Book Title: Pramana Nirnay
Author(s): Vadirajsuri, Surajmukhi Jain
Publisher: Anekant Gyanmandir Shodh Sansthan

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Page 28
________________ कथमेवमप्यन्वितज्ञानाविष्वग्भावे तत्तत्समयभाविन्योऽर्थप्रमितयो व्य'तिभिद्यन्ते इति चेत्, युगपदाविन्यः कथं?तदानीमेकैव करितुरगादिविषया प्रमितिरपीति चेन्न, तस्यास्तुरगोन्मुखस्वभावत्वे तद्विषयतया नरवारणादेरपि तुरगरूपत्वापत्तेः। अतत्स्वभावत्वे तया तुरगस्याऽव्यवस्थापनप्रसङगात्। नरवारणादेरपि तत्तदुन्मुखयस्वभावयैव तया विषयीकरणं न तुरगोन्मुखस्वभावयैव यदयं प्रसङ्गः इति चेत्, सिद्धं तर्हि युगपत्प्रमिते नात्वं, औन्मुख्यनानात्वे तद्रूपतया तत्राऽपि नानात्वस्योपपत्तेः। अतो युगपदिव कमेणाऽपि अन्वितज्ञानाविष्वग्भावेऽपि व्यतिभेदोपपत्तेः। तत्र तत्र प्रमितौ तस्यैवान्वयिनः संवेदनस्य साधकतमत्वं, नाचेतनस्येन्द्रियलिड्गादेः, नाप्यसम्यज्ञानस्याध्यवसायादेरिति स्थितम् ।।9।। शंकाकार कहते हैं ऐसा होने पर भी संबद्ध ज्ञान के सर्वव्यापी न होने पर भिन्न भिन्न समय में होने वाली अर्थप्रमितियां परस्पर भिन्न कैसे होती हैं।आचार्य कहते हैं फिर युगपत् होने वाली अर्थप्रमितियां कैसे भिन्न होती हैं? युगपत् करि तुरग आदि को विषय करने वाली प्रमिति भी एक ही है, यह भी नहीं कह सकते।उस प्रमिति का तुरगोन्मुख स्वभाव होने पर उसको विषय करने वाली प्रमिति के कारण मनुष्य हाथी आदि को भी तुरग रूपत्व का प्रसंग होने से।तुरगोन्मुख स्वभाव नहीं होने पर तुरग का ही व्यवस्थापन नहीं होने से।यदि यह कहो कि नर वारण आदि का भी उस स्वभाव वाली प्रमिति के द्वारा ही उनका उस प्रकार विषयी करण होता है, तुरगोन्मुख स्वभाव वाली प्रमिति के द्वारा नहीं, जिससे उक्त आपत्ति आये तब तो एक साथ प्रमिति की भिन्नता सिद्ध ही हो जाती है।उन्मखता के भिन्न होने पर उसी प्रकार प्रमितियों की भी भिन्नता होने से अतः युगपत के समान कम से भी संबद्ध ज्ञान के सर्वगत होने पर भी प्रमितियों में भेद होने से पूर्वोत्तर समय में होने वाली प्रमिति में उसी से संबद्ध संवेदन को साधकतमत्व होता है अचेतन इन्द्रिय लिंगादि को नहीं, न मिथ्या ज्ञान और अनध्यवसाय आदि को।।9।। तस्य संवेदनस्य स्वरूपमर्थश्चेति द्विविधो विषयः ।तत्रोभयत्रापि तत एव प्रमितेः। कः पुनरर्थो नाम यत्र ततः प्रमितिरिति चेत्, संवेदनबहि विनीलादिरेव, यद्यसौ प्रकाशते न कथमस्ति?व्योमकुसुमादिवत् प्रकाशते चेत, न संवेदनबहिर्भाव -स्तस्य प्रकाशस्यैव संवेदनत्वेन प्रसिद्धेऽपि संवेदने प्रतिपत्तेः। संवेदनं प्रकाशरूपमेव, नीलादिस्तु कदाचिदप्रकाशोऽपि, ततस्तस्यार्थत्वं प्रकाशबहिर्भावात् इति चेत् ।अप्रकाशावस्थस्य यदि न तस्य प्रतिपत्तिः कथमस्तित्वमति-प्रसगात्। प्रतिपत्तिश्चेन्न प्रकाशवैकल्यं, प्रकाशवत्त्वादेव प्रतिपन्नतोपपत्तेः। ततो नीलादेः प्रकाशबहिर्भावेन नार्थत्वमिति-कथं तस्य संवेदनादन्यतः प्रतिपत्तिः? ||10|| ' परस्परं भिद्यते। 2 प्रमितानां। पूर्वोत्तरसमये। 'ज्ञानाद्वैतवादी सौगतो वक्ति ।प्रमितेर्भिन्नः कः पुनरर्थो नामेति प्रश्नस्याशयः । 5.जैनः। भवतीति शेषः ।

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