawāna Mahāvīra had come and like king Konika he also began to serve and worship Bhagawāna Mahāvīra. Bhagawāna delivered religious discourse. Then like Udāyana, king Alakṣa accepted sage consecration, in presence of Sramaņa Bhagawāna Mahāvīra. Excepting; he coronated his eldest son. Alakșa studied eleven holy scriptures (angas). practised sage conduct for many years and in the end he attained salvation on Vipulagiri. • २२८ . अन्तकृद्दशा सूत्र : षष्टम वर्ग Page #318 -------------------------------------------------------------------------- ________________ विवेचन जहा कूणिए-कूणिक राजा के समान भगवान का दर्शन करने आया यह विस्तृत वर्णन औपपातिक सूत्र में है । विस्तार अन्तकृद्दशा महिमा में देखें । जहा उदायणे - जैसे वीतभय नगरी का राजा उदायन भगवान के पास दीक्षित हुआ। इसी प्रकार | राजा उदायन का वर्णन भगवती सूत्र शतक १३, उद्देशक ७ में आया है । ( देखें - अन्तकृद्ददशा महिमा ।) Elucidation 1 Jahā Kūnie-Came to see Bhagawāna like king Konika. The detailed description of this can be got in Aupapātika Sūtra. Readers are requested to read Antakṛddaśā Mahima for detailed study of this subject. 2. Jahā Udāyane - as Udāyana, king of Vitabhaya Pātand was consecrated in presence of Bhagawāna Mahāvīra in the same way............ Description of king Udayana can be got in Bhagavati Sūtra Sataka 13 uddeśaka 4. For detailed study see Antakṛddaśā Mahimā. १६ वाँ अध्ययन 馬 For Private [Chapter sixteenth concluded] (Section 6 Completed) Personal Use Only २२९• Page #319 -------------------------------------------------------------------------- ________________ सातवां वर्ग सूत्र १: जइ णं भंते ! सत्तमस्स वग्गस्स उक्वेवओ जाव तेरस अज्झयणा पण्णत्ता । तं जहा नंदा तहा नंदवई,२ नंदोत्तर नंदसेणिया' चेव । मरुया सुमरुया६ महमरुया, मरुद्देवा य अट्ठमा ॥१॥ । भद्दा य सुभद्दा 0 य, सुजाया'१ सुमणाइया१२ । भूयदिण्णा य बोद्धव्या, सेणिय-भज्जाण णामाई ॥२॥ सूत्र १ : श्री जम्बू स्वामी वोले हे भगवन् ! छठे वर्ग का भाव मैंने सुना। अव सातवें वर्ग का प्रभु ने क्या अर्थ कहा है ? आप मुझे बताने की कृपा करें । श्री सुधर्मा स्वामी सातवें वर्ग के तेरह अध्ययन कहे गये हैं, जो इस प्रकार हैं १. नन्दा, २. नन्दवती. ३. नन्दोत्तरा, ४. नन्दश्रेणिका, ५. मरुता. ६. सुमरुता, ७. महामरुता, ८. मरुद्देवा, ९. भद्रा, १0. सुभद्रा, ११, सुजाता, १२, सुमनायिका, १३. भूतदत्ता । ये सब राजा श्रेणिक की रानियां थीं । | SEVENTH SECTION Maxim 1 : Jambu Swāmī said-Bhagawan ! I have heard attentively the subject matter of sixth section. What has Bhagawāna said in Seventh Section; Kindly tell me. .२३० . अन्तकृद्दशा सूत्र : सप्तम वर्ग Page #320 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Sudharmā Swāmī told-O Janbū ! Bhaguwāna has narrated thirteen chapters in seventh section. Names of these are1. Nandä 2. Nandaati 3. Nandottarā, 4. Nandaśrenikā, 5. Marutā Ó. Sunarutā 7. Mahämarutā 8. Maruddevā, 9. Bhadrā, 10. Subhadrā, 11. Sujātā, 12. Sumanāyika and 13. Bhūtadattă. All these were the queens of king Śrenika. सूत्र २ : जइ णं भंते ! सत्तमस्स वग्गस्स तेरस अज्झयणा पण्णत्ता, पढमस्स णं भंते ! अज्झयणस्स समणेणं जाव संपत्तेणं के अटे पण्णत्ते ? एवं खलु जंबू ! तेणं कालेणं तेणं समएणं रायगिहे णयरे, गुणसिलए चेइए, सेणिए राया, वण्णओ । तस्स णं सेणियस्स रण्णो णंदा णामं देवी होत्था, वण्णओ । सामी समोसढे । परिसा णिग्गया । तए णं सा गंदा देवी इमीसे कहाए लद्धट्ठा समाणी जाव हट्टतुट्ठा कोडुंबियपुरिसे सद्दावेइ । सद्दावित्ता जाणं दुरूहइ ; जहा पउमावई । जाव एक्कारस अंगाइं अहिज्जित्ता बीसं वासाइं परियाओ जाव सिद्धा । एवं तेरस वि णंदागमेण णेयव्याओ । णिक्खेवओ। (इति सत्तमो वग्गो) सूत्र २ हे भगवन् ! प्रभु ने सातवें वर्ग के तेरह अध्ययन कहे हैं, तो प्रथम अध्ययन का श्रमण भगवान महावीर ने यावत् मुक्ति प्राप्त प्रभु ने क्या अर्थ फरमाया १-१३ अध्ययन .२३१ . Page #321 -------------------------------------------------------------------------- ________________ श्री सुधर्मा स्वामी ने कहा-हे जम्बू ! उस काल उस समय में राजगृह नाम का नगर था । उसके बाहर गुणशीलक नाम का उद्यान था । वहां श्रेणिक नाम के राजा राज्य करते थे । उस श्रेणिक राजा की नंदा नाम की रानी थी, जो वर्णन करने योग्य थी । प्रभु महावीर राजगृह नगर के उद्यान में पधारे । जन परिषद वंदन करने को गयी । उस समय नन्दा देवी भगवान के आगमन की खबर सुनकर बहुत प्रसन्न हुई और उसने आज्ञाकारी सेवकों को बुलाकर धार्मिक रथ लाने की आज्ञा दी । पद्मावती की तरह इसने भी दीक्षा ली यावत् ग्यारह अंगों का अध्ययन किया । बीस वर्ष तक श्रमण पर्याय का पालन किया, यावत् अन्त में सिद्ध हुई । इसी प्रकार नन्दवती आदि के सभी अध्ययन नंदा के समान हैं । यह निक्षेपक है-समान वर्णन समझना चाहिए । इस प्रकार हे जम्बू ! भगवान् ने सातवें वर्ग का यह भाव फरमाया है | (कथा अनुसार यह नन्दा रानी अभयकुमार की माता थी।) (सातवां वर्ग समाप्त) Maxim 2 : Jambū Swāmī said, Bhagawan ! If Bhagawāna mentioned thirteen chapters in seventh section then what was the subject matter of first chapter as described by Bhagawāna Mahāvīra. Sudharma Swami told-O Jambu ! At that time and at that period there was a city named Rājagrha. At the outskirt of that city was Guņaśīlaka garden. King Srenika ruled there. Nanda was the queen of king Srenika. She was describable. Lord Mahāvīra came and stayed at the garden. Public congregation went to bow down to him. .२३२. अन्तकृद्दशा सूत्र : सप्तम वर्ग Page #322 -------------------------------------------------------------------------- ________________ At that time Nandā became very happy on, hearing the news that Bhagawāna was staying in the garden. She called the chamberlains and ordered them to bring religious chariot. She also accepted consecration, like Padmavati, studied eleven holy scriptures (angas), practised sagehood for twenty years, and in the end became emancipated. Like this are the remaining twelve chapters Nandavati and others. They should be considered similar in description. Thus, O Jambū ! Bhagawāna expressed the subject matter of Seventh Section, (According to recital queen Nandā was the mother of Abhayakumāra.) [Seventh Section Completed] १-१३अध्ययन 233 Page #323 -------------------------------------------------------------------------- ________________ अष्टम वर्ग सूत्र १: जइ णं भंते ! समणेणं जाव संपत्तेणं अट्ठमस्स अंगस्स अंतगडदसाणं सत्तमस्स वग्गस्स अयमढे पण्णत्ते । अट्ठमस्स णं भंते ! वग्गस्स अंतगडदसाणं समणेणं जाव संपत्तेणं के अढे पण्णत्ते ? एवं खलु जंबू ! समणेणं जाव संपत्तेणं अट्ठमस्स वग्गस्स दस अज्झयणा पण्णत्ता । तं जहाकाली,सुकाली, महाकाली, कण्हा, सुकण्हा,५ महाकण्हा । वीरकण्हा य बोद्धव्या, रामकण्हा तहेव य ॥ पिउसेणकण्हा णवमी, दसमी महासेणकण्हा0 य । जइ णं भंते ! अट्ठमस्स वग्गस्स दस अज्झयणा पण्णत्ता, पढमस्स णं भंते ! अज्झयणस्स समणेणं जाव संपत्तेणं के अद्वे पण्णत्ते ? सूत्र १ : श्री जम्बू स्वामी ने पूछा-हे भगवन् ! श्रमण भगवान महावीर स्वामी ने सातवें वर्ग के जो भाव फरमाये, वे आपके श्रीमुख से मैंने सुने । कृपापूर्वक कहिये कि आठवें वर्ग में प्रभु ने किन भावों का प्रतिपादन किया है ? सुधर्मा स्वामी-हे जम्बू ! आठवें वर्ग में श्रमण भगवान महावीर स्वामी ने दस अध्ययन फरमाये हैं१. काली २. सुकाली, ३. महाकाली, ४. कृष्णा, ५, सुकृष्णा, ६. महाकृष्णा, ७. वीरकृष्णा, ८. रामकृष्णा, ९, पितृसेनकृष्णा, और १०. महासेनकृष्णा । जम्बू स्वामी ने पूछा-हे भगवन् ! भगवान ने आठवें वर्ग के दस अध्ययन फरमाये हैं, तो प्रथम अध्ययन के क्या भाव परमाये हैं ? कृपाकर बताइए । अन्तकृद्दशा सूत्र : अष्टम वर्ग . २३४. Page #324 -------------------------------------------------------------------------- ________________ | EIGHTH SECTION Maxim 1: Sri Jambu Swami asked-O Bhagawan ! I have heard from you the subject matter of seventh section as described by Srainaņa Bhagawāna Mahāvīra. Now please tell the subject matter as expressed by Bhagawāna in eighth section. Sri Sudharma Swami told-OJambit ! In eighth section Sramana Bhagawāna Mahāvīra described ten chapters. Names of these are1. Kālī, 2. Sukāli, 3. Mahākāli, 4. Krsnā, 5. Sukrsnā 6. Mahākrsņā, 7. Virakrsņā 8. Rāmakrsnā, 9. Pitr senaky sna and 10. Mahasenakr sna. Jambú Swāmi asked-If Bhagawāna described ten chapters in eighth section then what had he told in first chapter ? Kindly tell me. प्रथम अध्ययन सूत्र २ : एवं खलु जंबू ! तेणं कालेणं तेणं समएणं चंपा णामं णयरी होत्था, पुण्णभद्दे चेइए। तत्थ णं चम्पाए णयरीए कोणिए राया वण्णओ। तत्थ णं चंपाए नयरीए सेणियस्स रण्णो भज्जा; कोणियस्स रण्णो चुल्लमाउया काली णामं देवी होत्था, वण्णओ। जहा गंदा सामाइयमाइयाई एक्कारसअंगाई अहिज्जइ, बहूहिं चउत्थ छट्ठट्ठमेहिं जाव अप्पाणं भावेमाणे विहरइ । सूत्र २ : श्री सुधर्मा स्वामी ने कहा-उस काल, उस समय में चम्पा नामक नगरी थी, पूर्णभद्र नामक यक्षायतन था । कोणिक राजा का शासन चल रहा प्रथम अध्ययन .२३५ . Page #325 -------------------------------------------------------------------------- ________________ था । श्रेणिक महाराज की भार्या एवं कोणिक महाराज की छोटी माता काली नामक रानी थी । नन्दा के समान उसने दीक्षा ग्रहण की । सामायिक आदि (छह आवश्यकों के साथ) ग्यारह अंगों का अध्ययन किया एवं उपवास, बेला, तेला आदि विविध तपस्याओं से आत्मा को भावित करती हुई विचरने लगी । Chapter 1 Maxim 2: Sudharmā Swāmī told-O Jambū ! At that time and at that period, there was a city named Campā, a sanctuary of Pūrṇabhadra deity, King Konika was ruling. There was a queen named Kāli, consort of king Śreņika and younger step mother of king Koņika. She accepted consecration, like queen Nandā. She studied Sāmāyika (containing six necessary section) etc., eleven holy scriptures (angas) and began to wander engrossing her soul with one day fast, two days' fast, three days' fast, etc. and various types of penances. विवेचन नन्दा रानी आदि के वर्णन में राजगृह नगरी तथा राजा श्रेणिक का उल्लेख है और यहां पर चम्पा नगरी तथा कोणिक राजा का । इससे पता चलता है कि काली आदि का यह वर्णन राजा श्रेणिक के देहावसान के पश्चात् पितृ-शोकग्रस्त राजा कोणिक ने राजगृह को छोड़कर चम्पानगरी को अपनी राजधानी बनाई, उसके बाद का है । काली आदि दसों रानियों को वैराग्य उत्पन्न होने के पीछे जो घटना घटी, वह निरयावलिका सूत्रानुसार इस प्रकार है मगधेश्वर श्रेणिक ने अपने जीवन काल में, चेलना के लघु पुत्र हल्ल और विहल्ल कुमार को देवनामी हार और सिंचानक हाथी उपहार के रूप में दिये थे । वे कुमार अपने अन्तःपुर के साथ इन अन्तकृदशा सूत्र : अष्टम वर्ग Page #326 -------------------------------------------------------------------------- ________________ दोनों वस्तुओं का उपभोग करते हुए आनन्द से रह रहे थे । चम्पा के निवासी उनके सुखी जीवन, तथा हार और हाथी के उपभोग की प्रशंसा करते रहते थे कि 'हल्ल, विहल्नकुमार वास्तव में राज्य लक्ष्मी का सुख भोग रहे हैं । राजा कोणिक तो सिर्फ राज्य का भार ढोता है, कोणिक की पटरानी पद्मावती ने जनता की वात को सुनकर महाराज कोणिक से निवेदन किया- ये दोनों वस्तुएँ हार व हाथी तो राजचिन्ह हैं अतः आपको शोभा देती हैं ।' कोणिक ने उत्तर दिया-'पिताजी ने ये मेरे छोटे भाइयों को उपहार रूप में दी हैं, ये उनसे मांगना उचित नहीं है ।' परन्तु पटरानी के अति आग्रह से राजा कोणिक ने विवश होकर हल्ल विहल्ल कुमार को इन दोनों वस्तुओं को लौटाने के लिये आज्ञा दे दी। हल्न-विहल्लकुमार ने नम्रता से उत्तर दिया कि-बंधु ! अगर आप इनके बदले हमको राज्य का एक भाग देवें तो हम इनको आपको दे सकते हैं । राजा कोणिक ने राज्य का बंटवारा करने से इंकार कर दिया, और बलपूर्वक हार-हाथी लेना चाहा । हल्ल-विहल्लकुमार को कोणिक के विचारों का पता चल गया । तव वे अपने परिवार, सेना, कोष, हार और हाथी सहित चुपचाप अपने नाना चेटक राजा के पास चले गये । कोणिक को हल्ल-विहल्लकुमार के चुपचाप चम्पा से चले जाने की वार्ता ज्ञात होने पर बहुत कोध आया । उसने अपने नाना राजा चेटक को हार, हाथी सहित हल्न विहल्लकुमार को लौटाने के लिये सन्देश भेजा । चेटक राजा न्याय का पक्षधर था, उसने जवाब दिया कि वे उसकी बात तव मानने को सहमत हैं, जव वह हल्ल-विहल्लकुमार को अपना आधा राज्य दे देवें । इस शर्त को अमान्य करके राजा कोणिक ने चेटक राजा की नगरी वैशाली पर आक्रमण कर दिया । कोणिक नृप के साथ उसके दस विमाता-पुत्र भाई कालिकुमार आदि सेनापति के रूप में युद्ध के मैदान में आये । भयंकर नर-संहार हुआ । वे दसों सेनापति चेटक राजा के वाणों से काल के ग्रास हो गये । इस बीच भगवान महावीर का चम्पानगरी.में समवशरण हुआ । काली आदि दसों ही महारानियों ने भगवान से पूछा-वे अपने पुत्रों का युद्ध से लौटने पर मुँह देख सकेंगी या नहीं ? प्रभु ने उनके युद्ध में काम आने की बात बताई । इस पर वे सभी दसों रानियां संसार की असारता को समझकर विरक्त हुईं और दीक्षित हो गई । Elucidation In the description of queen Nandă etc., the names of king Srenika and Rājagrha city are given and here Campă city and king Konika are referred. It प्रथम अध्ययन . २३७ . Page #327 -------------------------------------------------------------------------- ________________ clearly shows that this description of queen Käli etc., is after the death of king Śrenika. Being in sorrow at the death of his father Srenika, King Komika left Rajagrha and made Campů his capital. So these episodes of queens Kāli etc., happened after the death of king Sreņika. The event which excited the apathy of Käli etc., according to Nirayavaliku Sūtra, is as follows Monarch of Magadha, King Śrenika, in his life time, had given two valuab.e things as gift-1. Necklace given by god (Deranāmi hāra) and 2. elepha.. Sincanaka or Secaraka, to the two younger sons, named Halla and Vihalla born of queen Celanū. Both princes, enjoining these things, with their harems, were living in pleasure. The inhabitants of Campă city used to praise their happy life, necklace and elephant, saying that-verily Halla and Vihalla Kumāras are enjoying the royality (rājya-lakṣmi), king Konika is only bearing the burden of kingdom. Padmavati, the chief queen of Konika heard these views of public then she requested her husband king Koņiku-Necklace and elephant-boti are the signs of kingdom, therefore, these are for you only. Konika replied-My father had given these two valuable things-Necklace and elephant-to my younger brothers, so it is not proper to ask these things from them. But chief queen Padmavati insisted then under compulsion, Koniku ordered his younger brothers to return that necklace and elephant. Princes Halla and Vihalla gave a polite answer-Elder brother ! If you want to take these things, then please give us a part of kingdom. Koņika denied the division of kingdom, and tried to take Necklace and elephant by force. Halla-Vihalla knew the scheme of Konika. Then they stealthily ran away to their maternal grandfather king Cetuka taking with them all their army, treasure, seraglio, necklace and elephant. When Konika came to know that Halla-Vihalla had stealthily run away from Campā city then he was filled with wrath. He had sent message to his maternal grand father to send back princes Halla-Vihalla with divine necklace and Sincanaka elephant. Cetaka was a just man. He replied that if Konika gives half of his kingdom to princes Halla and Vihalla then he could accept the proposal. Denying this proposed Koņika attacked Vaisali capital city of Cetaka. With king Konika his ten step brothers Kālikumāra etc., came as army-commanders in battle field. Millions of men were killed these ten brothers were killed by the arrows of Cetaka. R3C . अन्तकृददशा सूत्र : अष्टम वर्ग Page #328 -------------------------------------------------------------------------- ________________ During this period Bhagawana arrived at Campú city. All the queens Kāli and others asked Bhagawana-Can we see the faces of our sons, when they return from battle field or not? The Lord told that their sons had died in war. Hearing this all the ten queens thought that life is momentary, so disinclined to world, became consecrated. सूत्र ३ : तए णं सा काली अज्जा अण्णया कयाई जेणेव अन्जचंदणा अज्जा तेणेव उवागया; उवागच्छित्ता एवं वयासी-इच्छामि णं अज्जाओ ! तुडभेहि अब्भनुण्णाया समाणी रयणावलिं तवोकम्मं उवसंपज्जित्ताणं विहरित्तए । "अहासुहं देवाणुप्पिया ! मा पडिबंधं करेह ।" तए णं सा काली अज्जा अज्जचंदणाए अब्भनुण्णाया समाणी रयणावलिं तवोकम्मं उवसंपज्जित्ता णं विहरइ । काली आर्या का रत्नावली तप एक बार काली आर्या ने आर्या चन्दनबाला के पास आकर वंदना नमस्कार करके इस प्रकार निवेदन कियाहे आर्ये ! आपकी आज्ञा प्राप्त होने पर मैं रत्नावली नामक तप को अंगीकार करके विचरना चाहती हूँ । साध्वी प्रमुखा चन्दनवालाजी ने अनुज्ञा प्रदान करते हुए कहा-देवानुप्रिये ! जैसा सुख हो वैसा करो, विलम्ब मत करो । तब आज्ञा प्राप्त कर आर्या काली ने रत्नावली नामक तप विशेष की इस प्रकार आराधना कीRatnávali Penance of Āryā Kāli Maxim 3 : Once Arya Kälī approached Āryā Candanabālā, Bowing down and worshipping her, she requested-O Ārve ! I intend to accept Ratnāvali penance, if you permit me. प्रथम अध्ययन .