Book Title: Parikshamukh
Author(s): Ghanshyamdas Jain
Publisher: Ghanshyamdas Jain

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Page 10
________________ ॥ श्री जिनाय नमः ॥ || परीक्षामुख भाषा अर्थ सहित || वा जैनियों का मूल न्याय सिद्धान्त । ग्रन्थकार की प्रतिज्ञा तथा प्रयोजन । प्रमाणादर्थसंसिद्धिस्तदाभासाद्विपर्ययः । इति वक्ष्ये तयोर्लक्ष्म सिद्धमल्पं लघीयसः ॥१॥ भाषार्थ — प्रमाण ( सच्चे ज्ञान ) से पदार्थों का निर्णय होता है, और प्रमाणाभास ( झुंटे ज्ञान से पदार्थों का निर्णय नहीं होता ; इस लिये मन्दबुद्धिवाले बालकों के हितार्थ. उन दोनों का लक्षण थोड़े शब्दों में, जैसा कि पूर्व महर्षियों ने कहा है; कहता हूँ । अब प्रमाण के स्वरूप का निर्णय करते हैं । प्रमाण का लक्षण । स्वापूर्वार्थ व्यवसायात्मकं ज्ञानं प्रमाणम् ॥१॥ भाषार्थ - - अपने तथा पूर्वार्थ के निश्चय करने वाले ज्ञान को प्रमाण कहते हैं |

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