Book Title: Prakaran Samucchay
Author(s): Ratnasinhsuri
Publisher: Rushabhdev Kesarimal Jain Shwetambar Sanstha
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प्रकरण
समुच्चय:
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ते भितो मिच्छत्तमोहाणिज्जं तिहा कुणइ || ३ || सुद्धं अद्धविसुद्धं अविसुद्ध चैव करणकालं जा । तत्तोऽनियट्टिकरणं अंतमुहुत्तं पवज्जित्ता ॥ ४ ॥ तप्पज्जेते सुद्धं पुंजं समुदीरिऊण वेयंतो । खाओवसमियसम्मत्तधारगो होइ सो पच्छा ||५ || अंतोमुहुत्तमवरं छावाईं सागराई उक्कोसं । चउगइगओऽवि एवं सम्मत्तं लहइ भव्वजिओ || ६ || अन्नोऽवि तव्विहो किचय नवरि तिपुंजं करेइ नापुत्र्वे । करणमि सुज्झइ च्चिय ठिइरसघायाइ| ३५ ॥ ४९ करणं ॥ ७॥ तत्तोऽनियट्टिकरणे वट्टित्ता सुज्झिऊण ( शुधोभूत्वा ) य तव । तव्विरमे विक्खंभियमिच्छत्रुदयं तओ भवइ ॥ ८ ॥ उवसमसम्मदिट्ठी अंतमुत्तं तओ स नियमेणं । वेयइ मिच्छत्तं चिय तदुवरमे कलुसपरिणामो || ९ || कोई पुण सासाणो होडं उवसामिगंतभागम्मि । वेयइ मिच्छत्तं चिय तं चिय जं तस्स संतं तु ॥ १० ॥ उवसमियसम्मकाले तस्स पएसोदएण मिच्छत्तं । केई भणति भणियं एवं पुण कप्पभासम्म (कल्पभाष्ये) ॥ ११ ॥ जो अन्नया उ सम्मं अतिपुंजो लहइ अद्धसुद्धं सो । पुंजं करिडं तव्वेयगो य सुद्धं तओ कुणइ ॥ १२ ॥ अद्धविसुद्धाओ काड्डेऊण केई तहाविद्दे बंधे । पच्छा खाओवसमिगसम्मदिट्ठी जिओ होइ ।। १३ ।। जे कम्पयडिपाहुड वियक्खणा ते भांति पुण एवं । उवसमियसम्मकाले सम्मत्तमहापवत्तेणं ॥ १४ ॥ तत्थ पढमं विसुज्झिय अभवजियाओ अनंतगुणणाए । तत्तो अपुव्वकरणं भिन्नमुत्तं पवज्जेई ।। १५ ।। ठिघाओ रसघाओ गुणसेढी तह अपुव्वठिइबंधो । तत्थ पवत्तंती पढममेव गुणसंकमो न उण ॥ १६ ॥ तत्तोऽनियट्टिकरणे गयाम्म तह चैव नवरि सेसंभि । संखेज्जइमे भागे अंतमुहुत्तं अहो मुच्चा ॥ १७ ॥ करणोवरि अंतमुहुत्तमित्तियाओ ठिईड मिच्छस्स । उक्किरइ भावविसओ तं दलियमहोवरिं च खिवे ।। १८ ।। एवं अंतरकरणे कयम्मि खीणेऽनियट्टिकालंमि । अंतरकरणपवेसे उबसमियं लहइ सम्मं सो ||१९|| सम्मत्तगुणेण तओ विसोहई कम्ममेस मिच्छत्तं । सुज्झति कोदवा जह मयणा ते ओसहेणेव ॥ २० ॥ गुणसंकमेण पढमं अंतमुहुत्तं तओ तदंतम्मि । विज्झायनामगेणं संक्रमभेषण सुशंति ॥ २१ ॥ अंतरकरणस्संते अज्झवसाणाणुरूवमेगयरं । पडिव
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सम्यक्त्वो
पायप्रकर०
॥ ३५ ॥

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