२३९ . Page #329 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Chief nun Candanabālā permitting Āryā Kāli said-O beloved as gods ! Do as you please; but do not make any delay in auspicious deeds. Getting permission Āryā Kali propiliated Ratnāvali penance in this wayसूत्र ४ : तं जहाचउत्थं करेइ, करित्ता सबकामगुणियं पारेइ, पारित्ता छटुं करेइ, करित्ता सव्यकामगुणियं पारेइ, पारित्ता अट्ठमं करेइ, करित्ता सव्वकामगुणियं पारेइ, पारित्ता अट्ठछट्ठाई करेइ, करित्ता सव्वकामगुणियं पारेइ, पारित्ता, चउत्थं करेइ करित्ता सव्वकामगुणियं पारेइ, पारित्ता छटुं करेइ, करित्ता सव्वकामगुणियं पारेइ, पारित्ता, अट्ठमं करेइ, करित्ता सव्वकामगुणियं पारेइ, पारित्ता दसमं करेइ, करित्ता सव्वकामगुणियं पारेइ, पारित्ता दुवालसमं करेइ, करित्ता सव्वकामगुणियं पारेइ, पारित्ता चोद्दसमं करेइ, करित्ता सव्वकामगुणियं पारेइ, पारित्ता सोलसमं करेइ, करित्ता सव्वकामगुणियं पारेइ, पारित्ता अट्ठारसमं करेइ, करित्ता सबकामगुणियं पारेइ, पारित्ता वीसइमं करेइ, करित्ता सव्वकामगुणियं पारेइ, पारित्ता बावीसइमं करेइ, करित्ता सव्यकामुणियं पारेइ, पारित्ता चउवीसइमं करेइ, करित्ता सव्वकामगुणियं पारेइ, पारित्ता छब्बीसइमं करेइ, करित्ता सव्वकामगुणियं पारेइ, .२४०. अन्तकृद्दशा सूत्र : अष्टम वर्ग Page #330 -------------------------------------------------------------------------- ________________ पारित्ता अट्ठावीसइमं करेइ, करित्ता सव्वकामगुणियं पारेइ, पारित्ता तीसइमं करेइ करित्ता सव्वकामगुणियं पारेइ, पारित्ता बत्तीसइमं करेइ, करित्ता सव्वकामगुणियं पारेइ, पारित्ता चोत्तीसइमं करेइ, करित्ता सव्वकामगुणियं पारेइ, पारित्ता चोत्तीसं छट्ठाई करेइ, करित्ता सव्वकामगुणियं पारेइ, पारित्ता चोत्तीसइमं करेइ, करित्ता सव्यकामगुणियं पारेइ, पारित्ता बत्तीसइमं करेइ, करित्ता सव्यकामगुणियं पारेइ, पारित्ता तीसइमं करेइ, करित्ता सव्वकामगुणियं पारेइ, पारित्ता अट्ठावीसइमं करेइ, करित्ता सव्यकामगुणियं पारेइ, पारित्ता छब्बीसइमं करेइ, करित्ता सव्वकामगुणियं पारेइ, पारित्ता चउवीसइमं करेइ, करित्ता सबकामगुणियं पारेइ, पारित्ता बाबीसइमं करेइ, करित्ता सव्वकामगुणियं पारेइ, पारित्ता वीसइमं करेइ, करित्ता सव्वकामगुणियं पारेइ, पारित्ता अट्ठारसमं करेइ, करित्ता सव्यकामगुणियं पारेइ, पारित्ता सोलसमं करेइ, करित्ता सव्वकामगुणियं पारेइ, पारित्ता चोद्दसमं करेइ, करित्ता सव्वकामगुणियं पारेइ, पारित्ता बारसमं करेइ, करित्ता सव्वकामगुणियं पारेइ, पारित्ता दसमं करेइ, करित्ता सव्वकामगुणियं पारेइ, पारित्ता अट्ठमं करेइ करित्ता सबकामगुणियं पारेइ, पारित्ता छटुं करेइ, करित्ता सव्वकामगुणियं पारेइ, पारित्ता चउत्थं करेइ, करित्ता सव्वकामगुणियं पारेइ, प्रथम अध्ययन २४१. Page #331 -------------------------------------------------------------------------- ________________ पारित्ता अछट्टाई करेइ, करित्ता सव्वकामगुणियं पारेइ पारित्ता अमं करेइ, करित्ता सव्वकामगुणियं पारेइ, पारित्ता छुट्ट करेइ, करित्ता सव्वकामगुणियं पारेइ, पारित्ता चउत्थं करेइ, करित्ता सव्वकामगुणियं पारेइ । एवं खलु सारयणावलीए तवोकम्मस्स पढमा परिवाडी, एगेणं संवच्छरेणं तिहिं मासेहिं बावीसाए य अहोरत्तेहिं अहासुतं जाव आराहिया भवइ । सूत्र ४ : उपवास (चतुर्थ भक्त) किया, करके सर्वकाम गुणयुक्त (विगय सहित) पारणा किया । पारणा करके, बेला (षष्ठ भक्त) किया, फिर पारणा किया । पारणा करके तेला (अष्टम भक्त) किया, फिर पारणा किया । पारणा करके, आठ बेले किये, फिर पारणा किया । पारणा करके, उपवास किया, फिर पारणा किया । पारणा करके, बेला किया, फिर पारणा किया । पारणा करके तेला किया, फिर पारणा किया । पारणा करके, (दशम) चोला किया, फिर पारणा किया । पारणा करके ( द्वादशम) पंचोला किया, फिर पारणा किया । पारणा करके, छह दिन का उपवास ( चतुर्दश भक्त) किये, फिर पारणा किया । पारणा करके सात दिन का उपवास किया फिर पारणा किया । पारणा करके, आठ उपवास किये, फिर पारणा किया । पारणा करके, नव उपवास किये, फिर पारणा किया । पारणा करके, दश उपवास किये, पुनः पारणा किया । पारणा करके, ग्यारह उपवास किये, पुनः पारणा किया । पारणा करके, वारह उपवास किये, पुनः पारणा किया । पारणा करके, तेरह उपवास किये, पुनः पारणा किया । पारणा करके, चौदह उपवास किये, पुनः पारणा किया । पारणा करके, पन्द्रह उपवास किये, पुनः पारणा किया | पारणा करके, सोलह दिन का उपवास किया. ( चौंतीस भक्त) पुनः पारणा किया । पारणा करके चौंतीस बेले किये, फिर पारणां किया ! पारणा करके पुनः सोलह दिन का उपवास (चौंतीस भक्त) किये, पुनः पारणा किया । पारणा करके, पन्द्रह उपवास किये, फिर पारणा किया । पारणा करके चौदह उपवास किये, पारणा किया । पारणा करके अन्तकृद्दशा सूत्र : अष्टम वर्ग २४२ Page #332 -------------------------------------------------------------------------- ________________ तेरह उपवास किये, फिर पारणा किया । पारणा करके, वारह उपवास किये, फिर पारणा किया । पारणा करके, ग्यारह उपवास किये, फिर पारणा किया । पारणा करके, दस उपवास किये, फिर पारणा किया । पारणा करके, नव उपवास किये, फिर पारणा किया । पारणा करके, आठ उपवास किये, फिर पारणा किया । पारणा करके, सात उपवास किये, फिर पारणा किया । पारणा करके छह उपवास किये, फिर पारणा किया । पारणा करके, पंचोला किया, फिर पारणा किया । पारणा करके, चोला किया, पारणा किया, करके, तेला किया, फिर पारणा किया । पारणा करके बेला किया फिर पारणा किया । पारणा करके, उपवास किया, फिर पारणा किया । करके आठ बेले किये, फिर पारणा किया । पारणा करके तेला किया, फिर पारणा किया, करके बेला किया, फिर पारणा किया । पारणा करके, उपवास किया, और पश्चात् सर्वकाम गुणयुक्त पारणा किया । इस प्रकार काली आर्या ने रत्नावली तप की एक परिपाटी (लड़ी) की आराधना की । रत्नावली तप की यह एक परिपाटी एक वर्ष, तीन महीने और बाईस दिन में पूर्ण होती है । (इस परिपाटी में तीन सौ चौरासी दिन तपस्या के और अट्ठासी दिन पारणा के होते हैं । इस प्रकार कुल चार सौ वहत्तर दिन होते हैं ।) Maxim 4: She fasted upto four meals i.e. one day fast; broke it with all kinds of meals (with hutter sweets etc..); then iwo days' fast, broke it and took meal; then three day's fast, took meals: eight two days's fast, took meals; then one day fast, took meals; then two days' fast took meals; three days' fast. took meals; four days' fast. took meals: five davs' fast. took meals: six davs' fast. took meals: seven dars' fast. took meals; eight days' fast, took meals: nine lays' fast. took meals; ten days' fast, took meals; eleven days' fast, took meals, twelve days' fast, took meals; thirteen days' fast, took meals; fourteen days' fast. took meals: fifteen days' fast, took meals: sixteen days' fast, took meals; and प्रथम अध्ययन Page #333 -------------------------------------------------------------------------- ________________ then she practised thirtyfour two days' fast, took meals after each fast and then sixteen days' fast, took meals; fifteen days' fast, took meals: fourteen days' fast, took meals; thirteen days' fast, took meals; twelve days' fast, took meals, eleven days' fast, took meals; ten days' fast, took meals; nine days: fast, took meals; eight days' fast, took meals; seven days' fast, took meals; six days' fast, took meals; five days' fast, took meals; four days' fast, took meals; three days' fast, took meals; two days' fast, took meals, one day fast, took meals; eight two days' fast, took meals; after each fast three days' fast, took meals; two days' fast, took meals; one day fast and then took meals of all the four types according to her desire and need. Thus Āryā Kāli completed one series of Ratnávali penance. This one series of Ratnāvali penance took one year, three months and twentytwo days to complete. In this series there were three hundred eightyfour days of penance and eightyeight days of taking meal. सूत्र ५ : तयाणंतरं च णं दोच्चाए परिवाडिए चउत्थं करेइ, करित्ता विगइवज्जं पारेइ, पारित्ता छटुं करेइ, करित्ता विगइवज्जं पारेइ, एवं जहा पढमाए परिवाडीए तहा बीयाए वि, णवरं सव्वत्थ पारणगए विगइवज्जं पारेइ, जाव आराहिया भवइ । तयाणंतरं च णं तच्चाए परिवाडीए चउत्थं करेइ, करित्ता अलेवाडं पारेइ सेसं तहेव । एवं चउत्था परिवाडी, णवरं सव्वत्थ पारणाए आयंबिलं पारेइ । सेसं तं चेव । .२४४. अन्तकृद्दशा सूत्र : अष्टम वर्ग Page #334 -------------------------------------------------------------------------- ________________ पढमम्मि सव्यकामपारणयं, बीइयए विगइवज्जं । तइयम्मि अलेवाडं, आयंबिलओ चउत्थम्मि ॥ तए णं सा काली अज्जा रयणावलिं तवोकम्मं पंचहिं संवच्छरेहिं दोहिं य मासेहिं अट्ठावीसाए य दिवसेहिं अहासुत्तं जाव आराहित्ता जेणेव अज्जचंदणा अज्जा तेणेव उवागया, उवागच्छित्ता अज्जचंदणं वंदइ, णमंसइ; वंदित्ता, णमंसित्ता बहूहिं चउत्थ छट्ठट्टम दसम-दुवालसेहि तवोकम्मेहि अप्पाणं भावमाणी विहरइ । सूत्र ५ : इसके बाद काली आर्या ने रत्नावली तप की दूसरी परिपाटी प्रारम्भ की । उन्होंने पहले उपवास किया, उपवास का पारणा विगय रहित अर्थात् दूध, दही, घी, तेल और मीठा इन पांचों विगयों को छोड़ते हुए किया । इस प्रकार उपवास का पारणा करके बेला किया, पारणा किया । इस दूसरी परिपाटी के सभी पारणों में पांचों विगयों का त्याग रखा । इस प्रकार पहली परिपाटी के समान ही इस दूसरी परिपाटी का आराधन किया जाता है । विशेषता यही है कि पारणों में विगयों का सेवन वर्जित रहता है । बाकी तपस्या का क्रम एक समान ही है । इसके पश्चात् तीसरी परिपाटी में वह काली आर्या उपवास करती है, और लेप रहित पारणा करती है । शेष पहले के समान है । ऐसे ही काली आर्या ने चौथी परिपाटी की आराधना की । इसमें विशेषता यह है कि पारणे के दिन आयम्बिल करती है। शेष उसी प्रकार है । (देखिए चार्ट नं. २) गाथार्थ-प्रथम परिपाटी में सर्वकामगुणयुक्त एवं दूसरी में विगय रहित पारणा किया । तीसरी में लेप रहित और चौथी परिपाटी में आयंबिल से पारणा किया । इस भांति काली आर्या ने संपूर्ण रत्नावली तप की आराधना की । इसमें पाँच वर्ष दो महीने और अट्ठाईस दिनों का समय लगा । तप आराधन करने के पश्चात् जहाँ आर्या चंदना थी, वहाँ आई और आर्या चन्दना को वन्दन नमस्कार किया । प्रथम अध्ययन .२४५ . Page #335 -------------------------------------------------------------------------- ________________ तदनन्तर बहुत से उपवास, बेले, तेले, चोला, पंचोला आदि तप से अपन आत्मा को भावित करती हुई विचरने लगी । Maxim 5 : After that Āryā Kāli began the second series of Ratnávali penance. She observed one day fast, breaking one day fast penance she took meals devoid of milk, curd, ghee, oil and sweet-vigayas. After that she observed two days' fast and then took meals without all the five vigayas and so on. In this second series she avoided all the five vigayas. Thus second series she observed like first series. Excepting; vigayas were not taken. The order of penance is the same as that of first series. After this Kāli Aryā observed third series of fast. In it took she meals without smearing of vigayas. All else was same as first series. She also practised fourth series. In this on the day she took meals, she practised āyambila penance. Rest is the same. (See Table 2) Meaning of Couplet-In the first series all types of meals according to desire and need. In the second taking meals devoid of vigayas. In the third taking meals even without smearing of vigayas; and in the fourth observing of Ayambila in stead of meal taking. Thus Kālī Aryā propiliated complete Ratnāvali penance. It took five years, two months and twentyeight days to perform. After practising this penance in due order, she came to Aryā Candanā and bowed down and woshipped her. Thereafter Kāli Āryā began to wander engrossed her soul in various kinds of fast penances like-one day, two days', three days’, four days’, five days' etc. LET & : तए णं सा काली अज्जा तेणं ओरालेणं तवोकम्मेणं सुक्का जाव धमणिसंतया जाया यावि होत्था । से जहा णामाए इंगाल सगडी वा जाव • 28€ . अन्तकृद्दशा सूत्र : अष्टम वर्ग Page #336 -------------------------------------------------------------------------- ________________ सुहुय हुयासणे इव भासरासिपलिच्छण्णा तवेणं तेएणं तव तेयसिरीए अई अईव उवसोभेमाणी चिट्ठइ । काली आर्या की अन्तिम साधना सूत्र ६ : इतनी तपस्या करने के बाद काली आर्या उस कठोर घोर तपस्या से सूख गई, मांस सूखकर उसकी नसें प्रत्यक्ष साफ दिखने लगीं । अर्थात् उसके शरीर का रक्त-मांस प्रायः सूख गया, सिर्फ हड्डियों का ढांचा मात्र रह गया । जैसे कोयले से भरी गाड़ी में चलते समय आवाज निकलती है, वैसे उठते-बैठते, चलते-फिरते काली आर्या की हड्डियाँ भी कड़कड़ बोलने लगीं । फिर भी होम की हुई अग्नि के समान एवं भस्म से ढकी हुई आग जैसे भीतर से प्रज्वलित रहती है वैसे तपस्या के तेज की शोभा से आर्या काली का शरीर अत्यन्त शोभायमान हो रहा था । Last Propiliation of Kālī Āryā Maxim 6 : Due to these hard and rigorous penances Kāli Āryā became lean and thin. Her veins became visible clearlymeaning blood and flesh of her body had dried up and her body was reduced to skeleton of bones only. As the cart full of coal makes sound while moving, so was the position of her body. Moving, sitting, standing, her bones made the sound of cracking, i.e., khada-khada still then, as the sacrificial fire, and fire covered by ashes, remains burning inside; so by the flames of penance the body of Arya Kālī was full of lustre. सूत्र ७ : तए णं तीसे कालीए अज्जाए अण्णया कयाई पुव्वरत्तावरत्तकाले अयमज्झथिए । जहा खंदयस्स चिंता जाव अत्थि उट्ठाणे कम्मे, बल वीरिए, पुरिसक्कार- परक्कमे, सद्धा धिई संवेगे वा ताव मे सेयं कल्लं प्रथम अध्ययन For Private Personal Use Only २४७ Page #337 -------------------------------------------------------------------------- ________________ जाव जलंते अज्जचंदणं अज्जं आपुच्छित्ता अज्ज चंदणाए अज्जाए अब्भणुण्णायाए समाणीए संलेहणा झूसणा झूसियाए भत्त-पाणपडियाइक्खियाए कालं अणवकंखमाणीए विहरित्तए त्ति कटु एवं संपेहेइ, संपेहित्ता कल्लं जेणेव अज्जचंदणा अज्जा तेणेव उवागच्छइ, उवागच्छित्ता अज्जचंदणं अजं वंदइ णमंसइ, वंदित्ता णमंसित्ता एवं वयासीइच्छामि णं अज्जाओ ! तुब्भेहिं अब्भणुण्णाया समाणी संलेहणा जाव विहरित्तए । अहा सुहं देवाणुप्पिया ! मा पडिबंधं करेह । तओ काली अज्जा अज्जचंदणाए अज्जाए अब्भणुण्णाया समाणी संलेहणा झूसणा झूसिया जाव विहरइ । सा काली अज्जा अज्जचंदणाए अज्जाए अंतिए सामाइयमाइयाई एक्कारसअंगाई अहिज्जित्ता बहुपडिपुण्णाइं अट्ठ संवच्छराई सामण्णपरियागं पाउणित्ता मासियाए संलेहणाए अप्पाणं झूसित्ता सटुिं भत्ताई अणसणाए छेदित्ता जस्सट्टाए कीरइ णग्गभावे जाव चरिमुस्सासणीसासेहिं सिद्धा । (पढमं अज्झयणं) सूत्र ७: फिर किसी दिन रात्रि के पिछले प्रहर में काली आर्या के हृदय में स्कन्दक मुनि के समान इस प्रकार विचार उत्पन्न हुआ-'इस कठोर तप साधना के कारण मेरा शरीर अत्यन्त कृश हो गया है, तथापि जब तक मेरे इस शरीर में उत्थान (उठने बैठने की शक्ति) कर्म, (संयम क्रियाएं करने की क्षमता) बल, वीर्य (जीवनी शक्ति) और पुरुषाकार (पुरुषार्थ-अदीन भावना) पराक्रम है, मन में श्रद्धा, धैर्य एवं वैराग्य है, तब तक मेरे लिये उचित है कि कल सूर्योदय होने के पश्चात् मैं चन्दना आर्या को पूछकर उनकी आज्ञा प्राप्त होने पर संलेखना झूसणा का सेवन करती हुई भक्तपान का .