Book Title: Suktimuktavali
Author(s): Somprabhacharya, Ajitsagarsuri
Publisher: Shanti Vir Digambar Jain Sansthan

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Page 12
________________ सूक्तिमुक्तावली पाही होते हैं दूसरों के दोषों को ग्रहण कमी नहीं करते । आचार्य कहते हैं कि हम इस काव्य प्रन्थ का निर्माण कर रहे हैं सो पूर्व भाचार्यों की परम्परा से कर रहे हैं, अपनी बुद्धि से नहीं। इस हेतु ( कारण ) से इम कर्त्ता नहीं हैं। केवल भक्ति के अनुराग से ग्रन्थ रचना की है। अतः प्रमाद यश से कहीं पर भूल चूक हो तो सज्जन पुरुष विचार कर शुद्ध करलें। क्योंकि उनका स्वभाव ही ऐसा होता है जो गुण प्रहण ही करते हैं दोषों पर दृश्रिपात नहीं करते तो पेसी दशा में उनसे प्रार्थना करने से क्या प्रयोजन ? क्योंकि यदि हमारे वचनों में गुण होंगे तो वे सामन पुरुष विस्तार ही करेंगे और यदि दोष होंगे तो दोषों को दूर कर विस्तार करेंगे। जैसे जख कमलों को उत्पन्न करता है परन्तु पवन गन्ध को फैलाता है क्योंकि पवन का खभाव यही है। इसी प्रकार प्रन्थकर्ता को यदि यश नहीं तो यशविस्तार की प्रार्थना करने से क्या प्रयोजन है ? यदि यश है तो भी प्रार्थना करने से क्या प्रयोजन १ अतः सज्जन पुरुष मुझे बालक समझ कर अनुग्रह बुद्धि कर शुद्ध करेंगे ही। इस प्रकार प्रत्यकार ने अपनी लघुता प्रदर्शित की है। अथ विहितसकलसुरासुरसेवाय देवाधिदेवस्य श्रीवीसरागस्यागमानुसारेण भन्यानां हितहेतवे धम्मोपदेशमाइ इन्द्रवन्नाछन्दः वित्रर्मसंसाधनमन्तरेण, पशोरिवायुर्विफलं नरस्य । तत्रापि धर्म प्रवरं वदंति, न तं विना यद्भवतोऽर्थकामौ ।।३।।

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