Book Title: Yatindrasuri Abhinandan Granth
Author(s): Kalyanvijay Gani
Publisher: Saudharmbruhat Tapagacchiya Shwetambar Shree Sangh
View full book text
________________
विषय खंड
अंग विज्जा कर्दम, प्रासादतल, भूमि, वृक्ष आदि के सान्निध्य में खड़े होकर प्रश्न करने के फलाफल का निर्देश किया गया है । (पृ० ३१-३३)
ग्यारहवें पटल में नेत्रों की भिन्न २ स्थिति और उनके फलाफल का विचार है। (पृ० ३४)
बारहवें पटल में चौदह प्रकार के हसित या हँसने का निर्देश करते हुए उनके फल का कथन है। (पृष्ठ ३५-३६)
तेरहवें पटल में विस्तार से पूछनेवाले या प्रश्नकर्ता की शरीर-स्थिति और उससे संबंधित शुभाशुभ फल का विचार किया गया है । (पृ. ३६ - ३७)
चौदहवें पटल में वंदन करने की विधि को आधार मानकर इसी प्रकार का विचार है । (पृ. ३७ - ४०,
प्रश्नकर्ता व्यक्ति जिस प्रकार का संलाप करे उसे भी फलाफल का आधार बनाया जा सकता है इस बात का पन्द्रहवें पटल में निर्देश है (पृ. ४०-४१)
_इस प्रकार के बीस संलाप कहे गये हैं जो अर्थ, धर्म, काम, मोक्ष इन चारों भागों में बाँटे जा सकते हैं । पुष्प, फल, गन्ध, माल्य आदि मांगलिक वस्तुओं के संबंध की चर्चा अर्थसिद्धि की सूचक है । ऐसी ही अनेक प्रकार की कथा या बातचीत के फल का निर्देश किया गया है।
सोलहवें पटल में आगत अर्थात् आगमन के प्रकारों से शुभ-अशुभ फल सूचित किए गये हैं (पृ. ४१-४२)।
_ सत्रहवें पटल से तीसवें पटल तक रोने - धोने, लेटने, आने-जाने, जंभाई लेने, बोलने आदि से फलाफल का कथन है [पृ. ४३-५६] । किन्तु सांस्कृतिक दृष्टि से इस अंश का विशेष महत्त्व नहीं है।
नौवें अध्याय की संज्ञा अंगमणि है। इसमें २७० विषयों का निरूपण है । पहले द्वार में शरीर संबंधी ७५ अंगों के नाम व उनके शुभाशुभ फल का कथन है । विभिन्न प्रकार के मनुष्य, देवयोनि, नक्षत्र, चतुष्पद, पक्षी, मत्स्य, वृक्ष, गुल्म, पुष्प, फल, वस्त्र, भूषण, भोजन, शयनासन, भाण्डोपकरण, धातु, मणि एवं सिक्कों के नामों की सूचियां हैं । वस्त्रों में पटशाटक, क्षौम, दुकूल, चीनांशुक, चीनपट्ट, प्रावार, शाटक, श्वेत शाट, कौशेय और नाना प्रकार के कम्बलों का उल्लेख है । पहनने के वस्त्रों में इनका उल्लेख है- उत्तरीय, उष्णीष, कंचुक, वारबाण [एक प्रकार का कंचुक], सन्नाहपट्ट [कोई विशेष प्रकार का कवच], विताणक और पच्छत [संभवतः पिछौडी जो पीठ पर डाल कर सामने की ओर छाती पर गठिया दी जाती थी जैसा मथुरा की कुछ मूर्तियों में देखा जाता है ], मल्लसाटक [पहलवानों का लंगोट ] [पृ० ६४]
आभूषणों के नामों की सूची अधिक रोचक है [पृ ६४-६५] । किरीट और मुकुट सिर पर पहनने के लिए विशेष रूप में काम में आते थे । सिंहभंडक वह आभूषण
Jain Educationa International
For Personal and Private Use Only
www.jainelibrary.org