२४८ . अन्तकृद्दशा सूत्र : अष्टम वर्ग Page #338 -------------------------------------------------------------------------- ________________ त्याग करके मृत्यु को नहीं चाहती हुई अर्थात् जीवन और मरण की इच्छा से रहित निष्काम विचरण करूँ । ऐसा सोचकर वह अगले दिन सूर्योदय होते ही जहाँ आर्या चन्दना थी, वहां आई और आर्या चन्दना को वन्दना नमस्कार कर इस प्रकार बोलीहे आर्ये ! आपकी आज्ञा हो तो मैं संलेखणा-झूसणा करते हुए विचरना चाहती हूँ। आर्या चन्दना ने कहा हे देवानुप्रिये ! जैसा तुम्हे सुख हो, वैसा करो । सत्कार्य साधन में विलम्ब मत करो । तब आर्या चन्दना की आज्ञा पाकर काली आर्या संलेखना-झूसणा करती हुई विचरने लगी। काली आर्या ने आर्या चन्दना के पास सामायिक आदि ग्यारह अंगों का अध्ययन किया था और पूरे आठ वर्ष तक चारित्र धर्म का पालन करके एक मास की संलेखना से आत्मा को झूषित (कर्म रहित, निर्मल बनाकर) कर, साठ भक्त का अनशन पूर्ण कर, जिस हेतु से संयम ग्रहण किया था उसी निर्ममत्व भाव (नग्न भावं) से उसको अन्तिम श्वासोच्छ्वास तक पूर्ण करके वह काली आर्या सिद्ध-बुद्ध और मुक्त हो गई। (प्रथम अध्ययन समाप्त) Maxim 7 : Again, any day, like monk Skandaka, these thoughts arose in the mind of Aryā Kāli-Though my body has become lean, thin and reduced, yet, until, in my body are utthāna, karma, bala, vīrya, purusākāra and parākraina; faith, steadiness and detachment in mind; it would be proper for me that the next day after sun rise I should go to Aryā Candanā and taking her permission accept samthārā, renounce food, water and every kind of meals, not wishing death (becoming devoid of the wish of life and death), fix myself in soul virtues. --प्रथम अध्ययन .२४९. Page #339 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Thinking thus, next day as the sun rose Āryā Kālī approached Arya Candanā, Bowing down and worshipping her she said “O ārye ! If you allow me, I want to accept samlekhanāJhūsanā. Āryä Candană allowing her request, said: O beloved as gods! Do as you feel happy; but do not delay in auspicious deeds. Getting permission of Arya Candanā, Āryā Kālī accepted last penance of fast-starvation and emancipation (samlekhanā-jhūsanā). Āryā Kāli had learnt Sāmāyika etc., eleven holy scriptures (angas) from āryā Candanā ( before ) and completed eight years of sage-conduct period. She emaciated (exhausting all karma, making her soul pure), by cutting off sixty meals and accepting restrain. With her last breath, she became beatified, emancipated and ended all miseries. [N. B. Please see the chart of Ratnāvalī penance.] [First chapter concluded] द्वितीय अध्ययन सुकाली आर्या : कनकावली तप सूत्र ८ : उक्खेवओ बीयस्स अज्झयणस्स । एवं खलु जंबू ! तेणं कालेणं तेणं समएणं चंपा णामं णयरी, चेइए, कोणि राया । तत्थ णं सेणियस्स रण्णो भज्जा कोणियस्स रण्णो चुल्लमाउया सुकाली मं देवी होत्था | २५० पुण अन्तकृद्दशा सूत्र : अष्टम वर्ग Page #340 -------------------------------------------------------------------------- ________________ जहा काली तहा सुकाली वि णिक्खंता जाव बहूहिं चउत्थ जाव अप्पाणं भावमाणी विहरइ । तए णं सा सुकाली अज्जा अण्णया कयाइं जेणेव अज्जचंदणा अज्जा जाव "इच्छामि णं अज्जाओ तुब्भेहिं अन्भणुण्णाया समाणी कणगावली तबोकम्म उवसंपज्जित्ताणं विहरित्तए।" एवं जहा रयणावली तहा कणगावली वि, णवरं तिसु ठाणेसु अट्ठमाई करेइ, जहा रयणावलीए छट्ठाई । एक्काए परिवाडीए संवच्छरो, पंचमासा बारस य अहोरत्ता । चउण्डं पंच परिसा णव मासा अट्ठारस दिवसा । सेसं तहेव, णववासा परियाओ । जाव सिद्धा । सूत्र ८: दूसरे अध्ययन का उत्क्षेपक इस प्रकार हैआर्य जम्बू स्वामी ने कहा-हे भगवन् ! आठवें वर्ग के दूसरे अध्ययन में प्रभु महावीर ने क्या भाव फरमाये हैं ? कृपया बताइये । श्री सुधर्मा स्वामी ने कहा-हे जम्बू ! उस काल उस समय में चम्पा नाम की नगरी थी, वहां पूर्णभद्र उद्यान (चैत्य) था, कोणिक नाम का राजा वहां राज्य करता था । उस नगरी में श्रेणिक राजा की रानी और कोणिक राजा की छोटी माता सुकाली नाम की देवी थी । काली की तरह सुकाली भी वैराग्य प्राप्त कर प्रव्रजित हुई और बहुत से उपवास आदि तप से आत्मा को भावित करती हुई विचरने लगी। फिर वह सुकाली आर्या अन्यदा किसी दिन आर्या चन्दना के पास आकर इस प्रकार बोली- 'हे आर्ये ! आपकी आज्ञा होने पर मैं कनकावली तप को अंगीकार करके विचरना चाहती हूँ ।” महासती आर्या चन्दना की आज्ञा पाकर सुकाली आर्या ने रत्नावली तप के समान कनकावली तप की आराधना की । विशेषता इसमें यह थी कि तीनों स्थानों पर अष्टम-तेले किये, जबकि रत्नावली तप में बेले किये द्वितीय अध्ययन .२५१ . Page #341 -------------------------------------------------------------------------- ________________ जाते हैं । एक परिपाटी में एक वर्ष, पांच महीने और बारह अहोरात्रियां लगती हैं। इस एक परिपाटी में ८८ दिन का पारणा और १ वर्ष २ मास और १४ दिन का तप होता है । चारों परिपाटी का काल पाँच वर्ष नौ महीने और अठारह दिन होते हैं । शेष वर्णन काली आर्या के समान है । नव वर्ष तक चारित्र का पालन कर यावत् वह भी सिद्ध वुद्ध और मुक्त हो गई । (देखिए चार्ट नं. ३) (द्वितीय अध्ययन समाप्त) Chapter 2 Maxim 8: Introduction to the second chapter is like this, Arya Jambu Swami said-O Bhagawan ! What was the subject matter expressed by the Lord in the second chapter of eighth section ? Please tell me. Sudharmā Swāmi told-0 Jambū ! At that time and at that period there was a city named Campā. In it there was situated Pūrņabhadra garden (sanctuary). King Koạika was ruling there. There lived queen Sukālī consort of king Srenika and younger step mother of king koņika. Sukāli also accepted consecration like queen Kāli and began to wander engrossing her soul hy many types of fast penances. Then one day Aryā Sukāli came to Aryā Candanā and spoke-O Arye ! If you permit me I intend to wander practising Kanakávali penance. Getting permission of chief nun āryā Candanā, Ārya Sukālī practised Kanakávali penance, like penance of Ratnāvalī. Excepting; on the three occasions she practised three days' fast, while in Ratnanali two days' fast was practised. It takes the period of one year, five months and twelve days to complete one series. .२५२ . अन्तकृद्दशा सूत्र : अष्टम वर्ग Page #342 -------------------------------------------------------------------------- ________________ In this one series eightyeight days are of taking meals and one year, two months, fourteen days are of fast. The time period of all the four series is of five years, nine months, eighteen days. Remaining description is similar to that of Aryā Kāli. Practising nun-conduct upto nine years, she became beatified. ___[Second chapter completed] तृतीय अध्ययन महाकाली आर्या : लघुसिंहनिष्क्रीड़ित तप सूत्र ९ : एवं महाकाली वि ! णवरं खुड्डागं सीहणिक्कीलियं तवोकम्म उवसंपज्जित्ताणं विहरइ । तं जहाचउत्थं करेइ, करित्ता सव्वकामगुणियं पारेइ, पारित्ता छटुं करेइ, करित्ता सव्वकामगुणियं पारेइ, पारित्ता चउत्थं करेइ, करित्ता सव्वकामगुणियं पारेइ, पारित्ता अट्ठमं करेइ, करित्ता सबकामगुणियं पारेइ, पारित्ता छटुं करेइ, करित्ता सव्वकामगुणियं पारेइ, पारित्ता दसमं करेइ, करित्ता सबकामगुणियं पारेइ, पारित्ता अट्ठमं करेइ, करित्ता सव्यकामगुणियं पारेइ, पारित्ता दुवालसमं करेइ, करित्ता सव्वकामगुणियं पारेइ, पारित्ता दसमं करेइ, करित्ता सव्वकामगुणियं पारेइ, पारित्ता चउद्दसमं करेइ, करित्ता सव्यकामगुणियं पारेइ, पारित्ता बारसमं करेइ, करित्ता सव्वकामगुणियं पारेइ, पारित्ता तृतीय अध्ययन .२५३ . Page #343 -------------------------------------------------------------------------- ________________ सोलसमं करेइ, करित्ता सव्वकामगुणियं पारेइ, पारित्ता चउद्दसमं करेइ, करित्ता सव्वकामगुणियं पारेइ, पारित्ता अट्ठारसमं करेइ, करित्ता सव्यकामगुणियं पारेइ, पारित्ता सोलसमं करेइ, करित्ता सव्यकामगुणियं पारेइ, पारित्ता वीसइमं करेइ, करित्ता सव्वकामगुणियं पारेइ, पारित्ता अट्ठारसमं करेइ, करित्ता सव्वकामगुणियं पारेइ, पारित्ता वीसइमं करेइ, करित्ता सव्वकामगुणियं पारेइ, पारित्ता सोलसमं करेइ, करित्ता सव्वकामगुणियं पारेइ, पारित्ता अट्ठारसमं करेइ, करित्ता सव्वकामगुणियं पारेइ, पारित्ता चउद्दसमं करेइ करित्ता सव्वकामगुणियं पारेइ, पारित्ता सोलसमं करेइ, करित्ता सबकामगुणियं पारेइ, पारित्ता बारसमं करेइ, करित्ता सव्वकामगुणियं पारेइ, पारित्ता अट्ठमं करेइ, करित्ता सव्वकामगुणियं पारेइ, पारित्ता चउद्दसमं करेइ, करित्ता सव्वकामगुणियं पारेइ, पारित्ता दसमं करेइ, करित्ता सव्वकामगुणियं पारेइ, पारित्ता बारसमं करेइ, करित्ता सव्वकामगुणियं पारेइ, पारित्ता अट्ठमं करेइ, करित्ता सव्वकामगुणियं पारेइ, पारित्ता दसमं करेइ, करित्ता सव्वकामगुणियं पारेइ, पारित्ता छटुं करेइ, करित्ता सव्वकामगुणियं पारेइ, पारित्ता अट्ठमं करेइ, करित्ता सव्वकामगुणियं पारेइ, पारित्ता चउत्थं करेइ, करित्ता सव्यकामगुणियं पारेइ, पारित्ता छटुं करेइ करित्ता सव्वकामगुणियं पारेइ, पारित्ता चउत्थं करेइ करित्ता सव्वकामगुणियं पारेइ, पारित्ता .२५४. अन्तकृद्दशा सूत्र : अष्टम वर्ग Page #344 -------------------------------------------------------------------------- ________________ तहेव चत्तारि परिवाडीओ । एक्काए परिवाडीए छम्मासा सत्त य दिवसा । चउन्हं दो वरिसा अट्ठावीस य दिवसा जाव सिद्धा । सूत्र ९ : जम्बूस्वामी ने सुधर्मा स्वामी से पूछा - हे भगवन् ! आठवें वर्ग के तीसरे अध्ययन का भगवान ने क्या भाव फरमाया है ? सुधर्मा स्वामी ने कहा - हे जम्बू ! तीसरे अध्ययन में महाकाली रानी का वर्णन है । वह श्रेणिक राजा की भार्या और कोणिक राजा की छोटी माता थी । उन्होंने भी सुकाली रानी के समान दीक्षा धारण की और लघुसिंह - निष्क्रीड़ित नामक तप किया । वह इस प्रकार है - सर्वप्रथम उपवास किया, पारणा किया, ( इसकी भी पहली परिपाटी के सभी पारणों में विगयों का सेवन वर्जित नहीं था ) फिर बेला किया, फिर पारणा करके उपवास किया । फिर पारणा करके तेला किया । इस प्रकार आगे बेला, चोला, तेला, पचोला, चोला, छह, पाँच, सात, छह, आठ, सात, नौ और आठ किये । फिर नौ, सात, आठ, छह, सात, पाँच, छह, चार, पाँच, तीन, चार, दो, तीन, उपवास, दो और उपवास किया । इस प्रकार लघुसिंह निष्क्रीड़ित तप की एक परिपाटी की । एक परिपाटी में छह महीने और सात दिन लगे । जिसमें पारणे के तेतीस दिन और तपस्या के पाँच मास और तीन दिन हुए । इस प्रकार महाकाली आर्या ने चार परिपाटी की, जिसमें दो वर्ष और अट्ठाईस दिन लगे । इस प्रकार महाकाली आर्या ने लघुसिंह निष्क्रीड़ित तप की सूत्रोक्त विधि से आराधना की । तत्पश्चात् महाकाली आर्या ने अनेक प्रकार की फुटकर तपस्याएँ कीं । अन्त में संथारा करके सम्पूर्ण कर्मों का क्षय करके मोक्ष को प्राप्त हुई । (देखिए चार्ट नं. ४) तृतीय अध्ययन For Private Personal Use Only २५५ ● Page #345 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Chapter 3 Jambu Swāmi asked Sudharmā Swāmī-O Bhagawan! What was subject matter told by Bhagawana in the third chapter of eighth section. Maxim 9: Sudharma Swāmī told-O Jambu! In the third chapter. there is the description of queen Mahākālī. She was consort of king Śrenika and younger step mother of king Konika. She accepted consecration like queen Sukāli and practised Laghu singhaniṣkrīḍita penance. Details of that penance are like this. First of all she practised one day fast then took meals (In the first series of this penance, the practiser takes meals with all five kinds of vigayas.) After breaking fast next day she practised two days' fast and took meals, then one day fast penance, next day took meals. Then three days' fast and took meals. Then, she practised two, four, three, five, four, six, five, seven, six, eight, seven, nine and eight days' fast penance. Thereafter, she practised nine, seven, eight, six. seven. five, six, four, five, three, four, two, three, one, two and one days' fast penance. In this way she accomplished one series of Laghu singha nişkridita fast penance. One series took the time period of six months and seven days. Among them thirty three days were of taking meals and five months, three days were of fast penance. Thus, Mahākāli Āryā practised four series of this penance and it took two years and twentyeight days. In this way, Mahākālī Āryā practised smaller lion's play (Laghu singha niskrīḍita) penance in aforesaid manner. Afterwards she practised various types of miscellaneous penances. In the fag end of her life she accepted samthārā and exhausting all the karmas, became beatified. २५६ अन्तकृद्दशा सूत्र : अष्टम वर्ग Page #346 -------------------------------------------------------------------------- ________________ विवेचन आर्या महाकाली ने लघुसिंहनिष्क्रीड़ित तप की आगधना की थी । प्रस्तुत सूत्र में इसे खुड्डाग सीहनिक्कीलियं कहा है, जिसका अर्थ है-जिस प्रकार गमन करता हुआ सिंह अपने अतिक्रान्त मार्ग को पीछे मुड़कर फिर देखता है और फिर आगे चलता है । इसे सिंहावलोकन भी कहते हैं । उसी प्रकार जिस तप में अतिक्रमण किए हुए उपवास के दिनों को फिर से सेवन करके आगे बढ़ा जाए । सिंहनिष्क्रीड़ित तप दो प्रकार का होता है, एक लघुसिंहनिष्क्रीड़ित और दूसरा महासिंहनिष्क्रीड़ित तप। प्रस्तुत अध्ययन में वर्णित आर्या महाकाली ने लघुसिंहनिष्क्रीड़ित तप की आराधना की । अगले अध्ययन में वर्णित कृष्णा आर्या ने महासिंहनिष्क्रीड़ित तप किया है । (तृतीय अध्ययन समाप्त) Elucidation Arya Mahakali practised laght-singha-niskridita pcnance, which is mentioned in present sūtra as khuddāga Siha nikkiliyain. It denotes that as the lion, while walking, visualises the path he has passed by turning back and then moves forward-that is called as retrospection. In the same way, during this penance the practiser moving forward jumps in due order, then returns and practises that, c.g. a penancer observing five days fast jumps on seven days' fast then he returns and practises six days' fast. Singha-niskridita penance is of two kinds-1. Laghu singha-niskridita penance and 2. Maha-singha niskridita penance. Described in present chapter Āryā Mahākāli propiliated Laghu Singha niskridita penance. As described in next chapter Aryā Krsņā practised Maha Singha-niskridita penance. (Third chapter concluded] चतुर्थ अध्ययन कृष्णा आर्या : महासिंह निष्क्रीड़ित तप सूत्र १०: एवं कण्हा वि । णवरं महासीहणिक्कीलियं तवोकम्मं जहेव खुड्डागं । णवरं चोत्तीसइमं जाव णेयव्यं, तहेव ऊसारेयव्यं एक्काए परिवाडीए एगं चतुर्थ अध्ययन .२५७ . Page #347 -------------------------------------------------------------------------- ________________ परिसं, छम्मासा अट्ठारस य दिवसा । चउण्हं छ वरिसा, दो मासा, बारस य अहोरत्ता, सेसा जहा कालीए, जाव सिद्धा । सूत्र १0: इसी प्रकार कृष्णा रानी का भी चौथा अध्ययन समझना चाहिए । महाकाली से इसमें विशेषता यह है कि इन्होंने महासिंह-निष्क्रीड़ित तप किया । लघुसिंह निष्क्रीड़ित तप से इसमें इतनी विशेषता है कि एक से लेकर १६ तक तप किया जाता है और उसी प्रकार उतरा जाता है । एक परिपाटी में एक वर्ष छह महीने और अठारह दिन लगते हैं । चारों परिपाटियों में छह वर्षं , दो महीने और बारह दिन (अहोरात्रि) लगते हैं । शेष वर्णन काली आर्या के समान ही है । अन्त में संथारा संलेखना करके यह काली आर्या की तरह सिद्ध बुद्ध और मुक्त हो गई । (देखिए चार्ट नं. ५) (चतुर्थ अध्ययन समाप्त) Chapter 4 Maxim 10: In the same way we should understand the fourth chapter, relating to queen Krsna. Excepting; Krsna Arya practised Mahā singha niskridita (greater lion's play) penance. Difference of this penance from Laghu singhaniskidita penance is that in this penance it is carried upto 16 days' fast in ascending order and then it is carried down upto one day fast in descending order. One series takes time period of one year, six months, eighteen days. So all the four series are completed in six years, two months, twelve days. Remaining description is similar to that of Kāli Aryā. In the later period, she accepted samthārā and attained salvation like Kali Arya. (See Table 5) [Fourth chapter completed] .२५८ . __ अन्तकृद्दशा सूत्र : अष्टम वर्ग Page #348 -------------------------------------------------------------------------- ________________ सुकृष्णा आर्या : सप्त सप्तमी भिक्षु प्रतिमा सूत्र ११ : एवं सुकण्हा वि, णवरं सत्तसत्तमियं भिक्खुपडिमं उवसंपज्जित्ताणं विहरइ । पढमे सत्तए एक्केक्कं भोयणस्स दत्तिं पडिगाहेइ एक्केक्कं पाणगस्स । दोच्च सत्तए दो दो भोयणस्स दो दो पाणगस्स । तच्चे सत्तए तिणि तिण्णि भोयणस्स तिण्णि तिण्णिपा णगस्स । चउत्थे चउ, पंचमे पंच, छट्टे छ, सत्तमे सत्तए सत्त दत्तीओ भोयणस्स पडिगाहेइ, सत्त पाणगस्स । पंचम अध्ययन एवं खलु एयं सत्तसत्तमियं भिक्खुपडिमं एगूणपण्णाए राइदिएहिं एगेण य छण्णउएणं भिक्खासएणं अहासुत्तं जाव आराहित्ता जेणेव अज्जचंदणा अज्जा तेणेव उवागया । अज्जचंदणं अज्जं वंदइ, णमंसइ, वंदित्ता, णमंसित्ता एवं वयासी" इच्छामि णं अज्जाओ ! तुब्भेहिं अब्भणुण्णाया समाणी अट्ठमियं भिक्खुपडिमं उत्वसंपज्जित्ताणं विहरित्तए । " अहासुहं देवाप्पिए ! मा पडिबंधं करेह । तए णं सा सुकण्हा अज्जा अज्जचंदणाए अज्जाए अब्भणुष्णाया समाणी अट्ठमियं भिक्खुपडिमं उवसंपज्जित्ताणं विहरइ | पढमे अट्ठए एक्क्कं भोयणस्स दत्तिं पडिगाहेइ एक्केक्कं पाणगस्स दत्तिं, जाव अट्टमे अट्ठए अट्ठ भोयणस्स दत्तिं पडिगाहेइ अट्ठट्ठ पाणगस्स । एवं खलु अट्ठमियं भिक्खुपडिमं चउसट्ठीए राइदिएहिं दोहिं य अट्ठासीए हिं भिक्खासएहिं अहासुत्तं जाव आराहित्ता, नव-नवमियं भिक्खुपडिमं उवसंपज्जित्ताणं विहरइ । पंचम अध्ययन For Private Personal Use Only २५९ Page #349 -------------------------------------------------------------------------- ________________ पढमे नवए एक्केक्कं भोयणस्स दत्तिं पडिगाहेइ एक्केक्कं पाणगस्स, जाव नवमे नवए नव-नव-दत्तिं भोयणस्स पडिगाहेइ नव-नव पाणगस्स । एवं खलु नव-नवमियं भिक्खुपडिमं एकासीइ राइंदिएहिं चउहिं पंचोत्तरेहिं, भिक्खासएहिं अहासुत्तं जाव आराहित्ता । दस-दसमियं भिक्खुपडिम उवसंपज्जित्ताणं विहरइ । पढमे दसए एक्केक्कं भोयणस्स दत्तिं पडिगाहेइ एक्केक्कं पाणगस्स- जाव दसमे दसए दस-दस भोयणस्स दस-दस पाणगस्स । एवं खलु एयं दस-दसमियं भिक्खुपडिमं एक्केणं राइंदियसएणं अद्धछ हिं भिक्खासएहिं अहासुत्तं जाव आराहेइ । आराहित्ता बहूहिँ चउत्थ जाव मास-द्धमास-विविह-तवोकम्मेहि अप्पाणं भावेमाणी विहरइ। तए णं सा सुकण्हा अज्जा तेणं ओरालेणं जाव सिद्धा । पंचम अध्ययन सूत्र ११: इसी प्रकार पांचवें अध्ययन में सुकृष्णा देवी का भी वर्णन समझना चाहिये । यह भी श्रेणिक राजा की रानी और कोणिक राजा की छोटी माता थी । इसने भगवान का उपदेश सुनकर श्रमण दीक्षा अंगीकार की । इसमें विशेषता यह है कि आर्या चन्दनबाला की आज्ञा प्राप्त कर आर्या सुकृष्णा "सप्त-सप्तमिका' भिक्षु प्रतिमा रूप तप अंगीकार करके विचरने लगी, जिसकी विधि इस प्रकार हैप्रथम सप्ताह में एक दत्ति (दाती-अखंडधारा) भोजन की और एक ही दत्ति पानी की ग्रहण की जाती है । 'दत्ति-का अर्थ है दाता एक वार में या एक ही अंखड धारा में जितना देता है वह एक दत्ति कहलाती है । दूसर सप्ताह में दो-दो दत्ति भोजन को और दो-दा दत्ति पानी की, तीसरे .२६० . अन्तकृद्दशा सूत्र : अष्टम वर्ग Page #350 -------------------------------------------------------------------------- ________________ सप्ताह में तीन दत्ति भोजन की और तीन पानी की, चौथे सप्ताह में चार-चार, पांचवें सप्ताह में पाँच-पाँच, छठे में छह-छह, और सातवें सप्ताह में सात दत्ति भोजन की ली जाती हैं, तथा सात ही दत्ति पानी की ग्रहण की जाती हैं । इस प्रकार उनचास (४९) रात - दिन में एक सौ छियानवे (१९६) भिक्षा की दत्तियाँ होती हैं । सुकृष्णा आर्या ने सूत्रोक्त विधि के अनुसार इसी "सप्त सप्तमिका" भिक्षु प्रतिमा तप की सम्यग् आराधना की । इसमें आहार- पानी की सम्मिलित रूप से प्रथम सप्ताह में सात दत्तियाँ हुई. दूसरे सप्ताह में चौदह तीसरे सप्ताह में इक्कीस, चौथे सप्ताह में अट्ठाईस, पाँचवें सप्ताह में पैंतीस, छठे सप्ताह में बियालीस और सातवें सप्ताह में उनचास दत्तियाँ हुईं । इस प्रकार सभी मिलाकर कुल एक सौ छियानवें (१९६) दत्तियाँ हुईं । (देखिए चार्ट नं. ६) इस तरह सूत्रानुसार इस प्रतिमा का आराधन करके सुकृष्णा आर्या, आर्या चन्दनवाला के पास आई और उन्हें वंदन नमस्कार करके इस प्रकार बोलीहे आर्य ! आपकी आज्ञा होने पर मैं "अष्ट- अष्टमिका” भिक्षु प्रतिमा तप अंगीकार करके विचरना चाहती हूँ । + आर्या चन्दना ने कहा- "हे देवानुप्रिये ! जैसा तुम्हें सुख हो, वैसा करो । धर्म कार्य में प्रमाद मत करो ।" फिर वह सुकृष्णा आर्या, चन्दना आर्या की आज्ञा प्राप्त होने पर अष्टअष्टमिका भिक्षु प्रतिमा अंगीकार करके विचरने लगी । इस तप में प्रथम अष्टक में एक-एक दत्ति भोजन की और एक-एक दत्ति पानी की ग्रहण की जाती है । यावत् इसी क्रम से दूसरे अष्टक में प्रतिदिन दो दत्तियाँ आहार की और दो ही दत्तियाँ पानी की ली जाती हैं । इसी प्रकार क्रम से आठवें अप्टक में आठ दत्ति आहार और आठ दत्ति पानी की ग्रहण की जाती हैं । इस प्रकार अष्ट अष्टमिका भिक्षु प्रतिमा तपस्या चौंसठ (६४) दिन-रात में पूर्ण होती है । जिसमें आहार- पानी की दो मौ अट्ठासी (२८८) दत्ति होती हैं । सुकृष्णा आर्या ने सूत्रोक्त विधि से इस अष्ट अष्टमिका प्रतिमा का आराधन किया । (देखिए चार्ट नं. ७) पंचम अध्ययन • २६१ Page #351 -------------------------------------------------------------------------- ________________ इसके बाद आर्या चन्दना की आज्ञा प्राप्त कर उसने नवनवमिका भिक्षु प्रतिमा अंगीकार की । प्रथम नवक में एक दत्ति आहार और एक दत्ति पानी की ग्रहण की। इस क्रम से नौवें नवक में नौ दत्तियाँ आहार की और नौ दत्तियाँ पानी की ग्रहण कीं । यह "नवनवमिका" भिक्षु प्रतिमा इक्यासी (८१) दिन-रात में पूरी हुई । इसमें आहार -पानी की चार सौ पांच (४०५) दत्तियाँ हुईं । इस नवनवमिका भिक्षु प्रतिमा का सुकृष्णा आर्या ने सूत्रोक्त विधि के अनुसार आराधन किया । (देखिए चार्ट नं. ८ ) इसके पश्चात् सुकृष्णा आर्या ने दशदशमिका भिक्षु प्रतिमा अंगीकार की । इसके प्रथम दशक में एक दत्ति भोजन की और एक दत्ति पानी की ग्रहण की। इस प्रकार क्रमशः दसवें दशक में दस दत्ति भोजन की और दस दत्ति पानी की ग्रहण की । यह दशदशमिका भिक्षु प्रतिमा एक सौ ( 900 ) दिन - रात में पूर्ण होती है । इसमें आहार पानी की सम्मिलित रूप से पाँच सौ पचास (५५0 ) दत्तियाँ होती हैं । इस प्रकार इन भिक्षु प्रतिमाओं hi सूत्रोक्त विधि से आराधन किया । (देखिए चार्ट नं. ९ ) फिर सुकृष्णा आर्या उपवासादि से लेकर अर्द्धमासखमण और मासखमण आदि विविध प्रकार की तपस्या से आत्मा को भावित करती हुई विचरने लगी । इस उदार एवं घोर तपस्या के कारण सुकृष्णा आर्या अत्यधिक दुर्बल हो गयी । अन्त में संथारा करके सम्पूर्ण कर्मों का क्षय कर सिद्धगति को प्राप्त हुई । ( पांचवा अध्ययन समाप्त) Chapter 5 Arya Sukṛṣṇā; Propiliation of Sage (Nun)-Resolution Maxim 11: of Similarly should be known the description Sukṛṣṇādevi, in fifth chapter. She was also the consort of king Srenika and younger step mother of king Konika. Having heard the sermon of Bhagawāna Mahāvīra, she accepted sage (nun ) consecration. Excepting; she began to wander, accepting seven-sevens sage (nun ) resolution penance with the permission of Arya Candanabālā. २६२ • अन्तकृद्दशा सूत्र : अष्टन वर्ग For Private Personal Use Only Page #352 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Its method is as follows During first week (seven days) one dole (datti meaning unbroken flow of food and water given by a giver) of food and one dole (datti) of water is accepted every day. During second week two doles of meals and two doles of water. During third week three-three, in fourth four-four, in fifth five-five in sixth six-six and in seventh seven-seven doles of meals and water are accepted. Thus in these fortynine days, one hundred ninetysix doles of alms are taken by practiser. Sukṛṣṇā Āryā practised sapt-saptamika seven-sevens in proper way sage firm-resolution according to the schedule of sutras. During first week, there become seven doles of meals and water combinedly, during second week fourteen, in third twentyone, in fourth twentyeight, in fifth thirty five. in sixth fortytwo, in seventh fortynine. Totalling all these there became one hundred ninetysix dattis-doles. (See Table 6) Thus practising this firm resolution (pratimā) penance according to the schedule of sutra Arya Sukṛṣṇā went to Arya Candanabälä, bowed down and worshipped her and then she said O Ārye! I intend to wander, accepting eight-eighth (sage) firm resolution, if you permit me. Arya Candana spoke-O beloved as gods! Do, as it pleases you; but do not be negligent in religious deeds. Then Arya Sukṛṣṇā getting the permission of Āryā Candană accepted the eight-eighth nun firm resolution penance and began to wander. During this penance in the first eight days one dole of meals and one dole of water is taken everyday, in second eight days two doles of meals and water is taken. In this order in पंचम अध्ययन २६३ For Private Personal Use Only Page #353 -------------------------------------------------------------------------- ________________ last eight days eignut doles of meals and eight doles of water is taken. In all, this penance takes sixty four days to perform and total doles combined meals and water are two hundred eightyeight each. Arya Sukrsna performed this penance according to the schedule of sutra in due order. (See Table 7) After this, with the permission of Arya Candanā she accepted nun firm resolution penance of nine-nines. During first nine days she took onc dole of meals and one dole of water everyday. In this order she took nine doles of meals and nine doles of water in ninth-nine penance, for nine days. In all, this penance took eightyone day to perform and total doles, counting both meals and water. were four hundred five each. Ārya Suk!so performed this nun firm resolution nine-nines penance according to the schedule prescribed in sūtras. (See Table 8) Then āryā Sukrsnā accepted the nun firm resolution penance of ten-tens. During the first ten days she took one dole of meals and one dole of water everyday. Then increasing it she took ten doles of meals and ten doles of water everyday in the last ten days of this penance. This penance was completed in one hundred days and the total number of doles, counting doles of meals and water both, becomes five hundred fifty each. (See Table 9) Thus she practised these nun firm-resolution. penances according to the schedule prescribed in sūtras. Then Āryā Sukrsnī began to wander engrossing her soul with various types of penances like-one day fast and increasing upto fortnight and full month's fast penances. Due to these rigorous penances she became too weak. At the fag end of life she accepted samthārā and exhausting all karmas became beatified. [Fifth chapter concluded] RX8 अन्तकृद्दशा सूत्र : अष्टम वर्ग Page #354 -------------------------------------------------------------------------- ________________ षष्ठ अध्ययन सूत्र १२: एवं महाकण्हा वि । णवरं खुड्डागं सव्वओभई पडिम उवसंपज्जित्ताणं विहरइ । तं जहाचउत्थं करेइ, करित्ता सव्वकामगुणियं पारेइ, पारित्ता छटुं करेइ, करित्ता सव्वकामगुणियं पारेइ, पारित्ता अट्ठमं करेइ, करित्ता सव्वकामगुणियं पारेइ, पारित्ता दसमं करेइ, करित्ता सव्वकामगुणियं पारेइ, पारित्ता दुवालसमं करेइ, करित्ता सव्वकामगुणियं पारेइ, पारित्ता अट्ठमं करेइ, करित्ता सव्वकामगुणियं पारेइ, पारित्ता दसमं करेइ, करित्ता सव्वकामगुणियं पारेइ, पारित्ता दुवालसमं करेइ, करित्ता सव्वकामगुणियं पारेइ, पारित्ता चउत्थं करेइ, करित्ता सव्वकामगुणियं पारेइ, पारित्ता छटुं करेइ, करित्ता सव्यकामगुणियं पारेइ, पारित्ता दुवालसमं करेइ, करित्ता सव्वकामगुणियं पारेइ, पारित्ता चउत्थं करेइ, करित्ता सव्वकामगुणियं पारेइ, पारित्ता छटुं करेइ, करित्ता सव्यकामगुणियं पारेइ, पारित्ता अट्ठमं करेइ, करित्ता सव्वकामगुणियं पारेइ, पारित्ता दसमं करेइ, करित्ता सव्वकामगुणियं पारेइ, पारित्ता छटुं करेइ, करित्ता सव्वकामगुणियं पारेइ, पारित्ता अट्ठमं करेइ, करित्ता सव्वकामगुणियं पारेइ, पारित्ता दसमं करेइ, करित्ता सव्वकामगुणियं पारेइ, पारित्ता षष्ठ अध्ययन . २६५ . . Page #355 -------------------------------------------------------------------------- ________________ दुवालसमं करेइ, करित्ता सबकामगुणियं पारेइ, पारित्ता चउत्थं करेइ, करित्ता सव्वकामगुणियं पारेइ, पारित्ता दसमं करेइ, करित्ता सव्वकामगुणियं पारेइ, पारित्ता दुवालसमं करेइ, करित्ता सव्वकामगुणियं पारेइ, पारित्ता चउत्थं करेइ, करित्ता सव्वकामगुणियं पारेइ, पारित्ता छटुं करेइ, करित्ता सय्यकामगुणियं पारेइ, पारित्ता अट्ठमं करेइ, करित्ता सव्यकामगुणियं पारेइ, पारित्ता एवं खलु एयं खुड्डाग-सव्वओभहस्स तवोकम्मस्स पढमं परिवाडिं तिहिं मासेहिं दसहिं दिवसेहिं अहासुत्तं जाव आराहित्ता । दोच्चाए परिवाडीए चउत्थं करेइ, करित्ता विगइवज्जं पारेइ, पारित्ता जहा रयणावलीए तहा एत्थ वि चत्तारि परिवाडीओ । पारणा तहेव । चउण्हं कालो संवच्छरो मासो दस य दिवसा । सेसं तहेव जाव सिद्धा । छठा अध्ययन महाकृष्णा : लघुसर्वतोभद्रतप सूत्र १२ : इसी प्रकार राजा श्रेणिक की भार्या और राजा कोणिक की छोटी माता महाकृष्णा रानी ने भी भगवान के पास दीक्षा अंगीकार की । महाकृष्णा आर्या चन्दनबाला आर्या की आज्ञा लेकर "लघु सर्वतोभद्र'' तप करने लगी । उसकी विधि इस प्रकार हैसर्वप्रथम, उन्होंने उपवास किया और पारणा किया । (विगय बिना त्यागे) पारणा करके बेला किया । पारणा करके तेला किया । इसी प्रकार चोला. पचोला किया, फिर तेला, चोला, पचोला, उपवास एवं बेला किया । फिर पचोला, उपवास, बेला, तेला, चोला किया । फिर वेला, तेला, चोला, अन्तकृद्दशा सूत्र : अष्टम वर्ग Page #356 -------------------------------------------------------------------------- ________________ पचोला उपवास किया । फिर चोला, पचोला, उपवास, बेला एवं तेला किया । इस प्रकार महाकृष्णा आर्या ने लघु सर्वतोभद्र तप की पहली परिपाटी पूरी की । (देखिए चार्ट नं. १०) इस प्रकार यह लघु सर्वतोभद्र तप, कर्म की प्रथम परिपाटी तीन महीने और दस दिनों में पूर्ण होती है । इसकी सूत्रानुसार सम्यग् रीति से आराधना करके आर्या महाकृष्णा ने इसकी दूसरी परिपाटी में उपवास और विगयरहित पारणा किया । जैसे रत्नावली तप में चार परिपाटियाँ बताई गईं वैसे ही इसमे भी चार परिपाटियाँ होती हैं । पारणा भी ऐसे ही समझना चाहिये । इसकी पहली परिपाटी में पूरे सौ दिन लगे, जिनमें पच्चीस दिन पारणे के और पिचहत्तर दिन तपस्या के हुए। क्रम से इतने ही दिन दूसरी, तीसरी एवं चौथी परिपाटी के हुए । इस तरह इन चारों परिपाटियों का सम्मिलित काल एक वर्ष, एक मास और दस दिन हुआ । पहली परिपाटी में पारणा बिना विगय त्यागे किया । दूसरी परिपाटी के पारणे में विगय का त्याग किया । तीसरी परिपाटी के पारणे में विगय के लेपमात्र का भी त्याग कर दिया । चौथी परिपाटी में आयंबिल किया । इस प्रकार इस तप की सूत्रोक्तविधि से आर्या महाकृष्णा ने आराधना की और अन्त में संलेखनाा-संथारा करके सभी कर्मों का क्षय कर सिद्ध, बुद्ध और मुक्त हो गईं। Chapter 6 Mahākrsnā : Laghu Sarvatobhadra penance (Small fourfold penance) Maxim 12 : In the same way, consort of king Śreņika and younger step mother of king Konika, queen Mahākrsna also षष्ठ अध्ययन .२६७ . Page #357 -------------------------------------------------------------------------- ________________ accepted consecration in presence of Bhagawāna Mahāvīra. Āryā Mahākrsnā with the permission of Ārya Candanā began to practise Laghu Sarvatobhadra penance. The method of this penance is as followsFirst of all she observed one day fast and next day broke it up, took food without renouncing vigayas. Then observed two days' fast, in the same way observed three days', four days; five days' fast; again observed three days', four days', five days', one day and two days' fast penance. Then observed five days', one day, two days’, three days' and four days' fast. Then observed two days', three days' four day’, five days' and one day fast, again four days', five days’ one day', two days' and three days' fast. Thus Aryā Mahākrsnă completed the first series of small Sarvatobhadra penance. (See Table 10) This first series takes the time period of three months and ten days. Practising this series according to schedule prescribed by sūtras and in due order Arya Mahākrsnā observed one day' fast in second series of this penance and took food avoiding vigayas. As four series are told in Ratnāvali penance, so are the four series in this penance also. Taking food should also be known similar to that one. The first series was performed in one hundred days, among these twentyfive days were of taking meals and seventyfive days were of fast penance. Same is the number of days in second, third and fourth series. Thus the time period of all the four series is one year one month and ten days. In first series she took meals without renouncing vigayas, in second avoiding vigayas, in third even without smearing of vigayas and in fourth taking of āyambila gruel. R&C . 3 bae 277: 316CH auf Page #358 -------------------------------------------------------------------------- ________________ In this way Āryā Mahākrsnā propiliated this penance according to the schedule prescribed in sūtras. In the later period of life she accepted samlekhanā- samthārā, exhausted all the karmas and was liberated , beatified, completely free of all miseries. विवेचन "खुड्डिय सव्वओभई पडिमं" में क्षुल्लक शब्द महद् की अपेक्षा से है । सर्वतोभद्र तप दो प्रकार का है-एक महद् दूसरा लघु । यह लघु है, इस बात को प्रकट करने के लिए क्षुल्लक शब्द का प्रयोग किया गया है । गणना करने पर जिसके अंक सम अर्थात् बराबर हों, विषम न हों, जिधर से गणना की जाए उधर से ही समान हों उसे सर्वतोभद्र कहते हैं । इसमें एक से लेकर पाँच तक के अंक दिये जाते हैं | चारों ओर से जिधर से चाहें गिन लें, सभी ओर से योग की १५ ही संख्या होती है । एक से पांच तक सभी ओर से गिनने पर एक जैसी संख्या रहने से इसे सर्वतोभद्र कहा जाता है । यह प्रस्तुत यंत्र से स्पष्ट होता है । (छठा अध्ययन समाप्त) Elucidation Khuddiya Suvvaobhaddam Padimam-In this phrase word khuddiya (Sanskrta form ksullaka) is given. It is in comparison to great (mahad.). Really word Ksullaka means small or smaller than that, i.e.. mahad. Thus (Sarvatobhadra) penance is of two kinds-one great and another small. Here described penance is small, to make clear this the word Ksullaka (small) is given. The figures counted from any side or all sides horizontal or vertical, the sum total of figures should be the same, that is called magic square. In this small fivefold (magic square) one to five figures are given. Counting all these numbers from any side the total we get is fifteen. As clarified by figures the penancer practise penance in the same way e.g., one day fast, two days' fast upto five days' fast. So this penance has been termed as magic square or sarvatobhadra penance. This can be clearly understood by the square given here. [Sixth chapter completed] षष्ठ अध्ययन • २६९ . Page #359 -------------------------------------------------------------------------- ________________ सातवाँ अध्ययन सूत्र १३ : एवं वीरकण्हा वि । णवरं महालयं सवओभदं तवोकम्मं उवसंपज्जित्ताणं विहरइ । तं जहाचउत्थं करेइ, करित्ता सबकामगुणियं पारेइ, पारित्ता छटुं करेइ, करित्ता सव्वकामगुणियं पारेइ, पारित्ता अट्ठमं करेइ, करित्ता सव्वकामगुणियं पारेइ, पारित्ता दसमं करेइ, करित्ता सव्वकामगुणियं पारेइ, पारित्ता दुवालसमं करेइ, करित्ता सव्वकामगुणियं पारेइ, पारित्ता चउद्दसमं करेइ, करित्ता सव्वकामगुणियं पारेइ, पारित्ता सोलसमं करेइ, करित्ता सव्वकामगुणियं पारेइ, पारित्ता । पढमा लया । दसमं करेइ, करित्ता सव्वकामगुणियं पारेइ, पारित्ता दुवालसमं करेइ, करित्ता सव्वकामगुणियं पारेइ, पारित्ता चउद्दसमं करेइ, करित्ता सव्वकामगुणियं पारेइ, पारित्ता सोलसमं करेइ, करित्ता सम्बकामगुणियं पारेइ, पारित्ता चउत्थं करेइ, करित्ता सव्यकामगुणियं पारेइ, पारित्ता छटुं करेइ, करित्ता सव्वकामगुणियं पारेइ, पारित्ता अट्ठमं करेइ, करित्ता सव्वकामगुणियं पारेइ, पारित्ता । बीया लया । सोलसमं करेइ, करित्ता सव्वकामगुणियं पारेइ, पारित्ता चउत्थं करेइ, करित्ता सबकामगुणियं पारेइ, पारित्ता छटुं करेइ, करित्ता सव्वकामगुणियं पारेइ, पारित्ता अन्तकृद्दशा सूत्र : अष्टम वर्ग ૨૭૦ ૦ Page #360 -------------------------------------------------------------------------- ________________ अमं करेइ, करिता सव्वकामगुणियं पारेइ, पारित्ता दसमं करेइ, करित्ता सव्वकामगुणियं पारेइ, पारित्ता दुवालसमं करेइ, करित्ता सव्वकामगुणियं पारेइ, पारित्ता चउदसमं करेइ, करित्ता सव्वकामगुणियं पारेइ, पारित्ता । तइया लया । अट्टमं करेइ, करित्ता सव्वकामगुणियं पारेइ, पारित्ता दसमं करेइ, करित्ता सव्वकामगुणियं पारेइ, पारित्ता दुवालसमं करेइ, करित्ता सव्वकामगुणियं पारेइ, पारित्ता चउद्दसमं करेइ, करित्ता सव्वकामगुणियं पारेइ, पारित्ता सोलसमं करेइ, करिता सव्वकामगुणियं पारेइ, पारित्ता चउत्थं करेइ, करित्ता सव्वकामगुणियं पारेइ, पारिता छट्ट करेइ, करित्ता सव्वकामगुणियं पारेइ, पारित्ता । चउत्थी लया । चउद्दसमं करेइ, करित्ता सव्वकामगुणियं पारेइ, पारित्ता सोलसमं करेइ, करित्ता सव्वकामगुणियं पारेइ, पारित्ता चउत्थं करेइ, करित्ता सव्वकामगुणियं पारेइ, पारिता छट्ट करेइ, करिता सव्वकामगुणियं पारेइ, पारित्ता अट्ठमं करेइ, करित्ता सव्वकामगुणियं पारेइ, पारित्ता दसमं करेइ, करित्ता सव्वकामगुणियं पारेइ, पारित्ता दुवालसमं करेइ, करित्ता सव्वकामगुणियं पारेइ, पारित्तापंचमी लया । छट्ठ करेइ, करित्ता सव्वकामगुणियं पारेइ, पारित्ता अट्टमं करेइ, करित्ता सव्वकामगुणियं पारेइ, पारित्ता सप्तम अध्ययन For Private Personal Use Only २७१ Page #361 -------------------------------------------------------------------------- ________________ दसमं करेइ, करिता सव्वकामगुणियं पारेइ, पारित्ता दुबालसमं करेइ, करित्ता सव्वकामगुणियं पारेइ, पारित्ता चउद्दसमं करेइ, करित्ता सव्वकामगुणियं पारेइ, पारित्ता सोलसमं करेइ, करित्ता सव्वकामगुणियं पारेइ, पारित्ता उत्थं करेइ, करिता सव्वकामगुणियं पारेइ, पारित्ताछट्ठी लया । दुवालसमं करेइ, करित्ता सव्वकामगुणियं पारेइ, पारित्ता चउद्दसमं करेइ, करित्ता सव्वकामगुणियं पारेइ, पारित्ता सोलसमं करेइ, करित्ता सव्वकामगुणियं पारेइ, पारित्ता उत्थं करेइ, करित्ता सव्वकामगुणियं पारेइ, पारित्ता छट्ठ करेइ, करित्ता सव्वकामगुणियं पारेइ, पारित्ता अट्टमं करेइ, करित्ता सव्वकामगुणियं पारेइ, पारित्ता दसमं करेइ, करित्ता सव्वकामगुणियं पारेइ, पारित्ता सत्तमी लया । एक्का कालो अट्टमासा पंच य दिवसा । चउण्हं दो वासा अट्ठमासा वीसं दिवसा । सेसं तहेव जाव सिद्धा । आर्या वीर कृष्णाः महा सर्वतोभद्रतप सूत्र १३ : इसी प्रकार वीरकृष्णा रानी का चरित्र भी जानना चाहिये । यह भी श्रेणिक राजा की भार्या तथा कोणिक राजा की छोटी माता थी । इन्होंने भी दीक्षा अंगीकार की और आर्या चन्दनबाला से आज्ञा लेकर " महासर्वतोभद्र " तप का आराधन किया । ૨૭૨ For Private Personal Use Only अन्तकृद्दशा सूत्र : अष्टम वर्ग Page #362 -------------------------------------------------------------------------- ________________ इसकी विधि इस प्रकार हैसबसे पहले उपवास किया । फिर वेला किया । इसी क्रम से तेला, चोला, पचोला, छह और सात किये। या प्रथम लता हुई। फिर चोला किया, पारणा किया, इसी प्रकार पचोला, छः, सात, उपवास, बेला और तेला किया । यह दूसरी लता हुई । फिर सात किये, पारणा किया, उपवास, वेला, तेला, चोला, पचोला और छह किये यह तीसरी लता हुई । फिर तेला किया, पारणा किया, पूर्वोक्त क्रम से फिर चोला किया पारणा किया, क्रमशः पचोला, छः, सात, उपवास और बेला किया । यह चौथी लता हुई। आगे पूर्वोक्त क्रम से तप और बीच में पारणा करते हुए छः, सात, उपवास, बेला, तेला, चोला और पचोला किया । यह पांचवीं लता हुई । फिर बेला, तेला, चोला, पचोला, छः, सात और उपवास किया । यह छठी लता हुई। फिर पचोला, छः, सात, उपवास किया, बेला, तेला और चोला किया । यह सातवीं लता हुई। इस प्रकार सात लता की एक परिपाटी हुई । (देखिए चार्ट नं. ११) इसमें आठ मास और पांच दिन लगे । जिनमें उनपचास (४९) दिन पारणे के और छ: मास सोलह दिन (१९६ दिन) तपस्या के हुए । इसकी प्रथम परिपाटी में पारणों में विगय का सेवन वर्जित नहीं था । दूसरी परिपाटी में पारणे में विगय का त्याग किया । तीसरी परिपाटी में लेप मात्र का भी त्याग कर दिया और चौथी परिपाटी में, पारणे में आयम्विल किया । चारों परिपाटियों को पूर्ण करने में दो वर्ष, आठ मास और बीस (९८0) दिन लगे । उसने इस तप का (सूत्रोक्त) विधि से आराधन किया । यावत् सिद्ध गति प्राप्त की। (सातवां अध्ययन समाप्त) सप्तम अध्ययन २७३ Page #363 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Chapter 7 Maxim 13 : Likewise the life-sketch of queen Vīrakrsnā should be known. She was also consort of king Srenika and younger step mother of king Konika. She also accepted consecration and with the permission of Arya Candanabālā practised great magic square (Mahāsar vatobhadra) penance. The method of this penance is like thisFirst of all she observed one day fast then two days' fast and in this order three days', four days', five days', six days' and seven days' fast penance was observed. It became first branch. Then, she observed four days' fast, took meals and further in this order observed-five days', six days’, seven days', one day', two days' and three days' fast penance. It became second branch. Then, she observed seven days' fast took meals and in this order observed-one day, two days', three days', four days, five days’, and six days' fast. It made third branch. Then, she observed three days' fast, took meals and in the aforesaid order she observed four days’, five days', six days' seven days', one day and two days' fast, It is fourth branch. Then in aforesaid order practising fast penance and in between taking meals observed-six days', seven days', one day, two days', three days', four days' and five days' penance. It is fifth hraordi Then plikt i We days', three days', four days', five days', six days, seven days', and one day' fast. • 268 अन्तकृद्दशा सूत्र : अष्टम वर्ग Page #364 -------------------------------------------------------------------------- ________________ It is sixth branch Then observed five days', six days', seven days', one day', two days', three days' and four days' fast. This is seventh branch. Thus seven branches make one series. This first series was completed in eight months and five days. Among them she took meals in fortynine days and penanced one hundred ninetysix days. During this first series vigayas were not avoided. while taking meals. Taking meals in second series vigayas were avoided, in third series even the smearing of vigayas was avoided and in fourth on day of taking meals ayambila was dyaned In completion of all the four series she took the time period of two years eight months and twenty days (980 days). She practised this penance according to the schedule prescribed by sutras in proper way and in the end of life was beatifie [Seventh chapter concluded] आठवाँ अध्ययन सूत्र १४ : एवं रामकण्हा वि । णवरं भद्दोत्तरपडिमं उवसंपज्जित्ताणं विहरइ, तं जहा - दुवालसमं करेइ, करित्ता सव्वकामगुणियं पारेइ, पारित्ता चउदसमं करेइ, करित्ता सव्वकामगुणियं पारेइ, पारित्ता सोलसमं करेइ, करिता सव्वकामगुणियं पारेइ, पारित्ता अट्ठारसमं करेइ, करित्ता सव्वकामगुणियं पारेइ, पारिता वीसइमं करेइ, करित्ता सव्वकामगुणियं पारेइ, पारित्ता - पढमा लया । अष्टम अध्ययन For Private Personal Use Only २७५ ● Page #365 -------------------------------------------------------------------------- ________________ राम कृष्णाः भद्रोत्तर प्रतिमा सूत्र १४: रामकृष्णा आर्या का चरित्र भी इसी प्रकार है । यह भी श्रेणिक राजा की रानी और कोणिक राजा की छोटी माता थी । दीक्षा ली और आर्या चन्दनबाला की आज्ञा प्राप्त कर “भद्रोत्तर प्रतिमा" तप किया । (भद्रोत्तर प्रतिमा का अर्थ है-भद्र-कल्याण की प्रदाता, उत्तर-प्रधान । यह प्रतिमा परम कल्याणप्रद होने से भद्रोत्तर प्रतिमा कही जाती है ।) उसकी विधि इस प्रकार हैसर्वप्रथम पचोला किया । पारणा किया । फिर क्रमशः छः किये, पारणा किया, पिर क्रमशः सात, आठ और नौ किये । प्रथम परिपार्टी के सभी पारणों में विगयों का सेवन वर्जित नहीं था । यह प्रथम लता हुई । Chapter 8 Rāmakrsnā : Bhadrottara firm resolution Maxim 14 : The life sketch of Rāmakrsnā Devī is also similar as aforesaid in previous chapters. She also was the consort of king Sreņika and younger step mother of king Konika. She accepted consecration and with the permission of Aryaā Candanabālā, practised Bhadrottara Pratimā penance. In Bhadrottara Pratimā the word Bhadrottara is composed by two words-Bhadra and uttara. Bhadra means welfare and uttara denotes chief. Thus the whole word Bhadrottara means-giver of chief and utmost welfare or salvation to the soul. That is as followsFirst of all she observed five days' fast, took meal. Then observed six days' fast, took meal; then seven, eight and nine days' fast, took meals in between. It is first branch. .२७६. अन्तकृद्दशा सूत्र : अष्टम वर्ग Page #366 -------------------------------------------------------------------------- ________________ सूत्र १५ : सोलसमं करेइ, करित्ता सव्वकामगुणियं पारेइ, पारित्ता अट्ठारसमं करेइ, करित्ता सव्वकामगुणियं पारेइ, पारित्ता बीसइमं करेइ, करित्ता सव्वकामगुणियं पारेइ, पारित्ता दुवालसमं करेइ, करित्ता सव्वकामगुणियं पारेइ, पारित्ता चउद्दसमं करेइ, करित्ता सव्वकामगुणियं पारेइ, पारित्ताबीया लया । बीसइमं करेइ, करिता सव्वकामगुणियं पारेइ, पारित्ता दुबालसमं करेइ, करित्ता सव्वकामगुणियं पारेइ, पारित्ता चउद्दसमं करेइ, करित्ता सव्वकामगुणियं पारेइ, पारित्ता सोलसमं करेइ, करित्ता सव्वकामगुणियं पारेइ, पारित्ता अट्ठारसमं करेइ, करित्ता सव्वकामगुणियं पारेइ, पारित्तातइया लया । चउद्दसमं करेइ, करित्ता सव्वकामगुणियं पारेइ, पारित्ता सोलसमं करेइ, करित्ता सव्वकामगुणियं पारेइ, पारित्ता अट्ठारसमं करेइ, करित्ता सव्वकामगुणियं पारेइ, पारित्ता बीसइमं करेइ, करित्ता सव्वकामगुणियं पारेइ, पारित्ता दुवालसमं करेइ, करित्ता सव्वकामगुणियं पारेइ, पारित्ताचउत्थी लया । अट्ठारसमं करेइ, करित्ता सव्वकामगुणियं पारेइ, पारित्ता बीसइमं करे, करिता सव्वकामगुणियं पारेइ, पारित्ता अष्टम अध्ययन For Private Personal Use Only २७७ Page #367 -------------------------------------------------------------------------- ________________ दुवालसमं करेइ, करित्ता सव्यकामगुणियं पारेइ, पारित्ता चउद्दसमं करेइ, करित्ता सव्वकामगुणियं पारेइ, पारित्ता सोलसमं करेइ, करित्ता सव्यकामगुणियं पारेइ, पारित्तापंचमी लया। एक्काए कालो छम्मासा वीसा य दिवसा । चउण्हं दो बरिसा दो मासा वीसं य दिवसा । सेसं तहेव जहा काली जाव सिद्धा । सूत्र १५: फिर सात, आठ, नौ, पाँच और छह किये । यह दूसरी लता हुई । फिर नौ, पाँच, छह, सात और आठ उपवास किये | यह तीसरी लता हुई। फिर छह, सात, आठ, नौ और पाँच उपवास किये । यह चौथी लता हुई । फिर आठ, नौ, पांच, छह और सात किये । यह पांचवीं लता हुई । इस तरह पांचों लताओं की एक परिपाटी हुई । ऐसी चार परिपाटियाँ इस तप में होती हैं । एक परिपाटी में छह मास और बीस दिन लगे एवं चारों परिपाटियों में दो वर्ष, दो मास और बीस दिन लगे । रामकृष्णा आर्या भी काली आर्या के समान सभी कर्मों का क्षय करके सिद्ध-पद को प्राप्त हुई । (देखिए चार्ट नं. १२) (आठवाँ अध्ययन समाप्त) Maxim 15 : Then she observed seven, eight, nine, five and six days' fast. It was second branch. Then she observed nine, five, six, seven, and eight fasts. It was third branch. Then she observed six, seven, eight, nine and five fasts. It was fourth branch. Then she observed eight, nine, five, six and seven fasts. .२७८ . अन्तकृद्दशा सूत्र : अष्टम वर्ग Page #368 -------------------------------------------------------------------------- ________________ It was fifth branch. All these five branches made a series. Such four series are in this penance. One series took six months and twenty days. So all the four series were completed in two years, two months and twenty days. During first series vigayas were not renounced in meels, in second vigayas were avoided, in third even smearing of vigayas was avoided and in fourth āyambila was observed on day meant for taking meals after fast.. Āryā Rāmakrsnā practised this penance in due order. Like Āryā Kāļi exhausting all karmas, she was beatified. (See Table 12) [Eighth chapter concluded] नवम अध्ययन सूत्र १६ : एवं पिउसेणकण्हा वि । णवरं, मुत्तावलिं तवोकम्मं उवसंपज्जित्ताणं विहरइ । तं जहाचउत्थं करेइ, करित्ता सव्वकामगुणियं पारेइ, पारित्ता छटुं करेइ, करित्ता सबकामगुणियं पारेइ, पारित्ता चउत्थं करेइ, करित्ता सव्यकामगुणियं पारेइ, पारिता अट्ठमं करेइ, करित्ता सव्वकामगुणियं पारेइ, पारित्ता चउत्थं करेइ, करित्ता सव्वकामगुणियं पारेइ, पारित्ता दसमं करेइ, करित्ता सबकामगुणियं पारेइ, पारित्ता चउत्थं करेइ, करित्ता सव्वकामगुणियं पारेइ, पारिता दुवालसमं करेइ, करित्ता सबकामगुणियं पारेइ, पारित्ता चउत्थं करेइ, करित्ता सव्यकामगुणियं पारेइ, पारित्ता नवम अध्ययन .२७९ Page #369 -------------------------------------------------------------------------- ________________ चउद्दसमं करेइ, करित्ता सव्वकामगुणियं पारेइ, पारित्ता चउत्थं करेइ, करित्ता सव्वकामगुणियं पारेइ, पारित्ता सोलसमं करेइ, करित्ता सव्वकामगुणियं पारेइ, पारित्ता चउत्थं करेइ, करित्ता सव्वकामगुणियं पारेइ, पारिता अट्ठारसमं करेइ, करित्ता सव्वकामगुणियं पारेइ, पारित्ता उत्थं करेइ, करित्ता सव्वकामगुणियं पारेइ, पारित्ता अट्ठारसमं करेइ, करित्ता सव्वकामगुणियं पारेइ, पारित्ता चउत्थं करेइ, करित्ता सव्वकामगुणियं पारेइ, पारित्ता वीसइमं करेइ, करित्ता सव्वकामगुणियं पारेइ, पारिता चउत्थं करेइ, करित्ता सव्वकामगुणियं पारेइ, पारित्ता बावीसइमं करेइ, करित्ता सव्वकामगुणियं पारेइ, पारित्ता चउत्थं करेइ, करित्ता सव्वकामगुणियं पारेइ, पारित्ता चवीसइमं करेइ, करित्ता सव्वकामगुणियं पारेइ, पारित्ता चउत्थं करेइ, करित्ता सव्वकामगुणियं पारेइ, पारित्ता छब्बीसइमं करेइ, करित्ता सव्वकामगुणियं पारेइ, पारित्ता चउत्थं करेइ, करित्ता सव्वकामगुणियं पारेइ, पारित्ता अट्ठावीसइमं करेइ, करित्ता सव्वकामगुणियं पारेइ, पारित्ता उत्थं करेइ, करित्ता सव्वकामगुणियं पारेइ, पारित्ता तीसइमं करेइ, करित्ता सव्वकामगुणियं पारेइ, पारित्ता उत्थं करेइ, करित्ता सव्वकामगुणियं पारेइ, पारित्ता बत्तीसइमं करेइ, करित्ता सव्वकामगुणियं पारेइ, पारित्ता चउत्थं करेइ, करित्ता सव्वकामगुणियं पारेइ, पारित्ता ૨૮૦ For Private Personal Use Only अन्तकृद्दशा सूत्र : अष्टम वर्ग Page #370 -------------------------------------------------------------------------- ________________ चोतीसइमं करेइ, करित्ता सव्वकामगुणियं पारेइ, पारित्ता उत्थं करेइ, करित्ता सव्वकामगुणियं पारेइ, पारित्ता बत्तीसइमं करेइ, करित्ता सव्वकामगुणियं पारेइ, पारित्ता एवं ओसारेइ जाव चउत्थं करेइ, करित्ता सव्वकामगुणियं पारेइ । एक्काए कालो एक्कास मासा पण्णरस य दिवसा । चउण्हं तिण्णि वरिसा दस य मासा । सेसं तहेव जाव सिद्धा । अध्ययन ९ मुक्तावली तप आराधना सूत्र १६ : इसी प्रकार आर्या पितृसेनकृष्णा का वर्णन जानना चाहिये । वह राजा श्रेणिक की रानी और कोणिक राजा की छोटी माता थी । इन्होंने दीक्षा अंगीकार की और आर्या चन्दनबाला की आज्ञा लेकर मुक्तावली तप किया । इसकी विधि इस प्रकार है सर्वप्रथम उपवास किया । पारणा किया । ( इसकी भी पहली परिपाटी में पारणों में विगयों का सेवन वर्जित नहीं है ।) फिर वेला किया । पारणा किया । फिर उपवास किया । पारणा किया । फिर तेला किया । इस प्रकार बीच में एक-एक उपवास करती हुई पितृसेन कृष्णा आर्या पन्द्रह उपवास तक बढ़ी । फिर उपवास । वाद में सोलह । सोलह के बाद उपवास और फिर उपवास किया । फिर इसी प्रकार पश्चानुपूर्वी से अर्थात् आगे बढ़े, फिर पीछे आये, फिर आगे बढ़े इस प्रकार मध्य में एक-एक उपवास करती हुई जिस प्रकार चढ़ी थी, उसी प्रकार पन्द्रह उपवास से एक उपवास तक क्रम से उतरी । इस प्रकार मुक्तावली तप की एक परिपाटी समाप्त हुई । नवम अध्ययन For Private Personal Use Only २८१ Page #371 -------------------------------------------------------------------------- ________________ काली आर्या के समान इसकी चारों परिपाटियाँ पूर्ण कीं । एक परिपाटी में ग्यारह महीने और पन्द्रह दिन लगे और चारों परिपाटियों में तीन वर्ष और दस महीने लगे । इसमें ११४० दिन तप के और २४० दिन पारणा 54 । अन्त में संलेखना संथारा किया और समस्त कर्मों का क्षय करके सिद्ध पद को प्राप्त हुई । (देखिए चार्ट नं. १३) के Chpater 9 Pitrasenakṛṣṇā: Propiliation of Muktavali Penance Maxim 16: So is the description of Pitrasenakṛṣṇā. She was the consort of king Sreṇika and younger step mother of king Konika. She accepted consecration and propiliated Muktavali penance with the permission of Arya Candanabālā. That is as follows First of all she observed one day' fast then took meals; (in this first series vigayas are not excluded in meals) then she observed two days' fast, took meals; then one day fast, took meals; then three days' fast. In this way, observing one day* fast in between Āryā Pitrasenakṛṣṇā ascended upto fifteen days' fast then one day fast, again sixteen days' fast and after it. again sixteen days' fast. one day' fast took meals and then again she observed one day' fast. Then, likewise, according to Paścänupurvi (i.e. to go forward and then come backward and then again to go forward) and in between observing one day' fast, as she ascended. in the same way descended from fifteen days' fast to one day fast in due order. Thus, she completed one series of Muktavali penance. Like Kāli Ārya, she completed four series of this fast penance. One series of this penance took eleven months and fifteen days to complete. So four series were completed in three अन्तकृद्दशा सूत्र : अष्टम वर्ग ૨૮૨ Page #372 -------------------------------------------------------------------------- ________________ years and ten months. Among them were eleven hundred forty (1140) days of penance and two hundred forty days of taking meals. (See Table 13) In the end she accepted salekhand-swithūru and was emancipated. विवेचन मुक्तावली शब्द का अर्थ है-मोतियों का हार । जिस प्रकार मोतियों का हार वनाते समय उन मोतियों की स्थापना की जाती है, उसी प्रकार जिस तप में उपवासों की स्थापना की जाए उस तप को मुक्तावली तप कहते हैं । स्पष्टता हेतु चित्र देखिये । (नौवाँ अध्ययन समाप्त) Elucidation The word Muktārali means necklace of pearls. As pearls are established while preparing a necklace, in the same way fasts are established in this penance. So it is called Muktārali penance. For clear understanding see the illustration. Nineth chapter completed] दसम अध्ययन सूत्र १७: एवं महासेणकण्हा वि । णवरं आयंबिलवड्ढमाणं तवोकम्म उवसंपज्जित्ताणं विहरइ । तंजहाआयंबिलं करेइ, करित्ता चउत्थं करेइ करित्ता बे आयंबिलाइं करेइ, करित्ता चउत्थं करेइ, करित्ता तिण्णि आयंबिलाई करेइ करित्ता चउत्थं करेइ, करित्ता चत्तारि आयंबिलाई करेइ करित्ता चउत्थं करेइ करित्ता पंच आयंबिलाइं करेइ करित्ता चउत्थं करेइ, करित्ता छ आयंबिलाइं करेइ करित्ता चउत्थं करेइ, करित्ता नवम अध्ययन Page #373 -------------------------------------------------------------------------- ________________ एकोत्तरियाए वुड्ढीए आयंबिलाई वड्ढंती, चउत्थंतरियाई जाव आयंबिलसयं करेइ, करित्ता चउत्थं करेइ । तए णं सा महासेणकण्हा अज्जा आयंबिलवड्ढमाणं तवोकम्मं चोहसेहिं वासेहिं तिहि य मासेहिं वीसहि य अहोरत्तेहिं अहासुत्तं जाव सम्मं काएणं फासेइ जाव । आराहित्ता, जेणेव अज्जचंदणा अज्जा तेणेव उवागच्छइ, उवागच्छित्ता अज्जचंदणं अज्जं वंदइ णमंसइ, वंदित्ता णमंसित्ता बहूहिं चउत्थेहिं जाव भावेमाणी विहरइ। तए णं सा महासेणकण्हा अज्जा तेणं ओरालेणं जाव उवसोभेमाणी उवसोभेमाणी चिट्ठइ । तए णं तीसे महासेणकण्हाए अज्जाए अण्णया कयाइं पुव्यरत्तावरत्तकाले चिंता जहा खंदयस्स जाव अज्जचंदणं अज्जं आपुच्छइ जाव संलेहणा । कालं अणवकंखमाणी विहरइ । तए णं सा महासेणकण्हा अज्जा अज्जचंदणा अज्जाए अंतिए सामाइयमाइयाइं एक्कारसअंगाई अहिज्जित्ता बहुपडिपुण्णाइं सत्तरस वासाइं परियायं पालइत्ता मासियाए संलेहणाए अप्पाणं झूसित्ता सटुिं भत्ताई अणसणाए छेदित्ता जस्सट्टाए कीरइ जाव तमटुं आराहेइ । चरिम उस्सास-णीसासेहिं सिद्धा बुद्धा ।। अट्ठ य वासा आदी, एकोत्तरियाए जाव सत्तरस । एसो खलु परियाओ सेणियभज्जाण णायव्यो ॥ महासेनकृष्णाः आयम्बिल वर्धमान तप सूत्र १७: इसी प्रकार महासेनकष्णा का वर्णन भी जानना चाहिये । वह राजा श्रेणिक की रानी और कोणिक राजा की छोटी माता थी। दीक्षा ली और आर्या • २८४ . अन्तकृद्दशा सूत्र : अष्टम वर्ग Page #374 -------------------------------------------------------------------------- ________________ चन्दनबाला की आज्ञा पाकर उसने "आयम्बिल-वर्द्धमान'' नामक तप किया। इसकी विधि इस प्रकार हैसर्वप्रथम आयम्बिल किया । दूसरे दिन उपवास किया । फिर दो आयम्बिल किये । फिर उपवास किया । फिर तीन आयम्विल किये । फिर उपवास किया । फिर चार आयम्बिल किये. फिर उपवास किया तथा पांच आयम्बिल किये । फिर उपवास किया । फिर छ: आयम्बिल किये । फिर उपवास किया । इस प्रकार एक-एक आयम्बिल बढ़ाते हुए मध्य में एक-एक उपवास करते हुए एक सौ आयम्बिल तक किये । फिर उपवास किया । इस प्रकार आयम्बिल वर्द्धमान नामक तप पूरा किया । इस प्रकार महासेनकृष्णा आर्या ने चौदह वर्ष, तीन मास और बीस दिन में "आयम्बिल वर्द्धमान' नामक तप का सूत्रोक्त विधि से आराधन किया। इसमें आयम्विल के पांच हजार पचास दिन तथा उपवास के एक सौ दिन होते हैं। इस तप में चढ़ना ही है, उतरना नहीं । इसमें १४ वर्ष दस दिन आयम्विल के व १00 दिन उपवास के हैं । (देखिए चार्ट नं. १४) इसके बाद महासेनकृष्णा आर्या, आर्या चन्दनबाला के पास आई और वंदन नमस्कार किया । इसके बाद उपवास आदि वहुत-सी तपश्चर्या करती हुई अपनी आत्मा को भावित करती हुई विचरने लगी । उन कठिन तपस्याओं के कारण वह अत्यन्त दुर्वल हो गई. तथापि आन्तरिक तप-तेज के कारण वह अत्यन्त शोभित होने लगी । एक दिन पिछली रात्रि के समय महासेनकृष्णा आर्या ने स्कन्दक के समान चिन्तन किया-मेरा शरीर तपस्या से कृश हो रहा है, तथापि अभी तक मुझमें उत्थान, बल, वीर्य आदि हैं । इसलिये कल सूर्योदय होते ही आर्या चन्दनवाला के पास जाकर उनसे आज्ञा लेकर संथारा करूं । तदनुसार दूसरे दिन सूर्योदय होते ही आर्या चन्दनबाला के पास जाकर वन्दन नमस्कार करके संथारे के लिये आज्ञा मांगी । आज्ञा लेकर संथारा ग्रहण किया और मरण की आकांक्षा नहीं करती हुई, धर्मध्यान में तल्लीन रहने लगी। दसम अध्ययन .२८५ . Page #375 -------------------------------------------------------------------------- ________________ महासनकृष्णा आर्या ने चन्दनवाला आर्या से सामायिक आदि (छ: आवश्यकों के साथ) ग्यारह अंगों का अध्ययन किया । सत्तरह वर्ष तक चारित्र पर्याय का पालन किया तथा एक मास की संलेखना से आत्मा का भावित करती हुई, साठ भक्तों के अनशन से छेदित कर, अन्तिम श्वासोच्छ्वास में अपने सम्पूर्ण कर्मों का क्षय कर सिद्ध बुद्ध हुई अर्थात् मोक्ष प्राप्त किया । इन दस आर्याओं में प्रथम काली आर्या न आठ वर्ष तक चारित्र पर्याय का पालन किया । दूसरी सुकाली आर्या ने नौ वर्ष तक चारित्र पर्याय का पालन किया । इस प्रकार क्रमश: उत्तरोत्तर एक-एक रानी के चारित्र पर्याय में एक-एक वर्ष की वृद्धि होती गई । अन्तिम दसवीं रानी महासेनकृष्णा आर्या ने सतरह वर्ष तक चारित्र पर्याय का पालन किया । ये सभी राजा श्रेणिक की रानियां तथा कोणिक राजा की छोटी माताएँ थीं ।। (दसवां अध्ययन समाप्त) Chapter 10 Mahāse nakrsnā Ayambila Vardhamāna Tapa Maxim 17 : Same is the description of queen Mahāsenakrsnā. She also was the consort of king Srenika and younger step mother of king Konika. She accepted consecration and with the permission of Ārva Candanabālā, she practised Ayambila Vardhamana penance. That is as followsFirst of all she observed one cycunbila, next day one fast: then two ūyambilas and next day one fast, then three ayambilas and next day fast, then four ayambilas, next day fast, then five āyambilas, next day fast, then six ayambilas and next day fast; in this way increasing one āyambila and in between fast, she practised one hundred āvambilas and then fast. Thus she completed Āyaumbila Vardhamana penance. अन्तकृद्दशा सूत्र : अष्टम वर्ग Page #376 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Thus Āryā Mahāsenakṛṣṇā completed Ãyambila Vardhamana penance in fourteen years, three months and twenty days according to the schedule prescribed by sutras and in proper manner. Among this, the days of ayambilas are 5050 and that of fasts are 100 days. Thus total days are 5150. In this penance. there is only ascending; and no descending. In this penance fourteen years and ten days are of ayambila and hundred days are of fast. After this Arya Mahasenakṛṣṇā went to Arya Candanabālā and bowed to her. Then she (Arya Mahasenakṛṣṇā) began to wander engrossing her soul by many types of penances e.g.. fast etc. She became too weak due to those rigorous penances but she seemed lustrous by the internal flame of austerities. Once, in the last hours of night, like Skandaka, Āryā Mahāsenakṛṣṇā pondered deeply-though my body has become lean, thin and reduced, yet, until, in my body are utthāna, bala, virya etc., it would be proper for me that, as the sun rises, I go to Āryā Candanahālā and taking her permission accept samthārā. Accordingly, next day, as the sun rose she went to Arya Candanabālā, bowed down respected her. and asked her permission for saṁthārā. Getting permission she accepted samthārā and without desire of death, she engrossed herself in auspiciousreligious meditation. Arya Mahasenakṛṣṇā learnt Samayika etc. (six essentials), and eleven holy scriptures (angas) from Āryā Candanabālā, practised nun-conduct upto seventeen years and engrossing her soul by one month's santhārā, cutting off sixty meals, exhausting all karmas, with her last breath became emancipated i.e., attained salvation. (See Table 14) Among these ten aryās, the first Āryā Kālī practised nunconduct upto eight years; the second Arya Sukāli upto nine years. In this way, one after another, consecration period increased by one year of every queen (aryā). Last दसम अध्ययन For Private Personal Use Only २८७ Page #377 -------------------------------------------------------------------------- ________________ tenth Āryā Mahāsenakrsnā observed consecration period for seventeen years. All these were the consorts of king Sreņika and younger step mothers of king Konika. [Tenth chapter concluded] उपसंहार एवं खलु जंबू ! समणेणं भगवया महावीरेणं आइगरेणं जाव संपत्तेणं अट्ठमस्स अंगस्स अंतगडदसाणं अयमद्धे पण्णत्ते त्ति बेमि । अंतगडदसाणं अंगस्स एगो सुयक्वंधो । अट्ठवग्गा । अट्ठसु चेव दिवसेसु उद्दिसिज्जंति । तत्थ पढम बितियवग्गे दस-अट्ठ उद्देसगा । तइयवग्गे तेरस उद्देसगा । चउत्थ-पंचम वग्गे दस-दस उद्देसगा । छ? वग्गे सोलस उद्देसगा । सत्तमवग्गे तेरस उद्देसगा, अट्ठमवग्गे दस उद्देसगा । सेसं जहा णायाधम्मकहाणं । सिरि अंतगडदसांग सुत्तं समत्तं । हे जम्बू ! अपने शासन की अपेक्षा से धर्म की आदि करने वाले श्रमण भगवान महावीर स्वामी-जो मोक्ष को प्राप्त हैं, उन्होंने आठवें अंग अन्तगडदशा सूत्र का यह भाव प्ररूपित किया है । भगवान् से जैसा मैंने सुना, उसी प्रकार तुम्हें कहा है । इस अन्तकृद्दशा सूत्र में एक श्रुतस्कन्ध है, और आट वर्ग हैं । आठ दिनों में इसका वाचन होता है । इसमें प्रथम और दूसरे वर्ग के दस एवं आठ अध्ययन हैं । तीसरे वर्ग में तेरह अध्ययन (उद्देशक) हैं । चौथे और पांचवें वर्ग में दस-दस अध्ययन हैं । छठे वर्ग में सोलह अध्ययन हैं । सातवें वर्ग में तेरह और आठवें वर्ग में दस अध्ययन हैं । कुल ९० अध्ययन हैं। शेष वर्णन ज्ञाताधर्मकथांग सूत्र में है । (श्री अन्तकृद्दशा सूत्र समाप्त) .२८८. अन्तकृद्दशा सूत्र : अष्टम वर्ग Page #378 -------------------------------------------------------------------------- ________________ चार्ट (Table) 1 तप दिन (Days of Penance) पारणा दिन (Days of Pārunā) सर्व-दिन (Total Days) 32 30 28 73 : 407 : 480 = १६ महीने (16 months) 24 33 30 गुणरत्न संवत्सर तप (Gunurutna Sainvatsara Penance) तप दिन (Days of Penance) पारणा दिन (Days of Pāranā) : सर्व-दिन (Total Days) १ वर्ष, ४ मास (1 year, 4 months) 24 25 24 24 8 20 10 15 . 15 प्रसंग: वर्ग १, अध्ययन १, पृष्ठ २८-३३ : गौतम अणगार का वर्णन (Reference Section 1. Chapter 1, Page 28-33 : Description of ascetic Gautamur) Page #379 -------------------------------------------------------------------------- ________________ चाट (Taple) 2 AURI रत्नावली (Ratnavali) तपस्या काल (Time period of Penance) एक परिपाटी का काल : १ वर्ष,३मास, २२ दिन (Time period of one series : 1 year, 3 months, 22 days) चार परिपाटी का काल: ५वर्ष, २ मास, २८ दिन (Time period of four series : 5 years, 2 months, 28 days) तप के दिन (Days of Penance) एक परिपाटी के तपोदिन : १ वर्ष, २४ दिन (Days of Penance of one series : 1 year. 24 days) चार परिपाटी के तपोदिन : ४ वर्ष, ३ मास, ६ दिन (Days of Penance of four series : 4 years. 3 months. 6 days) पारणे (Paranas) एक परिपाटी के पारणे : ८८ (Paranas of one series : 88) चार परिपाटी के पारणे : ३५२ (Paranās of four series : 352) प्रसंग: वर्ग ८, अध्ययन १, पृष्ठ २४४-२४६ : काली आर्या ने इस तप की आराधना की। (Reference : Section 8. Chapter 1, Page 244-246: Arya Kal practised of this penance.) Page #380 -------------------------------------------------------------------------- ________________ चार्ट (Table)3 कनकावली (Kanakavali) - एक परिपाटी का काल : १ वर्ष, ५ मास, १२ दिन तपस्या काल (Time period of one series : 1 year, 5 months, 12 days) (Time period of Penance) | चार परिपाटी का काल : ५ वर्ष, ९ मास, १८ दिन (Time period of four series : 5 years, 9 months, 18 days) r एक परिपाटी के तपोदिन : १ वर्ष, २ मास, १४ दिन तप के दिन (Days of Penance of one series : 1 year, 2 months, 14 days) (Days of Penance) चार परिपाटी के तपोदिन : ४ वर्ष, ९ मास, २६ दिन (Days of Penance of four series : 4 years, 9 months, 26 days) एक परिपाटी के पारणे : ८८ पारणे (Pāranās of one series : 88) (Paranas) चार परिपाटी के पारणे : ३५२ (Paranās of four series : 352 प्रसंग : वर्ग ८, अध्ययन २, पृष्ठ २५० : सुकाली आर्या ने इस तप की आराधना की। (Reference : Section 8, Chapter 2, Page 250: Arya Sukāli practised of this penance.) Page #381 -------------------------------------------------------------------------- ________________ तपस्या काल (Time period of Penance) तप के दिन (Days of Penance) पारणे (Paranas) प्रसंग : वर्ग ८, अध्ययन ३, पृष्ठ २५५: महाकाली आर्या ने इस तप की आराधना की। Mahakali Arya practised of this penance.) (Reference: Section 8. Chapter 3, Page 255: (Reference Section 8. Chapter 7. Page 273. Description of Arva Virakrsnä) प्रसंग : वर्ग ८, अध्ययन ७, पृष्ठ २७३ : वीर कृष्णा आर्या का वर्णन एक परिपाटी का काल : ६ माह, ७ दिन (Time period of one series: 6 months, 7 days) चार परिपाटी का काल : २ वर्ष, २८ दिन (Time period of four series: 2 years, 28 days) एक परिपाटी के तपोदिन: ५ मास, ४ दिन (Days of Penance of one series 5 months, 4 days) चार परिपाटी के तपोदिन १ वर्ष, ८ मास, १६ दिन : (Days of Penance of four series: 1 year, 8 months, 16 days) एक परिपाटी के पारणे : ३३ (Paranãs of one series : 33) चार परिपाटी के पारणे : १३२ (Päranäs of four series. 132) 56 2 3 4 -1 1 47362 47 2 3 4 +7 2-+5+ 62 473 7.1 - -5---6---7---1---2- -w 25 3625 5 1 2 3 4 6 7 1 5 25 3625 6 7 (Table) 11 चार्ट (Table) 4 Page #382 -------------------------------------------------------------------------- ________________ तपस्या काल (Time period of Pentance) चार परिपाटी का काल ६ वर्ष, २ मास, १२ दिन तप के दिन (Days of Penance) एक परिपाटी का काल १ वर्ष, ६ मास, १८ दिन (Time period of one series: 1 year, 6 months. 18 days) पारणे (Paranas) (Time period of four series. 6 years. 2 months, 12 days) 'एक परिपाटी के तपोदिन १ वर्ष ४ मास, १७ दिन (Days of Penance of one series. 1 year, 4 months, 17 days) चार परिपाटी के तपोदिन : ५ वर्ष, ६ मास, ८ दिन (Days of Penance of four series: 5 years, 6 months, 8 days) एक परिपाटी के पारणे ६१ (Parands of rne venies 60 चार परिपाटी के पारणे : २४४ (Paranas of four series 244) 0 : प्रसंग वर्ग ८, अध्ययन ४, पृष्ठ २५८ कृष्णा आर्या ने इस तप की आराधना की। (Reference : Section 8, Chapter 4. Page 258 Aryā Krsna practised of this penance ) चाट (Table) 5 Page #383 -------------------------------------------------------------------------- ________________ चार्ट (Table) 6 चार्ट (Table)7 चार्ट (Table) 8 अष्ट-अष्टमिका भिक्ष प्रतिमा (Asta-Astamiki nun fim-resolution) 11111 11 2|2|2|2|2|2|2 3333333 4/44/444 555555 111111111 2/22/2/2/2/2/2 33333333 1444444441 5/5/5/5/5/5/5/5 66666666 7/7/7/7/7/777 188888888 ६४ दिवस, २८८ दत्तियाँ (64 Days. 288 Duttis) टेन्ट 333333333 474/44/4/4/4/4/4 1575/5/5/5/5/5/5/5 6/6/6/6/6/6/6/66 /7/7/7/7/7/7/7/7/7 /8/8/8/8/8/8/8/8/8/ 9/9/9/9/9/9/9/9/9/ 2 1777 7777 प्रसंग : वर्ग ८, अध्ययन ५, पृष्ठ २६१ : सुकृष्णा आर्या ने इस तप की आराधना की। (Reference : Section 8. Chapter 5, Page 261 : Arvá Sukrsná practised of this penance.) प्रसंग : वर्ग ८, अध्ययन ५, पृष्ठ २६१ : सुकृष्णा आर्या का वर्णन (Reference Section 8 Chapter S, Page 21 ki se rapter of irri Sukr smi) प्रसंग : वर्ग ८, अध्ययन ५, पृष्ठ २६२ : सुकृष्णा आर्या का वर्णन (Reference Secuon 8 (Chapter 5. Page 262 Description of Irva Suk! nd) Page #384 -------------------------------------------------------------------------- ________________ चार्ट (Table) 10 चार्ट (Table)9 4 5 J5 1112 L213 12131415.1 1415112 प्रसंग : वर्ग८, अध्ययन ६, पृष्ठ (Reference Section R. Chapter 6, Page २६७: महाकृष्णा आर्या का वर्णन 267. Descnption of Arya Mahakrsnd) चार्ट (Table) 12 भद्रोत्तर प्रतिमा (Bhadrottara firm-resolution) 111111111111 21 2/2/2/2/2/21 2 2 2 33/3/3/3/3/3/333 4444444444 5/5/5/5/5/5/5/5 515 61666666666 17 17/7/7/7/7/7/7/717 | 8/8/88888888 9999999999 10|10|10|10|10|10|10|10|10|10| 1 15.1 6 7 18 191 1718115161 --9-7-5-161-7--1-8 879.51 819567. 67 प्रसंग : वर्ग ८, अध्ययन ५, पृष्ठ २६२ : सक्रष्णा आर्या का वर्णन (Reference : Section 8, Chapter 5, Page 262 : Description of Arya Sukrsna) प्रसंग : वर्ग ८, अध्ययन ८, पृष्ठ २७६ : रामकृष्णा आर्या का वर्णन (Reference Sechon & Chapter 8. Page 276 Descnption of Aryd Ramakrsna) तप दिन : १७५, पारणे : २५ (Days of Penance : 175, Paranas 25) Page #385 -------------------------------------------------------------------------- ________________ चाटे (Table) 13 मुक्तावली (Muktavali) एक परिपाटी का काल : ११ मास, १५ दिन तपस्या काल (Time period of one series : 11 months. 15 days) (Time period of Penance) | चार परिपाटी का काल : ३ वर्ष, १0 मास (Time period of four series : 3 years, 10 months) एक परिपाटी के तपोदिन : २८५ दिन तप के दिन (Days of Penance of one series : 285 days) (Days of Penance) चार परिपाटी के तपोदिन : ३ वर्ष, २ मास (Days of Penance of four series : 3 years, 2 months) पारणे एक परिपाटी के पारणे : ६० (Paranas) (Paranās of one series : 60) चार परिपाटी के पारणे : २४० L (Paranās of four series : 240) प्रसंग : वर्ग ८, अध्ययन ९, पृष्ठ २८२ : पितृसेन कृष्णा आर्या का वर्णन (Reference : Section 8, Chapter 9. Page 282 : Description of Arya Pitrasena Krsnā) Page #386 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Conclusion O Jambu! From the point of view of his own religious order, the exponent of religion, Śramaṇa Bhagawāna Mahāvīra Swāmī. who is now salvated, has expressed the subject matter of eighth anga-Antakṛd-daśā Sūtra. As I listened from Bhagawāna, so I have told you. Antakṛddaśā Sūtra has one Book (Śrutaskandha) and eight sections. These are read in eight days. Among these in first and second sections there are ten and eight chapters respectively. In third section there are thirteen chapters (uddeśakas). Fourth and fifth sections contain ten chapters each. In sixth section sixteen chapters. in seventh section thirteen and in eighth section there are ten chapters. Remaining description is in Jñātādharmakathānga sutra. दसम अध्ययन [Eighth section completed. [Antakrd-daśa Sūtra ended] For Private Personal Use Only २८९ • Page #387 -------------------------------------------------------------------------- ________________ टेबिल नं. 14 आयम्बिले वर्धमान तप - आयंबिल | उपवास आयंबिल उपवास आयंबिल | उपवास आयंबिल उपवास आयंबिल उपवास |आयंबिल उपवास आयंबिल उपवास आयंबिल उपवास आयंबिल उपवास . आयंबिल उपवास - ० 31 4। | - (290) 41 । 1 । - 11| 1 |12| 1 | 131 | 14 | 1 | 15 1 16 1 | 17 | 1 | | 18 119 120 1 | 22 | 1 | | 231 24|1| 25 | 1 261 27 1 28| 1 | 29 | 1301 321 33 1341 35 | 1 | 361 37 1 38 139 140 1 | 42 | 1 43 1 44 | 1 | 45 | 1 |46 | 1 | 47 | 1 | 48 | 1 49 | 1 |50 | 1 | 152 1531541 55 156 157 158 1591601 61 162 163164 | 1 |65 1 66 167168 169 | 1701 | 172 1 | | 73|1| 74|1| 75 1 76 | 1|77 1 | 78| 1791801 81 | 1 | 82 | 183 184 1 85 186 187 | 1 88189 | 1901 |91 192|1|93|194 1951 96 1971 |98| 199 | 1 100 1 महासेन कृष्णा आर्य ने इस तप की आराधना की। वर्ग 8 अ 10 पृष्ठ 285 Page #388 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आगमों का अनध्यायकाल ( स्व. आचार्यप्रवर श्री आत्माराम जी म. द्वारा सम्पादित नन्दीसूत्र से उद्धृत) स्वाध्याय के लिए आगमों में जो समय बताया गया है, उसी समय शास्त्रों का स्वाध्याय करना चाहिए। अनध्यायकाल में स्वाध्याय वर्जित है । मनुस्मृति आदि स्मृतियों में भी अनध्यायकाल का विस्तारपूर्वक वर्णन किया गया है। वैदिक लोग भी वेद के अनध्यायों का उल्लेख करते हैं। इसी प्रकार अन्य आर्ष ग्रन्थों का भी अनध्याय माना जाता है। जैनागम भी सर्वज्ञोक्त, देवाधिष्ठित तथा स्वरविद्या संयुक्त होने के कारण, इनका भी आगमों में अनध्यायकाल वर्णित किया गया है, जैसे कि दसविहे अंतलिक्खिए असज्झाए पण्णत्ते, तं जहा - उक्कावाते, दिसिदाघे, गज्जिते, विज्जुते, निग्घाते, जुवते, जक्खालित्ते धूमिता, महिता, रयउग्घाते। दसविहे ओरालिए असझाए, तं जहा अट्टी, मंसं, सोणिते, असुतिसामंते, सुसाणसामंते, चंदोवराते, सूरोबराते, पडणे, रायबुग्गहे, उवस्सयस्स अंतो ओरालिए सरीरगे । - स्थानाङ्गसूत्र, स्थान १० नो कप्पति निग्गंथाण वा निग्गंथीण वा चउहिं महापाडिवएहिं सज्झायं करित्तए, तं जहा - आसाढपाडिवए, इंदमहपाडिवए, कत्ति अपाडिवए सुगिम्हपाडियए । " नो कम्पs निग्ाण वा निग्गंधीण वा, चउहिं संझाहिं सज्झायं करेत्तए, तं जहा - पढिमाते, पच्छिमाते मज्झहे, अड्ढरत्ते । कप्पइ निग्गंथाणं वा, निग्गंथीण वा, चाउक्कालं सज्झायं करेत्तए, तं जहा - पुव्वण्हे अवरण्हे, पओसे. पच्चूसे । - स्थानाङ्गसूत्र, स्थान ४, उद्देशक २ उपरोक्त सूत्रपाठ अनुसार, दस आकाश से सम्बन्धित, दस औदारिक शरीर से सम्बन्धित, चार महाप्रतिपदा, चार महाप्रतिपदा की पूर्णिमा और चार सन्ध्या, इस प्रकार बत्तीस अनध्याय (काल) माने गए हैं, जिनका संक्षेप में निम्न प्रकार से वर्णन है, जैसे आकाश सम्बन्धी दस अनध्याय १. उत्कापात- तारापतन-यदि महत् तारापतन हुआ है तो एक प्रहर पर्यन्त शास्त्र स्वाध्याय नहीं करना चाहिए। २. दिग्दाह - जब तक दिशा रक्तवर्ण की हो अर्थात् ऐसा मालूम पड़े कि दिशा में आग सी लगी है, तब भी स्वाध्याय नहीं करना चाहिए । ३. गर्जित - बादलों के गर्जन पर एक प्रहर पर्यन्त स्वाध्याय न करे । ४. विद्युत - बिजली चमकने पर एक प्रहर पर्यन्त स्वाध्याय न करे । परिशिष्ट For Private Personal Use Only २९१ Page #389 -------------------------------------------------------------------------- ________________ किन्तु गर्जन और विद्युत का अस्वाध्याय चातुर्मास में नहीं मानना चाहिए। क्योंकि वह गर्जन और विद्युत प्रायः ऋतु स्वभाव से ही होता है। अतः आर्द्रा से स्वाति नक्षत्र पर्यन्त अनध्याय नहीं माना जाता। ५. निर्घात-बिना बादल के आकाश में व्यन्तरादिकृत घोर गर्जन होने पर या बादलों सहित आकाश में कड़कने पर दो प्रहर तक अस्वाध्याय काल है। ६. यूपक-शुक्ल पक्ष में प्रतिपदा, द्वितीया, तृतीया की सन्ध्या चन्द्रप्रभा के मिलने को यूपक कहा जाता है। इन दिनों प्रहर रात्रि पर्यन्त अस्वाध्याय नहीं करना चाहिए। ७. यक्षादीप्त-कभी किसी दिशा में बिजली चमकने जैसा, थोड़े-थोड़े समय पीछे जो प्रकाश होता है वह यक्षादीप्त कहलाता है। अतः आकाश में जब तक यक्षाकार दीखता रहे तब तक स्वाध्याय नहीं करना चाहिए। ८. धूमिका कृष्ण-कार्तिक से लेकर माघ तक का समय मेघों का गर्भमास होता है। इसमें धूम्र वर्ण की सूक्ष्म जलरूप धुंध पड़ती है। वह धूमिका-कृष्ण कहलाती है। जब तक यह धुंध पड़ती रहे, तब तक स्वाध्याय नहीं करना चाहिए। ९. मिहिकाश्वेत-शीतकाल में श्वेत वर्ण का सूक्ष्म जलरूप धुंध मिहिका कहलाती है। जब तक यह गिरती रहे, तब तक अस्वाध्यायकाल है। १०. रज उद्घात-वायु के कारण आकाश में चारों ओर धूलि छा जाती है। जब तक यह धूलि फैली रहती है स्वाध्याय नहीं करना चाहिए। उपरोक्त दस कारण आकाश सम्बन्धी अस्वाध्याय हैं। औदारिक सम्बन्धी दस अनध्याय ११-१२-१३. हड्डी, माँस और रुधिर-पंचेन्द्रिय तिर्यंच की हड्डी, माँस और रुधिर यदि सामने दिखाई दें, तो जब तक वहाँ से यह वस्तुएँ उठाई न जाएँ तब तक अस्वाध्याय है। वृत्तिकार आसपास के ६०० हाथ तक इन वस्तुओं के होने पर अस्वाध्याय मानते हैं। इसी प्रकार मनुष्य सम्बन्धी अस्थि, माँस और रुधिर का भी अनध्याय माना जाता है। विशेषता इतनी है कि इनका अस्वाध्याय सौ हाथ तक तथा एक दिन-रात का होता है। स्त्री के मासिक धर्म का अस्वाध्याय तीन दिन तक। बालक एवं बालिका के जन्म का अस्वाध्याय क्रमशः सात एवं आठ दिन पर्यन्त का माना जाता है। १४. अशुचि-मल-मूत्र सामने दिखाई देने तक अस्वाध्याय है। १५. श्मशान-३मशान भूमि के चारों ओर सौ-सौ हाथ पर्यन्त अस्वाध्याय माना जाता है। १६. चन्द्र-ग्रहण-चन्द्र-ग्रहण होने पर जघन्य आठ, मध्यम बारह और उत्कृष्ट सोलह प्रहर पर्यन्त म्वाध्याय नहीं करना चाहिए। १७. सूर्य-ग्रहण-सूर्य-ग्रहण होने पर भी क्रशः आठ, बारह और सोलह प्रहर पर्यन्त अस्वाध्यायकाल माना गया है। १८. पतन-किसी बड़े मान्य राजा अथवा राष्ट्र पुरुष का निधन होने पर जब तक उसका दाह-संस्कार न हो तब तक स्वाध्याय न करना चाहिए। अथवा जब तक दूसरा अधिकारी सिंहासनारूढ़ न हो तब तक शनैः-शनै: स्वाध्याय करना चाहिए। .२९२. परिशिष्ट Page #390 -------------------------------------------------------------------------- ________________ १९. राजव्युद्ग्रह-समीपस्थ राजाओं में परस्पर युद्ध होने पर जब तक शान्ति न हो जाए, तब तक उसके पश्चात् भी एक दिन-रात्रि स्वाध्याय नहीं करें। २०. औदारिक शरीर-उपाश्रय के भीतर पंचेन्द्रिय जीव का वध हो जाने पर जब तक कलेवर पड़ा रहे, तब तक तथा १00 हाथ तक यदि निर्जीव कलेवर पड़ा हो तो स्वाध्याय नहीं करना चाहिए। अस्वाध्याय के उपरोक्त दस कारण औदारिक शरीर सम्बन्धी कहे गये हैं। २१-२८ चार महोत्सव और चार महाप्रतिपदा-आषाढ़-पूर्णिमा, आश्विन-पूर्णिमा, कार्तिक पूर्णिमा और चैत्र-पूर्णिमा ये चार महोत्सव हैं। इन पूर्णिमाओं के पश्चात् आने वाली प्रतिपदा को महाप्रतिपदा कहते हैं। इसमें स्वाध्याय करने का निषेध है। २९-३२. प्रातः, सायं, मध्याह्न और अर्ध-रात्रि-प्रातः सूर्य से एक घड़ी पहले तथा एक घड़ी पीछे। सूर्यास्त होने से एक घड़ी पहले तथा एक घड़ी पीछे। मध्याह्न अर्थात् दोपहर में (१२ बजे) एक घड़ी आगे और एक घड़ी पीछे एवं अर्ध-रात्रि में भी एक घड़ी आगे तथा एक घड़ी पीछे स्वाध्याय नहीं करना चाहिए। इस प्रकार अस्वाध्याय काल टालकर दिन-रात्रि में चार काल की स्वाध्याय करना चाहिए। S Appropriate Time for Study of Scriptures Holy books should be studied only at a time as prescribed in the scriptures. There are times when this study is prohibited. In scriptures like Manusmriti etc. also the prohibited time has been described. Vedic people also mention about this period in the Vedas. Other Aryan holy books also agree to this particular period. Jain scriptures too, as they have been associated with the omnipresent and established by the devas, are prohibited to be studied in that particular period, e.g. As per the above scripture study, prohibited periods are ten relating to symptoms in the sky, ten relating to the physical body, four relating to first day of the fortnight, four relating to full moon of the fortnight, four relating to waned moon of the fortnight. Thus, 32 periods are forbidden which are briefly described below : Relating to symptoms in the sky 1. If an important star has fallen, then the study is forbidden for three hours. 2. If there is red colour in the sky then the study shouldn't be done. 3. No study for 6 hours after thunder of clouds. 4. For three hours after lightening, study is not allowed. 5. If there is thunder without clouds in the sky or if there is crackling with presence of clouds, then study is forbidden for 6 hours. परिशिष्ट Page #391 -------------------------------------------------------------------------- ________________ 6. The evening time of 1st, 2nd and 3rd day of the fortnight when the moon waxes, is forbidden for the study. 7. Till the time when the after glow of lightening is visible in any direction, study should not be done. 8. From October to January, there is fog. Till the time there is fog, study is forbidden. 9. During winters, there is five fog of white colour. Till the time there is fog, that is forbidden time. 10. Due to air movement, if there is a dust in the air, then the study is not allowed. Relating to the Physical Body 11-12-13. Till bone, flesh or blood of any five sensed being is visible, study is not to be done. Similarly, human bone, flesh and blood is also considered ominous for study. Their presence forbids study for 3 days. 14. Presence of stool and urine prohibits study. 15. 66.6 ft. around 3 funeral place is unfit for study. 16. Study is provided during lunar eclipse. 17. Study is prohibited during solar eclipse. 18. Till the funeral of a big king or national leader after his death, study is prohibited. 19. Till the time when peace prevails after a fight between two neighbouring kings, study is torbiculen for 24 hours. 20. Physcial Body-In case a live-sensed animal dies or is killed in the upashraya (the place where monks/nuns are staying), scriptures should not be studied till the dead body is there. If the dead body is lying at a distance upto 100 nath, then also the scriptures cannot be studied. The above mentioned ten taboos relate to physical body. 21-28. Four auspicious days and four phatipadas (the days prolongs the auspicious day)-Fifteenth days of the bright fortnight (i.e. the days of full moon) in Ashadh (June), Ashvin (September), Kartik (October) and Chaitra (March) are known as Mahotsava (Auspicious days). The day immediately followings are mahapratipada. Scriptures should not be studied in these eight day. 29-32. Scriptures should not be studied for 24 minutes immediately preceding and immediately following the sunrise, the noon, the sunset and midnight. • 798 परिशिष्ट Page #392 -------------------------------------------------------------------------- ________________ अन्तकृद्दशा महिमा (अन्तकृद्दशासूत्र से सम्बन्धित विविध विशिष्ट प्रसंग, विषय स्पष्टीकरण, ग्राम, नगर आदि का परिचय) लेखक श्री सुयश मुनि सम्पादक श्रीचन्द सुराना 'सरस' अंग्रेजी अनुवाद श्री सुरेन्द्र बोथरा ANTAKRIDDAŠĀ MAHIMĀ THE IMPORTANCE OF ANTAKRIDDASA (Various important incidents, explanations about the themes, details about places like cities, villages, etc. included in Antakriddasha Sutra) By Shri Suyash Muni Edited by Srichand Surana 'Saras' English Translation by Shri Surendra Bothara अन्तकृद्दशा महिमा . २९५ . Page #393 -------------------------------------------------------------------------- ________________ क्रम 9. २. ३. ४. ५. ६. ७. ८. ९. 90. No. 1. 2. 3. 4. 5. 6. 7. 8. 9. 10. २९६ विषयानुक्रम अध्याय अन्तकृद्दशासूत्र : अन्तर् - बाह्य परिचय अन्तक्रिया : अर्थ और उदाहरण तीन महान् युगप्रवर्तक विविध तप: विधि-विधान और उद्देश्य संलेखना - संथारा : एक पर्यालोचन प्रतिमा योग निदान अन्तकृदशासूत्र में वर्णित प्रसिद्ध नगर, उद्यान आदि अन्तकृद्दशासूत्र में संकेतित / सन्दर्भित प्रसिद्ध व्यक्तित्व विविध प्रसंग Chapter CONTENTS Antakriddasha Sutra: A Detailed Introduction Antakriya Meaning and Examples Three Great Epoch-makers Various Austerities: Procedures, Codes and Purpose Sanlekhana - Santhara : A Study Pratima Yoga Nidan (Volition ) Famous Cities, Gardens etc. Described in Antakriddasha Sutra The Famous Characters, Mentioned in Antakriddasha Sutra Miscellaneous Topics For Private Personal Use Only पृष्ठ २९७ ३१३ ३३२ ३५० ३६८ ३८४ ४०२ ४१६ ४२८ ४६९ Page 305 323 341 359 376 393 409 422 449 479 अन्तकृद्दशा महिमा Page #394 -------------------------------------------------------------------------- ________________ अध्याय १ 中步步步步步步步步步步步步步步步步步步步步步步步步步步555555555岁男步步步步步步步步步步步步步步步步步步步步为中 अन्तकृद्दशा सूत्र : अन्तर्-बाह्य परिचय 0545 05555555555555555555555555555555555555555555555555555555510 मानवीय आकांक्षा ___ अनादिकाल से मानव की एक ही अदृश्य इच्छा रही है, वह है सुख-प्राप्ति की, दुःखों का अन्त करने की। यद्यपि यह इच्छा प्राणी मात्र में है, जैसा कि भगवान महावीर ने कहा है-“सव्ये जीवा, सव्ये सत्ता, सव्वे पाणा, सब्वे भूया, सुह साया, दुक्खा पडिकूला.. ___-संसार के सभी प्राणी सुख के अभिलाषी हैं, दुःख सभी को प्रतिकूल है, दुःख से बचना चाहते हैं और सुख पाना चाहते हैं। मानव संसार का एक ऐसा समर्थ प्राणी है जो अपनी कुशल मेधा-शक्ति, उन्नत बल-वीर्य पराक्रम के अनुसार दुःखों का अन्त करने और सुख-प्राप्ति की दिशा में अग्रसर हो सकता है। ___ मानव की सभी प्रवृत्तियाँ दुःखों का अन्त करने की दिशा में अग्रसर हुई हैं। सुख-प्राप्ति के लिए ही उसने भौतिक और वैज्ञानिक उन्नति की। महल, बाग-बगीचे, स्कूटर, मोटर, वायुयान, स्पूतनिक, टी. वी. आदि का आविष्कार किया। जीवन को उन्नतिशील बनाने के लिए उसने अनेक शास्त्रों की रचना की अर्थशास्त्र, समाजशास्त्र, नीतिशास्त्र, धर्मशास्त्र आदि। इनमें भी सुख-प्राप्ति के नियम और साधन ही निर्धारित किये। 'मुण्डे-मुण्डे मतिर्भिन्ना' के अनुसार कुछ लोग भौतिक साधनों में सुख की खोज करते हुए भौतिकवादी बन गये तो कुछ ने स्वयं अपने अन्दर ही सुख की गवेषणा की और आत्मानुभव (self-realisation) में प्रवृत्त होकर आध्यात्मिकता की ओर मुड़ गये। ___ अति प्राचीनकाल-प्रागैतिहासिककाल से ही भारत आध्यात्मिकता-प्रधान रहा है। धर्म तथा आध्यात्मिकता की आदि (beginning) इसी पवित्र धरा पर हुई, जिसका श्रेय आदि तीर्थंकर ऋषभदेव से लेकर चरम (चौबीसवें) तीर्थंकर भगवान महावीर को है। द्वादशांगी का महत्त्व भगवान महावीर ने प्राणी मात्र के कल्याण के लिए जो उपदेश दिये, उन उपदेशों को महान् प्रज्ञावान गणधरों ने बारह अंगों में संकलित किया। यह बारह अंग ही द्वादशांगी कहलाते हैं। द्वादशांगी की विशेषता यह है कि यह सर्वज्ञ द्वारा कथित है। सर्वज्ञ भगवान अर्थ-रूप वाणी बोलते हैं, उनके प्रमुख शिष्य गणधर उसे ग्रहण करके शासन के हित के लिए (प्राणी मात्र के कल्याण के लिए) निपुणतापूर्वक सूत्रों की रचना करते हैं। अन्तकृदशा महिमा • २९७ . Page #395 -------------------------------------------------------------------------- ________________ यही कारण है कि गणधरों द्वारा गूंथे हुए १२ अंगसूत्र भी कहे जाते हैं। वारह अंग हैं-(१) आचारांग, (२) सूत्रकृतांग, (३) स्थानांग. (४) समवायांग, (५) भगवती-व्याख्याप्रज्ञप्ति, (६) ज्ञाताधर्मकथांग, (७) उपासकदशांग, (८) अन्तकृद्दशांग, (९) अनुत्तरौपपातिकदशा, (१०) प्रश्नव्याकरण, (११) विपाकसूत्र, और (१२) दृष्टिवाद। (यह बारहवाँ दृष्टिवाद अंग लुप्त हो चुका है।) अन्तकृद्दशा : आठवाँ अंग उपरोक्त क्रम से प्रस्तुत अन्तकृद्दशासूत्र द्वादशांगी का आठवाँ अंग या सूत्र है। जैनदर्शन में ८ का अंक कुछ महत्त्वपूर्ण विशेषताएँ लिए हुए है, जैसे-सिद्धों के आठ गुण हैं। आत्मा के आठ मूल गुण हैं। मंगल भी आठ हैं। प्रमाद स्थान भी आठ हैं और कर्म भी आठ हैं; जिन्हें नष्ट कर जीव बंधन से छुटकारा पाता है। प्रस्तुत आठवें अंग में भी ऐसे साधकों का वर्णन है, जिन्होंने अपने संपूर्ण आठ कर्मों का विनाश करके अन्त में अपने लक्ष्य-मुक्ति की प्राप्ति की है। नामकरण एवं शब्दार्थ प्रस्तुत अंग का नाम अन्तकृद्दशांगसूत्र है। यह नाम चार शब्दों से मिलकर निष्पन्न हुआ है। वे शब्द हैं-(१) अन्तकृत, (२) दशा, (३) अंग, और (४) सूत्र। इन चारों शब्दों के पृथक्-पृथक् रूप से अर्थ पर विचार करने से प्रस्तुत सूत्र के नामकरण का रहस्य स्पष्ट हो जायेगा। १. अन्तकृत् प्रस्तुत अंग के नाम का यह प्रथम शब्द है-अन्तकृत्। इसका अर्थ है-अन्त करने वाले भवान्त, भव का अन्त करने वाले अथवा जन्म-मरण रूप संसार का अन्त करने वाले। जिस लक्ष्य के लिए साधना-मार्ग अपनाया जाता है, उस लक्ष्य को प्राप्त करने वाले (end-winners), संसार के सभी दुःखों का अन्त करके मुक्ति-सिद्धि प्राप्त करने वाले। प्रस्तुत सूत्र का यह प्रथम शब्द सार्थक और सटीक है, क्योंकि इसमें उन साधक एवं साधिकाओं का, उनकी साधना, तपस्या आदि का वर्णन किया गया है, जिन्होंने अपना अन्तिम लक्ष्य मुक्ति (salvation) को पाकर अपना मानव-जीवन सफल किया और अनन्त, निराबाध सुख में लीन (beatified) हो गये। २. दशा प्रस्तुत अंगसूत्र के नाम का दूसरा घटक (शब्द) 'दशा' है। ‘